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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#117


दो बातो ने मुझे उलझा रखा था की क्या रमा जानती थी चाचा ने ही उसकी बेटी को मारा था . दूसरा वैध को किसने मारा. वैध एक ऐसा इन्सान था जो कविता को भी पेल रहा था , रमा को भी . वैध जरुर जानता था की कविता उस रात जंगल में क्या करने गयी थी . मैं उसी वक्त कविता के घर पर गया और तलाशी लेने लगा पर इस बार कमरा कविता का नहीं बल्कि वैध का था .

बात केवल चुदाई की नहीं थी नशा उस सोने का भी था जिसका साला कोई दावेदार नहीं था . जर, जोरू और जमीन दुनिया में इस से बड़ा कोई नशा नहीं हुआ . ये तीन ही चीज था जो क्या से क्या करवा सकती थी . वैध के कमरे में मुझे बहुत कुछ मिला जो सोच से परे था. वैध ने अपनी बहु से ही चुदाई के सम्बन्ध बनाये थे, मतलब साफ़ था वो शौक़ीन बुढा था . बेटा उसका शहर में था घर पर जवान बहु दोनों को रोकने वाला कोई नहीं था .

चीजो को खंगालते हुए मैं सोच रहा था . और जो चीज मुझे खटकी वो थी उस झोले से निकला एक पहचान पत्र जिस पर वैध के बेटे रोहताश का फोटो था और जहाँ वो चोकिदारी करता था वहां का पता लिखा था , रोहताश शहर में था तो उसका ये परिचय पत्र यहाँ क्या कर रहा था . ये तो उसके पास होना चाहिए था न, मैंने गौर किया वो काफी समय से यहाँ गाँव में नहीं आया था , न कविता की मौत पर न बाप की मौत पर . क्या इतना जरुरी था उसका काम. चाचा के बारे में जो मैंने पिछली रात जाना था मुझे शंका होने लगी की कहीं रोहताश भी बस नाम का जिन्दा न हो. किसी ने बहुत पहले उसे भी रस्ते से हटा दिया हो.

पर किसने, शायद उसी न जिसने रमा के पति को मरवाया हो. ये दोनों लोग रमा और कविता के साथ खुली चुदाई में रोड़े थे , माना की रोहताश तो शहर में था पर रमा का आदमी यही रहता था तो मुमकिन था की दोनों को एक ही कातिल ने पेल दिया हो. मैंने वो परिचय पत्र जेब में डाला उन चुदाई की किताबो को झोले में वापिस रखा और तुंरत अंजू के पास गया .

अंजू- क्या हुआ साँस क्यों उखड़ रही है तुम्हारी

मैं- मदद चाहिए

अंजू- मुझसे कैसी मदद

मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- मेरी बहन अगर मेरी मदद नहीं करेगी तो कौन करेगी

अंजू- बता क्या चाहिए

मैं- गाडी की चाबी और रमा को धर लो जहाँ भी मिले , चाहे उसकी खाल उतारनी क्यों ना पड़े. उस से पूछो वैध को किसने मारा.

अंजू- धर तो लुंगी पर फिर कहना मत की क्या कर दिया

मैं- जो चाहे करो

उसने मुझे चाबी दी और मैंने गाडी शहर की तरफ दौड़ा दी. मैं सीधा वहां गया जहाँ का पता परिचय पत्र पर था और वहां एक छिपा सच मेरा इंतज़ार कर रहा था . मालूम हुआ की एक बार रोहताश छुट्टी गया था फिर कभी लौटा ही नहीं . इसका अंदेशा तो था मुझे पर पुष्टि जरुरी थी . मैंने गाडी वापिस मोड़ दी. अब रमा ही वो चाबी थी जो कुछ बातो के ताले खोलने वाली थी . वापसी में मैं मलिकपुर होते हुए आया. रमा के कमरे पर ताला लगा था . मैंने ताले को तोड़ दिया और तलाशी लेने लगा पर यहाँ कुछ भी नहीं था . रमा अपना अतीत साथ लेकर नहीं आई थी यहाँ .

चौधरी रुडा से मिलने की एक और कोशिश नाकाम रही , आज भी नहीं मिला वो मुझे बता नहीं सकता कितनी हताशा थी मुझे उस वक्त. पर हालात पर भला किसका जोर चला है जो मेरा चलेगा. दिमाग में बहुत कुछ था , हो सकता था की राय साहब के कहने पर ही मंगू ने वैध को भी मारा हो . हो सकता था की इस शतरंज के असली खिलाड़ी राय साहब ही रहे हो जंगल में सबने अपनी अपनी जिन्दगिया जी थी . सबको एक साथ लाना बहुत टेढ़ा काम था .

रोहताश मर चूका था उसकी लाश यही कहीं इसी जंगल में गाड दी गयी होगी. चंपा का राय साहब से सिर्फ इसलिए चुदना की वो अहसान उतार रही थी मामला जम सा नहीं रहा था . घर वापिस आने के बाद मैं सीधा चाची के पास गया .

मैं- मुझे हर हाल में मालूम करना है की चंपा क्यों चुदी राय साहब से . चाची तुम्हारे बहुत करीब है वो ये बात पता करके दो

चाची- इस बारे में हमने बात की थी न, और फिर ब्याह के बाद वो चली ही जाएगी छोड़ो इस बात को

मैं- नहीं छोड़ सकता . मालूम करके बताओ

चाची- कोशिश करती हूँ

मैंने हाँ में सर हिलाया और दरवाजे से बाहर निकला ही था की भाभी से टकरा गया .

भाभी- देख कर चला करो , सर फूट ही गया क्या मेरा

मैं- रोहताश मर चूका है. एक बार छुट्टी आया तो फिर वो वापिस नहीं गया काम पर . प्रकाश को राय शाब ने मरवाया मंगू के हाथो कहीं ऐसा तो नहीं की मंगू ने ही वैध, रोहताश, को मारा हो .

भाभी- राय साहब के कमरे की तलाशी लेने की कोशिश करो . क्या पता कुछ सुराग मिले. वैसे अभिमानु के पास कमरे की एक चाबी हमेशा रहती है .

मैं- बात चाबी की नहीं है मैं ताला भी तोड़ दू. पर बाप इधर ही है , उसे किसी काम में उलझा दिया जाये की वो कमरे में न आ पाए तो भी मेरा काम हो जायेगा.

भाभी- कोशिश करती हूँ .

तभी मैंने देखा की अभिमानु भैया पैदल ही घर से बाहर जा रहे थे . मैंने देखा की बाप हमारा हलवाइयो से बात कर रहा था मैंने सही समझा और उसके कमरे में घुस गया . एक बार फिर से मैं कुछ तलाशना चाहता था . दराज में पड़े कागजो पर जो हाथ डाला, तो किस्मत ने मेरा ऐसा साथ दिया की अगर किस्मत सामने होती तो उसके लब चूम लिए होते मैंने.
 
#118

वसीयत का चौथा पन्ना और कुछ नहीं एक वादा था . वो वादा जो राय साहब ने प्रकाश की माँ से किया था . उस वादे के अनुसार राय साहब को परकाश को जमीने देनी थी पर शायद अब राय साहब के मन में फर्क आ गया होगा. पर पिताजी ने ऐसा वादा किया ही क्यों था . वो शायद जमीने देना भी चाहते होंगे इसलिए ही तो वसीयत का चौथा पन्ना बनाया गया था . असली बात क्या थी ये मालुम करना बेहद जरुरी हो गया था क्योंकि परकाश अब रहा नहीं , जो पिताजी को ब्लेकमेल कर रहा था . दूसरी बात ये की ऐसी क्या मज़बूरी थी जो प्रकाश की माँ को वादा करना पड़ा.

जमीन के लिए तो परकाश हरगिज ब्लेकमेल नहीं करता मामला कुछ और ही था .मैंने मलिकपुर प्रकाश की माँ से मिलने का सोचा. बेशक मैं थका हुआ था पर सोचा की शाम ढलने से पहले लौट आऊंगा. और फिर देर ही कितनी लगनी थी . मैं सीधा परकाश की माँ के पास गया और दुआ सलाम के बाद मुद्दे पर आ गया .

मैं- काकी, मेरे पास समय की सख्त कमी है , मन में केवल एक प्रशन है तो एक सौदा करते है तू मुझे मेरा जवाब दे मैं तुझे बता दूंगा की तेरे बेटे का कातिल कौन है .

काकी की आँखे फ़ैल सी गयी . पर मैं जानता था की ये दांव चलेगा जरुर.

काकी- क्या सवाल है कुंवर.

मैं- बरसो पहले राय साहब ने तुझसे एक वादा किया था . उसके बारे में पूछना है मुझे. ऐसा क्या किया था तूने

मेरा सवाल सुन कर काकी सन्न रह गयी. उसे समझ ही नहीं आया की क्या कहे क्या ना कहे.

मैं- काकी बात बस तेरे मेरे बीच रहेगी. मेरा कोई लेना देना नहीं तुझसे न मैं कभी दुबारा तुझसे ऐसे मिलूँगा तेरी दहलीज से बाहर कदम रखते ही मैं भूल जाऊंगा की हमारे बीच क्या बातचीत हुई.

मैंने अपनी तरफ से काकी को आश्वस्त किया.

कुछ देर वो खामोश रही श्याद हिम्मत जुटा रही थी उस बात को होंठो पर लाने की.

