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Romance आ अब लौट चले

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Guest
Romance आ अब लौट चले

कहते है बढ़ती उम्र में इश्क़ हो तो समझ जाना चाहिए , जिंदगी फिर से मुस्कुराना चाहती है

ओल्डएज होम के बरामदे की सीढ़ियों पर बैठे अमर जी सुबह का अखबार पढ़ रहे थे घर के बंटवारे के बाद दोनो बेटों ओर बहुओं के बीच अमर को लेकर झगड़े होते रहते थे जिन्हें देखते हुए अमर ने खुद ही ओल्डएज होंम आने का मन बना लिया यहां उन्हें अपने कुछ पुराने दोस्त भी मिल गए थे जब घर से निकले तो हाथ मे सिर्फ एक बैग था जिसमे कुछ कपड़े और कुछ जरूरी सामान था बेटे बहु ने रोका तक नही ओर इस बात से आहत होकर अमर ने घर वापस ना आने का मन बना लिया पिछले 6 महीनों से वह यही ओल्डएज होंम में थे , खुश थे लेकिन मन मे अभी भी एक खालीपन था अमर के साथ यहाँ 11 लोग ओर थे सभी अपने बच्चों से आहत होकर यहां आए थे इसी ओल्डएज होंम से जुड़कर , एक ओर ओल्डएज होंम था जिसमे बुजुर्ग महिलाएं थी दोनो एक ही घर मे बने थे जिन्हें एक शादीशुदा दम्पति जो कि अनाथ थे वह सम्हाल रहे थे

अखबार में छपी नकारात्मक घटनाएं पढ़कर अमर का मन कुंठित हो उठा उसने अखबार बंद कर दिया और उठकर जाने लगा तभी दरवाजे पर गाड़ी के रुकने की आवाज आई अमर पलटा ओर आंखो पंर नजर का चश्मा लगाकर देखने लगा फीके रंग की साड़ी पहने कोई बुजुर्ग महिला गाड़ी से नीचे उतरी लेकीन अमर उसका चेहरा नही देख पाया उसने देखा महिला के सामने खड़ा लड़का महिला को कुछ समझा रहा था ओर वह बस हा में गर्दन हिलाये जा रही थी कुछ देर बाद लड़के ने उस महिला को एक बैग थमाया ओर गाड़ी में बैठकर वहां से चला गया महिला अंदर आयी जैसे जैसे वह आगे बढ़ी उसे देखकर अमर का दिल धड़कने लगा आंखे भय और पीड़ा से भर आईं , वह एकटक सामने से आती महिला लो देखता रहा 40 साल बाद वह उसके सामने इन हालातों में होगी ऐसा अमर ने सोचा नही था जैसे ही महिला अमर के सामने आई अमर ने काँपते हुए स्वर में कहा - सुमि तुम यहां ?

महिला ने अमर की ओर देखा उस आवाज को वह बखूबी पहचानती थी उसकी आंखो में पीड़ा के भाव उभर आये और वह बिना अमर से कुछ कहे महिला विभाग की तरफ चली गईं अमर उसे जाते हुए देखता रहा तभी पीछे से आकार , जगन्नाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुये कहा,"क्या बात है अमर ऐसे क्यों खड़े हो ? कौन है वो महिला ? होंम में नई आई लगता है''

अमर ने अपने दर्द और पीड़ा को आंखो में ही समेट लिया और कहा - हा जगन्नाथ आज एक बार फिर ममता अपने बच्चों पर बोझ बन यहां धकेल दी गयी

अमर अंदर चला गया सुमि याने सुमित्रा वर्मा जिसे अमर जानता था उसे आज इस हालत में देखकर काफी परेशान था उसके मन मे सवालों का अंबार लग गया लेकिन कैसे पूछे ? सुमि ने तो उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया था अपने कमरे में आकर वह यहां से वहां चक्कर काटने लगा , कुछ समझ नही आ रहा था क्या करे ? दिमाग मे सैंकड़ो सवाल आ जा रहे थे ओर सीने में एक पीड़ा का अहसास हो रहा था जिसे अमर खुद से दूर नहीं कर पा रहा था थककर वह बिस्तर पर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा

"सुमि यहां क्या कर रही है ? उसने कहा था शादी के बाद वह हमेशा खुश रहेगी फिर आज इन हालातो में वो यहां कैसे ? उसके पति , बच्चे घर बार आखिर इन सबके होते हुए वो अकेले , वो भी ओल्डएज होंम में बीते 40 सालों में ऐसा क्या हुआ होगा सुमि के साथ ? उसने कभी बताया भी तो नही ना जाने क्या क्या हुआ होगा ? किन परेशानियों से गुजरी होगी वो ,,छः मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है आखिर इतने सालों में मैंने उस के बारे में कभी जानने की कोशिश , तक नही की ,,

अमर की पीड़ा अब गुस्से में बदल चुकी थी अमर उठा और अलमारी में रखे अपने बैग को बाहर निकालकर बिस्तर पर रखा बैग में रखे कपड़े ओर सामान निकालकर बाहर फेकने लगे जैसे कुछ ढूंढ रहे हो आखिर में एक किताब मिली अमर ने जल्दी से उस किताब को खोला और पन्ने पलटने लगा पन्नो के बीच रखी तस्वीर निकालकर देखने लगा पीले रंग के सूट में लाल फूलों वाला दुपट्टा लगाए एक 20-22 साल की लड़की की तस्वीर थी जिसमे उसकी मुस्कान उस तस्वीर को ओर आकर्षक बना रही थी अमर अपलक उस तस्वीर को देखता रहा और धीरे से कहा,"ये तस्वीर तुम्हारी तरफ से दिया आखरी तोहफा था सुमि जब तुमने कहा था कि इस जिंदगी में हम फिर मिलेंगे ,, लेकिन तुमसे दोबारा मुलाकात इस तरह , इन हालातों में होगी मैने सोचा नही था "

अमर काफी देर तक उस तस्वीर को हाथ मे लिए खड़े रहा कुछ देर बाद ही दरवाजे पर दस्तक हुई जगन्नाथ खड़ा था उसने कहा,"क्यों भाई अमर आज नाश्ता नही करना , चलो सब आ चुके है !"

जगन्नाथ की आवाज सुनकर अमर अपने वर्तमान में लौट आया और तस्वीर को वापस किताब में रख दिया और जगन्नाथ के साथ कमरे से बाहर चला आया

हॉल में सभी बुजुर्ग ओर महिला बुजुर्ग शामिल थे वही वह , दम्पति अनुज ओर सुनिधि थे सभी अपना अपना नाश्ता लेकर बैठ गए , अमर भी अपनी प्लेट लेकर बैठ गए लेकिन उसकी कमजोर आंखे सामने बैठी महिलाओं में सुमि को ढूंढ रही थी पर वो वहां नही थी अमर को चुपचाप देखकर जगन्नाथ ने कहा,"अरे भई खाओ , सुबह से कहा खोए हो ?

"ह्म्म्म",कहते हुए अमर खाने लगा

अनुज ने देखा सुमित्रा वहां नही है तो उसने सुनिधि से कहा,"सुनिधि आज सुबह जो माताजी आई थी वो यहां नही है "

"अनुज वे थोड़ा परेशान है , उन्हें ये समझने में थोड़ा वक्त लगेगा की अब वो इस ओल्डएज होंम का हिस्सा है ! उनके बच्चों ने उनके साथ जो भी किया उस से उनका मन काफी आहत है",सुनिधि ने उदास होकर कहा

"तुम उनका ख्याल रखो , मैं सुनील (रसोईया) से कहकर उनके लिए नाश्ता उनके कमरे में ही भिजवा देता हूं",अनुज ने कहा

"उसकी जरूरत नही है अनुज मैं ले जाऊंगी ",सुनिधि ने कहा और नाश्ता लेकर वहां से चली गयी

नाश्ता करने के बाद अमर बरामदे में आया उसने महिला विभाग की ओर नजर दौड़ाई सुमि उसे नही दिखी , उसने इधर उधर देखा तो पाया बगीचे में बनी बेंच पर सुमि खामोशी से बैठी है उसकी उदास आँखे ओर मुरझाया चेहरा बया कर रहा था अमर के कदम उस ओर बढ़ गए वह बगीचे में आया , और बैंच के दूसरे किनारे पर बैठ गया सुमि अब भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी उसे अमर के आने का अहसास ही नही हुआ अमर काफी देर खामोश बैठा रहा और फिर हिम्मत करके कहा - सुमि मैं अमर मुझे पहचाना नही क्या ?

अमर की आवाज सुनकर सुमित्रा ने उसकी ओर देखा लेकिन खामोश रही उसकी खामोशी अमर को एक टिस पहुंचा रही थी उसने सुमि को देखा चेहरे पर अब पहले जैसा नूर नही था , ना आंखो में पहले जैसी चमक थी फूलों सा नाजुक चेहरा झुर्रियों से फीका पड़ चुका था गले की हड्डियां बाहर झांकने लगी थी ,, हाथ कमजोर पड़ चुके थे , बालो से सफेदी झड़ रही थी अमर को अपनी ओर देखता पाकर सुमि वहां से उठकर जाने लगी कुछ कदम चली ओर रुक गयी , शायद कुछ कहना चाहती थी लेकिन जबान ने उसका साथ नही दिया अमर बेंच से उठा और कहा - मैं जानता हूं तुमने मुझे पहचान लिया है , क्या अब मैं जान सकता हु की तुम यहाँ इस हाल में कैसे ?

"कुछ सवालों के जवाब नही हुआ करते है अमर , मुझे नही पता था मेरी किस्मत में तुमसे फिर से मिलना लिखा होगा",सुमि ने पहली बार कुछ कहा

अमर को इतने सालों बाद सुमि की आवाज सुनकर एक खुशी का अहसास हुआ उसने धीरे से कहा,"क्या मेरा तुम पर अब कोई हक नही है ?"

"वो सब हक 40 साल पहले ही दफन हो चुके है अमर , इस , बेदर्द जिंदगी के कुछ साल ओर बचे है इसमें अब ओर दर्द नही चाहती",उसकी आवाज भर आयी और वह बिना अमर की बात सुने वहां से चली गयी

क्रमशः
 
सुमित्रा के जाने के बाद अमर उसे जाते हुए देखता रहा और फिर वापस अपने कमरे में चला आया मन में उथल पुथल थी सुमि का उस से इस तरफ बात करना उसे संमझ नही आ रहा था जबकि आखरी मुलाकात में सुमि ने कहा था,"जिंदगी में अगर कभी किसी मोड़ पर सामना हुआ तो हम अच्छे दोस्तो की तरह मिलेंगे"

अमर बेचैनी से कमरे में यहां से वहां घूमने लगा कि सामने पडी कुर्सी से उसका पैर टकराया ओर उस पर रखा उनका चश्मा नीचे आ गिरा जिसमें दरार आ गयी अमर ने उसे उठाया तो चश्मे का पुराना शीशा चरमरा कर गिर गया अमर उसे देखने लगा ये काफी पुराना चश्मा था उनके पास लेकिन आज ये भी जवाब दे गया उन्होंने टुकड़ो को उठाया और जोड़ने की कोशिश करने लगा तभी उधर से गुजरते हुए , अनुज ने देखा तो उनकी ओर चला आया और उनके हाथ मे टूट हुआ चश्मा देखकर कहा,"अरे अमर अंकल , लाइये मुझे दीजिए मैं बाहर ही जा रहा हु ठीक करवा देता हूं"

"अरे नही बेटा , ये ठीक है मैं इसे जोड लेता हूं",अमर ने कहा

"अरे अंकल ये कैसे जुड़ेगा इसके एक साइड का शीशा तो पूरा खराब हो चुका ओर दूसरा टूट गया मैं सुनिधि की दवाइयां लेने बाहर जा रहा हु लाइये मैं सही करवा देता हूं",अनुज ने अपनेपन से चश्मा लेकर देखते हुए कहा

"नही बेटा तुम खामखा परेशान हो रहे हो , फिजूलखर्ची होगी ",अमर ने कहा

"लो इसमें कैसी फिजूलखर्ची , आप कोई पराए थोड़े हो ,, अगर आपने अब ना कहा तो मैं बुरा मान जाऊंगा",अनुज ने कहा तो अमर मुस्कुरा उठा और हामी भर दी अनुज चश्मा लेकर वहां से चला गया अमर बाहर बरामदे की सीढ़ियों पर आकर बैठ गया उसे कुछ महीनों पहले की घटना याद आ गयी

********* कुछ काम करते हुए अमर ने चश्मा उतार कर बिस्तर पर रखा और अपना काम करने लगा तभी उनका 10 साल का पोता भागते हुए आया और बिस्तर पर चढ़ गया लेकिन जैसे ही वह बिस्तर पर चढ़ा वहां रखे अमर के चश्मे पर पोते का पैर पड़ गया और चश्मे का शीशा टूट गया ये , देखते ही पोते ने घबराकर कहा,"आई एम सॉरी दादाजी , प्लीज मम्मी पापा को मत बताइएगा वरना वो मुझे बहुत डाटेगे प्लीज दादाजी प्लीज दादाजी"

अमर ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा ओर कहा,"हम्म , नही कहूंगा जाओ खेलो"

बच्चा वहां से चला गया अमर ने चश्मे को देखा वो टूट गया था उसने उसे साइड में रख दिया अगले दिन जब अमर का बेटा विकास ऑफिस जा रहा था तो अमर ने उसे चश्मा देते हुए कहा,"बेटा ये चश्मा जरा टूट गया है , इसे ठीक करवा दोगे ?"

