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जाल पार्ट--60
गतान्क से आगे......
“ये किसका घर है रंभा?”
“यहा के वाइड का.”
“यहा क्या मिला है तुम्हे?”
“ये.”,रंभा ने चौखट पे बैठे शख्स के चेहरे पे टॉर्च की रोशनी मारी.उस शख्स ने बहुत धीरे से हाथ उठाके रोशनी को रोका & फिर आँखे मीचे हाथ नीचे कर रोशनी मारने वाले को देखने लगा लेकिन वो कुच्छ बोला नही.देवेन आगे बढ़ा & उस शख्स के चेहरे को गौर से देखा & उसके मुँह से हैरत भरी चीख निकल गयी.
“हैं!ये तो..ये तो..विजयंत मेहरा है.!”
"ये मुझे नदी के किनारे पड़ा मिला था..",वाइड देवेन को विजयंत मेहरा के मिलने की कहानी सुना रहा था,"..यहा से बहुत आयेज.मैं उधर जड़ी-बूटियाँ चुनने जाता हू."
"आपने पोलीस को इत्तिला नही की?"
"की थी लेकिन यहा कोई पक्की चौकी नही है बस 1 हवलदार आता है हफ्ते मे 1 बार.उसने इसे देखा & बोला कि नदी मे गिर गया होगा.उसने कहा कि वो जाके थानेदार को बता देगा & फिर वोही ये पता करेगा कि इसके जैसे हुलिए वाले किसी आदमी के गुम होने की रपट लिखाई गयी है या नही."
"फिर?"
"फिर वो आअज तक यहा नही आया है."
"हूँ..वैसे इसे हुआ क्या है?..ये बोलता क्यू नही?"
"ये देखो..",वाइड काफ़ी उम्रदराज़ था & काफ़ी देर बैठने के बाद उठने मे उसे काफ़ी तकलीफ़ होती थी.वो धीरे से उठा & कमरे मे बैठे उन्हे देखते विजयंत की ओर गया.विजयंत सब सुन रहा था,उन्हे देख रहा था लेकिन उसकी आँखो मे कही भी वो भाव नही था जिसे देख ये लगे कि उसे उनकी बातें समझ आ रही थी या नही,"..इस जगह..",उसने उसके माथे पे बाई तरफ बॉल हटा के दिखाया,"..पे गहरी चोट लगी थी इसे.मैने खून रोक के टाँके लगाए.ये बोलता क्यू नही इसका कारण मुझे नही पता.पर इतना ज़रूर है कि इसके दिमाग़ पे ज़ोर की चोट लगी है & उसी वजह से या तो इसकी याददाश्त गयी है या फिर सोचने & बोलने की ताक़त.",वो वापस अपनी जगह पे बैठ गया.
"वैसे इसे बातें समझ मे तो आती है.इसे भूख लगती है,प्यास लगती है.कहो तो खड़ा हो जाएगा,बोलो तो बैठ जाएगा मगर खुद कुच्छ कहेगा नही ना ही इशारा करेगा."
"हूँ..हम इसे अपने साथ ले जाते हैं.वाहा शहर मे सरकारी लोगो के हवाले कर देंगे तो फिर ज़रा आपका हवलदार भी चौकस होगा.ढीला लगता है मुझे वो."
"बहुत अच्छे.ज़रा यहा की बिजली के बारे मे भी बात करना."
"ज़रूर.",दोनो विजयंत को वाहा से ले निकल आए.रंभा ने वाइड को कुच्छ पैसे दे दिए थे.उसे अजीब सी खुशी हो रही थी लेकिन उसकी निगाह गाड़ी चलाते देवेन पे भी थी जो बहुत संजीदा लग रहा था.अब देवी फार्म पे हुई किसी बात की वजह से या फिर विजयंत के मिलने की वजह से,ये उसकी समझ मे नही आ रहा था.देवेन उसे चाहने लगा था & वो ये भी जानता था कि रंभा के ताल्लुक़ात विजयंत के साथ भी हैं.उसने उसे सवेरे ही कहा था कि इस बात से उसे कोई ऐतराज़ नही कि वो उसके अलावा किसी & को भी चाहे लेकिन था तो वो 1 मर्द ही.
"क्या हुआ था वाहा?बताए क्यू नही?",रंभा ने अपना सर उसके कंधे पे रख दिया & उसकी बाई बाँह सहलाने लगा.
"बताता हू.",देवेन ने उसके सर को थपथपाया & कार चलते हुए उसे सारी बात बतानी शुरू की.
"गाड़ी रोकिए!",सारी बात सुनने के बाद वो बोली.
"क्या हुआ रंभा?"
"गाड़ी रोकिए!",वो रुवन्सि हो गयी थी.देवेन ने ब्रेक लगाया तो वो उसके गले लग गयी & रोने लगी.देवेन उसके जज़्बातो को समझ रहा था.1 कामीने के स्वार्थ ने तीन जिंदगियो को इतने दिनो तक खुशी से महरूम रखा था & उनमे से 1 तो अब इस दुनिया मे थी भी नही.
"इतना ख़तरा मोल लिया आपने..आप कितना चाहते थे मा को आज सही मयनो मे समझ आ रहा है मुझे..उसके धोखे की ग़लतफहमी से ही इतनी नफ़रत पैदा हुई थी आपके दिल में.",रंभा की रुलाई थम गयी थी & वो उसके गाल के निशान को सहला रही थी.
"हां,मगर आज सारी ग़लतफहमी दूर हो गयी बस 1 बात का गीला रह गया की सुमित्रा मेरी सच्चाई जाने बगैर चली गयी.",रंभा की रुलाई दोबारा छूट गयी.देर तक देवेन उसे बाहो मे भर समझाता रहा.उसने मूड के पिच्छली सीट पे बैठे विजयंत को देखा.उसने 1 बार आवाज़ होने पे आँखे खोली थी & फिर सो गया था.
"चलो,अब चुप हो जाओ.हमे यहा से जल्द से जल्द निकलना है.बालम सिंग ड्रग डीलर था & उसके मरने के बाद अब उसके लोग & पोलीस कुत्तो की तरह पूरे इलाक़े को सूंघ-2 के छनेन्गे.",उसने फिर कार स्टार्ट की तो सीधा क्लेवर्त जाके ही रोकी.रंभा होटेल वाय्लेट पहुँच समीर को विजयंत के मिलने के बारे मे बताना चाहती थी लेकिन देवेन ने उसे रोका.उसे कुच्छ खटक रहा था.
"रंभा,तुम मुझे ये बताओ कि समीर जब कंधार पे पोलीस को मिला था तो उसने क्या बताया था?",वो रात अभी भी उसके ज़हन मे ताज़ा थी बाद मे उसने & अख़बारो मे भी पढ़ा था & खबरों मे भी सुना था कि कैसे ब्रिज & सोनिया उस साज़िश मे शामिल थे & यही बात उसे खटक रही थी.रंभा ने उसे सारी बात बता दी.
"लेकिन आप ये क्यू पुच्छ रहे हैं?"
"अब मेरी समझ मे आया कि मुझे क्या खटक रहा था.",उसने खुशी से स्टियरिंग पे हाथ मारा,"..समीर झूठ क्यू बोल रहा है,रंभा?"
"क्या?समीर..झूठ..मेरी समझ मे नही आई आपकी बात.",रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी थी.
"उसने ये क्यू कहा कि झरने पे उसके हाथ पाँव बँधे होने के कारण वो अपने बाप की मदद नही कर सका जबकि हक़ीक़त ये थी कि उसके पाँव खुले थे."
"क्या?!"
"हां & उसे तो ये दिखना ही नही चाहिए था कि ब्रिज & सोनिया 1 साथ आए कि उसका बाप अकेला आया."
"क्यू?"
"क्यूकी उसकी आँखो पे पट्टी बँधी थी."
"क्या?!..",रंभा के चेहरे पे काई भाव आके चले गये..समीर झूठ बोल रहा था लेकिन क्यू?..विजयंत की मौत क्या 1 हादसा नही साज़िश थी?..समीर क्या नाराज़ था उसे रंभा से शादी करने पे ग्रूप से अलग करने से?..तो इसका मतलब था कि वो उस से बेइंतहा मोहब्बत करता था लेकिन उसके नमूने तो वो उस पार्टी मे देख ही चुकी थी जब वो कामया से प्यार के वादे कर रहा था..आख़िर सच क्या था?..समीर का मक़सद क्या था?
