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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"वो कल कोई ज़रूरी काम तो नही कर रहा कोई?" खाने के वक्त आज रामेश्वर जी भी वही बैठे थे और अर्जुन से बात शुरू करते उन्होने पूछा.

"बताइए दादाजी. कही जाना है क्या?" अर्जुन तो यही सोच रहा था कि अलका दीदी का इम्तिहान तो परसो है और ऋतु दीदी का उस से अगले दिन. तभी तो मंजुला को उसने हा बोल दिया था चलने के लिए.

"वो कल एक बार बड़ी मार्केट चले जाना टाइम मिले तो. तेरी बॉक्सिंग की ड्रेस लेनी है और वही पंसारी से ये समान भी लेते आना." एक पर्ची उन्होने उपर की जेब से निकाल कर दी और साथ मे 2000 रुपये.

"वो दादाजी हमें भी कुछ चाहिए था." ये अलका दीदी की आवाज़ आई जो सामने ऋतु दीदी के साथ ही बैठी थी.

"बोलो लक्ष्मी बेटा. जो भी चाहिए बताओ." दादा जी ने प्यार से कहा तो अलका दीदी ने ऋतु दीदी की तरफ देखा जैसे उनसे इशारो मे कुछ पूछ रही हो.

"ट्रेडमिल." ऋतु दीदी ने इतना बोला और फिर चुप हो नीचे देखने लगी.

" ट्रेडमिल? तुम वो दौड़ने वाली मशीन की बात तो नही कर रही कही बेटा?" चौंकते हुए रामेश्वर जी ने कहा तो दोनो सहमी सी हाँ मे सर हिलाने लगी.

"हाहाहा. अच्छी बात है ये भी लेकिन वो ये कहाँ ला पाएगा. अर्जुन मार्केट के प्रवेश द्वार पर ही जीवन की खेल के समान की दुकान है. उसको बोल देना की पंडित रामेश्वर शर्मा के घर एक ट्रेडमिल भिजवा दे. और बाकी बात फोन पर कर लेगा." एक तरफ से ऋतु दीदी और एक तरफ से अलका दीदी ने दादा जी झप्पी डाल ली.

"दादा जी आप बेस्ट हो. थॅंक यू सो मच." दोनो बस यही बोलने लगी

तो रामेश्वर जी हंसते हुए ही बोले. "अररी मेरी बच्चियो ने इतनी अच्छी चीज़ की फरमाइश करी है भाई, ये नलायक तो सड़क पर दौड़ता है लेकिन तुम दोनो ने सही बात करी. और फिट होना तो सबसे ज़रूरी है."

कौशल्या देवी जी रोटी प्लेट मे रखते हुए ही बोली, "कल को वो बंदूक माँगेंगी फिर भी कह देना के अच्छी बात है." वो ऐसा कभी नही बोलती थी पता नही क्या सोच कर उन्होने ये कहा.

"वो तो भागवान अब तुम्ही दिला सकती हो. मैं तो अदना सा हवलदार हूँ थानेदारनी का." उनकी बातों पर सब हँसने लगे लेकिन दादी तो आज कुछ सोच के ही बैठी थी.

"ये दोनो पहले ही घर का कोई काम नही करती. शादी होगी फिर घरवाले को क्या खिलाएँगी? माधुरी का रिश्ता तो इस बार मैं करके ही आउन्गी इस बार कृशन ने एक लड़का देखा है. फिर उसके जाने तक इनको काम तो सीखना पड़ेगा या वो शादी तक घिसटी रहेगी?"

कौशल्या जी का सख़्त मिज़ाज देख कर दोनो बहनो का मूह उतर गया था.

"ये दोनो जो चाहे वो करेंगी. एक ने डॉक्टर बन कर घर का नाम रोशन करना है दूसरी ने एम बी ए करके बाहर जाना है. 2 कामवाली रख लो घर मे लेकिन तुम इन्हे कुछ नही कहोगी." रामेश्वर जी नाराज़गी से बोलकर चुप हो गये

लेकिन ऋतु अलका ने जब आपस मे ताली मारी तो उन्होने अपनी घरवाली को भी हंसते देखा. "ये शैतान की नानी है दोनो. खुद इन्होने कहा था मुझे आपको ये बोलने के लिए और आपने भी इनका साथ देकर दिखा दिया की घर मे ये 2 आपकी जान क्यो है." और हंसते हुए चूल्हे की ओर चल दी जहा ललिता जी और लोगो के लिए प्लेट लगा रही थी और रेखा जी रोटी सेक रही थी.

"इतना आगे का कैसे सोच के रखती हो तुम?" रामेश्वर जी ताज्जुब से बोले.

"वो आपने ही कहा था ना दादाजी, आज के साथ आने वाला कल भी तयार रखकर चलो.दादी ने जब कहा के अब आप लोग दीदी का रिस्ता पक्का करने वाले हो और हम को घर का काम करना पड़ेगा तो मैने उन्हे बोल दिया था कि हमारे दादाजी कामवाली रखवा देंगे लेकिन हमारी पढ़ाई के बीच मे किसी को नही आने देंगे. और दादी ने शर्त लगाई थी अब वो हार गई." ऋतु ने चहकते हुए कहा और अलका के गले लग गई.

"तो थानेदारनी जी शर्त मे क्या हार गई आप?" रामेश्वर जी ने अपनी बीवी को छेड़ते कहा तो उन्होने सामने से कहा, "वो मूई दौड़ने वाली मशीन पर पहन-ने वाले कपड़े और जूते."

एक बार फिर सब हंस दिए. अर्जुन तो बस अपने घर को देख रहा था जो हमेशा इतना खिला खुश रहता था. और जब किशनचन्द शर्मा

का जीकर हुआ तो वो अपने दादाजी से बोला. "गाँव वाले दादाजी आएँगे यहा या आप जाएँगे वहाँ?"

"तेरे विनोद चाचा के कल लड़का हुआ है. 6 दिन बाद पूजा है और फिर गेहूँ भी तयार है. उसने तो कहा था सबको आने के लिए लेकिन तेरी दादी ने कहा के

ऋतु, अलका तो अभी जा नही सकती और पीछे संजीव भी है. फिर प्रियंका और आरती भी होंगी यहा तो सिर्फ़ घर के बड़े ही जा रहे है. माधुरी और कोमल

को साथ लेकर." रामेश्वर जी ने खाना ख़तम करते ये कहा.

"मतलब ये हुआ की आप, दादीजी, ताऊ जी-ताईजी , मेरी मा, माधुरी दीदी, कोमल दीदी और मैं?" अर्जुन ने चहकते हुए कहा तो दादाजी ने उसकी शकल देखते कहा

"तू यही रहेगा और तेरा बाप भी जा रहा है वहाँ पे. गर्मी की छुट्टियों मे चला जइयो गाँव अभी तुझे इस शहर से एक दिन के लिए भी कही भेजना. वैसे भी अगर हम 1-2 दिन के लिए जाते तो भी बात थी. वहाँ तो पूरा हफ़्ता लग जाएगा. लड़के वाले भी आएँगे, फिर कुलदेवी के मंदिर जाना है और ज़मीन के कागज का भी कुछ काम है कचहरी मे." और उठ गये वहाँ से.

"कब जा रही हो दादी आप लोग?" अर्जुन ने उदास स्वर मे ये बात कही तो दादी जी हंस पड़ी. "बेटा नरेन्दर आ जाए फिर जाएँगे. और देख तेरी भलाई के लिए ही कहा है तेरे दादा जी ने."

"और पापा वहाँ कैसे जाएँगे. वो तो छुट्टी करते नही?" थोड़ा हैरान होते कहा उसने

"उसका बाप बुलाए तो उसको भी जाना पड़ता है." हँसती हुई सी वो अंदर की ओर चल दी अपनी थाली हाथ मे लिए.

अर्जुन ने देखा तो माधुरी दीदी बार बार उसकी तरफ ही देख रही थी. जैसे कोई बात करना चाहती हो उस से. अर्जुन ने ध्यान दिया तो उंगली के इशारे से वो उपर का इशारा कर रही थी. उसने सिर्फ़ हल्के हा मे सर हिला दिया दीदी को देखते हुए. ऐसे ही सब खाना खा चुके तो कौशल्या जी ने अलका को अर्जुन को बुलाने भेजा जो अपने कमरे मे थे उपर.

अलका दीदी अर्जुन के कमरे की ओर चल दी. इस समय एक हल्का खुल्ला सूती कुर्ता और खुली सलवार मे पतंग सी उड़ती अलका दीदी जा पहुँची उपर जहा अर्जुन कोई किताब बड़े ध्यान से पढ़ रहा था सोफे पर अकेला बैठा. कुछ देर तो अलका दीदी ने देखा की ये सच मे ही पढ़ रहा है या वैसे टाइम पास कर रहा है लेकिन उसको थोड़ी देर बाद पन्ना पलट ते देखा तो दबे पाव उसके पीछे जा खड़ी हुई और जैसे ही उसकी तरफ अपने हाथ बढ़ाए, अर्जुन ने साइड हो कर उनके दोनो हाथ पकड़ अपने ही उपर गिरा सा लिया.

"मेरे कान हर तरफ रहते है दीदी और फिर आपके हाथ तो आ भी रोशनी की तरफ से रहे थे." बोलता हुआ वो उनके चेहरे पर झुक गया. 1 मिनिट बाद जब दोनो के होंठ अलग हुए तो अलका दीदी जैसी प्यासी सी उसको देखने लगी. "आप शायद किसी काम से आई थी क्योंकि इस समय अगर मेरे पास मिलने आती तो ऐसे आने की जगह मेरी गोद मे आ जाती."

अर्जुन की बात सुनकर अलका दीदी अच्छे से उसके गोद मे आकर बैठ गई. "कर ले 2 दिन और इंतजार तू. फिर ये तेरी गर्लफ्रेंड तुझे बताएगी ये शरारत कितनी महँगी पड़ती है." और चूमकर फुर्ती से खड़ी हो गई. "दादी बुला रही है तुझे. चल आजा साथ लेकर आने को कहा है." मुस्कुराती से दरवाजे पर जा खड़ी हुई.

कुछ ही देर मे दोनो ही रामेश्वर जी के कमरे मे थे. अलका तो बिस्तर पर बैठ गई दादी के सिरहाने और अर्जुन खड़ा था.

"हंजी आपने बुलाया मुझे?" दादा-दादी की तरफ देखते पूछा.

"तू यहा बैठ और ये पूरे ख़तम करने है. और लक्ष्मी बेटा तू खुद रसोईघर मे जा और बड़ा गिलास दूध का बना के लेकर आ." कौशल्या जी ने पिस्ता और काजू से आधी भरी कटोरी अर्जुन को थमाते हुए अलका दीदी को दूध लाने को भेजा.
 
"आज से ये रोज तेरी खुराक का हिस्सा है. कोई हो या ना हो ये सामने दोनो डब्बे रखे है जहा से इतना ही रोज शाम को सोने से पहले लेने है और एक गिलास दूध."ये बात रामेश्वर जी ने कही.

अर्जुन ने आराम से वो खाने शुरू किए तो रामेश्वर जी ने आगे बात बधाई, "सुन बेटा, मेरी तो उमर ज़्यादा हो चली है. ज़्यादा भाग-दौड़ नही होती. तेरा बाप और ताऊ कभी भी घर के लिए समय नही निकाल पाते. अब संजीव ने भी सॉफ मना कर दिया है के वो 2 साल नौकरी कर के अपना कारोबार शुरू करेगा." कुछ देर रुक कर उन्होने अपनी धरमपत्नी की तरफ देखा तो उन्होने हामी भरी.

"ऐसा अर्जुन अभी गाँव जाने का कारण है एक जो नही बताया लेकिन जो मैं अब बताउन्गा वो बात तू मानेगा, अगर तुझे मेरे फैंसले पर कोई शक या दिक्कत हो तो अभी बता देना उठने से पहले."

अर्जुन को तो बात का पता नही था उसने सिर्फ़ हा कहा.

