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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#37

एक रात और मैंने चाची की बाँहों में गुज़ार दी. सुबह ही मैं मंगू को लेकर हलवाई के पास गया और उस से पूछा की मिठाइयो का काम कितना बाकी है .

हलवाई- क्या बताऊ कुंवर, मेरा कारीगर न जाने कहाँ गायब हो गया है . वो होता तो बड़ी राहत रहती मुझे .

मैं- तो तुमने तलाश नहीं की उसकी

हलवाई- पिय्क्क्ड है , किसी और के साथ हो लिया होगा ऐसे की क्या तलाश करनी .

मैने मेरे मन में सोचा ये दुनिया बड़ी मादरचोद है .

मैं- कोई नहीं, दिवाली के दिन आये ही समझो मिठाई कम नहीं रहनी चाहिए

हलवाई- आजतक ऐसा हुआ है क्या कभी

मैं- ठीक है

फिर मैं और मंगू खेतो पर निकल गए. सरसों की फसल में तेजी होने लगी थी पर फिर भी हमने सोचा की दिवाली के बाद ही पानी देंगे इसको. गेहूं भी हमारे ठीक ही लग रहे थे . शाम तक हम लोग वही पर रहे . मैं मंगू के आगे कारीगर का जिक्र करना चाहता था फिर सोचा की मंगू चुतिया है . किसी और के आगे अंट शंट बक दिया तो मेर्रे लिए और मुसीबत हो जाएगी.

खैर त्यौहार सर पर था तो मैंने चाची के घर को पूरा साफ़ कर दिया. दरअसल पुताई के लिए भैया ने मना किया था वो चाहते थे की थोड़े दिन में चंपा का ब्याह होना ही है फिर ही करवा लेंगे. तमाम व्यस्तता के बीच एक चीज जो मुझे हताश कर रही थी वो थी मेरे लिंग की सूजन, जब जब मैंने मूतने जाता तो मैं उसे देखता . हालाँकि चाची कहती थी की ये चीज़ मोटी ही होनी चाहिए क्योंकि औरत को मोटे लंड से चुदने में अलग हो मजा आता है .

पर मुझे थोड़ी शर्मिंदगी होती थी क्योंकि ये साला झूलता ही रहता था इसका उभार अलग से ही दीखता था . चंपा कई बार इसकी तरफ इशारा करके मेरे मजे लेती थी. दूसरी समस्या थी मेरे कंधे का जख्म साला भर ही नहीं रहा था . हार कर मैंने भैया को बताया तो उन्होंने कहा की दिवाली के बाद वो मुझे शहर दिखायेंगे बड़े डॉक्टर को .

खैर इन्ही सब के बीच दिवाली का दिन भी आ ही गया. भैया ने हम तीनो को पैसे दिए नए कपडे दिए. भाभी ने मंगू और चंपा को तोहफे दिए . मैंने भाभी के पैरो को हाथ लगाया पर उनका हाथ मेरे सर प् र्नाही आया. ऐसी ये पहली दिवाली थी जो भाभी की नाराजगी के बीच मनाई जाने वाली थी .

इतना पराया कर बैठी थी वो मुझे , दिल में कसक तो बहुत थी कहना तो बहुत कुछ चाहता था मैं पर त्यौहार में खटास न हो जाए इसलिए मैं चुप ही रहा. भैया के साथ जाकर हम लोगो ने घर घर मिठाई बांटी. गाँव का माहौल थोडा ठीक नहीं था इसलिए इस बार आतिशबाजी नहीं की जाने वाली थी . बस दिए हो जलाने थे. रात को पूजा के बाद हमने गाँव भर में दियो की रौशनी कर दी. गाँव का स्कूल, मंदिर, डाकखाना. जोहड़ जो भी जहाँ भी जगह दिखी रौशनी करते गए.

दो दिए मैंने लाली और उसके प्रेमी के सम्मान में उस जगह पर जलाये जहाँ पर उन्हें फांसी दी गयी थी .तरह तरह की मिठाई, पकवान खाने पीने में ही आधी रात कब हो गयी मालूम ही नहीं हुआ के तभी मुझे याद आया की मैं कुवे पर और खेतो में दिए जलाना तो भूल ही गया.

मैंने एक झोले में दिए डाले और तेल का कनस्तर साइकिल पर बाँध लिया

चाची- अब कहाँ

मैं- खेतो पर तो दिए जलाये ही नहीं

चाची- रात बहुत हुई अब ठीक नहीं वहां जाना

मैं- चाची किसान का दूसरा घर खेत होते है . उस धरती माता का सम्मान नहीं किया तो ये भी गलत ही होगा न . तुम फ़िक्र मत करो मैं यूँ गया और यूँ आया .

चाची- मैं चलू साथ

मैं- नहीं कहाँ न बस गया और आया . देर नहीं करूँगा.

मैंने साइकिल उठाई और तेजी से गाँव से बाहर को निकल गया . जिस धरती से हम अनाज, सब्जिया ले रहे थे. जिस धरती को हम दूसरी माँ समझते थे इस त्यौहार में उसे कैसे अकेला छोड़ देते . मैं जब पगडण्डी से थोड़ी दूर था तो मैंने अपनी जमीन पर दूर से ही रौशनी देख ली थी और मैं हैरान हुआ . मैंने सोचा क्या मालूम भाभी आई हो यहाँ पर . जब मैं वहां पर पहुंचा तो देखा की दिए जुगनुओ जैसे फैले थे जहाँ तक मेरी नजर गयी झिलमिलाते दियो ने मन मोह लिया.

मैंने देखा कुवे की मुंडेर पर गोलाई में दिए जल रहे थे और वही पर सियार बैठा हुआ बड़ा गजब लग रहा था उस रौशनी में . मुझे देख कर वो पास आया और मेरे सीने से पंजे लगा दिए. उसका ये तरीका था गले लगने का. उसे देख कर मैं मुस्कुराया . मैं थोडा और आगे बढ़ा तो देखा की देहरी पर मेरी तरफ पीठ किये कोई बैठी थी और मैं एक पल में जान गया वो कौन थी ....

"निशा, तुम यहाँ " मैंने कहा

निशा-और कौन होगा मेरे सिवा .

निशा उठ कर मेरे पास आई .उसे देखा , देखता ही रह गया . इतनी खूबसूरत आज से पहले वो कभी नहीं थी . आज उसने केसरिया लहंगा चोली पहना था

मैं- जोगन लग रही हो आज

निशा- जोग लगे जमाना हुआ

उसने एक दिया मेरे हाथ में रखा और बोली- बिना बताये आई तुम्हे परेशानी तो नहीं

मैं- इतना तो हक़ है तुम्हारा . ये सब तुम्हारा ही है कभी भी आ सकती हो. मुझे मालूम होता की तुम आओगी तो मैं पहले ही आया जाता

निशा- अब भी देर कहाँ हुई.

मैं- तू जब भी बुलाये मैं तो आऊंगा ही

निशा- ये बात है तो फिर इतना इंतजार क्यों करवाया

मैं- क्या बताऊ अब . वैसे मुझे किसी ने बताया नहीं की डायन त्यौहार मानती है

निशा- तूने डायन को जाना ही नहीं कभी . पहले तो कभी मनाया नहीं पर अब ये जरुर मनाएगी ये डायन. अंधेरो में मिला तू उजले की तरफ खींच रहा है मुझे.

वो मेरे पास आई उसने मेरे माथे को चूमा और एक नारंगी-लाल धागा मेरे हाथ में रख दिया.

मैं- क्या है ये ............
 
#38

मैं- क्या है ये निशा

निशा- इसे कलाई में बांध लेना ये रक्षा करेगा तुम्हारी

मैने वो धागा जेब में रख लिया.

निशा- ऐसे क्या देख रहा है

मैं- दिल करता है तुझे ही देखता रहू

निशा- देखा था न फिर मुड के देखा नहीं तूने .

मैं- समझता हूँ

निशा- समझता नहीं तू, समझता तो दारा की खाल नहीं उतारता

मैं- तुझे मालूम हो गया .

निशा- कुछ छिपा भी तो नहीं मुझसे

मैं- मुझे बहुत अफ़सोस है उस बात का , हालाँकि मैं उसे मारना नहीं चाहता था बस सबक सिखाना चाहता था ताकि फिर किसी मजलूम को सताए नहीं वो.

निशा- जो किया ठीक किया पर कबीर इस रक्त की महक से बच कर रहना , जब इसका सुरूर चढ़े तो फिर कुछ खबर न रहे.

मैं- मैं वैसा नहीं हूँ निशा, मैंने कभी किसी से ऐसा-वैसा कुछ नहीं किया उस दिन भी बस मैं उसे अहसास करवाना चाहता था की मजलूमों को नहीं सताना चाहिए. दारा को मुझसे दिक्कत थी तो मिल लेता पर उसने नीच हरकत की .

निशा- ये दुनिया बड़ी जालिम है धीरे धीरे तुम भी समझ जाओगी

मैं-ठण्ड बहुत है कहो तो अलाव जला लू या अन्दर बैठ सकते है

निशा ने सितारों की तरफ देखा और बोली- कुछ देर और ठहर सकती हूँ

मैं- अगर कभी तुम्हे दिन में मिलना हो तो .....

निशा-मेरा साथ करना है तो इन अंधेरो की आदत डाल लो . मेरा यकीन करो ये अँधेरे तुम्हारे उजालो से भी ज्यादा रोचक है .

मैं- फिर भी अगर कभी दिन में मुझे तुम्हारी जरूरत हुई तो .

निशा- तो क्या मैं आ जाउंगी पर ये समझना मेरी कुछ हदे है

मैं- चंपा कहती है की डायन का नाम लेने से वो रात को घर पर आ जाती है

निशा- वो कहती है तो ठीक ही कहती होगी.

रात के तीसरे पहर तक हम दोनों कुवे की मुंडेर पर बैठे बाते करते रहे. फिर उसके जाने का समय हो गया . दिल तो नहीं कर रहा था पर रोक भी तो नहीं पा रहा था उसे. उसके जाने के बाद मैंने भी साइकिल उठाई और गाँव का रास्ता पकड़ लिया. मैंने देखा की जब तक आबादी शुरू नहीं हुई सियार मेरे साथ साथ ही रहा और फिर ख़ामोशी से मुड गया.

देखा की चाची अभी तक जाग रही थी .

मैं- सोयी नहीं अभी तक

चाची- जिनका जवान लड़का इतनी रात तक बाहर हो वो कैसे सो सकती है.

