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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

पहली बात तो ये की विशम्बर दयाल हरामी, कमीना, नीच, गलीच, घटिया, सुअर और कुत्ता है..
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और आखिरी बात भी यही है। साला, इसका एक पांव कब्र में है और ये अपनी बेटी जैसी लड़की के साथ बिस्तर तोड़ रहा है, यही नहीं, उसे, उसके सगे भाई के सामने भी परोस रहा है। भाभी ने कहा की अभिमानु ढाल है अंजू की,यानी यदि अभिमानु ना हो तो, ये कुत्ता, अंजू पर भी चढ़ जाए।
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इसे कोई बताओ की इस उम्र में ज़्यादा उछल - कूद करेगा, तो हृदयाघात से ही मर जाएगा। अब मुझे शक है की अंजू का बाप कौन था, बेटी जैसी चम्पा को नहीं छोड़ा इस चूतिये ने तो बहन जैसी सुनैना को कहां छोड़ा होगा? साला,
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...

अभी तक एक बात स्पष्ट हो चुकी है की कबीर के गांव में लोगों को सोने से ज़्यादा छेदों का शौक है। चाहे वो कबीर खुद ही, मंगू नामक कुत्ता हो, जरनैल हो, या फिर हरामियों का हरामी - विशम्बर दयाल।
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कबीर का बाप जानता है समाधि के नीचे रखे सोने के बारे में, अंजू भी जानती है, शर्तिया अभिमानु भी जानता होगा, परंतु वो सोना किसी को भी नहीं चाहिए। निशा देवी के खंडहर में तालाब की तलहटी में पड़ा सोना, और उस आंशिक संभोग कक्ष में पड़ा सोना.. किसी को भी नहीं चाहिए। ऐसे में ये कहना की कहानी में सारी फसाद की जड़ सोना है, गलत होगा। असल में इस गांव में कुछ वर्ष पूर्व एक संभोग नामक विषाणु फैल गया था, जिसके प्रभाव से इस गांव के सभी आदमी और औरतें, और लड़कियां.. इसी कार्य में खोए हुए हैं।
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अभिमानु का शरीर या तो उस विषाणु से लड़ने में सक्षम रहा होगा या फिर उसने अपने संभोग की कथाएं किसी के सामने नहीं आने दी होंगी। नंदिनी भी कबीर के घर में रहकर वैसी ही हो गई है तभी कबीर के गाल पर गर्म सांसें छोड़ रही थी... और हां, फौजी भाई चाहे कितना भी कहें की नंदिनी का कबीर द्वारा नग्न रूप में देखा जाना, कोई बड़ी बात नहीं थी, अर्थात कई घरों में ऐसी घटना हो जाती है! परंतु मैं अब भी यही कहूंगा कि ये सब उस चालाक लोमड़ी नंदिनी की सोची - समझी साजिश थी। दिल की बातें जो कर रही थी कबीर से, अचानक ही निशा को लेकर उसका स्वर बदल गया, चम्पा की शादी में उसे बुलवाने को तैयार हो गई, पक्का कुछ सोचा है इस चालबाज़ औरत ने...
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मंगू... कम से कम एक लाख हराम के पिल्ले मरे होंगे तब जाकर इस महापुरुष का जन्म हुआ। साफ शब्दों में मंगू का परिचय दिया जाए तो ये उस गंदी नाली का कीड़ा है जिसमें जानवर भी पांव ना मारे.. दूसरे शब्दों में हरामियों के भगवान - विशम्बर दयाल का पालतू कुत्ता है मंगू। रमा तक तो समझ आता है, की सामने से मुफ्त में मिल रही औरत कौन छोड़ता है? परंतु, चम्पा..? माना की चम्पा खुद भी महा - कमीनी है, परंतु भाई होने के नाते, मंगू को ना केवल विशम्बर दयाल के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए थी, बल्कि उसकी हत्या कर देनी चाहिए थे, भले ही इसमें मंगू खुद ही क्यों ना मर जाता। परंतु, उस हराम के जने ने चम्पा को खुद भी भोग लिया...
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एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, मंगू कहीं विशम्बर का ही पिल्ला तो नहीं? संभव है की उस मनहूस ने मंगू की मां तक को ना छोड़ा हो...
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खैर, यदि कहानी के पिछले कुछ भागों में हुई प्रगति पर नज़र डाली जाए तो। सर्वप्रथम, नंदिनी का कोई गहरा मंतव्य है उस सबके पीछे जो वो कर रही है। उसका कबीर को चुनिंदा बातें बताना, निशा को लेकर उसका रुख, और अब निशा को चम्पा के ब्याह में बुलाने की बात, मुझे शक है की असल में नंदिनी शायद इस घर की विभीषण है। असल में, उसका कार्य अपना कोई विशेष मतलब निकालना है, पिता - पुत्र में दूरियां लाकर। हालांकि, विशम्बर इसी लायक है, की कबीर उसकी लाश तक को लावारिस छोड़ दे, परंतु, फिर भी, मुझे यही लगता है कि नंदिनी कुछ तो खिचड़ी पका रही है!
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रमा को जल्द से जल्द ढूंढना होगा कबीर को और उसे मगरमच्छों के सामने डालना होगा। कबीर अपने दुश्मनों को ज़िंदा छोड़ता है यही उसकी गलती है। वैसे यदि वो रमा को ज़िंदा छोड़ भी से तो भी वो मर ही जाएगी, ऐसा मुझे लगता है। जैसे की वैद के साथ हुआ था।
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पर देखना होगा की रमा आखिर चाहती क्या है? मेरे ख्याल में विशम्बर दयाल की कोई साजिश है जिसके चलते रमा कबीर से मिली और बाकी सब चीज़ें हुईं। परकाश, कबीर पर नजर रखे हुए था, हो ना हो, ये भी उस सूअर की ही चाल होगी...
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एक मुख्य बिंदु है अंजू! कबीर ने यही निष्कर्ष निकाला था की जंगल में परकाश के साथ संभोग में लिप्त औरत रमा थी परंतु अब सूरजभान और अंजू के मध्य हुई बातों से कुछ और ही लगता है। क्या सचमें अंजू परकाश से प्यार करती थी, या अपने मुंहबोले मामा की तरह हवस ही रखती थी? सुरजभान से उसका कहना की वो उसके दुख का कारण ना हो, यही अच्छा है, संकेत करता है की वो शायद परकाश की मौत का कसूरवार सूरजभान को भी मान रही है। और ये एक और *beep* सूरजभान क्या ढूंढ रहा है, जिसका ज़िक्र वो अंजू से कर रहा था..?
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खैर, अब इंतज़ार है तो निशा जी का, क्या वो आयेंगी कबीर के बुलावे पर, चम्पा के ब्याह में? क्या अगला नंबर शेखर का है? शायद विशम्बर दयाल मरवा दे शेखर को, ताकि वो चम्पा के साथ मौज करता रहे, हो सकता है की शेखर विशम्बर का ही आदमी हो, और उससे चम्पा की शादी करवा, वो अपना पक्का इंतेजाम कर रहा हो। देखना ये है की क्या चम्पा नामक इस हरामन में थोड़ी शर्म बची है की कबीर से बात करने के बाद वो विशम्बर और हरामी मंगू से दूर रहती है या नहीं। इसके बारे में ज़्यादा नहीं बोलूंगा क्योंकि मुझे लग रहा है की फौजी भाई इसे अंत में हालत का मारा, या बेचारी, या बलिदानी सिद्ध कर ही देंगे।

खैर, सभी भाग बहुत ही खूबसूरत थे भाई। इतने समय बाद भी सभी रहस्य बने हुए हैं, और यही लेखक के तौर पर आपकी काबिलियत का सबसे बड़ा प्रमाण है।

प्रतीक्षा अगले भाग की...
 
#98

दो सवाल अंजू यहाँ क्या कर रही थी , और भैया रात को कहाँ गए थे. घूमते घूमते मैं मलिकपुर पहुँच गया , रमा की दूकान पर कुछ लोग थे. मैं अन्दर गया तो रमा मुझे मिल गयी .

मैं- कब से ढूंढ रहा हूँ और तुम हो की कहा गायब हो गयी थी , तुमसे जरुरी बात करनी थी .

रमा- अन्दर चलो मैं आती हूँ

कुछ देर बाद वो आई.

रमा- क्या बात थी

मैं- पिताजी और तुम्हारे बीच कब से ये सब चल रहा है

रमा- कुछ नहीं है हमारे बीच, कभी कभी वो बुलाते है मुझे . कभी अपनी मनमानी करते है कभी नहीं पर एक सवाल जरुर पूछते है

मैं- कैसा सवाल

रमा- यही की ठाकुर जरनैल मेरे पास आये क्या .

मैं- और क्या जवाब होता है तुम्हारा

रमा- यही की मैंने बरसो से उनको नहीं देखा.

मैं- मैंने मंगू के साथ भी देखा तुमको

रमा- राय साहब का कुत्ता है वो , हमारे जिस्मो की कुछ बोटिया कुत्तो को भी डाल देते है राय साहब ताकि हमें हमेशा याद रहे हमारी औकात.

मैं- उस रात जंगल में प्रकाश के साथ तुम चुदाई कर रही थी . तुम दोनों मिल कर चुतिया बना रहे थे मुझे

रमा- मेरी ऐसी मंशा नहीं थी न ही कभी प्रकाश ने मुझसे कुछ कहा तुम्हारे बारे में . वो बस आता चोदता और चले जाता.

मैं- बस इतना ही

रमा- हां, इतना ही .

मैं- देख रमा, मैंने तुझे वैध से चुदते देखा, फिर परकाश से फिर पिताजी और मंगू से, चाचा पहले से ही पेलता था तुझे. मैं नहीं जानता इस खेल में कौन गलत है कौन सही, मैं नहीं जानता तेरे मन में क्या चल रहा है तू चाहे दुनिया में आग लगा दे परवाह नहीं पर इतना ध्यान रखना तेरी खुराफात में किसी मजलूम का नुकसान न हो . तेरी चूत तू किसी को भी दे तू जाने.