विकास जो कि पहले ही झुंझलाया हुआ था उसने कहा,"मैं ऑफिस का काम करू या फिर आपका चश्मा ठीक करवाता फिरूँ आप तो दिनभर घर मे पड़े रहते है मुझे दिन में ना जाने कितने ही लोगो से मिलना जुलना लगा रहता है "

"संमझ सकता हु बेटा लेकिन क्या करूँ चश्मे के बिना अखबार में छपे बारीक अक्षर दिखाई नही देते",अमर ने धीरे से कहा

"दो चार दिन अखबार नही पढ़ेंगे तो कौनसा कुछ हो जाएगा ? सुबह सुबह दिमाग खराब मत कीजिये ये रोज का है आपका कभी कुछ चाहिए कभी कुछ ,, अभी पिछले महीने ही मैंने आपको नए चप्पल लेकर दिए थे पैसे क्या पेड़ पर उगते है ! कुछ दिन काम चला लीजिए फिर बनवा दूँगा नया चश्मा",विकास ने गुस्से से कहा और वहां से चला गया , अमर की आंखो में नमी तैर गयी जिस बच्चे की जरूरतें ओर ख्वाहिशें पूरी करते वक्त अमर ने कभी बजट नही देखा आज वही बेटा उन्हें पैसे की अहमियत समझा रहा था अमर चुपचाप वापस अपने कमरे में चले आये और चश्मे को देखने लगे कुछ देर बाद उनका पोता दौड़ता हुआ आया और ग्लू की बोतल देकर कहा - ये लीजिए दादाजी इस से आपका चश्मा वापस चिपक जाएगा

बच्चे की बात सुनकर अमर मुस्कुरा दिया और चश्मे को चिपकाने लगा , उस से वह कामचलाऊ तो बन ही गया लेकिन उसके बाद न कभी अमर ने चश्मे का जिक्र किया ना ही विकास ने वह चश्मा कभी ठीक करवाया *********

अमर पुरानी यादो में खोया था तभी सामने से मोहनराव आता दिखाई दिया उसके हाथ मे रंगीन डिब्बा था जिसे अमर के सामने खोलकर उसने कहा - लो अमर मिठाई खाओ

अमर ने एक टुकड़ा मिठाई का उठाया और कहा,"ये किस खुशी में मोहनराव ?"

"आज मेरे बेटे का जन्मदिन है , अभी अभी घर का नोकर मिठाई देकर गया है भगवान उसे लंबी उम्र दे",मोहनराव ने बगल में बैठते हुए कहा

अमर ने सुना तो गुस्से से उसकी भँवे तन गयी और उसने कहा,"जिस बेटे ने तुम्हे यहां मरने के लिए छोड़ दिया उस बेटे , के जन्म की खुशियां मना रहे हो तुम ?"

मोहनराव मुस्कुराया ओर कहा - क्या फर्क पड़ता है अमर आखिर है तो अपने ही बच्चे तुम मिठाई खाओ

"फर्क क्यों नही पड़ता मोहनराव , आज के दिन भी वह तुमसे मिलने नही आया बस नोकर के हाथ मिठाई का डिब्बा भेज दिया हुंह कैसा जमाना आ गया है जिम्मेदारियों को बच्चे अब बोझ समझने लगे है क्या उनके पास हमसे मिलने को 5 मिनिट भी नही है ?",अमर के होंठ गुस्से से कांप रहे थे

"गुस्सा मत करो अमर उसने याद रखा इतना ही काफी है अपनी ही औलाद से भला कैसी नफरत ?",मोहनराव ने भावुक होकर कहा

अमर ने मिठाई का टुकड़ा वापस डिब्बे में रखा और उठकर जाने लगा जाते जाते रुका ओर पलटकर कहा - ऐसी औलाद से तो अच्छा हम बेऔलाद रहते

अमर वहां से चला गया कुछ ही दूर खड़ी सुमित्रा खामोशी से सब देख रही थी मोहनराव ने जाते हुए अमर को देखा ओर फिर खुशी खुशी सबको मिठाई खिलाने लगा ऐसा ही था ये ओल्डएज होंम जहां बच्चों के बुरे व्यवहार के बाद भी ये बुजुर्ग उनकी सलामती की दुआ कर रहे थे

सुमित्रा अपने कमरे में चली आयी उनके कमरे में राधा और सुरुपा नाम की दो औरते ओर थी सुमित्रा खामोशी से , आकर अपने बिस्तर पर बैठ गयी और खिड़की के बाहर देखने लगी बाहर सड़क पर एक ठेले वाला कांच की चूड़ियां बेंच रहा था उन रंग बिरंगी चूड़ियों को देखकर सुमित्रा का मन अतीत में भटकने लगा

*********
 
सुमित्रा अपने हाथ मे कांच की चूड़ियां पहने आई और अपने दोनो हाथों को अमर के सामने करते हुए कहा,"कैसी है मेरी चूड़ियां ?"

"सुमि तुम ये कांच की चूड़ियां क्यो पहनती हो ? किसी दिन तुम्हारे हाथों को घायल कर देंगी ये",अमर ने बेचैनी से कहा

"ये मैं इसलिये पहन्नती हु क्योकि ये बहुत प्यारी आवाज करती है",सुमित्रा ने अपने दोनो हाथों की चूड़ियों को बजाकर कहा

अमर ने उसके दोनो हाथों को थाम लिया और कहा,"लेकिन ये तो सिर्फ कांच की चूड़ियां है , हमारी शादी के बाद मैं तुम्हे सोने कि चूडिया बनवाकर दूंगा , जो कि आवाज भी करेंगी और तुम्हारे हाथों को नुकसान भी नही पहुंचायेगी"

"क्या सच मे ?",सुमित्रा ने आंखो में चमक भरते हुए कहा

"हा सच मे , बस कल से तुम ये कांच की चूड़ियां मत पहनना",अमर ने कहा

"अच्छा तो फिर कर लो शादी और पहना दो सोने के कंगन",सुमित्रा ने कहा और वहां से भाग गई ******

, चूड़ी वाले कि आवाज कानो में पडी तो सुमित्रा की तन्द्रा टूटी ओर सहसा ही उसका ध्यान अपने हाथों पर गया जिसमें कुछ कांच वाली चूड़ियां थी जिनका रंग फीका पड़ चुका था

उन चूड़ियों को देखते हि मन फिर अतीत में भटक गया पति की मौत के कुछ दिन बाद उसके हाथों में सोने के कंगन देखकर उसकी बहु ने कहा - माजी इस उम्र में ये कंगन आपके हाथों में शोभा नही देते , आप इन्हें निकालकर कुछ सिंपल चूड़ियां पहन लीजिए

बहु के कहने पर सुमित्रा ने वो कंगन निकाल दिए लेकिन सिंपल चूड़ियों के नाम पर उसे ये कांच की चूड़ियां मिली जो आज भी इन हाथों में थी

उसकी आंखो में आंसू भर आये चूड़ी वाले कि आवाज उसके कानों को पीडा पहुंचा रही थी उसने आंसू पोछे ओर खिड़की बंद कर दी
 
अमर ओर सुमित्रा दोनो की जिंदगी में दर्द था लेकिन दोनो ही एक दूसरे के दर्द से अनजान थे अमर सुमित्रा ही क्या बल्कि उस ओल्डएज होम में रहने वाले सभी लोगो की कोई न कोई कहानी थी जिसके चलते वे सब यहां थे पुरुष विभाग में 12 लोग थे और महिला विभाग में 9 महिलाएं ,इन सबकी अपनी अपनी दर्दभरी कहानियां थी , अपनी उन कड़वी यादों को भुलाकर सभी यहां अपनी बची खुची जिंदगी जी रहे थे कुछ यहां खुश थे तो कुछ अभी भी अपने बच्चों के बारे में परेशान थे उन्ही में से दो लोग थे जो एक दूसरे को वहां देखकर हैरान थे और वो थे अमर ओर सुमित्रा

दोपहर के खाने के बाद सभी अपने अपने कमरों में सुस्ताने लगे अमर के कमरे में मोहनराव ओर जगन्नाथ रहते थे , अमर को खोया हुआ देखकर मोहन ने कहा - क्यो भाई अमर सुबह से कहा खोए हो ?

, अमर ने कोई जवाब नही दिया मोहन ने जगन्नाथ की ओर देखा तो उसने कंधे उचका दिए मोहनराव बडा ही खुशमिजाज इंसान था उसने आगे कहा - लगता है अपनी किसी महिलामित्र के खयालो में खोए हो इस उम्र में ये सब शोभा कहा देता है अमर ?

मोहनराव की बात सुनकर जगन्नाथ हसने लगा , अमर भी मुस्कुरा दिया और उठकर बाहर आंगन में चला आया , आंगन में पंछियों को देखकर उन्होंने पास ही पड़े बर्तन से अनाज उठाकर उनके बीच डाल दिया पंछियों की मधुर आवाज ने उसकी बेचैनी को थोड़ा कम किया तो वह वही पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गया और उन्हें देखने लगा तभी उसका ध्यान पास ही एक पंछी पर गया जिसका एक पैर धागे में उलझ गया था और वह उस से छूटने की कोशिश कर रहा था अमर उठा और पंछी के पास आया और बड़े आराम से उसके पैर में फंसा धागा निकालने लगा धागा निकालकर उन्होंने उसे आसमान में उड़ा दिया जैसे ही पंछी आसमान में उड़ा अमर की यादें उसे चालीस साल पीछे ले गयी

अपनी फूलों की दुकान पर बैठा अमर फूलों पंर पानी छिड़क रहा था पीछे पिंजरे में बंद तोता बार बार आवाज कर रहा था जिसे अमर की माँ ने पकड़ा था और अब अच्छी कीमत पर उसे बेचने वाली थी उसकी आवाज सुनकर अमर ने , उसकी ओर देखा उसकी आंखों में कैद होने का दर्द था जिसे देखकर अमर पिघल गया उसने पिंजरा खोला और उसे बाहर निकाल कर आसमान में उड़ा दिया जैसे ही तोता हवा में उड़ा पीछे से अमर की माँ चिल्लाई - ये क्या किया तूने , उसे आजाद कर दिया उस से अच्छे खासे पैसे मिल जाते हमे

"माफ करना माँ उसकी जान पैसे से ज्यादा कीमती है , इसे खरीदने वाला या तो इसे हमेशा के लिए पिंजरे में बंद रखता या फिर इसे पकाकर खा जाता इसलिए मैने उसे छोड़ दिया",अमर ने कहा ।।

"लेकिन बेटा पैसे ----------",माँ कहते कहते रुक गयी

"कोई बात नही माँ पैसे हम ओर कमा लेंगे , आओ दुकान में चलते है आज सोमवार है दर्शनाथी आएंगे और ज्यादा फूल बिकेंगे",अमर ने कहा और माँ के साथ अपनी दुकान में आ गया

गोरखपुर में एक छोटे से गांव में अमर अपनी माँ के साथ रहता था बाप का साया सर से बचपन में ही उठ गया तबसे उसकी माँ ने ही उसे पाल पोसकर बड़ा किया गांव में करने को कुछ नही था इसलिए अमर ने कालिका मंदिर के पास फूलों ओर पूजा के समान की दुकान खोल ली जिस से दो वक्त की रोटी का इन्तजाम हो जाता था दोनो माँ बेटे खुश थे

दुकान पर लोग आने लगे अमर उन्हें फूल और पूजा का सामान देने लगा जैसे कि आज दर्शन करने वाले लोग ज्यादा , थे इसलिए दुकान पर भीड़ लगी हुई थी कुछ देर बाद नरेंद्र वर्मा अपनी पत्नी और बेटी के साथ फूल लेने अमर की दुकान पर आए जैसे ही अमर की नजर लड़की पंर गयी वह उसे देखता ही रह गया सुंदर नैन नक्श , गोरा रंग , काली आंखे ओर ललाट पर एक लाल बिंदी ,सादगी में भी वह बहुत सुंदर लग रही थी

