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Raj sharma stories चूतो का मेला compleet

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मैंने अपने लण्ड को बाहर निकाल लिया और बस ऐसे ही उसपे अपना हाथ फेरने लगा उन मादक दृश्यों को देख कर मेरा मन काबू से बाहर होने लगा काश पिस्ता इस समय होती तो चोद लेता ऐसे ही सोचते हूँए मैं मुठमार रहा था की किसी की आवाज आई-शाबाश,बहूँत अच्छे

आवाज की दिशा में गर्दन घुमी तो मैंने देखा कृष्णा जी खड़ी थी ,पिस्ता की जेठानी मैंने जल्दबाज़ी में अपनी ज़िप बंद की तो वो हँसते हूँए बोली- ना न कोई बात नहीं, होता है पर थोडा आजु बाजु देख लिया करो

ये बोलके वो ऊपर कमरे में जाने लगी फिर सीढ़ियों पे रुकी और एक चाय लाने को कहा दस मिनट बाद मैं उनके कमरे में गया कृष्णा जी ने साडी उतार दी थी और अब वो एक टाइट फिटिंग वाले सूट सलवार में थी जिसमे से उनका यौवन बाहर आने को मचल रहा था

मैंने चाय टेबल पे रखी और बाहर जाने लगा तो उन्होंने मुझे बैठने को कहा और खुद भी सामने वाली कुर्सी पे बैठ गयी

वो-शादी क्यों नहीं करते तुम

मैं-जी करूँगा

वो-कब

मैं-जल्दी ही

वो-कोई देख रखी है मेरा मतलब कोई गर्लफ्रेंड है

मैं-जी ज़िन्दगी के सफर में लोग मिलते गए बिछड़ते गए बस इतनी सी बात है

वो-मतलब कोई है

मैं- हाँ है मालिक है जिन्होंने घर दिया, मालिकन है जिन्होंने बेटे सामान स्नेह दिया सब अपने है और आप भी

जैसे ही मैंने आप भी कहा कृष्णा के होंठो पे एक मुस्कान सी आ गयी एक शोखी सी आ गयी साथ ही मैंने पेंट के ऊपर से अपने लण्ड को खुजा दिया वो अपनी पैनी नजरो से जैसे मेरा निरिक्षण कर रही थी फिर उन्होंने अपनी चुन्नी उतार के पास में रख दी मेरी नजरे उनकी छातियो पे पड़ी

उस टाइट सूट की कैद में वो जैसे आज़ाद होने को मचल रही थी उनके निप्प्ल्स साफ़ दिख रहे थे मतलब अंदर ब्रा नहीं पहनी थी कृष्णा जी एक गेहुंए रंग की महिला थी पांच फुट की लंबाई, थोड़ी ज्यादा मोटी छातियाँ और बाहर को निकले हूँए नितम्ब कमर तक आते लंबे बाल और सबसे बड़ी बात जिस तरह से उन्होंने खुद को फिट रखा था कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था उम्र का

वो कुछ कहने वाली थी की उनका फ़ोन बजा करीब पांच मिनट उन्होंने बात की फिर मुझे बोली-मौसम ख़राब है उनलोगो को आने में देर हो जायेगी शायद सुबह ही आये तो तुम्हे इधर ही रुकना होगा

मैं-जी ठीक है मैं एक बार सब दरवाजो को चेक कर लेता हूँ

वो- शायद बारिश होने वाली है मैं टैरेस पे हूँ कुछ कपड़े है तुम उधर ही आ जाना

मैंने निचे जाके सब देखा और फिर ऊपर गया तो ठंडी हवा ने मेरा स्वागत किया गाँव की याद आ गयी जब ऐसे ही बरसातों में खूब नहाया करते थे और ना जाने ऐसी कितनी ही बरसातों में रात रंगीन की थी हलकी हल्की सी फुहारे पड़ने लगी थी उस ठंडी हवा को अपने फेफड़ों में महसूस करता हूँआ मैं टैरेस पे पहुंचा

कृष्णा छत पर खड़ी उन बारिश की ताजा बूंदों को अपने बदन पर महसूस कर रही थी बरसात में भीगे उसके बदन को देख कर मन में एक तरंग सी जाग गयी थी वैसे भी जबसे पिस्ता दुबारा ज़िन्दगी में आई थी अपने अरमाँ कुछ ज्यादा ही मचलने लगे थे

कृष्णा को ऐसे गीले बदन देख कर मेरा लण्ड तन गया था वो मेरे पास आई और बोली- ऐसे क्या देख रहे हो

मैं-आपकी सुंदरता को

वो- सच में सुंदर लग रही हूँ क्या

मैं- हां, आज तो आप एक खिला गुलाब लग रही हो

वो मेरी पेंट में बने उभार की तरफ इशारा करते हूँए - हाँ, तभी तो तुम्हारा ये कुछ ज्यादा जोश में आ रहा है

मैं समझने लगा था की इसके मन में भी चुदने की लालसा है बस थोडा गर्म करना होगा इसको

मैं- अब आप हो ही सेक्सी इतनी तो इसका क्या कसूर

वो-लाइन मार रहे हो

मैं-लाइन नहीं बस जो फील किया वो बता दिया अब आपकी नजर में इसे लाइन मारना कहते है तो वो ही सही

वो- पर ऐसा सोचना गलत होता है ना

मैं-इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में किसे दो पल नहीं चाहिए होते सुकून के और फिर इंसान अपने लिए कुछ खास पल अपने लिए चुरा ले तो उसमे गलत क्या है

ये कहके मैंने अपनी ज़िप खोली और अपने मचलते लण्ड को आज़ाद कर दिया कृष्णा की आँखे उस पर जैसे जम सी गयी

वो- ये क्या किया इसको बाहर क्यों निकाला

मैं-आपको पसंद नहीं आया क्या

वो कुछ नहीं बोली पर उसकी तेजी से ऊपर निचे होती छातिया बता रही थी की वो भी सुलगने लगी थी मैं उसकी आआँखो में देखते हूँए अपने लण्ड पर हाथ फिरा रहा था कृष्णा का गीला बदन ऊपर से बारिश की बूंदे जिस्मो में आग को हवा देने लगे थे

मैं थोडा सा उसकी तरफ बढ़ा उसने अपने होंठ को दांतो से हलके से काटा मैंने उसके हाथ को अपने लण्ड पर रख दिया वो कुछ कहने ही वाली थी की मैंने अपनी ऊँगली उसके होंठो पे रखी और बोला-आज की रात अपनी है आप चाहो तो कुछ लम्हे आप अपने लिए जी सकते हो

मैंने महसूस किया उसकी पकड़ मेरे लण्ड पर कुछ टाइट हो गयी थी और उसी पल मैंने अपने होंठ उसके होंठो से जोड़ दिए उसकी डार्क चॉकलेट फ्लेवर की लिपस्टिक मेरे मुह में घुलने लगी इधर हमारा किस्स चालू था और निचे वो अपनी मनपसन्द चीज़ को हिलाने लगी थी

मैंने महसूस किया उसकी पकड़ मेरे लण्ड पर कुछ टाइट हो गयी थी और उसी पल मैंने अपने होंठ उसके होंठो से जोड़ दिए उसकी डार्क चॉकलेट फ्लेवर की लिपस्टिक मेरे मुह में घुलने लगी इधर हमारा किस्स चालू था और निचे वो अपनी मनपसन्द चीज़ को हिलाने लगी थी

कृष्णा के मीठे मीठे होंठो को कई देर तक चूमा चूसा मैंने उसको चूमते चूमते ही मैंने सलवार का नाडा खोल दिया था अब उसकी सलवार उसके पांवो में पड़ी थी इधर वो खूब जोर से मेरे लण्ड से खेल रही थी जब बारिश थोड़ी तेज हो गयी तो हम वहाँ से बालकोनी में आ गए

मैं भाग के कमरे में गया और एक गद्दा और चादर ले आया मैंने जल्दी से अपने कपडे उतारे और फिर कृष्णा के सूट को भी उतार दिया क्या गजब सेक्सी औरत थी थोड़ी मोटी होने के बावजूद भी फिटनेस थी ऊपर से एक बेहद छोटी सी पेंटी जो बस किसी तरह से उसके अंग को ढके हूँई थी

 


मैंने कृष्णा को अपनी गोद में बिठा लिया और उसके गालो, गर्दन और कंधो को चूमते हूँए उसके उभारो से खेलने लगा उफ्फ्फ उसकी चूचियो की वो घुन्डियाँ क्या गजब कसावट थी उसके बोबो में आह यार ये कैसा जादू सा तुम्हारे हाथो में बोली वो

मेरा लंड उसकी मांसल गांड की दरार में एक दम फिट हूँआ पड़ा था जिस पर वो अपने नितम्बो को हिला हिला के मेरी कामवासना को भड़का रही थी ,मेरे दबाने से उसकी चूची फूलती जा रही थी करीब दस मिनट तक उसकी छातियो से खेलता रहा मैं कृष्णा की सांसे भारी हो चली थी

अब मैं एक हाथ से उसकी चूची को मसल रहा था और दूसरा हाथ निचे ले जाके उसकी कच्छी के ऊपर से उसकी फूली हूँई चूत को सहलाने लगा तो कृष्णा मदहोश होने लगी, टूटने लगी मेरी बाहों में पिघलने लगी थी मेरी जीभ उसकी गर्दन के पिछले हिस्से को चाट रही थी

उसके तन में चींटिया रेंगने लगी थी जब उससे रहा नहीं गया वो मेरी गोद में थोडा सा ऊपर को उठी और मैंने उसके अंतिम वस्त्र को भी निचे खिसका दिया कृष्णा को अब मैंने गद्दे पे लिटाया और उसकी टांगो को फैलाया काले काले रेशमी झांटो से भरी उसकी मांसल चूत क्या मस्त लग रही थी

उसके झांट उसकी जांघ के कुछ हिस्से तक जा रहे थे जो की बड़े प्यारे लग रहे थे सच में उसकी चूत बड़ी ही सुंदर थी एक लम्बी सी बीच की लाइन और फिर निचे की तरफ खुला हूँआ छेद काली फांके और अंदर से लाल लाल हिस्सा अगर मैं विश्वामित्र भी होता तो आज तपस्या तोड़ देता

बरसात भी अपने शबाब पे थी और हूँस्न मेरी बाहों में था मैंने उसके चूतड़ो के निचे तकिया लगाया और उसकी जांघो को फैलाते हूँए अपने चेहरे को उस जन्नत के दरवाजे पे झुकाने लगा ,जैसे ही मेरे प्यासे होंठो ने उस नमकीन रस को चखा कृष्णा का बदन सिहर उठा

वो तड़प उठी और उसके होंठो से एक आह फुट पड़ी-आअह, सीईईईई ओह यार

मैंने एक कस के चुम्बन लिया उन प्यारी पंखुड़ियों पर और कृष्ना की मीठी मीठी आहे बारिश के शोर के बीच गूंजने लगी उसके नमकीन पानी में कई बोतलों जितना नशा था मैंने उसकी जांघो पर हाथ जमाया और उसे अपनी और खींच लिया मैं अपनी जीभ उसकी चूत के अंदर और अंदर डालने लगा

ओह यार ये क्या कर दिया ओफह आअह कम ओन दिलवाले तुम तो गजब हो मेरा तन इस अगन में जलने लगा है उफ्फ्फ्फ़ आअह थोडा आराम से तुम्हारी जलती,,,जलती जीभ क्या मजा दे रही है ओह्ह्ह्ह्ह्ह सीईईईईईइ

कृष्णा अपने चूतड़ो को ऊपर निचे करती हूँई कोशिश कर रही थी की मैं उसकी चूत को खा ही जाऊं उसकी हथेलिया मेरे सर पर दबाव डालती हूँई जैसे कह रही थी की मैं पूरा ही उसकी चूत में घुस जाऊ, ढेर सारा कॉमरस मेरे मुह से होते हूँए गले के निचे उत्तर रहा था कृष्णा तो जैसे उन्माद में पागल ही हो गयी थी