रमा- क्या जानना चाहते हो मुझसे कुंवर.

मैं- चाचा कहाँ है ये जानना चाहता हूँ मैं

रमा- बस यही नहीं जानती मैं

मैं- रुडा और चाचा की लड़ाई हुई थी क्या रुडा का हाथ हो सकता है इसमें

रमा- मुझे नहीं लगता. रुडा बेशक घटिया है पर इतना नहीं गिरेगा वो .

मैं- परकाश को किसने मारा होगा.

रमा- चर्चा तो ये है की सूरजभान ने मारा है

मैं- किसने कहा ऐसा.

रमा- कहने को कौन आएगा उडती उडती खबर है .

मैं- पर सूरजभान तो साथ रहता था प्रकाश के फिर क्यों मारेगा उसे.

रमा-पिछले कुछ समय से अंजू और सूरजभान की तल्खी बहुत बढ़ गयी है . सूरज को लगता है की प्रकाश अंजू को चोदता है , कोई उसके घर की लड़की पर हाथ डाले ये उसे गवारा नहीं था शायद इसलिए ही .

मैं- पर अंजू तो उनके साथ रहती तो नहीं

रमा- साथ नहीं रहती पर है तो उनके परिवार की ही , है तो उसकी बहन ही.

मैं- चाचा को सबसे प्यारी तू थी , कभी चाचा ने तुझे कुछ ऐसा बताया जो तुझे खटका हो .

रमा- ऐसा तो कुछ खास नहीं था . पर वो कभी कभी कहते थे की राय साहब उनसे स्नेह नहीं करते थे .

मैं- और

रमा- छोटे ठाकुर का दिल उस घर में नहीं लगता था वो जायदातर समय जंगल में ही रहना पसंद करते थे .

मैं- जंगल में कहा था ठिकाना तुम लोगो के मिलने का.

रमा- ज्यादातर तो खेतो पर बने कमरे में ही मिलते थे या फिर छोटे ठाकुर की गाडी में .

चाचा भी गाडी रखते थे , ये तो मुझे मालूम ही था क्योंकि मैंने कभी भी चाचा की गाड़ी नहीं देखि थी .

मैं- चाचा की गाडी

रमा- हाँ,

मैं- तो अब कहा है वो गाडी

रमा- मालूम नहीं , जब से छोटे ठाकुर गए है गाड़ी देखि नहीं मैंने,शायद वो साथ ही ले गए हो.

मैं- इतने लोग से चुदने का क्या कारन है , चूत देकर क्या पाना चाहती है तू .

रमा- नहीं जानती .

मैं- जानता हु अब वापिस लौटना मुश्किल है पर फिर भी कोशिश तो कर ही सकती है न , अगली बार जब राय साहब तेरे पास आये तो तू मना करना कहना की कबीर ने कहा है .

रमा- राय साहब के खिलाफ जाओगे कुंवर.

मैं- वो मेरी समस्या है . क्या इतना मालूम कर सकती है की जिस दिन चाचा यहाँ से गया आखिरी बार वो किसके साथ था , किस से मिला था . कोई लेन देन कुछ तो ऐसा बताया होगा तुझे चाचा ने जो उस समय अजीब नहीं लगा हो पर आज उसका महत्त्व हो.

रमा- ऐसा तो कुछ खास नहीं है , छोटे ठाकुर बात बहुत कम करने लगे थे जब वो मिलने को बुलाते थे तो बस चुदाई की और हमारे लिए जो भी तोहफे लाते थे देकर चले जाते थे . कभी मैं पूछती तो टाल देते थे पर शायद अपने मन में कुछ तो छिपा रहे थे वो.

मैं- ऐसी कौन सी जगह थी जहाँ पर वो सबसे जायदा जाते थे मतलब जब वो चुदाई नहीं कर रहे होते थे तब.

रमा-नहीं मालूम पर वो हमें गहने देते थे तो कहते थे की ये बहुत बढ़िया कारीगर से बनवाये है .

मैं- कौन था वो कारीगर

रमा- यही, अपने सुनार और कौन. मुझे याद है एक बार उन्होंने कहा था की वो छोटी ठकुरानी के लिए कुछ विशेष गहने बनवा रहे थे.

"सुनार , ह्म्म्म " मैंने कहा और वहां से चल दिया. अचानक से मुझे उन गहनों में उत्सुकता जाग गयी थी जो चाचा ने चाची के लिए बनवाये थे . मुझे वो गहने देखने थे और साथ ही मालूम करना था की चाचा की गाडी कहाँ गयी.

वापसी में मुझे अंजू फिर मिली, तनहा रात में आग जलाये सडक किनारे बैठी थी वो . इतनी रात को ये बहन की लोडी क्या करती है जंगल में मैं सोच कर ही पगला जा रहा था.

मैं- इतनी रात को यु अकेले जंगल में भटकना ठीक नहीं

अंजू- ये बात तुम पर भी लागू होती है

मैं- मैं तो अपने काम से गया था

अंजू- मुझे भी कोई काम हो सकता है न

मै आंच के पास बैठ गया और हाथ सेंकने लगा.

अंजू- क्या चाहते हो तुम इस जंगल से

मैं- अपने कुछ सवालो के जवाब

अंजू- क्या है सवाल तुम्हारे.

मैं- यही की ये जंगल क्या छिपा रहा है मुझसे

अंजू- मौत छिपी है यहाँ पर ,

मैं- कैसी मौत किसकी मौत

अंजू- मेरी मौत तुम्हारी मौत . हम सब की मौत. यहाँ जो ख़ामोशी है वो चीखो से दबी है , जंगल का कोना कोना रक्तरंजित है

मैं- किसका रक्त

अंजू- न तुम्हारा, न मेरा . अरमानो का रक्त, जज्बातों का रक्त, ..................
 
#99


मैं- देखो बात ये है की मुझे आदत नहीं है ये घुमा फिरा कर कहने वाली बातो की मैं जानना चाहता हूँ की क्या कारन है तुम इतनी रात को जंगल में घुमती हो. जबकि आदमखोर ने कितने लोगो को अपना शिकार बना लिया है

अंजू- मुझे उसकी परवाह नहीं है और फिर मौत से क्या डरना जिन्दगी के सफ़र का अंतिम पथ तो मौत ही है न .

मैं- तुम चाहे कहो की तुम प्रकाश से प्यार करती थी पर वो तुम्हे नहीं चाहता था , तुम्हारी पीठ पीछे न जाने कितनी औरतो संग चक्कर था उसका.

अंजू- फिर भी मैं जानना चाहती हूँ की उसे किसने मारा.

मैं- वैसे इस जंगल में तुमने किसकी मौत देखि थी .

अंजू- तुम्हे जानने की जरुरत नहीं

मैं- जरुरत है , एक रात अचानक से तुम मुझे मिलती हो , हम एक दुसरे को जानते है और पहली ही मुलाकात में तुम मुझे ये लाकेट देती हो क्यों

अंजू- इस लाकेट से तुमको इतनी ही परेशानी है तो वापिस दे दो मुझे अभी .

मैं- बेशक पर पहले मैं वो कारण जानना चाहता हूँ जिसके लिए तुम रात भटक रही हो .

अंजू- मैंने कहा न तुमको जानने की जरुँत नहीं

मैं- चाहूँ तो दो थप्पड़ मार कर भी पूछ सकता हूँ , एक मिनट नहीं लगेगी और जुबान टेप के जैसे चल पड़ेगी तुम्हारी.

अंजू- अपनी हद पार मत करो कबीर

मैं- हद तो देखि ही नहीं तुमने

अंजू-राय साहब को अगर मालूम हुआ की तुमने मेरे साथ बदतमीजी की है तो खाल खींच लेंगे तुम्हारी

मैं- जुती की नोक पर रखता हु मैं राय साहब जैसो को . तुमने मुझे झूठी कहानी बताई तुम भी जानती थी की उस रात गाड़ी के पास परकाश के साथ तुम नहीं रमा थी फिर मुझसे क्यों झूठ बोला तुमने , मेरे साथ क्या खेल खेल रही हो तुम.

अंजू- रमा से नफरत है मुझे कबीर, वो साली जैसी दिखती है वैसी नहीं है वो

मैं- हो सकता है , पर उसे फंसाने की कोशिश क्यों

अंजू- प्रकाश के सम्बन्ध थे रमा से, जब कोई अपना धोखा दे तो सहन करना मुश्किल होता है . पर मेरे लिए रमा से कुछ और जानना भी बहुत जरुरी था .

मैं- क्या , और अब तक तुम जान क्यों नहीं पाई.

अंजू- मैं जानती हूँ की मामा जरनैल के गायब होने के पीछे रमा का हाथ है .

मैं- कैसे और अगर ऐसा है तो तुमने ये बात राय साहब को क्यों नहीं बताई

अंजू- मैंने बताई थी उनको, रमा पर नजर है उनकी पर अफ़सोस उनके हाथ खाली है आजतक. मामा के गायब होने के कुछ दिनों पहले की ही बात है , उस शाम मैं नंदिनी से मिलने जा रही थी , पर कुवे पर उस दिन नंदिनी की जगह कोई और था , रमा और छोटे मामा. पहले तो मुझे लगा की रमा खेत पर काम करती होगी पर जब मैंने नजदीक से उनकी बाते सुनी तो छोटे मामा नाराज थे रमा पर.

मैं- रमा पर , क्यों, रमा तो उनको सबसे प्रिय थी .

अंजू- शायद इसलिए ही वो नाराज थे, छोटे मामा को मालूम हो गया था की रमा ने किसी और से भी नाता जोड़ लिया है .

मैं- किस से .

अंजू- यही नहीं जानती मैं इस बात का सबूत आज तक नहीं मिला मुझे.

मैं- प्रकाश ही रहा होगा

अंजू- नहीं , प्रकाश होता तो वो इतने दिन जिन्दा नहीं रह पाता छोटे मामा कभी का मरवा देते उसे.