काकी- मैं उनसे कुछ नहीं चाहती थी. मैं भूल जाना चाहती थी पर तक़दीर ,

मैं- क्या हुआ था .

काकी- अक्सर मैं बड़ी ठकुराइन से मिलने जाया करती थी . एक दोपहर मैं जब तुम्हारे घर सी लौट रही थी तो मैंने देखा की जंगल में राय साहब घायल अवस्था में पड़े थे . उनको इस हालात में देख कर मैं बहुत घबरा गई थी . पर वो होश में थे. उन्होंने मुझसे कहा की सहारा दू उनको. और वो मुझे तुम्हारे कुवे पर ले आये. उन्होंने बस इतना कहा की वैध को बुला लाऊ किसी को भी मालूम ना हो की राय शाब घायल है .मैंने वैसे ही किया. वैध के उपचार से उनको बहुत आराम हुआ.

"मैंने सोचा की इस हालात में उनको अकेले छोड़ना ठीक नहीं होगा. मैंने उनके लिए वय्व्स्थाये की, जब जब वैध नहीं होता तो मैं उनके पास होती. घंटो राय साहब और मैं बाते करते. जो समय मैं बड़ी ठकुराइन के साथ बिताती अब राय साहब के साथ बिताने लगी. घर से कह कर मैं आती की बड़ी ठकुराइन के पास जा रही हूँ पर जाती राय साहब के पास. किसी चुम्बक की तरह वो मुझे अपनी तरफ खींच रहे थे . ये उस दौर की बात है जब अभिमानु पैदा ही हुआ था .बड़ी ठकुराइन का जायदातर समय छोटे अभिमानु के साथ ही बीतता था . चूँकि हम दोनों बहुत समय एक दुसरे के साथ बिता रहे थे तो जाहिर है की आकर्षण सा होना ही था और उसी आकर्षण में किसी कमजोर लम्हे में हम एक हो गए " काकी ने गहरी साँस ली

वो जोर से हांफ रही थी . कुछ गिलास पानी उसने गटका और फिर बोलना शुरू किया.-सिलसिला एक बार जो शुरू हुआ फिर रुका ही नहीं जब तक की बड़ी ठकुराइन ने एक दिन हमें पकड़ नहीं लिया. उस दोपहर बहुत बड़ा कलेश हो गया था . राय शाब ने मुझसे कहा की वो अब कभी नहीं आयेंगे मेरे पास. ये रिश्ता उसी समय खत्म हो गया. मैंने तब उनको बताया की मैं पेट से हूँ , कोख में उनका अंश पल रहा है . तब उन्होंने मुझसे वादा किया था की सही समय आने पर वो उस अंश के को उसके हिस्से की जमीने देंगे.

काकी धम्म से पलंग पर बैठ गयी थी . मेरी समझ में नहीं आ रहा था की कहूँ तो क्या कहूँ. बाप चुतिया ने एक औलाद और पैदा कर रखी थी . मेरे पैरो की जान निकल ही गयी थी .

मैं- तेरे बेटे को राय साहब ने ही मारा है

मैंने अपना वादा निभाया. काकी की आँखों से आंसू बहने लगे पर मेरी हिम्मत नहीं थी की उनको पोंछ सकू. वापसी में मैं सोचता रहा की परकाश को सिर्फ इसलिए नहीं मरवाया गया था की राय साहब उसे जमीने नहीं देना चाहते होंगे , परकाश की हसरत किसी खास जमीन के टुकड़े में रही होगी और वो खास जमीन थी मेरा खेत जिसके निचे अथाह सोना था . परकाश का खेतो पर बार बार चक्कर लगाना यही दर्शाता था .

वापिस आकर पाया की अंजू अभी तक नहीं लौटी थी . होलिका दहन की तैयारिया चल रही थी . कल फाग था , कल मैं अपनी जिन्दगी की नयी शुरुआत करने वाला था . कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण होने वाला था . मैं रसोई में गया , सुबह से कुछ खाया नहीं था सरला से मैंने खाना लिया और बैठ गया .

मैं- कुछ बात करनी थी

सरला- हाँ कुंवर.

मैं- मंगू वाला काम हुआ

सरला- लेने को तो तैयार है वो पर बाते नहीं बताता . काफी घुन्ना है वो

मैं- कुछ तो बात निकाल उस से .

सरला- मिलता ही कहाँ है वो न जाने कहाँ गायब रहता है वो

मैं- कभी चाचा ने तुझसे कहा था की किसी और को भी दे दे

सरला- ठाकुर साहब उस तरह के आदमी नहीं थे की किसी और के साथ सोने को मजबूर करते

मैं- क्या रमा ने तुझसे कभी कहा था की किसी और से चुदले

सरला- ऐसे सीधा तो नहीं कहा पर अक्सर कविता मुझसे कहती थी चूत का काम है चुदना , क्या फर्क पड़ता है एक चोदे या हजार.

मैंने उसे जाने को कहा और सोचने लगा. मामला बस इतना नहीं था . मरने से पहले चाचा परेशां सा रहने लगा था , उसे किस चीज की परेशानी थी ये मालूम करना बेहद जरुरी था मेरे लिए.
 
#119


एक ऐसी कड़ी जो इन सबको जोड़ सकती थी मुझसे छूट रही थी . प्रकाश की माँ ने जो खुलासा किया उसने कहानी को अलग ही दिशा दे दी थी . चाचा को मरे एक जमाना हो गया था तो फिर कविता जंगल में किससे मिलने जाती थी अगर ये जवाब मिल जाता तो काफी हद तक मामला सुलझ जाता . राय साहब के बिस्तर से मिली चुडिया और कविता के घर से मिली चुडिया कहीं न कहीं इशारा कर रही थी की हो न हो कविता को राय साहब भी चोदते थे.

चलो मान लिया की राय साहब ने कविता को भी चोदा क्योंकि रमा की चुदाई प्रमाण थी पर यहाँ से एक सवाल और खड़ा हो जाता था की हवस के पुजारी ने फिर नंदिनी भाभी और चाची पर डोरे क्यों नहीं डाले.मामला बेहद संगीन था , चुदाई के साथ साथ रक्त की सड़ांध भी फैली हुई थी इस अतीत में . कल का दिन बहुत खास था व्यस्त रहने वाला था पर ये रात, ये रात , इसकी ख़ामोशी मुझे बेचैन किये हुए थी. ब्याह की सब तैयारिया पूरी हो चुकी थी, कल चंपा की डोली उठ जानी थी . जिसे कभी अपनी माना था वो पराई हो जानी थी.

पराई, अपने आप में बहुत भारी था ये शब्द,. पराई तो चंपा तभी हो गयी थी जब उसने मेरे बाप के साथ उस दलदल में उतरने का सोचा. बाप चुतिया को रंगे हाथ चुदाई करते पकड़ भी लेता तो कुछ हासिल नहीं होना था . मुझे तलाश थी उस वजह की , आखिर क्या थी वो वजह जिसकी वजह से ये सब हो रहा था .चाची ने मेरी कसम खाकर कहा था की राय शाब ने कभी भी उसे गन्दी नजरो से नहीं देखा. पर जिस तरह से चाची ने इतना बड़ा राज छिपाया था , क्या मैं पूर्ण विस्वास कर सकता था उस पर.

दो पेग लगाने के बाद भी मुझे चैन नहीं था , मेरी नजर सरला की गांड पर थी जिसे शाल ओढने के बाद भी वो छिपा नहीं पा रही थी .पर खचाखच भरे घर में मौका मिलना था ही नहीं उसे चोदने का. सुबह बड़ी खूबसूरत थी , वैसे तो मैं रोज जल्दी ही उठता था पर आज सुबह की बात ही कुछ और थी. भोर के उजाले में केसरिया रंगत लिए सूरज को देखना सकून था . सुबह सबसे पहले मैंने चंपा को ही देखा जो चाय देने आई थी मुझे.

खूबसूरत तो पहले भी थी वो पर ब्याह का रंग चढ़ा था उस पर उबटन ने उसे और निखार दिया था .

चंपा- क्या देख रहा है कबीर

मैं- देख लेना चाहता हूँ तुझे आज , कल तो परायी हो जाएगी तू

चंपा- एक न एक दिन तो हर लड़की पराई हो ही जाती है किसी न किसी के लिए.

मैं- वक्त कितना जल्दी बीत जाता है न

चंपा- वक्त तो आज भी वही है , बस हम दोनों थोडा आगे बढ़ गए है .ये गलिया, ये घर , ये चौबारे. कल तक यही जी मैं, यही पर बड़ी हुई, कल यही सब छोड़ कर जाना होगा.

मैं- नियति यही है .लडकिया एक घर छोडती है तो एक घर पाती भी है .

चंपा- डोली को सबसे पहले तू हाथ लगाना , इतना हक़ तो देगा न मुझे.

चंपा की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. आज की रात भारी पड़ने वाली थी मुझ पर , मैंने पहले ही सोच लिया था की रात होते ही मैं कुवे पर चला जाऊंगा. मैं हरगिज नहीं चाहता था की ब्याह में मेरी वजह से रंग में भंग पड़े.

चंपा- कुछ कह रही हूँ तुझसे

मैं- ये भी कोई कहने की बात है .

मैंने चंपा से कह तो दिया था पर कैसे संभाल पाउँगा खुद को ये नहीं जानता था .

