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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#70

रात को मेरी आँख खुली तो देखा की निशा का सियार मुझसे लिपटा हुआ था

"तू कब आया " मैंने उसे थपथपाते हुए कहा . उसने अपने पंजे मेरे सीने पर रखे और मेरी गर्दन चाटने लगा.

मैं- निशा है क्या वहां

उसने फिर से अपनी जीभ से गर्दन को चाटा.

मैं- चले क्या फिर.

वो चारपाई से कूदा और आगे चलने लगा.

मैं- दो मिनट रुक . मैं कमरे में गया और कम्बल ओढ़ लिया कमरा बंद करने के बाद मैं उसके साथ साथ खंडहर की तरफ चल पड़ा. ठिठोली करते हुए हम खंडहर पर पहुँच गए. मैंने देखा सब कुछ अँधेरे में डूबा हुआ था .

"बड़ी देर की सरकार आने में " ये निशा की आवाज थी .

मैं- कहाँ है तू जाना

निशा- तेरे पास ही तो हूँ

अचानक से वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी.

मैं- इतना अँधेरा क्यों आज

निशा- अँधेरा ही भाग है मेरा .

उसने मेरा हाथ पकड़ा और हम अन्दर एक दिवार के पास जाकर बैठ गए.

निशा- बड़ी याद आ रही थी तेरी.

मैं- तो आ जाती

निशा- तुझे बुला तो लिया

मैं- अगर तू कहे तो मैं यही रह जाऊ तेरे पास मेरी जान. मैं एक बार फिर कहता हूँ इस ठिकाने को हम अपना छोटा सा आशियाना बना लेंगे.

निशा-मुमकिन होता तेरा होना तो फिर ये खंडहर ही क्या मैं तेरे घर न रह जाती.

मैं- तू जहाँ है वो ही मेरा घर है. वैसे मेरी छोटी सी इच्छा है कभी किसी रात तेरे हाथ की रोटी खानी है .

निशा- माँगा भी तो क्या माँगा रे सनम तूने

मैं- रहने दे तू, इतना ही देने वाली है तो फिर अपना दिल क्यों नहीं दे देती मुझे.

निशा ने मेरा हाथ अपने सीने पर रखा और बोली- पूछ इन धडकनों से ये देंगी जवाब तुझे.

मैं- फिर तेरे होंठो क्यों लरजते है ये कबूल करने में

निशा- क्योंकि मैं तेरी नहीं हो सकती

मैं- झूठी है तू , तू भी जानती है तू मेरी हो चुकी. बस चंपा का ब्याह हो जाये फिर तेरी एक नहीं सुनने वाला. जब तक भी रहे ये डाकन मेरी ही रहेगी.

निशा- क्या बताया चंपा ने तुझे

मैं- बोली उसकी मर्जी आयेगी वो करेगी

निशा- सही तो कहती है वो. तू ध्यान मत दे उसपे

मैं- भाभी ने बताया की उसका और भैया का प्यार भी इसी जंगल में जवान हुआ था .

निशा- कितनी ही कहानिया छिपी है यहाँ

मैं- पर भाभी कहती है की तुझसे ब्याह नहीं होने देगी मेरा

निशा- सही तो कहती है वो.

मैं- क्या सही कहती है

निशा- वो जानती है उस हद को जो तेरे मेरे बिच की दिवार है

मैं- ऐसी कोई दिवार नहीं जिस को मोहब्बत तोड़ न सके.

निशा- छोड़ इन बातो को . तुझे कुछ ऐसा दिखाती हूँ जो अनोखा है

मैं-इस अँधेरी रात में तुझसे अनोखा भला क्या है

निशा- आ तो सही .

निशा के पीछे पीछे मैं पानी के तालाब तक आ गया .

निशा- झेल लेगा न बर्फीले पानी की ठण्ड को

मैं- तू साथ है तो झेल ही लेंगे.

निशा- आजा फिर.

आहिस्ता से निशा पानी में उतर गयी और तालाब के बीचो बीच पहुँच गयी . मैंने पानी में पैर डाला और अन्दर तक जम गया मैं .

निशा- खुद को इसके हवाले कर दे बस

मैंने निशा का कहा माना पर दिसम्बर की ठिठुरती रात में जमे हुए पानी में जाना कोई ज्यादा बढ़िया हरकत नहीं थी . पर मुझे विश्वास था उस पर. निशा ने गोता लगाया निचे की तरफ मैंने उसका अनुसरण किया. जैसे जैसे निचे जाते गए मेरे फेफड़ो पर दबाव बढ़ता गया . धड़कने जमने लगी . और जब लगा की अब बस की बात नहीं रही , निशा ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे कुछ देखने को कहा. अँधेरी रात की गहराई में मैंने कुछ चमकता सा देखा और जब निशा मुझे उसके और पास ले गयी तो जैसे मेरा सब कुछ जम गया. इस तालाब की तलहटी में वो चीज पड़ी थी जिसका किसी को भी भान हो जाता तो गजब हो जाता.

तालाब की तलहटी में सोना पड़ा था . इतना सोना की कोई सोच भी नहीं सकता. निशा ने कुछ मेरे हाथ में थमा दिया और मुझे ऊपर खेंचने लगी. फेफड़ो को ताजा हवा मिली तो करार आया. बदन को ठण्ड का अहसास जैसे मर ही गया था तालाब के बीचो बीच मैं अपने हाथ में लिए उस ईंट को देख रहा था जो खालिस सोने की बनी थी . निशा तालाब की मुंडेर पर बैठ गयी मैं तैरते हुए उसके पास गया . बदन बुरी तरह से कांप रहा था समझ नहीं आया की वो ठण्ड से कांप रहा था या फिर सोने के ढेर की वजह से.

वापिस आते ही मैंने कम्बल ओढ़ लिया और बैठ गया.

निशा- मेरी तरफ से तोहफा है तेरे लिए.

मैने उसे अपने कम्बल में लिया और बोला- नियति ने तुझसे मिलवाया तुझे मेरी जिन्दगी में भेजा सबसे बड़ा तोहफा तू है मेरे लिए. तेरे बाद मुझे कोई चाह नहीं . मेरी आजमाइश मत कर मेरी जाना, मेरी आजमाइश उस दिन होगी जब तेरा हाथ थामुंगा तुझे दुल्हन बनाने के लिए. ये जो भी है उसे वहीँ रहने दे . मेरा कोई हक़ नहीं इस पर.

निशा- ये मैं दे रही हूँ तुझे

मैंने उसे अपने आगोश में लिया और उसके गालो को चूमते हुए बोला- कहा न तुझसे इस मोह की जरुरत नहीं मुझे

मैंने उसे अपनी बाँहों में जकड लिया और आँखे बंद कर ली.

निशा- डरती हूँ कहीं टूट कर बिखर न जाऊ मैं

मैं- तुझे थामने के लिए हु मैं

निशा- इसलिए तो बिखरना नहीं चाहती मैं

मैं- मेरा हक़ है तुझ पर

निशा- मानती हूँ

मैं- तू एक बार फिर भाभी से मिल ले . क्या पता वो समझ जाए

निशा- उसकी जरुरत नहीं कबीर. तेरी जिद अगर यूँ ही रही तो किसी दिन वो जरुर आएगी.

मैं- पर मेरे प्यार को क्यों नहीं समझती वो

निशा- समझती है इसलिए ही नहीं मानती वो .

ये भीगी हुई रात हमारे जलते जज्बातों की गवाह थी रात के तीसरे पहर में उसे वहीँ छोड़ कर मैं वापिस कुवे पर आ गया . सुबह आँख खुली तो दिन चढ़ आया था सबसे पहले मेरी नजर सरला पर पड़ी जो खेतो पर थी .

मैं- मंगू नहीं आया क्या भाभी

सरला- अभिमानु जी के साथ कहीं गया है वो .

मैं- भैया आये थे क्या यहाँ

सरला- जी

मैं- मुझे क्यों नहीं जगाया

सरला- उन्होंने कहा की सोने दो कुवर को .

मैं- भाभी, थोड़ी चाय बना दो जरा

मैं जंगल की तरफ चला गया . कुछ देर बाद आया तो चाय की महक से सब महक रहा था .

मैंने उसे भी पीने को कहा और उस से बाते शुरू की .

मैं- भाभी मुझे रमा के बारे में जानना है सब कुछ जानना है .

सरला- रमा शुरू से ही गाँव के बाहर की तरफ रहती थी कुंवर . उसका कम ही आना जाना था गाँव में . काम भी होता तो बस बनिए की दूकान तक पर उसकी एक सहेली थी जिसके साथ वो बहुत समय बिताती थी .

मैं- कौन भाभी

सरला - कविता .

कविता रमा की सहेली थी ये सुनते ही मेरा दिमाग घूम गया .

सरला- रोहताश और रमा का पति दोनों हम उम्र थे साथ ही खेती करते थे खूब आना जाना था दोनों का फिर एक रात अचानक से रमा का आदमी मर गया उसके बाद रोहताश का आना जाना कम हो गया . रमा कुछ महीनो बाद मलिकपुर में बस गयी. बस इतना ही जानती हूँ .

मैं- रमा का पुराना घर कहा है भाभी

सरला- जोहड़ के पीछे जो पेड़ है उनको पार करते ही जो बंजर पड़ी है न वो उसकी ही जमीन थी . वहीँ पर उसका घर था .

मैं- कुछ तो जरुर था वर्ना अपनी जमीन छोड़ कर कोई कैसे जायेगा दूसरी जगह .

सरला- मैं नहीं जानती .

मैं- जो भी बाते हमारे बीच हुई है भाभी, किसी को भी मालूम न हो .

सरला ने हाँ में सर हिलाया . वो चाय का कप उठाने को झुकी तो उसका आंचल सरक गया . मेरी नजर उसकी भारी छातियो पर पड़ी.

"ठाकुरों को विरासत में मिली है अयाशी " एक बार फिर ये शब्द मेरे कानो में गूंजने लगे. मैंने रमा के पुराने घर जाने का सोचा.
 
