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Incest फूफी और उसकी बेटी से शादी

फिर हम दोनों हँसने लगे। मैंने उस ड्रेस की पेमेंट की और हम लोग होटेल चले गये। वहां पर थोड़ी देर काम करने के बाद मेम घर चली गई, और उनके जाने के बाद में भी घर चला गया।

मैंने घर पहुँच के शाजिया और फूफी को वो सूट्स दिखाए और मैंने जब उन दोनों को ये बताया की मेरी मैडम ने मुझे ये दिलवाया है तो अचानक पता नहीं फूफी और शाजिया को क्या हुआ की उन दोनों के खुश चेहरे गुस्से से लाल हो गये।

मैंने पूछा- "अचानक क्या हो गया? तुम दोनों इतना गुस्सा क्यों हो गये?"

फूफी- "तुम्हारी मेडम को अचानक क्या हो गया की उन्होंने तुम्हें इतने महंगे सूट दिलवा दिए?

शाजिया- हाँ भैया, इतने महंगे सूट कोई ऐसे ही नहीं दिलवा देता है। आखिर बात क्या है?

मैं- कोई बात नहीं है जान। मैं उनका दोस्त हूँ, इस नाते शायद उन्होंने मेरे लिए ये सूट खरीद दिया है।

फूफी नहीं वसीम ऐसा नहीं होता की कोई अपने पी.ए. या दोस्त के लिए इतने महंगे ड्रेस खरीद दे, वो भी बिना किसी बात के, और तुमने उससे ये ले कैसे लिया?"

मैं- "मैं सूट के पैसे दे रहा था पर उन्होंने देने नहीं दिया। इसलिए मैंने उनके लिए एक लड़कियों वाला सूट खरीदा और उनको दे दिया..."

शाजिया- आपने भी उनके लिए सूट खरीदा?

मैं- हाँ। क्यों क्या हो गया? मेम ने मेरे लिए 3 सूट खरीदे तो क्या मैं उनके लिए एक सूट भी ना खरीदूं?

फूफी और शाजिया मुझे गुस्से से देख रहे थे

शाजिया- "वाह भैया वाह... आपने उसके लिए सूट खरीदा। वैसे कितने का था वो सूट?"

मैं- “क्यों तुम जान के क्या करोगी?"

फूफी और शाजिया एक साथ बोली- "नहीं मुझे जानना है..."

उन दोनों को इतने गुस्से में देखकर मेरी तो हवा टाइट हो रही थी। मैंने सोचा- "यार मुझे इन दोनों को मेम के सूट के बारे में नहीं बताना चाहिए था। लग रहा है इन दोनों को जलन हो रही है...."

मैं- “वो सूट ₹10500 का था...'

शाजिया और फूफी- "क्या 10500 रुपये ?"

फूफी- "तुम आज तक मेरे लिए तो कोई इतनी महंगी चीज नहीं लाए ...

"

शाजिया- "अम्मी को छोड़ो... आपने मेरे लिए भी आज तक इतना महंगा सामान नहीं खरीदा जबकी आप मुझसे

" ये कहते कहते शाजिया रुक गई।

फूफी शाजिया को घूर घूर के देखने लगी।

शाजिया ने बात पलट दी- "मतलब... जबकी हम दोनों आपसे इतना प्यार करते हैं...

मैं मन में सोच रहा था- "आज तो लग रहा है की ये दोनों मुझे नहीं छोड़ेंगी.. "

फूफी - सच-सच बोलो वसीम कहीं तुम दोनों के बीच कुछ चल तो नहीं रहा है?

मैं- नहीं नहीं फूफी ऐसा कुछ नहीं है। तुम दोनों ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ?

शाजिया- सच बोलिए भैया?

मैं- हाँ मेरी जान मैं सच बोल रहा हूँ। मेरे और मेडम के बीच कुछ नहीं है। तुम दोनों मेरा यकीन करो ।

उन दोनों ने कुछ नहीं कहा, और कमरे में एकदम शांति थी।

मैं- गुस्से से "लग रहा है तुम दोनों को मुझ पे यकीन नहीं है। इसलिए तुम लोग कुछ बोल नहीं रहे हो। मैं जानता हूँ की मैंने अभी तक कोई गलत काम नहीं किया है। फिर भी तुम लोगों को मुझ पर यकीन नहीं तो कोई बात नहीं। मैं भी अब से तुम दोनों से बात नहीं करूँगा...”

फूफी और शाजिया ये सुनकर एकदम से चौंक गई।

फूफी- "नहीं नहीं वसीम ऐसा कुछ भी नहीं है। तुम तो गुस्सा हो गये..."

शाजिया- "हाँ भैया, आप ऐसी बातें ना करो। आपके सिवाए मेरा है ही कौन?"

फूफी उसे घूर के देखने लगी।

मैं- “नहीं। मुझे लगता है की तुम दोनों को मुझ पर अब यकीन नहीं रहा..."

फूफी- ऐसा ना बोलो वसीम तुम ही तो हम दोनों के सब कुछ हो।

शाजिया और फूफी माफी माँगने लगी और कहने लगी- “अब से हम लोग तुमपे शक नहीं करेंगी...

मैंने कहा- "चलो ठीक है माफ किया। कोई बात नहीं..." और थोड़ी देर बाद सब कुछ नार्मल हो गया।
 
शाजिया- "भैया वैसे सूट आप पे बड़ा अच्छा लग रहा था.." फूफी किचेन में खाना बनाने चली गई थी।

मैं- “थैंक यू मेरी जान.” मैंने शाजिया को बाहों में पकड़ रखा था। हम लोग बेड पे बैठे सब कुछ ठीक चल रहा है? कोई परेशानी तो नहीं?"

शाजिया- "नहीं भैया सब ठीक है, और मुझे मजा भी खूब आ रहा है वहां..."

मैं शाजिया के पीछे बैठा था। मेरा चेहरा उसके चेहरा के करीब था। मैंने कहा- "काफी समय हो गया तुमने मुझे एक भी किस नहीं दिया..."

शाजिया- "हाँ भैया मैं भी यही सोच रही थी की आपने मुझसे बहुत समय से किस नहीं माँगा। कही आप किसी और लड़की में बिजी तो नहीं थे?"

मैं- “नहीं पगली, मैं तुमसे ही प्यार करता हूँ। चलो अब तो मुझे किस दो..."

शाजिया पलटी और मुझ पर टूट पड़ी और किस करने लगी। मैं नीचे लेटा हुआ था और वो मेरे ऊपर थी। हमारी किस बहुत देर तक चली। शाजिया मेरे ऊपर से उठी और साइड में जाकर बैठ गई। मैं भी उठा और बैठ गया ।

मैं- “आए मेरी जान... ये क्या था तुम इतना उत्तेजित कब से हो गई?"

शाजिया- "जब से मुझे लगा की आप अपनी मेडम के इतना पास आ रहे हैं, तो मैं आपको खो नहीं सकती इसलिए मुझे आप पे इतना प्यार आ रहा है..'

मैं- "अच्छा तो तुम्हें जलन हो रही है?"

"

शाजिया- "हाँ मुझे जलन हो रही है, क्योंकी मेरा प्यार आपके लिए दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है पर "

मैं- “पर तुम मुझे अपना प्यार दिखाती तो नहीं हो?"

शाजिया- क्या करूं यहां अम्मी हमेशा रहती हैं, मैं कुछ नहीं कर सकती।

मैं- “अच्छा ये बात है... तो चलो कल मैं और तुम दिन भर साथ रहेगे..."

शाजिया पर आपको तो कल आफिस जाना होगा।

मैं- "मैं छुट्टी ले लूँगा। पर तुम फूफी को ये मत बताना.."

शाजिया खुश हो गई और मुझे गले लगा के फिर से किस करने लगी। मेरा एक हाथ उसकी कमर में था और दूसरा हाथ उसकी गाण्ड में था। पर फिर भी वो कुछ नहीं कह रही थी। मैं समझ गया की शाजिया को वाकई में मुझसे प्यार होने लगा है। उस दिन में बहुत थका था इसलिए हम लोग खाना खाकर जल्दी सो गये।

…..