जितना वो मचल रही थी उतना ही मैं तेजी से अपनी जीभ को उसकी चूत पे घिस रहा था उफ्फ्फ कितना मचल रही थी ये औरत अब मैंने उसके दाने को अपने मुह में भर लिया और साथ ही अपनी एक उंगली उसकी चूत में घुसा दी और अंदर बाहर करने लगा

वो ये हमला ज्यादा देर नहीं सह पायी और कुछ देर बाद अपनी गांड को पटकते हूँए झड़ने लगी मेरा आधा चेहरा उसके रस से सन् गया शांत होते ही वो निढाल हो गयी मैंने चादर से अपना मुह साफ़ किया और अपने लण्ड पर थूक लगाया और उसको कृष्ना की चूत पे रगड़ने लगा

झड़ने के बाद भी वो गर्म भट्टी की तरह तप रही थी उसकी चूत का एहसास पाते ही मेरे तड़पते लण्ड को करार आ गया और वो बस अब अंदर जाने को बेकरार हो रहा था

वो-आह ,कितना मोटा है तुम्हारा

मैं-अभी तो डाला भी नहीं मोटाई का पता चल गया

वो-जिस तरह से दवाब डाल रहा है अंदाजा हो रहा है

मैं-आज की चुदाई तुम्हे सदा याद रहेगी

मैं धीरे धीरे अपने सुपाड़े को चूत की घाटी पे रगड़ने लगा तो कृषणा बोली-क्यों तड़पाते हो अब घुसा भी दो ना

मैं धीरे धीरे अपने सुपाड़े को चूत की घाटी पे रगड़ने लगा तो कृषणा बोली-क्यों तड़पाते हो अब घुसा भी दो ना

बस ऐसे ही कुछ पल तो थे मेरी ज़िन्दगी में जिनके सहारे जी रहे थे वर्ना तो कुछ बाकी रहा नहीं था मैंने एक बार फिर से अपने सुपाड़े को चूत से लगाया और धक्का लगाया कृष्णा की फांके एक दूसरे से विपरीत दिशाओ में फैलने लगी उसकी टांगो में तनाव सा आने लगा बदन में हलचल होने लगी

उफ्फ्फ्फ्फ़ फाड़ ही डालोगे क्या

मैं- क्या हूँआ,

वो- दर्द कर दिया ऐसा लग रहा है की चीर दी हो

मैं-क्या बात कर रही हो,इस उम्र में कहा दर्द होता है इस उम्र में तो बस मजा ही है

वो-काश तुम डलवा पाते तो पता चलता

मैं-कोई ना इस दर्द में भी तो मजा आता है

वो-बाते बनाना तो कोई तुमसे सीखे

मैं-और चुदना तुमसे

वो हस पड़ी और मैंने एक झटका लगा दिया लगभग आधा लण्ड चूत में चला गया था उसने अपने चूतड़ो के निचे तकिये को थोडा एडजस्ट किया और मैंने बाकी का काम भी पूरा कर दिया उसकी चूत अंदर से एक दम मस्त थी उसने मेरे लोडे को जैसे कैद कर लिया था

अब उसकी टांगो को m शेप में किया और धीरे धीरे उसको चोदना शुरू किया एक तो ऐसे मस्त मौसम का सुरूर ऊपर से कृष्णा जैसी माल औरत और क्या चाहिए ज़िन्दगी में चिकनी जांघो को अपनी मुट्ठी में कैद करते हूँए मैं अपने लण्ड को अंदर बाहर करने लगा था

कृष्णा के हाथ अपने बोबो पर पहुँच गए थे और वो उनको मसल रही थी हवा के झोंको के साथ जो कोई बारिश की बूंदे शरीर से टकरा जाती थी तो चोदने का सुख कई गुना बढ़ जाया करता था 5 मिनट तक उसको मैं ऐसे ही पेलता रहा फिर उसने अपनी टाँगे उठा के मेरे कंधो पे रख दी

मेरे हर धक्के पे वो मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी और फिर बोली-तुम्हारे लण्ड में सचमुच जादू है जो एक बार तुम्हारे निचे आई वो फिर कहीं और ना जायेगी ओह दिलवाले आह थोडा आराम से जान ही निकालोगे क्या आज उफ्फ्फ्फ्फ़

मैं-ज़िन्दगी में बस चूत मारना ही तो सीखा है मेमसाब

वो- मेमसाब मत बोलो, मैं तो हूँई गुलाम तुम्हारी आअह आह

कृष्णा के चेहरे पे एक नूर सा चढ़ आया था पुच पुच करते हूँए मेरा लण्ड तेजी से उसकी चुदाई कर रहा था मैंने अपना हाथ उसके पेट पर रखा और उसको प्यार से सहलाने लगा गुजरते समय के साथ उसकी उत्तेजना चरम की और जाने लगी थी अब उसने अपनी टाँगे हटा ली और मैं अब पूरी तरह से उसके ऊपर चढ़ गया

कृष्णा ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और मेरे होंठो को चूमते हूँए अपनी टांगो को ऐसे लपेट लिया जैसे कोई लॉक लगा लिया हो अब वो मेरे हर धक्के पे अपनी गांड को पटक रही थी मैं खुद उत्तेजना के सागर में लहरो पे दौड़ रहा था उसके लबो को बुरी तरह से खा रहा था मैं

और वो भी कम नहीं थे उसके नाखून जैसे मेरी पीठ में धँस ही गए थे उसकी मुझ पर पकड़ कसती जा रही थी सुलगती साँसे मचलते अरमान मैं समझ सकता था की अगर उसके होंठ मेरे मुह में ना होते तो किस हद तक माहौल उसकी आहो से गूँज रहा होता

 
इधर वो अपने हाथो को मेरी पीठ पर रगड़ते हूँए इशारा कर रही थी तेज करने का तो मैं पुरे ज़ोर से उसको चोदने लगा वो जल बिन मछली की तरह तड़पने लगी आँखे जैसे मदहोशी से पथरा गयी थी बदन स गुलाबी पसीना छलके चुदाई में चूर बदन मौसम बेईमान अरमाँ अपने शबाब पे

हाय रे आःह्ह्ह आज तो मैं। गयी आअह्ह आअह

आअह आअह ऊऊऊओन्ज्ज् यार

और तेज और तेज मैं गयी गईईईईईईऊओ आआह ओह्ह्ह्ह्ह और तेज्जज्जज्जज्जज्ज और टीज्जज्जज्जज्जज्ज आआअह यार। उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़ जोर जोर से ऐसे चिल्लाते हूँए कृष्णा झड़ने लगी उसका बदन किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था

उसकी चूत ने मुझे अपने अंदर ऐसे कस लिया की क्या कहऊ उसकी चूत से अमृत सा रस बहने लगा था जैसे एक ज्वालामुखी फट पड़ा और मैं भी गया काम से एक के बाद एक मेरे लण्ड से गर्म पानी की पिचकारियाँ उसकी चूत को पवित्र करने लगी

मुझे भी करार आ गया अपने दम को दुरुस्त करते हूँए मैं पड गया उसके ऊपर करीब दस मिनट तक मैं उसके ऊपर ही लेटा रहा फिर मैं हटा तो वो भी उठ के बैठ गयी मैंने उसके हाथ को चूमा वो मुस्काई और उठ के छत के कोने में जाके मूतने लगी

सीईईईई की आवाज मेरे कानो में आने लगी मैं उसको मूतते हूँए देखता रहा वो थोड़ी देर बाद आई और मेरे पास ही लेट गयी

वो- दिलवाले तुम सच में क्या गजब चोदते हो मेरा तो अंग अंग हिला दिया रे कहाँ से सीखा

मैं अब उसको क्या सिखाता की हमे तो चूत मारनी भी दुश्मनो ने सिखाई थी दिलवाले तो बस नाम के थे बाकी दिल तो साला था ही नहीं वो अजय देवगन ने कहा था ना

"हमे तो अपनों ने लूटा गैरो में कहाँ दम था,मेरी कश्ती थी डूबी वहाँ जहा पानी कम था"

मैं भी ये क्या सोचने लगा था हूँस्न का प्याला मेरे सामने था आज बस मुझे इस जाम को पीना था तब तक पीना था जब तक इस नशे में मैं डूब नहीं जाता

कुछ देर वो लेटी रही फिर उसने पास पड़ी चादर लपेटी और बोली-मैं पानी पिने जा रही हूँ तुम्हारे लिए कुछ लाऊँ क्या

मैं-मुझे तो बस तुम्हारे हूँस्न का जाम पीना है

वो- हाँ पर पहले पानी तो पी लू

हम दोनों निचे किचन में आ गए उसने फ्रिज खोला और पानी की बोतल निकली वो पानी पिने लगी साँसे तेज थी कुछ बूंदे उसकी छातियो पे छलक आई जिन्हें मैंने चाट लिया मेरी खुरदरी जीभ उसकी निप्पल से रगड़ खाने लगी एक बार फिर से उसके लबो से कामुक आहे फूटने लगी वो फिर से मस्ताने लगी

पर्वतो की चोटियो की तरह उसके निप्प्ल्स तन चुके थे 1 इंच के लगभग उनमे तनाव आ गया था मैं बारी बारी से उन खरबूज़ों का मजा ले रहा था कृष्णा का हाथ मेरे लण्ड पे पहूँच चूका था और वो पूरी शिद्दत से उसे तैयार कर रही थी

पर अभी उसके इरादे कुछ और ही थे उसने मुझे धक्का दिया और फ्रिज में से आइसक्रीम का बॉक्स निकाल लिया और मेरे बदन पे रगड़ने लगी पुरे चेहरे पर, चेस्ट पर और फिर लण्ड और गोलियों पे अब वो उस पिघलती आइसक्रीम को चाटने लगी पर उस से ज्यादा वो मेरे शारीर पे अपने दांतो के निशाँ छोड़ रही थी

अब वो मेरे होंठो तक आ गयी थी और हम किस करने लगे होंठो से होंठ मिले तो मैंने अपनी और खींच लिया उसको और उसके चूतड़ो को दबाते हूँए बेरहमी से उसके होंठो का मर्दन करने लगा उसके चूतड़ कितने नरम थे मैंने सोचा जब इसकी गांड का दरवाजा खोलूंगा तो कितना सुकून मिलेगा

दस मिनट तक हम बस चूमा चाटी करते रहे फिर वो फर्श पे बैठ गयी और मेरे लण्ड पर अपने मुह का जादू चलाने लगी आइसक्रीम से सने सुपाड़े को जब उसने अपनी लपलपाती जीभ से चाटना शुरू किया तो मेरा पूरा बदन झनझना गया लगा की कही मैं इस मस्ती में बह ना जाऊ

मेरे पेशाब वाले छेद में उसकी वो अपनी जीभ घुसाने वाली कोशिश ने तो मेरे तन में आग ही लगा दी थी मैंने अपने हाथ उसके सर पे रखे और अपने लण्ड को उसके मुह में अंदर और अंदर देने लगा वो भी मेरी मनोदशा समझ रही थी और पूरी शिद्दत से लण्ड चूस रही थी

पर उसके मुह में ही झड़ जाना भी तो ठीक नहीं था तो मैंने उसे हटाया और बस अब जगह बदल गयी थी अब वो खड़ी थी और मैं बैठा हूँआ था , मैंने उसे फ्रिज के दरवाजे से सता के ऐसे खड़ा किया की उसकी उभरी हूँई चौड़ी गांड मेरी तरफ थी