"तेरे छोटे दादा शुरू से हमारी ज़मीन की भी देखभाल करते आए है. उस से होने वाला मुनाफ़ा आधा उनको मिलता है क्योंकि सबकुछ वही देखते है लेकिन अब कुछ बदलाव आ गये है उनके परिवार मे भी. उनके 3 बच्चे, तेरी 2 बुआ और तेरा चाचा विनोद आजकल थोड़ा ठीक व्यवहार नही कर रहे मेरे छोटे भाई से. उसने कल मुझे बताया था की अब ज़मीन की अलग रजिस्ट्री करवा लो कही कल को कुछ ऊँच नीच ना हो जाए. तेरे बाप और ताऊ को मैने बताया था तो वो मेरे साथ जाने के लिए तैयार है लेकिन ये सब वो भी नही संभालेंगे. तो ये तेरे नाम करने का फैंसला हुआ है. बस मेरी इक्षा है की हमारे चले जाने के बाद तू उसको बेचना मत.

विनोद ने तो तेरे कृशन दादा के हिस्से की आधी ज़मीन बेच कर होटल खोल लिया, कुछ उसमे से अपनी बहनो की तरफ भी कर दिया. ये ज़मीन हमारे पास पीढ़ियों से रही है और पहली बार इसमे से कुछ हिस्सा बेच दिया गया. जब तक किशन जिंदा है वो देखभाल करता रहेगा तेरे नाम होने के बाद और मैं भी वहाँ साल मे 4 बार जाता रहूँगा. लेकिन फिर ये ज़िम्मेदारी तुझे उठानी पड़ेगी बेटा. और तेरे चाचा नरेन्दर को उसकी आमदनी हर साल देनी पड़ेगी. कर पाएगा ये सब?"

"आपने जो भी कहा कभी मैने मना किया क्या? और अभी तो आप सब है ही तब की तब देखेंगे लेकिन जैसा आपने कहा वैसा ही होगा. बस पहले जो भी लक्ष्य है उनपे ही काम करते है ना."

सुलभ मन से अर्जुन ने ये बात कही तो रामेश्वर जी ने उसको थपथपाते हुए कहा, "बस बेटा अपना आचरण और संस्कार मत बदलना.

तू ही इस परिवार को परिवार बना के रख सकता है, ये मैं जानता हूँ. चल अब तू आराम कर अपने कमरे मे."

और अर्जुन कुछ सोचता सा वहाँ से उठकर खाली गिलास ले रसोईघर मे आ गया जहा उसकी मा रेखा जी और माधुरी दीदी बर्तन और चूल्हा सॉफ कर रहे थे.

"आ गया मेरा बच्चा. आज कहा सोएगा?"

रेखा जी की आँखों मे एक अलग ही प्रश्न था लेकिन अर्जुन ने बिना कुछ समझे सिर्फ़ इतना कहा, "उपर छत पर मा. वैसे कल मेरा दिल है के आपके साथ सोऊं अगले 2-3 रात. फिर आप चली जाएँगी एक हफ्ते के लिए."

बेटे का प्यार देख कर उन्होने अपने दिल की बात दबा कर सर पे हाथ फिरा दिया. "हा तो जब भी दिल करे तू आ सकता है मेरे पास सोने. अब रात हो गई है चल तू जा." फिर अर्जुन दीदी की तरफ देखता पहले छत पर बिस्तर लगाने चला गया और वहाँ से अपने दूसरी मंज़िल वाले बाथरूम मे नहाने. वहाँ भी वो प्रीति को याद कर के मुस्कुरा रहा था. कितनी अच्छी है और कैसे नासमझो वाली बातें कर देती है. लेकिन है तो मेरीही वो. देखते है जब घर कोई नही रहेगा तब क्या करते है.

ऐसे ही सोचता वो कुछ ज़्यादाही देर तक नहाता रहा फिर बिना कच्छे के पाजामा पहन उपर छत पर चल दिया. दीदी शायद पहले ही आकर लेट गई थी. थोड़ा मज़े मे वो भी उनकी चद्दर मे जा घुसा. दीदी को पकड़ कर उनके होंठ चूसने लगा अपना एक हाथ सीधा उनके बड़े दूध पर रख कर. वो शायद कुछ ज़्यादाही टाइट लगे तो मन का वहम समझ बस ऐसे ही दोनो होंठ मूह मे भर के बारी बारी चूसने लगा. अब दीदी भी उसके सर पर हाथ फेर रही थी. टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर जैसे ही अर्जुन ने उनका एक मुलायम बड़ा चुचा पकड़ा तो उसको पता चल गया के ये माधुरी दीदी नही है लेकिन अब दीदी तो उसका हाथ कस कर अपने चुचे पर दबाने लगी थी. "कोमल दीदी" इतना ही सोच पाया था कि छत पर किसी के चढ़ने की आवाज़ सुनकर दोनो अलग हो गये और कोमल दीदी ने तो मूह चादर से बाहर ही निकाल लिया.

"वो अर्जुन, रात को छत पर कितनी शांति और ठंडक होती है ना? कूलर की हवा मे भी इतना मज़ा नही आता." कोमल दीदी जैसे बातें करने का नाटक करने लगी और इधर माधुरी दीदी पानी की बॉटल और 2 तकिये उठाए उनके पास आ गई.

"अच्छा तो आज तू भी उपर ही सोने आ गई?" उन्होने तो आते ही कोमल दीदी को पहचान लिया, अर्जुन सोचने लगा की उसके साथ ये ग़लती कैसे हो गई. शायद वो ज़्यादाही मस्ती मे था.

"नीचे दिल नही था सोने का तो मैने सोचा मैं आज उपर आ जाऊ? आपको अच्छा नही लगा क्या?" कोमल दीदी मधुरी दीदी से बड़ा प्यार करती थी और माधुरी दीदी भी.

"अर्रे नही रे ऐसा थोड़ी कभी हो सकता है. बस तू इस साइड हो और मुझे बीच मे सोना है." वो उन दोनो के बीच आती हुई बोली. दोनो को पता था कि दीदी थोड़ी डरती है तो हंसते हुए उन्होने उनको जगह बना दी. अर्जुन ऐसे ही उन दोनो की बातें सुनता रहा कुछ देर लेकिन कुछ देर बाद कोमल दीदी की आवाज़ आनी बंद हो गई तो उसने अपने हाथ माधुरी दीदी के उपर रख कर कुरती के उपर से ही उनके दूध सहलाने शुरू कर दिए. एक ही मिनिट मे उनके निपल कपड़े पर से ही उभर कर अर्जुन की उंगलियों मे दबने लगे थे.

"आराम से करना भाई. संभाल कर कही कोमल ना जाग जाए, वैसे ये कुंभकरण उठेगी तो नही." और अर्जुन की तरफ मूह करके दोनो एक दूसरे को चूमने लगे.
 
"दीदी आपकी स्किन कितनी मुलायम है लेकिन यहा से ये कितने टाइट है. ऐसा क्यो?" अर्जुन ने होंठ हटा कर उनके दोनो बड़े दूध मसलते हुए कहा तो वो अंधेरे मे मुस्कुराती बोली, "भाई ये भी ढीले हो जाते है बस एक लंबे अरसे तक कोई इन्हे मसले और पीले तो. लेकिन मैं चाहती हूँ मेरी शादी होने तक बस तू इन्हे नरम कर दे." और फिर भावुक हो कर अर्जुन को चूमने लगी और खुद ही उसके हाथ से अपने मोटे चुचे उस से मसलवाने लगी. "इनको अच्छे से रगड़ और दबा.

कभी कभी तो सोचती हूँ हर रात तेरे कमरे मे चली आऊँ जब तू उपर नही होता." सिसकती सी माधुरी दीदी अब बुरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और एक हाथ से अपनी चूत को सलवार के उपर से रगड़ रही थी.

"दीदी आप कपड़े खोलो कही फिर ऐसा ना हो के बीच मे रह जाए. या फिर नीचे चलते है वहाँ ज़्यादा सुरक्षित है." अर्जुन ने समझते हुए कहा.

माधुरी दीदी ने अपने दोनो हाथो से सलवार नीचे कर दी और कमीज़ उपर चढ़ा लिया. "ये आज बाहर नही निकालती अगर कोमल जाग भी

तो बस नीचे करना है." दोनो के उपर एक चादर करते हुए उन्होने अपने दोनो दूध बेपर्दा कर लिए थे. पूरी छाती पर जैसे वो दो बड़े चुचे ही थे, और

उतनाही बाहर को लटके हुए. अर्जुन ने पाजामा घुटनो से नीचे कर माधुरी दीदी की टांगे चौड़ी कर अपना लंड उनकी चिकनी पानी बहाती चूत पर हल्के हल्के घिसना शुरू कर दिया.

"भाई इन्हे अच्छे से चूस." माधुरी दीदी के चुचे उन्हे परेशान कर रहे थे जिनपर अब अर्जुन झुक कर मूह रख चुका था.

निपल मूह मे ले चुसकते हुए दूसरे वाले को वो दबाता अपनी कमर भी उनकी चूत के बीच हिला रहा था. "दीदी आज आप पहले से ही गीली हो?"

"अर्रे जितनी बार तुझे देखती हूँ तभी ये पानी बहाने लगती है. इसको अब तेरी आदत होने लगी है. अब खोल दे इसका मूह ज़रा." आज उनपर शायद काम का नशा पूरा हावी हो चुका था. अर्जुन भी चाहता था कि जल्दी ही फारिग हो जाए. दिन मे 3 बार उसका खड़ा हो कर बैठा था तो अभी ज़्यादाही फूल चुका था.

"लो दीदी. बस चीखना मत." उसकी बात सुनकर माधुरी दीदी ने अपने मूह पर तकिये का सीरा रख लिया और अर्जुन ने अपने मोटे सुपाडे को चूत पर टीका कर एक मध्यम सा धक्का लगा दिया. "कच" और हर बार की तरह माधुरी दीदी की चूत इस तगड़े लंड के अंदर जाने से रब्बर के छल्ले की तरह फैल कर लंड के इर्द-गिर्द चिपक गई. "आ दीदी. अंदर से ये आज ज़्यादा गरम है." गीली गरम चूत में लंड 4 इंच तक फिसल गया था. थोड़ी देर उनके मोटे दूध दबाते वो

उनके कान को चूमने लगा.

दीदी ने आज अच्छे से बर्दाश्त कर लिया था उसका लंड. कुछ देर बाद उन्होने होले से उसके कान मे कहा, "पूरा डाल दे इस बार."

अर्जुन ने अभी तक तो उतने लंड से ही धक्के नही लगाए थे. दीदी की बात सुनकर वो चुपचाप सा उनका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा. "डाल दे फिर सीधा काम

शुरू कर देना." एक बार फिरसे इतना बोलकर अब उन्होने तकिया वापिस मूह पर रख उसके चुतड़ों पर थपकी सी दी जैसे कह रही हो के चल चढ़ाई कर दे.

अर्जुन ने हल्का सा लंड पीछे किया तो उसको भी चूत गीली महसूस हुई. घुटनो को अच्छे से थाम कर उसने करारा धक्का दे मारा और लंड लगभग पूरा अंदर जा घुसा.

माधुरी दीदी को इतना दर्द हुआ के बेध्यानी मे उन्होने कोमल का हाथ कस के पकड़ लिया. अर्जुन ने कुछ देर तक उन्हे पहले की तरह ही सहलाना जारी रखा और फिर उनपर झुक कर लंड थोड़ा खींच कर अंदर बाहर करने लगा. चूत तो अभी भी किसी कोरी लड़की जैसी ही थी. अच्छी रगड़ के साथ लगते धक्को से माधुरी दीदी भी दर्द और थोड़े मज़े मे सिसकती अपना हाथ कोमल की कलाई पर दबाती रही, जो अब आँखे खोलकर कुछ समझने की कोशिश कर रही थी. उसको ये सब दिख रहा था की कैसे अर्जुन दीदी के उपर चढ़कर धक्के लगा रहा था और माधुरी दीदी की गर्दन कभी अकड़ती तो कभी वो अर्जुन को अपने उपर खींच लेती. कुछ देर तक बस हल्के धक्को की ठप्प ठप्प, माधुरी दीदी की हल्की सिसकियाँही सुनाई दे रही थी. फिर अर्जुन की नज़र जब कोमल दीदी पर पड़ी तो वो उसको ही देख रही थी.

जैसे ही अर्जुन के धक्के तेज होने लगे तो माधुरी दीदी के आहे अब खुलकर निकल रही थी..."आ अर्जुन ऐसे ही .. आई मा. श्श्श्.. पूरा अंदर भर .. आ

ज़ोर से मेरे भाई.."

"दीदी मज़ा आ रहा है?" अर्जुन भी किसी घोड़े के जैसे अपने नीचे दबी माधुरी दीदी के गदराए बदन को मसलता बोला.