माँ ने देखा अमर खोया हुआ है तो उसे कंधे से झंझोड़ कर कहा,"क्या देख रहा है ? फूल दे उन्हें

ये देखकर लड़की मुस्कुराने लगी अमर ने खिंसिया कर समान बांधा ओर नरेंद्र की ओर बढ़ा दिया पैसे देकर नरेंद्र अपनी पत्नी और बेटी के साथ वहां से चले गए अमर उन्हें जाते हुए देखता रहा लड़की का चेहरा बार बार उसकी आँखों मे आता रहा ,सारा दिन वह उसी के बारे में सोचता रहा ,, रात में ठीक से सो भी नही पाया और उठकर बैठ गया

अगली सुबह अमर जल्दी ही दुकान पर चला आया और उस लड़की का इंतजार करने लगा लेकिन लड़की नही आयी , अब हर रोज अमर उसका इंतजार करता पंर लड़की नही आई बैचैन सा वह रास्ता निहारता रहता अगले दिन सोमवार था और अब तक अमर उम्मीद छोड़ चुका था बेमन से वह फूलों पर पानी छिड़क रहा था तभी एक मीठी सी आवाज उसके कानो में पड़ी - कुछ ताजा फूल और पूजा का सामान दे दीजिए

अमर ने सामने देखा तो उसे विश्वास नही हुआ सामने वही , लड़की खड़ी थी वह एक बार फिर उसकी आँखों मे खो गया कुछ देर बाद लड़की ने कहा - पूजा का सामान

"हा हा एक मिनिट देता हूं",अमर ने हकलाते हुए कहा

लड़की से नजर बचाकर वह समान बांधने लगा बीच बीच मे वह लड़की की ओर देख भी लेता था और लड़की उसे लड़की ने पैसे दिए और समान लेकर वहां से चली गयी

अमर का चेहरा खुशी से खिल उठा अब उसे हर रोज सोमवार का इंतजार रहने लगा बाकी के 6 दिन उसे नागवार गुजरने लगे महीनों निकल गए हर सोमवार लडकी उसकी दुकान पर आती और पूजा का सामान लेकर चली जाती इसके अलावा दोनो में ना कोई बात होती ना ही वह मिलते नजर बचाकर बस एक दूसरे को देख लेते दोनो के बीच एक अनजाना रिश्ता बन चुका था

एक सोमवार की सुबह अमर ने अच्छे अच्छे फूल निकालकर अलग रख दिये ताकि उस लड़की को दे सके , उसकी माँ जैसे ही उन्हें उठाने लगी अमर ने टोकते हुए कहा - अरे माँ माँ ये सामान उस लड़की का है

- किस लड़की का ?

"उसी का जो हर सोमवार यहां से फूल लेती है

- यहां से तो कई लोग फूल लेते है , ये किसका है ?

"अरे माँ जो अकेले आती है , वही लड़की

- बेटा उसका कोई नाम तो होगा ना

अमर सोच में पड़ गया इतने दिनों में उसने कभी उस लड़की , का नाम जानने की कोशिश भी नही की वह मुस्कुरा उठा और कहा - नाम नही पता पंर रहने दो तुम दूसरे फूल चुन लो

माँ उन्हें छोड़कर दूसरे फूल चुनने लगी कुछ देर बाद लड़की आयी अमर ने उसे हमेशा की तरह सामान दीया लड़की पैसे देकर जाने लगी तो अमर ने हिम्मत करके कहा - सुनो , तुम्हारा नाम क्या है ?

लड़की ने बिना पीछे पलटे कहा - नाम जानना हो आज शाम 5 बजे मंदिर के पीछे वाली नदी पर मिलना

लड़की वहां से चली गयी अमर मुस्कुराते हुए उसे जाते हुए देखता रहा शाम को 5 बजे अमर नदी किनारे पहुंचा लेकिन वहां कोई नही था , वह वहां पड़ी एक चट्टान पर बैठकर उसके आने का इंतजार करने लगा , लड़की नही आयी अमर ने कुछ कंकर हाथ मे उठाये ओर उन्हें नदी में फेंकने लगा कुछ देर बाद लड़की वहां आयी उसे देखते ही अमर का चेहरा खिल उठा और धड़कने सामान्य से तेज जिन्हें सामान्य करके अमर ने कहा - तुमने आने में इतनी देर क्यो की ?

''पिताजी घर पर थे बड़ी मुश्किल से निकलकर आये है",लड़की ने अपनी मीठी सी आवाज में कहा

"अच्छा , अब बताओ तुम्हारा नाम क्या है ?",अमर ने कहा

"सुमित्रा , सुमित्रा नाम है मेरा ओर तुम्हारा ?",लड़की ने अपनी पलके झपकाकर कहा

"मेरा नाम अमर है , पहले तुम्हे कभी इस गांव में देखा , नही",अमर ने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा

सुमित्रा कुछ ही दूर पड़े पत्थर पर आ बैठी ओर कहा - मैं इस गांव की नही हु पड़ोस के गांव से हु

"तुम हर सोमवार मंदिर आती हो , भगवान को बहुत मानती हो",अमर ने कहा

सुमित्रा हंस पड़ी और कहा - मैं यहां तुम्हारे लिए आती हु मंदिर तो एक बहाना है तुमसे मिलने का

सुमित्रा की बात सुनकर अमर ने कहा - मतलब ?

"मतलब ये की तुम मुझे अच्छे लगते हो , तुम्हारे प्रति ये भावनाएं कैसी है ये मैं नही जानती पर तुम्हे ना देखु तो एक बेचैनी सी रहती है कई महीनों से तुम्हे देखते आ रही हु पर तुम कभी कुछ कहते ही नही , आज कहा भी तो क्या मेरा नाम पूछा बुद्धू !", कहते हुए सुमित्रा हंस पड़ी हंसते हुए वह बड़ी प्यारी लग रही थी अमर उसे एक टक देखता रहा तो सुमित्रा ने कहा - जबसे आयी हु मैं ही कुछ ना कुछ बोले जा रही हु तुम भी तो कुछ बोलो

"मैं भी तुम्हे पसंद करने लगा हु लेकिन कही मेरी किसी बात से तुम्हारा मन आहत न हो जाये सोचकर कभी कुछ कहा नही आज तुमने आने को कहा तो भरोसा करके चला आया",अमर ने कहा

"तुम्हारी सादगी और तुम्हारा भोलापन इतना भा गया कि मैं खुद को रोक नही पाई मैंने कुछ गलत तो नही किया ना ?",उसने अपनी आंखें झपकाते हुए कहां

, "नही इसमें गलत कैसा कीसी को पसंद करना भला कहा गलत होता है तुम्हारे घर मे कौन कौन है ?",अमर ने कहा

"माँ पिताजी दो बड़े भाई और मैं , ओर तुम्हारे घर मे ?",उसने अपनी चूड़ियों को आगे पीछे करते हुये कहा

"मेरे घर मे सिर्फ माँ और मैं , पिताजी सालों पहले गुजर गए",अमर ने उदास होकर कहा

उसे उदास देखकर सुमित्रा भी उदास हो गयी दोनो वही खामोश बैठे नदी के पानी को देखते रहे कुछ देर बाद दूर से एक लड़की ने सुमित्रा को आवाज दी और चलने का इशारा किया सुमित्रा उठी और अमर से कहा - अब मुझे जाना होगा

"फिर कब आओगी ?",अमर ने कहा

"जब तुम बुलाओगे , आज से हम दोस्त जो है",सुमित्रा ने मुस्कुरा कर कहा

"ठीक है , ध्यान से जाना",अमर ने कहा तो सुमित्रा जाने के लिए आगे बढ़ गयी अमर ने उसे आवाज दी - सुनो

वह पलटी ओर कहा - हा

"आज से मैं तुम्हे सुमि कहकर बुलाऊंगा",अमर ने कहा

"ठीक है ",उसने कहा ओर वहां से चली गयी अमर वही खड़े उसे देखता रहा
 
अमर-------अमर------अमर

आवाज कानों में पड़ी तो अमर वर्तमान में लौट आया और देखा सामने खड़े मोहनराव उसे आवाज दे रहे थे अमर उनके पास आया ओर कहा - क्या बात है मोहन ?

मोहनराव ने एक रुकी सी सांस ली और कहा - बाहर तुम्हारा बेटा तुम्हे लेने आया है

.......................................

अमर ने जब सुना कि उसका बेटा उसे लेने आया है तो उसे गुस्से के साथ साथ हैरानी भी हुई वह अनुज के ऑफिस नुमा कमरे में आया और वहां अपने दोनो बेटों को एक साथ देखकर चौंक गया , उन्हें देखते ही अनुज ने कहा - अमर अंकल आपके बेटे आपसे मिलने आये है आप बैठिए मैं आप सब लोगो के लिए चाय भिजवाता हु !

"उसकी जरूरत नही है अनुज , इनसे कहो यहां से चले जाएं",अमर ने गुस्से से कहा

''लेकिन क्यो पापा ? मैंने ओर भैया ने एक नई कंपनी खोली है उसी की खुशी में शाम को घर पर पार्टी है ,, सभी मेहमान आएंगे आप वहां होंगे तो अच्छा लगेगा",अमर के छोटे बेटे रवि ने कहा

"ओह्ह तो मेहमानों के बीच तुम्हारी बेइज्जत नही हो इसलिए आज बाप की याद आ गईं",अमर ने कहा

, "ऐसी बात नही है पापा सब आपसे मिलना चाहेंगे तो उन्हें हम क्या कहेंगे ? चलिए आप चाहे तो कल सुबह ही यहां वापस आ जाना",बड़े बेटे विकास ने कहा

"कितने स्वार्थी हो चुके हो तुम लोग , नही आना मुझे अब यही मेरा घर है और यही मेरे अपने !",अमर ने कहा और कमरे से बाहर निकल गया गुस्सा इतना आ रहा था कि अभी के अभी दोनो को धक्के मारकर यहां से निकाल दे वैसे ही जैसे उन्हें निकाला गया था अपने ही घर से लेकिन अमर ऐसा नही कर सका विकास और रवि ने अनुज से रिक्वेस्ट की के वो अमर को समझाए लेकिन अमर ने किसी की नही सुनी निराश रवि ओर विकास अपनी गाड़ी में आकर बैठ गए

"पापा ने तो हमे बेइज्जत करने की ठान ली है ,कितना कहा लेकिन देखो वे आने को तैयार नही है ",विकास ने स्टीयरिंग पर हाथ मारते हुए कहा

"हा भैया आखिर ऐसा क्या कर दिया हमने उनके साथ ? यहां आने का फैसला भी तो उनका ही था ना फिर वो ऐसा क्यों कर रहे ?",रवि ने कहा

"कुछ भी हो रवि लेकिन हमें उन्हें आज की पार्टी में लाना ही होगा वरना मिस्टर मित्तल से हमे वो डील कैसे मिलेगी ?",विकास ने सोचते हुए कहा

"लेकिन कैसे ? क्या करे ?",रवि ने कहा

"घी जब सीधी उंगली से ना निकले तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है",कहकर विकास ने सामने पड़ी पानी की बोतल से , पानी निकाला और अपनी आंखो को भिगो लिया , उसने बोतल रवि की ओर बढ़ाकर कहा,"ये ले तू भी आंखे गीली कर ले और चल मेरे साथ !"