#

भाभी- मैं अभिमानु के साथ नहीं रहूंगी तो फिर कौन रहेगा भला

मैं- कुछ समझा नहीं मैं

भाभी- क्योंकि मैं ही थी वो लड़की जिससे अभिमानु ने प्यार किया है .

भाभी की बात सुन कर मेरा मुह खुला का खुला ही रह गया. खेतो की पगडण्डी पर बैठ गयी भाभी और मुझे भी अपने साथ बिठा लिया .

भाभी- इस जंगल में तुम अकेले नहीं हो जो प्रेम कर रहे है तुमसे पहले भी कोई और है जो यहाँ प्यार कर चुके है . ये हवाए ये फिजाये ये घटाए . ये सर्द मौसम, वो गर्मियों की लू, वो बारिशो की रिमझिम हमने भी यही कहीं देखि थी प्यारे.

मैं- मैं नहीं मानता ये कैसे मुमकिन है .

भाभी- अच्छा जी. मुमकिन तो एक डाकन का दामन थामना भी नहीं है पर फिर भी तुम्हे उसकी लगन लगी है न.

मैं- कैसे. मेरा मतलब आप और भैया कैसे मिले .

भाभी- कहने को तो लम्बी कहानी है .

मैं- फिर भी मैं सुनना चाहता हूँ

एक पल को भाभी अतीत में खो सी गयी और अतीत यक़ीनन गजब रहा होगा क्योंकि भाभी के गाल थोड़े और गुलाबी हो गए थे.

भाभी- मुझे लगा था की तुम्हे मालूम हो जायेगा. खैर, ये उन दिनों की बात है जब हमारे दिल धडकने को बेताब थे और आशिकी के लिए आसमान था . तुम जानना चाहते हो न की वो क्या कारण था जिसके लिए मलिकपुर बार बार जाते थे अभिमानु, कुवर , वो कारण मैं थी . अभिमानु कभी नहीं चाहते की उनका अतीत कुरेदा जाये पर तुम्हारी रगों में भी वो ही जोश दौड़ रहा है .

मैं- आपका क्या रिश्ता है मलिकपुर से .

भाभी- चौधरी रुडा मेरा फूफा है .

मैंने अपना माथा पीट लिया . दिल किया की सर को दे मारू किसी दिवार पर .

मैं- मैं कैसे नहीं जानता इस बात को

भाभी- आ रही हूँ मुद्दे पर . तो कहानी शुरू होती है मलिकपुर के सरकारी स्कूल से. मैं अपनी बुआ के घर पर रहकर पढ़ती थी . अभिमानु भी पढने के लिए मलिकपुर आते थे .कभी बाजार में तो कभी रहो में हमारी मुलाकाते होने लगी. चढ़ती जवानी और जज्बातों का दौर था वो . न जाने किस घडी हम एक दुसरे को दिल बैठे. दिल मिले तो मुलाकातों के सिलसिले शुरू हुए. इसी जंगल में हम मिलने लगे. कभी मुलाकाते होती कभी खत लिखते.

पर इश्क ऐसा मर्ज था जो छुपाने से छुप नहीं पाता. फूफा और राय साहब में न जाने कब से बैर चला आ रहा था. अभिमानु समझते थे इस बात को हम घंटो सपने संजोते अपने सुनहरे भविष्य के . चर्चे होने लगे थे हमारे प्यार के और होते क्यों नहीं हम महक रहे थे प्यार हद से ज्यादा परवान चढ़ चूका था . अभिमानु मुझे मांजी से मिलवाना चाहते थे पर उनका ये अरमान दिल में ही रह गया. अचानक से हुए ह्रदयघात से मांजी चल बसी. अभिमानु टूट ही तो गए थे. घंटो वो बैठे रहते मेरे काँधे पर सर रख कर पर कहते कुछ नहीं.

मैं बस तड़प कर रह जाती थी .दूसरी तरफ फूफा को मालूम हो गया था तो मेरे लिए अलग ही मुसीबत शुरू हो गयी. ठाकुरों की लडकियों को आजादी नहीं होती दहलीज पार करने की और मैं तो आसमान में उड़ रही थी . बुआ बहुत नाराज थी वो भरोसे पर लायी थी मुझे जो मैंने तोड़ दिया था . पर इस से पहले की बात बिगडती , राय साहब मेरे घर पहुँच गए रिश्ता लेकर. कौन भला राय साहब का रिश्तेदार नहीं बनना चाहेगा मेरे पिता ने एक मिनट भी नहीं लगाई हाँ कहने में . जब फूफा को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने मेरे माँ-बापू से रिश्ता तोड़ लिया .इस तरह मैं अभिमानु की दुल्हन बन कर इस घर में आ गयी .

मैं- जो औरत खुद के प्रेम के लिए दुनिया से लड़ गयी वो मेरी मोहब्बत का समर्थन नहीं कर रही अजीब है न

भाभी- तुम इस दुनिया में किसी भी लड़की पर हाथ रखो मैं उसे दुल्हन बना कर ले आउंगी . पर जिस आग से तुम खेल रहे हो उसमे तुम्हे झुलसना नहीं जलना है .

मैं- इश्क किया है कोई चोरी नहीं की. और फिर तुम्हारी ही परवरिश हूँ मैं . जब तुमने अपने इश्क को पा लिया तो सोचो मैं किस हद से गुजर जाऊंगा.

भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- ये ही तो नहीं चाहती मैं. वो कभी नहीं हो पायेगी तुम्हारी. डाकन और तुम्हारा कोई मेल नहीं कबीर. हो सकता है की किसी घडी में तुम करीब आ गए. पर शायद वो भी जानती होगी की एक दिवार है तुम्हारे बीच जो हमेशा रहेगी.

मैं- मुझे बस उसकी हाँ का इंतज़ार है भाभी. जिस दिन वो कहेगी की वो मोहब्बत करती है मुझसे मैं ब्याह लाऊंगा उसे.

भाभी कुछ नहीं बोली उसने बस मेरे सर पर हाथ रख कर सहलाया और बोली- देर हो गयी चलना चाहिए अब.

मेरे मन में अजब उथल-पुथल मचा दी भाभी ने, जो औरत अपने प्यार के लिए ज़माने के आगे खड़ी हो गयी वो मेरी मोहब्बत को समझ नहीं पा रही थी ये बात गले से नहीं उतर रही थी. आज भाभी ने जो बताया उस से ये भी साबित होता था की मेरा बाप अपनी औलाद के लिए कुछ भी कर सकता था . जब उसे मालूम हुआ तो उसने बिना देर किये भैया के लिए भाभी का हाथ मांग लिया था.

तो अब ऐसा क्या हुआ था की वो चंपा को ही चोदने लगा था . बाप का चरित्र समझ नहीं आ रहा था और उलझ गए थे ख्यालात मेरे.

सबके जाने के बाद मैंने चारपाई बाहर बिछाई और लेट गया. ठण्ड बढ़ने लगी थी पर मैं अपने ख्यालो में खोया था .रमा के अनुसार भैया ने अचानक ही मलिकपुर जाना छोड़ दिया था उसका कारण यही रहा होगा की जिसके लिए जाते थे वो अब उनके पास थी .पर सूरजभान का सिस्टम समझ से बाहर था . हो सकता था की सूरजभान भाभी और भैया को मिलने में मदद करता हो जिसके लिए भैया उसे मानते थे. अब इसी सवाल की तलाश थी मुझे.

 
#71


रमा पर शक करने का मेरे पास ठोस कारण था . कुछ ही मुलाकातों में मैंने उसे इतना तो समझा था की उसे पैसो को कोई भूख नहीं थी फिर वो मेरे नोटो की खातिर मेरी मदद क्यों कर रही थी . उसका सिर्फ ये कहना की वो सूरजभान का अंत चाहती थी एक हद तक ठीक थी पर जो सवाल मेरे मन में खटक रहा था वो ये था की उसे गाँव क्यों छोड़ना पड़ा.

सरला के अनुसार उसकी एकमात्र सहेली कविता थी .वो कविता जिसके अवैध सम्बन्ध राय साहब से थे. तो क्या रमा को भी राय साहब की वजह से ही गाँव छोड़ना पड़ा. इस ख्याल में दम था क्योंकि किसकी इतनी मजाल जो उनके आगे सर उठा सके. पर क्या रमा को भी चोदा था मेरे बाप ने .

सोचने को बहुत कुछ था पर साबित करने को कुछ नहीं था . मुझे वैध मिल गया तो मैं थोड़ी देर उसके पास रुक गया .

मैं- कैसे है आप

वैध- बस जी रहा हूँ कुवर.

मैं- कोई परेशानी हो तो मुझसे कह सकते है

वैध- नहीं कुवर , कोई परेशानी नहीं बस ये खाली घर काटने को दौड़ता है .

मैं- रोहताश को सुचना भिजवा दीजिये . और फिर ऐसी कमाई का क्या ही फायदा जिसके लिए अपनों से दूर रहना पड़े.

वैध- पहले तो वो यही खेती करता था बेटा . वो तो राय साहब का भला हो जिन्होंने उसे सहर में काम दिलवा कर उसकी जिन्दगी संवार दी.

तो रोहताश को शहर में नौकरी पिताजी की देंन थी . उसे गाँव से दूर शायद इसलिए ही भेजा गया हो ताकि पिताजी कविता के करीब रह सके.

मैं- आपको कोई भी जरुरत हो तो बेहिचक मुझसे कहना

उसके बाद मैं जोहड़ की तरफ चल दिया. पहले तो इस जोहड़ पर बहुत चहल पहल रहती थी . पशु क्या आदमी क्या सब यही पानी पीते. कपडे धोते पर जब से गाँव में नयी टंकी बनी थी इधर से मोह टूट गया था लोगो का. अब तो कोई सुध भी नहीं लेता था इसकी. जोहड़ किनारे की झाड़ियो को पार करते हुए मैं पेड़ो के पास से होते हुए उस तरफ चले जा रहा था जो सरला ने मुझे बताया था . कंटीली झाड़ियो से होते हुए मैं बंजर जमीन पर जा पहुंचा चलते चलते मैं थकने लगा था .