मेरा तो दिल आ गया था उसकी गांड पे मैंने ढेर सारी आइसक्रीम लगाई उसकी चूत से लेके गांड के छेद तक पूरी दरार को भर दिया अब बारी थी उस को तड़पाने की कृष्णा को अब इतना गर्म करदेना था की वो ऐसे पिघले मेरी बाहों में की आज के बाद हर पल उसकी चूत बस मेरे लण्ड को ही मांगे

मैंने उसके चूतड़ो को खाना चालू किया कितने मुलायम थे वो जी चाहा की बस ऐसे ही कृष्णा को अपनी बाहों में लिए रहूँ अब मैंने अपना मुह उसकी गांड की दरार में दे दिया और उसने उसी पल अपनी गांड को पीछे की तरफ उभार लिया चूत पे लगी आइसक्रीम में चूत से रिसत्ता नमकीन पानी मिल रहा था तो उसका स्वाद और बढ़िया हो गया था

जी भर के उसकी चूत को चूसा मैंने अब मैं उसकी गांड की तरफ बढ़ा गोरे गोरे कुल्हो के बीच वो भूरे रंग का छेद क्या खूब लग रहा था उत्तेजना से वहिभुत मैं उसको भी चाटने लगा तो कृष्णा बस तड़प उठी उसके बदन में शोले भड़कने लगे उसकी चूत चीख़ चीख के बस लण्ड को पुकारने लगी थी

जितना मैं अपनी जीभ वहा रगड़ता उसके चूतड़ उतनी ही बुरी तरह स हिल रहे थे इधर मेरा लण्ड खुद बुरी तरह से ऐंठ रहा था अब बस जरूरत थी तो चुदाई की मैं उठा और उसके बदन से चिपक गया उसने अपनी टांगो को खोला और अपनी गांड को पीछे कर लिया मैंने अपने लण्ड को सही जगह पे लगाया

और कृष्णा की चूत में उतरने लगा एक बार जो पूरा अंदर गया तो उसने खड़े खड़े ही अपनी टांगो को आपस में भींच लिया और मैंने उसको चोदना शुरू किया दोनों के गर्म बदन पूरी ताकत से एक दूसरे से टकरा रही थी बार बार चूत की फांके खुलती बन्द होती धाड़ धाड़ मेरा लण्ड चूत में अंदर बहार हो रहा था

अब उसको चोदते चोदते मैं अब उसके कबूतरो को भींचने लगा कृष्णा की हालत पतली पड़ी थी बस वो सुलग रही थी मेरी बाहों में मैं उसके कंधो को चूमते हूँए उसे चोद रहा था कुछ देर बाद हम वहां से हटे , और वो मेरी गोद में चढ़ गयी वैसे तो थोड़ी भारी थी पर वो लण्ड ही क्या जो चूत का बोझ न उठा सके उसकी गांड को संभाले उसे अपने लण्ड पे कुदाने लगा मैं

मजा ही मजा बरस रहा था हम दोनों पागल हो चुके थे उसके बाल बिखर गए थे पसीने से लथपथ शरीर मस्ती में चूर वो गोदी से उतरी और डायनिंग टेबल पे लेट गयी मैं उसके ऊपर चढ़ा और अब धुआंदार चुदाई शुरु की चूत में धक्के पे धक्के लग रहे थे वो मुझे बेतहाशा चूम रही थी

बहूँत देर तक बस हम एक दूसरे के स्टैमिना को तौलते रहे साँसे फूल गयी थी पर मंजिल पर पहुँचने की जिद थी तो लगे रहे करीब आधे घंटे तक हम दोनों चुदाई करते रहे कृष्णा के बदन का पुर्जा पुर्जा हिल गया था मैं भी अब किसी भी पल झड़ सकता था वीर्य नसों से होते हूँए अब बाहर निकलने को चल पड़ा था

और तभी उसके हाथ पाँव ढीले पड़ गए और बस उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया हम दोनों साथ साथ झड़ने लगे बहूँत ही सुख मिला बदन जैसे महक उठा था आज इस स्खलन में बहूँत मजा आया था अब किसे होश था किसे खबर थी बस वो थी मैं था और तभी उसके हाथ पाँव ढीले पड़ गए और बस उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया हम दोनों साथ साथ झड़ने लगे बहूँत ही सुख मिला बदन जैसे महक उठा था आज इस स्खलन में बहूँत मजा आया था अब किसे होश था किसे खबर थी बस वो थी मैं था

मैंने कृष्णा को अपनी गोद में उठाया और फिर से हम टैरेस पे आ गए थे बारिश रुकने की जगह और तेज हो गयी थी हम दोनों गद्दे पे लेट गए कृष्णा मुझसे लिपटी पड़ी थी थकन से चूर

मेरा एक हाथ उसके नितम्बो पे था मैं उसकी गांड के छेद को सहला रहा था वैसे मैं भी थोडा थक रहा था पर दिल बेईमान कहाँ किसी की मानता है

मेरा मन कर रहा था की लगे हाथ इसकी गांड भी पेल दू वो थोडा और मेरे से चिपक गयी पर तभी मेरा फोन बजा और मैं थोडा दूर जाके वो फ़ोन सुना दिमाग में टेंशन सी हो गयी थी मैंने कृष्णा को समझाया की अर्जेंट जाना पड़ेगा

इधर मुझे जाना था पर इस घर को अकेला भी नहीं छोड़ सकता था तो मैंने एक फ़ोन और किया अपनी पूरी तसल्ली की और फिर बस्ती की तरफ चल पड़ा

वहां जाके देखा तो कलेजा मुह को आ गया भीड़ जमा थी मुझे देखते ही कुछ लोगो ने रास्ता छोड़ा तो मैं आगे को बढ़ा उस सब्ज़ी वाले बाबा की लाश पड़ी थी

आँख से आंसू निकल पड़े इस पराये शहर में वो भी अपना सा ही था और उसे किसने मारा ये भी मैं जान चूका था आज मेरे किसी अपने पे वार हूँआ था

तो मुझे दर्द होना ही था बरसात जोरो से हो रही थी अब अंतिम संस्कार तो दिन में ही होना था बाकी बचा समय मैं बस्ती में ही रहा

बाबा का अंतिम संस्कार में थोडा टाइम लग गया और मैं दोपहर बाद ही सेठ के घर जा पाया सब लोग अपने अपने कमरे में थे

तब मुझे ध्यान आया की माधुरी को वादा किया था की उसके साथ कॉलेज जाऊंगा पर फिर सोचा कल चला जाऊंगा पर उस से पहले मुझे एक काम और करना था

मुझे इस घर के प्रत्येक सदस्य की सुरक्षा पक्की करनी थी क्योंकि पिस्ता की नजरो में नहीं गिरना चाहता था बिना घर वालो के जाने उनकी सुरक्षा का खाका खींचा

अब तक तो मैंने ही गाज़ी पे वार किया था और उसके पहले ही वार से मैं तिलमिला गया था पर अभी सही समय नहीं आया था उस से भिड़ने का

 


अपने आप से उलझे हूँए मैं घर के छोटे मोटे कामो में व्यस्त था की माधुरी घर आई और चुपचाप अपने कमरे में जाने लगी मैं उसके पीछे गया शक्ल से बहूँत उदास लग रही थी जैसे की बरसो से बीमार हो

मैं-माधुरी क्या हूँआ परेशां हो

वो चुप रही

मैं-क्या हूँआ उन लोगो ने फिर कुछ कहा क्या

माधुरी चुपचाप मेरे सीने से लग गयी और फुट फुट के रोने लगी किसी अनिष्ट की आशंका से मेरा दिल धड़कने लगा ज़ोरो से

मैंने उसके आंसू पोंछे और उस से फिर पूछा

वो- आज कॉलेज में उन लोगो ने मुझे कहा की मान जा वर्ना उठा ले जायेंगे और फिर

मैं-फिर क्या

वो- फिर उसने मुझे जकड़ लिया और मेरे बदन को झिंझोड़ दिया , सबके सामने मेरी चुन्नी उतार दी

वो रोते हूँए मुझे सब बताती चली गयी उसकी आँखों से टपकते आंसू मेरे कलेजे को चीरते जा रहे थे मैंने देखा वो अब तक बिना दुप्पटे के थी

मुझे ऐसा लगा की जैसे किसी ने बीच राह मुझे नंगा कर दिया हो एक आग दिल में सुलगने लगी जी में आ रहा था की क्या कर जाऊ

पर ये सारी कमी तो मेरी थी मैंने उसे वादा दिया की मेरे रहते कोई उसको परेशान नहीं करेगा पर मैं फेल हो गया था मैंने उसको कहा अभी के अभी चल मेरे साथ

मैं देखना चाहता था की ऐसा कौन माई का लाल हो गया जो सरे आम एक लड़की की चुन्नी उतार दे मेरी आँखों में खून उत्तर आया था

मैं बस माधुरी के साथ घर से निकल ही रहा था की तभी सेठ का फोन आ गया अभी बुलाया था होटल पे और मैं चाह कर भी उसको मना नही कर पाया

मैंने माधुरी के सर पे हाथ रखा और बोला- मेरी बहन बस आज की माफ़ी दे दे तेरे हर आंसू का कतरा क़र्ज़ है मुझ पे आज तू रोई है

तेरे सर की कसम कल अगर तुझे रुलाने वालो की ज़िन्दगी को शमशान ना बना दिया तो तेरा ये भाई तुझे अपना चेहरा नहीं दिखायेगा

जितना तू आज रोई है उतना ही तू कल हँसेगी मेरी बहन बस आज की माफ़ी दे दे

ये बोलकर मैं होटल के लिए चला गया काम बहूँत था देर रात तक उधर ही रुकना पड़ा पर दिमाग में बस माधुरी घूम रही थी एक जवालामुखी जैसे फटने को तैयार था

इस ज़िंदगी में फिर से खुद को इतना बेब्स पा रहा था मैं माधुरी का आंसुओ से भरा चेहरा बार बार मेरी आँखों के सामने आ रहा था

कभी कभी ज़िंदगी ऐसे इम्तिहान लेती थी की क्या कहा जाए पर ये भी शुक्र था की उन लोगो ने माधुरी के साथ ...

