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Incest बदनसीब रण्डी

दोपहर के खाने तक नारायण जी और मोहनजी ने सारे इंतजाम कर लिए थे। चिराग आज घर जल्दी आ कर मुंबई जाने की तैयारी में हाथ बटाने वाला था। कल सुबह की ट्रेन से तीनों मुंबई जाने वाले थे क्योंकि वहां सिर्फ चिराग के कागज दिखाकर काम चल जाने वाला था।

प्रिया पैसे की इस ताकत को देख कर बुरी तरह डर चुकी थी। फुलवा ने नारायण जी के जाने के बाद प्रिया को सच्चाई से अवगत कराया।

फुलवा (प्रिया के हाथ अपने हाथों में लेकर), “प्रिया तुमने मुझसे यह नहीं छुपाया की तुम एक वैश्या की बेटी हो। सच्चाई बताते हुए तुम्हें डर लगा होगा की तुम्हें बुरा बर्ताव मिलेगा पर तुमने सच कहा! अब सच कहने की बारी मेरी है। मैं भी वैश्या की बेटी हूं। राज नर्तकी मेरी सखी थी क्योंकि उसी के सामने मेरे बापू ने मेरी गांड़ मार कर मुझे वैश्या बनाया था। कल तुम्हारा 18 वा जन्मदिन था और आज मेरा 38 वा जन्मदिन है। मैने जवानी के 20 सालों में से 19 साल किसी न किसी तरह से कैद में गुजारे हैं। मैं कभी रण्डी थी तो कभी डकैत। आखरी कैद में मैं एक 50 रुपए की रण्डी थी और हर रात 20 से ज्यादा लौड़े लेती थी। इसी वजह से मुझे सेक्स की बीमारी लग गई है। मेरे बेटे चिराग ने मुझे बचाया और अब मैं अपने ही बेटे ने चुधवाते हुए अपनी बीमारी पर काबू पाने की कोशिश कर रही हूं। अब बताओ, क्या तुम ऐसे बदचलन लोगों के बीच रहना चाहती हो? सोचो! अगर मना किया तो मैं आसानी से तुम्हें नारायण जी की मदद से तुम्हारी मर्जी के शहर में तुम्हारा अच्छा इंतज़ाम कर सकती हूं!”

प्रिया मुस्कुराकर, “औरत मर्द के बीच क्या होता है यह तो शायद मैं बोलना सीखने से पहले सीख गई। लेकिन आप की सच्चाई जानकर मुझे लगता है कि मुझे आप से बेहतर कोई समझ नहीं पाएगा। अगर आप बुरा न मानो तो मैं आप के साथ ही रहना चाहूंगी।”

फुलवा ने प्रिया को गले लगाया और उसके साथ अपने मानसउपचारतज्ञ के पास गई। डॉक्टर ने उनके मुंबई के दोस्त का पता दिया और दोनों को शुभकामनाएं दी।

चिराग घर लौटा तो उसके मन में कई सवाल थे। चिराग ने अपनी मां को देखा और उसके लाल होते चेहरे, तेज चलती सांसे, माथे पर पसीना और चमकती आंखों से पहचान गया की उसे जवाबों के लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा।

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चिराग फुलवा को पकड़कर उनके कमरे में ले गया और दरवाजा हैरानी से देखती प्रिया के मुंह पर बंद कर दिया।

चिराग, “मां, तुम भूखी हो।”

फुलवा चिराग से लिपट गई और दोनों के वजन से दरवाजा बज गया।

फुलवा चिराग के कान में, “बेहद भूखी!!”

चिराग असहज होकर, “बाहर! वह लड़की!!”

फुलवा चिराग को चूमते हुए, “प्रिया!! उसे सब बता दिया है!!”

चिराग चौंक कर, “सब!!”

फुलवा, “इतना वक्त नहीं था!!… बस मेरा अतीत, मेरी बीमारी, मेरा इलाज और हमारा रिश्ता!”

चिराग, “और वह कुछ नहीं बोली?”

फुलवा ने नीचे झुककर चिराग के पैंट की चैन खोली और अंदर से उसका फूला हुआ लौड़ा बाहर निकाला। चिराग के लौड़े पर थूंक कर उसे हिलाते हुए फुलवा ने चिराग को देखा।

फुलवा, “लाचार है! उसके पास दूसरा सहारा नहीं! उसकी जान को खतरा है और मैने उसकी जान बचाई है! वह मेरे कहने पर तुझे भी चुधवा ले!!”

चिराग डांटते हुए, “मां! ऐसे मजाक में भी नहीं कहना!!”

फुलवा ने अपने बेटे की वाजिब डांट खाते हुए उसका लौड़ा चूसने लगी। चिराग ने भी सुबह से अपना माल दबाए रखा था और वह उसे अपनी मां की कोख में ही भरना चाहता था।

चिराग ने अपनी मां को उठाया और घुमाकर दरवाजे पर दबाया। चिराग की उंगलियों ने मां की साड़ी और पेटीकोट को कमर तक ऊपर उठाया और उसे मोड़ कर मां की कमर से दरवाजे पर दबा दिया। फुलवा की भूखी चूत में जमा यौन रस से भीग कर उसकी पैंटी कब की भीग चुकी थी। अब यौन रसों की पतली धारा फुलवा की जांघों पर से होते हुए नीचे बह रही थी।

चिराग ने जल्दी से फुलवा की पैंटी की बीच में बनी गीली पट्टी को खीच कर एक ओर सरका दिया। फुलवा की टपकती गरम चूत को बाहर की ठंडी हवा लगी तो उसकी यौन पंखुड़ियां फूल की तरह खिल उठी और फैल गई। चिराग ने अपने मोटे सुपाड़े को फुलवा की टपकती पंखुड़ियों पर घुमाया और फुलवा उत्तेजना वश सिसक उठी।

चिराग ने अपने लौड़े को अपनी मां की गरम बहती जवानी में धीरे धीरे भरना शुरू किया तो फुलवा ने भूख से तड़प कर उसके इस तरीके का विरोध किया।

फुलवा अपनी कमर हिलाकर दरवाजे को बजाते हुए चीख पड़ी, “नहीं!…

बेटा ऐसे नही तड़पते!!…

आह!!…

आह!!…

आ!!…

मैने तुझे भूखा रखा!!…

गुस्सा नहीं होना!!…

मेरी बात मान!!…

आह!!…”

फुलवा ने अपने हाथों से चिराग के कंधे पकड़ लिए और अपने पैरों को उठाकर चिराग के चाप लगाते कूल्हों के पीछे अपनी एडियां अटका ली। चिराग का हर चाप फुलवा की चीख निकालता और दरवाजे को बजाता। जवान फौलादी लौड़ा उबलती भूखी जवानी में समा चुका था तो अब होश तो आग में पानी चिड़कने के बाद ही आना था।

सुबह से भूखे प्रेमियों की भूख शांत होने में पूरा आधा घंटा गया जिस दौरान चिराग लगातार दो बार झड़ गया तो फुलवा की चीखों की किसीने गिनती नहीं की।

गिनती तो हुई थी पर इसकी खबर फुलवा को देर से चली। फुलवा अपने कपड़े बदलकर बाहर आई तो प्रिया चिराग को शाम का नाश्ता परोस रही थी। फुलवा को देख कर प्रिया की आंखों में इतनी हमदर्दी भर आई की फुलवा पहले समझ ही नहीं पाई।

फुलवा को नाश्ते के बाद अकेले में पकड़ प्रिया, “मर्द जात बड़ी बेरहम होती है। आप को बोलने तक का वक्त नहीं दिया!!”

फुलवा को समझने में कुछ पल लगे और फिर वह जोर से हंसने लगी। फुलवा के पेट में दर्द तो आंखों में आंसू आ गए। प्रिया नासमझ होने से देखती रह गई। फुलवा ने आखिर कार अपने आप को संभाला और प्रिया को गले लगाकर उसके गाल और माथे को चूमा।

असहज प्रिया को देख फुलवा, “मेरी मासूम बच्ची तुझे किसी की नज़र ना लगे!!”

प्रिया, “मतलब? आप दर्द से चिल्ला रही थी और वो अपनी मां को दरवाजे पर पटकते हुए तड़पा रहा था। आप की बातें मैंने सुनी! आप उसे कह रही थीं कि वह आप को ना तड़पाए पर वह लगा रहा। मां भी ग्राहकों के आने पर ऐसे ही चिल्लाती रहती!”

फुलवा समझाते हुए, “मेरी भोली बच्ची तेरी मां बहुत अच्छी थी जो उसने अपनी हालातों में भी तुझे इतनी मासूमियत में रहने दिया। अगर औरत अपनी मर्जी ना हो कर भी मर्द का साथ देने को मजबूर हो जाए तो यह दर्द वाकई बहुत बुरा होता है। पर जब औरत को अपने मर्द से प्यार हो और वह उसे अपनाना चाहती हो तो यह दर्द मज़ेदार होता है! तुम जवान हो रही हो, जल्द ही प्यार भी करने लगोगी! तब बताना!”

प्रिया मुंह बनाकर, “आप मुझे बहलाने की कोशिश कर रही हो! मैने मर्द का अंग देखा है! ऐसा गंदा मोटा कीड़े जैसा हिस्सा कोई औरत अपने अंदर अपनी मर्जी से कभी नहीं लेगी! और दर्द तो दर्द होता है। अपने दे या पराए, अच्छा क्यों लगेगा? मुझे कुछ नहीं पता! मैं बस इतना जानती हूं कि अगर कोई मर्द मुझे छूने की भी कोशिश करे तो मैं उसे मार दूंगी या मर जाऊंगी!”

फुलवा ने अपनी मासूम बच्ची के सर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर बात टाल दी।

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प्रिया को बगल के खाली कमरे में सोने को कह कर चिराग अपनी मां के कमरे में आ गया।

चिराग, “विश्वास नहीं होता कि एक साल के अंदर हमने कितना सामान इकट्ठा कर लिया है! मोहनजी ने अपने किसी दोस्त का कमरा किराए पर दिलाया है और इसी वजह से हमें आसानी होगी। सुना है मुंबई में अच्छा घर मिलना बेहद मुश्किल है!”

फुलवा, “दोस्त से? भाड़ा कितना है सुना? इतने में नया घर खरीद लो!! मुझे तो वह दोस्त अच्छा नहीं लगता! एखाद महीने में हम दूसरा घर ले लेंगे!”

चिराग अपनी मां को पीछे से पकड़ कर उसके गाल को चूमते हुए, “मां, कीमत जगह की नही जमीन की होती है। घर कहां बनाया है वह भी मायने रखता है!”

चिराग ने अपनी मां को बाहों में लेते हुए उसके भरे हुए मम्मे दबाने लगा।

फुलवा, “रुको!! मैं प्रिया को बगल के कमरे में सोने के लिए कहती हूं! फिर हम सोते हैं।”

चिराग फुलवा का गाउन उतारते हुए, “मैंने उसे बता दिया है मां! आप बस अपने इलाज पर ध्यान दो!”

फुलवा ने अपने गाउन को उड़ाया और चिराग को चूमते हुए, “कर दी ना मर्दों वाली हरकत! (चिराग की पैंट उतरते हुए) बेचारी को लगता है कि मर्द औरतों पर जबरदस्ती करते हैं और तुमने जा कर उसे कुछ ऐसे कहा होगा की वह उसे भी मनमानी समझेगी।“

चिराग फुलवा को नंगा करके बेड पर लिटाते हुए, “औरतों को समझना ना मुमकिन है। अगर अच्छे से पेश आओ तो तुम्हारी बात नही मानेंगे और कुछ बोलो तो मनमानी कहेगी!”