"तू वो नहीं बनेगा, क्योंकि तू वो नहीं है तू बस कबीर है ये याद रखना " निशा के शब्द मुझे याद आने लगे. दिन ऐसे बीत रहा था की जैसे पंख लग गए हो उसके. भाभी, अंजू, चाची और तमाम औरते ऐसे सजी-धजी थी की जैसे आसमान से अप्सराये उतर आई हो पर मेरा दिल जब काबू से बाहर हो गया जब मैंने अपनी जान को आते देखा, या जान जाते देखा.

मैं जनवासे में चाय पानी की वयवस्था देख कर घर आया ही था की मैंने भाभी के साथ निशा को खड़ी देखा, और देखता ही रह गया. जैसे ही हमारी नजरे मिली काबू नहीं रहा खुद पर . दिल किया की बस आगोश में भर लू उसे और उसके गाल चूम लू.

इठलाते हुए निशा मेरे पास आई और बोली- तैयार नहीं हुए अभी तक तुम .

मैं- आओ मेरे साथ

मैं उसे चाची के घर ले पंहुचा और हम दोनों छत पर आ गए . एकांत मिलते ही मैं उस से लिपट गया

निशा- किस बात की बेसब्री है ये

मैं- बहुत अच्छा किया तुमने जो आ गयी .

निशा- मुझे तो आना ही था .

मैं- दिल बहुत घबरा रहा था, रात का सोच कर

निशा- रात ही तो है बीत जाएगी . सोचना ही नहीं उस बारे में .

मैं- और इस खूबसूरत चेहरे के बारे में सोचु या नहीं

निशा- डायन से इश्क किया है तुमने, इस चेहरे के बारे में नहीं सोचोगे तो फिर किसका ख्याल होगा.

निशा ने मेरा माथा चूमा और बोली- निचे जा रही हूँ मेरे आगे-पीछे मत घूमना. नजरो से देखना मुझे, नजरो से छेड़ना मुझे .

मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा- इश्क किया है तुमसे कोई चोरी नहीं की है.

निशा- इसीलिए तो सारे बंधन तोड़ कर आ गयी. तेरा बंधन बाँध लिया पिया .

मैंने उसे फिर से अपने आगोश में खींच लिया . उसकी सांसे मेरे गालो पर पड़ने लगी.

निशा- जाने दो न

मैं- अब कही नहीं जाना तुमको

निशा-जिस दिन ज़माने की छाती पर पैर रख कर आउंगी फिर एक पल दूर ना जाउंगी तुमसे.

बड़ी नफासत से उसने अपनी छातिया मेरे सीने पर रगड़ी और बाँहों से निकल कर निचे चली गयी. नहा-धोकर नए कपडे पहन कर मैं निचे गया तो भाभी और भैया किसी गहरी चर्चा में डूबे थे . मुझे अपनी तरफ आते देख दोनों चुप हो गए. जिन्दगी में पहली बार मैंने भैया के माथे पर बल पड़े देखे.

भाभी- देवर जी, हमे थोडा समय दो

भाभी ने मुझे वहां से जाने को कहा. मैं और काम देखने लगा पर मन में सवाल था की क्या बात कर रहे थे दोनों. जैसे जैसे अँधेरा घिर रहा था मुझ पर अनजाना डर छाता जा रहा था . कुछ ही देर में सुचना आई की बारात जनवासे में पहुँच चुकी है. हम लोग रस्मो के लिए वहां पहुँच गए. बारात को चाय पानी करवाने के बाद गोरवे की रस्म की और शेखर बाबू घोड़ी पर बैठ गए .बैंड बाजा बजने लगा. बाराती नाचने लगे. मेरी नजर आसमान में चमकते चाँद पर पड़ी और छाती में आग सी लग गयी................................

 
#120


"तू वो नहीं है, तू वो नहीं बनेगा " निशा के कहे शब्दों पर मैंने ध्यान लगाया पर जानता था की ये बेचैनी बढती जाएगी . मैंने सर पर साफा बाँध लिया और बारात पर ध्यान लगाने लगा. बारात जनवासे से चल पड़ी थी थोड़ी ही देर में आ पहुंचनी थी . मेरी नजर भैया पर पड़ी जो बाप चुतिया के साथ चर्चा मे लगे थे भैया ने मुझे देखा तो मेरी तरफ आने लगे पर रस्ते में किसी ने उन्हे रोक लिया और हम मिलते मिलते रह गए.

जैसे जैसे बारात आगे बढ़ रही थी मेरी बेचैनी भी बढ़ने लगी थी. पल पल भारी हो रहा था मुझ पर. जैसे ही बारात गाँव के स्कूल से होते हुए आगे मुड़ी , मैं वहीँ पर रह गया . मैं चाहता था की अँधेरा मुझे लील जाए.मैंने दिशा बदली और कुवे की तरफ चल पड़ा. बाजे की आवाज मेरे कानो में गूंजती रही .

नियति ने कितना बेबस कर दिया था मुझे. घर में शादी थी और मोजूद होते हुए भी होना न होना बराबर था मेरा. कुवे पर पहुँच कर मैंने मटके को उठाया और होंठो से लगा लिया. ठंडा पानी भी उस अग्न को शांत नहीं कर पाया. मैंने खुद को कमरे में बंद कर लिया. पर बढती रात मुझे झुलसा रही थी , गुस्से में मैंने अपने हाथ दिवार से रगड़े , जिनसे की दिवार पर रगड बन गयी .

पर उन निशानों ने मुझे दिशा दिखाई, तालाब के कमरे का सच ये ही था की आदमखोर उस कमरे का इस्तेमाल करता था , वो आदमखोर भी मेरी तरह अपनी मज़बूरी को समझता था इसलिए ही वो इस खास रात को वहां छिपता होगा . पर ये अनुमान अधुरा था क्योंकि मैं दो चाँद रातो के बाद भी पूरा क्या आधा आदमखोर भी नहीं बन पाया था और उस आदमखोर को मैंने बिना चाँद रात भी देखा था . यानी की वो अपने रूप को जब चाहे तब बदल सकता था .

एक बात और जो मुझे परेशान किये हुए थी वो ये की आज कहाँ होगा वो आदमखोर , गाँव में इतना बड़ा आयोजन था कहीं उसने हमला कर दिया तो . ये सोच कर ही मेरा कलेजा कांप उठा. मैं उसी पल वापिस गाँव के लिए चल पड़ा. सोचा जो होगा देखा जायेगा. वैसे भी घर पर कम से कम निशा तो साथ होगी मेरे.

बारात का खाना चालु था . शेखर बाबु मंडप में पहुँच गए थे . देखते ही देखते चंपा भी आ गयी और फेरो की रस्म शुरू हो गयी. मंगल गीत गाये जा रहे थे मैंने एक कुर्सी उठाई और मंडप से थोडा दूर हुआ ही था की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा . मैंने मुड कर देखा भैया थे .

भैया- ठीक है न छोटे

मैं- हाँ बढ़िया भैया , कुछ काम था क्या

भैया ने जेब से एक पुडिया निकाली और बोले- इसे घोल कर पी ले. असर रोक तो नहीं पायेगी ये पर थोड़ी राहत जरुर देगी .

"तो ये है वो दवा जिसके लिए आप भटकते थे " मैंने कहा

भैया- इसका कोई इलाज नहीं है , ये पुडिया तकलीफ को कम कर देगी, तेरा पूर्ण रुपंतार्ण नहीं हुआ है तो क्या पता असर ज्यादा कर जाये. वैसे मुझे कुछ और बात भी करनी थी पर कल करूँगा . अभी पी ले इसे.

भैया ने मुझे गिलास दिया मैंने तुरंत पुडिया घोली और पी गया. भैया ने ठीक ही कहा था मेरी तकलीफ काफी कम हो गयी . दुल्हन बनी चंपा के चेहरे से नजर हट ही नहीं रही थी . इतनी खूबसूरत वो पहले कभी लगी भी तो नहीं थी . मेरी नजर निशा पर पड़ी जो भाभी और अंजू के साथ खड़ी थी .उसके चेहरे पर जो नूर था देखने लायक था.मैंने गौर किया की चाची कहीं दिखाई नहीं दे रही थी . चूँकि फेरो में काफी समय लगना था मैं टेंट में चला गया . बाराती मजे से पकवानों का आनन्द उठा रहे थे. सब कुछ वैसे ही था जैसा किसी आदर्श शादी में होना चाहिए था .

पर क्या ये शादी सामान्य थी , नहीं जी नहीं बिलकुल नहीं. कुछ तो ऐसा था जो सामने होते हुए भी छिपा था . राय साहब का प्रयोजन, भैया के अपने किस्से , अंजू का अतीत. मेरा और निशा का प्रेम . चाची का राज. रमा का राज सब कुछ तो था यहाँ इस जगह पर . मेरी नजरे हर एक पर जमी थी मैं जानता था की यहाँ कोई न कोई तो ऐसा है जो मेरे सवालो के जवाब जानता होगा.

टेंट से मैं वापिस मंडप में आया तो वहां पर ना राय साहब थे , न भैया, न भाभी , ना ही अंजू. मैंने देखा निशा भी नहीं थी . और चाची तो पहले से ही गायब थी. इतने लोगो को अचानक से भला क्या काम हो गया होगा. मैं रसोई में गया तो वहां पर निशा मिली जो विदाई के लिए रंग घोल रही थी ताकि दुल्हन के हाथो की छाप ली जा सके, उसके साथ ही सरला थी .

