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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#58


मेरे सवालो में दो सवाल और जुड़ गए थे पहला की वसीयत की इतनी जल्दी क्यों दूजा चौथा कागज किसका था. मेरे ख्याल जब टूटे जब चाची ने मुझे खाना खाने के लिए अंदर बुलाया. चाची ने खाना परोसा और हम दोनों खाना खाने बैठ गए.

मैं- पिताजी ने इतनी जल्दी वसीयत क्यों बनवा ली

चाची- ये तो जेठ जी ही जाने पर मैंने कह दिया है मुझे कुछ नहीं चाहिए . मेरी पूंजी तो तू और अभी मानु हो.

मै- तुम्हारी भावनाओ की कद्र है चाची. विचार करो जरा पिताजी ने क्या पूरी ईमानदारी से वसीयत बनवाई है.

चाची- जायदाद के तीन टुकड़े किये एक मुझे और दो तुम दोनों भाइयो के. मुझे आधा हिस्सा इसलिए दिया क्योंकि तेरे चाचा होते तो आधा उनका मिलता.

मैं- उसकी बात नहीं कर रहा हूँ .

चाची-तो फिर क्या कहना चाहता है तू

मैं चाची से कुछ कहता उस से पहले ही भाभी अन्दर आ गयी मेरी बात अधूरी रह गयी.

भाभी- आजकल तो आपने हमें पराया ही कर दिया है चाची जी.

चाची- अपने बच्चो को कोई माँ कभी पराया नहीं कर सकती बैठ अभी परोसती हूँ तुझे भी .

हम तीनो हलकी-फुलकी बाते करते हुए खाना खाने लगे. फिर चाची बर्तन समेट कर बाहर चली गयी रह गए हम देवर-भाभी.

भाभी- तो बात कुछ आगे बढ़ी तुम्हारी.

मैं- कैसी बात भाभी

भाभी- इतने भी भोले नहीं तुम

तब मुझे समझ आया की निशा की बात कर रही है भाभी

मैं- बात पक्की तब समझूंगा जब वो दुल्हन बन कर इस चोखट पर आएगी

भाभी- उफ्फ्फ्फ़ ये दिल्लगी.

मैं- आशिकी भाभी

भाभी- पिताजी ने वसीयत बनवा ली है

मैं- जानता हूँ

भाभी- तुम्हारे तो वारे-न्यारे है सबसे ज्यादा हिस्सा तुम्हारा ही होने वाला है

मैं- मुझे ये परिवार चाहिए और कुछ नहीं . इस धन-दौलत का मोह नहीं मुझे

भाभी- मोह कैसे होगा दिल एक डाकन से जो लगा बैठे हो

मैं- बार बार एक ही बात करने से क्या हासिल होगा आपको

भाभी- मुझे लगता है की इस वसीयत में कमी है जल्दबाजी में बनवाई गयी है ये.

मैं- मेरा भी यही मानना है

भाभी- तो क्या कमी पकड़ी तुमने

मैं- अभी पकड़ी नहीं है पर जल्दी ही पिताजी से आमने सामने बात करूँगा

भाभी- मुझे लगता है की तुम्हे वसीयत को दुबारा पढना चाहिए

मैं- क्या आपको लगता है की पिताजी ने हमसे दूर कुछ ऐसा किया हुआ है जिसका हमें मालूम नहीं . मेरा मतलब कोई दूसरी औरत या परिवार

भाभी- तू जब अगली बार घर से बाहर जाओ तो जो भी तुम्हे पहला सक्श मिले और फिर अंतिम सख्श तक तुम सबसे ये सवाल करना तुम्हे जवाब मालूम हो जायेगा और ये भी की राय साहब का कद कितना बड़ा है .

मैं- पर उसी राय साहब ने अपनी बेटी समान चंपा को गर्भवती कर दिया

भाभी- ये दुनिया उतनी खूबसूरत कहाँ है जितनी हम सोचते है . ये जीवन उतना सरल कहाँ जितना हम सुनते है . मेरी एक बात गाँठ बाँध लो इस जग में केवल दो सच्चे रिश्ते है एक पुरुष और एक औरत का बाकी सब मिथ्या है . झूठ है .

भाभी ने बहुत बड़ी बात कही थी पर वो सोलह आने सच थी .

भाभी- पुरुष हर औरत को बस एक ही नजर से देखता है और उस नजर के बारे में तुम्हे बताने की जरूरत है नहीं. औरत के लिए उसकी सुन्दरता उसका सबसे बड़ा अभिशाप है . चंपा तो मात्र एक उदाहरण है . तुम खुद को देखो कितनी आसानी से चाहे जो भी बहाना रहा हो तुमने चाची संग सम्बन्ध बना लिए. चाची की गलती रही हो या तुम्हारी उमंगें पर रिश्ता सिर्फ औरत और मर्द का. अगर मैं भी तुम्हारे सामने टांगे खोल दू तो यकीन मानो देवर भाभी के रिश्ते की मर्यादा टूटते देर नहीं लगेगी.

मैं- आपकी हिम्मत कैसे हुई ये नीच बात जुबान पर लाते हुए. आप जानती हो मैंने हमेशा माँ का दर्जा दिया है आपको

भाभी- माँ तो चाची भी है न जब तुम उसके साथ सो सकते हो तो मेरे साथ क्यों नहीं, मेरे ख्याल से ये बेचैनी क्यों हुई.

भाभी की बात खरी थी .

मैं- वो परिस्तिथिया अलग थी आप समझ नहीं पाएंगी मैं समझा नहीं पाऊंगा.

भाभी- परिस्तिथिया कितना आसान बहाना है न .मैं मान लेती हु तुम्हारी बात कुछ पलो के लिए अब विचार करो वो क्या अलग परिस्तिथिया रही होंगी जब राय साहब और चंपा के बीच जिस्मो का खेल हो गया.

मैं- आपने ही मुझे बताया उसके बारे में और अब आप ही उनका पक्ष ले रही है

भाभी- मेरे प्यारे देवर जी, मैं तुम्हे समझा रही हूँ की परिस्तिथि कितना कमजोर बहाना है. असली सच है रजामंदी , मन की चाह . चाची या तुम्हारे मन में चाहत तो जरुर रही होगी एक दुसरे को पाने की.

मैं- क्या पिताजी अपनी जायदाद में से चंपा को कुछ हिस्सा दे सकते है

भाभी- वो चाहे तो पूरी जायदाद उसे दे दे

मैं- क्या आपको कभी ऐसा लगा की पिताजी की नजरे आप पर भी गलत है

भाभी- कभी भी नहीं

मैं - तो ऐसा क्या हुआ की एक इतनी साख वाला इन्सान चंपा संग ये कर बैठा.

भाभी- तुम जानो ये

न जाने मुझे क्यों लगने लगा था की भाभी मुझसे कुछ तो छिपा रही है.

खैर, चाची के आने से हमारी बात बंद हो गयी. मैं उठ कर बाहर चला गया. थोड़ी देर गाँव में घूमा . एक बात का सकूं था की फिलहाल गाँव में उस आदमखोर के हमले कम हो गए थे जो राहत थी . घूमते घूमते मैं जोहड़ के पीछे की तरफ चला गया मिटटी के टीले पर चढ़ कर मैं पेड़ो की तरफ गया ही था की मुझे भैया की गाडी खड़ी दिखी.

"भैया यहाँ " मैंने खुद से सवाल किया . पर गाड़ी में भैया नहीं थे . ऐसे गाड़ी छोड़ कर वो कहाँ जा सकते थे . अजीब बात थी ये. की तभी मुझे दूर से एक और गाडी आती दिखी मैं पेड़ो की ओट में हो गया दौड़ कर और देखने लगा. वो गाड़ी भैया की गाड़ी के पास आकार रुकी मैंने देखा की उसमे भैया और सूरजभान थे. सूरजभान के सर पर पट्टी बंधी थी . पर भैया इस नीच के साथ क्या कर रहे थे और कहाँ से आये थे . सोच कर मेरा सरदर्द करने लगा.

थोड़ी देर कुछ बाते करने के बाद भैया की गाड़ी गाँव की तरफ बढ़ गयी और सूरजभान जिस रस्ते से आया था उसी पर वापिस मुड गया.

"कोई तो बात है जो मुहसे छिपाई जा रही है " मैंने कहा

 
#५९


मेरा भाई सूरजभान को इतनी अहमियत क्यों देता था ये सोच सोच कर मैं पागल हुए जा रहा था . दूसरा राय साहब क्या चीज थे. मेरा वजूद मेरे घर की दीवारों से आजाद हो जाना चाहता था . रात को जब मैं घर पहुंचा तो पिताजी घर पर नहीं थे. मैंने देखा भाभी अपना काम कर रही थी मौका देख कर मैं पिताजी के कमरे में घुस गया. मेरा दिल में अजीब सी घबराहट थी ऐसा पहली बार तो नहीं था की मैं इस कमरे में आया था पर ऐसे चोरी छिपे घुसने में डर सा लग रहा था .

कमरे में रोशनी थी हर सामान बड़े सलीके से रखा था . बिस्तर के सिराहने एक अलमारी थी थोड़ी दूर एक मेज थी जिस पर कुछ सामान रखा हुआ था . मैंने अलमारी खोली पिताजी के कपडे थे. पर मुझे किसी और चीज की तलाश थी दराज में देखा पर वसीयत के कागज वहां भी नहीं थे . क्या पिताजी के कमरे में कोई ख़ुफ़िया दराज थी या ऐसी जगह जहाँ पर कुछ छुपाया जा सके. मैंने लगभग कमरा छान लिया पर कागज नहीं मिले मुझे.

हताशा में मैंने इधर उधर हाथ पैर मारे बिस्तर के एक कोने में मुझे कुछ ऐसा मिला जिसने एक बार फिर मुझे हैरान कर दिया. बिस्तर के कोने में चूडियो के कुछ टूटे टुकड़े पड़े थे. मेरे बाप के बिस्तर पर टूटी चूडियो के टुकड़े सोचने वाली बात थी . न जाने क्यों मैंने वो टुकड़े अपनी जेब में रख लिए और कमरे से बाहर आया.

इस घर में दो औरते थे भाभी हमेशा सोने के कंगन पहनती थी चाची के हाथो को मैंने खाली देखा था तो क्या कोई तीसरी औरत थी जो मेरी जानकारी के बिना घर में आती थी पर कैसे , किसलिए. टूटी चूडियो ने मेरे दिमाग को उलझा कर रख दिया था ऐसा क्या था इस घर की दीवारों के पीछे छिपा हुआ जो बाहर आने को बेकरार था .