झुरमुट में काफी आगे जाने पर मुझे बेहद खस्ताहाल दीवारे दिखी. जगह जगह से चुना झड़ रहा था. दरवाजे के नाम पर लकड़ी झूल रही थी . दो कमरे थे . किसी दौर में किसी के अरमानो का घर रहा होगा ये पर आज वक्त से जूझ रहा था . अन्दर मिटटी का फर्श था . कड़ीयो की छत थी कुछ कडिया सील कर फूल गयी थी .सामान के नाम पर एक पलंग पड़ा था . आलो में बर्तन थे जो अब किसी काम के नहीं थे. दुसरे कमरे में भी एक चारपाई पड़ी थी धुल से सनी हुईउसके निचे एक संदूक पड़ा था जिस पर ताला था.

पत्थर का सिर्फ एक वार झेल पाया वो ताला मैंने संदूक खोली . कुछ कपडे थे . उनके निचे रंग बिरंगी कच्छी का ढेर . पर जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया वो थी वो किताबे जिन पर आदमी और औरतो की नंगी तस्वीरे थी. चुदाई की तस्वीरे . रमा के घर में ये होना मुझे बता रहा था की कविता की चुदाई वाली बात में रमा भी पूरी पूरी हिस्सेदार थी .

उस दिन सूरजभान और भैया भी मुझे जीप से इसी तरफ आते दिखे थे हो सकता है की रमा के इस खाली घर को वो चुदाई के लिए इस्तेमाल करते हो क्योंकि इस तरफ कोई आताजाता ही नहीं था. मेरे तर्क को सिर्फ एक चीज ख़ारिज कर रही थी वो थी कमरों में लगी बेशुमार धुल और जाले यदि कोई चुदाई के लिए आता होगा तो थोड़ी सफाई जरुर मिलती या फिर धुल में निशान पर ऐसा कुछ नहीं था .

कुछ सोच कर मैंने वो कच्छी और वो किताबे अपने पास ही रख ली. रात को एक बार फिर मैं उस तस्वीर को घूर रहा था. कहने को उस तस्वीर में कुछ नहीं था पर उस कमरे में सिर्फ उसका मोजूद होना ये बताने को काफी था की ये बहुत करीब रही होगी अभिमानु ठाकुर के दिल के.

वो चुदाई की तस्वीरों वाली किताबे इस गाँव में क्या आस पास भी किसी के पास नहीं हो सकती थी. क्योंकि ऐसी चीजे बड़े शहरो में ही मिल सकती थी

"तो क्या कविता के साथ साथ रमा को भी राय साहब चोदते थे " मेरे मन में ये ख्याल इसलिए आया क्योंकि राय साब अक्सर शहर जाते थे . पर अगर रमा चुदती थी तो चुदती रहती राय साहब उसे कोई कमी तो रहने नहीं देते होंगे फिर गाँव क्यों छोड़ा उसने. कल सुबह मुझे दो लोगो से मिलना था एक तो रमा से और दूसरा रुडा की बेटी से.

सुबह कुछ समय खेतो पर बिताने के बाद मैं रमा के ठिकाने पर पहुँच गया .

"तुम इस वक्त " उसने कहा

मैं-कुछ काम से आया था सोचा तुमसे मिलता चलू

रमा- सही वक्त पर आये हो मैं खाना खाने जा ही रही थी . तुम भी आ जाओ

खाना खाते हुए मेरी नजर उसके जिस्म पर थी इतनी अड़तीस चालीस की होने के बाद भी कटीली औरत थी रमा.

मैं- मुझे मालूम हुआ कविता तुम्हारी बहुत अच्छी दोस्त थी .

रमा- कोई न कोई किसी न किसी का दोस्त होता ही है .

मैं- रमा मैं सीधी बात करूँगा. मैं जानता हु की तुम मेरा साथ सिर्फ पैसो के लिए नहीं दे रही .

रमा- जब जानते हो तो क्यों पूछ रहे हो .

मैं- मैं वो वजह जानना चाहता हूँ जिसके कारण तुझे अपना घर छोड़ कर मलिकपुर में बसना पड़ा.

मैंने वो कच्छी और किताबे रमा के सामने रख दी. रमा ने अपनी थाली सरकाई और उठ कर खड़ी हो गयी.

मैं- मैं ये तो नहीं जानता की तेरे साथ क्या हुआ था पर तू मुझे बताएगी तो मैं तेरी मदद जरुर करूँगा.

रमा- तुम चले जाओ यहाँ से कुंवर और फिर कभी मत लौटना

मैं- तू क्या समझती है मैं मालूम नहीं कर लूँगा. क्योंकि तेरी कहानी से मेरी कहानी भी जुडी है कहीं न कही. माना की मंजिल दूर है पर मेरा साथ दे इस सफ़र को पार कर ही लेंगे हम

रमा- कुछ नहीं कर पाओगे तुम कुछ नहीं .

मैं- जब तक तू मुझे नहीं बताएगी मैं कैसे समझ पाउँगा इस सब को

रमा- ठीक है मेरा साथ देना है तो जाओ और अभिमानु ठाकुर से पूछो की क्यों रमा को बर्बाद होना पड़ा.

 
#72

मैं- उस से भी पूछूँगा पर अभी मैं तुमसे जानना चाहता हूँ. मैं कविता और तुम्हारे किस्से सुनना चाहता हूँ .और मेरा विश्वास कर , मैं तुझे जुबान देता हूँ ये ठाकुर कबीर का वादा है तुझसे . तेरे गुनेहगार को सजा जरुर मिलेगी.

रमा- जुबान की कीमत जानते हो न कुंवर

मैं- तू चाहे तो आजमा ले मुझे , मैं जानता हूँ की तेरा दिल कहीं न कहीं विश्वास करता है मुझ पर

रमा- मेरी बेटी की लाश ठाकुर अभिमानु लाया था .जिस्म नोच लिया गया था मेरी बेटी का . सब कुछ तार तार था. अभिमानु ने उसकी लाश रखी कुछ गद्दिया फेंक गया और हम रह गए रोते-बिलखते . बहुत मिन्नते की हमने पंचायत में गए पर किसी ने नहीं सुनी. कोई सुनता भी कैसे मेरी ठाकुर अभिमानु के सामने कौन जुबान खोलता अपनी.

मैं- राय साब भी तो थे. उन्होंने इन्साफ नहीं किया

रमा- वो बस इतना बोले जो हुआ उसे भूल जाओ और नयी शुरुआत करो जीवन की. थोड़े दिन पहले ही मेरा पति खेत में मरा हुआ पाया गया था . मैंने किस्मत का लिखा समझ पर समझौता कर लिया था पर अपने कलेजे के एक मात्र टुकड़े को ऐसे छीन लिया गया मैं तडप कर रह गयी . क्या करती मैं वहां पर , इसलिए यहाँ आकर बस गयी .

मैं- तू फिर कभी मिली भैया से

रमा-बहुत बार, पैर भी पकडे उस निर्दयी के जानना चाह की क्या किया था मेरी बेटी के साथ . क्यों किया पर वो पत्थर बना रहा .

मैं- ये तो थी तेरी वजह नफरत करने की . प्यार करने की और बता तुम दोनों भैया या फिर पिताजी किस से चुद रही थी .

मेरी बात सुन कर रमा के चेहरे पर अजीब सा भाव आया . उसने पानी के कुछ घूँट भरे और बोली- दोनों में से किसी से भी नहीं.

मेरा तो दिमाग ही घूम गया .

मैं- ऐसा कैसे हो सकता है . मेरे पास सबूत है की कविता पिताजी का बिस्तर गर्म कर रही थी . और फिर ये किताबे ये महंगे अंतर्वस्त्र उन दोनों में से कोई और नहीं लाया तो फिर कौन लाया.

रमा- कविता और मैं एक सी थी. जवानी और जोश से भरपूर . इस गाँव में हमारे जैसा हुस्न किसी का नहीं था . हमें भी मजा आता था जब लोग आहे भरते थे हमें देख कर. और यही मजे हम पर भारी पड़ गए. ऐसे ही एक दिन जोहड़ पर हमें नहाते हुए ठाकुर जरनैल ने देख लिया. ठाकुर सहाब के बारे में हमने बहुत सुना था की वो बहुत जोशीले मर्द है . गाँव की कोई ही औरत रही होगी जिसके साथ वो सोये नहीं होंगे. न जाने कैसा जादू था उनमे. हम भी उनकी तरफ खींचे चले गए. वो ख्याल भी बहुत रखते हमारा. धीरे धीरे जिस्म पिघलने लगे. हमें भी उनसे कोई शिकायत नहीं थी वो अगर हमसे कुछ लेते तो बहुत कुछ देते भी थे. वो तमाम सामान ठाकुर साहब ने ही लाकर दिया था.

चाचा जरनैल के बारे में ऐसा खुलासा सुन कर मुझे ज्यादा हैरत नहीं हुई . क्योंकि बीते दिनों से सबके बारे में कुछ न कुछ मालूम हो ही रहा था ये भी सही फिर.

रमा- फिर एक दिन राय साहब ने हमें पकड लिया रंगे हाथो चुदाई करते हुए. उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा पर छोटे ठाकुर को बहुत मारा. मैं खड़ी खड़ी देखती रही . राय साहब को इतना गुस्से में पहले कभी नहीं देखा था . पर छोटे ठाकुर भी जिद्दी थे उन्होंने अपने भाई का कहना नहीं माना . कभी कभी तो वो पूरी पूरी रात मुझे चोदते. मेरे लिए भी मुश्किल होने लगी थी क्योंकि मेरा भी घर बार था. और ऐसी बाते छिपती भी नहीं . मेरा आदमी कहता नहीं था मुझसे पर उसकी नजरे जब मुझ को देखती तो मैं कटने लगी थी . एक दिन मैंने सब कुछ ख़त्म करने का सोचा. मैंने छोटे ठाकुर से कह दिया की अब ये बंद होना चाइये और उन्होंने भी मेरी बात मान ली.

सात-आठ महीने बीत गए. सब ठीक चल रहा था की एक दिन मेरा आदमी मर गया. जैसे तैसे खुद को संभाला था की फिर बेटी मर गयी. जिंदगी में कुछ नहीं बचा था .