निशा- क्या हुआ कबीर

मैं- कुछ नहीं , और तुम्हे ये सब करने की क्या जरुरत है

मैंने बात बदली पर वो समझ गयी .

निशा- सब ठीक होगा कबीर. मैं हूँ ना.

मैं- जानता हूँ . अगर फुर्सत हो तो थोडा समय सात बिताते है

निशा- विदाई के बाद समय ही है , सरकार

निशा मेरे पास आई और बोली- आसमान को मत देखना , सोचना ये कोई खास रात नहीं है बस एक रात है जो बीत जाएगी जल्दी ही . मुझे पूर्ण विश्वास है तुम वैसे नहीं बनोगे. मैं साथ ही हूँ

बिना सरला की परवाह किये उसने मेरे माथे को चूमा और मुझे रसोई से बाहर धकेल दिया. मैं फेरे देखता रहा, कन्यादान किया गया वो घडी अब दूर नहीं थी जब चंपा की डोली उठते ही उसके नए जीवन की शुरुआत हो जानी थी . मेरी उडती सी नजर रमा पर पड़ी जो मंगू के साथ खड़ी बात कर रही थी . दोनों का साथ होना किसी खुराफात का इशारा कर रहा था . मैं उनकी तरफ जाने को हुआ ही था की तभी अचानक से अँधेरा हो गया . ...................................

 
#121

बिजली गए मुश्किल से दो चार लम्हे बीते होंगे की बाहर से चीख-पुकार मचनी शुरू हो गयी. आवाजे टेंट से आ रही थी . मेरे दिल ने उस पल जो महसूस किया काश वो बताया जा सकता . तुरंत मैं टेंट की तरफ भागा. अँधेरे में कुछ सुझाई नहीं दे रहा था , कुछ दिखाई नहीं दे रहा था .सिवाय लोगो की चीखो के .

"रौशनी जलाओ कोई , " मैंने जोर से चिल्लाया पर किसे परवाह थी मेरी आवाज सुनने की. मैं जरनेटर की तरफ भागा , तभी अँधेरे में मैं किसी से टकराया, टक्कर ऐसी थी की जैसे किसी शिला से टकरा गया हूँ मैं. पर तभी एक ऐसी गन्ध मेरे नाक में समाती चली गयी , जिसे मैं बिलकुल नहीं सूंघना चाहता था , वो महक थी रक्त की ताजा रक्त की. इस पूनम की रात बस यही नहीं चाहता था मैं. मेरा खुद पर काबू रखना मुश्किल हो गया.

मैं तुरंत टेंट से बाहर भागा . खुली हवा में जो साँस मिली , राहत सी मिली. मैंने जरनेटर का हेंडल घुमाया और रौशनी से आखे चुंधिया गयी .मैंने आँखे बंद कर ली, इसलिए नहीं की रौशनी हो गयी थी बल्कि इसलिए की सामने को देखा, फिर देखा ही नहीं गया. टेंट तार तार हो चूका था . इधर उधर जहाँ देखो इंसानों के टुकड़े पड़े थे कुछ मारे गए थे कुछ घायल तडप रहे थे .

दौड़ते हुए मैं मंडप की तरफ पहुंचा तो जो मेरा कलेजा बाहर आ गया . बेशक मैं धरा पर खड़ा था पर पैरो की जान निकल चुकी थी . जिस डोली को मैंने उठा कर चंपा को विदा करने का वादा किया था वो डोली रक्त रंजित थी , पास में ही शेखर बाबु की लाश पड़ी थी . जिस मंडप में कुछ देर पहले चंपा अपने जीवन की नयी दिशा के सपने संजो रही थी , उसी मंडप में चंपा दुल्हन के लिबास में अर्ध-मुर्छित सी बैठी थी . घर घर न होकर शमशान बन चूका था .

इधर उधर दौड़ते हुए मैं परिवार के लोगो को तलाश करने लगा. मुझे निशा मिली जो बेहोश पड़ी थी . उसके सीने और कंधो पर घाव थे. मैंने उसे होश में लाया. खांसते हुए वो उठ बैठी और अपनी हालात देखने लगी. निशा के पास ही सरला थी जिसके सर पर चोट लगी थी पर ठीक थी वो भी .

निशा और सरला अपनी चोटों की फ़िक्र किये बिना घायलों को संभालने लगी पर जो बात मुझे हैरान किये हुई थी की बाकि के घर वाले कहाँ थे. मुझे मंगू तो मिला पर रमा गायब थी . साला ये हो क्या रहा था . मैं वापिस से चंपा के पास आया. सबसे पाहे शेखर बाबु के शव को वहां से हटाया और फिर चंपा को देखा, वो कुछ नहीं बोल रही थी . काठ मार गया था जैसे उसे.

मैं- कुछ तो बोल चंपा , कुछ तो बोल

पर वो गूंगी बनी बैठी रही . मुझे लगा की कहीं गम न बैठ जाये इसके सीने में . मैंने खींच कर थप्पड़ मारा उसे तो रुलाई छूट पड़ी उसकी . दहाड़े मार कर रोटी चंपा मेरे आगोश में थी, उसके आंसुओ ने मेरा कलेजा चीर दिया था . निशा दौड़ कर मेरे पास आई पर मैंने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया. चंपा का दर्द बह जाना जरुरी था. एक सपना मेरी आँखों के आगे टूट गया था .

जिस डोली को मैंने राजी खुसी विदा करने का वादा किया था वो डोली खामोश खड़ी हजारो सवाल पूछ रही थी और मेरे हाथ खाली थे.

"मैं कसम खाता हूँ चंपा, तेरी खुशियों के कातिल को इसी आँगन में मारूंगा " मैंने कहा.

रोते रोते चंपा बेहोश सी हो गयी थी मैंने उसे बाँहों में उठाया और कमरे में लेजाकर बिस्तर पर सुला दिया.

निशा- बहुत गलत हो गया कबीर , बहुत गलत हो गया

मै- मेरे घर की खुशिया खाई है उसने, बदला जरुर लूँगा. और ऐसा बदला लूँगा की क़यामत तक याद रखेगी दुनिया.

तभी बदहवास सी चाची घर में दाखिल हुई.

मैं- कहाँ थी तुम

चाची-मंदिर में थी , प्रथा के अनुसार मुझे फेरो के बाद ही लौटना था और जब लोटी तो . ये क्या हो गया कबीर

चाची भी रो पड़ी. रो तो हम सब ही रहे थे न . पर मैंने निर्णय कर लिया था उस आदमखोर को कहीं से भी तलाश कर के यही लाना था मुझे . चाहे जंगल को जला देना पड़ता मुझे. रक्त की प्यास उस आदमखोर ने हमारी खुशियों से बुझाई थी ,कीमत तो उसे चुकानी ही थी . बदन प्रतिशोध की अग्नि में इतना धधक रहा था की आदमखोर सामने होता तो आज या तो वो नहीं तो मैं रहता .

"कबीर मैं तेरे साथ चलूंगी " निशा ने मेरी तरफ आते हुए कहा .

हम दोनों गाँव से बाहर की तरफ चल दिए. लाशो की दुर्गन्ध पीछा ही नहीं छोड़ रही थी .

"तुझे लौट जाना चाहिए , तुझे खतरे में नहीं डाल सकता वैसे भी चोटिल है तू " मैंने निशा से कहा

निशा- आज तेरा साथ छोड़ दिया तो फिर क्या जवाब दूंगी कल तुझे मैं . छोड़ने के लिए नहीं थामा तुझे मैंने

कुवे की तरफ जाने वाले रस्ते पर खड़ी दोनों गाडियों को मैंने दूर से ही पहचान लिया था , एक गाड़ी राय साहब की थी और दूसरी गाडी भैया की , दोनों गाडियों का साथ होना अजीब था . घर पर मातम मचा था और ये दोनों यहाँ कुवे पर क्या कर रहे थे . सोचने की बात थी .

निशा- खान में चले क्या

मैं- खान में कुछ नहीं मिलेगा निशा, ये गाडिया भरम है और कुछ नहीं. खान में जाना होता तो पैदल आते गाड़िया लेकर नहीं. खान को गुमनाम रखने के लिए इतना कुछ किया गया है

निशा- समझती हूँ पर गाडिया यहाँ मोजूद है तो इनके मालिक भी होने चाहिए ना.

इस से पहले की निशा अपनी बात पूरी कर पाती उसने मुझे झाड़ियो में खींच लिया. हमने देखा की मंगू कुवे की तरफ से आया और राय साहब वाली गाड़ी को स्टार्ट करके वहां से चलता बना .

निशा- ये क्या कर रहा था यहाँ पर

मैं- देखते है , और चोकन्ना रहना . न जाने इनका कौन सा खेल चल रहा है .

हम दोनों कुवे के पास पहुंचे, कमरे को देखा सब कुछ वैसा ही था जो मैं छोड़ कर गया था . पर मंगू का इस परिस्तिथि में यहाँ होना संदेह पैदा कर गया था . निशा से मैंने लालटेन मंगवाई और हम कमरे के चारो तरफ देखने लगे. और जल्दी ही हमें कुछ ऐसा मिला जिसने सोचने समझने की शक्ति को समाप्त कर दिया गया. जहाँ से चले थे घूम कर हम एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़े थे ........................

 
#122


"तो आदमखोर की आड़ में इनका अलग ही नाटक चल रहा है , "निशा ने मंगू के छिपाए हुए बक्से को उठा कर खोलते हुए कहा .

