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Incest फूफी और उसकी बेटी से शादी

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फूफी और उसकी बेटी से शादी

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पात्र (किरदार ) परिचय

01. वसीम- उम्र 22 साल, ठीक ठाक हूँ, छोटा परिवार, अम्मी और अब्बू की मौत हो चुकी है,

02. रुखसाना- वसीम की फूफी, विधवा, दिखने में बहुत सुंदर, बदन थोड़ा मोटा, सेक्सी,

03. शाजिया- फैशन का शौक, रुखसाना की बेटी, उमर 18 साल, 11वीं क्लास में, रंग दूधिया सफेद, पतला बदन, दिखने में हाट,
 
मैं बिहार के एक छोटे से गाँव से हूँ, मेरा नाम वसीम है, मेरी उमर 22 साल है, दिखने में भी ठीक ठाक हूँ। मेरा परिवार बहुत छोटा सा है क्योंकी मेरे अम्मी की मौत बचपन में और अब्बू की मौत जब मैं 19 साल का था तभी हो गई थी। अब मेरे परिवार में विधवा फूफी रुखसाना, फूफी की बेटी शाजिया, और दादाजी है।

फूफी के बारे में कुछ बता दूं। वो दिखने में बहुत सुंदर हैं, और एक सिंपल सी औरत हैं। उनका बदन थोड़ा सा मोटा है लेकिन बहुत सेक्सी दिखती है।

शाजिया अभी 11वीं क्लास में है। वो 18 साल की है। देखने में बहुत हाट है, और उसकी बाड़ी पतली है, दूध जैसा सफेद रंग है उसका शाजिया को फैशन का बहुत शौक है लेकिन गाँव में होने के कारण उसकी ये इक्षा पूरी नहीं हो सकती थी।

जब अब्बू की मौत हुई थी तब मैंने 12वीं पास ही किया था उनकी मौत के बाद हमारी माली हालत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। दादाजी के पास एक छोटा सा खेत था जिसमें खेती करते थे। उसी से हमारा घर चलता था। हमारे गाँव में 12वीं तक ही स्कूल था। कोई कालेज नहीं था इसलिए मैंने आगे पढ़ाई नहीं की।

घर की हालत देखते हुए मैंने शहर जाकर पैसे कमाने का फैसला किया। मैं अपने खानदान का एकलौता बेटा हूँ। क्योंकी मेरे दादाजी के कोई भी भाई बहन नहीं हैं और हमारे कोई भी खास रिलेटिव भी नहीं है और जो हैं भी उनसे मनमुटाव चल रहा है। दादाजी शहर जाने से मना करने लगे। वो मुझे अपने से अलग नहीं करना चाहते थे पर मैंने उन्हें मना लिया।

मेरे एक दोस्त का भाई लखनऊ में काम करता है। उसने मुझसे कहा था की वो मेरी कोई छोटी मोटी जाब लगा सकता था, तो मैं लखनऊ चला गया। मुझे वहां एक अच्छे रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी मिल गई। मेरे दोस्त के भाई ने कहा- “तुमने बारहवीं के बाद पढ़ाई की होती तो तुझे और अच्छी नौकरी मिल सकती थी।

तब मैंने डिसाइड किया की थोड़ा और पढ़ लेता हूँ तो उसके कहने पर मैंने वहीं कानपुर के कालेज से बी. काम. का प्राइवेट फार्म भर दिया, क्योंकी ये डिग्री मुझे आगे चलकर अच्छी नौकरी दिला सकती थी। अब शुरू करते हैं 5 महीने पहले की कहानी ।

मैं लखनऊ में 22 साल से रह रहा था मेरा बी. काम भी कुछ महीने में कंप्लीट होने वाला था। मैं गाँव में पैसे देता था। सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक गाँव से खबर आई की दादाजी चल बसे। मैं तुरंत छुट्टी लेकर गाँव गया, हमें बहुत दुख हो रहा था। पर दादाजी अपनी जिंदगी जी चुके थे सबसे ज्यादा दुख फूफी और शाजिया को हो रहा था की अब उनका क्या होगा ? क्योंकी दादाजी उन्हें बहुत प्यार से रखते थे और अब उनका कोई नहीं है मेरे सिवाए ।

अब फूफी और रुखसाना की जिम्मेदारी मुझ पे आ गई। वो दोनों अकले हो गये थे, क्योंकी गाँव में कोई भी रिश्तेदार नहीं था और जो थे उनसे बनती नहीं थीं।

फूफी ने कहा- "वसीम बेटा, हमें अपने साथ लखनऊं ले चलो हम दो अकेली औरतें यहां नहीं रह पाएंगी..."

पर मेरा मन नहीं कर रहा था उन्हें ले जाने का, क्योंकी में लगभग 22 साल से अकेला रह रहा था और मुझे अपनी प्राइवेसी खोनी नहीं थी। इसलिए मैंने फूफी को बहाना बनाते हुए कहा- "फूफी मेरा बी. काम, कंप्लीट होने वाला है और मुझे कानपुर की एक फैक्टरी में मेरे दोस्त का भाई जाब लगा रहा है, तो मैं अब कानपुर में रहूँगा और जब मेरी नई नौकरी लग जाएगी तब तुम लोगों को बुला लूंगा..."

फूफी ये सुनकर रोने लगी, और रोते-रोते कहने लगी- "हम यहां अकेले क्या करेगी?"

मैंने उन्हें समझाया- “फसल की कटाई का समय आ गया है तो आप वो करो और जो पैसे आए उनसे घर चलाना और मैं भी बीच-बीच में आकर आपको पैसे दूंगा..."

शाजिया भी ये सुनकर रोने लगी।

तब मैंने उन दोनों को अपने सीने से लगाकर कहा- "मैं तुम लोगों को यहां से ले जल्दी जाऊँगा. "

उन दोनों ने मुझे कस के पकड़ रखा था, इस पकड़ से मुझे ऐसा लगा की मैं ही इन दोनों का सब कुछ हूँ, अब वो दोनों शांत हो गई थी। कुछ दिनों में सब कुछ शांत हो गया। अब मैं दो हफ्ते की छुट्टी के बाद लखनऊं जा रहा था।

फूफी और शाजिया रोने लगे और कहने लगे- "हमारा तुम्हारे सिवाए कोई भी नहीं है तो हो सके तो हमें जल्दी बुला लेना.” और जाते-जाते फूफी ने दादाजी की अलमारी से घर और जमीन के कागज मुझे निकाल के दिए और कहा- "दादाजी ने ये तुम्हारे नाम कर रखी थी तो इसे तुम्हीं ले जाओ...

मैंने उसे ले लिया और लखनऊं के लिए निकल पड़ा। सब कुछ नार्मल हो रहा था। मेरे जाने के बाद एक महीने बीत चुके थे, फूफी मुझे फोन कर-करके आने के लिए कह रही थी। पर मैं बहुत बिजी था। तभी एक दिन फूफी का फिर फोन आया और वो बहुत रो रही थी और बार-बार शाजिया का नाम ले रही थी।
 
मैंने उन्हें शांत करके पूछा- “क्या हुवा?"

उन्होंने बताया- "सरपंज के बेटे ने रात में आकर शाजिया के साथ जबरजस्ती करने की कोशिश की...."

ये सुनकर मेरी जान हलक में आ गई तो मैंने पूछा- “आप कहां थी उस वक़्त ?”

उन्होंने बताया- "मैं एक शादी में गई थी और शाजिया को थोड़ा सा बुखार था इसलिए वो नहीं गई मेरे साथ । इसी मौके का फायदा उठाकर वो घर में घुसने लगा तो शाजिया ने शोर मचा दिया। आवाज सुनकर पड़ोसी आ गये और उन्होंने शाजिया की इज्जत बचा ली और वो कमीना भाग गया...."

मैंने पूछा- “अब शाजिया कैसी है?"

फूफी ने कहा- “अब शाजिया को बहुत तेज बुखार हो गया है और तुम्हें बुला रही है..."