मैं- थोड़ी देर हो गयी .

चाची- वैसे मुझे भी लगता है की बहुरानी ठीक कहती है तेरा किसी न किसी से तो चक्कर जरुर है . गाँव में ऐसी कौन हो गयी जो रातो को तेरे साथ है , मालूम तो कर ही लुंगी मैं.

मैं- ऐसी कोई बात नहीं है चाची

चाची- ऐसी ही बात है तू ही बता भला और क्या वजह है जो तू बहाने कर कर के गायब हो जाता है , मैं जानती हूँ खेतो की रखवाली भी तेरा बहाना ही है

मैं- सच सुनना चाहती हो

चाची- सुनकर ही मानूंगी

मैं- तो सुनो , मेरी जिन्दगी में कोई आ गयी है ये बात मैं मानता हूँ

चाची- वाह बेटे अब बता भी दे वो कौन है

मैं- वो एक डायन है .

चाची के माथे पर शिकन छा गयी मेरी बात सुन कर

चाची ने उसी समय आंच जलाई और लाल मिर्च कोयलों पर फूक कर मेरे सर से पैर तक उसे घुमाया और बोली- रात बहुत हुई सो जा.

मैं- मैं ऐसा करने से क्या होगा.

चाची- तसल्ली रहेगी मुझे. और हाँ अबकी बार ऐसे बहाना करके गया न तो मैं अभिमानु को सब बता दूंगी .

मैंने चुपचाप बिस्तर पकड़ा और आँखे बंद कर ली. सुबह मेरा कंधा बहुत जोर से दुःख रहा था शायद कुछ सुजन भी थी तो भैया मुझे शहर के लिए दिखाने के लिए. डॉक्टर ने बताया की मांस सड रहा है , उसने अच्छे से देखा और फिर अपने औजार लेकर कुछ चीर फाड़ करने लगा. बेशक मुझे दवाई दी थी सुन्न करने की पर फिर भी दर्द हो रहा था .मुझसे बाते करते हुए डॉक्टर कभी नुकीले औजार इधर घुसाता कभी उधर.

बहुत देर बाद उसने कंधे के अन्दर से कोई तीन-चार इंच लम्बा एक टुकड़ा बाहर निकाला. जो देखने में किसी हड्डी सा लग रहा था .

डॉक्टर- इसकी वजह से तुम्हारा मांस लगातार सड रहा था .

मैं- पर ये क्या है

डॉक्टर- शायद ये दांत हो सकता है उस जानवर का जिसने तुम्हे काटा था .

ये सुन कर मेरी रीढ़ की हड्डी में सिरहन दौड़ गयी. जिस बात को मैं लगातार मानने से इंकार कर रहा था डॉक्टर ने उसकी पुष्टि कर दी थी . उस रात बेखुदी की हालत में अवश्य ही उस हमलावर ने मुझे काट लिया था .

"क्या इस की वजह से ही मुझे रक्त की महक इतनी प्यारी लगने लगी थी ." मैंने खुद से सवाल किया और जवाब के ख्याल से ही मैं घबरा गया .

डॉक्टर ने मुझे कुछ दवाइया दी. कुछ मरहम दिए जो जख्म को जल्दी भरने में मदद करने वाले थे . साथ ही हिदायत दी की हर तीसरे दिन पट्टी बदली जाए और जितना हो सके मैं आराम करू ताकि कंधे पर जोर कम से कम आये.

"अब तुम जा सकते हो " डॉक्टर ने कहा

मैं उठ कर बाहर को चला ही था की तभी मेरे मन में आया की लिंग की सुजन के बारे में क्या इनसे बात की जाये. पर हिम्मत नहीं हुई की जिक्र कर सकू. भैया ने एक मोटा कपडा ख़रीदा कंधे की अतिरिक्त सुरक्षा के लिए. हमने दोपहर का खाना शहर में ही खाया . भैया के एक दो जानने वालो से मिले और घर आते आते अँधेरा छाने लगा था. वापसी में भैया ने गाँव से थोडा पहले गाडी रोक दी .

मैं- क्या हुआ

भैया - कुछ नहीं बैठते है थोडा फिर चलेंगे.

भैया ने गाड़ी में से एक बोतल निकाली और बाहर उतर गए . मैं भी उनके पीछे हो लिया . पास में ही एक लकड़ी का लट्ठा पड़ा था हम उस बैठ गए . भैया ने एक पेग बनाया और मुझे दिया .

मैं- नहीं भाई

भईया- अरे ले कुछ नहीं होता. ये तो दवाई है इतनी सर्दी में खांसी-जुकाम से भी तो बचना है .

मैंने गिलास थाम लिया और एक चुस्की ली. कडवा पानी कलेजे पर जाकर लगा.

मैं- भैया ये तो कोई नयी ही चीज है

भैया- हाँ, अंग्रेजी है

मैंने कुछ घूँट और भरे.

भैया- कबीर .

मैं- हाँ भैया ..

भैया- कबीर , कुछ नहीं जल्दी से पेग ख़त्म करते है रात घिर आई है घर चलते है .

मुझे लगा की भैया कुछ पूछना चाहते है पर पूछ नहीं पा रहे है

मैं- क्या बात है भैया. होंठ कुछ पूछ रहे है आपका दिल रोक रहा है

भैया- नहीं रे कुछ नहीं

मैं- आप पूछ सकते है आपसे झूठ बोल सकू इतना बड़ा नहीं हुआ मैं अभी .

भैया- दारा की हत्या के बारे में क्या ख्याल है तेरा

भैया की बात सुनकर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया जिसे मैं भैया की नजरो से छुपा नहीं सका..............
 
#

भैया- जिन रास्तो पर तू चल रहा है न उन पर मैं दौड़ चूका हूँ . तेरे हर किये कराये पर मैं मिटटी डाल दूंगा पर तुझे भी समझना होगा राय साहब के हम दो कंधे है, हमें जिम्मेदारी सिर्फ इस घर की ही नहीं है इस गाँव को इस समाज को साथ लेकर भी चलना है . मैंने तुझे आज तक नहीं रोका आगे भी नहीं रोकूंगा पर बस इतना समझना की अय्याशी चाहे जितनी भी करो ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए की घर की दहलीज तक उस बात के छींटे पड़े.

मैं- भैया, दारा को मैं जानता भी नहीं उसका जिक्र भी आपसे ही सुना है

भैया- बेहतर होगा आगे जिक्र तुम्हे सुनना नहीं पड़े. मैंने और तुम्हारी भाभी ने फैसला किया है की चंपा के ब्याह के बाद तुम्हारे लिए भी रिश्ते देख लिए जाये कोई ठीक सा लगेगा तो ब्याह कर देंगे तुम्हारा .

मैं- भैया , अभी मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ .

भैया- भाई हूँ तेरा , तुझे तुझसे ज्यादा जानता हूँ ये बात क्यों दोहरानी पड़ती है मुझे. लाली के लिए तेरी आँखों में जो बगावत देखि थी मैंने , वो आज भी देख रहा हूँ मैं . मेरे भाई, मैं जानता हूँ एक दिन आयेगा जब तू मेरे सामने खड़ा होगा और मैं नहीं चाहता की वो दिन कभी भी आये इसलिए कुछ फैसले मुझे लेने ही होंगे.

मैं- जब मुझे ब्याह करना होगा मैं बता दूंगा

भैया ने एक ही साँस में अपना पेग खाली कर दिया और बोले- तेरी मर्ज़ी छोटे

भाई ने जान कर बात अधूरी छोड़ दी पर मैं समझ गया था की नियति मेरे भाग में क्या लिख रही थी . बोतल ख़तम करने के बाद हम गाँव में पहुँच गए. चाची के घर पहुंचा तो देखा की चंपा रसोई में मीट पका रही थी . केसरिया सलवार सूट में बड़ी प्यारी लग रही थी वो . एक पल को मुझे लगा की जैसे निशा ही हो वहां पर . निशा के ख्याल से ही मेरे होंठ अपने आप मुस्कुरा पड़े.

चंपा- क्या बात है आजकल अपने आप में ही खोये रहते हो .

मैं- आज बड़ी कटीली लग रही है .

चंपा- मैं तो हमेशा से ही दिलदार रही हूँ एक तू ही है जो देखता नहीं मेरी तरफ .

मैं- भूख लगी है रोटी परोस

चंपा- बस ये पक जाये, आटा गूंध लिया है चाची आ जाये फिर फटाफट तवा रख दूंगी.

मैं- कहा गयी चाची.

चंपा- भाभी के पास गयी है .

मैं- किसलिए

चंपा- भाभी तेरी सलामती के लिए कल एक पूजा करवा रही है उसकी तयारी के लिए .

मैं- घर से तो निकाल दिया है अब ये किसलिए

चंपा- दिल से नहीं निकाल सकती तुझे वो इसलिए

मैं- वो मुझे कातिल मानती है उन तमाम लोगो का

चंपा- वैसे शक है मुझे भी ,

मैं- की मैंने क़त्ल किया है उनका

चंपा- नहीं मुझे शक है की कविता का तेरे साथ सम्बन्ध था तुझसे चुदने के लिए ही वो जंगल में गयी थी या फिर तूने उसे कुवे पर बुलाया होगा.

मैं- अगर मेरा ऐसा इरादा होता तो उसके घर पर ही नहीं जाता मैं, वैसे भी वैध जी तो तक़रीबन बाहर ही रहते है घर से ऐसे में हम दोनों के पास पूरा मौका नहीं रहता क्या

चंपा-वैध के घर के चक्कर भी कुछ ज्यादा ही लग रहे थे बोल न ,

मैं- वैध के घर जाने का मेरा मकसद कुछ और था .

चंपा जरा हमें भी तो बता ऐसा क्या मकसद था जो कविता पूरा कर रही थी और हम नहीं कर पाये.

मैं- मेरी कुछ समस्या है

चंपा- हाँ तो हमें भी बता देना . क्या मालूम मैं कुछ समाधान कर सकू.

मैं- तुझे हर बात मजाक में ही लेनी है न

चंपा- चल ठीक है तू चाहे तो मुझे बता सकता है

मैं- सुन कर हसेंगी तो नहीं न

चंपा- मैं कोई पागल हूँ क्या जो बिना बात दांत फाडू

मैं- ठीक है फिर बताता हूँ , मैं एक रात खेत में मैं पेशाब कर रहा था तो किसी कीड़े ने मेरे इस पर काट लिया तब से ये सूज गया है . इसकी सुजन कम ही नहीं हो रही .