कोमल और अर्जुन बस एक दूसरे को देख रहे थे. उसने अब बेरहमी से लंबे धक्के लगाने शुरू कर दिए. माधुरी दीदी तो उसकी ताक़त देखते हुए किसी बारिश सी झड़ने लगी लेकिन चूत के ज़्यादा गीले होतेही अर्जुन ने उनके कूल्हे पकड़ उनको घूमने को कहा. वो अब बिना बोले खुलकर ही करना चाहता था.

"पलटो ना दीदी." अभी अभी झड़ी माधुरी दीदी ना चाहते हुए भी पलटी तो उनको घुटने पे कर अर्जुन ने लंड सेट करते हुए करारा धक्का लगा दिया और बच्चेदानी तक सुपाडा भीड़ गया इस गहरे धक्के से.

"आ मा. जानवर मत बन भाई. दुख़्ता है. "सर तो जैसे नीचेही लुढ़क गया था दीदी का. अर्जुन आराम से कर रे."

अर्जुन एक लयबद्ध तरीके से उनको पीछे से ही चोदने लगा और दोनो कूल्हे फैला कर गान्ड के छेद पर अपनी एक उंगिली फेरने लगा.

"तू वहाँ क्यो छेड़ता है भाई. वैसे एक मस्ती सी चढ़ जाती है जब तू वहाँ हाथ लगाता है." माधुरी दीदी किसी गदराई गाए सी खुद अपनी गान्ड हिला रही थी.

"एक बार एक किताब मे देखा था दीदी की लड़की यहा भी ले रही थी." अपनी उंगली नीचे कर चूत के बाहर से गीली करते हुए अर्जुन ने वापिस गान्ड के छेद पर रगड़ते अंदर डालनी शुरू कर दी. एक पौरा ही अंदर गया था की दीदी ने एक पल के लिए गान्ड हिलाना रोक दिया.

"पागल है क्या? जहा तेरी उंगली है वो जगह ये तेरा घोड़े जैस हथियार नही ले सकती. और वो गंदी होती है."

कुछ सोचता अर्जुन बस चुपचाप धक्के मारता रहा. अब तो लंड सुपाडे तक बाहर आ कर अंदर जा रहा था. पीछे पूरी उंगली अंदर बाहर हो रही थी तो दीदी की कमर भी थिरकने लगी. अर्जुन को ऐसे धक्के देने मे दिक्कत होने लगी तो उसने उंगली निकाल ली.

"भाई, आ रहने देता ना.. कोई नही.. आह मैं गई रे.." इतना कह कर वो झड़ने लगी लेकिन अर्जुन हचक कर धक्के लगाता रहा. वो नीचे ढह गई थी लेकिन अर्जुन का नही हुआ था. "भाई कुछ देर रुक जा. जलन होने लगी है."

"दीदी आप ऐसे ही लेटी रहो." बिना कुछ और कहे उसने अपना चूत रस से गीला लंड उनकी गान्ड की फांको मे दबा उनके उपर लेटकर लंबे धक्के देने लगा.

लंड जितनी बार गान्ड के छेद से रगड़ ख़ाता आगे जाता दीदी सिसक उठती. कोई 2 मिनिट बाद ही अर्जुन ने उनकी पीठ और गान्ड की दरार रस से भर दी.

कोमल दीदी ने सारा कार्यक्रम देखने के बाद एक बार प्यार भरी निगाह अर्जुन पर डाली तो उसने हल्के से उनका एक दूध दबा दिया और खड़ा हो कर पाजामा पहन ने लगा.

"ऐसे ही खड़ा हो गया? कोमल देख लेती तो?" माधुरी दीदी ने निगाह दोनो तरफ घूमते थोड़ा हल्के शब्दो मे अर्जुन को झाड़ा.

नीचे झुक कर उसने एक बार कस के दीदी को चूमा और बाथरूम का बोलकर निकल गया. माधुरी दीदी भी एक साइड हो अपने कमीज़ से पीठ को सॉफ कर पसर गई. उनकी चूत इतनी लंबी चुदाई से दुखने सी लगी थी. ऐसे ही उनकी आँख लग गई. इधर अर्जुन एक बार फिर अच्छे से नहा के आया और कोमल दीदी के साथ आ कर चिपक गया.

"नीचे चल." धीरे से इतना बोलकर कोमल दीदी बिना कुछ बोले चल पड़ी और अर्जुन तो हैरान सा उनके पीछे हो लिया. वो तो सोचा था कि दीदी सो चुकी है और अगर जागी भी तो कंट्रोल करके उसके साथ बस सोयेंगी.

दोनो दूसरी मंज़िल के ड्रॉयिंग रूम मे खड़े थे.

"कब से चल रहा है ये सब?" कोमल दीदी का सवाल सुनकर अर्जुन ने कुछ ना छुपाते हुए बोला, "आज चोथी बार था. और आपने तो देखा भी था."

"देखा तो था मैने लेकिन ये तो नही सोचा था कि दीदी और तू इतना आगे हो. मुझे लगा कि तुझे मैं पसंद हूँ."

कोमल दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने उन्हे अपनी बाहो मे लेते कहा, "मैने कभी मना किया क्या दीदी आपको? और माधुरी दीदी तो आपसे भी बड़ी है उनका भी हक़ है मेरे पर."

कोमल दीदी ने भी अपनी बाहें उस पर कस ली और बोली, "हा तो मैं तो शायद उनके जैसी नही लगती तुझे?'

अपनी दीदी का नखरा देख वो मुस्कुराते हुए उनका चेहरा थाम अपने होंठ उनके मूह के पास ले आया, जिन्हें बिना कुछ बोले कोमल दीदी ने भी अपने होंठो मे भर लिया.

कुछ देर ऐसे ही चूमने के बाद अर्जुन बोला, "दीदी ये हम आराम से करेंगे ऐसे जल्दबाज़ी मे नही. आप बस अभी आराम से सो जाए उपर चलकर फिर जब भी आप बोलेंगी मैं आपके पास होऊँगा." साथ ही उनके कूल्हे सहला दिए.

थोड़ा शरमाती सी कोमल अपने छोटे भाई की बात समझ कर गर्दन हिला वापिस चलने लगी तो अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ लिया. "लेकिन सोना मेरे साथ उपर चलकर." और फिर दोनो उपर आ गये. कोमल दीदी को पीछे से पकड़ कर वो चिपक के उनसे लिपट गया. थोड़ी देर उनके आज़ाद बड़े बूब्स मसलता वो उन्हे अपने से चिपकाए ही गहरी नींद मे जा चुका था.
 
"दीदी आपकी स्किन कितनी मुलायम है लेकिन यहा से ये कितने टाइट है. ऐसा क्यो?" अर्जुन ने होंठ हटा कर उनके दोनो बड़े दूध मसलते हुए कहा तो वो अंधेरे मे मुस्कुराती बोली, "भाई ये भी ढीले हो जाते है बस एक लंबे अरसे तक कोई इन्हे मसले और पीले तो. लेकिन मैं चाहती हूँ मेरी शादी होने तक बस तू इन्हे नरम कर दे." और फिर भावुक हो कर अर्जुन को चूमने लगी और खुद ही उसके हाथ से अपने मोटे चुचे उस से मसलवाने लगी. "इनको अच्छे से रगड़ और दबा.

कभी कभी तो सोचती हूँ हर रात तेरे कमरे मे चली आऊँ जब तू उपर नही होता." सिसकती सी माधुरी दीदी अब बुरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और एक हाथ से अपनी चूत को सलवार के उपर से रगड़ रही थी.

"दीदी आप कपड़े खोलो कही फिर ऐसा ना हो के बीच मे रह जाए. या फिर नीचे चलते है वहाँ ज़्यादा सुरक्षित है." अर्जुन ने समझाते हुए कहा.

माधुरी दीदी ने अपने दोनो हाथो से सलवार नीचे कर दी और कमीज़ उपर चढ़ा लिया. "ये आज बाहर नही निकालती अगर कोमल जाग भी जाती

मुझे तो बस नीचे करना है." दोनो के उपर एक चादर करते हुए उन्होने अपने दोनो दूध बेपर्दा कर लिए थे. पूरी छाती पर जैसे वो दो बड़े चुचे ही थे, और

उतना ही बाहर को लटके हुए. अर्जुन ने पाजामा घुटनो से नीचे कर माधुरी दीदी की टांगे चौड़ी कर अपना लंड उनकी चिकनी पानी बहाती चूत पर हल्के हल्के घिसना शुरू कर दिया.

"भाई इन्हे अच्छे से चूस." माधुरी दीदी के चुचे उन्हे परेशान कर रहे थे जिनपर अब अर्जुन झुक कर मूह रख चुका था.

निपल मूह मे ले चुसकते हुए दूसरे वाले को वो दबाता अपनी कमर भी उनकी चूत के बीच हिला रहा था. "दीदी आज आप पहले से ही गीली हो?"

"अर्रे जितनी बार तुझे देखती हूँ तभी ये पानी बहाने लगती है. इसको अब तेरी आदत होने लगी है. अब खोल दे इसका मूह ज़रा." आज उनपर शायद काम का नशा पूरा हावी हो चुका था. अर्जुन भी चाहता था कि जल्दी ही फारिग हो जाए. दिन मे 3 बार उसका खड़ा हो कर बैठा था तो अभी ज़्यादाही फूल चुका था.

"लो दीदी. बस चीखना मत." उसकी बात सुनकर माधुरी दीदी ने अपने मूह पर तकिये का सीरा रख लिया और अर्जुन ने अपने मोटे सुपाडे को चूत पर टीका कर एक मध्यम सा धक्का लगा दिया. "कच" और हर बार की तरह माधुरी दीदी की चूत इस तगड़े लंड के अंदर जाने से रब्बर के छल्ले की तरह फैल कर लंड के इर्द-गिर्द चिपक गई. "आ दीदी. अंदर से ये आज ज़्यादा गरम है." गीली गरम चूत में लंड 4 इंच तक फिसल गया था. थोड़ी देर उनके मोटे दूध दबाते वो

उनके कान को चूमने लगा.

दीदी ने आज अच्छे से बर्दाश्त कर लिया था उसका लंड. कुछ देर बाद उन्होने होले से उसके कान मे कहा, "पूरा डाल दे इस बार."

अर्जुन ने अभी तक तो उतने लंड से ही धक्के नही लगाए थे. दीदी की बात सुनकर वो चुपचाप सा उनका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा. "डाल दे फिर सीधा काम शुरू कर देना." एक बार फिरसे इतना बोलकर अब उन्होने तकिया वापिस मूह पर रख उसके चुतड़ों पर थपकी सी दी जैसे कह रही हो के चल चढ़ाई कर दे.

अर्जुन ने हल्का सा लंड पीछे किया तो उसको भी चूत गीली महसूस हुई. घुटनो को अच्छे से थाम कर उसने करारा धक्का दे मारा और लंड लगभग पूरा अंदर जा घुसा.

माधुरी दीदी को इतना दर्द हुआ के बेध्यानी मे उन्होने कोमल का हाथ कस के पकड़ लिया. अर्जुन ने कुछ देर तक उन्हे पहले की तरह ही सहलाना जारी रखा और फिर उनपर झुक कर लंड थोड़ा खींच कर अंदर बाहर करने लगा. चूत तो अभी भी किसी कोरी लड़की जैसी ही थी. अच्छी रगड़ के साथ लगते धक्को से माधुरी दीदी भी दर्द और थोड़े मज़े मे सिसकती अपना हाथ कोमल की कलाई पर दबाती रही, जो अब आँखे खोलकर कुछ समझने की कोशिश कर रही थी. उसको ये सब दिख रहा था की कैसे अर्जुन दीदी के उपर चढ़कर धक्के लगा रहा था और माधुरी दीदी की गर्दन कभी अकड़ती तो कभी वो अर्जुन को अपने उपर खींच लेती. कुछ देर तक बस हल्के धक्को की ठप्प ठप्प, माधुरी दीदी की हल्की सिसकियाँही सुनाई दे रही थी. फिर अर्जुन की नज़र जब कोमल दीदी पर पड़ी तो वो उसको ही देख रही थी.

जैसे ही अर्जुन के धक्के तेज होने लगे तो माधुरी दीदी के आहे अब खुलकर निकल रही थी..."आ अर्जुन ऐसे ही .. आई मा. श्श्श्.. पूरा अंदर भर .. आ

ज़ोर से मेरे भाई.."

