• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#10

"इस गाँव का हर घर मेरा है , हर आदमी मेरा भाई-बेटा है . हर औरत मेरी बहन-बेटी है . इस गाँव की खुशहाली के लिए हम सब ने मिलकर कुछ नियम बनाये है ताकि भाई-चारा बना रहे. इस गाँव में बहुत सी जाती के लोग बसे हुए है पर आज तक ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे किसी भी गाँव वाले का सर झुका हो. इस प्रेम प्यार का एकमात्र कारण है हमारे उसूल जिन पर हम सब चलते आ रहे है . लाली हम में से एक थी पर उसने पर पुरुष का साथ किया जो की अनुचित है . चूँकि पंचायत के माननीय सदस्यों ने निर्णय कर ही लिया तो हम सब को निर्णय का उच्चित सम्मान करना चाहिए " पिताजी ने कहा .

पिताजी की बात सुनकर मुझ बहुत गहरा धक्का लगा राय चंद जी एक अनुचित काम को समर्थन दे रहे थे .

"पंचायत के निर्णय को मैं अपनी जुती की नोक पर रखता हूँ , मैं देखता हूँ कौन हाथ लगाता है मेरे होते हुए इन दोनों को " मैंने गुस्से से कहा .

"तुम अपनी सीमा लांघ रहे हो कबीर " पिताजी की आवाज में तल्खी थी.

"कुंवर, आपको हमारे लिए इन लोगो से झगडा करने की जरुरत नहीं है . आपने हमें समझा यही बड़ी बात है , ये झूठी शान में जीने वाले लोग कभी प्रेम को नहीं समझ सकते. हमारी नियति में जो है वो हमें मिलेगा." लाली ने अपने हाथ मेरे सामने जोड़ते हुए कहा .

मैं- जीवन इश्वर का अनमोल तोहफा है और किसी को भी हक़ नहीं उसे नष्ट करने का सिवाय इश्वर के.

इस से पहले की मेरी बात ख़तम होती पिताजी का थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ चूका था . जिस पिता ने कभी ऊँगली तक मेरी तरफ नहीं की थी उसने पुरे गाँव के सामने मुझे थप्पड़ मारा था .

"हमने कहा था न की अपनी सीमा मत लाँघो कबीर. इस दुनिया में किसी की भी हिम्मत नहीं की हमारी बात काट सके.पंचायत की निर्णय की तुरंत तामिल की जाए " पिताजी की गरजती आवाज चौपाल में गूँज रही थी .

तुंरत ही कुछ लोग लाली की तरफ लपके .

मैं- खबरदार जो इन दोनों को किसी ने भी हाथ लगाया जो हाथ लाली की तरफ बढेगा उस हाथ को उखाड़ दूंगा मैं.

पिताजी- निर्णय की पालना में यदि कोई भी अडचन डालता है तो खुली छूट है उसे सबक सिखाने की .

पिताजी का निर्णय गाँव वालो के लिए पत्थर की लकीर थी पर मेरी रगों में भी राय साहब का खून था. जिन गाँव वालो के साथ मैं बचपन से खेलता आ रहा था जिनके साथ हंसी खुशी में मैं शामिल था उनसे भीड़ गया था मैं. दो चार को तो धर लिया था मैंने पर मैं कोई बलशाली भीम नहीं था भीड़ मुझ पर हावी होने वाली थी . मेरी पूरी कोशिश थी की लाली को कोई हाथ भी नहीं लगा पाए.

मैंने एक पंच की कुर्सी उठा ली और उसे अपना हथियार बना लिया. जो भी जहाँ भी जिसे भी लगे मुझे परवाह नहीं थी . पंचायत की जिद थी तो मेरी भी जिद थी मेरे रहते वो लोग लाली को फांसी नहीं दे सकते थे . पर तभी अचानक से सब कुछ बदल गया . मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया . पीछे से किसी ने मेरे सर पर मारा था . वार जोरदार था . मैंने खुद को गिरते हुए देखा और फिर मुझे कुछ याद नहीं रहा.

आँख खुली तो मैंने खुद को अपने चौबारे में पाया . चाची, भाभी, मंगू, चंपा सब लोग आस पास बैठे हुए थे . मैं तुरंत बिस्तर से उठ बैठा .

"लाली , " मैंने बस इतना कहा

भाभी- शांत हो जाओ देवर जी, चोट लगी है तुम्हे

भाभी ने एक गिलास पानी का मुझे दिया कुछ घूँट भरे मैंने पाया की सर पर पट्टी बंधी थी और दर्द बेशुमार था .

"लाली के साथ क्या किया उन्होंने " मैंने कहा

चंपा- भाड़ में गयी लाली, हमारे लिए तुम महत्वपूर्ण हो कबीर. क्या जरुरत थी तुम्हे फसाद करने की मालूम है कितनी चोट लगी है तुम्हे.

चाची की आँखों में आंसू थे पर मेरा दिल जोर से धडक रहा था .मैं बिस्तर से उतरा और एक शाल लपेट पर चोबारे से बाहर निकल गया .

"कहाँ जा रहे हो भाई " मंगू ने कहा पर मैंने कोई जवाब नहीं दिया. साइकिल उठा कर मैं चौपाल पर पहुंचा जहाँ पर पेड़ से दो लाशे लटक रही थी . मेरी आँखों से झर झर आंसू गिरने लगे. बेशक लाली और उसका प्रेमी मेरे कुछ नहीं लगते थे पर मुझे दुःख था .

"माफ़ करना मुझे , मैं तुम्हे बचा नहीं पाया " मैंने लाली के पांवो को हाथ लगा कर माफ़ी मांगी. मेरा दिल बहुत दुखी था . . मन कच्चा हो गया था मेरा. बहुत देर तक मैं उधर ही बैठा रहा .सोचता रहा की कैसा सितमगर जमाना है ये . क्या दस्तूर है इसके.

जब सहन नहीं हुआ तो मैं गाँव से बाहर निकल गया . ब्यथित मन में बहुत कुछ था कहने को. बेखुदी में भटकते हुए न जाने कब मैं जंगल में उधर ही पहुच गया जहाँ दो बार मैं इत्तेफाक से था. दुखी मन थोडा और विद्रोही हो गया . मैंने साइकिल उधर ही पटकी और पैदल ही भटकने लगा जंगल में.

वन देव की मूर्ति के पास बैठे बैठे कब मेरा सर भारी हो गया मालूम ही नहीं हुआ. पर जब तन्द्रा टूटी तो मैंने खुद को अन्धकार में पाया. गहरी धुंध मेरे चारो तरफ छाई हुई थी और मैं ठण्ड से कांप रहा था . रात न जाने कितनी बीती कितनी बाकि थी. सर के दर्द के बीच थोडा समय जरुर लगा समझने में की मैं कहाँ पर हूँ. आँखों के सामने बार बार लाली, हरिया और वो बुजुर्ग जिसे मैं नहीं जानता था के चेहरे आ रहे थे .मैंने उसी पल जंगल में अन्दर जाने का निर्णय लिया.

दूर कहीं झींगुरो की आवाज आ रही थी . कभी सियारों और जंगली कुत्तो की आवाजे आती पर मैं चले जा रहा था . कंटीली झाडिया उलझी कभी कांटे चुभे पर फिर मैंने एक ऐसी जगह देखि जो यहाँ थी कम से कम मैं तो नहीं जानता था .

वो एक तालाब था . जंगल की न जाने किस हिस्से में वो तालाब जिसमे लहरे हिलोरे मार रही थी . वो पक्का तालाब जिसकी एक दिवार मेरे सामने खड़ी थी किसी हदबंदी की तरह और तालाब के पार वो काली ईमारत जिसका वहां अपने आप में अजूबा था . चाँद की रौशनी में तालाब का पानी बहुत काला लग रहा था .

तालाब के पास से होते हुए मैं उस ईमारत की तरफ लगभग आधी दुरी तय कर चूका था की पानी में जोर से छापक की आवाज हुई . मैंने मुड कर देखा पानी में कोई नहीं था बस लहरे उठ रही थी . शायद मछलिय होंगी इसमें मैंने खुद को तसल्ली दी और इमारत की सीढिया चढ़ते हुए ऊपर चला गया .

प्रांगन में जाते ही मैं समझ गया की ये कोई प्राचीन मंदिर रहा होगा जिसे वक्त ने और हम जैसो ने भुला दिया . हर तरफ जाले ही जाले लगे थे . सिल के पत्थरों की नक्काशी चांदनी में चमक रही थी . खम्बो से चुना झड़ रहा था . मैं थोडा और आगे बढ़ा . मैंने देखा की चार छोटे खम्बो पर टिकी छत के निचे कोई मेरी तरफ पीठ किये बैठा था . मेरी आँखे जो देख रही थी वो यकीन करना मुश्किल था . कड़कती ठण्ड की रात में जब धुंध ने हर किसी को अपने आगोश में लिए हुए था. इस सुनसान जगह पर कोई शांति से बैठा था . पर किसलिए. मेरे दिल में हजारो सवाल एक साथ उठ गए थे .

"रातो को यूँ भटकना ठीक नहीं होता " उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा. न जाने कैसे उसे मेरी उपस्तिथि का भान हो गया था .

उसकी आवाज इतनी सर्द थी की ठण्ड मेरी रीढ़ की हड्डी में उतर गयी .

"कौन हो तुम " मैंने पूछा

वो साया उठा और मेरी तरफ. मेरे पास आया. मैंने देखा की वो एक लड़की थी .काली साडी में माथे पर गोल बिंदी लगाये. कुलहो तक आते उसके काले बाल. चांदनी रात किसी आबनूस सी चमकती वो लड़की एक पल को मैं उसमे खो सा गया पर फिर मैंने पूछा- कौन हो तुम

वो मेरे पास आई और बोली- डायन ............................

 
#11


काली साडी में लिपटी हुई एक बेहद खूबसूरत लड़की. जिसकी आभा उस चाँद की रौशनी में खिली हुई थी. विपरीत हालातो में मैं उस से इस सर्द रात में ऐसी जगह मिला जहाँ किसी को भी उसके होने की भनक तक नहीं थी . उसने जो कहा था मेरे कानो में पिघले शीशे सा उतर गया था . सर्द रात में माथे से बहते पसीने को मैंने गर्दन तक महसूस किया.

मैं- कैसे मान लू तुम डायन हो

वो मेरी तरफ देख कर हंसी और बोली- इस बियाबान में , इस तनहा रात में , इस उजड़े खंडहर में डायन नहीं तो किसके मिलने की उम्मीद कर रहे थे तुम.

