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Romance अनैतिक

हम दोनों पलटे और देखा की पिताजी जीवन में पहलीबार अपने बड़े भाई की आँखों में आँखें डाल कर देख रहे हैं और तेजी से सांस ले रहे हे.

"ये आप क्या करने वाले थे भाईसाहब? मेरे बेटे पर गोली चलाई आपने? मेरे बेटे पर?" इतना कहते हुए पिताजी ने झटके से उनके हाथ से बन्दूक छीन ली और दूर फेंक दी. "रुक जा सागर, तू कहीं नहीं जाएगा! आजतक मैने हर वो काम किया है जो इन्होने (ताऊ जी ने) कहा, चाहे सही या गलत अपने बड़े भाई का हुक्म समझ मैं वही करता आया. इन्होने उस दिन कहा की सागर को घर से निकाल दे तो मैंने वो भी किया पर आज इन्होने तुझ पर बन्दूक तान दी और गोली चलाई, ये मैं नहीं सहन करूँगा!" पिताजी बोले और ताऊ जी बस पिताजी को घूरते रहे. इधर मेरी माँ भाभी का सहारा ले कर आगे बढ़ी और ताऊ जी से बोली; "ब्याह के बाद मैंने आपको और दीदी को अपने माँ-बाप माना और आप दोनों ने भी मुझे बेटी की तरह प्यार दिया. बेटे को खो देने का गम मैं जानती हूँ, भले ही पिछली बार मैं कुछ बोल नहीं पाई पर सागर की कमी मुझे हमेशा खलती थी! आप भी तो जानते हो की बेटा जब घर नहीं होता तो घर का क्या ख्याल होता है? गोपाल भैया जब अस्पताल में था तब आप ने दीदी की हालत देखि थी ना? मुझ में अब अपने बेटे को दुबारा खोने की ताक़त नहीं है, आजतक मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा.....आज पहली और आखरी बार माँगती हूँ..." माँ ने अपना आँचल ताऊ जी के सामने फैला दिया और बोलीं; मेरी झोली में मेरे बेटे का प्यार डाल दो, उसे इसी लड़की से शादी करने दीजिये!" माँ की हिम्मत देख ताई जी और भाभी भी माँ के साथ खड़े हो गये."सागर की हालत देखि थी न उस दिन? क्या करेंगे हम जी कर हमारे बच्चे ही खुश नहीं हैं तो?" ताई जी रोती हुई बोली. "पिताजी सागर अब बच्चा नहीं हैं, सोच समझ कर फैसला लेते हैं! आप ने कितनी बड़ाई की है सागर की और आज आप गुस्से में कैसी अनहोनी करने जा रहे थे?" गोपाल भैया बोले. भाभी कुछ बोल ना पाइन क्योंकि वो ताऊ जी से बहुत डरती थीं इसलिए उन्होंने केवल ताऊ जी के आगे हाथ जोड़ दिये. घर के सारे लोग मेरी तरफ आ चुका था.

खुद को यूँ अकेला देख ताऊ जी की आँखें झुक गई. उन्हें एहसास हुआ की उनका झूठा घमंड लगभग हमारे परिवार का अंत कर देता. ताऊ जी आँखों से पछतावे के आँसूँ बह निकले, उन्होंने अपनी बाहें खोल कर मुझे और नितु को अपने पास बुलाया. हम दोनों जा कर ताऊ जी के गले लग गए और ताऊ जी ने हम दोनों के सर चूमे और बोले; "मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों! मैं गुस्से से अँधा हो चूका था! तुम सब ने आज मेरी आंखें खोल दीं! तुम दोनों की शादी बड़े धूम धाम से होगी और तुम दोनों को वो हर एक ख़ुशी मिलेगी जो मिलनी चाहिए. इतना कहते हुए ताऊ जी पिताजी के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़े.

पिताजी ने एक दम से ताऊ जी के दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके गले लग गए और बोले; "नहीं भैया ...मैं आपसे छोटा हूँ...आज जो जुर्रत की उसके लिए माफ़ कर देना!" पिताजी रोते हुए बोले; "नहीं छोटे...तूने आज मेरी आँखें खोल दी!" ताऊ जी रोते हुए बोले. फिर ताऊ जी ने भाभी से कहा की वो साक्षी को ले कर आएं और जैसे ही भाभी सीढ़ी की तरफ गईं अश्विनी उनके सामने खड़ी हो गई और उनका रास्ता रोक लिया. भाभी कुछ बोलती उससे पहले ही ताऊ जी तेजी से अश्विनी के पास पहुंचे और एक जोरदार थप्पड़ उसे मारा; "आग लगाने आई थी तू यहाँ? मंथरा!!!! जा बहु ले कर आ साक्षी को!" अश्विनी डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी हो गई! जैसे ही भाभी ने ऊपर जा कर अश्विनी के कमरे का दरवाजा खोला की उन्हें साक्षी के रोने की आवाज सुनाई दी! गोली की आवाज से साक्षी जाग गई थी और जोर-जोर से रो रही थी! मैंने जैसे ही ये आवाज सुनी मैं तुरंत ऊपर दौड़ता हुआ पहुंचा. भाभी अभी साक्षी को गोद में उठाने ही वाली थीं की मैंने उसे उनसे पहले उठा लिया और उसे एक दम से अपनी छाती से चिपका लिया. "मेरा बच्चा......!!!" इतना ही कह पाया. आज कई दीन बाद एक पिता को उसकी बेटी मिली थी और अंदर से आँसूँ बह निकले. जब मैं नीचे आया तो ताऊ जी अश्विनी को डाँट रहे थे; "कैसी माँ है तू? अपनी नन्ही सी बेटी को कमरे में बंद रखती है? जा बुला ले जिस मर्जी कोतवाल को में देखता हूँ की क्या करता है!" ताऊ जी ये कहते हुए मेरी माँ के सामने आये और हाथ जोड़ते हुए बोले; "मुझे माफ़ कर दे बहु! मैं तेरा कसूरवार हूँ, तुझे तेरे बच्चे से दूर करने का पाप किया है मैंने!"

"भाईसाहब जो हुआ सो हुआ, अब बस इस घर में फिर से खुशियां गूंजने लगे मैं बस यही चाहती हूँ!" माँ बोली. तब तक मैं साक्षी को ले कर नीचे आ गया था और मेरी गोद में आते ही साक्षी का रोना बंद हो गया था और उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं थी. "देख रहे हो आप (ताऊ जी), आज दो दिन बाद इस घर में साक्षी की किलकारियाँ गूँज रही हैं? तेरे जाने के बाद सागर ये एकदम से गुमसुम हो गई थी!" ताई जी बोली. मैंने साक्षी के माथो को चूमा तो उसने एकदम से मेरी ऊँगली पकड़ ली और उसकी किलकारी की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी. नितु हसरत भरी आँखों से मुझे साक्षी से प्यार करते हुए देख रही थी. जब मेरा ध्यान नितु पर गया तो मैंने उसे साक्षी को दिया. साक्षी को गोद में लेते ही नितु को उसकी ममता का एहसास जीवन में पहली बार हुआ. उसकी आँखें एक दम से भर आईं और उसने साक्षी को अपनी छाती से लगा लिया. जहाँ मैं ये देख कर अंदर ही अंदर ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था वहीँ दूसरी तरफ अश्विनी जल के राख हो चुकी थी. उसकी नफरत उसके चेहरे से दिख रही थी पर वो ताऊ जी के डर के मारे कुछ नहीं कर पा रही थी. वो गुस्से में पाँव पटकते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गई. इधर नितु साक्षी को अपनी छाती से लगाए हुए माँ और ताई जी के पास बैठ गई. वहीँ ताऊजी, पिताजी और गोपाल भैया ने मुझे अपने पास बिठा लिया. फिर जो बातें शुरू हुईं तो मैंने घरवालों को सब कुछ बता दिया. अब जाहिर था की ताऊजी ने नितु के घरवालों से मिलने की ख्वाइश प्रकट करनी थी. मुझे उसी वक़्त कहा गया की परसों ही सब को मिलने बुलाओ और चूँकि आज शाम होने को है तो कल मैं नितु को सुबह छोड़ने जाऊ.
 
मैंने फ़ोन मिलाया और ताऊ जी ने बात करने के लिए मुझसे फ़ोन लिया. उन्होंने बड़े प्यार से डैडी जी से बात की और उन्हें परसों आने का न्योता दिया. साथ ही ये भी कह दिया की अभी समय बहुत हो गया है तो आज 'नीता बिटिया' यहीं रुकेगी और कल सागर आपके पास छोड़ आयेगा. चाय बनने लगी तो नितु ने भाभी की मदद करनी चाही पर भाभी मजाक करने से बाज नहीं आईं और बोलीं; "अरे पहले शादी तो कर लो! उसके बाद ये सब तुम्हें ही करना है!" ये सुन कर सारे लोग हँस पड़े और घर में हँसी का माहौल बन गया.कोई अगर दुखी था तो वो थी अश्विनी जो ऊपर अपने कमरे में बैठी जल-भून रही थी! माँ और ताई जी ने नितु से बहुत से सवाल पूछे और मेरी बताई गई बातों को वेरीफाई किया गया, तथा मेरी बचकानी हरकतों के बारे में भी नितु को आगाह किया गया.कुल मिला कर कहें तो आज हमारे घर में खुशियाँ लौट आईं थी!नितु और मैं हम दोनों ही बहुत खुश थे और हमारी ख़ुशी दुगनी हो गई थी साक्षी को पा कर...... पर हम चाह कर भी साक्षी को माँ-बाप वाला प्यार नहीं दे सकते थे क्योंकि साक्षी की माँ यानी अश्विनी ये कभी नहीं होने देती!

रात का खाना बनने तक मैं साक्षी को अपनी छाती से चीपकाये रहा और घर के सब मर्दों के बीच रह कर बातें करता रहा. चूँकि ये घर के एकलौते कुंवारे लड़के की शादी थी और वो भी परिवार की आखरी शादी तो सब के मन में उत्साह भरा हुआ था. अश्विनी की दूसरी शादी की तरफ किसी ने तवज्जो नहीं दी थी क्योंकि अब घर वालों को अश्विनी के पागलपन से पीछा छुड़ाना था. ताऊ जी ने पूरे घर का रंग-रोगन का काम गोपाल भैया को सौंप दिया. और परसों के दिन जो नितु के मम्मी-डैडी का स्वागत होना था उसकी जिम्मेदारी उन्होंने पिताजी और अपने सर ले ली थी. "बेटा एक बात तो बता?" पिताजी थोड़ा हिचकते हुए बोले. "हाँ जी बोलिये?" मैंने साक्षी से अपना ध्यान उनकी तरफ करते हुए कहा. "बेटा....तू हमारा रहन-सहन तो जानता हे. अब बहु के घरवाले वो क्या सोचेंगे? क्या उन्हें ये रंग-ढंग जमेगा? मेरा मतलब ....वो ठहरे शहर में रहने वाले और हम ठहरे देहाती!" पिताजी बोले और ताऊ जी ने उनकी बात का समर्थन करते हुए हाँ में गर्दन हिलाई."ताऊ जी, पिताजी वो लोग बस आपका अपनी बेटी के लिए प्यार देखना चाहते हे. बाकी उन्हें हमारे रहन-सहन से कोई परेशानी नहीं होगी. वो लोग जमीन से जुड़े लोग हैं और किसी भी तरह का कोई दिखावा नहीं करते." मैंने सब सच ही कहा था. क्योंकि जितने भी दिन मैं वहां रहा था उतने दिन मुझे मम्मी-डैडी के बर्ताव में कोई भेदभाव या घमंड नजर नहीं आया था.

उधर माँ ने नितु को अपने साथ बिठा रखा था और उससे उसकी पसंद-नापसंद पूछी जा रही थी. जो सवाल मुझसे यहाँ पुछा गया था वही सवाल नितु से माँ ने पूछा. मेरे माँ-बाप खुद को नितु के मम्मी-डैडी के सामने कम आंक रहे थे. "माँ कोई अंतर् नहीं है? बस बुलाने का फर्क है, मैं मम्मी-डैडी कहती हूँ और 'ये' (अर्थात मैं) माँ-पिताजी कहते हैं!" नितु ने माँ के सवाल का जवाब देते हुए कहा. पर भाभी को नितु की टांग खींचने का मौका फिर से मिल गया; "ये? भला 'ये' कौन है?" भाभी ने थोड़ा जोर से कहा ताकि मैं भी सुन लु. "भाभी नाम नहीं ले सकती ना इसलिए!" नितु ने शर्माते हुए कहा. नितु का जवाब सुन सभी हँस पडे. "बहु तू ज्यादा टाँग न खींच!" ताई जी प्यार से भाभी को डांटा. "माँ एक बात बताओ, जब देवर भाभी का रिश्ता हंसी-मजाक का हो सकता है तो देवरानी और भाभी का रिश्ता ऐसा क्यों नहीं हो सकता?" भाभी ने पुछा तो नितु बोल पड़ी; "बिलकुल भाभी!" नितु का जवाब सुन माँ ने नितु के सर पर हाथ फेरा.घर में हँसी मजाक चल रहा था और वहाँ ये हँसी-मजाक अश्विनी के दर्द का सबब बन चूका था. जब नितु सागर के साथ होती थी तब भी उसे नितु से चिढ होती थी और अब तो सागर उससे शादी कर रहा है तो उसका जल भून कर राख होना तय था! सागर को चाचा कहने में उसे मौत आती थी और नितु को चाची कहने के बारे में वो सोच भी नहीं सकती थी! वो बेसब्री से इससे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने लगी. पर उसके लिए अब सारे दरवाजे बंद हो चके थे! जिस दर्द से सागर ने विदेश जाने के बहाने खुद को बचा लिया था अब वही दुःख अश्विनी को अपने आगोश में लेने को मचल रहा था! वो तो आत्महत्या भी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने से सागर और नितु साक्षी को अपना लेते और मरने के बाद भी अश्विनी को शान्ति नहीं मिलती! वो तो बस यही चाहती थी की सागर भी उसी की तरह आग में जले, तड़पे और मर जाए! जहाँ एक तरफ नीचे सारा परिवार नई खुशियों के साथ नई उमंग में सागर और नितु के लिए नई जिंदगी की दुआ कर रहा था. वहीँ ऊपर बैठी अश्विनी बस सागर की बरबादी की मनोकामना कर रही थी. "मुझसे तो तूने सब कुछ छीन लिया? कम से कम मेरे दुश्मन को तो चैन से मत रहने दे? कुछ दिन पहले ही मैंने उसे इतना तड़पाया था और जो सुकून मुझे मिला उसे तो मैं बयान भी नहीं कर सकती. आज भी वो मौत के इतने करीब था पर तूने उसे मरने नहीं दिया! क्या बिगाड़ा है मैंने तेरा?" रोती बिलखती अश्विनी भगवान् से सागर की मौत माँग रही थी. "बस एक मौका मिल जाए और मैं खुद इस आदमी को तेरे पास भेज दूँगी! कम्भख्त पैसे भी नहीं मेरे पास वरना इसे मरवा देती!" अश्विनी ने अपनी किस्मत को कोसते हुए कहा.इधर इस सब से बेखबर मैं अपनी और नितु की शादी को ले कर खुश था और अब तो मेरे पास साक्षी भी थी! मैं जानता था की अब अश्विनी में इतनी हिम्मत नहीं की वो ताऊ जी के सामने कुछ बोलने की हिम्मत करे, वरना ताऊ जी की दुनाली में अभी भी एक गोली बाकी थी और उन्हें वो अश्विनी को आशीर्वाद स्वरुप देने में जरा भी हिचक नहीं होती! रात का खाना हुआ और आज बरसों बाद सब ने एक साथ बैठ कर खाया.माँ, ताई जी और भाभी ने मिलकर नितु को इतना खिलाया जितना उसने आज तक नहीं खाया था. अश्विनी अपना खाना ले कर राजसी में बैठी थी और सब को इस तरह नितु को प्यार देते देख जलन से मरी जा रही थी पर बेबस थी और कुछ कह नहीं सकती. खाने के बाद उसने साक्षी को दूध पिलाया और साक्षी को ले कर ऊपर जाने लगी तो ताई जी ने उसे रोका और नीचे ही सब के साथ सोने को कहा पर वो अपनी अखडी गर्दन ले कर ऊपर जाने लगी. "साक्षी को दे यहाँ!" ताई जी ने उससे रूखे स्वर में कहा तो ताऊ जी के डर के मारे उसने बेमन से साक्षी को ताई जी को दे दिया. सब जानते थे की अश्विनी का दिमाग सनका हुआ और वो गुस्से में कहीं साक्षी के साथ कुछ गलत ना करे. ताई जी ने साक्षी को मेरी गोदी में दिया और मैं उसे ले कर ताऊ जी वाले कमरे में अंगीठी के सामने बैठ गया.वहाँ अभी भी मेरी शादी की बातें हो रही थीं और शादी के लिए मेरे कमरे में खरीदारी करने की चर्चा चल रही थी.

इधर नितु के मन में साक्षी के लिए प्यार उमड़ पड़ा था. इन कुछ घंटों में ही उसका मन साक्षी ने मोह लिया था; "माँ.... आज साक्षी को मैं अपने साथ सुला लूँ?"