"दीदी मज़ा आ रहा है?" अर्जुन भी किसी घोड़े के जैसे अपने नीचे दबी माधुरी दीदी के गदराए बदन को मसलता बोला.

कोमल और अर्जुन बस एक दूसरे को देख रहे थे. उसने अब बेरहमी से लंबे धक्के लगाने शुरू कर दिए. माधुरी दीदी तो उसकी ताक़त देखते हुए किसी बारिश सी झड़ने लगी लेकिन चूत के ज़्यादा गीले होतेही अर्जुन ने उनके कूल्हे पकड़ उनको घूमने को कहा. वो अब बिना बोले खुलकर ही करना चाहता था.

"पलटो ना दीदी." अभी अभी झड़ी माधुरी दीदी ना चाहते हुए भी पलटी तो उनको घुटने पे कर अर्जुन ने लंड सेट करते हुए करारा धक्का लगा दिया और बच्चेदानी तक सुपाडा भिड़ गया इस गहरे धक्के से.

"आ मा. जानवर मत बन भाई. दुख़्ता है. "सर तो जैसे नीचे ही लुढ़क गया था दीदी का. अर्जुन आराम से कर रे."

अर्जुन एक लयबद्ध तरीके से उनको पीछे से ही चोदने लगा और दोनो कूल्हे फैला कर गान्ड के छेद पर अपनी एक उंगिली फेरने लगा.

"तू वहाँ क्यो छेड़ता है भाई. वैसे एक मस्ती सी चढ़ जाती है जब तू वहाँ हाथ लगाता है." माधुरी दीदी किसी गदराई गाए सी खुद अपनी गान्ड हिला रही थी.

"एक बार एक किताब मे देखा था दीदी की लड़की यहा भी ले रही थी." अपनी उंगली नीचे कर चूत के बाहर से गीली करते हुए अर्जुन ने वापिस गान्ड के छेद पर रगड़ते अंदर डालनी शुरू कर दी. एक पौरा ही अंदर गया था की दीदी ने एक पल के लिए गान्ड हिलाना रोक दिया.

"पागल है क्या? जहा तेरी उंगली है वो जगह ये तेरा घोड़े जैस हथियार नही ले सकती. और वो गंदी होती है."

कुछ सोचता अर्जुन बस चुपचाप धक्के मारता रहा. अब तो लंड सुपाडे तक बाहर आ कर अंदर जा रहा था. पीछे पूरी उंगली अंदर बाहर हो रही थी तो दीदी की कमर भी थिरकने लगी. अर्जुन को ऐसे धक्के देने मे दिक्कत होने लगी तो उसने उंगली निकाल ली.

"भाई, आ रहने देता ना.. कोई नही.. आह मैं गई रे.." इतना कह कर वो झड़ने लगी लेकिन अर्जुन हचक कर धक्के लगाता रहा. वो नीचे ढह गई थी लेकिन अर्जुन का नही हुआ था. "भाई कुछ देर रुक जा. जलन होने लगी है."

"दीदी आप ऐसे ही लेटी रहो." बिना कुछ और कहे उसने अपना चूत रस से गीला लंड उनकी गान्ड की फांको मे दबा उनके उपर लेटकर लंबे धक्के देने लगा.

लंड जितनी बार गान्ड के छेद से रगड़ ख़ाता आगे जाता दीदी सिसक उठती. कोई 2 मिनिट बाद ही अर्जुन ने उनकी पीठ और गान्ड की दरार रस से भर दी.

कोमल दीदी ने सारा कार्यक्रम देखने के बाद एक बार प्यार भरी निगाह अर्जुन पर डाली तो उसने हल्के से उनका एक दूध दबा दिया और खड़ा हो कर पाजामा पहन ने लगा.

"ऐसे ही खड़ा हो गया? कोमल देख लेती तो?" माधुरी दीदी ने निगाह दोनो तरफ घूमते थोड़ा हल्के शब्दो मे अर्जुन को झाड़ा.

नीचे झुक कर उसने एक बार कस के दीदी को चूमा और बाथरूम का बोलकर निकल गया. माधुरी दीदी भी एक साइड हो अपने कमीज़ से पीठ को सॉफ कर पसर गई. उनकी चूत इतनी लंबी चुदाई से दुखने सी लगी थी. ऐसे ही उनकी आँख लग गई. इधर अर्जुन एक बार फिर अच्छे से नहा के आया और कोमल दीदी के साथ आ कर चिपक गया.

"नीचे चल." धीरे से इतना बोलकर कोमल दीदी बिना कुछ बोले चल पड़ी और अर्जुन तो हैरान सा उनके पीछे हो लिया. वो तो सोचा था कि दीदी सो चुकी है और अगर जागी भी तो कंट्रोल करके उसके साथ बस सोयेंगी.

दोनो दूसरी मंज़िल के ड्रॉयिंग रूम मे खड़े थे.

"कब से चल रहा है ये सब?"

कोमल दीदी का सवाल सुनकर अर्जुन ने कुछ ना छुपाते हुए बोला, "आज चोथी बार था.

और आपने तो देखा भी था."

"देखा तो था मैने लेकिन ये तो नही सोचा था कि दीदी और तू इतना आगे हो. मुझे लगा कि तुझे मैं पसंद हूँ."

कोमल दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने उन्हे अपनी बाहो मे लेते कहा, "मैने कभी मना किया क्या दीदी आपको? और माधुरी दीदी तो आपसे भी बड़ी है उनका भी हक़ है मेरे पर."

कोमल दीदी ने भी अपनी बाहें उस पर कस ली और बोली, "हा तो मैं तो शायद उनके जैसी नही लगती तुझे?'

अपनी दीदी का नखरा देख वो मुस्कुराते हुए उनका चेहरा थाम अपने होंठ उनके मूह के पास ले आया, जिन्हें बिना कुछ बोले कोमल दीदी ने भी अपने होंठो मे भर लिया. कुछ देर ऐसे ही चूमने के बाद अर्जुन बोला, "दीदी ये हम आराम से करेंगे ऐसे जल्दबाज़ी मे नही. आप बस अभी आराम से सो जाए उपर चलकर फिर जब भी आप बोलेंगी मैं आपके पास होऊँगा." साथ ही उनके कूल्हे सहला दिए.

थोड़ा शरमाती सी कोमल अपने छोटे भाई की बात समझ कर गर्दन हिला वापिस चलने लगी तो अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ लिया. "लेकिन सोना मेरे साथ उपर चलकर." और फिर दोनो उपर आ गये. कोमल दीदी को पीछे से पकड़ कर वो चिपक के उनसे लेट गया. थोड़ी देर उनके आज़ाद बड़े बूब्स मसलता वो उन्हे अपने से चिपकाएही गहरी नींद मे जा चुका था.
 
सिनिमा - एक और सफ़र

मन के अलार्म से अर्जुन की आँख खुली तो अपने हाथो पर मुलायम बड़ा और माँस से भरपूर अंग पाया. कोमल दीदी अपने भारी पिछवाड़े को उसके लंड से दबाए मीठी नींद के सफ़र मे थी और उनका एक बड़ा उभार पूरा बाहर अर्जुन के हाथ मे संभला हुआ था. ऐसे दृश्य से एक मीठी सी झुरजुरी अर्जुन के दिल और लंड दोनो मे हुई. अभी बड़ी बहन के हल्के फूले गाल को चूमता वो उठकर नीचे बने बाथरूम मे चल दिया. कोई 15 मिनिट बाद अपने घर के बाहर निकला तो सामने प्रीति को तयार खड़े देख ठिठक गया.

"क्या बात? इतनी जल्दी हम फिर मिल रहे है?" उसने हल्के कदमो से उसकी तरफ बढ़ते कहा तो वो सीधाही आगे की तरफ चलने लगी.

"मैं तो 4:30 बजे से हमारे घर से देख रही थी. तुम ही 20 मिनिट लेट हो आज." अर्जुन को उसके समय से लेट होने का आभास कराती वो हल्के कदमो से दौड़ रही थी. अर्जुन कुछ सोचता सा साथ मे हो लिया. प्रीति कल शाम की तरह बिल्कुल नही थी.

"वो मैं 5 से पहले ही निकलता हूँ लेकिन ना कोई पक्का रास्ता है ना कोई ऐसा पक्का समय." अर्जुन ने बस इतना कहा.

"रास्ते पक्के ना हो लेकिन लक्ष्य और उनसे जुड़े इंसान होने चाहिए." अर्जुन बस उसकी सुनता हुआ साथ दौड़ता रहा.

कुछ देर तक दोनो ही चुप थे और बस दौड़ते जा रहे थे. प्रीति ने कोई 5 मिनिट बाद कहा. "वैसे तुम्हे क्यो नही लगा के मैं इतनी सुबह नही आ सकती? पार्क मे भी तो मिले थे ना?"

"हा. शायद संयोग था और ये भी है के एक अकेली लड़की हल्के अंधेरे मे ऐसी वीरान जगह नही जाती, आमतौर पर."

"अकेली कहाँ हूँ मैं? उस दिन तुम्हारे पीछे थी और आज तुम्हारे साथ." हंसते हुए उसने जवाब दिया तो

अर्जुन सब समझते हुए मुस्कुराते सा उसकी और देख वैसे ही हल्के पाव से आगे बढ़ाता रहा. "वैसे एक बात तो है प्रीति. ये बात मैं कई बार सोचता हूँ. देखो जैसे अभी किसी सफेद गुलाब सी हो, फिर जब धूप खिलती है तो बिल्कुल गुलाबी होने लगती हो. सबके सामने तुम्हारे पास आने लगता हूँ तो पीले गुलाब की तरह सहम जाती हो और अकेले मे जब मेरी बाहों मे होती हो तो किसी सुर्ख लाल गुलाब सी हो जाती हो. भगवान ने शायद किसी फुलो के बाद मे बैठकर तुम्हे तयार किया होगा." ये बात अर्जुन के प्रेम ने कैसे कह दी खुद उसको नही पता चला और अब वो दौड़ नही रहे थे बस पेड़ो के नीचे जुड़े हुए से तेज चल रहे थे.

"ऐसे भी कोई तारीफ करता है? कितने गये गुज़रे आशिक़ सी बातें करते हो तुम." इतराते हुए प्रीति ने बात पूरी भी नही की थी की अर्जुन ने अपनी एक बाह उसके गले मे डाल कर साथ ही चिपका लिया.

"ये हॉलीवुड की फिल्म जैसे इज़हार करू? जैसे कल किया था" इतना बोलते ही प्रीति एक बार अर्जुन के चेहरे को देखती उसकी पकड़ से निकल आगे दौड़ गई. "हाथ नही आने वाली मैं ऐसे मिस्टर. और ये हॉलीवुड भी तुम्हारे बस का नही." उसका दिल जोरो से धड़क गया था अर्जुन की इतनी खुली हरकत और हिम्मत से लेकिन दोनो वहाँ आ चुके थे जहा अर्जुन पहले दौड़ने आता था, खाली पड़े अगले सेक्टर मे. एक बार अच्छे से साँस भर के अर्जुन ने रफ़्तार बढ़ाई और फिर से प्रीति को पकड़ लिया.

"अब देखो तुम हॉलीवुड." इतना बोलकर उसने प्रीति को अपनी तरफ घुमा कर कस के चूम लिया. एक पल को तो प्रीति ठगी सी रह गई फिर उसकी बाजू भी अर्जुन के शरीर पर कस गई. दोनो अलग हुए तो अर्जुन हल्के हल्के मुस्कुरा रहा था लें प्रीति किसी नशे मे उसके चेहरे को देखती रही. फिर शरमाती सी गर्दन नीचे कर खड़ी हो गई.

"अब तुम्हे क्या हो गया?" अर्जुन ने उसकी झुकी नज़र की वजह से पूछा.

"तुम हमेशा अपने दिल की कर लेते हो. और फिर मेरा क्या?"

प्रीति की बात समझते हुए अर्जुन ने कहा, "ये दूर ऐसीही बनी रहने दो ना प्रीति. एक बार अगर ये खींच गई और हम जुड़ गये तो फिर थोड़ा सा भी अलगाव बर्दाश्त नही होगा. तुम मेरे से ज़्यादा समझदार हो." वो उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए बोला.

