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Guest
Romance आ अब लौट चले
कहते है बढ़ती उम्र में इश्क़ हो तो समझ जाना चाहिए , जिंदगी फिर से मुस्कुराना चाहती है
ओल्डएज होम के बरामदे की सीढ़ियों पर बैठे अमर जी सुबह का अखबार पढ़ रहे थे घर के बंटवारे के बाद दोनो बेटों ओर बहुओं के बीच अमर को लेकर झगड़े होते रहते थे जिन्हें देखते हुए अमर ने खुद ही ओल्डएज होंम आने का मन बना लिया यहां उन्हें अपने कुछ पुराने दोस्त भी मिल गए थे जब घर से निकले तो हाथ मे सिर्फ एक बैग था जिसमे कुछ कपड़े और कुछ जरूरी सामान था बेटे बहु ने रोका तक नही ओर इस बात से आहत होकर अमर ने घर वापस ना आने का मन बना लिया पिछले 6 महीनों से वह यही ओल्डएज होंम में थे , खुश थे लेकिन मन मे अभी भी एक खालीपन था अमर के साथ यहाँ 11 लोग ओर थे सभी अपने बच्चों से आहत होकर यहां आए थे इसी ओल्डएज होंम से जुड़कर , एक ओर ओल्डएज होंम था जिसमे बुजुर्ग महिलाएं थी दोनो एक ही घर मे बने थे जिन्हें एक शादीशुदा दम्पति जो कि अनाथ थे वह सम्हाल रहे थे
अखबार में छपी नकारात्मक घटनाएं पढ़कर अमर का मन कुंठित हो उठा उसने अखबार बंद कर दिया और उठकर जाने लगा तभी दरवाजे पर गाड़ी के रुकने की आवाज आई अमर पलटा ओर आंखो पंर नजर का चश्मा लगाकर देखने लगा फीके रंग की साड़ी पहने कोई बुजुर्ग महिला गाड़ी से नीचे उतरी लेकीन अमर उसका चेहरा नही देख पाया उसने देखा महिला के सामने खड़ा लड़का महिला को कुछ समझा रहा था ओर वह बस हा में गर्दन हिलाये जा रही थी कुछ देर बाद लड़के ने उस महिला को एक बैग थमाया ओर गाड़ी में बैठकर वहां से चला गया महिला अंदर आयी जैसे जैसे वह आगे बढ़ी उसे देखकर अमर का दिल धड़कने लगा आंखे भय और पीड़ा से भर आईं , वह एकटक सामने से आती महिला लो देखता रहा 40 साल बाद वह उसके सामने इन हालातों में होगी ऐसा अमर ने सोचा नही था जैसे ही महिला अमर के सामने आई अमर ने काँपते हुए स्वर में कहा - सुमि तुम यहां ?
महिला ने अमर की ओर देखा उस आवाज को वह बखूबी पहचानती थी उसकी आंखो में पीड़ा के भाव उभर आये और वह बिना अमर से कुछ कहे महिला विभाग की तरफ चली गईं अमर उसे जाते हुए देखता रहा तभी पीछे से आकार , जगन्नाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुये कहा,"क्या बात है अमर ऐसे क्यों खड़े हो ? कौन है वो महिला ? होंम में नई आई लगता है''
अमर ने अपने दर्द और पीड़ा को आंखो में ही समेट लिया और कहा - हा जगन्नाथ आज एक बार फिर ममता अपने बच्चों पर बोझ बन यहां धकेल दी गयी
अमर अंदर चला गया सुमि याने सुमित्रा वर्मा जिसे अमर जानता था उसे आज इस हालत में देखकर काफी परेशान था उसके मन मे सवालों का अंबार लग गया लेकिन कैसे पूछे ? सुमि ने तो उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया था अपने कमरे में आकर वह यहां से वहां चक्कर काटने लगा , कुछ समझ नही आ रहा था क्या करे ? दिमाग मे सैंकड़ो सवाल आ जा रहे थे ओर सीने में एक पीड़ा का अहसास हो रहा था जिसे अमर खुद से दूर नहीं कर पा रहा था थककर वह बिस्तर पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा
"सुमि यहां क्या कर रही है ? उसने कहा था शादी के बाद वह हमेशा खुश रहेगी फिर आज इन हालातो में वो यहां कैसे ? उसके पति , बच्चे घर बार आखिर इन सबके होते हुए वो अकेले , वो भी ओल्डएज होंम में बीते 40 सालों में ऐसा क्या हुआ होगा सुमि के साथ ? उसने कभी बताया भी तो नही ना जाने क्या क्या हुआ होगा ? किन परेशानियों से गुजरी होगी वो ,,छः मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है आखिर इतने सालों में मैंने उस के बारे में कभी जानने की कोशिश , तक नही की ,,
अमर की पीड़ा अब गुस्से में बदल चुकी थी अमर उठा और अलमारी में रखे अपने बैग को बाहर निकालकर बिस्तर पर रखा बैग में रखे कपड़े ओर सामान निकालकर बाहर फेकने लगे जैसे कुछ ढूंढ रहे हो आखिर में एक किताब मिली अमर ने जल्दी से उस किताब को खोला और पन्ने पलटने लगा पन्नो के बीच रखी तस्वीर निकालकर देखने लगा पीले रंग के सूट में लाल फूलों वाला दुपट्टा लगाए एक 20-22 साल की लड़की की तस्वीर थी जिसमे उसकी मुस्कान उस तस्वीर को ओर आकर्षक बना रही थी अमर अपलक उस तस्वीर को देखता रहा और धीरे से कहा,"ये तस्वीर तुम्हारी तरफ से दिया आखरी तोहफा था सुमि जब तुमने कहा था कि इस जिंदगी में हम फिर मिलेंगे ,, लेकिन तुमसे दोबारा मुलाकात इस तरह , इन हालातों में होगी मैने सोचा नही था "
अमर काफी देर तक उस तस्वीर को हाथ मे लिए खड़े रहा कुछ देर बाद ही दरवाजे पर दस्तक हुई जगन्नाथ खड़ा था उसने कहा,"क्यों भाई अमर आज नाश्ता नही करना , चलो सब आ चुके है !"
जगन्नाथ की आवाज सुनकर अमर अपने वर्तमान में लौट आया और तस्वीर को वापस किताब में रख दिया और जगन्नाथ के साथ कमरे से बाहर चला आया
हॉल में सभी बुजुर्ग ओर महिला बुजुर्ग शामिल थे वही वह , दम्पति अनुज ओर सुनिधि थे सभी अपना अपना नाश्ता लेकर बैठ गए , अमर भी अपनी प्लेट लेकर बैठ गए लेकिन उसकी कमजोर आंखे सामने बैठी महिलाओं में सुमि को ढूंढ रही थी पर वो वहां नही थी अमर को चुपचाप देखकर जगन्नाथ ने कहा,"अरे भई खाओ , सुबह से कहा खोए हो ?
"ह्म्म्म",कहते हुए अमर खाने लगा
अनुज ने देखा सुमित्रा वहां नही है तो उसने सुनिधि से कहा,"सुनिधि आज सुबह जो माताजी आई थी वो यहां नही है "
"अनुज वे थोड़ा परेशान है , उन्हें ये समझने में थोड़ा वक्त लगेगा की अब वो इस ओल्डएज होंम का हिस्सा है ! उनके बच्चों ने उनके साथ जो भी किया उस से उनका मन काफी आहत है",सुनिधि ने उदास होकर कहा
"तुम उनका ख्याल रखो , मैं सुनील (रसोईया) से कहकर उनके लिए नाश्ता उनके कमरे में ही भिजवा देता हूं",अनुज ने कहा
"उसकी जरूरत नही है अनुज मैं ले जाऊंगी ",सुनिधि ने कहा और नाश्ता लेकर वहां से चली गयी
नाश्ता करने के बाद अमर बरामदे में आया उसने महिला विभाग की ओर नजर दौड़ाई सुमि उसे नही दिखी , उसने इधर उधर देखा तो पाया बगीचे में बनी बेंच पर सुमि खामोशी से बैठी है उसकी उदास आँखे ओर मुरझाया चेहरा बया कर रहा था अमर के कदम उस ओर बढ़ गए वह बगीचे में आया , और बैंच के दूसरे किनारे पर बैठ गया सुमि अब भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी उसे अमर के आने का अहसास ही नही हुआ अमर काफी देर खामोश बैठा रहा और फिर हिम्मत करके कहा - सुमि मैं अमर मुझे पहचाना नही क्या ?