"

मैंने कहा- "मैं अभी निकल रहा हूँ यहां से गाँव के लिए और तुरंत रात की ट्रेन से निकला और वहां सबेरे में पहुँच गया।

फूफी ने दरवाजा खोला। मुझे देखकर फूफी की आँखों में आँसू आ गये। पर मैं भागता हुआ शाजिया के पास गया तो वो सो रही थी। इसलिये मैंने उसे डिस्टर्ब नहीं किया और सोने दिया। मैं फूफी के पास गया और उन्हें गले से लगा लिए।

फूफी फूट-फूट के रोने लगी और सारी कहानी फिर से बताने लगी। उन्होंने कहा- "तुम्हारे जाने के बाद गाँव के मर्दों और लड़कों की नजर मुझपर और शाजिया पर थी..."

मैंने कहा- “आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?"

फूफी कहने लगी- "मुझे लगा की तुम परेशान हो जाओगे, और तुमने कहा था की तुम कानपुर जाने वाले हो तो इसलिए तुम्हें परेशान नहीं किया..."

हमारी आवाज सुनकर शाजिया उठ गई और कमरे से बाहर निकली और मुझे देखकर रोती हुई मेरी तरफ आई और मुझे गले लगा लिया..."

मैं शाजिया को शांत करने की कोशिश करने लगा। पर वो शांत नहीं हो रही थी। वो रोते-रोते कह रही थी- “मुझे अपने साथ ले चलो अब मैं यहां नहीं रहना चाहती...”

मैंने उससे वादा किया- “अब तुम लोग मेरे साथ चलोगी." और अपने मन में कहा- “पर सबसे पहले उस सरपंच के बेटे को सबक सिखाना होगा...."

मैंने उसी वक़्त होटेल में फोन करके दो हफ्ते छुट्टी माँग ली पारिवारिक एमर्जेन्सी है कहकर हमारी मैनेजर बड़ी अच्छी है इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा। अब मैं और मेरे दोस्त मिलकर सरपंच के बेटे को ढूँढ़ने लगे और हम लोगों ने पोलिस में शिकायत भी कर दी, और इसी बीच मैं घर और खेत के लिए ग्राहक भी ढूँढ़ने लगा। मेरे पास दो हफ्ते का समय था। इसी दो हफ्ते में मुझे ग्राहक और सरपंच के बेटे इमरान को ढूँढ़ना था। तीन दिन बीत गये।

मैं और फूफी शाजिया के साथ हमेशा रहते थे। वो दोनों बहुत खुश थीं। क्योंकी मैंने वादा किया था की उन्हें मैं अपने साथ ले जाऊँगा। चौथे दिन सुबह घर का एक ग्राहक आया, मैंने उसे पूरा घर दिखा दिया।

उसे मकान पसंद भी आया तो उसने पूछा- "कितने में बेचेंगे इसे?"

मैंने कहा- "7 लाख में" क्योंकी हमारा घर बड़ा था पर गाँव की जमीन की ज्यादा कीमत वल्यू नहीं होती ।

थोड़ा मोल-भाव करने के बाद 6.7 लाख में बात पक्की हो गई। मैंने उससे ये भी कह दिया की हमें घर जल्दी बेचना है।

उसने कहा- "ठीक है। मैं दो दिन के बाद आता हूँ..'

पाँच दिन बीत गये पर सरपंच के बेटे इमरान का कुछ पता नहीं चल रहा था। उसी दिन हमारे घर पर सरपंच जी और उनकी बीवी आए और माफी माँगने लगे और रो-रोकर पोलिस से शिकायत वापस लेने को कहने लगे। पर मैंने मना कर दिया और वो रोते-रोते चले गये।

सात दिन बीत गये उस घर के ग्राहक का कोई फोन नहीं आया।

शाम को एक फोन आया पर वो मेरे दोस्त अकरम का था, जो बगल के गाँव में रहता था। उसने मुझसे बताया की उसने इमरान को अपने गाँव में देखा है। मैं भागते हुए अपने दोस्तों के पास गया और उन्हें फोन के बारे में बता दिया। हम सब सोचने लगे की वो बगल वाले गाँव में कहां रह रहा होगा और उसको ढूँढ़ें कैसे? तभी मुझे ध्यान आया की इमरान की बहन की शादी उसी गाँव में हुई थी, तो इसका मतलब है की वो अपनी बहन की ससुराल में छुपा हो सकता है।

उसी वक़्त मैंने अकरम को फोन लगाकर कहा- “इमरान की बहन के घर पे नजर रखो। हम लोग कल आ रहे हैं। सुबह 3:00 बजे हम सारे दोस्त मिल के अकरम के गाँव जाने लगे। इतनी सुबह इसलिए की हमें कोई देख ना सके की ये सारे लोग कहां जा रहे हैं। जब हम लोग गाँव पहुँचे तो हम लोग अकरम के घर जाकर छुप गये । क्योंकी मैं नहीं चाहता था की इमरान को पता चले की मैं यही हूँ।
 
अकरम ने सारे दिन इमरान के बहन के घर पर नजर रखी, पर इमरान नहीं दिख रहा था। शाम को अचानक इमरान घर से निकला और कहीं जाने लगा। अकरम ने तुरंत मुझे फोन किया तो मैंने उससे कहा की तुम उसका पीछा करो हम अभी आ रहे हैं।

मैं मेरे दोस्त भेष बदल के निकले और अकरम के साथ उसका पीछा करने लगे। तभी हम लोगों ने देखा की वो एक घर में घुस रहा है। मैंने पूछा- “ये किसका घर है?"

अकरम ने बताया- “ये एक रंडीखाना है..."

हम लोग भी उस रंडीखाने में घुस गये और देखा की इमरान एक औरत के साथ एक कमरे में घुस गया और दरवाजा बंद कर लिया। अब हमारे पास इंतजार करने के सिवाए और कोई रास्ता नहीं था, तो हम लोग बाहर निकले। पर मेरे दोस्तों का मन रंडीखाने में रंडियों को देखकर डोलने लगा और अंदर जाने के लिए कहने लगे।

मैंने उन लोगों को बहुत समझाया तो वो लोग एक शर्त पे माने की मैं उन लोगों को अपना बदला पूरा होने के बाद इस रंडी खाने में लाऊँगा तो मैंने हाँ कर दी।

50 मिनट इंतजार करने बाद इमरान निकला तो हम लोग उसका पीछा करने लगे। तब तक अंधेरा हो चुका था। वो जिस रास्ते से आया था उसी रास्ते से बहन के घर जाने लगा। रास्ते में एक सुनसान गली थी तो हम लोग ने उसको उसी लगी में रोका।

इमरान कहने लगा- "कौन हो तुम लोग?"

हमने कोई जवाब नहीं दिया। फिर मेरे एक दोस्त ने तुरंत उसका मुँह पकड़ लिया और मैंने लात घूसों की बरसात कर दी। ये देखकर बाकी दोस्त भी शुरू हो गये। दस मिनट बाद अकरम ने चाकू निकाला और मुझे दिया। हम सबने उसे मारना बंद किया और उसके हाथ पैर पकड़ लिए। अब मैंने उसको उल्टा किया और चाकू से उसके प्राइवेट पार्टस पे कट मारने लगा, उसकी गाण्ड पे, जांघों पे, और उसके लण्ड के पास ।

इमरान दर्द के मारे रोने लगा। मैंने उसको लगभग नामर्द बना दिया, और उसको वहीं छोड़कर हम वहां से भागे । अब वो जब भी बैठेगा या मूतने जाएगा उसको वो कट के दर्द और उसको देखकर रोना आएगा और अब वो कभी सेक्स नहीं कर पाएगा।

इस बदले से मैं बहुत खुश था हम भागते हुए अकरम के घर गये और वहां पार्टी की। अब बारी थी वादे की तो उन लोगों को मैं रंडी खाने ले गया, और उन लोगों ने खूब एंजाय किया। पर मैं अंदर नहीं गया, क्योंकी मैंने ये प्लान बनाया था की हम सब एक-एक करके अपने गाँव जाएंगे, क्योंकी अगर हम एक साथ गये तो सबको शक हो जाएगा। तो मैं उन लोगों को रंडीखाने में छोड़कर तुरंत गाँव के लिए निकल पड़ा। रात के अंधेरे में घर पहुँचा

फूफी और शाजिया को जब बताया की मैंने उनका बदला ले लिया है तो शाजिया बहुत खुश हुई और उसने कस के मुझे अपनी बाहों में पकड़ लिया। मेरा हाथ उसके नंगे पेट में था, तब मुझे अजीब सी फीलिंग होने लगी। इस फीलिंग की वजह से मैंने भी उसे कस के पकड़ लिया और उसके पेट पर हाथ फेरने लगा।

तभी फूफी पीछे से बोली- “बेटा अगर तुमको किसी ने पहचान लिया तो?"

