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Romance अनैतिक

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अनैतिक

अब काम बढ़ता जा रहा था और अब हमें एक कॉन्फ्रेंस रूम चाहिए था जहाँ हम किसी से मिल सकें या फिर अगर कोई टीम मीटिंग करनी हो. उसी बिल्डिंग में सबसे ऊपर का फ्लोर खाली था. तो मैंने नितु से उसके बारे में बात की. वो शुरू-शुरू में डरी हुई थी क्योंकि रेंट डबल था पर चूँकि वहाँ कोई और ऑफिस नहीं था जबतक कोई नहीं आता तो हम पूरा फ्लोर इस्तेमाल कर सकते थे! नितु को आईडिया पसंद आया और हमने मालिक से बात की, अब उसे दो कमरों के लिए तो कोई भी किरायदार मिल जाता पर पूरा फ्लोर लेने वाले कम लोग थे. सारा ऑफिस सेट हो गया था. आज मुझे मेरा अपना केबिन मिला था...मेरा अपना! ये मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी और इसके लिए मैंने बहुत मेहनत भी की थी. अपनी बॉस चेयर को मैं बस एक टक निहारे जा रहा था. मेरे अंदर बहुत ख़ुशी थी जो आँसू बन कर टपक पडी. नितु जो मेरे पीछे खडी थी उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे ढाँढस बँधाने लगी. "काश मेरे माँ और पिताजी यहाँ होते तो आज उनका कितना गर्व हो रहा होता!" मैंने कहा पर वो सब तो वहाँ अश्विनी की खुशियों में लीन थे, मुझसे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया था. "सागर आज ख़ुशी का दिन है, ऐसे आँसू बहा कर इस दिन को खराब ना करो! आई नो तुम अपने माँ-पिताजी को मिस कर रहे हो पर वो अपनी ख़ुशी में व्यस्त हैं." नितु ने कहा और तभी बाकी के सारे अंदर आये और मुझे ऐसा देख कर मुझे चियर करने के लिए बोले; "सर आज तो पार्टी होनी चाहिए!"

"अबे यार काम भी कर लिया करो, हर बार पार्टी चाहिए तुम्हें!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, पर उनकी ख़ुशी के लिए बाहर से खाना मंगा लिया.

इधर युएस से हमें एक और कॉन्ट्रैक्ट मिल गया और वो भी पूरे साल का. काम डबल हो गया था और अब हमें एक और इम्प्लोयी की दरकार हुई और साथ में एक प्यून भी जो चाय वगैरह बनाये.अब तक तो हम चाय बाहर से पिया करते थे. प्यून के लिए हमने अल्का को ही रख लिया और एक और इम्प्लोयी को नितु ने हायर किया. नितु के शुरू के दिनों में वो यहाँ एक हॉस्टल में रहतीं थीं और ये लड़की उनकी रूममेट थी. एक लड़की के आने से लड़के भी जोश में आ गए थे और तीनों उसे काम में मदद करने के बहाने से घेरे रहते. "गाईज सारे एक साथ समझाओगे तो कैसे समझेगी वो?" मैंने तीनों की टांग खींचते हुए कहा. ये सुन कर सारे हँस पड़े थे, नितु बड़ा ख़ास ध्यान रखती थी की ये तीनों कहीं इसी के चक्कर में पड़ कर काम-धाम न छोड़ दें और वो जब भी किसी को उस लड़की के साथ देखती तो घूर के देखने लगती और लड़के डर के वापस अपने डेस्क पर बैठ जाते. तीनों लड़के मन के साफ़ थे बस छिछोरपना भरा पड़ा था. नितु ने उसे अपने साथ रखना शुरू कर दिया और ये तीनों मेरे पास आये; "सर देखो न मॅडम ने उसे अपना साथ रख लिया है, सारा टाइम वो उनके साथ ही बैठती है, ऐसे में हम उससे फ्रेंडशिप कैसे करें?"

"क्या फायदा यार, आखिर में उसने तुम्हें फ्रेंड झोन कर देना है!" मैंने कहा.

"सर ट्राय ट्राय बट डोन्ट क्राय!" आकाश बोला.

"अच्छा बेटा, करो ट्राय फिर! मैंने कुछ कहा तो मेरी क्लास लग जाएगी!" मैंने ये कहते हुए खुद को दूर कर लिया.

फिर एक दिन की बात है मैं और नितु अपने-अपने केबिन में बैठे थे की उस लड़की का बॉयफ्रेंड उसे मिलने ऑफिस आया. वो उससे बात कर रही थी और इधर तीनों के दिल एक साथ टूट गए! मैं ये देख कर दहाड़े मार कर हँसने लगा, सब लोग मुझे ही देख रहे थे और मैं बस हँसता जा रहा था. नितु अपने केबिन से मेरे पास आई और पूछने लगी तो मैंने हँसते हुए उन्हें सारी बात बताई. तो वो भी हँस पड़ीं और तीनों लड़के शर्मा ने लगे और एक दूसरे की शक्ल देख कर हँस रहे थे!

"कहा था मैंने इन्हें की फ्रेंड झोन हो जाओगे पर नहीं इन्हें ट्राय करना था!" मैंने हँसी काबू करते हुए कहा.

"क्या सर एक तो यहाँ कट गया और आप हमारी ही ले रहे हो!" आकाश बोला.

"बेटा भगवान् ने दी है ना एक गर्लफ्रेंड उसी के साथ खुश रहो, अब जा कर पंडित जी के साथ बैठ कर जी. एस. टी. की रिटर्न फाइनल कर के लाओ" मैंने उसे प्यार से आर्डर देते हुए कहा और वो भी मुस्कुराते हुए चला गया.नितु भी बहुत खुश थी क्योंकि उन्होंने मेरी सब के साथ अंडर स्टँडिंग देख ली थी.

ऐसे ही हसी मजाक मे दिन बीते. एक दिन हम दोनों शाम को बैठे चाय पी रहे थे;

मैं: यार थोड़ा बोर हो गया हूँ, सोच रहा हूँ की एक ब्रेक ले लेते हैं!

नितु: सच कहा तो बताओ कहाँ चलें? कोई नई जगह चलते हैं!

मैं: मेरा मन ट्रेकिंग करने को कर हे.

नितु: वाव!!!

मैं: खीरगंगा का ट्रेक छोटा है, वहाँ चलें?

नितु: वो कहा है?

मैं: हिमाचल प्रदेश में हे. हालाँकि ये बारिश का सीजन पर मजा बहुत आयेगा.

नितु: ठीक है डन!

मैं: पर पहले बता रहा हूँ की ट्रेकिंग आसान नहीं होती, वहाँ जा कर आधे रास्ते से वापस नहीं आ सकते. चाहे जो हो ट्रेक पूरा करना होगा!

नितु: तुम साथ हो ना तो क्या दिक्कत है?!

मैं: ठीक है तो तुम टिकट्स बुक करो और मैं गियर खरीदता हु.

नितु: गियर?

मैं: और क्या? रक सॅकचाहिए, रेन कोट चाहिए, ट्रैकिंग के लिए शूज चाहिए वरना वहाँ फिसलने का खतरा हे.
 
नितु ने टिकट्स बुक की और जानबूझ कर ऐसे दिन पर करि ताकि वो मेरा बर्थडे वहीं मना सके, इधर मैंने भी अपनी तैयारी पूरी की. ३० अगस्त को हम निकले और दिल्ली पहुँचे, वहाँ दो दिन का स्टे था. दिल्ली में जो पहली चीज मुझे देखनी थी वो था इंडिया गेट.वहाँ पहुँच कर गर्व से सीना चौड़ा हो गया, अब चूँकि मुझ पर कोई खाने-पीने की बंदिश नहीं थी तो मैं नितु को लेकर निकल पडा. दिल्ली आने से पहले मैंने 'पेट भर' के रिसर्च की थी जिसके फल स्वरुप यहाँ पर क्या-क्या मिलता है वो सब मैंने लिस्ट में डाल लिया था.

सबसे पहले हमने पहाड़गंज में सीता राम दीवान चाँद के छोले भठूरे खाये. हमने एक ही प्लेट ली थी क्योंकि आज हमें पेट-फटने तक खाना था. वहाँ से हम देल्ही मेट्रो ले कर चावड़ी बजार आ गए और वहाँ हमने सबसे पहले नटराज के दही भल्ले खाये, फिर जुंग बहादुर की कचौड़ी, फिर जलेबी वाला की जलेबी और लास्ट में कुरेमल की कुल्फी! पेट अब पूरा गले तक भर गया था और अब बस सोना था.