अमर की आवाज सुनकर सुमित्रा ने उसकी ओर देखा लेकिन खामोश रही उसकी खामोशी अमर को एक टिस पहुंचा रही थी उसने सुमि को देखा चेहरे पर अब पहले जैसा नूर नही था , ना आंखो में पहले जैसी चमक थी फूलों सा नाजुक चेहरा झुर्रियों से फीका पड़ चुका था गले की हड्डियां बाहर झांकने लगी थी ,, हाथ कमजोर पड़ चुके थे , बालो से सफेदी झड़ रही थी अमर को अपनी ओर देखता पाकर सुमि वहां से उठकर जाने लगी कुछ कदम चली ओर रुक गयी , शायद कुछ कहना चाहती थी लेकिन जबान ने उसका साथ नही दिया अमर बेंच से उठा और कहा - मैं जानता हूं तुमने मुझे पहचान लिया है , क्या अब मैं जान सकता हु की तुम यहाँ इस हाल में कैसे ?
"कुछ सवालों के जवाब नही हुआ करते है अमर , मुझे नही पता था मेरी किस्मत में तुमसे फिर से मिलना लिखा होगा",सुमि ने पहली बार कुछ कहा
अमर को इतने सालों बाद सुमि की आवाज सुनकर एक खुशी का अहसास हुआ उसने धीरे से कहा,"क्या मेरा तुम पर अब कोई हक नही है ?"
"वो सब हक 40 साल पहले ही दफन हो चुके है अमर , इस , बेदर्द जिंदगी के कुछ साल ओर बचे है इसमें अब ओर दर्द नही चाहती",उसकी आवाज भर आयी और वह बिना अमर की बात सुने वहां से चली गयी
क्रमशः
कहते है बढ़ती उम्र में इश्क़ हो तो समझ जाना चाहिए , जिंदगी फिर से मुस्कुराना चाहती है
ओल्डएज होम के बरामदे की सीढ़ियों पर बैठे अमर जी सुबह का अखबार पढ़ रहे थे घर के बंटवारे के बाद दोनो बेटों ओर बहुओं के बीच अमर को लेकर झगड़े होते रहते थे जिन्हें देखते हुए अमर ने खुद ही ओल्डएज होंम आने का मन बना लिया यहां उन्हें अपने कुछ पुराने दोस्त भी मिल गए थे जब घर से निकले तो हाथ मे सिर्फ एक बैग था जिसमे कुछ कपड़े और कुछ जरूरी सामान था बेटे बहु ने रोका तक नही ओर इस बात से आहत होकर अमर ने घर वापस ना आने का मन बना लिया पिछले 6 महीनों से वह यही ओल्डएज होंम में थे , खुश थे लेकिन मन मे अभी भी एक खालीपन था अमर के साथ यहाँ 11 लोग ओर थे सभी अपने बच्चों से आहत होकर यहां आए थे इसी ओल्डएज होंम से जुड़कर , एक ओर ओल्डएज होंम था जिसमे बुजुर्ग महिलाएं थी दोनो एक ही घर मे बने थे जिन्हें एक शादीशुदा दम्पति जो कि अनाथ थे वह सम्हाल रहे थे
अखबार में छपी नकारात्मक घटनाएं पढ़कर अमर का मन कुंठित हो उठा उसने अखबार बंद कर दिया और उठकर जाने लगा तभी दरवाजे पर गाड़ी के रुकने की आवाज आई अमर पलटा ओर आंखो पंर नजर का चश्मा लगाकर देखने लगा फीके रंग की साड़ी पहने कोई बुजुर्ग महिला गाड़ी से नीचे उतरी लेकीन अमर उसका चेहरा नही देख पाया उसने देखा महिला के सामने खड़ा लड़का महिला को कुछ समझा रहा था ओर वह बस हा में गर्दन हिलाये जा रही थी कुछ देर बाद लड़के ने उस महिला को एक बैग थमाया ओर गाड़ी में बैठकर वहां से चला गया महिला अंदर आयी जैसे जैसे वह आगे बढ़ी उसे देखकर अमर का दिल धड़कने लगा आंखे भय और पीड़ा से भर आईं , वह एकटक सामने से आती महिला लो देखता रहा 40 साल बाद वह उसके सामने इन हालातों में होगी ऐसा अमर ने सोचा नही था जैसे ही महिला अमर के सामने आई अमर ने काँपते हुए स्वर में कहा - सुमि तुम यहां ?