मैं- जब तुम अकेली थी तो फिर चाचा ने दुबारा तुमसे नाता जोड़ने की कोशिश नहीं की.

रमा- नहीं

मैं- क्यों . लम्पट इन्सान तो ऐसे मौके ढूंढते है .

रमा-मेरे मलिकपुर आने के कुछ महीनो बाद ही छोटे ठाकुर गायब हो गए और फिर तबसे आजतक कोई खबर नहीं उनकी तुम जानते तो हो ही.

मैं- सूरजभान से तुम्हारी क्या दुश्मनी

रमा- मुझे लगता है की सूरजभान भी शामिल था मेरी बेटी के क़त्ल में .

मैं- अगर वो शामिल हुआ तो कसम है मुझे उसकी खाल नोच ली जाएगी और मैं भैया से भी सवाल करूँगा इस मामले में . कबीर किसी भी अन्याय को बर्दास्त नहीं करेगा. ये बता की रुडा की लड़की से मुलाकात कहाँ हो पायेगी.

रमा-कल उसका और रुडा का झगड़ा हुआ वो रात को ही शहर चली गयी.

मैं- रमा तुझ पर भरोसा किया है ये टूटना नहीं चाहिए .

उसने हाँ में सर हिलाया मैं वापिस मुड गया.

"आयाशी विरासत में मिली है खून में दौड़ती है " रस्ते भर ये शब्द मेरे कानो में चुभते रहे.

भैया मुझे खेतो पर ही मिल गये.

मैं- भैया आपसे कुछ बात करनी है

भैया- हाँ छोटे

मैं- रमा को जानते है आप

भैया- जानता हूँ.

मैं- उसे गाँव छोड़ कर क्यों जाना पड़ा. हम उसे यही आसरा क्यों नहीं दे पाए. आप कहते है न की इस गाँव का प्रत्येक घर की जिम्मेदारी हमारी है तो फिर क्यों जाना पड़ा उसे.

भैया- उसका परिवार खत्म हो गया था . अवसाद में गाँव छोड़ गयी वो .

मैं-उसकी बेटी को किसने मारा.

भैया- मैं नहीं जानता

मैं- उसकी लाश आप लेकर आये थे .

भैया- लाया था पर कातिल को नहीं जानता मैं

मैं- ऐसा कैसे हो सकता है . किसका हाथ था उसके क़त्ल में मुझे बताना होगा भैया . क्या आपने मारा था उसकी बेटी को

भैया- जानता है न तू क्या बोल रहा है

मैं- तो फिर बताते क्यों नहीं मुझे .उसकी लाश आपके पास कैसे आई.

भैया - जैसे कविता की लाश तुझे मिली थी. तू ही लाया था न उसकी लाश को गाँव में . तो क्या तुझे भी कातिल मान लू. उसकी लाश जंगल में मिली थी मुझे. मिटटी समेटने को मैं ले आया. चाहता तो वहीँ छोड़ देता पर मेरा मन नहीं माना . कम से कम उसके शरीर का तो सम्मान कर सकता था न मैं.

मैं- रमा कहती है की आपने मारा उसकी बेटी को

भैया- उसके दिल को ऐसे तस्सली मिलती है तो मुझे ये आरोप मंजूर है छोटे.मैं तेरे मन की व्यथा समझता हूँ पर तू इतना जरुर समझना तेरा भाई ऐसा कुछ नहीं करेगा जिस से तुझे शर्मिंदा होना पड़े.

भैया ने मेरे सर पर हाथ फेरा और चले गये. एक बार फिर मैं अकेला रह गया.
 
#73

दो घडी मैं भैया को जाते हुए देखता रहा और फिर उनको आवाज दी उन्होंने मुड कर देखा मैं दौड़ कर उनके पास गया.

मैं- रमा की बेटी की लाश जब देने गए तो नोटों की गड्डी क्यों फेंकी

भैया-उसकी हालात बहुत कमजोर थे , मैंने उसकी मदद करनी चाही पर उसने पैसे नहीं लिए तो मैं पैसे वही छोड़ कर आ गया.

मैं- आप रमा और चाचा के संबंधो को जानते थे न भैया

भैया- अब उन बातो का कोई औचित्य नहीं है . सबकी अपनी निजी जिन्दगी होती है उसमे दखल देना एक तरह से अपमान ही होता है . जब तक कुछ चीजे किसी को परेशां नहीं कर रही उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए.

मैं- मतलब आप जानते थे .

भैया- मुझे कुछ जरुरी काम है बाद में मिलते है .

मैं इतना तो जान गया था की भैया को बराबर मालूम था चाचा श्री की करतूतों का. मैं थकने लगा था चारपाई पर लेटा और रजाई ओढ़ ली. सर्दी के मौसम में गर्म रजाई ने ऐसा सुख दिया की फिर कब गहरी नींद आई कौन जाने.

"कुंवर उठो , उठो " अधखुली आँखों से मैंने देखा की सरला मुझ पर झुकी हुई है. मेरी नजर उसकी ब्लाउज से झांकती चुचियो पर पड़ी.

"उठो कुंवर " उसने फिर से मुझे जगाते हुए कहा.

मैं क्या हुआ भाभी .

सरला- काम खत्म हो गया है कहो तो मैं जाऊ घर

मैं- जाना है तो जाओ किसने रोका है तुमको

मैंने होश किया तो देखा की बाहर अँधेरा घिरने लगा था .

मैं- तुम्हे तो पहले ही चले जाना चाहिए था .

सरला- वो मंगू कह कर गया था की कुंवर उठे तो कमरा बंद करके फिर जाना

मैं- कमरे में क्या पड़ा है . खैर कोई बात नहीं मैं जरा हाथ मुह धो लेता हूँ फिर साथ ही चलते है गाँव.

थोड़ी देर बाद हम पैदल ही गाँव की तरफ जा रहे थे .बार बार मेरी नजर सरला की उन्नत चुचियो पर जा रही थी ये तो शुक्र था की अँधेरा होने की वजह से मैं शर्मिंदा नहीं हो रहा था. मैंने उसे उसके घर की दहलीज पर छोड़ा और वापिस मुड़ा ही था की उसने टोक दिया- कुंवर चाय पीकर जाओ

मैं- नहीं भाभी, आप सारा दिन खेतो पर थी थकी होंगी और फिर परिवार के लिए खाना- पीना भी करना होगा फिर कभी

सरला- आ जाओ. वैसे भी मैं अकेली ही हूँ आज एक से भले दो.

मैं- कहाँ गए सब लोग

सरला- बच्चे दादा-दादी के साथ उसकी बुआ के घर गए कुछ दिन बाद आयेंगे.

चाय की चुसकिया लेटे हुए मैं गहरी सोच में खो गया था.

सरला- क्या सोच रहे हो कुंवर.

मैं- रमा की बेटी को किसने मारा होगा.

सरला- इसका आजतक पता नहीं लग पाया.

मैं- मुझे लगता है जिसने रमा की बेटी को मारा उसने ही बाकि लोगो को भी मारा होगा.

सरला- कातिल मारा जाये तो मेरा जख्म भरे.

मैं उसकी भावनाओ को समझ सकता था .

मैं- तू ठाकुर जरनैल के बारे में क्या जानती है .

सरला- वही जो बाकि गाँव जानता है

मैं- क्या जानता है गाँव

सरला- तुम्हे बुरा लगेगा कुंवर.

मैं- तू नहीं बतायेगी तो मुझे बुरा लगेगा भाभी

सरला- एक नम्बर के घटिया, गलीच व्यक्ति थे वो .

मैं- जानता हु कुछ और बताओ

सरला-जिस भी औरत पर नजर पड़ जाती थी उसकी उसे पाकर ही मानते थे वो चाहे जो भी करना पड़े.

मैं- क्या रमा को पाने के लिए चाचा उसके पति को मरवा सकता है

सरला मेरा मुह ताकने लगी.

मैं-हम दोनों एक दुसरे पर भरोसा करते है न भाभी

सरला ने कुछ पल सोचा और फिर हाँ में सर हिला दिया.

मैं- रमा के आदमी को चाचा मार सकता है क्या .

सरला- रमा को छोटे ठाकुर ने बहुत पहले पा लिया था . मुझे नहीं लगता की ठाकुर ने उसके आदमी को मारा या मरवाया होगा. देखो छोटे ठाकुर घटिया थे पर जिसके साथ भी सम्बन्ध बनाते उसका ख्याल पूरा रखते थे . उस दौर में रमा जितना बन संवर कर रहती थी धुल की भी क्या मजाल जो उसे छू भर जाये.

सरला की बात ने मुझे और उलझा दिया था .

मैं- चलो मान लिया पर हर औरत थोड़ी न धन के लिए चाचा के साथ सोना मंजूर कर लेती होगी . किसी का जमीर तो जिन्दा रहा होगा. क्या किसी ने भी उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई .

सरला- किसकी मजाल थी इतनी.

मैं- एक बात और मुझे मालूम हुआ की गाँव की एक औरत ऐसी भी थी जिस से अभिमानु भैया का चक्कर था .

मैंने झूठ का जाल फेंका

सरला- असंभव , ऐसा नहीं हो सकता. अभिमानु ठाकुर के बारे में ऐसा कहना सूरज को आइना दिखाना है . उसने गाँव के जितना किया है कोई नहीं कर सकता .

मैं -रमा तो भैया को ही उसकी बेटी का कातिल मानती है

सरला- रमा का क्या है . लाश को अभीमानु लाया था . बस ये बात थी . अभिमानु ने रमा को सहारा देने के लिए सब कुछ किया था पर वो अपनी जिद में गाँव छोड़ गयी.

मैं-जाने से पहले एक बात और पूछना चाहता हूँ भाभी.

सरला- हाँ

मैं- जाने दे फिर कभी .

मैंने अपने होंठो पर आई बात को रोक लिया . मैं सरला से साफ पूछना चाहता था की क्या वो मुझे चूत देगी . पर तभी मेरे मन में उसकी कही बात आई की कौन मना कर सकता था . मैंने अपना इरादा बदल दिया और उसके घर से निकल गया. घर गया तो देखा की चंपा आँगन में बैठी थी राय साहब अपने कमरे में दारू पी रहे थे . मैंने चंपा को अनदेखा किया और रसोई में चला गया . मेरे पीछे पीछे वो भी आ गयी.