अगले दिन सुबह जब मैं उठा तो शाजिया स्कूल के लिए तैयार हो रही थी, और फूफी साफ सफाई कर रही थी। मैं फ्रेश होकर शाजिया के पास गया और कहा- “तुम्हें कल का प्लान तो याद है, है ना?"

शाजिया- "हाँ भैया, मुझे याद है। आप बस होटेल के लिए निकलो..."

मैंने सोचा एक बार फूफी को देख आऊँ। वो अब किचेन में थी। मैं वहां गया और फूफी को पीछे से पकड़ लिया।

फूफी- क्या हुआ वसीम ? आज बहुत अच्छे मूड में लग रहे हो क्या बात है?

मैं- कोई बात नहीं है मुझे बस मेरा गुड मार्निंग किस चाहिए।

फूफी- "ठीक है, ले लो। किसने रोका है?"

मैं फूफी को अपनी तरफ घुमाया और उन्हें किस करने लगा। 10 मिनट किस करने के बाद मैं होटेल के लिए निकलने लगा। फूफी गेट पे खड़ी थी और मैं अपनी बाइक स्टार्ट कर रहा था।

तभी प्लान के मुताबिक शाजिया आई और कहने लगी- "भैया मुझे स्कूल छोड़ दोगे?"

मैंने कहा- "हाँ क्यों नहीं? आओ बैठ जाओ..."

पहले भी स्कूल बंक का प्लान कामयाब हो चुका था इसलिये शाजिया बिना डरे आकर बैठ गई और हम लोग चल दिए। थोड़ी दूर जाने के बाद मैंने बाइक रोकी। क्योंकी में मेम को फोन करना भूल गया था, तो मैंने मेम को तुरंत काल किया और उनसे बहाना बनाकर छुट्टी ले ली। उन्होंने एक बार भी मुझे छुट्टी के लिए मना नहीं किया है। वो हमेशा बिना कुछ ज्यादा कहे मान जाती हैं।

मैं- "अब बताओ मेरी जान कहां चलोगी?"

शाजिया- "कहीं भी चलिए, बस मुझे आपके साथ ही टाइम बिताना है..."

मैंने सोचा- "सबसे पहले इसको कही घुमाने ले जाऊँ, फिर इसको लवर्स पाइंट लेजाकर सिड्यूस करूँगा..."

मैं अपने प्लान के मुताबिक उसे घुमाने ले गया। वो मेरे साथ बहुत खुश लग रही थी। मैं भी उसके साथ बहुत काम्फर्टेबल महसूस कर रह था। वो हमेशा मेरा हाथ पकड़कर रखती और मेरे साथ चिपक के चलती। मस्ती मजाक करते-करते 12:00 बज गये थे। मैंने सोचा अब शाजिया को लवर्स पाइंट ले जाता हूँ थोड़ी देर में हम लोग वहां पहुँच गये।

शाजिया उस जगह को देखकर पहचान गई और कहने लगी- “आप मुझे यहां क्यों लाए हैं?"

मैं- "क्योंकी मेरी जान ये जगह हम जैसे प्यार करने वालों के लिए ही बनी है। तुम्ही ने कहा था की घर में फूफी के होते हुए तुम मुझे अपना प्यार नहीं दिखा सकती, तो मैं तुम्हें इस जगह लाया हूँ। अब तुम्हें दिखाना है की तुम मुझसे कितना प्यार करती हो?"

शाजिया शर्माकर हँसने लगी और उसे हँसता हुआ देखकर मेरे चेहरे पे भी स्माइल आ गई। मैंने उसे झाड़ियों के पास लगी एक बेंच पे बैठा दिया। वहां आस-पास कोई नहीं था, पर लवर्स पाइंट पे कई कपल मौजूद थे और सभी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ चालू थे। शाजिया उन्हें देखकर शर्मा रही थी, इसलिए मैं उसे ऐसी जगह ले गया जहां आस-पास कोई नहीं था। शाजिया मेरे साथ चिपक के बैठी थी। उसका हाथ मेरे हाथ में था।

मैंने उससे कहा- "शाजिया तुम मुझसे कितना प्यार करती हो?"

शाजिया- बहुत प्यार करती हूँ इतना की आप सोच नहीं सकते।

मैं तुमको मुझसे इतना प्यार कब हो गया?

शाजिया- "ये तो मुझे भी नहीं पता की मुझे आपसे प्यार कब हुआ ? बस हो गया, क्या आपको मुझसे सच्चा प्यार है?"

मैं- हाँ शाजिया, बहुत प्यार है।

शाजिया- सच.. आपको पता नहीं ये सुनकर मुझे कितना अच्छा लग रहा है की आपके दिल में मेरे लिए प्यार पर मुझे आपसे ये भी क्लियर करना है की आपके दिल में मेरे सिवाए कोई और भी तो नहीं है?" और ये कहते से भर गया था।

उस पल मुझे लगा कहीं शाजिया को पता तो नहीं है फूफी के बारे में? मैं सोचने लगा की आखिर क्या कहूँ शाजिया से की मैं तुम्हारी अम्मी के साथ शारीरिक संबंध बना चुका हूँ? मुझे उसे धोखा देते हुए अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिये उसके इस सवाल पे मैं चुप था।

शाजिया- आप खामोश हैं। इसका मतलब आपके जीवन में कोई और है

मैं- “हाँ शाजिया.... मेरे जीवन में पहले से कोई है...."

शाजिया- इसका मतलब आप मुझसे उतना प्यार नहीं करते जितना मैं आपसे करती हूँ और आप मुझे कभी उतना प्यार नहीं दे पाएंगे। वैसे कौन है वो लड़की जिसे आप जैसा अच्छा साथी मिला?" कहकर शाजिया उदास हो गई थी।

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं उसे फूफी के बारे में कैसे बताऊँ? मैंने कहा- "शाजिया तुम उसका नाम जानकर क्या करोगी? मैं तुमसे सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ तो मुझ पे सबसे पहला हक तुम्हारा ही है और किसी का नहीं..."

शाजिया ये सुनकर वो खुश हो गई, और कहा "आप सच बोल रहे हैं?"

मैं- “हाँ शाजिया, मैं सच बोल रहा हूँ...

"

शाजिया- "तो आप मेरे लिए उस लड़की को छोड़ देंगे?"

मैं- "देखो शाजिया, मैं किसी के साथ धोखा नहीं कर सकता। वो लड़की भी मुझे बहुत प्यार करती है और मैं उसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकता। पर मेरे दिल में तुम्हारे लिए उससे ज्यादा प्यार है, तो तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है..."

शाजिया- “अगर आपके दिल में मेरे लिए सबसे ज्यादा प्ययर है तो उसे आप क्यों नहीं छोड़ सकते?"

मैं- "क्योंकी शाजिया मेरे दिल में उसके लिए भी थोड़ा प्यार है। तुम समझ क्यों नहीं रही हो?"

शाजिया- "प्लीज आप उसे छोड़ दो। मैं आपके लिए कुछ भी कर सकती हूँ। क्या वो कर सकती है?"

मैं- “हाँ शाजिया। वो भी मेरे लिए कुछ भी कर सकती है..."

शाजिया- "इसका मतलब आप मुझसे उतना प्यार नहीं करते जितना उसे करते हैं..."

हमारे बीच थोड़ी देर तक बहस होने लगी। शाजिया बहुत गुस्से में आ चुकी थी। मैं समझ रहा था पर मैं अपने रिश्ते की शुरुवात धोखे से नहीं करना चाहता था।
 
शाजिया- "मुझे अब कुछ नहीं सुनना है। अगर आप मुझसे प्यार करते तो मेरी बात सुनते, और उस लड़की को मेरे लिए छोड़ देते। पर आपने ऐसा नहीं किया। इसका मतलब मैं समझ गई हूँ। आप मुझे घर छोड़ दें ...

मैंने सोचा- "अभी बात को आगे ना बढ़ाएं, नहीं तो शाजिया को और गुस्सा आ सकता है ..."