वो पलटी & पिच्छली सीट पे बेख़बर सोए विजयंत को देखा,"अब क्या करें?",उसने देवेन की ओर देखा.पहली बार उसे इस सारे मामले मे डर का एहसास हुआ था.
"पहले तो तुम समीर को इस बारे मे ज़रा भी भनक नही लगने दोगि..समीर क्या किसी को भी नही!ये राज़ सिर्फ़ मेरे तुम्हारे बीच रहेगा."
"ठीक है मगर इनका क्या करें?..इन्हे इलाज की ज़रूरत है वो भी बहुत उम्दा इलाज."
"हूँ..वो तो मैं करवा दूँगा."
"मगर कैसे?"
"वो मुझपे छ्चोड़ो."
"ओफ्फो..",तनाव की वजह से रंभा झल्ला गयी,"..मुझे भी तो बताइए कुच्छ..दिन मे भी मुझे अकेला भेज दिया & अब अभी भी नही बता रहे हैं!",खीजती रंभा देवेन को किसी बच्ची की तरह लगी..थी तो वो 1 बच्ची ही..वो तो हालात की दरकार थी की वो जल्दी बड़ी हो गयी.
"मैं इसका इलाज कारवंगा.इसे अपने साथ ले जाके..",उसने उसे अपनी ओर खींचा & उसके चेहरे को चूमने लगा.रंभा की खिज भी गायब होने लगी,"..गोआ मे."
"गोआ?"
"हां,गोआ."
देवेन विजयंत मेहरा को गोआ कैसे ले गया ये वही जानता था.कुच्छ रास्ता उसने ट्रेन से कुच्छ बस से & कुच्छ टॅक्सी से तय किया.किसी के माशूर इंडस्ट्रियलिस्ट विजयंत मेहरा को पहचान लेने का ख़तरा था & इसीलिए उसे इतनी सावधानी बरतनी पड़ी.रंभा ने विजयंत की बेतरटीबी से बढ़ी दाढ़ी & बालो को बस थोड़ा सा काटा-च्चंता & बालो की पोनीटेल बनाके उसे ढीली टी-शर्ट & जेनस पहना दी थी ताकि वो कोई हिपी जैसा लगे & वो खुद डेवाले वापस लौट गयी थी.
समीर उस वक़्त बॉमबे मे था & उसने उस बात का फयडा उठाके उसकी चीज़ो की तलाशी ली लेकिन उसे कुच्छ भी ऐसा नही मिला जोकि गुत्थी सुलझाने मे उसकी मदद करता & तब उसे अपनी सहेली सोनम की याद आई & उसने उसे मिलने के लिए 1 5-स्तर होटेल के कॉफी शॉप मे बुलाया.
"सोनम,आजकल ऑफीस मे सब कैसा चल रहा है?"
"ठीक-ठाक लेकिन तू क्यू पुच्छ रही है?"
"& आज से पहले कैसा चल रहा था?",रंभा ने उसके सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया.
"मैं तेरी बात समझ नही पा रही,रंभा.",सोनम के माथे पे बल पड़ गये.
"रंभा,जब समीर लापता हुआ था & दाद उसकी खोज मे गये थे तो सब ठीक चल रहा था यहा?",अब सोनम सोच मे पड़ गयी.उसका दिल धड़कने लगा कि वो उसे प्रणव के बारे मे बताए या नही.उसे ये भी डर था की कही रंभा को उसके ब्रिज से जुड़े होने की बात तो पता नही चल गयी.
"क्या हू सोनम?तू चुप क्यू है?",रंभा ने उसके हाथ के उपर अपना हाथ रखा तो सोनम ने नज़रे उपर की.रंभा की नज़रो मे उसे कोई शक़ नही दिख रहा था बल्कि चिंता दिख रही थी.
"रंभा..वो.."
"हां,बोल ना!"
"देख,मुझे ये बात शायद विजयंत सर को या तुम्हे या फिर समीर को बता देनी चाहिए थी पर मैं बहुत घबरा गयी थी."
"मगर क्यू,सोनम?",उस वक़्त सोनम ने फ़ैसला किया कि अब अपने दिल का बोझ हल्का करने के लिए अपनी सहेली को सब बता देना ही सही होगा.
"यहा नही.मेरे घर चल.",दोनो वाहा से निकले & उसके घर पहुँचे.
"अब तो बता."
"रंभा,मुझे नही पता कि तुम मेरे बारे मे क्या सोचोगी लेकिन आज मैं तुम्हे सब बता देना चाहती हू..",सोनम ने ब्रिज से मिलने से लेके प्रणव के शाह से कोई डील करने तक की सारी बातें बता दी.रंभा उसे खामोशी से देख रही थी..सोनम ब्रिज की जासूस थी..& उसे भनक भी नही लगी..उस से दोस्ती भी क्या इसीलिए गाँठि उसने?..",तू मुझे धोखेबाज़ समझ रही है ना?..लेकिन रंभा,मैने तेरी दोस्ती से कभी फयडा उठाने की कोशिश नही की.हां,शुरू मे मैने सोचा था कि समीर से तेरी नज़दीकी का फयडा उठाऊं & उस वक़्त तुझे खोदती भी रहती थी ताकि कुच्छ इन्फर्मेशन मेरे हाथ लगे लेकिन बाद मे मुझे खुद पे बड़ी शर्म आई..",सोनम की आँखे छलक आई थी..क्या ग़लती थी उसकी?..& उस से भी बड़ा सवाल क्या वो इस बात का फ़ैसला करने वाली कौन होती है?..वो भी तो उसी के जैसी थी..बस अपना फयडा देखने वाली.
वो अपनी सुबक्ती हुई सहेली के करीब गयी & उसकी पीठ पे हाथ रखा,"कुच्छ ग़लत नही किया तूने.तेरी जगह मैं भी होती तो शायद ऐसा ही करती.",सोनम के दिल का गुबार उसकी आँखो से अब फूट-2 के बहने लगा & वो रंभा के गले से लग गयी,"..बस हो गया,अब चुप हो जा..कहा ना तेरी कोई ग़लती नही..हम जैसी लड़कियो को ऐसे फ़ैसले तो लेने ही पड़ते है ना!बस चुप हो जा!",1 बच्चे की तरह उसने उसे समझाया.
सोनम को अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था,"अब मेरी बात गौर से सुन,सोनम.डॅड की मौत की जो कहानी हमने सुनी है उसमे कुच्छ झूठ है."
"क्या?!मगर तुझे कैसे पता?"
"वो मैं तुझे बाद मे बताउन्गि क्यूकी अभी तक मुझे भी नही पता सही बात का.देख,उनकी मौत मे ब्रिज कोठारी का हाथ तो नही था."
"क्या?!"
"हां.",उसे देवेन ने बता दिया था कि सोनिया उस रात उसके ससुर के साथ होटेल से निकली थी & कंधार पहुँची थी ना कि अपने पति के साथ,"..& ये काम परिवार के ही किसी सदस्य का है."
"मतलब प्रणव?"
"तेरी बातो से मुझे उसपे भी शक़ होने लगा है."
"उसपे भी?"
"हां,पहले तो मुझे समीर पे शक़ था."
"वॉट?!"
"हां.अब हम दोनो को ये पता लगाना है कि आख़िर है कौन & उसे क्या फयडा हुआ डॅड की मौत से?"
"फयडा..हूँ..लेकिन समीर को क्या फयडा होगा..ग्रूप तो उसेही मिलना था अपने पिता के बाद."
"हां मगर मेरे लिए झगड़ा किया था उनसे उसने लेकिन..लेकिन फिर सब होने के बाद वो मुझसे ही बेरूख़् हो गया है."
"अच्छा?"
"हां,यार वो मेरे साथ सोता है,मेरे जिस्म को प्यार करता है लेकिन अब उसका प्यार मेरे दिल तक जैसे पहुँच ही नही पाता..मैं तो उसके साथ पहले जैसे ही बर्ताव करती हू मगर वो जैसे मुझे..मुझे.."
"भूल गया है?",सोनम ने सहेली की बात पूरी करनी चाही.
"नही.भूला नही जैसे अब मैं उसके लिए कोई मायने नही रखती."