ये सोच कर ही दिल डर सा गया पहली बार मेरे हाथ काम्पने लगे थे डर क्या होता है आज महसूस कर रहा था रात एक बार फिर से बेचैनी में कटने वाली थी

कभी कभी मैं अपने बारे में सोचता था की हालात के थपेड़ो को सहते हूँए मैं कहाँ से कहाँ पहूँच गया था वो गाँव की गलियाँ, वो सावन के झूले एक बेफिक्री सी रहती थी

वो खेतो में लहलहाती फसले जिसे चूमकर हवा जब चलती थी वो बरसात जो तन मन को भिगो दिया करती थी गाँव में जब मेला लगता था तो खूब चीज़ खाना मस्ती करना दोस्तों के साथ दूर निकल जाना

गर्मी की दोपहरों में बेर खाने जाना कभी कच्चे आम चुराना कभी खरबूजे तरबूज की बाड़ी में घुस जाना नंगे पाँव दौड़ लगाना घरवालो से छुप के नहर में नहाने जाना फिर मार भी पड़ती थी

वो मिर्च की चटनी मक्खन लगी रोटियों के साथ आज भी वो स्वाद मुह में घुल सा जाता है पता नहीं आज घर की बहूँत याद आ रही थी

ये घर भी अजीब होता है हम जैसे अकेले लोगो से पुछो की घर क्या होता है कई बार रात को नींद खुल जाती है लगता है माँ ने सर पे हाथ फेरा हो पिताजी की शर्ट से दस बीस रूपये चुरा लेना

कभी कभी वो नहाते तो मैं उनकी मालिश करता फिर उनके खटारा स्कूटर को चलाने की मिन्नतें टाइम बदल गया था अब कुछ नहीं था हाथ खाली थे आज मेरे

सब कुछ कांच की तरह टूट कर बिखर गया था वक़्त ने ऐसा सितम किया था की बस दर्द ही दर्द रह गया था कभी कभी इतनी घुटन होती थी की काश माँ होती तो उसकी गोद में सर

रख देता हर मुश्किल आसान होती बाप होता तो उसके सीने लग के रो सकता था लोग अक्सर कहते की जेब में पैसा होना चाहिए दुनिया कर सुख कदम चूमता है

मैं कहता हूँ ये सारी दौलत ले लो ये सोना चांदी ये रुपया पैसा सब बेमानी है कोई उस बाप की उंगली पकड़ा दे जिसे पकड़ के चलना सीखा था ये पैसा

कहाँ मुझे मेरी माँ का आँचल वापिस दे सकता था इस बाजार में तो हर चीज़ मिलती है तो बताओ कितना खर्च करू कौन सी दुकान है जहाँ

मैं वो ममता की छाँव खरीद सकु एक छोटा सा घर था चन्द खुशिया थी और क्या चाहिए था ज़िन्दगी में पर मैंने अपने ही हाथो से सब खो दिया था

घर की बहूँत याद आती है दिन तो साला कट जाया करता है पर ये रात ये भी मेरी तरह अधूरी है तनहा है सीने में जलन सी होने लगी थी

जब दर्द हद से ज्यादा हो गया तो बोतल खोल ली बस अब इसका ही सहारा था कुछ ही घूंट में आधी बोतल से ज्यादा गटक चुका था

आज दर्द कुछ ज्यादा था तो नशा भी ज्यादा चाहिए था एक के बाद एक बोतल खुलती गयी कदम डगमगाने लगे तो मैं सड़क पर निकल आया बरसात हो रही थी

ऐसा लगता था की मेरे दर्द से आसमान भी रो पड़ा था ये शहर अपना होकर भी बेगाना था आज किसी अपने से मिलने की जरूरत हो रही थी

पर अब तो आदत सी होने लगी थी इस तन्हाई की इस अकेलेपन की वैसे ज़िंदा तो तो बस नाम का ही था मैं बाकि बचा कुछ नही था

अपने आप से झूझते हूँए न जाने किन सड़को पर निकल आया था मैं बस चले जा रहा था अपने आप से बाते करता हूँआ कभी खुद को कोसता कभी अपने नसीब को आवारा कुत्तो सी ज़िन्दगी हो गयी थी अपनी

दिलवाले तो बस हम नाम के थे बाकि कुछ आनी जानी नहीं थी उस बोतल में अभी कुछ कतरे बाकी थे पर अब पीने की चाह नहीं थी

फेक मारा उस बोतल को रोड पर रोने लगा मैं जोर जोर से पर उस बरसात के शोर में मेरे दर्द का क्या मोल था और फिर हम जैसे लोगो के आंसुओ की कीमत भी तो क्या होती है

चलो माना की लाख आवारा थे , नाकारा थे पर सीने में कहीं एक मासूम सा दिल हमारे भी धड़कता था कभी तो हमारा भी मुस्कुराने का जी करता था

बेगानो में अपनों को ढूंढते ढूंढते अब थकने लगा था और ये दर्द साला इस दुनिया में इतने लोग है पर इसको बस मैं ही मिलता हूँ

ऐसा कौन सा पाप कर दिया था की उस के दरबार में अपनी कोई दुआ कभी कबूल ही नहीं होती थी क्यों ज़माने भर का दुःख था मुझे ही

साला सबके चेहरे पे मुस्कान लाते लाते हमारी मुस्कान खो गयी थी जोर जोर से चीखने लगा था मैं पर साला इतने बड़े सहर में कोई नहीं था

जो इस दर्द को बाँट लेता कहाँ जाऊं कोई ऐसा दर नहीं जहा सकूँ मिल सके इस दिलवाले को पता नहीं कितनी दूर निकल आया था चलते चलते

उस मोड़ पे ठोकर सी लगी कदम तो वैसे ही डगमगा रहे थे और होश था ही कहाँ हमे ठोकर से सम्भल भी ना पाये थे की सड़क

से आती उस गाडी से टकरा गए और फिर गिर पड़े चोट लगी या नहीं किसे परवाह थी गाड़ी का दरवाजा खुला और ड्राईवर ने उत्तर कर उठाया मुझे

पैर थे की साले साथ ही नहीं दे रहे थे और हम तो वैसे ही गिरे हूँए थे

 


कौन है रामदीन कौन आ गया गाडी के आगे गाड़ी में से कहा किसी ने

ड्राईवर-कोई नहीं मैडम एक शराबी है

उसने मुझे साइड किया दो चार बाते कही और फिर गाडी स्टार्ट करने लगा उस दो पल की रौशनी में पीछे बैठे चेहरे पर नजर पड़ी तो

जेसे सारा नशा फुर्ररर करके उड़ गया हे उपरवाले समझ नहीं आती तेरी लीला कभी कभी क्या ये सच था या फिर बस नशे में वहम मेरा

और वैसे भी अपनी तक़दीर यु हम पे मेहरबान हो जाये ऐसा होना मुमकिन नहीं था पर दिल की धड़कनो मे एक रवानी सी दौड़ गयी थी

चलो मान लिया हम तो झूठ बोलते है पर दिल तो सच्चा था हमारा ये बात और थी बरसो से धड़कनो का कहना माना नही था हमने

सुबह जब आँख खुली तो खुद को फुटपाथ के किनारे पे पड़ा पाया आँखों में रात का सुरूर अभी बाकी था पास की दूकान पे एक चाय पि और फिर ऑटो पकड़ के घर आया

तैयार हो चूका था पिस्ता मंदिर गयी हूँई थी पूजा का नास्ता थोडा लेट हो गया था तो उसकी कई कड़वी बाते सुननी पड़ी कभी कभी मैं सोचता था

की जिस दिन इसको मेरी असलियत पता चलेगी उस दिन क्या बीतेगी इस पर पूजा अपने कमरे में थी मैं भी जा रहा था की कृष्णा जी ने मना किया

माधुरी के कॉलेज का टाइम हो रहा था पर आज वो तैयार ना हूँई थी मैं उसके पास गया

मैं-आज मेरी बहना तैयार नहीं हूँई

वो- मैं कॉलेज नहीं जाउंगी मैंने सोचा है की पढाई छोड़ दूंगी

मैं-ऐसा नहीं बोलते पगली, क्या भरोसा नहीं अपने भाई पे

वो-मुझे डर लगता है

मैं- मेरी बहन तू शेरनी है फिर कुछ गीदड़ो से डर गयी

चल तैयार हो जा वर्ना लोगो को पता चलेगा की दिलवाले की बहन कुछ मामूली गुंडों से डर गयी तो शहर में तेरे भाई का क्या रुतबा रहेगा

वो-पर वो मामूली नहीं है उनकी चलती है पुरे शहर में

मैं- पर तू किसी कायर की बहन नहीं और अगर मैं तेरी रक्षा नहीं कर पाया तो धिक्कार है मुझ पे बस तू चल रही है कॉलेज तैयार हो जा मैं इंतज़ार कर रहा हूँ

पूजा थोड़ा टाइम पहले निकल गयी थी उसके पीछे पीछे मैं और माधुरी भी निकल गए

जैसे जैसे कॉलेज करीब आता जा रहा था माधुरी का चेहरा सफ़ेद होता जा रहा था डर हावी होते जा रहा था उसके हाथ पाँव जैसे काम्पने लगे थे

पर उसे उस ज्वालामुखी का आभास नही था जो एक भाई के कलेजे में सुलग रहा था कॉलेज के मेन गेट पे मैंने गाडी रोकी और हम उतरे

मैंने माधुरी का हाथ टाइट पकड़ा और कहा घबराना मत तुम आगे आगे चलो मैं तुम्हारे पीछे ही हु वो आगे बढ़ने लगी दो कॉरिडोर पार करके

वो अपनी क्लास की तरफ जा रही थी की ब्लाक के सामने 4-5लड़को ने उसे रोक लिया माधुरी थर थर कांपने लगी उनमे से एक बोला

अरे भाभी आ गयी जल्दी भाई को फोन कर लगता है आज भाई का मामला सेट होगा हह हा हां

माधुरी उनसे बचने के लिए कभी दाए हो कभी बाए पर वो लोग उसे रास्ता ही ना दे अब मैं आगे बढ़ा

मैं-ओये,क्यों तंग कर रहा है इसको

वो-चिरकुट तेरे को ज्यादा चर्बी चढ़ी है क्या जानता नहीं हम किसके आदमी है भाई की सेटिंग है ये भाई आते ही होंगे

मैं-भाई तो आएगा जब आएगा लड़की का रास्ता छोड़ वर्ना फिर तेरे लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा

माहौल गर्म होने लगा था स्टूडेंट्स इकठ्ठा होने लगे थे वो लड़का मेरी तरफ बढ़ा और बोला- ज्यादा हीरो मत बन तू जानता नहीं हम कौन है क्यों इसके चक्कर में जान गंवाता है

मैं- तू नहीं जानता मैं कौन हु और बेहतरी है की तू ना जाने ये यहाँ पढ़ने आती है और मैं चाहता हु की ये अपनी पढाई आराम से करे

वो-और ना करे तो

मैं-ना का तो सवाल ही नहीं

तभी एक दूसरा लड़का हॉकी लेके मेरी तरफ बढ़ा और बोला-तू बहुत बोल रहा है क्या लगती है तेरी ये जो इसके पीछे मरने चला आया

मैं-बहन लगती है मेरी दिक्कत है

वो हँसने लगे फिर उनमे से एक बोला - अच्छा तो भाई खुद बहन को जीजाजी के पास छोड़ने आया है कल इसकी चुन्नी उतरी थी और आज इसकी सलवार यही उतरेगी और तू भी देखेगा

मेरी आँखे तपने लगी थी क्रोध से कुछ और साथी आ गए थे उनके पर आज इनको सबक सिखाना जरुरी था

मैं- तू उतरेगा इसकी सलवार, तू

मैं उसकी तरफ बढ़ने लगा माधुरी को मैंने साइड होने को कहा पर एक लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया और मेरा सब्र टूट गया

अगले ही पल जिस हाथ ने माधुरी को पकड़ा हुआ था वो जमीं पर कटा हुआ पड़ा था पल भर में ही चारो तरफ चीख पुकार मच गयी

मेरे हाथ में गंडासा था उन सालो को गाजर मूली की तरह काटने लगा मैं कुछ भागे पर आज किसी को नहीं भागना था आज तो तांडव देखना था मुझे अगले दस मिनट में

15-20 जमीं पर कटे पिटे पड़े थे बरसात होने लगी थी पर आज यहाँ खून की बरसात होनी थी जिसने सलवार उतरने की बात की थी

मैं उसको घसीट के लाया और बोला- उतार के दिखा सलवार

वो चीखते हुए बोला-तू नहीं जानता तूने क्या किया है आने दे भाई को फिर देखना

मैंने साले को लात मारी और बोला-तेरे भाई का तो पता नहीं पर ये जिस भाई की बहन है उसका नाम दिलवाला है , गौर से देख मेरी बहन है ये

ये दहाड़ थी मेरी , सुनते ही डर से वो काम्पने लगा

मैं-क्या हुआ मूत निकल गया साले तेरी इतनी हिम्मत तू मेरी बहन की सलवार उतरेगा तू

मैंने वॉर किया और उसकी उंगलिया जमीं पर कटी पड़ी थी उसकी चीख कॉलेज में हर कोई सुन रहा था जब तक उसकी चीखे बंद ना हो गयी उसको काटता रहा मैं

उस बरसात के पानी को लाल कर दिया मैंने जितने थे सबका यही हाल किया मेरा ध्यान था नही मेरी पीठ पर लात लगी और मैं आगे को कीचड़ में जा गिरा