मैं- सच कहूँ तो मुझे मालूम भी नहीं था की इस जंगल में ऐसी भी कोई जगह है आजतक वनदेव के मंदिर से आगे कभी कदम बढे ही नहीं थे . मेरी तन्हाई मेरा व्यथित मन न जाने किस तरह मुझे यहाँ ले आया.

पसीजी हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए मैंने उस से कहा.

"यूँ इन अंधेरो में भटकना ठीक नहीं है . लोग तो उजालो में भी इस तरफ नहीं आते. मुझे उम्मीद भी नहीं थी बहुत समय से किसी को देखा जो नहीं यहाँ. देखो, कितनी दिलचस्प रात है एक डायन और एक इन्सान बाते कर रहे है . अजीब है " उसने अपनी उंगलियों को चटकाते हुए कहा.

मेरी धडकनों की रफ़्तार अचानक से ही तेज हो गयी थी . नजरे उस शोख हसीना का ऊपर से निचे अवलोकन कर रही थी . न वो कुछ कह रही थी न मैं . दोनों के बीच अजीब सी कशमकश हो रही थी आखिर मैंने चुप्पी तोड़ी.

"तो अब क्या , एक इन्सान एक डायन आमने सामने है . क्या तुम मुझे मारने वाली हो " मैंने कहा

डायन- तुम्हे ऐसा क्यों लगा की मैं तुम्हे मारूंगी.

मैं- मुझे लगा तुम्हारा यही प्रयोजन होगा. डायने तो मारती ही है न इंसानों को

डायन- क्या तुम्हे डर लग रहा है .

मैं- नहीं , नहीं तो

डायन दो कदम आगे बढ़ी. मेरे पास आई. इतना पास की उसके स्तन मेरे सीने से रगड़ खाने लगे.

"तुम्हारी बढ़ी हुई धड़कने, बेकाबू पसीना तो कहता है की तुम डरे हुए हो " ऐसा कह कर वो फिर से वापिस हो गयी.

मैंने उसके व्यंग को महसूस किया.

"मुझे नहीं लगता की तुम डायन हो " मैंने कहा

वो- क्यों भला

उसने त्योरिया चढ़ाई .

मैं- तुम वैसी नहीं हो.

वो- कैसी .

मैं- जैसा मुझे मालूम है डायन इतनी सुन्दर नहीं हो सकती . वो वीभत्स होती है उसके दांत हाथो के नाखून नुकीले होते है . शरीर सडा हुआ होता है रक्त की बदबू आती है उस से .उसके पाँव उलटे होते है .

मेरी बात सुन कर वो जोर जोर से हंसने लगी. इतना जोर से की उसकी आवाज दूर दूर तक गूंजने लगी. कुछ देर बाद वो रुकी.

"मुझसे पहले किसी और डायन से मिले हो तुम , किसी और डायन को देखा है तुमने " उसने प्रशन किया.

मैं- नहीं

वो- तो तुम्हे कैसे मालूम की डायन का हुलिया वैसा होता है जैसा तुमने बताया.

मैं- मैंने सुना है . गाँव में लोगो ने अपनी बातो में बताया की कैसे उन्होंने डायन को देखा था .

वो- उन लोगो ने तुम्हे ये तो बताया ही होगा की डायन से मुलाकात के बाद क्या हुआ.

मैं- ये तो नहीं बताया

वो- क्या तुमने कभी ईश्वर को देखा है क्या तुम बता सकते हो वो कैसा दीखता है .

मैं- देखा है उसे. कितनी ही तस्वीरे मुर्तिया है इश्वर की

वो- क्या तुम्हे पक्का विश्वास है इश्वर वैसा ही दीखता है जैसा की वो मूर्तियों तस्वीरों में है

उसकी बात ने मुझे उलझन में डाल दिया.

वो- वो तस्वीरे, वो मुर्तिया एक माध्यम है बस ये दर्शाने का की इश्वर ऐसा होगा. ऐसे ही किस्से-कहानियो में डायनो का वैसा वर्णन है जो तुमने सुना है .

मैं- मैं कैसे मान लू तुम सच में डायन हो.

वो फिर हंसी जैसे मैंने कोई मूर्खतापूर्ण बात पूछ ली हो .

डायन- उफ्फ्फ ये इंसानी जिज्ञासा, बताओ मैं क्या करू तुम्हे विश्वास दिलाने के लिए . अपने पैरो को उल्टा मोड़ कर हवा में लटक जाऊ. या फिर उंगलियों के नाखून लम्बे कर के तुम्हारे पेट से अंतड़ी निकाल लू.

ये सुनते ही मेरी आँखों के सामने वो बुजुर्ग आ गया. उस मंजर की याद आते ही मेरी रीढ़ में सिरहन दौड़ गयी.

"तुम्हे ठण्ड लग रही है चाहो तो अन्दर दिवार की ओट में बैठ सकते हो " उसने कहा .

मैं- वहां ले जाकर तुमने मेरा अहित कर दिया तो

डायन- अगर मेरा वैसा इरादा है तो फिर क्या दिवार और क्या ये खुला आसमान सब कुछ मेरा ही तो है.

मैं उसके पीछे पीछे जाकर दिवार की ओट में बैठ गया . उसने एक छोटा अलाव जला दिया. सच कहूँ तो बड़ी राहत मिली मुझे. सिंदूरी आंच की रौशनी में उसके गोरी आभा बड़ी खूबसूरत लग रही थी . ये रात न जाने मेरी किस्मत में क्या लिखने वाली थी .

"तुम्हारा नाम क्या है " उसने पूछा मुझसे

मैं- कबीर.

एक बात मैंने देखि की जबसे वो मुझसे मिली थी वो बार बार चाँद की तरफ देखती थी .

मैं- क्या मैंने तुम्हारे किसी कार्य में बाधा डाली है यहाँ आकर

वो- नहीं . इतने बरस बाद किसी इन्सान के कदम इधर पड़े है तो अजीब लग रहा है .

मैं- कदम कैसे पड़ेंगे. तुम्हारे डर से लोग इधर आने की हिम्मत कर ही नहीं पाते होंगे.

वो-डरना भी चाहिए . एक दुसरे की हद का सम्मान बना रहे तो बेहतर है सबके लिए.

मैं- पर मैंने यहा आकर उस हद को पार कर दिया है. मेरी सजा क्या होगी.

वो-इतनी बेबाकी. बताओ तुम ही क्या सजा हो तुम्हारी.

मैं- जो करना है तुम्हे ही करना है मैं भला क्या ही कर लूँगा एक डायन के सामने.

मेरी बात सुनकर वो मुस्कुराई और बोली- ठीक है तो मैं तुम्हे जाने देती हूँ

मैं- और ये मेहरबानी किसलिए

वो- आज बरसों बाद कोई ऐसा मिला है जिस से दिल खोल कर बात हुई मेरी. तुमने मेरे अस्तित्व पर सवाल नहीं किया . ऐसा व्यवहार दुर्लभ है . दूसरी बात आज मुझे रक्त तृष्णा नहीं है . पर जब मुझे ये तृष्णा होगी तो मैं आउंगी तुम्हारे पास , तुम्हारा रक्त पीने.

जैसे ही उसने अपनी बात समाप्त की . अचानक से जंगल में सियारों का रुदन शुरू हो गया. ऐसा शोर मैंने पहले नहीं सुना था .

होऊ हूँ की आवाज दूर दूर तक गूँज रही थी . डायन ने मेरी तरफ देखा और बोली- तुम्हे जाना होगा अभी . मैं तुम्हे सुरक्षित हद तक छोड़ देती हूँ.

उसने मेरा हाथ पकड़ा बर्फ सा अहसास मुझे अन्दर तक भिगो गया. सियारों के रुदन के बीच उसकी पायल की आवाज मुझे रोमांचित कर रही थी . मैं बिलकुल नहीं जानता था की जंगल में वो मुझे कहाँ किस तरफ ले जा रही थी पर बहुत जल्दी मैं वनदेव के पत्थर के पास था की उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और बोली- अंधेरो से दूर रहना ये किसी एक सगे नहीं होते. जाओ.

मैंने मुड कर देखा. अंधेरो में कोई नहीं था न किसी पायल की आवाज गूँज रही थी .

 
#12


"अरे यहाँ चबूतरे पर क्यों सोया पड़ा है " चाची ने मुझसे कहा .

मैंने आँखे खोली खुद को चाची के चबूतरे पर पाया. ठन्डे फर्श पर पड़े मेरी कमर अकड़ गयी थी.

""उठ अन्दर आ, दरवाजा खडका भी सकता था न , जाने कबसे ठण्ड पर पड़ा है "चाची ने मुझे उठाया और अन्दर ले आई. अन्दर जाते ही मैंने अपने सीले कपडे उतारे और रजाई में घुस गया. चाची ने थोड़ी देर पहले ही बिस्तर छोड़ा होगा रजाई में गर्मी बाकी थी .

"चाय बना लाऊ तुम्हारे लिए " चाची ने कहा.

मैंने चाची का हाथ पकड़ा और कहा- सोना चाहता हूँ . चाची ने घडी में देखा सुबह के पांच बज रहे थे . उन्होंने दरवाजा बंद किया और फिर मेरे साथ ही बिस्तर में घुस गयी मैंने चाची के ऊपर अपना हाथ डाला और उस से चिपक गया . गर्म जिस्म की तपिश ने बहुत राहत दी. चाची ने अपना मुह मेरी तरफ कर लिया इस तरह उसका सर मेरे कान के पास आ गया. चाची की गर्म सांसे जब मेरे चेहरे पर पड़ती तो किसी अलाव की आंच सा लगता.

"कहाँ थे रात भर " चाची ने मेरी पीठ को सहलाते हुए पूछा.

मैं- नहीं मालूम.

चाची- मुझसे भी अब बाते छिपाने लगे हो. मंगू बेचारा बहुत देर तक तलाशता रहा तुम्हे.

मैं- बस इधर उधर ही भटक रहा था .

चाची- मुझे कहना तो बहुत कुछ है तुमसे पर अभी नहीं कहूँगी.

मैंने चाची की उंगलियों में अपनी उंगलिया उलझाई और बोला- आपका भी उलाहना सुन लूँगा.

चाची- जेठ जी बहुत नाराज हुए थे घर आकार

मैं- मैं क्या करू फिर

चाची- किसी दुसरे के लिए अपने घर में कलेश करना कहाँ जायज है बेटा.

मैं- दो लोगो को मारना भी तो गलत है न

चाची- ये दुनिया तेरे मेरे हिसाब से नहीं चलती , यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैंस . जो हुआ उसे अब कोई वापिस नहीं कर सकता एक बुरा सपना समझ कर भूल जा उसे.

मैंने चाची के स्तनों पर अपना सर टिकाया और आँखों को बंद कर लिया.