चंपा- अरे ऐसा भी होता है क्या ,

मैं- ऐसा ही हुआ है

चंपा- मैं नहीं मानती इस बात को

मैं- यही बात है

चंपा- एक काम कर मुझे देखने दे इसे, तभी मैं मानूंगी

मैं- देख लिया न तो घबरा जाएगी , चुदने के तेरे सारे ख्याल गायब हो जायेंगे.

चंपा- ये बात है तो दिखा फिर

मैं- नहीं दिखाने वाला मैं

चंपा- देख तू अब मुकर रहा है बात से

मैंने देगची में चम्मच डाली और थोड़ी तरी और कुछ मांस के टुकड़े कटोरी में डाले और खाने लगा.

मैं- चंपा , तू मंगू की बहन न होती तो मैं पक्का तेरी मुराद पूरी कर देता .

चंपा- कबीर मैं बहुत दिनों से तुझे कुछ बताना चाहती थी , तू हमेशा मंगू की दोस्ती का जिक्र करता है पर आज मैं तुझे मेरी जिन्दगी का एक काला सच बताती हूँ .

चंपा ने जब ऐसा कहा तो मेरा दिल और जोर से धडकने लगा.

चंपा- जिस मंगू की वजह से तू मुझे नहीं देखता वो मंगू , वो मेरा भाई मंगू ले चूका है मेरी.........

चंपा की बात सुन कर मेरे पैरो तले जैसे जमीन ही खिसक गयी .

मैं- जुबान को लगाम दे चंपा. सोच कर बोल तू क्या बोल रही है

चंपा- मुझे मालूम था तू यकीन नहीं करेगा पर तेरा दोस्त वैसा नहीं है जितना सीधा तू उसे समझता है . जानता है मैंने तुझसे क्यों कहा की तेरा कविता से सम्बन्ध हो सकता है क्योंकि मंगू से सेट थी कविता. मैंने सोचा की क्या मालूम मंगू ने तुझे भी दिलवा दी हो कविता की .

मैं- चंपा अगर तू सच कह रही है तो अभी मेरे साथ चल , मुझे तेरी कसम मंगू का वो हाल करूँगा मैं की ये गाँव याद रखेगा. एक पवित्र रिश्ते की मर्यादा तोड़ने की उसकी हिम्मत कैसे हुई.

चंपा- तू ऐसा कुछ नहीं करेगा . तू मेरा साथी है इसलिए मैंने अपने मन की बात तुझे बताई ये किसी और को मालूम हुआ तो मुझे फांसी खानी पड़ेगी कबीर.

मैं- तू क्यों फांसी खाएगी , गलत काम मंगू ने किया है सजा उसे मिलेगी.

चंपा- और उस सजा से तकलीफ भी हमें ही होगी कबीर. मैं तुझे बस बताना चाहती थी की ये दुनिया वैसी नहीं है जैसा तू मानता है . यहाँ पर फरेब है , धोखा है

मैंने चंपा से कुछ नहीं कहा उसे अपने गले से लगा लिया मेरी आँखों से कुछ आंसू बह कर उसके गालो को भिगो गए.
 
#40

चाची के आने के बाद हम सब ने खाना खाया . उसके बाद मैं चंपा को छोड़ने चला गया . वापसी में मैं थोड़ी देर उस पेड़ के पास बने चबूतरे पर बैठ गया जहाँ से लाली को सजा सुनाई थी . ये दुनिया बड़ी मादरचोद है मैंने सोचा . पर मैं दोष देता भी तो किसे मैं खुद अपनी चाची को चोद रहा था .दूसरी बात मंगू ने कविता को फसाया हुआ था और हरामी ने मुझे कभी बताया भी नहीं ..

बैठे बैठे मैंने सोचा की एक दिन आयेगा जब मैं भी अपनी पसंद की लड़की से ब्याह करने का कहूँगा तब भी ये जमाना मेरे खिलाफ ही जायेगा जैसे लाली के खिलाफ था एक दिन मुझे भी ऐसे ही किसी पेड़ पर लटका दिया जायेगा. खैर, कितनी देर बैठे रहते घर तो जाना ही था चाची मेरी राह ही देख रही थी .

मैंने बिस्तर पर जाते ही रजाई ओढ़ ली और आँखे बंद कर ली. कुछ ही देर में चाची भी बिस्तर में आ गयी .

चाची- क्या बात है परेशां लगते हो , शहर में डॉक्टर ने क्या बताया

मैं- डॉक्टर ने कहा सब ठीक है जल्दी ही जख्म भर जायेगा

चाची- तो फिर चेहरे पर ये चिंता किसलिए

मैं- चाची तुम चंपा की सबसे अच्छी दोस्त हो . उसका तुमसे कुछ नहीं छुपा

चाची- क्या हुआ बताएगा भी

मैं- चंपा ने मुझे बताया की मंगू उसकी लेता है

मेरी बात सुन कर चाची कुछ देर के लिए चुप हो गयी और फिर बोली---- सच है ये कबीर.

मै- तुमको पता था , तुमने खाल क्यों नहीं उतारी मंगू की

चाची- उसका कारण था , ये बात अगर गाँव में फैलती तो उन दोनों को मार दिया जाता समाज में बदनामी होती अलग

मैं- तो क्या बदनामी के डर से हम अनुचित को संरक्षण देंगे

चाची- ये दुनिया वैसी नहीं है कबीर जैसा तू समझता है . मंगू के माता पिता का क्या दोष है अगर औलाद ना लायक निकल जाये तो . मंगू और चंपा को तो एक दिन लटका दिया जाता पर उसके माँ बाप लोगो के तानो से रोज मरते . तिल तिल करके मरते वो . दूसरी बात ये दुनिया एक हमाम है कबीर जिसमे हम सब नंगे है . चम्पा और मंगू की बात क्यों करे तू मुझे और खुद को देख हम दोनों भी तो गुनेह्गर है कहीं न कहीं . कहने को हम माँ-बेटे है और बिस्तर पर लोग-लुगाई बने हुए है

.

चाची मुझे वो आइना दिखा रही थी जिसके वजूद को मैं नकार रहा था .

चाची- कबीर, मैं जानती हूँ चंपा के मन में चाहत है तेरे प्रति, तेरे अन्दर जो मंगू की दोस्ती का मान है वो भी जानती हु. चंपा की हर कोशिश तेरे करीब आने की दोस्ती की आन पर आकर रुक जाती है . और मुझे गर्व है इस बात का की मेरा बेटा रिश्तो की अहमियत समझता है . चंपा ने अपना मन तेरे सामने खोला क्योंकि वो विश्वास करती है तुझ पर अब ये तेरी जिम्मेदारी है की तू उसका मान रखे.

मैं- मंगू ने कविता को भी पटाया हुआ था .

चाची- वो उसकी जिन्दगी है , उसका निजी मामला है हमें जरुरत नहीं उसमे पड़ने की .

मैं- वो मुझे बता सकता था .

चाची- कबीर समझ लो कुछ बाते निजी होती है अब देखो तुम्हारी भाभी और यहाँ तक मुझे भी लगता है की तुम्हारे किसी लड़की से चक्कर है जिससे मिलने को तुम रात रात भर गायब रहते हो हमारे लाख पूछने पर भी तुमने हमें नहीं बताया क्योंकि तुम समझते हो ये निजी मामला है तुम्हारा. बेशक मंगू और तुम बचपन से एक साथ रहे हो पर कुछ चीजे दोस्तों से भी छिपाई जाती है . सो जाओ अब , सुबह हमें पूजा के लिए चलना है .

चाची ने पीठ मोड़ ली मैंने एक बार उसकी गांड पर हाथ फेरा और फेर कर ही रह गया क्योंकि तभी मेरे कंधे में दर्द हो गया मुड़ने से . मैंने कंधे के निचे तकिया लगाया और सोने की कोशिश करने लगा. सुबह अँधेरे ही चाची ने मुझे उठा दिया . थोड़ी देर में ही मैं तैयार हो गया . और हम लोग चल दिए.

चौपाल पर पहुँचने के बाद हम लोग उस रस्ते पर मुडने लगे जो गाँव से बाहर जंगल की तरफ जाता था .

मैं- मंदिर दूसरी तरफ है

भाभी- चुपचाप चलते रहो .

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था .

चाची- पूजा, वनदेव के पत्थर पर होगी. बहुरानी को लगता है की जंगल में वनदेव ही सुरक्षित रखेंगे तुम्हे.

मैं- इतनी सी बात के लिए इतनी ठंडी सुबह में ले जा रहे हो मुझे

चाची- देवता के बारे में कुछ मत बोलो

खैर हम लोग वनदेव के पत्थर के पास पहुंचे मैंने हसरत भरी नजरो से उस तरफ देखा जो निशा की मिलकियत तक जाता था . न जाने क्यों दिल को अच्छा लगा. गाँव का पुजारी पहले से ही वहां पर मोजूद था . एक चटाई सी बिछा कर पूजा की तैयारिया शुरू की गयी . पुजारी ने अग्नि जलाई और मन्त्र पढने शुरू किये उसने मेरे माथे पर टीका लगाया और फिर मुझे अपना हाथ आगे करने को कहा जैसे ही मैंने अपना हाथ आगे किया पुजारी के मन्त्र रुक गए उसके माथे पर पसीना बहने लगा. इधर-उधर देखने लगा वो

भाभी- क्या हुआ पुजारी जी

पुजारी- ये शुभ मुहूर्त नहीं है

भाभी- ये क्या कह रहे है आप. आपने ही तो पंचांग देख कर गणना की थी

पुजारी- मुझसे भूल हुई होगी.

भाभी- भूल नहीं हुई आपसे आप कुछ छिपा रहे है हमसे . जो भी बात है वो बताई जाये

अब राय साहब की बहु को भला कौन मना करे. पुजारी ने मेरा हाथ पकड़ा और भाभी के सामने कर दिया. जलती आंच के ताप में मेरी कलाई में बंधा धागा झिलमिलाने लगा और भाभी की त्योरिया चढ़ती गयी .

भाभी- पुजारी जी आप जाइये अभी , आपकी दक्षिणा हम भिजवा देंगे

मैं भी उठने लगा तो भाभी बोली- तुम यही रुको कुंवर.