"अर्जुन, अगर हमारे पास आने वाला कल ही ना हो तो? और अगर मैं खुद तुमसे ये कहूं की मुझे जी-भर के प्यार करो?" ये 2 सवाल प्रीति ने कर तो दिए थे लेकिन अर्जुन के दिल पे जैसे हथौड़ा पड़ा हो. उसने कस के प्रीति को दिल से लगा लिया. "फिर से ये बात मत कहना कभी. तुम जैसा चाहोगी मैं वैसा करूँगा बस ये मत कहना के हमारा कोई कल नही होगा. मेरा तो सबसे बड़ा लक्ष्य ही तुम्हारे साथ जीने का है." प्रीति का दिल इतना सुनकर ही शांत सा हो गया था. वो खुद भी जानती थी की अर्जुन उस से कितना प्यार करता है बेशक कुछ साल दोनो दूर रहे लेकिन ये सख़्त नौजवान उसके लिए वैसे ही पिघलता और तड़प्ता है जैसे बचपन मे था.

"अब चलो यहा से देखो रोशनी भी हो रही है." दिल तो नही था उसका भी इन बाहों के घेरे से निकलने का लेकिन फिर दोनो वापिस चल दिए घर की तरफ.

"स्टेडियम साथ चलना आज मेरे." प्रीति ने बस इतना कहा घर पहुचने पर और अर्जुन उसको घर छोड़कर अपने घर की ओर मुस्कुराता आ गया.

दूध और अपने दादाजी से फारिग हो कर वो पिछले आँगन मे आया तो वहाँ उसकी मा रेखा जी और ललिता जी सफाई मे लगी थी. एक काला ढीला ब्लाउस और गहरी हरियाली साड़ी पहनकर ललिता जी फर्श पर पानी डाल रही थी. उनके बड़े बड़े मांसल उरोज कपड़े को फाड़ कर बाहर ही निकलने को तड़प से रहे थे. इधर गुलाबी ब्लाउस और वैसी साड़ी मे झुक कर तीली वाली झाड़ू से पानी बुहारती रेखा जी का यौवन भी ज़हर ही था. उनकी गोरी पिंडलिया ऐसे बैठने की वजह से नुमाया हो रही थी और बार बार घुटनो से टकराते वो गोरे खरबूजे तो अलग ही काम का रंग फैला रहे थे.

अर्जुन सोचता रहा के किसकी तरफ ध्यान दे लेकिन फ़ैसला ना कर बस वो दोनो के मादक शरीर को अपनी आँखों मे भरने सा लगा. ये सब उसके साथ पहले कभी नही होता था लेकिन जाने क्या नया रोग था की उसको अपनी मा और ताईजी भी अब एक खूसूरत महिला की तरह ही नज़र आने लगी थी. खुद पर काबू रख वो बाथरूम की तरफ बढ़ा तो मा की आवाज़ आई, "ये एक बाल्टी दे ज़रा भरी हुई इधर. फिर नहा लेना मैं कपड़े ला दूँगी."

अर्जुन ने अंदर ताजी भरी बाल्टी दरवाजे के पास रख दी. जैसे ही रेखा जी ने खड़े हो कर वो बाल्टी उठाई अर्जुन को उनके उभार वहाँ तक दिख गये जहा की त्वचा गहरी और गोल होती है.

रेखा जी ने भी अपने बेटे की नज़र पढ़ ली थी. थोड़ा शरम और प्यार से बस वो बाल्टी उठा चल दी.
 
अर्जुन दरवाजा बंद कर अपने नहाने के कार्यक्रम मे लग गया, हल्के खड़े उभार के साथ. उसके मन मे भी कुछ विचार चल रहा था. मा को भी उसने रात का सोने का बोल दिया था और फिर कोमल दीदी को भी. कल अलका दीदी का इम्तिहान है और परसो ऋतु दीदी का. और कल शायद चाचा जी भी आएँगे. हर तरफ दुविधा ही तो थी. क्या करे और कैसे. बस ऐसे ही वो बाहर आ गया और तार पर टाँगे अपने कपड़े लेकर कमरे मे पहन ने लगा.

"तयार भी हो गया तू?" माधुरी दीदी चलती हुई उसके कमरे मे आ गई. उनके उभार इस वक्त भी पूरे हिल रहे थे. अर्जुन की नज़र अपने चुचो पर देख कर वो हँसती हुई उसके सर पर थपकी मारती बिस्तर पर बैठ गई. "नज़र हर समय ना घुमाया कर. हर जगह अकेले नही होते." अपनी आकर्षक मुस्कान के साथ उन्होने ये कहा तो अर्जुन ने खड़े हुए ही थोड़ा झुक कर उनका एक उभार सूट के उपर से पकड़ लिया. थोड़ा सहला के निपल को हल्का दबाया और फिर छोड़ दिया.

दीदी की तो आँखेही बंद हो गई थी इस मज़े भरी हरकत से.

"यही देख रहा था कि ये इतना हिल क्यो रहे है. पता चल गया के पिंजरा नही है अभी." शरारत से अर्जुन ने कहा तो माधुरी

दीदी ने भी उसकी पैंट के उपर हाथ फेरते कहा, "पिंजरा अच्छा नही होता ज़्यादा देर तक. अपने इसका ही हाल देख ले कैसे तड़प रहा है."

"रात मे मैं इसको पूरा आराम दे देता हूँ बस दिन के समयही थोड़ा सख्ती बरतनी पड़ती है दीदी. आप ही कहती है ना के हर समय ठीक नही होता." और एक बार उनके होंठ चूमकर आने का कारण पूछा.

"सोचा था कि आज मैं उपर नहा लेती हूँ, और तू भी अच्छे से रगड़ देगा लेकिन तू तो नहा के तयार भी हो गया तो मेरा आना बेकार हो गया." नखरे से अपनी बात कहती माधुरी दीदी ने चाहत से एक बार उसके चेहरे को देखा.

"आज काम है दीदी थोड़ा लेकिन कल पक्का वादा है के साथ मे ही नहाउन्गा आपके." उसको पता था कि कुछ देर और रुका तो सैयम भी जाता रहेगा तो जूते पहन कर नीचे की ओर चल दिया. माधुरी दीदी बाथरूम मे घुस गई मन मार के. अर्जुन ये भी सोच रहा था कि दीदी आज कुछ ज़्यादाही देर सो गई. नही तो 7:30 बजे तक तो वो रसोईघर मे काम कर रही होती है रोज. फिर नीचे आया तो कोमल दीदी चूल्हे पर काम कर रही थी और साथ मे ताईजी . अपने कमरे से सॉफ कपड़े पहनकर आती\ रेखाजी भी दिखी तो अर्जुन वही टेबल पर बैठ गया.

"हो गया तू तयार?" साथ बैठते हुए ऋतु दीदी ने पूछा तो अर्जुन ने अपनी बहन की तरफ देखा. गीले बाल, बड़ी आँखें, शरीर से आती महक. खूबसूरत.

"बस कर सब देख रहे है." बिल्कुल धीमे से लेकिन सख़्त आवाज़ मे ऋतु दीदी ने कहा तो उसका ध्यान हटा. दीदी अब मुस्कुरा भी रही थी. "आप सच मे बहुत सुंदर हो."

अर्जुन ने भी धीमी आवाज़ मे ये बात कही तो मुस्कुराती ऋतु दीदी ने बस पलके झुका ली.

"तुम दोनो मेरे बिना ही लग गये.?" अलका दीदी ने आते ही कहा तो दोनो ने खाली प्लेट दिखा दी. "अभी शुरूही कहाँ किया." अर्जुन ने कहा तो दोनो बहने हँसने लगी.

थोड़ी देर तक लगभग सभी सदस्य नाश्ता कर चुके थे. बस माधुरी दीदी, कोमल दीदी, रेखा और ललिता जी ही रह गई थी. अर्जुन वहाँ से उठकर थोड़ी देर के लिए ऋतु दीदी के कमरे मे ही लेट गया, जहा अभी कोई नही था. कोई 20-25 मिनिट हुए थे की प्रीति की आवाज़ सुनाई दी. आँगन मे वो शायद दादीजी से बात कर रही थी

फिर ऋतु दीदी और अलका दीदी के साथ कमरे मे आई तो अर्जुन आँखें मूंद के लेटने का नाटक करने लगा.

"ये यहा सो रहा है? अर्जुन, चल बिस्तर खाली कर." ऋतु दीदी उसको झकझोरते हुए बोली.

"उठ रहा हूँ ना थोड़ी देर बस." अर्जुन ने इतना कहा तो ऋतु दीदी ने उसको परे धकेल दिया, बिस्तर के किनारे पर. "बैठो यार. पड़ा रहने

दो इस आलसी को यही."वो अर्जुन की पीठ से टेक लगाती बैठी और दोनो को भी बिठा लिया बिस्तर पर.

"तो फिर आपकी ट्रेडमिल पक्की?" प्रीति ने ये कहा तो ऋतु दीदी सोचती सी बोली, "यार वो तो ठीक है आज आ जाएगी लेकिन उसको रखेंगे कहा? ऊपर वाले ड्रॉयिंग रूम मे तो बिल्कुल नही. कोई ऐसी जगह जहा इतमीनान से रन्निंग और एक्सर्साइज़ कर सके. और एक शीशा भी हो." उनकी बात पर दोनो लड़कियों ने सर हिला दिए.

अर्जुन खामोश पड़ा सुन रहा था. जब कोई अगली आवाज़ ना आई तो सीधा खड़ा होता बोल पड़ा, यहा ऋतु दीदी लुढ़क गई.

"वो उपर ना चाचा वाला कमरा ठीक है आप सबके लिए. और दीदी किसी का सहारा नही लेना चाहिए." बाहर भाग गया.

"ये मार खाएगा. हाए सर बच गया मेरा." ऋतु दीदी उसकी हरकत पर हल्का गुस्सा हुई फिर सोच कर बोली, "सही कहा इसने तो. चाचा जी वाले कमरे भी तो सॉफ और खुले है. वही ठीक रहेंगे और वो पीछे भी है तो कोई शोर नही होगा."

"वो हमेशा ही सही बात कहता है." ये बात प्रीति ने कही तो अलका दीदी ने सर पे चपत लगाते कहा, "बड़ा पसंद है तुझे. सावन की आँधी हो गई है तू प्रीति.

किसी दिन जब ग़लत करेगा फिर पूछूंगी." आँख मारते हुए उन्होने कहा तो ऋतु दीदी ने भी ताली लगाई.

"मैं तो उसको खुद कह चुकी हूँ. लेकिन देख लो फिर भी नही आगे बढ़ता." अब प्रीति ने इतना कहा तो दोनो ही उसके हंसते चेहरे को देख सन्न से हो गये.

"तूने उसको कह दिया? और उसने मना कर दिया?" ऋतु दीदी ने चौंकते हुए पूछा.

"हा मैने तो कह दिया क्योंकि अब सच मे मुझे उसकी ज़रूरत सी होने लगी है. लेकिन उसको लगता है के अभी ये सब नही. हा वो प्यार तो करता ही है लेकिन उसको पता नही कैसा डर है." प्रीति सोचती सी बोल रही थी.

"शाबाश. तू दिलेर लड़की है इस अलका की तरह डरपोक नही. आगे पीछे घूम लेगी लेकिन पास आते ही गला बंद हो जाता है." ऋतु दीदी ने पासा अलका की तरफ फेंक दिया.

"2 दिन बाद बताउन्गी की कोंन कितना दिलेर है. देख लेना तुम दोनो का नंबर मेरे बाद आएगा." अलका दीदी ने भी थोड़े गरूर से ये बात कही तो ऋतु दीदी की हँसी छूट गई.. प्रीति को ये हँसी कुछ कहती सी लगी तो उसने पूछही लिया. "मतलब.. आप.. पहले ही?"

"वाह. बड़ी देर से सही लेकिन तूने ही समझा तो सही. हा. जिस दिन तेरे घर थी मैं."

"मतलब पैर नही मुड़ा था. कोई चोट नही लगी थी और वहाँ रहकर बस आप सबकी नज़रो से बची रही." एक एक बात समझती और बोलती प्रीति जोरो से मुस्कुराती गई.

"कमीनी, मुझे तो लगा के तूने रात भर उसके साथ सिर्फ़ उपर से मज़े किए होंगे. तभी तू आते ही सो गई." अब अलका दीदी ऋतु से चिपक गई.

"हा रे. बता नही सकती के कैसे कर लिया. लेकिन ऐसा लगता है के एक बार मौत देख कर बस सीधा स्वर्ग मे ही चली गई थी. फिर जब होश आया तो दर्द और थकान. उसने दर्द की गोली ना दी होती तो मैं फँसही गई थी. लेकिन प्यार से किया चाहे जितना दर्द हुआ हो. अब हैही ऐसा तगड़ा के कोई भी हो एक बार तो जान पक्का ही निकलेगी." याद सा करते हुए ऋतु ने ये बात कही तो प्रीति भी उनकी बातों मे खोई उस दिन महसूस किए उस सख़्त और मोटे लिंग को याद करने लगी.