फुलवा ने अपनी उंगलियों से अपनी चूत के होठों को खोल कर फैलाया, “अब तो समझ रहे हो ना की मैं क्या चाहती हूं?”

चिराग चिढ़ाते हुए, “आप को गर्मी हो रही है और अंदर ठंडी हवा चाहती हैं?”

चिराग ने अपनी मां के पैरों में बैठ कर उसके तलवे चाटे और चूमे। गुदगुदी से फुलवा हंस पड़ी। चिराग ने अपनी मां के बाएं टखने को चूमकर अपने दांतों से रगड़ा और फुलवा की उत्तेजना में आह निकल गई।

चिराग को अब कोई जल्दी नहीं थी और वह धीरे धीरे अपनी मां की टांगों को चूमता चाटता उसके बदन में आग भड़काता ऊपर उठने लगा। चिराग ने अपनी मां की जांघों को अंदर से चूमा तब तक फुलवा की चूत में से रसों का सैलाब बह रहा था।

चिराग, “मां!! आप तो गद्दे को गीला कर दोगी! आओ मैं साफ कर दूं!”

चिराग ने अपने होठों को चूत के नीचे लगाकर फुलवा की गांड़ को चूमते फुलवा ने अपनी कमर उठकर उसका स्वागत किया। चिराग ने अपनी जीभ को बढ़ाकर पहले फुलवा की गांड़ को छेड़ते हुए उसके रस और अपनी लार से उसकी गांड़ को उत्तेजना वश झड़ने को मजबूर किया और फिर चूत में से बह आए रसों को पीकर ही ऊपर उठा।

फुलवा (अधीर होकर), “ बेटा!!…

अब और मत तड़पाओ!!…

आ जाओ!!…”

लेकिन चिराग नहीं माना। चिराग ने अपनी मां के निचले होठों को चूमते हुए उसकी जवानी की गरम भट्टी को अपनी जीभ से भड़काया। फुलवा ने सिरहाने की चादर को मुट्ठियों में पकड़ कर अपने सर को हिलाते हुए अपने आप पर काबू करने की नाकाम कोशिश की। फुलवा के माथे पर पसीना जमा हो गया और वह चीखते हुए कांपने लगी। फुलवा की चूत में से यौन रसों की धाराएं बहती रही को चिराग बिना सोचे उन्हें गटागट पी गया।

झड़कर लगभग बेसुध पड़ी फुलवा के ऊपर चिराग चढ़ गया और उसके रसों से भीगे मुंह से वह उसे चूमने लगा। चिराग के होठों पर से अपना स्वाद चखते हुए फुलवा ने राहत की आह भरी जब चिराग का लौड़ा उसकी भूखी जवानी में समा गया।

चिराग को अब कोई जल्दी नहीं थी और वह अपने लौड़े को सुपाड़े की नोक तक बाहर निकाल कर फिर लौड़े की जड़ को अपनी मां की चूत पर दबाकर रगड़ता। फुलवा लगातार झड़ते हुए मजे से चुधवाती रही जब तक आधे घंटे बाद चिराग ने कराहते हुए अपने गाढ़े वीर्य से फुलवा की कोख को रंग नही दिया। चिराग फुलवा के ऊपर पड़ा रहा और फुलवा ने अपने बेटे के पसीने से भीगी पीठ पर हाथ फेरा।

फुलवा ने अपनी आंख खोली तो उसे दरवाजे के खुले किनारे में एक डरी हुई आंख दिखी। दरवाजा झट से बंद हो गया और फुलवा की हंसी निकल गई। चिराग ने बगल में लेटते हुए उससे हंसने की वजह पूछी पर फुलवा ने बताने से मना कर दिया।

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प्रिया की आंख खुली तो उसे लगा की वह अपने घर में है। कुछ पल बाद उसे पिछले दो दिनों की बातें याद आई और समझ गई की आहें उसकी मां नही पर उसकी जान बचाने वाली फुलवा भर रही थी।

कल जब फुलवा ने उसे मजेदार दर्द के बारे में बताया तो वह विश्वास नहीं कर पाई थी। रात को चिराग ने उसे इस कमरे में सोने को कहा तो वह चुपके से उसके पीछे पीछे जाकर दरवाजे को बिना आवाज किए खोल कर अंदर देखने लगी।

रण्डी की बेटी होने की वजह से उसे बचपन से खतरा था। उसकी मां ने उसे बचपन में ही सिखाया था कि कैसे बिना आवाज किए कमरे में आना और कैसे पता चले बगैर कमरे में से भाग जाना। प्रिया अपनी हिफाजत करने के लिए जासूसी करना सीखी और खतरों को पहचानने के लिए हर चीज याद करना भी सीख गई।

प्रिया नही जानती थी की वह क्या देखना चाहती थी पर उसने जो देखा वह उसकी उम्मीद से परे था। औरत और मर्द (यहां मां बेटे) एक दूसरे पर टूट पड़ने के बजाय एक दूसरे को मज़ा देने की होड़ में लगे नजर आए। फुलवा लगभग आधे घंटे तक बुरी तरह चीखने, अकड़ने और रोने के बाद अपने बेटे से खुश नज़र आई। फुलवा की चीखों में उसने कई बार मना किया था पर अब प्रिया को सोचना पड़ रहा था कि वह किस बात को माना कर रही थी?

क्या सच में मर्द से प्यार होता है?

क्या मर्द प्यार कर सकता है?

क्या प्रिया को प्यार हो सकता है?

क्या प्रिया से कोई मर्द प्यार कर सकता है?

क्या प्रिया भी दर्द को मजेदार…

प्रिया को एहसास हुआ की उसकी पैंटी गीली हो रही थी और उसे बुखार जैसे गर्मी लग रही थी। प्रिया इस बात से बेहद डर गई। अपने हाथों से अपने कान दबाकर फुलवा की आहें को भूलने की कोशिश करते हुए प्रिया बाथरूम में भाग गई।

प्रिया ने ठंडे पानी का शावर चालू किया और गाना गुनगुनाते हुए फुलवा की आहों को दबाने लगी। फुलवा की आहें प्रिया के दिल दिमाग पर हावी होकर उसके कानों में गूंज रही थी। ठंडा पानी उसके गरम बदन पर गिरते ही मानो भाप बनकर उड़ रहा था।

प्रिया समझ रही थी की उसे क्या हो रहा है। प्रिया जवानी की आग को महसूस कर रही थी। ऐसी आग जो एक दिन उसे ऐसे जलाएगी की वह उस मोटे कीड़े को अपने अंदर लेने को मजबूर हो जाएगी। प्रिया रण्डी की बेटी थी और उसके अब्बू ने उसे झीन के लिए ही तैयार किया था पर उसे वह कीड़ा देख कर हमेशा घिन आती थी। प्रिया शावर में बैठ कर रोने लगी क्योंकि आज चाहकर भी उसे चिराग का कीड़ा देख कर घिन नही आ रही थी।

प्रिया को डर सता रहा था कि वह अपनी मां की आखरी इच्छा पूरी नहीं कर पाएगी। प्रिया भी कीड़ा लेकर रण्डी बन जाएगी।

काफी देर बाद जब ठंडे पानी से प्रिया के बदन पर झुर्रियां पड़ने लगी तो वह ठिठुरती हुई बेडरूम में आ गई। उसने गाना जारी रखते हुए अपने कपड़े बदले और रसोई की ओर भागी। रसोई में सबके लिए नाश्ता बनाने के बाद जब प्रिया ने गाना बंद किया तो उसे एहसास हुआ कि दूसरे बेडरूम में से आवाजें बंद हो गई थी।

10 मिनट बाद मां बेटे नहाकर बाहर आए तो प्रिया उनसे आंख मिलाने से कतरा रही थी।

सुबह की गाड़ी पकड़ने के लिए ट्रेन के टिकट लेने चिराग समान लेकर आगे निकल गया। फुलवा की जिद्द पर चिराग को बापू की गाड़ी मुंबई पहुंचने का भी इंतजाम करना था। बाकी थोड़ा समान लेकर फुलवा और प्रिया को बाद में मोहनजी की गाड़ी में नारायण जी और सत्या के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचना था।

फुलवा चुपके से, “मैं जानती हूं कि तुमने कल रात हमें देखा।”

प्रिया डर गई और अचानक अपना बदन चुराने लगी।

फुलवा, “यहां तुम्हें कोई पीटने वाला नही। एक बात हमेशा याद रखना पिटने को तयार रहोगी तो पिट जाओगी, पीटने को तयार रहोगी तो कोई पीटने से पहले एक बार सोचेगा जरूर।”

प्रिया, “माफ करना! मुझे लगा कि आप को चोट पहुंचाई जा रही थी!”

फुलवा ने प्रिया को अपनी बाहों में लेकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे समझाया।

फुलवा, “जवानी में कदम रखना एक डरावना एहसास होता है। इसके लिए मां का साथ अच्छा होता है। जवानी के लिए न मेरे पास मां थी और ना ही तुम्हारे पास मां है। अगर तुम चाहो तो मुझे मां समझ सकती हो।”

प्रिया को अपनी खुशकिस्मती पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसे इतनी जल्दी कोई अपनाने को तैयार हो गया है। प्रिया अपनी फुलवा मां की बाहों में समा गई पर कैसे बताती की उसकी आंखों से चिराग का लंबा मोटा कीड़ा जाने को तैयार नहीं था और उसे इस बात की घिन भी नहीं आ रही थी!!

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चिराग ने फुलवा और प्रिया को गाड़ी में से उतारते देखा और आगे बढ़ा।

फुलवा ने सत्या को गले लगाया और मुंबई में आने पर अपनी मुंबई वाली सहेलियों से मिलाने का वादा किया। सत्या ने फुलवा के नए कपड़े देखे थे और पिछली खरीददारी के बाद मोहन का बर्ताव याद कर तुरंत मान गई।

नारायण जी ने फुलवा को एक ओर ले जा कर बताया की पहली पोटली सही घर पहुंच चुकी है। अगले महीने उनका बच्चा अपनी पैसों की कमी से अधूरी रही पढ़ाई पूरी करने दिल्ली जा रहा है। हालांकि खजाना लौटने वाले की पहचान बताने से मना कर दिया गया था पर घर वालों ने फुलवा के लिए आशीर्वाद भेजे थे।

फुलवा का दिल भर आया कि किसीने उसे जाने बगैर उसे आशीर्वाद दिए थे। आज तक लोग उसके बारे में रण्डी डकैत सुनकर बस गालियां देते थे। फुलवा ने प्रिया का हाथ पकड़ कर चिराग के पीछे चलते हुए फर्स्ट क्लास के डिब्बे में कदम रखा। TTE साहब ने तीनों के टिकट देखे और एक छोटे कमरे में उन्हें बिठाकर दरवाजा बंद कर लिया।

प्रिया और फुलवा इस छोटे से कमरे को देखने लगे।

प्रिया, “हमें इस कमरे में रहना होगा? हम बाहर नहीं जा सकते?”

फुलवा, “एक दिन का रास्ता है, कल सुबह पहुंचेंगे। खाना लिया है क्या? और पेट दर्द हुआ तो?”

चिराग को एहसास हुआ कि दोनों औरतों ने अपनी पूरी जिंदगी किसी न किसी रूप से कैद में गुजारी थी। इन्हें ट्रेन का तजुर्बा नहीं था!