मैं- तो फिर कौन हो सकता है

अंजू- कह नहीं सकती . मैंने रमा पर बहुत नजर रखी है पर प्रकाश के सिवा किसी और के पास नहीं गयी वो .

मैं समझ गया था की अंजू को गहराई की जानकारी नहीं थी .

मैं- चलो मान लिया रमा वाली कहानी पर तुम क्यों भटक रही हो जंगल में., मेरा सवाल फिर भी वही है .

अंजू-क्यों जानना चाहते हो तुम

मैं- क्योंकि तुम ही वो आदमखोर हो, तुम ही हो वो कातिल . मैं जानता हूँ सबसे बढ़िया जगह जंगल ही है . मैंने तमाम हिसाब लगाया है , जिन जिन रातो को आदमखोर की बेचैनी रहती है उन्ही रातो को तुम जंगल में भटकती हो.

अंजू- ओह, इतना बड़ा राज मालूम हो गया तुमको अब मैं क्या करुँगी. हाय मेरे ऊपर तो साया चढ़ रहा है हा हा

मैं- बात को घुमाओ मत

अंजू- ठीक है फिर अगली चाँद रात को मैं तुम्हारे साथ रहूंगी ,

मैं- अगली चाँद रात को मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पाऊंगा.

अंजू- अभी से डर गए तुम , चाँद रात तो आई भी नहीं,

मैं- उस रात मुझे कुछ काम है

अंजू- क्या काम है तुम्हे, आदमखोर का दीदार करने से ज्यादा और क्या जरुरी है तुम्हे .

मैं- उस रात ब्याह है चंपा का

अंजू- ये तो और अच्छी बात है न, ब्याह में मैं भी आउंगी मुझ पर नजर रखने का बढ़िया मौका रहेगा तुम्हारे लिए.

इतना कहने के बाद अंजू उठ खड़ी हुई और चली गयी . मैंने आंच बुझाई और अपनी राह चल दिया. अगले दिन मैंने सबसे पहले चाची को पकड़ा.

मैं- चाचा ने तेरे लिए जो गहने बनवाये थे वो देखने है मुझे

चाची- उन्होंने कभी कोई गहने नहीं दिए मुझे. जो भी है वो ब्याह में दिए हुए है उसके बाद कुछ नहीं दिया मुझे .

मैं- याद कर चाची,

चाची ने अपनी अलमारी खोली और कुछ डिब्बो को बाहर रखते हुए बोली- देख ले , जो है यही है.कुछ मैंने नंदिनी को दे दिए पर ये सब मेरे बयाह में मिले थे .

मैं-रमा ने बताया की चाचा ने तेरे लिए गहने बनवाए थे

चाची- तो फिर उसी रंडी से पूछ ले की कहीं मेरी जगह उसको तो नहीं दे दिये वैसे भी तेरा चाचा मुझसे ज्यादा तो उसके पास ही रहता था .

मैं चाची की व्यथा समझता था पर चाचा ने गहने बनवाये थे तो फिर वो गहने गए कहाँ सोचने की बात तो थी. मैं ये मान भी लू की अगर तालाब वाले कमरे में चाचा इन रांडो को चोदता था तो फिर रमा और सरला क्यों नहीं जानती थी उस कमरे के बारे में.

खैर, मैंने अब मलिकपुर के सुनार से मिलने का निर्णय लिया वो ही अब कुछ बता सकता था . मैंने साइकिल उठाई और मलिकपुर की तरफ बढ़ गया जंगल पहुंचा ही था की सड़क के बीचो बीच मैंने कुछ ऐसा देखा की मैंने सोचा नहीं था. साइकिल अपने आप रूकती चली गयी. .................. नजरे जम गयी ................

 
#100

गहरी काली आँखों ने पलके झुका कर अहसास करवाया वो ही थी .केसरिया लहंगे-चोली पर पड़ती धुप की किरने जैसे की साक्षात् सूर्य ही मेरे सामने खड़ा हो गया था .

मैं- तुम यहाँ

निशा- यहाँ नहीं तो फिर और कहा .

मैं- दिन के उजालो में रात की रानी

निशा- आदत डाल रही हूँ उजालो की जबसे तुमसे नाता जोड़ा है मेरी राते भी अब मेरी नहीं रही

मैं- ये तो है सरकार. मैं तुमसे मिलना चाहता ही था आज रात जरुर आता मैं पर देखिये तक़दीर, तुम अभी मिल गयी .

निशा- कितनी अजीब बात है न तुम मुझसे मिलने को बेकरार मैं तुमसे मिलने को बेक़रार.

मैं- यही तो है प्यार सरकार

निशा मुस्कुराई . उसकी ये मुस्कान ही तो थी जिसे मैं अब हर पल देखना चाहता था ,

मैं- सुन, चंपा का ब्याह है , तेरा निमन्त्रण है

निशा- मैं कैसे आउंगी

मैं- घर की छोटी बहु नहीं आएगी तो फिर हमारा क्या ही रुतबा रहेगा . वैसे भी ये निमन्त्रण मेरे साथ साथ नंदिनी भाभी ने भी भेझा है

निशा- मेरे यार का न्योता सर माथे पर , पर मैं कैसे आ पाऊँगी

मैं- बरसों बाद ख़ुशी की घडी आई है निशा, तू मेरा ही तो हिस्सा है , और एक हिस्सा जब दूर रहेगा तो दूसरा हिस्सा कैसे ख़ुशी मना पायेगा.

निशा- मुझे खुशियों की आदत नहीं कबीर, दुनिया मुझे मनहूस मानती है कहते है की जहाँ डायन के कदम पड़े वहां पर खुशिया झुलस जाती है , रुदन-विलाप शुरू हो जाता है .

मैं- कुछ नहीं होगा. मैं हूँ न. मेरा नहीं तो नंदिनी भाभी का ही मान रख लो

निशा- मैं सोचूंगी

मैं - सोचना नहीं तुझे आना है.

निशा मुस्कुराई .

मैं- जंगल की राते अब सुनी नहीं रही निशा, कोई न कोई भटक रहा है इधर उधर

निशा- खबर है मुझे

मैं- अंजू क्या चाहती है ये नहीं समझ पा रहा मैं, पहले मैंने सोचा था की उसे सोने का लालच होगा पर उसकी माँ उसके लिए इतना छोड़ कर गयी है उसे मोह ही नहीं रहा . प्रकाश के बारे में भी झूठ बोली वो. कल रात सूरजभान से झगडा हुआ उसका. सूरजभान पर शक है उसे की वो ही प्रकाश का कातिल है . समझ नहीं आ रहा की ये चल क्या रहा है .

निशा- नसीब, इन सब का नसीब इन्हें जंगल में बुला रहा है ,अंजू चाहती थी परकाश को , पर वो ना लायक उसे बस इस्तेमाल करता था , अंजू कभी नहीं समझ पाई इस चीज को . प्रकाश बहुत अय्याश किस्म का व्यक्ति था , कितनी ही औरतो को इसी जंगल में अपनी हवस का शिकार बनाया था उसने. सूरजभान को मालूम था की उसकी बहन और प्रकाश का क्या नाता है , उसे गवारा नहीं ये रिश्ता, पर उसमे इतनी हिम्मत नहीं है की कत्ल कर सके.

मैं- तो फिर कौन हो सकता है जो पेल गया उस चूतिये को .

निशा- मैं तेरे साथ थी न उस वक्त .

मैं- जानता हु बस सम्भावना तलाश रहा हूँ

निशा- संभावनाए अपने साथ अनंत विचार लेकर आती है कबीर, निरर्थक विचार जो मन को उलझाते है बस .

मैं- तू मेरी थोड़ी मदद कर न ,

निशा- मेरी नजर में है ये सब पर इनमे से कोई भी तालाब की तरफ आता नहीं .

मैं- यही तो मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ की उस कमरे में कौन आता-जाता होगा. और कमरे का जिक्र छोड़ दे तो फिर इस जंगल में ऐसा कौन सा ठिकाना हो सकता है जहाँ पर ये रास चलता हो.

निशा- उस बिस्तर, उन किताबो से तो यही लगता है की उस कमरे में ही होता था सब कुछ

मैं- तो फिर अब क्यों नहीं जाते ये लोग

निशा- आयेंगे, कभी न कभी तो आयेंगे.

मैं- मुझे लगता है की अंजू आदमखोर है

निशा- कैसे

मैं- वो बहुत समय तक गायब रही , उसका व्यवहार संदिग्ध है और चांदनी रातो में ही वो भटकती है

निशा- ये तो हम दोनों भी करते है तो क्या हम भी आदमखोर है

मैं- कम से कम मैं तो हूँ

मैंने गहरी सांस ली

निशा- फ़िक्र मत करो. तुम वो नहीं हो. तुम संभाल लोगे खुद को .

निशा ने मेरे गालो पर हल्का सा चुम्बन लिया और बोली- जाती हूँ ,

मैं- रात को मिलेंगे

निशा- नहीं ........

जाते जाते उसने एक बार मुड कर देखा कसम से उसके नैनो के तीर सीधा दिल में उतर गए. उसके जाने के बाद मैंने भी साइकिल उठाई और मलिकपुर पहुँच गया सुनार के पास.

सुनार- आइये कुंवर ,आपने तकलीफ क्यों की मुझे बुला लिया होता.

मैं- हमारा कुछ सामान बहुत समय से आपके पास पड़ा है , सोचा आज वापिस ले चलू

सुनार ने अपने चश्मे को इधर उधर किया और बोला- कैसा सामान कुंवर मैं समझा नहीं , बयाह के सारे जेवर तो मैंने पहुंचा ही दिए है .

मैं- और उन गहनों का क्या जो कभी कोई लेने आया ही नहीं .

सुनार- मैं बरसों से इन्तजार कर रहा था की कोई आये ये पूछने मुझसे

मैं- हाँ तो मैं अब आ गया हूँ वो गहने देखने है मुझे

सुनार- गहने तो नहीं है मेरे पास

मैं - तो कहाँ है वो गहने

सुनार- छोटे ठाकुर ले गए थे वो गहने .