अगले दिन भी हम खूब घूमें और शाम ६ बजे चेकआउट किया, उसके बाद हम सीधा कश्मीरी गेट बस स्टैंड आये और वहाँ से हमें व्होल्व्हो मिली जिसने हमें अगली सुबह भुंतर उतारा| हमारी किस्मत अच्छी थी की बारिशें बंद हो चुकीं थीं इसलिए हमें कोई तकलीफ नहीं हुई. भुंतर से टैक्सी ले कर हम कसोल पहुँचे और वहाँ समान रख कर फ्रेश हुए और सीधा मणिकरण गुरुद्वारे गए वहाँ, गर्म पानी में मुंह-हाथ धोये और लंगर का प्रसाद खाया.वापस आ कर हम सो गए क्योंकि अगली सुबह हमें जल्दी निकलना था.

सुबह हमने एक रक सॅक लिया जिसमें कुछ समान था!एक बस ने हमें वहाँ उतारा जहाँ से ट्रैकिंग शुरू होनी थी और रास्ता देखते ही दोनों की हवा टाइट हो गई. बिलकुल कच्चा रास्ता जो एक छोटे से गाँव से होता हुआ जाता था और फिर पहाड़ की चढ़ाई! पर वहाँ का नजारा इतना अद्भुत था की हम रोमांच से भर उठे और ट्रैकिंग शुरू की. रास्ता सिर्फ दिखने में ही डरावना था पर वहाँ सहूलतें इतनी थी की कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन सिर्फ आधे रास्ते तक! रुद्रनाग पहुँच कर हमने वहाँ मंदिर में दर्शन किये और आगे बढे, उसके आगे की चढ़ाई बिलकुल खड़ी और रिस्की थी! ये देख कर नितु ने ना में गर्दन हिला दी. "मैं नहीं जाऊँगी आगे!" नितु बोली.

"यार आधा रास्ता पहुचं गए हैं और अब हार मान लोगे तो कैसे चलेगा?" ये कहते हुए मैंने उनका हाथ पकड़ा और आगे ले कर चल पडा. मैं आगे-आगे था और उन्हें बता रहा था की कहाँ-कहाँ पैर रखना हे. आगे हमें के संकरा रास्ता मिला जहाँ सिर्फ एक पाँव रखने की जगह थी और वहाँ थोड़ा कीचड भी था. मैं आगे था और रक सॅक उठाये हुए था और नितु मेरे पीछे थी. उन्होंने कीचड़ में जूते गंदे ना हो जाएँ ये सोच कर पाँव ऊँचा-नीच रखा जिससे उनका बैलेंस बिगड़ गया और वो खाईं की तरफ गिरने लगीं, मैंने तुरंत फुर्ती दिखाई और उनका हाथ पकड़ लिया वरना वो नीचे खाईं की तरफ गिर जातीं.उन्हें खींच कर ऊपर लाया और वो एक दम से मेरे सीने से लग गईं और रोने लगी. इन कुछ पलों में उन्होंने जैसे मौत देख ली थी. मैंने उनके पीठ को काफी रगड़ा ताकि वो चुप हो जाये. आधे घंटे तक हम वहीं खड़े रहे और लोग हमें देखते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. मैं चुपचाप था और कोशिश कर रहा था की वो चुप हो जाएँ ताकि हम वापिस जा सकें! उन्होंने रोना बंद किया और मैंने उन्हें पीने को पानी दिया. फिर खाने के लिए एक चॉकलेट दी और जब वो नार्मल हो गईं तो कहा; "चलो वापस चलते हैं!" पर वो जानती थी की मेरा मन ऊपर जाने का है इसलिए उन्होंने हिम्मत करते हुए कहा; "मैंने कहा था ना की मुझे संभालने के लिए तुम हो! तो फिर वापस क्यों जाएंगे? गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में। वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले." नितु ने बड़े गर्व से कहा. मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उठाया और गले लगाया, उनके माथे को चूमते हुए कहा; "आई एम प्राउड ऑफ यू!" हम आगे चल पड़े और बड़ी सावधानी से आगे बढे, टाइम थोड़ा ज्यादा लगा पर हम ऊपर पहुँच ही गये.
 
सबसे पहले हमने एक टेंट बुक किया और अपना समान रख कर फोटो क्लिक करने लगे. आज दो तरीक थी और नितु को रात बारह बजे का बेसब्री से इंतजार था. हम दोनों कुर्सी लगा कर अपने ही टेंट के बाहर बैठे थे. अब वहाँ कोई नेटवर्क नहीं था तो हम बस बातों में लगे थे और वहाँ का नजारा देख कर प्रफुल्लित थे.

शाम को खाने के लिए वहाँ मॅगी और चाय थी तो हमने बड़े चाव से वो खाई| रात के खाने में हमने दो थालियाँ ली और टेंट के बाहर ही बैठ कर खाई| बारह बजे तक नितु ने मुझे सोने नहीं दिया और मेरे साथ बैठ के बातें करती रही, अपने जीवन के किस्से सुनाती रही और मैं भी उन्हें अपने कॉलेज लाइफ के बारे में बताने लगा. इसी बीच मैंने उन्हें वो भांग वाले काण्ड के बारे में भी बताया. जैसे ही बारह बजे नितु ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खड़ा किया और मेरे गले लग कर बोलीं; "हॅपी बर्थ डे माई डिअर! गॉड ब्लेस यू!" इतना कहते हुए उनकी आवाज भारी हो गई. मैने उन्हें कस कर गले लगा लिया ताकि वो रो ना पड़ें.कुछ देर में वो नार्मल हो गईं और हम सोने के लिए अंदर आ गये.

सुबह जल्दी ही आँख खुल गई. फ्रेश होने के बाद उन्होंने मुझे कहा की ऊपर मंदिर चलते हे. मंदिर के बाहर एक गर्म पानी का स्त्रोत्र था जिसमें सारे लोग नहा रहे थे, हमने हाथ-मुंह धोया और भगवान के दर्शन करने लगे. दर्शन के बाद नितु ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे वहाँ एक पत्थर पर बैठने को कहा. "मुझे तुमसे कुछ बात करनी है!" नितु ने बहुत गंभीर होते हुए कहा. एक पल के लिए मैं भी सोच में पड़ गया की उन्हें आखिर बात क्या करनी है?

"सागर मैं तुमसे प्यार करती हूँ....सच्चा प्यार!" नितु ने गंभीर होते हुए कहा.

"आप ये क्या कह रहे हो?" मैंने चौंक कर खड़े होते हुए कहा.

"जब हम कुमार के ऑफिस में प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे तभी मुझे तुमसे प्यार हो गया था! पर मैं उस समय कुमार की पत्नी थी. इसलिए कुछ नहीं बोली! बड़ी हिम्मत लगी और फिर तुम्हारे सहारे के कारन मैं आजाद हुई. फिर घरवालों ने मुझे अकेला छोड़ दिया ओर ऐसे में मैं तुम्हारे लिए बोझ नहीं बनना चाहती थी. इसलिए तुम से दूर बैंगलोर आ गई और सोचा की जिंदगी दुबारा शुरू करूँगी पर तुम्हारी यादें साथ नहीं छोड़ती थी. बहुत कोशिश की तुम्हें भुलाने की और भूल भी गई. इसलिए मैंने अपना नंबर बदल लिया था क्योंकि मेरा मन जानता था की तुम मुझे कभी नहीं अपनाओगे. देखा जाए वो सही भी था क्योंकि उस टाइम तुम अश्विनी के थे, अगर मैं तुमसे अपने प्यार का इजहार भी करती तो तुम मना कर देते और तब मैं टूट जाती. बड़े मुश्किल से डरते हुए मैं दुबारा लखनऊ आई, क्योंकि जानती थी की तुम्हारे सामने मैं खुद को संभाल नहीं पाऊँगी पर एक बार और अपने मम्मी-डैडी से रिश्ते सुधारने की बात थी. लेकिन उन्होंने तो मुझसे बात तक नहीं की और घर से बाहर निकाल दिया. फिर उस रात जब मैंने तुम्हें उस बस स्टैंड पर देखा तो मैं बता नहीं सकती मुझ पर क्या बीती.दूर से देख कर ही मन कह रहा था की ये तुम नहीं हो सकते, तुम्हारी ऐसी हालत नहीं हो सकती! वो रात मैंने रोते-रोते गुजारी ....फिर ये तुम्हारी बिमारी और वो सब.... मैंने बहुत सम्भलने की कोशिश की पर ये दिल अब नहीं सम्भलता!" नितु ने रोते-रोते कहा.

"आप मेरे बारे में सब नहीं जानते, अगर जानते तो प्यार नहीं नफरत करते!" मैंने उनका कन्धा पकड़ कर उन्हें झिंझोड़ते हुए कहा.

"क्या नहीं पता मुझे?" नितु ने अपना रोना रोकते हुए पुछा?

"मेरे और अश्विनी के रिश्ते के बारे में" मैंने उनके कन्धों को छोड़ दिया.

"तुम उससे प्यार करते थे और उसने तुमसे धोखा किया, बस!" नितु ने कहा.