जब नींद पूरी हुई तो दोपहर बाद का समय था . मैंने देखा की चंपा आई हुई थी . मैं बिस्तर से उतरा .

"तू कब आई " मैंने पूछा

चंपा- थोड़ी देर पहले ही . आज खीर पूरी बनाई थी . तेरे लिए ले आई.

मैं- ये बढ़िया किया

मैंने देखा की चंपा की नजर मेरे शरीर के निचले हिस्से जमी हुई है मैंने गौर किया तो पाया की पेशाब के जोर की बजह से मेरा लिंग तना हुआ था. चूँकि वो सुजा हुआ था तो और बड़ा लग रहा था . मैंने ये गौर ही नहीं किया था की मैं सिर्फ कच्छे-बनियान में ही हूँ. मैंने तुरंत अपने कपडे पहने और बाथरूम में घुस गया. कुछ देर बाद मैं आया तो चंपा मुझे देख कर हंस रही थी.

मैं- पागल हुई है क्या जो अकेले दांत निपोर रही है .

चंपा उठ कर मेरे पास आई और बोली-- सच बता मुझे देख कर ही तेरा ऐसा हाल हुआ न.

मैं- पागल हुई है या तू. वो तो मैं नींद से उठा था इसलिए वैसा था .

चंपा- मेरे सिवा और कौन आ रहा है तेरे सपनो में

मैं- कोई और बात कर.

चंपा ने अचानक से मेरे लिंग को पायजामे के ऊपर से पकड़ लिया और बोली- ये तो कह रहा है की मैं बस ये बात ही करता रहूँ. उफ्फ्फ कितना बड़ा है मेरी तो जान ही ले जायेगा तेरा ये केला.

हद से जायदा बेशर्म थी ये लड़की .

मैं- पागल मत बन . ये ठीक नहीं है छोड़ इसे .

मैंने चंपा को खुद से परे किया. पर वो भी पक्की वाली थी. मेरे गालो पर एक पप्पी ले ही ली उस मरजानी ने

चंपा- खीर पूरी खा ले फिर मैं जाउंगी घर.

मैं- परोस दे.

चंपा के घर जब भी खीर बनती थी वो या मंगू हमेशा मेरे लिए लेकर आते थे. सब कुछ भूल कर मैं खाने पर ध्यान देने लगा.

चंपा- उस रात कुवे पर तूने सब कुछ देख लिया था न .

मैं- हाँ.

चंपा- फिर अन्दर क्यों नहीं आया तू.

मैं- मेरी अपनी हदे है चंपा .

चंपा- नुकसान तो तेरा ही हुआ न , दो दो रसीले जाम चख सकता था तू उस रात.

मैं- तुम दोनों तो मेरी ही हो न . मुझसे कहाँ दूर हुई तुम.

चंपा- तेरी इसी अदा पर तो मैं मरती हु . सच बताना उस रात तुझे कैसी लगी मैं. तेरे मन में मुझे नंगी देख कर क्या आया.

मैं- मेरा मन , मेरे मन की कौन जाने चंपा

चंपा- तू बेगाना नहीं है कबीर हम सब हमेशा तेरे साथ है . साथ रहेंगे. कल पंचायत में तूने जो किया रात भर मैं तेरे बारे में ही सोचती रही .

मैं- ठीक है अब तू जा . मुझे भी वैध जी के घर जाना है पट्टी बदलवाने .

चंपा ने बर्तन समेटे और बोली-साथ चलते है मैं घर जाउंगी तू आगे चले जाना. हम घर की दहलीज पर पहुंचे ही थे की अचानक से चंपा मुझसे लिपट गयी और अपने होंठो को मेरे होंठो पर टिका दिया.

"श्ह्हह्श , इतना तो हक़ दे मुझे " उसने कहा और मुझे चूमने लगी. एक मीठा सा स्वाद मेरे होंठो से होते हुए मुह में घुलने लगा मेरी आँखे बंद होने लगे. नशा सा छाने लगा. जब वो अलग हुई तो उसकी छातिया धौंकनी सी ऊपर निचे हो रही थी . पट्टी करवाने के बाद मैं सोचने लगा की कहाँ जाऊंगा . सर का दर्द भी ताजी चोट की वजह से ज्यादा था .

घर आने के बाद मैं सीधा अपने चोबारे में गया और कुर्सी पर बैठ गया. थोड़े देर बाद भाभी गर्म दूध का गिलास लेकर आ गयी .

भाभी- पियो इसे , अच्छा लगेगा तुम्हे.

मैंने कुछ घूँट भरी.

भाभी- कल पूरी रात तुम गायब थे, जानते हो तुम्हारे भैया और मुझे कितनी फ़िक्र हुई.

मैं- माफ़ी चाहूँगा. मुझे जरुरी काम था .

भाभी- ऐसे कौन से काम है तुम्हारे जो रातो में ही होते है . काम ही करना है तो भैया के साथ करो. कारोबार सीखो .

मैं- कोशिश कर रहा हूँ भाभी.

भाभी-देवर जी , मुझे बहुत चिंता है . इस घर में सबसे छोटे हो तुम. नटखट हो . जानती हूँ की तुम कभी कुछ ऐसा वैसा नहीं करोगे जिस से परिवार की प्रतिष्ठा पर आंच आये. अपने से ज्यादा मुझे तुम पर मान है . बस इतना ही कहूँगी की यूँ रातो को भटकना उचित नहीं है.

मैं- ध्यान रखूँगा भाभी.

भाभी- ये कुछ दवाए है समय से खाते रहना . घाव जल्दी ही भर जायेगा.

करने को कुछ खास था नहीं तो मैंने फिर से बिस्तर पकड़ लिया. कुछ असर शायद दवाओ का था मेरी आँख लग गयी. पर जब आँख खुली तो घडी में पोने एक बज रहा था . प्यास के मारे गला सूख रहा था . टेबल पर रखा जग खाली था. मैं पानी के लिए निचे आया तो देखा की हमारा दरवाजा खुला था . वैसे तो ये कोई नयी बात नहीं थी पर फिर भी मैंने सोचा की इस बंद कर देता हु. वहां पहुंचा तो गली में कुछ आवाज सी आई. कम्बल को सही करते हुए मैं गली में देखा .और जो देखा मैंने अपनी पेंट को मूत से गीला होते हुए महसूस किया. गली में एक उबलती हुई चीख गूंजने लगी जिसने गाँव की नींदे उड़ा दी.
 
#13

मैंने देखा की रामलाल मोची , अपने सीने पर हाथ रखे गिरा हुआ था . और उसके ऊपर को सवार था . रामलाल चीख रहा था . जो भी उसके ऊपर था उसके हाथ बड़े ताकतवर थे रामलाल के सीने को मेरे देखते देखते उसने चीर दिया था . खौफ के मारे मेरा मूत निकल गया था . पर तुरंत ही मैंने खुद को संभाला और रामलाल को बचाने के लिए उसकी तरफ भागा.

मैंने एक पत्थर उठा कर उस पर मारा पर उसे जरा भी फर्क नहीं पड़ा. उसने फिर से रामलाल को दबोचा शायद इस बार गर्दन पर वार किया था . जिबह होते बकरे की तरह मिमिया रहा था रामलाल. भागते हुए मैं रामलाल के पास पहुंचा और जो भी उसके ऊपर था पूरी ताकत से उसे उठा कर दूसरी तरफ फेंका. उसे शायद ऐसी उम्मीद नहीं रही होगी.

उस साये के कदम पीछे हुए और वो मेरी तरफ लपका. उसने मुझ पर वार किया उसके नुकीले नाखून मेरे कम्बल के टुकड़े टुकड़े कर गए. वो साया इन्सान तो नहीं था कम से कम या फिर उसने अजीब सा हुलिया बनाया हुआ था .

वो हल्का हल्का गुर्रा रहा था . डर से मैं भी कांप रहा था पर इसे नहीं रोकूँ तो ये रामलाल को मार डाले. वो फिर मेरी तरफ लपका इस बार मैं उसका वार नहीं बचा पाया और मेरी पीठ लहू लुहान हो गयी. तभी मेरी नजर लोहे के पड़े गाटर पर पड़ी. मैंने पूरा जोर लगाकर उसे उठा लिया और उस साये पर दे मारा डकारता हुआ वो साया गाटर की चोट से तिलमिला गया और गुस्से से मेरी तरफ लपका . मेरी छाती पर चढ़ ही बैठा था वो . उसके लम्बे नाखून किसी भी पल मेरी छाती चीर सकते थे पर अचानक से वो शांत हो गया .उसने मुझे दूसरी तरफ फेंका और गली में आगे की तरफ दौड़ गया . मेरे हाथो में रह गया उसका लबादा.

मैं उसके पीछे दौड़ा पर अगले मोड़ के बाद गली में कुछ नहीं था कुछ भी नहीं . मैं वापिस रामलाल के पास आया तो वो खून में लथपथ पड़ा था .

मैंने उसे उठाया.

मैं- हौंसला रखना रामलाल तुम्हे कुछ नहीं होगा.

रामलाल अपने हाथो को हिलाकर कुछ इशारा कर रहा था जैसे की वो कुछ कहना चाहता था मुझसे. उसका खून बहुत बह रहा था . तभी वहां पर गाँव के कई लोग आ गये . उन्होंने मुझे रामलाल के साथ देखा और वहीँ रुक गए.

मैं- भाइयो जल्दी आओ मेरी मदद करो रामलाल को जल्दी से वैध जी के पास लेकर चलते है इस पर किसी ने हमला कर दिया है . एक दो लोग मेरे पास की तभी रामलाल मेरे आगोश से निकल गया और गाँव वालो के आगे कुछ इशारा करने लगा. वो बार बार अपनी उंगलिया मेरी तरफ कर रहा था . गाँव वाले कभी मुझे देखे कभी उसे और तभी वो जोर जोर से तड़पने लगा. गाँव वालो की तरफ भगा और अपने प्राण त्याग गया.

गाँव वाले डर के मारे इधर उधर भागने लगे. वो चिलाने लगे "मार दिया मार दिया रामलाल को मार दिया " देखते देखते गाँव वहां पर उस रात में इकट्ठा हो गया .

"क्या बात है , क्यों इतना शोर मचा रखा है " ये पिताजी की आवाज थी जो शायद जाग गए थे.

"कुंवर ने रामलाल को मार दिया " एक गाँव वाले ने कहा तो और लोग भी सुर में सुर मिलाने लगे.

मैं- चुतिया हुए हो क्या. मैं तो इसे बचाने की कोशिश कर रहा था .

"नहीं, कुंवर ही कातिल है रामलाल ने मरने से पहले कुंवर की तरफ ही इशारा किया था " उनमे से एक ने कहा

मैं- वो इशारा नहीं कर रहा था बल्कि कुछ बताने की कोशिश कर रहा था.