चिराग ने उन्हें बताया की ट्रेन में अपना होटल है और भूख लगने पर मर्जी से खाना मिलेगा। साथ ही वह दोनों को डिब्बे के अंत में बने शौचालय में ले गया और वहां की बातें समझाई। प्रिया और फुलवा इस अनोखे सफर के लिए बहुत उत्तेजित हो गई। चिराग ने दोनों को गाड़ी के डिब्बे को देखने दिया और फिर जब दोनों बैठ गईं तो जरूरी बात करने लगा।

चिराग, “हम जितना हो सके प्रिया का नाम या कहें पूरा अस्तित्व छुपाना चाहते हैं। इस लिए मैंने टिकट निकालते हुए Mr and Mrs चिराग और Ms फुलवा लिखा। अब कागजी तौर पर मैं और प्रिया पति पत्नी हैं जो अपनी मां के साथ मुंबई जा रहे हैं। लोग एक लड़की को ढूंढ रहे होंगे न की एक परिवार की बहु को।”

प्रिया चिराग का नाम पति की जगह देख कर लाल हो गई क्योंकि उसकी जवानी उसकी आंखों के सामने चिराग का कीड़ा नचा रही थी। फुलवा प्रिया की बेचैनी पर हंस पड़ी और चिराग भी कुछ शरमा गया।

चिराग सफाई देते हुए, “ये बस इसे छुपने…”

फुलवा का मन अपने 19 वर्ष के बेटे की 18 वर्ष की लड़की के प्रति स्वाभाविक आकर्षण से उसे अतीत के एक चेहरे की ओर ले गया।

फुलवा चिराग की आवाज से वर्तमान में आई।

फुलवा, “क्या?…”

चिराग, “दोपहर के खाने की ऑर्डर देनी है। इन चीजों में से क्या पसंद करोगी?”

फुलवा पिछले एक साल में कई चीजों को आदि हो चुकी थी पर इतने तरह का खाना प्रिया के लिए नया था। फुलवा ने मां की ममता से तीन तरह के व्यंजन मंगाए और सबने मिलकर सब चखने का तय किया।

चिराग ने स्टेशन पर इंतजार करते हुए अखबार, ताश की गड्डी और कुछ खेल खरीदे थे। ट्रेन चल पड़ी तो फुलवा और प्रिया खिड़की की कांच को नाक लगाकर लखनऊ को जाते हुए देख रही थी। चिराग ने फुलवा को चिढ़ाया की वह हवाई जहाज से सफर कर चुकी थी तो फुलवा ने चिराग को बताया की ट्रेन का मजा कुछ और ही है! चिराग को इसी का डर था क्यूंकि अब अगले 24 घंटे तक या तो फुलवा को अपनी भूख पर काबू पाना होगा या फिर उसे प्रिया की आंखों के सामने अपनी मां की भूख मिटानी होगी।

खाना आने तक फुलवा और प्रिया बातें करते हुए बाहर देखती रही। प्रिया के लिए यह पहला सफर था क्योंकि ओझा जब उसे लखनऊ लाया था तब पूरे रास्ते उसकी आंखें और हाथ पैर बंधे हुए थे। प्रिया फुलवा को रास्ते की लगभग हर चीज दिखा रही थी तो फुलवा उसे मुंबई के बारे में बता रही थी।

खाने में एक पंजाबी थाली थी, चिकन थाली थी और चाइनीज भी मंगवाया था। हंसी मजाक में सबने सब कुछ बांट कर खाया जब तक खाने के बाद मिठाई खाने की बात नहीं आई।

मिठाई में 2 रसगुल्ले थे और लोग 3। प्रिया जानती थी कि मां बेटे न केवल उसके लिए खर्चा कर रहे थे पर उसके लिए अपना घर और शहर तक बदल रहे थे। प्रिया ने कहा कि उसका पेट भर चुका है और वह और नहीं खा सकती।

फुलवा गरीबी से इतने दिन दूर नहीं रही थी जो इस अनाथ बच्ची के टूटते दिल की आवाज न सुन पाए। फुलवा ने एक रसगुल्ला उठाया और चिराग को खिलाया। फिर फुलवा ने दूसरा रसगुल्ला उठाया और प्रिया को खिलाया।

प्रिया के विरोध को चुप कराते हुए फुलवा, “चुप!!…

बिलकुल चुप!!…

मां से जुबान लड़ाएगी?”

प्रिया चुपके से फुलवा की बाहों में समा गई और काफी देर तक रोती रही। चिराग अपने जीवन में आई इन दो औरतों को देख कर कुछ बोलने की हालत में नहीं था।

ट्रेन तेजी से रास्ता काट रही थी पर चिराग की नजर फुलवा पर थी। फुलवा प्रिया के साथ खेलते हुए उसके कई हुनर समझ रही थी। जैसे कि प्रिया के खिलाफ ताश खेलना बेकार था। वह हर चल में चला हर पत्ता याद रखती और इसी वजह से उसे हराना नामुमकिन था। चिराग ने प्रिया को अखबार पढ़ने को कहा और फिर उस से सवाल पूछे। प्रिया छोटी से छोटी खबर भी पन्ने के क्रमांक और जगह के साथ बता सकती थी।

फुलवा और चिराग ने प्रिया की याददाश की तारीफ की तो प्रिया बहुत खुश हो गई। कोठे पर पलते हुए अपने बढ़ते हुस्न की गंदी तारीफ सुनने को आदि प्रिया को अपनी नई मां के साथ नई खूबी पता चली थी।

रात होने लगी तो फुलवा का चेहरा लाल और सांसे तेज होने लगी। फुलवा की हालत पर चिराग के साथ साथ प्रिया की भी नजर थी। चिराग ने रात का खाना जल्दी मंगाया तो प्रिया ने खाने के तुरंत बाद थकान बताकर सोने की तयारी की। कमरे में चार लोगों की जगह थी पर सिर्फ 3 लोग होने से चुनाव करना मुमकिन था।

प्रिया ने एक ओर की ऊपरी बेड पर सोना तय किया तो फुलवा ने अपनी हालत को जानकर उसके नीचे का बेड लिया। चिराग के पास चुनाव था तो वह दूसरी ओर निचली बेड पर लेट गया।

प्रिया जल्द ही हल्के खर्राटे लेने लगी। चिराग ने भी अपनी आंखें बंद कर ली। चिराग को अपनी मां की तेज सांसों से उसकी बढ़ती भूख का एहसास हो रहा था पर साथ ही एक जवान लड़की की आंखों के सामने अपनी मां को चोदने में असहज महसूस हो रहा था। चिराग इसी विचार में डूबा हुआ था जब उसे अपने लौड़े को सहलाने का एहसास हुआ। चिराग ने चौंक कर अपनी आंखें खोली।

चिराग चौंक कर, “ मां!!”

फुलवा चिढ़ाते हुए, “किसी और का इंतजार कर रहे थे?”

चिराग फुसफुसाते हुए, “मां!! वो देख लेगी!!”

फुलवा अपने बेटे की पैंट खोल कर उसका खड़ा लौड़ा बाहर निकलते हुए, “उसे पता है।”

चिराग फुसफुसाकर, “फिर भी मां!!…”

प्रिया ने एक हल्का खर्राटा लिया और फुलवा मुस्कुराई।

फुलवा फुसफुसाकर, “बेचारी थक कर सो रही है। या शायद तुम उसके जगने का इंतजार कर रहे हो!”

चिराग ने अपनी मां को डांटने की कोशिश की पर तभी फुलवा ने अपने बेटे के मोटे सुपाड़े को अपने मुंह की गर्मी में ले कर अपनी जीभ की नोक से सहलाया। चिराग की डांट आह बनकर रह गई।

चिराग, “मां…”

फुलवा ने मुस्कुराते हुए अपने सर को हिलाकर चिराग के लौड़े से अपना मुंह चुधवाना जारी रखते हुए अपनी गाउन को कमर के ऊपर उठाया। अपनी गीली टपकती जवानी को अपने बेटे के प्यासे होठों के पास लाते हुए फुलवा चिराग के बेड पर चढ़ कर 69 की स्थिति में आ गई।

अपनी मां की गीली गर्मी को देख कर चिराग के दिमाग से बाकी सारे खयाल उड़ गए और वह आगे बढ़ कर अपनी मां की चूत चाटने लगा। फुलवा भी चिराग से हारने को तयार नहीं थी इस लिए वह चिराग के पूरे लौड़े को निगलते हुए अपनी जीभ से सहलाती और गीला करती।

चिराग पिछले एक साल में औरत की बारीकियां और कमजोरियां सीख चुका था। अपनी मां की सारी कमजोरियों पर एक साथ धावा बोल कर चिराग ने अपनी मां को हराया। चिराग के लौड़े को मुंह में गले तक दबाकर फुलवा चीख पड़ी।

फुलवा की यौन रसों की नदी बाढ़ बनकर चिराग को डुबोने की कोशिश करती रही पर चिराग ने बहादुरी से सारा रस पीते हुए फुलवा को बेसुध होने दिया। फुलवा के गले में चिराग झड़ जाता लेकिन फुलवा ने झड़ते हुए अपने होठों से चिराग के लौड़े की जड़ को दबाए रखा। चिराग मुश्किल से 4 बूंद का पारदर्शी द्रव बहा पाया और अगले दांव के लिए तुरंत तयार हो गया।

फुलवा ने अपने बेटे के ऊपर से उठते हुए एक नजर सोती हुई मासूम जवानी को देखा और अपने गाउन को उतार फैंका।

चिराग फुसफुसाकर डांटते हुए, “मां!!…”

फुलवा ने जवाब में अपनी चूत के गीले मुंह को चिराग के सुपाड़े से खोला और नीचे बैठ गई।

चिराग आह भरते हुए, “मां…”

फुलवा ने मुस्कुराकर ऊपर उठते हुए चिराग के खड़े लौड़े को लगभग अपनी चूत में से निकालते हुए उस पर झट से बैठ गई। मांस से मांस टकराया और ताली बज गई।

चिराग “आ… हा!!…” करते हुए अपनी मां की झूलते मम्मे देखता उसे अपने लौड़े पर अपनी चूत चुधवाते देखने लगा। कमसिन जवानी की मासूमियत का खयाल रखते हुए मां बेटे कम से कम आवाज करते हुए अपने बदन की आग बुझा रहे थे।

फुलवा ने दो बार अपनी चीखों को दबाते हुए अपनी हथेली में दांत गड़ाते हुए आंसू बहाए और जितनी खामोशी से हो सके ट्रेन के धक्कों के साथ अपने बेटे के लौड़े पर झड़ गई। चिराग भी अपने आप को आहें रोकने में नाकाम पाकर हवा भरे तकिए को मुंह पर दबाए अपनी मां की कोख में झड़ गया।

मां बेटे इस अनोखी चलती ट्रेन की चुदाई से थक कर एक दूसरे से लिपट कर सो गए। किसी को खबर नही हुई की हल्के खर्राटे कब खामोशी में बदल गए थे। न ही खामोशी में गरम सांसों का बनना पता चला ना ही ठंडी आहों का दबकर निकालना।

अपनी चीखे दबाते हुए तड़पती जवानी की बेचैन खामोश सिसकियां भी किसी ने नहीं सुनी। थक कर सोते हुए चैन की सांसे लेते हुए किसी के तड़पकर टपकते खामोश आंसू भी किसी को नजर नहीं आए।

प्रिया अपनी मां की चीखों को याद कर रही थी, अपनी अब्बू के हाथों हुई पिटाई याद कर रही थी। कोई भी ऐसा दर्दनाक वाकिया जो उसके बदन में जलती इस आग को बुझाए। कोई भी दर्द जो उसकी जांघों पर बहती गर्मी को रोके।

प्रिया ने बचपन में ही झूठा सोना और चुपके से जागना सीखा था। झूठे खर्राटे लेते हुए प्रिया ने अपनी नई मां को उसके बेटे से चुधवाते हुए देखा। प्रिया फुलवा को अपनी मां मान चुकी थी पर उसका मन चिराग को भाई मानने को तैयार नहीं था।