"हूँ..तो तुझसे शादी भी कही उसकी किसी चाल का हिस्सा तो नही था?",रंभा ने चौंक के सहेली को देखा..इस तरह तो सोचा भी नही था उसने..मगर चल क्या हो सकती थी & क्यू?..फिर वही क्यू?..यानी मक़सद..समीर का मक़सद क्या था?..अगर शादी भी चाल थी तो उस चल का मक़सद था क्या?..रंभा का सर घूमने लगा था!
"तू थी तो है,रंभा?..ये ले पानी पी.",.सोनम ने उसे पनिका ग्लास थमाया & उसके साथ बैठ गयी.रंभा गतगत सारा पानी पी गयी.
"यार,हम कहा फँस गयी हैं!",उसने अपनी सहेली को देखा,"..बचपन से लेके जवानी ऐसे कमिनो मे गुज़ारे की दौलत & ऊँचा तबका हमारी ख्वाहिश ही नही जुनून भी हो गया लेकिन क्या ये सब उतनी ज़रूरी चीज़ें हैं जितना ये हमे लगती थी?",रंभा ने बहुत गहरी बात कह दी थी.सोनम ने आँखे झुका ली थी,"चल यार.अब ऐसे मुँह मत लटका.चल कही बाहर चल के बढ़िया खाना खाते हैं.इस मुसीबत से तो मैं निपट ही लूँगी.कोई मेरा इस्तेमाल करे & मैं उसे सबक ना सिखाऊँ,ऐसा तो होगा नही!",दोनो हंसते हुए उठे & बाहर जाने की तैय्यरी करने लगे.
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क्रमशः.......
JAAL paart--60
gataank se aage......
“ye kiska ghar hai rambha?”
“yaha ke vaid ka.”
“yaha kya mila hai tumhe?”
“ye.”,rambha ne chaukhat pe baithe shakhs ke chehre pe torch ki roshni mari.us shakhs ne bahut dhire se hath uthake roshni ko roka & fir aankhe meeche hath neeche kar roshni marne vale ko dekhne laga lekin vo kuchh bola nahi.deven aage badha & us shakhs ke chehre ko gaur se dekha & uske munh se hairat bhari chikh nikal gayi.
“hain!ye to..ye to..Vijayant Mehra hai.!”
"Ye mujhe nadi ke kinare pada mila tha..",Vaid Deven ko Vijayant Mehra ke milne ki kahani suna raha tha,"..yaha se bahut aage.main udhar jadi-butiyan chunane jata hu."
"aapne police ko ittila nahi ki?"
"ki thi lekin yaha koi pakki chauki nahi hai bas 1 hawaldar aata hai hafte me 1 baar.usne ise dekha & bola ki nadi me gir gaya hoga.usne kaha ki vo jake thanedar ko bata dega & fir vohi ye pata akrega ki iske jaise huliye vale kisi aadmi ke gum hone ki rapat likhayi gayi hai ya nahi."
"fir?"
"fir vo aaaj tak yaha nahi aaya hai."
"hun..vaise ise hua kya hai?..ye bolta kyu nahi?"
"ye dekho..",vaid kafi umradaraz tha & kafi der baithne ke baad uthne me use kafi taklif hoti thi.vo dhire se utha & kamre me baithe unhe dekhte vijayant ki or gaya.vijayant sab sun raha tha,unhe dekh raha tha lekin uski aankho me kahi bhi vo bhav nahi tha jise dekh ye lage ki use unki baaten samajh aa rahi thi ya nahi,"..is jagah..",usne uske mathe pe bayi taraf baal hatake dikhaya,"..pe gehri chot lagi thi ise.maine khoon rok ke tanke lagaye.ye bolta kyu nahi iska karan mujhe nahi pata.par itna zarur hai ki iske dimagh pe zor ki chot lagi hai & usi vajah se ya to iski yaaddasht gayi hai ya fir sochne & bolne ki taaqat.",vo vapas apni jagah pe baith gaya.
"vaise ise baaten samajh me to aati hai.ise bhookh lagti hai,pyas lagti hai.kaho to khada ho jayega,bolo to baith jayega magar khud kuchh kahega nahi na hi ishara karega."
"hun..hum ise apne sath le jate hain.vaha shehar me sarkari logo ke hawale kar denge to fir zara aapka hawaldar bhi chaukas hoga.dhila lagta hai mujhe vo."
"bahut achhe.zara yaha ki bijli ke bare me bhi baat karna."
"zarur.",dono vijayant ko vaha se le nikla aaye.rambha ne vaid ko kuchh paise de diye the.use ajib si khushi ho rahi thi lekin uski nigah gadi chalate deven pe bhi thi jo bahut sanjida lag raha tha.ab Devi Farm pe hui kisi baat ki vajahse ya fir vijayant ke milne ki vajah se,ye uski samajh me nahi aa raha tha.deven use chahne laga tha & vo ye bhi janta tha ki rambha ke tallukat vijayant ke sath bhi hain.usne use savere hi kaha tha ki is baat se use koi aitraz nahi ki vo uske alawa kisi & ko bhi chahe lekin tha to vo 1 mard hi.
"kya hua tha vaha?batae kyu nahi?",rambha ne apna sar uske kandhe pe rakh diya & uski bayi banh sehlane laga.
"batata hu.",deven ne uske sar ko thapthapaya & car chalate hue use sari baat batani shuru ki.
"gadi rokiye!",sari baat sunane ke baad vo boli.
"kya hua rambha?"
"gadi rokiye!",vo ruwansi ho gayi thi.deven ne brake lagaya to vo uske gale lag gayi & rone lagi.deven uske jazbato ko samajh raha tha.1 kamine ke swarth ne teen sindagiyo ko itne dino tak khushi se mehrum rakha tha & unme se 1 to ab is duniya me thi bhi nahi.
"itna khatra mol liya aapne..aap kitna chahte the maa ko aaj sahi mayno me samajh aa raha hai mujhe..uske dhokhe ki galatfehmi se hi itni nafrat paida hui thi aapke dil men.",rambha ki rulayi tham gayi thi & vo uske gaal ke nishan ko sehla rahi thi.
"haan,magar aaj sari galatfehmi door ho gayibas 1 baat ka gila reh gaya ki sumitra meri sachchai jane bagair chali gayi.",rambha ki rulai dobara chhut gayi.der tak deven use baaho me bhar samjhata raha.usne mud ke pichhli seat pe baithe vijayant ko dekha.usne 1 baar aavaz hone pe aankhe kholi thi & fir so gaya tha.
"chalo,ab chup ho jao.hume yaha se jald se jald nikalna hai.Baalam Singh drug dealer tha & uske marne ke baad ab uske log & police kutto ki tarah pure ilake ko sungh-2 ke chhanenge.",usne fir car start ki to seedha Clayworth jake hi roki.rambha Hotel Violet pahunch Sameer ko vijayant ke milne ke bare me batana chahti thi lekin deven ne use roka.use kuchh khatak raha tha.
"rambha,tum mujhe ye batao ki sameer jab Kamdhar pe police ko mila tha to usne kya bataya tha?",vo raat abhi bhi uske zehan me taza thi baad me usne & akhbaro me bhi pahda tha & khabron me bhi suna tha ki kaise brij & Soniya us sazish me shamil the & yehi baat use khatak rahi thi.rambha ne use sari baat bata di.
"lekin aap ye kyu puchh rahe hain?"
"ab meri samajh me aaya ki mujhe kya khatak raha tha.",usne khushi se steering pe hath mara,"..sameer jhuth kyu bol raha hai,rambha?"
"kya?sameer..jhuth..meri samajh me nahi aayi aapki baat.",rambha ke mathe pe shikan pad gayi thi.
"usne ye kyu kaha ki jharne pe uske hath panv bandhe hone ke karan vo apne baap ki madad nahi kar saka jabki haqeeqat ye thi ki uske panv khule the."
"kya?!"
"haan & use to ye dikhna hi nahi chahiye tha ki brij & soniya 1 sath aaye ki uska baap akela aaya."
"kyu?"
"kyuki uski aankho pe patti bandhi thi."