"बेटी कोशिश कर ले! ना तो सागर साक्षी को गोद से उतारेगा और ना ही साक्षी उसकी गोद से उतरेगी! दोनों में बिलकुल बाप-बेटी वाला प्यार है!" माँ ने मुस्कुराते हुए कहा. पर नितु कहाँ हार मानने वाली थी. वो माँ के कमरे से बाहर आई पर उसकी हिम्मत नहीं हुई ताऊ जी कमरे में घुसने की, क्योंकि वहाँ सब मर्द बैठे थे और ताऊ जी और पिताजी से उसकी शर्म उसे अंदर नहीं आने दे रही थी. वो कमरे के बाहर ही चक्कर लगाने लगी. तभी भाभी ने बाहर से मुझे आवाज दी और मैं उठ कर कमरे के बाहर आया. नितु ने पहले भाभी को देखा और थैंक यू कहा और फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली; "आज मुझे भी मेरी बेटी के साथ सोने दो?" नितु की बात सुन कर मैं मंत्र-मुग्ध सा उसे देखने लगा. इतनी जल्दी नितु ने साक्षी को अपना लिया था इसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी! मैंने एक बार साक्षी के मस्तक को चूमा और उसे नितु की तरफ बढ़ा दिया. पर साक्षी के नन्हे हाथों ने मेरी कमीज पकड़ ली थी. मैंने धीरे से उसके कान में खुसफुसाते हुए कहा; "बेटा आज रात आपको मम्मी के पास सोना है!" मेरा इतना कहाँ था की साक्षी ने मेरी कमीज छोड़ दी और नितु ने उसे अपनी छाती से लगा लिया. नितु की आँखें बंद हो गईं, ऐसा लगा जैसे उसके जलते माँ के कलेजे को सुकून मिल गई हो. मेरी आँखें नितु के चेहरे पर टिकी थीं और मैं उस सुकून को महसूस कर पा रहा था. जब नितु ने आँखें खोली और मुझे खुद को देखते हुए पाया तो शर्म से उसके गाल लाल हो गये. उसने मुस्कुरा कर मुझे थैंक यू कहा और माँ के कमरे में चली गई. मैं मुस्कुराता हुआ वापस ताऊ जी के कमरे में आ गया और उधर जैसे ही माँ ने नितु की गोद में साक्षी को देखा वो बोल पड़ीं; "लो भाई! आज पहलीबार सागर ने किसी को साक्षी की जिम्मेदारी दी है वरना रात को तो साक्षी उसी के पास सोती थी." ये सुन कर नितु को खुद पर गर्व होने लगा! रात को सोने का इंतजाम कुछ ऐसा था की माँ के कमरे में सारी औरतें सोने वाली थीं और ताऊ जी के कमरे में सारे मर्द.मेरा बिस्तर आज ताऊ जी और पिताजी के बीच था. देर रात तक हमारी बातें चलती रही.

अगली सुबह सब जल्दी उठे, नितु भी आज सब के साथ उठी और साक्षी को ले कर मेरे पास आई जो रो रही थी. "मेरा बच्चा क्यों रो रहा है?" उस समय मैं अकेला ताऊ जी के कमरे में बिस्तर ठीक कर रहा था और मौके का फायदा उठाते हुए मैंने नितु का हाथ पकड़ लिया; "आप कहाँ जा रहे हो? साक्षी बेटा आपने मम्मी को तंग तो नहीं किया?" मैंने कहा.

"रात में तो बड़े आराम से सोई पर सुबह उठते ही रोने लगी!" नितु बोली और मेरे थोड़ा नजदीक आ गई. हम दोनों की नजरें बस एक दूसरे पर टिकी थीं; "वो क्या है ना सुबह होते ही साक्षी को पापा की गुड मॉर्निंग वाली किसी चाहिए होती है!" मैंने कहा.

"अच्छा? और साक्षी के पापा को मेरी गुड मॉर्निंग वाली किसी नहीं चाहिए होती?" नितु ने शर्माते हुए मुझे उस दिन वाली किसी याद दिलाई!

"चाहिए तो होती है.....पर .....!!!" मैं आगे कुछ कह पाता उससे पहले ही भाभी आ गईं जो बाहर से हमारी बातें सुन रही थी.

"हाय राम! तुम दोनों तो बड़े बेशर्म हो? शादी से पहले ही किस्सियाँ कर रहे हो? रुको अभी बताती हूँ सबको!" भाभी बोलीं और बाहर जाने लगीं की नितु ने उनका हाथ पकड़ लिया; "नहीं भाभी प्लीज!!!" नितु घबरा गई थी और ये देख कर भाभी हँस पड़ी तब जा कर नितु को पता चला की वो बस उसकी टाँग खींच रही हैं! "अच्छा सच्ची-सच्ची बता तुझे किसी चाहिए?" भाभी ने मुझसे पुछा और ये सुन कर मेरे गाल लाल हो गए और गर्दन झुक गई. "समझ गई! चलो अब भाभी हूँ तो कुछ तो करना पड़ेगा! हम्म्म्म...." ये कहते हुए भाभी कुछ सोचने लगी. "रहने दो भाभी! अभी इन्हें मुझे छोड़ने भी तो जाना हे." नितु ने कहा.

"हाय राम! तो तुम दोनों क्या बाहर खुले में सबके सामने....... लाज नहीं आती तुम्हें!" भाभी मुँह पर हाथ रखते हुए बोली.

"नहीं नहीं भाभी... क्या बात कर रहे हो?" मैंने नितु का बचाव किया तब जा कर नितु को एहसास हुआ की वो क्या बोल गई थी!

"भाभी मेरा मतलब था की हम अभी थोड़ी देर में निकलने वाले हैं!" नितु ने बात संभालनी चाही.

"अरे रहने दे! तू मुझे उल्लू समझती है!" भाभी ने नितु की पीठ पर प्यार से थपकी मारते हुए कहा.

"सच भाभी आपकी कसम हमने आजतक वैसा कुछ नहीं किया.... बस कुछ दिन पहले से ही ये 'किसी' शुरू हुई हे." मैंने कहा. भाभी जानती थी की मैं कभी झूठी कसम नहीं खाता था इसलिए उन्होंने नितु की टाँग और नहीं खींची.तभी बाहर से ताई जी की आवाज आई; 'अरे तुम तीनों अंदर कौन सी खिचड़ी पका रहे हो?" उनकी बात सुन कर हम सब बाहर आये और भाभी बोलीं; "माँ मैं तो नजर रख रही थी की ये दोनों क्या बातें कर रहे हैं!" भाभी बोलीं और खिलखिला कर हँस पड़ी और इधर हम दोनों के गाल लाल हो गये.

नाश्ता कर के हम निकलने लगे तो ताऊ जी बोले; "वहाँ पहुँच कर हमें फोन करना और कल निकलने से पहले भी फोन करना." नितु ने सब के पाँव छुए और हम दोनों मुस्कुराते हुए घर से निकले.जहाँ कल आते हुए हमारे प्राण सूख रहे थे की नजाने क्या होगा वहीँ आज हम इतने खुश थे की उसे व्यक्त करने के लिए हम ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया. बस स्टैंड पहुंचे तो नितु ने बात शुरू की;

नितु: तो घर पर क्या बोलना है?

मैं: जो हुआ वो सब बताना हे.

नितु: पर इतनी डिटेल की क्या जरुरत है? हम बस इतना कह देते हैं की सब राज़ी हे. वैसे भी माँ का कल शाम को फ़ोन आया था और मैंने उन्हें बता दिया था की यहाँ सब शादी के लिए राज़ी हैं और हम कल आ रहे हे.

मैं: बेबी बात को समझो! कल को ये बात अगर सामने आई तो पता नहीं डैडी जी कैसे रियेक्ट कर्नेगे! फिर वो चुड़ैल (अश्विनी) भी है जो इस बात को मिर्च-मसाला लगा कर कहेगी!

नितु: ये सुन कर डैडी डर जायेंगे और फिर उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया तो?

मैं: कुछ नहीं होगा....मैं उन्हें समझा दूंगा.

नितु को मुझ पर तो विश्वास था पर वो अपने डैडी को भी जानती थी. इसीलिए वो मना कर रही थी.

पर एक बात थी जो सब से छिप्पी थी. वो थी मेरा और अश्विनी का रिश्ता जो अगर सबके सामने आता तो सब कुछ तहस-नहस हो जाता. बस आई और हम दोनों बैठ गए, मेरे मन में जो बात चल रही थी उससे मेरी शक्ल पर बारह बज रहे थे.

नितु: क्या सोच रहे हो?

मैं: यही की क्या हमारे घरवालों को सब कुछ पता होना नहीं चाहिए?

नितु: सब कुछ.....नहीं! थोड़ा बहुत...हाँ! आप जब गाँव आये हुए थे तब मम्मी ने मुझसे आपके पास्ट के बारे में पुछा था. तो मैंने बता दिया पर अश्विनी का नाम और आपसे रिश्ता नहीं! इतना ही उनके लिए जानना काफी है, इससे ज्यादा कुछ भी बताना मतलब सब कुछ खत्म कर देना और मुझ में आपको खोने की ताक़त नहीं हे. ना तो मैं उन्हें कुछ बताऊँगी और ना ही आपको बताने दूँगी!

मैं: पर क्या ये सही है?

नितु: सही है...बिलकुल सही हे. सच मुझे जानना जरुरी था उन्हें नहीं, जिंदगी हमें साथ बितानी है उन्हें नहीं! जो बात दबी है उसे दबी रहने दो!

नितु ने मुझे आगे कुछ कहने नहीं दिया पर वो भूल रही थी की दुनिया में और भी लोग हैं जो मेरे और अश्विनी के रिश्ते के बारे में सब जानते हे. अब चूँकि हमारा (मेरा और नितु का) रिश्ता सब के सामने आ रहा था तो ऐसे में अश्विनी और मेरे रिश्ते को ले कर कीचड उछलना स्वाभाविक था.

पर अभी के लिए हम दोनों अपने आँखों में शादी के सपने लिए बस के झटके खाते हुए घर पहुंचे. वहाँ मैंने डैडी जी को सारी बात बताई और सब सुन कर उन्हें ख़ुशी तो हुई पर साथ ही उन्हें चिंता भी हुई! ख़ुशी का कारन हमारी शादी के लिए मेरे घर वालों का मान जाना था और चिंता मेरे ताऊ जी का गुस्सैल स्वभाव था! "डैडी जी आप को घबराने की कोई जरुरत नहीं है, जो होना था वो स्वाभविक था. उसके पीछे का कारन है हमारे ही गाँव और मेरे ही घर में घटी एक घटना." फिर मैंने उन्हें भाभी वाले काण्ड की सारी बात बता दी; "अब उनकी जगह आप होते तो आप भी शायद नाराज होते.पर अब ताऊ जी का दिल साफ़ हे. उन्होंने नितु को हमारे घर की बहु के रूप में स्वीकार लिया हे. मेरी माँ तो नितु से मुझसे भी ज्यादा प्रेम करती है और सिर्फ वे ही नहीं बल्कि घर के सब लोग नितु से बहुत प्यार करते हैं!" मैंने कहा और फिर नितु ने उन्हें मेरी माँ से हुई सारी बातें बताईं, तब जा कर उनके दिल को सुकून मिला. "डैडी जी मैं आप से वादा करता हूँ की नितु हमेशा खुश रहेगी और मैं उस पर कोई आंच नहीं आने दूँगा!" मेरी बात सुन कर डैडी जी की चिंता दूर हुई और उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया.

डैडी जी से बात होने के बाद मैंने घर फ़ोन कर के कल आने का समय बता दिया और ये सुनते ही मेरे घर में तैयारियाँ शुरू हो चुकी थी. तम्बू-कनात वालों को बुला लिया गया, घर में कालीन बिछ गया, रसोइयों को ख़ास पकवानों की फरमाइश कर दी गई. घर पर लाइटें लग गईं, छत पर और आंगन की क्यारियों में नए-नए पौधे लगा दिए गये. बैठने-उठने के लिए कुर्सियाँ-टेबल साफ़ करा दिए गए, घर के सारे कमरों की सफाई ढंग से हुई और सब कुछ सजा-धजा के रखा गया.पेंट नहीं हो पाया क्योंकि समय नहीं था पर घर इतना चमक गया था की पेंट ना होने पर किसी का ध्यान ही ना जाये. वहाँ बस हमारा इंतजार हो रहा था.
 
इधर मैं, नितु और मम्मी-डैडी निकले, बस की जगह हमने डैडी जी की गाडी ही ली. ड्राइविंग सीट पर मैं था और मेरे साथ डैडी जी थे, पीछे मम्मी जी और नितु बैठे थे. पूरे रास्ते हम सब बस बातें करते रहे, इधर हर एक घंटे में मेरे घर से फ़ोन आ रहा था. वो तो फ़ोन नितु के पास था जो पिताजी को हमारी एकज्याकट लोकेशन बता रही थी. मैंने गाडी सीधा अपने घर के बाहर रोकी और इधर मेरे सारे घर वाले स्वागत करने के लिए बाहर खड़े हो गये. मैंने सब का परिचय करवाया और वहीँ खड़े-खड़े सब ने एक दूसरे को गले लगाना और आशीर्वाद देना शुरू कर दिया. आस-पड़ोस वाले जो इतनी तैयारी देख कर हैरान थे वो ये मिलन का सीन देख के समझ गए थे की यहाँ मेरे रिश्ते की बात चल रही हे. फिर सब अंदर आये और आंगन में बैठ गए और बातों का सिलसिला शुरू हुआ. डॅडी जी और ताऊ जी ने एक दूसरे से कोई बात नहीं छुपाई और दोनों परिवार एक दूसरे की गलतियों और खामियों को समझ चुका था.. जहाँ एक तरफ डैडी जी ने अपनी गलती मानी की उन्होंने नितु के साथ ज्यादती करते हुए उसे घर से निकाल दिया वहीँ मेरे ताऊजी ने मेरा अमरीका जाने पर मुझे घर से निकालने की बात कबूली.

डैडी जी ने मेरी बड़ाई करनी शुरू की; "भाईसाहब आपका लड़का सच में हीरा है, पहली नजर में ही हमारे दिल में घर कर गया.जिस तरह से इसने नितु को हम से फिर से मिलाया वो काबिले तारीफ है!" ये सुन कर मेरे ताऊ जी भी नितु की बधाई करने से नहीं चूके; "भाईसाहब इसका सारा श्रेय सिर्फ नीता बेटी को ही जाता हे. जिस तरह उसने सागर को संभाला वो भी तब जब हम उसके पास नहीं थे....मेरे पास तो उसे धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं! बल्कि मैं तो उसका कसूरवार हूँ!" ताऊ जी ने नितु के आगे हाथ जोड़े तो नितु ने फ़ौरन उठ कर उनके हाथ पकड़ लिए; "ताऊ जी कोई कसूरवार नहीं हैं आप! क्या बड़ों को बच्चों को डांटने या मारने का हक़ नहीं होता?" नितु को ताऊ जी की हिमायत करते देख ताई जी संग सभी की आँखें नम हो गईं, अब मुझे सब का मूड ठीक करना था सो मैं उठ कर ऊपर गया तो देखा अश्विनी छत पर अकेली बैठी है और अपना सर वॉल से टकरा रही हे. नीचे मिलन होने के बाद वो ऊपर आ गई थी. पर मैं यहाँ उसे नहीं बल्कि अपनी बेटी को लेने आया था. मैंने साक्षी को गोद में उठाया जो अकेली कमरे में लेटी छत की ओर देख कर अपने हाथ-पाँव हिला रहे थी. मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझसे शिकायत कर रही हो की पापा आप मुझे भुल गये. मैंने तुरंत उसे अपनी गोद में उठाया ओर उससे बोला; "मेरा बच्चा! मैं आपको नहीं भूला, चलो आपको सब से मिलवाता हु." मैं फटाफट साक्षी को ले कर नीचे उतरा और उसे मम्मी-डैडी से मिलवाया; "ये है हमारे घर की सबसे छोटी ओर प्यारी सदस्य, साक्षी!" उसे देखते ही मम्मी-डैडी ने उसे बड़ा प्यार दिया और फिर पूरे घर का माहौल वापस से खुशनुमा हो गया.

शादी की तारीख तो पहले से ही तय थी. "२३ फरवरी". घर में सब के पास काफी समय था तैयारी के लिए. जैसे ही डैडी जी ने दहेज़ की बात रखी तो ताऊ जी ने इस बात को सिरे से नकार दिया; "भाईसाहब ऐसी गुणवान बहु के इलावा हमें और कुछ नहीं चाहिए!" ये सुन कर तो मैं भी हैरान था. क्योंकि गाँव-देहात में आज भी ये प्रथा चलती है और गाँव क्या शहर में भी यही प्रथा चल रही हे. बाद में जब मैं ताऊजी से इसका कारन पुछा तो वो बोले; "बेटा मैंने तेरा और नीता का प्यार देखा है और इसके चलते मैं या हमारे परिवार से कोई भी ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा जिससे इस शादी में कोई बाधा आये. फिर हमें दहेज़ की क्या जरुरत है? तेरे और बहु के लिए सारी तैयारी मैं कर रहा हूँ, तू बस देखता जा!" ताऊ जी ने इतने गर्व से कहा की मैं उनके गले लग गया.खेर खाने का समय हुआ और फिर इतने मजेदार पकवान परोसे गए की क्या कहूँ! खाने के बाद ताऊ जी डैडी जी के साथ सब को हमारी जमीन दिखाने निकले और रास्ते में जो कोई भी मिला उससे डैडी जी का तार्रुफ़ अपने समधी के रूप में करवाया. सब कुछ देख कर हम सब ऊपर छत पर बैठे, शाम की चाय भी सब ने ऊपर पि.इस दौरान अश्विनी अपने कमरे में छुपी रही और इन खुशियों से जलती रही! इधर पिताजी ने एक अलाव ऊपर जलवाया और सब उसके इर्द-गिर्द बैठ गये. हँसी-मजाक हुआ और फिर डैडी जी ने मँगनी करने की बात की.

हमारे गांव में ऐसी कोई रस्म नहीं थी. इसकी जगह हम 'बरेछा' की रस्म करते हे. इस रस्म में दुल्हन के घर वाले दूल्हे का तिलक कर उसे कुछ उपहार देते हैं और इसी के साथ शादी की बात पक्की मानी जाती हे. मुझे लगा की ताऊ जी मना कर देंगे पर पिताजी और ताऊ जी दोनों ही इस बात के लिए तैयार हो गए और गोपाल भैया से पंडित जी को बुलाने को कहा. पंडित जी अपनी पोथी-पटरी ले कर आये और गुना-भाग कर १० दिन बाद का मुहुरत निकाल दिया.