मैं- "ठीक है। मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ.” और थोड़ी देर में मैंने उसे घर के पास छोड़ दिया और कहा- “फूफी से कह देना तुम्हारे स्कूल में तुम्हारी तबीयत खराब हो गई थी तो स्कूल वालों ने तुम्हें घर छोड़ दिया इससे फूफी को शक नहीं होगा की तुम कही बाहर गई थी..."

शाजिया बिना कुछ जवाब दिए वहां से चली गई।

मेरा तो आज का पूरा दिन बर्बाद हो गया था। मैं सोच रहा था की अब मैं क्या करूं? शाजिया तो नाराज हो गई है और वो इतना जल्दी तो नहीं मानेगी। शायद उसे अभी के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए। अभी दोपहर हुई थी तो होटेल चला गया। वहां पहुँच के मैंने मेम से कह दिया- “मेरा काम पहले हो गया तो में आ गया आपकी हेल्प करने..."

मेम मुझे अचानक देखकर खुश हो गई। मैंने नार्मल कपड़े पहने थे तो ये देखकर मेम बोली- "वसीम तुमने मेरा दिया हुआ सूट क्यों नहीं पहना ?”

मैं- "मेम मैं अपने काम से बाहर गया हुआ था, इसलिए नार्मल कपड़े पहने हुये हूँ। मुझे नहीं पता था की मेरा काम इतनी जल्दी खतम हो जाएगा, नहीं तो मैं आपका दिया हुआ सूट ही पहनकर आता.." ‘

मेडम - "कोई बात नहीं वसीम?"

मैं- "मेम आपने वो सूट क्यों नहीं पहना जो कल मैंने खरीदा था ?"

मेडम “वो सूट तो मेरे लिए स्पेशल है। मैं उसे ऐसे ही नार्मल दिन नहीं पहनूंगी स्पेशल है वो ..."

मैं- कैसे मेम?"

मेम थोड़ा घबरा के बोली- स्पेशल मतलब वो सट पिंक कलर का है और पिंक मेरा फवरिट कलर है इसलिए...

मैं- “अच्छा मुझे नहीं पता था की पिंक आपका फेवरिट कलर है पर मैं बहुत खुश हूँ की आपको वो सूट पसंद आया..."

"

मेम हँसने लगी- “पसंद क्यों नहीं आएगा? आखीरकार, मेरे बेस्ट दोस्त ने जो दी थी..."

मैं- थैंक मेम

उस दिन मेम और मैंने ज्यादा काम नहीं किया, बस बातें ही करते रहे एक दूसरे के बारे में और होटेल के बारे में। उनकी और मेरी बहुत अच्छी बान्डिंग हो चुकी थी कपड़ों की शापिंग के बाद। मेम तो बहुत खुश लग रही थी पर मैं थोड़ा उदास था शाजिया को लेकर। शाम होते ही वो घर निकल गई और मैं भी।

मैं कुछ देर में घर पहुँच गया। अपने हाथ पैर धोकर अपने कपड़े खोलने लगा। फूफी और शाजिया मेरे सामने ही बैठकर टीवी देख रही थी। कपड़े खोलने के बाद मैंने अपनी शार्टस पहन लिए और बिस्तर पर आराम करने लगा। शाजिया अभी भी मुझसे नाराज थी, वो मेरे तरफ देख भी नहीं रहीं थी ।

थोड़ी देर बाद फूफी कुर्सी से उठकर मेरे पास बिस्तर पे बैठ गई और कहने लगी- "क्या हुआ वसीम, बहुत उदास लग रहे हो?"

मैं शाजिया की तरफ देखने लगा, और कहा- "नहीं फूफी, कुछ नहीं हुआ बस थोड़ा थक गया हूँ."

फूफी- “लाओ मैं तुम्हारे पैर दबा देती हूँ, तुम्हारी थकान थोड़ी कम हो जाएगी..."

मैं- "ठीक है फूफी...

फूफी मेरा पैर दबाने लगी, मैं शाजिया को ही देख रहा था। पर वो मेरी तरफ देख ही नहीं रही थी, टीवी देखने की आक्टिंग कर रही थी।

अचानक फूफी पैर दबाते-दबाते मेरे लण्ड को छूने लगी। मैंने उनकी तरफ देखा तो वो मुझे देखकर स्माइल करने लगी। फूफी आज मस्ती के मूड में लग रही थी।

मैं बहुत धीरे से बोला- "फूफी ये क्या कर रही हो?

पर फूफी तो अलग ही मूड में थी। फूफी बोली- "नहीं मेरे राजा जी, रुखसाना बोलो। तुम बार-बार भूल जाते हो..."

मैं- “अच्छा ठीक है। रुखसाना ये सब बंद करो। मैं नहीं चाहता हूँ की शाजिया हमें देख ले..."

फूफी- "अच्छा... जैसा तुम कहो मेरे राजा जी.." और रुखसाना ने मेरे लण्ड को छूना बंद कर दिया।

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मैं सुबह हुई घटना याद कर रहा था की रुखसाना फिर से मेरे लण्ड पे हाथ फेरने लगी और इस बार जोर-जोर से लण्ड पे हाथ फेर रही थी। मैंने उससे धीमे से कहा- "रुखसाना, मेरी रानी मत करो। मेरा अभी मन नहीं है..."

फूफी- "अरे मेरे राजा... पर मेरा तो आज बहुत मन है तुम्हारे लण्ड को देखने का.." रुखसाना अब तो मेरे लण्ड को पैंट के ऊपर से पकड़कर हिलाने लगी।

उसने अपनी साड़ी का पल्लू भी गिरा दिया था।

मैं उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों को देखने लगा और वो मेरे लण्ड को मसलती जा रही थी। मेरा भी अब मूड बन रहा था। मैंने शाजिया की तरफ देखा तो वो टीवी देखने में बिजी थी। मैं रुखसाना की चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से दबाने लगा। हम दोनों वो सब एंजाय करने लगे। मेरा लण्ड एकदम खड़ा हो चुका था। रुखसाना मेरे लण्ड को आगे पीछे करके हिलाने लगी। वो आज फुल मस्ती के मूड में थी। उसने धीरे से शार्टस की जिप खोली और अपना हाथ उसके अंदर डाल दिया। मुझे उसकी हाथों की गर्मी अपने लण्ड पे महसूस हो रही थी। रुखसाना लण्ड हिलाए जा रही थी की तभी अचानक शाजिया कुर्सी से उठी ।

शाजिया को उठता हुआ देखकर मैंने रुखसाना का हाथ अपने शार्टस से निकाल दिया और जिप बंद करने लगा। शाजिया बिना पीछे मुड़े किचेन की तरफ चली गई।

मैंने कहा- “अच्छा हुआ शाजिया पीछे नहीं मुड़ी, नहीं तो वो मुझे जिप बंद करते देख लेती..” मैं उठकर बैठ गया और तकिया को अपने लण्ड पे रख लिया। ताकी मेरा खड़ा लण्ड शाजिया ना देख लें।

रुखसाना- “सुनिए राजा जी, आज मेरा बहुत मन कर रहा है आपके साथ सोने का। क्या आप रात को मेरे साथ छत पे चलेंगे वही करने जो अपने पहले किया था. "

मैं रुखसाना के मुँह से ये सुनकर स्माइल करने लगा। मैंने सोचा मेरा मूड तो रुखसाना ने बना ही दिया है, तो क्यों ना आज उसकी चुदाई कर दूं। वैसे भी शाजिया को वो प्यार नहीं दे पाऊँगा क्योंकी उसे तो सच्चा प्यार चाहिए और मैं उसे वो प्यार नहीं दे सकता। तो मैंने अब शाजिया के बारे में सोचना छोड़ दिया और रुखसाना के बारे में सोचने लगा।

शाजिया को मेरा प्यार नहीं चाहिए था। पर मेरे दिल में उसके लिए बहुत प्यार था। मैं सोच रहा था की शाजिया से झूठ बोल दूं, पर मेरा दिल नहीं मान रहा था उसे धोखा देने के लिए। एक तरफ शाजिया थी और दूसरी तरफ रुखसाना, मैं किसी को भी नहीं छोड़ सकता था। शाजिया तो अब मुझसे बात भी नहीं कर रही थी, और एक तरफ रुखसाना थी जो ये जानने के बाद भी की मेरे दिल में शाजिया के लिए भी प्यार है फिर भी वो मुझसे प्यार करती थी। शायद उसे ये पता था की मैं कभी ना कभी तो किसी जवान लड़की की तरफ आकर्षित हो जाऊँगा क्योंकी वो मेरी उमर की नहीं है।

मेरे दिमाग में एक आइडिया आया की रुखसाना को तो शाजिया के बारे में सब पता है तो क्यों ना उससे मदद ली जाए उसे मनाने में।

तभी फूफी की आवाज आई- "वसीम शाजिया खाना बन गया है। आकर खा लो...