"दीदी, वो तो कपड़ो पर से इतना बड़ा लगता है." नासमझी मे प्रीति ने अपने हाथो के इशारे से ऋतु दीदी की तरफ अर्जुन का लंड आकार बताया तो वो खिलखिला उठी.

"तेरी-मेरी कलाई जैसा है और आगे से तो और भी वाइड." उन्होने ही अब सच्चाई बता दी.

"यार ऋतु, ये तो इतनी सी ही है." अलका ने थोड़ा फिकर से अपनी मुनिया का आकर उंगलियो से बनाते कहा तो प्रीति ने भी इस बात का समर्थन किया.

"तभी तो कहा के एक बार जान जाएगी. लेकिन बुक्स मे नही पढ़ा क्या वेजाइना मसल्स के बारे मे? ये रब्बर जैसे स्ट्रेच और फिर वापिस कॉमप्रेस हो जाती है. हाइमेन टाइम तो पेन होता ही है नॉर्मल इंटरकोर्स मे. और इसका तो किसी डोंकी जैसा है, एक-दो साल मे पूरा डोंकी हो जाएगा."

ऐसे ही इनकी काम-शिक्षा और व्यथा चलती रही इधर अर्जुन दादाजी को बता कर 9:15 पर घर से निकल लिया.
 
ऐसे ही इनकी काम-शिक्षा और व्यथा चलती रही इधर अर्जुन दादाजी को बता कर 9:15 पर घर से निकल लिया.

काली कमीज़ और तंग सफेद पाजामी पहने मंजुला कुछ झिझक और शरम से अर्जुन को खुद की तरफ देखते पा कर उसके स्कूटर की ओर चल दी.

"आज शायद मैं एक नई मंजू को देख रहा हूँ. पहले तो ये कभी नज़र नही आई." एक बार और निहार कर अर्जुन ने अपने पीछे की और जाती मंजू से कहा तो वो हल्का सा मुक्का जमाती पिछली सीट पर बैठ गई. चेहरे पर चुन्नी कर ली थी. "अब चलो यहा से. मैं नही चाहती कोई देख ले." इतना बोलकर उसने एक हाथ उसके कंधे पर रख लिया और अर्जुन ने सिनेमा की तरफ स्कूटर का रुख़ कर लिया.

"वैसे तो मुझे तुम रोजही सही दिखती हो लेकिन शायद आज कुछ ख़ास बात है." अर्जुन छेड़ता सा बोला.

"ऐसी कोई बात नही है. अब सलवार-कमीज़ मे तो बॅस्केटबॉल खेलने से रही. तुम सीधा सिनेमा चलो." शरमाती मुस्काती वो इतना बोली और इधर अर्जुन ने एक हाथ से उसका हाथ अपनी कमर की तरफ कर लिया. "आराम से बैठो, संभाल कर." उसकी इस हरकत से तो मंजुला खामोशही रह गई. कुछ समय बाद दोनो सिनेमा के सामने थे.

स्कूटर को सामने पार्किंग मे लगा कर दोनो साथ चल दिए टिकेट खिड़की की ओर. यहा इस समय इतनी भी ख़ास भीड़ नही थी. जो भी थे कॉलेज जाने वाले ही लोग थे. दिल तो पागल है फिल्म चल रही थी इस सिनेमा मे. अर्जुन ने 2 टिकेट बाल्कनी की ली तो मंजू चोंक कर उसकी और देखने लगी.

"कुछ ग़लत कह दिया क्या मैने?" अर्जुन को समझ नही आया.

"वो बाल्कनी की क्यो? हॉल की ठीक थी ना." मंजू ने अपनी शंका बताई.

"हाहाहा. मैं ज़्यादा सिनेमा नही आया हूँ. लेकिन इतना ज़रूर पता है की टूटी सीट पर फिल्म नही देख सकते."

अर्जुन की बात समझकर थोड़ा सा चिंतन ख़तम हुआ. वो तो कुछ और सोचने लगी थी और उस सोच की वजह से ही एक अलग सा डर उत्पन्न हो गया था उसके दिल मे. दोनो फिर साथ मे ही दरवाजे की और आए जहा टिकेट चेक करवा कर उपर की और बढ़ चले. यहा अर्जुन ने देखा था का बाल्कनी का रास्ता हॉल के रास्ते से अलग जाता है. बाहर की तरफ अलग सीढ़ियों से तो वो दोनो उपर हो लिए. पर्दे पर कोई संदेश चल रहा था और हल्की रोशनी थी. ये सबसे आख़िर मे ही आए थे तो दरवाजा बंद हो चुका था. बाल्कनी मे अच्छी सीट लगी थी

बढ़ते क्रम मे और सिर्फ़ 4 लोगही थे उनके सिवा वहाँ. 2 प्रेमी युगल जो 2-3 कतार दूर हो कर चिपके बैठे थे. अर्जुन ने सबसे पीचली कतार को ही चुना. जहा से परदा बिल्कुल सॉफ नज़र आ रहा था.

"बैठ जाओ अब मेडम जी." अर्जुन ने हल्के से कहा तो अंधेरे की वजह से मंजू जाँच-परख कर उसके बगल वाली सीट पर बैठ गई. पिक्चर शुरू हो गई तो अब

सब शांत थे.

"तुम पहले भी आई हो यहा?" अर्जुन ने धीमी आवाज़ मे मंजू के कान की तरफ ये बात कही तो उसके होंठ हल्के से टकरा गये वहाँ. मंजू को झुरजूरी हुई लेकिन उसने ध्यान हटाते हुए कहा, "3 साल मे दूसरी बार इधर आई हूँ. एक बार सीनियर के साथ आई थी लेकिन बकवास फिल्म थी. ये अच्छी है सुना तो आ गई आज."

दोनो के हाथ सीट की हत्थी पर टिके थे तो आपस मे स्पर्श होने लगा. चुपचाप नज़र पिक्चर पर गड़ाए थे की मंजू की नज़र उनसे 3 कतार आगे बैठे जोड़े पर गई जो अंधेरे मे मूह मिला रहे थे. नीचे का ज़्यादा कुछ दिख नही रहा था लेकिन लड़के की हरकत से लग रहा था कि वो अपनी प्रेमिका का स्तन-मर्दन कर रहा है.

साँसे तेज होने लगी मंजू की भी इस दृश्य से. अर्जुन ने इतना सब खामोश देखा तो एक बार मंजू की ओर निगाह करी जो किसी जगह चिपकी सी थी, फिर जब पीछा किया नज़रो का तो वो मुस्कुरा उठा. मंजू को ये सब पता था कि लड़का लड़की ऐसे भी करते है. उसके साथ रहने वाली कुछ लड़कियों ने भी अपने किससे सुनाए हुए थे लेकिन खुद का उसका अनुभव बस एक चुंबन तक था जो अभी 2 दिन पहले ही इस लड़के ने किया था जिसके साथ आज सिनेमा आई थी. अर्जुन ने अपने हाथ को हरकत देकर मंजू की उंगलियो के बीच अपनी उंगलिया हल्के से रख भर दी. जब सामने वाली लड़की की गर्दन मज़े मे पीछे को हुई तो खुद उसने अर्जुन का हाथ जकड़ सा लिया.

दोनो की उंगलिया बंद हो कर मुट्ठी सी बन गई. पिक्चर मे कोई रात का दृश्य चल रहा था तो अंधेरा भी ज़्यादा हो गया था. मंजु ने अर्जुन की और नज़र की तो वो पहले ही उसकी तरफ देख रहा था. किसी चुंबक और लोहे से दोनो के सर एक दूसरे की तरफ खींचे बढ़ गये. मंजुला के पतले लेकिन मादक होंठ अर्जुन के होंठो से खेल रहे थे. जो कुछ देर बाद अब अर्जुन आराम से पीने लगा था. बंद आँखों से मंजू सिर्फ़ उसका सर सहलाती उसकी पीठ अपनी तरफ खींच रही थी. एक पूरी रात वो बस इस उधेड़बुन मे थी की कही अर्जुन ने ऐसा कुछ किया तो? क्या वो उसको डाँट देगी? क्या वो कुछ करेगा भी या सिर्फ़ उसका वहाँ है? लेकिन अब सारी सोच गायब थी

अर्जुन और मंजू के होंठ खुलकर एक दूसरे की जीभ तक चूस रहे थे.

"ये तो जन्नत है." मंजू इस नशे जैसे मज़े मे पूरी जकड़ गई थी. अपने आप ही उसने एक हाथ अर्जुन का अपनी छाती पर रख कर दबा दिया. अर्जुन भी हौले हौले उस रेशमी कपड़े पर से ब्रा मे क़ैद उसकी मध्यम आकर की सख़्त चुचियों को नरम करने मे लगा रहा. जब होंठ थक गये और साँस उखड़ने लगी तो मंजू ने अर्जुन का चेहरा अपने गले से नीचे चिपका लिया. अर्जुन के दोनो हाथ बाद-स्टेर मंजू की गोलाइयाँ माप रहे थे और वो उसको अपने से चिपकाए थी. एक बार फिर होंठ आपस मे मिले तो अर्जुन ने एक हाथ मंजू की पीठ के पीछे किया और दूसरा कमीज़ के अंदर उसके नंगे पेट पर जमा दिया.

"आ." हल्की सिसकी निकली तो एक बार दोनो की नज़रे मिली. उनमे कोई रुकावट, डर या प्रतिवाद नही था. मंजू के सपाट मुलायम पेट को अच्छे से महसूस करते हुए अर्जुन का हाथ ब्रा के नीचे तक आ गया था. अर्जुन के होंठो ने जब उसकी कान की लौ को चूमा तो ये आग और भड़क गई. मंजू को तो कुछ

समझ ही नही आ रहा था कि हो क्या गया है लेकिन फिर जैसे ही उसकी ब्रा के एक भाग को अर्जुन ने उपर से पकड़ा तो वो फिर से मदहोश हो गई. पहली बार उसकी चुचि पर किसी मर्द का स्पर्श था. और अभी भी वो पूरी नंगी नही थी. ब्रा के उपर से ही अर्जुन का हाथ उसको दबाए थे, बस थोड़ा नरम माँस उसको अपने हाथ पर लगता महसूस हो रहा था. 2 उंगलियों को ऐसे ही ब्रा के कप के अंदर किया तो छोटा मुलायम सा चुचक उंगलिओ के बीच मे आ गया.

"आ.. मॅर जाउन्गी मैं ऐसे." मंजू ने उसके कान मे सीत्कार्ते हुए बड़ी धीमी आवाज़ मे कहा तो अर्जुन ने निपल हल्के हल्के मसलना शुरू कर दिया था. मज़े से दोहरी होती मंजुला एकदम से जैसे बादलो मे उड़ने लगी थी और अगेल 30 सेकेंड मे ही उसकी कच्छी पर चूत का पानी फैल चुका था. वो लुढ़कने ही वाली थी की अर्जुन ने उसको थामते हुए सही से सीट पर टीका दिया और खुद को भी ठीक कर के बैठ गया. मंजू को हस्तमैथुन के बारे मे पता था लेकिन जैसा उसके साथ हुआ था अभी वो तो जैसे उसके किसी नीले बैग मे ले गया था, जन्नत जैसे. साँसे संभालती वो कुछ ठीक हुई तो अब वापिस धरती पर थी. अर्जुन उसको देख मुस्कुरा रहा था जिस से अब वो शर्मिंदा होने लगी थी.

"तुम्हे कुछ कहने की ज़रूरत नही है मंजू. अभी जो भी हुआ वो दोनो ने किया था, मर्ज़ी से. और शरीर की भी एक ज़रूरत होती है. तुम्हारा चरमोत्कर्ष को पाना कितना सुखद लगा तुमको. मैं भी जानता हूँ. ये कोई अपराध नही है. अब फिल्म देखो." और अपने बाह उसके पीछे करते अर्जुन ने प्यार जताया तो मंजू भी बेहतर महसूस करने लगी थी. उसको ये देख कर भी अच्छा लगा था कि उस से उमर मे छोटा ये लड़का कितने अच्छे से उसका ख्याल रख रहा था. जैसा उसकी सहेलियों उसको बताया था अर्जुन ने वैसा कुछ भी नही किया था. ना कपड़े उतारे, ना ज़ोर लगाया, ना चुदाई की. सिर्फ़ उसको प्यार किया और सिर्फ़ उसके तंन-मन को एक अजीब सा सुख दिया था. जबकि सहेलियों के हिसाब से तो लड़के सिर्फ़ चुदाई करते है और कपड़े निकालने के बाद कभी पहनने तो दूर उनसे बात भी नही करते. उसकी बाहों मे लिपटी वो आज इस सुख की हाँसिल कर खुद को खुशनसीब मान रही थी. इस मज़े से वो बाहर जब आई जब अर्जुन ने उसको हल्के से हिलाया.