"राय साहब ही इस बात का फैसला करेंगे , आप ही पूछिए इतनी रात को सुनसान गली में रामलाल के साथ कुंवर क्या कर रहे थे और क्यों इसने मारा उसे." गाँव वालो ने कहा .

पिताजी वहीँ एक चबूतरे पर बैठ गए और बोले- कबीर.कायदे से तुम्हे अपने बिस्तर पर होना चाहिए था तुम यहाँ क्या कर रहे हो.

मैंने पिताजी को पूरी बात बता दी.

पिताजी- इस गली में कौन था तुम दोनों के सिवाय. और फिर ये जो कुछ भी इन लोगो ने देखा संदिग्ध तो है .

"ये आप क्या कह रहे है पिताजी . आप मुझ पर शक कर रहे है " मैंने कहा

"क्यों न करे शक, कल पंचायत में गाँव वालो से तुम्हारा झगडा हुआ था , खुन्नस में तुमने इस घटना को अंजाम दिया. " एक गाँव वाले ने कहा .

मैं- मुझे किसी को मारना होता तो मैं दिन दिहाड़े भी मार देता अपनी नींद क्यों ख़राब करता कौन रोक लेता मुझे

"अगर तुम सच्चे हो तो है कोई सबूत तुम्हारे पास जो तुम्हे बेगुनाह साबित करे. बताओ है कोई सबूत " एक गाँव वाले ने कहा.

मैं- है मेरे पास सबूत .

मैंने अपने कपडे उतार दिए. और सीने और पीठ के घाव गाँव वालो को दिखाए .

मैं- ये घाव मुझे उस साये से मुठभेड़ में लगे है जिसने रामलाल को मारे है .

पिताजी- वैध को बुला कर लाओ

थोड़ी देर बाद वैध आया और उसने पुष्टि कर दी की रामलाल और मेरे घाव एक ही तरह के है .

मैं- मिल गया सबूत किसी और को कुछ कहना है क्या .

कोई भी नहीं बोला.

पिताजी- बहुत हुआ तमाशा . लाश को इसके घर पहुचाओ . सुबह अंतिम संस्कार करेंगे इसका. एक बात और गाँव में जानवरों का हमला आज से पहले कभी नहीं हुआ. हरिया पर भी ऐसा ही हमला हुआ था . हमें लगता है की थोड़े दिन के लिए बेमतलब रात को घरो से न निकला जाये. साथ ही आठ-दस लोगो की दो तीन टुकडिया बना कर रात को पहरा दिया जाये. ताकि उस जानवर को पकड़ा जा सके. पहरे के लिए कल से कार्यवाही होगी हर घर से एक सदस्य का नम्बर होगा. और तुम कबीर , इसी समय मेरे साथ चलो .

पिताजी मुझे घर ले आये .

पिताजी- अगर आज तुम पाक साफ न निकलते तो सोचो क्या हो सकता था तुम्हारे साथ .

मैं- पर मैंने कुछ किया ही नहीं था मैं तो उसे बचाने की कोशिश कर रहा था .

पिताजी- ये अजीब इत्तेफाक है न की जब जब ऐसी घटना होती है तुम वहीँ होते हो .

मैं- क्या आप शक कर रहे है मुझ पर

पिताजी- हम बस तुम्हे समझा रहे है की हालात कितने नाजुक है . वो जानवर अगर राम लाल की जगह तुम्हे मार देता तो ....हमें पहले भी सुचना मिली थी की तुम रातो को भटक रहे हो ..जवान लड़के का बिना वजह भटकना ठीक नहीं है . कोई भी बात है तो हमें बता सकते हो.

मैं- ऐसी कोई बात नहीं है

पिताजी- ठीक है फिर , आज से तुम रात को अकेले नहीं रहोगे. तुम्हारी चाची तुम्हारे साथ रहेगी तुम चाहो तो वो यहाँ आ जायेगी या तुम उसके घर जाओगे. और रेणुका, तुम्हे पूरी छूट है की रात को ये कही भी जाये तो इसको पीट सकती हो. इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी है .

चाची ने हाँ में सर हिलाया.

बाहर आते ही भाभी गुस्से से मुझ पर चढ़ गयी .

भाभी- तुमसे तो कुछ कहना ही बेकार है , आज कुछ भी उल्टा सीधा हो जाता तो जानते हो क्या बन आती परिवार पर. पर तुमको क्या तुम्हे तो अपने सिवा किसी और का सोचना ही नहीं था . थोड़ी देर पहले ही मैं समझा कर गयी थी पर जनाब को क्या परवाह है किसी की.

मैं-गलती हो गयी भाभी. अब चाहे गाँव में आग लगे मैं ध्यान ही नहीं दूंगा.

भाभी- हर बार यही कहते हो

भैया- रात बहुत हुई सो जाओ कबीर . चाची ले जाओ इसे.

मैं चाची के साथ उनके घर आ गया पर मेरे मन में एक ही सवाल था उस जानवर ने मुझे क्यों नहीं मारा.
 
लाली का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था और ऊपर से ये सब.. कबीर के ऊपर जो इल्जाम लगाए गए पंचायत में, और उसपर उसके पिता का उससे प्रमाण की मांग करना। बेशक राय साहब वही कर रहे थे जो एक कुशल और ईमानदार पंच/सरपंच को करना चाहिए परंतु ये घटना कबीर के अंदर अपने पिता को लेकर द्वंद्व की शुरुआत कर सकती है। अकेली लाली वाली घटना ही पर्याप्त होने वाली थी पिता - पुत्र के मध्य खींचतान उत्पन्न करने के लिए, उसपर ये घटना... कोई संदेह नहीं कि कुछ समय बाद कबीर अपने पिता के विरुद्ध खड़ा पुनः दिखाई देगा।

कुछ भी हो पर ये एक के बाद एक हत्याएं कई प्रश्नों को जन्म देती हैं। उससे भी बड़ी बात प्रत्येक हत्या का गवाह रहा है कबीर। हरिया, वो जंगल में मिला बुज़ुर्ग, और अब ये मोची, लाली वाला मामला इससे अलग दिखाई पड़ता है... क्या ये मात्र एक इत्तेफाक है। लगता नहीं, कबीर की नियति या फिर शायद हत्यारे की सोची - समझी नीति है ये, जिसके कारण सदैव ही वो हत्या के स्थान पर मौजूद रहा है। और जैसा होता है, वही हुआ, गांववालों को यही लगा कि कबीर ने ही मोची की हत्या कर दी है, गनीमत रही कि हत्यारा जाते - जाते कबीर को घाव रूपी सबूत दे गया था अन्यथा... भले ही अभी के लिए कबीर निर्दोष साबित हो गया हो, पर एक पड़ा संदेह का बीज, वृक्ष अवश्य बनता है, एक और हत्या होगी, तो बेशक कबीर पर ही उसका इल्जाम लगेगा।

सवाल तो ये भी है कि वो जीव जिसने मोची की हत्या की, उसने कबीर को जीवित क्यों छोड़ दिया? कौन था वो? कोई जानवर, कोई आदमखोर या फिर कोई प्रेत - आत्मा। जो कोई भी था, निश्चित ही उसका कोई न कोई संबंध है कबीर के साथ, जिसका उजागर होना कबीर के जीवन को बदल कर रख देगा। वो डायन, जो कबीर को मिली थी, क्या उससे कोई संबंध था इस हत्यारे का? क्या उसी के लिए ये हत्याएं करता है ताकि जैसा उसने कहा था, उसकी रक्तपिपासा को शांत किया जा सके।

उसकी और कबीर की बातें भी अचंभित कर गई। कबीर का उससे बिल्कुल भी ना डरना, ना ही उसके इस खुलासे पर घबराना कि वो एक डायन थी, उस डायन का कबीर को रत्ती भर भी नुकसान ना पहुंचाना, और तो और, कबीर से इस प्रकार वार्ता करना जैसे कबीर उसका कोई इंसान ना होकर उसके जैसा ही प्राणी हो। परंतु, जिस चीज़ ने सबसे अधिक हैरान किया वो था उसका कथन, कि जब उसे आवश्यकता होगी वो आएगी कबीर के रक्त के लिए। कबीर के जीवन का कोई न कोई पहलू तो ऐसा है जिससे वो स्वयं भी अंजान है, क्या पता वो खुद भी आलौकिक शक्तियों का स्वामी हो जिनका जागृत होना अभी शेष है।

इधर, एक बार फिर कबीर के सभी करीबियों के बरताव को देखकर स्पष्ट हो गया कि कबीर कितना भाग्यशाली है को उसे ऐसा परिवार मिला है। चम्पा और चाची के साथ कबीर का किस प्रकार का रिश्ता हो सकता है आगे चलकर, हम सभी जानते हैं। चम्पा कितनी चंचल है ये भी हम जानते हैं, परंतु इन एक - दो अध्यायों में ये भी साफ होता नजर आया कि चम्पा का भाव कबीर के प्रति, जो आकर्षण लग रहा था, असल में वो शायद प्रेम है। रोचक रहेगा देखना कि क्या होगा इन दोनों का आगे चलकर, शादी तय हो चुकी है चम्पा की, और यदि कबीर कहीं चम्पा के प्रेम में पड़ा, तो इसका असर मंगू और उसकी मित्रता पर भी पड़ेगा। भाभी का वात्सल्य कबीर के प्रति... क्या वो मातृत्व का भाव है? अभी तक तो यही लगा है कि भाभी की अपनी कोई संतान नहीं, क्या ये एक कारण है कबीर के प्रति इतने प्रेम का या..?

खैर, कबीर अब शांत तो बैठेगा नहीं, वो पूरी कोशिश करेगी इन हत्याओं का रहस्य खोजने की। लगता यही है कि जल्द ही वो दोबारा उस डायन से भी मिल सकता है। आखिर कबीर का भाग्य हत्याओं और जंगल में ही केंद्रित नज़र जो आ रहा है। बहरहाल, बहुत ही सुंदर प्रस्तुतियां थीं सभी। कबीर के प्रति सभी का प्रेम और लगाव बेहतरीन तरीके से दर्शाया आपने, परंतु जो सबसे भिन्न और उच्च था, वो था कबीर और उस डायन का वार्तालाप। बढ़िया शब्दों का चयन किया आपने उस प्रकरण में।

अगली कड़ी की प्रतीक्षा में...
 
#14

वो जो भी था उसने मुझे नहीं मारा . ये सवाल मुझे पागल किये हुए था.

"सोना नहीं है क्या अब " चाची ने कहा तो मैं ख्यालो की दुनिया से बाहर आया.