"kya?!..",rambha ke chehre pe kayi bhav aake chale gaye..sameer jhuth bol raha tha lekin kyu?..vijayant ki maut kya 1 hadsa nahi sazish thi?..sameer kya naraz tha use rambha se shadi karne pe group se alag karne se?..to iska matlab tha ki vo us se beintaha mohabbat karta tha lekin uske namune to vo us party me dekh hi chuki thi jab vo Kamya se pyar ke vade kar raha tha..aakhir sach kya tha?..sameer ka maqsad kya tha?
vo palti & pichhli seat pe bekhabar soye vijayant ko dekha,"ab kya karen?",usne deven ki or dekha.pehli baar use is sare mamle me darr ka ehsas hua tha.
"pehle to tum sameer ko is bare me zara bhi bhanak nahi lagne dogi..sameer kya kisi ko bhi nahi!ye raaz sirf mere tumhare beech rahega."
"thik hai magar inka kya karen?..inhe ilaj ki zarurat hai vo bhi bahut umda ilaj."
"hun..vo to main karwa dunga."
"magar kaise?"
"vo mujhpe chhodo."
"offoh..",tanav ki vajah se rambha jhalla gayi,"..mujhe bhi to bataiye kuchh..din me bhi mujhe akela bhej diya & ab abhi bhinahi bata rahe hain!",khijti rambha deven ko kisi bachchi ki tarah lagi..thi to vo 1 bachchi hi..vo to halaat ki darkar thi ki vo jaldi badi ho gayi.
"main iska ilaj karaunga.ise apne sat le jake..",usne use apni or khincha & uske chehre ko chumne laga.rambha ki khij bhi gayab hone lagi,"..Goa me."
"goa?"
"haan,goa."
Deven Vijayant Mehra ko Goa kaise le gaya ye vahi janta tha.kuchh rasta usne train se kuchh bus se & kuchh taxi se tay kiya.kisi ke mashoor industrialist Vijayant Mehra ko pehchan lene ka khatra tha & isiliye use itni savdhani baratni padi.Rambha ne vijayant ki betartibi se badhi dadhi & baalo ko bas thoda sa kata-chhanta & baalo ki ponytail banake use dhili t-shirt & jenas pehna di thi taki vo koi hippy jaisa lage & vo khud Devalay vapas laut gayi thi.
Sameer us waqt Bombay me tha & usne us baat ka fayda uthake uski chizo ki talashi li lekin use kuchh bhi aisa nahi mila joki gutthi suljhane me uski madad karta & tab use apni saheli Sonam ki yaad aayi & usne use milne ke liye 1 5-star hotel ke coffee shop me bulaya.
"sonam,aajkal office me sab kaisa chal raha hai?"
"thik-thak lekin tu kyu puchh rahi hai?"
"& aaj se pehle kaisa chal raha tha?",rambha ne useks awal ko nazarandaz kar diya.
"main teri baat samajh nahi pa rahi,rambha.",sonam ke mathe pe bal pad gaye.
"rambha,jab sameer lapata hua tha & dad uski khoj me gaye the to sab thik chal raha tha yaha?",ab sonam soch me pad gayi.uska dil dhadakne laga ki vo use Pranav ke bare me bataye ya nahi.use ye bhi darr tha ki lahi rambha ko uske Brij se jude hone ki baat to pata nahi chal gayi.
"kya hu sonam?tu chup kyu hai?",rambha ne uske hath ke uapr apna hath rakha to sonam ne nazre upar ki.rambha ki nazro me use koi shaq nahi dikh raha tha balki chinta dikh rahi thi.
"rambha..vo.."
"haan,bol na!"
"dekh,mujhe ye baat shayad vijayant sir ko ya tumhe ya fir sameer ko bata deni chahiye thi par main bahut ghabra gayi thi."
"magar kyu,sonam?",us waqt sonam ne faisla kiya ki ab apne dil ka bojh halka karne ke liye apnis aheli ko sab bata dena hi sahi hoga.
"yaha nahi.mere ghar chal.",dono vaha se nikle & uske ghar pahunche.
"ab to bata."
"rambha,mujhe nahi pata ki tum mere bare me kya sochogi lekin aaj main tumhe sab bata dena chahti hu..",sonam ne brij se milne se leke pranav ke Shah se koi deal karne tak ki sari baaten bata di.rambha use khamoshi se dekh rahi thi..sonam brij ki jasoos thi..& use bhanak bhi nahi lagi..us se dosti bhi kya isiliye ganthi usne?..",tu mujhe dhokhebaz samajh rahi hai na?..lekin rambha,maine teri dosti se kabhi fayda uthane ki koshsih nahi ki.haan,shuru me maine socha tha ki sameer se teri nazdiki ka fayda uthaoon & us waqt tujhe khodti bhi rehti thi taki kuchh information mere hath lage lekin baad me mujhe khud pe badi sharm aayi..",sonam ki aankhe chhalak aayi thi..kya galti thi uski?..& us se bhi bada sawal kya vo is baat ka faisla karne vali kaun hoti hai?..vo bhi to usi ke jaisi thi..bas apna fayda dekhne vali.
vo apni subakti hui saheli ke karib gayi & uski pith pe hath rakha,"kuchh galat nahi kiya tune.teri jagah main bhi hoti to shayad aisa hi karti.",sonam ke dil ka gubar uski aankho se ab phoot-2 ke behne laga & vo rambha ke gale se lag gayi,"..bas ho gaya,ab chup ho ja..kaha na teri koi galti nahi..hum jaisi ladkiyo ko aise faisle to lene hi padte hai na!bas chup ho ja!",1 bachche ki tarah usne use samjhaya.
sonam ko ab bahut halka mehsus ho raha tha,"ab meri baat gaur se sun,sonam.dad ki maut ki jo kahani humne suni hai usme kuchh jhuth hai."
"kya?!magar tujhe kaise pata?"
"vo main tujhe baad me bataungi kyuki abhi tak mujhe bhi nahi pata sahi baat ka.dekh,unki maut me Brij Kothari ka hath to nahi tha."
"kya?!"
"haan.",use deven ne bata diya tha ki Soniya us raat uske sasur ke sath hotel se nikli thi & Kamdhar pahunchi thi na ki apne pati ke sath,"..& ye kaam parivar ke hi kisi sadasya ka hai."
"matlab pranav?"
"teri baato se mujhe uspe bhi shaq hone laga hai."
"uspe bhi?"
"haan,pehle to mujhe sameer pe shaq tha."
"what?!"
"haan.ab hum dono ko ye pata lagana hai ki aakhir hai kaun & use kya fayda hua dad ki maut se?"
"fayda..hun..lekin sameer ko kya fayda hoga..group to usehi milna tha apne pita ke baad."
"haan magar mere liye jhagada kiya tha unse usne lekin..lekin fir sab hone ke baad vo mujhse hi berukh ho gaya hai."
"achha?"
"haan,yaar vo mere sath sota hai,mere jism ko pyar karta hai lekin ab uska pyar mere dil tak jaise pahunch hi nahi pata..main to uske sath pehle jaise hi bartav karti hu magar vo jaise mujhe..mujhe.."
"bhool gaya hai?",sonam ne saheli ki baat puri karni chahi.
"nahi.bhoola nahi jaise ab main uske liye koi mayne nahi rakhti."
"hun..to tujhse shadi bhi kahi uski kisi chaal ka hissa to nahi tha?",rambha ne chaunk ke saheli ko dekha..is tarah to socha bhi nahi tha usne..magar chal kya ho sakti thi & kyu?..fir vahi kyu?..yani maqsad..sameer ka maqsad kya tha?..agar shadi bhi chaal thi to us chal ka maqsad tha kya?..rambha ka sar ghumne laga tha!
"tu thi to hai,rambha?..ye le pani pi.",.sonam ne use panika glass thamaya & uske sath baith gayi.rambha gatagat sara pani pi gayi.
"yaar,hum kaha phans gayi hain!",usne apni saheli ko dekha,"..bachpan se leke jawani aise kamiyo me guzri ki daulat & ooncha tabka humari khwahish hi nahi junoon bhi ho gaya lekin kya ye sab utni zaruri chizen hain jitna ye hume lagti thi?",rambha ne bahut gehri baat keh di thi.sonam ne aankhe jhuka li thi,"chal yaar.ab aise munh mat latka.chal kahi bahar chal ke badhiya khana khate hain.is musibat se to main nipat hi lungi.koi mera istemal kare & main use sabak na sikhaoon,aisa to hoga nahi!",dono hanste hue uthe & bahar jane ki taiyyari karne lage.
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kramashah.......