खाना खाने बाद सब लोग जल्दी सो गये। पर फूफी तो जागी हुई थी। उनके ऊपर तो आज चुदाई का भूत सावर था। रात के 12:00 बज रहे थे। वो धीरे से उठी और मेरे बिस्तर पे आकर मुझे उठाने लगी- “वसीम उठो चलो ना... छत पे तुमने वादा किया था..."

मैं पहले से उठा हुआ था- "हाँ चलो मेरी जान... आज तुम्हें जन्नत की सैर कराता हूँ...

फूफी हँसने लगी। हम लोगों ने एक चादर और तकिया उठाया और छत पर चल दिए।
 
रुखसाना बहुत खुश लग रही थी। चादर बिछाने के बाद मैं उस पे लेटा हुआ था। तभी मैंने पीछे मुड़कर देखा तो रुखसाना अपनी नाइटी उतार के नंगी खड़ी थी। वो बिना टाइम वेस्ट किए मेरे ऊपर आ गई और मुझे किस करने लगी।

उसे इतना उत्तेजित देखकर मैं भी उत्तेजित हो गया। हम दोनों पागलों की तरह किस कर रहे थे। मेरे दोनों हाथ उसकी गाण्ड को कसकर मसल रहे थे। किस करते-करते वो मेरे ऊपर से उठी और मेरी शार्टस खोलने लगी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। मेरे बिना कुछ बोले उसने मेरे लण्ड को पकड़ लिया और हिलाने लगी।

मैंने कहा- "क्या हुआ मेरी रानी, आज तो तुम बहुत जोश में लग रही हो क्या बात है?"

रुखसाना - "कोई बात नहीं है। बस मुझे तुम पे आज बहुत प्यार आ रहा है..."

हम दोनों बहुत खुश थे। 5 मिनट हिलाने के बाद उसने मेरे लण्ड को अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी। वो 10 मिनट तक चूसती रही। अब मैं भी पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था।

मैंने कहा- "रुखसाना उठो, आज हम लोग कुछ नया करते हैं..."

रुखसाना- “क्या नया करोगे?"

मैं- “तुम उठो तो..."

रुखसाना उठकर खड़ी हो गई।

मैं लेटा ही हुआ था, कहा- “तुम आओ मेरे मुँह के ऊपर बैठ जाओ..."

रुखसाना पर कैसे?

मैं- तुम मेरे पास तो आओ।

रुखसाना मेरे पास आ गई और मैंने उसे अपने मुँह पे बैठा लिया और उसकी चूत को चाटने लगा। इस तरह चूत चाटने में मजा आ रहा था। रुखसाना के मुँह से भी आवाजें निकल रही थी- “आअहह उहह... आहह.... आअह्ह... राजा इसमें बहुत मजा आ रहा है, ऐसी ही करते रहो..."

मैं 15 मिनट उसकी चूत चाटने के बाद उसे अपने ऊपर से उठाया और उसे 69 की पोजीशन में आने को कहा। फूफी मेरे ऊपर थी, मैं उसकी चूत चाट रहा था और वो मेरा लण्ड चूस रही थी। क्या बताऊँ दोस्तों, पहली बार इतना मजा आ रहा था। एक तरफ वो मेरा लण्ड चूस रही थी और दूसरी तरफ मैं उसकी चूत चाट रहा था। उसकी चूत की खुशबू मुझे पागल बना रही थी। मैं उसकी चूत की लाइन में अपनी जुबान डाल रहा था जैसे की मैं उसे अपने जुबान से ही चोद रहा हूँ। अपने हाथ से उसकी कमर को अपने मुँह की तरफ दबा रहा था जिससे उसकी चूत मेरे मुँह से दबी रहे।

रुखसाना चीख रही थी। पर मेरा लण्ड उसके मुँह में था, इसलिए उसकी आवाजें तेज नहीं थी। 20 मिनट ऐसी चुसाई के बाद हम दोनों एक दूसरे के ऊपर से उठे तो हमारी सांसें तेज चल रही थी। मैं बहुत जोश में आ चुका था। इसलिए लेटे-लेटे मैं उसके ऊपर आ गया और उसे फिर से किस करने लगा।

किस करने के बाद मैंने उसे अपने लण्ड के ऊपर बैठने को कहा। वो बैठ गई। इसके बाद मैंने अपना लण्ड उसकी चूत पे सेट किया और जोर-जोर से नीचे लेते हुए ही झटका देने लगा। फूफी को बहुत मजा आ रहा था। मैं उनकी आवाजों से पहचान गया था –

"आअहह ... उहह.. अया अया अया बहुत मजा आ रहा है, वसीम "

फूफी की आवाजें अब चीखों में बदल चुकी थी- “उहह ... ऊहह ... ऊहह ... आss अया आहह.... ऊह्ह... धीरे करो आअह्ह... आअह्ह..."

इस पोजीशन में 15 मिनट हो चुके थे। उनकी आवाजें सुनकर मैंने सोचा अब पोजीशन चेंज करना पड़ेगा तो मैंने उन्हें अपने ऊपर सीधे बैठने को कहा और मेरे लण्ड पे उछलने को कहा।

फूफी सीधे बैठ गई और मेरे लण्ड को चूत में घुसेड़ने के बाद उछलने लगी।

चारों तरफ पछ-पछ की आवाजें गूँज रही थी। मुझे उनकी चूत की गर्मी अपने लण्ड पे महसूस हो रही थी। अब मेरे मुँह से भी हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं और उसकी भी हम दोनों अपनी चरम सीमा पे थे। 20 मिनट के बाद हम दोनों एक साथ झड़ गये उसका अकड़ा हुआ बदन ढीला हो गया। उसकी चूत के अंदर मेरे लण्ड का माल बाहर आने को बेचैन था पर मैंने अपना लण्ड उनकी चूत से नहीं निकाला । 10 मिनट तक वो मेरे ऊपर ही लेटी रही। हम दोनों एक दूसरे को धीमे-धीमे किस कर रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे छोड़ा, तब वो मेरे ऊपर से उठी और कहने लगी- “राजा जी अपना माल मेरी डाला करो, नहीं तो मैं माँ बन सकती हूँ...

मैं- “क्यों तुम्हें मेरा बच्चा नहीं चाहिए क्या? अच्छा मैंने तुमसे कुछ दिन पहले पूछा था शादी के बारे में, तो क्या कहती हो तुम?"

फूफी- “शादी अभी नहीं करूँगी और थोड़ा वक़्त चाहिए..."

मैं- “ठीक है मेरी जान... जितना समय चाहिए उतना ले लो..."

मैंने सोचा की यही सही टाइम है शाजिया के बारे में बात करने का। हम दोनों लेटे हुए थे- “अच्छा मेरी जान मुझे तुम्हारी हेल्प चाहिए?"

फूफी- कैसी हेल्प?

मैं- तुम तो जानती हो की मैं शाजिया से भी प्यार करता हूँ। पर कुछ दिनों से मेरे और उसके बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है, तो मुझे उसे मनाने के लिए तुम्हारी हेल्प चाहिए "

फूफी शाजिया का नाम सुनकर गुस्से में आ गई "तुम मुझे अपने प्यार को बांटने के लिए कह रहे हो। ऐसा नहीं हो सकता। अच्छा हुआ तुम्हारी और उसकी लड़ाई हो गई। मुझे तुम्हें उसके साथ देखना बिल्कुल अच्छा नहीं

लगता..."