"किस सोच में इतना गहरे डूबे हो " निशा ने अलाव जलाते हुए कहा

मैं- क्या मालूम

निशा- दोस्तों को बताने से दिल हल्का हो जाता है

मैंने सोचा की निशा से ये बात करना ठीक रहेगा या नहीं क्योंकि राय शहाब के बारे में ऐसी बात करना सामाजिक तौर पर ठीक नहीं था फिर भी मैंने निशा को सारी बात बताई

निशा कुछ देर सोचती रही और फिर बोली- तुम्हारी भाभी का कहना बिलकुल सही है इस दुनिया में एक ही रिश्ता है औरत और मर्द का रिश्ता और जिस्मो की प्यास कबीर कब न जाने क्या कर जाये कोई नहीं जानता . परदे के पीछे जो चीजे होती है उनका सामने आना कभी कभी सब कुछ बर्बाद कर बैठता है . हर चीज के दो मायने होते है इसके भी है समझो , तुम्हारे पिता काफी सालो से अकेले रहे है , एक इन्सान की कुछ खास जरूरते होती है जिनमे से एक सम्भोग भी है यदि चंपा और पिताजी के बीच इस रिश्ते में दोनों की रजामंदी है तो उनके नजरिये से ठीक है ये अब दूसरा नजरिया समझो यदि वो चंपा का शोषण कर रहे है तो पाप के भागीदार है वो . सही और गलत के मध्य एक बहुत महीन रेखा होती है कबीर.

निशा ने एक गहरी साँस ली और बोली- ये समाज रिश्तो की एक ऐसी भूलभुलैया है जिसमे अपने हिसाब से रिश्तो की व्याख्या की जाती है , भाभी को देखो वो नहीं चाहती की उसका देवर एक डाकन संग रहे पर तू और मैं जानते है इस रिश्ते की सच्चाई को. बेशक हम दोनों के कर्म अलग है पर नियति ने दोस्ती की डोर बाँधी. यदि चंपा को ऐतराज नहीं है तो तू भी इस पर मिटटी डाल .

मैं- और वसीयत का चौथा टुकड़ा उसका क्या

निशा- तुझे किसका मोह है . वो राय साहब की कमाई दौलत है उनकी जमीने है वो चाहे जिसे भी दे तू अपना कर्म कर तू किसान है . तेरे हाथो की मेहनत बंजर धरती पर भी सोना उगा देती है . तू अपनी तक़दीर अपने हाथो से लिखता है

मैं- मेरे हाथो की तक़दीर में कोई रेखा तेरे साथ की भी है क्या

निशा- नियति जाने .

मैं- नियति ही तुझे मेरी जिन्दगी में लाइ है नियति ही तुझे मेरी बनाएगी.

निशा- मेरा मोह भी छोड़ दे , दुनिया में हजारो-लाखो होंगी मुझसे हसीं मुझसे जुदा

मैं- पर तू तो एक ही हैं न मेरी सरकार.

निशा- मैं अँधेरा हूँ तेरे सामने सुनहरा उजाला है

मैं- तेरे साथ इन अँधेरे प्यारे है मुझे

मैंने निशा की गोद में अपना सर रखा और लेट गया . अलाव की आंच चट चट चटकती रही हम बाते करते रहे.

मैं- भाभी कहती है की इस धागे को उतार कर फेक दे ये डाकन का है

निशा- सच ही तो कहती है ठकुराइन

मैं- पर वो इस डाकन को जानती नहीं

निशा- वो जान गयी होगी

मैं- बताया नहीं फिर मुझे

निशा- तू जाने वो जाने

मैं- कोई तो रास्ता होगा तेरे मेरे मिलने का . तेरी दुनिया के नियम भी तो टूटते होंगे.

निशा- मैं वो सपने नहीं देखती जिनके टूटने पर दुःख हो.

वो मेरे पास लेट गयी उसका हाथ मेरे सीने पर आया.

"दिल करता है इस दिल को निकाल लू " उसने कहा

मैं- तेरा दिल है ले जा बेशक

निशा- दुनिया कहेगी डायन एक और को खा गयी.

मैं- ये तू जाने दुनिया जाने.

इसके आगे मैं कुछ और नहीं कह पाया अगले ही पल निशा ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए और फिर मैं सब कुछ भूल गया. आँख खुली तो मैंने खुद को अलाव की राख में लिपटे हुए पाया. मुस्कुराते हुए मैंने कपडे झाडे और वापिस घर की तरफ चल पड़ा. घर पहुँच कर देखा की पिताजी , भैया और पुजारी जी आँगन में बैठे कुछ बाते कर रहे थे . पुजारी का सुबह सुबह हमारे घर आना मुझे अजीब ही लगा. उन पर नजर डाल कर मैं मुड़ा ही था की भैया की नजर मुझ पर पड़ी और मुझे अपने पास बुलाया

भैया- छोटे, चंपा के ब्याह का मुहूर्त निकलवाया है पुजारी जी कहते है की होली के बाद की पूनम को बड़ा ही शुभ मुहूर्त है .

पूनम की रात का जिक्र होते ही मेरे तन में झुरझुरी दौड़ गयी .

मैं- पुजारी जी कहते है तो ठीक ही होगा.

मैंने अनमने भाव से कहा.

"पुजारी जी हमारे देवर के बारे में भी कुछ कहिये , चंपा के ब्याह के बाद इनका ही नम्बर होगा आप कोई योग देखिये ताकि हम रिश्तो की बात शुरू कर पाए. " भाभी ने चाय के कप रखते हुए कहा

मैंने अपनी आस्तीन थोड़ी चढ़ाई पुजारी की नजर मेरी कलाई पर बंधे निशा के धागे पर पड़ी और वो बोला- मैं देख कर बता दूंगा

पिताजी- तो लगभग दो सवा दो महीने बीच में है . अभिमानु तयारी शुरू कर दो

भैया ने हाँ में सर हिलाया

भाभी- मैं बता दू चंपा को

मैं- नहीं ये काम मुझे करने दो

तभी पिताजी बोल पड़े- उसे ये खबर हम देंगे . भाई शुभ समाचार है बिना किसी तोहफे के कैसे बताएँगे उसे.

मैं सोचने लगा कही उसे चोद कर तो नहीं बताएगा मेरा बाप.
 
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कम्बल ओढ़े मैं कुर्सी पर बैठा सोच रहा था तमाम संभावनाओ के बारे में की चाची भी मेरे पास आकर बैठ गयी चाची ने कुछ मूंगफलिया दी मुझे और बोली- देख रही हूँ पिछले कुछ दिनों से चिंता सी है तेरे चेहरे पर क्या बात है

मैं- कुछ खास नहीं बस ऐसे ही

चाची- फिर भी तू बता सकता है मुझे.

मैं-पिताजी के कमरे की सफाई कौन करता है

चाची- कोई नहीं . क्या तुझे नहीं मालूम जेठ जी की इजाजत के बिना कोई नहीं आता जाता वहां पर.

मैं- आज बड़ी प्यारी लग रही हूँ

चाची- समझ रही हूँ तेरी इन बातो को पर तेरा काम अब कुछ दिन हो नहीं पायेगा, मासिक आया है मुझे.

मैं मुस्कुरा दिया और उठ गया वहां से

चाची- कहाँ चला

मैं- थोड़ी देर सोना चाहता हूँ मैं.

मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली. शाम को मैं चंपा के घर गया . वो सिलबट्टे पर मसाले पीस रही थी . मैंने भरपूर नजर डाली उस पर बाप से चुदाई करवा के गदरा तो गयी थी वो.

चंपा- तू बैठ मैं बस अभी आती हु

मैं- कोई नहीं .

मैंने छप्पर के बाहर चारपाई लगाई और बैठ गया.

मैं- घरवाले कहाँ गए.

चंपा- बापू खेत पर और माँ पड़ोस में आती ही होगी .

मैं- तुझसे कुछ कहना था

चंपा- हाँ

मैं- तू कैसी चुडिया पहनती है

चंपा- मै क्यों चूड़ी पहनने लगी. अभी मेरा ब्याह कहाँ हुआ

मेरे ध्यान में ये बात क्यों नहीं आई थी . मतलब वो जो भी थी शादीशुदा ही रही होगी.

चंपा- क्यों पूछ रहा है तू चूडियो के बारे में

मैं- छोड़ ये बता राय साहब मिले क्या तुझसे आज

चंपा- नहीं पर क्या बात है

मैं- कुछ नहीं वो कह रहे थे की तुझसे मिलना है उनको

चंपा ने मेरी तरफ देखा और बोली- माँ आ जाती है फिर चलती हूँ मैं

तभी चंपा के पिता घर आ गए. मैंने देखा उनके चेहरे पर थोड़ी हताशा थी . चंपा ने पानी पकडाया अपने पिता को वो मेरे पास बैठ गए.

मैं- क्या बात है काका कुछ परेशां हो .

काका- नहीं कुंवर कोई परेशानी नहीं

मैंने काका का हाथ पकड़ा और बोला- अपने बेटे से छिपाने लगे हो काका कोई तो गंभीर बात जरुर है .

काका- बेटा आज चंपा के ब्याह की तिथि पक्की हो गयी है . और इस बार की ही फसल खराब हो गयी है . वैसे इतना जुगाड़ तो है मेरे पास की बारात की रोटी-पानी हो जायेगा पर शेखर बाबु का परिवार संपन है . दान-दहेज़ की फ़िक्र है उनकी हसियत जैसा ब्याह नहीं किया तो समाज में बेइज्जती होगी.

मैं- काका इस बात की क्या चिंता आपको . बहन-बेटिया कभी माँ बाप पर बोझ नहीं होती चंपा के भाग्य में जो है वो लेकर जाएगी ये. आप जरा भी फ़िक्र मत करो मैं हूँ न.

काका- बेटा राय साहब के बड़े अहसान रहे है हम पर . चंपा के लिए इतना योग्य वर तलाशा उन्होंने हम तो अपनी चमड़ी की जुतिया भी राय साहब के लिए बना दे तो भी उनका अहसान इस जन्म में नहीं उतार पाएंगे.