मैं- जब पूजा होने ही नहीं वाली तो क्या फायदा रुकने का वैसे भी ठण्ड बहुत है

"हमें दुबारा कहने की जरुरत नहीं है " भाभी ने थोड़े गुस्से से कहा

चाची- आराम से बहु,

भाभी- आप हमें आराम से रहने को कह रही है ,ये देखने के बाद भी ....

मैं- क्या कह रही हो मुझे बताओ तो सही .........

चाची - ये धागा किसने दिया तुम्हे

मैं- ये धागा ......... ये ये तो........
 
#41

मैं- ये धागा तो मैंने ऐसे ही बाँध लिया था . दुकान से लिया था

मेरा ऐसा कहते ही भाभी ने खींच कर एक तमाचा मारा मुझे

चाची- बहुरानी ये क्या कर रही हो तुम

भाभी- चाची, मैं करू तो क्या करू आपके सामने भी ये झूठ पे झूठ बोले जा रहा है . मुझे तो शर्म आ रही है की मेरी परवरिश इतनी नालायक कैसे हो गयी .

चाची- कबीर , सच बता ये धागा तुझे किसने दिया

मैं- मामूली से धागे के पीछे पड़ गए हो आप लोग आखिर क्या फर्क पड़ता है इस धागे से

चाची- फर्क पड़ता है

मैं- तो तुम ही बताओ क्या है ऐसा इस धागे में

भाभी- ये डाकन का धागा है . इसे मनहूसियत माना जाता है

भाभी के चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था की बस रो ही पड़ेगी .

भाभी- सच सच बता तुझे कैसे मिला ये

मैं- कहा न दूकान से ख़रीदा था शहर गया जब . हो सकता है की ये कुछ मिलता जुलता धागा हो

भाभी- मेरी आँखे धोखा खा सकती है , चाची की आँखे धोखा खा सकती पर क्या पुजारी भी झूठा है

मैं- मुझे नहीं मालूम

भाभी- तू समझ नहीं रहा नादान . अब तो मुझे और यकीन हो गया है की वो सारे पाप तू उसके वश में होकर ही कर रहा है

मैं- तिल का ताड़ मत बनाओ भाभी . ऐसा वैसा जो भी तुम सोच रही हो कुछ भी नहीं है .

चाची- बहुरानी हमें घर चल कर बात करनी चाहिए.

घर आकर भी भाभी का रोना-धोना चालू ही रहा . दिल तो किया की भाभी का मन रखने के लिए इस धागे को उतार कर फेंक दू पर निशा ने इतने मान से ये धागा दिया था इसे उतार देता तो उसकी तोहीन होती अब करे भी तो क्या करे. जब कुछ नहीं सूझा तो मैंने रजाई ओढ़ी और सो गया . न जाने कितनी देर तक भाभी का रुदन चला होगा.

दोपहर को ही उठा फिर मैं . खाना खाके डॉक्टर की दवाई ली . घर से बाहर निकला ही था की मंगू मिल गया वो जाल और काँटा लिए जा रहा था .

मैं- अरे कहाँ

मंगू- बड़े भैया ने कहा की आज शाम के लिए मछली पकड़ लाऊ

मैं- चल मैं भी चलता हूँ .

हम दोनों गाँव के जोहड़ पर आ गए .

मंगू ने जाल फेंका और हम बाते करने लगे.

मंगू- कन्धा कब तक ठीक होगा

मैं- थोडा समय लगेगा तब तक तू थोडा खेतो का काम देख लेगा न

मंगू- ये भी कोई कहने की बात है .

मैं- मंगू यार मैं क्या सोचता हूँ अपनी उम्र के लड़के साले किसी न किसी को पटाये तो होंगे ही .वो लाली भी आशिक पाले हुई थी . अपनी जिन्दगी में कोई ऐसी आएगी या फिर घरवाले जब ब्याह करेंगे तभी कुछ हो पायेगा.

मंगू- गाँव में दो तीन चालू औरते तो है जिनके बारे में कहा जाता है की वो आशिकी करती है पर जब से लाली वाला काण्ड हुआ है न तब से इस मामले में ख़ामोशी सी ही है .

मैं- तुझे नहीं लगता की हमें भी कोई दे दे तो हम भी थोडा मजा कर ले.

मंगू- भाई तुझे तो फिर भी कोई न कोई दे ही देगी मैं तो किसान हूँ मेरी तरफ कौन देखेगी .

मैं- भोसड़ी में मैं भी तेरे साथ ही खेती करता हूँ न .

मंगू- पर तू राय साहब का बेटा है

मैं- तो राय साहब के नाम से कोई भी चुद जाएगी मुझसे

मंगू- ऐसा नहीं है पर तू कोशिश करेगा तो कोई न कोई फंस ही जाएगी.

मैं मंगू को बातो में लगा कर उस से कुछ उगलवाना चाहता था पर वो सहज था मेरे साथ . मुझे चाची की बात याद आ रही थी .

मैं- मंगू तू किसी ऐसी को मिले जो देने को तैयार हो तो मुझे मिलवा देना

मंगू- अरे ये भी कोई कहने की बात है भाई .

बात करते करते मंगू ने जाल में मोटी मछलिया फंसा ली और हम वापिस आ गए. मेरे मन में एक ही सवाल था की क्या उस रात कविता मंगू से मिलने तो नहीं गयी थी जंगल में . पर इतना दूर जाने की क्या जरुरत थी मंगू कविता के घर में घुस जाता वैध को तो कुछ मालूम वैसे भी नहीं होना था . इस सवाल ने मुझे परेशान कर दिया.

तमाम सवालो के बीच एक राहत थी की पिछले कुछ दिनों से मामला शांत था कोई नया हमला नहीं हुआ था हालाँकि भाभी ऐसा मानती थी की निगरानी की वजह से मैं कुछ कर नहीं पा रहा हूँ. रात को एक बार फिर मैं चाची के साथ अकेला था बिस्तर पर . चाची मुझ पर झुकी हुई मेरे होंठ चूस रही थी और मेरे नंगे लंड को हाथ में लेकर मसल रही थी .

मैं- आराम से कंधे में दर्द न हो जाये

चाची- थोडा दर्द सहना सीख

मैं- ज़ख्म ताजा है न इसलिए

चाची -कोई बात नहीं जब तू पूरी तरह ठीक हो जायेगा तब ही करेंगे

मैं- और अभी जो ये खड़ा होकर झूल रहा है इसका क्या .

चाची- मैं क्या जानू इसके बारे में

मैं- और जो तुम्हारी जांघो के बिच छुपी है उसके बारे में तो जानती हो न

चाची- अश्लील बहुत हो गया है तू

मैं- मजा आता है न गन्दी बाते करने में

मैं दिलो जान से चाची की लेना चाहता था पर ये साला हाथ उपर हो नही पाता था पट्टियों की वजह से अजीब ही समस्या थी . चाची लिपट कर मुझसे सो गयी . सर्दी में गर्म औरत पास हो तो चुदाई न भी हो तब भी मजा आता ही है .

न जाने कितनी रात बीती थी दरवाजे पर ही अजीब दस्तक से मेरी आँख खुल गयी . इतनी रात को कौन होगा सोचते हुए मैंने दरवाजा खोला तो देखा की चबूतरे पर सियार बैठा था . मुझे देखते ही वो लपक कर आया और मेरे सीने पर अपने पंजे रख दिए

मैं- आहिस्ता से , चोट लगी है न

वो चबूतरे से कूदा और गली में सडक के बीचो बीच खड़ा हो गया . मैं समझ गया .

मैं- आता हु

मैंने कम्बल ओढा और दरवाजे को इस तरह से बंद किया की लगे अन्दर से बंद है मैं जानता था की मुझे कहाँ जाना है . दो गली पार करके मैं आगे हुआ ही था की एक चीख ने मुझे हिलाकर रख दिया . कोई भागते हुए मेरी तरफ आया और जोर से मुझ से लिपट गया ............................
 
#

"कबीर बचा ले मुझे " सिस्कारिया भरते हुए चंपा की आवाज मेरे कानो में पड़ी

अनजानी आशंका लिए धडकते दिल को संभाले मैं पलटा तो देखा की चंपा का खूबसूरत चेहरा खून से सना था . उसका कुरता फटा हुआ था . सीने पर गहरी खरोंचे थी .

"क्या हुआ चंपा " मेरी आवाज लरजने लगी .

चंपा और जोर से मुझसे लिपट गयी और गली के किनारे की तरफ इशारा किया और जो मैंने देखा मेरी समझ से बाहर हो गया . एक शख्स खड़ा था जिसके हाथ पैर अजीब तरीके से हिल रहे थे .

"कौन है तू और तेरी हिम्मत कैसे हुई चंपा पर हमला करने की " मैंने जोर से कहा

पर उधर से कोई जवाब नहीं आया . मैंने एक नजर चंपा पर डाली जो भय से थर थर कांप रही थी मैंने अपना कम्बल उसे ओढाया क्योंकि कुरता फटने से उसका सीना नंगा हो गया था. मैं उस शख्स की तरफ बढ़ा की चंपा ने मेरा हाथ पकड़ लिया .

"हाथ छोड़ मेरा " मैंने कहा

चंपा- मत जा कबीर वो खतरनाक है

मैं- सुना नहीं तूने हाथ छोड़ मेरा .

चंपा की ऐसी हालत देख कर मेरा दिमाग हद से ज्यादा ख़राब हो गया था . मेरी नजर एक घर के दरवाजे के पास रखे लट्ठ पर पड़ी मैंने उसे उठाया , कमबख्त मेरा कन्धा भी ना, मैंने दुसरे हाथ से उस लट्ठ को उसकी तरफ फेंका पर वो बन्दा जरा भी नहीं हिला. मैं थोडा और उसकी तरफ बढ़ा की तभी बिजली आ गयी लट्टू की रौशनी में मैंने जो देखा मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा .वो कोई और नहीं वो कारीगर था जिसकी तलाश में मैं दिन रात एक किये हुए था .

मैं- कारीगर तू ,

पर उसने कोई जवाब दिया , न जाने क्या बडबडाते हुए वो मेरी तरफ लपका और मुझे गिरा के चढ़ गया मुझ पर .

"कबीर ,,,,,, कबीर " चंपा की चीख एक बार फिर से वातावरण की शान्ति को चीर गयी . मुझ पर हुए हमले से घबरा गयी थी वो .