"बात इतनी आसान नहीं है!..... हम दोनों असल जिंदगी में चाचा-भतीजी थे!" इतना कहते हुए मैंने उन्हें सारी कहानी सुना दी, उसका मुझे धोखा देने से ले कर उसकी शादी तक सब बात!

"तो इसमें तुम्हारी क्या गलती थी? आई वो थी तुम्हारे पास, तुम तो अपने रिश्ते की मर्यादा जानते थे ना? तभी तो उसे मना कर रहे थे, और रिश्ते क्या होते हैं? इंसान उन्हें बनाता है ना? हमारा ये दोस्ती का रिश्ता भी हमने बनाया ना? अगर तुमने उससे अपने प्यार का इजहार किया होता तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता! फर्क पड़ता है तो सिर्फ इस बात से की अभी तुम क्या चाहते हो? क्या तुम उससे अब भी प्यार करते हो? क्या तुम्हारे दिल में उसके लिए अब भी प्यार है?" नितु ने मुझे झिंझोड़ते हुए पूछा. में नितु की बातों में खो गया था. क्योंकि जिस सरलता से वो इस सब को ले रहे थीं वो मेरे गले नहीं उतर रही थी! पर उनका मुझे झिंझोड़ना जारी था और वो जवाब की उम्मीद कर रहीं थी.

"नहीं....मैं उससे सिर्फ नफरत करता हूँ! उसकी वजह से मुझे मेरे ही परिवार से अलग होना पड़ा!" मैंने कहा.

"तो फिर क्या प्रॉब्लम है? इतने दिनों में एक छत के नीचे रहते हुए तुम्हें कभी नहीं लगा की तुम्हारे दिल में मेरे लिए थोड़ा सा भी प्यार है?" नितु ने पूछा.

"हुआ था...कई बार हुआ पर...मुझ में अब दुबारा टूटने की ताक़त नहीं हे." मैंने नितु की आँखों में देखते हुए कहा. ये मेरा सवाल था की क्या होगा अगर उन्होंने भी मेरे साथ वही किया जो अश्विनी ने किया.

"मैं तुम्हें कभी टूटने नहीं दूँगी! मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ!" नितु ने पूरे आत्मविश्वास से कहा. उस पल मेरा दिमाग सुन्न हो चूका था. बस एक दिल था जो प्यार चाहता था और उसे नितु का प्यार सच्चा लग रहा था. पर खुद को फिर से टूटते हुए देखने का डर भी था जो मुझे रोक रहा था.

"मैं तुम्हारा डर समझ सकती हूँ, पर हाथ की सभी उँगलियाँ एक सी नहीं होतीं. अगर एक लड़की ने तुम्हें धोखा दिया तो जरुरी तो नहीं की मैं भी तुम्हें धोका दूँ? उसके लिए तुम बाहर जाने का रास्ता थे, पर मेरे लिए तुम मेरी पूरी जिंदगी हो!" मेरा दिल नितु की बातें सुन कर उसकी ओर बहने लगा था. पर जुबान खामोश थी!
 
"हाँ अगर तुम्हें मेरी उम्र से कोई प्रॉब्लम है तो बात अलग है!" नितु ने माहौल को हल्का करते हुए कहा. पर मुझे उनकी उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता था. बस दिल टूटने का डर था!

"आई लव यू!!!" मैंने एकदम से उनकी आँखों में देखते हुए कहा.

"आई लव यू टू!!!!" नितु ने एकदम से जवाब दिया और मेरे गले लग गई. हम १० मिनट तक बस ऐसे ही गले लगे रहे, कोई बात-चीत नहीं हुई बस दो बेक़रार दिल थे जो एक दूसरे में करार ढूँढ रहे थे. "तो शादी कब करनी है?" नितु बोली और मैंने उन्हें अपने आलिंगन से आजाद किया.

"पहले इस पहाड़ से तो नीचे उतरें!" मैने मुस्कुराते हुए कहा. हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अपने टेंट की तरफ आ रहे थे की तभी नितु बोली; "मैं बड़ी खुशनसीब हूँ, यहाँ आई थी एक दोस्त के साथ और जा रही हूँ हमसफ़र के साथ!"

"खुशनसीब तो मैं हूँ जो मुझे तुम्हारे जैसा साथी मिला, जो मेरे सारे दुःख बाँट रहा है!" मैंने कहा.

"मैं तुम्हें इतना प्यार दूँगी की तुम सारे दुःख भूल जाओगे!" नितु ने मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास से कहा. मैंने नितु के सर को चूम लिया.

हमने बैग उठाया और नीचे उतर चले. इस वक़्त हम दोनों ही एक अजीब से जोश से भरे हुए थे, वो प्यार जो हम दोनों के दिलों में धधक रहा था ये उसी की ऊर्जा थी. रास्ते भर हमने जगह-जगह पर फोटोज क्लिक करी. दोपहर होते-होते हम कसोल वापस पहुँचे और सबसे पहले मैंने नूडल पैक करवाए.हाय क्या नूडल्स थे! ऐसे नूडल मैने आजतक नहीं खाये थे! मैंने एक पौवा रम ली और 'माल' भी लिया! रूम पर आ कर पहले हम दोनों बारी-बारी नहाये और फिर नूडल खाने लगे, मैंने एक-एक पेग भी बना कर रेडी किया. अब रम में होती है थोड़ी बदबू जो नितु को पसंद नहीं आई. "इव्व .....तुम तो हमेशा अच्छी वाली पीते हो तो आज रम क्यों?" नितु ने नाक सिकोड़ते हुए कहा. "इंसान को कभी अपनी जड़ नहीं भूलनी चाहिए! रम से ही मैंने शुरुआत की थी और पहाड़ों पर रम पीने का मजा ही अलग होता हे." मैंने कहा और नाक सिकोड़ कर ही सही पर नितु ने पूरा पेग एक सांस में खींच लिया. जैसे ही रम गले से नीचे उत्तरी उनका पूरा जिस्म गर्म हो गया."वाव ये तो सच में बहुत गर्म है! अब समझ में आया पहाड़ों पर इसे पीने का मतलब!" नितु ने गिलास मेरे आगे सरकाते हुए कहा. "सिर्फ पहाड़ों पर ही नहीं, सर्दी में भी ये 'रम बाण्ड इलाज' है!" मैंने कहा और हम दोनों हंसने लगे. नूडल के साथ आज रम का एक अलग ही सुरूर था और जब खाना खत्म हुआ तो मैंने अपनी 'लैब' खोल दी जिसे देख कर नितु हैरान हो गई! "अब ये क्या कर रहे हो?" नितु ने पूछा.

"इसे कहते हैं 'माल'!" ये कहते हुए मैंने सिगरेट का तम्बाकू एक पेपर निकाला और मलाना क्रीम निकाली, दिखने में वो काली-काली, चिप-चिपि सी होती हे. "ये क्या है?" नितु ने अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा.

"ये है यहाँ की फेमस मलाना क्रीम!" पर नितु को समझ नहीं आया की वो क्या होती हे. "हशीश!" मैंने कहा तो नितु एक दम से अपने दोनों गालों को हाथ से ढकते हुए मुझे देखने लगी! "आऊच.... .... ये तो ड्रग्स है? तुम ड्रग्स लेते हो?" नितु ने चौंकते हुए कहा. उनका इतना लाउड रिएक्शन का कारन था रम का असर जो अब धीरे-धीरे उन पर चढ़ रहा था.

"ड्रग्स तो अंग्रेजी नशे की चीजें होती हैं, ये तो नेचुरल है! ये हमें प्रकृति देती है!" मैंने अपनी प्यारी हशीश का बचाव करते हुए कहा जिसे सुन नितु हँस पडी. मैंने हशीश की एक छोटी गोली को माचिस की तीली पर रख कर गर्म किया और फिर उसे सिगरेट के तम्बाकू में डाल कर मिलाया और बड़ी सावधानी से वापस सिगरेट में भर दिया. सिगरेट मुँह पर लगा कर मैंने पहला कश लिया और पीठ दिवार से टिका कर बैठ गया.आँखें अपने आप बंद हो गईं क्योंकि जिस्म को आज कई महीनों बाद असली माल चखने को मिला था. "इसकी आदत तो नहीं पड़ती?" नितु ने थोड़ा चिंता जताते हुए पूछा.

"इतने महीनों में तुमने कभी देखा मुझे इसे पीते हुए? नशा जब तक कण्ट्रोल में रहे ठीक होता है, जब उसके लिए आपकी आत्मा आपको परेशान करने लगे तब वो हद्द से बाहर हो जाता हे." मैंने प्रवचन देते हुए कहा, पिछले साल यही तो सीखा था मैंने!
 