"लेकिन इस से क्या होगा ? ",रवि ने आंखो में पानी मारते हुए कहा

"दुनिया में ऐसा कोई बाप नही बना जो बच्चों के आंसू देखकर न पिघले",विकास ने गाड़ी से नीचे उतरते हुए कहा और रवि के साथ एक बार फिर ओल्डएज होंम चला लाया अमर उस वक्त पौधों में पानी दे रहे थे विकास और रवि उनके पास आये ओर दुखी स्वर में कहने लगे,"चलिए ना पापा बच्चों से हमने प्रॉमिस किया है कि आपको साथ लेकर आएंगे , आप नही चलेंगे तो वे लोग दुखी होंगे "

उनके मुंह से बच्चों का नाम सुनकर ओर उनकी आंखो में आंसू देखकर अमर का दिल पिघल गया लेकिन अभी भी उसके मन मे गुस्सा भरा था इसलिए वह वहा से चले गए लेकिन सामने से आती सुमित्रा को देखकर रूक गये

सुमित्रा ने दोनो लड़को के उदास चेहरे देखकर अमर से कहां - नसीब वाले हो अमर जो बच्चे लेने आये है तुम्हे जाना चाहिए

आज पहली बार था जब सुमित्रा ने खुद अमर से बात की थी अमर ने अपना मन शांत किया तो महसूस हुआ कि उसे भी बच्चों की याद आ रही थी कुछ दिनों से , उसने सुमित्रा की ओर देखकर कहा - हम्म्म्म

, सुमित्रा वहां से चली गयी ओर अमर अपना झोला लेने अंदर चला गया कुछ देर बाद वह अपने एक जोड़ी कपड़े को झोले में डालकर ले आया और विकास रवि के साथ घर के लिए निकल गया

घर पहुंचा तो देखा घर को बहुत सजा रखा था , सारा घर जगमगा रहा था अमर को देखते ही उसके दोनो पोते ओर पोती दौड़ते हुए उसके पास चले आये बहुओ ने बेमन से उनके पैर छुए ओर तैयार होने चली गयी पार्टी शाम को थी इसलिय अमर भी बच्चों के साथ उनके कमरे में चला आया और सुस्ताने लगा यहां आकर बच्चों से मिलकर उसे बहुत खुशी हुई अमर घर को निहारने लगा , एक एक ईंट लगाकर उसने ये घर बनाया था लेकिन आज इसी घर पर उसका कोई हक नही था यहां आने के बाद बहुओं ने खाना तो दूर पानी तक नही पूछा उन्हें ,, अमर ने किसी से कुछ नही कहा बस शाम का इंतजार था

पार्टी मे सभी बड़े बड़े लोग शामिल हुए , सबने चमचमाते कपड़े पहने थे इन सबके बिच अमर को अपना सफेद कुर्ता पजामा थोड़ा अजीब ही लगा जो कि अब पुराना हो चला था विकास के बॉस जब उनसे मिले तो उन्होंने कहा - क्या ये तुम्हारे पापा है ? लगता है किसी गरीबखाने से उठकर आये है !"

"दरअसल सर वो पापा जमीन से जुड़े आदमी है ना इसलिए , इन्हें ऐसे ही रहना पसन्द है ,, मै तो अक्सर कहता हु सोसायटी के साथ मिल जुलकर रहो लेकिन ये सुनते ही नही है ,, आइए मैं आपको कुछ और मेहमानों से मिलाता हु ",कहते हुए विकास उन्हें वहां से ले गया अमर अपमान का घूंट पीकर रह गए

उस भीड़ में उनका दम घुटने लगा था , वे वहां से साइड में चले आये पार्टी शुरू हुई तो खत्म होने का नाम ही नही ले रही थी 11 बज रहे थे लेकिन खाना शुरू नही हुआ था , सभी बस शराब का लुफ्त उठा रहे थे यहां तक के रवि ओर विकास की पत्नियां भी ये देखकर अमर को बहुत ठेंस पहुंची भूख से उनकी आंते कुलबुलाने लगी उन्होंने एक प्लेट उठाई और उसमे कुछ खाना रखकर सीढ़ियों की साइड आकर बैठ गये एक निवाला तोड़कर जैसे ही उन्होने मुंह की ओर बढ़ाया छोटी बहू ने आकर उनका हाथ पकड़कर रोकते हुई कहा - ये क्या कर रहे है आप ? मेहमानों ने अभी तक खाना शुरू भी नही किया और आप यहां खाने बैठ गए , जरा भी शर्म नही है आप मे थोड़ी देर नही खाओगे तो मर नही जाओगे !"

बहु के मुंह से ऐसी बाते सुनकर अमर अवाक था उसने कहा - बहु मुझे भूख लगी थीं दोपहर से कुछ खाया नही था इसलिए ,, माफ करना !"

"हुंह थोड़ी देर में खा लेना जितना खाना है",कहते हुए बहु ने प्लेट छीन ली अमर उस से कुछ कहते इस से पहले ही , विकास आया और उनकी बाँह पकड़कर कहा,"इस हाल में पार्टी में क्यों आये ? मेरी कितनी बेइज्जती हुई वहा जानते है आप ? आपकी तो कोई इज्जत नही कम से कम हमारे बारे में तो थोडा ख्याल किया होता अपने कमरे में जाओ खाना वही भिजवा दूंगा मैं"

बेबस अमर क्या कहता ? उसके पास बोलने के लिए कुछ नही था जिस खुशी से वह आया था अब वह खुशी धूमिल हो चुकी थी , बिना कुछ कहे ही अमर वहां से बच्चों के कमरे में चला आया तीनो बच्चे सो चुके थे , अमर आकर बिस्तर पर बैठ गया मन भारी हो चुका था ,, उसे बीते वक्त की यादों ने घेर लिया

"एक चपाती ओर लीजिए ना",अमर की पत्नी शांति ने थाली में चपाती रखते हुए कहा

"अरे नही शांति , पेट भर चुका तुम भी खाना खा लो बैठो",अमर ने कहा

"आपसे पहले मैं खाना कैसे खा सकती हूं ? आप इस घर के मुखिया है , पहले आपको खाना चाहिए और वक्त पर खाना चाहिए",शांति ने पानी का ग्लास उनकी ओर बढ़ाकर कहा

"तुम हो ना शांति वक्त पर खिलाने के लिए",अमर ने कहा

"मैं ना भी रही तब भी हमारे बच्चे आपको वक्त पर ही खाना खिलाएंगे ओर इस से भी अच्छा अच्छा",शांति ने कहा

,

अमर वर्तमान में लौट आया कमरे में इधर उधर नजर दौड़ाई ओर देखा तो टेबल पर नजर गयी जहां पानी का जग रखा हुआ था अमर में ग्लास मे पानी उड़ेला ओर एक सांस में पी गया लेकिन पानी से भुख कहा मिटती है , वे बच्चों के बगल में लेट गए , घंटा बीत गया लेकिन किसी ने अमर के लिए खाना नही भेजा अमर ने एक बार फिर पानी पीकर भूख मिटानी चाही ओर लेट गया उसकी आँखों से आंसू बह गए और मन ही मन कहा

"बच्चे वक्त से खिला रहे है शांति"

क्रमशः
 
अमर उस रात खाली पेट ही सो गया पार्टी देर रात तक चलती रही और सभी खा पीकर अपने अपने घर चले गए सुबह अमर जल्दी उठ गया और नहा धोकर बाहर आया दोनो बेटे बहुओं के साथ नाश्ता कर रहे थे नोकर ने उनके लिए भी नाश्ता लगा दिया अमर ने नाश्ता करने से मना कर दिया और कहा - कल रात तुम लोगो ने जो बर्ताव किया है उसके बाद यहां बैठकर खाना मेरे लिये मेरा अपमान है ,, इस से अच्छा तुम लोग मुझे वापस अनाथाश्रम छोड़ आओ "

अमर की बातों से गुस्सा साफ झलक रहा था

"ठीक है पापा छोड़ आएंगे लेकिन उस से पहले हमे आप से एक छोटा सा काम है ववो कर दीजिए",विकास ने हाथ पोछते हुए कहा

"कैसा काम ?",अमर की आँखे फैल गयी

विकास के इशारे पर रवि कुछ कागज ले आया और अमर , को देकर कहा - मैंने ओर भैया ने ये घर बेचने का फैसला किया है

अमर ने जैसे ही सुना उसका दिल धक से रह गया उन्होंने कागज पढ़े और दोनो बेटों की ओर देखकर कहा - ओह्ह तो इसलिए तुम दोनो को कल अपने बूढ़े बाप पर तरस आ गया था मैंने ये घर तुम दोनो के नाम करके बहुत बडी गलती की थी और आज तुम इसे बेचने की बात कर रहै हो ,, इस घर की एक एक ईंट मैंने अपने इन्ही हाथों से लगाई है मेरे जीते जी मैं ये कभी नही होने दूंगा समझे तुम लोग"

अमर ने कहते हुए पेपर दोनो बेटों के मुंह पर दे मारे , विकास और रवि का चेहरा तमतमा उठा विकास ने गुस्से से कहा - आप पागल हो गए है क्या ? एक डील के बदले हमने ये घर बेचना तय किया है ,, वैसे भी हम ओर हमारा परिवार फ्लैट्स में रहेगा आखिर रखा क्या है इस घर मे ? चुपचाप इन कागजो पंर साइन कीजिये"

अमर ने क्रोधभरी नजर से विकास को देखा और कहने लगे - अब तक मैं तुम लोगो की खुशी के लिए चुपचाप सब सुनता रहा , जो तुम लोगो ने चाहा करता रहा लेकिन अब नही क्या रखा है इस घर मे ये तुम पूछ रहे हो विकास ? (कहते कहते भावुक हो जाते हैं अमर) इस घर से तुम्हारी माँ की यादे जुड़ी है , तुम दोनो का बचपन जुड़ा है , इस घर को बनाने संवारने में मैंने अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी और आज तुम कहते हो इस घर मे रखा क्या है ? इतने ओछे , संस्कार तो ना दीये थे मैंने"

"पर पापा जब माँ ही नही है तो उनकी यादों का क्या ?",बड़ी बहू ने कहा

अमर को पीड़ा हुई तो वह बोल पड़े - क्या अपने माँ पिता के लिए भी तुम्हारे यही विचार है बहु ?

"पापा जी ?",बड़ी बहू चिल्लाई

"क्यों बुरा लगा ? शांति मेरी पत्नी है मुझे कितना बुरा लगा होगा , कान खोल कर सुन लो चारो जब तक मैं जिंदा हु इस घर की एक ईंट तक नही हिलेगी समझे तुम लोग ,, फिर इसके लिए चाहे मुझे अपनी ही औलाद के खिलाफ क्यो ना जाना पड़े "

अमर का गुस्सा देखकर सभी शांत हो गए , अमर ने दिवार पर लगी अपनी पत्नी की तस्वीर को उतारा और लेकर जाने लगे तो पोते पोतियों ने उनके पैरो से लिपटकर रोते हुए कहा - मत जाईये ना दादाजी

उनके आंसू देखकर अमर का दिल भर आया उन्होंने उनके आंसू पोछे ओर कहा - इस घर से मेरा बसेरा कब का उठ चुका है मेरे बच्चों बस इतना याद रखना जो तुम्हारे माँ बाप ने किया वो तुम कभी उनके साथ मत करना

अपने दोनो बेटों के लालच को रौंदकर अमर वहां से निकल गया आंखो में आंसू भर आये सड़क तक पैदल ही चले आये वहां से ओल्डएज होंम के लिए बस मिल जाती थी , अमर में जेब में हाथ डालकर देखा सिर्फ 50 रुपये का एक फटा पुराना नोट मिला , किराया 35 रुपये था अमर ने वही पास की दुकान से चाय ली और एक डिब्बा बिस्किट लेकर खाने लगा बेचारगी ओर बेबसी के भाव उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहे थे कुछ देर बाद बस आयी अमर उसमें चढ़ गया और खाली सीट देखकर बैठ गया कुछ देर बाद के महिला अपनी 10 साल की बेटी के साथ आई और अमर की बगल में बैठ गयी अमर खिड़की से बाहर देखने लगा बस चलती रही अचानक अमर की नजर बच्ची के हाथों पर गयी उसके हाथों में रंग बिरंगी कांच की चूड़ियां देखकर अमर अपने अतीत में खो गया

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सुमित्रा का इंतजार करते हुए अमर नदी किनारे बेचैनी से टहल रहा था दोनो एक दूसरे को बहुत पसंद करते थे और घंटो यहां बैठकर बाते किया करते थे अमर कमाने के लिए शहर जा रहा था उसे शहर की एक मिल में काम जो मिल गया था लेकिन जाने से पहले वह सुमित्रा से मिलना चाहता था और इसलिए उसका इंतजार कर रहा था । कुछ देर बाद सुमित्रा आती दिखाई दी तो उसके जान में जान आयी सुमित्रा अपने हाथ मे कांच की चूड़ियां पहने आई और अपने , दोनो हाथों को अमर के सामने करते हुए कहा,"कैसी है मेरी चूड़ियां ?"