मुहूरत निकला तो सब को फिर से मुँह मीठा करने का मौका मिल गया.ताऊ जी ने रसोइये को गर्म-गर्म जलेबियाँ लाने को कहा. फटाफट गर्म-गर्म जलेबियाँ आईं. ठंडी की शाम में, अलाव के सामने बैठ के सब ने जलेबियाँ खाईं! ७ बजते-बजते ठण्ड प्रचंड हो गई इसलिए सब नीचे आ गए और नीचे बरामदे में बैठ गये. रसोइयों ने खाना बनाना शुरू कर दिया था जिसके खुशबु सब को मंत्र-मुग्ध किये हुए थी. मैं यहाँ सब मर्दों के साथ बैठा था और नितु वहाँ सब औरतों के साथ.साक्षी मेरी गोद में थी और अपनी पयाली-प्याली आँखों से मुझे देख रही थी. अब नितु जब से आई थी तब से उसने साक्षी को गोद में नहीं लिया था और उसकी ममता अब रह-रह कर टीस मारने लगी थी. आखिर वो भाभी को ले कर कमरे से बाहर निकली और उस कमरे की तरफ देखने लगी जहाँ मैं सब के साथ बैठा था. भाभी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आईं और बोलीं; "बेकरारी का आलम तो देखो?" ये सुन कर दोनों खी-खी करके हँसने लगी. इधर कल सुबह जाने की बात हो रही थी तो मैंने कहा की मैं सब को घर छोड़ दूँगा पर डैडी जी बोले; "बेटा तुम्हें तकलीफ करने की कोई जरुरत नहीं है!" पर गोपाल भैया जानते थे की मेरा असली मकसद क्या है और वो बोल पड़े; "चाचा जी! सागर इसलिए जाना चाहता है ताकि नीता के साथ रह सके!" गोपाल भैया ने बात कुछ इस ढंग से कही की सब समझ गए और हँस पडे. "अब तो तुमने बिलकुल नहीं जाना! अब तुम दोनों शादी के बाद ही मिलोगे!" डैडी जी बोले. "सही कहा समधी जी आप ने! भाई थोड़ा रस्मों-रिवाजों की भी कदर करो!" ताऊ जी बोले.

इधर नितु और भाभी ने सारी बात सुन ली थी और ये ना मिलने वाली बात सुन नितु का दिल बैठा जा रहा था. उसने बड़ी आस लिए हुए भाभी की तरफ देखा और भाभी सब समझ गई. "सागर...जरा इधर आना!" भाभी ने मुझे आवाज दी और मैं साक्षी को ले कर बाहर आया. मेरी शक्ल पर बारह बजे देख वो समझ गईं की आग दोनों तरफ लगी हे. भाभी कुछ कहती उसके पहले ही मेरी नजर ऊपर गई और देखा तो अश्विनी नीचे झाँक रही हे. "भाभी कुछ करो ना? देखो कल मुझे 'इन्हें' छोड़ने भी नहीं जाने दे रहे!" मैंने मुँह बनाते हुए कहा. भाभी एक मिनट कुछ सोचने लगी और फिर ऊँची आवाज में बोलीं; "अरे सागर तुमने नीता को अपना कमरा तो दिखाया ही नहीं?" उनकी बात सुन कर हम दोनों समझ गए और दोनों सीढ़ियों की तरफ जाने लगे. "अरे साक्षी को तो देते जाओ, इसका वहाँ क्या काम?" भाभी ने फिर से दोनों की चुटकी लेते हुए कहा. मैंने एक बार देख लिया की कोई देख तो नहीं रहा और ये भी की अश्विनी देख ले, फिर मैंने झट से नितु का हाथ पकड़ा और हम दोनों ऊपर आ गये. अश्विनी जल्दी से अपने कमरे में छिप गई और दरवाजा बंद कर लिया. हम दोनों मेरे कमरे में घुसे, नितु आगे थी और मैं पीछे.मैंने दरवाजा हल्का से चिपका दिया और जैसे ही पलटा नितु ने मुझे कस कर गले लगा लिया. "आई लव यू बेबी!" मैंने कहा और कुछ इतनी आवाज से कहा की अश्विनी सुन ले.नितु एक दम से मेरा मकसद समझ गई और बोली; "सससस... अब तो इंतजार नहीं होता!" ये सुन कर मेरी हँसी छूट गई पर मैंने कोई आवाज नहीं निकाली और अपने मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगा. तभी नितु को एक शरारत सूझी और वो बोली; "कितने दिन हुए मुझे आपको वो गुड मॉर्निंग वाली किसी दिए हुए!" नितु ने मेरी कमीज के ऊपर के दो बटन खोले, मेरी गर्दन को बाईं तरफ झुकाया और अपने होंठ मेरी गर्दन पर रख दिये. मेरे हाथ उसकी कमर पर सख्त हो गए और मैंने उसे कस कर अपने से चिपका लिया. इधर नितु ने अपनी जीभ से मेरी गर्दन पर चुभलाना शुरू कर दिया. फिर नितु ने जितना हिस्सा उसके मुँह से घिरा हुआ था उसे अपने मुँह में सक कर लिया और दांतों से धीरे से काटा. मेरा लिंग एक दम से फूल कर कुप्पा हो गया, नितु को उसके उभार से अच्छे से एहसास भी हुआ और डर के मारे उसने वो किसी तोड़ दी! उसकी आँखें झुक गईं और नितु मुझसे दूर चली गई. मैं समझ गया की उसे अपने इस डर के कारन शर्म आ रही हे. मैं धीरे से उसके पास बढ़ा और उसे अपनी तरफ घुमाया, उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसकी आँखों में देखते हुए धीमे से बोला ताकि अश्विनी न सुन ले; "बेबी ....इट्स ओके! डोन्ट ब्लेम योवरसेल्फ!" ये सुन कर नितु को तसल्ली हुई वरना वो रो पड़ती.मैंने उसके माथे को चूमा और नितु ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और फिर से अपने होंठ मेरी गर्दन पर रख दिये.

इधर भाभी एकदम से धड़धड़ाती हुई अंदर आईं और हम दोनों को ऐसे गले लगे देख फिर से चुटकी लेने लगीं; "मुझे तो लगा यहाँ मुझे कुछ अलग देखने को मिलेगा पर तुम दोनों तो गले लगने से आगे ही नहीं बढे? तुम्हें और कितना टाइम चाहिए होता है?"

"क्या भाभी? अभी तो इंजन गर्म हुआ था और आपने उस पर ठंडा पानी डाल दिया!" मैंने चिढ़ने का नाटक करते हुए कहा.

"हाय! माफ़ कर दो देवर जी पर नीचे आपके ससुर जी बुला रहे हैं!" भाभी की बात सुन कर मैंने अपनी कमीज के सारे बटन बंद किये और ये देख कर भाभी की हँसी छूट गई; "तुम दोनों जिस धीमी रफ़्तार से काम कर रहे हो उससे तो तुम्हें एक रात भी कम पड़ेगी!" भाभी ने फिर से दोनों का मज़ाक उड़ाया. मैंने जा कर भाभी को गले लगाया और उन्हें थैंक यू कहा तो भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा; "देख रही है? जब से मेरी शादी हुई है आज पहलीबार है की सागर ने मुझे ऐसे गले लगाया है! क्यों नई बहु को जला रहे हो?" ये सुन कर नितु ने भी पीछे से आ कर भाभी को गले लगा लिया. अब हम दोनों ही भाभी के गले लगे हुए थे की तभी ताई जी हमें ढूढ़ती हुई आ गईं; "अरे वाह! देवर-देवरानी और भाभी तीनों एक साथ गले लगे हुए हो?" हम दोनों ताई जी को देख कर अलग हुए और भाभी ने अपनी बात फिर से दोहराई तो ताई जी ने उनके सर पर प्यार से एक चपत लगाई और बोलीं; "जब उस दिन घर आया था तब गले नहीं लगाया था?" तब भाभी को याद आया की जब मैं पहलीबार घर आया था तब मैंने सब को गले लगाया था.

खेर रात के खाने का समय हुआ और सब ने एक साथ टेबल-कुर्सी पर बैठ कर खाना खाया, फिर जैसे ही गाजर का हलवा आया तो सारे खुश हो गये. डैडी जी ने ताऊ जी के इंतजाम की बड़ी तारीफ की, फिर खान-पान के बाद सब सोने चल दिये. ताऊ जी वाले कमरे में डैडी जी, पिताजी और ताऊ जी लेटे, गोपाल भैया वाले कमरे में भाभी और नितु सोने वाले थे और मेरे कमरे में मैं और गोपाल भैया सोने वाले थे. बाकी बची माँ, मम्मी जी और ताई जी तो वो माँ वाले कमरे में लेट गये. रसोइये जा चुका था. और बरामदे में बस मैं, गोपाल भैया, नितु और भाभी आग के अलाव के पास बैठे थे. साक्षी मेरी गोद में थी और मेरी ऊँगली पकड़ कर खेल रही थी. "आपको क्या जरुरत थी सागर के छोड़ने जाने पर कुछ कहने की?" भाभी ने गोपाल भैया की क्लास लेते हुए कहा. "अरे मैं तो...." भैया कुछ कह पाते इससे पहले मैं बोल पड़ा; "सही में भैया एक दिन हमें साथ मिल जाता!"

"हाँ भैया ....अब देखो ना १० दिन तक...." जोश-जोश में नितु ज्यादा बोल गई और फिर एकदम से चुप हो गई. ये देख कर हम तीनों ठहाका मार के हँसने लगे! "चिंता मत कर बहु! मैंने बात बिगाड़ी है तो मैं ही सुधारूँगा भी! दो एक दिन रुक जा फिर हम तीनों (यानी मैं, भैया और भाभी) शहर आयेंगे. हम दोनों काम में लग जाएंगे और तुम दोनों अपना घूम लेना!" भैया की बात सुन मैंने उन्हें झप्पी दे दी! कुछ देर हँस-खेल कर हम सब अपने-अपने कमरों में सोने चल दिये.

अगली सुबह हुई और सब नहा-धो कर तैयार हुए और नाश्ता-पानी हुआ. फिर आया विदा लेने का समय तो ताऊ जी और पिताजी सबसे पहले अपने होने वाले समधी जी से गले मिले और ठीक ऐसा ही माँ और ताई जी ने अपनी होने वाली समधन जी के साथ किया. ताऊ जी ने गोपाल भैया को कुछ इशारा किया और वो अपने कमरे से मिठाईयाँ और कपडे का एक गिफ्ट पैक ले कर निकले; "समधी जी ये हमारी तरफ से प्यारभरी भेंट! अब हम अपनी समझ से जो खरीद पाए वो हमने आप सब के लिए बड़े प्यार से लिया." ताऊ जी बोले और उधर डैडी जी बोले; "अरे समधी जी इसकी तकलीफ क्यों की आपने? हम तो यहाँ रिश्ता पक्का करने आये तो और आपने तो...." डैडी जी का मतलब था की वो तो जल्दी-जल्दी में खाली हाथ आ गए थे और ऐसे में उन्हें शर्म आ रही थी. पर डैडी जी की बात पूरी होने से पहले ही ताऊ जी ने उन्हें एक बार और गले लगा लिया और बोले; "समधी जी कोई बात नहीं!" ताऊ जी ने डैडी जी को इतने कस कर गले लगाया की वो कुछ आगे नहीं कह पाए और मैंने खुद ये समान गाडी में रखवाया.मैंने मम्मी-डैडी जी के पाँव छुए और उधर नितु सब से मिलने और पाँव छूने लगी. "अगली बार तुझे मैं बहु कह कर गले लगाऊँगी!" माँ बोली और फिर सब ने ख़ुशी-ख़ुशी नितु और मम्मी डैडी को विदा किया. उनके जाने के बाद सब घर में आये और ताऊ जी ने गोपाल भैया से मंगनी की रस्म की सारी तैयारियाँ शुरू करने को कहा. जिन लोगों ने कल मम्मी-डैडी को आते हुए देखा था वो अब सब आ कर पूछ रहे थे और ताऊ जी और पिताजी बड़े गर्व से मेरी शादी की बात बता रहे थे. दोपहर के खाने के बाद मैंने बात छेड़ते हुए कहा;

मैं: मैं सोच रहा था की शादी में और मँगनी के लिए सारे आदमी सूट पहने!

माँ: और हम लोग?

मैं: आप सब साड़ियाँ.... पर साड़ियाँ मेरी पसंद की होंगी!

ताई जी: ठीक है बेटा जैसा तू ठीक समझे.

ताऊ जी: पर बेटा हम ने कभी सूट नहीं पहना? सारी उम्र हमने धोती और कुर्ते में काटी है तो अब कहाँ हमें पतलून पहना रहा है?

मैं: ताऊ जी थोड़ा तो मॉडर्न बन ही सकते हैं? आप तीनों सूट में बहुत अच्छे लगोगे! फिर ये भी तो सोचिये की हमारे गाँव में आप अकेले होंगे जिसने सूट पहना है!

मेरी बात सुन कर ताऊ जी मान गए, और अगले दिन सुबह-सुबह जाने का प्लान सेट हो गया.कुछ देर बाद नितु का फ़ोन आया की वो घर पहुँच गए हैं और मम्मी-डैडी मेरे घर वालों से बहुत खुश हे. मैं उस वक़्त साक्षी को गोद में ले कर बैठा था और उसकी किलकारी सुन नितु का मन उससे बात करने को हुआ पर वो नन्ही सी बच्ची क्या बोलती? मैंने वीडियो कॉल ऑन की और नितु ने साक्षी को अपनी ऊँगली चूसते हुए देखा और वो एकदम से पिघल गई. फिर मैंने नितु को बताया की पिताजी , ताऊ जी और गोपाल भैया सूट पहनने के लिए मान गए हैं तो उसने कहा की मैं उसे कलर बता दूँ ताकि वो उस हिसाब से अपने डैडी का सूट सेलेक्ट करे. इसी तरह बात करते हुए और साक्षी की किलकारियां देखते हुए हमारी बात होती रही. अगले दिन सुबह हम सब दर्जी के निकल लिए और मैंने वहाँ जा कर हम चारों क सूट का कपडा और डिज़ाइन सेलेक्ट करवाया, दर्जी ने साथ ही साथ सबका मांप भी लिया. शादी के लिए कपडे सेलेक्ट करना फिलहाल के लिए टाल दिया गया था. फिर हम सारे मर्द एक साडी की दूकान में घुसे और वहाँ मैंने एक-एक कर साड़ियों का ढेर लगा दिया. घंटा भर लगा कर मैंने माँ, भाभी और ताई जी के लिए साड़ियाँ ली" उसके बाद ताऊ जी हम सब को सुनार की दूकान में ले गए और वहाँ मुझसे ही नितु के लिए अंगूठी पसंद करने को कहा गया, दुकानदार को हैरानी तो तब हुई जब मैंने उसे नितु की ऊँगली का एकज्याकट साइज बताया! खरीदारी कर के हम घर लौट रहे थे और ताऊ जी ने मुझे कोई पैसा खर्च करने नहीं दिया था.
 
बजार में मोटरसाइकिल का एक नया शोरूम खुला था और मैं बातों-बातों में गोपाल भैया से जान चूका था की उन्हें बाइक चलानी आती हे. वो तो उनके नशे के चलते ताऊ जी बाइक लेने नहीं देते थे. मैंने सोचा की घर में एक बाइक तो होनी ही चाहिए, इसलिए मैंने गोपाल भैया का हाथ पकड़ा और एक बाइक के शोरूम में घुस गया."बताओ भैया कौनसी पसद आई आपको?" मैंने खुश होते हुए पूछा.

"बेटा इसकी क्या जरुरत है?" ताऊ जी बोले.

"ताऊ जी आज तक मैं सब के लिए कुछ न कुछ लाया हूँ, भैया के लिए बस शर्ट-पैंट ही ला पाया, आज तो एक तौहफा देने दो! मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुरा दिए और मेरे पिताजी की पीठ पर हाथ रखते हुए उन्हें अपने गर्व का एहसास दिलाया.

इधर गोपाल भैया भी भावुक हो गए और मेरे गले लग गये. फिर मैं उनका हाथ पकड़ कर अंदर ले आया और उनसे पुछा तो उन्होंने डिलक्स सेलेक्ट की पर मेरा मन हिरो पॅशन प्रो पर था. मैने उन्हें जब उसकी तरफ इशारा किया तो वो एकदम से खुश हो गए और लाल रंग में वही सेलेक्ट की गई. जब मैं पैसे देने लगा तो ताऊ जी ने बड़ी कोशिश की पर मैं जिद्द पर अड़ गया और मैंने उन्हें पैसे नहीं देने दिये. किस्मत से डिलीवरी भी उसी वक़्त मिल गई. मैं और गोपाल भैया फरफराते हुए पहले निकले.ताऊ जी और पिताजी बाद में आये, जैसे ही बाइक घर के बाहर रुकी भैया ने पी-पी हॉर्न की रेल लगा दी.

सबसे पहले भाभी निकली और बाइक देख कर एकदम से अंदर भागीं और आरती की थाली ले आईं, ताई जी और माँ भी आ कर बाहर खड़े हो गए और भैया ने बड़े गर्व से कहा की ये मैंने उन्हें तौह्फे में दी हे. अश्विनी ऊपर छत से नीचे झांकते हुए देख रही थी पर उसे ये देख कर जरा भी ख़ुशी नहीं हुई थी. पूजा हुई और मैंने भाभी और भैया को जबरदस्ती ड्राइव पर भेज दिया और मैं, माँ ताई जी सब अंदर आ गये. ताई जी ने हलवा बनाना शुरू किया और मैंने साक्षी को गोद में ले कर खेलना शुरू किया. कुछ देर बाद ताऊ जी और पिताजी लौट आये और उनके आने के एक घंटे बाद भैया और भाभी भी लौट आये.

शाम को मैं और नितु वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे की तभी भाभी आ गईं और उन्होंने भी नितु से बात करना शुरू कर दिया और आज के तौह्फे के बारे में बताया. तभी भाभी ने इशारे से भैया को ऊपर बुला लिया और उनसे बोली; "देखो मैं कुछ नहीं जानती कल के कल ही दोनों को मिलवाओ!" नितु उस वक़्त वीडियो कॉल पर ही थी और शर्मा रही थी की तभी भैया मुझसे बोले; "तू कपडे पहन मैं अभी ले चलता हूँ तुझे!" ये सुन मैं तो एकदम से खड़ा हुआ पर भाभी बोली; "अभी टाइम ही कहाँ बचा है? कल सुबह चलते हैं, मैं भी इसी बहाने लखनऊ घूम लुंगी."