उठा और देखा तो सामने जो ईनसान था उसे देखते हो पुराणी खुन्नस याद आ गयी कसम से आज तो मजा ही आ गया मैने चेहरे की मिटटी साफ़ की

वो- तो तू है दिलवाला बड़े दिनों से तलाश थी आज मजा आएगा पता नहीं था तेरी बहन है ये वर्ना इसको तो नंगी ही भेजता पर कोई नहीं तूने जो हमसे दुश्मनी ली है अब ये भुगतेगी

मैं- दुश्मनी से याद आया, दिलवाला हर रिश्ता ईमानदारी से निभाता है काश मुझे पहले पता होता की वो तू है जिसने मेरी बहन से बदसलूकी की है तो गाज़ी तेरी मौत का मातम मना रहा होता

वो- जश्न होगा आज तो दादाजान को तेरी लाश का तोहफा जो दूँगा और कसम है तेरी साँसे निकलने से पहले तेरी बहन की इज्जत यही नोचूंगा

मैं चीखने लगा था - तो फिर तू हाथ ही लगा के दिखा आज तू देख की डर क्या होता है मैं तुझे समझाऊंगा कसम है हर उस आंसू की जो मेरी बहन की आँख से गिरा है

आज तेरे खून से ही मैं आज अभिषेक करूँगा

वो-मुझसे तो दूर पहले मेरे आदमियो से तो लड़ ले उनसे ही जीत

मैं-हिज़ड़े , आज तू चाहे पूरा शहर ले आ या पूरी दुनिया आज कोई नहीं बचेगा

मैंने गंडासे को कंधे पर रख लिया और चिल्लाते हुए बोला-कॉलेज का गेट बंद करो ताला मारो कही ये साला भागने ना पाये

आज रक्त स्नान करना था मुझे तो लोग अधिक थे पर आज हार नहीं माननी थी वर्ना इक बहन से किया वादा टूट जाता आज उसकी लाज बचानी थी हर हाल में

कभी मैं वार करता कभी उनके प्रहार लगते पर थकना नहीं थारुकना नहीं था गुरु गोविन्द सिंह जी की बात याद आ रही थी चिड़िया नाल बाज लाडवा

मैंने देखा पूजा माधुरी के पास खड़ी थी बरसात में भी लोगो के पसीने छुट चले थे ऐसा भीसन नरसंहार हो रहा था मेरा शारीर भी दर्द से चीख रहा था

पर आज दर्द क्या होता है डर क्या होता है किसी की आँखों में देखना था ,लाशो की जैसे आज दिवार ही चुन दी थी जैसे जैसे मैं आगे बढ़ते जा रहा था किसी के चेहरे पे घबराहट दिखने लगी थी

वो शायद किसी को फ़ोन कर रहा था तो मैंने एक आदमी को फेक मारा उसपे वो उठके भागने लगा मैं भी भाग लिया और घसीट के लाया

मैं - ये शहर जागीर है तेरे बाप की,

वो-मुझे जाने दो

मैं-जाने दूंगा पर ऊपर

मैंने माधुरी को बुलाया वो आई

मैं-ये खड़ी हाथ लगा के दिखा इस हाथ से इसकी चुन्नी उतारी थी ना इस हाथ से

अगले हो पल उसकी दर्दनाक चीक गूंजने लगी हाथ तोड़ दिया था उसका

ना ना माफ़ी मत मांगियो बस दुआ कर की तेरी साँसों की डोर जल्दी टूट जाए

मैंने उसकी टांगो के बीच लात मारी वो गिर पड़ा

मैं-बहुत मर्द बनता है दिखा तो सही दम तू तो अभी से गिर गया

मैंने उसको नंगा किया और बेल्ट से मारने लगा साले को जब तक की उसकी पीठ ज़ख्मो से भर नहीं गयी

सब लोग दम साढे उस दृश्य को देख रहे थे अब मैंने गंडासा उठाया और उसका लण्ड काट दिया वो साला भी सख्त जान था जान निकल ही नही रही थी

मेरी बहन की इज्जत पे हाथ डालेगा तू उठ साले हाथ लगा लगाता क्यों नहीं मैं जैसे पागल ही हो गया था घसीट के ब्लाक की छत पे ले गया और साले को फेक दिया निचे

तरबूज की तरह फट गया था पर फिर से ले गया फिर फेका जंग का ऐलान हो गया था आज मैंने पूजा को कहा की बहार गाडी खड़ीहै घर जाओ

उनके जाते ही मैं बरस पड़ा स्टूडेंट्स और टीचर पर - ये तुम्हारी ही तरह स्टूडेंट थी यहाँ ये लोग पता नहीं कितने स्टूडेंट्स को परशान करते होंगे पर तुम सब चुप क्यों हो

कहाँ है तुम्हारी एकता आज जब तुम खुद की रक्षा नहीं कर सकते तो अपने परिवार की इस देश की क्या करोगे क्या फायदा इस पढाई का

एक रहो वो कितने आएंगे 100 200 तुम 1000 बनो अपने साथी के लिए आवाज उठाओ आज वो परशान है कल तुम होवोगे

आगे तुम जानो गाज़ी के पोते को मार दिया था अब बस ये देखना था की देर कितनी है इस शहर को सुलगने में पर ये तो होना ही था आज नहीं तो कल

 
मैंने सेठ के घर और होटल की सिक्योरिटी को अपने हिसाब से खूब मजबूत किया था मैं नहीं चाहता था कि उन लोगो पे कोई आंच आये

शहर में आग लगी हुई थी बाहुबली गाज़ी के पोते की हत्या हुई थी और मैं ये भी जानता था कि वो ज्यादा देर चुप नही बैठेगा पर मुझे उस से पहले कई उलझने सुलझानी थी

अपने हुलिए को दुरुस्त करके मैं सीधा सेठ के घर गया पर वहां कुछ भी सही नहीं था सब लोग ऐसे बैठे थे की जैसे मौत हो गयी हो

पूजा- देखो , भोले भाले दिलवाले जी आये है

मैं चुप चाप खड़ा रहा

पूजा- पापा, देखो तो सही इस इंसान को जिसे हम अपने घर में पाले हुए थे वो कितना बड़ा गुंडा है जिसने किसे मारा है पता है इसकी वजह से अब हम सब लोग मुसीबत में आ गए है मैंने तो पहले ही कहा था की इसको मत रखो

माधुरी की आँखों से आंसू गिर चले मैं आगे बढ़ा और उसके आंसू पोंछे

पूजा-ओह ओह देखो तो कितना अपना बन रहा है कलयुग का भाई

माधुरी-दीदी आप चुप रहो आपने तो देखा था न की भाई ने जो किया मेरी इज्जत बचाने के लिए किया

पूजा- और जो हम सब को इस मुसीबत में डाल दिया उसका क्या

माधुरी-कैसी मुसीबत दीदी, जानती हो मैं कितना डर डर के जी रही हु अगर वो गुंडे मुझे उठा के ले जाते आप लोग तब भी कुछ नहीं करते

पूजा-मुझे कुछ नहीं पता ,ये आदमी जिसे दुनिया दिलवाले भाई के नाम से जानती है मुझे अपने घर से बाहर चाहिए मैं किसी अपराधी को अपने घर में नही देखना चाहती

आज किसी को मारा है कल किसी को

कृष्णा का पति-पूजा ठीक कह रही है , माधुरी को बचाके अहसान किया है पर हम अपनी समस्या खुद सुलझा लेंगे पर अब इसको अपने घर रखना ठीक नहीं

माधुरी-भाई कही नहीं जाएगा, तुम लोग तो मेरे सगे भाई हो हर साल तुम्हारी कलाई पे राखी बांधी है मैंने पर तुम सब मुझे कभी समझ नहीं पाए , मेरी आँखों के आंसू कभी नही दिखे तुम लोगो को

पर ये इंसान जिसे तुम लोग जलील कर रहे हो मैं पूछती हु की क्या रिश्ता है इसका मुझ से मालकिन और नौकर का नहीं इसने समझा मेरे दर्द को मैं दिन भर रोती पर इस घर में किसी ने नहीं समझा

पर इसने इस परायी के लिए अपनी जान दांव पे लगादी भाई बहन का रिश्ता बस खून का ही नहीं होता क्या तुम्हारी तरह मैंने इसकी कलाई पे राखी बांधी , नहीं ना जो काम तुम

लोगो को करना चाहिए था वो इसने किया क्योंकि एक बहन की आत्मा की चीख एक भाई के कलेजे को ही छलनी करती है तुम जैसे लोगो को नहीं जिनकी आत्मा मर चुकी है

पूजा-तू अपनी बकवास बंद कर और जिसकी शान में तू कसीदे पढ़ रही है हम उसके बारे में जानते ही क्या है एक दिन बस आ गया कही से एक नोकर में ऐसा क्या है जिसे सबने इतना सर चढ़ा रखा है

मैं कहती हूं लात मारके निकालो इसको यहाँ इसके लिए कोई जगह नहीं आज बाहर क़त्ल किया है कल क्या पता हमे मार दे मुझे तो घिन्न आ रही है इस से

जुबान को लगाम दो पूजा, एक दहाड़ सी सुनी सबने और मैंने अपना माथा पीट लिया मैंने , सबकी नजरें उसकी तरफ घूम गयी

पिस्ता-पूजा जिस बारे में पता नही हो मुह नहीं खोलना चाहिए , जिसके बारे में तुम इतनी गालिया दे रही हो जिस से तुम्हे घिन्न आ रही है तुम जानती भी हो वो कौन है

सब लोग पिस्ता को ऐसे देख रहे थी मानो कोई अजूबा वो

पूजा- आप बीच में ना पडो भाभी, और वैसे भी मैं जानती हु आप इसकी इतनी फेवर क्यों करती हो

पिस्ता- चुप बस चुप, अगर अब तेरे मुह से एक शब्द और निकला तो मैं मर्यादा भूल जाउंगी और क्या कहा तूने फेवर करती हूं तो सुन, अगर इसकी असलियत तू जान जायेगी तो पाँव पकड़ लेगी इस इंसान के

पूजा-आप तो ऐसे बोल रही हो जैसे बरसो से जानती हो क्या रिश्ता है इस से

पिस्ता-मेरा रिश्ता हां हाँ हां ,मेरा रिश्ता नादान लड़की तू क्या समझेगी जैसे राधा श्याम का जैसे मीरा कृष्ण का जिस दिलवाले को तुम नोकर समझते हो जो दो कौड़ी का दिलवाला तुम्हारे आगे पीछे जी हजूरी करता है

तुम सब लोग उसकी धुल भी नहीं, जिस दौलत का तुम्हे घमण्ड है उतने रूपये तो ये किसी की झोली में डाल दिया करता है जिस बुंगले में तुम रहते हो पल भर में खरीद ले

पर तुम क्या समझोगे आँखों पे पट्टी जो बंधी है तुम्हारे

ये दिलवाला जो खुद किसी राजा से कम नही क्यों ऐसे रहता है तुम जानना चाहोगे मैंने पिस्ता को चुप करवाना चाहा पर वो किसकी सुनने वाली थी

पिस्ता उन्हें वो सब बताती चली गयी जो शायद नहीं बताना चाहिए था क्योंकि उसकी ग्रहस्थी पे अब तलवार लटक जानी थी

पर कभी ना कभी ये राज खुल ही जाना था पर वो तो बस वो थी शुक्र कभी उसने ये नहीं कहा था कि मोहब्बत है वर्ना वो क्या कर जाती

पिस्ता ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली-चलो यहाँ से ये फरेब भरी दुनिया कभी नहीं समझेगी ना तुम्हे ना मुझे