शायद यही वजह थी कि प्रिया का बदन अब बुरी तरह जल रहा था, उसकी पैंटी और जांघें गीली थी और उसकी आंखों में नींद की जगह एक लंबा मोटा कीड़ा था। प्रिया ने अपनी हथेली से अपने मुंह को दबाया और चुपके से सिसकते हुए बेबस होकर रोने लगी।

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प्रिया की रात बहुत खराब थी। पहले तो उसे बहुत देर तक नींद नहीं आई। सोने की कोशिश करती तो उसकी आंखों के सामने लंबा मोटा कीड़ा खड़ा हो जाता। प्रिया का गला सुख गया था पर उसकी नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

जब फुलवा मां ने अपना गाउन पहना और अपने बिस्तर पर सो गई तब प्रिया ने चुपके से उतर कर पहले शौचालय में अपने चेहरे और बदन को ठंडे पानी से धोया और फिर अपने कमरे में रखा एक बॉटल ठंडा पानी पी गई। कुछ अच्छा लगा तो प्रिया दुबारा सोने की कोशिश करने लगी।

अबकी बार नींद लग गई पर भयानक सपने आने लगे।

प्रिया को ऐसे लगा की कोई उसे उठा रहा है। प्रिया ने पाया की वह एक 7 फीट लंबा 3 फीट मोटा कीड़ा था जो उसे कह रहा था कि अब उसकी बारी है। प्रिया ने उसे रोकने की कोशिश की पर वह प्रिया के अंदर घुसते हुए उसे हिलाने लगा।

प्रिया की आंखे खुली तो वह बस चलती ट्रेन के कारण हिल रही थी।

प्रिया ने वापस सपना देखा की चिराग उसके ऊपर लेटा हुआ है और वह चीखने की कोशिश कर रही है। चिराग ने प्रिया का मुंह दबाया और अपने कीड़े को उसकी गीली जगह पर लगाया।

चिराग, “चिल्लाना मत! मां जाग जायेगी! क्या तुम उसे अपने भाई से चुधवाते हुए दिखाना चाहती हो?”

चिराग का कीड़ा उसके अंदर घुसते हुए उसे काटने लगा। प्रिया चिराग की हथेली में चीख पड़ी।

प्रिया पसीने से लथपथ उठ कर बैठ गई पर फुलवा और चिराग चैन से सो रहे थे।

प्रिया दुबारा थक कर सो गई तो अलग अलग रंग और आकार के कीड़े कुश्ती करते हुए तय कर रहे थे कि प्रिया को कौन पहले खायेगा।

प्रिया ने सिसकते हुए आंखें खोली और उसे एक और सिसकने की आवाज आई। प्रिया ने अपनी आंखों को मूंद कर चुपके से देखने की कोशिश की तो चिराग का बिस्तर खाली था।

फुलवा की आहें बता रही थी कि चिराग मां को उसका मजेदार दर्द देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। फुलवा की आहें तेज़ हो गई तो चिराग भी हांफने लगा। दोनों की आहों और कराहने में प्रिया की दबी हुई सिसकियां खो गई। फुलवा ने चिराग को हल्के से पुकारते हुए उसे गले लगाया तब तक प्रिया पागल हो कर चीखने की कगार पर पहुंच चुकी थी।

फुलवा ने कुछ देर बाद जब प्रिया को उठाया और उतरने के लिए तयार होने को कहा तब प्रिया का हुलिया बदला हुआ था। रात भर सिसकियां दबाने से होंठ फूल गए थे और अधूरी नींद से आंखों में अजीब हिचकिचाहट भरी मासूमियत थी।

फुलवा के अंदर से औरत और मां एक साथ बोल पड़ी। औरत के मुताबिक अगर यह रंडीखाने में पली बढ़ी नहीं होती तो इसके हुस्न के चर्चे चारों ओर होते। मां ने कहा कि उसकी बच्ची हुस्न से बहुत ज्यादा है पर वह अपनी बच्ची को वह सब कुछ देगी जो उसका होना चाहिए।

फुलवा प्रिया के उलझे बालों को संवारते हुए, “बुरे सपने आए?”

प्रिया क्या बताती अपने सपनों के बारे में? उसने सिर्फ सर हिलाकर हां कहा।

फुलवा, “सब ठीक हो जाएगा!”

प्रिया ने उतरकर अपनी फुलवा मां को गले लगाया और मुंह धोने चली गई। वहां प्रिया ने चिराग को देखा और उसका चेहरा टमाटर सा लाल हो गया। चिराग भी उसे टूथपेस्ट और ब्रश देकर कमरे में लौट गया।

सुबह का चाय नाश्ता करते हुए चिराग, “मोहनजी के दोस्त ने हमारे लिए गाड़ी भेजने का वादा किया है। इस तरह हम आसानी से हमारे नए घर पहुंचेंगे।“

मुंबई में स्टेशन पर उतरते ही एक दुबले पतले आम दिखने वाले इंसान ने उनसे बात करना शुरू किया।

आदमी, “चिराग? फुलवा? मेरा नाम छोटेलाल है। मैं आप को आप के नए घर ले जाने आया हूं।“

फुलवा को यह आदमी अलग लगा क्योंकि इसकी आंखे सब देखती और सब पहचानती थी। दोनों मर्दों ने सारा सामान गाड़ी में रखा और गाड़ी चल पड़ी।

फुलवा, “आप कौन हैं? आप ड्राइवर नहीं हो!”

छोटे, “ मुझे बताया गया था कि आप काफी तेज़ हो। सुंदर लड़कियां बेवकूफ नहीं होती यह मैं अच्छे से जानता हूं। आप के जवाब में बता दूं, आप में से किसी को खतरा हो सकता है यह जान कर मुझे भेजा गया है। आप मुझ पर भरोसा कर सकते हो क्योंकि फुलवाजी की मेरी बीवी के साथ दोस्ती है। (आईने में देख कर) साफ़िया आज आप से मिलना चाहती है। कहती है कि एक नई सहेली से मिलाना है।”

फुलवा, “तो यह है आप की कंपनी जिसके बारे में मुझे पता ना होना मेरी खुशनसीबी है!”

छोटेलाल मुस्कुराकर, “ अमीरों के राज़ होते हैं और जब तक वह गैर कानूनी नहीं हम उनकी हिफाजत करते हैं!”

प्रिया, “कोई हमारा पीछा कर रहा है!”

छोटेलाल, “वह वसीम भाई के लोग हैं। अब वह तुम्हें देख रहे हैं। फिर अगर कोई तुम्हें देखने की कोशिश करेगा तो मैं… उन्हें देखूंगा।”

छोटेलाल के आखरी दो शब्द बाकी लोगों को बता गए की छोटेलाल का दोस्त होना हमेशा फायदे का सौदा है। यह आम आदमी बीकुल आम नहीं था।

समुंदर के सामने एक बड़ी बिल्डिंग में एक दो बेडरूम कमरा किराए पर लिया गया था। फुलवा और चिराग इस बिल्डिंग को मानव शाह की वजह से जानते थे। चिराग ने मकानमालिक से मिलने के लिए दरवाजा खटखटाया और मानव शाह ने दरवाजा खोला।

मानव शाह ने तीनों को अंदर लेते हुए एक गहरी सांस ली और गंदी मुस्कान देते हुए उन्होंने देखने लगा।

मानव शाह, “कच्ची जवानी की खुशबू! आऊंऽ!!!… (प्रिया की ओर बढ़ कर) आप का तोहफा पसंद आया!”

प्रिया डर कर फुलवा से चिपक गई और फुलवा ने मानव शाह को डांटा।

फुलवा, “मेरी बच्ची को डराना मत! साफ़िया को बता दूंगी!”

मानव चिढ़ाते हुए, “पिछले साल तक तुम्हारी सिर्फ एक औलाद थी और आज अचानक ये लज्जतदार निवाला तुम्हारी बेटी बन गई?”

फुलवा ने प्रिया से मिलने की कहानी और प्रिया को होने वाले खतरे के बारे में मानव को बताया और उसके चेहरे से मस्ती के सारे भाव चले गए।

मानव, “लोग मुझे नरपिशाच कहते हैं और मैं मना नहीं करता पर मुझे इन बातों पर यकीन नहीं। लेकिन मुझे मेरे दोस्तों पर यकीन है और पैसे की लालच को बखूबी पहचानता हूं। (प्रिया से) सर उठाओ और डरो मत! यहां सारे दोस्त हैं। हमारे होते हुए तुम्हारे चाल चलन बिगड़ सकते है पर चोट नहीं आएगी!”

प्रिया के मन से मानव शाह का डर मिट गया था क्योंकि कहीं पर उसने मानव के अंदर एक चोट खाया मासूम महसूस किया। प्रिया ने आगे बढ़कर मानव शाह को गले लगाया तो फुलवा मुस्कुराई और चिराग को गुस्सा आ गया।

मानव शाह प्रिया को झूठे गुस्से से दूर करते हुए, “टेडी बियर समझी क्या? मैं असली भालू हूं, कुंवारियों को खाता हूं! चलो तुम्हें तुम्हारा घर दिखा दूं!”

दोपहर को चिराग अपने नए दफ्तर गया और वहां के अपने बॉस से मिला जब यहां घर पर महिला मंडल की आपातकालीन बैठक जमा हो गई। फुलवा से मिलने उसकी सहेलियां साफ़िया, हनीफा, रूबीना के साथ मोहिनी और नकचढ़ी काम्या भी आई थी। जब फुलवा ने सब की पहचान प्रिया से कराई तो काम्या ने प्रिया को ताने मारना शुरू किया।

काम्या प्रिया का चक्कर लगाते हुए, “ये क्या है? I mean कोई reality show?… इसे जितने कपड़े पहना दो और मेकअप लगा दो, दो टके की लड़की दो टके की ही रहेगी! किसी मॉल में खड़ी होकर सामान बेचेगी और अपनी छोटी सी तनखा में सड़ कर मरेगी!”

प्रिया ने गुस्से में आकर, “कम से कम मैं जो कमाऊंगी अपने टके पर कमाऊंगी अपने बाप के नाम पर नही!”

महिला मंडल खामोश हो गया और प्रिया को लगा की वह ज्यादा बोल गई। प्रिया अपना सर उठाए रही तो काम्या मुस्कुराई।

काम्या फुलवा से, “आग है इसमें!… देखते है कि और क्या कर सकती है?”

प्रिया को लगा की उसने किसी इम्तिहान में सही जवाब दिया था। फिर सब औरतें दोस्त बनकर बातें करने लगी और जल्द ही प्रिया भी उनमें शामिल हो गई। सबने अगले दिन शॉपिंग और spa का प्लान बनाया और जाने की तयारी की जब दरवाजे में से सफेद रुमाल लिए हाथ अंदर आया।

मानव शाह, “मैं अकेला हूं! निहत्था हूं! रहम करो!”

सारी औरतों ने हंसकर, “निहत्था?…”

मानव अंदर आया तो प्रिया ने मोहिनी और काम्या के चेहरे पर मानव के लिए बिल्कुल एक से भाव देखे और चौंक कर फुलवा की ओर मुड़ गई।

फुलवा चुपके से, “बाकी सब को भी देखो!”

प्रिया जल्द ही समझ गई की उसके अलावा सिर्फ फुलवा और साफिया थी जिनपर मानव शाह की एक विशेष छाप नहीं थी। जब काम्या ने अपनी नई सहेली की सब याद रखने की खूबी बताई तो मानव को भी अचरज हुआ।

मानव शाह, “फोटोग्राफिक मेमोरी एक अनोखा वरदान है। पर हर वरदान की तरह इसे इस्तमाल करना सबसे बड़ी चुनौती है। अपनी पढ़ाई पूरी करो और फिर मुझसे मिलना। बातें करेंगे!”