मैं- होश कर कारीगर . देख समझ मैं क्या कह रहा हूँ

पर उस पर न जाने कौन सा जूनून चढ़ा था . उसने मेरे गले पर अपने दोनों हाथ कस दिए और मेरा गला दबाने लगा. उसके हाथ इतने भारी हो गए थे की जैसे न जाने कितने किलो के बाट रख दिए हो . बड़ी मुश्किल से मैंने उसे अपने से दूर किया .

खांसते हुए मैं अपनी सांसो को दुरुस्त कर रहा था की वो दौड़ कर चंपा की तरफ गया और उसे पकड़ लिया

"कबिर्र्र्रर्र्र्र " चंपा खौफ से चीखने लगी . मैं उठ कर भागा उसकी तरफ. और उसे चंपा से दूर किया . लट्टू की रौशनी में मैंने ध्यान से उसका चेहरा देखा जो एक तरफ से सड गया था .

"बस बहुत हुआ अब तक मैं टाल रहा था पर अब नहीं " इस से पहले की मेरी बात पूरी होती कारीगर ने खींच कर मुक्का मारा जो मेरे कंधे के जख्म पर जाकर लगा. न चाहते हुए भी मैं अपनी चीख को रोक नहीं पाया. उसने फिर से चंपा को पकड लिया और उसे मारने लगा. मेरे सब्र का बाँध टूट गया . मैंने अपने कंधे पर बंधी पट्टियों को खोला और हाथ को जकदन से आजाद किया . कारीगर के प्रति मेरे मन में जो भी था अब सिर्फ नफरत बची थी .

मैंने उसके पैर पर मारा वो जैसे ही झुका मैंने उसे उठा लिया. पर कंधे की कमजोरी मेरे लिए आफत बन गयी थी . उसे लिए लिए ही मैं गिर गया और उसने एक लात मेरे पेट में मारी मैं दूर जाकर गिरा. वो फिर से चंपा की तरफ बढ़ा मैंने उसका पैर पकड़ लिया पर जैसे उसे फर्क नही पड़ा मुझे घसीटते हुए वो चंपा के पास पहुँच गया जो सड़क के बीचो बीच पड़ी थी . उसने हम दोनों को उठाया और हमारे गले दबाने लगा.

आँखे जैसे बाहर ही निकल आई थी लगा की अब प्राण गए की तभी उसकी पकड़ हमसे ढीली हो गयी और वो हमारे ऊपर से होते हुए दूर जाकर गिरा . पनियाई आँखों से मैंने देखा अपने भाई को , जो हाथ के लोहे का एक पाइप लिए उसकी तरफ बढ़ रहा था .

"मेरे भाई को मारेगा तू हरामजादे , देख मैं क्या करता हूँ तेरा " जिन्दगी में पहली बार मैंने भैया को इतने गुस्से में देखा था . भैया ने लगातार उसे मारा पर फिर उसने पाइप पकड़ लिया और भैया के हाथ से छीन लिया . कारीगर न जाने किस भाषा में क्या बोल रहा था उसने भैया की पीठ पर मारा भैया धरती पर गिर गए.

कारीगर ने पाइप ऊपर किया और इस से पहले की वो भैया के सर पर दे मारता भागते हुए मैंने कारीगर की कमर पकड़ी और उसे लिए लिए गिर गया भैया तुरंत खड़े हुए और कारीगर के सर पर लात मारी. मौके का फायदा उठाते हुए मैंने कारीगर का एक पैर तोड़ दिया . वो तड़पने लगा घिसटने लगा. तभी भैया को एक घर की चोखट पर रस्सी लटकी दिखी उन्होंने एक सिरा मेरी तरफ फेंका मैं समझ गया की क्या करना है . गोल गोल घूमते हुए हमने उसे फंसा लिया और रस्सियों को विपरीत दिशाओ में खींचने लगे.

मेरा कन्धा दर्द से परेशान था भैया इस बात को समझ गए .

"छोटे तू चिंता मत कर मैं संभाल लूँगा " भैया ने अचानक से रस्सी छोड़ दी और अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा ली . भैया ने एक बार मेरी और चंपा की तरफ देखा और फिर अगले ही पल मैंने वो देखा जो मैंने दारा के साथ किया था . उस पल मुझे लगा की मैंने भैया को नहीं बल्कि काली मंदिर में दारा को हलाल करते हुए खुद को देखा हो . सब कुछ जब थमा तो भैया कारीगर के रक्त में सने हुए थे . उस पल को भी उन्हें देखता तो दहशत से ही मर जाता .

"मेरे भाई-बहनों को मारेगा साले. " भैया कारीगर के जिस्म को तार तार कर रहे थे . वो तब तक नहीं रुके जब तक की भाभी की चीख उनके कानो में नहीं पड़ी . मैंने देखा की भाभी-चाची और कुछ गाँव वाले गली में आ पहुंचे थे . मैंने भाग कर बेसुध पड़ी चंपा को दुबारा से कम्बल ओढाया .चाची-भाभी ने चंपा को संभाला

"अपने अपने घर जाओ सब लोग , सुबह बात हो गी जो भी होगी , और कोई तुरंत वैध को हमारे घर आने का संदेसा दो " भैया ने सबसे कहा तो गाँव वाले घरो में दुबक गए भैया ने मुझे उठाया और घर ले आये.

"वैध जी आते ही होंगे छोटे " भैया ने मुझे चारपाई पर लिटाते हुए कहा

मैं- मैं ठीक हूँ भैया , चंपा को देखिये उसे चोट लगी है

भैया- उसे भी कुछ नहीं होगा.

वैध जी ने आते ही अपनी कार्यवाई शुरू की और हमारी मरहम पट्टी की . एक दो काढ़े पिलाये . चंपा के सीने पर गहरा जख्म लगा था . सर भी फूटा था . मैंने पाया की भाभी की नजरे मुझ पर जमी थी .

मैं- ऐसे क्या देख रही हो मैंने कुछ नहीं किया इस बार तो भैया और चंपा भी गवाह है और हमला करने वाला भी .

भाभी- तुम्हे कैसे पता चला की चंपा पर हमला हुआ है और तुम चंपा के पास कैसे पहुंचे

मैंने अपना माथा पीट लिया और भाभी को देखा . उसके मन में आये शक ने मेरा जीवन हरम कर दिया था . इस से पहले की मैं कुछ भी कहता सियार अन्दर आया और मेरी चारपाई पर चढ़ गया ...........
 
#43

सियार को देख कर सारे घर वालो में अफरा तफरी मच गयी . भैया ने उसे मारने के लिए लट्ठ उठा लिया पर मैंने उन्हें रोका. सियार मेरी गोद में चढ़ गया और मेरे कानो को चाटने लगा.

मैं- भैया, ये मेरा दोस्त है .

मेरी बात सुन कर सब लोगो को हैरत हुई

भैया- पर ये जानवर पालतू नहीं हो सकता

मैं- आपके सामने ही है, दरअसल ये अपने खेतो के आस पास ही रहता है कई बार आ जाता है , फिर मुझे भी इस से लगाव हो गया . ये किसी को नुकसान नहीं करेगा भरोसा करो

मैंने कहा तो था पर मेरी बात का घरवालो को रत्ती भर भी यकीन नहीं था खासकर भाभी को . ऊपर से सियार को यहाँ वो पचा नहीं पा रही थी .

मैने सियार को पुचकारा और कहा - तू जा वापिस मैं जल्दी ही आऊंगा मिलने

भाभी- किस से मिलने की बात कर रहे हो

मैं- इसको ही कह रहा हूँ भाभी

इस से पहले की वो कुछ और कहती वैध जी ने भैया से एक तरफ आने को कहा और न जाने उन दोनों में क्या बात हुई फिर वैध और भैया घर से बाहर चले गए. भाभी की जलती नजरो से मुझे कोफ़्त होने लगी थी . मैंने सियार को इशारा किया और उसके पीछे मैं भी चल दिया .

भाभी- अब कहा चल दिए.

मैं- हम दोनों यहाँ रहेंगे तो आप को परेशानी होगी.

भाभी- मुझे परेशानी होगी , कमबख्त मेरा बस नहीं चल रहा वर्ना मैं पीट देती तुझे .

मैं- भाभी आपका दर्जा बहुत ऊँचा है मेरी नजरो में , मैंने आप से कभी झूठ नहीं बोला मैंने आपको सच बताया की मैं किस से मिलता हूँ , किस से मिलने जाता हूँ ये सियार भी उसका ही है . आप चाहे मानो या न मानो वो वैसी बिलकुल नहीं है जैसा हम किस्से-कहानियो में सुनते आये है . उसे कुछ गलत करना होता तो वो न जाने कब का कर चुकी होती .

भाभी- ये बकवास बंद कर तू मैं बस इतना जानना चाहती हूँ की तू इतनी रात को चंपा के साथ क्या कर रहा था .

मैं- चंपा को होश आये तो उस से ही पूछ लेना . चाची चलो यहाँ से

मैंने चाची का हाथ पकड़ा और उसे लेकर चाची के घर आ गया .

चाची- कबीर , मैं जानती हूँ तू मुझसे कभी झूठ नहीं बोलेगा

मैं- मैंने तुझे भी तो सच ही कहा था न की डायन मेरी दोस्त है

मेरी बात सुन कर चाची के माथे पर बल पड़ गए .

चाची- डाकन की दोस्ती माणूस से असंभव है . अगर ऐसा है भी तो उसने जरुर कुछ किया होगा तेरे ऊपर

मैं- तूने क्या बदलाव देखा मेरे अन्दर क्या मैंने किसी का जरा भी बुरा किया . मेरा बिस्वास कर मेरा कोई अहित नहीं है उसके साथ रहने में

चाची का चेहरा पूरा लाल हो गया था

"सो जा तुझे आराम की जरुरत है " चाची ने बस इतना ही कहा .

सुबह आँख खुली तो बदन दर्द से टूट रहा था . सामने कुर्सी पर भाभी बैठी थी . मैंने उससे कोई बात नहीं की उठ कर बदन पर एक शाल लपेटा और घर से बाहर निकल ही रहा था की भाभी की आवाज ने मेरे कदम रोक लिए

भाभी- मैं उस डायन से मिलना चाहती हूँ

मैं- उसकी मर्जी होगी तो जरुर मिलेगी आप से

भाभी- तुम लेकर चलो मुझे उस के पास

मैं- मैंने कहा न जब उसका जी करेगा वो जरुर मिलेगी

भाभी- कुंवर, तुम्हे यूँ देख कर मुझे तकलीफ होती है सोचती हूँ की मेरी परवरिश में कहाँ कमी रह गयी

मैं- मुझे गर्व है की आपने मेरी परवरिश की और एक दिन आयेगा जब आप मुझे समझेगी और अपने आँचल तले ले लेंगी .