तो बात तय हुई की कल का दिन हम चारों लखनऊ घूमेंगे, रही ताऊ जी से बात करनी तो वो भी भैया ने खुद कर ली.अगले दिन हम लखनऊ के लिए निकले और पूरे रास्ते भाभी मेरी टाँग खींचती रहीं,

"आज तो अपनी होने वाली दुल्हनिया से मिलने जा रहे हो!"

नितु हमें लेने बस स्टैंड पहुँच गई थी और वहाँ से हम अलग हो गये. भैया-भाभी घूमने चले गए और मैं और नितु कहीं और निकल लिए. घुमते-घुमते बात चली लोगों को इंवाईट करने की तो मैं और नितु नाम गिनने लगे की किस किस को बुलाना हे.

मैं: यार मेरे कॉलेज से तो कोई नहीं आ सकता, रिजन ओबविअस है सब अश्विनी को जानते हैं!

नितु: मेरा तो कॉलेज ही कॉरेस्पोंडेंस था! कुछ स्कूल के दोस्त हैं पर उनसे मेरी कोई ख़ास-बात चीत नहीं हे. एक दोस्त है शालू जिस के घर मैं रुकी थी वो मेरी बहुत अच्छी दोस्त है तो वो जरूर आयेगी.

मैं: मोहित-प्रफुल ...... उन्हें .....मैं आगे कुछ नहीं बोल पाया.

नितु: उन्हें बुला तो लें पर वो भी अश्विनी के बारे में जानते हे.

मैं: उन्हें सच बता दूँ?

नितु: आप को विश्वास है उन पर?

मैं: बहुत विश्वास है! आपके आने से पहले वही थे जो मुझे थोड़ा-बहुत संभाल पा रहे थे. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा की वो लाऊड रियाक्ट करेंगे और दोस्ती टूट जायेगी!

नितु: जितना मैं उन्हें जानती हूँ वो शायद ऐसा कुछ न कहें!

मैंने फ़ोन निकाला और मोहित-प्रफुल को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया; "यार कुछ बहुत जरुरी बात करनी है, अभी मिलना है! प्लीज!!!" आगे मुझे कुछ बोलना नहीं पड़ा और उन्होंने फ़ौरन जगह और टाइम फिक्स किया.

मैं: मेरी कॉलेज की एकलौती दोस्त है जिसे मैं बुलाना चाहता हु.

नितु: सुमन? पर उसे भी तो पता है?

मैं: वो अकेली ऐसी दोस्त है जो सब जानते हुए भी मेरे खिलाफ नहीं थी.

मैंने सुमन को कॉल मिलाया और उसे सब बताया, अश्विनी के बारे में सुन कर उसे बहुत गुस्सा आया और वो उसे गाली देने लगी; "हरामजादी कुतिया! इसकी वजह से .....हम दोनों........" वो आगे कुछ नहीं कह पाई.पर मैं उसका मतलब समझ गया था. अगर आशु नहीं होती तो आज मैं और सुमन साथ होते!

"सॉरी....तो कब आना है मुझे?" सुमन बोली. "आप मेरी तरफ से आजाओ! मेरे नाते-रिश्तेदार कम हैं!" नितु बोली और उसकी बात सुन सुमन को एहसास हुआ की कॉल स्पीकर पर था और नितु ने उसकी सारी बात सुन ली थी इसलिए वो एकदम से खामोश हो गई!

"हेल्लो? सुमन?" नितु बोली और तब जा कर सुमन ने हेल्लो कहा.

"यार इट्स ओके .... आई नो एवरीथिंग ...." ये सुन कर भी सुमन कुछ नहीं बोली तो मजबूरन मुझे ही बोलना पड़ा; "अच्छा बाबा आप २० फरवरी को मेरे घर पहुँच जाना और अपना एड्रेस टेक्स्ट कर दो मैं कार्ड भेज देता हूँ!" तब जा कर उसके मुँह से 'सॉरी' निकला और मैंने बाय बोल कर कॉल काट दिया.

मुझे भी थोड़ा आकर्ड फील हुआ पर नितु एकदम नार्मल थी. कुछ देर बाद मोहित और प्रफुल भी मिलने आ गए और मैं उन्हें एकदम से सारी बात नहीं बता सकता था इसलिए मैंने बात घुमाते हुए कहा;

मैं: यार अगर तुम लोगों को मेरे बारे में कोई ऐसी बात पता चले जिससे मेरा करैक्टर खराब हो तो क्या तुम मुझसे दोस्ती रखोगे? या फिर तुम्हारी नजरों में दोस्ती की अहमियत कम हो जाएगी? और फिर तुम सब की तरह मुझे जज करोगे?

मोहित: तू पागल हो गया है क्या?

प्रफुल: हम दोनों हमेशा तेरे साथ हैं, तुझे इतने सालों से जानते हैं तू कभी कोई गलत काम कर ही नहीं सकता!

मोहित: अगर किया भी तो उससे हमारी दोस्ती में फर्क नहीं आएगा? तूने जब ये दारु पीना शुरू किया था तब हम तेरे साथ ही थे ना? तुझे समझाते थे, रोकते थे पर तूने बात नहीं मानी!

प्रफुल: अच्छा अब बता भी क्या बात है?

उनकी बात सुन कर ये साफ़ हो गया था की वो मेरा साथ नहीं छोड़ेंगे.मैंने उन्हें सारी बात बता दी, मुझे पता था की वो मुझे कुछ ज्ञान की बात कहेंगे!

मोहित: यार अब तो तू नितु से प्यार करता है ना?

मैं: हाँ

प्रफुल: तो प्रॉब्लम क्या है? तुम दोनों की शादी कब है?

मैं: २३ फरवरी

मोहित: ठीक है ...तो अब ये सड़ी हुई सी शक्ल क्यों बना रखी है तूने?

प्रफुल: अबे साले! जो हुआ वो तेरा पास्ट था. तेरा इस्तेमाल किया उसने. अब वो सब भूल कर नई जिंदगी शुरू कर!

मैं: पर यार तुम लोगों को .....

मोहित: (मेरी बात काटते हुए) सुन मेरी बात! अगर ये सारा रायता उस लड़की ने ना फैलाया होता और तू तब हमें ये सारी बात बताता तब भी हम तेरा साथ देते, तुझे ताना नहीं मारते! तूने प्यार किया उससे... वो भी सच्चा वाला!

अब ये बात सुन कर सब साफ़ हो चूका था की मेरे दोस्त मेरे साथ हैं और उन्हें जरा भी मतलब नहीं की मेरा और अश्विनी का रिश्ता क्या था! मेरे दिल पर से आज बहुत बड़ा पत्थर उतर गया था! उनसे ख़ुशी-ख़ुशी विदा ले कर हम दोनों वापस बस स्टैंड आये, जहाँ भैया-भाभी पहले से खड़े थे! भाभी ने हम दोनों के मजे लिए और फिर हम सब अपने-अपने घर लौट आये.अगले दिन की बात है, दूध पीने के बाद साक्षी सो रही थी और मुझे ऑफिस का एक जरुरी काम करना था. तो मैं अपना लैपटॉप ले कर छत पर आ गया था और वहाँ बैठा अपना काम कर रहा था की वहाँ पीछे से अश्विनी आ गई. मेरा ध्यान स्क्रीन पर था और वो मेरे पीछे खड़ी थी. वो पीछे से ही बोली; "ये सब जान बूझ कर रहे हो ना?"

‘नितु से जब प्यार हुआ तब तो मुझे तेरे साथ हुए हादसे के बारे में पता तक नहीं था. ये तो मेरी किस्मत थी जो मुझे वापस इस घर तक खींच लाई! तो ये जानबूझ कर कैसे हुआ?' मन ये सफाई देना चाहता था पर फिर एहसास हुआ की ना तो अश्विनी मेरी ये सफाई सुनने के लायक है और ना ही मेरे कुछ कहने से वो बात समझेगी इसलिए मैंने उसे वही जवाब दिया जो वो सुन्ना चाहती थी; "अभी तो शुरुआत है!" इतना कह मैं अपना लैपटॉप ले कर नीचे आने लगा तो वो पीछे से बोली; "मैं तुम्हारी नितु से कितना नफरत करती हूँ ...... ये जानते हुए .....तुमने ये चाल चली?" ये कहते हुए वो पीछे खड़ी ताली मारती रही और मैं चुप-चाप नीचे आ गया.
 
निचे आ कर मैंने खुद को साक्षी के साथ व्यस्त कर लिया. उसी शाम को अश्विनी ने अपनी चाल चली, रात को सब खाना खा रहे थे की वो ताऊ जी के सामने कान पकड़ कर खड़ी हो गई; "दादाजी.... मैं माफ़ी के लायक तो नहीं पर क्या आप सब मुझे एक आखरी बार माफ़ कर देंगे? मैं ईर्ष्या में जलकर जो कुछ भी किया मैं उसके लिए बहुत शर्मिंदा हूँ और वादा करती हूँ की आज के बाद ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी! इस परिवार की इज्जत मेरी इज्जत होगी और मैं इस पर कोई आँच नहीं आने दूँगी!" इतना कहते हुए अश्विनी ने घड़ियाली आँसू बहाने शुरू कर दिये.

ख़ुशी का मौका था और डैडी-मम्मी जी भी कई बार अश्विनी के बारे में पूछ चुका था., हरबार झूठ बोलना ताऊ जी को भी अच्छा नहीं लग रहा था. इसलिए उन्होंने अश्विनी को माफ़ कर दिया और उनके साथ-साथ घर के हर एक सदस्य ने उसे माफ़ कर दिया. पर अश्विनी न मेरे पास माफ़ी मांगने आई और ना ही मैं उसे माफ़ करने के मूड में था.

रंग-रोगन का काम शुरू हो चुका था और इस बार रंग मेरे पसंद का करवाया गया था. मेरे कमरे में तो कुछ ख़ास ही मेहणत करवाई जा रही थी और उसका रंग ताऊ जी ने ख़ास कर नितु से पूछ कर करवाया था. घर भर तैयारियों में लगा था पर मुझे कोई काम नहीं दिया गया था. कारन ये की पिछले कई दिनों से मैं ऑफिस नहीं जा पा रहा था और काम बहुत ज्यादा पेंडिंग था तो मेरा सारा समय व्हिडिओ-कॉल पर जाता.

अब तो साक्षी भी मुझसे नाराज रहने लगी थी क्योंकि मैं ज्यादातर लैपटॉप पर बैठा रहता था. वो ज्यादा कर के माँ के पास रहती और जब मैं उसे लेने जाता तो मेरे पास आने से मना कर देती; "सॉरी मेरा बच्चा!" में कान पकड़ कर उससे माफ़ी मांगता तो वो मुस्कुराते हुए माँ की गोद से मेरे पास आ जाती.

सगाई से दो दिन पहले की बात है, मैं छत पर बैठा काम कर रहा था और साक्षी नीचे सो रही थी की अश्विनी कपडे बाल्टी में भर कर आ गई. "एक बात पूछूँ? तुमने ऐसा क्या देख लिया उसमें जो तुम्हें उससे प्यार हो गया? कहाँ वो ३३ की और कहाँ मैं २३ की! उसकी जवानी तो ढल रही है और मेरी तो अभी शुरू हुई है! याद है न वो दिन जो हमने एक दूसरे के पहलु में गुजारे थे? तुम तो मुझे छोड़ते ही नहीं थे! हमेशा मेरे जिस्म से खेलते रहते थे! वो पूरी-पूरी रात जागना और पलंगतोड़ संभोग करना! सससस.... कितनी बार किया तुमने उसके साथ संभोग? उतना तो नहीं किया होगा जितना मेरे साथ किया था? अरे वो देती ही नहीं होगी! राखी कहती थी की मॅडम को संभोग वाली बातें करना पसंद नहीं! जिसे बातें ही पसंद ना हो वो संभोग कहाँ करने देगी? अभी भी मौका है.... मैं अब भी तैयार हूँ!!!!"

अश्विनी ने ये बातें कुछ इस तरह से कहीं के मेरे बदन में आग लग गई. मैं एक दम से उठ खड़ा हुआ और बोला; "तेरी सुई घूम-फिर कर संभोग पर ही अटकती है ना? नहीं किया मैंने उसके साथ संभोग और अगर सारी उम्र ना करने पड़े तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा! पता है क्यों? क्योंकि वो मुझसे प्यार करती है और मैं भी उससे प्यार करता हूँ! तेरे लिए प्यार की परिभाषा होती होगी संभोग हमारे लिए नहीं! हमारे लिए बस साथ रहना ही प्यार है!" इतना कह कर मैं पाँव पटककर वहाँ से चला गया.उस दिन रात को जब नितु का फ़ोन आया तो मैंने उससे ये बात छुपाई! आमतौर पर मैं नितु से कोई बात नहीं छुपाता था पर मैंने ये बात उसे नहीं बताई!

उस दिन के बाद से अश्विनी मुझसे कोई बात नहीं करती, हाँ उसकी घरवालों के साथ अच्छी बनने लगी थी. घर के सभी कामों में वो हिस्सा ले रही थी और उसने सब को ये विश्वास दिला दिया था की वो वाक़ई में बहुत खुश हे. एक बदलाव जो मैं अब उसमें देख पा रहा था वो ये था की अश्विनी ने अब मुझे प्यासी नजरों से देखना शुरू कर दिया था. वो भले ही मुझसे दूर रहती पर किसी न किसी तरीके से मुझे अपने जिस्म की नुमाइश करा देती, कभी जानबूझ कर मेरे पास अपना क्लीवेज दिखाते हुए झाडू लगाती तो कभी साडी को अपनी कमर पर ऐसे बांधती जिससे मुझे उसका नैवेल साफ़ दिख जाता. उसकी इन हरकतों का मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था पर बड़ा अजीब सा लग रहा था. ऐसा लगता मानो मुझे उससे घिन्ना आने लगी थी.

आखिर मेरी सगाई का दिन आ ही गया और मम्मी-डैडी और नितु सब गाडी से आ गये. मैं उस वक़्त तैयार हो रहा था इसलिए मैं नीचे नहीं आ पाया, घर के सभी लोगों ने उन्हें रिसीव किया और उन्हें अंदर लाये.इधर नितु की नजरें पूरे घर में घूम रही थीं की मैं दिख जाऊँ, पर भाभी ने उनकी नजरें पकड़ ली थीं और वो उसके कान में खुसफुसाते हुए बोलीं; "आपके मंगेतर अभी तैयार हो रहे हैं!"ये सुन कर नितु शर्मा गई.

तभी उसकी नजर अश्विनी पर पड़ी जो चेहरे पर नकली मुस्कान चिपकाए सब को देख रही थी. डैडी जी ने भी जब उसे देखा तो अपने पास बिठाया और उन्हें उस पर बड़ा तरस आया. "बेटी पिछली बार तुमसे ज्यादा बात नहीं हो पाई, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं थी! अब कैसी है तुम्हारी तबियत?" डैडी जी ने पुछा और अश्विनी ने नकली हँसी हँसते हुए कहा; "जी अंकल अब ठीक है!" अभी आगे वो कुछ बोलते की मैं सूट पहने हुए नीचे उतरा.नितु ने मुझे पहले देखा और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं! उसकी ठंडी आह भाभी ने सुन ली और वो बोलीं; "माँ आप कहो तो सागर को काला टीका लगा दूँ!" भाभी की आवाज सुन कर सब मेरी तरफ देखने लगे.

इधर मेरी नजर नितु पर पड़ी और मैं आखरी सीढ़ी पर रुक गया और आँखें फाड़े उसे देखने लगा. घर में सब का ध्यान अब हम दोनों पर ही था और सब चुप हो गए थे. आज नितु को साडी में देखा मेरा मन बावरा हो गया था. आखिर भाभी चल के मेरे पास आईं और मेरा हाथ पकड़ कर मेरी तन्द्रा भंग की! मैं बैठक में आ कर ताऊ जी और पिताजी के बीच बैठ गया."क्या हुआ था बेटा?" डैडी जी ने पुछा और मेरे मुँह से अचानक निकल गया; "वो बहुत दिनों बाद देखा ना....." ये बोलने के बाद मुझे एहसास हुआ और मैंने शर्म से मुस्कुराते हुए सर झुका लिया. यही हाल नितु का भी था और उसके भी मेरी तरह शर्म से हजाल लाल थे और ये सब देख कर अश्विनी की आँखें गुस्से से लाल थी.

मँगनी की रस्म शुरू हुई और पहले नितु ने मुझे अंगूठी पहनाई जो थोड़ी लूज थी और फिर जब मैंने उसे अंगूठी पहनाई तो वो उसे एकदम फिट आई. सबका मुँह मीठा हुआ और खाना-पीना शुरू हुआ, मैंने भाभी को इशारा किया और वो समझ गई. भाभी ने नितु को कहा की वो उनके साथ चल कर कमरा देख ले जिसमें पेंट हुआ हे.

उनके जाते ही दो मिनट बाद मैंने फ़ोन निकाला और ऐसे जताया की मैं फ़ोन पर बात कर रहा हूँ और फिर आंगन में आ गया और धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ कर ऊपर पहुँच गया.भाभी और नितु मेरे कमरे में खड़े मेरा ही इंतजार कर रहे थे. मुझे देखते ही नितु बोली; 'तो आपने भाभी को सब पहले से ही समझा दिया था की उन्हें क्या बहाना कर के मुझे वहाँ से निकालना है?" नितु बोली.

"और क्या?" मैंने कहा और भाभी ये देख कर हँस पडी. "यार आपका (भाभी का) काम हो गया, आप जाओ!" मैंने कहा.

"अच्छा जी? ठीक है चल नीता!" भाभी ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और नीचे जाने को निकलीं."सॉरी...सॉरी...सॉरी.... माफ़ कर दो... !!!" मैंने अपने कान पकड़ते हुए कहा. ये देख कर भाभी और नितु दोनों हँस पडे. "वैसे भाभी आपको नहीं लगता की नितु आज बहुत ज्यादा सुन्दर लग रही है?" मैंने पूछा. मैं तो बस भाभी के जरिये नितु को ये बताना चाहता था की आज वो बहुत सूंदर लग रही हे. भाभी के सामने हम दोनों थोड़ा शर्म किया करते थे!