प्रिया समझ गई की मानव शाह का बातें करना छोटेलाल के देख लेना जैसा ही गहरा और खतरनाक था। मानव शाह ने फुलवा और प्रिया को अगली सुबह अपने वकील से मिलने की सलाह दी और फुलवा मान गई।

अगली सुबह वकील ने प्रिया के कागजात खास कर Birth certificate की जरूरत बताई। प्रिया को छुपाकर यह करने की जरूरत जानकर फुलवा और वकील ने तरकीब सोची। फुलवा की देहबीक्री से भागी लड़कियां को बचाती संस्था 18 साल की होने वाली और हो चुकी सारी लड़कियों के birth certificate पुरानी दिल्ली और लखनऊ की बदनाम गलियों में से जमा करेगी और जो लड़कियां गुमशुदा होंगी उनकी पुलिस में खबर देंगी। इस तरह प्रिया का असली birth certificate मिल जाएगा और साथ ही कुछ लड़कियां बच जाएंगी।

फिर फुलवा और प्रिया मॉल गई और अपनी सहेलियों से मिली। मॉल के spa को एक दिन के लिए बंद कर दिया था क्योंकि आज उनकी खास ग्राहकों की टोली आई थी।

शाम को प्रिया के बाल उसके चेहरे के हिसाब से तराशे गए थे। प्रिया की भोएं आकार में आकर बिलकुल अलग लग रही थी। ब्यूटीशियन ने प्रिया को मेकअप लगाने और निकालने की विधि सिखाई थी जिस से प्रिया का चेहरा बिल्कुल बदल गया था।

Passion Dreams Boutique में से बाहर निकलती लड़की को कोई पुरानी दिल्ली के कोठे से जोड़ने की कोशिश भी नहीं कर सकता था। साफ़िया ने मां बेटी को उनके घर छोड़ा तो वहां चिराग खुले मुंह से प्रिया को देख रहा था।

साफिया हंसकर चिराग का मुंह बंद करते हुए, “बेटा मक्खी खानी है क्या? एक लड़के ने मुझे भी ऐसे ही देखा था!”

प्रिया अपनी खूबसूरती के असर से खुश होकर, “तो आपने क्या किया?”

प्रिया के कान में साफिया, “मैं हमारे बेटे को स्कूल से लेने जा रही हूं!”

प्रिया का खुला मुंह देख कर हंसते हुए साफिया अपने बेटे को स्कूल से लेने चली गई।

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फुलवा की संस्था ने birth certificate जमा कर उनके वहां के लोगों से मिलान कर पता लगाया की 19 लड़कियां गायब थी। रूबीना की किसी दोस्त के हाथों यह खबर न्यूज चैनल तक पहुंचाई गई और पुरानी दिल्ली में भूचाल आ गया।

पुलिस कमिश्नर ने अपना तबादला रोकने के लिए वहां के रिश्वतखोर अधिकारियों को निकाला और खुद छानबीन की। देश भर से 15 लड़कियां मिली तो 3 खुद को आज़ाद करा कर भाग चुकी थी। कमिश्नर को बड़ी नाकामयाबी से बताना पड़ा की एक लड़की की बलि दी जाने की आशंका है और ओझा को ढूंढा जा रहा था। ओझा मिलना मुश्किल था क्योंकि उन कोठों पर कुछ दिन पहले हमला हुआ था और वहां के सारे भड़वे मारे गए थे और लड़की का बाप लापता था।

उसी वक्त मुंबई में प्रिया दसवीं की परीक्षा की तयारी कर चुकी थी और बारहवीं की भी तयारी में लग गई थी। प्रिया ने अपनी कला को दिखाते हुए सूरज की पहली किरण में चमकती बेहद खूबसूरत औरत का चित्र फुलवा को बना कर दिखाया।

राज नर्तकी की यह तस्वीर रूबीना मांग कर ले गई और दो दिन बाद उसके पति ने प्रिया को अपने स्टूडियो में बुलाया। भक्तावर नाम को न जानने वाली शागिर्द से मिलकर भक्तावर खुश हुआ और दोनों ने एक एक चित्र बनाने की प्रतियोगिता लगाई। भक्तावर ने अपनी बेटी की तस्वीर बनाई तो प्रिया ने रूबीना से जिद्द करते उसके बेटे को कागज पर उतारा।

भक्तावर ने महिला मंडल से बात की और प्रिया की चित्रकारिता और पेंटिंग की पढ़ाई शुरू हो गई। मदद के लिए शुक्रिया अदा करते हुए प्रिया ने “राज नर्तकी” को भक्तावर को भेंट कर दिया।

चिराग का जन्मदिन मनाने लखनऊ से नारायण जी, मोहनजी और उनका परिवार आया था। छोटे रक्षित ने धीरे से अपने पिता को बताया की वह बड़ा बनकर जेवरातों का डिजाइनर बनेगा तो सभी ने उसकी महत्वकांक्षा की प्रशंसा की। सत्या महिला मंडल के साथ एक दिन बिताकर लौटी तो मोहन का मुंह खुला रह गया।

जन्मदिन की पार्टी के बाद नारायण जी ने अपने और फुलवा के परिवार को साथ बिठाया। रक्षित का यहां होना सत्या को ठीक नहीं लगा पर जरूरी था।

नारायण, “मैं आप लोगों को डराना नहीं चाहता पर आगाह करना जरूरी है। कोई राज नर्तकी और उस ओझा को ढूंढ रहा है। यह एक इंसान है या गिरोह यह पता नहीं पर इन्हें खून खराबे से परहेज नहीं है। इन्होंने ओझा को ढूंढते हुए पुरानी दिल्ली के कोठे पर हमला किया। वहां के हर भड़वे को कतार में खड़ा किया और उन सब का गला काट कर उन्हे बीच सड़क में छोड़ दिया। प्रिया के अब्बू का कोई पता नहीं है। और अब कोई लौटाए खजाने को लौटाने वाले को ढूंढ रहा है।”

फुलवा, “इसका मतलब आप को खतरा है!”

नारायण, “मैंने अपने बाल धूप में सफेद नहीं किए! मैने अपने एक आदमी, चूतपुर के दीवान का मुनीम, विजय राणा के हाथों खजाना लौटाया। उसे कोई नहीं पहचानता और सब जानते हैं कि चूतपुर के दीवान थोड़े अजीब हैं! उसे कोई कुछ नहीं पूछेगा!”

चिराग, “हमें क्या करना होगा?”

नारायण रक्षित और प्रिया की ओर देखते हुए, “कभी भी किसी को भी राज नर्तकी या खजाने के बारे में कुछ मत बताना! राज नर्तकी के घुंघरू, कमरपट्टा नवाबजादे का खंजर और नवाबजादे के बीवी की जेवर अनोखे है। उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है इस लिए उन्हें विजय राणा के हाथों मैंने संग्रहालय को दान किया। बाकी के जेवरात कीमती है पर बेशकीमती नहीं। उन्हें ठिकाने लगा कर उनका मोल मिल जायेगा। अब उस खजाने और ओझा को प्रिया से जोड़ने वाला राज़ सिर्फ इस कमरे में है और यहीं रहना चाहिए!”

रक्षित भी इस मामले की अहमियत समझता था और सब लोग राज़ को भूल जाने पर सहमत हो गए। जब नारायण जी और उनका परिवार वापस जाने से पहले होटल में रात गुजारने के लिए लौटा तब प्रिया चिराग को जन्मदिन का तोहफा देने उसके कमरे में गई। एक महीना अपने नए परिवार के साथ बिताकर प्रिया बहुत खुश थी।

प्रिया ने चिराग के लिए एक रंगों के घुलते मिलते छटाओं की पेंटिंग बनाई थी जिस में गौर करें तो चिराग की तस्वीर नजर आती थी। प्रिया ने हमेशा की तरह चुपके से चिराग के कमरे का दरवाजा खोला पर अंदर का नजारा देख कर जम गई।

चिराग ने फुलवा को पीछे से पकड़ कर बेड पर धक्का देकर गिराया। फुलवा हंसकर बेड पर पेट के बल गिर गई।

फुलवा हंसते हुए, “बेटा!!…

ये क्या कर रहे हो?…”

चिराग ने अपनी पैंट और कच्छा नीचे उतार कर नीचे से नंगे होते हुए, “अपने जन्मदिन का तोहफा ले रहा हूं!!”

फुलवा पीछे मुड़ कर देखते हुए, “अच्छा?…

बताओ मेरे बेटे को क्या चाहिए?”

चिराग अपनी मां की साड़ी कमर तक ऊपर उठाकर उसकी गीली पैंटी उतारते हुए, “मां की गांड़!!…”

प्रिया चौंक गई और उसके मुंह से आह निकल गई। फुलवा का सर ऊपर उठा पर उसने दरवाजे की ओर नहीं देखा तो प्रिया कोने में चिपककर देखती रही।

फुलवा, “बेटा अगले महीने मेरा जन्मदिन है। मैं 38 की हो जाऊंगी! तुम मुझे पसंद तो करोगे ना?”

चिराग ने अपने लौड़े को अपनी लार से चमकाया और अपनी मां के ऊपर लेट गया। अपनी मां की टांगों को फैलाकर उसकी गांड़ पर अपना सुपाड़ा लगाकर चिराग ने अपनी मां के गाल को चूम।

चिराग, “आपको पसंद ना करने की कोई गुंजाइश ही नहीं। आप तो आ…

आ…

आह…

आह!!!…

आप ही हो!!…”

फुलवा ने अपनी गांड़ मारते अपने बेटे को चूमते हुए अपनी कमर उठाकर हिलाई।

फुलवा, “आह!!…

हां…

मेरे बच्चे!!…

ऐसे!!…

ऐसे ही!!…

चोद दे!!…

मार मेरी…

गा…

आ…

आ…

आंड!!…

हा!!…

हा!!…

आह!!…”

चिराग ने अपनी टाई निकाली और उसे फुलवा के गले में पट्टे की तरह अटकाकर खींचा। प्रिया ने देखा की अब फुलवा अपने गले के पट्टे को पकड़ कर चिराग के लौड़े को अपनी गांड़ में दबाए हुए थी।

फुलवा का दम घूट रहा था और साथ की उसकी गांड़ मारी जा रही थी। प्रिया अपनी मां को उसके बेटे से बचाने बढने लगी जब फुलवा ने अपनी कमर को हिलाकर अपनी गांड़ को तेजी से मरवाना शुरू किया।

प्रिया को पसीने छूट गए थे और अब वह अपना मुंह दबाए दीवार से चिपकी हुई थी। प्रिया की गीली पैंटी के अंदर चींटियों का ढेर महसूस हो रहा था। ये सारी चींटियां उसे अपनी गीली जवानी को खूजाने पर मजबूर कर रही थीं।

प्रिया अपनी मां को चिराग के लौड़े से अपनी गांड़ मरवाते देख कर डरते हुए अपनी स्कर्ट को अपनी उंगलियों से उठाने लगी। प्रिया की उंगलियों ने उसकी पैंटी के सबसे गीले चींटी चढ़े हिस्से को छू लिया और जैसे उसके बदन में बिजली की नंगी तार घुस गई।

प्रिया सिसकर रोते हुए नीचे बैठने पर मजबूर हो गई। प्रिया की सफेद कॉटन पैंटी का बीच वाला हिस्सा मानो अनदेखी आग में जल रहा था। एक ऐसी आग जिसे बुझाने का कोई जरिया नहीं था। एक अजीब भूख से जलती आंखों के सामने चिराग अपने लंबे मोटे कीड़े से फुलवा की गंदी जगह को कूट रहा था। प्रिया नहीं जानती थी कि वह क्या चाहती है पर उसे इस आग से छुटकारा और भूख से निजाद चाहिए था।

प्रिया की चूत में से बाहर निकला रस उसकी गांड़ पर से होते हुए नीचे छोटा डबरा बना रहा था। प्रिया की भूखी आंखें अपनी मां की दर्दनाक चुदाई को देखती उसका बदन जला रही थी।

फुलवा चीख पड़ी और उसकी गांड़ ने चिराग को निचोड़ लिया। अपनी मां के साथ झड़ते हुए चिराग ने अपनी मां की गांड़ में अपना गरम रस भर दिया।

प्रिया अपना मुंह दबाए जल रही थी जब उसने अपना नाम सुना।

चिराग थक कर, “प्रिया क्या?”