"मैं भी एक पफ लूँ?" नितु ने पुछा तो मैंने उन्हें सिगरेट दे दी. उन्होंने एक छोटा सा पफ लिया और खांसने लगी और मुझे सिगरेट वापस दे दी. मैंने उनकी पीठ सहलाई ताकि उनकी खांसी काबू में आये. उनकी खांसी काबू में आई और मैंने एक और ड्रैग लिया और फिर से आँख मूँद कर पीठ दिवार से लगा कर बैठ गया.तभी अचानक से नितु ने मेरे हाथ से सिगरेट ले ली और एक बड़ा ड्रैग लिया, इस बार उन्हें खांसी नहीं आई, दस मिनट बाद वो बोलीं; "कुछ भी तो नहीं हुआ? मुझे लगा की चढ़ेगी पर ये तो कुछ भी नहीं कर रही!" नितु ने चिढ़ते हुए कहा.

"ये दारु नहीं है, इसका असर धीरे-धीरे होगा, दिमाग सुन्न हो जाएगा. मैंने कहा. पर उस पर रम की गर्मी चढ़ गई तो नितु ने अपने कपडे उतारे, अब वो सिर्फ एक पतली सी टी-शर्ट और काप्री पहने मेरे बगल में लेती थीं और फोटोज अपलोड करने लगी. इधर उनकी फोटोज अपलोड हुई और इधर मेरे फ़ोन में नोटिफिकेशन की घंटियाँ बजने लगी. मैंने फ़ोन उठाया ही था की नितु ने फिर से मेरे हाथ से सिगरेट ली और एक बड़ा ड्रैग लिया, उनका ऐसा करने से मैं हँस पड़ा और वो भी हँस दी. मैंने अपना फ़ोन खोल के देखा तो ३० फेसबुक की नोटिफिकेशन थी! मैं हैरान था की की इतनी नोटिफिकेशन कैसे! मैंने जब खोला तो देखा की नितु ने हम दोनों की एक फोटो डाली थी और कॅप्शन में लिखा था; 'ही सेड येस स स स! आई लव यू!!!' नितु के जितने भी दोस्त थे उन सब ने फोटो पर हार्ट रियाक्ट किया था और काँग्राचूलेशन की झड़ी लगा दी थी! तभी आकाश का कमेंट भी आया है; "काँग्राचूलेशन सर अँड मॅडम!" मैं मुस्कुराते हुए नितु को देखने लगा जो मेरी तरफ ही देख रही थी. चेहरे पर वही मुस्कुराहट लिए और रम और हशीश के नशे में चूर उनका चेहरा दमक रहा था. "चलो अब सो जाओ!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और लास्ट ड्रैग ले कर मैं दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गया.नितु ने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे अपनी तरफ घुमाया और मेरे से चिपक कर लेट गई. आज पता नहीं क्यों पर मेरे जिस्म में एक झुरझुरी सी पैदा हुई और मेरा मन बहकने लगा. बरसों से सोइ हुई प्यास भड़कने लगी. दिल की धड़कनें तेज होने लगीं और मन मेरे और नितु के बीच बंधी दोस्ती की मर्यादा तोड़ने को करने लगा. मेरे शरीर का अंग जिसे मैं इतने महीनों से सिर्फ पेशाब करने के लिए इस्तेमाल करता था आज वो अकड़ने लगा था. पर कुछ तो था जो मुझे रोके हुए था. मैंने नितु की तरफ देखा तो उसकी आँख लग चुकी थी. मैंने खुद को धीरे से उसकी गिरफ्त से निकाला और कमरे से बाहर आ कर बालकनी में बैठ गया.सांझ हो रही थी और मेरा मन ढलते सूरज को देखने का था. सो मैं बाहर कुर्सी लगा कर बैठ गया.जिस अंग में जान आई थी वो वापस से शांत हो गया था. दिमाग ने ध्यान बहारों पर लगा दिया. कुछ असर सिगरेट का भी था सो मैं चुप-चाप वो नजारा एन्जॉय करने लगा. साढ़े सात बजे नितु उठी और मुझे ढूंढती हुई बाहर आई, पीछे से मुझे अपनी बाहों में भर कर बोली; "यहाँ अकेले क्या कर रहे हो?"

"कुछ नहीं बस ढलती हुई सांझ को देख रहा था." ये सुन कर नितु मेरी गोद में बैठ गई और अपना सर मेरे सीने से लगा दिया. उसके जिस्म की गर्माहट से फिर से जिस्म में झूझुरी छूटने लगी और मन फिर बावरा होने लगा, दिल की धड़कनें तेज थीं जो नितु साफ़ सुन पा रही थी. शायद वो मेरी स्थिति समझ पा रही थी इसलिए वो उठी और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अंदर ले आई. दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ बड़ी अदा से देखा. उनकी ये अदा आज मैं पहली बार देख रहा था और अब तो दिल बगावत कर बैठा था. उसे अब बस वो प्यार चाहिए था जिसके लिए वो इतने दिनों से प्यासा था. नितु धीरे-धीरे चलते हुए मेरे पास आई और अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी और कुछ पलों के लिए हमारी आँखें बस एक दूसरे को देखती रही. इन्ही कुछ पलों में मेरे दिमाग ने जिस्म पर काबू पा लिया, नितु ने आगे बढ़ कर मुझे किस करना चाहा पर मैंने उनके होठों पर ऊँगली रख दी; "अभी नहीं!" मैंने कहा और नितु को कस कर गले लगा लिया. नितु ने एक शब्द नहीं कहा और मेरी बात का मान रखा. हम वापस बिस्तर पर बैठ गए; "तुम्हारा मन था ना?" नितु ने पूछा.

"था.... पर ऐसे नहीं!!!" मैंने कहा.

"तो कैसे?" नितु ने पूछा.

"शादी के बाद! तब तक हम ये दोस्ती का रिश्ता बरकरार रखेंगे! प्यार भी होगा पर एक हद्द तक!"

"अब पता चला क्यों मैं तुमसे इतना प्यार करती हूँ?!" नितु ने फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया, पर इस बार मेरा जिस्म में नियंत्रण में था.

मेरा खुद को और उनको रोकने का कारन था. समर्पण! हम दोनों एक दूसरे को आत्मिक समर्पण कर चुका थे. पर जिस्मानी समर्पण के लिए नितु पूरी तरह से तैयार नहीं थी. इतने महीनों में मैंने जो जाना था वो ये की नितु की संभोग के प्रति उतनी रूचि नहीं जितनी की होनी चाहिए थी. मैं नहीं चाहता था की वो ये सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिए करें और वही गलती फिर दोहराई जाए जो मैंने अश्विनी के लिए की थी!
 
अगले दिन हम तैयार हो कर तोश जाने के लिए निकले, यहाँ की चढ़ाई खीरगंगा के मुकाबले थकावट भरी नहीं थी. यहाँ पर बहुत से घर थे और रास्ता इन्हीं के बीच से ऊपर तक जाता था. ऊपर पहुँच कर हमने वादियाँ का नजारा देखा, नितु को इतना जोश आया की वो जोर से चिल्लाने लगी; " आई लव यू सागर!" मैं खड़ा हुआ उसे ऐसा देख कर मुस्कुरा रहा था. हमने बहुत सारी फोटोज खेंची और वापस कसोल आ गये. शाम की बस थी जो हमें दिल्ली छोड़ती, बस में एक प्रेमी जोड़ा था जिसे देख कर नितु के मन में प्यार उबलने लगा. उसने मेरी बाँह अपने दोनों हाथों में पकड़ ली, जैसे की कोई प्रेमी जोड़ा पकड़ता हे. मैंने फ़ोन निकाला और हमारी कल वाली फोटो पर आये कमैंट्स पढ़ने शुरू किये. ऐसा लग रहा था जैसे सारा बैंगलोर जान गया हो, "तैयार हो जाओ, बैंगलोर पहुँचते ही सब टूट पड़ेंगे!" नितु ने कहा. तभी मेरा फ़ोन बजने लगा; "ओ चिरांद! हमें बताया भी नहीं तू ने और शादी कर ली?" प्रफुल बोला. ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई. "यार अभी की नहीं है!" मैंने हँसते हुए कहा.

"मुझे तो पहले से ही पता था की तुम दोनों का कुछ चल रहा है!" मोहित बोला. दरअसल प्रफुल का फ़ोन स्पीकर पर था.

"उस दिन जब तूने कहा था न की तू एक खुशखबरी बाँटना चाहता है मुझे तभी लगा था की तूम दोनों शादी की बात कहने वाले हो." प्रफुल बोला.

"तब तक हम इतने करीब नहीं आये थे ना!" नितु ने बोला. क्योंकि मेरे फ़ोन में हेडफोन्स लगे थे और एक इयर पीस नितु के पास था और एक मेरे पास.

"भाभी जी! कब कर रहे हो शादी!" मोहित बोला. ये सुन कर हम दोनों ही हँस पड़े और उधर वो दोनों भी हँस पडे.