"सुमि तुम ये कांच की चूड़ियां क्यो पहनती हो ? किसी दिन तुम्हारे हाथों को घायल कर देंगी ये",अमर ने बेचैनी से कहा

"ये मैं इसलिये पहन्नती हु क्योकि ये बहुत प्यारी आवाज करती है",सुमित्रा ने अपने दोनो हाथों की चूड़ियों को बजाकर कहा

अमर ने उसके दोनो हाथों को थाम लिया और कहा,"लेकिन ये तो सिर्फ कांच की चूड़ियां है , हमारी शादी के बाद मैं तुम्हे सोने कि चूडिया बनवाकर दूंगा , जो कि आवाज भी करेंगी और तुम्हारे हाथों को नुकसान भी नही पहुंचायेगी"

"क्या सच मे ?",सुमित्रा ने आंखो में चमक भरते हुए कहा

"हा सच मे , बस कल से तुम ये कांच की चूड़ियां मत पहनना",अमर ने कहा

"अच्छा तो फिर कर लो शादी और पहना दो सोने के कंगन",सुमित्रा ने कहा

"तुम्हारे लिए ही शहर जा रहा हु ताकि तुम्हारे लायक बन तुम्हारे पिताजी से शादी के लिए तुम्हारा हाथ मांग सकू , तुम मेरा इंतजार करोगी न सुमि ?",अमर ने उसकी आंखो में देखते हुए कहा

''हा अमर , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी अभी चलती हु किसी से देख लिया तो परेशानी हो जाएगी कहते हुए सुमित्रा वहां से भाग गई

, अमर मुस्कुराते हुए उसे देखता रहा , अगले दिन अमर शहर के लिए निकल गया

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अचानक गाड़ी को ब्रेक लगा तो अमर अपने वर्तमान में लौट आया बच्ची के हाथों में कांच वाली चूड़ियां अभी भी चमक रही थी अमर ने ऑंखे बंद कर सर सीट से लगा लिया कुछ देर बाद बस रुकी ओर शांति की तस्वीर ओर अपना सामान सम्हाले अमर नीचे उतर गया ओल्ड ऐज होंम पास ही में था अमर हताश ओर निराश चलते हुए आया उसके कानो में बेटों के नफरत भरे लफ्ज गूंज रहे थे गेट से अंदर आते हुए कुछ ही दूर चला कि लड़खड़ा के गिर गया सुमित्रा पास ही कुछ काम मे लगी थी जब उसने देखा तो दौड़कर आयी और अमर को सहारा देकर उठाते हुए कहा - तुम ठीक तो हो ना अमर ?

"ह्म्म्म हा , हा",अमर ने हांफते हुए कहा सुमित्रा ने उसे बरामदे में बैठाया ओर उसका सामान लाकर रखा शांति की तस्वीर उठाई उसका शीशा टूट चुका था तस्वीर लेकर वह अमर के पास आई ओर कहा - ये तस्वीर ?

"ये तस्वीर मेरी पत्नी शांति की है , कुछ साल पहले ही उसका देहांत हो गया !",अमर ने फ़ोटो पर लगी धूल साफ करते हुए कहा

, ये सुनकर सुमित्रा को एक अजीब सी पीड़ा का अहसास हुआ और उसने कहा - कल तुम्हारे जाने के बाद मुझे लगा कि तुम खुशनसीब हो तुम्हारे बच्चे तुम्हे लेने आये लेकिन आज तुम्हे यहां देखकर अच्छा नही लग रहा है तुम भले खुशनसीब ना हो लेकिन वो बच्चे सच मे बदनसीब है अमर जिन्होंने तुम्हारा साथ छोङ दिया

अमर ने सुमित्रा के चेहरे की ओर देखा जो दुख और पीड़ा से भर उठा था आज भी उसकी सुमि की आंखो में उसके लिए अपनापन था अमर की आंख से आंसू बहकर शांति की तस्वीर पर आ गिरे

क्रमशः
 
अमर को उदास बैठा देखकर सुमित्रा कुछ ही दूरी पर बैठ गई और कहा - तुम ऐसे तो ना थे अमर , हमेशा हसने मुस्कुराने वाले , जिंदादिली की बाते करने वाले आदमी थे फिर आज बच्चों के सामने इतने कमजोर क्यो पड़ गए ?

सुमि की बातों में अपने लिए परवाह देखकर अमर ने अपनी आंखों का गीलापन साफ किया और कहने लगा - सालों पहले तुम्हारी शादी की बात सुनकर मैं पहली बार कमजोर पड़ा था सुमि , उस वक्त कुछ समझ नही आ रहा था उस वक्त मैं इतना सक्षम था की तुम्हारी जिम्मेदारी उठा सकता था लेकिन तुम नही चाहती थी कि तुम्हारे पिता का अपमान हो , उन्हें किसी के सामने सर झुकाना पड़े तुम्हारा आखरी फैसला सर आँखों पर था और मैं हमेशा हमेशा के लिए चला गया कुछ वक्त बाद अपने ही दूर के रिश्ते में एक लड़की से मेरा रिश्ता तय हो गया शांति नाम था उसका उसने मुझे पसंद कर लिया ,, मै उस वक्त टूटा हुआ था इसलिए मेरी , पसंद से कोई फर्क नही पड़ता मैंने इसे ही अपनी किस्मत मान लिया शादी के बाद शांति मेरे घर रहने लगी मैं हर वक्त उस से कटा कटा सा रहता था पर उसने कभी शिकायत नही की ओर फिर मुझे एहसास हुआ कि अपने टूटे मन के चलते मैं उस भली औरत की भावनाओ को ठेस पहुंचा रहा हु मैंने उसे अपना लिया और अपना पति धर्म निभाने लगा तुम हमेशा मेरे मन मे रही क्योकि हमारा रिश्ता अपवित्र नही था मैने शांति को तुम्हारे बारे में बताया तो वह तुमसे मिलने की जिद करने लगी लेकिन तुम कहा थी मैं नही जानता था (एक गहरी सांस लेता है और कुछ देर की खामोशी के बाद फिर बोलने लगता है)

वक्त सभी जख्म भर देता है सुमि , धीरे धीरे मैं अपने गृहस्थ जीवन मे व्यस्त हो गया माँ के खत्म होने के बाद गांव से हमेशा के लिए शहर आ गया यहां मेहनत से अपना घर बनाया जिसमे मैं शान्ति और मेरे दोनो बच्चे खुशी खुशी जिंदगी जी रहे थे वक्त गुजरता गया बच्चे बड़े होने लगे अच्छी लड़कीया देखकर उनका रिश्ता तय किया शादी की कुछ साल बाद ही मुझे दादा बनने का सुख प्राप्त हुआ और उस वक्त मुझे लगा जैसे मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान हु लेकिन ज्यादा खुशियों को भी हम इंसानों की नजर लग जाती है एक बीमारी के चलते शांति का देहांत हो गया बच्चों में झगड़े न हो इसके चलते मैंने उनके बीच बटवारा कर दिया पर मैं भूल गया था कि ये बंटवारा जमीन , और पैसे का नही बल्कि मेरा था कुछ महीने बड़े बेटे के घर तो कुछ महीने छोटे बेटे के घर रहने लगा धीरे धीरे मेरा अस्तित्व खत्म होने लगा था बेटों ओर बहुओं के असली रंग दिखने लगे थे जलील करना , ताने देना , मुझे बार बार ये अहसास दिलाना की मैं उन पर अब बोझ बन चुका हूं मुझे अंदर ही अंदर काटने लगा था मैं उनके साथ होकर भी नही था सब छूट चुका था दोस्त , घर , मेरे अपने जो सिर्फ कहने को मेरे अपने थे जब सह नही पाया तो उन दोनों के घर को छोड़कर मैं यहां चला आया ( कहते कहते रुक गया उसकी आंखो में नमी तैर गयी , आंसुओ को आंखो में ही रोक लिया ओर आगे कहने लगा ) यहां आकर अपनो के किये बुरे बर्ताव को भूलने की कोशिश करने लगा पंर जब तुम्हे देखा तो मन फिर पीड़ा से भर गया ,तुम्हे यहां इस तरह इस हाल में देखूंगा मैंने कभी सोचा नही था सुमि ,, उस शाम जाने से पहले तुमने कहा था कि तुम हमेशा खुश रहोगी लेकिन अगर सच मे तुम खुश थी तो फिर यहां कैसे ?"

अपनी बात खत्म कर अमर सुमि की ओर देखने लगा अमर की कहानी सुन सुमित्रा की आंखो में आंसू थे जिन्हें देखकर अमर ने कहा - संमझ गया तुम्हारे साथ भी बेटे और बहुओं ने ऐसा ही किया होगा , ये आजकल की लड़कियां समझती क्यो नही ? जितना प्यार ये अपने माँ पिता से करती है उतना सास ससुर से क्यो नही ? बुजुर्गों के वृद्धाश्रम होने की सबसे बड़ी वजह ये बहुये ही है सुमि वरना कोई भी बेटा अपनी माँ , को वृद्धाश्रम नही भेजेगा

उनकी बातों से गुस्सा साफ झलक रहा था सुमि को चुप देखकर आगे कहने लगे - कभी कभी मैं सोचता हूं कि बेटों से अच्छा काश मुझे एक बेटी होती तो आज सुख दुख में मेरे साथ होती

अमर की इस बात पर सुमि का दिल पीड़ा से भर गया और उसने कहा - नही अमर , सब बेटियां ऐसी नही होती है अगर बेटियों में ये भावना होती तो वो कभी अपने सास ससुर को यहां नही भेजती , बहुओं से पहले बेटियों को ये सिखाना बहुत जरूरी है ताकि आगे चलकर जब वो बहु बने तो ऐसा कुकृत्य नही करे "

"मैं कुछ समझा नही सुमि",अमर ने कहा

"कैसे समझोगे अमर तुम किसी बेटी के बाप जो नही हो ?",सुमि ने गीली आंखो को पोछते हुए कहा और वहां से चली गयी

अमर अपनी कहानी तो सुमि को सुना दी पंर सुमि के बारे में नही जान सका , सुमि कुछ खुलकर बताना नही चाहती थी और अमर पूछकर उसे ओर दुखी करना नही चाहता था अमर अपना सामान लेकर कमरे में चला आया उसे देखकर जगन्नाथ ओर मोहनराव उसके पास आये और कहा - तुम तो घर गए थे वापस कैसे चले आये ?

"वो घर अपना था ही कब मोहनराव , अब यही मेरा घर है और तुम सब मेरे अपने हो ! बची खुची ये जिंदगी तुम सबके , साथ बितानी है",अमर ने कहा तो जगन्नाथ उसके गले आ लगा और कहा - तू अकेला कहा है रे अमर हम सब है ना तेरे साथ ,, चल चलकर कुछ खा ले"

तीनो कमरे से बाहर चले आये और नाश्ता करने चले गए सामने से आते अनुज ने देखा तो उनके पास चले आया और कहा - अरे अमर अंकल आ गए आप , चलिए पहले कुछ खा लीजिए फिर आप सबके लिए एक खुशखबरी है

सबके नाश्ता करने के बाद अनुज ने सभी को हॉल में इकट्ठा किया ओर कहने लगा - आप सभी काफी दिनों से यहां है और आपसे मुझे ओर सुनिधि को बहुत प्यार मिला है , हम दोनों तो अनाथ थे पंर आप लोगो ने वह कमी भी पूरी कर दी ,, आज आप सबको मैं एक खुशखबरी देना चाहता हु वो ये की मैंने ओर सुनिधि ने आप सबके नाम से पेंशन फॉर्म भरा है अबसे हर महीने सरकार की तरफ से आपको 500 रूपये महीना मिलेंगे और वो आपके होंगे , उन्हें आप जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकते है "

सबने सुना तो उनके चेहरे पर खुशी आ गयी लेकिन अमर ने कहा - नही बेटा वो सब पैसे आप ओर सुनिधि जी रखिये , आप दोनो हम सबके लिए इतना कर रहै है वो ही बहुत है बेटा

"हा अमर सही कह रहा है",सबने अमर की बात का समर्थन किया

, अनुज अमर के पास आया और उनका हाथ दोनो हाथों में थामकर कहा - अंकल आपने जो प्यार जो अपनापन मुझे ओर सुनिधि को दिया है उसके सामने ये पैसे कुछ भी नही है , माँ बाप के प्यार का कर्ज इंसान एक जन्म में भला कैसे उतार सकता है ? मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं आप सबके लिए कुछ कर पाया

अमर ने अनुज को गले लगा लिया और कहा - अगर सारे बेटे तुम जैसे हो जाये तो दुनिया मे कही कोई वृद्धाश्रम नही होगा बेटा

क्रमशः
 
ओल्ड ऐज होंम में अब खुशी का माहौल था अनुज ओर सुनिधि को माँ बाप मिल चुके थे और बुजुर्गों को सहारा अमर ओर सुमि में थोड़ी थोड़ी बाते होने लगी थी उन्हें साथ देखकर मोहनराव ओर जगन्नाथ अक्सर अमर को छेड़ते नजर आते थे सुमित्रा सुबह शाम पौधों में पानी देने बगीचे की देखभाल करती थी अनुज ओर सुनिधि ने उन्हें मना करना चाहा लेकिन सुमित्रा ने कहा कि वह अपनी खुशी से ये सब करती है सुमित्रा को देख बाकी लोगो ने भी कुछ ना कुछ काम करना शुरू कर दिया ,, कोई सब्जियां काटने में मदद करता तो कोई बाजार से सामान ले आता ओल्डएज होंम एक हंसता खेलता घर बन चुका था जहां सभी एक दूसरे की देखभाल करते थे अपने अपने दुखों को भूलकर सभी खुश थे

एक शाम अमर जगननाथ ओर मोहन बैठे थे तभी मोहन ने , कहा - भाई अमर क्या अब भी तुम्हारे मन मे सुमित्रा के लिए भावनाएं है

अमर - ये कैसा सवाल है ?