फुलवा, “प्रिया भी जवान है, खूबसूरत है और अच्छे पोषण के साथ उसका शरीर भी भर जाएगा! मेरे मम्मे पिचकने लगेंगे जब उसके फूलने लगेंगे। क्या तुम्हें यकीन है कि तुम उसे पसंद नहीं करोगे?”

प्रिया की सांस अटक गई और वह दीवार से चिपक कर बैठी रही।

चिराग, “प्रिया आप की बेटी है। मैं उसके साथ ऐसा करने का सोच भी नही सकता!”

प्रिया के अंदर अंगड़ाई लेती हसीना को इस तरह नकारा जाना बिलकुल रास नहीं आया पर प्रिया चिराग के तेजी से फूलते लौड़े से अपनी आंखें हटा भी नहीं पाई। चिराग ने अपनी मां को नंगा किया और उसकी एड़ियों को अपने कंधे पर रख कर उसकी गांड़ मार दी।

प्रिया बड़ी मुश्किल से अपने घुटनों के बल रेंगती वहां से अपने बिस्तर पर आई और पूरी रात जवानी की आग में जलते हुए गुजारी।

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सबेरे दरवाजे पर दस्तक हुई तो नहाकर बाहर निकले मानव शाह ने बिना सोचे तौलिया लपेट कर दरवाजा खोला। तौलिए के नीचे से झांकता सेब जैसा सुपाड़ा देख कर प्रिया की आंखें फटी रह गई।

अपने नंगे बदन पर तौलिया लपेट कर लड़खड़ाते हुए बाहर आती काम्या,

“कितनी बार कहा है, दरवाजा खोलने तौलिया लपेट कर नहीं जाना। बेचारी बच्ची सदमे में चली गई!…

हटो!!…

जाओ!!…

शू!!…”

मानव शाह अपने 15 इंची सांप को तौलिए के अंदर दबाते हुए, “वहां सारे बच्चों ने मोहिनी पर कब्जा कर लिया है।”

काम्या मानव को धक्का देकर भेजते हुए, “बच्चे हैं काटेंगे नहीं! काट भी लिया तो आप ही के बच्चे हैं!! जाओ!!”

प्रिया काम्या और मानव की बातें सुनती दंग रह गई। काम्या प्रिया को अपने कमरे में ले गई और दरवाजा लॉक कर लिया। अपना तौलिया उतार कर अपनी जांघों पर से बहते गाढ़े वीर्य की धाराओं को काम्या पोंचते हुए काम्या प्रिया से बातें करने लगी।

काम्या, “डरना मत! दरवाजा लॉक नहीं करती तो इसे पोंछने की नौबत दुबारा आती। मुझे ऐसा देखकर तुम्हें एतराज तो नहीं ना?”

प्रिया ने सर हिलाकर मना किया।

काम्या, “ कुछ जरूरी बात होगी जो सुबह इतनी जल्दी यहां आई! बोलो क्या हुआ?”

प्रिया ने काम्या को अपने आकर्षक बदन को अलग अलग कपड़ों और सुगंध से सजाते हुए देखते हुए अपने मन में चिराग के कीड़े को देख कर बनती हालत के बारे में बताया।

काम्या, “कीड़ा? ओह!!… मैंने सिर्फ सांप देखा है तो समझने में देर लगी! मैं जानती हूं कि तुम हमारा राज समझ चुकी हो। तो हिचकिचाहट की कोई जरूरत नहीं है।”

प्रिया सिसकते हुए, “मैं रंडीखाने में पली बढ़ी हूं। मैंने बचपन से औरतों को मर्दों के नीचे रोते चीखते सुना है। फुलवा मां कहती हैं कि प्यार होने पर यह दर्द मज़ेदार होता है! मैं नहीं जानती की मुझे क्या सोचना चाहिए पर मुझे पहले ऐसा कभी नहीं लगा।”

काम्या ऑफिस के कपड़े पहने प्रिया के बगल में बैठ गई।

काम्या, “पहली बार दर्द होता है! तुमने पापा का आकार देखा ना?(प्रिया ने सहमी हुई आंखों से देख कर सर हिलाकर हां कहा) मेरी शुरुवात तो जबरदस्ती से हाथ पांव बांध कर हुई थी! कभी कभी सोचती हूं कि अगर प्यार से होती क्या कम दर्द होता?”

प्रिया ने काम्या को गले लगाया तो काम्या हंस पड़ी।

काम्या, “अरे नही!!… मैने पापा के हाथ पांव बांध कर उन्हें अपनी पहली बार दी थी! (प्रिया हैरानी में देखती रही गई) वो अलग कहानी है। पर हां दर्द होता है और इसे फ्रेंच लोग ‘le petit morte’ कहते हैं। यानी छोटी मौत! मर्द सही काम करे तो औरत कुछ पलों के लिए दूसरी दुनिया की सैर कर लौटती है।”

प्रिया की अविश्वास भरी आंखों को देख कर काम्या हंस पड़ी।

काम्या, “छोड़ो!! इसे बाद में देखेंगे। तुम्हारी तकलीफ है कि तुम चिराग से कैसे पेश आओगी? तो मैं तुम्हें कुछ नियम बताती हूं।”

उस पर ध्यान मत देना। चाहे जितना मन करे उसे ऐसे दिखाना की वह कोई आम राह चलता मर्द है जिस से तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

उसे तुमसे बात करने दो! खुद से उसके पास कभी नहीं जाना!

हमेशा एक पहेली बने रहना। उसे ऐसा कभी नहीं लगना चाहिए की वह तुम्हें पहचान गया है।

यह मुश्किल है! मर्द बेवकूफ होते हैं और वह तुम्हें चोट पहुंचाएगा। उसे यह कभी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम्हें उसकी चोट से फर्क पड़ता है।

प्रिया, “इस से क्या होगा?”

काम्या हंसकर, “तुम चिराग से आसानी से बात कर पाओगी और शायद भविष्य अपने आप को खुद दिखा दे! (प्रिया को गले लगाकर) चलो अब बच्चे बाहर मस्ती कर रहे होंगे और पापा को मुझे ऑफिस के कपड़ों में देख कर मुझ पर ज्यादा प्यार आता है!”

काम्या के साथ उसके पापा क्या करने वाले हैं यह सोच कर प्रिया का चेहरा लाल हो गया और वह परिवार के सारे लोगों से विदा लेकर चिराग का सामना करने लौटी।

चिराग ने दरवाजा खोला तो प्रिया उसे गुड मॉर्निंग बोल कर अंदर चली आई जिस से चिराग भौंचक्का रह गया। चिराग ने प्रिया को दरवाजे के बाहर रखी पेंटिंग के बारे में पूछा तो प्रिया हंस पड़ी।

प्रिया, “कल तुम्हारा जन्मदिन था और वह तुम्हारा तोहफा है। मैं देने आई थी पर तुम… व्यस्त थे इस लिए वहां छोड़ कर चली गई।”

फुलवा प्रिया में आए बदलाव से मुस्कुरा रही थी जब की चिराग उलझन में था।

चिराग, “कल रात तुमने जो देखा… सुना…”

प्रिया हंसकर, “मैं एक रण्डी की बेटी हूं। मैने बहुत कुछ बचपन से देखा और सुना है! सच में, अगर फुलवा मां को कोई ऐतराज नहीं तो मैं भला क्यों कुछ बोलूं? (फुलवा की ओर देख कर) मां अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूं?”

चिराग को ऐसे भुला दिया जाना बिलकुल रास नहीं आया पर फुलवा का चेहरा खुशी से खिल गया था।

प्रिया, “आप को नहीं लगता कि चिराग ठीक से कसरत नहीं करता? मतलब कल कितनी जल्दी हांफने लगा था?”

चिराग दंग रह गया और फुलवा जोर से हंस पड़ी।

फुलवा, “बात बिलकुल सही कही! शायद उसे लगता है कि अब उसे मेरे लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं रही! चिराग! बेडरूम में आओ! मैं तुम्हें कसरत कराऊंगी!!”

चिराग को लग रहा था जैसे उसकी दुनिया दुबारा उल्टी हो गई है और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

प्रिया ने अपनी कलाओं और गुणों को निखारते हुए जल्द ही अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और मानव की मदद से हनीफा के पति रिज़वान अहमद के साथ काम करने लगी। हालांकि उसे फुलवा के होते हुए पैसे की कमी नहीं थी पर प्रिया अपने पैरों पर खड़ी होकर अपनी मां का सपना पूरा करना चाहती थी। प्रिया अब भी हर रात चुपके से मां बेटे की चुदाई देखते हुए अपनी गीली जवानी की चुभन महसूस करती। अपने जलते बदन को ठंडे पानी में भिगो कर शांत करती। लेकिन चिराग के लिए प्रिया वह पहेली थी जिसे वह ना उगल सकता था और ना निगल सकता था।

प्रिया को फुलवा और चिराग से मिले दो साल होने को थे जब फुलवा एक दिन बहुत खुश लौटी।

फुलवा ने रात के खाने के वक्त बताया की अब वह अपनी बीमारी से पूरी तरह ठीक हो गई है और अब वह अपनी भूख पर बिना किसी तकलीफ के काबू पाने के काबिल है।

चिराग ने अपनी मां को इस कामयाबी की बधाई दी तो प्रिया ने उसे पूछा की वह इस कामयाबी को कैसे मानना चाहेगी।

फुलवा, “चिराग, मैं अकेली गोवा जा रही हूं! खुला समुंदर, नंगे लड़के और मस्त हवा। मैं अपने आप को 1 हफ्ते तक छूटी देते हुए मज़े करूंगी!!”

प्रिया को अपने जन्मदिन पर फुलवा का ना होना बुरा लगा पर उसने फुलवा की खुशी को ज्यादा अहमियत देते हुए उसे बैग भरने में मदद की।

फुलवा ने चिराग को गले लगाकर, “तुम्हें पिछले 3 सालों में रोज औरत का साथ मिला है। अकेले रह पाओगे ना? तकलीफ हुई तो तुम्हारे ऑफिस की पम्मी…”

चिराग, “मां मैं ठीक हूं! मुझे कोई तकलीफ नहीं होने वाली! और मैं आप से प्यार करता हूं, बस गरम बदन से नहीं को पम्मी को बुला लूं!”

फुलवा, “मेरा राजा बेटा! (चिराग का गाल चूमकर उसके कान में) घर में जवान मर्द को कच्ची कुंवारी के साथ छोड़ते हुए थोड़ा डर तो लगता ही है! मतलब अगर तुम्हें रात में भूख लगी और बगल के कमरे में कोई आह भरे तो… इस लिए पम्मी के बारे में बताया।”

चिराग की आंखों के सामने मां ने बनाई तस्वीर साफ नजर आई और उसका लौड़ा फूल कर फटने की कगार पर पहुंच गया।

चिराग, “मां, आप डरो मत! ऐसा कुछ नहीं होने वाला! आप हफ्ते बाद आओगी तब भी प्रिया मुझे ऐसे ही झटक कर आप से बात कर रही होगी।”

प्रिया कुछ लेकर आई और फुलवा की बैग में रखा।

फुलवा, “यह बिकिनी सेट है! गोवा में काफी दिल जलाना! जब आप लौटेंगी तब तक मैं चिराग से पूरा घर साफ करवा लूंगी! मर्द और किस काम आते हैं?”