मैंने उन्हें समझाया- “हमें यहां से किसी ने जाते या आते हुए नहीं देखा। इमरान को मारते हुए नहीं देखा। अगर देख भी लिया होगा तो हम लोगों ने भेष बदल रखा था। यहां तक की इमरान को खुद नहीं पता होगा की उसे कौन मार गया?"

ये सुनकर दोनों बहुत खुश हुए। रात थी इसलिए हम सब सोने चले गये।

9वें दिन दोपहर में वो ग्राहक आया और मुझसे घर की रजिस्ट्री की बात करने लगा।

मैंने कहा- "कल ही हम लोग रजिस्ट्रार आफिस जाएंगे और फार्मेलिटीस पूरी कर लेंगे..” तो वो चला गया ।

शाम को पता चला की सरपंच का बेटा हास्पिटल में भरती है और पोलिस उसके ठीक होने बाद उसको अरेस्ट कर लेगी। पर वो इतनी जल्दी ठीक कहां होने वाला कहा था।

दसवें दिन सुबह वो ग्राहक आया और हम लोग रजिस्ट्रार आफिस गये और सारी फार्मेलिटीस पूरी कर ली। उसने मुझे घर के पैसे दे दिए, जो मैं तुरंत बैंक में जाकर जमा कर आया। मैं बहुत खुश था। मैंने फूफी और शाजिया के लिए कपड़े खरीदे और मिठाई लेकर गया। वो दोनों डील की बात सुनकर और कपड़े देखकर बहुत खुश हुए।

उसी दिन सरपंच की बीवी आई और फिर से से माफी माँगने लगी। उसने कहा- "मेरे बेटे को उसकी किए की सजा मिल चुकी है, वो अब कभी भी बाप नहीं बन सकता...*

मैंने अपने मन में कहा- “बाप तो तब बनेगा जब किसी को चोद पाएगा...

सरपंच की बीवी कहने लगी- “कृपया आप लोग अपनी शिकायत वापस ले लो...

मैंने फूफी और शाजिया की तरफ देखा, तो उनके मुँह पे मंद-मंद मुश्कान थी। मैं समझ गया की अब बदला पूरा हो चुका है, तो मैंने सरपंच की बीवी से कहा- "हमें आपकी स्थिति पर दया आ रही है। इसलिए हम लोग शिकायत वापस ले लेंगे...

फिर वो चली गई, और शाम को ही मैंने शिकायत वापस ले ली। हम तीनों बहुत खुश थे।
 
11वें दिन, हमारे खेत के लिए कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था तो मैंने निर्णय किया की ये खेत किसी किसान को किराए में दे देंगे, वो इस पर खेती करेगा और हमें सालाना किराया देगा। तो मैंने ऐसा ही किया और एक किसान को सारे पेपर वर्क करने बाद खेत किराए में दे दिया।

12वें दिन हम लोगों के जाने का दिन आ गया तो मैं अपने सारे दोस्तों से जाने से पहले मिल लिया और टिकेट करने स्टेशन चला गया। फूफी और शाजिया खुशी के मारे उछल रहे थे। क्योंकी अब उन्हें कोई परेशानी नहीं थी, और उन्हें मेरे साथ रहना पसंद भी था। जब मैं टिकेट लेकर आया तो उन दोनों ने मुझे बाहों में भर लिया और फूफी ने मेरे दायें गाल पे किस किया और शाजिया ने लेफ्ट गाल पे मुझे बहुत अच्छा लगा तो जवाब में मैंने भी उन दोनों के माथे पे किस किया। दोनों बहुत खुश हो गईं।

रात में 10:00 बजे के करीब हम लोग लखनऊं स्टेशन पहुँचे। मेरे घर के बारे में कुछ डीटेल्स | मेरा घर एक ऐसे एरिया में है जहां ज्यादा घर नहीं बने हैं, वो अंडर डेवलप एरिया है। सारे घर एक दूसरे से थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हैं। मेरे घर जो की किराए का है, घर में एक बेडरूम, किचेन, बाथरूम, टायलेट और एक छोटा सा गार्डन एरिया भी है। बेडरूम में एक बेड, टीवी और कूलर है। मेरा घर एक नार्मल सा घर था। पर अब मेरे पास 6 लाख से ज्यादा रुपये थे तो मैंने उसे अपग्रेड करने की सोची। अब हम लोग स्टेशन से घर के लिए निकले। एक घंटे में घर पहुँच गये। मैंने घर का ताला खोला और अंदर गये।

फूफी ने घर देखा और कहा- “अच्छा घर है बेटा..."

शाजिया तो बस टीवी को घूरे जा रही थी। क्योंकी हमारे गाँव में दो या तीन लोगों के पास ही टीवी था और उसने टीवी एक-दो बार ही देखा होगा |

काफी रात हो चुकी थी तो मैंने कहा- "सो जाते हैं..."

अब दिक्कत ये थी की बेड था सिंगल और सोने वाले थे तीन, तो फूफी ने कहा- "मैं और शाजिया चद्दर बिछाकर नीची सो जाते हैं। तुम ऊपर सो जाओ..."

हम लोगों ने खाना स्टेशन पर ही खा लिया था तो सबको नींद भी खूब आ रही तो सब लोग सो गये।
 
हम लोगों ने खाना स्टेशन पर ही खा लिया था तो सबको नींद भी खूब आ रही तो सब लोग सो गये।

सुबह मेरी आँख पहले खुल गई और मैंने देखा की फूफी और शाजिया सोते हुए कितनी हाट दिख रही थी। फूफी की कमर और शाजिया की गाण्ड देखकर मैं पागल ही हो गया।

मैं फूफी की कमर में हाट रखकर उन्हें उठाने लगा और वो उठ गई। पर फूफी की कमर पे हाथ रखते ही मेरे बदन में करेट दौड़ गया था। अब मैंने शाजिया की गाण्ड पे हाथ रखा और उसे उठाने गला । पर वो नहीं उठ रही थी, तो मैंने इस मौके का फायदा उठाते हुए उसकी गाण्ड मसल दी। अब वो उठी। वो दोनों अभी भी नींद में थीं। ये देखकर मुझे गुस्सा आया की मेरे उठने पर भी नहीं उठ रहे तो मैंने उन्हें तेज आवाज में उठने को कहा, तो दोनों उठकर खड़े हो गये।

ये सब देखकर मुझे थोड़ा गिल्टी फील हुआ की मैंने उन्हें डाँट दिया, तो मैंने सोचा की मैं इन दोनों को आज लखनऊं घुमाऊँगा तो दोनों खुश हो जाएंगी। उन दोनों लोगों ने नहा लिया। अब मुझे नहाना था तो मैं फ्रेश होने के बाद बाथरूम में गया और देखा की फूफी और शाजिया के कपड़े और अंडरगार्मेंट्स वही पड़े हैं। ये देखकर मुझे फिर से गुस्सा आ गया। पर इस बार मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा और नहाकर बाहर आ गया।

शाजिया बार-बार टीवी चालू करने को कह रही थी तो मैंने टीवी चला दिया और म्यूजिक चऋनेल लगा दिया। वो अब टीवी देखने में बिजी हो गई।

फूफी कहने लगी- "बेटा मैंमैं तुम्हारे लिए नाश्ता बना दूं?