गतान्क से आगे......
“ये किसका घर है रंभा?”
“यहा के वाइड का.”
“यहा क्या मिला है तुम्हे?”
“ये.”,रंभा ने चौखट पे बैठे शख्स के चेहरे पे टॉर्च की रोशनी मारी.उस शख्स ने बहुत धीरे से हाथ उठाके रोशनी को रोका & फिर आँखे मीचे हाथ नीचे कर रोशनी मारने वाले को देखने लगा लेकिन वो कुच्छ बोला नही.देवेन आगे बढ़ा & उस शख्स के चेहरे को गौर से देखा & उसके मुँह से हैरत भरी चीख निकल गयी.
“हैं!ये तो..ये तो..विजयंत मेहरा है.!”
"ये मुझे नदी के किनारे पड़ा मिला था..",वाइड देवेन को विजयंत मेहरा के मिलने की कहानी सुना रहा था,"..यहा से बहुत आयेज.मैं उधर जड़ी-बूटियाँ चुनने जाता हू."
"आपने पोलीस को इत्तिला नही की?"
"की थी लेकिन यहा कोई पक्की चौकी नही है बस 1 हवलदार आता है हफ्ते मे 1 बार.उसने इसे देखा & बोला कि नदी मे गिर गया होगा.उसने कहा कि वो जाके थानेदार को बता देगा & फिर वोही ये पता करेगा कि इसके जैसे हुलिए वाले किसी आदमी के गुम होने की रपट लिखाई गयी है या नही."
"फिर?"
"फिर वो आअज तक यहा नही आया है."
"हूँ..वैसे इसे हुआ क्या है?..ये बोलता क्यू नही?"
"ये देखो..",वाइड काफ़ी उम्रदराज़ था & काफ़ी देर बैठने के बाद उठने मे उसे काफ़ी तकलीफ़ होती थी.वो धीरे से उठा & कमरे मे बैठे उन्हे देखते विजयंत की ओर गया.विजयंत सब सुन रहा था,उन्हे देख रहा था लेकिन उसकी आँखो मे कही भी वो भाव नही था जिसे देख ये लगे कि उसे उनकी बातें समझ आ रही थी या नही,"..इस जगह..",उसने उसके माथे पे बाई तरफ बॉल हटा के दिखाया,"..पे गहरी चोट लगी थी इसे.मैने खून रोक के टाँके लगाए.ये बोलता क्यू नही इसका कारण मुझे नही पता.पर इतना ज़रूर है कि इसके दिमाग़ पे ज़ोर की चोट लगी है & उसी वजह से या तो इसकी याददाश्त गयी है या फिर सोचने & बोलने की ताक़त.",वो वापस अपनी जगह पे बैठ गया.
"वैसे इसे बातें समझ मे तो आती है.इसे भूख लगती है,प्यास लगती है.कहो तो खड़ा हो जाएगा,बोलो तो बैठ जाएगा मगर खुद कुच्छ कहेगा नही ना ही इशारा करेगा."
"हूँ..हम इसे अपने साथ ले जाते हैं.वाहा शहर मे सरकारी लोगो के हवाले कर देंगे तो फिर ज़रा आपका हवलदार भी चौकस होगा.ढीला लगता है मुझे वो."
"बहुत अच्छे.ज़रा यहा की बिजली के बारे मे भी बात करना."
"ज़रूर.",दोनो विजयंत को वाहा से ले निकल आए.रंभा ने वाइड को कुच्छ पैसे दे दिए थे.उसे अजीब सी खुशी हो रही थी लेकिन उसकी निगाह गाड़ी चलाते देवेन पे भी थी जो बहुत संजीदा लग रहा था.अब देवी फार्म पे हुई किसी बात की वजह से या फिर विजयंत के मिलने की वजह से,ये उसकी समझ मे नही आ रहा था.देवेन उसे चाहने लगा था & वो ये भी जानता था कि रंभा के ताल्लुक़ात विजयंत के साथ भी हैं.उसने उसे सवेरे ही कहा था कि इस बात से उसे कोई ऐतराज़ नही कि वो उसके अलावा किसी & को भी चाहे लेकिन था तो वो 1 मर्द ही.
"क्या हुआ था वाहा?बताए क्यू नही?",रंभा ने अपना सर उसके कंधे पे रख दिया & उसकी बाई बाँह सहलाने लगा.
"बताता हू.",देवेन ने उसके सर को थपथपाया & कार चलते हुए उसे सारी बात बतानी शुरू की.
"गाड़ी रोकिए!",सारी बात सुनने के बाद वो बोली.
"क्या हुआ रंभा?"
"गाड़ी रोकिए!",वो रुवन्सि हो गयी थी.देवेन ने ब्रेक लगाया तो वो उसके गले लग गयी & रोने लगी.देवेन उसके जज़्बातो को समझ रहा था.1 कामीने के स्वार्थ ने तीन जिंदगियो को इतने दिनो तक खुशी से महरूम रखा था & उनमे से 1 तो अब इस दुनिया मे थी भी नही.
"इतना ख़तरा मोल लिया आपने..आप कितना चाहते थे मा को आज सही मयनो मे समझ आ रहा है मुझे..उसके धोखे की ग़लतफहमी से ही इतनी नफ़रत पैदा हुई थी आपके दिल में.",रंभा की रुलाई थम गयी थी & वो उसके गाल के निशान को सहला रही थी.
"हां,मगर आज सारी ग़लतफहमी दूर हो गयी बस 1 बात का गीला रह गया की सुमित्रा मेरी सच्चाई जाने बगैर चली गयी.",रंभा की रुलाई दोबारा छूट गयी.देर तक देवेन उसे बाहो मे भर समझाता रहा.उसने मूड के पिच्छली सीट पे बैठे विजयंत को देखा.उसने 1 बार आवाज़ होने पे आँखे खोली थी & फिर सो गया था.
"चलो,अब चुप हो जाओ.हमे यहा से जल्द से जल्द निकलना है.बालम सिंग ड्रग डीलर था & उसके मरने के बाद अब उसके लोग & पोलीस कुत्तो की तरह पूरे इलाक़े को सूंघ-2 के छनेन्गे.",उसने फिर कार स्टार्ट की तो सीधा क्लेवर्त जाके ही रोकी.रंभा होटेल वाय्लेट पहुँच समीर को विजयंत के मिलने के बारे मे बताना चाहती थी लेकिन देवेन ने उसे रोका.उसे कुच्छ खटक रहा था.
"रंभा,तुम मुझे ये बताओ कि समीर जब कंधार पे पोलीस को मिला था तो उसने क्या बताया था?",वो रात अभी भी उसके ज़हन मे ताज़ा थी बाद मे उसने & अख़बारो मे भी पढ़ा था & खबरों मे भी सुना था कि कैसे ब्रिज & सोनिया उस साज़िश मे शामिल थे & यही बात उसे खटक रही थी.रंभा ने उसे सारी बात बता दी.
"लेकिन आप ये क्यू पुच्छ रहे हैं?"
"अब मेरी समझ मे आया कि मुझे क्या खटक रहा था.",उसने खुशी से स्टियरिंग पे हाथ मारा,"..समीर झूठ क्यू बोल रहा है,रंभा?"
"क्या?समीर..झूठ..मेरी समझ मे नही आई आपकी बात.",रंभा के माथे पे शिकन पड़ गयी थी.
"उसने ये क्यू कहा कि झरने पे उसके हाथ पाँव बँधे होने के कारण वो अपने बाप की मदद नही कर सका जबकि हक़ीक़त ये थी कि उसके पाँव खुले थे."
"क्या?!"
"हां & उसे तो ये दिखना ही नही चाहिए था कि ब्रिज & सोनिया 1 साथ आए कि उसका बाप अकेला आया."
"क्यू?"
"क्यूकी उसकी आँखो पे पट्टी बँधी थी."
"क्या?!..",रंभा के चेहरे पे काई भाव आके चले गये..समीर झूठ बोल रहा था लेकिन क्यू?..विजयंत की मौत क्या 1 हादसा नही साज़िश थी?..समीर क्या नाराज़ था उसे रंभा से शादी करने पे ग्रूप से अलग करने से?..तो इसका मतलब था कि वो उस से बेइंतहा मोहब्बत करता था लेकिन उसके नमूने तो वो उस पार्टी मे देख ही चुकी थी जब वो कामया से प्यार के वादे कर रहा था..आख़िर सच क्या था?..समीर का मक़सद क्या था?