मैं- न जाने किस लालच की पट्टी पड़ी है मंगू की आँखों में , उसे बिलकुल नहीं करना चाहिए था ये, गलती तो मेरी भी है उसे तभी रोकना चाहिए था जब मुझे पहली बार पता चला था की वो क्या कर रहा है .

निशा- उस से पूछ तो लो क्यों वो नकली आदमखोर बन कर घूम रहा था . आदमखोर के खौफ को हद से ज्यादा मंगू ने बढ़ा दिया है . हमें मालूम करना ही होगा की उसका क्या उद्देश्य है .

मैंने निशा से उस नकली आदमखोर की खाल को लिया और उस पर आंच लगा दी. धू धू करके जलता धुआ मेरे सीने की आग को और भड़का गया.

निशा- वक्त आ गया है कबीर, तुम्हे ऊँगली टेढ़ी करनी होगी. समय रिश्ते-नातो का लिहाज करने का नहीं रह गया है.

मैं- सही कहती हो सरकार. फिलहाल मुझे उस आदमखोर की तलाश करनी है , तुम पर हाथ डाल कर उसने ठीक नहीं किया.

निशा- बात सिर्फ मेरी नहीं है, बात चंपा की भी है जिसके साथ अन्याय हो गया .

तमाम बातो के बीच मुझे भैया की गाड़ी खटक रही थी , भैया को ये गाडी बहुत ही प्यारी थी . इसे अचानक से यहाँ छोड़ कर जाना , हो न हो भैया जंगल में ही होंगे. और इस वक्त जंगल में होने का सिर्फ एक ही मतलब हो सकता था . कहीं ना कहीं मेरा शक यकीन में बदलता जा रहा था की भैया ही वो आदमखोर तो नहीं.

मैं- निशा , मैं तुमको छोड़ आता हूँ

निशा- तुम्हे अकेला छोड़ कर जाउंगी कैसे सोचा तुमने

मैं- तुम्हे थोडा आराम करना चाहिए . हम दिन में मिलेंगे .

निशा- मैं कही नहीं जाने वाली कबीर.

मैं- बात को समझो तुम.

निशा- इस जंगल को मैं भी उतना ही जानती हूँ कबीर , जितना की तुम. और हम दोनों फिलहाल एक ही चीज को तलाश रहे है .

मैं जानता था की वो सच कह रही है पर मेरे मन में ये भावना जोर मार रही थी की भैया ही वो आदमखोर ना हो . मैं निशा के सामने ये बात नहीं लाना चाहता था . कम से कम इस वक्त तो नहीं . इसलिए मैं उसे भेजना चाहता था .

निशा- ये एक कहानी नहीं है कबीर, ये दो कहानिया है . एक कहानी सोने की और दूसरी उस आदमखोर की . हो सकता है की दोनों कहानिया एक दुसरे से जुडी हो या अलग हो . पर हमें इस गुत्थी को सुलझाने के लिए दो दिशाओ का सहारा लेना पड़ेगा.

मैं- समझ चूका हूँ इस बात को . हो सकता है की कविता को आदमखोर ने नहीं मंगू ने मारा हो .

निशा- अचानक से बिजली का कटना और ठीक उसी समय पर हमला होना . इतना अचूक हमला योजना बना कर ही हो सकता है .

मैं- इसी बात को समझ नहीं पा रहा हूँ मैं निशा

निशा- क्यों

मैं- क्योंकि टेंट में जो था वो असली आदमखोर था , उसकी ताकत को . उसकी गंध को पहचाना है मैंने.

निशा- ऐसा भी तो हो सकता है की टेंट में असली वाला हो और मंडप में मंगू ने ये काण्ड कर दिया हो .

निशा की बात सुनकर मुझे वो पल याद आया जब रमा और मंगू आपस में खुसरपुसर कर रहे थे .

निशा ने मेरा हाथ थामा और बोली- जानती हूँ मन पर बहुत बोझ है . इसे मुझे दे दो. तुम अकेले नहीं हो इस सफ़र में . थोडा आराम कर लो

मैं- आराम हराम हो गया मेरी सरकार. किस मुह से घर जाऊंगा वापिस. सोचा तो ये था की चंपा को विदा करते ही तुम्हे इस घर ले आऊंगा पर देखो हालात क्या हो गए है

निशा- मैं तुमसे कहाँ दूर हु कबीर. हम दोनों संभाल लेंगे सब कुछ भरोसा रखो

मैं- तुम पर ही तो भरोसा है

निशा ने आगे बढ़ कर मेरा माथा चूमा .इस से पहले की मैं उसे कुछ कह पाता, आसमान उस चिंघाड़ से गूँज उठा . एक पल के लिए हम दोनों हैरान रह गये.

निशा-यही कहीं है वो

हम सामने खेतो पर आये.

निशा- जंगल में

हम दोनों लगातार आती आवाजो की दिशा में दौड़ पड़े. चांदनी रात की वजह से दूर तक देखना आसान था , भैया की दी हुई पुडिया ने बहुत काम किया था मेरे लिए . पर हमें ये समझ नहीं आ रहा था की असल में आवाजे किधर से आ रही थी , आदमखोर लगातार चिंघाड़ते हुए जंगल में दौड़ रहा था .

मैं- समझ नही आ रहा , क्या हो रहा है ये . किस किस्म का खेल खेल रहा है वो

निशा- खेल नहीं है, लगता है की तकलीफ में है वो . कहीं तुमने घायल तो नहीं कर दिया उसे.

मैं- पक्के तौर पर नहीं कह सकता इस बारे में

निशा- चिंघाड़ से तो ऐसा ही प्रतीत होता है .

इस बार आवाज ऐसे लगी की बहुत पास से आई हो . हम पेड़ो के दाये से दौड़ते हुए संकरे रस्ते से थोडा और अन्दर की तरफ गए उस वो ही जगह थी जहाँ पर मैंने राय साहब को आदमखोर होने का शक किया था . उस बड़े से पत्थर के पार जाते ही मोड़ पर पहुचे ही थे की तभी निशा किसी से टकरा गयी और जब सामने वाले के चेहरे पर मेरी नजर पड़ी तो होंठो से बस इतना निकला, "तुम . तो तुम ही हो वो.................."

 
#


"तो तुम ही हो वो ," मैंने कहा

"नहीं मैं नहीं हूँ " रमा ने शांति से कहा

मैं- तो फिर इस जंगल में जब मौत सर पर नाच रही है तुम क्यों भटक रही हो क्या इरादा है तुम्हारा. और हाँ इस बार कोई झूठ नहीं . मुझे रेस अहब तुम्हारे और मंगू के बीच जो भी है सब मालूम है . इस जंगल ने न जाने क्या क्या छिपाया है तुम्हारी लाश भी कहाँ गायब हुई कोई नहीं जान पायेगा.

रमा- मुझे मौत की धमकी दे रहे हो कुंवर.

रमा ने मुझे ताना मारा.

निशा- रमा, कबीर के सवाल का जवाब दो .

रमा- मुझे राय साहब ने बुलाया था जंगल में

रमा की बात ने हम दोनों को हैरान कर दिया .

मैं- क्या पिताजी भी जंगल में मोजूद है

रमा- शायद हाँ शायद न

निशा- क्या मतलब

रमा- उन्होंने बस इतना कहा था की जंगल में मिलना तुम्हारी जरुरत पड़ेगी.

मैं- जरुरत पर किसलिए

रमा- वो तो नहीं जानती .

मैं- ये तो जानती हो न की मंगू ही आदमखोर बन कर ये काण्ड कर रहा है .

रमा कुछ नहीं बोली

निशा- तो तुम जानती हो इस बारे में . परकाश की हत्या में तुम भी शामिल थी न. ये षड्यंत्र तुमने, मंगू और राय साहब के साथ मिल कर बनाया . प्रकाश को अपने हुस्न के जाल में फंसाया . उसे कुवे पर बुलाया जहाँ पर मंगू ने उसका काम तमाम कर दिया.

रमा की ख़ामोशी बता रही थी की निशा ने जो कहा सच कहा .

मैं- रमा बताओ क्या वजह थी जो परकाश की हत्या हुई.

रमा- उसको मरना ही था , जीना हराम कर दिया था उसने मेरा. उसकी मांगो को पूरा करते करते थक गयी थी मैं. उसे मेरे जिस्म की चाहत थी मैंने अपना जिस्म दिया उसे पर उसका लालच बढ़ता ही गया .इतना बढ़ा की पाप का घड़ा फोड़ना पड़ा. उसे मरना ही था , मैं या राय साहब या फिर मंगू हम तीनो ही हद नफरत करते थे उस से . हम तीनो के पास ही ठोस वजह थी उसे मारने की , पर राय साहब उसकी गलतियों को नजरअंदाज करते आ रहे थे न जाने क्यों ? पर मैंने और मंगू ने निर्णय किया और उसे ठिकाने लगा दिया. हम चाहते तो जंगल में गायब कर सकते थे उसे पर हमने उसकी लाश को खुले में फेंका ताकि दुनिया जान सके की एक कुत्ते को मारा गया .

रमा के होंठ गुस्से से थर थर कांप रहे थे.

निशा- राय साहब की क्या मज़बूरी थी जो प्रकाश को माफ़ किये जा रहे थे वो जबकि तुम तीनो में से सबसे आसानी से प्रकाश का काम तमाम वो ही करवा सकते थे बिना किसी शोर-शराबे के.