मैं- पर वो गहने घर पर नहीं है .

सुनार- रोजी रोटी की कसम खा कर कहता हूँ की छोटे ठाकुर वो गहने ले गए थे मुझसे चाहो तो जल की सौगंध उठा लू पर हाँ जब वो यहाँ से गए तो उनकी जेब से कुछ गिर गया था . ध्यान आते ही मैंने उनको आवाज दी पर वो जा चुके थे .

मैं- क्या गिर गया था चाचा की जेब से

सुनार उठा उसने अपनी अलमारी खोली , कुछ देर वो टटोलता रहा और फिर एक चाबी मेरी हथेली पर रख दी. मैं कुछ देर उस चाबी को देखता रहा .

मैं- किस जगह की है ये चाबी

सुनार- मैं क्या जानू.

सुनार के पास गहने तो नहीं मिले पर ये चाबी मिली. चाचा का वो ताला कहाँ था जिसकी ये चाबी थी . वापसी में मेरे पास कुछ नहीं था निराशा के. खैर घर आया तो पाया की टेंट वाले आ गए थे, एक तरफ शामियाना लगाया जा रहा था , गली की साफ़ सफाई की जा रही थी . हलवाई अपने बर्तन साफ़ कर रहा था .

मैं सीधा चाची के पास गया .

चाची- घर पर इतना काम है और तू सुबह से गायब है .

मैं- सुबह से गायब था पर रात को तेरे साथ ही रहूँगा . और आज तू मना नहीं करेगी चाहे कुछ भी हो आज देनी पड़ेगी.

चाची- मरवाएगा क्या तू, आज से रस्मे शुरू हो रही है , रात को गाँव की औरते होंगी. गीत गायेंगे कहाँ समय लगेगा अब तो इस ब्याह के बाद ही दूंगी.

मैं- लूँगा तो आज ही .

"क्या बाते हो रही है " भाभी ने हमारी तरफ आते हुए पूछा

मैं- चाची मुझे दे नहीं रही है .

मैंने कहा तो चाची और भाभी दोनों ही सकपका गयी.............
 
#101

भाभी- क्या नहीं दे रही हो चाची

चाची- कुछ , कुछ नहीं ऐसे ही जिद करे हुए है की मैं खाना परोस कर दूंगी तभी खायेगा. अब तू ही बता घर में इतने काम है खुद खा लेगा तो क्या घट जायेगा इसका.

भाभी- देनी तो तुमको ही होगी चाची .

भाभी ने ये कहा तो इस बार मैं सकपका गया .

भाभी- मेरा मतलब रोटी चाची. आप तो जानती है की कितना जिद्दी है ये

चाची- तू ही संभाल अपने देवर को , वर्ना मुझे ऐसे ही तंग करता रहेगा.

चाची हम दोनों को छोड़ कर बाहर चली गयी.

भाभी- बड़े बेशर्म हो गए हो तुम खुले आम मांग रहे हो चाची से

मैं- कैसी बाते कर रही हो भाभी

भाभी- अच्छा जी तुम कर सकते हो हम बोल नहीं सकते.

मैं- कोई और नहीं मिला क्या सुबह से जो मेरी टांग खींच रही हो.

भाभी- चलो छोड़ो, ये बताओ सुबह से किधर गायब थे.

मैं- डायन से मिलने गया था

भाभी- कैसी रही मुलाकात

मैं- जैसी हमेशा होती है

भाभी- खैर, तुम्हारे भैया शाम तक आयेंगे, तब तक यही रहना छोटे मोटे काम देख लेना.

मैंने चंपा को देखा बड़ी प्यारी लग रही थी . उसके हाथो पर मेहँदी रचाई जा रही थी. दरवाजे की टेक लगाये मैं उसे देखता रहा. कुछ ही दिनों में बचपन की साथी हमसे पराई हो जाने वाली थी इक पल के लिए हमारी नजरे मिली और मैं वहां से हट गया.

दिमाग में बस वो चाबी घूम रही थी . मैंने सरला को पास आने का इशारा किया . वो आई.

मैं- इस चाबी के बारे में तू क्या जानती है

सरला ने चाबी को देखा और बोली- कुछ नहीं .

मैं- पक्का

सरला- पक्का.

मैं- आज रात मिलेगी

सरला- इतने लोग है कैसे मुमकिन होगा.

मैं- कोशिश करेगी तो मुमकिन होगा.

सरला- देखूंगी.

कुछ देर के लिए मैं धर्मशाला में चला गया. बारात के रुकने की वयवस्था वहीँ पर होनी थी . सफाई वगैरह करवाई. दरी बिछवाई . हुक्का वगैरह का इंतजाम में शाम हो गयी थी. अँधेरे , मैं वापिस आया था भैया भी आ पहुंचे थे. ठण्ड बहुत ज्यादा थी आज तो मैंने भैया से कहा की दो बूँद दे दो हमको भी . भैया और मैं छत पर बैठ गए.

मैं- कहाँ थे पूरा दिन

भैया- न्योते बाँट रहा था . काफी तो हो गए कुछ रह गए है वो तू देख लेना

मैं- हो जायेंगे वैसे क्या हम रुडा को न्योता देंगे

भैया- तू जानता है न छोटे

मैं- सूरजभान तो दोस्त है आपका

भैया- कुछ चीजे बाहर ही ठीक रहती है उनको घर की दहलीज पर लाना उचित नहीं और फिर पिताजी को मालूम हुआ तो जानता ही है तू

मैं- आपने सब को थाम कर रखा, सबको साथ रखा, अंजू को , सूरजभान को पर क्या मेरा भाई मेरा साथ देगा

भैया- तू जिगर है मेरा तू मांग कर तो देख

मैं- मांग तो लूँगा पर आप दे न पाए तो

भैया ने अपना पेग निचे रखा और बोले- अपने जिगर की फरमाइश पूरी न कर पाया तो क्या फायदा मेरे होने का

मैं- वक्त आने पर मांगूंगा भाई,

भैया- ऐसा क्या चाहिए तुझे जो तू संकोच कर रहा है

दिल किया की बाप की करतूत भाई को बता दू पर खुद को रोक लिया ब्याह की शुभ घडी में तमाशा हो जाता .

मैं- ब्याह करना चाहता हूँ मैं

भैया- हाँ तो कहा तो था न तुझसे , चंपा के ब्याह के बाद तेरा ही नम्बर है . तू बता तो सही मुझे मैं खुद जाऊंगा रिश्ता लेकर.

मैं- बता दूंगा जल्दी ही .

भैया- लड़का बड़ा हो गया है हमारा.

मैंने देखा नंदिनी भाभी सीढियों पर खड़ी हमें ही देख रही थी .

भाभी- हो गया हो तो खाना लगा दू, फिर फुर्सत नहीं होगी मुझे

भैया- कुछ ख़ास भूख नहीं है मुझे तो अपने देवर से पूछ लो

भाभी- इस से क्या पूछना आजकल तो चाची ही देती है इसको

भाभी ने जिस अंदाज से कहा था भैया ने मेरी तरफ देखा

भाभी- मेरा मतलब आजकल इसका खाना-पीना चाची के साथ ही होता है न, वो ही परोसती है इसको

भैया- हां तो ठीक ही है न . परिवार साथ रहे इस से बड़ा सुख और क्या होगा. मैं जरा व्यवस्था देख कर आता हूँ.

मैं- ढोल बजा कर सारे गाँव को बता दो न चाची और मेरी बात

भाभी- जरुरत नहीं अपने आप ही सब जान जायेंगे.

मैं- तब की तब देखेंगे.

कम्बल ओढ़े, आंच तापते हुए मैं नाच-गाना देख रहा था . आँखों के सामने निशा का चेहरा आ रहा था बार बार. मैंने सोचा एक दिन आयेगा जब उसे साथ नाचूँगा मैं. मेरी जिदंगी में जब वो दुल्हन बन कर आएगी तो ये बेरंग जिदंगी रंगों से भर जाएगी.

"क्या सोच रहे हो कबीर " भाभी ने मेरे पास बैठते हुए कहा

मैं- निशा के बारे में , ऐसी किसी रात में उसका हाथ थाम कर बैठने की ख्वाहिश है मेरी.

तुरंत मुझे ध्यान आया की मैं क्या बोल गया .

मैं- कुछ नहीं भाभी , कुछ नहीं

भाभी- फ़िलहाल उसका नहीं मेरा हाथ थामो और उठो. बड़े दिनों बाद मौका लगा है अपने देवर संग नाचने का. आओ

भाभी ने लगभग मुझे खींच लिया था . सच ही तो था बरसों बाद इस घर में खुशियाँ आई थी , इन खुशियों को ही तो तरसता है इन्सान . मेरी आँख भर आई थी . उन लम्हों में कुछ देर के लिए मैं सब कुछ भूल गया था .

धीरे धीरे सब लोग चले गए था. जो रह गए वो सोने की तयारी करने लगा. जिसे जहाँ जगह मिली पसरा हुआ था . मैंने चाची को चोदने का सोचा पर वो कुछ और औरतो संग सोयी हुई थी . धीरे धीरे बत्तिया बुझने लगी. सर्द रात में मैं अलाव के पास बैठा नींद भरी आँखों से खुद को सोते-जागते महसूस कर रहा था .

"अभी तो रात ठीक से जवान नहीं हुई, अभी तो रात का दीदार नहीं हुआ, हम तो सनम के दर पर आये और हमारे सनम की आंखे डूबी जा रही है " कानो में ये आवाज आते ही झट से आँखे खुल गयी मेरी. केसरिया आंच के पार हमारी सरकार खड़ी थी. आधी सी रात में , गहरी धुंध की चादर ओढ़े मेरे आँगन में वो खड़ी थी , जिसको थोड़े दिन बाद इसी घर में लाल जोड़ा पहन कर आना था .

"तू कब आई मेरी जाना " मैंने कहा

निशा- डाकन ने तेरा न्योता स्वीकार कर लिया. अब तूने इतनी शिद्दत से याद जो किया ये कदम रुक ही नहीं पाये.