भाभी- मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ की अपनी दोस्त से मुझे मिलवाने में क्या परेशानी है तुझे

मैं- मैंने कहा न उसकी इच्छा होगी तो जरुर मिलेगी

भाभी- और कब होगी उसकी इच्छा

मैं- ये तो वो जाने .

भाभी- कुंवर, ये जो भो षड्यंत्र तुम रच रहे हो न इसका पर्दाफाश मैं जरुर करुँगी , मैंने चंपा से भी पूछा उसने कहा की उसे याद नहीं . मैंने कुछ रोज पहले चंपा को तुम्हारी बाँहों में देखा था . दुआ करना मेरा शक गलत साबित हो .

मैं- चंपा को गले लगाना गलत है क्या . आप भी जानती है उसे .

भाभी - तो फिर क्यों नहीं बताया उसने की रात में घर से बाहर क्यों थी वो

मैं- शायद उसने जरुरी नहीं समझा होगा.

भाभी - इतनी बड़ी नहीं हुई है वो अभी

मैं- मुझे जाना है बाहर

खुली हवा में आकर मैंने सांस ली तो करार मिला. भैया अखाड़े में थे मैं वही चला गया .

भाई- अरे छोटे, आराम करना चाहिए न

मैं- आराम ही है भैया

भैया- मैं नहा लेता हु फिर तुझे वापिस शहर ले चलता हूँ डॉक्टर के पास

मैं- ठीक है भैया , बस पट्टी ही तो करवानी है वैध कर देगा

भैया- वैसे कल अच्छी बहादुरी दिखाई तूने

मैं- आप न होते तो मामला हाथ से निकल ही गया था

भैया- उठा पटक की आवाज ने नींद तोड़ दी . मैंने खिड़की से देखा की दरवाजा खुला पड़ा है उसे बंद करने ही आया था की तुम लोगो की चीख पुकार सुनी भैया पर वो कारीगर को हुआ क्या था कुछ समझ नही आया

मैं- मुझे भी तलाश है इस सवाल के जवाब की

भैया- तू फ़िक्र मत कर मैं मालूम कर ही लूँगा.

मैं चंपा के पास गया वो लेटी हुई थी उसकी माँ को मैंने एक कप चाय के लिए कहा और चंपा से मुखातिब हुआ

मैं- बस एक ही सवाल है मेरा और सच सुनना चाहता हूँ , इतनी रात को घर से बाहर क्या कर रही थी तू.

चंपा- मैं सोयी पड़ी थी , अचानक से एक आहट से मेरी आँख खुल गयी मैंने देखा की आँगन में एक छाया है . गौर किया तो मालूम हुआ की मंगू था जो घर से बाहर जा रहा था .

मैं- इतनी रात को कहाँ जा रहा था वो .

चंपा- यही सवाल मेरे मन में भी था मैं भी उसके पीछे दबे पाँव हो ली . गली में पहुची इतने वो गायब हो चूका था . मैंने सोचा की इधर उधर देखूं उसे की तभी न जाने कहाँ से वो कारीगर आ गया और मुझे दबोच लिया ये तो शुक्र था की तू मिल गया

मैं- अभी कहा है मंगू.

चंपा मालूम नहीं लौट कर आया नहीं वो .

मैं- भाभी को लगता है की रात में तू मुझसे मिलने आई थी

चंपा- सच में

मैं- तेरी कसम

चंपा- सच तू जानता तो है

मैं- तेरे मेरे कहने से क्या होता है , कल को भाभी ये आरोप लगा दे की तू मुझसे चुदने आई थी रात को तो कोई हैरानी नहीं

चंपा- मैं भाभी से बात करुँगी

मैं- पिछले कुछ दिनों में मंगू के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन लगा है क्या तुझे

चंपा- कुछ खास नहीं बस आजकल वो तेरे साथ खेतो पर नहीं रहता रातो को

मैं - कहाँ कटती है उसकी राते

चंपा यही घर पर ही . कभी कभी दारु की दूकान पर जरुर जाता है पर समय से ही लौट आता है .

दारू की दुकान का सुन कर मुझे दारा की याद आयी . मुझे लगा की कहीं सूरजभान ने ही तो मंगू को अपने जाल में फंसा लिया हो मुझसे दुश्मनी के चलते . पर क्या ये मेरा वहम हो सकता था जो भी था मुझे सच की तलाश करनी ही थी .
 
#44

मुझे शिद्दत से मंगू का इंतज़ार था और जब वो आया तो उसके कपडे सने हुए थे कीचड़ से . हालत पस्त थी उसकी.

मैं- कहाँ गायब था बे

मंगू- भाई , खेतो की परली तरफ नहर का एक किनारा टूट गया काफी पानी भर गया है बहुत नुक्सान हो गया . किनारे की मरम्मत करने में देर हो गयी .

मैं- तू अकेला गया , मुझे बता तो सकता था न

मंगू- अकेला नहीं था उस तरफ जिनके भी खेत है सब लोग थे. तुझे इसलिए नहीं बताया की पहले ही चोट लगी है. पानी का बहाव फ़िलहाल के लिए तो रोक दिया है पर मुझे लगता नहीं की ज्यादा देर ये कोशिश कामयाब होगी , अभिमानु भाई ही मदद करेंगे अभी . मैं नहा लेता हु फिर भैया को बुलाने जाऊंगा.

मंगू के रात भर गायब होने की वजह ये थी . मैंने तस्दीक कर ली थी मंगू गाँव के और लोगो के साथ नहर के किनारे को ठीक करने में ही जुटा था . एक बार फिर से मैं घूम कर वहीँ पर आ गया था जहां से चला था . दोपहर में भाभी ने मुझसे कहा की डायन अगर मिलने को तैयार हो जाये तो वो गाँव के मंदिर में मिलना चाहेगी उस से. भाभी ने अपना दांव खेल दिया था उसने जान बुझ कर ऐसी जगह चुनी थी . पहली बार मुझे लगा की भाभी कितनी कुटिल है .

खैर उस रात को ये सुनिश्चित करने के बाद की कोई भी मेरा पीछा नहीं कर रहा मैं काले मंदिर के तालाब के पास पहुँच गया. पानी एकदम शांत था इतना शांत की जैसे तालाब था ही नहीं . सीली दिवार का सहारा लेते हुए मैं काली मंदिर की सीढिया चढ़ कर ऊपर पहुँच गया .

"माना के मेरे मुक्कद्दर में लिखे है ये अँधेरे , पर तुम क्यों अपनी राते काली करते हो " निशा ने बिना मेरी तरफ देखे कहा. वो आज भी वैसे ही पीठ किये बैठी थी जैसा हमारी पहली मुलाकात में .

मैं- अंधियारों में तू एक जोगन और मेरा मन रमता जोगी.

निशा- जोग का रोग जो लगा बैठे न तो फिर सब से बेगाने हो जाओगे.

मैं- तू ही जाने क्या अपना क्या पराया

निशा- तू सबका तेरा कोई नहीं

मैं- तू तो है मेरी

निशा- मैं हूँ तेरी

वो हंसने लगी .

"मैं हूँ तेरी , क्या हूँ मैं तेरी मैं कुछ भी तो नहीं राख के एक ढेर के सिवा जिसे तू चिंगारी दे रहा है " बोली वो

मैं- बस इतना जानता हूँ ये अंधियारे जितने तेरे है उतने मेरे

निशा- मत कह ऐसा . मेरी तो नियति है तू अपने उजालो से दगा मत कर

वो उठ कर मेरे पास आई . अँधेरी रात में उसकी मर्ग्नय्नी आँखे मेरे मन को टटोलने लगी.

निशा- बता क्या है मन में

मैं- बहुत कुछ , कुछ कहना है है कुछ छिपाना है .

निशा- आ बैठ पास मेरे .

निशा ने अपना सर मेरे काँधे पर रखा

मैं- आहिस्ता से, दर्द होता है .

निशा- कैसा दर्द

मैं- घाव लगा है

निशा- देखू जरा

मैं- तेरी मर्जी

निशा ने मेरा कम्बल एक तरफ किया और पट्टियों को तार तार कर दिया . उसकी सर्द सांसो ने घाव के रस्ते होते हुए दिल पर दस्तक दे दी.

निशा- कब हुआ ये

मैं- थोड़े दिन बीते

निशा- दो मिनट रुक

वो उस तरफ गयी जहाँ वो बैठी थी वापसी में एक झोला लेकर आई . उसमे से कुछ निकाला और बोली- दर्द होगा सह पायेगा .

मैं- मर्द को दर्द नहीं होता जाना

निशा- ठीक है फिर

उसने मेरे कंधे में कुछ नुकीली छुरी सा घुसा दिया और मैं लगभग चीख ही पड़ा था की उसने अपना हाथ मेरे मुह पर रखा और बोली- मर्द जी , ये तो शुरुआत है .

मुझे लगा की वो मेरे मांस को काट रही है . दर्द बहुत हो रहा था पर मैं कमजोर नहीं पड़ा . उसने झोले से एक शीशी निकाली और मेरे घाव के छेद में उड़ेलने लगी. मैंने महसूस किया की मेरे तन में आग लग गई हो.

पर ये तो शुरुआत थी . उसने आग जलाई और एक चाक़ू को गर्म करने लगी.

निशा- शोर मत करना . मुझे पसंद नहीं है .

मैं- क्या करने वाली है तू

निशा- जान जायेगा उसने अपनी चुनर उतारी और बोली- मुह में दबा ले .

मेरे वैसा करते ही उसने सुलगते चाकू को मेरे काँधे में धंसा दिया . उफफ्फ्फ्फ़ कसम से मर ही गया था मैं तो . निशा ने जख्म को दाग दिया था.

"बस हो गया " उसने बेताक्लुफ्फी से कहा और कम्बल वापिस ओढा दिया मुझे .

मैं- जान लेनी थी तो वैसे ही ले लेती .