"मैं तो अभी तैयार हूँ पर सागर मान ही नहीं रहा!" नितु ने बात मेरे सर मढ़ते हुए कहा.

"यार अभी हम कसोल में हैं, पहले घर पहुँचते हैं फिर जरा वर्कआऊट करते हे. चिंता मत करो 'वर दान' तुम ही करोगे!" मैंने कहा, इस बात पर हम चारों हँस पडे.इसी तरह हँसते हुए हम अगले दिन दिल्ली पहुँचे और वहाँ से फ्लाइट ली जिसने हमें बैंगलोर छोडा.अगली सुबह बड़ी प्यारी थी....नितु मुझे उठाने आई और चूँकि वहाँ मैं अकेला सो रहा था तो उसने मेरे गाल पर अपने होंठ रखे और उन्हें अपने मुँह में भर कर धीरे से काट लिया. इस जोरदार किस से मेरा पूरा शरीर हरकत करने लगा. मैने आँखें खोले बिना ही नितु का हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया. "ससस....गुड ..... मॉर्निंग!!!" नितु ने मेरे जिस्म के स्पर्श से सीसियाते हुए कहा. मैंने नितु के माथे को चूमा और कहा; "हॅपी बर्थ डे मल्लिकाय हुस्न जी!" नितु शर्मा गई और अपना सर मेरे सीने पर रख कर लेट गई. तभी मम्मी जी आ गईं और अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोली; "हे राम! सुबह-सुबह तुम दोनों का रोमांस चालु हो गया?!" उनकी आवाज सुनते ही नितु छिटक कर खड़ी हुई और बाहर भाग गई. मैं भी उठ के बैठ गया और मम्मी जी मेरे पास आईं और मेरे कान पकड़ते हुए बोलीं; "चल बदमाश बाहर!" मैं बाहर आया और मेरा कान अब भी मम्मी जी के हाथ में था; "सुनते हो जी? जल्दी से शादी कराओ इनकी, ये दोनों दिन ब दिन पागल होते जा रहे हैं!" मम्मी जी की बात सुन कर मेरे और नितु के गाल शर्म से लाल हो गए और डैडी जी जोर से हँसने लगे. "सॉरी मम्मी जी! नेक्स्ट टाइम से ..... " आगे मैं कुछ कह पाता उससे पहले नितु कूदती हुई नजदीक आई और मम्मी जी के गले लगी और उनके कान में बोली; "नेक्स्ट टाइम से आप हमें पकड़ नहीं पाओगे!" इतना कहते हुए नितु खिलखिला कर हँसी और अपने कमरे में भाग गई. "रुक जा बदमाश!" मम्मी जी मेरा कान छोड़ते हुए बोली. डैडी जी जो ये सब सुन नहीं पाए थे पूछने लगे; "क्या हुआ?"

"ये लड़की है न सच्ची बहुत बदमाश हो गई है!" ये कहते हुए मम्मी जी हँस के डैडी जी के पास जाने लगीं और मेरा हाथ भी पकड़ कर साथ ले गई. मुझे उन्होंने डैडी जी के साथ सोफे पर बिठाया और वो मेरे सामने पफ्फी पर बैठ गईं; "बेटा.... मुझे ये कहने की जरुरत तो नहीं पर फिर भी एक माँ हूँ इसलिए कह रही हूँ, इसका बहुत ख्याल रखना! हम दोनों इसे एक बार लघभग खो चुका था. क्योंकि हम इसे समझ नहीं पाए थे, पर वो तुम थे जिसने हमें इसके जज्बात समझाये! इसके मन में तुम्हारे लिए बहुत प्यार है और मैं जानती हूँ तुम भी इसे बहुत चाहते हो, इसलिए इसे हमेशा खुश रखना, बहुत सारा प्यार देना! वो प्यार भी देना जो हम इसे ना दे पाए!" मम्मी जी ने रुंधे गले से कहा. मैं उनके सामने घुटनों पर बैठ गया और बोला; "मम्मी जी मैं आपसे वादा करता हूँ मैं नितु को बहुत खुश रखूँगा, पूरी कोशिश करूँगा की उसकी आँखों में कभी आँसू ना आये!"
 
डैडी जी ने मेरे सर पर हाथ रखा और कहा; "बेटा मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और शुक्रिया की कल रात तुमने केक का सारा क्रेडिट हमें दिया. वरना हम तो भूल ही गए थे!"

"डैडी जी आप केक लाओ या मैं लाऊँ बात तो एक ही है!" इतना कह कर मैं बैठ गया की नितु अपने कमरे के बाहर से चिल्लाई; "क्या प्लानिंग हो रही है?"

"किसने कहा यहाँ तेरी बात हो रही है?" डैडी जी ने उसे प्यार से डाँटते हुए कहा. पर मुझे अपने मम्मी-डैडी के इतने करीब बैठा देख नितु का दिल गदगद हो उठा!

नहा-धो कर हमें निकलते-निकलते बारह बज गए, नितु डैडी जी की गाडी ड्राइव कर रही थी. उसने पहले गाडी एक ठेके के बाहर रोकी और मुझे रेड वाइन लाने को कहा. मैंने उसके हुक्म की तामील की, फिर उसने कुछ खाने के लिए स्नैक्स लेने को कहा और फिर गाडी एक होटल के बाहर रोक दी. "हम यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैंने पूछा.

"वही जो हम घर पर नहीं कर पाते!" नितु ने मुस्कुराते हुए कहा.

"यार ये सही नहीं है!" मैंने झिझकते हुए कहा.

"क्यों? घर पर मम्मी-डैडी होते हैं और हम साथ बैठ भी नहीं पाते!" नितु ने कहा तो मुझे इत्मीनान हुआ की नितु 'उस' काम के लिए यहाँ नहीं आई हे. हम ने चेक इन किया और रूम के अंदर आये;

"यार बड़ा अजीब सा लग रहा है?" मैंने कहा तो नितु हँसने लगी; "क्यों डर लग रहा है?" नितु ने पूछा.

"ऐसी जगह एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड को लाता है 'उस' काम के लिए!" मैंने शर्माते हुए कहा.

"इसीलिए तो लाई हूँ आपको यहाँ! आप तो मुझे कहीं ऐसी जगह ले जाते नहीं, सोचा मैं ही ले जाऊँ?" नितु ने बिस्तर पर गिरते हुए कहा. मैं नितु की बगल में ही लेट गया और नितु ने अपना सर मेरे सीने पर रख दिया और मेरे दिल की धड़कनें सुनने लगी;

"हाय! आपका दिल तो अभी से रोमांटिक हो गया?" नितु बोली.

"रोमांटिक नहीं डर से धड़क रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा.

"किस बात का डर?" नितु ने हैरान होते हुए कहा.

"जिस काम के लिए यहाँ लाये हो?" मैंने नितु को चिढ़ाते हुए कहा.

"आपका मन नहीं है?" नितु ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा.

मैंने नितु को एक दम से मेरे नीचे किया और उसके ऊपर झुक कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "बेबी ये सब सुहागरात तक बचा रहा हूँ मैं! वो रात हमारी एक दूसरे को सौंप देने की रात होगी!" मैंने कहा.

"और अगर वो रात नहीं आई तो?" नितु ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा.

"क्या? ऐसा क्यों कह रही हो?" मैंने चिंता जताते हुए कहा.

"कल हम आपके घर जा रहे हैं ना, आपको लगता है की मेरा पास्ट जानकार आपके सब घरवाले मान जायेंगे? उन्होंने अगर इस शादी से मना कर दिया तो? हमें मार दिया तो? मरना तो मैं सह लूंगी पर आपकी जुदाई नहीं सह सकती!" नितु ने कहा.

"मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा! समझ आया? रही हमें अलग करने की तो उसका उन्हें (मेरे घरवालों को) कोई हक़ नहीं हे. हमारी शादी तो हो कर रहेगी चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े!" मैंने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा.

"तो मेरे लिए क्या फिर से अपना घर छोड़ दोगे?" नितु बोली.

"हाँ" मैंने इतना कहा और नितु की आँखों में आँखें डाले देखने लगा, वो कुछ कहने वाली थी पर चुप हो गई. उसके होंठ कांपने लगे थे और उसने मुझे किस करने के लिए अपनी बाँहों को मेरी गर्दन पर लॉक कर लिया और मुझे अपने होठों पर झुकाने लगी. मैंने अपनी ऊँगली उसके होठों पर रख दी और उसके दाएँ गाल को चूम लिया. नितु मुस्कुरा दी और बोली; "वैसे आपको सुबह वाली किसी कैसी लगी?"

"बहुत अच्छी, और आगे से मुझे ऐसे ही जगाना!" मैंने हँसते हुए कहा.
 