मैंने उठ कर उसे अपने आगोश में भर लिया. उसके माथे को चूमा . उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- देख , महसूस कर इन धडकनों को .

निशा की कमर में हाथ डाल कर और पास किया उसे खुद को .

मैं- ये रात गवाह है मेरी जान , इतना प्यार किया है , बस तुमसे प्यार किया है . तेरा इस घर में कदम रखना बंजर रेत में बरसात होने सा है .

निशा- इतना प्यार मत कर मुझे , मैं डायन हूँ

मैं- मेरी डायन के सीने में एक दिल धडकता है , जिसकी धड़कने बेताब है मुझे प्यार करने को , मुझे चाहने को

निशा-प्यार कर तो बैठी हूँ निभा कैसे पाउंगी

मैं- मोहब्बत अपनी मंजिल खुद ढूंढ लेगी.

"कौन है उधर " भाभी की आवाज आई . निशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे पीछे हो गयी. लालटेन की रौशनी हमारी तरफ आने लगी. मेरा दिल जोरो से धडकने लगा.
 
#102

"कौन है उधर " भाभी की आवाज आई . निशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे पीछे हो गयी. लालटेन की रौशनी हमारी तरफ आने लगी. मेरा दिल जोरो से धडकने लगा. भाभी यहाँ इस हालत में निशा को देखती तो पक्का गुस्सा करती ही . हम दोनों आँगन के बीचोबीच खड़े थे. लालटेन की रौशनी हमारी तरफ आ ही रही थी

"नंदिनी क्या कर रही हो "

ऊपर से भैया की आवाज आई

"आई, " भाभी ने कहा और वापिस मुड गयी . हमें राहत सी मिली मैं निशा को लेकर घर से बाहर निकल गया. फिर सीधा हम कुवे पर ही आकर रुके.

निशा- तो छिपना भी जानते हो तुम

मैं- छिप कर मिलने का अपना ही मजा है जान.

निशा मुस्कुराने लगी.

निशा- वैसे मेरे साथ देख लेती नंदिनी तो तुम पर गुस्सा बहुत करती

मैं- घबरा तो तुम भी गयी थी

निशा- तुमसे ही सीखा की छिप कर मिलने का मजा बहुत है .

हम दोनों ही हंस पड़े.

निशा- चंपा को कुछ तोहफे देना चाहती हूँ मैं भिजवा दूंगी कल तुम मेरी तरफ से उसे दे देना.

मैं- तुम खुद मिल कर दोगी तो अच्छा लगेगा उसे और हमें हमारी जान का दीदार हो जायेगा.

निशा- बस बहाने ढूंढते हो तुम

मैं- क्या करे जान, तुम बहाने कहती हो तुमसे मिलने के लिए हम जान दे दे

निशा ने अपनी ऊँगली मेरे होंठो पर रखी और बोली- जान देने के लिए नहीं होती , फिर न कहना ऐसा.

मैं- तो फिर क्या कहूँ मेरी सरकार

निशा- कुछ नहीं रात बहुत हुई .

मैं- अभी तो रात जवान हुई है और अभी से तुम घबराने लगी

निशा- अच्छा जी हमारी बाते हमी को सुनाई जा रही है. खैर, बयाह में अंजू भी आएगी ऐसा मेरा मानना है

मैं- आएगी जानता हूँ

निशा- तुम्हारे पास पूरा मौका रहेगा उसके साथ रहना वो अभिमानु के बहुत करीब है जब वो बाते करे तो कान लगाये रखना उम्मीद है कुछ मिलेगा तुमको.

मैं- मैंने भी यही सोचा है . वैसे प्रकाश इस जमीं के आस पास मरा था , अंजू भी इधर के चक्कर ज्यादा लगा रही है तुमको क्या लगता है

निशा- शायद इधर कुछ हो सकता है उनके मतलब का

मैं- मेरा भी यही विचार है जान, पर खुले खेत और ये कमरा इसके सिवा और क्या ही है यहाँ

निशा- जमीन तो है न , तुम हमेशा से यहाँ खेती कर रहे हो अगर तुम अपनी जमीं को नहीं पहचानते तो फिर क्या ख़ाक किसान हो तुम.

निशा की बात में दम था जमीं से बेहतर क्या हो सकता था कुछ छिपाने के लिए . पर इतनी बड़ी जमीन में उसे तलाशना बहुत मुशकिल था पर कोशिश करनी ही थी.

सुबह आँख खुली तो रजाई में मैं अकेला था . वो जा चुकी थी . रात भर जागने की वजह से आँखे भारी भारी सी हो रही थी जैसे तैसे करके उठा और पूरी जमीन का एक चक्कर लगाया. बारीकी से निरिक्षण किया. जमीन भी तो बहुत बड़ी थी ,जब थक गया तो गाँव की तरफ चल दिया.

जाते ही एक कप चाय ली, देखा बाप के कमरे पर ताला लटका था ये चुतिया न जाने कहा गायब था .

मेरी चाय ख़त्म भी नहीं हुई थी की राय साहब की गाडी आकर रुकी. साथ में मंगू का बाप भी था . मालुम हुआ की आज लग्न देने के लिए घर और गाँव के कुछ लोग शेखर बाबु के घर जायेंगे. दोपहर होते होते सामान , कपडे, भेंटे सब लाद दिया गया और चलने की तयारी होने लगी. भैया मेरे पास आये और बोले- छोटे, हम लग्न देने जा रहे है तू यही रहेगा,पीछे से व्यवस्था में कोई कमी नहीं आये.

मैं- पर मैं भी चल रहा हूँ

भैया- पिताजी ने कहा है की तू यही रहेगा.

मैंने एक गहरी साँस ली बाप चुतिया मुझे क्यों नहीं ले जाना चाहता था .

भाभी- कबीर थोड़ी हल्दी बची है कहे तो तुझे लगा दू, शुभ होता है इसे लगाना

मैं- मेरा आज नहाने का मन नहीं है भाभी

भाभी ने थोड़ी हल्दी मेरे गाल पर लगाई और भैया से बोली- आपके भाई को ब्याह करना है और हल्दी से घबरा रहा है .

भैया- कम न समझना मेरा भाई है ये

भाभी- एक बार आपको कम समझने की भूल की थी ,मन हार बैठी थी

भैया- मन हार कर हमें तो जीत ही गयी थी न .

मैं- आप लोगो का हो गया हो तो मेरी भी सुन लो

भैया- तुम मेरी सुनो छोटे,

उन लोगो के जाने के बाद चाची ने बताया की वो मंदिर जा रही है . रह गए मैं और भाभी . भाभी अपने कमरे में चली गयी मैं भी छोटा मोटा काम करने लगा. कुछ देर ही बीती थी की कुछ लोग आये और काफी सारे कपडे, आभूषण और तोहफे रखने लगे. लग्न तो चला गया फिर ये सामान कैसा, मैंने एक पल सोचा और फिर समझा की राय साहब के ही लोग रहे होंगे. मैंने ध्यान नहीं दिया. पूरी रात निशा के साथ जागा था तो सोचा की थोड़ी देर सो जाता हूँ वैसे भी रात को फिर से जागना ही था. पीठ मोड़ कर कमरे की तरफ चला ही था की.....

"एक बार फिर हम दर पर आये सनम के और एक बार फिर पीठ मोड़ ली तुमने " पलट कर देखे बिना ही मेरे होंठो पर मुस्कान आ गयी.

"मेहमान है तुम्हारे , " निशा ने कहा

मैं- मेहमान नहीं मेजबान हो तुम सरकार, ये घर मेरा ही नहीं तुम्हारा भी है .

मैंने आगी बढ़ कर उसे बाँहों में भर लिया और अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिए. इश्क का ऐसा नशा था की भूल गया मेरे सिवा घर पर कोई और भी था .

"कौन आया है कबीर " भाभी ने ऊपर से झाँका , निशा को मेरे साथ देख कर भाभी बस देखती ही रह गयी हमें. मैंने निशा का हाथ कस कर पकड़ लिया .

मैं- निशा आई है भाभी .

भाभी सीढिया उतर कर निचे आई. कुछ देर तक वो बस हमें देखती रही .

मैं- आपने इसे न्योता दिया है भाभी

पर भाभी ने मेरी बात जैसे सुनी ही नहीं .....दो पल वो एक दुसरे को देखती रही और फिर वो हुआ जिसकी कभी उम्मीद नहीं थी भाभी झुकी और निशा के पैरो को हाथ लगा कर अपने माथे पर लगाया. नंदिनी भाभी की आँखों से गिरते आंसू उनके गालो को भिगो गए. मैं हैरान था , परेशान था .

भाभी- कबीर, मेहमान आई है घर पर . मेरे कमरे में लेकर चलो इनको मैं आती हूँ .

मैंने निशा का हाथ पकड़ा और ऊपर सीढिया चढ़ने लगे. भाभी बस हमें देखती रही .........
 
#103

"ये मेरा कमरा है " मैंने निशा को अन्दर लाते हुए कहा

निशा- बढ़िया सजाया है

मैं- क्या तुम भी सब कुछ अस्त व्यस्त तो पड़ा है , वैसे भी आजकल मैं ज्यादातर कुवे पर ही रहता हूँ न

"कोई बात नहीं कबीर " निशा ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

मैं- समझ नहीं आ रहा क्या करू तुम्हारे लिए

निशा- तुमने बहुत कुछ कर दिया है अब और की जरुरत नहीं

"ये कबीर के कमरा किसने खोला " बाहर से चंपा की आवाज आई तो मैंने उसे अन्दर आने को कहा. चंपा मेरे साथ निशा को देख कर थोडा हैरान हो गयी.

मैं- ऐसे क्या देख रही है , मैंने कहा था न तुझसे की निशा से मिलवा दूंगा तुझे

चंपा- ये तो वो ........