चंपा- मैं परोस दू खाना

मैं- भूख नहीं है .

चंपा- तो फिर रसोई में क्यों आया.

मैं- तू मेरे बाप का ख्याल रख मैं अपना ध्यान खुद रख लूँगा.

चंपा- नाराज है मुझसे

मैं- जानती है तो पूछती क्यों है

चंपा- काश तू समझ पाता

मैं- मेरी दोस्त मेरे बाप का बिस्तर गर्म कर रही है और मैं समझ पाता

चंपा ने कुछ नहीं कहा और रसोई से बाहर निकल गयी . रात को एक बार फिर मैं उस तस्वीर को देख रहा था .

"दुसरो की चीजो को छुप कर देखना भी एक तरह की चोरी होती है " कानो में ये आवाज पड़ते ही मैंने पीछे मुड कर देखा..........................
 
#74

सामने भैया खड़े थे .

मैं- आप यहाँ कैसे

भैया- हमारे ही कमरे में हमसे ही ये सवाल. अजीब बदतमीजी है छोटे

मैं- मेरा वो मतलब नहीं था भैया . मैं बस ........

भैया- कोई बात नहीं , वैसे भी यहाँ कुछ खास नहीं पुराना कबाड़ ही पड़ा है . रात बहुत हुई चाहो तो दिन में आराम से देख सकते हो इसे.

मैंने हां में सर हिलाया और बाहर आ गया. चाची के पास गया तो देखा की चंपा सोयी पड़ी थी वहां . मैंने कम्बल ओढा और कुवे पर जाने का सोचा. बाहर गली में आते ही देखा की भाभी छजे पर खड़ी थी बल्ब की रौशनी में उनकी नजर मुझ पर पड़ी. दोनों ने एक दुसरे को देखा और मैं अपने रस्ते बढ़ गया ये सोचते हुए की इतनी रात को भी जागती रहती है ये. कोचवान के घर के सामने से गुजरते हुए मैंने देखा की सरला का दरवाजा खुला है . इतनी रात को दरवाजा क्यों खुला है मैंने सोचा और मेरे कदम उसके घर की तरफ हो लिए.

मैंने अन्दर जाकर देखा सरला जागी हुई थी .

मैं- इधर से गुजर रहा था देखा दरवाजा खुला है तो चिंता हुई

सरला- तुम्हारे लिए ही खुला छोड़ा था कुंवर.

मैं- मेरे लिए पर क्यों

सरला- जानती थी तुम जरुर आओगे.

मैं- कैसे जानती थी .

सरला- औरत हूँ . औरत की नजरे सब पहचान लेती है . वो अधूरी बात जो होंठो तक आकर रुक गयी थी पढ़ ली थी मैंने.

मैं- तुम गलत सोच रही हो भाभी दरवाजा खुला देख कर चिंता हुई तो आ गया.

सरला- इतनी रात को एक अकेली औरत की चिंता करना बड़ा साहसिक काम है कुंवर.

मैं क्या ही कहता उसे .

मैं- तुम कुछ भी कह सकती हो भाभी . पर मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था

सरला मेरे पास आई और बोली- इरादा नहीं था तो फिर इन पर नजरे क्यों टिकी है तुम्हारी

उसने अपनी छातियो पर हाथ रखते हुए कहा.

मैं- अन्दर से कुण्डी लगा लो . मैं चलता हूँ

तभी सरला ने मेरा हाथ पकड़ लिया.

मैं- जाने दे मुझे , बहक गया तो फिर रोक नहीं पाऊंगा खुद को . ये रात का अँधेरा तो बीत जायेगा उजालो में तेरा गुनेहगार होना अच्छा नहीं लगेगा मुझे. तूने कहा था न की ठाकुरों को कौन मना करे. तू मना कर मुझे.

सरला- तो फिर रुक जाओ यही ये भी तो तुम्हारा ही घर है

मैं- घर तो है पर ..............

सरला- पर क्या....

इस से पहले की वो और कुछ कहती मैंने आगे बढ़ कर अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिए और उसने चूमने लगा. उसने खुद को मेरे हवाले कर दिया और हम दोनों एक दुसरे के होंठ खाने लगे. मेरे हाथ उसके ठोस नितम्बो पर कस गए. मैंने महसूस किया की सरला की गांड चाची से बड़ी थी . सरला के होंठ थोडा सा खुले और हमारी जीभ एक दुसरे से रगड़ खाने लगी. उत्तेजना का ऐसा अहसास की तन जल उठा मेरा.

धक्का देकर मैंने उसे बिस्तर पर गिराया और दरवाजे की कुण्डी लगा दी. कमरे में हम दोनों थे और मचलते अरमान हमारे.

मैंने उसके लहंगे को ऊपर उठाया और पेट तक कर दिया. गोरी जांघो के बीच काले बालो से ढकी हुई सरला की चूत जिसकी फांके एक दुसरे से चिपकी हुई थी . मेरा जी ललचा गया उसकी चूत देख कर . मैंने उसकी टांगो को विपरीत दिशाओ में फैलाया और अपने होंठ उसकी चूत पर लगा दिए.

मैंने अपने होंठो को इस कद्र जलता महसूस किया की किसी ने दहकते हुए अंगारे रख दिए हो.

"सीईई " चूत को चुमते ही सरला मचल उठी. मैंने देखा उसने अपनी चोली उतार कर फेंक दी और अपने हाथो से मेरे सर को थाम लिया. मैं उसकी चूत को चूसने लगा. बस दो मिनट में ही सरला के चुतड खुद ऊपर उठ गये . उसके होंठ आहों को रोकने में नाकाम होने लगे थे.

चाची के बाद जीवन में ये दूसरी औरत थी जो इतनी हद गदराई हुई थी .

"आह्ह्हह्ह्ह्हह्ह " चंपा ने अपनी छातियो को भींचते हुए आह भरी. मैंने अपने कपडे उतारे और अपने लंड को उसकी थूक से सनी चूत पर लगाते हुए धक्का मारा. सरला की आँखे गुलाबी डोरों के बोझ से बंद होने लगी. दो धक्के और मारे मैंने और पूरा लंड अन्दर सरका दिया. सरला ने अपने पैर उठा कर मेरी कमर पर लपेट दिए और चुदाई का मजा लेने लगी.

सरला को पेलने में मजा बहुत आ रहा था , सरला को चुदाई का ज्ञान बहुत था मैं महसूस कर रहा था . जिस तरीके से वो सम्भोग का लुत्फ़ उठा रही थी मैं कायल हो गया था उसकी कला का.

"आह छोटे ठाकुर , aaahhhhhhhhh "सरला के होंठो से जब ये आह फूटी तो मेरा ध्यान चुदाई से हट गया क्या मैंने ठीक ठीक सुना था . विचारो में बस एक पल ही खोया था की सरला ने अपने होंठ मेरे होंठो से जोड़ दिए और झड़ने लगी. उसने मुझे ऐसे कस लिया की मैं भी खुदको रोक नहीं पाया और उसके कामरस में मेरा वीर्य मिलने लगा.

चुदाई के बाद वो उठी और बाहर चली गयी मैं लेटे लेटे सोचने लगा उस आह के बारे में .

बाहर से आते ही वो एक बार फिर मुझसे लिपट गयी और मैंने रजाई हम दोनों के ऊपर डाल ली. सरला का हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया . उस से खेलने लगी वो . मैंने उसे टेढ़ा किया और उसके मजबूत नितम्बो को सहलाने लगा.

मैं- बहुत जबरदस्त गांड है तेरी

सरला- तुम भी कम नहीं हो

मैं- ये ठीक नहीं हुआ

सरला- ये मेरी इच्छा थी कुंवर. जब से तुम को मूतते देखा मैंने मैं तभी से इसे अपने अन्दर लेना चाहती थी

मैं- पर इस रिश्ते का अंजाम क्या होगा

सरला- ये तो निभाने वाले की नियत पर निर्भर करता है .दोनों तरफ से वफा रहेगी तो चलता रहेगा वर्ना डोर टूट जाएगी.

"सो तो है " मैंने सरला की गांड के छेद को सहलाते हुए कहा

मैं उस से पूछना चाहता था पर मेरे तने हुए लंड ने गुस्ताखी कर दी और एक बार फिर मैं सरला के साथ चुदाई के सागर में गोते लगाने लगा.

सुबह जब मैं उसके घर से निकला तो मुझे पक्का यकीन था की रमा-कविता की चुदाई में तीसरी हिस्सेदार सरला थी ...... रमा के पति का मरना फिर सरला के पति का मरना कोई तो गहरी बात जरुर थी ......................
 
#75

फिर मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की आसमान बादलो से भरा था . हवाए जोरो से चल रही थी. एक रात में मौसम का अचानक बदलना ठीक नहीं था फिर ख्याल आया की मेरी तो फसल वैसे ही बर्बाद हो गयी थी इस बारी. बाहर आकर मैंने नज़ारे का आनंद लिया. काली घटाओ से आसमान गुलजार था . लगता था की बस अब बारिश पड़ी. दिन को जैसे रात ने घेर लिया था .

"क्या देख रहे हो " भाभी ने मेरी तरफ चाय का प्याला बढाते हुए कहा.

मैं- ऐसा लगता है की जैसे वो मुझसे मिलने आ रही हो. ये हवाए कह रही है की आज मुलाकात होगी .

मैंने भाभी को छेड़ा

भाभी- तुम्हे बर्बाद होना है तुम होकर रहोगे.

मैं- वो मेरी नियति देख लेगी. फ़िलहाल तो मुझे इस नजारे को देखना है

भाभी- कल रात कहा गए थे तुम

मैं- उसी के पास . मेरी हर रात अब उसके साथ ही गुजरेगी

भाभी- तुम तो नादान हो कम से कम उसे तो समझना चाहिए

मैं- नादाँ तो कभी आप भी रही होंगे . आपने अपनी मोहब्बत के लिए सब कुछ सहा और फिर मैं तो आपकी परवरिश हूँ मैं न जाने क्या कर जाऊंगा वैसे भी दीवानों को कहाँ ये बाते समझ आती है आप तो जानती है न

भाभी- जानती हूँ इसलिए तो कह रही हूँ. बारूद के ढेर पर बैठ कर चिनगारियो को हवा नहीं देते.