मोहन - बस मैं जानना चाहता था , तुम दोनो का यहा आना कोई संजोग नही है क्या पता किस्मत फिर से तुम्हे मिलाना चाहती हो

जगन्नाथ - हा भाई जानना तो मैं भी चाहता हु , काफी दिनों से देख रहा हु की एक अदृश्य रिश्ता है तुम दोनो के बिच

अमर - ये आज कैसी बचकानी बातें कर रहे हो तुम दोनो , सुमि के लिए मेरे मन मे कोई गलत भावनाएं नही है , ना तब थी ना अब है

मोहन - हम लोग कब कह रहे है कि तुम्हारी भावनाएं गलत है देखो अमर तुम ओर सुमित्रा दोनो एक दुशरे को जानते हो उम्र के इस पड़ाव में चाहो तो एक दूसरे का साथ दे सकते हो हम तुम्हारी शादी करवाएंगे , क्यो जगन ?

जगन्नाथ - बात तो तुम्हारी सही है मोहन ,, वैसे भी दोस्त होकर इतना तो करना बनता है

उनकी बातें सुनकर अमर खीज उठा ओर कहा - कैसी बाते कर रहे हो दोनो ? ना तो मैं 20 साल का युवक हु ओर ना ही ये सब सोचने की मेरी उम्र ,, सुमि के सामने भूल से भी ऐसी बात मत करना तुम समझे

मोहन - अरे भाई मजाक कर रहे है पर जरा सोचो तुम्हे ओर सुमित्रा को बुढ़ापे में सहारा मिल जाएगा सालों पहले जो , प्यार अधूरा रह गया था वो पूरा हो जाएगा आखिर में तुम दोनो के पास भले कुछ न हो कम से कम एक दूसरे को सुनने का वक्त तो रहेगा

जगन्नाथ - सबकी किस्मत में ये नही होता है अमर तुम चाहो तो इस रिश्ते को एक नया मोड़ दे सकते हो आगे तुम्हारी मर्जी

अमर अपनी जगह से उठा और कहा - मुझे इस बारे में कोई बात नही करनी

कहकर अमर वहां से चला गया मोहन ओर जगन वही बैठे रहे जानते थे अमर बहुत जिद्दी इंसान है लेकिन दोनो उसकी ओर सुमित्रा की जिंदगी में खुशियां लाना चाहते थे वे लोग सही कर रहै थे या गलत ये तो कोई नही जानता था लेकिन उन्हें ये करना था अमर के लिए बुजुर्ग होकर भी दोनो 20-22 साल के लड़को की तरह बात कर रहे थे

शाम की पूजा संध्या के समय सभी इकट्ठा हुए अमर हाथ जोड़े भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि सुमि की जिंदगी में खुशियां लौट आये और वह खुश रहे उधर सुमि का मन अभी भी अमर को लेकर पीड़ा से भरा हुआ था उसने पहली बार अमर की आंखो में आंसू देखे थे शादी के बाद उसने कभी अमर की सुध नही ली ये सोचकर वह बहुत दुखी थी

आरती समाप्ति के बाद सभी खाना खाने चले आये यहां , मौजूद लोगों में एक साफ सुथरा रिश्ता था सभी एक दूसरे की इज्जत करते और अपना धर्म निभाते

खाना खाने के बाद अमर अपने कमरे में चला आया मोहन ओर जगन कि बातों ने उसे बहुत परेशान कर दिया था उसे नींद नही आई तो वह बाहर बरामदे में चला आया सीढ़ियों पर बैठा वह अपने अतीत में खोया था कि तभी किसी के गिरने की आवाज आई अमर ने आवाज वाली दिशा में देखा तो उसके होश उड़ गए सीढ़ियों के पास कुछ ही दूर सुमि नीचे जमीन पर गिरी हुई थी अमर ने उसे देखा उठाने की कोशिश की लेकिन सुमि तब तक बेहोश हो चुकी थी उसकी नाक से खून बह रहा था अमर ने अनुज को आवाज लगाई कुछ ही देर में सभी दौड़ते हुए आये सुनिधि ने एम्बुलेंस वाले को फोन किया सभी बहुत घबरा गए थे अमर ने मजबूती से सुमि के हाथ को थामा हुआ था और उसका सर अमर के घुटने पर था अनुज लगातार सुमि के पैरों के तलवो को मसल रहा था कुछ देर बाद एम्बुलेंस आयी तो अनुज , मोहनराव ओर अमर सुमित्रा को लेकर एम्बुलेंस में आ बैठे कुछ ही देर में एम्बुलेंस हॉस्पिटल पहुंची सुमित्रा को स्ट्रेक्चर पंर लेटाया ओर अंदर ले जाने लगे इस बीच अमर ने उसका हाथ नही छोड़ा , नर्स स्ट्रेचर को अंदर ले जाने लगी तब। अमर का हाथ धीरे धीरे सुमि के हाथ से छूटने लगा और उस वक्त उन्हें उसी पीड़ा का अहसास हो रहा था जो सालों पहले हुआ था जब वह सुमित्रा से आखरी बार मिला था

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**************

शहर से लौटने के बाद अमर नदी किनारे खड़ा अपनी सुमि का इंतजार कर रहा था जब सुमि वहा आयी तो उसके चेहरे पर खुशी के बजाय उदासी के भाव थे सुमि अमर के सामने आकर चुपचाप खड़ी हो गयी तो अमर ने चहकते हुए उसके हाथो को पकड़कर कहा - देखो सुमि शहर से मैं तुम्हारे लिए सोने के कंगन लाया हूं अब तुम्हे ये कांच की चूड़ियां पहनने की जरूरत नही पड़ेगी

लेकिन अगले ही पल सुमि के हाथों में लगी मेहंदी देखकर अमर हैरान रह गया और कहा - सुमि ये सब , मैं समझा नही "

सुमि की आंखो से आँसू बहने लगे उसने कहा - मुझे माफ कर दो अमर पिताजी ने मेरी शादी किसी से तय कर दी है

"तुमने उन्हें मेरे बारे में नही बताया ?",अमर ने हैरानी से कहा

""बताया था लेकिन तुम दूसरी जाती से हो , ओर पिताजी इस रिश्ते को कभी स्वीकार नही करेंगे उन्होंने साफ मना कर दिया",सुमित्रा ने रोते हुए कहा

"तो चलो अभी हम शादी कर लेते है फिर किसी को हमारे , साथ रहने से ऐतराज नही होगा'',अमर ने मजबूती से सुमित्रा का हाथ थामकर कहा

सुमित्रा ने अपने आंसू पोछे ओर कहने लगी - नही अमर ऐसा किया तो पिताजी की इज्जत खराब होगी और मैं ऐसा कभी नही चाहती , हमारा रिश्ता पवित्र था और हमेशा पवित्र रहेगा ,, हम दोनों कही भी रहे किसी के भी साथ रहे हमेशा खुश रहेंगे "

सुमित्रा की बात सुनकर अमर का दिल टूट गया लेकिन वह सुमि के जज्बातों की कद्र करता था इसलिये उसने वह कंगन सुमित्रा को पहनाते हुए कहा,"यह मेरी आखरी निशानी संमझ कर रख लो सुमित्रा

सुमित्रा कि आंख से आंसू बहने लगे उसने अपने साथ लायी किताब अमर को दे दी दोनो आखरी बार एक दूसरे के गले मिलकर खूब रोये जाते जाते अमर ने सुमित्रा का हाथ थाम लिया और कहा - सुमि क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?

"नही अमर तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे इन कंगनों के रूप में ,चलती हु ज्यादा देर यहां रुकी तो कमजोर पड़ जाऊँगी",कहकर सुमि आगे बढ़ गयी अमर का हाथ। धीरेधीरे उस के हाथ से छूटता रहा

तभी किसी ने आकर उसके कंधे पर हाथ रखा अमर ने चोंककर देखा मोहन खड़ा था अमर अपने अतीत में लौट , आया मोहन ने कहा - चिंता मत करो डॉक्टर साहब आ गये है , उन्हें कुछ नही होगा

अमर सुमि को लेकर बहुत परेशान था तभी डॉक्टर आया और कहा - ब्रेस्ट के कुछ नीचे एक गांठ है जो लगभग फूटने वाली है जल्द से जल्द ऑपरेशन करके उसे निकालना होगा वरना इनकी जान को भी खतरा हो सकता है"

"तो कीजिये किसी भी हालत में उन्हें बचा लीजिए",अमर ने बेचैनी से कहा

अनुज ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा - अंकल मैं बात करता हु

अनुज डॉक्टर की तरफ़ आया और कहा - डॉक्टर आप जल्द से जल्द ऑपरेशन की तैयारी कीजिये ,, उन्हें कुछ नही होना चाहिए !

"ऑपरेशन में डेढ़ लाख का खर्च आएगा , उसके बाद मेडिसिन हॉस्पिटल का चार्ज मिलाकर कुल 2 लाख रुपए ,, आप पैसे जमा करा दीजिए मैं अपनी टीम से कहकर ऑपरेशन की तैयारी करता हु ",डॉक्टर ने कहा

"2 लाख ?",अनुज ने कहा

"पहले इंतजाम कर लीजिए उसके बाद ऑपरेशन होगा",डॉक्टर ने कहा

"इंतजाम हो जाएगा डॉक्टर , आप ऑपरेशन शुरू कीजिए तब तक मैं पैसे लेकर आता हूं ",अनुज ने कहा तो डॉक्टर उसके कंधे पर हाथ रखकर वहां से चला गया

अमर ओर मोहनराव अनुज के पास आये और अमर ने कहा - 2 लाख , पर इतनी बड़ी रकम तुम कहा से लाओगे ?

"आप घबराइए मत मैं इंतजाम करता हु",अनुज ने कहा और हॉस्पिटल से निकल गया ओल्डएज होंम आकर उसमें सुनिधि को बताया सुनिधि ओर अनुज ने तुरंत अपने जमा पैसों को निकाला वो सिर्फ 80000 ही थे , उन्हें देखकर अनुज ने कहा - बाकी पैसे कहा से आएंगे ? आंटी की जान बचाना बहुत जरूरी है

"अनुज तुम ये पैसे जमा करवाओ ताकी उनका इलाज शुरू हो , बाकी के पैसे भी हम लोग अरेंज कर लेंगे",सुनिधि ने कहा

अनुज ने डॉक्टर से रिक्वेस्ट कर आधे पैसे जमा करवाये , ऑपरेशन शुरू हुआ अनुज ने मोहन ओर अमर को भी घर भेज दिया और खुद अपने दोस्तो को मदद के लिए फोन करने लगा पर हर किसी से निराशा ही मिली अनुज को संमझ नही आ रहा था क्या करे ?