"वो तो तुम्हारा बिना पलके झपकाए देखने से ही पता चल गया था!" भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा.

"वैसे भाभी क़यामत तो आज आपके देवर जी ढा रहे हैं!" नितु ने मेरी तारीफ करते हुए कहा.

"मेरे देवर जी? मैं चली नीचे, वरना तुम दोनों मेरी शर्म कर के बार-बार मेरा ही नाम ले-ले कर बातें करोगे." भाभी बोलीं और हँसते हुए नीचे चली गई. उनके जाते ही मैंने नितु का हाथ पकड़ लिया; "यार सच्ची आज आप इतने हसीन लेग रहे हो की मन करता है आज ही शादी कर लूँ!" मैंने कहा और नितु शर्माते हुए मेरे सीने से आ लगी और बोली; "हैंडसम तो आज आप लग रहे हो!" हम दोनों ऐसे ही गले लग कर खड़े थे की तभी वहाँ हमें बुलाने के लिए अश्विनी आ गई. हमें इस तरह गले लगे देख उसके जिस्म में बुरी तरह आग लग गई.

उसने बड़े जोर से मेरे कमरे के दरवाजे पर हाथ मारा और चिल्लाई; "अभी शादी नहीं हुई है तुम दोनों की!" उसे देखते ही हम दोनों हड़बड़ा गए और अलग हुए पर उसके इस कदर चिल्लाने से मुझे गुस्सा आ गया; "तेरी....... !!!" मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही नितु ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया. "बोलने दो बेचारी को! तकलीफ हुई है!!!" नितु ने मुस्कुराते हुए कहा.

नितु ने आज उसी अंदाज में कहा जिस अंदाज में उस दिन अश्विनी ने मेरा मजाक उड़ाया था जब मैं उससे साक्षी को माँग रहा था. नितु की बात सुन कर अश्विनी जलती हुई नीचे चली गई. "मत लगा करो इसके मुँह! ये जानबूझ कर आपको उकसाने आती है!" नितु बोली, मैंने सर हिला कर उसकी बात मान ली और फिर उसे दुबारा अपने पास खींच लिया; "आपको किस करने की गुस्ताखी करने का मन कर रहा है!" मैने नितु की आँखों में देखते हुए कहा तो जवाब में नितु ने अपनी आँखें बंद कर लीं.

मैंने अभी नितु के होठों पर अपने होंठ रखे ही थे की भाभी आ गई और अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोलीं; "शर्म करो!" उनकी आवाज सुनते ही हम दोनों अलग हो गये.

"भाभी हमेशा गलत टाइम पर आते हो!" मैंने शिकायत करते हुए कहा, इधर नितु के गाल शर्म से सुर्ख लाल हो चुका था.!

भाभी ने मेरे कान पकड़ लिए; "बेटा ज्यादा ना उड़ो मत! शादी हो जाने दो उसके बाद मैं आस-पास भी नहीं भटकूँगी!"

नितु भाभी के पीछे छुप गई और बोली; "तो मुझे बचाएगा कौन?" ये सुन कर तो हम तीनों हँस पड़े और भाभी ने हम दोनों को अपने गले लगा लिया.

तभी पीछे से मम्मी जी आ गईं मेरा कमरा देखने और हमें ऐसे गले लगे देख मुस्कुराते हुए बोलीं; "लो भाई! यहाँ तो देवर-देवरानी और भाभी का प्रेम मिलाप चल रहा है!" ये सुन कर हम अलग हुए;

"बेटा (भाभी) इसका ख्याल रखना, कभी-कभी ये मनमानी करती है!" मम्मी जी बोली.

"आप चिंता ना करो मैं नीता का ध्यान अपनी दोस्त जैसा ख्याल रखुंगी." भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा.

आखिर हम नीचे आ गए, फिर खाना-पीना हुआ और इस दौरान अश्विनी कहीं भी नजर नहीं आई! समय से मम्मी-डैडी और नितु चले गए, पर जाते-जाते नितु ने साक्षी को अपनी गोद में लिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा; "अब जब आपसे मिलूँगी तो आपको अपने साथ ही रखुंगी.!" ये सुन कर साक्षी मुस्कुराने लगी और नितु ने उसके माथे को चूमा और मुझे दे दिया.
 
दिन गुजरने लगे और शादी में अभी एक महीना रह गया था. शादी के कार्ड छप कर आये. मेरे दोस्तों को कार्ड मैंने भेज दिए और ऑफिस स्टाफ को भी कार्ड भेज दिये. अल्का को कार्ड नितु ने भेजा और साथ ही उसे टिकट भी भेज दी. इधर घरवालों ने जब नाते-रिश्तेदारों को कार्ड भेजा तो सभी ने पूछना शुरू कर दिया. ताऊ जी ने सब से यही कहा की लड़की सब की पसंद की है और उन्हें बाकी डिटेल नहीं दी, मैं तो वैसे भी इन सब बातों से अनविज्ञ था! शादी से ठीक १५ दिन पहले तक मेरा घर रिश्तेदारों से खचाखच भर चूका था. मैं उन दिनों काम के चलते बहुत ज्यादा बिजी था तो घर में जो कोई भी बात होती वो मेरे सामने नहीं होती थी. दिन में मैं छत पर अपना लैपटॉप ले कर बैठा होता था. रात में मुझे देर तक जागने की मनाही थी. मेरे कुछ कजन कभी-कबार आ कर मेरे पास बैठ जाते और उनके साथ हँसी-मजाक होता. इतने लोग तो अश्विनी की शादी में भी नहीं आये थे!

एक दिन की बात है की घर में घमासान खड़ा हो गया, बात शुरू की मौसा जी ने! "भाईसाहब! आपकी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं जो एक तलाकशुदा लड़की की शादी, उम्र में सागर से ५ साल बड़ी की शादी अपने लड़के से करवा रहे हो?" उनकी बात सुनते ही पिताजी और ताऊ जी भड़क उठे, पिताजी के कुछ कहने से पहले ही ताऊ जी बोल उठे; "यहाँ तुम से कुछ पुछा गया? शादी में बुलाया है, चुप-चाप आशीर्वाद दो और निकल जाओ!" मौसा जी ताऊ जी से उम्र में छोटे थे और उनका बड़ा मान करते थे, वैसे तो सभी मान करते थे या ये कहूँ की डरते थे! इसलिए जब ताऊ जी चिल्लाये तो मौसा भीगी बिल्ली बन कर चुप हो गये. बड़ी हिम्मत कर के छोटी मौसी बोलीं; "भाईसाहब लड़की तो हमारी ज़ात की भी नहीं!" उनकी बात का जवाब ताई जी ने दिया; "काहे की ज़ात? जब हम मुसीबत में थे तो कौन से ज़ात वाले सामने आये थे? सब के सब पुलिस के डर के मारे अपने घर में छुपे हुए थे!" ताई जी की बात सुन कर सब के सब चुप-चाप खड़े हो गये.

"मेरी बात गौर से सुन लो सारे! तुम में से अगर किसी ने भी इस शादी में विघ्न डाला या कोई ऐसी हरकत की जिससे हमारी मट्टी-पलीत हुई तो उसे गोली से उड़ा दूँगा! तुम में से किसी ने अगर समधी-समधन को या बहु को कुछ भी ताना मारा या कहा ना तो अंजाम तुम्हें मैं बता चूका हूँ! एक आरसे बाद इस घर में खुशियाँ आ रही हैं!" ताऊ जी की दहाड़ सुन सब के सब चुप हो गये. अब मुझे कहने की तो कोई जरुरत नहीं की ये लगाई-बुझाई अश्विनी की थी. एक वही तो थी जो सब कुछ जानती थी! इसलिए मैं इंतजार करने लगा की मुझे कब मौका मिले जब वो अकेली हो.

रात को जब मैं साक्षी को उससे लेने के बहाने उसके कमरे में पहुँचा तो मुझे वो अकेली अपना बिस्तर ठीक करते हुए दिखी; "मिल गई तेरे कलेजे को ठंडक? लगा ली ना आग?" ये सुनते ही अश्विनी बोली; "मैंने क्या किया?" उसने अनजान बनने का नाटक किया पर मेरे सामने उसका ये रंग नहीं चल सकता था.

"ज्यादा अनजान बनने की कोशिश मत कर! तेरे आलावा यहाँ और कोई है जिसे मेरी खुशियां देख कर आग लग रही हो! दुबारा तूने ऐसा कुछ किया ना तो दुर्गत कर दूँगा तेरी!" मैंने अश्विनी को हड़काया और साक्षी को ले कर अपने कमरे में आ गया.अगले दिन सुबह-सुबह एक बड़ा सा ट्रक घर के आगे खड़ा हो गया, ताऊ जी ने सारे मर्दों को आवाज दी. सभी हैरान थे सिवाए उनके और पिताजी के, जब ट्रक पर से तिरपाल हटा तो उसमें पड़ा सामान देख सब समझ गये. उसमें सारा फर्नीचर था जो ताऊ जी ने स्पेशल आर्डर दे कर बनवाया था. जब सामान उतारने के लिए मैंने हाथ लगाना चाहा तो ताऊ जी ने मना कर दिया. मैं ख़ुशी-ख़ुशी ऊपर आया की एक और टेम्पो की आवाज सुनाई दी, मैंने छत से नीचे झाँका तो पता चला की डैडी जी ने भी कुछ सामान भेजा था.

घर में जितने भी रिश्तेदार आये थे सब के सब सामान उतारने में लग गए और पिताजी और ताऊ जी ये ध्यान रख रहे थे की कहीं कुछ टूट ना जाये. मेरा कमरा इतना बड़ा था पर उसमें सामान के नाम पर मेरा सिंगल बेड और एक टेबल था बाकी उसमें ट्रंक रखे हुए थे जिनमें गर्म कपडे होते थे.

आज जा कर मेरे कमरे को एक डबल बेड, ड्रेसिंग टेबल, छोटा सोफा, अलमारी और स्टडी टेबल का सुख मिल रहा था. मैं ने नितु को वीडियो कॉल कर के सामान ऊपर चढ़ते हुए दिखाया और वो बहुत खुश हुई.शादी में एक हफ्ता रह गया था और पिताजी ने मंदिर में पूजा रखवाई थी. सारा परिवार वहीँ जमा था. में भी वहीँ था और काम में मदद कर रहा था. ताऊ जी ने मुझे कुछ सामान लाने के लिए घर भेजा. जब मैं घर पहुँचा तो वहाँ पर सिर्फ अश्विनी थी. उसके अलावा वहाँ कोई नहीं था. मैं सामान लेने अपने कमरे में पहुँचा तो अश्विनी चुपके से मेरे कमरे के बाहर खड़ी हो गई. जैसे ही मैं सामान ले कर पलटा की अश्विनी ने अचानक से मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे खींच कर सीधा छत पर ले आई.

मैं उसके साथ नहीं जाना चाहता था पर आज उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी और उसमें बहुत ज्यादा ताक़त आ गई थी. छत पर आ कर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और वो घुटनों के बल खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए; "प्लीज ....प्लीज मुझे माफ़ कर दो!" अश्विनी की आँखें छल-छला गईं थी.

पर मेरा मन तो जैसे पत्थर का हो चूका था. जिस पर उसके रोने का कोई असर नहीं हो रहा था उल्टा गुस्सा आ रहा था; "किस लिए माफ़ कर दूँ? मेरा दिल तोडा उसके लिए? या फिर मुझे मेरे ही बेटी से दूर किया उसके लिए?" मैंने गुस्से से कहा.

"सबके लिए....मैंने बहुत पाप किये हैं! तुम्हारे दिल के साथ खेल खेला.... जानते-बूझते तुम्हें बहुत दुःख दिया........" इतना कहते हुए अश्विनी ने मेरे पैर पकड़ लिए और बिलख-बिलख कर रोने लगी.

मैंने उसके हाथों की पकड़ खोलनी चाही पर उसने मेरा दाहिना पैर अपनी छाती से जकड़ रखा था.

"मैं तुम से बहुत प्यार करती हूँ और तुम्हारे बिना नहीं रह सकती!.....मैं तुम्हें अपनी आँखों के सामने किसी और का होता हुआ नहीं देख सकती! प्लीज....एक मौका दो मुझे" अश्विनी ने बिलखते हुए कहा.

उसकी बात सुन कर एक पल को मेरा दिल पसीज गया, इसलिए मैंने उसे समझाते हुए कहा; "देख हमारे बीच जो कुछ भी था वो सब उसी दिन खत्म हो गया था जब तूने रक्षित से शादी की थी. अब मैं नितु से प्यार करता हूँ और वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है, हमारी शादी होने वाली हे. अब ये पागलपन छोड़ दे और अपने मन से ये बात निकाल दे की मैं अब दुबारा तुझसे प्यार कर सकता हु." मैंने फिर से अपने पाँव को छुड़ाने की कोशिश की.

"नहीं...पहले भी तुम ने मना किया था की तुम मुझसे प्यार नहीं करते पर मेरे प्यार ने तुम्हारे मन में मेरे प्यार की लौ जला दी थी! इस बार भी मैं ऐसा कर सकती हूँ...बस एक मौका दे दो! एक आखरी मौका.....अबकी बार मैंने कुछ भी गलत किया तो मेरी जान ले लेना...मैं उफ़ तक ना करुँगी!...... हम दोनों और साक्षी कहीं दूर एक सुकून भरी जिंदगी जियेंगे! मेरा नहीं तो कम से कम साक्षी का सोचो? यहाँ से दूर आप उसे कितना प्यार दे सकोगे? .... उसे भी तो अपने पापा का प्यार चाहिए! कल को वो बोलने लगेगी तो आपको क्या कहेगी?"

अश्विनी की साक्षी वाली बात सुन कर मैं चुप हो गया था. पर मैं नितु के साथ ये धोका नहीं कर सकता था. इसलिए मैंने ना में सर हिलाया और अश्विनी की पकड़ से अपना पाँव छुड़ा लिया. मैं नीचे आने को दो ही कदम चला हूँगा की अश्विनी जमीन से उठ खड़ी हुई और बोली; "अपनी हालत याद है न उस दिन क्या हुई थी? क्या कहा था तुमने उस दिन मुझसे?......

'तो बोल तुझे क्या चाहिए? जो चाहिए वो सब दूँगा तुझे बस मुझे साक्षी से अलग मत कर!'... यही कहा था ना उस दिन .....

ठीक है... आज माँगती हूँ..... इस शादी का ख्याल अपने मन से निकाल दो, मिटा दो नितु की सारी यादें और मैं तुम्हें साक्षी दे दूँगी! ये सिर्फ मुँह से नहीं कह रही, बल्कि कानूनी रूप से तुम्हें साक्षी की कस्टडी दे दूँगी! फिर बुलवा लेना उसके मुँह से पापा, मैं कुछ नहीं कहूँगी!" अश्विनी ने फिर से वही जहरीली हँसी हँसते हुए कहा और मुस्कुराते हुए मेरे सामने से गुजरी.

मैने उसका हाथ बड़ी जोर से पकड़ा और उसे झटके से रोका और पीछे की तरफ खींचा, मेरी आँखें आँसुओं से लाल हो गई थी; "दिखा दी ना तूने अपनी ज़ात! साक्षी के नाम पर नितु की जिंदगी का सौदा करना चाहती है? तू चाहती है मैं भी उसके साथ वही करूँ जो तूने मेरे साथ किया था? पर मैं तेरी तरह मौका परस्त नहीं हूँ, मैं साक्षी से बहुत प्यार करता हूँ पर उसके लिए मैं नितु को नहीं छोड़ सकता! वो मेरे बिना मर जायेगी.....तुझसे कई गुना ज्यादा उससे प्यार करता हूँ!" मैंने रोते हुए कहा, अगले ही पल मेरे आँसू सूख गए और एक बाप का प्यार बाहर आया. मैंने अश्विनी का गाल पकड़ लिया और उसकी आँखों में देखते हुए बोला; "तू अपनी नितंब का जोर लगा दे, देखता हूँ कैसे तू साक्षी को मुझसे अलग रख पाती है!"

मेरे आँखों में गुस्सा देख अश्विनी आगे कुछ नहीं बोल पाई क्योंकि वो भी जानती थी की वो चाहे कुछ भी कर ले वो ताऊ जी के रहते साक्षी को मुझसे दूर नहीं कर सकती थी.

"तेरे पास कोई रास्ता नहीं है! तुझे इसी घर में रहना होगा.... तेरी शादी तो उस हत्यकांड के बाद होने से रही! यहाँ रहते हुए तू साक्षी को मुझसे कभी अलग नहीं कर पाएगी!" मैंने अश्विनी की सारी हिम्मत तोड़ दी थी. उसने जो घरवालों का प्यार जीतने के लिए जो कुछ दिन पहले ड्रामा किया था उसके चलते अब वो बुरी नहीं बन सकती थी वरना ताऊ जी समेत सारे घर वाले उसकी जान ले लेते! इतना कहते हुए मैं मंदिर लौट आया और पूजा में शामिल हो गया.पर मैं ये नहीं जानता था की वो कमिनी औरत किसी भी हद्द तक गिर सकती है!
 
इधर मैं पूजा में बैठा था और उधर उसने नितु को फ़ोन कर दिया. नितु का नंबर वो पहले ही भाभी के फ़ोन से निकाल चुकी थी और आज उसने अपनी गन्दी चाल चली. "हेल्लो! नितु? मैं अश्विनी बोल रही हूँ!"