वो पलटी & पिच्छली सीट पे बेख़बर सोए विजयंत को देखा,"अब क्या करें?",उसने देवेन की ओर देखा.पहली बार उसे इस सारे मामले मे डर का एहसास हुआ था.
"पहले तो तुम समीर को इस बारे मे ज़रा भी भनक नही लगने दोगि..समीर क्या किसी को भी नही!ये राज़ सिर्फ़ मेरे तुम्हारे बीच रहेगा."
"ठीक है मगर इनका क्या करें?..इन्हे इलाज की ज़रूरत है वो भी बहुत उम्दा इलाज."
"हूँ..वो तो मैं करवा दूँगा."
"मगर कैसे?"
"वो मुझपे छ्चोड़ो."
"ओफ्फो..",तनाव की वजह से रंभा झल्ला गयी,"..मुझे भी तो बताइए कुच्छ..दिन मे भी मुझे अकेला भेज दिया & अब अभी भी नही बता रहे हैं!",खीजती रंभा देवेन को किसी बच्ची की तरह लगी..थी तो वो 1 बच्ची ही..वो तो हालात की दरकार थी की वो जल्दी बड़ी हो गयी.
"मैं इसका इलाज कारवंगा.इसे अपने साथ ले जाके..",उसने उसे अपनी ओर खींचा & उसके चेहरे को चूमने लगा.रंभा की खिज भी गायब होने लगी,"..गोआ मे."
"गोआ?"
"हां,गोआ."
देवेन विजयंत मेहरा को गोआ कैसे ले गया ये वही जानता था.कुच्छ रास्ता उसने ट्रेन से कुच्छ बस से & कुच्छ टॅक्सी से तय किया.किसी के माशूर इंडस्ट्रियलिस्ट विजयंत मेहरा को पहचान लेने का ख़तरा था & इसीलिए उसे इतनी सावधानी बरतनी पड़ी.रंभा ने विजयंत की बेतरटीबी से बढ़ी दाढ़ी & बालो को बस थोड़ा सा काटा-च्चंता & बालो की पोनीटेल बनाके उसे ढीली टी-शर्ट & जेनस पहना दी थी ताकि वो कोई हिपी जैसा लगे & वो खुद डेवाले वापस लौट गयी थी.
समीर उस वक़्त बॉमबे मे था & उसने उस बात का फयडा उठाके उसकी चीज़ो की तलाशी ली लेकिन उसे कुच्छ भी ऐसा नही मिला जोकि गुत्थी सुलझाने मे उसकी मदद करता & तब उसे अपनी सहेली सोनम की याद आई & उसने उसे मिलने के लिए 1 5-स्तर होटेल के कॉफी शॉप मे बुलाया.
"सोनम,आजकल ऑफीस मे सब कैसा चल रहा है?"
"ठीक-ठाक लेकिन तू क्यू पुच्छ रही है?"
"& आज से पहले कैसा चल रहा था?",रंभा ने उसके सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया.
"मैं तेरी बात समझ नही पा रही,रंभा.",सोनम के माथे पे बल पड़ गये.
"रंभा,जब समीर लापता हुआ था & दाद उसकी खोज मे गये थे तो सब ठीक चल रहा था यहा?",अब सोनम सोच मे पड़ गयी.उसका दिल धड़कने लगा कि वो उसे प्रणव के बारे मे बताए या नही.उसे ये भी डर था की कही रंभा को उसके ब्रिज से जुड़े होने की बात तो पता नही चल गयी.
"क्या हू सोनम?तू चुप क्यू है?",रंभा ने उसके हाथ के उपर अपना हाथ रखा तो सोनम ने नज़रे उपर की.रंभा की नज़रो मे उसे कोई शक़ नही दिख रहा था बल्कि चिंता दिख रही थी.
"रंभा..वो.."
"हां,बोल ना!"
"देख,मुझे ये बात शायद विजयंत सर को या तुम्हे या फिर समीर को बता देनी चाहिए थी पर मैं बहुत घबरा गयी थी."
"मगर क्यू,सोनम?",उस वक़्त सोनम ने फ़ैसला किया कि अब अपने दिल का बोझ हल्का करने के लिए अपनी सहेली को सब बता देना ही सही होगा.
"यहा नही.मेरे घर चल.",दोनो वाहा से निकले & उसके घर पहुँचे.
"अब तो बता."
"रंभा,मुझे नही पता कि तुम मेरे बारे मे क्या सोचोगी लेकिन आज मैं तुम्हे सब बता देना चाहती हू..",सोनम ने ब्रिज से मिलने से लेके प्रणव के शाह से कोई डील करने तक की सारी बातें बता दी.रंभा उसे खामोशी से देख रही थी..सोनम ब्रिज की जासूस थी..& उसे भनक भी नही लगी..उस से दोस्ती भी क्या इसीलिए गाँठि उसने?..",तू मुझे धोखेबाज़ समझ रही है ना?..लेकिन रंभा,मैने तेरी दोस्ती से कभी फयडा उठाने की कोशिश नही की.हां,शुरू मे मैने सोचा था कि समीर से तेरी नज़दीकी का फयडा उठाऊं & उस वक़्त तुझे खोदती भी रहती थी ताकि कुच्छ इन्फर्मेशन मेरे हाथ लगे लेकिन बाद मे मुझे खुद पे बड़ी शर्म आई..",सोनम की आँखे छलक आई थी..क्या ग़लती थी उसकी?..& उस से भी बड़ा सवाल क्या वो इस बात का फ़ैसला करने वाली कौन होती है?..वो भी तो उसी के जैसी थी..बस अपना फयडा देखने वाली.
वो अपनी सुबक्ती हुई सहेली के करीब गयी & उसकी पीठ पे हाथ रखा,"कुच्छ ग़लत नही किया तूने.तेरी जगह मैं भी होती तो शायद ऐसा ही करती.",सोनम के दिल का गुबार उसकी आँखो से अब फूट-2 के बहने लगा & वो रंभा के गले से लग गयी,"..बस हो गया,अब चुप हो जा..कहा ना तेरी कोई ग़लती नही..हम जैसी लड़कियो को ऐसे फ़ैसले तो लेने ही पड़ते है ना!बस चुप हो जा!",1 बच्चे की तरह उसने उसे समझाया.
सोनम को अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था,"अब मेरी बात गौर से सुन,सोनम.डॅड की मौत की जो कहानी हमने सुनी है उसमे कुच्छ झूठ है."
"क्या?!मगर तुझे कैसे पता?"
"वो मैं तुझे बाद मे बताउन्गि क्यूकी अभी तक मुझे भी नही पता सही बात का.देख,उनकी मौत मे ब्रिज कोठारी का हाथ तो नही था."
"क्या?!"
"हां.",उसे देवेन ने बता दिया था कि सोनिया उस रात उसके ससुर के साथ होटेल से निकली थी & कंधार पहुँची थी ना कि अपने पति के साथ,"..& ये काम परिवार के ही किसी सदस्य का है."
"मतलब प्रणव?"
"तेरी बातो से मुझे उसपे भी शक़ होने लगा है."
"उसपे भी?"
"हां,पहले तो मुझे समीर पे शक़ था."
"वॉट?!"
"हां.अब हम दोनो को ये पता लगाना है कि आख़िर है कौन & उसे क्या फयडा हुआ डॅड की मौत से?"
"फयडा..हूँ..लेकिन समीर को क्या फयडा होगा..ग्रूप तो उसेही मिलना था अपने पिता के बाद."
"हां मगर मेरे लिए झगड़ा किया था उनसे उसने लेकिन..लेकिन फिर सब होने के बाद वो मुझसे ही बेरूख़् हो गया है."
"अच्छा?"
"हां,यार वो मेरे साथ सोता है,मेरे जिस्म को प्यार करता है लेकिन अब उसका प्यार मेरे दिल तक जैसे पहुँच ही नही पाता..मैं तो उसके साथ पहले जैसे ही बर्ताव करती हू मगर वो जैसे मुझे..मुझे.."
"भूल गया है?",सोनम ने सहेली की बात पूरी करनी चाही.
"नही.भूला नही जैसे अब मैं उसके लिए कोई मायने नही रखती."