महिला ने अमर की ओर देखा उस आवाज को वह बखूबी पहचानती थी उसकी आंखो में पीड़ा के भाव उभर आये और वह बिना अमर से कुछ कहे महिला विभाग की तरफ चली गईं अमर उसे जाते हुए देखता रहा तभी पीछे से आकार , जगन्नाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुये कहा,"क्या बात है अमर ऐसे क्यों खड़े हो ? कौन है वो महिला ? होंम में नई आई लगता है''
अमर ने अपने दर्द और पीड़ा को आंखो में ही समेट लिया और कहा - हा जगन्नाथ आज एक बार फिर ममता अपने बच्चों पर बोझ बन यहां धकेल दी गयी
अमर अंदर चला गया सुमि याने सुमित्रा वर्मा जिसे अमर जानता था उसे आज इस हालत में देखकर काफी परेशान था उसके मन मे सवालों का अंबार लग गया लेकिन कैसे पूछे ? सुमि ने तो उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया था अपने कमरे में आकर वह यहां से वहां चक्कर काटने लगा , कुछ समझ नही आ रहा था क्या करे ? दिमाग मे सैंकड़ो सवाल आ जा रहे थे ओर सीने में एक पीड़ा का अहसास हो रहा था जिसे अमर खुद से दूर नहीं कर पा रहा था थककर वह बिस्तर पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा
"सुमि यहां क्या कर रही है ? उसने कहा था शादी के बाद वह हमेशा खुश रहेगी फिर आज इन हालातो में वो यहां कैसे ? उसके पति , बच्चे घर बार आखिर इन सबके होते हुए वो अकेले , वो भी ओल्डएज होंम में बीते 40 सालों में ऐसा क्या हुआ होगा सुमि के साथ ? उसने कभी बताया भी तो नही ना जाने क्या क्या हुआ होगा ? किन परेशानियों से गुजरी होगी वो ,,छः मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है आखिर इतने सालों में मैंने उस के बारे में कभी जानने की कोशिश , तक नही की ,,
अमर की पीड़ा अब गुस्से में बदल चुकी थी अमर उठा और अलमारी में रखे अपने बैग को बाहर निकालकर बिस्तर पर रखा बैग में रखे कपड़े ओर सामान निकालकर बाहर फेकने लगे जैसे कुछ ढूंढ रहे हो आखिर में एक किताब मिली अमर ने जल्दी से उस किताब को खोला और पन्ने पलटने लगा पन्नो के बीच रखी तस्वीर निकालकर देखने लगा पीले रंग के सूट में लाल फूलों वाला दुपट्टा लगाए एक 20-22 साल की लड़की की तस्वीर थी जिसमे उसकी मुस्कान उस तस्वीर को ओर आकर्षक बना रही थी अमर अपलक उस तस्वीर को देखता रहा और धीरे से कहा,"ये तस्वीर तुम्हारी तरफ से दिया आखरी तोहफा था सुमि जब तुमने कहा था कि इस जिंदगी में हम फिर मिलेंगे ,, लेकिन तुमसे दोबारा मुलाकात इस तरह , इन हालातों में होगी मैने सोचा नही था "
अमर काफी देर तक उस तस्वीर को हाथ मे लिए खड़े रहा कुछ देर बाद ही दरवाजे पर दस्तक हुई जगन्नाथ खड़ा था उसने कहा,"क्यों भाई अमर आज नाश्ता नही करना , चलो सब आ चुके है !"