उधर अमर पैसे की चिंता में रातभर सो नही पाया उसने आफिस रूम से सुमित्रा के घर वालो का पता लगाया उसका बेटा ओर बेटी इसी शहर में थे अमर बिना किसी को बताये सुबह सुबह ही वहां से निकल गया सुबह के 9 बजे वह सुमित्रा के बेटे के घर पहुंचा वहां जाकर उसने उन्हें सुमित्रा के बारे में बताया लेकिन बेटे बहु को कोई फर्क नही पड़ा यहां तक के बेटे ने तो ये तक कह दिया - मेरे पास उनपर खर्च करने को एक फालतू पैसा नही है ,, उनसे कहो जाकर सरकारी हॉस्पिटल में इलाज करवाये

"जरा भी शर्म नही आई ये कहते हुए , वो माँ जिसने तुम्हे जन्म दिया उसके लिए ऐसी सोच , छः कैसे बेटे हो तुम ?",अमर ने कहा

लड़के को गुस्सा आ गया उसने एक थप्पड़ खींचकर अमर को मारा और घर से बाहर धक्का दे दिया , अमर नीचे आ गिरा लड़के ने उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया अमर को बहुत दुख हुआ कि वह ऐसे इंसान से सुमित्रा के लिए मदद मांग रहा था

उम्मीद की एक किरण बाकी थी वह सुमित्रा की बेटी के घर पहुंचा उसे सुमित्रा के बारे में बताया तो बेटी के शब्दों ने अमर का कलेजा चिर दिया

"मेरी कोई माँ नही है मेरे लिए तो वो तब ही मर गयी थी जब उन्होंने सारी जायदाद अपने बेटे के नाम कर दी ओर मुझे एक फूटी कौड़ी तक नही दी , जाकर उनके बेटे से कहिए ये सब"

"किस मिट्टी के बने हो तुम सब ? क्या तुम्हारे मन मे जरा भी दया भावना नही है ,, वो औरत वहा जिंदगी और मौत से लड़ रही है और तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें",अमर रो पड़ा

"वो मरे या जिये हमे क्या ? , निकलो यहाँ से पता नही सुबह सुबह भीख मांगने कहा से आ जाते है",कहकर लड़की वहां से चली गयी

अमर हताश हो गया उसे खुदसे ज्यादा सुमित्रा के लिए दुख हो रहा था आज समझ आया की सुमित्रा को अपनी बेटी से नफरत क्यो थी ?

वह बेबस सा हॉस्पिटल लौट आया सुमित्रा का ऑपरेशन रात में ही हो चुका था अभी वह बेहोश थी अमर अनुज के पास आया तो अनुज ने कहा - अंकल परेशान मत होइए , आंटी अब ठीक हैं

"लेकिन पैसे ?", अमर ने कहा

"उनका इंतजाम भी हो गया , कुछ पैसे मेरे ओर सुनिधि के पास थे , बाकी पैसों के लिए ओल्डएज होंम को गिरवी रख दिया",अनुज ने कहा

"ये तुमने क्या किया बेटा ? वो तुम्हारी मेहनत थी हमारे लिए उसे गिरवी रख दिया",अमर ने कहा

"अंकल पैसा किसी की जान से बढ़कर नही है , आप बैठिए मैं चाय लेकर आता हूं",अनुज ने कहा और चला गया

अमर बेंच पर बैठ गया उसे बहुत हैरानी हुई एक तरफ उनके बच्चे थे जो इतना गिर चुके है और एक तरफ अनुज था जो बिना किसी मतलब के इन सबके लिए अपना सब कुछ दे रहा था

अनुज चाय ले आया , ओल्डएज से कुछ लोग सुमित्रा से मिलने आये दोपहर तक उन्हें भी होश आया , सभी उनसे मिले लेकिन अमर बिना मिले ही चला गया उसकी हिम्मत नही हो रही थी सुमित्रा से नजर मिलाने की

वह अपने कमरे मे बैठा सुमित्रा के बारे में सोच रहा था उसके बच्चों ने जो बात कही वह मन ही मन उसे पपरेशान कर रही थी

धीरे धीरे सुमित्रा की तबियत में सुधार होने लगा , अनुज ओर सुनिधि अपना सारा काम छोड़कर सुमित्रा की देखभाल में लगे रहे , ओल्डएज होंम का सारा भार अमर ओर मोहनराव पंर आ गया

एक हफ्ते बाद सुमित्रा को घर ले आये सभी उसे देखकर खुश थे अमर भी वही भीड़ में खड़ा था सुमित्रा अपने कमरे में आराम करने चली गयी अनुज अपने ऑफिस चला गया , सुनिधि ऑफिस में बैठकर काम देखने लगी शाम के समय सुमित्रा बगीचे में टहल रही थी तभी अमर उसके पास आया ओर गुस्से से कहा - इतना सब हो गया तुम्हारे साथ तुमने मुझे कभी बताया क्यो नही ?"

"मैं अपनी मर्जी से यहां आयी हु ",सुमित्रा ने नजर बचाते हुए कहा

"मैं तुम्हारे बच्चों से मिल चुका हूं सुमि , क्यों तुम अकेले इस दुख को झेलती रही , क्या एक बार भी तुम्हे मेरी याद नही आई ,, मुझे क्यो नही बताया इस बारे में ?',अमर ने कहा

सुमित्रा ने अमर को पीछे की ओर धक्का देकर कहा - तुम होते कौन हो मुझसे ये सब पूछने वाले ? क्यो बताऊँ मै तुम्हे ये सब , आखिर रिश्ता क्या है हमारा ?"

"क्या हमारा कोई रिश्ता नही है सुमि ?",अमर ने कहा

"यहां से चले जाओ अमर",कहकर सुमित्रा ने पीठ घुमा ली

अमर की आँखों मे आंसू आ गए वह चुपचाप वहां से चला गया रात के खाने पर अमर नही आया वह चुपचाप अपने कमरे में लेते सोच में डूबा था , मन कि पीड़ा चेहरे से साफ झलक रही थी मोहनराव ओर जगन्नाथ कमरे में आये लेकिन अमर को चुप देखकर दोनो अपने अपने बिस्तर पर चले गए रात के 11 बज रहे थे लेकिन अमर जाग रहा था उसे जागता देखकर मोहन ने गुस्से से कहा - तुम्हारी नींदें उड़ाकर वो खुद चैन से सो रही है

अमर ने उसकी ओर नजर घुमाई तो मोहन ने कहा - आज शाम उसने जो कहा सुना मैंने , कितनी मतलबी निकली वो ओर तुम्हे उसकी परवाह थी

अमर उठकर बैठ गया और कहा - वो जाग रही है मोहन

मोहन ने सुना तो खिड़की से बाहर देखने लगा सुमित्रा बरामदे में खड़ी खिड़की की ओर ही देख रही थी

क्रमशः
 
सुमित्रा की तकलीफ अमर समझता था ओर इसी वजह से वह अब सुमित्रा को परेशान करना नही चाहता था अमर उस से दूर रहने लगा सुमि अगर आस पास भी होती तो अमर दूसरी ओर चला जाता सुमित्रा अब पहले आए ज्यादा उदास रहने लगी थी , अमर के साथ किया बर्ताव उसे खल रहा था एक शाम अमर पौधो की साफ सफाई कर रहा था कि सुमित्रा भी आकर उसका हाथ बटाने लगी अमर ने सुमि को वहाँ देखा तो उठकर जाने लगा सुमित्रा उसके सामने आ खड़ी हुई और कहा - मैंने तुम्हें गलत समझा अमर लेकिन मुझे अच्छा नही लगा जब तुम मेरे बच्चों से मिले और मेरे हिस्से की नफरत तुम्हे मिली "

"मुझे इस बात का दुख नही है सुमि दुख सिर्फ इस बात का है कि तुम मुझसे ये सब छुपा रही हो , अपना दुख अकेले जी रही हो क्या मुझे ये सब जानने का कोई हक नही ?",अमर ने कहा

"हक है अमर लेकिन किस मुंह से तुम्हे बताती की मेरे साथ ये सब हो रहा है ? बड़े गर्व से कहा था न मैंने की हम खुश ,रहेंगे लेकिन ऐसा कुछ नही था हम दोनों की जिंदगियों में ",कहते कहते सुमि का गला भर्रा गया

अमर उसे लेकर सीढ़ियों के पास आया और बैठने को कहा , खुद कुछ दूर बैठ गया और कहा,"अब बताओ सुमि क्या हुआ था ? मुझे सब जानना है और ये हक मैं खुद दे रहा हु खुद को बोलो , चुप मत रहो सुमि इतने साल चुप रही काश बोला होता तो आज हम यहां नही होते बल्कि एक अच्छी जिंदगी जी रहे होते कहो सुमि"

अमर की बात सुनकर सुमि पिघल गयी और कहने लगी - मेरी शादी एक बहुत बड़े परिवार में हुई थी जहां सब था बस प्यार नही था पति दे पैसा , इज्जत , हर जरूरत का सामान मिला लेकिन कभी उनका प्यार , साथ ओर वक्त नही मिला समाज के सामने मैं दो बच्चों की माँ तो बन चुकी थी पर उनकी पत्नी कभी नही बन पाई और थककर मैंने इसे ही अपनी किस्मत मान लिया संयुक्त परिवार टूटकर अकेला हो गया , गांव छोड़कर मैं अपने बच्चों और पति के साथ शहर चली आई कुछ सालों बाद उनका निधन हो गया बच्चों की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गयी , ससुराल वालों ने हाथ खींच लिए ओर पीहर वालो में इतनी क्षमता नही बची थी कि मुझे ओर मेरे बच्चों को पाल सके

यहां रहकर मैंने ही उनका पालन पोषण करना शुरू कर दिया ,उन्हें पढ़ाया लिखाया इस लायक बनाया की वो अपने पैरों पर खड़े हो सके ,, बेटा सरकारी ओहदे में अफसर लग गया तो बेटी भी बैंक में कर्मचारी थी उन्हें देखकर मैं अपना हर दर्द भूल गयी लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नही रहता बेटे बेटी ने अपनी पसन्द से शादी की मैं भला ऐतराज जताती भी कैसे ?

बेटी इसी शहर में अपने पति के साथ रहने लगी और बहू मेरे घर मे ,, कुछ दिन सही रहा लेकिन उसके बाद झगड़े होने लगे बहु को मैं फूटी आंख नही सुहाती थी , मेरे सामने वह अपनी दोस्रो को घर नही बुला पाती थी मैं जैसे तैसे करके दिन काट रही थी एक शाम बेटे ने कुछ पेपर्स देकर कहा की मैं जायदाद उसके नाम कर दु लेकिन कही से बेटी वहां आयी और खूब झगड़ा हुआ बेटी ने प्यार दिखाया और भरोसा दिलाया कि वो मेरी सेवा करेगी , मैंने दोनो बच्चों को बराबर जायदाद दे दिया उसी शाम बेटी और दामाद मुझे अपने साथ ले गए उन्होंने मेरी सेवा में कोई कमी नही छोड़ी लेकिन मैं समझ ही नही पाई की ये सिर्फ उनका झूठा प्यार था जो उन्होंने जायदाद के चलते दिखाया था जब बेटी मेरी जिम्मेदारी उठाते उठाते थक गई तो एक शाम दामाद मुझे यहां छोड़ गया "

कहते कहते सुमि की आंखे भर आयी अमर की आँख भी नम हो गयी उसने आँखों के किनारे साफ करते हुए कहा,"इतना सब हो गया ओर तुमने एक बार भी मुझसे नही कहा , क्यो सुमि ?"

"मैं पहले ही तुम्हे शादी के लिये ना बोलकर बहुत बड़ी ठेंस पहुंचा चुकी थी अमर , उसके बाद कभी तुम्हारा सामना करने की हिम्मत ही नही हुई पंर जब तुम्हे यहां देखा तो मेरा दिल टूट गया आखिर हमारे बच्चों ने ऐसा क्यो किया ?",कहते कहते रो पड़ी सुमित्रा अमर से उसका रोना देखा नही गया तो वह थोड़ा उसके पास आया और उसके हाथ पर हाथ रखकर कहा,"सब वक्त का फेर है सुमि है ,हमारा यहां होना भी हमारी किस्मत है कि हम साथ है , मैं हमेशा तुम्हारे साथ हु सुमि बच्चे न सही हम एक दूसरे से अपना दुख तो बाट ही सकते है "

अमर की बात सुनकर सुमि ने अपना सर अमर के कंधे पर रख दिया एक अपनेपन का अहसास दोनो को हुआ दोनो खामोश बैठे रहे अंधेरा होने लगा ऑफिस की खिड़की पर खड़े अनुज ओर सुनिधि मुस्कुराते हुए उन दोनों को देख रहे थे

"अनुज अंकल आंटी साथ में कितने अच्छे लग रहे है ना ?",सुनिधि ने कहा

"हा सुनिधि इस उम्र में भी इनका प्यार कही ना कही जिंदा है मैं सोच रहा था क्यो ना इन दोनों के लिए कुछ किया जाए",अनुज ने कहा

"वाओ मैं भी यही सोच रही थी , लेकिन उस से पहले हमें इन दोनों को एक दूसरे के करीब लाना होगा , इन्हें अहसास दिलाना होगा ",सुनिधि ने कहा

"उसकी जरूरत ही नही है सुनिधि जरा देखो उन्हें उनके चेहरे पर जो सुकून है उस से साफ पता चलता है कि वो दोनो एक दूसरे से कितना प्यार करते होंगे",अनुज ने कहा

"हम्म्म्म चलो , ऐसे छुपकर किसी को देखना सही नही है",सुनिधि ने कहा और अनुज को खींचते हुए वहां से ले गयी