"हूँ..तो तुझसे शादी भी कही उसकी किसी चाल का हिस्सा तो नही था?",रंभा ने चौंक के सहेली को देखा..इस तरह तो सोचा भी नही था उसने..मगर चल क्या हो सकती थी & क्यू?..फिर वही क्यू?..यानी मक़सद..समीर का मक़सद क्या था?..अगर शादी भी चाल थी तो उस चल का मक़सद था क्या?..रंभा का सर घूमने लगा था!
"तू थी तो है,रंभा?..ये ले पानी पी.",.सोनम ने उसे पनिका ग्लास थमाया & उसके साथ बैठ गयी.रंभा गतगत सारा पानी पी गयी.
"यार,हम कहा फँस गयी हैं!",उसने अपनी सहेली को देखा,"..बचपन से लेके जवानी ऐसे कमिनो मे गुज़ारे की दौलत & ऊँचा तबका हमारी ख्वाहिश ही नही जुनून भी हो गया लेकिन क्या ये सब उतनी ज़रूरी चीज़ें हैं जितना ये हमे लगती थी?",रंभा ने बहुत गहरी बात कह दी थी.सोनम ने आँखे झुका ली थी,"चल यार.अब ऐसे मुँह मत लटका.चल कही बाहर चल के बढ़िया खाना खाते हैं.इस मुसीबत से तो मैं निपट ही लूँगी.कोई मेरा इस्तेमाल करे & मैं उसे सबक ना सिखाऊँ,ऐसा तो होगा नही!",दोनो हंसते हुए उठे & बाहर जाने की तैय्यरी करने लगे.
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क्रमशः.......
JAAL paart--60
gataank se aage......
“ye kiska ghar hai rambha?”
“yaha ke vaid ka.”
“yaha kya mila hai tumhe?”
“ye.”,rambha ne chaukhat pe baithe shakhs ke chehre pe torch ki roshni mari.us shakhs ne bahut dhire se hath uthake roshni ko roka & fir aankhe meeche hath neeche kar roshni marne vale ko dekhne laga lekin vo kuchh bola nahi.deven aage badha & us shakhs ke chehre ko gaur se dekha & uske munh se hairat bhari chikh nikal gayi.
“hain!ye to..ye to..Vijayant Mehra hai.!”
"Ye mujhe nadi ke kinare pada mila tha..",Vaid Deven ko Vijayant Mehra ke milne ki kahani suna raha tha,"..yaha se bahut aage.main udhar jadi-butiyan chunane jata hu."
"aapne police ko ittila nahi ki?"
"ki thi lekin yaha koi pakki chauki nahi hai bas 1 hawaldar aata hai hafte me 1 baar.usne ise dekha & bola ki nadi me gir gaya hoga.usne kaha ki vo jake thanedar ko bata dega & fir vohi ye pata akrega ki iske jaise huliye vale kisi aadmi ke gum hone ki rapat likhayi gayi hai ya nahi."
"fir?"
"fir vo aaaj tak yaha nahi aaya hai."
"hun..vaise ise hua kya hai?..ye bolta kyu nahi?"
"ye dekho..",vaid kafi umradaraz tha & kafi der baithne ke baad uthne me use kafi taklif hoti thi.vo dhire se utha & kamre me baithe unhe dekhte vijayant ki or gaya.vijayant sab sun raha tha,unhe dekh raha tha lekin uski aankho me kahi bhi vo bhav nahi tha jise dekh ye lage ki use unki baaten samajh aa rahi thi ya nahi,"..is jagah..",usne uske mathe pe bayi taraf baal hatake dikhaya,"..pe gehri chot lagi thi ise.maine khoon rok ke tanke lagaye.ye bolta kyu nahi iska karan mujhe nahi pata.par itna zarur hai ki iske dimagh pe zor ki chot lagi hai & usi vajah se ya to iski yaaddasht gayi hai ya fir sochne & bolne ki taaqat.",vo vapas apni jagah pe baith gaya.
"vaise ise baaten samajh me to aati hai.ise bhookh lagti hai,pyas lagti hai.kaho to khada ho jayega,bolo to baith jayega magar khud kuchh kahega nahi na hi ishara karega."
"hun..hum ise apne sath le jate hain.vaha shehar me sarkari logo ke hawale kar denge to fir zara aapka hawaldar bhi chaukas hoga.dhila lagta hai mujhe vo."
"bahut achhe.zara yaha ki bijli ke bare me bhi baat karna."
"zarur.",dono vijayant ko vaha se le nikla aaye.rambha ne vaid ko kuchh paise de diye the.use ajib si khushi ho rahi thi lekin uski nigah gadi chalate deven pe bhi thi jo bahut sanjida lag raha tha.ab Devi Farm pe hui kisi baat ki vajahse ya fir vijayant ke milne ki vajah se,ye uski samajh me nahi aa raha tha.deven use chahne laga tha & vo ye bhi janta tha ki rambha ke tallukat vijayant ke sath bhi hain.usne use savere hi kaha tha ki is baat se use koi aitraz nahi ki vo uske alawa kisi & ko bhi chahe lekin tha to vo 1 mard hi.
"kya hua tha vaha?batae kyu nahi?",rambha ne apna sar uske kandhe pe rakh diya & uski bayi banh sehlane laga.
"batata hu.",deven ne uske sar ko thapthapaya & car chalate hue use sari baat batani shuru ki.
"gadi rokiye!",sari baat sunane ke baad vo boli.
"kya hua rambha?"
"gadi rokiye!",vo ruwansi ho gayi thi.deven ne brake lagaya to vo uske gale lag gayi & rone lagi.deven uske jazbato ko samajh raha tha.1 kamine ke swarth ne teen sindagiyo ko itne dino tak khushi se mehrum rakha tha & unme se 1 to ab is duniya me thi bhi nahi.
"itna khatra mol liya aapne..aap kitna chahte the maa ko aaj sahi mayno me samajh aa raha hai mujhe..uske dhokhe ki galatfehmi se hi itni nafrat paida hui thi aapke dil men.",rambha ki rulayi tham gayi thi & vo uske gaal ke nishan ko sehla rahi thi.
"haan,magar aaj sari galatfehmi door ho gayibas 1 baat ka gila reh gaya ki sumitra meri sachchai jane bagair chali gayi.",rambha ki rulai dobara chhut gayi.der tak deven use baaho me bhar samjhata raha.usne mud ke pichhli seat pe baithe vijayant ko dekha.usne 1 baar aavaz hone pe aankhe kholi thi & fir so gaya tha.
"chalo,ab chup ho jao.hume yaha se jald se jald nikalna hai.Baalam Singh drug dealer tha & uske marne ke baad ab uske log & police kutto ki tarah pure ilake ko sungh-2 ke chhanenge.",usne fir car start ki to seedha Clayworth jake hi roki.rambha Hotel Violet pahunch Sameer ko vijayant ke milne ke bare me batana chahti thi lekin deven ne use roka.use kuchh khatak raha tha.
"rambha,tum mujhe ye batao ki sameer jab Kamdhar pe police ko mila tha to usne kya bataya tha?",vo raat abhi bhi uske zehan me taza thi baad me usne & akhbaro me bhi pahda tha & khabron me bhi suna tha ki kaise brij & Soniya us sazish me shamil the & yehi baat use khatak rahi thi.rambha ne use sari baat bata di.
"lekin aap ye kyu puchh rahe hain?"
"ab meri samajh me aaya ki mujhe kya khatak raha tha.",usne khushi se steering pe hath mara,"..sameer jhuth kyu bol raha hai,rambha?"
"kya?sameer..jhuth..meri samajh me nahi aayi aapki baat.",rambha ke mathe pe shikan pad gayi thi.
"usne ye kyu kaha ki jharne pe uske hath panv bandhe hone ke karan vo apne baap ki madad nahi kar saka jabki haqeeqat ye thi ki uske panv khule the."
"kya?!"
"haan & use to ye dikhna hi nahi chahiye tha ki brij & soniya 1 sath aaye ki uska baap akela aaya."
"kyu?"
"kyuki uski aankho pe patti bandhi thi."