मैं- जानती होती तो कहती देवर उसे ले आ इस घर की छोटी बहु बना कर

भाभी- जो हो नहीं पायेगा उसका ख्याल भी क्या करना.

मैं -जाने दो फिर. मुझे जीने दो मेरे ख्यालो में जब तक उसका साथ है इस खूबसूरत दौर को जी भर कर जीना चाहता हूँ मैं .

भाभी- पर मैं तुझे मरते हुए नहीं देख पाउंगी

मैं- नियति का लिखा कौन बदल सकता है

भाभी ने गुस्से से देखा और पैर पटकते हुए चल पड़ी. नासाज मौसम की वजह से मैंने नहाने का विचार किया ही नहीं और खाना खाने के बाद फिर से उसी कमरे में पहुँच गया . पर निराशा ही हाथ लगी भैया ने वो तस्वीर हटा दी थी वहां से. कुछ तो जरुर था उस तस्वीर में . वो तस्वीर भैया के अतीत को जानने की चाबी लगी मुझे.

साइकिल उठाई और मैं निकल गया खेतो की तरफ. ऐसे गदराये मौसम में घुमने का अपना ही सुख था. घूमते घूमते मैं मोड़ पर पहुंचा जहा से एक रास्ता कुवे पर दूजा जंगल की तरफ जाता था . मन किया की रमा से मिल लिया जाये आधी दुरी तय की थी की मैंने कच्ची सडक के बीचो बिच एक गाड़ी खड़ी देखि , जिसके दरवाजे खुले हुए थे. ऐसे कौन खुली गाड़ी छोड़ कर जायेगा. मैंने साइकिल खड़ी की और गाड़ी को देखने लगा.

"कुछ नहीं मिलेगा तुम्हे चुराने को " आवाज की तरफ मैंने पलट कर देखा . थोड़ी दुरी पर एक औरत थी जो हाथो में किताब लिए हुए थी. चेहरे पर झूलती लटे. आँखों पर चश्मा बहुत ही खूबसूरत थी वो .

मैं- चोर समझा है क्या .

औरत- दुसरो के सामान की बिना परमिशन कौन जांच करता है फिर.

उसकी भाषा से मैं समझ गया की ये शहरी मेंम है . क्या यही रुडा की बेटी है मैंने खुद से सवाल किया .

वो- ऐसे क्या देख रहे हो .

मैं- आप रुडा की बेटी है न

मैंने पक्का करने के लिए सवाल किया .

उसने किताब निचे रखी और बोली- बदकिस्मती से.

मैं- बड़ी शिद्दत से मैं आपसे मिलना चाहता था .

उसने मुझे ऊपर से निचे तक देखा और बोली- मुझसे पर क्यों मैं तो तुमको जानती भी नहीं.

मैं- अभिमानु ठाकुर को तो जानती हो उनका छोटा भाई हूँ मैं

उसने फिर से देखा मुझे और बोली- क्यों मिलना चाहते थे मुझसे

मैं- बस ये पूछना था की भैया और आप एक दुसरे से प्यार करते थे क्या .

उसने अपना चस्मा उतारा और बोली- पहले मुझे बताओ की तुम प्यार को कैसे समझते हो .

मैं- नहीं जानता

वो- तो फिर प्रश्न मत पूछो

मैं- मेरी दुविधा ही ऐसी है . मैं अतीत को तलाश रहा हूँ क्योंकि मेरा वर्तमान उलझ रहा है उसकी वजह से .

वो- मैं अभिमानु से कभी प्यार नहीं करती थी . पर जब तुम इस सवाल तक पहुँच गए हो तो यकीनन बहुत कुछ मालूम कर ही लिया होगा.

मैं- आप से मदद की बड़ी उम्मीद है मुझे.

वो- मैं बरसों पहले घर छोड़ चुकी हूँ , कभी कभी जब मन नहीं मानता तो यहाँ आ जाती हूँ . यही इसी जंगल में सकूं की तलाश में

मैं- इस जंगल में सकून उसी को मिलता है जिसकी कोई कहानी रही हो यहाँ से .

वो- तो तुम्हे क्या लगता है मैं अनजानी हूँ यहाँ से . अरे बचपन बीता है हमारा यहाँ.

मैं- तो फिर बताओ इस जंगल में क्या छिपा है

वो- जिन्दगी छिपी है यहाँ , दोस्ती छिपी है दुश्मनी छिपी है . जिद छुपी है .अरमान छुपे है , हताशा छुपी है दिल मिले है दर्द मिला है .

मैं- सूरजभान को क्या तलाश है इस जंगल में

वो- सच की तलाश उस सच की जो यही कहीं छुपा है

मैं- कैसा सच

वो- वही सच जिसके लिए तुम भटक रहे हो . वो ही सच की कौन है वो आदमखोर .

वो उठ कर मेरे पास आई और अपने गले से एक चांदी की चेन उतार कर मेरे हाथ दे देते हुए बोली- मेरी तरफ से एक छोटा सा तोहफा. जाने का समय हो गया हम फिर कभी नहीं मिलेंगे.

वो दो चार कदम आगे बढ़ी थी की मैंने उसे आवाज दी- आप प्यार करती है न भैया से .

वो मुड कर मेरे पास आई और बोली- अभिमानु भाई है मेरा , राखी बांधती हूँ मैं उसे. मैंने तुमसे पहले ही कहा था की ये तुम पर निर्भर है की तुम प्यार को कैसे समझते हो.

मैं- आपने घर क्यों छोड़ा

वो- मेरे बाप को मेरी गुस्ताखी पसंद नहीं आई. मैं आसमान देखना चाहती थी वो मेरे पांव बांधना चाहता था . अभिमानु न होता तो मैं अपनी जिन्दगी जी नहीं पाती.

मैं- बस एक सवाल और , भैया ने एक तस्वीर छुपाई हुई है जिसमे तीन लोग है

वो- त्रिदेव, तीन दोस्तों की कहानी ढूंढो . फिर किसी से कोई सवाल नहीं करना पड़ेगा.

जाते जाते उसने मुझे गले लगाया और बोली- मेरे भाई पर कभी शक मत करना

 
.#76

उनके जाने के बाद मैं भी निशा के ठिकाने पर चला गया.उस गहरी ख़ामोशी में बैठे बैठे मैं सोच रहा था तमाम बातो के बारे में . तस्वीर में तीन लड़के थे भैया के सिवा मैं बाकी दोनों को बिलकुल नहीं जानता था . पर रुडा की बेटी के अनुसार मुझे त्रिदेव की कहानी मालूम करनी थी और ये त्रिदेव कोई और नहीं वो तस्वीर में मोजूद शक्श ही थे. आसमान और काला हो गया था. थोड़ी थोड़ी बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी. तालाब के पानी में टप टप गिरती बूंदों को देखते हुए मैं ख्यालो में जैसे खो सा गया था.

बहन जी ने जो चांदी का लाकेट मुझे दिया था मैंने उसे गले में पहन लिया .बस तलाश थी मुझे किसी ऐसे की जो भैया का अतीत खोल कर रख दे मेरे सामने.

"जब कुछ न जोर चले तो इस पानी में उतरना ये पनाह देगा तुझे " निशा की कही ये बात अचानक ही मेरे जेहन में आई.

मैंने कपडे उतारे और पानी में कूद गया. बरसात ने पानी को और ठंडा कर दिया था . मैंने फेफड़ो में हवा भरी और गोता लगाया. ठन्डे पानी ने एक बार फिर मेरी परीक्षा लेना चाही पर इरादा मजबूत था. .निशा ने जो भी मुझे दिखाया था वो भ्रम नहीं था सच था . पर कौन मालिक था इसका , ऐसा कौन था जिसे जरा भी परवाह नहीं रही इस की . कौन था वो निर्मोही जिसे खजाने का मोल नहीं समझ आया था .

बेशक मेरे फेफड़े फटने को थे पर फिर भी मैं वही रुका रहा . उस ढेर को देखता रहा . पानी के निचे दबी उस ख़ामोशी को शिद्दत से महसूस किया जो बाहर आकर चीखने को बेक़रार थी .किसकी कहानी थी ये जो धरती के निचे दफन थी . खजाना था तो इस खंडहर में भी कोई बात जरुर होगी . मेरे दिल ने कहा मैंने तुरंत ऊपर की और दिशा की और पानी से बाहर आ गया. बरसात बदस्तूर जारी थी . कपडे पहने पर ठण्ड से राहत मिली नहीं . शरीर कांप रहा था . पर एक जूनून था मुझ पर ,

"तुम भी मामूली नहीं हो सकते कोई तो कहानी तुम्हारी भी जरुर है " मैंने उस बेजान ईमारत से कहा और गौर से देखने लगा. हर दिवार को देखा पुराने बने चिन्हों को समझा . खंडहर पुराना होने की वजह से दीवारे काली हुई पड़ी थी निशा ने कहा था की वक्त और लोगो ने भुला दिया इसे पर ये कैसा मंदिर था जिसमे कोई प्रतिमा नहीं . कुछ तो छूट रहा था मुझसे कोई तो ऐसी बात थी जो सामने होते हुए भी छिपी थी . मैंने उस बड़े पत्थर को भी सरका कर देखा जिस पर कभी प्रतिमा होगी जो मैं सोचता था पर नहीं . मैं प्रांगन में आया एक बार फिर से उस ईमारत को देखा. पानी , पानी , पानी .......

मैं समझ गया ये कभी कोई मंदिर था ही नहीं. ये एक पनाहगाह थी मुसाफिरों के लिए. पानी का प्रयोजन यहाँ था की पथिक बैठ कर सुस्ता सके, पानी पीकर तरोताजा हो सके. किसी जगह में इधर से लोग गुजरते होंगे. पर ऐसा कौन दिलेर था जिसने खुली जगह में सोना छुपाया. मन ही मन मैंने उसकी सोच की दाद दी उसके साहस का कायल हो गया मैं.