मैं- हाँ वो ही है. आ बैठ पास

निशा ने आगे बढ़ कर चंपा को गले लगाया और उसके माथे को चूमा

"बड़ी प्यारी हो " निशा ने कहा.

चंपा- मैं कुछ लाती हूँ आपके लिए

निशा- जरुरत नहीं तुम बैठो पास मेरे, तुमसे मिलने ही तो आई हूँ मैं

निशा की सादगी, उसका बड़प्पन उसका स्नेह एक डायन के दिल में इंसानों से ज्यादा दरियादिली थी .

निशा- सब लोग खामोश क्यों हो बोलो भी कुछ

चम्पा- मैं क्या बोलू

निशा- जो तुम्हारा दिल करे वो बोलो. कबीर तो तुम्हारी तारीफ करते हुए नहीं थकता.

तभी भाभी नाश्ता ले आई निचे से. चंपा ने भाभी के हाथ से ट्रे ली और सबको चाय नाश्ता देने लगी.

भाभी- चंपा निशा तेरे लिए कुछ तोहफे लाई है तू निचे जाकर देख और संभाल कर रख दे उनको.

चंपा के जाने के बाद हमारी तरफ मुखातिब हुई.

भाभी- तुमको यहाँ देख कर बड़ी प्रसन्नता हुई ,

निशा- तुम्हारे निमन्त्रण को कैसे मना करती .

मैं- आप दोनों एक दुसरे को कैसे जानती है

भाभी- जंगल में सिर्फ तुम ही नहीं जी रहे हो तुमसे पहले भी कुछ लोग है जो तुमसे ज्यादा जानते है जंगल को.

मैं- भाभी आपसे मैंने कुछ नहीं छिपाया . आज जब निशा भी यहाँ पर है तो मैं आपसे विनती करता हूँ की आप हमारे रिश्ते पर अपनी हाँ की मोहर लगा दे. ये प्रेम दुनिया समझे ना समझे आप जरुर समझेंगी मैंने शुरू से ही ये माना है . मेरा और निशा का रिश्ता किसी स्वार्थ पर नहीं टिका है

भाभी- जानती हु, समझती भी हूँ प्रेम को .पर मैं डरती हूँ कबीर . शुरू में मुझे लगता था की निशा कभी इतना आगे नहीं बढ़ेगी पर जब निशा ने ये निर्णय लिया है तो सोच कर ही लिया होगा.

निशा- नंदिनी, मैं तुम्हारे मन की बात समझती हूँ . जानती हूँ की जिस पथ पर चलने के लिए मैंने कबीर का हाथ थामा है वो राह आसान नहीं है

मैं- हर राह आसान कर लूँगा मैं निशा, मेरा वादा है तेरे दामन में इतनी खुशिया भर दूंगा की तू नाज करेगी मुझ पर

भाभी- वो नाज करती है तुझ पर कबीर. पर ये जमाना, अभिमानु को कैसे समझा पाउंगी मैं

मैं- आप फ़िक्र ना करे, भैया ने मुझसे वादा किया है की वो खुद जायेंगे रिश्ता लेके

भाभी- एक बार मुझसे पूछ तो लेते कबीर,

निशा- नियति का खेल निराला है नंदिनी . खैर, अब मुझे चलना चाहिए . ब्याह की रात नहीं आ सकती थी इसलिए सोचा की आज ही चंपा से मिल लू .

भाभी- अच्छा किया

हम लोग निचे आये. निशा ने थोड़ी बाते चंपा के साथ की और फिर चली गयी. मैं उसके साथ जाना चाहता था पर भाभी ने मुझे रोक लिया.

भाभी- क्या वादा किया है अभिमानु ने तुझसे

मैं- यही की वो खुद मेरे रिशते की बात करने जायेंगे.

भाभी और कुछ कहती की तभी उनकी नजर आँगन में आती चाची पर पड़ी तो वो चुप हो गयी. मैं चंपा के पास गया .

मैं- तोहफे कैसे लगे.

चंपा- अप्रतिम, तेरी दोस्त तो बहुत अमीर है

मैं- अमीर का तो मालूम नहीं पर दिल की बहुत नेक है .और हाँ डाकन कभी बुरी नहीं होती वो मेरे जैसी ही होती है .

मेरी बात सुन कर चंपा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी. चाची के पीछे पीछे मैं कमरे में गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया. चाची के लाल होंठ चूसने लगा.

चाची- मत कर कोई आ निकलेगा मरवा के मानेगा तू

मैं- कितने दिन हो गए रुका नहीं जा रहा मुझसे

चाची- ठीक है आज रात को कर दूंगी तेरा काम अभी तंग मत कर.

चाची के लहंगे में हाथ डाला और चूत को मसलते हुए बोला- रात को पक्का

एक बार फिर मैंने चाचा की चाबी को देखा और सोचने लगा की क्या चक्कर है इस चाबी का, कहाँ होगा वो ताला जो चाचा की गुत्थी सुलझाएगा. रसोई में मैंने देखा की सरला बर्तन धो रही थी .

मैं- बर्तनों पर ध्यान मत दे थोडा ध्यान मुझ पर भी दे भाभी

सरला- कल मौका ही नहीं मिला पर आज तुम्हारी मनचाही कर दूंगी.

मैं- यहाँ जगह नहीं है , और तेरे घर पर आ नहीं सकता

सरला- एक जगह है , जहाँ मिल सकते है

मैं- कहाँ

सरला- वैध के घर पर . घर बंद पड़ा है किसी को मालूम भी नहीं होगा

मैं- ठीक है पर आज ना नहीं होनी चाहिए

मैं अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहता था चाची या सरला दोनों में से एक को तो चोदना ही चोदना था मुझे. तभी मुझे ध्यान आया की चोदने के लिए इस घर में भी तो जगह है . मैंने रसोई में छिपे दरवाजे को खोलना चाहा पर उस पर ताला लगा था . जरुर भाई ने ही किया होगा ये काम.

थोड़ी देर सोना चाहता था पर ब्याह के घर में सब कुछ मिल सकता है बस नींद नहीं. चाची ने कहा की भाभी को बुला ला ऊपर गया तो देखा की भाभी पलंग पर बैठी थी उनकी गोद में लाल जोड़ा था .

मुझे देख कर वो बोली- सोचा था की तेरी दुल्हन को दूंगी ये

मैं- आई तो थी दे देती हमारा भी थोडा मान रह जाता.

भाभी- पर दे नहीं पाई

मैं- आपका मन अब भी नहीं मान रहा क्या

भाभी- मुझे डर लग रहा है कबीर.

मैं- कैसा डर भाभी

भाभी- यही की तुझे खो न दू कहीं.
 
#104

मैं- दिल हार चूका हूँ भाभी उसके प्यार में, निशा को पाना मेरी कोई जिद नहीं है भाभी,पर इतना जरुर है की उसके बिना जी पाना मुश्किल होगा. यूँ तो ज़माने में कोई और भी मिल जाएगी पर निशा जैसी तो बस वो अकेली ही है न, मैं जानता हूँ आप इस रिश्ते को मान्यता क्यों नहीं दे रही है पर भाभी मैं आपकी परवरिश हूँ , अपनी परवरिश पर थोडा भरोसा तो रखिये.

भाभी- इसलिए ही तो मेरा जी घबराता है . जान गयी हूँ की तू उसका साथ किसी भी सुरत में नहीं छोड़ेगा. मैं ये भी जानती हूँ कबीर, की तेरा फैसला ठीक है . आज से नहीं तेरे अन्दर के विद्रोह को सबसे पहले मैंने ही समझा था .ये लाल जोड़ा मैं निशा को देना चाहती थी पर फिर खुद को रोक लिया क्योंकि मुझे डर है .

मैं- इस डर को दिल से निकाल दो भाभी. दिल हारा हूँ उसके प्यार में दुनिया से जीत लाऊंगा मैं. जिस राज को तुम छिपाए बैठी हो,बताने से घबरा रही हो मैं जानता हूँ उस राज को

भाभी के चेहरे का रंग बदल गया .

मैं- भाभी , डाकन के हाथ को थामा है मैंने, दुनिया को ये बताने दो मुझे की वो मनहूस नहीं है , उसके कदम किसी भी घर में अँधेरा नहीं करते. वो भी मेरे जैसी ही है. उसके सीने में भी एक दिल धडक रहा है जो जीना चाहता है , जो उड़ना चाहता है आसमान में. जब वो आएगी , इस घर को , इस आँगन को, जीवन को खुशिओ से भर देगी वो .

भाभी- राय साहब नहीं मानेगे उनका अहंकार नहीं मानेगा

मैं- किसे परवाह है उस चूतिये की . माँ के जाने के बाद भी मुझे कभी मा की कमी महसूस नहीं हुई, तुम्हारा आँचल सदा मेरे सर पर छाया बन कर रहा . उस माँ ने तो जन्म दिया था इस माँ ने जीवन दिया मुझे, पाला-पोसा सही गलत का फर्क बताया. इस माँ से अपना हक़ मांगता हूँ मैं. इस लाल जोड़े में तुम इस घर में आई थी इसी लाल जोड़े में मैं उसे लाऊंगा.

भाभी- यही लाल जोड़ा रत से रंग जाएगा कबीर. मैं चाह कर भी रोक नहीं पाउंगी . अभिमानु कभी भी राय शाब के सामने अपनी आवाज ऊँची नहीं करेंगे. बाप बेटे में तलवारे चल जायेंगी

मैं- भैया ने वादा किया है मुझसे

भाभी- यही तो मेरी चिंता है उनके एक तरफ भाई होगा दूसरी तरफ बाप धर्मसंकट में वो न जाने क्या करेंगे.

मैं- वो जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे. मेरी पूरी कोशिश होगी की मैं ही सुलझा लू सब राजी ख़ुशी, आपकी ग्रहस्थी पर मेरी वजह से कोई आंच नहीं आएगी.

भाभी- तुझ पर जो आंच आयेगी दर्द मेरे कलेजे को ही होगा ना.