हम दोनों उठे और नितु ने गिलास में वाइन डाली और खाने के लिए जो स्नैक्स लिए थे वो खोले और मैं वाशरूम में फ्रेश होने गया.फ्रेश हो कर आया तो नितु पलंग पर बेडपोस्ट को सहारा ले कर बैठी थी और टी.वी. जोर से चल रहा था. मैं भी जूते उतार कर उसकी बगल में बैठ गया;

"टी.वी. की आवाज कम कर दो वरना लोग सोचेंगे की यहाँ 'गर्मागर्म' प्रोग्राम चल रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा.

"सही है, उन्हें लगना भी चाहिए!" नितु ने हँसते हुए कहा.

कुछ देर बाद नितु ने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा सर अपनी गोद में रखा, मेरी शर्ट का कालर पकड़ कर नीचे की तरफ किया जिससे मेरी गर्दन उसे साफ़ नजर आने लगी. धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरी गर्दन पर रखे और धीरे-धीरे अपनी जीभ से चुभलाने लगी. पता नहीं उसे इसमें क्या मजा आता था पर अगले दस मिनट तक वो इसी तरह मेरी गर्दन के माँस के टुकड़े को कभी धीरे से काटती, कभी उसे चुभलाती और कभी उसे चूसने लगती. दस मिनट बाद जब नितु ने मेरी गर्दन पर से अपने गुलाबी होंठ हटाए तो जितना हिस्सा उसके मुँह में था वो लाल हो चूका था और नितु के मुख के रस की तार मेरी गर्दन और उसके होठों को जोड़े हुए थी. मेरी आँखें बंद थीं जो ये बता रही थीं की मुझे कितना मज़ा आ रहा है! नितु की नजर मेरे अकड़ चुके लिंग पर पड़ी और वो उभार देख उसकी सांसें थम गई. संभोग का डर उसे सताने लगा और उसके हाथ-पाँव काँपने लगे! मेरी आँखें खुलीं और उसकी तेजी से ऊपर-नीचे होती छातियां देख मैं उसके डर को भाँप गया.मैं उठ कर बैठा तो नितु का दिल जोर से धड़कने लगा, मैंने नितु की तरफ देखा तो उसने अपनी आँखें झुका ली. मैं सीधा हो कर तकिये पर सर रख कर लेट गया और अपने दोनों हाथ खोल कर नितु को अपने पास बुलाया. नितु का डर एक सेकंड में फुर्र हो गया और वो आ कर मेरे सीने से लिपट गई और हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे. जब नितु के दिल की धड़कन सामन्य हुई तो मैंने उसके कान में खुसफुसाती हुए कहा; "मेरा बेबी डर गया था? आपको क्या लगा की मैं......संभोग....." मैंने थोड़ा अटकते-अटकते कहा और ये सुन नितु ने हाँ में सर हिलाया. "आववव्वव्व .... मेरा बेबी! डोन्ट वरी!" फिर हम ऐसे ही लिपटे सो गए, वाइन की कुछ खुमारी थी बाकी नितु के जिस्म की गर्माहट जिसने मुझे और नितु को सुला दिया.

शाम ५ बजे डैडी जी का फ़ोन आया तब हम उठे और मुँह-हाथ धो कर निकले और घर पहुंचे. कपडे बदल कर हम सब निकले, आगे मैं और डैडी जी बैठे थे और पीछे नितु और मम्मी जी.पार्किंग में गाडी पार्क कर के हम सब अंदर जा रहे थे की मैंने एक कॉल का बहाना बनाया और १० मिनट के लिए बाहर रुक गया! मैं जल्दी से अंदर आया तो नितु की नजरें बस मुझे ही ढूँढ रही थी. "सॉरी जी....वो घर से कॉल आया था!" मैंने डैडी जी को झूठ बोलते हुए कहा. नितु घर का कॉल सुनते ही थोड़ा चिंतित हो गई. मैंने गर्दन ना में हिला कर उसे कहा की कोई सीरियस बात नहीं है तब जा कर उसे इत्मीनान हुआ. खाना आर्डर हुआ और वहाँ बॉलीवुड के गाने बजने लगे, कोई शोर शराबा नहीं था बस सॉफ्ट म्यूजिक बज रहा था. इधर मम्मी जी ने मेरी गर्दन पर लाल निशान देख लिया और पुछा की ये कैसे हुआ, मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा "एक मच्छर ने काट लिया!" ये सुनते ही नितु ने टेबल के नीचे से मुझे पैर मारा और मैं हँसने लगा. डैडी जी मेरी बात समझ गए और वो भी हँस पडे. नितु ने जब उन्हें हँसते हुए देखा तो वो शर्म से लाल हो गई.

फिर डैडी जी ने शादी की बातें शुरू की, वो मेरे घर आना चाहते थे और मैंने उन्हें कहा कि कल नितु को मिलवा कर वापस आता हूँ और फिर आप सब मिल लीजियेगा, इतने में खाना आया और हमने खाना शुरू किया. डेजर्ट आर्डर करने के बाद मम्मी जी और नितु वाशरूम चले गए और मुझे डैडी जी से कुछ पूछने का मौका मिल गया."डैडी जी.... एक बात पूछनी थी?" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा.

"क्या हुआ बेटा? बोलो?" डैडी जी ने मुझे इज्जाजत दी फिर भी मैंने थोड़ा डरते हुए कहा; "वो.......वो मैं ....नितु को अभी प्रोपोज़ करना चाहता था!" डैडी जी ने कहा; "भई इसमें पूछने की क्या बात है?" कुछ देर बाद जब नितु और मम्मी जी आये तो मैंने खड़े हो कर नितु का हाथ पकड़ लिया और उसे बैठने नहीं दिया. मैं एक घुटने पर झुका और जेब से रिंग की डिब्बी निकाली और कहा; "थोड़ा बुद्धू हूँ, थोड़ा स्टुपिड हूँ, थोड़ा पागल हूँ पर जैसा भी हूँ तुमसे बहुत प्यार करता हूँ! विल् यू म्यारी मी?" नितु ख़ुशी से कूद पड़ी और हाँ में गर्दन हिलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे कर दिया. मैंने नितु को अंगूठी पहनाई और उठ के खड़ा हुआ. नितु फ़ौरन मेरे गले से लग गई और बोली; "आई लव यू!" मम्मी-डैडी भी उठ खड़े हुए और हमें अपने गले लगा लिया. बहुत सारा आशीर्वाद दिया और बहुत सारा प्यार दिया. डेजर्ट आ गया था और वो खाने के बाद डैडी जी ने जबरदस्ती बिल पे किया. फिर हम घर आ गये, मम्मी जी ने सब को सोने के लिए कहा क्योंकि कल सुबह नितु और मुझे घर के लिए जल्दी निकलना था. पर नितु कहाँ सोने वाली थी. चेंज करने के बाद मैं पानी पीने किचन जा रहा था की वो मुझे खींच कर सोफे पर ले आई. टी.वी ऑन कर के हम दोनों बैठ गए, ड्राइंग रूम में आज काफी सर्दी थी पर नितु ने सारि तैयारी कर रखी थी. नितु ने एक डबल वाला कंबल अपने और मेरे ऊपर डाल दिया. अपने घुटने उसने अपनी छाती से चिपका लिए और मेरे कंधे पर सर रख कर टी.वी. देखने लगी. "बेबी! आज रात सोना नहीं है क्या?" मैंने खुसफुसाते हुए कहा. नितु ने ना में गर्दन हिलाई और कंबल के अंदर मेरा दायाँ हाथ पकड़ लिया. दस मिनट बाद मम्मी जी नितु को बुलाने आई; "बेटी सो जा और सागर को भी सोने दे! कल सुबह तुम दोनों को जाना है!"
 
"मम्मी मैं बस थोड़ी देर में आ रही हूँ!" नितु ने उनकी तरफ देखते हुए कहा. मम्मी जी मुस्कुरा दीं और सोने चली गई. उनके जाते ही नितु ने मेरी गोद में सर रख दिया; "वैसे बेबी ....थैंक यू!" मैंने कहा.

"क्यों?" नितु ने पूछा.

"आपने मेरा इतना ध्यान रखा, एक पल भी मेरा ध्यान साक्षी पर जाने नहीं दिया. उसके लिए..." मैंने कहा तो नितु मुस्कुरा दी फिर कुछ सोचते हुए बोली; "आज रात हम यहीं सोते हैं?"

"क्यों बेबी? मैंने थोड़ा हैरान होते हुए कहा.

"बस ऐसे ही, आज आप से अलग सोने को मन नहीं कर रहा है!" मैं समझ गया की उसके मन में कल के लिए डर पैदा हो चूका हे.

"बेबी कल कुछ नहीं होगा! एवरीथिंग विल् बी फाइन!" मैंने नितु को आश्वासन दिया पर उसका दिल इस आश्वासन को मानने वाला नहीं था.