नितु अश्विनी की आवाज सुन कर एकदम से चौंक गई और इसके पहले वो कुछ कहती अश्विनी बोल पड़ी; "कैसी औरत हो तुम? तुम्हारी वजह से सागर अपनी बेटी को छोड़ कर तुमसे शादी कर रहा है! मैंने उससे आज पुछा की क्या वो साक्षी के साथ रहना चाहता है या तुम्हारे साथ शादी करना चाहता है तो उसने तुम्हें चुना! शर्म आनी चाहिए तुम्हें, तुम एक बाप को उसी की बेटी से छीन रही हो! वो तुमसे को प्यार नहीं करता बल्कि वो तुम्हारी जान बचाने के लिए तुमसे शादी कर रहा है!" इतना बोल कर अश्विनी ने कॉल काटा और नितु को एक व्हाट्सअप्प भेजा जिसमें उसने कुछ देर पहले मेरी कही बात का ऑडियो भेजा. उसने बड़ी ही चालाकी से मेरी "तुझसे कई गुना ज्यादा उससे प्यार करता हूँ!" वाली बात को काट दिया और बाकी की बात ऐसे के ऐसे ही उसे भेज दी थी.

ये ऑडियो सुन कर नितु एक दम से सन्न रह गई और उसे लगा की मैं उससे कम प्यार करता हूँ और साक्षी से ज्यादा प्यार करता हु. मेरे इस त्याग के बारे में सोच कर नितु टूट गई. वो कतई नहीं चाहती थी की मैं साक्षी को छोड़ूँ बल्कि वो अपने प्यार की कुर्बानी देने को तैयार हो गई थी! नितु ने फ़ौरन एक मैसेज टाइप किया; "आई एम कॉलिंग दिस वेडिंग ऑफ!" और मुझे भेज दिया.

मैं उस वक़्त पूजा में था तो उसका मैसेज नहीं देख पाया, पूजा रात नौ बजे तक चली और पूजा के बाद जब मैंने नितु का मैसेज पढ़ा तो मेरे होश उड़ गए, मैंने उसे कॉल करना शुरू किया पर वो फ़ोन नहीं उठा रही थी. मैंने डैडी-मम्मी को कॉल किया तो पता चला की वो बाहर किसी रिश्तेदार के आये हैं! अब मेरी हालत ख़राब हो गई क्योंकि वहाँ नितु अकेली थी और वो कुछ गलत ना कर ले इसलिए मैंने गोपाल भैया से बाइक की चाभी मांगी. मेरी शक्ल देखते ही वो समझ गए की कुछ तो बात है, "भैया दोस्त का एकसिडेंट हो गया इसलिए मैं लखनऊ जा रहा हु." इतना कह कर मैं बाइक पर बैठा और नितु के घर की तरफ निकल पडा.

४ घंटे का रास्ता मैंने ३ घंटों में पूरा किया, बाइक हवा से बातें कर रही थी और चूँकि मैंने कपडे कम पहने थे सो ठंड से मेरा हाल बुरा था. ये तो मेरे जिस्म में नितु को खो देने का डर था जो मुझे संभाले हुए था वरना इतनी ठंड में बाइक फुल स्पीड से चलाना?!

रात सवा बारह बजे मैं नितु के घर पहुँचा और ताबड़तोड़ घंटियां बजाईं, नितु ने मुझे मॅजिक आय से देख लिया था और वो दरवाजे से अपनी पीठ टिकाये रो रही थी पर दरवाजा नहीं खोल र ही थी. इधर मैंने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया था. मुझे अभी तक नहीं पता था की नितु दरवाजे से पीठ लगा कर बैठी रो रही हे.

"नितु....प्लीज दरवाजा खोलो....आई नो .... तुम घर पर हो....प्लीज....."

आखिर नितु बोली; "नहीं...मुझे कोई बात नहीं करनी! इट्स ओव्हर!" नितु ने बड़ी मुश्किल से ये कहा था और उसकी आवाज में दर्द महसूस कर मैं टूटने लगा था.

"प्लीज....तुम्हें मेरे प्यार का वास्ता! बस एक बार दरवाजा खोल दो! प्लीज...." मैंने काँपते हुए कहा क्योंकि ठंड अब जिस्म पर हावी हो चुकी थी.

नितु उठ कर खड़ी हुई, अपने आँसूँ पोछे और दरवाजा खोला और इससे पहले वो कुछ कहती मैं ही उस पर बरस पड़ा: "तुम्हें लगता है की तुम इतनी आसानी से कहोगी की दिस वेडिंग इज ऑफ और सब कुछ खत्म हो जाएगा? आखिर मैंने किया क्या है जिसकी सजा मुझे दे रही हो? तुम अश्विनी की तरह निकलोगी की ये मैं कतई नहीं मान सकता."

मैंने जब ये कहा तो नितु ने अपना फ़ोन निकाला और मुझे वो ट्रिम रिकॉर्डिंग सूना दी! वो सुनने के बाद मैं समझ गया की ये किसकी कारस्तान है पर अभ के लिए मुझे नितु को संभालना था.उसे सच से रूबरू कराना था.

"ये पूरी बात नहीं है!" इतना कह कर मैंने नितु को सब सच बता दिया और नितु आँखें फाड़े सब सुनती रही; "आपने सोच भी कैसे लिया की मैं ऐसा कर सकता हूँ? ये सब उस हरामजादी का किया धरा है और आज मैं उसे जिन्दा नहीं छोड़ूँगा." इतना कह कर मैं वापस निकलने को पलटा तो नितु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और तब उस एहसास हुआ की मेरा पूरा जिस्म बर्फ सा ठंडा हो चूका हे.

"आप ऐसा कुछ नहीं करोगे! वो यही तो चाहती है.....गलती मेरी है, मुझे आपसे पहले पूछ लेना चाहिए था! पर मैं नहीं चाहती थी की आप साक्षी के प्यार से वंचित रहो!" नितु रोते हुए बोली और मुझे अपने गले लगा लिया. उसके गर्म जिस्म का एहसास मुझे मेरे ठन्डे जिस्म पर होने लगा था.

"लीसन टू मी! साक्षी मेरी बेटी है और इस बात को कोई झुटला नहीं सकता. मैं उससे प्यार करता रहूँगा फिर चाहे हम यहाँ रहे या बैंगलोर में! पहले तो मैं सोच रहा था की मैं साक्षी को गोद ले लूँ पर घरवाले इसके लिए कभी नहीं मानेंगे! फिर आज नहीं तो कल हमारा अपना बच्चा भी तो होगा ना?! ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब अभी ढूंढा नहीं जा सकता, फिलहाल मेरे लिए ये शादी जरुरी है, उसके बाद मैं साक्षी के बारे में सोचूँगा!" मैंने कहा और नितु मेरी बात समझ गई. साथ ही उसके मन में अश्विनी को सबक सिखाने की आग भी जल उठी!

हम दोनों ऐसे ही गले लगे हुए खड़े रहे और फिर थोड़ी देर बाद घर से फ़ोन आ गया; "हाँ जी....सब ठीक है जी...कोई घबराने की बात नहीं! जी... मैं सुबह तक निकलता हूँ!" मैंने कहा और ये सुन नितु भी हैरान हो गई.

"घर की पूजा खत्म हुई तब मैंने आपका मैसेज देखा और जिस हालत में था उसी हालत में भाग आया. गोपाल भैया से ये कहा की दोस्त का एक्सीडेंट हो गया है! उसी के लिए डाँट पड़ रही थी की बता कर नहीं जा सकता था!” मैंने नितु को सच बताया तो उसने कान पकड़ कर मुझे सॉरी कहा! फिर उसने कॉफ़ी बनाई जिसे पीने के बाद मेरे जिस्म में गर्मी आई.

सुबह ६ बजे तक मैं वहीँ रहा और फिर बाइक से निकला, जाते-जाते- नितु ने मुझे अपनी शाल दी ताकि मैं ठंड से खुद को बचा पाऊँ. मैं घर पहुँचा और कहानी बना कर सुना दी पर भाभी ने जब शॉल देखि तो वो सब समझ गई की बात कुछ और हे. कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे शाल के बारे में पुछा तो मैंने उन्हें ये कहा की हॉस्पिटल के बाद मैं नितु से मिलने गया था और उसी ने ये शॉल दी हे. भाभी बस मुस्कुरा दी और चली गईं,

अब अश्विनी मुझसे छुपती फिर रही थी. मेरी भी मजबूरी थी की घर में सब मौजूद थे और उनके सामने मेरा उसे कुछ कहना लाखों सवाल खड़े कर देता. हम दोनों चूँकि कई दिनों से बात नहीं कर रहे थे और जब से मैं घर पहुँचा था तब से तो अश्विनी डरी-डरी सी रहती थी. अब इस पर सवाल उठना तो तय था.....

"क्यों भाई सागर क्या बात है? जब से हम लोग आये हैं देख रहे हैं की अश्विनी और तुम बात भी नहीं करते? कहाँ तो पहले तुम उसका इतना ख्याल रखते थे, घर-परिवार की मर्जी के खिलाफ जा कर उसे पढ़ा रहे थे! और तो और उसकी शादी में भी तुम विदेश चले गए? क्या नाराजगी है, हमें भी बताओ?" मौसा जी बोले.

"मौसा जी जिस उल्लू को पढ़ाने के लिए इतने पापड़ बेले वो कमबख्त पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर इश्क़-मोहब्बत करती फ़िरे, ऐसे एहसान फरामोश इंसान से क्या बात करना? यहाँ तक की मैं तो शहर में रहता था. मुझे तक इस बात की खबर नहीं की ये इश्क़ लड़ा रही हैं! जिस इंसान को मैं हमेशा डाँट से बचाता था वही इंसान जब मुझे सबसे डाँट पड़ रही थी खामोश था. यही नहीं इसने मुझे शादी के लिए रुकने तक को नहीं बोला तो मैं क्यों रुकता? मुझे इतना अच्छा मौका मिला अमेरिका जाने का, काम सीखने का, एक बिज़नेस से जुड़ने का अपना हमसफ़र चुनने का तो ऐसा मौका मैं कैसे छोड़ देता!"

मेरा जवाब सुन कर मौसा जी बस मुस्कुरा दिए और बोले; "ठीक है बेटा पर अब तो सब सही हो गया ना? अब तो माफ़ कर दे इसे?!"

"नहीं मौसा जी! इतने कम पाप नहीं किये इसने की इसे माफ़ी दे दी जाए! फिर मेरे अकेले के ना बात करने से इसे क्या फर्क पड़ेगा? आप सब तो हो ना इससे बात करने को?!"

"चलो भाई, जैसी तुम्हारी मर्जी! पर ये बताओ सारा समय ये कम्प्यूटर ले कर बैठे रहते हो, शादी तुम्हारी है थोड़ा काम-वाम देखा करो!" मौसा जी शिकायत करते हुए बोले पर इसका जवाब ताऊ जी ने ही दे दिया;

"तुम्हें पता भी है ये क्या काम करता है? अमेरिका की कंपनी का काम है ये! वहाँ हमारे देश की तरह लोग छुट्टियाँ नहीं मारते, कमाई डॉलरों में होती है! १ डॉलर मतलब ८३- ८४ रुपये! इस काम के इसे १ लाख डॉलर मिल रहे हैं!!!!"

ताऊ जी के मुँह से इतनी बड़ी रकम सुन कर सब के कान खड़े हो गए थे और पूरे घर में मेरी तारीफें शुरू हो गई थीं! इधर मुझे अश्विनी की क्लास लेनी थी पर वो किसी न किसी सदस्य के साथ चिपकी हुई थी. पर आखिर वो कब तक मुझसे भागती!
 
रात को मैं सोने जल्दी चला गया, साक्षी मेरे साथ ही चिपकी सो रही थी. मेरा कमरा सब समान से भरा था और वहाँ जाने की किसी को भी इज़ाजत नहीं दी गई थी. ताऊ जी का कहना था की जब तक नई बहु नहीं आ जाती तब तक उस सामान को कोई नहीं छुएगा! रात को ग्यारह बजे साक्षी ने सुसु किया और उसके डायपर के साथ उसके कपडे भी खराब हो गये. मेरी बेटी ने मुझे उसकी माँ की क्लास लेने का मौका दे दिया था. मैंने पहले तो साक्षी का माथा चूमा और किलकारियां मारते हुए अपने हाथ पाँव चलाने लगी.

मानो उसे भी मजा आ रहा हो की आज उसकी माँ की क्लास लगने वाली है! फिर मैंने उसके सारे कपडे निकाले और उसे कंबल ओढ़ा दिया. कमरे में हीटर चालु किया ताकि कमरा गर्म बना रहे. मैं अपने कमरे से बाहर निकला और जा कर अश्विनी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. वो घोड़े बेच कर सोइ थी. इसलिए दस मिनट तक खटखटाने के बाद उसने दरवाजा खोला. जैसे ही उसने मुझे देखा उसकी फ़ट गई और आँखें अपने आप झुक गई. एक तो बाहर ठंड में १० मिनट से खड़ा होना पड़ा और ऊपर से नितु की हालत देख कर जो गुस्सा आया था उससे मेरा जिस्म जलने लगा. मैंने अश्विनी का गला पकड़ लिया और उसे ढकेलते हुए अंदर आया और उसे उसी के बिस्तर पर गिरा दिया.

अश्विनी छटपटा रही थी ताकि मैं उसका गला छोड़ दूँ; "कल अगर नितु को कुछ हो जाता ना तो आज मैं तुझे जिन्दा जला देता! आज आखरी बार तुझे बताने आया हूँ, अगर तूने कोई भी लगाईं-बुझाई की ना तो अपनी खेर मना लियो फिर! मुझे मिनट नहीं लगेगा तेरी जान लेने में!" मेरी पकड़ अश्विनी के गले पर तेज थी और अगर दो मिनट और उसका गला नहीं छोड़ता तो वो पक्का मर जाती. मैंने जैसे ही उसका गला छोड़ा वो साँस लेने की कोशिश करते हुए छटपटाने लगी! मैंने साक्षी के कपडे लिए और वापस अपने कमरे में आ गया.

साक्षी अब भी जाग रही थी और कंबल के अंदर अपने हाथ-पैर मार रही थी. कुछ देर पहले जो मुझे गुस्सा आ रहा था वो अश्विनी को देख कर गायब हो गया था. साक्षी को अच्छे से कपडे पहना कर मैं उसे अपनी छाती से चिपका कर सो गया.सुबह की शुरुआत बड़ी मीठी हुई, पहले तो नितु ने मेरी गर्दन को प्यार से काटा और उसके कुछ देर बाद साक्षी ने मेरे गाल पर किसी की! मैं कुनमुनाता हुआ उठा और साक्षी को अपने सामने देख कर बैठ गया.नितु ने साक्षी को मेरी गोद में दिया और खुद नीचे चली गई. मैं साक्षी को गोद में ले कर खेल रहा था की नीचे हल्ला मच गया.

मैं फ़ौरन नीचे आया तो देखा सारे ख़ुशी से एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे हे. "बेटा तो चाचा बनने वाला है!" ये सुनते ही मैं चौंक गया और फिर भाभी की तरफ देखा जो शरमाई हुई ताई जी के पीछे छुपी हुई थी. इस उम्र में भाभी का कन्सिव करना एक चमत्कार था. मेरा मन ये सोच कर खुश हुआ की चलो भाभी अभी तक जिन खुशियों से महरूम थीं वो उन्हें मिल ही गई. मैंने भाभी को दिल से मुबारकबाद दी और फिर गोपाल भैया को भी गले लग कर मुबारकबाद दी. आज पूरा घर खुशियों से झूम रहा था और कहीं इसकी नजर किसी को न लग जाए इसलिए ताऊ जी ने जोश-जोश में पूजा का आयोजन रख दिया. नितु ने फ़ौरन हलवा बनाना शुरू कर दिया और भाभी भी उसी के साथ खड़ी हो गई.

रसोई में चूँकि बस वो दोनों ही थे तो मुझे भाभी से बात करने का मौका मिल गया.जैसे ही मैं रसोई पहुँचा भाभी ने मुझे गले लगा लिया और रुंधे गले से बोलीं; "सागर ये सब तुम्हारी वजह से हुआ, वरना मैं तो गलत रास्ते पर भटक जाती! तुम अगर मुझे इन्हें (गोपाल भैया को) पहले नशा मुक्ति केंद्र ले जाने को कहा और वहीँ मैंने डॉक्टर से इनका बाकी चेक-अप भी करवाया.अगर उस दिन तुम मुझे हिम्मत ना देते और गलत रास्ते पर नहीं जाने देते तो आज ये सब नहीं होता!"

"भाभी इस ख़ुशी के मौके पर रोते नहीं हैं! पहले चलो डॉक्टर के ताकि आपका चेकअप हो जाए!| मैंने कहा. "भाभी ये तो गलत बात है! मुझे तो गले लग कर इतना प्यार नहीं करती जितना इन्हें करती हो!" नितु ने प्यार भरे लहजे में शिकायत की.

"बदमाश! सबसे पहले तू ही गले लगी थी मेरे!" ये कहते हुए भाभी ने उसे गले लगा लिया. सबने हलवा खाया और मैंने डॉक्टर के जाने की बात रखी तो ताऊ जी ने कहा की मैं, नितु, गोपाल भैया और भाभी को अपने साथ बजार ले जाऊ. पर तभी नितु के मौसा जी आ गए, मैंने उनके पाँव छुए और समझ गया की वो नितु को लेने आये हे. नितु ऊपर चली गई और उसके पीछे-पीछे मैं भी चला गया.इधर नीचे सब ने उन्हें खुशखबरी दी और मुँह मीठा करवाया, उधर ऊपर आते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया और नितु को पीछे से जकड़ लिया. मेरे हाथ नितु की कमर पर सामने की तरफ लॉक हो चुका था.; "दो दिन से ज्यादा नहीं वेट करूँगा!" मैंने कहा.

"आई विल्ल ट्राय!!!" नितु शर्माते हुए बोली. इतने में भाभी ने नीचे से मुझे आवाज दी. मैं थोड़ा गुस्से में नीचे उतरा और भाभी मेरे चेहरे पर गुस्सा देख हँस पडी. ५ मिनट बाद नितु भी नीचे आई, उसका एक छोटा सा बैग मैं पहले ही नीचे ले कर आ गया था. सारा परिवार नितु को छोड़ने बाहर आया, नितु ने भी सब के पाँव छुए और फिर गाडी में बैठ गई. मैंने तुरंत उसे मैसेज कर के एक बार फिर याद दिलाया; "बस दो दिन!" और इसके जवाब में नितु ने मुझे एक किस वाली ईमोजी भेजी! नितु के जाने के कुछ देर बाद मैं तैयार हुआ और फिर भाभी, मैं और गोपाल भैया गाडी से निकले. ये आज दोनों की पहली राइड थी. हम हँसते-खेलते हुए बाजार पहुंचे और डॉक्टर ने भाभी का चेकअप किया और कुछ टेस्ट वगैरह भी किये. भाभी की प्रेगनेंसी की बात कन्फर्म हुई और डॉक्टर ने कुछ मल्टीविटामिन्स लिख दिए, मैंने घर के लिए मिठाई खरीदी और हम तीनों घर लौटे.