मैं उसे मनाने लगा पर वो नहीं मानी। मैंने सोचा छोड़ो यार शाजिया की वजह से फूफी को नाराज नहीं कर सकता। मैंने फूफी को सारी कहा और उस रात हम दोनों ने थोड़ी देर बाद फिर से चुदाई की। मेरे खराब दिन का बहुत अच्छा अंत हुआ था। चुदाई करने के बाद हम दोनों सो गये।
 
हम लोग चुपचाप खाना खाकर सो गये। बिस्तर पे लेटे-लेटे मैं सोच रहा था की ये क्या हो गया? मैं तो उसे मनाने गया था, पर यहां तो उल्टा हो गया। मैं शाजिया की बातें याद कर रहा था की तभी मुझे याद आया- “ये मैंने क्या कह दिया शाजिया से दूसरी गर्लफ्रेंड के बारे में? अगर उसे समझ में आ गया की वो दूसरी लड़की जो समाज के डर के बाद भी मुझसे प्यार करती है वो उसकी अम्मी है तो शाजिया पे क्या बीतेगी? यही सब सोचते- सोचते मुझे नींद आ गई।

सुबह उठकर मुझे रात की बातें याद आने लगी, क्योंकी शाजिया मेरे सामने ही खड़े होकर बाल बना रही थी। उसने मुझे उठता हुआ देखकर अपना मुँह घुमा लिया। मैं भी बिना कुछ बोले वहां से चला गया। थोड़ी देर बाद मैं तैयार होकर होटेल जाने लगा। शाजिया स्कूल जा चुकी थी।

मैं अपनी बाइक स्टार्ट कर ही रहा था की पीछे से आवाज आई- "सुनिए जी...

मुझे ये सुनकर थोड़ा अजीब लगा । क्योंकी आज से पहले मुझे कभी किसी ने ऐसे नहीं बुलाया था। मैं पीछे घूमा तो देखा वो फूफी थी।

फूफी- "जरा इधर तो आइए, मुझे थोड़ा काम है..." फूफी आजकल बहुत खुश रहती थी।

मैंने उनसे पूछा- “क्या बात है?"

फूफी- “आप आज एक चीज लेना भूल गये..."

मैं अपनी जेब चेक करने लगा- "नहीं तो सब कुछ तो ले लिया है..."

फूफी- आज आप मेरा किस लेना भूल गये।

ये सुनकर मेरा मन खुश हो गया। फूफी मुझे देखकर स्माइल कर रही थी और उन्हें देखकर मैं स्माइल कर रहा था। मैंने कहा- "क्या बात है फूफी, आजकल तो तुम्हारा मूड बहुत अच्छा रहता है?"

फूफी- हाँ जब से मुझे ये पता चला है तुम्हारी जिंदगी में मेरे सिवाए अब और कोई नहीं है तब से मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है।

मैंने मन में बोला- “अरे यार... ये तो मेरे और शाजिया के अलग होने से खुश है और मुझे लगा कोई और बात होगी." फूफी का ये प्यार देखकर मेरा मूड अच्छा हो गया ।

मैं बोला- “नहीं तो... शाजिया की वजह से तो मेरा मूड खराब हो गया.. "

फूफी "जी क्या सोच रहे हैं..."

हम दोनों अंदर गये और एक दूसरे को किस करने लगे। मैंने फूफी को कसकर अपनी बाहों में पकड़ रखा था और किस कर रहा था। 10 मिनट किस करने के बाद हम दोनों अलग हुए। मेरा तो फूफी ने मन खुश कर दिया था। फूफी भी खुश लग रही थी। मैं किस करने के बाद फूफी को बाइ बोलकर होटेल चल दिया।

होटेल पहुँच के में सीधा मेम की केबिन में चला गया। वहां पहुँच के देखा तो मेम पहले ही आ चुकी थी। हमारी दोस्ती और बान्डिंग और अच्छी हो चुकी है, जब से मैं उनका पी. ए. बना हूँ तब से हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से बात करते है

मैं- "मेम आप आज इतनी जल्दी कैसे आ गई?" मैम अपनी चेयर से उठी तो उन्हें देखकर मेरी आँखें उनकी ड्रेस पे जम गई

सुरभि मेम - कई सारी मीटिंग्स हैं, भूल गये? इसीलिए तो जल्दी आई हूँ "

मैं तो मेम की ड्रेस को ही देखे जा रहा था। उन्होंने आज शार्ट स्कर्ट वाली ड्रेस पहन रखी थी। उनकी टांगों को देखकर लग रहा था जैसे वो दूध से नहाती हो। मेम मुझसे बातें किए जा रही थी और मेरी नजरें उनकी स्कर्ट को घूरे जा रही थी।

सुरभि मेम ने मेरी नजरों को देख लिया। वो मेरे पास आई और मेरे कंधे पे हाथ रखकर बोली- "वसीम कहां खोए हुए हो?"

तब मुझे होश आया तो मैंने हड़बड़ा के बोला- “हाँ कही नहीं मेम...."

वो हँसने लगी। मुझे लगा उन्होंने मुझे कही देख तो नहीं लिया? मेम हँस क्यों रही हैं?

मैंने कहा- "आप क्या कह रही थी?"

मेम- "वसीम मैं ये कह रही थी की आज होटेल में बहुत सारी मीटिंग्स है इसलिए जल्दी आई हूँ.. "

मेम की ये बात सुनकर मैंने सोचा- "मीटिंग्स तो दोपहर से शुरू होगी तो मेम आज इतनी जल्दी क्यों आई हैं?"

उन्होंने मुझसे पूछा- "वसीम तुम बहुत देर से मेरे कपड़ों को देख रहे हो। क्या हुआ अच्छे नहीं लग रहे है क्या?"

उनकी बात सुनकर मुझे शर्म आने लगी की आखिर मेम मुझसे ऐसे सवाल क्यों पूछ रही हैं?

मेम- “अरे वसीम बोलो ना... तुम तो मेरे बेस्ट दोस्त हो। तुमसे तो ऐसी बातें कर ही सकती हूँ..”

मैंने कहा- "ये ड्रेस आप पे बहुत अच्छी लग रही है मैम। आप तो एकदम सोनम कपूर लग रहीं हैं। नहीं आप तो उससे भी ज्यादा खूबसूरत लग रही हैं..."

मेम फिर से हँसने लगी- "वसीम, तुम कितनी तारीफ करते हो?"
 
थोड़ी देर ऐसे ही बात करने के बाद हम लोग काम करने लगे। मेम आज बहुत खुश लग रही थी। वो बार-बार उठकर मेरी टेबल के पास आ रही थी, जैसे वो मुझे अपनी ड्रेस दिखाना चाहती हो। उस टाइट शार्ट स्कर्ट में उनकी गाण्ड की शेप साफ-साफ दिख रही थी। मेम के लिए मेरा नजरिया बदलता जा रहा था। शायद मुझे उकसा रही थी। उनकी गाण्ड को देखकर मेम के लिए मेरे मन में गंदे-गंदे खयाल आने लगे।

मैं मन में- "काश... रुखसाना की जगह ये होती तो इसको छोड़कर कभी कही नहीं जाता। बस दिन भर इसको ही चोदता रहता...'