फुलवा ने प्रिया को गले लगाकर, “ओह मेरी मासूम बच्ची!! सच में मर्द एक ही काम आते हैं!”

फुलवा अपनी गाड़ी में बैठ कर गोवा के लिए चली गई और चिराग प्रिया के साथ घर लौटा। चिराग को एहसास हुआ कि वह पहली बार प्रिया के साथ अकेले रहने वाला है। प्रिया ने अपने घर में पहने जाने वाले कपड़े पहन कर घर के रोज के काम करना शुरू किया।

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Crop tops और denim shorts में प्रिया को रोज़ देखना अपने आप में एक सजा थी पर अब चिराग को प्रिया के असर से बचाने या प्रिया का असर कम करने वाली मां भी सात दिन तक नहीं थी।

चिराग ने पहली बार ऊपर वाले से मदद मांगी की वह इन सात दिनों में अपने आप को शर्मिंदा होने से रोक पाए। प्रिया को अपनी मासूम जवानी का चिराग पर क्या असर होता है इसकी भनक भी नहीं थी।

चिराग ने अपने घर का दरवाजा लगाया तो उसे अपने कमरे में से प्रिया की हल्की चीख सुनाई दी। चिराग दौड़ कर गया तो उसकी आंखों के सामने प्रिया की शॉर्ट्स में भरी हुई गांड़ झूल रही थी।

प्रिया, “पीछे से देखते रहोगे या पकड़ोगे भी! मेरी पकड़ छूट रही है!”

चिराग ने प्रिया को पीछे से पकड़ लिया और प्रिया चिराग के सीने पर से सरकती नीचे आई। चिराग की मजबूत बाहों के घेरे में प्रिया के फूले हुए मम्मे नीचे से दबकर उठ रहे थे। प्रिया ने गले में से आवाज निकाली और चिराग ने झटके से अपने हाथों को हटाया।

चिराग डांटते हुए, “वहां ऊपर क्या कर रही थी? गिर जाती तो?”

प्रिया, “मां के आने के बाद मेरा जन्मदिन मनाएंगे लेकिन अब जब मां ठीक हो गई है तो मैं और मां इस कमरे में सोएंगी। बदबूदार मर्दों को वह दूसरा कमरा ठीक है।”

चिराग, “याद रखना की इसी बदबूदार मर्द ने अभी तुम्हें बचाया!”

प्रिया ने नीचे झुककर कुछ सामान उठाते हुए, “मर्दों को और क्या करना आता है?”

चिराग के अंदर से एक जानवर दहाड़ा की प्रिया को मर्द का काम सिखाया जाए और चिराग जैसे तैसे अपने होठों को दबाकर बाहर TV के सामने बैठ गया।

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4 दिन बाद शनिवार दोपहर को चिराग घर लौटा तब वह सोच रहा था कि प्रिया को उसके जन्मदिन का तोहफा आज रात 12 बजे दे या कल सुबह। आखिर में रात के 12 बजे प्रिया को नींद से जगाने में बनने वाले खतरे समझ कर उसने अगली सुबह को निश्चित किया।

चिराग ने चुपके से घर में कदम रखा तो सब खामोश था। अचानक प्रिया की सिसकी सुनाई दी और चिराग प्रिया के कमरे में गया। प्रिया बिस्तर के बगल में नीचे बैठी रो रही थी।

चिराग के दिल में जैसे मरोड़ पैदा हो गई। चिराग ने प्रिया के कंधे को छू लिया और वह चौंक कर अपने आंसू पोंछने लगी। चिराग ने रोने की वजह पूछी तो प्रिया ने वापस रोते हुए बताया कि उसे मां की याद आ रही थी।

कल उसका जन्मदिन था और हर बार की तरह आज कोई भी मां उसके पास नहीं थी। चिराग ने प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया और उसे फुलवा को ढूंढते हुए बने हुए अलग अलग किस्से बताए।

प्रिया को हंसाने में कामयाब होने के बाद चिराग ने बिना सोचे प्रिया को तयार होने को कहा। आज वह दोनों जवानों की birthday party मनाने वाले थे। चिराग प्रिया को पहले हनीफा के बुटीक में ले गया जहां प्रिया के लिए सेक्सी पार्टी ड्रेस लिया गया। फिर चिराग प्रिया को खाना खाने बढ़िया रेस्टोरेंट में ले गया। प्रिया ने पेट भरने की शिकायत की तो चिराग उसके साथ डिस्को में आया। दोनों ने एक दूसरे के साथ नाचते हुए 4 घंटे बिताए। प्रिया थक गई तो दोनों घर वापस लौटे।

प्रिया के पैरों में नाच कर दर्द हो रहा था और वह सोना चाहती थी पर चिराग ने उसे उसका तोहफा दिया। चिराग और प्रिया ने हॉल के बड़े सोफे पर बैठ कर प्रिया का पसंदीदा आइसक्रीम खाते हुए उसकी पसंदीदा फिल्म देखी। किसी को पता भी नहीं चला कब चिराग की बाहों में प्रिया को नींद आ गई।

चौंक कर दोनों जाग गए जब फुलवा ने प्रिया को खींच कर चिराग की बाहों में से दूर करते हुए नीचे गिराया।

फुलवा गुस्से में लाल होकर, “एहसान फरामोश!!…

आस्तीन के सांप!!…

धोखेबाज!!…

मक्कार!!…

मैने तुझे अपनी बेटी कहा और तूने अपने भाई के साथ मुंह काला कर लिया!! मेरे प्यार का यह सिला दिया!”

प्रिया रोते हुए मना कर रही थी पर फुलवा सुनने की हालत में नहीं थी। चिराग ने अपनी मां को प्रिया से दूर करते हुए उसे समझाने की कोशिश करने लगा।

फुलवा, “इस गंदी नाली की पैदाइश को लगता है कि मेरे बेटे को फंसा लेगी और मैं चुप बैठूंगी? इसी ने तुझे भूखा पा कर अपनी टांगे फैलाकर बुलाया होगा। ये इसके खून में है!”

फुलवा मां के मुंह से अपनी मां की बेइज्जती सुनकर प्रिया रोने लगी पर चिराग गुस्सा हो गया।

चिराग, “अगर यह सच है मां तो यही सब कुछ मेरे अंदर भी हो सकता है। जब मैं पैदा हुआ था तब आप क्या किया करती थीं?”

प्रिया और फुलवा चिराग को ऐसे देखने लगी मानो उसने अपनी मां को थप्पड़ लगाया था।

फुलवा प्रिया से गुस्से में, “देखा!! तेरी वजह से मेरे बेटे ने मुझे रण्डी कहा! वैश्या कहा!! हो गई तसल्ली?”

चिराग ठंडी आवाज में अधिकार से, “मां हमने कहा कि कुछ नहीं हुआ और आप के लिए इतना काफी है। इस से पहले कि बात और बिगड़े आप सोने जाओ! प्रिया, तुम अपने कमरे में जाओ! मैं यहीं पर सोऊंगा!”

फुलवा झल्ला कर, “ये रण्डी की औलाद इस घर में नहीं रहेगी! बाहर जाकर अपनी मां की तरह धंधा लगाए पर यहां से दफा हो जा!!”

चिराग, “मां, अगर आप ने ऐसा किया तो इस घर में कोई रण्डी की औलाद नहीं रहेगी! समझ रही हो ना?”

फुलवा चौंक कर, “तू इस चूत के टुकड़े के लिए अपनी मां को छोड़ेगा? मुझे छोड़ेगा? ये हैं कौन?”

चिराग को जैसे सब साफ दिखाई देने लगा।

चिराग मुस्कुराकर, “मेरा प्यार!”

प्रिया का मुंह खुला रह गया है तो फुलवा गुस्से में पागल हो गई।

फुलवा, “चिराग, पागल मत बन! अगर तूने इसे घर से बाहर नहीं निकाला तो मैं तुझे जायदाद में से बेदखल कर दूंगी! तुझे बरबाद कर दूंगी! दोनों को भिखारियों की तरह जीना पड़ेगा!”

चिराग ने नीचे झुककर प्रिया को उठाते हुए, “मां की बात सुनी ना? बोलो, रहोगी मेरे साथ? गरीबी में, बरबाद होकर?”

प्रिया को जैसे किसी राजकुमार ने अपने महल में बुला लिया हो वैसे वह चिराग के साथ चली गई। फुलवा काफी देर तक चीखती चिल्लाती रही पर चिराग और प्रिया खाली हाथ फुलवा को छोड़ कर चले गए।

दोनों को घर से बाहर निकलने के बाद याद आया कि उनके पास ना पैसे थे और ना ही ठिकाना। दोनों ने सबेरे का इंतजार बाहर के बस स्टॉप पर किया।

सुबह 5 बजे मानव शाह उनके बगल में बैठ गया तो दोनों उसकी बात सुनने लगे।

मानव, “ तुम दोनों को पता है कि फुलवा ने तुम दोनों के खिलाफ जंग छेड़ दी है? हां तुमसे बस बात करना भी खतरनाक है! कोई तुम्हारी मदद नहीं कर सकता। मेरी बात मानो। चिराग, घर लौट जाओ। तुम्हारी डिग्री पूरी नहीं है और अब कोई नौकरी भी नहीं मिलेगी! प्रिया को कुछ दिन मैं छुपाऊंगा और फिर इसे किसी दूसरे शहर में भेज देंगे!”

प्रिया जानती थी कि इतनी बड़ी दौलत को कोई ठुकरा नही सकता। प्रिया ने अपना सर झुकाकर हार मान ली पर चिराग डरने वालों में से नहीं था।

चिराग, “आप किसी घर का इंतजाम कर सकते हैं? बाकी मैं संभाल लूंगा।“

मानव, “एक लड़की के लिए…”

चिराग, “क्या आप काम्या को छोड़ सकते हैं?”