ताऊ जी ने छाती ठोक कर पूरे गाँव में मिठाई बाटी. इधर नितु के जाने से मैं अकेला हो गया था तो मैंने अपना मन साक्षी के साथ लगा लिया. मैं उसे गोद में ले कर अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. कुछ देर बाद मैंने नितु को व्हिडिओ कॉल किया और मेरी गोद में साक्षी को बैठे देख वो खुश हो गई. मैंने फिर से अपनी बात दोहराई और उसे दो दिन याद दिलाये और वो हँसने लगी. "बाबा अभी तो आई हूँ..... और आप अभी से बेकरार हो रहे हो?!" आगे कुछ बात हो पाती उससे पहले ही मम्मी जी आ गईं और फिर उनसे बात शुरू हो गई.
 
कॉल के बाद मैं काम करने लगा, दिन तो जैसे-तैसे बीत गया पर रात लम्बी थी! पर मेरी बेटी का प्यार था जो मैं आराम से सो गया.बड़ी मुश्किल से मैंने दो दिन बिताये और फिर आया तीसरा दिन. मैंने सुबह ही नितु को फ़ोन कर के पुछा तो वो बोली की वो आज नहीं आ रही, क्योंकि कल ही पूजा खत्म हुई है और कम से कम आज उसे घर रहना हे. दरअसल डैडी जी ने एक मन्नत मांगी थी की नितु की शादी अच्छे से निपट जाए तो वो मंदिर दर्शन के लिए जायेंगे. पर यहाँ मैं बेसब्र हो गया था; "मैंने कहा था ना की मैं तीसरे दिन आजाऊँगा! सामान पैक करो, मैं, माँ, ताई जी और भाभी आ रहे हैं!" इतना कह कर मैंने फ़ोन काटा और मैं नीचे आ गया.जब मैंने माँ से आज जाने की बात कही तो सबसे मुझे डाँट सुनने को मिली! एक बस भाभी थी जो मेरे दिल की हालत समझती थी पर घरवालों के आगे वो कुछ बोल नहीं पाती थी. हालाँकि घर वालों की डाँट जायज थी पर मेरा नितु के लिए बेसब्र होना भी मुझे जायज लग रहा था.

पर साक्षी से अपने पापा की उदासी नहीं देखि गई. उसने अपने हाथ-पैर चलाने शुरू किये जैसे मुझे अपने पास बुला रही हो, मैंने साक्षी को गोद में उठाया और छत पर आ गया."मेरा छोटा बच्चा! एक आप हो जो पापा की उदासी समझते हो!" मैंने तुतलाते हुए साक्षी से कहा तो वो मुस्कुराने लगी. कुछ देर बाद भाभी आ गईं वो जानती थी की मैं उदास हूँ तो मेरा दिल बहलाने के लिए वो बात करने लगीं; "सागर देखो कुछ दिन रुक जाओ, उसे भी तो अपने माँ-पिताजी से मिलने दो!"

"मैं जानता हूँ की आप आप सही कह रहे हो भाभी, पर कम से कम आप तो मेरी बेसब्री समझो! साल भर से उसके साथ रहने की आदत हो गई हे. उस पर पिछले ३ महीने भी मैं उससे अलग रहा, अब शादी हुई तो भी उसे घर जाना पड़ा! अब कैसे ..... नई-नई शादी हुई....दूल्हे का थोड़ा तो ध्यान रखना चाहिए ना? फिर एक बड़ी जोरदार खुशखबरी भी उसे देनी है!!" ये कहते हुए मैंने भाभी को वो खुशखबरी सुनाई और वो फ़ौरन नीचे आईं और सब को वो बात बताई| भाभी ने बड़े तरीके से मेरी खुशखबरी को मेरी बेसब्री के ऊपर रख ऐसे जताया जैसे ये खबर सुनाने को मैं मरा जा रहा हु.

आखिर नीचे से बुलावा आया और पिताजी बोले; "देख मैं या भाईसाहब तो जाने वाले नहीं, क्योंकि हमें अच्छा नहीं लगता की हम इतनी जल्दी बहु को लेने जाएँ!" अभी पिताजी की बात पूरी भी नहीं हुई की मैं बीच में ही बोल पड़ा; "पिताजी मैं माँ, भाभी और ताई जी को ले जाता हूँ! इसी बहाने वो सब भी घूम आएंगे!"

"कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया तू? पर जाते हुए मिठाई ले जाइओ और अपनी भाभी की खुशखबरी भी दे दिओ!" पिताजी बोले और जाने की इजाजत दी. अब मुझे माँ और ताई जी को मनाना था जो इतना मुश्किल नहीं था! आखिर हम सारे निकले, भाभी आगे बैठीं और उनकी गोद में साक्षी बैठी थी. आज पहलीबार मेरी बेटी गाडी में बैठी थी और इसकी ख़ुशी नितु से मिलने की ख़ुशी के साथ जुड़ गई!

मैंने गाडी एक दूकान पर मिठाई लेने के लिए रोकी और उसी बीच नितु को फ़ोन किया; "अपनी दुल्हनिया को लेने उसके दूल्हे राजा आ रहे हैं और साथ ही आपकी चहेती (साक्षी) को भी ला रहे हैं!" ये सुन कर नितु हँस पड़ी और उसने ये बात फ़ौरन मम्मी जी को बता दी. मिठाई की दूकान के बाद गाडी सीधा नितु के दरवाजे पर रुकी, जहाँ नितु पहले से ही खड़ी थी.

उसे देखते ही भाभी बोलीं; "आग दोनों तरफ लगी है!" पहले भाभी गाडी से उतरीं और उनके गोद में साक्षी को देख नितु फ़ौरन उनके पास पहुँची. पहले उनसे गले मिली और फिर साक्षी को गोद में उठा लिया. फिर निकली माँ और ताई जी और उन्हें देख वो एकदम हैरान हो गई और दौड़ कर उनके पाँव छुए पर मुझे एक हाई तक नहीं बोला बल्कि साक्षी और सब को ले कर अंदर चली गई.

मैं बेचारा लास्ट में अंदर आया, सब के सब बैठक में बैठ गए और तब मैंने मम्मी-डैडी जी का मुँह मीठा करवाया. डैडी जी को (नितु के) मौसा जी ने पहले ही सब बता दिया था. मम्मी-डैडी ने भाभी को आशीर्वाद दिया और उन्होंने मंदिर में भाभी के लिए अर्चना कराई थी उसका प्रसाद भी दिया.

"समधी जी माफ़ करना हमने इस तरह बिना बताये आने की गलती की पर ये जो है ना हमारा लड़का वो थोड़ा सा पागल है!" माँ ने जैसे-तैसे बात शुरू करते हुए कहा.

"अरे समधन जी ये आप क्या कह रहीं हैं?! आप सब का हमेशा स्वागत है! वैसे हम अच्छे से जानते हैं हमारे जमाई पागल नहीं,बस नितु से बहुत प्यार करता है!" डैडी जी बोले पर मुझे थोड़ा बहाना तो करना था;

"वो डैडी जी....काम....काम बहुत पेंडिंग है!" मैंने बहाना मारा.

"हाँ बीटा जी! हम जानते हैं कितना काम पेंडिंग है?" मम्मी जी हँसते हुए बोली. अब मेरी पोल-पट्टी तो खुल ही चुकी थी तो मैंने सोचा की चलो सब के साथ ख़ुशी साजा कर लु.

"दरअसल डैडी जी मैं और नितु जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे उसी के जरिये मैंने न्यूयॉर्क में बात की थी और हमें एक और कंपनी में मिलने के लिए बुलाया गया हे. पर उसके पहले हमें अपनी कुछ प्रेझेंटेशन करनी हैं! अगर हमारा प्रपोजल उन्हें पसंद आ गया तो हमें जल्दी ही न्यूयॉर्क जाना होगा." मैंने कहा और ये खबर सुन कर मम्मी-डैडी बहुत खुश हुए पर ठीक उसी समय पर भाभी ने अपना काम किया;

"इसी बहाने इन दोनों का वो....वो क्या होता? शादी के बाद मियाँ-बीवी कहाँ जाते हैं?" भाभी बोलीं और मैं अपने उत्साह में बोल गया;"हनिमून!!!"

ये सुन कर सारे हँसने लगे, इधर मैं और नितु शर्म से लाल हो गए! फिर भाभी ने वहाँ सब के सामने मेरी और नितु की बड़ी खिचाई की, आखिर खाना-पीना कर के हम सब निकले. आगे की तरफ नितु बैठी और उसकी गोद में साक्षी थी और पीछे माँ, ताई जी और भाभी बैठे थे. कुछ दूर आने पर मैंने नितु से शिकायत करते हुए अंग्रेजी में कहा; "यू ग्रीटेड एवरीवन बट दिडंत एवन सेड ‘हाई’ टू मी, दिस ऐंट फेयर!”

“सॉरी!” नितु ने शर्माते हुए कहा.

"ये क्या दोनों अंग्रेजी में गिट-पिट कर रहे हो?" भाभी बोलीं तो मैंने नितु की शिकायत सबसे कर दी!

"मैं कह रहा था की जब हम आये तो इन्होने सब का प्यार से स्वागत किया और मुझे एक छोटा सा हाई तक नहीं कहा!" ये सुनते ही ताई जी नितु की हिमायत करते हुए बोलीं;

"तेरे लिए बेचारी दरवाजे पर खड़ी इंतजार कर रही थी ना?" और बाकी की रही-सही कसर माँ ने निकाल दी; "हमारी बहु शर्मीली है, तेरी तरह बेशर्म नहीं! दो दिन भी उसके बिना नहीं रह पाया!"

मैं अपना इतना सा मुँह ले कर चुप हो गया और उधर भाभी और नितु का हँस-हँस कर बुरा हाल हो गया.हम घर पहुँचे और नितु को देख कर सब खुश हुए लेकिन मुझे एक बार फिर सब की डाँट खानी पड़ी! पर कम से कम नितु घर वापस आ गई थी और मैं इसी से खुश था. रात को खाने के बाद नितु का प्यार मुझ पर बरसने लगा, पर तभी नीचे से साक्षी के रोने की आवाज आई.

मैं फ़ौरन नीचे पहुँचा; "तेरे बिना ये सोने वाली नहीं, इसे सुला कर मेरे पास वापस दे दे!" भाभी बोली.

मैं उनका मतलब समझ गया था. वो चाहती थीं की नितु और मुझे अकेला टाइम मिले पर वो क्या जाने की हम दोनों साक्षी से कितना प्यार करते हे. मैंने बस ना में सर हिलाया, और साक्षी को पुचकारते हुए ऊपर ले आया. साक्षी को रोता देख नितु ने उसे गोद में लेने को हाथ खोले पर साक्षी उसकी गोद में नहीं गई.

"अच्छा बेटा! मेरे पास नहीं आओगे, ठीक है मैं आपसे बात नहीं करुँगी!" ये कहते हुए नितु रूठ गई.

"आऊच....!!! देखो मम्मा गुच्छा हो गए!" मैंने तुतलाते हुए साक्षी से कहा और वो एकदम से चुप हो गई. फिर मैं उसे नितु के पास ले गया और साक्षी ने अपने हाथ एकदम से खोल दिये. नितु एकदम से पिघल गई और उसने साक्षी को गोद में ले लिया और उसे प्यार करने लगी. नितु ने साक्षी को बीच में लिटाया और हम दोनों उसके दोनों तरफ लेट गये. नितु ने अपना दायाँ हाथ मेरी कमर पर रखा और मैं अपने बाएँ हाथ से नितु के गाल को सहलाने लगा. "आपको पता है मैंने आपको कितना मिस किया!" मैंने कहा.

"मिस तो मैंने किया आपको! आपके पास तो कम से कम साक्षी थी मेरा तो वहाँ हाल ही बुरा था!" नितु बोली. फिर वो एक दम से उठी और मेरे होठों पर किस दे कर लेट गई. साक्षी अब भी जाग रही थी तो उसे सुलाने को मैंने एक कहानी सुनाई| कहानी सुनते-सुनते माँ-बेटी सो गए और कुछ देर बाद मैं भी सो गया.अगले ३ दिन हम दोनों ने ऑफिस का काम किया, बेचारी नितु को घर का काम भी देखना पड़ता और मेरे साथ बैठ कर काम भी करना पडता. मैं अपनी तरफ से कोशिश कर रहा था की मैं नितु को ज्यादा तंग ना करूँ पर बिना उसके इनपुट के काम होना मुश्किल था. माँ ने भी कई बार नितु को कहा की वो काम करे और घर का काम भाभी कर लेंगी पर नितु नहीं मानी. अखिरकार पीच रेडी हुई और मैंने वो भेज दी और अब हम दोनों बेसब्री से जवाब आने का इंतजार करने लगे.

दो दिन बीते, मैं अब भी पुराने वाले प्रोजेक्ट में लगा था. आकाश और पंडित जी को मैंने पुराने काम दे रखे थे जैसे की जी. एस. टी. रिटर्न भरना, बिल,वाउचर चढ़ाना, आई टी आर फाइल करना. जब बॉस सर पर ना हो तो इम्प्लोयी ढीले हो ही जाते हैं! नितु को तो वो अब जैसे कुछ समझते ही नहीं थे, वो तो मैं उनकी लगाम किसी तरह खींच कर रखता था. डेली उनको फ़ोन कर के जान खाता था की कितनी प्रोग्रेस हुई है तब जा कर वो सीरियसली काम कर रहे थे. पिताजी और ताऊ जी जब मुझे फ़ोन पर उन पर हुक्म चलाते हुए देखते या मुझे उनकी क्लास लेते हुए देखते तो उन्हें बड़ा फ़क्र होता!

खेर दूसरे दिन की बात है, सुबह मैं अपने काम में लगा था. पिताजी और गोपाल भैया कुछ काम से शहर गए थे और ताऊ जी को एक काम था पर वो कहने में झिझक रहे थे. मैं उठ कर उनके पास बैठ गया और उनसे पूछने लगा तो उन्होंने झिझकते हुए कहा; "बेटा वो.... बँक से पैसे लाने थे.....तो ...." बस ताऊ जी इतना ही बोल पाए की मैं एकदम से उठ खड़ा हुआ; "तो चलिए चलते हैं!"

"पर बेटा....तेरा काम...." ताऊ जी बोले.

"ताऊ जी वो मैं वापस आ कर कर लूँगा!" मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुराते हुए खड़े हुए और मुझे आशीर्वाद दिया. फिर हम दोनों गाडी से निकल पड़े, मैंने गाडी बड़े ध्यान से चलाई और रास्ते में ताऊ जी ने मुझे हमारे खेती-बाड़ी के काम के बारे में काफी कुछ बताया. पर उन्हें जान कर हैरानी हुई जब मैंने उन्हें कुछ ऐसी दुकानों के बारे में बताया जहाँ बीज सबसे बढ़िया क्वालिटी के मिलते थे, और तो और कुछ ऐसे व्यापारियों के बारे में भी बताया जहाँ उन्हें रेट सबसे अच्छा मिलता हे. ये सब मैंने कुछ साल पहले जब मैं प्रकाश के साथ भाई-दूज वाले दिन निकला था तब देखा और सीखा था. इधर मैं और ताऊ जी बातें करते हुए जा रहे थे और उधर घर पर काण्ड हो गया.

नितु उस वक़्त रसोई में नाहा-धो कर खाना बनाने में लगी थी. ताई जी और मान पड़ोस में किसी के यहाँ गईं थी और भाभी नहा रही थी. साक्षी को नहलाने का समय हो गया था तो नितु ने पानी गर्म कर दिया था. भाभी ने नहाने जाते हुए अश्विनी को आवाज मार के कह दिया था की रसोई से गर्म पानी ले कर साक्षी को नहला दे.अब अगर मैं घर पर होता तो मैं ही साक्षी को नहला देता पर मेरी गैरहाजरी का फायदा उठा कर अश्विनी ने साक्षी को ठंडे पानी से नहला दिया. मेरे घर लौटने तक साक्षी की तबियत खराब हो चुकी थी.

जैसे ही मैं घर में घुसा मुझे साक्षी के रोने की आवाज आई और मैं भागता हुआ अंदर आया तो देखा नितु साक्षी को गोद में ले कर चुप कराने की कोशिश कर रही हे. मुझे देखते ही नितु ने फ़ौरन साक्षी को मेरी गोद में दे दिया. अभी वो कुछ बोल पाती उससे पहले ही मुझे साक्षी के बुखार का एहसास हो गया."साक्षी को तो बुखार है?" मैंने गुस्से में कहा और ठीक उसी वक़्त अश्विनी ऊपर से अंगड़ाई लेते हुए नीचे उतरी. "यहाँ अश्विनी को बुखार चढ़ हुआ है और तू ऊपर सो रही है?" मैंने अश्विनी पर चीखते हुए कहा.

पर वो जहरीली नागिन पलट कर बोली; "मुझ पर क्यों चीख रहे हो? अपनी बीवी से कहो या अपनी भाभी से कहो!" इतना कह कर वो पलट कर ऊपर चली गई. मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया पर अभी मेरे लिए साक्षी की तबियत ज्यादा जरुरी थी. ताऊ जी भी गुस्से से तमतमा गए थे और बरसने वाले थे;

"ताऊ जी अभी आप इसे कुछ मत कहना, पहले मुझे वापस आने दो!" इतना कह कर मैं और नितु दोनों डॉक्टर के निकल गये. मैंने चाभी नितु को दी और उसे ड्राइव करने को कहा. मैं साक्षी को अपनी छाती से चिपकाए रखा और उसे अपने जिस्म की गर्मी देता रहा. साक्षी की सांसें तेज चलने लगी थीं और मेरी जान निकलने लगी थी.