"कल अगर हम नहीं रहे.... तो कम से कम ये रात तो याद रहेगी ना?" नितु की आँखें छलक आई. मैंने नितु को उठा के बिठाया और उसके चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया; "तुम्हें पता है आज ही मैंने मम्मी-डैडी से वादा किया है की मैं तुम्हारी आँखों में आँसू का एक कतरा नहीं आने दूँगा और तुम हो की रो रही हो? क्यों मुझे झूठा बना रही हो?आई प्रॉमिस तुम्हें कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा.

"और अगर आपको कुछ हो गया तो? मैं तो तब भी मर जाऊँगी!" नितु ने अपने आँसू पोछते हुए कहा.

'किसी को कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा पर इस बार मेरी बात में वजन कम था. मैं मन ही मन तैयारी कर चूका था की अगर हालत बिगड़े और हालत ऐसे बने जैसे तब बने थे जब भाभी वाला काण्ड हुआ तो मुझे कैसे भी कर के नितु को बचाना हे. उसे मेरी वजह से कुछ नहीं होना चाहिए! उस काण्ड के बारे में सोचते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे!सुबह नाहा धो कर तैयार हुए और नाश्ता कर के मैं और नितु मम्मी-डैडी का आशीर्वाद ले कर निकले.मम्मी-डैडी ने कहा था की अगर मेरे घर वाले नहीं माने तो वो खुद चल कर बात करेंगे और हम दोनों बस मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिला कर रह गए थे. घर के बाहर से ऑटो किया और ऑटो मैंने बैठते ही नितु ने मेरा हाथ थाम लिया, आज नितु की पकड़ में कठोरता थी और डर भी छलक रहा था. ऑटो से हम बस स्टैंड उतरे और फिर बस में बैठ गये. बस में भी नितु ने हाथ पकड़ा हुआ था. मैंने नितु का हाथ एक बार चूमा और नितु के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. कुछ देर बाद जब बस हॉल्ट के लिए रुकी तो मैंने घर फ़ोन कर दिया; "जी पिताजी.... मैं बस रास्ते में हूँ....हाँ जी...मेरे साथ ही है... जी एक बजे तक पहुँच जाऊंगा. आप सब घर पर ही हैं ना? जी ठीक है... ओके जी!" मैंने कॉल काटा और नितु बोली; "क्या कहा पिताजी ने?"

"वो पूछ रहे थे की अपने बिज़नेस पार्टनर को साथ ला रहा है ना? और फिर मैंने पुछा की सब घर पर ही हैं ना तो उन्होंने कहा की सब हमारा ही इंतजार कर रहे हैं." ये सुन कर नितु के दिल की धड़कनें तेज हो गईं, उसके हाथ काँपने लगे थे. मैंने नितु को कस कर अपने गले लगा लिया और नितु ने जैसे-तैसे खुद को संभाला. कुछ समय बाद बस ने हमें बस स्टॉप उतारा और वहाँ से १५ मिनट की वॉक थी. मैं और नितु हाथ पकडे चल रहे थे और हर एक कदम आगे बढ़ाते हुए दोनों के दिलों की धड़कनें तेज होती जा रही थी. जब मुझे घर दूर से दिखाई देने लगा तो मैंने बात शुरू की; "बेबी! अगर मैं आपसे कुछ माँगू तो आप दोगे?"

"हाँ" नितु ने एक दम से कहा.

"प्रॉमिस?" मैंने पूछा.

"प्रॉमिस!" नितु ने आत्मविश्वास से कहा.

"अगर अभी हालात बिगड़े और बात मरने-मारने की आई तो आप यहाँ से भाग जाओगे! मैं जितनी देर तक हो सकेगा सब को रोकूँगा पर आप बिना पीछे मुड़े भागोगे! मेरे अल्वा यहाँ आपको कोई नहीं जानता, आपके घर का पता कोई नहीं जानता तो आप यहाँ बिलकुल नहीं रुकोगे! समझे?" मैंने एक साँस में कहा. ये सुनते ही नितु एकदम से ठिठक कर रुक गई. उसकी आँखें भर आईं और वो ना में गर्दन हिलाने लगी. "नितु आपने अभी प्रॉमिस किया था ना?" पर नितु अब भी ना में गर्दन हिला रही थी. मैंने नितु के दोनों कंधे पकडे और उसे समझाया; "बेबी...मैंने मम्मी-डैडी को प्रॉमिस किया था.... मेरा परिवार कैसे रियाक्ट करेगा मुझे नहीं पता ये सिर्फ एक इमरर्जन्सी प्लॅन है! कम से कम आप भाग कर मेरे लिए मदद तो ला पाओगे ना? प्लीज... इस सब में आपको कुछ नहीं होना चाहिए! प्लीज....मेरी बात मानो! आपको मेरी कसम!" मेरे पास जो भी तर्क थे मैंने वो सब दे डाले पर नितु नहीं मानी! "मरना है तो साथ मरेंगे!" नितु ने रोते हुए कहा. नितु की बात सुन कर मुझे उस पर गर्व हो रहा था. वो पीठ दिखा के भागना नहीं चाहती थी बल्कि मेरे साथ कंधे से कन्धा मिला कर हालात से लड़ना चाहती थी! मैंने नितु के आँसू पोछे और उसका हाथ पकड़ कर फिर से घर की ओर चल दिया.

जब घर करीब ५० कदम की दूरी पर रह गया तो नितु ने मेरा हाथ छोड़ दिया ताकि हमें कोई ऐसे ना देख ले.आखिर घर पहुँच कर मैंने दरवाजा खटखटाया और दरवाजा ताऊ जी ने खोला, जहाँ मुझे देख कर उन्हें ख़ुशी हुई वहां जैसे ही उनकी नजर नितु पर पड़ी उनके ख़ुशी फ़ाख्ता हो गई! वो बिना कुछ बोले अंदर आ गए और आंगन में सब के साथ बैठ गये. "ताऊ जी, ताई जी, माँ, पिताजी, भाभी और भैया ये हैं नीता साहिवाल, मेरी बिज़नेस पार्टनर जिसने मेरे मुश्किल समय में मुझे संभाला और फिर अपने साथ बिज़नेस में पार्टनर की तरह काम करने का मौका दिया." ये सुनने के बाद ताऊ जी को इत्मीनान हुआ, उन्हें लगा था की मैं और नीता शादी कर के यहाँ आये हैं!

नितु ने सब को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और एक-एक कर सब के पाँव छुए.सब ने उसे आशीर्वाद दिया और ख़ास कर माँ ने उसे अपने गले लगा लिया! "बेटी...मेरे पास शब्द नहीं है..... तेरा बहुत बड़ा एहसान है!" माँ ने रुंधे गले से कहा. "माँ एहसान कह कर मुझे शर्मिंदा मत करो!" नितु ने बड़े प्यार से माँ से कहा. अश्विनी उस वक़्त सबसे पीछे खड़ी थी और चूँकि मैं ने अश्विनी से नितु का तार्रुफ़ नहीं कराया था इसलिए वो सड़ी हुई सी शक्ल ले कर पीछे खड़ी रही. नितु उसके पास नहीं गई और गोपाल भैया से नमस्ते कर के वापस मेरे साथ खड़ी हो गई. "बहु बेटा चाय रखो!" ताऊ जी ने भाभी से कहा पर मैंने भाभी को रोक दिया; "भाभी रुक जाओ, आप बैठो कुछ बात करनी है!" मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा. "पिताजी कुछ दिन पहले आप ने कहा था ना शादी कर ले! तो मैंने नितु से शादी करने का फैसला किया हैं!" मैंने एक गहरी सांस ली और पूरी हिम्मत जुटाते हुए कहा. घर वाले कुछ कहते उसके पहले ही अश्विनी पीछे से बोल पड़ी; "अच्छा? ये तो वही हैं ना जिनके पति के यहाँ आप पहले ऑफिस में काम करते थे! फि उसी पति ने कोर्ट में डाइवोर्स का केस किया था और कहा था की तुम्हारे इनके साथ नाजायज तालुकात हैं!" ये सुनते ही मैं गुस्से से उठने लगा तो नितु ने मेरा हाथ पकड़ के रोक दिया. उसे भी जानना था की अश्विनी के मन में कितना ज़हर भरा हैं! "और हाँ...वो बंबई जाना, ट्रैन में इनका आपकी गोद में सर रख कर लेटना प्रकाश भैया के चाचा ने भी तो देखा था ना? फिर एक ही होटल में, एक ही कमरे में मिस्टर अँड मिसेस सागर मौर्य बन कर रात बिताना! ये सब भी तो बताओ!" अश्विनी बोली और फिर वही घिनौनी हँसी उसके होठों पर आ गई! ये सब सुन कर सारे घर वाले अवाक मुझे देखने लगे.