वो काम करते-करते कभी-कभी मेरे एकदम करीब आ जाती और काम समझाने के बहाने मेरी टेबल पे बैठ जाती और काम समझाने लगती। जब भी वो मेरे टेबल पे बैठी उनकी गाण्ड मेरे एकदम करीब होती। उसे देखकर मन करता की अभी उनकी गाण्ड से स्कर्ट उठाकर उन्हें दबाने लगूं। वो मुझसे बहुत बातें करती थी। अगर केबिन से बाहर काम होता तो वो जल्दी काम करके आ जाती और मुझे भी केबिन से ज्यादा बाहर जाने के लिए मना कर रखा था। हम दोनों का टाइम एक दूसरे के साथ केबिन में ही बीतता ।

:

मेम मेरे करीब आने के लिए मोका ढूँढ़ती रहती थी। मुझे भी सब समझ में आ रहा था की मेम मुझे रिझाने की कोशिश कर रही हैं। कभी-कभी तो वो मेरे बहुत करीब आ जाती। अब हम दोनों एक दूसरे को रिझाने की कोशिश कर रहे थे। थोड़ी देर में हमारी मीटिंग्स शुरू हो गई एक बाद एक कई मीटिंग्स थी तो हम लोग एक साथ उसी में बिजी हो गये ।

मीटिंग्स खतम होते-होते रात के 9:00 बज चुके थे। मैडम और मैं हम दोनों एक साथ घर के लिए निकले। मैडम के साथ टाइम बिताना अब मुझे भी अच्छा लगने लगा था। मैं रास्ते भर मेम के ही बारे में सोचता रहा। घर पहुँचने के बाद भी यही हाल था, वो मेरे खयालों से जा ही नहीं रही थी।

उस दिन खाना खाने के बाद उनके बारे में सोच-सोचकर सो गया। चार दिन और बीत गये। सब कुछ नार्मल चल रहा था। सुरभि मैम और मैं और अच्छे दोस्त बनते जा रहे थे। वो मुझ पर पूरा भरोसा करने लगी थी। अब मैं देर से घर जाने लगा था। क्योंकी मेम मुझे जल्दी छोड़ती ही नहीं थी। हमारा सारा दिन होटेल में बीतता था। अब तो मेरे दोस्त भी समझने लगे थे की कुछ तो चल रहा है मेम और मेरे बीच ।

………………..
 
मैम के साथ सब कुछ नार्मल था। पर घर पर कुछ भी नार्मल नहीं था।

शाजिया थकी-थकी रहने लगी थी वो ढंग से खाना भी नहीं खाती थी। फूफी और मुझसे कम बातें करती थी। उसकी ये हालत देखकर फूफी भी हमेशा चिंता में रहती थी। घर में हमेशा चिंता का माहौल रहता था।

मुझे 8:00 बजे रात में होटेल से घर आने पे पता चला की शाजिया को बहुत तेज बुखार है, तो मैं उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गया। चेक अप के दौरान डाक्टर को पता चला की शाजिया के पैर में चोट लगी थी। जब शाजिया से पूछा गया तो उसने बताया ये चोट उसे स्कूल में दो दिन पहले लोहे के गेट से लगी थी। डाक्टर तुरंत समझ गया की इसे टिटनेस की वजह से बुखार आ रहा है, तो उसने तुरंत शाजिया को टिटनेस का इंजेक्सन लगाया और चोट पे ड्रेसिंग कर दी। फिर डाक्टर ने मुझे कुछ दवाइया लिख के दी और हम लोग वहां से घर आ गये ।

घर आकर मैंने शाजिया को बिस्तर पे लेटा दिया। फूफी किचेन में चली गई शाजिया के लिए कुछ बनाने को । उसने सुबह से ज्यादा कुछ नहीं खाया था। मैं शाजिया के बगल में बैठा था ।

मैंने कहा- "शाजिया, तुमको इतनी गहरी चोट लगी थी और तुमने मुझे बताया भी नहीं ?”

शाजिया- “आपको क्या फरक पड़ता है?"

मैं- "अच्छा.. मुझे फरक नहीं पड़ता? मैं तुम्हारे लिए उस सरपंच के बेटे को मारने चला गया। उन तीन लड़कों को सबक सिखाया। ये सब मैंने तुम्हारे लिए ही तो किया था, और तुम कह रही हो मुझे फरक नहीं पड़ता। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और करता रहूँगा, चाहे तुम मुझसे प्यार करो या ना करो..”

शाजिया की आँखों में आँसू थे, और कहा- "क्या आप मुझसे इतना प्यार करते हैं?"

मैं- "हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और ये प्यार कभी खतम नहीं होगा। तुम जब से नाराज हुई हो तब से मैं बहुत दुखी हूँ तुम्हारे लिए..” शाजिया को खुश करने के लिए मैंने उससे ये सब बातें बोली।

शाजिया- "मेरा भी यही हाल है। जब से हमारी लड़ाई हुई है तब से मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। ऐसा लग रहा था जैसे मैंने आपको खो दिया हो और अब आपको शायद मेरी कोई चिंता नहीं है...."

शाजिया ने रोते-रोते मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका शरीर बुखार की वजह से जल रहा था, बोली- "मैं तो आपसे कब से बात करना चाहती थी, पर हिम्मत नहीं हो पा रही थी। क्योंकी मुझे लगा आप मुझसे बात नहीं करना चाहते...."

मैं- "नहीं शाजिया, ऐसी कोई बात नहीं थी। मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। तुम्हें जो कहना है कह दो..."

शाजिया- "मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपका दिल बहुत दुखाया है। मुझे आपसे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी । मैंने सोचा था की उस लड़ाई के बाद मैं आपको अपने दिल से निकाल दूँगी पर मैं ऐसा नहीं कर पा रही हूँ। उल्टा आपको खो देने के बाद मुझे एहसास हुआ की मैं आपके बिना नहीं रह पाऊँगी। आपकी चुप्पी मुझे और डरा रही थी...."

मैं- “शाजिया तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं। मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा.. "

ये तो उल्टा हो गया। मैं तो शाजिया से माफी माँगने जा रहा था, पर उससे पहले उसने ही माफी माँग ली।

मैं- “मैं तुम्हें छोड़ भी नहीं सकता, क्योंकी तुम मुझे सबसे ज्यादा प्यारी हो इस दुनियां में.."

शाजिया- "सच आप मुझसे नाराज नहीं हैं?"

मैं- "नहीं मेरी जान... मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। तुम बीमार हो, अब आराम करो"

शाजिया की आँखों में अभी भी आँसू थे। वो डर-डर के बोली- “मुझे आपसे कुछ माँगना है?"

मैं- "क्या बोलो? मैं तुम्हें कुछ भी दे दूँगा बस तुम माँग के तो देखो..."

शाजिया- "आप मेरे लिए अपने दूसरे प्यार यानी मेरी अम्मी को छोड़ सकते हैं?"

ये सुनते ही मेरी तो बोलती ही बंद हो गई। शाजिया को पता चल गया था की मैं फूफी से प्यार करता हूँ, शायद उसने 4 दिन पहले हुई हमारी लड़ाई से अंदाजा लगा लिया था।

मैं- "शाजिया, तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है। मैं फूफी से प्यार नहीं करता...'

शाजिया- "नहीं भैया, मुझे पता चल चुका है सब..."

मेरा चेहरा शर्म से लाल हो रहा था।

शाजिया- "मैं बस यही चाहती हूँ की आप उनको छोड़ दो..."

मैंने सोचा- "अब इसे पता चल ही गया है तो डरने का क्या फायेदा ?"

मैं- “शाजिया, तुम समझ क्यों नहीं रही हो? वो भी मुझसे प्यार करती है और मैं उनका दिल नहीं दुखा सकता। तुम दोनों ही मेरे सब कुछ हो और मैं नहीं चाहता की किसी का दिल टूटे। फूफी तो ये जानती हैं की मैं तुमसे प्यार करता हूँ, फिर भी वो मुझसे प्यार करती हैं। अब बताओ मैं इतनी समझदार औरत को कैसे छोड़ सकता हूँ? और एक तरफ तुम हो की बस अपनी ही सोच रही हो?"

शाजिया- "नहीं। मैं अपनी नहीं, हम दोनों के बारे में सोच रही थी...'

मैं- “मैं फूफी को नहीं छोड़ सकता। अब तुम्हें फैसला करना है की तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं? अगर करती हो तो तुम्हें समझना होगा की मैं फूफी और तुमको दोनों को नहीं छोड़ सकता। फैसला तुम्हारे हाथ में है..."

शाजिया चुप थी।

उसकी चुप्पी देखकर मैं समझ गया की ये नहीं मानेगी, तो मैं उठकर जाने लगा।

तभी शाजिया पीछे से बोली- "मुझे मंजूर है...

मैं पलटा और उसके पास गया, और पूछा- "सच बोल रही हो?" और में उसे देखकर हँस रहा था और वो मुझे देखकर शर्मा रही थी।

शाजिया- "मैं आपको फिर से दूर नहीं जाने देना चाहती। आप जो कहेंगे वही होगा । पर मेरी एक शर्त है? आपको पहले मुझसे शादी करनी होगी.."