मैं- अपने आंचल तले हमारे प्यार को पनाह दे दो भाभी . हमें जीने दो

मैंने भाभी के आगे हाथ जोड़ दिए.

"ले आ उसे, लेकर ही आना " भाभी ने अपना हाथ मेरे पर रख दिया.

"नंदिनी क्या कर रही है कितनी आवाज लगा चुकी हूँ सुनती ही नहीं " कमरे में दाखिल होते हुए चाची ने कहा .

भाभी- इस गाँव को दुल्हन की तरह सजवा दो चाची. तैयारिया और बढ़ा दो.अआप्का बेटा ,मेरा देवर इस घर की नयी बहु ला रहा है .

चाची- नयी बहु मैं समझी नहीं . मुझे तो लगा था की ये ऐसे ही मजाक करता है

भाभी- वो सच कहता था हमेशा से

चाची- जेठ जी से तो बता देते

भाभी- ये हवाए ही बता देंगी उनको. जा कबीर तय वक्त पर उसे ले आना, ये नंदिनी ठकुराइन कह रही है तुझसे ,जा जी ले अपनी जिन्दगी.

आगे बढ़ कर भाभी ने मुझे अपने गले से लगा लिया

"प्यार किया है निभाना जरुर " हौले से भाभी ने मेरे कान में कहा और अलग हो गयी.

नीचे आते हुए मैंने महसूस किया की हवाए सच में महक उठी थी. ढलते केसरिया सूरज की रौशनी में मैंने मोहब्बत को देखा. निचे उतर भी नहीं पाया था की मैंने गाडी घर में आते देखा , गाड़ी से अंजू उतरी.

मैं- तुम यहाँ

अंजू- मुझे तो आना ही था वादा जो किया था तुमसे पूनम की रात का , नंदिनी भाभी कैसी है आप

अंजू भाभी के गले लग गयी जाकर.

"कबीर , चाय " मैंने मुड कर देखा चंपा थी.

मैं- चाय नहीं रोटी परोस भूख लगी है .

अंजू- ये कोई समय है खाना खाने का

मैं- क्या करे तुम्हारी तरह खून तो नहीं पि सकता न

अंजू- तुम बच कर रहना , मुझे तलब है तुम्हारे रक्त की

भाभी- अंजू,

अंजू- कुछ नहीं भाभी बस थोडा मजाक कर रही थी कबीर के साथ .

मैं चंपा के पीछे रसोई में गया.

"तो साइकिल वाली संग ही इश्क कर बैठे " उसने कहा

मैं- तुझे अच्छी लगी वो

चंपा- तुमने पसंद की है अच्छी तो होगी ही .

मैं- बहुत अच्छी है वो .

चंपा ने थाली परोसी. मैं खाने लगा.

चंपा- अच्छा है ब्याह के बाद तू भी जीवन में आगे बढ़ जायेगा .

मैं- तेरी कमी तो रहेगी न इस दिल में एक कोने में थोड़ी जगह तूने खाली जो कर दी

चंपा- तेरी तमाम शिकायते सर माथे पर

मैं- दोस्ती निभा नहीं पाई तू

चंपा- जानती हूँ . सदा अफ़सोस रहेगा मुझे

खाना खाने के बाद मैंने छोटे मोटे काम देखे , अंजू ने मेरे कमरे में अपना डेरा जमा लिया था मुझे पसंद नहीं आई ये हरकत पर मेहमान थी तो लिहाज जरुरी था . रात को मैं कुछ देर रस्मो में शामिल हुआ. और फिर मैंने अपने कदम घर से बाहर बढ़ा दिए. ठण्ड में अपनी जाकेट को गले तक कसे हुए मैं बस चले जा रहा था .

न जाने कितना वक्त हुआ होगा. सारा जहाँ जब नींद में डूबा था . मैं उस हवेली के आगे खड़ा था जिसका दरवाजा खुला था चलते हुए मैंने उस दरवाजे को पार किया. अँधेरे में डूबी इमारत शान से खड़ी थी . मुख्य द्वार तक आने में कुछ देर लगी पर आहिस्ता से मैंने दहलीज पर पैर रखा और अन्दर घुस गया .

सब कुछ अँधेरे में डूबा था . सन्नाटा इतना घना था की सांसो की आवाज भी गूँज उठे. सीढिया चढ़ते हुए मैं दूसरी मंजिल पर पहुंचा . पूरी हवेली में बस यही पर लालटेन की रौशनी थी. कमरे का दरवाजा खुला था . टेबल पर लालटेन जल रही थी . उसकी पीठ थी मेरी तरफ नजरे खिड़की पर ..................
 
#105


"सनम के दीदार को प्यासी है आँखे हमारी और सनम मुह मोड़े खड़ी है "

जैसे ही उसके कानो में मेरी आवाज पड़ी, हैरानी से पीछे मुड़ी वो और देखती ही रह गयी मुझे. उसने दरवाजा बंद किया और बोली- तुम यहाँ,इस वक्त

मैं- आना ही पड़ा सरकार

मैंने उसे सीने से लगा लिया

निशा- यही नहीं चाहती थी मैं

मैं- बस तुझे देखना चाहता था . वापिस लौट जाऊंगा

निशा- आये हो तो रुको थोड़ी देर वैसे भी कोई नहीं है यहाँ

मैं- कोई क्यों नहीं है हम तुम तो है

निशा- ये होना भी कोई होना है

मैं- तू ही बता फिर क्या खोना है क्या पाना है

निशा- मैं खो गयी तुझे पा लिया

मैं- भाभी ने हां कह दी है

निशा- जानती हूँ

मैं- बस यही बताने आया था , अभी जाना होगा

निशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया , बोली- साथ चलू

मैं- नहीं तू आराम कर . तू मुझे छोड़ने आएगी मैं तुझे ये रात यूँ ही बीत जाएगी.

निशा- बीतने दे फिर इसे. आने वाली रातो का भी देखना है जैसे जैसे पूर्णिमा करीब आ रही है दिल घबरा रहा है. वैसे मुझे तलब नहीं है किसी भी तरह की पर चूँकि पिछली पूर्णिमा बड़ी भारी पड़ी थी और उसी दिन चंपा की बारात आएगी कहीं मेरी वजह से कोई परेशानी ना हो जाए.

निशा- कुछ नहीं होगा. कुछ भी नहीं होगा. तू आदमखोर नहीं है कबीर . तू उस जैसा न था न बनेगा भरोसा रख . रक्त की प्यास न होना सबसे बड़ा सबूत है इस बात का . माना की रात भारी पड़ी थी पर उसका भी तोड़ मिल ही जायेगा. सावधानी के लिए थोड़े समय दाए बाये हो जाना गाँव से. मैं तुझे अपने ठिकाने पर मिलूंगी थाम लुंगी तुझे.

मैं- चर्चे होने लगेंगे जल्दी ही तेरे मेरे प्यार के

निशा- क्यों नहीं होंगे, तुमको जीता है है दिल हार के. और फिर वो प्यार ही क्या जिसमे दुश्वारियां ना हो .

मैं- चलता हूँ .

निशा- छोटा रास्ता लेना

मैं- जानता हु सरकार

वहां से निकलने के बाद मैंने राह पकड़ी और जल्दी ही मैं अपने कुवे के पास वाली सड़क पर था . रात बता रही थी की कुवे पर ख़ामोशी है. घर पहुंचा तो बाहर खड़ी गाडियों ने मुझे बता दिया था की लग्न देकर वापिस आ चुके है . बाप के कमरे का दरवाजा खुला था . बल्ब जल रहा था. मैं अन्दर दाखिल हुआ. देखा की गीत गए जा रहे थे. मैं सीढिया चढ़ते हुए ऊपर पहुंचा. देखा की मेरे बिस्तर पर लेटे हुए अंजू कोई किताब पढ़ रही थी . ये चुतिया की बच्ची क्या पढ़ती रहती है मैंने सोचा.

अंजू- कहा से आ रहे हो

मैं- तुम्हारा जानना जरुरी नहीं

अंजू- समझ नहीं आता किस बात का गुरुर है तुमको

मैं कुर्सी पर बैठा और बोला- थका हुआ हूँ सोना चाहता हूँ

अंजू थोडा सा सरकी और बोली- पीछे सो जा

मैं- इतने बुरे दिन नहीं आये की तेरे पास पड़ना पड़ेगा मुझे.

अंजू- तो बाहर जाकर ऐसीतैसी करवा , पढने दे मुझे

मैं- क्या पढ़ती रहती है तू मुझे भी बता जरा

अंजू- तेरे बस की नहीं है इसे समझना और बाहर जाते जाते किवाड़ बंद कर जाना

निचे आते ही मैंने सरला को पकड़ा और बोला- कुछ जरुरी बात करनी है

सरला- कितनी देर तो इन्तजार करती रही मैं अब समय नहीं मिलेगा

मैं- चोदना नहीं है दो मिनट साइड में आ तू

सरला- क्या हुआ कुंवर

मैं- क्या तुझे चाचा ने खुद कहा था की चूत दे दे

सरला- नहीं , रमा मुझे छोटे ठाकुर के किस्से बताया करती थी धीरे धीरे मेरा भी मन करने लगा और फिर एक दिन उसने ही मुझे छोटे ठाकुर से मिलवाया था.

मैं- कहाँ कुवे पर

सरला- नहीं रमा के घर पर .

चाचा को सबसे प्यारी रमा ही थी, बिना देर किये मैं रमा के पुराने घर में पहुँच गया. बल्ब जलाया सब कुछ वैसा ही था जैसा मैं पिछली बार छोड़ कर गया था . चाचा को सबसे ज्यादा रमा से ही प्यार था . उसके जाने के बाद रमा को प्रकाश चोद रहा था , वैध चोद रहा था और मेरा बाप चोद रहा था . बिना किसी मकसद के रमा क्यों चुदेगी. पैसे की उसे चाह नहीं थी . फिर किसलिए . बेटी के कातिल को जानने के लिए नहीं , क्योंकि वो जानती थी की चाचा कभी नहीं मारेगा उसकी बेटी को दुनिया जो भी कहे, चाचा को अच्छी तरह से समझती थी रमा

मैंने एक बार फिर बहुत बारीकी से तहकीकात शुरू की , पुराने बक्सों में अखबार के पन्नो के बिच मुझे एक तस्वीर मिली और उस तस्वीर को खूब गौर से देखा तो मैं बहुत कुछ समझ गया था , तस्वीर में रमा, उसकी बेटी और चाचा थे. मैंने सुना था की तस्वीरे झूठ नहीं बोलती आज समझ भी लिया था इस बात को. रमा की बेटी दरअसल रमा और चाचा की बेटी थी .