मैंने रजाई में सर दिया और आँखे बंद करली पर नींद बहुत मुश्किल से आई. सुबह एक बार फिर उठते ही मैंने चंपा को सामने पाया.

मैं- इतनी सुबह तू यहाँ

चंपा- मैं तो रोज इसी समय आती हूँ

मैं- चाची कहा है

चंपा- नहा रही है . ये सब छोड़ मुझे रात की बता क्या हुआ था . गाँव में बहुत खुसर पुसर हो रही है.

मैं- गाँव वाले है ही चुतिया.

मैंने सारी बात चंपा को बता दी.

चंपा-तुझे क्या जरुरत थी अगर तुझे कुछ हो जाता तो .

मैं- कुछ हुआ तो नहीं न

चंपा- लाली वाले कांड के बाद गाँव वाले तेरे खिलाफ है वो कोई कसर नहीं छोड़ेंगे तुझे बदनाम करने की. अगर तू राय साहब का बेटा न होता तो अब तक पंच और उसके पिल्ले न जाने क्या कर चुके होते.

मैं- पंच से तो मुझे भी खुंदक है , कभी मौका मिला तो उसकी गांड जरुर तोडूंगा

चंपा- सुन तुझे चाहिए तो मैं अभी नाश्ता बना देती हूँ वर्ना फिर मैं, चाची और भाभी मंदिर जा रहे है भाभी ने कोई पूजा रखवाई है तेरे लिए तो दोपहर बाद ही आना होगा.

मैं- कोई दिक्कत नहीं . बस चाय बना दे एक कप

चंपा जब रसोई की तरफ जा रही थी तो न जाने क्यों मेरी नजर उसकी मटकती गांड से हट ही नहीं रही थी चाय पीने के बाद मैंने अपनी साइकिल उठाई और खेतो पर पहुँच गया . मुझे खेतो को नजर भर कर देखना था मैं ये नहीं चाहता था की मेरी वजह से फसल को नुकसान हो. एक ये ही काम तो था जिसे मैं दिल से करता था . हमारी जमीनों के बड़े हिस्से पर तो मजदुर काम करते थे . मैं भी उनके साथ कभी कभी काम करता .

दोपहर तक खेतो पर रहने के बाद मैं घर की तरफ जा रहा था की मैंने साइकिल जंगल की तरफ मोड़ दी. वनदेव के पत्थर के पास मैंने साइकिल खड़ी की . पत्थर को हाथ लगाकर आशीर्वाद लिया और फिर मैं पैदल ही उस तरफ चल दिया. उस तरफ जहाँ मैं एक बार फिर से जाना चाहता था . दो बार मैं भटका पर फिर भी मैं उस तालाब के पास पहुँच ही गया. उस जगह की रचना ही ऐसी थी की घने पेड़ो, झाड़ियो की वजह से पहली नजर में उसे देख पाना लगभग नामुमकिन ही था .

दिन की रौशनी में तालाब का नीला पानी इतना दिलकश था की जी करे उसे देखता ही रहे. एक तरफ से पत्थरों की दिवार जो तालाब और जंगल के बीच सरहद बनाती थी .रौशनी में वो खंडहर बताता था की किसी ज़माने में बड़ी शान रही होगी उसकी. बेशक वास्तुकला का अप्रतिम उदाहरण रहा होगा वो किसी ज़माने में पर मेरी दिलचस्पी किसी और में थी .

सीढिया चढ़ कर मैं ठीक उसी जगह पहुँच गया जहाँ पर मेरी मुलाकात डायन से हुई थी . हवा जैसे रुक सी गयी थी . सन्नाटा इतना गहरा की एक पत्ता भी हिले तो बम सा धमाका हो. चुने-पत्थर से बनी दीवारों का पलस्तर जगह जगह से उखड़ा हुआ था . कहीं कहीं से छत भी टूटी हुई थी . चारो तरफ घूम कर मैंने जगह का अच्छी तरह से अवलोकन किया पर ऐसा कुछ भी नहीं था जो इंसानों की आमद बता सके.

तभी मेरी नजर एक तरफ जाती छोटी सीढियों पर गयी . मैं उनसे उतरते हुए मंदिर के पीछे पहुँच गया . वहां पर मैंने एक मरे हुए हिरन को देखा जिसकी मौत को ज्यादा समय नहीं हुआ था . घंटे-डेढ़ घंटे मैं वहां रहा इंतजार किया पर शायद आज उसके दर्शन दुर्लभ थे जिसकी मुझे चाह थी . बस तस्सली इस बात की थी उस रात की मुलाकात भ्रम नहीं थी .

"फिर कभी मुलाकात होगी " कहते हुए मैंने अपने दिल को तस्सली दी और वापिस मुड गया . तालाब के पास से गुजरते हुए मुझे एक बार अनुभव हुआ की किसी ने पानी में छलांग लगाई हो पर पीछे मुड़ने पर कोई नहीं था .

शाम होते होते मैं गाँव पहुँच गया. भाभी मेरा ही इंतजार कर रही थी .

भाभी- कहाँ गायब थे तुम. रात को रोका तो दिन में गायब हो गए. इरादे क्या हैं तुम्हारे

मैं- हम गरीबो के भी क्या इरादे भाभी. खेतो पर ही था पूरा दिन

भाभी- लगता है तुम्हारे पांवो में ऐसी जंजीर बांधनी पड़ेगी , जिस से तुम्हारे कदम घर पर रहे.

मैं- कैसी जंजीर भाभी

भाभी- यही की अब समय आ गया है हमें तुम्हारी शादी के बारे में सोचना चाहिए. कहो तो मेरी चचेरी बहन से बात चलाऊ

मैं- अभी तो मैंने ऐसा कुछ सोचा नहीं है , पर जिस दिन कोई ऐसी मिलेगी जिसके लिए दिल धड़केगा तो सबसे पहले आपको ही आकर बताऊंगा.

भाभी- हमारे यहाँ रिश्ते दिल नहीं घरवाले तय करते है .

मैं- अपना तो दिल ही तय करेगा.

जब मैंने भाभी से ये बात कही तो मेरी आँखों के सामने डायन का चेहरा आ गया .न जाने क्यों होंठो पर मुस्कान आ गयी . भाभी बस देखती रह गयी मुझे. रात को खाने-पीने के बाद एक बार फिर मैं चाची के घर आ गया. मैंने गौर किया चाची आज बड़ी प्यारी लग रही थी . नीले लहंगे और सफ़ेद ब्लाउज में अप्सरा सी लग रही थी . चूँकि ओढनी हटा राखी तो ब्लाउज में कैद गुब्बारे मचल रहे थे . मैंने एक बात और गौर की चाची कच्छी नहीं पहनती थी क्योंकि जांघो के जोड़ पर चूत की शेप बिलकुल नुमायाँ हो रही थी .

मैंने बस एक झलक देखि उसकी क्योंकि फिर वो रसोई में चली गयी थी पीछे पीछे मैं भी वही चला गया .

"क्या कर रही हो " मैंने चाची के पीछे सटते हुए कहा

चाची- दूध गर्म कर रही हूँ तेरे लिए. गोंद के लड्डू संग पी लेना. लाडू का पीपा उतारने के बाद चाची चूल्हे पर उबलते दूध को देखने के लिए झुकी और जब वो झुकी तो मैंने क्या खूब नजारा देखा. झुकने की वजह से चाची के नितम्ब पीछे को उभर आये थे और जीवन में पहली बार मैंने उनकी मादकता को महसूस किया था . दो दो किलो मांस तो जरुर होगा उनमे.

तभी चाची उठी और पलटते ही मेरे से टकरा गयी चाची की छातिया मेरे सीने से आ लगी. मैंने चाची की कमर में हाथ डाला और चाची को थाम लिया. अपना हाथ ले जाकर मैंने चाची के चूतडो पर फेरा तो चाची के बदन में सिरहन दौड़ गयी . ये वो लम्हा था जिसने चाची और मेरे दरमियान एक नए रिश्ते की नींव रख दी थी . मैंने चाची के कुलहो को अपने दोनों हाथो में थाम लिया और अपने होंठ चाची के होंठो पर रख दिया. चंपा के बाद चाची दूसरी औरत थी जिसके होंठ मैंने चुसे थे . पर जैसे किसी सपने सा ये चुम्बन तुरंत ही टूट गया .


"कबीर कबीर " बाहर से कोई दरवाजा पीट रहा था .
 
#15

एक झटके से मैं चाची से अलग हो गया और दरवाजे पर गया . देखा की वहां पर भैया और मंगू थे. दोनों को ऐसे देख कर मेरा दिल शंका के मारे विचलित होने लगा.

भैया- छोटे तुझे मेरे साथ चलना होगा अभी .

मैं- जी भैया पर कहाँ

भैया- आ तो सही .

हम तीनो जल्दी ही गाँव के पंच के घर पर थे जहाँ और भी भीड़ थी . औरतो का रोना-धोना चालू था . भैया मुझे एक कमरे में ले गए . जहाँ पर पंच के लड़के को एक चारपाई पर बाँधा हुआ था .और वो उस पकड़ को तोड़ने के लिए पूरा जोर लगा रहा था . अपने हाथ -पाँव मार रहा था मैंने देखा की उसकी गर्दन कुछ टेढ़ी हो गयी थी . आँखे पथरा सी गयी थी और हाथो से वो कुछ अजीब इशारे कर रहा था .

"न, मेरा इसमें कोई हाथ नहीं है , " मैंने भैया से कहा .

भैया - कोई भी नहीं कह रहा है की इसकी ये हालत तूने की है . तू बस इस को देख . मंगू कहता है की हरिया भी ऐसे ही हालात में तुम्हे मिला था .

मैं-इसे सबसे पहले किसने देखा था और कब .

भैया- थोड़ी देर पहले ही इसे लेकर आये थे . गाँव के कुछ लड़के जंगल में गए थे लकडिया काटने के लिए. ये न जाने कब उनसे अलग हो गया. बाकि लडको ने जब तलाश किया तो ये झाड़ियो में मिला.

मैंने पञ्च को देखा जिसकी शक्ल ऐसी थी की रोने ही वाला हो .

मैं- पंच साहब, तुम्हे दुःख है क्योंकि ये तुम्हारा बेटा है . इसकी नासाज हालत देख कर तुम्हारा कलेजा जल रहा होगा. पर सब कर्मो के लेख है. दो दिन पहले तुमने दो लाशो के लिए फरमान सुनाया था . ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती पर उसकी मार बहुत तेज लगती है . देखो आज तुम्हारा लड़का मौत की दहलीज पर है और तुम, तुम्हारा ये समाज. तुम्हारे बनाये वो तमाम रीती-रिवाज जिनकी दुहाई तुम पंचायत में दे रहे थे .उनमे से एक भी बात तुम्हारे काम नहीं आ रही अब.