जगन्नाथ की आवाज सुनकर अमर अपने वर्तमान में लौट आया और तस्वीर को वापस किताब में रख दिया और जगन्नाथ के साथ कमरे से बाहर चला आया
हॉल में सभी बुजुर्ग ओर महिला बुजुर्ग शामिल थे वही वह , दम्पति अनुज ओर सुनिधि थे सभी अपना अपना नाश्ता लेकर बैठ गए , अमर भी अपनी प्लेट लेकर बैठ गए लेकिन उसकी कमजोर आंखे सामने बैठी महिलाओं में सुमि को ढूंढ रही थी पर वो वहां नही थी अमर को चुपचाप देखकर जगन्नाथ ने कहा,"अरे भई खाओ , सुबह से कहा खोए हो ?
"ह्म्म्म",कहते हुए अमर खाने लगा
अनुज ने देखा सुमित्रा वहां नही है तो उसने सुनिधि से कहा,"सुनिधि आज सुबह जो माताजी आई थी वो यहां नही है "
"अनुज वे थोड़ा परेशान है , उन्हें ये समझने में थोड़ा वक्त लगेगा की अब वो इस ओल्डएज होंम का हिस्सा है ! उनके बच्चों ने उनके साथ जो भी किया उस से उनका मन काफी आहत है",सुनिधि ने उदास होकर कहा
"तुम उनका ख्याल रखो , मैं सुनील (रसोईया) से कहकर उनके लिए नाश्ता उनके कमरे में ही भिजवा देता हूं",अनुज ने कहा
"उसकी जरूरत नही है अनुज मैं ले जाऊंगी ",सुनिधि ने कहा और नाश्ता लेकर वहां से चली गयी
नाश्ता करने के बाद अमर बरामदे में आया उसने महिला विभाग की ओर नजर दौड़ाई सुमि उसे नही दिखी , उसने इधर उधर देखा तो पाया बगीचे में बनी बेंच पर सुमि खामोशी से बैठी है उसकी उदास आँखे ओर मुरझाया चेहरा बया कर रहा था अमर के कदम उस ओर बढ़ गए वह बगीचे में आया , और बैंच के दूसरे किनारे पर बैठ गया सुमि अब भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी उसे अमर के आने का अहसास ही नही हुआ अमर काफी देर खामोश बैठा रहा और फिर हिम्मत करके कहा - सुमि मैं अमर मुझे पहचाना नही क्या ?
अमर की आवाज सुनकर सुमित्रा ने उसकी ओर देखा लेकिन खामोश रही उसकी खामोशी अमर को एक टिस पहुंचा रही थी उसने सुमि को देखा चेहरे पर अब पहले जैसा नूर नही था , ना आंखो में पहले जैसी चमक थी फूलों सा नाजुक चेहरा झुर्रियों से फीका पड़ चुका था गले की हड्डियां बाहर झांकने लगी थी ,, हाथ कमजोर पड़ चुके थे , बालो से सफेदी झड़ रही थी अमर को अपनी ओर देखता पाकर सुमि वहां से उठकर जाने लगी कुछ कदम चली ओर रुक गयी , शायद कुछ कहना चाहती थी लेकिन जबान ने उसका साथ नही दिया अमर बेंच से उठा और कहा - मैं जानता हूं तुमने मुझे पहचान लिया है , क्या अब मैं जान सकता हु की तुम यहाँ इस हाल में कैसे ?
"कुछ सवालों के जवाब नही हुआ करते है अमर , मुझे नही पता था मेरी किस्मत में तुमसे फिर से मिलना लिखा होगा",सुमि ने पहली बार कुछ कहा
अमर को इतने सालों बाद सुमि की आवाज सुनकर एक खुशी का अहसास हुआ उसने धीरे से कहा,"क्या मेरा तुम पर अब कोई हक नही है ?"
"वो सब हक 40 साल पहले ही दफन हो चुके है अमर , इस , बेदर्द जिंदगी के कुछ साल ओर बचे है इसमें अब ओर दर्द नही चाहती",उसकी आवाज भर आयी और वह बिना अमर की बात सुने वहां से चली गयी
क्रमशः