निशा- क्या करुँगी मैं इतनी सस्ती जान का

मैं- ये तेरी कमी हुई जो तूने सस्ती जान का सौदा किया

निशा- छोड़ इन बातो को मुझे मालूम हुआ कुछ परेशानी है तुझे

मैं- परेशानी तो जिन्दगी भर रहनी ही हैं .तुझे तो मालूम है की मेरी भाभी ने मेरा जीना मुश्किल किया हुआ है . उसे लगता है की गाँव में जो भी ये हो रहा है मैं कातिल हूँ

निशा- सच कहती है तेरी भाभी कातिल तो तू है

मैं- मैं कातिल हूँ ये तू समझती है वो नहीं

निशा- तो समझा उसे

मैं- मैंने उसे बताया सब कुछ बताया अब उसकी जिद है की वो तुझसे मिलेगी .

निशा-डाकन से मिल कर क्या करेगी वो

मैं- मैंने भी यही कहा उसे पर वो जिद किये हुई है

निशा- ठीक है फिर तेरी भाभी की जिद पूरी कर देती हूँ उस से कहना की तेरे कुवे पर मिलूंगी मैं उस से पर वो अकेली आयेगी.

मैं- तुझे कोई जरुरत नहीं है उसके सामने आने की

निशा- तू साथी है मेरा इन अधियारो में जब कोई नहीं था तू ही तो था . मेरी वजह से तुझे परेशानी हो . तू तकलीफ में होगा तो मैं चैन कैसे पाऊँगी . और फिर एक मुलाकात की ही तो बात है

मैं- तू समझ नहीं रही है

निशा- समझा फिर

मैं- भाभी तुझसे गाँव के मंदिर में मिलना चाहती है

मेरी बात सुन कर निशा थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी मैं उसके चेहरे की तरफ देखता रहा .

निशा- बस इतनी सी बात , चलो ये भी सही . भाभी से कहना की मैं उसकी हसरत जरुर पूरी करुँगी पर मेरी भी एक शर्त है की मैं उस से निखट दुपहरी में मिलने आउंगी और जब ये मुलाकात होगी तो मंदिर में उसके और मेरे सिवा कोई तीसरा नहीं होगा. यदि उस समय किसी और की आमद हुई तो फिर ठीक नहीं रहेगा

मैं- तुझे ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, मेरी वजह से तू मंदिर में कदम नहीं रखेगी .

निशा- ये तो शुरआत है दोस्त . रास्ता बड़ा लम्बा है ......

निशा ने मेरे कंधे पर सर रखा थोडा कम्बल खुद ओढा और आँखों को बंद कर लिया .........
 
#45

आँख खुली तो मैंने खुद को काली मंदिर में पड़े हुए पाया. भोर हो चुकी थी पर धुंध पसरी हुई थी . मैं घर आया आते ही मैंने भाभी को सारी बात बता दी की दोपहर में निशा उस से मिलेगी तय स्थान पर . मैं कुछ खाने के लिए चाची के घर में घुसा ही था की चंपा मिल गयी मुझे

चंपा- कहाँ गायब था तू

मैं- तू तो पूछ ही मत,

चंपा- मैं नहीं तो और कौन पूछेगी .

मैं- मैं पूछने का हक़ खो दिया है तूने , तूने मुझसे झूठ बोला .

चंपा- भला मैं क्यों झूठ बोलने लगी तुझसे

मैं- तो फिर बता उस रात तू घर से बाहर क्या कर रही थी .

चंपा- बताया तो सही

मैं- मुझे सच जानना है , हर बात का दोष मंगू पर नहीं डाल सकती तू

मेरी बात सुन कर चंपा खामोश हो गयी .

मैं- दरअसल दोष तेरा नहीं है दोष मेरा है जो मैं इस काबिल नहीं बन पाया की तू अपना मन खोल सके मेरे आगे. कोई नहीं मैं नहीं पूछता

मैंने कहा और रसोई की तरफ चल दिया. चंपा की ख़ामोशी मेरा दिल तोड़ रही थी . इस सवाल का जवाब मुझे ही तलाशना था .

खैर, अब इंतज़ार दोपहर का था मैंने व्यवस्था कर ली थी की छिप कर दोनों में क्या बात हुई सुन सकू. भाभी चूँकि, राय साब के परिवार की बहु थी मंदिर खाली करवाना उसके लिए कोई बड़ी बात थोड़ी न थी . तय समय पर भाभी मंदिर में पहुँच गयी . थोड़ी देर बीती, फिर और देर हुई और देर होती गयी . भाभी को भी अब खीज होने लगी थी . और मैं भी निशा के न आने से परेशां हो गया था .

"मैं जानती थी कोई नहीं आने वाला " भाभी ने खुद से कहा .

तभी मंदिर के बाहर लगा घंटा जोर से गूँज उठा . अचानक से ही मेरी धडकने बढ़ सी गयी .मैंने देखा निशा सीढिय चढ़ कर उस तरफ आ रही थी जहा भाभी खड़ी थी . सफ़ेद घाघरा-चोली में निशा सर्दियों की खिली धुप सी जगमगा रही थी . माथे से होते हुए गालो को चूमती उसकी लटे अंधेरो में मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था . उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था . ना सुख की शान न दुःख की फ़िक्र.

कोई और लम्हा होता तो मैं थाम लेता उसके हाथ को अपनेहाथ में . निशा किसी बिजली सी भाभी के नजदीक से निकली और माता की प्रतिमा के पास जाकर बैठ गयी .

" ए लड़की किसी ने तुझे बताया नहीं की मंदिर में प्रवेश को हमने मना किया है थोड़े समय बाद आना तू " भाभी ने कहा

"मैंने सुना है ये इश्वर का घर है और इश्वर के घर में कोई कभी भी आ जा सकता है " निशा ने बिना भाभी की तरफ देखे कहा

भाभी- कोई और दिन होता तो मैं सहमत होती तुझसे पर आज मेरा कोई काम है तू बाद में आना

निशा- हमारे ही दीदार को तरफ रही थी आँखे तुम्हारी और हम ही से पर्दा करने को कह रही हो तुम

जैसे ही निशा ने ये कहा भाभी की आँखे हैरत से फ़ैल गयी .

"तो.... तो...... तो तुम हो वो " भाभी बस इतना बोल पायी

निशा- तुम्हे क्या लगा , और किस्मे इतनी हिम्मत होगी की राय साहब की बहु के फरमान के बाद भी यहाँ पैर रखेगा.

भाभी ने ऊपर से निचे तक निशा का अवलोकन किया

निशा- अच्छी तरह से देख लो. मैं ही हूँ

भाभी- पर तुम ऐसी कैसे हो सकती हो

निशा- तुम ही बताओ फिर मैं कैसी हो सकती हूँ

भाभी के पास कोई जवाब नहीं था निशा की बात का .

निशा- तुमने कभी इसे भी साक्षात् नहीं देखा फिर भी इस पत्थर की मूर्त को तू पूजती है न मानती है न जब तू इसके रूप पर कोई सवाल नहीं करती तो मेरे रूप पर आपति कैसी . खैर मुद्दा ये नहीं है मुद्दा ये है की तुम क्यों मिलना चाहती थी मुझसे. आखिर ऐसी क्या वजह थी जो मुझे इन उजालो में आना पड़ा

भाभी- वजह थी , वजह है. वजह है कबीर. तुम ने न जाने क्या कर दिया है कबीर पर . वो पहले जैसा नहीं रहा .

निशा- वक्त सब को बदल देता है इसमें दोष समय का है मेरा क्या कसूर

भाभी- जब से कबीर तुझ से मिला है, वो पहले जैसा नहीं रहा . उसे तलब लगी है रक्त की , कितनी ही बार उसे पकड़ा गया है उन हालातो में जहाँ उसे बिलकुल भी नहीं होना चाहिए . ये उस पर तेरा सुरूर नहीं तो और क्या है.

निशा के चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी .

निशा- तो फिर रोक लो न उसे, मुझसे तो वो कुछ समय पहले मिला है तेरे साथ तो वो बचपन से रहा है . क्या तेरा हक़ इतना कमजोर हो गया ठकुराइन .

निशा की बात भाभी को बड़ी जोर से चुभी .

भाभी- दाद देती हूँ इस गुस्ताखी की ये जानते हुए भी की तू कहाँ खड़ी है

निशा- समझना तो तुम्हे चाहिए . जब तुमने यहाँ मिलने की शर्त राखी थी मैं तभी तुम्हारे मन के खोट को जान गयी थी पर देख लो मैं यहाँ खड़ी हु.

भाभी- यही तो एक डाकन का यहाँ होना अनोखा है

निशा- मुझे हमेशा से इंसानों की बुद्धिमता पर शक रहा है . तुम्हे देख कर और पुख्ता हो गया .

निशा ने जैसे भाभी का मजाक ही उड़ाया

निशा- जानती है तेरा देवर क्यों साथ है मेरे. क्योंकि उसका मन पवित्र है उसने मेरी हकीकत जानने के बाद भी मुझसे घृणा नहीं की. उसे मुझसे कोई डर नहीं है जैसा वो तेरे साथ है वैसे ही मेरे साथ . वो उस पहली मुलाकात से जानता था की मैं डाकन हु. न जाने वो मुझमे क्या देखता है पर मैं उसमे एक सच्चा इन्सान देखती हूँ . तुझे तो अभिमान होना चाहिए तेरी परवरिश पर , पर तू न जाने किस भाव से ग्रसित है

भाभी- मैं अपनी परवरिश को संभाल लुंगी . तुझसे मैं इतना चाहती हूँ तू कबीर को अपने चंगुल से आजाद कर . कुछ ऐसा कर की वो भूल जाये की कभी तुझसे मिला भी था वो . बदले में तुझे जो चाहिए वो दूंगी मैं तू चाहे जो मांग ले .

भाभी की बात सुन कर निशा जोर जोर से हंसने लगी. उसकी हंसी मंदिर में गूंजने लगी .

निशा- क्या ही देगी तू मुझे . हैं ही क्या तेरे पास देने को. ठकुराइन , मै अच्छी तरह से जानती हूँ एक डाकन और इन्सान का कोई मेल नहीं . मैं अपनी सीमाए समझती हूँ और तेरा देवर अपनी हदे जानता है . तू उसकी नेकी पर शक मत कर . ये दुनिया इस पत्थर की मूर्त को पुजती है वो तुझे पूजता है . इसके बराबर का दर्जा है उसके मन में तेरा .

भाभी- फिर भी मैं चाहती हूँ की तू उसकी जिन्दगी से निकल जा. दूर हो जा उस से.

निशा- इस पर मेरा कोई जोर नहीं ये नियति के हाथ में है

भाभी- कबीर की नियति मैं लिखूंगी

निशा- कर ले कोशिश कौन रोक रहा है तुझे.