"मध्यांतर हो चुका है. क्या लॉगी बताओ?"

मंजू ने ना मे गर्दन हिला दी.

"वो बाथरूम जाना है एक बार." पर्स को उठाती वो खड़ी हुई तो अर्जुन उसके साथ चल दिया. महिला प्रसा धन कक्ष के बाहर रुक कर ही वो आने की प्रतीक्षा करने लगा और अंदर जाते ही मंजू ने सलवार उतार कर अपनी गीली कच्छि उतारी. चूत अभी भी हल्की गीली थी तो उसको फिर से अच्छे से पोन्छा और कच्छी को अच्छे से तह -लगा कर किसी बीड़ी के बंडल सा बना पर्स मे बिल्कुल नीचे रख दिया. पेशाब करने के बाद सलवार पहन कर हाथ धो कर बाहर निकल आई.
 
"चलो." उसने हल्की शरम से कहा. कहा 6 फीट की ये हर समय मस्ती या गुस्से मे रहने वाली लड़की आज किसी नवबयाहता सी लग रही थी. एक बार मंजू को वापिस सीट पर बिठा कर अर्जुन ने 2 कोला की बॉटल और एक पॅकेट मक्की के फुल्लो का ले लिया सिनेमा की कॅंटीन से.

"ये लीजिए मेडम." अर्जुन ने एक बॉटल मंजू की और बढ़ाई और अपनी बॉटल नीचे रख दी.

"कोला खिलाड़ी के लिए ठीक नही होती." मंजू ने बॉटल पकड़ते हुए कहा तो अर्जुन ने फुल्लो का पॅकेट खोलते कहा, "अभी हम खिलाड़ी नही है. और कभी कभी ऐसा करना ग़लत तो नही." और मक्की की नमकीन फुल्ले उसकी तरफ बढ़ा दिए. दोनो हल्का मुस्कुराते कुछ देर कोला पीते और मक्की के दाने खाते फिल्म देखते रहे. लेकिन फिल्म तो नाम के लिए ही थी. मंजू ने अपनी बॉटल आधी खाली कर के साइड मे फर्श पर ही रख दी थी जैसे अब अर्जुन रख चुका था. वही दूसरा जोड़ा अब पहले वाले की तरह कामक्रीड़ा मे लगा था. ये दोनो कभी उनको देखते, कभी पर्दे पर चलती फिल्म को और कभी एक दूसरे को.

2-3 दाने मंजू के हाथ से उसकी झोली मे गिरे जिनको अर्जुन ने भी देखा था. बिना सोचे ही उसने अपने हाथ वहाँ अंधेरे मे पहुचा दिए तो मंजू उचक सी गई. पाव हल्के फैले हुए थे तो सीधा हाथ कमीज़ और सलवार के उपर से चूत पे जा भिड़ा. एक पल को दोनो ही सिहर गये. नरम से उस माँस को अर्जुन अच्छे से पहचानता था और इधर मंजू इस समय अपनी चूत पर कच्छी ना होने की अपनी भूल को याद करने लगी. दोनो ही कुछ ना बोले तो अर्जुन ने अपना हाथ आराम से हटा लिया. "सॉरी." उसने इतना कहकर नज़र सामने कर ली लेकिन मंजू को तो लगा जैसे ये उसकी भी ग़लती थी. और अर्जुन का एकदम से अपना हाथ हटा लेना अब उसके मन मे प्यारही बढ़ा रहा था.

"तुम्हारी तो कोई ग़लती नई है ना. और मेरी भी ग़लती है इसमे थोड़ी. मैने ही पैंटी उतार दी थी क्योंकि वॉशरूम मे वो खराब हो गई थी." अर्जुन की बाजू को पकड़ते हुए उसके साथ लगती मंजू ने कहा तो अर्जुन ने आराम से उसका माथा चूम लिया. बाल्कनी मे बाकी दोनो जोड़े भी ज़्यादा कुछ ना करते हुए बस एक दूसरे की बाहों मे थे. शायद कुछ कर भी रहे हो लेकिन प्रतीत ऐसाही हो रहा था. अर्जुन का एक हाथ वापिस से मंजू की बगल से होता उसके उभार को हल्के हल्के सहला रहा था और वो मंद मंद मुस्कुरा रही थी उसकी ऐसी हरकत पर.

"तुम्हे किसी ने कहा क्या मेरे वहाँ खारिश करने को?" 2 घंटे मे ही वो खुद को अर्जुन के करीब कर चुकी थी. जैसा अब उसने अपने आप को सौंपही दिया था.

"सुना है ऐसा करने से ये थोड़े बड़े भी हो जाते है." अर्जुन ने भी वैसे ही हल्की आवाज़ मे कहते हुए पूरे उभार को पंजे मे ले लिया था.

"बड़े मेरा नुकसान ही ना कर दे. खेलते समय. मेहनत से इनको यही रोका हुआ है मैने." शरमाती इतराती से वो थोड़ा खुलने भी लगी थी. अर्जुन के द्वारा अपने शरीर को सहलवाना फिर से उसको मज़ा देने लगा था.

"नुकसान तभी करेंगे ना जब ये खुले होंगे. और वैसे तो खेलने से रही. और बड़े होने मे कोई बुराई नही है." कमीज़ के उपर से ही हाथ डालते हुए अर्जुन ने

जवाब दिया और इस बार एक पूरा दूध उसकी हथेली की पहुँच मे था. ब्रा तो आड़ेही नही आई थी इस रास्ते से.

"आ. गुदगुदी होती है ना." अपने नंगे चुचे पर अर्जुन का बड़ा हाथ महसूस करते ही शरीर मे काम-उर्जा भरने लगी थी मंजू के.

"पहली बार हाथ लगा है ना तुम्हारे इनपर?" अर्जुन ने थोड़ी शोखी से ये बात कही तो मंजू एक बार अपने चुचे पर रखे हाथ को वही रोकते कहा, "जान ना ले लूँगी अगर किसी ने इनके पास आने की कोशिश भी की तो." और फिर हाथ छोड़ दिया जहा वापिस उन्हे किसी पानी के गुबारे सा दबाने लगा था.

"तुम्हे अच्छा नही लगता ये सब? तुम्हारी कोई फ्रेंड भी अपने अनुभव नही बताती क्या तुम्हे? लड़कियो के कॉलेज और हॉस्टिल मे हो. बाहर भी खेलने जाती रहती हो. आपस मे तो सभी बातें करती होंगी?" धीरे धीरे मंजू के निपल को कड़ा करता वो बस और जान-ने की कोशिश कर रहा था. अर्जुन नही चाहता था कि वो इस लड़की के साथ कुछ भी ज़बरदस्ती करे. जहा वो रोक देगी वो रुक जाएगा.

"आ. आराम से ये दुख़्ते भी है." निपल एंथने से उसको मज़ा तो आही रहा था लेकिन मंजू नारी शरम भी दिखाही रही थी.

"मेरी सहेलिया लड़को से ज़्यादा बेशरम है. कइयों के प्रेमी है जिनके साथ कभी वो उनके घर या लॉड्ज मे भी जाती. कुछ शहर से बाहर घूमने भी और मुझे भी बताती है. लेकिन मैं नही चाहती की इस शरीर के मालिक महीने या साल मे बदलते रहे. जैसा वो कर देती है. " दोनो के मूह आमने सामने थे और अब अर्जुन उसकी बातें सुनता एक हाथ से एक दूध और एक हाथ से कमर सहला रहा था. मंजू भी अर्जुन की छाती सहलाती, कभी उसके पट्ट को.

"कुछ ने तो शायद इतना गिरा लिया है खुद को की अपने खर्चे उठाने के लिए ही नाम भर के प्रेमी है. फिर आ कर मुझे बताती है कैसे उन्होने किया और क्या आज दिलाया. और मैं सुनती रहती है बस मज़े लेती हुई."

"मज़े लेती हुई?" नटखटपन से कही अर्जुन की इस बात से मंजू उसकी नाक पकड़ती बोली, "उनकी भी हिम्मत नही मेरे हाथ लगाने की. मेरा मतलब ये है की बातें सुनकर मज़ा तो आता ही है. जब वो बताती है की ये दबाए, पीए फिर अंदर किया. आपस मे तो वैसे ही बातें करती है जैसे तुम लड़के करते हो." और इतना बोलकर उसके होंठ चूमने लगी. अर्जुन ने भी गले से हाथ निकाल कर कमर और जाँघो पे हाते फिरने शुरू कर दिए थे उसको अच्छे से चूमते हुए. मंजू की ऐसी आधी अधूरी बातें, इतना बेहतरीन शरीर और अंदर क़ैद गर्मी अब उसको भी अच्छी लगने लगी थी.

"तुम्हे नही लगता के ये सब कभी तुम भी करोगी.?" होंठ छोड़कर वैसे ही कमर पर नीचे की और हाथ चलते अर्जुन ने बात कही तो मंजू आँखों मे देखते हुए ही बोली, "पहले तो कभी नई सोचा था लेकिन अब सोचूँगी इस बारे मे. लेकिन एक डर भी दिया है मेरी सहेलियों ने. पहली बारी का दर्द और खून उपर से फिर चाल का बदल जाना. बस यही सब सोच कर तो कभी इस चक्कर मे ही नही पड़ी. उपर से ध्यान सिर्फ़ अपने खेल मे ही लगाया है मैने. आहह." बात कहते कहतेही जब उसको पता चला की अर्जुन की उंगलिया उसकी चूत के होंठो को छेड़ रही है तो अपनी दोनो जांघे ज़ोर से भींच ली एक सिसकी के साथ.

"दर्द बहुत होगा और शायद खेलना तो दूर तुम ठीक से चल भी नही सकोगी." अर्जुन ने फिर से जाँघो पर हाथ रखते कहा तो वो नासमझी सा चेहरा बनाने लगी.

"यहा हाथ रखो." अर्जुन ने उसका हाथ अपने हाथ मे लेकर अपनी जीन्स के उभार पर टीकाया तो मंजू ने हाथ झटके से खींच लिया. "ये क्या है?"

"वही जो तुम्हारी सहेलियों ने बताया हुआ है तुम्हे जो वो अपने प्रेमी के साथ करती है." अर्जुन की बात सुनकर हैरत से ही एक बार फिर मंजू ने अपना हाथ खुद ही पैंट के उस उभर पर रखा और इधर अर्जुन ने उसकी चूत के होंठ उपर से सहला दिए. "स.. ये ऐसा तो नही होता. उन्होने कहा था की इतना या इतना होता है. ये कुछ अलग है और मोटा भी." अपने हाथ हटा लिए थे मंजू ने एक बार अच्छे से स्पर्श कर के उस तगड़े लंड को जो पैंट मे अकड़ा हुआ एक तरफ को उभरा हुआ था.

"सबके शायद अलग होते होंगे. मेरे पास यही है." और एक बार अच्छे से होंठो को चूम लिया. तभी वहाँ धीरे धीरे रोशनी होने लगी तो दोनो ही सकपका के अलग हो गये. अर्जुन ने खुद को सही किया और मंजुला ने भी. उसकी नज़रे अब ज़मीन की और थी. दोनो चुपचापही सिनेमा से बाहर आने लगे. अर्जुन बड़े ध्यान से मंजू को बाहर लेकर आया, जिसके चेहरे पर वापिस चुन्नी थी.

"मुझे गेट पर उतार देना." मंजू ने स्कूटर पर बैठते हुए कहा. इस बार बैठने मे फरक था. हाथ खुद ही कमर को पकड़े थे और पीठ पर उसका सीना चिपका था.