"ये सच हैं की मैं नीता के पति के ऑफिस में ही काम करता था पर तब हमारा रिश्ता सिर्फ एक मालिक और नौकर का था. मुंबई जाने का प्लान बॉस ने बनाया था और मुझे फँसाने के लिए उसने मुझे इनके साथ भेजा था. ट्रैन में कुछ नहीं हुआ, वहाँ मेरी गोद में इनका सर रख कर लेटना सिर्फ और सिर्फ इसलिए था क्योंकि हमारी बोगी में दो गुंडे जैसे लड़के थे जो नीता को गन्दी नजर से देख रहे थे. हम ने बस मिल के नाटक किया ताकि वो कोई गलत हरकत न करें! मुंबई पहुँचते-पहुँचते हमें देर रात हो गई थी. वहाँ कोई होटल नहीं मिला तो मजबूरन हमें एक कमरे में रात गुजारनी पड़ी वो भी अलग-अलग बिस्तर पर! पिताजी, ताऊ जी आप तो मुझे जानते हैं क्या आपको लगता हैं की मैं कभी किसी की मजबूरी का कोई फायदा उठाऊँगा? या कोई ऐसी हरकत करूँगा? वो आदमी बहुत नीच था और इनसे छुटकारा पाना चाहता था. उसने इन्हें कभी कोई सुख नहीं दिया. पत्नी होने का कोई एहसास नहीं दिलाया और दिलाता भी कैसे उसका खुद बाहर चक्कर चल रहा था!" मैंने घर वालों को सारी सफाई दी.
 
"कमाल है! अब तक तो सुना था की काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय एक लीक काजल की लागे है तो लागे है, पर यहाँ तो सब के दामन दूध के धुले हैं!" अश्विनी फिर बोली और ये सुनते ही मैं भुनभुना गया और जोर से चिल्लाया; "शट दीं फक अप!" मेरी गर्जन सुन ताऊ जी गुस्से में दहाड़े; "तेरा दिमाग खराब हो गया है? होश में है या नशा कर के आया है? ये लड़की ना हमारी ज़ात की, ऊपर से तलाकशुदा!"

"उम्र में भी बड़ी है!" अश्विनी फिर चुटकी लेते हुए बोली पर इस बार ताऊ जी ने उसे गुस्से से चुप करा दिया; "मुँह बंद कर अपना!"

क्या ज़ात-पात देख रहे हैं आप ताऊ जी? हमारी कौन से ज़ात वाले ने आज तक मदद की है? जब घर के हालात खराब थे तब किसने आ कर पुछा था?" मैंने ताऊ जी से पूछा. मेरा आत्मविश्वास देख उनका गुस्सा भड़क उठा और वो अपने कमरे में तेजी से घुसे और दिवार पर टंगी दुनाली ले आये. दुनाली का मुँह नितु की तरफ था और हालाँकि अभी तक ताऊ जी ने बन्दूक नितु पर तानी नहीं थी पर मुझे नितु के लिए डर लगने लगा था. इधर नितु भी बहुत घबरा गई थी. मैं तुरंत नितु के आगे आ गया ताकि अगर गोली चले भी तो पहले मुझे लगे नितु को नही. घरवाले सब डरे-सहमे खड़े थे, माँ, ताई जी और भाभी रो रही थीं और पिताजी सर झुकाये खड़े थे. वो आज तक अपने बड़े भाई के खिलाफ नहीं गए थे. "ताऊ जी किसे गोली मारेंगे आप? इस लड़की को जिसने मेरी जान बचाई! मर गया होता मैं और आपको तो मेरी लाश देखना भी नसीब नहीं होती अगर ये लड़की ना होती तो!" मैंने कहा पर ताऊ जी पर इसका तर्री भर भी असर नहीं हुआ. वो फिर से गुस्से से चिंघाड़ते हुए बोले; "तुझे शहर जाने देना मेरी सबसे बड़ी भूल थी. ना तू वहाँ जाता ना इस लड़की की बातों में आता!"

"मैं किसी की बातों में नहीं आया! आपको इस शादी से समस्या क्या है? आपने अश्विनी की शादी के समय तो कुछ नहीं कहा? वो मंत्री कौन सा हमारी ज़ात का था? उसने तो सारे काम ही गंदे किये थे, कितने लोगों के खून से हाथ रेंज थे उसके! नितु के माँ-बाप तो सीधे-साढ़े पढ़े लिखे लोग हैं!" मैंने कहा.

"वो ऊँची ज़ात का था...." ताऊ जी गुस्से से बोले और उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही मैं बोल पड़ा; "तो ये कौन सी किताब में लिखा है की अपने से ऊँची ज़ात में शादी करो पर नीची ज़ात में नहीं! और आपको क्या लगता है की मंत्री ने अपने बेटे की शादी अश्विनी से क्यों की? अपने बेटे के प्यार के आगे झुक कर और अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए वो आपके घर आया था!" मैंने एकदम सच बात कही जो ताऊ जी को बहुत चुभी और उन्होंने फ़ौरन बन्दूक मेरे ऊपर तान दी! माँ, ताई जी और भाभी सब ताऊ जी से गुहार करते रहे की वो ऐसा ना करें पर ताऊ जी के कान उनकी गुहार नहीं सुन सकते थे! पिताजी भी उन्हें रोकने को दो कदम बढे पर ताऊ जी की आँख में अंगारे देख रुक गए और सर झुका कर खड़े हो गये. इधर मैं और नितु समझ चुका था. की आज के दिन हम दोनों ही आज मार दिए जायेंगे और शायद इसके बारे में किसी को पता भी ना चले! नितु पीछे खड़े रोने लगी थी और उसके रोने की आवाज सुन कर मेरा दिल बहुत दुःख रहा था. मुझे कैसे न कैसे करके नितु को यहाँ से निकालना था. पर मुझे ताऊ जी के सामने अडिग खड़ा देख कर नितु में हिम्मत आ गई और वो पीछे से निकल कर मेरे सामने खड़ी हो गई और बोली; ताऊ जी रुक जाइये! आपको जान लेनी है तो मेरी ले लीजिये, इनकी (सागर की) जान ले कर आप सारी उम्र खुद को माफ़ नहीं कर पाओगे. मैं तो वैसे भी इस घर की नहीं हूँ तो मेरी जान ले कर आपको उतना दुःख नहीं होगा!" मैं ने नितु का हाथ पकड़ लिया और उसे पीछे करने जा रहा था की ताऊ जी बोल पड़े; "मुझे तेरी जान लेने का भी कोई शौक नहीं है! निकल जा इस घर से भी और सागर की जिंदगी से भी!" ये सुनते ही नितु ने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ा लिया और रोती हुई जाने को पलटी, पर मैंने उसका हाथ एक बार फिर पकड़ लिया; "मर तो मैं वैसे भी जाऊँगा!" मैंने कहा तो नितु एक पल को रुकी और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं यहाँ आपको आपके परिवार के हाथों मरवाने नहीं आई थी. मैं तो यहाँ सब का आशीर्वाद लेने आई थी! पर अगर ताऊ जी नहीं चाहते की ये शादी ना हो तो, मैं बस उनसे आपको माँग सकती हूँ छीन नहीं सकती! अपने परिवार के बिना आप कितना तड़पे हो ये मैंने देखा है और फिर उसी तरह तड़पते हुए नहीं देखना चाहती!" नितु ने रोते हुए कहा. "तो तुम भी मुझे छोड़ दोगी? फिर उसी हाल में जिससे बाहर निकाला था?" अब तो मेरे आँसूँ भी बह निकले थे! "मजबूर हूँ!" नितु ने बिलख कर रोते हुए कहा. मैंने तेजी से नितु को अपने पास खींचा और उसे अपने गले लगा लिया और आँखों में गुस्सा लिए ताऊ जी को देखा और जोर से चिल्लाया; "मार दो हम दोनों को! और इसी आंगन में गाड़ देना! रोज हमारी कबर पर बैठ कर अपनी इज्जत और शानोशौकत की पीपड़ी बजाते रहना." इतना कह कर मैं नितु को खुद से समेटे हुए बाहर की तरफ बढ़ने लगा. ताऊजी मेरी गर्जन सुन कर काँप गए थे पर उनका अहम उनके ऊपर हावी था! उन्होंने दुनाली मेरी पीठ पर तान दी, सेफ्टी लॉक खोला और ट्रिगर दबाया......... धाँय!!! गोली चली और छत पर जा लगी. पिताजी ने आगे बढ़ कर ताऊ जी की बन्दूक की नली छत की तरफ कर दी थी जिससे गोली छत में जा घुसी! मैं और नितु एक दम से रुक गए, नितु को लगा की वो गोली मेरे जिस्म में घुसी है और उसके प्राण सूख गए, पर जब उसने मुझे ठीक ठाक देखा तो उसकी जान में जान आई. इधर अश्विनी को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसे उसके हिस्से की ख़ुशी लगभग मिल ही गई हो!
 
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