मैं ये सुनकर हैरान हो गया की आखिर शाजिया के मन में ये बात कैसे आई?

शाजिया- "आप यही सोच रहे हैं ना की मैं शादी की बात क्यों कह रही हूँ? दरअसल जब आप अम्मी से शादी की बात कर रहे थे तब मैंने ये बात सुन ली थी। आपने ये भी कहा था की अम्मी बस शादी के लिए हाँ कहे आप सब संभाल लोगे। तो बस मुझे भी आपसे पहले शादी करनी है, फिर मैं आपकी हो जाऊँगी। जब तक आप मुझसे शादी नहीं करेंगे, तब तक मैं आपके पास नहीं आऊँगी. "

मुझे ये शर्त सुनकर थोड़ा डर लगने लगा, क्योंकी मैंने फूफी से भी यही कहा था। अब फूफी को कैसे बताऊँ की शाजिया मुझसे शादी करना चाहती है? फूफी तो गुस्सा करने लगेगी। मैं शाजिया को फिर से गुस्सा नहीं करना चाहता था। इसलिए मैंने उससे शादी के लिए हाँ कर दी। मैं और क्या कर सकता था? दोनों तरफ से फँस गया था। शाजिया की उस शर्त की वजह से मैं मुसीबत में फँस चुका था।

एक तरफ फूफी थी जिन्हें मैं इतने दिनों से शादी के लिए मना रहा था। ऊपर से जब उन्हें पता चलेगा की शाजिया और मेरे बीच सब ठीक हो चुका है और वो मुझसे शादी करने के लिए कह रही है। तब कहीं फूफी भी शाजिया से शादी की बात सुनकर मुझसे शादी की शर्त ना रख दें? तब मैं और बुरा फँस जाऊँगा। इतनी बड़ी बात फूफी को तो बतानी ही पड़ेगी। अगर मैंने फूफी को बताए बिना ही शाजिया से शादी कर ली तो मेरा रिश्ता तो फूफी से टूट ही जाएगा।
 
शाजिया लेटकर आराम कर रही थी। फूफी किचेन में थी और मैं अपने घर के गार्डेन में था ।

मैंने सोचा- "फूफी को अभी ही बताना पड़ेगा। जितनी देर करूँगा उतना बुरा फँसता जाऊँगा..” फिर मैं किचेन में गया और फूफी से बात शुरू की।

मैं- "रुखसाना मुझे तुमसे कुछ बात करनी है शाजिया के बारे में..."

फूफी- "मैं जानती हूँ आप क्या कहना चाहते हैं? यही ना की शाजिया की तबीयत दिन पर दिन खराब होती जा रही है आपकी और उसकी लड़ाई के बाद मुझे लगता है आपको अब उसे मनाना ही होगा, तब जाकर वो नार्मल होगी। उसकी ये हालत अब मुझसे देखी नहीं जा रही है...*

मैं- “मैं तुमसे इसी टापिक पे बात करने आया हूँ."

फूफी- "हाँ बताइए क्या बात है?"

मैं- “दरअसल उसकी ये हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी। इसलिए मैं उसे मना रहा था। अच्छी बात ये है की वो मान भी गई..."

रुखसाना खुशी से “वो मान गई है?"

मैं- “हाँ वो मान गई है पर उसने एक शर्त रखी है?"

फूफी- "कैसी शर्त?"

मैं- "रुखसाना बात ये है की उसे तुम्हारे और मेरे चक्कर के बारे में पता चल गया है..."

रुखसाना की सांसें रुक गई ये सुनकर की उसकी बेटी को पता चल गया की उसकी माँ का चक्कर चल रहा है।

मैं- “उसने हमारी बातें सुन ली थी शादी के बारे में, और अब वो मुझसे शादी करना चाहती है। अगर मैं उसे मना कर देता हूँ तो ऐसा लगेगा की की उसका प्यार उसकी माँ ने छीन लिया है। तब वो और नाराज हो जाती । इसलिए मैंने हाँ कर दी। मैं नहीं चाहता था की माँ बेटी में मनमुटव हो जाए...'

"

रुखसाना- “पर आपने तो कहा था की आप मुझसे शादी करना चाहते हैं। अब ये शाजिया बीच में कहां से आ गई?"

मैं- “समझो मेरी रानी... अगर मैंने शाजिया को मना कर दिया होता तो वो मुझसे और तुमसे कभी बात नहीं करती, और तब उसकी तबीयत और खराब हो जाती..."

रुखसाना- “ये तो आप ठीक कह रहे हैं शाजिया बहुत जिद्दी है। तो क्या अब आप मुझसे शादी नहीं करेंगे?"

मैं- "नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं तुमसे शादी जरूर करूँगा। पर पहले मुझे शाजिया से शादी करनी पड़ेगी..."

रुखसाना- "तो क्या आप दो-दो शादी करेंगे? ये तो गलत है...."

मैं- “मैं क्या करूं मेरी जान? मेरा इरादा तो तुमसे ही शादी करने का था, पर मैं शाजिया से भी प्यार करता हूँ। और उसे मुझसे शादी करनी है तो मैं अब क्या करूं? तुम ही बताओ क्या में उसे शादी के लिए मना कर दूं?"

रुखसाना- "नहीं नहीं, अगर आपने उसे मना कर दिया तो वो समझ जाएगी की मैंने आपको मना किया है उससे शादी करने को। ठीक है आप उससे पहले शादी कर लीजिए। मैं आपसे दूसरी शादी करूँगी..." रुखसाना दुखी मन से कह रही थी।

मैंने रुखसाना को गले लगा लिया, और कहा- "दुखी ना हो मेरी रानी, शादी तो मैं तुमसे भी करूँगा । चलो अब शाजिया को ये खुशखबरी सुना दी जाये..."

रुखसाना- "नहीं। मैं उसके सामने नहीं जाऊँगी..."

मैं- अर्रे अब क्या शर्माना ? जब उसे कोई फर्क नहीं पड़ा तो तुम क्यों शर्मा रही हो? चलो..."

हम दोनों शाजिया के पास गये। मैंने उससे कहा- "शाजिया मैंने और तुम्हारी अम्मी ने डिसाइड कर लिया है की पहली शादी मैं तुमसे ही करूँगा जैसा मैंने तुमसे पहले भी कहा था, और उसके तुरंत बाद मेरी और फूफी की शादी होगी। अब तो तुम दोनों खुश हो?"

शाजिया उठी और मुझे गले लगा लिया। पीछे से फूफी ने भी मुझे गले लगा लिया। शाजिया बहुत खुश थी की वो मेरी पहली पत्नी कहलाएगी। हम तीनों अलग हुए।
 
मैंने कहा- "जब सब लोग शादी के लिए तैयार हैं तो शादी जल्द ही कर लेनी चाहिए। क्या कहते हो तुम लोग ?*

शाजिया- "हाँ...

रुखसाना- हाँ ठीक है।

मैं- "तो मैं कल ही काजी के पास जाकर कोई महूरत निकलवाता हूँ। दोनों शादी एक ही दिन होगी..."

रुखसाना पर एक ही दिन कैसे हो सकती है?"

मैंने कहा- "हम तीनों अलग-अलग मस्जिद में शादी करेगे किसी पता नहीं चलेगा...'

शाजिया और फूफी शादी की बात सुनकर बहुत उत्तेजित हो गये थे।

शाजिया “पर मेरे पास तो शादी के कपड़े ही नहीं हैं..."

मैं- “कोई बात नहीं। कल हम लोग शापिंग पे जाकर तुम्हारे लिए सब सामान खरीद लेंगे...."

रुखसाना- “मुझे भी शादी के कपड़े और गहने चाहिए..."

मैं- "ठीक है मेरी रानियों, तुम सबको कल सब कुछ खरीद दूँगा.."