उसने छिपाने से सबसे सुरक्षित जगह चुनी थी क्योंकि इस जगह पर सोना होगा कोई सोच भी नहीं सकता था . दूसरा ये जगह इतनी छिपी हुई थी की पहली नजर में इसे देखना लगभग नामुमकिन था तो उस सक्श ने अपना ठिकाना इसे तब बनाया जब दुनिया ने इस जगह को ठुकरा दिया.

सोना छिपा था तो ऐसी जगह भी छिपी होनी चाहिए थी जिसका इस्तेमाल किया जा सके. कोई ख़ुफ़िया कमरा या तहखाना . मुझे बस उसकी ही तलाश करनी थी . एक बार फिर से मेहनत शूरू हुई आसमान इस कद्र काला हुआ था की दोपहर और रात का फर्क खत्म हो गया था . तभी अंदरूनी दिवार पर एक निशान ने मेरा ध्यान खींचा . दो जुड़े हुए सांप का निशान ऐसा लगता था की मैंने कहीं तो देखा है . पर कहाँ .ये ध्यान नहीं आ रहा था . बहुत देर हुई सोचते सोचते . मैंने अपने गले पर हल्का सा खुजाया और मेरी उंगलिया चांदी के लाकेट से टकराई . मैंने देखा फिर देखता ही रह गया. ये निशान मेरे गले में तो था. ये निशान मैंने तब देखा था जब रुडा की बेटी ने ये चेन मुझे दी थी .

गले से चेन उतार कर मैंने मिलान किया शक की गुंजाईश ही नहीं थी . खूब जांच की पर साला कोई जुगाड़ मिला नहीं इस निशान की क्या पहेली थी सोचते सोचते मेरा सर दुखने लगा. पर पहेली थी तो फिर उत्तर भी यही रहा होगा. सांप का जोड़ा , जोड़ा , जोड़ा . रहना ये जगह उसने अपने छिपने के लिए चुनी थी . सांप का छिपना एक छलावा . निशान बस एक धोखा था . वाह क्या खूब दिमाग था इस बन्दे का. मैं तुरंत मुड़ा और सीढियों की तरफ गया . थोड़ी मेहनत के बाद मुझे तालाब और सीढियों वाली दिवार पर एक लोहे का कुंडा मिल गया जिसे खींचने पर एक तरफ का पत्थर सरक गया निचे जाने को सीढिया थी मैं उतर गया और पत्थर को वापिस लगा लिया. थोडा निचे जाने पर मैं एक अँधेरे कमरे में था जो सीला हुआ था श्याद पानी की वजह से . कुछ देर बाद आँखे जब देखने लायक हुई तो मैंने पाया की पुराना सा कमरा था जिसमे एक तरफ छोटी मेज थी, दिवार पर एक आला था जिसमे की चिमनी थी. पास रखी दियासलाई जो की सीली हुई थी मैंने कोशिश की दो चार तीलिया बर्बाद हुई पर चिमनी जल गयी. हलकी से लौ ने सच कहूँ बड़ी राहत दी.

कोने में बिस्तर पड़ा था जो अब अवसेश ही रह गया था . काई लगी दीवारों पर लम्बे लम्बे निशान थे जैसे की उनको कुरचा गया हो . बरसों से यहाँ कोई नहीं आया था तो आमद का क्या ही सबूत देखता मैं . क्या निशा इस कमरे के बारे में जानती होगी . क्या मैं जिक्र करू पहली बार मुझे लगा था की निशा भी मुझसे कुछ छिपाए हुए है . एक डाकन की मोजुदगी में कोई और यहाँ रह जाए ये तो असंभव था . निशा शायद इस सक्श को जानती होगी पर जानती थी तो मुझसे क्यों छिपाया. क्या उस आदमखोर और डाकन का कोई सम्बन्ध था .
 
#77

ये आसमान को आज क्या गम था जो रोये ही जा रहा था . माना की हम उलझे थे अपने ताने-बाने में पर इस बारिश को किसने सताया था . इन तूफानी हवाओ को किसने छेड़ा था आज. शायद कुदरत भी नहीं चाहती की मैं अतीत की चादर को झडका दू.

एक हाथ से साइकिल की थामे पैदल बारिश में भीगते हुए मैं कुवे की तरफ चले जा रहा था . मन में उमंग थी, आस थी , और थोडा दर्द भी था . कुवे पर पहुँच कर देखा की सरला वही मोजूद थी .

मैं- तू यहाँ पर क्या कर रही है भाभी

सरला- सुबह से यही पर हूँ मेह थम ही नहीं रहा सोचा रुकेगा तभी जाउंगी

मैं- मौसम ख़राब था तो आने की जरुरत ही क्या थी तुमको .

सरला- कल थोडा काम अधुरा रह गया था सोचा था की दोपहर तक पूरा कर लुंगी पर मौसम बेईमान

मैं- बहुत बढ़िया हुआ जो रुक गयी तुम कल का अधुरा काम आज पूरा हो जायेगा.

मैंने कपडे उतार कर फेंके और कीचड़ साफ़ करके अन्दर आते ही सरला को अपनी बाहों में भर लिया.

मैं- ये मौसम और गदराई हुई तुम, मैं कैसे रोकू खुद को

सरला ने मेरे गालो पर चुम्बन किया और बोली- मत रोको कुंवर.

सरला ने मेरे तौलिये को हटाया और मेरे लंड को हाथ में लेकर मसलने लगी.

सरला- कुंवर , क्या कर दिया तुमने मुझ पर मैं रोक नहीं पाई खुद को पिघलने से.

मैं- किसलिए रुकना है तुमको

मैंने सरला के होंठो से अपने होंठ जोड़ दिए. बरसती दोपहर में हम दोनों जलने लगे थे. चुमते चुमते मैंने उसके लहंगे की गाँठ खोली और उसने निचे से नंगी कर दिया . उसके चूतडो पर हाथ फेरने का भी अपना ही सुख था . मैंने उसे खुद से अलग किया और थोडा झुका दिया.सरला ने अपने दोनो हाथ घुटनों पर रख लिए. इस तरह झुकने से उसकी भारी गांड और भी उभर कर मेरे सामने आ गयी. मैंने सोचा चाचा क्या ही आदमी था इन रांडो को उसने जी भर कर भोगा होगा.

लंड पर थूक लगा कर मैंने उसे सरला की चूत पर लगाया और जोर से धक्का मारा वो आगे को गिर जाती पर मैंने मजबूती से उसके कुल्हे थाम लिए थे . बरसते मेह में हमारी हवस भी बरसने लगी थी . मेरी उमंग और सरला की आहों ने चुदाई के सुख को दुगुना कर दिया. आज से पहले मैं इतना नहीं झडा था ऐसे नहीं झडा था .

चुदाई के बाद मैंने उसे चाय बनांने को कहा और फिर बातो का सिलसिला शुरू हुआ.

मैं- सरला देख, मैंने तुझ पर भरोसा किया है और तूने भी वादा किया है मुझसे

सरला- मैं अब तुम्हारी हूँ कुंवर. बेशक मैंने खुद पहल करके तुम्हारे साथ सब कुछ किया पर ये मेरी इच्छा थी .

मैं-रमा , कविता की चुदाई के खेल की तीसरी साथी तुम थी न

सरला- ये तुम कल रात ही जान गए थे कुंवर तो अब क्यों पूछते हो.

मैं- क्या हरिया जानता था ये बात

सरला-नहीं

उसने चूल्हे में फूक देते हुए कहा.

मैं- क्या तू चाहती है की हरिया के कातिल का सच में पता चले

सरला- मुझसे ज्यादा कौन जानना चाहेगा. कुंवर बेशक मेरे सम्बन्ध छोटे ठाकुर से भी थे पर मैंने हरिया से भी बहुत प्यार किया

मैं- तो फिर बता चाचा का क्या हुआ

सरला- मैं नहीं जानती , वो बस अचानक से गायब हो गए . जबसे उनका और राय साहब का झगड़ा हुआ था उसके बाद से वो शांत से हो गए थे गाँव में आना जाना कम हो गया था .

मैं- जानता हूँ पिताजी ने चुदाई करते पकड़ा था उनको

सरला- ये बात नहीं थी , राय साहब को परवाह नहीं थी की उनका भाई कहाँ मुह मार रहा है . झगडा किसी और बात को लेकर हुआ था .

मैं- किस बात को लेकर.

सरला- छोटे ठाकुर नहीं चाहते थे की रुडा की बहन की बेटी उनके घर की बहु बने . छोटे ठाकुर और रुडा में छत्तीस का आंकड़ा था

मैं- पर क्यों .

सरला- नहीं जानती

मैंने गहरी सांस ली .

मैं- तुम तीनो में से छोटे ठाकुर अपने मन की बाते किस से करते थे .

सरला- शायद एक से शयद तीनो से या फिर किसी से भी नहीं . हम बस अपने अपने स्वार्थ से जुड़े थे उनको चूत चाहिए थी और हमको सुख . दोनों का लालच था .

मै- कोई और भी तो होगा चाचा का राजदार

सरला- छोटे ठाकुर का कोई दोस्त नहीं था जहाँ तक मैं जानती हूँ

मैं- जंगल में तुम्हारे मिलने की जगह कहाँ थी , ऐसी कोई तो खास जगह होगी न जहाँ पर तुम घंटो चुदाई कर पाते थे.

सरला- जंगल में नहीं रमा के घर में मिलते थे हम . पर जब उसके पति को मालूम हुआ तो फिर हम यहाँ इसी कुवे पर आने लगे. तब यहाँ इतनी चहल पहल नहीं होती थी . और ऐसी ही एक दोपहर राय साहब आ धमके उसके बाद हालात पहले से नहीं रहे.

मैंने चाय का कप रखा और मंद होती बरसात को देख कर कहा - घर चलते है भाभी

थोड़ी देर बाद हम गाँव के लिए निकल पड़े. मैं सीधा चाची के पास गया और बोला- चाचा और राय साहब में झगडा हुआ था किस बात को लेकर अभी बता मुझे

चाची- तेरे चाचा औरतखोर थे. जेठ जी को ये पसंद नहीं था .

