मैं बिहार के एक छोटे से गाँव से हूँ, मेरा नाम वसीम है, मेरी उमर 22 साल है, दिखने में भी ठीक ठाक हूँ। मेरा परिवार बहुत छोटा सा है क्योंकी मेरे अम्मी की मौत बचपन में और अब्बू की मौत जब मैं 19 साल का था तभी हो गई थी। अब मेरे परिवार में विधवा फूफी रुखसाना, फूफी की बेटी शाजिया, और दादाजी है।
फूफी के बारे में कुछ बता दूं। वो दिखने में बहुत सुंदर हैं, और एक सिंपल सी औरत हैं। उनका बदन थोड़ा सा मोटा है लेकिन बहुत सेक्सी दिखती है।
शाजिया अभी 11वीं क्लास में है। वो 18 साल की है। देखने में बहुत हाट है, और उसकी बाड़ी पतली है, दूध जैसा सफेद रंग है उसका शाजिया को फैशन का बहुत शौक है लेकिन गाँव में होने के कारण उसकी ये इक्षा पूरी नहीं हो सकती थी।
जब अब्बू की मौत हुई थी तब मैंने 12वीं पास ही किया था उनकी मौत के बाद हमारी माली हालत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। दादाजी के पास एक छोटा सा खेत था जिसमें खेती करते थे। उसी से हमारा घर चलता था। हमारे गाँव में 12वीं तक ही स्कूल था। कोई कालेज नहीं था इसलिए मैंने आगे पढ़ाई नहीं की।
घर की हालत देखते हुए मैंने शहर जाकर पैसे कमाने का फैसला किया। मैं अपने खानदान का एकलौता बेटा हूँ। क्योंकी मेरे दादाजी के कोई भी भाई बहन नहीं हैं और हमारे कोई भी खास रिलेटिव भी नहीं है और जो हैं भी उनसे मनमुटाव चल रहा है। दादाजी शहर जाने से मना करने लगे। वो मुझे अपने से अलग नहीं करना चाहते थे पर मैंने उन्हें मना लिया।
मेरे एक दोस्त का भाई लखनऊ में काम करता है। उसने मुझसे कहा था की वो मेरी कोई छोटी मोटी जाब लगा सकता था, तो मैं लखनऊ चला गया। मुझे वहां एक अच्छे रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी मिल गई। मेरे दोस्त के भाई ने कहा- “तुमने बारहवीं के बाद पढ़ाई की होती तो तुझे और अच्छी नौकरी मिल सकती थी।
तब मैंने डिसाइड किया की थोड़ा और पढ़ लेता हूँ तो उसके कहने पर मैंने वहीं कानपुर के कालेज से बी. काम. का प्राइवेट फार्म भर दिया, क्योंकी ये डिग्री मुझे आगे चलकर अच्छी नौकरी दिला सकती थी। अब शुरू करते हैं 5 महीने पहले की कहानी ।
मैं लखनऊ में 22 साल से रह रहा था मेरा बी. काम भी कुछ महीने में कंप्लीट होने वाला था। मैं गाँव में पैसे देता था। सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक गाँव से खबर आई की दादाजी चल बसे। मैं तुरंत छुट्टी लेकर गाँव गया, हमें बहुत दुख हो रहा था। पर दादाजी अपनी जिंदगी जी चुके थे सबसे ज्यादा दुख फूफी और शाजिया को हो रहा था की अब उनका क्या होगा ? क्योंकी दादाजी उन्हें बहुत प्यार से रखते थे और अब उनका कोई नहीं है मेरे सिवाए ।
अब फूफी और रुखसाना की जिम्मेदारी मुझ पे आ गई। वो दोनों अकले हो गये थे, क्योंकी गाँव में कोई भी रिश्तेदार नहीं था और जो थे उनसे बनती नहीं थीं।
फूफी ने कहा- "वसीम बेटा, हमें अपने साथ लखनऊं ले चलो हम दो अकेली औरतें यहां नहीं रह पाएंगी..."
पर मेरा मन नहीं कर रहा था उन्हें ले जाने का, क्योंकी में लगभग 22 साल से अकेला रह रहा था और मुझे अपनी प्राइवेसी खोनी नहीं थी। इसलिए मैंने फूफी को बहाना बनाते हुए कहा- "फूफी मेरा बी. काम, कंप्लीट होने वाला है और मुझे कानपुर की एक फैक्टरी में मेरे दोस्त का भाई जाब लगा रहा है, तो मैं अब कानपुर में रहूँगा और जब मेरी नई नौकरी लग जाएगी तब तुम लोगों को बुला लूंगा..."
फूफी ये सुनकर रोने लगी, और रोते-रोते कहने लगी- "हम यहां अकेले क्या करेगी?"
मैंने उन्हें समझाया- “फसल की कटाई का समय आ गया है तो आप वो करो और जो पैसे आए उनसे घर चलाना और मैं भी बीच-बीच में आकर आपको पैसे दूंगा..."
शाजिया भी ये सुनकर रोने लगी।
तब मैंने उन दोनों को अपने सीने से लगाकर कहा- "मैं तुम लोगों को यहां से ले जल्दी जाऊँगा. "
उन दोनों ने मुझे कस के पकड़ रखा था, इस पकड़ से मुझे ऐसा लगा की मैं ही इन दोनों का सब कुछ हूँ, अब वो दोनों शांत हो गई थी। कुछ दिनों में सब कुछ शांत हो गया। अब मैं दो हफ्ते की छुट्टी के बाद लखनऊं जा रहा था।
फूफी और शाजिया रोने लगे और कहने लगे- "हमारा तुम्हारे सिवाए कोई भी नहीं है तो हो सके तो हमें जल्दी बुला लेना.” और जाते-जाते फूफी ने दादाजी की अलमारी से घर और जमीन के कागज मुझे निकाल के दिए और कहा- "दादाजी ने ये तुम्हारे नाम कर रखी थी तो इसे तुम्हीं ले जाओ...
मैंने उसे ले लिया और लखनऊं के लिए निकल पड़ा। सब कुछ नार्मल हो रहा था। मेरे जाने के बाद एक महीने बीत चुके थे, फूफी मुझे फोन कर-करके आने के लिए कह रही थी। पर मैं बहुत बिजी था। तभी एक दिन फूफी का फिर फोन आया और वो बहुत रो रही थी और बार-बार शाजिया का नाम ले रही थी।