मैं- कैसी बाते कर रहे है आप काका. मेरा बचपन इस घर में गुजरा है आपके दो बेटे है मैं और मंगू चंपा के ब्याह की आपको कोई चिंता नहीं करनी है . मैं और मंगू जितनी भी कमाई करते है उसका एक हिस्सा हम बचपन से इसी दिन के लिए ही जमा करते आये है . आप निश्चिन्त रहो .

काका ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और मेरे सर को पुचकारने लगे. उस दिन मैंने जाना था की बाप होना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है . मेरी नजर चंपा पर पड़ी जो दहलीज पर खड़ी भीगी आँखों से हमें ही देख रही थी . कुछ देर बाद मैं चंपा के घर से निकला और गली में आ गया.

"कबीर रुक जरा "चंपा ने पीछे से आवाज दी तो मैं रुक गया . वो दौड़ते हुए आई और मेरे आगोश में समां गयी.

मैं- अरे क्या कर रही है , कोई देखेगा तो क्या सोचेगा

चंपा- परवाह नहीं मुझे . लगने दे मुझे सीने से तेरे

मैं- पागल मत बन

चंपा ने मेरे माथे को हौले से चूमा और वापिस चली गयी. मैं सोचने लगा इसके मन में क्या आया. मैं वापिस हुआ ही था की मेरी नजर वैध जी के घर के खुले दरवाजे पर पड़ी. मैं उधर हो लिया . देखा की वैध जी अन्दर बैठे दवाइया कूट रहे थे.

मैं- कैसे है वैध जी.

वैध- ठीक हूँ कुंवर . कैसे आना हुआ

मैं- इधर से गुजर रहा था सोचा मिलता चलू

मैंने गौर किया कविता की मौत के बाद घर पर इतना ध्यान दिया नहीं गया था और देता भी कौन .

मैं- वैध जी भाभी के जाने के बाद आप अकेले रह गए . आपको किसी प्रकार की समस्या हो तो मुझे बताना .

वैध- नहीं कुंवर सब ठीक है . मुझे बूढ़े की भला क्या जरूरते हो सकती है दो रोटियों के सिवाय उसकी भी अब चिंता नहीं मंगू रोज सुबह शाम खाना दे जाता है .

जिन्दगी में पहली बार मुझे मंगू पर गर्व हुआ .

मैं- आप शहर क्यों नहीं चले जाते या फिर रोहतास को यहाँ बुला लो ऐसी भी क्या कमाई करनी जिसमे परिवार संग ही न रह पाए.

वैध- रोहतास की तो बहुत इच्छा है वो हमें ले जाना चाहता था पर मुझे शहर की आबो हवा रास नहीं मेरी वजह से ही कविता बहु को यहाँ रहना पड़ा पर आज सोचता हूँ तो की काश हम शहर चले गए होते तो वो जिन्दा होती.

मैं- जाने वाले चले जातेहै पीछे यादे रह जाती है पर इतनी रात को भाभी जंगल में करने क्या गयी थी

वैध- इसी यक्ष प्रश्न ने मेरा जीना हराम किया हुआ है. मैं हैरान हु सोच सोच कर बेटा

मैं- वैध जी आप को जरा भी परेशां नहीं होना. आप अकेले नहीं है रोहतास शहर में है पर यहाँ भी आपका परिवार है हम लोग है आपके साथ .

वैध की बूढी आँखों में पानी आ गया. थोड़ी देर बाद मैं वहां से उठ कर कुवे की तरफ चल दिया. सवाल अब भी मेरे मन में था की जंगल में कविता क्या कर रही थी उस रात. ? कविता की मौत अगर जंगल में हुई तो उसकी मौत की वजह भी जंगल में ही होगी मैंने इस बात पर गौर किया और संभावनाओ पर विचार करते हुए मैं कुवे पर पहुँच गया. इस जंगल में कुछ तो ऐसा था जो छिपा हुआ था या जिसे छुपाया गया था .

मंगू से मिलने आई होगी कविता ये विचार ही निरर्थक था क्योंकि मंगू से मिलने के लिए उसके घर से जायदा सुरक्षित कुछ नहीं था . जब घर में चुदाई हो सकती थी तो बाहर खुले में रिस्क क्यों लेगी वो . दूसरा महत्वपूर्ण सवाल ये था की क्या कविता के मंगू के अलावा किसी और से भी सम्बन्ध हो सकते थे . इस शक का ठोस कारण था मेरे पास क्योंकि उस रात पहली हरकत में ही कविता ने लगभग मेरा लंड चूस ही लिया था .
 
#61


उस दोपहर मैं कुछ कपडे लेने अपने चोबारे में गया . कुछ पुराणी चीजे थी जरुरत की मैंने सोचा की इनको चाची के घर ही ले चलता हूँ. फिर देखा की चोबारे की सफाई काफी दिनों से हुई नहीं सोचा की चंपा को बोल दू पर फिर विचार किया छोटे से काम के लिए उसे क्या परेशां करना . इसी काम में थोडा धुल-मिटटी में सन गया मैं . मैंने अपने कपडे उतारे और बाथरूम की तरफ बढ़ गया.

दरवाजा आधा खुला था , मैंने पल्ले को और खोल दिया पर जो देखा मैंने कसम से एक पल नजरे ऐसी ठहरी की फिर उठ नहीं पाई. बाथरूम में मेरी आंखो के सामने भाभी पूरी नंगी पानी की बूंदों में लिपटी हुई खड़ी थी . साबुन के झाग में लिपटी भाभी की उन्नत चुचिया . गुलाबी जांघे और उतनी ही गुलाबी भाभी की छोटी सी चूत मेरे होश-हवास छीन ले गयी उस एक छोटे से पल में .

अचानक से ऐसा मामला हो गया जो न उसने सोचा था न मैंने. वो भोचक्की रह गयी मैं हैरान . भाभी के हुस्न का ऐसा दीदार शुक्र था मैं पिघल कर बह नहीं गया. जब भाभी को भान हुआ तो उसने तुरंत दरवाजा बंद कर लिया .अपनी तेज धडकनों को सँभालते हुए मैं तुरंत निचे आ गया.

निचे आते समय मेरी नजर राय साहब के कमरे पर पड़ी . मैंने सोचा की ये जाते कहाँ है . मैं पूरी ताक में था की कब वो चंपा को बुलाएगा चोदने के लिए . मैंने साइकिल उठाई और चौपाल पर जाकर बैठ गया. मेरे दिल में इस जगह को देख कर हमेशा ख्याल आता था की मेरी मोहब्बत की कहानी यही पर पूरी होगी. हाथ जोड़ कर मैंने लाली से माफ़ी मांगी और अपनी आगे की योजना पर विचार करने लगा.

समाज की चाशनी में लिपटे इस गाँव में अवैध संबंधो का तंदूर दहक रहा था . जिसका उधाहरण, लालि, चंपा राय साहब , मंगू-कविता, चाची और मैं खुद दे. मैंने सोचा ऐसे ही सम्बन्ध न जाने और भी गाँव वालो के रहे होंगे पर साले सब ने मुखोटे ओढ़े हुए थे शराफत के.

समझ नहीं आ रहा था की बाप चंपा को कहा किस जगह पेल रहा था . अभिमानु भाई और सूरजभान के बीच क्या था . मेरा दिल कहता था की मंगू को अपना राजदार बना लू पर चाह कर भी मैं उस पर विश्वास बना नहीं पा रहा था . मेरे पास दो सवाल थे एक का जवाब मेरे घर में था उअर दुसरे का जबाब तलाशने के लिए मुझे मलिकपुर जाना था . क्योंकि सूरजभान के बारे में मुझे जो भी जानकारी मिले वो वही से मिलती.

पसरते अँधेरे में घूमते घूमते मैं मलिकपुर में पहुँच गया . दो चार दुकानों का बाजार बंद हो रहा था . मैंने देखा की शराब की दूकान खुली थी . मैं उस तरफ बढ़ गया. मैंने देखा की एक भी आदमी नहीं था वहां पर सिर्फ एक औरत बैठी थी तीखे नैन-नक्श कपडे कम बदन की नुमाइश ज्यादा मैं समझ गया तेज औरत है ये .

"आज शराब नहीं मिलेगी आगे से माल आया नहीं " उसने मुझे देख कर कहा.

मैं- शराब की तलब नहीं मुझे मेरी जरुरत कुछ और है .

उसने ऊपर से निचे तक देखा मुझे और बोली- तू तो वही है न जिसने सूरजभान का सर फोड़ा था .

मैं-किसी को न बताये तो वही हु मैं

वो- क्या चाहिए तुझे

मैं- कुछ सवाल है मेरे मन में जवाबो की तलाश है

वो- मेरा क्या फायदा तेरी मदद करने में

मैंने जेब से पाच पांच के नोटों की गड्डी निकाली और उसके हाथ में रख दी .

मैं- बहुत मामूली सवाल है मेरे तेरे अड्डे पर सब लोग आते है तू सबको जानती है हम एक दुसरे के काम आ सकते है .

उसने इधर उधर देखा और बोली- अन्दर आजा

मैं दुकान के अन्दर गया उसने दरवाजा बंद कर लिया . मैं उसके उन्नत उभारो को देखता रहा .

वो- क्या चाहता है तू

मैं-सूरजभान के बारे में क्या बता सकती है तू

वो- उसके बारे में क्या बताना सारा गाँव जानता है कितना नीच आदमी है वो .उसके दो ही काम है लोगो को तंग करना और पराई बहन बेटियों पर बुरी नजर डालना

मैं- कोई विरोध नहीं करता उसका .

वो- रुडा चौधरी बाप है उसका , ये गाँव उसकी जागीर है यहाँ पत्ता तक नहीं हिलता उसकी मर्जी के बिना . और फिर गाँव वाले क्या विरोध करेंगे. ये गाँव नहीं मुर्दा लोगो की बस्ती है जो सर झुका सकते है , गुलामी इनकी नसों में इतना अन्दर तक फ़ैल गयी है की आँखों में आँखे तक नहीं मिला सकते ये लोग.

मैं- तू तो दबंग लगती है . तू नहीं डरती उन लोगो से

वो- नहीं डरती मेरे पास है ही क्या खोने को जो मुझसे छीन लेंगे.

मैं- नाम क्या है तेरा

वो- रमा

मैं- रमा, तू इतना तो समझ ही गयी होगी की मुझे सूरजभान से कितनी नफरत है

रमा- जानती हूँ

मैं- उसके आतंक के अंत के लिए क्या तू मेरी सहायता करेगी मैं तुझे मुह मांगे पैसे दूंगा

रमा- पैसे नहीं चाहिए , क्या तू वादा कर सकता है की तू उसे मार देगा

मैं- इच्छा तो मेरी भी यही है . पर तू क्यों चाहती है ऐसा

रमा- उसकी वजह से मेरी बेटी को मरना पड़ा था .