मानव मुस्कुराकर, “काम्या के कहने पर मैंने ज़हर खाया था! (सोचकर) यहां से दूर एक झोपड़ी का इंतजाम कर सकता हूं।”

चिराग और प्रिया को फुलवा के गुस्से का अंदाजा तब हुआ जब उनके सारे दोस्तों ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। चिराग ने एक कंपनी में चपरासी की नौकरी ली और साथ में ही एक पार्किंग में वॉचमैन की भी।

चिराग ने प्रिया को समझाया की हालांकि वह पहले 3 साल बहुत कम मिलेंगे पर फिर उनके पास अपना घर होगा। प्रिया ने भी अपने लिए सस्ते कपड़े तलाशते हुए एक नौकरी ढूंढ ली थी।

काली क्रिएशन नाम के एक छोटे बुटीक की मालकिन को एक महीने के लिए कोई लड़की चाहिए थी जो उसके ना होने पर दुकान चलाए। प्रिया के चित्रकला का ज्ञान और फैशन की समझ से खुश होकर उसे नौकरी पर रख लिया गया।

प्रिया और चिराग एक दूसरे को सिर्फ सुबह 6 से 10 तक और रात को 11 बजे खाना पहुंचते हुए मिलते। दोनों को पता था कि वह मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं पर दोनों को एक दूसरे के प्यार पर उतना ही यकीन हो रहा था।

एक महीने बाद चिराग के 21 वे जन्मदिन पर नारायण जी उनसे मिलने उनके झोपड़े में आए। नारायण जी के समझने पर चिराग हंस पड़ा तो नारायण जी ने मदद का हाथ बढ़ाया। चिराग ने उनकी मदद लेकर उनकी और मां की दोस्ती को खतरे में डालने के बजाय उन्हें अपनी शादी में गवाह बनने का न्योता दिया। नारायण जी हां कहकर चले गए। उस रात प्रिया ने चिराग को हड़बड़ी में घर बुलाया तो वह दौड़ा चला आया। फुलवा अपने बेटे को घर ले जाने आई थी।

फुलवा ने प्रिया को राज नर्तकी का खजाना देने के बदले चिराग को छोड़ने का प्रस्ताव रखा पर प्रिया ने उसे ठुकरा दिया। फुलवा ने फिर प्रिया के प्यार को इस्तमाल करते हुए उसे मनाया की उसकी वजह से चिराग को न केवल अपनी जायदाद से हाथ धोना पड़ रहा है बल्कि मूलचंदानी बिल्डर्स की इकलौती बेटी भी हाथ से जाएगी। मूलचंदानी को चिराग के पास रखैल होने से कोई दिक्कत नहीं थी। प्रिया अपनी वजह से चिराग को गरीबी में नहीं रख सकती थी।

प्रिया ने चिराग से कहा की वह अपनी मां के साथ चला जाए और उसकी मर्जी से शादी कर ले। प्रिया उसके लिए उसकी रखैल बन कर रहने को तैयार थी।

चिराग जानता था कि प्रिया रखैल बन कर उसके लिए अपनी मां की आखरी इच्छा तोड़ रही थी। चिराग ने अपनी मां से कहा कि वह हमेशा उसकी मां रहेगी और वह जब चाहे उनसे मिलने आए। चिराग गरीबी में जीलेगा पर प्रिया को ही अपनी बीवी बनाएगा।

प्रिया रो पड़ी और फुलवा ने हार मान ली। फुलवा ने दोनों की शादी को मंजूरी देते हुए उन्हें वापस बुलाया। शादी होने तक चिराग और प्रिया को अलग रखना था इस लिए चिराग को एक महीने तक मूलचंदानी बिल्डर्स के मालिक के घर पर रहना था। मूलचंदानी बिल्डर्स के मालिक प्रतीक और लक्ष्मी को सिर्फ एक बेटा था। प्रिया को फुलवा अपने साथ घर ले गई।

प्रिया ने डरते हुए घर में दुबारा कदम रखा तो वहां पूरा महिला मंडल उनका इंतजार कर रहा था।

साफिया, “बताओ, बताओ! कैसा था? कितने महीनों से तैयारी कर रहे थे हम सब!”

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प्रिया पिछले एक महीने से उसे पहचानने से इंकार करती सहेलियों को देख कर रुक गई तो फुलवा उसे खींच कर अंदर ले आई। प्रिया बैठ गई तो सबने उसे घेर लिया।

रूबीना, “बताओ! बताओ!! क्या हुआ? कैसा रहा पिछला महीना?”

सत्या, “अरे जरा संभलने का मौका दो बेचारी को! पराए मर्द संग महीना बिताना कोई मजाक नहीं! पर चिराग तो पराया नहीं था! उसे अपनाते हुए ज्यादा चीखी तो नही? झोपड़ी में से आवाज जल्दी बाहर आती है!”

सारी सहेलियां ठहाका लगा कर हंसने लगी और उलझी हुई प्रिया शर्म से लाल हो गई।

फुलवा ने प्रिया के बालों में से उंगलियां फेरते हुए, “ तुमने यह कैसे सोच लिया की हम सब तुम्हें खुले में छोड़ देंगे? हमारी तुम दोनों पर नजर थी!”

साफिया, “जिन गुंडों ने बिल्डिंग से बस स्टॉप तक पीछा किया वह वसीम भाई के लोग थे और बस स्टॉप पर सोया भिखारी हमारा आदमी।”

फुलवा, “झोपड़े का इंतजाम 2 महीने पहले से कर के रखा था और चिराग की दोनों नौकरियों का भी। तुम्हारी नौकरी कुछ नई बात निकली।”

प्रिया के दिमाग की बत्ती जली और वह भड़क उठी।

प्रिया, “एक महीने तक डर और परेशानी में हम दोनों को रख कर आप सब लोग मजे ले रहे थे? ये है आप की दोस्ती? ये है आप का प्यार?”

काम्या, “ओह, so romantic!!”

फुलवा समझाते हुए, “प्रिया जिस दिन तुम मेरे साथ आई और चिराग तुम्हें देखते ही चुप हो गया उसी दिन मुझे तुम दोनों में कोई ‘खिंचाव’ महसूस हुआ। चिराग के जन्मदिन तक मुझे यकीन हो गया था कि तुम दोनों की जोड़ी बनेगी। पर तुम दोनों एक दूसरे से डरते थे या शायद इस खिंचाव को मानने से डरते थे। सच बताओ अगर मैं तुम दोनों की शादी लगा देती तो क्या तुम मान जाती?”

प्रिया गुस्से से, “हां!! मैं न जाने कब से चिराग को चाहती हूं!”

फुलवा, “बिलकुल सही! पर चिराग के मन में यह डर हमेशा रहता की शायद तुम उस से ज्यादा उसकी दौलत से प्यार करती हो। है ना? और तुम्हारे दिल में यह आशंका रहती की शायद चिराग ने अपनी मां की वजह से तुमसे शादी कर ली! है ना?”

फुलवा ने सोचकर हां कहा।

हनीफा, “लेकिन अब तुम दोनों जानते हो की तुमने दौलत और इज्जत ठुकराकर एक दूसरे का साथ चुना है। न तुम्हें दौलत की आस है और ना चिराग को। तुम तो अपने प्यार के खातिर चिराग की रखैल बनने को तैयार हो गई थी!”

प्रिया अपनी मां और सहेलियों की सूझ बूझ से खुश होकर अपनी मां की बाहों में समा कर रोने लगी।

फुलवा अपने आंसू पोंछे हुए, “बस बस, अब रोना बंद और खरीददारी शुरू! हनीफा, हमें जल्द से जल्द शादी का जोड़ा चाहिए!”

प्रिया, “मां!!… क्या हम शादी का जोड़ा मेरी दुकान… मतलब काली क्रिएशन में से ले सकते हैं? उसने मेरी मदद की थी और मैं उसे भी बुलाना चाहती हूं!”

हनीफा, “ये कौन हैं जो मेरे ग्राहक उठा रही है? चलो उस से मिलते हैं! आज कल मैं भी अपने बुटीक को सही वक्त नहीं दे पा रही।”

बात मर्दों पर आई तो सबने प्रिया से पूछा की चिराग बिस्तर में कैसा है? प्रिया ने शर्माकर बताया कि चिराग ने शादी से पहले उसे ना छूने की कसम खाई थी और इसी वजह से दोनों ने कोर्ट में शादी करने की तयारी की थी।

फुलवा ने प्रिया को चिराग का फोन आया है यह देखा और फोन छीन लिया। इशारे से सबको चुप कराते हुए,

“क्या है? क्यों फोन किया?”

चिराग, “मां, जरा प्रिया से बात करनी थी।”

फुलवा गुस्से से, “करवा रही हूं ना तुम्हारी शादी? जीत गए ना तुम दोनों? अब जो चुम्मा चाटी करनी है वह एक महीने बाद करना! प्रिया को जिंदा लेकर आऊंगी शादी के मंडप में! अब बहुत हुआ मुझे अपना काम करने दो! (दूसरी तरफ मुंह करके) इधर क्या देख रही है? तेरा यार नही आएगा वो फर्श धोने!! अगर दुबारा इधर देखा…”

फुलवा ने फोन काट दिया और सारी औरतें जोर जोर से हंसने लगी।

प्रिया, “ये सब नाटक कितनी खूबी से कर लेती हो मां!!”

फुलवा, “अरे बेटी रंडियां जो आह उउह करती हैं वह अक्सर नाटक ही होता है! कौन हर मर्द से रोएगा?”

सारी शादीशुदा औरतों ने सर हिलाकर हां कहा तो प्रिया, “पर चिराग को ऐसे परेशान करना?”

काम्या, “बड़ा प्यार आ रहा है अपने यार पे! जरा तड़पने दे उसे! शादी के दिन तेरा अच्छा दिखना जरूरी है, उसे तेरे अलावा कोई नहीं देखने वाला!”

अगले दिन कई महंगी गाडियां एक छोटे से बुटीक के सामने रुकी और सारी औरतें काली क्रिएशन का माल जांचने लगी। काली क्रिएशन की मालकिन, काली ने प्रिया को देखा और उसे गले लगाया।

काली, “मैंने सुना की तुम्हें कोई ले गया है! तुम ठीक तो हो ना?”

फुलवा ने आगे बढ़ कर, “काली? ये तुम्हारी दुकान है?(मंगलसूत्र को देख कर) और तुमने शादी कर ली?”

काली फुलवा को गले लगाकर, “फुलवा दीदी! आप को देख कर बहुत अच्छा लगा! कैसी हो आप? (फुलवा के कान में रूबीना की ओर देखकर) क्या तुम प्रिया की होने वाली सास को जानती हो? चुड़ैल ने अपने बेटे को घर से निकाला था!”

फुलवा हंसकर, “ प्रिया मेरी बहु होने वाली है और हां मैंने ही इन दोनों की आंखें खोलने के लिए उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर किया!”

काली, “पर… पर… प्रिया की सास बेहद अमीर है!”

प्रिया, “दीदी अब बोलना बंद कर दो! हम बाद में मिलकर सारी बातें करेंगे। मैं सबकी पहचान करा दूं!”

काली को यकीन नहीं हो रहा था कि उसके डिजाइन इन औरतों को बेहद पसंद आ रहे थे। यहां तक की फैशन जगत की हनीफा अहमद ने उसकी तारीफ करते हुए उसके बुटीक में साझेदारी करने में रुचि दिखाई थी।

प्रिया की शादी का जोड़ा बनाने में एक दिक्कत थी की उसे काली ने पहले ही तोहफे के तौर पर बना दिया था और अब पैसे लेने से इंकार कर रही थी। फुलवा के साथ बहस करने के बाद काली फुलवा को दुगनी कीमत में दूसरी ड्रेस देने को तैयार हो गई। काली फुलवा की संस्था के कार्यक्रम में भी कपड़े देना चाहती थी।

महिला मंडल एक नई सदस्य को अपने साथ जोड़कर spa day तय करने के बाद घर लौटा।

Spa day और ब्यूटी पार्लर में पूरा दिन उड़ाने के बाद शादी के दिन सारी औरतें अपने मर्दों का दिल जलाने को तयार थीं। शादी ज्यादा बड़ी नहीं थी पर फुलवा के सारे दोस्त परिवार समेत आए थे।

फुलवा ने अपनी बहु को अपने घर में बड़ी धूम धाम से लिया और कुछ देर चले हंसी मजाक और रिवाज होने के बाद प्रिया को सजाए हुए बड़े बिस्तर पर बिठाया गया। चिराग को चिढ़ाते हुए अंदर जाने से रोका गया और वह किसी तरह अंदर गया तो उसने दरवाजा लॉक कर लिया।

सारे महमान फुलवा से विदा लेकर चले गए और फुलवा ने प्रिया के कमरे में सोने की तयारी कर ली। अपने सिल्क के गाउन में फुलवा बिस्तर पर बैठी भी नहीं थी जब उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई।

फुलवा चिराग को परेशान देख कर, “क्या हुआ बेटा?”

चिराग नीचे देख कर, “प्रिया बहुत डर गई है। आप को बुला रही है।”

फुलवा मर्द और उनकी बेवकूफियों के बारे में बुदबुदाते हुए सुहागरात के कमरे में चिराग को पकड़ कर ले गई।

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