मैं-पिस्ता ये घर तुम्हारा है तुम यही रहोगी

वो- नही, जहाँ तुम वही मैं बहुत नकाब ओढ़ लिया मैंने पर अब नही बहुत घुट लिए तुम अब नही। बहुत घुट लिए तुम अब नहीं बस चलो यहाँ से

मैं-नही पिस्ता मैं तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं कर सकता

वो-बर्बाद ,मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहती बस मेरे रहते तुम्हारी बेइज्जती कोई नही कर सकता

पिस्ता ने मेरा हाथ पकड़ा और उसी पल हम उस घर से निकल गए

 
पिस्ता और मैं बस्ती आ गए थे

मैं-तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था

वो-तू फ़िक्र मत कर वैसे भी तेरा मेरा किसने बांटा

मैं-तू जानती है ना किस राह पर चल रहा हु

वो-इस आग में तू अकेला नही चलेगा और कितना सहेगा बस कर अब

मैं-मेरी मंजिल कहा

वो-इतनी बड़ी दुनिया है कही भी शिफ्ट हो जायेंगे

मैं-घर की याद आती है

वो-तो फिर चलते क्यों नहीं गाँव

मैं- अब कोई नहीं उधर

वो- हैं सब है कहानी अभी खत्म नहीं हुई

मैं-वो तो है बस जितना टल जाए उतना सही

वो-कम से कम वहां के हाल तो पता कर लो

मैं- बस जल्दी ही जाऊंगा

वो- तुम बैठो मैं नहां के आती हु

मैं बिस्तर पे लेट गया ऐसा लगा की बरसो बाद पनाह मिली हो नींद सी आने लगी की पिस्ता आ गयी

मैं-यार तू मेरे साथ आ गयी मास्टर जी का क्या होगा

वो-अरे तू चिंता कर उसको कोई फर्क नही। पड़ेगा

मैं-वोक्यों

वो-सुन,मास्टर जी के भी अपने किस्से है उस दिन मैंने तुझसे झूठ बोल दिया था पर वो कम नहीं है उनके स्टाफ में कोई है उस से टांका भिड़ा रखा है

मैं- तूने पकड़ा नही उनको

वो-यार इस खेल में हम सब नंगे तो क्या टेंशन लेनी

मैं-तू नहीं सुधरेगी कभी

वो- पहले ठीक से बिगड़ने तो दे

पिस्ता पलँग पे चढ़ गई सीने से लग गयी पता नही मेरा और उसका कैसा नाता था जिसका कोई नाम नही था पर हम जानते थे इस अनोखे बंधन को

मेरे हाथ अपने आप उसके स्तनों पे पहुच गए थे नाइटी के अंदर ब्रा नही थी मुझे पता चल गया था मैं धीरे धीरे उसके स्तनों को दबाने लगा

वो शांत पड़ी रही कुछ देर स्तनों को दबाने के बाद मैंने उसकी मोटी मोटी जांघो को सहलाना शुरू किया उसकी नाइटी ऊपर सरकने लगी

कुछ देर मैं ऐसे ही मस्ती करता रहा फिर वो मेरी तरफ पलट गयी

पिस्ता-याद है हम गाँव में कितनी मस्ती किया करते थे वो भी क्या दिन थे

मैं-हां तब की बात ही अलग थी अब सब बदल गया है मैं तुम्हे चोरी छिपे देखता था जब तुम भैंसों को पानी पिलाने खेली पे आया करती थी

और कितनी जल्दी पट गयी थी जैसे कहने की ही देर थी

वो- अरे वो तो मैंने सोचा छोरा तडप रहा है निकाल दे गर्मी

मैं-अच्छा जी हम तो सोचे की आग बराबर लगी है

वो-आग की बात ना ही करो तो अच्छा है

मैं-तू कबसे ठंडी होने लगी

वो- कभी कभी मूड नहीं होता है

मैं-चल कोई ना

वो-गाँव कब चलोगे

मैं- यहाँ से निपट लू फिर चलते है कब तक यु भागता रहूँगा

वो-अच्छा ही है पर ये बता तूने शादी क्यों न की

मैं-तेरे बाद कोई मिली नहीं ,

वो-पर तेरा तो किसी और से चक्कर था न

मैं-हम्म ,सब नसीब की बात है उसका साथ ऐसा छूट गया कि बस अब हम ही है

पर अब तू साथ है तो ज़िन्दगी कट ही जायेगी ये सब छोड़ भूख लगी है यार सुबह से कुछ ना खाया गालियो के सिवा

वो-खाना बना दू

मैं-इधर कुछ नहीं है चल कही बाहर चलते है

वो-कपडे पहन लू

कुछ देर बाद हम लोग सड़क पर घूम रहे थे आज बरसात नहीं थी पर ठंडी हवा चल रही थी हाथो में हाथ थामे हम लोग बस घूम रहे थे एक जगह एक रेहड़ी देख कर वो रुक गयी

मैं-क्या हुआ

वो-छोले भटूरे

मैं-तुझे आज भी पसंद है

वो-बहुत

मैं-तो चल फिर देर कैसी

उसकी यही बाते तो मुझे बहुत पसंद थी चाहे हम कही चले जाए पर जड़ो से जुड़ा रहना बहुत जरुरी है जिसमें ये छोटी बाते बहुत मैटर करती है

सच कहूं तो उसको खाते देखकर ही भूख मिट गयी थी कोई इंसान इतना बेतकल्लुफ कैसे हो सकता है अपने जैसा बस वो एक ही पीस थी इस दुनिया में

उसके मोटे गालो पे जो वो बालो की लट आती थी किसी का भी दिल धड़का दे हमारी तो बिसात ही क्या थी बस ये धड़कने ही थी आजकल गुस्ताख़ होने लगी थी

आँखों से दो बूंदे चुपचाप गिर गयी जब उसने एक निवाला अपने हाथों से मुझे खिलाया ज़माना ही गुजर गया था वो भी क्या दिन थे पर अब बस यादे ही थी

सड़क किनारे बैठे हम दोनों वो अपने हाथों से मुझे खिला रही थी कौन था मैं और कौन थी वो ये कैसा बंधन था या संकेत था उस ऊपरवाले का जो इशारा कर रहा था किसी और

खाना खाके बस चले ही थे की हलकी हलकी बूनदे गिरने लगी ये सावन का मौसम भी अजीब होता है जब देखो झड़ी लग जाती है

मैंने छतरी खोल ली पर उसका मन भीगने का था पानी की बूंदों में उसकी पायल की छम छम मुझ पर जादू सा कर रही थी जी कर रहा था कि उसे अभी बाहों में भर लू

ईस बरसात से भी ना जाने कितनी यादे जुडी हुई थी पर ज़िन्दगी यादो के साहरे तो नहीं चलती इतना तो सीख लिया था मैंने

देर रात हम कमरे पे आये पिस्ता मेरे पास ही सोयी पड़ी थी पर इन आँखों में नींद नहीं थी ,थी तो बस एक बरसो पुराणी बेचैनी

मैंने पिस्ता को अपनी और खींचा और सोने की कोशिश करने लगा आँख खुली तो देखा आसमान पूरा काला हुआ पड़ा है घनघोर बरसात हो रही थी

पिस्ता कुर्सी पे बैठी थी मैं हाथ मुह धोके आया फिर बस्ती के एक लड़के को फ़ोन किया कुछ नाश्ता पानी भेजने के लिए हम बाते कर रहे थे की माधुरी का फ़ोन आ गया

वो मिलने आना चाहती थी पर मैने मना कर दिया उसकी सुरक्षा में कोई चूक नहीं चाहता था बहुत मुश्किल से रोका उसको

नाश्ता आ ही गया था मैं और पिस्ता नाश्ता करने बैठे थे की कुछ लड़के भागते हुए आये और बोले-पुलिस ,भाई पुलिस आयी है

कुछ लड़के भागते हुए आये और बोले-पुलिस ,भाई पुलिस आयी है

 


मैंने चाय का गिलास वापिस टेबल पर रखा और उठ खड़ा हुआ और बाहर चलने को हुआ तो पिस्ता ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली-नहीं मत जाओ

मैं-तू कबसे डरने लगी

वो-आज मेरा जी घबरा रहा है

मैं- हैंडल तो करना होगा ना

भाई हम आपको गिरफ्तार नहीं करने देंगे उनमे से एक लड़का बोला

मैं-मैं संभाल लूंगा

सीढिया उतर के मैं नीचे आया बस्ती का हर इंसान ही जैसे जमा हो गया था लोग अड़े खड़े थे पुलिस के आगे जबर्दस्त भीड़ हो रही थी

चाहे कुछ हो जाये भाई को नहीं ले जाने देंगे

मैं-शांत हो जाओ ऐसी कोई बात नहीं है देखने तो दो

मेरे कहते ही भीड़ साइड होने लगी और पुलिस आगे बढ़ने लगी एक पुलिस वाला बोला-चल मैडम बुला रही है

मैं-मैडम को ही बुला ले

वो-चल ना यार , नयी dsp आयी है हमारी क्यों मारने पे तुले हो

मुझे हंसी आ गयी

मैं-चल ले चल मैडम के पास

हम लोग गए मोहतरमा की पीठ मेरी तरफ थी वो साथ वालो को कुछ हिदायते दे रही थी

मैडम दिलवाला उनमे से एक सिपाही ने कहा तो वो मेरी तरफ पलटी और जैसे ही मेरी नजरो ने उसे ठीक से देखा मेरे पैरों तले जमीन ही खिसक गयी

वाह रे ऊपरवाले तेरी महिमा न्यारी, ये कैसे खेल खिलाता है तू उसने चश्मा उतारा आँखों से, कुछ पल के लिए सब कुछ रुक सा गया वर्दी में क्या कहूँ फब रही थी वो

तुम्म। बड़ी मुश्किल से उसके होंठो से निकला

अब मैं क्या कहता उस से , देखो तक़दीर ने मिलाया भी तो किस हाल में किस मोड़ पे उसकी वर्दी पे लगी नाम की प्लेट में जो लिखा था अब कोई गुंजाईश ही नहीं थी

मुझे देख पर एक पल के लिए जो रौनक सी आयी थी वो तुरंत ही द्वेष और घृणा में बदल गयी और वो गुस्से से साथी से बोली

तो क्या, कोई महात्मा आया है क्या , हत्कड़ी डाल इसके हाथो में और ले चल

पता नहीं क्यों मुझे ऐसे लगा की शब्द उसके गले में जैसे अटक से गए हो

खैर, जैसे ही गिरफ्तारी की बात हुई बस्ती वाले अड़ गए कुछ लोग हाथो में डंडे जेली ले आये कुछ ने पत्थर उठा लिए चारो तरफ बस एक ही आवाज़ भाई को गिरफ्तार नहीं करने देंगे

dsp - एक मुजरिम का साथ दे रहे हो तुम सब भी नपोगे रही बात गिरफ्तारी की तो इसको ले ही जाउंगी जो बीच में पड़ेगा जान से जायेगा ,बाकी कोशिश करके देख लो

माहौल गर्म होने लगा था , दोनों तरफ तनाव बढ़ गया था बात संभालनी जरूरी थी और वैसे भी इस समय खून खच्चर ठीक नहीं था

मैं-अरे कुछ नहीं, मुझे जाने दो जल्दी ही लौट आऊंगा

बस्ती वालो को बड़ा समझाया और फिर बैठ लिए पुलिस की गाडी में सायरन बजाते गाडी दौड़ पड़ी कोतवाली की तरफ

साथ ही यादो की बारात भी चल पड़ी थी

जिस दुनिया को मैं छोड़ आया था वो अचानक से पिछले कुछ दिनों में फिर से मेरे सामने आके खड़ी हो गयी थी पहले इस अजनबी शहर में पिस्ता का यु मिल जाना और अब इसका

वक़्त ने एक बार फिर से ऐसी करवट ली थी की कुछ समझ ना आया ज़िन्दगी से पहले ही जूझ रहे थे अब तो ज़िन्दगी गांड मारने पे ही उतर आई थी