भाभी- तू देखेगी, मैं देखूंगी और ये सारी दुनिया देखेगी .

निशा- फ़िलहाल तो मुझे तेरी झुंझलाहट दिख रही है ठकुराइन

भाभी- मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले डाकन

निशा- मुद्दत हुई मेरा सब्र टूटे तेरी अगर यही जिद है तो तू भी कर ले अपने मन की , मुझे चुनोती देने का अंजाम भी समझ लेना . डायन एक घर छोडती है वो घर कबीर का था ........... सुन रही है न तू वो घर कबीर का था .

भाभी- मुझे चाहे को करना पड़े. एक से एक तांत्रिक, ओझा बुला लाऊंगी . पर इस गाँव और मेरे देवर पर आये संकट को जड से उखाड़ फेंकुंगी मैं

निशा- मैं इंतज़ार करुँगी .और तुम दुआ करना की दुबारा मुझे अंधेरो से इन उजालो की राह न देखनी पड़े................
 
#46

मैं जानता था की दोनों के बीच जो भी हुआ है मंदिर में वो आने वाले वक्त में मेरे लिए मुश्किलें पैदा करेगा. वहां से मैं सीधा नहर पर पहुंचा जहाँ भैया पहले से मोजूद थे और टूटे हिस्से की पक्की मरम्मत करवा रहे थे. मैंने पाया की मेरी सब्जियों में पानी भर गया था . सरसों भी नुक्सान में थी . मेरी आँखों में आंसू भर आये. किसान की मेहनत उसकी फसल होती है जो उसके सपने पूरी करती है . और हमारी फसल फिलहाल तो बर्बाद ही समझो .

गुस्सा था पर किस पर जोर चलाते . मैं खड़ा खड़ा सोच रहा था की अब क्या करेंगे की भैया को देखा मेरी तरफ आते हुए .

भैया- क्या सोच रहा है छोटे

मैं- अपनी बर्बादी देख रहा हूँ

भैया- दिल छोटा मत. सब ठीक होगा

मैं- उम्मीद कर सकता हूँ पर एक बात समझ नहीं आई की अचानक से नहर टूटी कैसे.

भैया- मैं भी यही सोच रहा हूँ . फिलहाल पानी सूखने का इंतज़ार करते है . सुबह से काम करते करते अकड़ हो गयी है पीठ में तू चल रहा है या रुकेगा .

मैं- यही रहूँगा

भैया के जाने के बाद मैंने चारपाई निकाली और उस पर लेट गया. मन में अजीब ख्याल आ रहे थे . आँख खुली तो आसमान में काला अँधेरा छाया हुआ था .झींगुरो की आवाजे आ रही थी . मैंने ठण्ड महसूस की देखा की मैं बिना किसी कम्बल, रजाई के ही सोया हुआ था . उठ कर मैंने मुह धोया . और वहां से चल दिया.

चलते चलते मैं दोराहे पर पहुंचा जहाँ से एक रास्ता निशा की तरफ जाता था और एक गाँव की तरफ . कायदे से मुझे गाँव जाना चाहिए था पर मेरे पैर काले मंदिर की तरफ बढ़ गए. घने पेड़ो- झाड़ियो के बीच उस ठिकाने को पहली नजर में देखना अपने आप में अनोखा ही था . ऊपर से आज अँधेरा भी कुछ ज्यादा ही था .

खैर, जब मैं वहां पहुंचा तो देखा की आंच जल रही थी निशा मांस के टुकड़े भून रही थी . मुझे देख कर उसने पास आने का इशारा किया

निशा- सही समय पर आया तू, ताजा खरगोश का मजा ले

मैं- रहने दे .

निशा- बैठ तो सही .

निशा ने कुछ टुकड़े मुझे दिए मैंने एक दो मुह में भर लिए

निशा- कच्चे कलेजे का तो मजा ही अलग है

मैं- क्या बात हुई आज भाभी से

मैंने निशा के मन को टटोला

निशा- कुछ नहीं .तेरी भाभी चाहती है की मैं तेरा साथ छोड़ दू.

मैं- तूने क्या कहा फिर

निशा- मैं क्या कहती , मैंने कभी किया ही नहीं तेरा साथ .

मैं- अच्छा जी . तो तेरे मेरे बीच कुछ नहीं है

निशा- एक डाकन और मानस के बीच क्या कुछ हो सकता है कबीर

मैं- कम से कम हम दोस्त तो है

निशा- दोस्त.... मैं बहुत सोचती हूँ इस बारे में .

मैं- और तेरी सोच क्या कहती है

निशा- कबीर. वैसे तेरी भाभी सच ही तो कहती है तेरी मेरी दोस्ती कैसे हो .

मैं- ये तो नसीब जाने अपना . तू मिली मैं मिला सिलसिला हुआ मुलाकातों का

निशा- यही तो सोचती हूँ की तुझे अब दूर कैसे करू

मैं- दूर करने की जरूरत नहीं

निशा- पास भी तो नहीं आ सकती

मैं-शायद तक़दीर ने हमारे भाग में यही लिखा हो. उसका शायद यही इशारा हो .

निशा- हम दोनों की सीमाए है . और फिर ये जो नज्दिकिया बढ़ रही है न ये हानिकारक साबित होंगी हम दोनों के लिए . मन बड़ा चंचल होता है कबीर, मन तमाम दुखो का कारण है . मैं मेरी तनहइयो में तुझे सोचती हूँ . तू मेरा ख्याल करता होगा. जिस तरह से हम एक दुसरे की परवाह करने लगे है मुझे डर है कबीर.

मैं- कैसा डर

निशा- यही की एक दिन तू मेरे सामने आकर खड़ा हो जायेगा कहेगा की तू इस डाकन से प्रेम करने लगा है .

निशा ने जब ये कहा तो मेरा दिल किया की आज अभी मैं उसे बता दू की मैं करने लगा हूँ प्रेम उस से

मैं- तब की तब देखेंगे निशा

निशा- ये वक्त अपनी स्याही से न जाने क्या लिख रहा है पर इतना जानती हूँ की आने वाले तूफान को रोकना होगा.

मैं- तू खुद को मुझसे जुदा नहीं कर सकती मैं करने ही नहीं दूंगा

निशा- तू समझ तो सही

मैं- तू समझ निशा, ये आंच जो तेरे मेरे दरमियान जल रही है . कहते है अग्नि से पवित्र कुछ नहीं मैं इसे ही साक्षी मान कर कहता हूँ कोई भी , ये दुनिया ये नियम मुझे तुझसे जुदा नहीं कर पायेंगे. जब तक तू मेरा हाथ थामे रहेगी मैं लड़ जाऊंगा इस ज़माने से . कितने ही पहरे लगे तेरा मेरा रिश्ता और गहरा होता जायेगा.

निशा- तू समझता क्यों नहीं तेरा मेरा साथ असंभव है

मैं- तू वो ही निशा है न जो भाभी के सामने इतनी बड़ी बड़ी बाते कर रही थी मेरे लिए तो फिर मेरे सामने इस सच को क्यों नहीं मानती

निशा- क्योंकि मैं उस पथ पर नहीं चल पाउंगी जिसकी मंजिल के तू सपने संजो रहा है .

मैं- तो मत सोच इस बारे में . दोस्त है दोस्ती का हक़ तो दे मुझे कभी तेरा दिल मोहब्बत के लिए धडके तो बताना वर्ना नसीब के सहारे तो है ही

मेरी बात सुन कर निशा मुस्कुरा पड़ी.

निशा- एक डाकन से मोहब्बत करने की सोच रहा है तू .

मैंने निशा की कमर में हाथ डाला और उसको अपने सीने से लगा लिया.

"मोहब्बत करने लगा हूँ तुझसे " मैंने कहा और अपने होंठ निशा के लबो पर रख दिए.

"छोड़, छोड़ मुझे " पहली बार मैंने निशा की आवाज को लरजते हुए महसूस किया .

निशा- मत दिखा मुझे ये सपने . रहने दे मुझे इन अंधियारों में . इस डाकन , इस जोगन के लिए कोई मायने नहीं है इन सपनो के

मैं- मैं कोई सपना नहीं हूँ जाना, मैं वो हकीकत हूँ जो तू देख रही है .

निशा- मैं आज के बाद नहीं आउंगी यहाँ पर छोड़ जाउंगी इस जगह को

मैं- बिलकुल ऐसा कर सकती है तू , पर जहाँ भी जायेगी मेरे दिल का एक हिस्सा अपने साथ ले जाएगी . तू मुझे अपनी नजरो से दूर कर सकती है पर मेरे ख्याल को कैसे निकालेगी अपने दिल से . मैं हर पल तुझे याद आऊंगा.

निशा- यही तो मैं नहीं चाहती. तू मुझसे वादा कर की बस दोस्ती ही रहेगी मोहब्बत नहीं होगी .

मैं- मोहब्बत हो चुकी है जाना, तुझसे मोहब्बत हो चुकी है .

निशा- मैं इस लायक नहीं हूँ . मैं नहीं चल पाऊँगी तेरे साथ इस सफ़र पर .

निशा ने मेरे माथे को चूमा . उसकी आँखों से कुछ आंसू मेरे चेहरे पर गिरे.

निशा ने मेरे जख्म को देखा और बोली- आज अमावस की रात है , कल से चांदनी शुरू होगी . कुछ दिन बड़े मुश्किल होंगे और पूनम के चाँद को तू यहाँ आ जाना पूरी रात यही रहना रात मुश्किल होगी पर बीत जायेगी. जब जोर न चले तो इस तालाब का आसरा लेना . पर इस हद में ही रहना . एक खूबसूरत ख्वाब समझ कर भुला देना मुझे.

निशा ने आंच बुझाई और बोली- मुझे जाना होगा कबीर.

मैं- तू छोड़ कर जा रही है मुझे

निशा- जाना पड़ेगा मेरे दोस्त

मैंने दौड़ कर निशा को गले लगा लिया. मैं रोने लगा . वो आहिस्ता से मेरे आगोश से निकल गयी .

निशा- ये ठिकाना तेरे हवाले छोड़ कर जा रही हूँ . देख करना इसकी

मैं- मत जा

वो मुड़ी , मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई और अंधेरो की तरफ बढ़ गयी . बहुत देर तक मैं वही बैठे रहा और जब मैं वापिस गाँव के लिए चला तो दिल का एक टुकड़ा कम सा लगा मुझे.

 
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