"मेरा बच्चा! बस ...बस पापा है ना यहाँ! मेरा ब्रेव बच्चा.... बस थोड़ी देर में हम डॉक्टर के पहुँच जाएँगे फिर आप ठीक हो जाओगे! ओके?" मैं साक्षी को हिम्मत बंधा रहा था. साक्षी के नन्हे से हाथ ने मेरी ऊँगली कस कर पकड़ ली थी और मेरे मन में बैठा डर बाहर आ गया था. आँसुओं की धारा बहते हुए मेरे हाथ पर गिरी जिसे देख नितु भी घबरा गई. उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे हिम्मत बढ़ाने लगी. मैंने भी गाडी में बैठे-बैठे भगवान को याद करना शुरू कर दिया.

आखिर हम डॉक्टर के पहुँचे और मैं दौड़ता हुआ अंदर पहुँचा और डॉक्टर को साक्षी को चेक करने को कहा. डॉक्टर ने साक्षी का अच्छे से चेक-अप किया और मुझसे कहा; "अच्छा हुआ की आप इसे ठीक समय पर ले आये, देर करते तो ह्य्पोथेरमिआ का खरा बन जाता. वैसे हुआ क्या था?" अब मुझे तो कुछ पता नहीं था तो नितु बोली; "वो किसी ने साक्षी को ठन्डे पानी से नहला दिया था!" नितु का ये बोलना था की मेरा खून खोल गया, क्योंकि मैं जानता था की ये काम किस का हे. डॉक्टर ने हम दोनों को ही झड़ा की इतनी छोटी बच्ची को ठंडे पानी से कौन नहलाता है और हम दोनों कितने गैर-जिम्मेदार माँ-बाप हैं! हम दोनों चुप-चाप सब सुनते रहे, बस मेरे मन को ये तसल्ली थी की मेरी बेटी को कुछ नहीं होगा.
 
दवाई ले कर हम घर वापस आ गए और पूरे रास्ते ना तो में कुछ बोलै और न ही नितु कुछ बोली. साक्षी मेरी गोद में ही सो चुकी थी. जैसे मैं घर में दाखिल हुआ मुझे माँ दिखीं और उन्होंने साक्षी का हाल-चाल पूछा.

मैंने साक्षी को उनकी गोद में दिया और उन्हें कमरे में जाने को कहा. माँ के अंदर जाने तक मैं चुप रहा और तब तक घर के सारे लोग इकठ्ठा हो चुका थे., सिवाए अश्विनी के! मैंने दहाड़ते हुए उसे आवाज दी; "अश्विनी!!!!!!" मेरी दहाड़ सुनते ही वो नीचे आ गई. उसे देखते ही मैं तमतमाता हुआ उसके पास तेजी से चल कर पहुँचा और उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा मारा. अश्विनी जा कर सीढ़ी पर गिरी, घर का कोई भी सदस्य कुछ नहीं बोला और न ही कोई अपनी जगह से हिला!

"अगर आज मेरी बच्ची को कुछ हो जाता ना, तो तुझे आज भगवान भी नहीं बचा सकता था! तेरी जान ले लेता मैं!!!!" मैंने चीखते हुए कहा.

"तू (अश्विनी) अभी तक इस घर में है तो सिर्फ इसलिए की मेरी बच्ची को माँ के दूध की जरुरत है वरना तुझे धक्के मार के निकाल देता!.... और आप सब भी सुन लीजिये आज से कोई भी साक्षी को इसके साथ अकेला नहीं छोड़ेगा! मुझे इस नागिन पर जरा भी भरोसा नहीं, अपनी सनक के चलते ये साक्षी को नुकसान पहुँचा सकती है!.... और अगर साक्षी को कुछ हुआ तो पहले इसकी जान लूँगा उसके बाद अपनी जान!" इतना कहते हुए मैं माँ के कमरे में घुसा और साक्षी को गोद में ले कर ऊपर अपने कमरे में आ गया.आज फिर एक बार एक बाप का प्यार सामने आया था और घर वाले चुप-चाप सर झुकाये खड़े थे.

कुछ देर बाद नितु कमरे में आई, साक्षी बिस्तर पर लेटी थी और मैंने उस पर एक कंबल डाल रखा था. मैं टकटकी बंधे साक्षी को देख रहा था. उसका पेट तेजी से सांस लेते हुए ऊपर-नीचे हो रहा था और मैं ईधर प्रार्थना कर रहा था की मेरी बेटी चहकती हुई उठे ताकि मैं उसे प्यार कर सकू. नितु दरवाजे पर कान पकड़ कर खड़ी हो गई और वहीँ से दबी हुई सी आवाज में बोली; "सॉरी!" उसकी आवाज सुन मैं ने उसकी तरफ देखा. उसके चेहरे से उसका दर्द झलक रहा था. मैं उठा और उसे अपने गले से लगा लिया.

"आई एम रियली सॉरी!” नितु रो पड़ी क्योंकि वो भी साक्षी से बहुत प्यार करती थी.

"इट्स ओके!आई एम सॉरी!!! मुझे आपको वहाँ सब के सामने नहीं डाँटना चाहिए था!" मैंने कहा.

"आपको सॉरी बोलने की कोई जरुरत नहीं है, आपने कुछ नहीं किया! मेरी जगह आपने ये गलती की होती तो मैं भी आपको ऐसे ही डाँटती!" नितु बोली.

इतने में भाभी खाना ले कर आ गईं और वो भी थोड़ी घबराई सी थी. पर नितु को गले लगाने के बाद मेरा गुस्सा शांत हो चूका था;

"माफ़ करना भाभी!" मैंने कहा,

नितु ने एकदम से भाभी के हाथ से खाने की थाली ले ली और मुझे उन्हें भी गले लगाने को कहा.

मैंने भाभी को गले लगाया और तभी भाभी बोली; "साऱी (सॉरी) सागर भैया! (भाभी ने अंग्रेजी बोलने की कोशिश की!) वादा करती हूँ की आज के बाद मैं साक्षी का ख्याल रखुंगी.!"

मेरे लिए इतना ही बहुत था फिर उन्होंने मुझे खाने को कहा तो मैंने मना कर दिया; "भाभी एक बार साक्षी को उठ जाने दो, फिर मैं खा लूँगा!"

भाभी ने थोड़ी जोर-जबरदस्ती की पर मैं अड़ा रहा. आखिर भाभी नीचे चली गईं और उनके पीछे मैंने नितु को भी भेज दिया ताकि वो सबको खिला दे.नितु ने सब को समझबूझा कर खाना खिला दिया और सबको यक़ीन दिला दिया की मेरा गुस्सा शांत हो चूका हे.

शाम को चार बजे साक्षी उठी और उसने उठते ही मुझे देखा. मुझे देख कर उसकी किलकारियाँ कमरे में गूंजने लगी. बुखार अब कम हो चूका था और अब उसके खाने का समय था. मैं साक्षी को ले कर नीचे आया तो देखा सब के सब चुप-चाप आंगन में बैठे हे. मैंने भाभी को इशारे से अपने पास बुलाया और उन्हें साक्षी को देते हुए कह दिया की वो साक्षी को दूध पिला दें.अश्विनी मेरी झड़ सुनने के बाद भाभी के कमरे में ही दुबकी बैठी थी और जब भाभी साक्षी को ले कर आईं तो वो समझ गई की साक्षी का दूध पीने का समय हो गया हे. भाभी उसी के सर पर बैठी रहीं जबतक उसने साक्षी को दूध नहीं पिला दिया.

इधर मैं आंगन में बैठ गया और नितु खाना परोसने लगी.

"बेटा इतना गुस्सा मत किया कर! तेरा गुस्सा देख कर तो आज मैं भी डर गया था!" ताऊ जी बोले.

"देख तेरे चक्कर में बहु ने भी खाना नहीं खाया!" माँ बोली.

मैंने सब के पाँव छू कर उनसे अपने बुरे बर्ताव की माफ़ी माँगी और उन्हें समझा दिया की मैं साक्षी को ले कर बहुत पजेसिव हूँ! मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए उस समय किसी ने मुझे कुछ नहीं कहा. पर ये बात नितु को भली-भाँती समझाई जा चुकी थी की मेरा साक्षी से इस कदर मोह बढ़ाना सही नहीं है! नितु भी मजबूर थी और किसी से कुछ नहीं कह सकती थी वरना वो सबको सच बता देती. मैंने और नितु ने खाना खाया और कुछ देर बाद भाभी साक्षी को ले कर वापस मेरे पास आ गईं, साक्षी मेरी गोद में आकर मेरे सीने से चिपक गई. रात को खाना खाने तक मैं सब के साथ नीचे बैठा रहा पर साक्षी को एक पल के लिए भी खुद से दूर नहीं किया. खाना खाने के बाद मैं, साक्षी और नितु ऊपर आ गये. मैं कपडे बदल रहा था और साक्षी बिस्तर पर चुप-चाप लेटी थी;

"बेटा!आई एम सॉरी!!! मैंने आपकी तकलीफ नहीं समझी! आप रो रहे थे और मैं ......कुछ नहीं कर पाई! आई एम a ब्याड मदर!!!" नितु ने खुद को कोसते हुए कहा.

“नो यू आर नॉट अ ब्याड मदर! दॅट इडियट इज अ ब्याड मदर! अब खुद को ब्लेम करना बंद करो और साक्षी को प्यारी सी किसी दो!" मैंने कहा तो नितु ने साक्षी के गाल को चूमा.

साक्षी को किसी मिली तो वो एकदम से मुस्कुरा दी और अपने नन्हे हाथों से नितु की लट को पकड़ लिया. नितु अपनी नाक को साक्षी की नाक से रगड़ने लगी. मेरी बेटी फिर से हंसने लगी और उसकी किलकारियाँ कमरे में गूंजने लगी. मैं और नितु साक्षी के दोनों तरफ लेट गए और उसे सुलाने के लिए मैंने कहानी सुनाना शुरू किया. कुछ ही देर में नितु सो गई पर साक्षी जाग रही थी. मैंने साक्षी को गोद में लिया और बेडपोस्ट का सहारा ले कर बैठ गया.आखिर कुछ देर बाद साक्षी को नींद आ गई पर मैं जागता रहा और उसके प्यारे मुखड़े को देखता रहा.

रात तीन बजे साक्षी ने रोना शुरू किया, उसका बुखार लौट आया था. मैंने फ़ौरन साक्षी का बुखार देखा तो वो थोड़ा ज्यादा था. इधर नितु ने फटाफट डॉक्टर को फ़ोन मिलाया और उसे साक्षी का टेम्परेचर बताया. डॉक्टर ने बताया की हमें क्या उपचार करना है, करीब घंटे भर बाद साक्षी शांत हुई और मेरी ऊँगली पकड़ कर सो गई. कुछ देर बाद थकावट के कारन नितु की भी आँख लग गई पर मैं सुबह तक जागता रहा. सुबह जब नौ उठी तो मुझे जागते हुए पाया; "आप साऱी रात सोये नहीं! थोड़ा रेस्ट आकर लो वरना बीमार पड़ जाओगे और फिर साक्षी का ख्याल कैसे रखोगे" नितु बोली तो मैं उसकी बात मान कर साक्षी से लिपट कर कुछ देर के लिए सो गया.

घंटेभर बाद ही साक्षी उठ गई और अपने छोटे-छोटे हाथों से मेरी दाढ़ी पकड़ने लगी. उसके छोटे-छोटे हाथों का एहसास पाते ही मैं उठ गया और उसे इस तरह हँसते हुए देख जान में जान आई. मैंने साक्षी का बुखार देखा तो वो अब नहीं था. मैंने चैन की साँस ली. इतने में नितु आ गई और मेरी गर्दन पर किस करते हुए बोली; "आपकी लाड़ली का बुखार अब उतर चूका है! अब उठो और अपनी ये दाढ़ी साफ़ करो! मुझे मेला शोना क्लीन शेवन चाहिए!"

ये पहलीबार था की नितु ने मुझे 'शोना' कहा हो. "पहले तो मैं आपको दाढ़ी में अच्छा लगता था. अब अचानक से क्लीन शेवन क्यों?" मैंने उठ कर बैठते हुए पूछा.

"पहले इसलिए कहती थी ताकि आपको किस न कर पाऊँ! पर अब तो जैसे आपको किसी करने के लिए जगह का अकाल पड़ने लगा हे." नितु ने हँसते हुए कहा.

मैं फटाफट तैयार हुआ और मुझे क्लीन शेवन देख नितु बहुत खुश हुई!

"क्या बात है? हम कहते तक गए की दाढ़ी ना रख पर सागर भैया ने एक ना सुनी और बहु ने एक बार क्या कहा सारा जंगल छोल (साफ़) दिया." गोपाल भैया बोले.

ये सुन कर भाभी ने नितु को प्यार से कंधा मारा और दोनों खी-खी कर हँसने लगे.

नाश्ता कर के हम दोनों डॉक्टर के आ गए और उसने चेक कर के बता दिया की अब घबराने की कोई बात नहीं हे. कुछ हिदायतें हमें दी गईं जिसे अच्छे से समझ कर हम घर लौट आये. दोपहर को खाने के बाद साक्षी मेरी गोद में सो गई और मैं मेल चेक करने लगा. तभी मैंने देखा की कंपनी का जवाब आया था और उन्होंने हमें अगले महीने न्यूयॉर्क बुलाया हे. नितु ने वो मेल मुझसे पहले देख लिया था पर मुझसे उसने कुछ कहा नहीं था. कुछ देर बाद जब नितु ऊपर आई तो मैंने उससे बात की; "बेबी! एक बात बताना, वो ...कोई रिवर्ट आया?"

ये सुन कर नितु कुछ सोच में पड़ गई और वो कुछ जवाब देती उससे पहले ही मैं बोल पड़ा; "मेरा बेबी मुझसे बात छिपा रहा है?" मैंने तुतलाते हुए कहा तो नितु मेरी तरफ देखने लगी; "वो....आप साक्षी को ले कर इतना परेशान थे....तो मैंने ....इसलिए...." नितु ने घबराते हुए कहा.

मैंने हाथ खोल कर नितु को गले लगने बुलाया और उसके कान में खुसफुसाते हुए बोला; "आपको पता है ना हमने कितनी मेहनत की है? मैं साक्षी से प्यार करता हूँ पर उतना ही प्यार मैं अपने काम से भी करता हु. इसलिए नेक्स्ट टाइम मुझसे कोई बात मत छुपाना. हमारे पास बस एक महीना है और अभी काफी काम पेंडिंग है!" मैंने कह तो दिया पर मैं जानता था की मैं साक्षी को छोड़ कर नहीं जा पाउंगा. अगर मैं चला भी जाता तो वापस गाँव नहीं लौट सकता था क्योंकि ६ महीने होने वाले थे हम दोनों को ऑफिस अटेंड किये और वहाँ काम संभालने वाला कोई नहीं था! मैं बस इसी चिंता में खोया था की नितु मेरी तकलीफ समझते हुए बोली; "आई प्रॉमिस की हम अकेले नहीं जाएँगे! साक्षी हमारे साथ जाएगी!"

नितु की ये बात सुन मेरा दिल उम्मीद से भर उठा, मैं इतना खुश था की मैंने नितु से ये तक नहीं पुछा की वो ये सब कैसे करने वाली है?अगले दिन की बात है, मैं ताऊ जी, पिताजी और गोपाल भैया एक साथ निकले.दरअसल मैं उन्हें वो सब जगह दिखाना चाहता था जहाँ से समान सस्ता मिलता है और उन व्यापारियों से भी मिलना चाहता था जिनके साथ हम काम कर रहे थे. इधर घर पर माँ, भाभी और ताई जी एक कीर्तन में चले गये. भाभी साक्षी को अपने साथ ले गईं, उन्होंने नितु को भी कहा पर उसने ऑफिस के काम का बाहना बना दिया.

दरअसल नितु को अश्विनी से बात करने का मौका चाहिए था! सब के जाने के बाद नितु ऊपर छत पर आई, अश्विनी वहाँ अकेली बैठी कुछ सिलाई कर रही थी. शादी के बाद से अभी तक दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की थी. काम को लेकर अगर कोई बात हुई हो तो हुई हो वरना और कोई बात नहीं हुई थी. नितु उसके सामने बैठ गई और बात शुरू करते हुए बोली; "देख....तेरे चाचा (अर्थात मैंने) ने मुझे सब कुछ बता दिया है!"

इतना सुनते ही अश्विनी नितु पर बरस पड़ी; "क्या चाचा? मैं प्यार करती थी उससे और वो भी मुझसे प्यार करता था! शायद अब भी करता हो!" अश्विनी ने जलन की एक चिंगारी जलाते हुए कहा.

नितु को गुस्सा तो बहुत आया पर अभी उसे जो बात करनी थी उसके लिए उसे ये कड़वा घूँट पीना पड़ा! "सॉरी! देख....मैं जानती हूँ तू बंध के रहने वालों में से नहीं है! तुझे उड़ना अच्छा लगता है, अपनी मनमानी करना अच्छा लगता है, ऐशों-आराम अच्छा लगता है और घूमना फिरना भी! यहाँ रहते हुए तो तेरे ये शौक पूरे नहीं हो सकते! मैं तुझे एक बहुत अच्छा मौका देती हूँ.... मैं तुझे इस घर से निकालूँगी...जहाँ तू चाहेगी वहाँ तू रहना, जो चाहे वो करना.....तुझे जो भी चाहिए होगा वो तुझे दूँगी...सारे ऐशों-आराम तेरे होंगे! जितने पैसे चाहिए सब दूँगी.....पर तुझे साक्षी की कस्टडी 'इन्हें' देनी होगी!"

नितु की बात सुन कर अश्विनी जोर से हँसने लगी.

"देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ....प्लीज मेरी बात मान जा!" नितु ने मिन्नत करते हुए कहा पर अश्विनी की हँसी और तेज होती गई. नितु को गुस्सा तो बहुत आया, मन किया की उसे छत से नीचे फेंक दे पर उससे वो मरती नहीं!
 
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