मैं उन्हें किचेन में ले गया और कहा- "आज से ये किचेन आपका। अब आपको मुझसे पूछने की कोई जरूरत नहीं है...."

फूफी खुश हो गई और नाश्ता बनाने लगी। मैं शाजिया के साथ टीवी देखने लगा। नाश्ता करने बाद मैंने उन्हें लखनऊं घूमने की बात कही, तो वो दोनों खुशी से झूम उठी। पर मैंने कहा- “एक शर्त पे ले जाऊँगा की आप दोनों मुझे गाल पे किस करेगी पहले की तरह...

ये सुनकर वो दोनों शर्माने लगीं पर एक-एक करके मुझे गाल पे किस किया तो मैं उन्हें लखनऊं घुमाने निकल पड़ा। मैंने उन्हें कई जगह घुमाई दोपहर में उन्हें एक छोटे से रेस्टोरेंट में खाना भी खिलाया। धूप बहुत थी तो मैंने सोचा की दोपहर काटने के लिए उन्हें सिनेमा हाल में ले जाऊँ और वहां एक पिक्चर दिखाऊँ। तो मैंने ऐसा

ही किया और उन्हें पिक्चर दिखाने ले गया।

शाजिया तो पहली बार सिनेमा हाल में गई थी। वो खुश थी पिक्चर देखकर जब हम बाहर निकले तो उन दोनों के हाथ मेरे हाथ में थे। फूफी और शाजिया बहुत ही खुश थी।

अब शाम हो चुकी थी। मैंने घर जाते समय एक ढाबे से खाना पैक करा लिया और हम लोग घर के लिये निकल पड़े। वो दोनों और मैं काफी थक चुके थे। ह ने खाना खाया और टीवी देखने लगे। टीवी पे मैंने एक मूवी लगा दी जिस पे हाट सीन चल रहे थे। बिस्तर पे मैं और मेरे आगे शाजिया लेटकर मूवी देख रहे थे। मेरा हाथ उसकी कमर पे था। फूफी नीचे लेटकर देख रही थी।

हाट सीन देखकर मेरा लण्ड खड़ा होने लगा। मैंने उसको थोड़ा अज़स्ट किया और शाजिया को कस के पकड़ लिया। वो हाट सीन देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने महसूस किया की शाजिया का बदन थोड़ा ऐंठने लगा है हाट सीन देखने की वजह से। तब मैंने उसे और कस के पकड़ लिया। हम दोनों एकदम चिपके थे।

तभी फूफी बोली- "बेटा बहुत नींद आ रही है, इसको बंद कर दो..” कहकर मेरे मूड पे फूफी ने पानी फेर दिया।

मैं उठा टीवी बंद करने के लिए और शाजिया नीचे चली गई सोने के लिए। ये दोनों गाँव से अभी शहर आई है इसलिए इन दोनों को आदत नहीं है देर तक जागने की। टीवी बंद करके वो लोग सो गये। कल मुझे बहुत सारे सामान खरीदने थे घर के लिए, इसलिए मैं भी सो गया।

सुबह मैं उठा तो फूफी और शाजिया नहा धो चुके थे। फूफी सबके लिए नाश्ता बना रही थी। शाजिया नहा के अभी निकली ही थी, वो भीगी हुई एकदम हाट लग रही थी। उसे देखकर मेरे मन में गंदे गंदे खयाल आ रहे थे। पर मैंने कंट्रोल किया और फ्रेश होने चला गया। मैं नहा धोकर निकला और घर का सामान मार्केट से खरीदने के लिए तैयार होने लगा। नाश्ता किया और मार्केट के लिए निकला।

सबसे पहले मैं एलेक्ट्रानिक की दुकान में गया और सेकेंड हैंड रेफ्रिजिरेटर खरीदा। मैंने सोचा की मेरे पास पैसे हैं लेकिन फिजूल खर्चे ज्यादा ना करूं। इसीलिए सेकेंड हैंड आर्डर दे दिया और रेफ्रिजरेटर शाम को घर भी आ जाएगा। अब मैं अपने होटेल में काम करने वाले एक दोस्त के पास गया जो अपनी मोटरसाइकिल बेच रहा था, तो मैंने उससे वो खरीद ली और पेमेंट भी कर दिया।
 
मुझे लगा मैंने अपने लिए बहुत पैसे खर्च कर लिए। अब फूफी और शाजिया के लिए कपड़े ले लूं। क्योंकी उन लोगों के पास अच्छे कपड़े नहीं हैं शहर के हिसाब से तो मैं उनके लिए कपड़े लेने गया कपड़ों की दुकान पे। मैंने ऐसी-ऐसी ड्रेस देखी जिसे मुझे लगा की अगर फूफी और शाजिया इन्हें पहेनेंगी तो क्यामत ढाएंगी। मैंने वो माडर्न ड्रेसेंस खरीद ली। अब शाम होने वाली थी तो मैं घर पहुँच गया।

मैंने अपनी मोटरसाइकिल उन लोगों को दिखाई और कहा- “हम लोग इसी से अब कहीं घूमने जाएंगे. "

वो दोनों हँसने लगी ।

मैंने कहा- “अपनी सी बचा के रखो, अभी और सर्प्राइज है इस बार तुम लोगों के लिए..."

शाजिया कहने लगी- "क्या सर्प्राइज है?"

मैंने कहा- "ऐसे नहीं मिलेगा। पहले मुझे एक किस चाहिए..."

फूफी ने कहा- "क्या?"

मैंने अपनी बाहें फैलाकर कहा- "हाँ गाल पे एक-एक किस दो..."

वो दोनों शर्माकर हँसने लगी।

मैंने कहा- "अगर मुझे किस नहीं दिया तो मैं नहीं दूँगा..."

शाजिया मेरी तरफ आई तो मैंने उसे कसकर बाहों में पकड़ा और उसने मेरे दोनों गालों पे किस किया। अब फूफी मेरी तरफ आई, उन्हें भी मैंने अपनी बाहों में पकड़ा और उन्होंने मुझे गालों पे किस किया। मैं बाहर गया और बाइक की डिक्की से उनके लिए खरीदे हुए कपड़े लेकर आया। कपड़े उन्हें दिए। जब उन लोगों ने कपड़े देखे तो बहुत खुश हुए। खासकर के शाजिया क्योंकी उसे फैशन का बहुत शौक था।

लेकिन फूफी उन कपड़ों को देखकर थोड़ी शर्माने लगी और कहने लगी, और कहा- “आ ये कैसे पहन सकती हूँ?"

मैंने उन्हें समझाया- “शहर में औरतें ऐसे ही कपड़े पहनती है..." तब वो मान गई

शाजिया के लिए मैं दो जीन्स और दो टाप लेकर आया था और फूफी के लिए दो बैकलेश लाल और आरेंज सारी, और कहा- "अब आप लोग इसे पहन के दिखाओ..."

सबसे पहले फूफी गई बाथरूम में और साड़ी पहनकर आई। उन्हें देखकर मेरी सांसें थम गई। मन कर रहा था की उन्हें ही देखता रहूं और अभी के अभी उनको बिस्तर पे लेजाकर चोद दूं। जब मेरी नजर उनकी कमर पे गई तो मुझे लगा की उनकी कमर पकड़कर किस करता रहूँ।

फूफी मुझे अपने पास बुलाने लगी और कहा- "मेरे पीठ पे जो डोरी लटक रही है उसे बाँध दो..."

मैंने उनकी कमर पकड़ी और उनकी पीठ अपनी तरफ घुमाई और उनकी डोरी बाँध दी। फिर मैंने कहा- "फूफी साड़ी कमर के इतने ऊपर नहीं पहनते...'

फूफी ने कहा- "फिर कैसे पहनते हैं?