रमा- बस यही नहीं मालूम मुझे की क्यों चाहते थे वो उसे. यहाँ तक की वो राय साहब पर नाजायज दवाब बनाये हुए था तब भी वो उसे नजरअंदाज करे हुए थे .

मैं जानता था की वो राय साहब का प्रकाश की माँ से किया हुआ वादा था जिसे वो निभा रहे थे .

निशा- मंगू क्यों नफरत करने लगा था परकाश से.

मैंने भी इस सवाल पर गौर किया न जाने क्यों मेरी धड़कने बढ़ने लगी थी .

रमा- कुछ बाते राज ही रहनी चाहिए कुंवर. उन राजो को इतना गहरा दफ़न हो न चाहिए की वो कबी खुल न सके. इस राज को राज ही रहने दो , वर्ना तुम्हे अफ़सोस होगा की परकाश पहले क्यों नहीं मर गया . क्योंकि ये जानने के बाद तुम्हे जिन्दगी भर मलाल रहेगा की उसे तुम क्यों नहीं मार पाए.

रमा की बात ने हद से जायदा विचलित कर दिया था मुझे. दिल इतनी जोर से धडक रहा था की अगर छाती फाड़ कर बाहर आ गिरता तो कोई ताज्जुब नहीं होता.

"मैं फिर भी जानना चाहूँगा " बड़ी मुश्किल से बोल पाया मैं

रमा- चंपा, चंपा का शोषण किया था उसने. चंपा को नोच-खसोट रहा था वो . अकेली चंपा ही नहीं बल्कि मैं और कविता भी . हम सब उसके जाल में फंसे थे . पर सबसे जायदा परेशां थी चंपा वो चाह कर भी किसी को बता नहीं पा रही थी की उसके साथ क्या हो रहा है .

रमा की बात ने मुझे और मेरे साथ निशा दोनों को ही हिला कर रख दिया. प्रकाश ने चंपा पर हाथ डाला था . सही ही कहा था रमा ने की मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा की मैं उसे क्यों नहीं मार पाया.

रमा- मंगू जान गया था इस बात को तबसे ही वो फ़िराक में था .

अब मैं समझा था की मंगू का अक्सर गायब रहने का क्या उद्दश्य था . वो ताक में रहता था की कब परकाश को निपटा दे.

रमा- हम ये जान गए थे की प्रकाश ने राय साहब पर दबाव बनाया हुआ है तो फिर मैंने और मंगू ने योजना बनाई और मौका देख कर उसे ढेर कर दिया.

निशा- अब मैं तुमसे सबसे महत्वपूर्ण प्रशन पूछना चाहूंगी. प्रकाश ने तुमसे कबीर को अपने झांसे में लेने के लिए क्यों कहा था . वो तुम्हारा इस्तेमाल कबीर के खिलाफ क्यों करना चाहता था . तुमने कबीर को वो ही सब दिखाया, बताया जो परकाश चाहता था . हमें बताओ क्या चाहता था वो .

रमा- परकाश नहीं चाहता था की कबीर की तलाश पूरी हो. वो नहीं चाहता की कबीर इस जंगल में तलाश करे.

निशा- उसने बताया की कबीर को क्या तलाश थी .

रमा-मुझे लगता है की कबीर जानता है , खैर मुझे राय साहब के पास जाना होगा.

रमा आगे बढ़ गयी रह गए हम दोनों. रमा की बातो ने तमाम मोहरों को फिर से घुमा कर रख दिया था .

निशा- क्या जानते हो तुम

मैं-अतीत, निशा, मुझे अतीत की तलाश है वो अतीत ही है जो हमारे आज को उलझाये हुए है.

निशा ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया . रात तेजी से बीत रही थी और हम खाली हाथ थे. सवाल अभी भी वही थे की असली आदमखोर कौन था .

 
#124


निशा- तुम्हे उसे जाने नहीं देना चाहिये था. कभी कभी लगता है की इतना पास आकर तुम्हारे कदम रुक जाते है .

मैं- जान कर जाने दिया रमा को मेरी जान. ताकि सही समय पर उसे राय साहब के साथ पकड सकू. रमा-मंगू-राय साहब तीनो ही मिले हुए है. तीनो ऐसा दर्शाते है की अलग है पर असल में एक है ये तीनो.राय साहब धुप-छाया का खेल खेल रहे है .

निशा- रमा ने ऐसा क्यों कहा की प्रकाश नहीं चाहता था की तुम अतीत जानो

मैं- परकाश राय साहब की नाजायज औलाद था .

मेरी बात सुन कर निशा की चेहरे का रंग बदल गया . मैंने उसे पूरी बात बता दी .

मैं- राय साहब को बाप कहते हुए शर्म आती है पर चाह कर भी मैं इस सच को झुठला नहीं सकता की मेरी रगों में उसका ही खून दौड़ रहा है.

निशा- तुम अलग हो कबीर . तुम सा कोई नहीं.

मैं- बस तुमने ही जाना मुझे मेरी जाना.

निशा- रिश्तो का बोझ बहुत भारी होता है कबीर, मुझे ख़ुशी है की मैने उस इन्सान का हाथ थामा है जो लायक है .

मैं- सोचा था की कल बड़ा खूबसूरत होगा. बरसते रंग में रंग दूंगा तेरी चुनरिया . हाथो में गुलाल लिए तुझे अपने आगोश में लिए ढलते सूरज की लाली में लाल रंगुंगा. रंग से भीगी तुम जब अपनी जुल्फों जो झटको गी तो ये नुरानी चेहरा देखूंगा . सिंदूर को अबीर बना कर तुम्हे जो रंग दूंगा , प्रेम का रंग फिर न छुटेगा तुम से.

"मैं तो रंग चुकी हूँ सरकार तुम्हारे प्रेम में ." निशा ने बेहद हौले से कहा.

जंगल में बहुत तलाश की पर हमें आदमखोर नहीं मिला. रह रह कर उसकी आवाजे तो आती रही पर वो नहीं मिला. रात के तीसरे पहर में मैंने निर्णय लिया की निशा को छोड़ आऊ , बेशक वो जाना नहीं चाहती थी पर मैंने जोर दिया. इस वादे के साथ की जल्दी ही उसे अपना बनाने मैं आऊंगा.

वापसी में मेरा एक एक कदम इतना भारी हो गया था की मैं क्या बताऊ उस बोझ के बारे में. आँखों के आगे चंपा का चेहरा घूम रहा था , ये मनहूस रात सब कुछ लूट ले गए थी हमसे.बरसो बाद घर में ख़ुशी आई थी , और अब हालात देख कर मैं सोच रहा था की काश ये ख़ुशी आती ही नहीं. कुछ थकान थी कुछ मुठभेड़ की चोटों का दर्द. मैंने घर जाने के बजाय खंडहर पर जाने का सोचा. थोड़ी देर मैं सोना चाहता था मैंने ख़ामोशी से छिपे कमरे को खोला और अन्दर दाखिल हो गया.

पर देखिये, किस्मत हमारी. नींद भी साली आज बेवफाई पर उतर आई थी . कमरे में मैंने जो देखा नींद रुसवाई कर गयी. कमरे में चिमनी की रौशनी में मेरी नजर जिस सक्श पर पड़ी. सात जन्मो में भी मैं यकीन नहीं कर सकता था की वो इन्सान मुझे वहां पर मिलेगा.

हम दोनों की नजरे मिली. हम दोनों थके थे , परेशान थे पर यहाँ इस जगह पर हम दोनों का होना सामान्य बिलकुल नहीं था .

"तुम सोच नहीं सकते जंगल ने अपने अन्दर क्या क्या छिपाया है. मैं उसे वहां छिपाती जहाँ वो सबके सामने तो होता पर उसे कोई देख नहीं पाता " मैंने अंजू के शब्दों को दोहराया.

"तो अब कहने को क्या ही रह गया है " मैंने चुप्पी को तोडा.

"जानता था तू आज नहीं तो कल यहाँ पहुँच ही जायेगा छोटे " भैया ने टूटती आवाज में कहा .

मैं- ये मेरी ही जगह है भैया. पर आपका यहाँ पर होना बहुत कुछ कह रहा है मुझे, ये दीवारे चीख रही है . ये दीवारे पहले भी चीख रही थी बस मैं समझ नहीं पाया था उन चीखो को .

भैया- तेरी जगह , ह्म्म्म . तुझसे पहले न जाने कितने आये कितने गए जिन्होंने इस जंगल में अपनी जिन्दगी जी .तू जानता ही क्या है

मैं- जान जाऊंगा भैया जान जाऊंगा. आज आपको मेरे सवालो के जवाब देने ही होंगे. आज आपका कोई बहाना नहीं चलेगा,मैं चलने ही नहीं दूंगा. आज सिर्फ मैं बोलूँगा और आप सुनेंगे.

भैया अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ाई और बोले- अपने बड़े भाई से ऐसे बात करेगा तू

मैं- समझ नहीं आ रहा की कहाँ से शुरू करू . सवाल बहुत है और जवाब के लिए बड़ा बेकरार मैं तो सीधा मुद्दे पर आते है अपने भाई को तो बता सकते थे न की आदमखोर कौन है , जानता हूँ आप जानते थे की आपका राज खुल जायेगा जानता हूँ की आप मुझसे बेहद प्यार करते है इसलिए आपने अपनी दवाई की पुडिया मुझे दी ताकि मैं सुरक्षित रह सकू पर आप खुद पर काबू नहीं रख पाए और देखो क्या काण्ड हो गया.