रमा क्या तलाश रही थी मैं समझ गया था वो अपनी बेटी के कातिल को नहीं बल्कि ठाकुर जरनैल सिंह को ढूंढ रही थी . मोहब्बत का ऐसा रूप भी देखने को मिलेगा ये कभी सोचा नहीं था . दुनिया सच ही तो कहती थी जो प्यार कर गये वो लोग और थे. राय साहब नहीं बल्कि वो राय साहब को चूत देकर उनसे चाचा के बारे में जानना चाहती थी . पर जिन जिन से वो चुद रही थी उन लोग का क्या लेना देना था चाचा से सोचने वाली बात थी . मंगू, राय साहब,प्रकाश और वैध. जिनमे से दो लोग अब बताने को उपलब्ध नहीं थे.


चाचा को गायब करवाने में अगर राय साहब का हाथ था तो वो उनके लिए बाए हाथ का काम था , वर्ना ऐसी क्या बात थी जो इतना बड़ा आदमी अपने भाई को नहीं तलाश पाया. मान लिया की राय साहब ने ही उसे गायब करवाया है पर किसलिए, रांडो को चोदने जैसी बात के लिए तो वो ऐसा कभी नहीं करेगा. जमीं का मामला भी नहीं हो सकता क्योंकि जमीने तो बहुत थी हमारे पास. औरत नहीं , जमीन नहीं तो फिर क्या बचा.दोनों भाई में झगडा आखिर किस बात को लेकर हुआ था
 
#106


मुझे अब एक दांव खेलना था जो यदि सफल हो जाये तो बहुत कुछ समझ में आ जाये. मैं सीधा अंजू के पास गया हो अभी भी किताब ही पढ़ रही थी .

मैं-एक बेहंद जुरुरी बात करनी थी

अंजू- चैन क्यों नहीं है तुमको

मैं- सुन एक सौदा करेगी मेरे साथ फायदा होगा तुझे .

अंजू- कैसा सौदा

मैं- प्रकाश के कातिल का नाम तुझे बता दूंगा बदले में तुझे मेरी मदद करनी होगी.

अंजू- कैसी मदद

मैं- पहले कसम खा की बात तेरे मेरे बिच रहेगी.

अंजू- किसकी कसम खाऊ मैं

मैं- वो नहीं पता पर तुझे कसम है अगर वादा तोडा तो

अंजू-बता भी दे अब

मैं- वो जो मेरा दोस्त है न मंगू तू उसे उठा ले , चाहे मार पिट कुछ भी कर उस से ये उगलवा ले की वो रेस साहब के कामो में उनका साथ क्यों दे रहा है और क्या राय साहब ने कविता को भी पेला था .

अंजू- अपने ही बाप की जासूसी करवाना चाहता है तू, और ये कविता कौन है

मैं- तुझे प्रकाश का कातिल चाहिए की नहीं

अंजू- मैं कैसे मान लू तू जो बताएगा वो सच ही होगा.

मैं- सबूत के साथ दूंगा तुझे कातिल का नाम सोच ले.

अंजू- पर मैं राय साहब के खिलाफ कैसे जाउंगी

मैं- मत जा मुझे क्या है फिर

अंजू- राय साहब के खिलाफ जाना , तू समझ रहा है न

मैं- राय साहब की ऐसी की तैसी तू उस आदमी के असली चेहरे को नहीं देख पाई है अभी . इसलिए कहता हूँ मेरा साथ दे

अंजू- सोचूंगी

मैं- सोच ले , प्रकाश के कातिल को तू जिन्दगी भर नहीं तलाश पाएगी.

अंजू ने अपना मुह वापिस किताब में घुसा दिया. दिल तो किया इसकी गांड पे दू पर फिर रोक लिया खुद को .मैं उसकी रजाई में घुस गया और सोने की कोशिश करने लगा. अब इतनी रात को जाते भी तो जाते कहा.

अंजू- नींद नहीं आ रही क्या

मैं- सोच रहा हूँ कुछ

अंजू- हमें भी बता दे क्या सोच रहा है तु

मैं- यही की तुम आदमखोर निकली तो कैसे मारूंगा तुमको

अंजू- सोच लो बढ़िया विचार है , वैसे मैं तडप तडप कर मरना पसंद करुँगी

मैं- तूने झूठ क्यों बोला की उस रात प्रकाश के साथ गाड़ी पर तुम थी

अंजू- देखना चाहती थी तुम क्या समझते हो उस बात से

मैं- और क्या समझा मैं

अंजू-कबीर हर किसी की जिन्दगी के कुछ निजी बाते होती है उन्हें निजी ही रहना चाहिए. बेशक तुम्हारे सवाल तुमको मुझ तक लाते है पर मैं चाहती हूँ की हमारे दरमियान एक फासला होना चाहिए. मैं नहीं जानती की तुम क्यों अतीत के पन्ने पलटना चाहते हो पर तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा . सब कुछ सही तो चल रहा है . तुम मौज में हम मौज में बताओ अतीत से क्या मिल रहा है तुमको , केवल अपनी उत्सुकता के लिए तुम किसी दुसरे के निजी जीवन में घुसना चाहते हो जबकि वो तमाम बाते तुम्हे कही से भी प्रभावित नहीं कर रही .

मैं- मुझे लगता है की ये सब जुड़ा है मुझसे.

अंजू- बताओ क्या जुड़ा है , कुछ भी तो नहीं जुड़ा तुमसे. राय साहब, जरनैल सिंह, अभिमानु, रुडा , कुछ भी तो नहीं जुंडा तुमसे. माना की सूरजभान से तुम्हारे पंगे है वो चलते रहे किसी को क्या लेना देना बताओ बाकि के अतीत से क्या लेना देना है तुम्हारा. तुम बस उस कहानी को पढना चाहते हो जिसके पन्नो पर अब कुछ नहीं बचा

मैं- फिलहाल मुझे सोने दो , कुछ रातो से मेरी नींद पूरी नहीं हुई.

अंजू ने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा और बोली सो जाओ सबको आराम की जरुरत होती है .

मैं- बस एक बात बता दो. परकाश को किस चीज की तलाश थी

अंजू- मामा जरनैल के पास कुछ ऐसा था जो प्रकाश का था, उसी को तलाशता था वो .

मैं- क्या थी वो चीज

अंजू- मालूम नहीं , पर प्रकाश कहता था की उस पर हक़ था उसका .

मैं- ऐसी क्या चीज हो सकती थी .

अंजू- कुछ भी , जमीन के कागज, गहने, प्रोपर्टी .पैसे कुछ भी . कुछ भी हो सकता है कबीर.

मैं- तुम क्या तलाशती हो जंगल में

अंजू- सकून जो मेरा खो गया है .

उसका हाथ पकड़ा और मैं सो गया. न जाने कितने बजे थे जब मेरी आँख खुली . बिस्तर पर अंजू मेरे साथ नहीं थी . प्यास के मारे मेरा गला सूख रहा था. पानी का जग खाली पड़ा था . कम्बल ओढ़ कर मैं बहार आया , सब कुछ सन्नाटे में डूबा हुआ था , आँगन का बल्ब ही जल रहा था . मैं जग लिए निचे आया. मटके से जग को भर ही रहा था की तभी मेरी नजर ऊपर आसमान में गयी. आसमान में सितारे नहीं थी . पर जो मैंने देखा दिल धक् से रह गया .

चौबारे की मुंडेर पर वो साया, वो साया , वो आदमखोर वहां बैठा था . एक पल मैंने खुद को देखा, इस घर को देखा और फिर उसे देखा. यदि ये यहाँ हमला कर देगा तो कितने ख़ाक होंगे कौन जाने. सीढिया चढ़ते हुए मैं ऊपर पहुंचा . दो पल में ही मैं उसके सामने था. अपनी जुगनू सी पीली आँखों से उसने मुझे देखा . हम दोनों एक दुसरे के इतने पास आ गए थे की उसकी सांसे भबकाने लगी थी मुझे .

मैं उसे देख रहा था वो मुझे देख रहा था. पर वो शांत था इतना शांत की न जाने क्या चल रहा था उसके मन में. उसने मुझे हल्का सा धक्का दिया और मुड़ने को ही था की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया

मैं- ऐसे नहीं जाने दूंगा तुझे . तुझे बताना होगा कौन है तू.

पर शायद मैंने उसकी ताकत को कम समझा था , उसने तुरंत अपना हाथ छुड़ा लिया और छत से कूदकर अंधेरो में गुम हो गया.

"आज नहीं तो कल तेरा राज भी मैं जान ही लूँगा " मैंने कहा और निचे आने लगा. कमरे की तरफ गया ही था की अंजू से टकराते टकराते बचा .

अंजू- चैन क्यों नहीं है तुझे

मैं- कहाँ गयी थी तुम .

अंजू- क्यों बताऊ तुमको

मैं- मैंने पूछा कहाँ गयी थी तुम

अंजू- मूतने गयी थी , कहे तो मूत की धार दिखा दू तसल्ली के लिए

मैं- अगर तू वो निकली न तो वादा है मेरा तेरी खाल खींचने से भैया भी नहीं रोक पाएंगे मुझे

अंजू- जितनी तेरी औकात है न कबीर उस से ज्यादा बोल रहा है तू. अभिमानु का भाई न होता तो अब तक तेरी जुबान मेरे पैरो में पड़ी होती .

अंजू ने मुझे दिवार से लगा दिया..............
 
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