मैंने कहा- "मैं बताता हूँ..” कहकर मैंने उनकी कमर के पास साड़ी पकड़ी और उसे खींच के नीचे ला दी ।

फूफी शर्माने लगी और अपनी कमर अपने हाथ से छुपाने लगी, तो मैंने उनका हाथ हटाया और उसे देखने लगा। उनकी कमर बिल्कुल झकास दिख रही थी।

मैंने कहा- "फूफी आप बहुत सुंदर दिख रही हो..."

फूफी शर्माते हुए मेरी बाहों में आकर अपना मुँह छुपाने लगी। मैंने उन्हें कस के पकड़ लिया था। मेरा एक हाथ उनके नंगे पेट पे और दूसरा हाथ उनकी कमर पे था। मन तो कर रहा था की उनको ना छोडू। पर फूफी अब उन कपड़ों में कंफर्टेबल महसूस कर रही थी ।

मैंने उन्हें छोड़ दिया और कहा- “फूफी शर्माइए मत। यहां मैं और शाजिया ही हैं..."

शाजिया तो अपने कपड़े देखने में ही बिजी थी।

फूफी ने कहा- "शाजिया ये कपड़े कैसे लग रहे हैं?"

शाजिया - "अम्मी बहुत सुंदर दिख रही हो। अब से तुम यही कपड़े पहना करो...

मैंने कहा- "ये कपड़े दिन में पहनने वाले हैं। रात के लिए नाइटी लाया हूँ...

फूफी नाइटी समझ नहीं पाई तो मैंने उन्हें नाइटी दिखाई, जो नार्मल नाइटी थी, और कहा- "ये तुम दोनों के लिए दो-दो नाइटी है...."

शाजिया कहने लगी- “अब मैं भी अपने कपड़े ट्राई करके आती हूँ.” कहकर वो भागते हुए बाथरूम में गई और जीन्स और टाप पहन के आई वो तो फूफी से भी ज्यादा हाट लग रही थी।

मैंने कहा- "इधर आओ...'

शाजिया मेरी तरफ आई, तो उसे पास से देखकर मेरे मन में लड्डू फूटने लगे। मैं मन में सोचने लगा की मेरी तो किश्मत खुल गई। इतनी हाट औरतें मेरे पास है और मैं इन्हें दूर कर रहा था। मेरे मन में फूफी और शाजिया के लिए गंदेडे विचार आने लगे थे।

तभी शाजिया बोली “बताओ ना मैं कैसी दिख रही हूँ?"

मैं- "तुम बहुत सेक्सी लग रही हो...'

शाजिया ये सुनकर हँसने लगी और घूम-घूम के अपने आपको मुझे दिखाने लगी। वो बिल्कुल इस लड़की की तरह दिख रही थी। मैंने उसके गालों पे किस किया तो शर्माने लगी। अब उन दोनों ने वो कपड़े खोल दिए और नाइटी पहन ली।

थोड़ी देर बाद कोई डोरबेल बजाता है तो मैं दरवाजा खोलता हूँ।

एक आदमी रेफ्रिजिरेटर की डेलिवरी लेकर आया था। उसे मैंने किचेन में रखवा दिया और वो चला गया। फूफी उसे देखकर समझ नहीं पाई की ये क्या चीज है? तो मैंने उन्हें उसके बारे में सब समझा दिया ।

फूफी अब खाना बनाने लगी और शाजिया मेरे साथ कूलर की हवा खाते हुए टीवी देखने लगी। खाना खाते हुए मैंने इन दोनों को बताया की अब मेरी छुट्टी खत्म हो गई है, और मुझे कल से जाब पे जाना होगा। खाना खा के हम लोग सो गये। सुबह हुई तो मैं उठकर तैयार होने लगा। फूफी और शाजिया नाश्ता बना रही थी।

नाश्ता करके मैंने फूफी से कहा- "जब तक मैं ना आ जाऊँ किसी के लिए भी दरवाजा मत खोलना चाहे कोई भी हो। छत पे जाकर बात करना, क्योंकी यहां चोरियां बहुत होती हैं." और मैं होटेल के लिए निकल गया । होटेल जाकर में काम में बिजी हो गया।

हमारी मैनेजर सुरभि मेम ने मुझसे कहा- "अच्छा हुआ की तुम टाइम पे आ गये। आज होटेल में बहुत बड़ी पार्टी है..." वो मुझ पे काफी भरोसा करती हैं। क्योंकी मैं एक सीधा साधा लड़का हूँ और इस होटेल में 21/1⁄2 साल से काम भी कर रहा हूँ।

मैं होटेल में वेटर था पर मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था की मैं उनका असिस्टेंट भी हूँ। वो अपनी पर्सनेल बातें कहती और अपने काम सिर्फ मुझे ही देती थी। इसीलिए मेरे इतनी छुट्टी माँगने पर भी वो नाराज नहीं होती। होटेल में पार्टी की तैयरी होने लगी। मैं भी उसी में बिजी था। पार्टी दोपहर में शुरू हुई और शाम को खतम भी हो गई। सब कुछ अच्छे से निपट गया। रात होने वाली थी और मेरी शिफ्ट अब खत्म हो चुकी थी तो मैं बाइक से घर के लिए निकल पड़ा।
 
तभी शाजिया बोली “बताओ ना मैं कैसी दिख रही हूँ?"

मैं- "तुम बहुत सेक्सी लग रही हो...'

शाजिया ये सुनकर हँसने लगी और घूम-घूम के अपने आपको मुझे दिखाने लगी। वो बिल्कुल इस लड़की की तरह दिख रही थी। मैंने उसके गालों पे किस किया तो शर्माने लगी। अब उन दोनों ने वो कपड़े खोल दिए और नाइटी पहन ली।

थोड़ी देर बाद कोई डोरबेल बजाता है तो मैं दरवाजा खोलता हूँ।

एक आदमी रेफ्रिजिरेटर की डेलिवरी लेकर आया था। उसे मैंने किचेन में रखवा दिया और वो चला गया। फूफी उसे देखकर समझ नहीं पाई की ये क्या चीज है? तो मैंने उन्हें उसके बारे में सब समझा दिया ।

फूफी अब खाना बनाने लगी और शाजिया मेरे साथ कूलर की हवा खाते हुए टीवी देखने लगी। खाना खाते हुए मैंने इन दोनों को बताया की अब मेरी छुट्टी खत्म हो गई है, और मुझे कल से जाब पे जाना होगा। खाना खा के हम लोग सो गये। सुबह हुई तो मैं उठकर तैयार होने लगा। फूफी और शाजिया नाश्ता बना रही थी।

नाश्ता करके मैंने फूफी से कहा- "जब तक मैं ना आ जाऊँ किसी के लिए भी दरवाजा मत खोलना चाहे कोई भी हो। छत पे जाकर बात करना, क्योंकी यहां चोरियां बहुत होती हैं." और मैं होटेल के लिए निकल गया । होटेल जाकर में काम में बिजी हो गया।

हमारी मैनेजर सुरभि मेम ने मुझसे कहा- "अच्छा हुआ की तुम टाइम पे आ गये। आज होटेल में बहुत बड़ी पार्टी है..." वो मुझ पे काफी भरोसा करती हैं। क्योंकी मैं एक सीधा साधा लड़का हूँ और इस होटेल में 21/1⁄2 साल से काम भी कर रहा हूँ।

मैं होटेल में वेटर था पर मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था की मैं उनका असिस्टेंट भी हूँ। वो अपनी पर्सनेल बातें कहती और अपने काम सिर्फ मुझे ही देती थी। इसीलिए मेरे इतनी छुट्टी माँगने पर भी वो नाराज नहीं होती। होटेल में पार्टी की तैयरी होने लगी। मैं भी उसी में बिजी था। पार्टी दोपहर में शुरू हुई और शाम को खतम भी हो गई। सब कुछ अच्छे से निपट गया। रात होने वाली थी और मेरी शिफ्ट अब खत्म हो चुकी थी तो मैं बाइक से घर के लिए निकल पड़ा।

घर पहुँच के मैंने शाजिया को आवाज लगाई तो उसी ने दरवाजा खोला। हाथ पैर धोकर फ्रेश होकर मैं बिस्तर पे बैठ गया और आराम करने लगा। शाजिया और फूफी मेरे बगल में आकर बैठ गये और मेरे हाथ पैर दबाने लगे।

मैं- “ये क्या कर रहे हो तुम लोग?"