"ज़्यादा मत सोचना इस सब के बारे मे. जब साथ हो हम ये तभी ठीक है नही तो ध्यान नही लगेगा." अर्जुन समझा भी रहा था उसको
 
"मुझे गेट पर उतार देना." मंजू ने स्कूटर पर बैठते हुए कहा. इस बार बैठने मे फरक था. हाथ खुद ही कमर को पकड़े थे और पीठ पर उसका सीना चिपका था.

"ज़्यादा मत सोचना इस सब के बारे मे. जब साथ हो हम ये तभी ठीक है नही तो ध्यान नही लगेगा." अर्जुन समझा भी रहा था उसको

"जी मास्टर जी. लेकिन जो आज हुआ है वो दिमाग़ से चला भी जाए दिल मे हमेशा रहेगा." उसकी गर्दन को अपने चुन्नी से ढके होंठो से चूमती वो बोली. सड़क दोपहर के समय लगभग खाली थी. वैसे भी यूनिवर्सिटी-स्टेडियम वाली इस सड़क पर आवा-जाहि कमही रहती थी.

"तुम्हे मेरी किसी हरकत या बात का बुरा तो नही लगा?" अर्जुन सोचकर बोला

"इस बात का बुरा लगा के हम सिनेमा क्यो गये थे. कही रात को खुले खेत मे बैठे होते तो ज़्यादा मज़ा आता." मंजुला अपनीही सोचो मे थी अभी तक

"किसी दिन." अर्जुन ने इतना ही कहा और ब्रेक लगा दिए. स्कूटर स्टेडियम के गेट से थोड़ी पहले ही रोक दिया था एक घने पेड़ की छाँव मे. "शाम को मिलते है."

मंजुला कुछ अलग ही तरीके से चहकति सी प्रवेश द्वार की तरफ़ बढ़ चली और अर्जुन खड़ा मुस्कुराता देखता था. उसने भी पीछे मुड़कर मुस्कान दिखाई थी.

वहाँ से सीधा जा कर ट्रेडमिल का काम किया जो फोन पर आपस की बात चीत से ही हो गया बिना ज़्यादा कुछ बोले कहे. अपने लिए एक जोड़ी बॉक्सिंग के आभास पर पहन ने के कपड़े लेकर फिर पंसारी से पर्ची पर बताया समान लिया. समय देखा तो 2 बजने को था, स्कूटर सीधा घर की तरफ ले लिया.
 
"ये लो दादाजी आपका मँगवाया समान." रामेश्वर जी को थैला देते हुए अर्जुन ने कहा और वही बैठ गया. उन्होने वो थैला अपनी धरमपत्नी की और कर दिया.

"वैसे ये सब है क्या दादाजी?" उसने जानकारी लेनी चाही तो रामेश्वर जी बोले, "तेरी विशेष खुराक बनेगी इस सब से. जो तेरी दादी खुद तयार करेगी."

कुछ देर उनके पास समय बिता कर रसोईघर मे भोजन करने आ बैठा. अलका दीदी तो किसी प्रेमिका की तरह उसको ताड़ रही थी. उनके मन मे सुबह से ही ऋतु का पढ़ाया काम ज्ञान चल रहा था और अब बस उसको सबके गाँव जाने की प्रतीक्षा थी. अर्जुन ने एक बार खाना परोसती कोमल दीदी को देखा जो शर्मा सी रही थी उसके पास आती जाती. फिर खाना खाने के बाद आराम करने के लिए अपने कमरे मे आ लेटा. कोई 40-45 मिनिट के बाद ही ललिता जी उसके कमरे मे दाखिल हुई एक टोकरी मे कटेही फलो को लेकर. उपर का भाग तो वस्तरविहीन था और नीचे पाजामे मे अर्जुन का अंग मध्यम आकार तक फूला हुआ था. एक बार बाहर की तरफ देखने के बाद ललिता जी ने जाली वाले दरवाजे के सामने लकड़ी का दरवाजा भी ढाल दिया और अब इतमीनान से अर्जुन के पैरो के पास बैठकर उसका चेहरा तो कभी उसका उभरा भाग देखती.

फिर हिम्मत कर उन्होने अपना हाथ उसकी जाँघो की तरफ बढ़ा दिया. हल्के से उसको सहलाते ही वो भाग और फूलना शुरू हो गया था. दिन के उजाले मे ही आज उनकी शरम ख़तम होने लगी थी. थोड़ा कस कर पकड़ते हुए ललिता जी इस बड़े विकराल लंड का तापमान महसूस सा करने लगी थी.

"इतना बड़ा है मूए का की मुट्ठी भी छोटी पड़ती है" सोचती वो सहलाने लगी ही थी की उनको भी अपने उभारो पर हाथ का अनुभव हुआ.

"ताईजी ऐसे आपको तो सुख मिलने से रहा."

अर्जुन की नटखट मुस्कान देख कर वो भी हँसती सी बोली, "तुझे तो अपनी ताई का ध्यानही नही. बस अपनाही सोचता रहता है. मुड़कर ना आया एक बार भी तू मेरे पास." झूठा सा ताना देती वो बोली

तो अर्जुन ने उनका एक दूध दबाते हुए घड़ी की और नज़र दौड़ाई. "अभी 3:20 हो चुके है ताई जी. मैं 6 बजे आउन्गा तब आप उपर आ जाना मेरा कमरा ठीक करने. अभी तो जाने का समय हो गया है. उठते हुए उसने कस के एक बार ललिता जी के दोनो उभार भींचे और होंठ चूसने के बाद सीधा बाथरूम चला गया.

ललिता जी भी इस 2 पल के अनुभव और शाम को मिलने वाले सुख की कल्पना लेती नीचे चल दी.

फल खाने के बाद अपनी अभ्यास वाली ड्रेस को बैग मे डालकर नीचे आया तो वहाँ पर पहले ही प्रीति उसका इंतजार करती मिली.

"चले." प्रीति ने इतना कहा तो उसने सर हिला दिया.

"वैसे ये ख़याल कैसे किया साथ चलने का? और दादाजी ने मुझे साइकल से जाने की हिदायत दी है तो रोज तो हम साथ नही जा पाएँगे." स्कूटी को स्टार्ट करते उसने कहा तो प्रीति ने सिर्फ़ इतना कहा की एक बार साथ चल पड़े बस. और दोनो आगे बढ़ चले. वैसे तो रामेश्वर जी को कोई ऐतराज नही होता क्योंकि दौड़ तो वो सुबह भी लगाता ही था. लेकिन अर्जुन को अभी जैसा ठीक लगा उसने कह दिया.

अभी कुछ आगे निकले थे की एक स्कूटर उनके बराबर आया और यही पर अर्जुन की नज़र उन 2 लड़को पर पड़ी जो शायद ये नही जान पाए थे की अर्जुन भी इस लड़की के साथ हो सकता है.

"रोज जो बोलते हो आज नही कहोगे कुछ?"

प्रीति की इतनी बात सुनकर अर्जुन ने थोड़ा ज़ोर से आवाज़ लगाई "कुलविंदर".. ये थे राणा और कुलविंदर जो अर्जुन के ही स्कूल मे थे और काफ़ी बदनाम थे. अर्जुन की आवाज़ सुनते ही उस साँवले से मध्यम कद के लड़के ने स्कूटर एक साइड रोक दिया. उसके पीछे बैठा था उसका हरपाल का जोड़ीदार राणा, बिल्कुल वैसा ही जैसा कुलविंदर था.

"क्या तकलीफ़ है तुझे?" ये बात राणा ने स्कूटर से उतरते हुए कही क्योंकि दोनो को पता था की ये लड़का एक होशियार, अकेला और कायर किस्म का है. आज शायद लड़की साथ है तो आवाज़ उँची हो गई होगी वरना स्कूल मे तो ये किसी पालतू गाए साही दिखता है.

"तकलीफ़ तो मैं बताती हूँ तुम्हे. रोज पीछा करते हो मेरा अगले 2 चौक तक. क्या क्या नही बोलते हो और कल इसने (राणा) मेरे सामने हाथ भी लगाने की कोशिश की थी अर्जुन. आज मैं इसलिए तुम्हे साथ लेकर आई." ये बात ख़तम भी नही हुई थी की स्कूटी ज़मीन पर थी और राणा फुटपाथ के साथ बनी दीवार के साथ लगा हवा मे 2 फीट उपर था.

"भारी ग़लती कर दी तुमने ऐसा कर के." अर्जुन का चेहरा फिर से बदल चुका था और कुलविंदर तो आँखे फाडे अपने दोस्त का हाल देख रहा था. जिसकी आँखे बाहर निकालने को हो रही थी. अगले ही पल वो ज़मीन पर था और एक तेज ठोककर उसकी नाक पर, जहा से खून की धार फुटपाथ पे बहने लगी थी. यहा अपने दोस्त को मार ख़ाता देख थोड़ी हिम्मत से कुलविंदर ने अर्जुन की पीठ पर जोरदार मुक्का मारा जिसका शायद उसको पता भी ना चला हो. लेकिन कुलविंदर का सर उस दीवार से ज़रूर जा टकराया जहा थोड़ी देर पहले उसका दोस्त लटका हुआ था. अर्जुन के अंतर्मंन ने उसको शांत किया तो उसने दोनो को वही खड़ा करके सिर्फ़ थप्पड़ ही बरसाए जो वो तब तक खाते रहे जब तक की एक पोलीस का मोटरसाइकल वहाँ ना आ गया.

"क्या बदमाशी कर रहा है तू पहलवान?" एक रौबदार मूछो वाला एक सितारा वर्दीधारी पॉलिसिया पीछे से अर्जुन को रोकते हुए बोला

प्रीति ने जवाब दिया, "अंकल मैं रोज प्रॅक्टीस को जाती हूँ तो ये दोनो मेरा पीछा करते है और हाथ भी मारा था इस वाले ने कल. आज मैने इन्हे बताया तो इन्होने इनकी खबर ली."

दूसरा पुलिसवाला उनकी तरफ आता हरियानवी भाषा मे बोला, "यो बात से भाई जगत. यो पहलवान ग़लत कोनी ये 2 काले छोरे छटे बदमाश है. और पहलवान तो मैने देखया भी है कदे न कदे . शायद यो अपने पंडित जी का टिंगर है." उसकी बात सुनकर जगत नाम वाले इस हवलदार ने ध्यान से अर्जुन को देखा.

"हा भाई सही कहा. उनका ही बालक है ये. चलो भाई तुम दोनो अपनी दीदी से ज़मीन पे नाक रगड़ के माफी माँग लो नही तो फिर इनके श्रीमान दादाजी हम को कहेंगे तो आप दोनो की सेवा पॅट्टो से करनी पड़ेगी." मसखरी करते हुए भी जगत राम की आवाज़ जोरदार थी. राणा और कुलविंदर तो किसी आग्याकारी कुत्ते की तरह सॉरी बोलते हुए ज़मीन पर बार बार नाक रगड़ने लगे थे. उनको बिल्कुल अंदाज़ा नही था की उनकी ये ऐसी छोटी मोटी मजनुगिरी इतनी भारी पड़ेगी. पोलीस वाले समझदार थे. विधयार्थी जानकार उन्होने भी सिर्फ़ एक नैतिक शिक्षा का ही पाठ पढ़ाया उन दोनो को.

"चल भाग जाओ यहा से और फिर दिखे तो हवालात के दर्शन करवा दूँगा." डाँटते हुए उनको वहाँ से भागकर जगातराम ने अर्जुन से कहा, "बेटा शरीर से तगड़ा है लेकिन गुस्सा नही करते इतना. सबसे पहले समझाओ, फिर शिकायत करो और फिर डाँटदपट. नही माने तो एक या 2 हाथ. लेकिन एक बार तू लगा तू मार देगा फिर तू इनके थप्पड़ लगाने लगा."

"वो कुछ याद आ गया था अंकल. ऐसे किसी को नही मारना चाहिए था. सॉरी." अर्जुन को शायद इन्होने शुरू से उन दोनों की पिटाई करते देख लिया था.

"चल कोई बात नि छोरे. तू समझदार सै जो रुक गया. तेरा बाप इनकी धुलाई करता तो हम भी कुछ ना कर पाते." ये दूसरे पुलिसिये ने कही थी."चाल रे जगत भाई और तुम दोणू भी निकलो." और कुछ लोग भी तमाशा देखने आ गये थे वो भी खिसक लिए थे वहाँ से.

"आगे से कोई कभी तुम्हे कुछ न्ही कहेगा. मैं साथ ही चलूँगा अब से तुम्हारे." अर्जुन वापिस स्कूटी स्टार्ट करता प्रीति को अपने साथ ले चल दिया
 
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