मैंने रमा के कंधे पर हाथ रखा और बोला- मैं तुझसे वादा करता हु उसकी खाल जरुर उतारूंगा . एक बात बता तू अभिमानु ठाकुर को जानती है .

रमा- जानती हूँ

मैं- अभी मानु और सूरजभान की दोस्ती कैसी है . मेरा मतलब अभिमानु आते जाते रहता होगा यहाँ

रमा ने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोली- सूरजभान से अभीमानु ठाकुर की दोस्ती. तुझे तो बिन पिए ही नशा हो रहा है .

मैं- कुछ समझा नहीं

रमा- अभिमानु शीतल जल है और सूरजभान तेल . दोनों अलग है उनमे दोस्ती मुमकिन नहीं

मैं- पर उस दिन जब मैंने सूरजभान को मारा तूने भी देखा होगा मेरा भाई कैसे उसे अपने सीने से लगाया था .

रमा- यही बात मुझे बहुत दिन से खटक रही है . अभिमानु ठाकुर ने पुरे पांच साल बाद इस गाँव में कदम रखा था .

रमा की बात से मैं और हिल गया.

मैं- पांच साल बाद, पर क्यों . और क्या पहले भैया रोज आते थे यहाँ

रमा- रोज तो नहीं पर तीसरे-चौथे दिन जरुर आते थे. फिर अचानक से उनका आना बंद हो गया.

पांच साल से भैया ने मुह मोड़ा हुआ था मलिकपुर से और फिर अचानक ही वो उस दिन आते है जब मैंने सूरजभान को लगभग मार ही दिया था और रमा बताती है की उन दोनों में कोई दोस्ती नहीं है . खैर मैंने रमा से वादा किया की मैं उस से मिलता रहूँगा और जो भी कुछ मेरे मतलब का उसे मालूम हो वो मुझे बतादे. वापसी में मेरा मन था की कुवे पर ही सो जाऊ . रस्ते में मैंने देखा की एक जगह राय साहब की गाड़ी खड़ी थी . जंगल के घने हिस्से में राय साहब की गाड़ी का होना अटपटा सा लगा मुझे. मैंने गाड़ी को देखा कोई नहीं था अन्दर.

"बाप, क्या करने आया होगा इधर " मैंने अपनी साइकिल एक तरफ लगाई और झाड़ियो में छुप गया आज मुझे मालूम करना ही था की बाप के मन में क्या चल रहा था ..........................
 
#62

कुछ देर बीती , फिर और देर हुई और होती ही गयी . राय साहब का कहें कोई पता नहीं था. इंतज़ार करते हुए मैं थकने लगा था.इतने बड़े जंगल में मैं तलाश करू तो कहाँ करू न जाने किस दिशा में गए होंगे वो. मेरी आँखे नींद के मारे झूलने लगी थी की तभी जंगल एक चिंघाड़ से गूंज उठा . आवाज इतने करीब से आई थी की मैं बुरी तरह से हिल गया.

आज जंगल शांत नहीं था और मुझे तुरंत समझ आ गया की शिकारी निकल पड़ा है शिकार में पर वो ये नहीं जानता था की मैं भी हूँ यहाँ .मैं आवाज की दिशा में दौड़ा. झुरमुट पार करके मैं खुली जगह में पहुंचा तो देखा की एक बड़े से पत्थर पर वो ही आदमखोर बैठा है . उसकी पीठ मेरी तरफ थी पर न जाने कैसे उसे मेरी उपस्तिथि का भान हो गया था .

गर्दन पीछे घुमा कर उसने अपनी सुलगती आँखों से मुझे देखा . मैं भी खुल कर उसके सामने आ गया. अँधेरी रात में भी हम दोनों एक दुसरे को घूर रहे थे . समय को बस इतंजार था की पहला वार कौन करे .क्योंकि आज मौका भी था दस्तूर भी था और ये मैदान भी . आज या तो उसकी कहानी खत्म होती या फिर मेरी. एक छलांग में ही वो तुरंत पत्थर से मेरे सामने आकर खड़ा हो गया.

मैंने अपना घुटना उसके पेट में मारा और उछलते हुए उसके सर पर वार किया. ऐसा लगा की जैसे पत्थर पर हाथ दे मारा हो मैंने. उसने प्रतिकार किया और मुझे धक्का दिया मैं थोड़ी दूर एक सूखे लट्ठे पर जाकर गिरा. इस से पहले की मैं उठ पाता उसने अपने पैर के पंजे से मेरे पेट पर मारा.

दुसरे वार को मैंने हाथो से रोका और उसे हवा में उछाल दिया. न जाने क्यों मुझे वो कमजोर सा लग रहा था . तबेले वाली मुठभेड़ में भी मैंने ऐसा ही महसूस किया था .मेरे हाथ में एक पत्थर आ गया जो मैंने उसके सर पर दे मारा . वो चिंघाड़ उठा और अगले ही पल उसने मुझे कंधो से पकड़ कर उठा लिया मैं हवा में हाथ पैर मारने लगा. कंधो से होते हुए उसकी लम्बी उंगलिया मेरी गर्दन पर कसने लगी . मेरी साँसे फूलने लगी पर तभी उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी और मुझे फेंक दिया .

मै हैरान हो गया ये दूसरी बार था जब वो चाहता तो मुझे मार सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया . अपने आप को संभाल ही रहा था मैं की तभी मुझे गाड़ी चालू होने की आवाज सुनाई दी .मैं तुरंत उस दिशा में दौड़ा पर मुझे थोड़ी देर हो गयी गाड़ी जा चुकी थी . मैंने अपनी साइकिल उठाई और तुरंत गाँव की तरफ मोड़ दी. जितना तेज मैं उसे चला सकता था उतनी तेज मैंने कोशिश की . घर पहुंचा , सांस फूली हुई थी . मैं तुरंत पिताजी के कमरे के पास पहुंचा और दरवाजे को धक्का दिया. दरवाजा अन्दर से बंद था .

"पिताजी दरवाजा खोलिए " मैंने किवाड़ पिटा

"हम व्यस्त है अभी " अन्दर से आवाज आई

मैं- पिताजी दरवाजा खोलिए अभी के अभी

कुछ देर ख़ामोशी छाई रही इस से पहले की मैं आज दरवाजे को तोड़ देता अन्दर से दरवाजा खुला . मैं कमरे में घुस गया .पिताजी के हाथ में जाम था . टेबल पर एक किताब खुली थी .

मैं- जंगल में क्या कर रहे थे आप

पिताजी ने किताब बंद करके रखी और बोली- जंगल में जाना कोई गुनाह तो नहीं . हमें लगता है की इतनी आजादी तो है हमें की अपनी मर्जी से कही भी आ सके जा सके.

मैं- ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है पिताजी

पिताजी- हम जरुरी नहीं समझते तुम्हारे सवालो का जवाब देना . रात बहुत हुई है सो जाओ जाकर

मैं- आपको जवाब देना होगा. आप अभी जवाब देंगे मुझे .

पिताजी ने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोले- अभी तुम इतने बड़े नहीं हुए हो की हमसे नजरे मिला कर बात कर सको

मैं-नजरे छिपा कर तो आप भागे थे जंगल से . मैंने आपको पहचान लिया है आपके अन्दर छुपे उस शैतान को पहचान लिया है मैं जान चूका हूँ की वो हमलावर आदमखोर कोई और नहीं मेरा बाप है .

जिन्दगी में ये दूसरा अवसर था जब मैंने राय साहब के सामने ऊँची आवाज की थी .

राय साहब ने अपनी ऐनक उतारी उसे साफ़ किया और दुबारा पहनते हुए बोले- माना की हौंसला बहुत है तुममे बरखुरदार पर ये इल्जाम लगाते हुए तुम्हे सोचना चाहिए था क्योंकि हम चाहे तो इसी समय तुम्हारी जीभ खींच ली जाएगी.

मैं- ये ढकोसले, ये शान ओ शोकत ये झूठी नवाबी का चोला उतार कर फेंक दीजिये राय साहब .मैं जानता हूँ वो हमलावर आप ही है .

पिताजी ने जाम दुबारा उठा लिया और बोले- इस यकीन की वजह जानने में दिलचश्पी है हमें

मैं-क्योंकि मैं भी उसी जगह मोजूद था मेरी मुठभेड़ हुई उसी हमलावर से और जब मैं उसके पीछे था ठीक उसी समय आप की गाडी वहां से निकली . क्या ये महज इतेफाक है .

पिताजी ने शराब का एक घूँट गले के निचे उतारा और बोले-इत्तेफाक तू जनता ही क्या है इत्तेफाक के बारे में . समस्या ये नहीं है की हमारी गाड़ी वहां क्या कर रही थी समस्या ये है की जमीनों के साथ साथ जंगल को भी तुमने अपनी मिलकियत समझ लिया है किसी और का जंगल में जाना गवारा नहीं तुम्हे

मैं- कितना कमजोर बहाना है ये . चलो मान लिया की मुझ पर हमला होना और हमलावर का उसी समय भागना और आपका भी वही से एक साथ निकलना संयोग ही था पर इतनी रातको ऐसा क्या काम हुआ जो राय साहब को जंगल में जाना पड़ा.

पिताजी- हमने कहा न तुम्हे ये जानने की जरुरत नहीं

मैं- जरुरत है मुझे. गाँव के लोग मारे जा रहे है . गाँव की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है

पिताजी- बेशक तुम्हारी जिम्मेदारी है पर तुम्हे यहाँ मेरी रात ख़राब करने की जगह कातिल को तलाशना चाहिए

मैं- उसे तो मैं तलाश लूँगा और जिस दिन ऐसा होगा मैं हर लिहाज भूल जाऊंगा.

गुस्से से दनदनाते हुए मैं कमरे से बाहर निकला . पहले चंपा के साथ सम्बन्ध और फिर ये घटना मैंने सोच लिया राय सहाब के चेहरे पर चढ़े मुखोटे को उसी पंचायत में उतारूंगा जहाँ लाली को फांसी दी गयी थी .