फूफी कहने लगी- "बेटा तुम बहुत थक गये होगे..."

मैंने कहा- "लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं थी..” हालांकी मुझे अच्छा लग रहा था की कोई मेरे हाथ पैर दबा रहा है। लेकिन में झूठ-मूठ का मना करने लगा।

फूफी कहने लगी- “हम दोनों तुम्हारे दादाजी के भी पैर दबाते थे जब वो खेत से आते थे...

मैंने कुछ नहीं कहा और वो दोनों दबाने लगी। पैर दबाते-दबाते मैंने उन लोग से पूछा- "कैसा लग रहा है यहां?"

फूफी- "अच्छा लग रहा है बेटा। शाजिया तो दिन भर टीवी ही देख रही थी..."

मैं- “आपने क्या किया आज दिन भर ?"

फूफी बताने लगी- "मैंने तो घर की साफ सफाई की और दोपहर में खाना खाकर सो गई थी। यहां गाँव से ज्यादा सुख सुविधा है और कोई ज्यादा काम भी नहीं है..."

ये दोनों मेरे पास ही बैठी थी। फूफी पांव दबा रही थी और शाजिया हाथ दबा रही थी, तो मैंने अपना सिर शाजिया की गोद में रख दिया और कहा- “हाथ रहने दो सिर दबा दो..."

शाजिया की गोल-गोल चूचियां मेरे सिर के एकदम करीब थीं, उसे देखने में बहुत मजा आ रहा था।

मैंने कहा- "फूफी, बहुत भूख लग रही है। जल्दी से खाना बना दो..."

फूफी किचेन में चली गई।

मैंने शाजिया से कहा- "टीवी चला लो..."
 
शाजिया भागते हुए टीवी चलाने गई। कयोंकी उसे टीवी देखने में मजा आता है। शायद जब मैं होटेल से आया तब उसने मेरे डर से टीवी बंद कर दिया था, अब वो और मैं बिस्तर पे बैठकर पिक्चर देख रहे थे। मैंने उसे प्यार से पीछे से पकड़ रखा था। थोड़ी देर के बाद में उठा और किचेन में पानी पीने के लिए गया। फूफी खाना बना रही थी। पीछे से उनकी गाण्ड देखकर मेरा मन खराब हो गया।

मैंने उन्हें पीछे से से पकड़ लिया और कहा “खाने में क्या बना रही हो?"

फूफी- "तुम्हारी पसंद का खाना बेटा..."

मेरा हाथ उनके पेट था और सिर उनकी पीठ के थोड़े से नंगे हिस्से पर उन्होंने नाइटी पहन रखी थी इसलिए पूरा शरीर ढका हुआ था। पर पीठ पे थोड़ा सा हिस्सा खुला हुआ था,

मैंने उनकी पीठ पर एक किस किया और कहा- “आप मेरा कितना खयाल रखती हैं?"

फूफी ने कहा- "बेटा ये बात तो मुझे तुमसे कहनी चाहिए। तुमने हम दोनों के लिए बहुत कुछ किया है नहीं तो आजकल के बच्चे अपने माँ बाप को घर से निकाल देते हैं, और तुमने तो अपनी फूफी को घर पर रखा है, जब हमारा तुम्हारे सिवाए कोई नहीं था। तुम्हारा एहसान हम लोग कैसे चायेंगी?"

मैंने कहा- "फूफी मैं मैपसे और शाजिया से बहुत प्यार करता हूँ। मैं आप लोगों को कभी अकेला नहीं छोडूंगा.'

"

फूफी ये सुनकर मेरे तरफ मुड़ी और मुझे गले लगा लिया। उनकी आँखों में थोड़ा-थोड़ा पानी आ गया था हमारी ये बातें शाजिया पीछे खड़े होकर सुन रही थी और जब फूफी ने गले लगाया तो शाजिया ने भी मुझे पीछे से पकड़ लिया। अब मुझे आगे से फूफी ने और पीछे से शाजिया ने पकड़ रखा था।

मुझे बहुत अच्छी फीलिंग आ रही थी। मैंने भी फूफी को कसकर पकड़ लिया फिर मैंने फूफी के आँसू पोछे और उनके गाल पे होठों के करीब किस किया। उनके चेहरा पे शर्म आ गई |

शाजिया हँसते हुए बोली- "मुझे किस नहीं करोगे?"

मैं पलटा और शाजिया का चेहरा पकड़कर उसको भी होठों के करीब किस किया। अब फूफी खाना पकाने लगी और शाजिया और मैं टीवी देखने लगे। खाना तैयार हो गया। मैंने एक-एक कौर दोनों को अपने हाथों से खिलाया

फिर हम तीनों ने एक साथ खाना खाया। खाना खाकर टीवी देख रहे थे।

"

फूफी ने कहा- "वसीम बेटा, शाजिया ने गाँव में 11वीं तक ही पढ़ाई की है। उसका अमिशन यहां किसी स्कूल में करा दो ना....

मैंने कहा- "ठीक है। देखते हैं कोई स्कूल अड्मिशन के लिए" और थोड़ी देर बाद हम सब सो गये ।

………………………..

अगले दिन सुबह मैं तैयार हो रहा था काम पे जाने लिए।

फूफी बोली- "बेटा नाश्ता तैयार है आकर कर लो..."

शाजिया छत पे थी। कपड़े धूप में डाल रही थी। मैंने नाश्ता किया और रेस्टोरेंट के लिए निकला। छत परपे से ही शाजिया ने मुझे बाड़ किया। रेस्टोरेंट में काम बहुत होते हैं। मैं उसी में बिजी हो जाता हूँ मैनेजर मेम के साथ | वो मुझसे कभी-कभी बहुत सी मजाक करती थी। मुझे भी अच्छा लगता था। मेरे साथ काम करने वाले कभी- कभी मुझसे पूछते थे की क्या मेडम मुझसे पटी हुई हैं क्या?

मैं उन्हें डाँट दिया करता था। क्योंकी मेरे मन में मेम के लिए बहुत रेस्पेक्ट थी, और कुछ नहीं। रात होते ही मैं घर के लिए निकल पड़ता हूँ। मुझे जल्दी थी क्योंकी दो हसीन औरतें मेरा इंतजार करती हैं। मैंने रास्ते में एक स्कूल का बोर्ड देखा जो की मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं था, उसका अड्रेस लिख लिया और चल दिया। घर में आते ही मैंने उन दोनों को बताया की एक स्कूल है यहां से थोड़ी दूरी पर परसों हम चलेंगी वहां अमिशन के लिए, क्योंकी परसों सनडे है और मेरी छुट्टी है।

शाजिया खुश हो गई।

हम तीनो खाना खा के सोने चले गये। मैं मन में सोच रहा था मुझे मोका ही नहीं मिल पा रहा है बात आगे बढ़ाने का इन दोनों साथ। यही सब सोच-सोचकर मैंमैं सो गया। अगले दिन भी भी वैसा ही रहा जैसा पहला दिन था। घर से होटेल और होटेल से घर सनडे का दिन आया तो मैं और शाजिया तैयार होकर स्कूल के लिए निकले। फूफी घर पर ही थी। स्कूल तो बंद था, पर अड्मिशन का सेशन होने की वजह से स्कूल आफिस खुला था। छोटा सा स्कूल था। उसके आफिस में जाकर अमिशन की सारी बात कर ली। उन लोगों ने एक छोटा सा टेस्ट लिया और अमिशन ले लिया शाजिया का ।

शाजिया पढ़ाई में ठीक-ठाक थी। अब उसके लिए सारी बुक्स और यूनिफार्म वही पास की एक दुकान से ले लिया और घर की तरफ निकल पड़े। घर पहुँच के फूफी को खुशखबरी सुनाई की अमिशन हो गया है। फूफी ये देखकर बहुत खुश थी की मैंने शाजिया और उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह से उठा ली है। पूरे दिन भर शाजिया और फूफी के साथ खूब मस्ती की, उन्हें मार्केट घुमाया, होटेल का खाना खिलाया। हम लोग रात में घर आए और जल्दी सो गये।