तबी गाडी के शीशे पे जो ड्राइवर के पास लगा होता है उसपर नजर पड़ी तो उसका चेहरा दिखाई दिया आँखों पे काला चश्मा लगा लिया था

पर आँखों से गिरी कुछ पानी की बूंदे उसके गालो पे निशान छोड़ ही गयी थी, बरसो से तम्मन्ना थी की उस से मिल पाउ ढूंढ लु उसको दुनिया की भीड़ में

और देखो दुआ कबूल हुई तो किस तरह से गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी बरसात की दिवार को चीरते हुए पर उन यादो का क्या जो बरसात की तरह ही इस दिल पर बरस रही थी

समझ नहीं आ रहा था कि ये सावन खुशि लाया था या गम पर चलो जो भी था अपना ही था दिल में दर्द सा होने लगा था पर हमने इतना जहर पिया था

की इस दर्द की क्या बिसात थी कोतवाली आते ही हमको बिठा दिया गया एक कुर्सी पे बिठा दिया गया 5 मिनट 10 करीब आधा घण्टा गुजर गया बैठे बैठे

फिर वो आयी बोली-क्या लोगे

मैं-पानी,

पानी पिलाया गया

मैं-नाश्ता अधूरा रह गया तो भूख लग आयी है व्यवस्था करवाओ

वो गुस्से से अपने हाथ को टेबल पे मारते हुए-शादी में आये हो क्या चुप करके बैठो

मैं-तुम्हे देख लिया दावत हो गयी वैसे ही

वो मैंने कहा न चुप रहो

मैं-चलो ये ही बता दो किस जुर्म की सजा देने लायी हो

वो- जुर्म बड़ा नादाँ है ये दिलवाला या याददास्त की प्रॉब्लम है ये लो स्टेटमेंट लिखो की कैसे तुमने पुलिस के अधिकारी और गाज़ी खान के पोते दोनों को दिन दिहाड़े क़त्ल किया

मैं-और ना लिखू तो

वो- ना सुनने की आदत नहीं मुझे जितनी जल्दी अपना जुर्म कबूल कर लोगे फायदे में राहोगे वार्ना पुलिस के पास और भी तरीके है

मैं-आज़मा लो हम भी देखे सौदाई का गुरूर कितना है

वो- जब दो डंडे पड़ेंगे न तो ये जो attitude है ना सब निकल जायेगा

मैं- हम तो तैयार है वक़्त ने तो आजमाँ लिया तुम भी अपनी कर लो हम तो इन्तजार में ही थे कब तुम मिलो कब जान जाए

वो- मेरा दिमाग खराब मत करो मैं बोल रही हु चुपचाप अपना जुर्म कबूल करलो

मैं- जुर्म तो उसी दिन कबूल लिया था जब इश्क़ का इज़हार किया था किसी से

वो- मुझे नहीं सुननी तुम्हारी बकवास

हम बात ही कर रहे थे की वकील आ पहुंचा था ना कोई fir थी ना कोई चार्जशीट हुई थी और वो सलाखें भी कहाँ बनी थी जो दिलवले को कैद कर सके

कोतवाली से तो निकल आये थे पर दिल वही रह गया था बस्ती आते ही पिस्ता मुझसे लिपट गई आज पहली बार उसके अंदर एक डर देखा था

उसकी आँखों में आंसू देखे थे पर उसे नहीं पता था कि मेरे सीने में एक आग जल रही थी कुछ समय पिस्ता के साथ बिता के मैं किसी काम से शहर से बाहर की तरफ आ गया

ये एक पुराना मंदिर था इतने लोग आते जाते नहीं थे पर फिर भी थे कुछ लोग हमारी तरह के करीब एक घंटे तक इंतजार करता रहा फिर एक गाडी आके रुकी

गाड़ी का दरवाजा खुला और नजरे उतरने वाले पे ठहर सी गयी हाथो में पूजा की थाली लिए वो उतरी हल्का नीले रंग का सूट क्या कहूँ। जँच रहा था मैं सीढियो पर ही बैठा था पर वो ऐसे निकल गयी

जैसे की पहचाना ही नहीं ,मैं वैसे ही बैठा रहा करीब आधे घंटे बाद उसकी आवाज सुनी-प्रसाद लो

मैंने प्रसाद लिया वो भी मेरे पास ही बैठ गई कुछ देर एक ख़ामोशी सी छाई रही ऐसा लग रहा था कि हम दोनों ही उस ख़ामोशी को तोड़ नहीं पा रहे थे

पर किसी को तो पहल करनी ही थी

मैं-कैसी हो

वो-जी रही हु

मैं-सभी जीते ही तो है

वो-हाँ पर मर मर के भी कोई जीना है

मैं-किसके लिए मरती हो

वो-था कोई अपना जो साथ छोड़ गया

मैं-ये चश्मा क्यों नहीं उतरती आँखों में कोई दिक्कत है क्या

वो-अच्छा लगता है ये

मैं-बहाना अछा है अपने दर्द को छुपाने का

वो-कैसा दर्द, भला मुझे कोई दर्द क्यों होगा देखो भली चंगी तो हु

मैं- खाओ मेरी कसम

वो-कसम क्या खानी

मैं- तो dsp हो गयी हो

वो-कुछ न कुछ काम तो करना ही था ना

मैं-चलो अच्छा हुआ ,तुम्हारा सपना था पुलिसवाली बनना बधाई हो

वो-सपना तो पूरा हो गया पर अपना छूट गया

मैं-तो फिर क्यों गयी थी छोड़के

वो-मैं थप्पड़ मार दूंगी,कौन गया था छोड़के

कितना परेशां थी मैं जानते हो कहाँ कहाँ नही ढूंढा तुम्हे फ़ोन करती थी कोई जवाब नहीं मिलता था फिर मैं गाँव आयी तो तुम्हारे घर गयी

तो फिर पता चला की क्या हुआ मुझे पता था कि उस समय तुम्हे मेरी बहुत जरूरत थी मैंने अपनी और से बहुत तलाश की पर तुम्हे कहीं नहीं पाया

 


यहाँ तक की तुम्हारे ननिहाल भी गयी पर बस इतना ही पता चला की तुम कुछ सामान लेने गए थे फिर उसके बाद कुछ खबर नहीं

समय बीतता गया , पर दिल में एक टीस फांस बनके मुझे घाव देती रही और देखो मुलाकात भी हुई तो किस मोड़ पर जैसे नदी के दो किनारे

वक़्त ने ये कैसा सितम किया है जानते हो आज का दिन कैसा गुजरा है मेरा ये चश्मा इसलिए नहीं उतारा की रोना नहीं चाहती मैं

दिल तड़प रहा है मेरा दर्द हो रहा है कभी सोचा नहीं था कि एक दिन तुम यु मिलोगे और हँसाने की जगह रुलाओगे

जानते हो क्या गुजरी होगी मुझ पे जब तुम्हारे हाथो में हतकड़ी डालनी पड़ी

मैं-वो तुम्हारा फ़र्ज़ था ड्यूटी सबसे पहले होनी चाहिए

वो-वो तो मैं निभाऊंगी ही पर एक कश्मकश है मन में की तुम्हारा और मेरा आमना सामना अब कैसे होगा और मैं क्या चुनूंगी

मैं-देखो बात बड़ी सिंपल सी है , हालात कुछ ऐसे है कि सामना तो होता रहेगा पर तुम कमजोर नहीं पढ़ोगी जब भी इस मुजरिम दिलवाले से तुम्हारा सामना हो बेहिचक गोली चला देना

वो कुछ पल मेरी तरफ देखती रही और फिर बोली-गोली चला दू किस पर तुम पे या खुद पे, जो गोली तुमपे चलेगी क्या वो मेरी जान ना ले जाएगी

बोलते बोलते उसकी आँखे डबडबा आयी आंसू गिरने लगे और एक पल भी मैंने उसको रोका नहीं रोने से क्योंकि जानता था कि अगर मैं कमजोर पड़ा तो फिर सब बर्बाद हो जायेगा

पर उसे रोता हुआ भी तो नहीं देख सकता था मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और हल्का सा दबा दिया और वो मेरे सीने से आ लगी

बरसो बाद ऐसे लगा था कि जैसे बंजर जमीन पर सावन टूट कर बरस पड़ा हो जैसे बस अपने सीने से लगाये रखा उसको , हर एक आंसू मेरे कलेजे को चीर रहा था पर उसके दिल में जो गुबार इतने दिनों से रुका था

आज बह जाना ही चाहिए था कुछ शांत हुई तो उसे थोड़ा पानी पिलाया वो- तुम इतने दिन कहा थे

मैं-लंबी कहानी है

वो-मेरे इंतज़ार से लंबी तो नहीं

मैं- जब पूरा परिवार तबाह हो गया तो मेरे नाना मुझे अपने गाँव ले आये मेरा मन नही था बिलकुल भी पर मज़बूरी थी तो जाना पड़ा कोई और चारा भी नहीं था क्योंकि बिमला और चाचा का हाल तो तुम्हे पता ही था नाना नानी का बहुत स्नेह था तो मैं मन मारके उनके साथ रहने लगा हर पल घर की बहुत याद आती थी पर अब घर था ही कहाँ

जब भी तन्हाई घेर लेती तुम्हारी बहुत याद आती पर हर वो जरिया जिस से तुम्हे धू ढ़ सकू खत्म हो गया था पढाई फिर से चालू हुआ उस रोज मैं थोड़ा लेट हो गया तो कच्चे रस्ते से शॉर्टकट ले लिया

जाड़े के दिन थे अँधेरा जल्दी हो गया और उस अँधेरे ने लील लिया मुझे वो एक जानलेवा हमला था पर खुशकिस्मती से बच गया मैं ज़ख्म गहरे थे पर जी ही गया जैसे तैसे करके पर एक बात मैंने खूब गौर की ,की मेरे मामा का व्यवहार बहुत बदल गया था

हर पल उनकी आँखों में जैसे एक द्वेष देखता था मैं पर वो मुझे कुछ कहते नहीं थे और फिर एक दिन मैंने नाना और मामा को बहस करते सुना मैं समझ गया था कि वो अपने घर में मुझे नही रखना चाहते थे

पर मेरी कुछ मज़बूरी थी और कुछ दवाब था मेरे नाना का और फिर एक दिन आया उस दिन इंदु की सगाई थी नाना ने मुझे सख्त कहा था कि कुछ भी हो पर यही रहना है पर मामा ने मुझे बॉर्डर वाले ठेके पे दारू लाने भेजा

नीनू दम साधे मेरे प्रत्येक शब्द को सुन रही थी कुछ देर मैं चुप रहा

फिर बताने लगा - मुझे जाने की जल्दी थी मैंने दारू लोड की और गाड़ी भगाई पर कुछ किलोमीटर बाद गाडी बंद हो गयी सच कहूं मेरा माथा तो उसी पल ठनक गया था जब मामा ने मुझे कहा था जाने को

पर मैंने ये सोच लिया की घर में कारन है सो काम होते है क्या हो जायेगा तो मैं चला गया मैं उस खराब गाडी को कोस रहा था कि एक काली गाडी मेरे सामने आके रुकी

इस से पहले की मैं कुछ समझता फायरिंग होने लगी एक गोली हिट कर गयी पर मैंने मुकाबला किया पर जीत नहीं पाया दो तीन को तो धर लिया पर मैं पहले हमले से ही नहीं उभरा था

और ये दूसरा और वो भी पूरी प्लानिंग से गोलिया जिस्म को छलनी कर गयी थी कुछ और हथियारों के घाव थे खून पानी की तरह बह रहा था सांसो की डोर बस टूटने को ही थी मैं सड़क किनारे पड़ा था कि