दोनों बहुत खुश हो गई और मुझे आपनी बाहों में पकड़कर मेरे गालों पे किस दिया। मुझे एहसास हुआ की फूफी और शाजिया एक दूसरे की तरफ देख ही नहीं रही थी, वो दोनों ऐसे दिखा रही थी जैसे मेरे सिवाए और कोई वहां पर है ही नहीं में समझ गया ये दोनों एक दूसरे से चिढ़ रही हैं। शायद थोड़ा टाइम लगेगा। पर एक दिन दोनों समझ जाएंगी।

अगले दिन सुबह हम तीनों देरी से उठे । शाजिया और फूफी तैयार थी। मैं बस तैयार हो रहा था काजी के पास जाकर शादी की तारीख निकलवाने के लिए मैंने सोचा इतने लोग वहां जाकर क्या करेगे, तो मैं अकेला ही चला जाता हूँ। मैंने उन दोनों को समझाया और अकेला ही चला गया काजी के पास ।

रुखसाना और शाजिया मानने को ही तैयार नहीं थी। दोनों जिद कर रही थी की हम भी साथ चलेंगी। बहुत उत्तेजित थे हम सब। लेकिन सबसे पहले मैंने मेम को फोन करके एक दिन की छुट्टी ले ली। मस्जिद में जाकर काजी को काफी पैसे देकर महूरत निकलवा लिया। पर एक दिक्कत थी की फूफी की कुंडली में से पाड़ित ने फूफी की शादी की डेट शाजिया और मेरी शादी के दो दिन बाद की निकाली। मैंने काजी को बहुत समझाया।

पर काजी ने कहा- "अगर तुम्हारी और फूफी की शादी मेरे निकाले हुए महूरत पे नहीं हुई तो तुम पर मृत्यु दोष आ सकता है। देखो बेटा तुम्हारी और शाजिया की कुंडली एकदम मिलती है। पर रुखसाना की कुंडली में दोष है, तो तुम्हें उससे अच्छे मुहूरत पे ही शादी करनी होगी, नहीं तो तुम पे संकट आ सकता है.."

मैं इन सब बातों पे बहुत विश्वास करता हूँ तो मैंने उनकी बात मान ली “ठीक है काजी जी । रुखसाना की शादी बाद में होगी...."

काजी से शादी के बारे में सारी बातें भी कर ली। घर पहुँच के शाजिया को बताया की हमारी शादी परसों तय हुई है। ये सुनकर शाजिया और फूफी खुशी के मारे झूम उठी। पर एक दिक्कत है फूफी और मेरी शादी 4 दिन बाद तय हुई है..."

फूफी पर तुमने तो कहा था की दोनों शादियां एक ही दिन होगी ।

मैं- "हाँ मैंने कहा था। पर तुम्हारी कुंडली में दोष है। इसलिए शादी अलग मुहूरत में है..."

फूफी ये सुनकर दुखी हो गई।

मैं- अर्रे दुखी क्यों होती हो? शादी आज हो या कल क्या फरक पड़ता है? वैसे भी तुम अभी शादी करने के लिए तैयार भी कहा थी?"

फूफी- "नहीं मुझे तुमसे उसी दिन शादी करनी है। मैं कुछ नहीं जानती..."

मैं- “मेरी जान कहा ना... शादी 4 दिन बाद कर लेंगे, क्या फरक पड़ता है?"

फूफी को थोड़ी देर समझाने के बाद वो समझ गई ।

मैं- “अच्छा चलो अब तुम दोनों को शापिंग करा लाता हूँ। मेरे पास एक ही दिन की छुट्टी है ...
 
शापिंग का नाम सुनकर दोनों खुश हो गई। दोनों तैयार ही थी तो हम लोग तुरंत मार्केट के लिए निकल पड़े। सबसे पहले हम लोग शादी के कपड़े लेने एक दुकान पे गये। वहां पे शाजिया और फूफी शादी का जोड़ा देखने लगी और में अपने लिए शेरवानी देखने लगा। मुझे 15 मिनट लगा अपने लिए ड्रेस खरीदने में पर फूफी और शाजिया तो अभी भी ड्रेस देखने में ही बिजी थी। मुझे ये देखकर खुशी हुई की फूफी अपनी बेटी के साथ खुशी- खुशी ड्रेस खरीद रही हैं। शायद उन दोनों के बीच अब सब कुछ अच्छा हो चुका था। आधे घंटे बाद फूफी को एक साड़ी पसंद आ गई।

शाजिया को शादी का जोड़ा खरीदने में टाइम लग रहा था। आखीरकार, उसकी पहली शादी थी। वो बहुत उत्तेजित और कन्फ्यूज थी। थोड़ी देर बाद उसने एक लहंगा पसद किया।

वो दोनों अपने मन पसंद के जोड़े पाकर खुश थी। पर मैं जानता था की ये खुशी बहुत महंगी पड़ने वाली है। जब हम कैश काउंटर पे गये तो पता चला मेरी शेरवानी का बिल ₹6000 फूफी का जोड़ा ₹10500 और शाजिया का जोड़ा ₹12500 का था। बिल सुनकर तो मेरे होश उड़ गये। पर उन दोनों के खुश चेहरे देखकर उनकी खुशी के लिए मैंने 29000 का बिल चुकता कर दिया। आखीरकार पैसा इंसान अपने परिवार के लिए ही तो कमाता है।

मैं- "अच्छा हो गया? अब तुम लोग घर चलो...

फूफी- अभी कहां? हमें गहने लेने हैं....

मैं- “गहने रहने दो बाद में ले लेंगे..."

शाजिया- नहीं नहीं... मुझे तो गहने खरीदने हैं। मैं अपनी शादी में बिना गहनों के नहीं रहना चाहती..."

उन दोनों की जिद के आगे मुझे झुकना ही पड़ा। मैंने सोचा- "लगता है आज ही ये दोनों मेरे 6 लाख रुपये उड़ा देंगी। हमारे होटेल के एक कस्टमर थे किशनलाल, जो बार-बार हमारे होटेल में आते थे। उनकी एक ज्यूलरी की दुकान पास में ही थी, तो मैं उन दोनों को वहीं ले गया।

किशनलाल मुझे अच्छे से जानते थे तो वो मुझे डिसकाउंट दे देते। दुकान में पहुँच के वो दोनों सोने का नेकलेश देखने लगी।

मैंने कहा- "देखो शादी अलग-अलग दिन है तो तुम दोनों एक ही लोगों के लिए गहने खरीदना। पहले शादी शाजिया की है तो पहले वो पहनेगी और बाद में तुम अपने शादी के दिन वही गहने पहन लेना..."

फूफी- "ठीक है..."

एक घंटा देखने के बाद उन दोनों ने एक सोने के नेकलेश का सेट ₹50,000 का, दो जोड़ी सोने के कंगन ₹40,000 का, दो सोने की कमरबन्द ₹19000 का, दो चाँदी के पायल ₹5000 के सेलेक्ट किया। इतना सब देखकर मैंने सोचा आज मेरे पैसे तो गये।

जब मैंने इन सबका बिल सुना तो मेरे तो हाथ पैर फूल गये। बिल था ₹114,000 का था। मैंने तुरंत दुकान के मालिक किशनलाल जी को फोन मिलाया की थोड़ा डिस्काउंट मिल जाए। उनसे बात करने के बाद मुझे ₹5000 का डिसकाउंट मिला। मुझे तो बचे हुए पैसे भी बहुत लग रहे थे। पर क्या कर सकता था मैं? उन दोनों के सामने तो मैंने अपने डेबिट कार्ड से निकाल के बचे हुए पैसे दे दिए।

थोड़ी देर बाद हम लोग सारा सामान लेकर घर पहुँचे। शाजिया और फूफी की तो खुशी का ठिकाना नहीं था। वो दोनों बस अपने गहनों और कपड़ों को चेक किए जा रहे थे।

मैंने कहा- "चलो अब अपने कपड़े ट्राई करके तो दिखाओ ? तुम लोगों ने तो ट्रायल रूम में कपड़े पहन के देख लिया। पर मैंने अभी तक नहीं देखा तुम दोनों को इन कपड़ों में..."

फूफी नहीं अब आप हमें शादी के दिन ही इन कपड़ों में देखेंगे। शादी से पहले इन कपड़ों में देखने से सर्प्राइज खतम हो जाएगा..."

मैं- "अच्छा बाबा ठीक है...."

उस दिन हम लोग काफी उत्तेजित थे। पूरा दिन हम लोग शादी की ही बात करते रहे।
 
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