भैया खामोश बैठे रहे कुर्सी पर कुछ नहीं बोले. उनकी ख़ामोशी और गुस्सा दिलाने लगी मुझे.

"बोलते क्यों नहीं " जिंदगी में पहली बार मैंने भैया के सामने आवाज ऊंची की थी .

भैया- क्या बोलू. कुछ भी तो नहीं मेरे पास कहने को जो है यही है .

भैया के शब्दों ने मेरे कलेजे पर चोट कर दी थी .

मैं- चंपा के सर पर हाथ रख कर कसम खाई है मैंने की उसके खुशियों के कातिल को सजा दूंगा . पर अब कैसे समझाऊ खुद को की कातिल भी मेरा अपना ही है .

भैया- सच के पथ पर चलना बड़ा कठिन होता है छोटे. जब जब तू इस सच को जान ही गया है तो तुझे अपने वादे को पूरा करना चाहिए. मैं जानता हूँ जो हुआ बेहद गलत हुआ है इस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं .मैं भी तंग आ गया हूँ इस बोझ को उठाते उठाते . और फिर मुझसे खुशनसीब भला कौन होगा जो अपने भाई के हाथो रुखसत होगा.

भैया कुर्सी से उठे और मेरे पास आये , उन्होंने जेब से एक पिस्तौल निकाली और बोले- चला इसे और दाग दे सारे बारूद को मेरे अंदर. बस इतना ध्यान रहे यहाँ क्या हुआ ये इस दरवाजे के बाहर कभी नहीं जान पाए कोई.

बड़ी मुश्किल से आँखों में भर आये पानी के कतरे को मैंने बहने से रोका. मेरा भाई बहुत चाहता था मुझे. मैं चाह कर भी इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था की असली आदमखोर मेरा भाई था .मेरे हाथ कांपने लगे थे .

भैया- क्या सोच रहा है चला पिस्तौल

मैंने पिस्तौल भैया पर तान दी.........

 
#125


"क्या सोच रहा है छोटे, चला गोली "भैया ने फिर कहा

मैं- ये तरीका कामयाब नहीं होगा भैया. आपका भाई इतना भी चुतिया नहीं है की इस नाटक को समझ नहीं पायेगा. ग्रेट अभिमानु ठाकुर जो अपने दिल में इतना सब कुछ छिपाए हुए है वो इतनी आसानी से आदमखोर का राज मुझे बता रहा है, मामला इतना भी सीधा नहीं है .

मैंने पिस्तौल टेबल पर रखी और भैया से फिर मुखातिब हुआ.

मैं- अतीत के तमाम तार मैंने जोड़ लिए है भैया, मैं जानता हूँ की आपने भरकस कोशिश की अतीत को छुपाने की पर चूँकि मेरी आने वाली जिन्दगी का भी हिस्सा ये अतीत बन गया है तो मैं चाहता हूँ की पूर्ण ईमानदारी से मेरा भाई मुझे अतीत में ले जाये.

भैया- अतीत कुछ भी नहीं है सिवाय बीते वक्त के.

मैं- वही तो मैं जानना चाहता हूँ की बीते वक्त में ऐसा क्या हुआ था की मेरे भाई ने आज इतने सालो बाद इस कमरे में अपने पैर रखे. अब कोई झूठ नहीं भैया, मैं बिलकुल भी यकीन नहीं करूँगा की आप इस जगह के बारे में पहले से नहीं जानते थे. इस जगह से आदमखोर के तार जुड़े है वो भी जानता है इस जगह को , तो बड़े भैया बता भी दो मुझे कौन है वो आदमखोर और इतने लोगो के कातिल को क्यों बचा रहे हो आप.

भैया- कुछ राज़ , राज ही रहने चाहिए छोटे. मैं तुझसे वादा करता हूँ की आज के बाद वो आदमखोर इस गाँव में , इस इलाके में कभी नहीं दिखेगा.

मैं- वो मेरे और उसकी अगली मुलाकात पर निर्भर करेगा. फ़िलहाल मैं वो सुनना चाहता हूँ जो सबसे छिपा है . आप ही बताओ कहाँ से शुरू करे, मुझे लगता है की चाचा की मौत से शुरू से करते है . अब ये मत कहना की आपको मालूम नहीं था की चाचा का. और वो गाडी कहाँ गायब की आपने.

भैया ने गहरी नजरो से मुझे देखा और बोले- मुझे लगता था की मैं सब कुछ ठीक कर दूंगा . मैंने कोशिश भी की . सब ठीक हो भी गया था जिन्दगी में मैं आगे भी बढ़ गया था पर फिर तुम, मेरे भाई तुम. तुमने भी जंगल को अपना साथी चुन लिया . मेरा किसान भाई जमीनों की दोस्ती छोड़ कर जंगल में भटक रहा था . शुरू में मैंने सोचा की नयी जवानी है , आसमान खुला है उड़ने दो . पर तुम वो सब करते गए जो नहीं होना चाहिए था .

मैं- मैंने कुछ नहीं किया भैया, मैंने हमेशा सच को सच कहा, गलत को गलत कहा.

भैया- दुनियादारी में सबसे बड़ा गुनाह यही तो है. तुम्हारे नजरिए की वजह से पिताजी और तुम्हारे रिश्ते में दरार आनी शुरू हो गयी . मैं हरगिज नहीं चाहता था की घर की नींव कमजोर हो. क्योंकि मैं हमेशा सबको साथ लेकर चला.

मैं- आपकी यही सोच आपके पैरो की बेडिया बन गयी भैया. आपने चीजो को छुपाना बेहतर समझा , ना की उन्हें सामने लाना.

भैया- वो ही बेहतर रास्ता था . ये मैं समझता हूँ तू नहीं समझेगा.

मैं- चाचा की पहेली से शुरू करते है

मैंने फिर से दोहराया.

भैया- चाचा एक नालायक आदमी था . कुल का कलंक. शराब शबाब में डूबा हुआ एक अय्याश जमींदार . जिसे कभी परिवार की फ़िक्र नहीं थी , उसे परवाह थी तो बस अपनी उन रंडियों की जो सारी शर्म लिहाज बेच कर चाचा के बिस्तर में घुसी रहती थी .

मैं- मुझे उसकी मौत क्यों , किन हालातो में हुई . किसने मारा ये जानना है .आपने हमेशा मुझसे कहा की हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए की किसी के जीवन पर संकट हो और आप खुद चाचा की मौत में शामिल रहे.

भैया- घर को घर बनाये रखने के लिए जरुरी था कबीर, कभी कभी जो सच नहीं कर पाता वो झूठ कर देता है . घर आज भी भरम में जी रहा है की चाचा कभी न कभी लौटेगा. ये झूठी उम्मीद उस सच से लाख गुना बेहतर है जिसे तू खोज रहा है .

मैं- मैं सिर्फ उस वजह को खोज रहा हूँ जिसकी वजह से चाचा को मरना पड़ा. अब ये मत कहना की चाचा को किसी और ने नहीं बल्कि उसकी हवस ने मारा था मैं जानता हु की कोई तो बात थी जो चाचा को बहुत परेशां किये हुए थी. अपने अंतिम दिनों में उसने घर आना छोड़ दिया था वो जंगल में था. इस जंगल में जहाँ हम सबने अपने अपने राज छुपाये है . पहले तो मैंने सोचा की चाचा ही वो आदमखोर है पर वो जो की है ही नहीं वो कैसे हो सकता है

भैया- कैसी परेशानी हो सकती थी चाचा को

मैं- ये मैं आपसे पूछता हूँ भैया. क्योंकि उस दौर में आप भी इसी जंगल में घूमते रहते थे.

भैया-रमा थी वो वजह जो चाचा और पिताजी की तल्खी का कारन बन गयी थी. रमा से दोनों भाइयो का चक्कर था . दोनों रमा पर अपना अधिकार मानते थे .

तो भैया भी पिताजी के रंगारंग कार्यकर्मो की जानकारी रखते थे .

भैया- हमारा घर जितना दुनिया को चका चौंध से भरा दिखाई देता है, उस घर की नींव धोखे, लालच और अनैतिक क्रत्यो पर टिकी हुई है छोटे, मैंने कभी नहीं चाहा था की तुझ पर छींटे पड़े पर खैर, पिताजी ने अपनी कुंठा में रमा के पति को मरवा दिया.

मुझे कोई खास हैरानी नहीं हुई ये जानकार.

मैं- लालच, पिताजी की नाराजगी का कारन केवल रमा ही नहीं थी बल्कि वो सोना भी था जो चाचा अपनी रंडियों पर लुटा रहे थे , पिताजी को सबसे ज्यादा प्यार अपनी उसी दौलत से है ये तो आप भी मानते होंगे भैया.

भैया- राय साहब किसी से प्यार नहीं करते वो बस इस्तेमाल करते है मन भर गया तो कोई और खिलौना पसंद कर लेते है .

मैं- चाचा की लाश कहाँ है. और वो गाडी .

लाश के बारे में पूछना बहुत जरुरी था मेरे लिए क्योंकि भैया के एक जवाब से मुझे बहुत कुछ मिलता , ये बात भी मालूम होती की क्या उनके सम्बन्ध भी थे चाची से मेरे जैसे.