पंच ने मेरे सामने हाथ जोड़ दिए और बोला- कुंवर, कुछ भी करके मेरे बेटे को बचा लो . मेरे जीवन के एकमात्र आस यही है .

मैं- मेरे बस में होता तो मैं न हरिया को मरने देता न रामलाल को. अगर इसका शिकारी भी वो ही है जो हरिया का था तो इसे तुरंत शहर के हॉस्पिटल में ले जाना होगा. इसके बदन का खून बहुत जल्दी सूखेगा. खून की जरुरत होगी इसे. कुछ दिनों का समय मिल जायेगा इसे. तब तक तुम लोग प्रयास करना क्या मालूम कोई मिल जाये जो मदद कर दे इसकी.

भैया- मंगू , तुंरत मेरी गाड़ी लेकर आओ . साथ ही एक-दो और साधनों का जुगाड़ करो . इसे तुरंत शहर ले जायेंगे.

बेशक पंच के प्रति मेरे मन में कड़वाहट भरी थी पर उसके लड़के के लिए मैं द्रवित था .पर मैं करता भी क्या हरिया के लिए भी मैं कहाँ कुछ कर आया था . जल्दी ही सारी व्यवस्था हो गयी . भैया ने मुझे घर जाने को कहा क्योंकि वो खुद शहर जा रहे थे .

मेरे लिए यही वो मौका था वो करने का जो मैंने सोचा था . जैसे ही वो लोग शहर के लिए निकले. मैं भी पैदल ही निकल पड़ा अपनी मंजिल की तरफ. एक बार फिर मैं काले मंदिर जा रहा था क्योंकि ये जो भी हो रहा था इसके बारे में अगर कोई बता सकती थी तो वो थी सिर्फ डायन.

गाँव की हद से बाहर आते ही ठण्ड दुगुनी हो गयी जिसे रोकने के लिए मेरी ये जाकेट काफी नहीं थी . मुझे याद आया की मेरा गर्म कम्बल खेतो पर ही रह गया था . वहां जाने का मतलब था की देर में और देर होना और अगर घर जाता दूसरा कम्बल लाने तो फिर चाची या भाभी हजार सवाल करती. तो मैंने पहले खेतो पर जाने का सोचा.

ठिठुरते हुए , गीली पगडण्डी पर पैर घसीटते हुए मैं खेतो की तरफ मुड गया. मैंने दूर से ही जलते अलाव की आंच को देख लिया.

"इस वक्त कौन होगा वहां पर. शायद कोई मजदुर या फिर कोई और " सोचते हुए मैं कुवे पर बने कमरे के पास पहुंचा तो मैंने जो देखा मेरा दिल इतनी जोर से उछला की धडकनों ने कुछ पलो के लिए हार ही मान ली हो.

मेरी जमीन पर मेरे कुवे पर वो थी . उसकी आमद मेरी जगह पर होना मुझे अन्दर तक हिला गया . नोवेम्बर की ठण्ड में मैं पसीने-पसीने हो गया और होता भी क्यों नहीं. सारी दुनिया से बेखबर अपने आप में मगन वो आंच जलाये उस पर मांस के टुकड़े भून रही थी . चाचड़ चाचड़ करती आंच में मांस की खुसबू भरी हुई थी .

"तुम , तुम यहाँ " मैंने थूक गटकते हुए उस से पूछा

उसने मेरी तरफ देखा और फिर से मांस के एक टुकड़े को भूनते हुए बेफिक्री से बोली- तुम मेरे घर बिना बताये जा सकते हो और मैं चली आई तो ये सवाल . इस्तकबाल का तो जमाना ही नहीं रहा .

मैं- मुझे उम्मीद नहीं थी तुमसे यूँ ऐसे अचानक से मुलाकात हो जाएगी.

वो- उम्मीद तो हमें भी नहीं थी की भरी दोपहरी में तुम चोरी से हमारे घर छान-बिन करने पहुँच जाओगे.

मैं- तो तुम्हे मालूम हो गया . पर कैसे.

वो- हमारा घर है वो .

मैं- माफ़ी चाहूँगा पर तुमसे मिलना बड़ा जरुरी था मेरे लिए. और संयोग देखो मुलाकात हुई भी तो कैसे.

वो- बैठो, आंच ताप लो आज ठण्ड बहुत बरस रही है .

मैं- ठीक हूँ मैं

वो- बैठ भी जाओ, इतने तकल्लुफ की जरुरत नहीं है तुम्हारी ही जमीन है

उसके ताने ने मुझे चोट पहुचाई. मैं अलाव के पास बैठ गया .

वो- मांस खाओगे, एक दम ताजा है कुछ देर पहले ही शिकार किया है . उसने भुने हुए कलेजे का टुकड़ा मेरी तरफ किया.

मैं- तुम यहाँ कैसे आई.

वो- कितना सोचते हो तुम . अरे इधर पास में ही शिकार किया था मैंने ये जगह बेहतर लगी तो इधर ही दावत सजा दी. तुम भी मेरे साथ शामिल हो जाओ. और हाँ , किसी इन्सान का मांस नहीं है . बकरे का है .थोडा इमांन हममे भी बाकी है .

मैं- इमांन की बात करती हो. तो फिर निर्दोष मासूमो को क्यों मार रही हो.

वो- मैंने तुमसे उस दिन भी कहा था मैं किसी को नहीं मारती. सब कुछ नियति करती है .

मैं- नियति का मोहरा हो क्या तुम

वो- मैं तो बस मैं हूँ.

मैं- तो ये प्यास क्यों. इतने जानवर है जंगल में तो फिर इन्सान ही क्यों .

वो- क्योंकि इंसानों का स्वाद ही अलग है .

मैं- तुमने मुझसे कहा था की जब तुम्हे रक्त तृष्णा होगी तो तुम रक्त पीने मेरे पास आओगी . मैं तुम्हे कहता हूँ अगर तुम गांववालों से दूर रहोगी तो जब भी तुम्हारा मन करेगा. तुम्हारे हर बुलावे पर मैं अपना रक्त तुम्हे अर्पण करूँगा.

मेरी बात सुनकर वो हंसने लगी. उसकी आवाज दूर दूर तक गूंजने लगी.

वो- सौदेबाजी करना चाहते हो मुझ से. तुम्हारे रक्त का क्या ही मोल मेरे लिए वो तो हमारी पहली मुलाकात में ही गिरवी हो गया मेरे पास.

मैं- तो फिर गाँव वाले कब तक ऐसे ही शिकार होकर मरते रहेंगे.

वो-नियती ही जाने इसके बारे में तो .

जी भरकर उसने अपना भोजन किया और फिर बाकि बचे हुए को फेंक दिया. उसके होंठ रक्त से सने थे. आंखो में ऐसा ठंडा खौफ पर उन खौफ भरी आँखों में ही मैंने अपने दिल को डूबता हुआ महसूस किया.

वो- दुबारा कभी भी अकेले मेरे घर नहीं जाना. मैं दुबारा नहीं कहूँगी.

मैं- मेरा मन मुझे बार बार वहां ले जायेगा. तुम रोक नहीं पाओगी

वो-ऐसी भी क्या चाहत एक डायन से मिलने की

मैं- आज तो नहीं मालूम पर एक दिन इस का जवाब जरुर दूंगा तुम्हे.

वो- ठीक है पर हमारी मुलाकात दिन के उजालो में कभी नहीं होगी. मैं तुम्हे कुछ राते बताती हूँ हम केवल तभी मिलेंगे. और यदि तुमने नियम तोडा तो फिर मैं तुम्हारे घर पर दस्तक दूंगी . जिसकी भरपाई तुम कर नहीं पाओगे.

उसने मुझे वो खास राते बताई. जिन्हें मैंने ध्यान से जेहन में बसा लिया.

मैं- इस खूबसूरत डायन का नाम क्या है

वो मेरे पास आई और मेरे कान में बोली- किसी ज़माने में लोग निशा कहते थे .

जैसे ही उसने इतना कहा मेरे सीने में खलबली मच गयी.
 
सीने के जख्म जो ताजा थे दर्द उतर आया उनमे. न चाहते हुए भी मेरे होंठो से आह निकल गयी.

निशा- क्या हुआ

मैं- कुछ नहीं चोट का दर्द है ठीक हो जायेगा.

निशा- मैं चलती हूँ

मैं- मैं भी , क्या तुम मोड़ तक मेरे साथ चलना पसंद करोगी.

निशा- ठीक है

खामोश कदमो से वो मेरे बराबर चल रही थी . काले घाघरे-चोली में उसके खुले बाल . सच कहूँ तो दिल चाहता था की उसे बस देखता रहूँ. इतनी प्यारी लग रही थी वो की नजर हटे ही नहीं उस चेहरे से.

निशा- क्या सोच रहा है

मैं- यही की किसी दोपहर , किसी पनघट पर तेरी-मेरी मुलाकात हो . मैं ओक लगाऊ तू मटके को मेरी तरफ करे. तेरी खनकती चूडियो से वो पनघट में हलचल मच जाये. तेरे आँचल से अपने भीगे चेहरे को पोंछु मैं .

निशा ने गहरी नजरो से मुझे देखा और बोली- ये भरम पालने का क्या फायदा . मैं खुद हैरान हूँ , इन दो मुलाकातों के बारे में सोच कर .

मैं- तू क्यों सोचती है जब तूने सब कुछ नियति पर ही छोड़ा हुआ है तो इस मामले को भी नियति के हवाले कर दे.

निशा- हम दोनों की अपनी अपनी हदे है . मेरी हद ये जंगल है . तेरी हद वो गाँव है . इनके बीच जो फासला है वो बना रहना चाहिए इसी में सबकी नेकी है.

बातो ही बातो में हम उस रस्ते पर आ गए थे जहाँ से एक तरफ उसे जाना था तो एक तरफ मुझे. उसने एक बार भी पलट कर नहीं देखा मैंने उसे तब तक देखा जब तक की धुंध ने उसे लील नहीं लिया. पूरा गाँव सुनसान पड़ा था , यहाँ तक की कुत्ते भी दुबके हुए थे. मैंने चाची को जगाना उचित नहीं समझा और अपने चोबारे की तरफ जाने लगा. मैंने देखा की भाभी के कमरे की बत्ती जल रही थी . जैसे ही मैं सीढिया चढ़ने लगा भाभी ने मुझे पकड़ लिया.

भाभी- तो कैसी रही आवारागर्दी के लिए एक और रात

मैं- आप सोयी नहीं अभी तक

भाभी- जिस घर के दो जवान बेटे घर से बाहर हो तो किसी को तो नींद नहीं आयेगी न.