सुबह होते ही मैं उसी जगह पर पहुँच गया और वहां की भोगोलिक स्तिथि को समझने की कोशिश करने लगा. चारो दिशाओ में मैंने खूब छानबीन की तीन दिशाओ में मुझे कुछ नहीं मिला पर चौथी दिशा में काफी चलने के बाद मैं संकरी झाड़ियो से होते हुए उस जगह पर पहुँच गया जो मुझे हैरान कर गयी . मैं काले खंडहर के सामने खड़ा था .
 
#64

"कहाँ जाना है आपको " मैंने राय साहब से पूछा

पिताजी ने एक नजर मुझपर डाली और बोले- तुम्हारा जानना जरुरी नहीं है .

मैं- ये फिर कभी जाएगी आप के साथ मुझसे इस से कुछ काम है बाद में आएगी ये

पिताजी- चंपा तूने सुना नहीं हमने क्या कहा

मैं- चंपा ने सुना भी और देख भी रही है पर ये अभी यही रहेगी.

पिताजी ने गहरी नजरो से देखा चंपा को उसने अपने कदम आगे बढ़ाये की मैंने उसकी कलाई पकड़ ली .

"बदतमीजी एक हद तक ही बर्दास्त के काबिल रहती है बरखुरदार " इस बार पिताजी थोडा तल्ख़ थे.

चंपा - जाने दे कबीर, मैं बाद में मिलूंगी तुझे.

मैं चाहता तो नहीं था पर चंपा की आँखों में एक विनती सी थी .दस्तूर तो ये था की चंपा अपनी चूत किसी को भी दे उसकी मर्जी पर न जाने क्यों मुझे बुरा बहुत लगने लगा था . मैंने रजाई ओढ़ी और सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि नींद ही मेर सर के दर्द को मिटा सकती थी .

नींद उचटी तो पाया की अँधेरा घिरा हुआ था . आसमान में कुछ नहीं था काली रात के सिवाय . मटके से पानी पीने आया तो देखा की कुवे की मुंडेर पर निशा बैठी थी .

मैं- तू कब आई

निशा- तूने देखा तभी

मैं- मुझे जगा लेती और बाहर क्यों बैठी है

निशा- अजब सा सकून है तेरे दर पर कदम अपने आप बढ़ने लगे है इस दहलीज की तरफ .

मैं- जहाँ तक तेरी नजर देखे सब कुछ तेरा ही तो है

निशा- बेशक ,पर मुझे क्या मोह क्या चाहत जो कुछ है तू है

मैं- कहती है तू मानती तो नहीं

निशा-मैं मानु न मानु ये रात सब जानती है

मैं- अन्दर आजा

मैंने पानी पिया और हम अन्दर आ गए.

निशा मेरी रजाई में घुस कर बैठ गयी और बोली- क्या बात है कुछ परेशान से लगते हो कुंवर जी

मैं - वही घर की परेशानी . चंपा और राय साहब का अलग ही नाटक चल रहा है .

निशा- बड़े रंगीले है पिताजी तुम्हारे. तुम्हे बुरा लगता है क्योंकि वो बाप है तुम्हारा पर ठाकुरों को विरासत में अय्याशी ही मिलती है . खून में दौड़ता है जिस्मो को पाने का नशा. इनको लगता है की दुनिया में जो भी मिले उसे अपने निचे पटक लो.

मैं- कहती तो तू सही है मेरी जाना पर क्या करू तू ही बता

निशा- जीने दे उनको अपनी जिन्दगी . चंपा को ठीक लगता है तो चलने दे जो चल रहा है .

मैं- बात सिर्फ इतनी सी नहीं है मेरी समस्या गाँव वालो की सुरक्षा की भी है . ये जो सिलसिला शुरू हुआ है इसका अंत न जाने क्या होगा

निशा-जो भी होगा ठीक ही होगा

मैं- तू कर न मेरी मदद .

निशा- क्या चाहिए तुझे बता

मैं- कविता उस रात जंगल में क्या कर रही थी इसका जवाब चाहिए और कल राय साहब जंगल में क्या कर रहे थे ये भी .

निशा-जंगल का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है कबीर. जंगल साक्षात् जीवन है क्या नहीं देता ये तुमको. खाना , पानी इंधन, जडीबुटी . पर लोग इसको भूलने लगे है . कितनी ही लोग इसको ख़राब कर रहे है , मतलबी इंसानी जात . ये लोग भी अपना कोई मकसद साध रहे होंगे.

मैं- क्या पिताजी कल तेरे ठिकाने की तरफ आये थे .

निशा- वहां कोई नहीं आता , भुला दी गयी एक कहानी है वो जिसे मैं और तू जी रहे है . क्या हुआ कभी कोई पशु बेशक आ निकले पर इन्सान नहीं झांकता उधर. दूसरी बात वो एक शापित जगह है और इन्सान एक कमजोर कौम है जिसके दिल में कुछ नहीं सिवाय खौफ के .

मैं- समझ नहीं आ रहा की ऐसा क्या है इस जंगल में जो कविता और राय साहब को खींच लाये . तूने तो देखा था न कविता को

निशा- मुझे अफ़सोस है की मैं उसे बचा नहीं पाई. वैसे क्या तूने चंपा और राय साहब को देखा हमबिस्तर होते हुए

मैं- नहीं भाभी ने बताया मुझे

निशा - कानो का कच्चा है क्या तू . तूने मान लिया

मैं- और वो टूटी चुडिया

निशा- बड़े भोले हो कुंवर जी , तुम्हे रंगे हाथ पकड़ना चाहिए उन दोनों को . भाभी ने अगर उनको देखा तो उसने तुम्हारे भैया को क्यों नहीं बताया उसने क्यों प्रतिकार नहीं किया की घर में ये अनैतिक काम क्यों हो रहा है पर उसने चुप्पी साधी और तुम्हे बताया .मैं पूछती हु क्यों तुम ही क्यों

मेरे पास कोई जवाब नहीं था निशा की बात का

निशा- जो राज घर में दबे होते है उनकी जड़े बहुत गहरी होती है . मैं तुम्हे रास्ता दिखा सकती हूँ चलना तुम्हे खुद पड़ेगा .

मैं-वही कोशिस कर रहा हूँ . एक मेरे घर की समस्या दूजा वो आदमखोर और तीसरा एक चुतिया वो सूरजभान कुंडली मार कर मेरे सुख पर बैठ गए है .एक तू ही तो है जिसको देख कर मैं अपना गम भूल जाता हूँ तू एक बार कह तो सही मैं सब कुछ छोड़ दू तेरे लिए तू कहे तो उसी खंडहर को हम अपना आशियाँ बना लेंगे. तू एक बार थाम तो सही हाथ मेरा

निशा- न मुझमे इतनी शक्ति है कबीर न मेरी नियति में तेरा साथ है ये एक अकाट्य सत्य है

मैं- तू ही बता मैं क्या करू

निशा- तू खोज उस सच को जो तेरी दहलीज में छुपा है . तुझे लगता है तेरे पिता गलत है तो साबित कर उनको गलत . इतिहास को तलाशना बहुत मुश्किल होता है कबीर . गड़े मुर्दे उख्ड़ेंगे तो उनकी बदबू जीना हराम कर देगी तेरा. कड़ीयो को जोड़ना सीख . पहली कड़ी तुझे तलाशनी है तो देख वो कमजोर कड़ी कहाँ है .

मैं- ठीक है चंपा से कल खुल कर पूछताछ करूँगा.

निशा- लोगो को पहचान परख उनको

मैं- समझ गया .

निशा ने मेरे गालो को चूमा और बोली- कल राय साहब किसी आदमी के साथ थे जंगल में . दोनों बड़ी देर तक दोनों कुछ देख रहे थे अनुमान लगा रहे थे

मैं- क्या देख रहे थे

निशा- शायद कुछ ऐसा जो तू जानना चाहता है .

 
#65

सुबह जब मैं जागा तो निशा जा चुकी थी . बाहर आकर देखा की भाभी, चंपा और मंगू तीनो ही खेतो पर थे. मैंने एक नजर उन पर डाली और जंगल में चला गया. वापिस आते ही चंपा ने मुझे चाय का गिलास पकडाया . मेरी नजर भाभी पर पड़ी जो हमें ही देख रही थी . मैं उनके पास गया .

मैं- इतनी सुबह आप खेतो पर

भाभी- कभी कभी मुझे भी घर से बाहर निकलना चाहिए न .

मैं- सही किया जो आप आ गयी मैं आ ही रहा था आपसे मिलने

भाभी- मुझसे क्या काम

मैं- वसीयत के चौथे टुकड़े के बारे में बात करनी थी

भाभी - मैं नहीं जानती उसके बारे में

मैं- पर मुझे जानना है . चाची, भैया और मैं हमसे अजीज और कौन है पिताजी के लिए . क्या चंपा का नाम है उस चौथे हिस्से में

भाभी- वो इतनी भी महत्वपूर्ण नहीं है .

मैं- तो बता भी दो मुझे

भाभी- मुझे जरा भी दिलचस्पी नहीं है जायदाद में कबीर .

मैं- इतना भी प्रेम नहीं बरस रहा इस परिवार में की ना आप हिस्सा चाहती है न भैया और न चाची. आप सब को इस जमीन में दिलचस्पी नहीं है तो क्या चाहते है आप लोग क्या ख्वाहिश है आप सब की

भाभी- परकाश नाम है उसके पुरखे मुनिमाई करते थे राय साहब के यहाँ उसने वकालत का पेशा चुना . राय साहब और तुम्हारे भैया के सारे क़ानूनी मामले वही संभालता है. वो ही बता सकता है क्या था उस हिस्से में .

मैं- क्या भैया को मालूम है उस चौथे हिस्से के बारे में

भाभी- क्या तुम जानते हो तुम्हारे भैया को

भाभी- परकाश से मिलो . खैर , क्या अब भी उस डाकन से मिलते हो तुम

मैं- मिलना क्या है पूरी रात साथ ही सो रहे थे हम

मैंने भाभी से कहा और वापिस मुड गया. मैंने देखा नहीं भाभी के चेहरे पर क्या भाव थे .मैंने मंगू को देखा जो खाली खेतो को देख रहा था .

मैं- कहाँ गया था तू भैया के साथ

मंगू- टेक्टर लेने , भैया का कहना है की जमाना बदल रहा है हल की जगह खेती में टेक्टर का उपयोग करना चाहिए . पैसे भर आये है जल्दी ही आ जायेगा.