सुबह में तैयार होकर रेस्टोरेंट पहुँचा तो पता चला की गवर्नमेंट ने अल्कोहाल पे बैन लगाने का फैसला किया है। इसलिए सारे रेस्टोरेंट वाले हड़ताल पे चले गये हैं। जब तक सरकार अपना फैसला नहीं बदलेगी तब तक रेस्टोरेंट नहीं खुलेंगे।

मैंने मन में सोचा- "मुझे जिस मौके की तलाश थी वो मुझे मिल गया। अब जब तक हड़ताल नहीं खतम होगी तब तक मैं घर पर ही रहूँगा फूफी और शाजिया के साथ। मैं वापस घर चला गया। शाजिया का आज पहला दिन था स्कूल में तो वो वहां गई हुई थी।

मैं घर पहुँचकर फूफी को सब बता दिया। मैंने देखा की फूफी ने अभी भी गाँव की साड़ी पहनी हुईथी।

मैं- "आपने मेरी दी हुई साड़ी क्यों नहीं पहनी है?"

फूफी- “बेटा तुम्हें वो साड़ी पसंद है इसलिए तुम्हारे सामने वो साड़ी पहन लेती थी। पर जब तुम्हीं नहीं हो घर पर तो किसके लिए पहनूं?"

मैं- “अब तो पहन लीजिए। मैं आ गया हूँ.

फूफी ने शर्माकर कहा- “ठीक है पहन लेती हूँ." और वो साड़ी पहनने जाने लगी।

मैंने कहा- “फूफी कहां जा रही हैं यही पहन लीजिए ना. *

फूफी- "बेटा तुम्हारे सामने कैसे पहनूं?*

मैं- “गाँव में भी तो आप मेरे सामने कभी-कभी पेटीकोट में रहती थी तो अब क्या हो गया? और अब मुझसे कैसा शर्माना? मैं आपका ही तो हँ..

फूफी- "ठीक है बेटा यही बदल लेती हूँ..." और वो अपनी साड़ी खोलने लगी।

उन्हें देखकर मेरा लण्ड खड़ा हो गया। उनकी नंगी कमर और पीठ मेरे बगल में थी तो मन तो कर रहा था की उन्हें पीछे से पकड़ लूँ। पर मैंने कंट्रोल किया। फूफी अब मेरी दी हुई साड़ी पहनने लगी। वो उस साड़ी में क्यामत लग रही थी। अब यही अच्छा टाइम है इन्हें सिड्यूस करने का।

मैंने कहा- "फूफी शाजिया घर पर नहीं है और वो दोपहर में 3:30 बजे तक आएगी, तो क्यों ना हम कोई पिक्चर देख आएं। मेरा बहुत मन कर रहा है...'

..

फूफी- "लेकिन बेटा अभी तो 11:00 बजे रहे हैं....

मैं- "तो क्या हुआ फूफी?"

फूफी "ठीक है। तुम्हारा मन है तो चलते हैं..."

हम लोग तैयार होकर पिक्चर हाल के लिए निकले। मैं उन्हें एक बी ग्रेड मूवी दिखाने ले जा रहा था। हम हाल में पहुँच के मूवी देखने लगे। मैंने फूफी का हाथ पकड़ रखा था मूवी देखने वक़्त, और उसे सहला रहा था। मुझे महसूस हुआ की हाट सीन आते ही बीच-बीच में फूफी की सांसें तेज हो जाती थी।

मौके का फायदा उठाते हुए मैंने फूफी के कंधे पे हाथ रख दिया। फूफी को भी मेरा कंधे पे हाथ रखना अच्छा लगा और वो थोड़ा सा मेरी तरफ खिसकी। क्योंकी शायद उन्हें ऐसी पिक्चर देखना आक्वर्ड लग रहा था। पर वो एंजाय भी कर रही थी। मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा हुआ था और कभी-कभी उनके कंधे को सहला रहा था। मुझे लगा उन्हें धीरे-धीरे सिड्यूस करना ही ठीक होगा, नहीं तो बात बिगड़ भी सकती है। पिक्चर तो दो घंटे में खत्म हो गई। मैं और फूफी पिक्चर हाल से निकले।

मैंने फूफी से पूछा- कैसी लगी पिक्चर ?"

फूफी के चेहरे पर एक छोटी सी शर्म वाली स्माइल थी। लेकिन मुझे उनके मुँह से सुनना था। इसलिए मैंने फिर से पूछा ।

फूफी ने शर्माकर कहा- "अच्छी लगी. "

मैं समझ गया की मेरा काम तो हो गया। अब हम लोग बाइक से ही घर के लिए निकले। रास्ते में मैं बार-बार ब्रेक लगाने लगा, ताकी फूफी मुझसे टकराएं। हम लोग घर पहुँच गये। शाजिया के आने में अभी टाइम था। फूफी बिस्तर पर लेटकर आराम कर रही थी। उन्होंने साड़ी खोल दी और पेटीकोट में थी।

मैं बगल में बैठा था। उन्हें लेटा हुआ देखकर मेरा मन नाटी होने लगा। मैं भी उनके बगल में लेट गया और अपना हाथ उनके पेट पर रख दिया, और कहा- “फूफी आपको यहां अच्छा तो लग रहा है ना मेरे साथ?"

फूफी ने कहा- "बेटा जितना प्यार तुमने किया है, उतना प्यार दादाजी भी नहीं करते थे। कभी-कभी तो हम लोग दादाजी को बोझ लगते थे, पर वो ऐसा कभी कहते नहीं थे। लेकिन मैं समझ जाती थी..."

मैंने कहा- "लेकिन आप लोग मेरे लिए कभी भी बोझ नहीं बन सकते। क्योंकी आप दोनों से मुझे बहुत प्यार है और आपको और शाजिया को कभी भी अपने से दूर नहीं करूँगा."

फिर मैंने फूफी के माथे पे किस किया और फूफी ने मुझे मेरे गाल पे किस किया। मैंने मन में सोचा की फूफी मुझसे कितना प्यार करती हैं। मैं और फूफी चिपक के आराम ही कर रहे थे की शाजिया आ गई स्कूल से मैंने दरवाजा खोला तो देखकर हैरान हो गया। क्योंकी शाजिया रो रही थी।
 
मैंने पूछा- "क्या हुआ शाजिया ?"

शाजिया ने कोई जवाब नहीं दिया तो मुझे लगा कोई सीरियस बात हो गई है तो मैंने उसे घर के अंदर किया

और दरवाजा बंद कर दिया। फूफी शाजिया से पूछने लगी तो वो रोती रोती फूफी के गले लग गई। मैं और फूफी ये सब देखकर डर गये की अचानक शाजिया को क्या हो गया है?

फूफी- "शाजिया क्या हुआ है बेटा बताओ ना?"

शाजिया रोते-रोते कहने लगी- "स्कूल में कुछ लड़के मिलकर मुझे आज पूरे दिन परेशान कर रहे थे...

मैंने पूछा- "क्या किया उन लोगों ने तुम्हारे साथ?"

शाजिया- "उन तीनों ने पहले मेरा बैग छुपा दिया और जब मैं उनसे माँगने गई तो मुझसे झगड़ा करने लगे और मुझे धक्का मार के गिरा दिया। मैं टीचर के पास गई तो उल्टा उन लोगों ने मुझे ही टीचर से डाँट खिलवा दी। मैंने अपना बैग खुद ही ढूँढ़ "

फूफी ने पूछा- "और तो कुछ नहीं किया उन लोगों ने?"

शाजिया- "मैंने जब अपना बैग खोला तो उसमें मेरा टिफिन नहीं था "

फूफी बोली- “तो इसका मतलब तुमने कुछ नहीं खाया है आज दिन भर..."