मैं- हमेशा आप पकड़ लेती है मुझे

भाभी- तुम्हे, तुमसे ज्यादा जानती हूँ .

मैं- सो तो है

भाभी- चूँकि तुम शहर नहीं गए तो तुम्हे संकोच नहीं होना चाहिए ये बताने में की इतनी रात तक तुम कहाँ थे .तमाम वो सम्भावनाये जिन पर मैं विचार कर सकती थी मैंने तलाश ली है .

मैं- भाभी आप जैसा सोच रही है वैसा बिलकुल भी नहीं है

भाभी- तो फिर बताओ न मुझे की आखिर ऐसी कौन सी वजह है जिसमे एक जवान लड़का रात रात भर जब और दुनिया रजाई में दुबकी ठण्ड से जूझ रही है , लड़का इन ठिठुरती रातो में घूम रहा है . ऐसी क्या वजह है जो तुम्हे राय साहब की भी परवाह नहीं है . मैं बहुत उत्सुक हूँ उस वजह को जानने के लिए.

मैं-सच कहूँ तो भाभी इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं है

भाभी- क्या मेरा देवर गाँव की किसी लड़की या औरत के सम्पर्क में है

मैं- नहीं भाभी बिलकुल नहीं

भाभी- अगर ऐसा हुआ तो मैं उसे तलाश लुंगी देवर जी, और फिर जो होगा उसके लिए अगर कोई जिम्मेदार होगा तो सिर्फ तुम

मैंने भाभी के चरणों को हाथ लगाया और चोबारे में घुस गया . बिस्तर पर लेटे लेटे मैं बस निशा के बारे में ही सोच रहा था . जब भी आँखे बंद करता वो चेहरा मेरी नींद चुरा लेता. और होता भी क्यों न जब वो जाग रही थी तो मुझे भला नींद कैसे आती.

सुबह मैंने भाभी के साथ नाश्ता किया और फिर खेतो के लिए घर से निकलने लगा. मैंने देखा की पिताजी घर पर नहीं थे . रस्ते में मुझे चंपा मिल गयी.

"रोक रोक साइकिल " उसने कहा

मैं- क्या काम है जल्दी बोल

चंपा- खेतो पर जा रहा है तो मुझे बिठा ले चल

मैं- पैदल आ जाना तू मुझे जल्दी है

चंपा- मुझे भी जल्दी है , बिठा ले इतने भी क्या नखरे तेरे

मैं- ठीक है

चंपा- आगे बैठूंगी.

मैं- तू भी न , कोई देखेगा तो क्या सोचेगा

चंपा- यहाँ से लेकर खेतो तक न के बराबर लोग ही मिलेंगे हमें रस्ते में

चंपा से जिद करने का मतलब था खुद के सर में हथोडा मारना तो मैंने चुपचाप उसे आगे डंडे पर बिठा लिया. और साइकिल चलाने लगा.

मैं- डंडे पर क्या आराम मिलेगा तुझे पीछे आराम से बैठती.

मेरे पैर उसकी जांघो और कुलहो पर रगड़ खा रहे थे .

चंपा- डंडे पर ही तो बैठने का मजा है निर्मोही पर तू है की कुछ समझता ही नहीं .

मैं- ऐसी बाते करेगी तो यही उतार दूंगा.

चंपा - मेरी ऐसी बातो से तेरा डंडा झटके खाता है . वैसे तेरा डंडा है मजेदार

मैं- तेरे होने वाले पति का भी ऐसा ही होगा उस पर दिन रात बैठे रहना कोई नहीं रोकेगा तुझे.

चंपा- अभी तो बस तू और मैं है न

मैं- यही तो मुश्किल है

चंपा- चल छोड़ फिर ये बता पंच के लड़के को क्या हुआ है

मैं- मुझे क्या मालूम

चंपा- कल रात को एक काकी कह रही थी की हो न हो कुंवर पर ही किसी का साया है , कुंवर ही ये सारे हमले कर रहा है .

मैं- फिर तो तूने गलती की इस सुनसान में मैंने तुझ पर हमला कर दिया तो कौन बचाएगा तुझे.

चम्पा- मैं तो तरस रही हूँ उस दिन के लिए की तू कब मुझ पर चढ़ जाये.

उसकी बात सुन कर मुझे हंसी आ गयी .

चंपा- वैसे कबीर, अगर कभी ऐसा हमला मुझ पर हो गया तो तू क्या करेगा .

मैं- शुभ शुभ बोल चंपा. दुआ कर वो दिन कभी न आये. कभी न आये. तू हमारा परिवार है

चंपा - मैं तो बस ऐसे ही पूछ रही थी .

बाते करते करते हम खेतो पर आ गए. मैंने साइकिल रोकी और पगडण्डी से होते हुए कुवे पर बने कमरे तक आ पहुंचे . जैसे हम उस जगह पर आये जहाँ मैं कल निशा के साथ था वहां कुछ ऐसा देखा की चंपा खुद को रोक नहीं पायी और उलटिया करने लगी................

 
#17

मैंने देखा की इधर उधर मांस के बड़े बड़े टुकड़े फैले हुए थे . निशा अपने निशाँ छोड़ गयी थी . मैंने चंपा को पानी लाकर दिया और तमाम उन टुकडो को वहां से साफ़ करके दूर फेंक दिया.

मैं- अब ठीक है

चंपा- हाँ पर ये किसने किया

मैं- कोई शिकारी जानवर रहा होगा. तू आराम कर मैं तब तक काम देखता हूँ . तबियत ठीक लगे तो आ जाना .

मैंने खेतो का दूर तक चक्कर लगाया . बीच बीच से क्यारी-धोरो को भी देखा . जो पगडण्डी कटी थी उसे सुधारा. एक हिस्से में काफी घने पेड़ थी जिनकी बरसो से कटाई नहीं हुई थी मैंने सोचा की इनकी कटाई से इस हिस्से को धुप भी मिलेगी और लकडिया भी .

जब मैं वापिस लौटा तो देखा की भाभी आई हुई थी .

मैं- अरे भाभी आप क्यों आई इधर

भाभी- क्यों मैं नहीं आ सकती क्या

मैं- मेरा वो मतलब नहीं था .

भाभी- सोचा आज खाना मैं ले चलती हूँ , वैसे भी बहुत दिनों से घर से बाहर निकलना हुआ नहीं मेरा.

चंपा- बढ़िया किया भाभी .

भाभी मुस्कुराई और बोली- खाना खा लो तुम लोग.

खाना खाने के बाद चंपा कुछ सब्जिया तोड़ने चली गयी रह गए हम दोनों .

भाभी- मैं घूमना चाहती हूँ

मैं- जो आपका दिल करे. जहाँ तक जाना है जाइये

मैंने चारपाई बाहर निकाली और उस पर लेट गया कमर सीढ़ी करने के लिए. पर मेरा दिल नहीं लग रहा था पल पल हर पल मुझ पर एक नशा चढ़ रहा था निशा का नशा . कल रात इसी जगह पर हम दोनों अलाव के पास बैठ कर बाते कर रहे थे . चारपाई के किनारे को चुमते हुए मुझे बस निशा का सुरूर ही था .

"हाय देखो कैसे चारपाई को चूम रहा है जिसे चूमना चाहिए उसे तो देखता भी नहीं " चंपा ने मुझे घूरते हुए कहा.

मैं थोडा असहज हो गया.

मैं- तू कब आयी

वो- मैं या विदेश से आई हूँ इधर ही तो थी दो मिनट सब्जी लाने क्या गयी देखो हालत क्या हो गयी तुम्हारी

मैं- अरे कुछ नहीं बस ऐसे ही

चंपा - हाय रे फूटी किस्मत मेरी. भाभी कहाँ है

मैं- इधर ही होंगी बोल रही थी की खेतो का चक्कर लगा कर आती हूँ .

चंपा - सुन .बड़े भैया या राय साहब से कह कर कीटनाशक मंगवा लेना शहर से .सब्जियों की कई क्यारिया ख़राब हो रही है . नुक्सान होगा इस बार .

मैं- तूने पहले क्यों नहीं बताया मुझे

वो- ये मेरा काम नहीं है सब्जिया तू और मंगू उगाते हो . तुम्हे मालूम होना चाहिए. आजकल तुम्हारा ध्यान न जाने कहा है

मैं- कोई बात कल ही शहर चला जाऊँगा.

चंपा- मुझे भी ले चल अपने साथ . बहुत दिन हुए

मैं- चाची या भाभी के साथ जाया कर न

वो- तेरे साथ अलग ही मजा रहेगा.

मैं- और उस मजे की सजा क्या होगी.

चंपा - किस बात की सजा

मैं- तू समझती क्यों नहीं

हम बाते कर ही रहे थे की एकाएक भाभी के चीखने की आवाजे आने लगी. हम दोनों तुरंत भाभी की तरफ भागे. भाभी खेतो के बीच खड़ी खड़ी कांप रही थी .

"भाभी, भाभी क्या हुआ " मैंने भाभी के पास जाकर कहा . भाभी ने सामने की दिशा में अपना हाथ हिलाया . मैंने आगे आकर देखा सरसों में एक बच्चे की लाश पड़ी थी जिसे बुरी तरह से उधेडा गया था. खून बिलकुल ताजा था मैंने अपनी आँखे बंद कर ली. भाभी खौफ के मारे मेरे सीने से लग गयी .

मैं दिलासा भी देता तो क्या देता. एक मासूम को किसी ने उधेड़ कर रख दिया था . हम भाभी को कमरे के पास लेकर आये और थोडा पानी दिया . भाभी ने अपने जीवन में ऐसा कुछ नहीं देखा था तो वो बहुत ज्यादा घबरा गयी थी .

मैं- चंपा भाभी का ख्याल रखो

मैंने चंपा से कह तो दिया था पर वो बेचारी खुद उबकाई ले रही थी . खैर मैंने कस्सी उठाई और उस मासूम की लाश की तरफ चल दिया. उसे ऐसे छोड़ता तो कोई और जानवर नाश करता उसके टुकडो का. मने एक गड्ढा खोदा और उस नन्ही सी जान को दफना दिया. मेरे दिल में आग लगी थी . आँखों के सामने तमाम वो द्रश्य आ रहे थे जब निशा अलाव की आंच में मांस के टुकड़े भुन रही थी . अब मुझे समझ आया वो टुकड़े किसी बकरे के नहीं उस मासूम के थे.

मेरे पैर कांप रहे थे. जी घबरा रहा था पर मुझे चंपा और भाभी को भी संभालना था . मैंने फिर हाथ पैर धोये और भाभी की गाड़ी लेकर हम लोग घर आ गए. भाभी को बुखार आ गया था वैध ने कुछ दवाई दी . जिसके असर से भाभी को नींद सी आ गयी. मैंने चंपा को हिदायत दे दी थी की घर में किसी को भी इस घटना के बारे में न बताये.