मैं- भैया वो जो नई जमीन के बारे में कह रहे थे वो जमीन देखने कब जायेंगे

मंगू- मुझे नहीं पता

मैं- मंगू बुरा मत मानियो पर मुझे लगता है की कविता का तेरे आलावा किसी और से भी चक्कर चल रहा था .

मंगू ने अजीब नजरो से देखा मुझे

मंगू- वो चालू औरत नहीं थी

मैं- क्या कभी उसने तुझे कुछ बताया

मंगू- हम ज्यादा बाते नहीं करते थे बस मिलते चुदाई करते और अलग हो जाते.

मुझे लगा की चंपा सच कहती थी की कविता बस इस्तेमाल कर रही थी मंगू का . कविता के बारे में कुछ तलाशना था तो उसके घर से ही शुरुआत करनी थी . मैंने पता लगाया की वैध किसी दुसरे में गाँव में गया हुआ है मैं चुपके से उसके घर में घुस गया. एक तरफ दुनिया भर की शीशिया थी जिनमे दवाइया और उन्हें बनाने का सामान था . मैंने कविता के कमरे में तलाशी शुरू की . दीवारों में बने खाने औरत के कपड़ो से भरे थे .

कमरा वैसे तो कुछ खास नहीं था एक पलंग था . पास में एक मेज थी जिस पर औरतो का कुछ सामान लाली-पोडर पड़ा था. मेज की दराज खोली तो उसमे तरह तरह की कच्छी पड़ी थी . रेशमी, जालीदार और भी कई तरह की . मैंने उनको हाथ में लेकर अच्छे से देखा. गाँव में मनिहारिन तो ऐसी नहीं बेच सकती थी मैं दावे से कह सकता था . मुझे कुछ जेवर मिले . गाँव की एक आम औरत जिसकी आर्थिक स्तिथि इतनी अच्छी भी नहीं थी की वो इतने जेवर बनवा ले इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.

मैंने कमरे को और अच्छे से खंगाला. मुझे एक छोटा बक्सा मिला जिसमे सौ-सौ के नोटों की गद्दिया थी. मेरा तो दिमाग ही घूम गया . एक वैध की बहु के पास इतना पैसा कहाँ से आया. किसने दिया. इतनी रात में जब आदमखोर का आतंक मचा हुआ है कविता जंगल में जाती है , जाहिर है उसे कुछ तो ऐसी प्रचंड लालसा रही होगी या फिर कोई गहरी मज़बूरी सिर्फ इन्ही दो सूरतो में वो जा सकती थी . कुछ तो कुकर्म कर रही थी वो .मंगू के आलावा कौन पेल रहा था उसे. कविता के जेवरो को वापिस रख ही रहा था की मेरी नजर आईने के पास पड़ी डिबिया पर पड़ी.

उत्सुकता वश मैंने उसे खोला . उसमे कांच की चुडिया थी . ऐसा लगा की मैंने इनको पहले देखा हो पर याद नहीं आ रहा था मैंने थोडा जोर दिया और जब याद आया तो ऐसा याद आया की सर्द मौसम में भी मैं अपने माथे पर आये पसीने को नहीं रोक सका. मैंने अपनी जेब से टूटी चूड़ियां निकाली और मिलान किया . मामला शीशे की तरह साफ़ था . ये चुडिया, ये पैसे और ये महंगे जेवर चीख चीख कर कह रहे थे की ये सब राय साहब की ही मेहरबानी थी . राय साहब ही वो दुसरे शक्श थे जो कविता को चोदते थे.

गरीबो का मसीहा, सबके लिए पूजनीय राय साहब का ऐसा चेहरा भी हो सकता था कोई विश्वास नहीं करे अगर मैं किसी से कहूँ तो पर सच शायद ये ही था. पर यहाँ एक सवाल और मेरे सामने आ खड़ा हुआ था की वसीयत का चौथा हिस्सा कविता का नहीं हो सकता क्योंकि कविता तो मर चुकी थी . वो शायद बस दिल बहलाने के लिए ही हो . निशा ने कहा था हवस , अयाशी खून में दौड़ती है . अब मुझे ये सच लग रहा था कितनी आसानी से मैंने चाची को चोद दिया था . कितनी ही मचल रही थी चंपा मुझसे चुदने के लिए.

वैध के घर से आने के बाद मैं चौपाल के चबूतरे पर बैठे सोच रहा था की राय साहब को रंगे हाथ चुदाई करते हुए पकड़ने के लिए मुझे एक ठोस योजना बनानी पड़ेगी जिसके लिए मुझे दो लोग तलाशने थे एक जो राय साहब का बिलकुल खास हो और जो उनके खिलाफ हो. खैर सुबह मुझे प्रकाश से मिलना ही था . कुछ सोच कर मैं रमा के ठेके की तरफ चल दिया. वहां पहुन्चा तो पाया की काफी लोग दारू पी रहे थे पर सूरजभान या उसका कोई साथी नहीं था.

मैंने रमा को देखा उसने मुझे इशारा किया और हम ठेके के पीछे बने कमरे में आ गए.

रमा- कैसे है कुंवर जी

मैंने रमा की भरपूर खिली हुई चुचियो पर नजर डाली और बोला - बढ़िया तुम बताओ

रमा- वो मुनीम का छोरा प्रकाश बहुत चक्कर लगा रहा है मलिकपुर के रुडा से खूब मिल रहा है

मैं- वकील है न जाने कितने लोगो का काम देखता होगा.

रमा-बड़ा धूर्त है वो .

मैं- क्या प्रयोजन हो सकता है उसका

रमा-रुडा की लड़की सहर से पढ़ कर आई है . मुझे लगता है की उसी के चक्कर में जाता होगा .

मैं- जान प्यारी नहीं क्या उसे . परकाश को क्या नहीं मालूम की ठाकुरों की बहन-बेटियों पर बुरी नजर डालने का क्या अंजाम होगा.

रमा- बहन-बेटी तो सबकी समान होवे है कुंवर जी, कोई माने या ना माने वैसे भी हर औरत निचे से एक जैसी ही होती है .

बातो बातो में रमा ने मुझे बताया की पहले वो मेरे गाँव में ही रहती थी फिर उसके पति की मौत हो गयी तो वो मलिकपुर आ गयी यहाँ भी तक़दीर ने उसे दुःख ही दिए.

हम बात कर ही रहे थे की बाहर से कुछ चीखने चिल्लाने की आवाजे आने लगी तो हम ठेके की तरफ गए और वहां जो मैंने देखा ...................
 
#66

मैंने देखा वकील परकाश एक गाँव वाले के साथ उलझा हुआ था. उसका गिरेबान पकड़ा हुआ था .

रमा- रोज का तमाशा है ये इधर कोई न कोई किसी न किसी से उलझा रहता है

पर मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था .

मैं- रसूखदार लोगो को शोभा नहीं देता ऐसे राह चलते हुए ये ओछी हरकते करते हुए .

प्रकाश ने मुझे देखा और बोला- कुंवर साहब आप यहाँ

मैं- हमें तो आना ही था , यहाँ के नशे की बड़ी तारीफ सुनी थी .

प्रकाश ने एक नजर रमा पर डाली और बोला- नशा तो मशहूर है यहाँ का

मैंने रमा से हमारे लिए दारू लाने को कहा और हम थोडा दूर बैठ गए.

मैं- और वकील साहब वसीयत का काम कहाँ तक पहुंचा

वकील - बड़ी जल्दी है आपको हिस्सा लेने की

मैं- हमारे दो ही शौक है जमीने और जिस्म . जितने मिले उतने थोड़े

वकील-ये बात तो है , वैसे पसंद उम्दा है आपकी

वकील ने रमा को देखते हुए कहा

मैं- हमें आपकी हसरतो का भान भी है वकील साहब , आपकी ये इच्छा हम पूरी कर सकते है पर वो कहते हैं न हर चीज की एक कीमत होती है

वकील- और वो कीमत क्या है

मैं- बहुत छोटी कीमत. बस आपको बताना होगा की वसीयत के चौथे कागज में क्या लिखा है .

मेरी बात सुनकर वकील का नशा एक पल में ही उड़ गया वो आँखे फाड़े मुझे देखने लगा.

मैं- मेरे लिए काम करो मुह्मांगे पैसे और नए जिस्म जब तुम चाहो

वकील- कुंवर साहब, वसीयत के सिर्फ तीन हिस्से है आप जितना जल्दी इस बात को समझ ले बेहतर होगा.

मैं- देखो परकाश, जीवन जो हैं न बड़ा अनिश्चित है न जाने कब क्या हो जाये आज हम यहाँ बैठे है कल हम हो न हो. तो क्या ही फायदा इन सब चीजो का तुम हमारे पारिवारिक वकील हो तुम्हारा फर्ज है हमें हर वो जानकारी देना जिसकी हमें जरूरत है .

वकील- आप मुझे धमका रहे है

मैं- तुम्हे ऐसा लगता है तो ये ही सही पर जो जानकारी हमें चाहिए वो हम लेकर रहेंगे चाहे उसके लिए हमें तुम्हारी खाल ही क्यों न उधेद्नी पड़े.

मैंने अपना गिलास होंठो से लगाया.

वकील- ये बात राय साहब को मालूम होगी तो आप मुशकिल में आ जायेंगे

मैं- ये बात राय साहब को मालूम हुई तो तुम मुश्किल में आ जाओगे. आखिर ऐसी क्या वजह थी जो वसीयत के कागज लेकर तुम जंगल में गए थे राय साहब से मिलने.

प्रकाश के माथे पर पसीना उभर आया. उसने एक ही साँस में अपना गिलास खाली कर दिया और बोला- मेरा यकीन कीजिये

मैं- यकीन है बस तुम बता दो की उस चौथे टुकड़े में क्या लिखा था .

वकील- ऐसा कोई कागज नहीं था .

प्रकाश उठ खड़ा हुआ और जाने लगा.

"सुना है की रुडा की बेटी पर नजर है तुम्हारी " मैंने थोडा जोर से कहा .

प्रकाश के कदम रुक गए वो एक पल पीछे मुड़ा और फिर तेज कदमो से वहां से नो दो ग्यारह हो गया. जितना मैंने समझा था उस से ज्यादा घाघ था ये . अगले दिन मैं जब मैं घर पहुंचा तो देखा की चंपा रसोई में थी . मैंने उसे छत पर आने को कहा . थोड़ी देर में वो मेरे सामने थी .