"kya?!..",rambha ke chehre pe kayi bhav aake chale gaye..sameer jhuth bol raha tha lekin kyu?..vijayant ki maut kya 1 hadsa nahi sazish thi?..sameer kya naraz tha use rambha se shadi karne pe group se alag karne se?..to iska matlab tha ki vo us se beintaha mohabbat karta tha lekin uske namune to vo us party me dekh hi chuki thi jab vo Kamya se pyar ke vade kar raha tha..aakhir sach kya tha?..sameer ka maqsad kya tha?
vo palti & pichhli seat pe bekhabar soye vijayant ko dekha,"ab kya karen?",usne deven ki or dekha.pehli baar use is sare mamle me darr ka ehsas hua tha.
"pehle to tum sameer ko is bare me zara bhi bhanak nahi lagne dogi..sameer kya kisi ko bhi nahi!ye raaz sirf mere tumhare beech rahega."
"thik hai magar inka kya karen?..inhe ilaj ki zarurat hai vo bhi bahut umda ilaj."
"hun..vo to main karwa dunga."
"magar kaise?"
"vo mujhpe chhodo."
"offoh..",tanav ki vajah se rambha jhalla gayi,"..mujhe bhi to bataiye kuchh..din me bhi mujhe akela bhej diya & ab abhi bhinahi bata rahe hain!",khijti rambha deven ko kisi bachchi ki tarah lagi..thi to vo 1 bachchi hi..vo to halaat ki darkar thi ki vo jaldi badi ho gayi.
"main iska ilaj karaunga.ise apne sat le jake..",usne use apni or khincha & uske chehre ko chumne laga.rambha ki khij bhi gayab hone lagi,"..Goa me."
"goa?"
"haan,goa."
Deven Vijayant Mehra ko Goa kaise le gaya ye vahi janta tha.kuchh rasta usne train se kuchh bus se & kuchh taxi se tay kiya.kisi ke mashoor industrialist Vijayant Mehra ko pehchan lene ka khatra tha & isiliye use itni savdhani baratni padi.Rambha ne vijayant ki betartibi se badhi dadhi & baalo ko bas thoda sa kata-chhanta & baalo ki ponytail banake use dhili t-shirt & jenas pehna di thi taki vo koi hippy jaisa lage & vo khud Devalay vapas laut gayi thi.
Sameer us waqt Bombay me tha & usne us baat ka fayda uthake uski chizo ki talashi li lekin use kuchh bhi aisa nahi mila joki gutthi suljhane me uski madad karta & tab use apni saheli Sonam ki yaad aayi & usne use milne ke liye 1 5-star hotel ke coffee shop me bulaya.
"sonam,aajkal office me sab kaisa chal raha hai?"
"thik-thak lekin tu kyu puchh rahi hai?"
"& aaj se pehle kaisa chal raha tha?",rambha ne useks awal ko nazarandaz kar diya.
"main teri baat samajh nahi pa rahi,rambha.",sonam ke mathe pe bal pad gaye.
"rambha,jab sameer lapata hua tha & dad uski khoj me gaye the to sab thik chal raha tha yaha?",ab sonam soch me pad gayi.uska dil dhadakne laga ki vo use Pranav ke bare me bataye ya nahi.use ye bhi darr tha ki lahi rambha ko uske Brij se jude hone ki baat to pata nahi chal gayi.
"kya hu sonam?tu chup kyu hai?",rambha ne uske hath ke uapr apna hath rakha to sonam ne nazre upar ki.rambha ki nazro me use koi shaq nahi dikh raha tha balki chinta dikh rahi thi.
"rambha..vo.."
"haan,bol na!"
"dekh,mujhe ye baat shayad vijayant sir ko ya tumhe ya fir sameer ko bata deni chahiye thi par main bahut ghabra gayi thi."
"magar kyu,sonam?",us waqt sonam ne faisla kiya ki ab apne dil ka bojh halka karne ke liye apnis aheli ko sab bata dena hi sahi hoga.
"yaha nahi.mere ghar chal.",dono vaha se nikle & uske ghar pahunche.
"ab to bata."
"rambha,mujhe nahi pata ki tum mere bare me kya sochogi lekin aaj main tumhe sab bata dena chahti hu..",sonam ne brij se milne se leke pranav ke Shah se koi deal karne tak ki sari baaten bata di.rambha use khamoshi se dekh rahi thi..sonam brij ki jasoos thi..& use bhanak bhi nahi lagi..us se dosti bhi kya isiliye ganthi usne?..",tu mujhe dhokhebaz samajh rahi hai na?..lekin rambha,maine teri dosti se kabhi fayda uthane ki koshsih nahi ki.haan,shuru me maine socha tha ki sameer se teri nazdiki ka fayda uthaoon & us waqt tujhe khodti bhi rehti thi taki kuchh information mere hath lage lekin baad me mujhe khud pe badi sharm aayi..",sonam ki aankhe chhalak aayi thi..kya galti thi uski?..& us se bhi bada sawal kya vo is baat ka faisla karne vali kaun hoti hai?..vo bhi to usi ke jaisi thi..bas apna fayda dekhne vali.
vo apni subakti hui saheli ke karib gayi & uski pith pe hath rakha,"kuchh galat nahi kiya tune.teri jagah main bhi hoti to shayad aisa hi karti.",sonam ke dil ka gubar uski aankho se ab phoot-2 ke behne laga & vo rambha ke gale se lag gayi,"..bas ho gaya,ab chup ho ja..kaha na teri koi galti nahi..hum jaisi ladkiyo ko aise faisle to lene hi padte hai na!bas chup ho ja!",1 bachche ki tarah usne use samjhaya.
sonam ko ab bahut halka mehsus ho raha tha,"ab meri baat gaur se sun,sonam.dad ki maut ki jo kahani humne suni hai usme kuchh jhuth hai."
"kya?!magar tujhe kaise pata?"
"vo main tujhe baad me bataungi kyuki abhi tak mujhe bhi nahi pata sahi baat ka.dekh,unki maut me Brij Kothari ka hath to nahi tha."
"kya?!"
"haan.",use deven ne bata diya tha ki Soniya us raat uske sasur ke sath hotel se nikli thi & Kamdhar pahunchi thi na ki apne pati ke sath,"..& ye kaam parivar ke hi kisi sadasya ka hai."
"matlab pranav?"
"teri baato se mujhe uspe bhi shaq hone laga hai."
"uspe bhi?"
"haan,pehle to mujhe sameer pe shaq tha."
"what?!"
"haan.ab hum dono ko ye pata lagana hai ki aakhir hai kaun & use kya fayda hua dad ki maut se?"
"fayda..hun..lekin sameer ko kya fayda hoga..group to usehi milna tha apne pita ke baad."
"haan magar mere liye jhagada kiya tha unse usne lekin..lekin fir sab hone ke baad vo mujhse hi berukh ho gaya hai."
"achha?"
"haan,yaar vo mere sath sota hai,mere jism ko pyar karta hai lekin ab uska pyar mere dil tak jaise pahunch hi nahi pata..main to uske sath pehle jaise hi bartav karti hu magar vo jaise mujhe..mujhe.."
"bhool gaya hai?",sonam ne saheli ki baat puri karni chahi.
"nahi.bhoola nahi jaise ab main uske liye koi mayne nahi rakhti."
"hun..to tujhse shadi bhi kahi uski kisi chaal ka hissa to nahi tha?",rambha ne chaunk ke saheli ko dekha..is tarah to socha bhi nahi tha usne..magar chal kya ho sakti thi & kyu?..fir vahi kyu?..yani maqsad..sameer ka maqsad kya tha?..agar shadi bhi chaal thi to us chal ka maqsad tha kya?..rambha ka sar ghumne laga tha!
"tu thi to hai,rambha?..ye le pani pi.",.sonam ne use panika glass thamaya & uske sath baith gayi.rambha gatagat sara pani pi gayi.
"yaar,hum kaha phans gayi hain!",usne apni saheli ko dekha,"..bachpan se leke jawani aise kamiyo me guzri ki daulat & ooncha tabka humari khwahish hi nahi junoon bhi ho gaya lekin kya ye sab utni zaruri chizen hain jitna ye hume lagti thi?",rambha ne bahut gehri baat keh di thi.sonam ne aankhe jhuka li thi,"chal yaar.ab aise munh mat latka.chal kahi bahar chal ke badhiya khana khate hain.is musibat se to main nipat hi lungi.koi mera istemal kare & main use sabak na sikhaoon,aisa to hoga nahi!",dono hanste hue uthe & bahar jane ki taiyyari karne lage.
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kramashah.......