निशा ने मुझे बताया कुछ था और हो कुछ और रहा था . मैंने उस पर विश्वास किया था . एक डायन पर मैंने विश्वास किया था . पर उसके लिए विश्वास के भला क्या मायने थे . क्या उसके और मेरे दरमियान जो भी बाते हुई थी उनका कुछ नहीं था सिवाय किसी छलावे के. पिछले कुछ दिनों में मैं लगातार लाशे ही देख रहा था . कहीं ये सब मुझ को पागल तो नहीं कर रहा था . छज्जे पर खड़े खड़े मैं ये सब ही सोच रहा था की तभी मैंने पिताजी की गाड़ी को अन्दर आते हुए देखा. गाड़ी से उतरते हुए वो कुछ थके से लग रहे थे . वो सीधा अपने कमरे में चले गए.

मैंने पिताजी के दरवाजे पर दस्तक दी.

पिताजी- अन्दर आ जाओ

मैं अन्दर गया . पिताजी कुर्सी पर बैठे थे .

मैं- आपसे कुछ बात करनी थी .

पिताजी- कहो

मैंने पिताजी को सारी बात बताई की खेतो पर क्या हुआ था .

पिताजी- ये पहली घटना नहीं है इस तरह की , आसपास के गाँवो से लगतार शिकायते आई है हमारे पास . पिछले कुछ महीनो से भेड-बकरिया. घोड़े -मुर्गे गायब हो रहे थे . ठण्ड के मौसम में अक्सर जंगली जानवर गाँवों का रुख कर लेते है पर इस पूर्णिमा से हमले जानवरों पर नहीं इंसानों पर हो रहे है . कुछ गाँवो के मोजिज लोगो से मिल कर हमने सुरक्षा के जरुरी उपाय किये भी पर वो सब नाकाफी है .

मैं- ऐसा चलता रहा तो लोगो का घर से निकलना बंद ही हो जायेगा.

पिताजी खेती का इलाका खुला है जंगल के पास है . इतने बड़े इलाके की तार बंदी न मुमकिन है

मैं- लोगो की टोली उस तरफ भी अगर चोकिदारी करे रातो में तो

पिताजी- नहीं , इन हालात में ये भी मुमकिन नहीं

मैं- तो फिर क्या इलाज इस समस्या का

पिताजी- दरअसल अभी तो मालूम भी नहीं की असल में ये क्या समस्या है. फिर भी हमने एक ओझा को बुलवाया है कल वो पहुँच जायेगा फिर देखते है वो क्या बताता है क्या करता है .

मै वापिस से भाभी के कमरे में आ गया . चाची ने मुझे गर्म चाय का कप दिया . कुछ घूंटो ने मुझे बड़ी राहत दी थी . भाभी के चेहरे पर नींद में भी डर सा था . दूसरी तरफ शहर से भी कोई खबर नहीं आई थी अभी तक. मैंने सोच लिया था की अगर निशा का हाथ है इन सब में तो मैं निशा को रंगे हाथ ही पकडूँगा तब देखूंगा वो क्या कहेगी मुझसे. सोचते सोचते मेरी भी आँख लग गयी .

 
#18


आँख खुली तो मैंने देखा की मेरे ऊपर कम्बल पड़ा था. निचे चाची और चंपा सो रही थी . मेरी नजर घडी पर पड़ी रात के दो बज रहे थे . मुझे महसूस हुआ की खाना खाना है . चंपा और चाची दोनों गहरी नींद में सोयी पड़ी थी . उन्हें जगाना उचित नहीं था पर किसी न किसी को तो रसोई खोलनी ही थी . मैं रसोई में गया और अपने लिए खाना निकाला . मैं वापिस ऊपर आ ही रहा था की कुछ आवाजो ने मेरा ध्यान खींच लिया. मैंने देखा हमारा दरवाजा हमेशा की तरह खुला ही पड़ा था .

"इसे बंद क्यों नहीं करते " मैंने अपने आप से कहा और थाली को रख कर दरवाजे की तरफ चल दिया.मैं दरवाजे को बंद कर ही रहा था की कुछ गीला गीला सा मेरे हाथ पर लगा. ओस समझ कर मैंने उसे अपनी शर्ट से साफ़ किया और फिर कुण्डी लगा कर वापिस आ गया. मैंने शांति से अपना खाना खाया और अपने कमरे में आकर सो गया.

अगला दिन बड़ा खूबसूरत था , धुंध इतनी घनी थी की मुझे छज्जे से निचे आँगन नहीं दिख रहा था . ओस की वजह से सब कुछ इतना गीला गीला था की जैसे रात में बारिश हुई हो. मैं निचे गया तो चाची से मुलाकात हो गयी .

चाची- सही समय पर उठे हो चाय बन ही रही है .

मैं- हाथ-मुह धोकर आता हूँ

मैंने शाल को उतार कर चाची को दिया और नलके की तरफ जा ही रहा था की चाची ने मुझे टोक दिया.

चाची- ये तेरी शर्ट पर क्या लगा है

मैं- क्या लगा है

कहते हुए मैंने देखा इ शर्ट पर लाल निशान थे . तभी मुझे ध्यान आया की शर्ट से मैंने रात को हाथ साफ़ किया था . मेरे दिमाग में घंटिया सी बजने लगी. चाची मुझे ही देख रही थी .

मैं- कुछ लग गया होगा.

मैं तुरंत दरवाजे के पास गया देखा की कुण्डी पर भी सुर्ख लाल रंग चिपका हुआ था और मुझे कोई ताज्जुब नहीं था ये समझने में की ये खून है. मेरा माथा ठनका दरवाजे पर खून कैसे आया जबकि किसी को भी कोई चोट नहीं लगी थी . सोचते हुए मैंने दरवाजे को साफ़ किया और शर्ट को धोने के लिए डाल दी.

चाय पीते हुए मेरी आँखे एक बार फिर से चाची की कटीली जवानी को निहार रही थी कौन कह सकता था की ये पैंतीस बरस की ये गदराई हुई औरत ना विधवा थी न सुहागन. खिले हुए ताजा गुलाब पर जैसे ओस पूरी रात बरसी हो चाची का यौवन ठीक वैसा ही था .

चाची- क्या देख रहा है ऐसे

मैं- बड़ी प्यारी लग रही हो तुम.

चाची- ये तो तू रोज ही कहता है

मैं- सच ही तो कहता हूँ मैं

चाची- मेरी तारीफ छोड़ और जा भाभी के लिए नाश्ता ले जा. बहुरानी से कहना की उसे निचे आने की जरुरत नहीं है वो आराम ही करे.

मैं नाश्ता लेकर गया . भाभी खिड़की से बाहर देख रही थी .

भाभी- देवर जी तुम ये क्यों लाये

मैं- सारे घर का भार आप पर हैं , इतना तो मेरा भी फर्ज है न भाभी .

भाभी मुस्कुराई.

मैं- अब तबियत कैसी है

भाभी- बेहतर है .

तभी बाहर से गाड़ी की आवाज आई . मैंने देखा भैया सहर से लौट आये थे तो मैं दौड़ के उनके पास गया .

मैं- लड़का कैसा है भैया

भैया- डॉक्टर के पास कोई तोड़ नहीं है . खून की बोतले चढ़ती है और उसका शरीर निचोड़ लेता है . डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए है . पिताजी ने सुचना भिजवाई थी की कोई ओझा आने वाला है तो हम लड़के को गाँव ले आये है वो ही अब कुछ समाधान करेगा.

मैं- आपको क्या लगता है

भैया- मेरे आदमियों ने बहुत तलाश की जंगल में . आसपास के तमाम इलाको में पर हाथ खाली ही रहा . रात को आस पास के गाँवो के मोजिज लोगो की सभा होगी जिसमे देखेंगे की क्या निष्कर्ष निकलता है . मैं बहुत थका हु, खाने को कुछ है तो ले आओ मैं सोऊंगा थोड़ी देर.

दोपहर होते होते ओझा भी गाँव आ पहुंचा . अपने दो चेलो संग. पिताजी ने उसके रहने-सहने की व्यवस्था पहले ही करवा दी थी . ओझा ने जलपान करने के बाद अपना स्थान बना लिया . एक छोटी सी पूजा करने के बाद उसने अपनी कार्यवाही शुरू की . न जाने क्या पढ़ रहा था वो कभी इधर देखता कभी उधर फिर उसने पंच के लड़के को देखा . उसकी नब्ज़ टटोली उसकी काली पड़ गयी आँखों में देखा और शांत हो गया.

"कुछ तो बोलिए महाराज " पंच ने आग्रह किया

ओझा- ये लड़का तीन दिन के भीतर मर जायेगा.

ओझा ने जैसे ही कहा पंच के परिवार का रोना-पीटना शुरू हो गया. माहौल गमजदा हो गया .

पिताजी- महराज कोई तो उपाय होगा.

ओझा- इस मुर्ख ने स्वयं अपना खून अर्पित किया है . इसने वचन दिया है रक्त की बूँद बूँददेने का वचन की पालना हो रही है .

ओझा की बात तमाम लोगो के सर के ऊपर से गयी.

"किसको रक्त देने का वचन दिया है इसने " मैंने ओझा से पूछा

ओझा ने जवाब देने में बहुत समय लिया तब तक उसकी नजरे मुझ पर जमी रही फिर वो बोला-लालच, कामना व्यक्ति के सबसे बड़े शत्रु है . इसके हालात भी कुछ ऐसे रहे होंगे की ये सच और झूठ का फर्क नहीं कर पाया और जीवन-मृत्यु के फेर में उलझ गया .

मैं- पर किसको वचन दिया इसने ये तो बताओ

ओझा-धीरज रखो. समय आने पर मालूम हो जायेगा. मैं इसकी मृत्यु नहीं टाल पाऊंगा . कोई भी नहीं टाल पायेगा पर मैं गाँव की सुरक्षा के उपाय जरुर करूँगा. गाँव वाले मेरे बनाये नियमो का पालन करेंगे तो मेरा वचन है सुरक्षित रहेंगे. मैं गाँव की हद को कील दूंगा.

गाँव वालो को ओझा के आश्वासन ने राहत तो मिली पर लड़के मी मौत हो ही जाएगी इस से दुःख भी था . पिताजी ने कुछ समय बाद सबको जाने के लिए कहा और खुद भी चले गए मैं भी वहां से निकल ही रहा था की ओझा ने मुझे रोक लिया.

ओझा- रुको कुंवर

मैं- जी कहिये.

ओझा- उसने तुम्हे क्यों छोड़ दिया...............
 
Back
Top