मैं- कहाँ ले गए थे तुझे राय साहब

चंपा- कहीं नहीं

मैं- बता भी दे वैसे भी अब छिपाने को कुछ नहीं है

चंपा- क्या सुनना चाहता है तू

मैं- जो तू छिपा रही है .

चंपा- मैंने तुझसे कुछ नहीं छिपाया

मैं- झूठी है तूने झूठ बोला की मंगू ने पेला तुझे जबकि तू किसी और के साथ सो रही है .

चंपा-मैंने पहले भी कहा था तुझे अब भी कहती हूँ मंगू करता है मेरे साथ

मैं- क्या वो बच्चा मंगू का था

चंपा- क्या फर्क पड़ता है अब

मैं- फर्क पड़ता है क्योंकि मेरी दोस्त मेरे बाप का बिस्तर गर्म कर रही है . मुझे दुःख होता है इस बात का

चंपा - देख कबीर तुझे जो सोचना है सोच, जो मानना है मान पर मैं नहीं चाहती की मेरी वजह से बाप-बेटो में तकरार हो .

मैं- सिर्फ इतना जानना है की कौन सी मज़बूरी में तू ये सब कर रही है

चंपा- कोई मज़बूरी नहीं है

मैं- कल तुझे चोदने ले गया था न मेरा बाप

चंपा- कल की क्या बात अब कल तो बीत गया आने वाला कल देख अब

मैं- दिल तो करता है तेरी ऐसी हालत कर दू की तो सौ बार सोचे. अरे तुझे क्या समझा था मैंने और तू इतना गिर गयी

चंपा- मैं अकेली नहीं हूँ जो गिरी हुई है ये दुनिया ही मादरचोद है कबीर.

मैं- ऐसी कैसी आग लगी थी तुझे जो दो दो लोग भी ठंडी नहीं कर पाए तुझे .

चंपा- तुझे जो कहना है कह ले.

मैं- तुझसे तो मैं क्या ही कहूँ , पर एक दिन आएगा जब राय साहब को उसी चौपाल पर नंगा करूँगा जहा न्याय की कसमे खाई जाती है .

निचे से भाभी ने चंपा को आवाज दी तो वो चली गयी . छत से गाँव के नज़ारे को देखते हुए मैं सोचने लगा कोई तो मजबूत सिरा मिले मुझे. दिल किया की राय साहब के कमरे की फिर से तलाशी ली जाये पर मेरा बाप ये मौका फिर नहीं देगा मुझे मैं जानता था .

मैंने भैया की गाड़ी आते देखा तो मैं निचे चला गया .

"कैसा है छोटे " उतरते ही भैया ने पूछा मुझसे

मैं- नाराज हूँ

ये सुनकर भैया के कदम ठिठक गए .

भैया- फिर कभी ऐसा मत कहना मेरे भाई, तू नाराज होगा तो मेरा क्या होगा.

मैं- मेरे बारे में सोचते ही नहीं आप

भैया- तेरे बारे में नहीं सोचता मैं जानता है तू क्या कह रहा है

मैं- मेरे बारे में सोचते तो मेरे दुश्मन को सहारा नहीं दे रहे होते आप जिस दिन आपसे दूर चला जाऊंगा न उस दिन याद बहुत आएगी मेरी.

मेरी बात सुनकर भैया ने मुझे अपने सीने से लगा लिया. उनकी आँखों में आंसू भर आये- दुबारा तेरी जुबान पर ये शब्द नहीं आने चाहिए . तूने सोच भी कैसे लिया की तू मुझसे दूर चला जायेगा. तू मेरी दुनिया है छोटे

मैं- तो फिर मेरा भाई क्यों मेरे दुश्मन के साथ है

भैया- तू मेरा जिगर है छोटे और वो मेरा फर्ज........................

 
#67

मैं- कैसा फर्ज भैया

भैया- बस इतना समझ ले छोटे , उसे भी थाम कर रखना है मुझे

मैं- ये मुमकिन नहीं हो पायेगा भैया . मैं हद नफरत करता हु उससे . एक दिन आयेगा जब या तो वो रहेगा या मैं

भैया- जब तक मैं हूँ वो दिन कभी नहीं आएगा.

भैया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और अन्दर चले गए. मैंने देखा भाभी मुझे ही देख रही थी .तमाम चीजो के बीच सिर्फ यही राहत थी की फिलहाल के लिए उस आदमखोर के हमले रुके हुए थे. गाँव वालो को भी थोडा चैन था . कुछ तो भैया छिपा रहे थे मुझसे पर क्या. राय साहब और भैया दोनों में एक बात एक सी थी की दोनों के कोई दोस्त नहीं थे. और जब आदमी अकेला होता है तो उसके इतिहास को तलाशना और मुस्किल हो जाता है .

एक बार फिर मैं दोपहर को रमा के अड्डे पर था.

रमा- पर तुम प्रकाश से जानकारी कैसे निकल्वाओगे

मैं- तुम्हारी मदद से , तुम्हारे हुस्न पर फ़िदा है वो तुम उसे अगर उलझाये रखो तो मैं उसके घर से कागज तलाश लूँगा.

रमा- मैं उसे जायदा देर तक नहीं उलझा पाउंगी , क्योंकि मैं उसे बस रिझा सकती हूँ उसकी मनचाही नहीं करुँगी. दूसरी बात वो बहुत धूर्त है समझ जायेगा की तुम्हारे कहने पर मैं कर रही हूँ ये

मैं- तो क्या करे.

रमा- रात की जगह तुम ये काम दिन में करो . दिन में वो अदालत में रहता है या फिर तुम्हारे पिता के साथ

.

रमा की बात में दम था . और दस्तूर भी क्योंकि प्रकाश का घर आबादी से दूर मलिकपुर के पिछले हिस्से में था. मैंने रमा को साथ लिया और हम उसके घर में घुस गए. घर ज्यादा बड़ा नहीं था तीन कमरे थे और एक छोटी सी रसोई. एक कमरे में उसके कागज थे कचहरी के . मैंने वसीयत के कागज तलाशे पर कुछ नहीं मिला. पूरा कमरा देख लिया. दुसरे कमरे में बस बिस्तर पड़ा था . पर तीसरे कमरे में कुछ ऐसा था जिसने मेरे मन को और मजबूत किया की प्रकाश धूर्त ही नहीं गलीच भी था. कमरे में औरतो की कछिया पड़ी थी . फटे हुए ब्लाउज पड़े थे. मतलब की यहाँ पर वो औरतो को चोदने के लिए लाया करता था .

मैं- देख रही हो रमा क्या काण्ड हो रहे है ये

रमा- समझ रही हूँ .

मेरी नजर रमा की छातियो पर पड़ी जो जोर से ऊपर निचे हो रही थी . बेशक उसने शाल ओढा हुआ था पर फिर भी मैं उसकी गोलाइयो को महसूस कर पा रहा था . एक पल को लगा की उसने मेरी नजरे पकड़ ली है.

रमा- वो कागज महत्वपूर्ण है उन्हें खुले में तो नहीं रखेगा . किसी तिजोरी जैसी जगह में रखेगा.

मुझे जायज लगी उसकी बात. मैंने एक बार फिर से गहनता से तलाशी शुरू की पर हालात वैसे के वैसे थे.

मैं- घी जब सीधी ऊँगली से नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी पड़ती है प्रकाश अब खुद कागज देगा मुझे .

हम लोग वापिस रमा के ठिकाने पर आ गए.

रमा- जबसे तुम इधर आने लगे हो सूरजभान और उसके साथी आते नहीं इधर

मैं- मेरी वजह से तुम्हारा धंधा कम हो गया .

रमा- वो बात नहीं है

मैं- क्या उन्होंने तुमसे कहा नहीं की क्यों बिठाती हो मुझे .

रमा- अभी तक तो नहीं .

मैं- और रुडा

रमा- रुडा ज्यादातर बाहर ही रहता है . उसमे पहले वाली बात नहीं रही . किसी ज़माने में उसका सिक्का चलता था पर अब उम्र भी तो हो गयी है .

मैं- और उसकी बेटी

रमा- वो बाहर पढ़ती थी बड़े शहर में पुरे पांच बरस बाद लौटी है . रुडा और उसकी कम ही बनती है .जब वो आती है तो रुडा घर नहीं रहता रुडा आये तो वो चली जाती है . इतने दिन बाद आई है तो कोई विशेष कारण ही होगा.

मैं- ब्याह नहीं किया रुडा ने उसका

रमा- सुना है की वो करना नहीं चाहती ब्याह.

"भैया ने भी पुरे पांच साल बाद मलिकपुर की धरती पर कदम रखा क्या सूरजभान की बहन ही वो वजह थी . वो भी पांच साल बाद लौटी है क्या अतीत में इनके बीच कुछ था " मैंने खुद से ये सवाल किया. वापिस गाँव आने के बाद मैं कोचवान हरिया के घर गया .

"कैसी हो भाभी " मैंने पूछा

भाभी- बस जी रहे है कुंवर

मैं- जीना तो है ही भाभी, अपने लिए न सही इन बच्चो के पालन के लिए हरिया की कमी तो जिन्दगी भर रहेगी उसकी जगह तो कोई भर नहीं सकता पर जीवन में आगे बढ़ना भी जरुरी है

भाभी- बात तो सही है पर मेरे लिए मुश्किल हो रहा है तीन बच्चो और बूढ़े सास-ससुर को संभालना , पहले बालको का बापू कमा कर लाता था तो घर चलता था .

मैं- तुम्हे किसी भी चीज से परेशां होने की जरुरत नहीं है भाभी . ये तो मेरी कमी हुई जो तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाया . घर में ये हालात है और तुम एक बार भी मुझसे कह नहीं पाई. ये तो गलत है न भाभी,

भाभी- किस मुह से कहे कुंवर. हाथ फ़ैलाने के लिए भी कलेजा लगता है

मैं- ये कह कर तुमने मुझे बहुत छोटा कर दिया भाभी

मैंने जेब से पैसे निकाले और भाभी के हाथ में रख दिए.

भाभी- मैं कहाँ से चूका पाऊँगी

मैं- कोई जरूरत नहीं है भाभी और तुम्हे काम भी मिल जायेगा तुम हमारे खेतो पर काम करो . अपनी मेहनत से पैसा कमाओ .

भाभी ने मेरे आगे हाथ जोड़ दिए.