मैं- मैं सच जानना चाहता हूँ चाची अभी

चाची- छोटे ठाकुर ने रमा के पति को मार दिया था , जेठ जी को मालूम हुआ तो बहुत कलेश हुआ .

मैं- क्यों मारा रमा को तो वो पा ही चुके थे फिर मारने की क्या जरूरत आन पड़ी.

चाची- मैं नहीं जानती ,जेठ जी ने बात को दबा दिया सिर्फ घर वाले ही जानते है इस बारे में

मैं- तेरे पति ने एक आदमी को मार दिया तू चुप रही

चाची- वो बस नाम का पति था मेरे लिए , मेरे हिस्से का सुख वो बाहर लुटा रहा था . कितना समझाया मैंने पर नहीं घर के सोने को ठुकरा कर वो बाहर पीतल तलाशता रहा . मैं करती भी तो क्या .............

"घर की दहलीज में छुपा है तेरे हिस्से का सच " निशा की कही बात मेरे जेहन में गूंजने लगी.

मेरे बाप ने न जाने किस किस पर पर्दा डाला हुआ था . कही लाली का श्राप सच तो नहीं हो रहा था मैंने इस घर की दीवारों को कांपते हुए महसूस किया. रात को अचानक दर्द से मेरी आँख खुल गयी मैंने खुद को बिस्तर से निचे पड़ा पाया. बदन तप रहा था . पसीने से भीगा था मैं. गटागट पानी पीने लगा पर चैन नहीं आया. उलटी करने का जी हो रहा था .बाहर आकर मैंने हवा खाने की सोची. गली में बाहर आया ठण्ड बहुत थी पर बारिश थम चुकी थी.

अचानक ही मेरे पैर कांप गए और मैं गली के बिच में गिर गया. .मेरी नजर बादलो के बीच से झांकते चाँद पर पड़ी और मैं जैसे पागल हो गया. मैं बिना कुछ सोचा समझे दौड़ पड़ा..............................
 
#78

पसीने से लथपथ मैं बस दौड़े जा रहा था . सांस ऐसी चढ़ी थी की कलेजा फटा ही फटा. एक जूनून सा चढ़ रहा था बेखुदी में मैंने अपना बदन नोचना शुरू किया. चाँद कुछ देर के लिए बादलो में छिपा और मैं हाँफते हुए खेतो की गीली जमीन पर पसर गया. सीने पर हाथ रखे लम्बी सांसे लेते हुए मैं इस दर्द से राहत पाने की कोशिश कर रहा था . जब दर्द पर काबू नहीं रहा तो मैं चीखने लगा. मेरी चीख सुनसान अंधेरो में गूंजने लगी.

"kabiiiiirrrrrrrrrrr " मैंने दूर से उस आवाज को सुना .

"निशा ............ " मैं कराहते हुए बोला

निशा- कबीर आ गयी हूँ मैं.

अधखुली आँखों से मैंने एक साए को पास आकर मुझ पर झुकते हुए देखा.

निशा- आँखे खोल कबीर , मैं आ गयी हूँ आँखे खोल

मैं उसकी आवाज सुन तो पा रहा था पर मेरी हिम्मत टूट गयी थी बदन की जलन हावी हो रही थी मुझ पर.

"निशा , निशा " मैं बोल नहीं पा रहा था .

निशा- ठीक हो जायेगा बस अभी .

निशा ने मुझे उठाया और अपने साथ कुवे पर बने कमरे में ले आई. मुझे घास पर पटका और देखने लगी . कभी मेरे माथे को सहलाती कभी मेरे सीने को .

"चाँद रात का असर है झेल लेगा तू " उसने कमजोर लहजे में कहा. मैंने आँख मूँद ली और सब कुछ छोड़ दिया.

"कबीर बोलता क्यों नहीं " उसने मुझे हिलाते हुए कहा .

मैंने कोई हरकत नहीं की .

उसने फिर से झिंझोड़ा मुझे

निशा- कबीर कुछ तो बोल . देख तू नहीं बोलेगा तो नाराज हो जाउंगी मैं . मेरी खातिर कुछ तो बोल .

मैं बस पड़ा रहा

निशा- तुझे मेरी कसम कुछ तो बोल आँखे खोल अपनी

इस बार रो पड़ी वो . बिना आँखे खोले मैंने उसका हाथ थाम लिया .

"जा रहा हु तुझे छोड़ के " मैंने मरी सी आवाज में कहा

निशा- ख़बरदार, जो ये बात कही . कहीं नहीं जायेगा तू मुझे छोड़ के. जाने नहीं दूंगी तुझे

मैं- प्यार जो नहीं करती तू मुझे. तेरे बिना क्या जीना मेरा

निशा- तुझसे ही तो प्यार करती हूँ . तुझसे ही तो प्यार किया है

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. बेहोशी मुझ पर चढ़ने लगी. होश आया तो देखा की निशा कुछ पिला रही थी मुझे. कुछ गर्म सा जो गले से निचे जाते ही चेतना लौटने लगी. पैरो के अंगूठो पर उसने कुछ बांधा हुआ था . उसके गालो पर आंसुओ की लकीरे देख कर रहा नहीं गया मुझसे. मैंने बाहे फैला कर उसे अपने पास बुलाया और सीने से लगा लिया.

"मैं तो घबरा ही गयी थी " उसने हौले से कहा

मैं- मैं भी .

निशा- अब कैसा लग रहा है

मैं- बेहतर

निशा- रात का तीसरा पहर चल रहा है अब आराम रहेगा.

मैं- पर ये कब तक चलेगा

निशा- नहीं जानती पर खत्म हो जायेगा.

मैं- निशा , इस रात मैंने कुछ सोचा है

निशा- क्या

मैं- तुझे कुछ बताना है कुछ कहना है तुझसे

निशा- सुन रही हूँ

मैं- समझ भी मेरी सरकार. मैं बहुत अकेला हूँ टूट कर बिखर रहा हूँ इस से पहले की कुछ न बचे थाम ले मुझे अपनी बाँहों में और मुझे जीने का अहसास दे. अपने आगोश में भर ले . पनाह दे मेरी रूह को निशा मैं तुझे अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ , ब्याह करना चाहता हूँ तुझसे

मेरी बात सुन कर निशा दिवार का सहारा लेकर बैठ गयी . पर वो कुछ नहीं बोली . मैंने इन्तजार किया पर वो खामोश रही .

मैं- जानता हूँ तेरा मेरा मेल नहीं . पर तू भी जानती है. इतना हक़ दे मुझे निशा. तू लाख इंकार कर . पर तेरा दिल चीख कर कहता है तुझसे की आगे बढ़ और थाम ले मेरा हाथ.

निशा- नहीं थाम सकती कबीर, नहीं थाम सकती

मैं- तो फिर ठीक है छोड़ दे मुझे मेरे हाल पर आगे कभी ऐसी रात आई तो तुझे कसम है मत आना . और मैं मर गया तो रोने जरुर आना . कम से कम मरने के बाद ही मुझ पर तेरा हक़ होगा.

निशा- मरने की बात मत कर

मैं- तू साथ जीना भी तो नहीं चाहती

निशा- मर तो बहुत पहले गयी थी जीना तूने ही सिखाया

मैं- तो फिर जीती क्यों नहीं मेरे साथ क्या रोक रहा है तुझे मेरी होने से

निशा- नसीब .मेरा भाग्य रोक रहा है कबीर.

मैं- तेरा भाग मैं हूँ तू एक बार कह तो सही की तू तैयार है ज़माने को तेरे कदमो में झुका दूंगा मैं मेरी जान .

निशा- तू समझता क्यों नहीं

मैं- मेरी पत्नी बन सारी जिन्दगी मुझे समझाती रहना .

निशा- डाकन का हाथ थाम कर जीवन के सफर पर चलना सजा होगा तेरे लिए

मैं- ये सजा भी मंजूर सरकार मुझे .

निशा ने एक बार आसमान में देखा और फिर उठ कर अपने होंठ मेरे होंठो से जोड़ दिए. दिल को ऐसा करार आया की रात की तमाम तकलीफे फिर याद नहीं रही .तभी निशा की नजर मेरे सीने में लटकी चेन पर पड़ी.

निशा- ये क्या है

मैं- रुडा की बेटी ने दी मुझे

निशा ने उसे हलके से छुआ और बोली- कुंवर साहब , हम अपना आशियाना इसी जगह बनायेंगे

मैं- क्या कहा जरा फिर से कहना

निशा- डाकन ने तुम्हारी होना चुन लिया है

सच बताऊ मेरी आँखों में कितनी ख़ुशी थी . मैंने उसे एक बार फिर से बाँहों में भर लिया और चूम लिया.

मैं- जल्दी से जल्दी तुझे अपनी बनाना चाहता हूँ कल से ही यहाँ घर बनाना शुरू होगा. सपनो का घर तेरा मेरा घर .

निशा- ये पथ परीक्षा लेगा कबीर

मैं- तू मेरा हाथ थामे रखना

निशा- मेरी दो बाते है .

मैं- तू चार बता सरकार

निशा- तेरे मेरे ब्याह में कोई रस्मे नहीं होंगी

मैं- मंजूर

निशा- दूसरी बात तू लेने आएगा मुझे . मैं तब थामुंगी तेरा हाथ और एक बार जो मैंने तेरा हाथ थामा फिर छोड़ नहीं पाउंगी .

मैं- तू जब बुलाएगी मैं दौड़ा आऊंगा.

निशा- कर ले तयारी फिर.................

डाकन ने हाँ कर दी थी . सुबह निशा को छोड़ने के बाद मैं सीधा घर गया . घर वाले बस जागे ही थी की मैंने उनकी नींद उड़ा दी.

मैं- भाभी,मैंने कहा था न की उसके हाँ कहते ही ब्याह कर लूँगा . वो दिन आ गया है.

भाभी के हाथ में पानी का जग था जो छूट का फर्श पर गिर गया जोर की आवाज पुरे घर में गूंजने लगी.
 
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