कुछ देर बाद अमर ओर सुमि भी वहां से चले गए दोनो के मन से एक भारी बोझ उतर चुका था और दोनो अब खुश रहने लगे थे सुमि मोहनराव ओर जगनाथ से भी मिली चारो घंटो बैठकर एक दूसरे के बारे में बातें करते रहते कभी कभार अमर ओर सुमि एक दूसरे को देखकर खो जाते ओर मोहन जगन वहां से खिसक जाते

कुछ वक्त हंसी खुशी निकाला एक सुबह मोहन अखबार पढ़ रहा था कि उसने देखा आज वैलेंटाइन डे है आज के दिन गुलाब का फूल देकर अपने प्यार का इजहार किया जाता है जैसे ही उसने पढ़ा अखबार लेकर अमर के पास आया और उसे सब बताया तो अमर ने कहा - छि हमारी उम्र है ये सब करने की , बच्चों के लिए होते है ये प्रेम दिवस

"प्यार में क्या बच्चा क्या बूढ़ा , भावनाएं तो सबकी एक ही है ,, तुम आज सुमित्रा जी को गुलाब दोगे अगर उन्होंने ले लिया तो समझ जाना उनके मन मे भी वही भावनाएं है जो तुम्हारे मन मे है"

अमर ने उसकी बात नही सुनी फिर क्या जगन ओर मोहन दिनभर उसके पीछे पड़े रहे और आखिर अमर मान गया शाम को जब सुमि बगीचे में टहल रही थी तभी अमर वहां आया और गुलाब का फूल कांपते हाथों से उसकी ओर बढ़ा दिया सुमि ने कुछ नही कहा और आगे बढ़ गयी अमर उदास हो गया मोहन ओर जगन उसके पास आये और अफसोस जताने लगे कुछ देर बाद ही सुमि वापस आयी उसके हाथ मे पिला फूल था उसने फूल अमर को देकर कहा - प्रेम की शुरुआत दोस्ती से होती है

अमर खामोशी से सुमि को देखता रहा और हाथ मे पकड़ा लाल गुलाब पीछे छुपा लिया सुमि मुस्कुरा कर वहां से चली गयी अमर किसी नोजवान की तरह शर्माने लगा तो मोहन ने कहा - आज दोस्ती हुई है कल प्यार भी हो जाएगा

अमर की हालत देखकर जगन्नाथ गाने लगा

- दिल तो बच्चा है जी , थोड़ा कच्चा है जी

अमर बस उस खिले हुए पीले फूल को देखता रहा जिसमे से दोस्ती की भीनी खुशबू आ रही थी

क्रमशः
 
सुमित्रा ओर अमर अच्छे दोस्त बन चुके थे वक्त गुजरता गया और देखते ही देखते 6 महीने गुजर गए इन 6 महीनों में काफी कुछ बदला बस नही बदला तो अमर ओर सुमित्रा के बच्चों का मन

अमर इस उम्र में किसी अपने का साथ पाकर खुश था तो सुमित्रा भी अपने सुख दुख अमर से बांट लिया करती थी अनुज ओर सुनिधि ने उन दोनों से शादी कर लेने को कहा लेकिन अमर ओर सुमित्रा दोनो ही नही चाहते थे कि वे किसी ऐसे बंधन में बंधे , कही ना कही उन दोनों के मन में अपने अपने जीवनसाथी को लेकर ईमानदारी अभी भी थी अनुज ने भी उन्हें ज्यादा नही कहा कुछ दिन बाद पता चला कि सुनिधि माँ बनने वाली हैं ओल्डएज होंम में खुशी का माहौल बन गया सभी बहुत खुश थे ओल्डएज होंम में अब बस 17 लोग ही रह गए थे बाकी लोग वहां से कही चले गए

अमर ने बाकी लोगो के साथ मिलकर ओल्डएज होंम को सजाया ओर शाम को वहां जलसा रखा अनुज ओर सुनिधि अनाथ थे उनका कोई अपना नही था इसलिए बस अनुज के ऑफिस से कुछ लोग आए ,, सभी बहुत खुश थे ,,नाच गा रहे थे खुशियां मना रहे थे कि तभी एक बड़ी सी गाड़ी आकर गेट के पास रुकी उसमें से सूट बूट पहने एक आदमी उतरा उसके हाथ मे कुछ पेपर्स थे उसे देखते ही अनुज उसके पास आया शायद वह उसे जानता था आदमी ने अनुज को पेपर्स देकर कहा - मुख्तार भाई ने ये कागज भेजे है तुमने 6 महीने के लिए जो पैसे लिए थे वो वक्त खत्म हो चुका अब लिए हुए रुपयों का दुगुना लेकर मुख्तार भाई के सामने हाजिर हो जाना वरना ये ओल्डएज होंम खाली कर देना

अनुज ने सुना तो टेंशन में आ गया और कहा - लेकिन उन्होने तो एक साल के लिए कहा था , इतनी जल्दी मैं इतनी बडी रकम कहा से लाऊंगा ?"

"वो सब मुझे नही पता दो हफ्ते का टाइम है तुम्हारे पास , पैसे दो वरना ये जगह खाली कर देंना भाई को यहां कॉम्प्लेक्स बनाना है ,, चलता हूं",कहकर आदमी वहां से चला गया

अनुज मुंह लटकाए पेपर्स हाथ मे लिए वापस आया उसे देखकर सब शांत हो गए अनुज सीढ़ियों पर आकर बैठ गया सुनिधि उसके पास आई ओर कहा - क्या हुआ अनुज ? तुम इतने परेशान क्यो हो ?

अनुज ने सबको सारी बात बताई तो सभी के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आये , अनुज ने निराशा से कहा - उनके हिसाब से मुझे उन्हें 2 लाख 40000 रुपये देने है लेकिन इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम मैं कहा से लाऊंगा ?

"तुम अपने ऑफिस में बात करके देखो , शायद वो कुछ मदद करे ",सुनिधि ने कहा

"नही सुनिधि उनसे मदद ली भी तो वो 50 हजार से ज्यादा मदद नही काट पाएंगे , मुझे कुछ करना होगा मैं ऐसे इस ओल्डएज होंम को बर्बाद होने नही दे सकता ",अनुज ने कहा

वहां खड़े सभी लोग चुपचाप अनुज की बाते सुन रहे थे अमर ने सबको आंख से कुछ इशारा किया तो सभी अंदर चले गए सुनिधि अनुज के कंधे पर हाथ रखकर उसे हिम्मत दे रही थी कुछ देर बाद सभी बाहर आये अमर के हाथ मे कुछ रुपये थे अमर ने रुपये अनुज की ओर बढ़ाकर कहा - बेटा ये 55000 हजार रुपये है हम सबने मिलकर जमा किये है , तुम इन्हें रखो शायद तुम्हे कुछ मदद मिले

"अरे नही अंकल ये आप सबके लिए है मैं ये पैसे कैसे ले सकता हु ? नही अंकल मैं ये नही ले सकता",अनुज ने कहा

"क्यो नही ले सकते ? आज तुम्हारी जगह अगर हम सबका बेटा होता तो क्या हम उसकी मदद नही करते ? तुम तो हमारे बेटों से भी बढ़कर निकले बेटा तुम्हारी वजह से हमे छत मिली दो वक्त का खाना मिला ,, तुमने जो हम सबके लिए किया उसके सामने तो ये कुछ भी नही है",जगन्नाथ ने कहा

अनुज की आँखों मे आंसू आ गए मोहन उसके पास आया और उसका हाथ थामकर कहा - रख लो बेटा , मदद समझकर नही बल्कि हम सबका प्यार समझकर ,, तुमने कभी हमे पराए होने का अहसास नही दिलाया तो आज मुसीबत के वक्त हम लोग तुम्हारा साथ कैसे छोड़ सकते है ? रख लो !"

"जब सुमित्रा की जान बचाने के वक्त तुमने घर गिरवी रखा तब एक बार नही सोचा तो फिर आज क्यो ? तुम बिल्कुल चिंता मत करो हम सब तुम्हारे साथ है",अमर ने कहा तो अनुज उनके गले आ लगा सबकी आँखों मे खुशी के आंसू झिलमिला रहे थे अनुज सीढ़ियों पर बैठा गया बाकी सब लोग भी वही बैठकर बाकी के पैसों के इंतजाम के बारे में सोचने लगे कुछ देर बाद वहां बैठे असलम ने कहा - मेरे पास एक आईडिया है ।

सबकी नजर उसकी ओर घूम गयी तो अमर ने कहा - हा बताओ असलम

"चार दिन बाद नवरात्र शुरू होंने वाले है क्यो ना हम सामने वाले मैदान में माता की स्थापना करे , लोग दर्शन के लिए आएंगे तो यहां आकर प्रशाद , फूल , नारियल लेंगे दूर से आएंगे तो उन्हें भूख प्यास भी लगेगी तो यही मैदान में खाने के दुकान लगाएंगे , लोगो के मनोरंजन की व्यवस्था भी करेंगे तो सभी आएंगे इन सब से आने वाले पैसे हम अनुज को देंगे कहो कैसा है आईडिया ?"

"मुस्लमान होकर तुम नवरात्र की बात कर रहै हो असलम ?',मोहन ने हैरानी से कहा

"मुस्लमान हु तो क्या हुआ ? हु तो इंसान ही ना ओर ये धर्म का बटवारा हम इंसानों ने किया है उस ऊपरवाले ने नही ,, इस से अनुज बेटे की समस्या तो हल हो गई जाएगी",असलम ने कहा

अमर आकर उसके गले लगा और कहा - असलम भाई हम सब ये करेंगे ,, इस ओल्डएज होंम को बचाएंगे"

"ठीक है फिर मैदान की सफाई का सारा काम हम सब मिलकर कल से ही शुरू कर देंगे",जगह ने कहा

"मैं प्रशाद ओर फूलों की दुकान लगा लूंगा",अमर ने कहा

"मैं राधा और सुमित्रा मिलकर खाने की दुकान खोल लेंगे",जानकी ने कहा

"मैं निम्बू पानी और सोढा बनाऊंगा",मोहन ने कहा

"मैं लोगो के मनोरंजन के लिये , नई नई प्रतियोगिता लगाऊंगा",जगन ने कहा

ओर इस तरह एक एक करके सबने काम बांट लिए , अनुज ओर सुनिधि ने सुना तो उनके पास आकर कहा - मैं ओर सुनिधि माता की मूर्ति बनाएंगे और उनका दरबार सजायेंगे

सभी बहुत खुश थे और जोश से भरे हुए थे इसके बाद सबने साथ बैठकर खाना खाया और अगले दिन के प्रतीक्षा में सो गए सुबह जल्दी उठकर सभी कुदाल फावड़ा लेकर सामने वाले मैदान की ओर बढ़ गए अनुज ने जगह के मालिक से परमिशन ले ली और सभी काम पर लग गए मैदान में झाड़ घासफूस ज्यादा था सबने मिलकर उसे हटाना शुरू किया काम करते हुए अमर की नजर सामने से आती सुनिधि पंर गयी वह उसके पास आये और उसके हाथ से थर्मस लेकर कहा - अरे बिटिया तुम क्यो चली आयी , इस हाल में तुम्हे ये सब काम नही करने चाहिए तुम बस आराम करो ,, ओर ये वजन तो बिल्कुल नही उठाना

"आप लोग इतनी मेहनत कर रहे है , आपके लिए इतना तो कर ही सकती हूं ना अंकल ,, अच्छा अभी सभी को बुला लीजिए चाय के लिए",सुनिधि ने वहां पड़े पत्थर पर बैठते हुए कहा अमर ने सबको बुलाया सभी हंसी खुशी चाय पीने लगे

उधर 6 महीनों में रवि ओर विकास का धंधा ठप हो गया अमर के साइन न करने की वजह से वो कॉन्ट्रेक्ट उन लोगो को नही मिला और जो बचा खुचा पैसा था वो भी उन लोगो ने कॉन्ट्रेक्ट में लगा दिया दोनो भाई परेशान से बैठे थे तभी बड़ी बहू का भाई वहां आया और उनसे बात की बातों बातों में सारी बाते सामने आई तो बहु के भाई ने कहा - तुम लोगो को बर्बाद करके वह वहां आराम से अपनी जिंदगी जी रहा है ,,

"लेकिन हम कर भी क्या सकते है ?",रवि ने कहा

"घी जब सीधी उंगली से ना निकले तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है",भाई ने सोचते हुए कहा

"मतलब ?",विकास ने कहा

"मतलब ये की अगर तुम्हें जिंदगी बनानी है तो उसे अपने रास्ते से हटाना होगा",आदमी ने कहा

दोनो भाई खामोशी से एक दूसरे की ओर देखते रहे

क्रमशः
 
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