मैं- शर्मिंदा मत करो

वापसी में मैंने बनिए से कह दिया की हरिया कोचवान के घर छ महीने का राशन तुरंत पहुंचा दे. घर आकार मैंने खाना खाया और बिस्तर पकड़ लिया पर आँखों में दूर दूर तक नींद नहीं थी . कभी इधर करवट कभी उधर करवट दिल में बस एक ही सवाल था .

"क्या परेशानी है नींद नहीं आ रही जो " चाची ने कहा

मैं- चाची क्या भैया किसी लड़की से प्रेम करते थे . ................

 
#68

मैं- क्या भैया किसी लड़की से प्रेम करते थे .

चाची- जहाँ तक मैं अभिमानु को जानती हूँ नहीं , छोटी उम्र से ही वो व्यापार संभाल रहा है. उसे किताबो का शौक रहा है . सबसे आदर से बोलना सबका ख्याल रखना परिवार को हमेशा से पहली प्राथमिकता रखना बस यही जिन्दगी है उसकी.

मैं- जहाँ तक मुझे याद है मैंने भैया को कभी पढ़ते नहीं देखा

चाची- तूने उसे देखा ही कहाँ है

बात तो सही थी चाची की मोजुदा हालातो को देखतेहुए मैं समझ सकता था इस बात की गहराई को .

मैं- कितनी बार भैया के कमरे में गया हूँ मैंने वहां भी किताबो का ढेर नहीं देखा.

चाची- क्योंकि तू उस अभिमानु को जानता है जिसे तू आज देखता है . मैं उस अभिमानु की बात कर रही हूँ जिसे मैंने कल देखा था .

मैं- उसी अभिमानु को जानना चाहता हूँ मैं

चाची- उसने किसी से प्यार किया होगा ये मैं नहीं जानती पर अब इन बातो का कोई मतलब नहीं है कबीर, हमेशा ये याद रखना अब उसकी ग्रहस्थी ही उसका सबकुछ हो. मैं जानती हूँ आजकल तू किसी खुराफात में है पर इतना याद रहे तेरी वजह से किसी का घर न उजड़े.

मैं- और जो तेरा घर उजड़ा पड़ा है उसका क्या . चाचा के बिना तू कैसे जी रही है कोई नहीं समझता सिवाय तेरे खुद के. आदमी मर जाये तो औरत समझ जाती है , जीवन से समझौता कर लेती है पर चाचा ऐसे गया की लौटा नहीं . आज तक तू नहीं जानती वो कहाँ है जिन्दा है भी या नहीं . तेरी गृहस्थी का क्या . इसका कोई जवाब क्यों नहीं मिलता.

चाची ने एक गहरी साँस ली और बोली- तू समझता है न मेरा दुःख तो तू ले आ उसकी कोई खबर . राय साहब और अभिमानु ने दिन रात एक कर दिया था तेरे चाचा की तलाश में पर किस्मत में लिखे को नहीं टाल पाए. मेरे नसीब में जुदाई लिखी है तो ये ही सही .

मैं- कोरी बाते है ये .राय साहब की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता इस इलाके में और पिछले कुछ सालो से उनका भाई गायब है . क्या तुझे कभी हैरानी नहीं हुई इस बात की. मान ले कोई दुश्मन ने कुछ उल्टा-सीधा कर दिया चाचा के साथ तो भी क्या मेरे बाप को मालूम नहीं हुआ होगा. सोच कर देख, लाली और उसके प्रेमी को तलाशने में कितना ही वक्त लगा था फिर चाचा को क्यों नहीं तलाश कर पाया वो इन्सान.

चाची- तू मुझे जेठ जी के खिलाफ भड़का रहा है

मैं- मैं तुझे आइना दिखा रहा हूँ. इस घर की खामोश दीवारे चीखना चाहती है तू मेरी मदद कर जरा

चाची-रसोई की बगल में जो पेंटिंग लगी है उसके पीछे दरवाजा है . उस कमरे में देख ले तुझे कुछ मिले तो .

मैं- इस घर में ऐसा भी कोई कमरा है मुझे आज तक नहीं पता .

चाची- अभिमानु का कमरा था वो किसी ज़माने में .

मैंने चाची के होंठो को चूम लिया और लालटेन लेकर उस तरफ चल दिया. हमेशा की तरह दरवाजा खुला पड़ा था . सारा घर सन्नाटे में डूबा था . मैंने उस बड़ी सी पेंटिंग को हटाया . दरवाजा मेरे सामने था . कोई ताला नहीं लगा था सिवाय एक कुण्डी के जो जंग खाई थी . देखने से ही मालूम होता था की बरसों से इसे छुआ नहीं गया. चुर्र्रर्र्र की आवाज करते हुए दरवाजा खुला और मैं अन्दर गया. कमरे की हालत ठीक नहीं थी . चारो तरफ जाले लगे थे . सीलन थी मैंने मुह पर कपडा बाँधा और थोड़े जाले हटाये. सामने एक बड़ी सी मेज थी . कुछ कुर्सिया थी .

लालटेन की लौ थोड़ी और ऊंची की . कमरे में शेल्फ ही शेल्फ थी जिनमे किताबे सलीके से लगाई गयी थी. मैंने धुल साफ़ की . तरह तरह की किताबे थी.टेबल पर कोरे कागज पड़े थे.

"अभिमानु ठाकुर , क्या छिपाया है तुमने अपने अतीत में " मैंने कहा .

कोने में एक अलमारी थी मैंने उसे खोला , जिसमे कुछ कागज रखे थे. मैंने उन्हें देखा , वो कागज नहीं थे वो खत थे.

"हो सकता है के बहार आये पर सरसों पीली न हो .

हो सकता है की बारिश आये पर धरती गीली न हो

पर ये नहीं हो सकता मेरी जान की तेरी याद आये और ये आँखे गीली न हो " मन ही मन मैंने शायरी की दाद दी.

कागज पर धुल थी वक्त की मार ने उसे पुराना कर दिया था पर उस पर लिखे शब्द आज भी उतने ही कारगर थे जितना किसी ज़माने में रहे होंगे. कुछ और पन्ने थे जिन पर बस शायरिया ही लिखी थी . किस तरह के खत थे ये जिनमे केवल शायरियो के माध्यम से ही बाते हो रही थी. मेरा भाई गजब था ये मैंने उस रात जाना था.

तमाम बाते ये तो पुख्ता कर रही थी की भैया की जिदंगी में कोई लड़की थी , पर क्या वो रुडा की बेटी थी अब ये मालूम करने की बात थी. लड़की थी तो कोई तस्वीर भी रही होगी उसकी जरुर. मैंने सब कुछ देख मारा हर एक किताब का पन्ना पलटा की कही उनमे तो कुछ नहीं छिपाया गया. पर हाथ कुछ नहीं लगा. सुबह होने में थोड़ी ही देर थी और भाभी जल्दी जाग जाती थी मैंने कमरे से निकलने का सोचा दरवाजे के पास पहुंचा ही था की जालो में कैद मुझे कुछ दिखा इस हिस्से पर . मैंने कपडे से उसे साफ़ किया देखा की ये एक तस्वीर थी . ....

खेतो पर पहुंचा तो पाया की हरिया कोचवान की बीवी सरला पहले ही वहां आ चुकी थी . मैंने मंगू से कहा की अब से ये हमारे साथ ही काम करेगी उसे काम समझा दे और हर शाम उसे बिना किसी देरी के मजदूरी का भुगतान करे. कुवे की मुंडेर पर बैठे बैठे मैं बस उस तस्वीर के बारे में ही सोचता रहा . आखिर क्या खास बात थी उस तस्वीर में जो उसे दिवार पर जगह दी गयी थी .

चूँकि आज घर से खाना आया नहीं तो मैंने मंगू को घर भेज दिया खाना लाने के लिए और सरला को अपने पास बुलाया .

मैं- भाभी , मैं तुमसे दो चार बात पूछ सकता हूँ क्या

सरला- जी कुंवर जी

मैं- तुम गाँव में सबको जानती होगी

उसने हाँ में सर हिलाया

मैं- क्या तुम किसी रमा को जानती हो जो कुछ साल पहले अपने गाँव में रहती थी .

सरला- जानती हूँ

मैं- वो गाँव क्यों छोड़ गयी

सरला- उसके पति की मौत हो गयी थी .कोई सहारा नहीं था एक दिन मालूम हुआ की वो गाँव छोड़ गयी.

मैं- खेती करके वो अपना पेट पाल सकती थी फिर ऐसा क्या हुआ जो उसे गाँव छोड़ना पड़ा.

सरला- मैं नहीं जानती कुवर.

मैं- क्या मैं तुम पर पूर्ण विश्वास कर सकता हूँ

सरला- तुमने ऐसे समय पर मुझे और मेरे परिवार को थामा है जब हम टूट चुके थे. तुम्हारा अहसान है मुझ पर मैं हमेशा वैसा ही करुँगी जो तुम कहोगे.

मैं- बढ़िया .

हम बात कर ही रहे थे की तभी मैंने मंगू और भाभी को आते देखा . मंगू के जल्दी आने का मतलब ये ही था की भाभी उसे रस्ते में मिल गए. भाभी ने एक नजर सरला पर डाली और बोली- ये यहाँ क्या कर रही है

मैंने भाभी को बताया की इसे काम पर रखा है .

भाभी ने हम सबको खाना परोसा . खाने के बाद मैंने भाभी से साथ आने को कहा और हम टहलने चल दिए.

भाभी- क्या बात है

मैं- क्या आपके और भैया के बीच सब ठीक चल रहा है

भाभी चलते चलते रुक गयी और बोली- तुम्हे क्या लगता है

मैं- आप बताओ न

भाभी- सब ठीक है

मैं- क्या वो आपसे प्रेम करते है

भाभी- बेशुमार मोहब्बत , इतनी की कोई सोच न सके.

मैं- क्या आप जानती है की भैया ब्याह से पहले किसी लड़की के प्यार करते थे .

भाभी- जानती हूँ . बिलकुल जानती हूँ

मैं- ये जानते हुए भी आपको कोई शिकायत नहीं

भाभी- मुझे भला क्यों शिकायत होगी. अभिमानु जैसे पति किस्मत वाली को ही मिलते है .

मैं- हो सकता है की वो आज भी उसी को चाहते हो .

भाभी- वो आज भी उसी को चाहते है देवर जी.

भाभी की आंखो की चमक ने मेरे विश्वास को कमजोर कर दिया. क्या औरत है ये अपने पति की बुराई को भी हंस कर स्वीकार कर रही है .

मैं- फिर भी तुम उनके साथ हो क्यों...............
 
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