मुझे ये सब सुनकर बहुत गुसा आ रहा था। मैंने कहा- "शाजिया तुम चिंता ना करो उन सबकी मैं कल प्रिन्सिपल से शिकायत करूँगा "

शाजिया बोली - "नहीं भैया, उन सबकी शिकायत तो पहले भी कई पेरेंट्स कर चुके हैं। पर वो लोग नहीं सुधरते...."

मैं- “कोई बात नहीं। अब उन सबको तो मैं सुधारूंगा। तुम अपने आँसू पुंछो और स्माइल करो...” और मैं उसके पेट में गुदगुदी करने लगा।

उसने थोड़ा सा स्माइल किया और मुझे गले लगा लिया।

मैंने कहा- "तुम चिंता मत करो। कल मैं उन सबको अच्छा सबक सिखाऊँगा" तब जाकर शाजिया शांत हुई

अगले दिन सुबह शाजिया तैयार हो चुकी थी और मैं भी। मेरे दिमाग में एक प्लान था जो मैंने शाजिया को पहले से बता दिया था। हम लोग स्कूल के लिए निकल पड़े। आधे रास्ते में ही हम दोनों रुके और एक घर के पास आकर छुप गये। वो रास्ता स्कूल की ही तरफ जाता था। मैं और शाजिया उन लड़कों का इंतजार कर रहे थे। उन लड़कों के आते ही शाजिया उनके पीछे चलने लगी और मैंनें शाजिया के पीछे। रास्ते में एक छोटी सी गली पड़ती थी। उनके वहां पहुँचते ही शाजिया ने अपने चेहरे पे एक कपड़ा बाँध लिया और पेपर स्प्रे निकाला, जो की मैं लाया था शाजिया के स्कूल से आने के बाद, अपने प्लान के लिए। ये स्प्रे छिड़कने से आँखों में जलन होती है।

शाजिया ने उन तीनों लड़कों को पीछे से आवाज दी। जैसे ही वो लोग पलटे शाजिया ने उनकी आँखों में पेपर स्प्रे छिड़क दिया। वो तीनों इस हमले से हक्के-बक्के हो गये और पेपर स्प्रे की जलन से तड़पने लगे। अब शाजिया ने अपने बैग से कुछ बुक्स नीचे गिरा दी और जोर-जोर से चिल्लाने लगी- "बचाओ... बचाओ.. बचाओ... ये लड़के मुझे छेड़ रहे हैं..."

गली छोटी थी इसलिए शाजिया की आवाज वहां के लोगों ने सुन ली और भागते हुए देखने आए की क्या हुआ है? उन लोगों को आता हुआ देखकर मैं भी शाजिया की तरफ भागा। अब वहां थोड़ी सी भीड़ हो गई थी।

एक आंटी ने पूछा- “क्या हुआ बेटा?"

शाजिया कहने लगी- "आंटी ये लोग मुझे छेड़ रहे थे, इसलिए मैंने इनकी आँखों में पेपर स्प्रे डाल दिया..."

मैंने वहां खड़े लोगों से कहा- "ये लड़की सच बोल रही है। मैंने भी देखा की ये लड़के इसे छेड़ रहे थे. " और ये कहकर मैंने उन तीनों को घसीट के तमाचा मारा ।

फिर क्या था, बाकी लोगों ने भी मारना शुरू कर दिया उन हरामियों को जब सब लोग उन लड़कों को मार रहे थे तब मैं और शाजिया धीरे से पीछे छूट गये और नीचे गिरी हुई बुक्स और बैग को उठाया और वहां से चुपचाप चले गये। मैं बहुत खुश था की शाजिया का बदला पूरा हो गया और उसकी बदनामी भी नहीं हुई। क्योंकी किसी ने उसे देखा भी नहीं था। उसके मुँह पे कपड़ा बँधा हुआ था। इसलिए अब मैं उसे स्कूल ले गया। स्कूल में जाते वक़्त उसने मुझे गले लगाकर थैंक्यू कहा ।

लेकिन मैंने कहा- "सिर्फ थैंक्यू से कुछ नहीं होगा, मुझे एक किस चाहिए गालों पे..."

शाजिया हँसने लगी- “ठीक है। घर आकर एक नहीं 10 किस दे दूंगी." और हँसते हुए स्कूल के अंदर चली गई।

मैं बाइक से घर जाने लगा। घर पर फूफी मेरा इंतजार कर रही थी। मैंने रास्ते में एक सी.डी. शाप से दो बी ग्रेड फिल्मों की डीवीडी खरीद ली। घर पहुँच के फूफी को सारी कहानी बता दी उन लड़कों के बारे में। वो बहुत खुश हुई। थोड़ी देर बाद हम सब नार्मल हो गये। फूफी और मैं टीवी देख रहे थे।

मैंने कहा- "फूफी टीवी पर पिक्चर देखोगी ?"

फूफी ने कहा- "कौन सी पिक्चर ?"

मैं- "वैसी ही जैसी कल देखी थी..."

फूफी शर्माने लगी। मैंने डीवीडी लगा दी। मैं और फूफी बिस्तर पर बैठकर देखने लगे। फूफी ने मेरी दी हुई बैकलेश साड़ी पहन रखी थी। वो मेरे आगे बैठी हुई थी और मैं उनके पीछे में जानबूझ के लेट गया। ताकी फूफी मेरे सामने पड़ जाएं और मुझे टीवी में कुछ ना दिखे।

मैंने कहा- “फूफी लेटकर देखो, मुझे कुछ दिख नहीं रहा है...”

तब फूफी मेरे सामने की तरफ लेट गई और टीवी देखने लगी। मैंने सोचा अच्छा मौका हैं आज इनको अपने इरादा बता दिया जाए। मैंने अपना एक हाथ उनकी कमर पे कर दिया और पिक्चर देखने लगा। मैं धीरे-धीरे उनकी तरफ सरकने लगा। थोड़ी देर बाद देखा की उन्होंने अपनी आँखें बंद कर रखी है और हाटथ सीन एंजाय कर रही हैं। मैं उठकर उन्हें देखने लगा। ये अच्छा टाइम था उन्हें सिड्यूस करने का। मैंने अपना हाथ उनके पेट पे रख दिया। उन्होंने अपनी आँखें खोल दी।

तब मैंने कहा- “फूफी लग रहा है की आपको खूब मजा आ रहा है..." और अपने हाथ से उनके पेट पर गुदगुदी करने लगा।

उनके चेहरा पे एक नाटी सी हँसी थी।

मैंने पूछा- “फूफी आपको मुझसे कितना प्यार है?"

फूफी कहने लगी- "तुम्हीं मेरे सब कुछ हो, तुम्हारे सिवाए मेरा है ही कौन? शाजिया भी एक दिन शादी करके चली जाएगी..."

मैंने ये सुनकर उनके गालों पे होंठों के पास दो किस किया तो वो शर्माकर पलट गई और हँसने लगी ।

मैंने कहा- "मुझे भी किस चाहिए...'

फूफी मुझे गालों पे किस करने लगी। मेरा हाथ उनके पेट पे था और एक पैर उनके पैर पे था। मौके का फायदा उठाते हुए मैंने उनके गालों पे भी दो किस कर दिया। वो शर्माकर उठ गई। मुझे लगा अभी के लिए काफी सिड्यूसिंग हो गई है। वो बहुत खुश भी नजर आ रही थी। पिक्चर खत्म हो गई और फूफी किचेन में खाना बनाने चली गई। मैं अभी भी डीवीडी से दूसरी मूवी देख रहा था।

थोड़ी देर बाद मैं उठा और बाथरूम में जाकर फूफी का नाम लेकर मूठ मारने लगा। बाथरूम से निकल के मैंने सोचा थोड़ी शेविंग कर ली जाए तो मैं शेविंग करने लगा। मैंने बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ छोड़ रखा था। फूफी खाना बना चुकी थी तो वो कपड़ेधो के लिए बाथरूम में आई। उनकी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा हुआ था। उनको इस तरह से देखकर मेरा मन उनको चोदने को करने लगा पर वो कपड़े धो रही थी।
 
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