एक गाडी और आयी मैंने जैसे तैसे मदद के लिए कोशिस की वो कार आके मेरे पास रुकी शीशा उतरा और जो चेहरा मैंने देखा विश्वाश नहीं हुआ पर मदद की जगह उसने गन निकाली और कुछ

पल बाद कुछ और फायर की आवाज वातावरण में गूंजने लगी

जिसे मैंने उम्मीद समझा था वो तो मौत का हाथ था गाड़ी तेजी से चली गयी और मैं खून से लथपथ पता नहीं उस दर्द से जूझ रहा था या अपनी टूटती साँसों की डोर से

आँखों में आंसू भी थे पर वो अँधेरा भी छा रहा था जो शायद मुंझे लील जाता काल के मुह में पर फरिश्ते होते है नीनू फरिश्ते होते है

मौत और मुझमे जब कुछ ही पलों की दूरी थी तभी उसने आके मुझे थाम लिया और जब होश आया तो मैं संघर्ष कर रहा था ज़िन्दगी से

इतनी गोलिया लगने के बाद मैं कैसे बच गया ये तो बस वो ही जानता है मैंने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा जानती हो एक टाइम था जब दवाई असर नहीं करती थी रातभर तड़पता था पर जीना था

देखना चाहोगी किस हद तक दर्द को सहा है मैंने ये कहके मैंने जैसे ही टीशर्ट उतारी नीनू मेरे सीने पे पेट पे उन ज़ख्मो के निशान देख कर फुट फुट के रोने लगी

मैं बस उसका सर पुचकारता रहा जब वो संयंत ही तो उसकी आँखों में एक ज्वाला थी वो अपने दांत पीसते हुए बोली-मैं उन लोगो को ज़िंदा जला दूंगी जिनकी वजह से हम सबकी लाइफ में जो दर्द आ गया है वो ब्याज सहित वापिस करुँगी मैं

मैं-हाँ करेंगे पर सही समय आने पे

वो- पर ये नहीं बताया कि तुम्हे बचाया किसने

मैं- वो अवंतिका थी

वो-पर कैसे उसे कैसे पता था

मैं-इस साजिश के बारे में मंजू को पता चल गया था कैसे ये मुझे भी नहीं पता था गाँव में अब हालात बदल चुके थे और मदद की सख्त जरूरत थी अब बिमला क्यों मदद करती तो बस एक अवंतिका ही थी जिस से आस की जा सकती थी और बस किस्मत ही थी

वो- पर तुम्हे नहीं लगता कि सबकुछ फ़िल्मी तरीके से हुआ मान लो की वो तैयार थी तुम्हे बचाने को पर गाँव में और जहाँ हमला हुआ दूरी बहुत है उसे पहुचने में टाइम लगना था और तुम्हारे पास टाइम था नहीं

दूसरी बात ये की , की क्या उन लोगो को शक नहीं हुआ होगा जब लाश नहीं मिली तुम्हारी और जब तुम गायब हुए तो मामा ने क्या बहाना बनाया होगा

मैं-पुलिसवाली हो ना आदत है शक करने की बताता हूं

देखो जब मंजू ने अवंतिका को फ़ोन किया तो वो इसी एरिया में थी

नीनू-हाऊ पॉसिबल

 


मैं- दरअसल इसी एरिया में अवंतिका का गाँव है माँ बाप की अकेली संतान है तो उनकी प्रॉपर्टी उसके ही नाम है फिर इधर फैक्ट्री एरिया डेवेलोप हो रहा था तो उसकी जमीं की डील थी

नीनू- देखो मुझे ये एक ट्रैप लगा

मैं-कैसे

वो- देखो बिमला बेकाबू हो चुकी थी बेशक अवंतिका सरपंच बन गयी थी पर उसका वैसा रुतबा नहीं था जो तुम्हारा था मतलब ये सरपंची वो कभी नही जीतती एक तरह से तूमने उसको दी थी

पर वो सरपंची कर नहीं सकती थी क्योंकि उसके हर कदम पर बिमला अड़ंगा लगाये खड़ी थी तो उसे चाहिए था एक हथियार और तुमसे बेहतर बिमला के खिलाफ कौन था और तुम्हारी काबिलियत वो चुनावो में देख ही चुकी थी

तो बस उसने ये प्लान बनाया और तुम्हारी सहानुभूति पा ली जो उसे चाहिए था मुझसे तुम्हारा कुछ नहीं छिपा जानते हो तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है, तुम्हारी भूख इस जिस्म की

क्या वो तुम नही थे जिसने बिमला को इस रास्ते पे लाया और वो डील तो याद होगी तुम्हे जो तुमने अवंतिका से की थी ये तुम्हारी हवस ही थी जो तुम्हारी दुश्मन बन गयी

दूसरी कमी ये की तुम लोगो पे विश्वास जल्दी कर लेते हो देखो क्या पैसे से मंजू को नहीं बहलाया जा सकता था उसका बाप बिस्टर पर था जब तक तुम्हारे पिता थे चिंता नहीं थी पर उनके बाद सोचो जरा

दूसरा तुमने कहा मांमाँ किसी से बात करता था जरुरी नहीं की बिमला से अवंतिका भी हो सकती है क्योंकि पैसा उसके पास भी कम नहीं और जैसा की वो उस दिन उसी एरिया में थी तो क्या वो डील तुम्हारे हमले की नहीं हो सकती क्या

अतीत के पन्नो पे निगाह डालो देखो अवंतिका ने सबसे पहले किसे भेजा अपना संदेसा

मैं-गीता ताई को

वो-उसी को क्यों गौर किया तुमने

बात में दम था उसकी

नीनू- देखो पिस्ता हद से ज्यादा खास थी तुम्हारी अगर पिस्ता तुम्से कुछ मांगटी तो तुम कभी मना नहीं करते। फिर उसने गीता को क्यों कहा

मैं- क्योंकि गीता उसकी सहेली थी

वो-हम्म ,क्योंकि गीता तुम्हारे साथ सो रही थी जो की उसने अवंतिका को भी बताया होगा ये तुम्हारी कमजोर कड़ी थी तुम्हारी भूख इसलिए तुमने उस से पैसो के बजय किसी और चीज़ की मांग की और उसने मान ली

क्योंकि उसे पता था तुम्हारी दिलफेंक फितरत के बारे में

नीनू की एक एक बात मेरे सर पे पत्थरो की तरह गिर रही थी उसका हर सवाल जायज था पर एक पेंच और था वो चेहरा जिसने मुझ पर गोलियां चलाइ थी

बस उसी बात का नीनू के पास कोई सवाल नहीं था कुछ सोच के वो बोली- पैसा हो सकता है उसको पैसा से खरीदा गया हो

मैं-सब सवालो के जवाब गाँव में मिलेंगे

वो- कब चलना होगा

मैं-इधर के काम निपटा लू

वो-इधर के क्या काम क्या सोच रहे हो

मैं-कुछ नहीं

वो-देखो मैं तुम्हारी कुछ नहीं चलने दूंगी शहर में तुमने गाज़ी के पोते को मारा है वो चुप रहेगा नहीं और तुम दोनों के बीच मैं शहर को जलने नहीं दूंगी

मैं-बीच में ना आना

वो-ये जो दिलवाले बने फिरते हो ना 5 मिनट में सर से उतार दुनंगी मेरे रहते शहर को झुलसने नहीं दूंगी

मैं-तुम अपना फर्ज निभाना

वो- पर हार भी तो मेरी होगी ना

मैं- एक मुजरिम और पुलिस का याराना नहीं होता मैडम गोली चला देना बे हिचक पर निशाना बस दिल ही होना चाहिए

रात हो चली थी जी भर के उसे देखा और फिर मैं आगे को बढ़ चला कुछ आंसू उसकी आँखों से गिर गए कुछ मेरी से बात बस इतनी सी नही थी इस वक़्त ने पैरो में मजबूरियों की बेड़िया डाल दी थी बात उसकी भी सही थी और हमारी भी हमारा ईगो भी कुछ ज्यादा सा था नीनू ने सही कहा था ये सारा रायता तो हमने ही फैलाया था

जो अब समेट नहीं पा रहे थे उसको मैं जानता था और ये भी सामझ रहा था कि मेरे हर कदम पर उसकी जलती नजरो का सामना करना पड़ेगा पता नहीं क्या खेल वो हम कठपुतलियों से खेल रहा था

इस खेल में जीत भी अपनी थी और हार भी पर हम जरा दूजे वाले थे गुस्ताखी तो खून में दौड़ती थी एक जूनून सा था हद से गुजर जाने का ये शोक तो नहीं था पर फिर भी उड़ते रहने की आदत सी हो गयी थी और आवारा तो हम जवान होने से पहले ही थे

दिल साला कही लग नहीं रहा था तो एक बोतल ले ली रस्ते में पर हमारा गुमान था या कंपनियों ने नशा कम करके बेचना शुरू कर दिया था बोतल में कितनी पि कितनी बाकी थी अब होश नहीं था

बस एक जंग थी एक जिद्द थी अपने आप से जूझने की पता नहीं दिलो दिमाग में क्या चल रहा था पर जब कुछ सूझा नहीं तो गाडी घुमा दी कोतवाली की तरफ अब कम हम भी नही थे

गाडी से उतरा कुछ पुलिसवाले जो नाईट ड्यूटी पे थे उनमें से कुछ बाहर थे उनमें से एक की कुर्सी खींची और बोला- बुला रे dsp मैडम को बोल दिलवाला आया है गिरफ्तारी देने

वो पुलिसिया मेरे मुह की तरफ देखने लगा फिर धीरे से बोला- भाई क्यों हमारी क्लास लेते हो कोई गलती हुई तो बताओ छोटी मोटी बाते तो होती रहती है कोई खता हुई तो हम हाथ जोड़ते है

मैं-ना रे साली खता तो हमसे हुई तुम यार गिरफ्तार करो हमको लगाओ कोई धारा तगड़ी वाली

वो- भाई क्यों चुस्की लेते हो खाव्ब में भी आपको गिरफ्तार करने का सोचा तो भाभी जी आ जाएँगी फिर उनसे कौन सुलटेगा

मैं-कौन भाभीजी बे जरा हमसे भी मिलवा कभी

वो-क्या भाई आप भी , आप तो रोज ही मिलते हो आपके साथ ही तो है

मैं-पर मैं तो अकेला हु

वो-भाई आपको चढ़ गई है आप समझ नहीं रहे

मैं- तू समझा फिर

वो- जो उस दिन जमानत के कागज़ लायी थी

मैं-याद नही एक काम कर फिर अरेस्ट कर ले अब आएगी तो मिल लेंगे

वो- हमे माफ़ करो प्रभु, dsp मैडम सुबह आएँगी आप तब गिरफ्तारी दे देना अभी आप जाओ

मैं-अबे ऐसी तैसी तुम्हारी मैडम की फोन करो बुलाओ अभी के अभी

कोतवाली न हुई गली का नुक्कड़ हो गयी तमाशा पूरा हो रहा था मैडम आये ना हम जाए ना प्यास सी लग आयी थी पानी पिने का सोच रहे थे की जेब में पड़ा फ़ोन बज उठा

कान पे लगाया पिस्ता थी-कहाँ हो तुम

मैं-कोतवाली में

वो- क्या हुआ मैं आती हु

मैं- ना रे मैं आता हूं थोड़ी देर में

मैं पुलिसिये से - चल भाई चलता हूं बाद में मिलूंगा

ऐसा लगा की पिस्ता से बात करते ही नशा कम सा हो गया था आते ही उसने खाना परोसा पहला निवाला खाते ही समझ गया खाना पिस्ता ने बनाया होगा

वो भी समझ गयी बोली-आज बाजार गयी थी काफी सामान खरीदी की

मैं- हाँ पर अकेले ना जाया करो

वो- ओके

 
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