मैं- अब जब सब कुछ उलझा हुआ है ये भी तो हो सकता है की अल्हड जवानी में आपका दिल आ गया हो चाची पर और आपने चाचा को रस्ते से हटाने की ठान ली हो ताकि घर में कोई रोक टोक न रह सके. आप दोनों जी भर कर अपनी प्यास बुझा सके. वैसे भी हवस तो हमारे खून में दौड़ती है .

इस से पहले की मेरी बात पूरी होती भैया का थप्पड़ इतनी जोर से मेरे गाल पर पड़ा की उसकी आवाज बड़ी जोर से गूंजी ,अगले ही पल मेरे गिरेबान को भैया ने पकड़ लिया

भैया- किसी और ने ये बात की होती तो अब तक उसकी लाश धरती पर पड़ी होती. तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा सोचने की .

मैं- क्यों न सोचु, चाचा के मरने का सबसे जायदा फायदा किसी को हुआ है तो वो आपको. आपने बड़ी आसानी से चाचा की जगह ले ली. हर जगह मेरी तलाश की सुई सिर्फ एक नाम पर आकर अटक जाती है ठाकुर अभिमानु सिंह पर . हर जगह जहाँ आपके होने की उम्मीद नहीं होती आप मिले मुझे. यहाँ तक की उस सूरजभान को मुझ से ज्यादा वरियत दी आपने. आदमखोर को भी बचा रहे है आप क्यों भैया क्यों ............ अपने भाई की परवाह नहीं आपको. मेरे जख्मो पर मरहम लगाने की जगह आप उस आदमखोर को बचाने के रस्ते तलाश रहे है क्यों भैया क्यों........ ऐसा क्या है जिसने आपके और मेरे बीच दिवार खड़ी कर दी है भैया. क्या है वो वजह आज आपको बताना पड़ेगा भैया....


"मैं हूँ वो वजह कबीर.............."एक तीसरी आवाज गूँज उठी उस कमरे में ......................
 
#126

"मैं हूँ वो वजह कबीर, जिसे अभिमानु तमाम जहाँ से छिपाते हुए फिर रहे है . मैं नंदिनी ठकुराइन मैं हूँ इस सारे फसाद की जड़ मैं हूँ वो गुनेहगार जिसकी गर्दन दबोचने को तुम तड़प रहे हो . मैं हूँ वो राज जो अभिमानु को चैन से जीने नहीं दे रहा " भाभी ने कहा.

मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया. उस पल मैंने सोचा की क्यों ये रात अब खत्म नहीं हो जाती. मेरे सामने भाभी खड़ी थी जो अभी अभी उस छिपे हुए कमरे से बाहर आई थी .

"नहीं ये नहीं हो सकता " मैंने कहा

भाभी- यही सच है कबीर . इस जंगल का सबसे भयानक सच . वो सच जिसका बोझ बस तुम्हारे भैया उठा रहे है .

भैया- नंदिनी, मैंने तुमसे कहा था न चाहे कुछ भी हो जाये ........

भाभी- इसके आगे जो होता वो ठीक तो नहीं होता न अभी. एक न एक दिन कोई न कोई तो ये बात जान ही जाता न. तुमने बहुत कोशिश की फिर भी देखो ....... कबीर, इसमें तुम्हारे भैया का कोई दोष नहीं है . जो कुछ भी हुआ उसकी जिम्मेदार हूँ . मैं ही हूँ वो रक्त प्यासी ........

मेरी तो जैसे साँस ही अटक गयी थी. ना कुछ समझ आ रहा था न कुछ कहते बन रहा था .

मैं- तो इसलिए वो आदमखोर मुझ पर हमला नहीं करता था ,वो पहचानता था मुझे.

भाभी- अपने बच्चे के जैसे पाला है तुमको , मेरी ममता के आगे तृष्णा हार जाती थी .

मैं- पर मैंने उस अवस्था में आप पर हाथ उठाया . ये गुनाह हुआ मुझसे भाभी.

भाभी- कोई गुनाह नहीं, उस अवस्था में तुमने मुझे संभाला बहुत बड़ी बात है .

मैं- कुछ समझ नहीं आ रहा , चंपा के साथ जो हुआ . बरातियो की लाशे . उनका क्या कसूर था

भैया- कबीर, नंदिनी ने मंडप और बारात पर हमला नहीं किया

मैं- मैं भी भाभी के राज को सीने में दबा लूँगा भैया

भैया- वो बात नहीं है कबीर. मैं तुझसे सच कह रहा हूँ , नंदिनी और मैं भी इसी सोच में पड़े है की किसने काण्ड किया ये .नंदिनी शुरू से ही चांदनी रात की वजह से परेशां थी , ये हरगिज नहीं चाहती थी की ब्याह उस रात हो , उसने पुजारी से भी ब्याह टालने को कहा पर राय साहब की जिद थी की ब्याह आज रात ही हो. इसलिए हमने निर्णय कर लिया था की जैसे ही बारात आएगी मैं नंदिनी को लेकर इस जगह पर आ जाऊंगा . कोई न कोई बहाना बना लेंगे लोगो के सामने और हमने किया भी ऐसा. जब तुम हमारे पास आये थे नंदिनी ने तुम्हे टोका था तब हम इसी बारे में बात कर रहे थे . मौका देखते ही हम लोग जंगल में आ गए.

नंदिनी- कबीर, उस अवस्था को बहुत हद तक मैंने तुम्हारे भैया की मदद से संभालना सीख लिया है , पर रक्त पीना उस रूप की मज़बूरी है , हमने इसका भी रास्ता निकाल लिया जरुरत पड़ने पर मैं जानवरों का शिकार कर लेती हूँ.पर एक सवाल जो मुझे खाए जा रहा है की यदि मैं यहाँ थी तो फिर वो हमला किसने किया

मैं- मंगू ने , वो ही नकली आदमखोर बन कर घूम रहा है

भैया- उसकी तो खाल खींच लूँगा मैं .

मैं- वो सिर्फ मोहरा है असली गुनेहगार कौन है ये समझ नहीं आ रहा वो रमा भी हो सकती है और राय साहब भी . वो मैं मालुम कर लूँगा खैर मैं जानता हूँ की आप दोनों ने इस जगह पर सात-आठ साल बाद कदम रखा है जबकि आप दोनों इस जगह के बारे में जानते थे , कम से कम भैया तो पुराने राज दार है इस कहानी के . और मैं बड़ा बेसब्र हूँ ये जानने को की क्यों . आखिर क्यों रूठना पड़ा भैया इस जगह से आपको . क्या हुआ था ऐसा जो आपने अपनी यादो तक से इस जगह को मिटा दिया. माफ़ कीजिये, मुझे मेरे शब्द पलटने पड़ेंगे, भाभी आप आज की रात ही यहाँ पर आई है . क्यों मैंने सही कहा न

भाभी के चेहरे पर उडती हवाइयो को मैंने चिमनी की धीमी रौशनी में भी देख लिया था .

मैं- क्यों भैया सही कह रहा हूँ न मैं

भैया- हाँ छोटे . नंदिनी इस खंडहर में आज ही आई है .

मैं- मैंने अनुमान लगा लिया था की आदमखोर का किस्सा इतना भी सुलझा हुआ नहीं है जितना की दिख रहा है. भाभी ने मुझे काटा पर भाभी आपको ये बीमारी किसने दी ,

भाभी- नहीं जानती बस एक शाम जंगल में मुझ पर हमला हुआ और तक़दीर बदल गयी .

मैं- आप आदमखोर है ये राज और कौन कौन जानता है

भाभी- अभी और अब तुम भी.

मैं- गलत , कोई और भी था जो जानता था की आप आदमखोर हो

"कौन " भैया-भाभी दोनों एक साथ बोल पड़े.

मैं- चाचा, और इसी वजह से वो नहीं चाहता था की आप दोनों की शादी हो . मैं चाचा को न जाने कैसे पर ये बात मालूम हो गयी होगी.

नंदिनी- पर चाचा ने कभी भी मुझसे कोई ऐसा दुर्व्यवहार नहीं किया था . हमारी शादी के बाद उन्होंने हमेशा सम्मान किया मेरा.

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और वही तस्वीर जो मैंने चुराई थी , उसे टेबल पर रख दिया और चिमनी को आले से हटा कर तस्वीर के पास ही रख दिया.

मैं- भैया इस तस्वीर ने मुझे पागल किया हुआ है , दो नाम तो मैने सुलझा लिए है पर ये तीसरा नाम उलझाये हुए है . अतीत के किस पन्ने में जिक्र है त्रिदेव के इस हिस्से का और अगर त्रिदेव की कहानी खुद त्रिदेव का मेरे सामने खड़ा हिस्सा ही बताये तो सही रहे.

भैया ने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं .

मैं- इस हमाम में हम सब नंगे है भैया , अब कैसा पर्दा . आप चाहे लाख कहें की कुछ नहीं अतीत में पर मेरी आने वाली जिन्दगी आपके अतीत से जुडी है , निशा को तो आज मिल ही लिए आप. आपके माथे पर चिंता की लकीरों को पढ़ लिया था मैंने. निशा से ब्याह करना है मुझे . डाकन को अपनी दुल्हन बनाना है मुझे.

"ये कभी नहीं हो पायेगा छोटे " भैया ने टूटी सी साँस में कहा.
 
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