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Romance शादी का मन्त्र

हंसते खिलखिलाते वह रात भी बीत गई, अगले दिन सुबह नाहर के आने पर सारे पेपर नाहर के हिसाब से ही तैयार करवा लिया गया युवराज भैया और नाहर की बात मानते हुए आखिर राज ने उन कागजों पर साइन कर दिया।।

उसी दिन शाम को प्रिंस को आईसीयू से मेडिकल वार्ड में भर्ती कर दिया गया प्रिंस की हालत में पहले से सुधार होने लग गया था,, उन सभी का सारा दिन प्रिंस के साथ ही अस्पताल में बीत जाता प्रिंस को बोलने में अभी भी तकलीफ थी लेकिन इशारों में अपनी बात समझा पा रहा था।। मेडिकल वार्ड में शिफ्ट करने के बाद राज ने प्रिंस का हाथ पकड़कर उसे नाहर और भैया वाली सारी बात बता दी,, प्रिंस ने अपने हाथ से राज के हाथ को थपथपा कर उसे आश्वस्त कर दिया कि राज ने जो भी किया है वह सही है और इस बात से प्रिंस बिल्कुल भी दुखी नहीं है।।

लेकिन उन कागजों पर साइन करने के बाद भी जाने क्यों राज का मन नहीं मान रहा था।।

उस शाम फ्लैट में वापस आने के बाद जब युवराज भैया, राज और प्रेम हॉल में बैठे इसी केस के बारे में कुछ बात कर

रहे थे तभी प्रिया रसोई से बाहर आई

" युवराज भैया हमें एक आईडिया आया है"

" हो गया बंटाधार "बोलकर प्रेम दूसरे कमरे में चला गया।।

प्रेम की बात पर ध्यान ना देकर प्रिया ने युवराज भैया और राज से कहना शुरू किया

" देखिए भैया यह सारा फसाद इसी बात का है ना कि उस अंजानी जमीन को प्रिंस ने बेचा अगर हम उस जमीन का सच में कोई मालिक दिखा दें ,और यह साबित कर दें कि उस जमीन का कोई मालिक है जिससे प्रिंस ने उस जमीन को खरीदा था तब तो यह केस वही का वही खत्म हो जाता है,है ना?"

"हाँ बात तो तुम सही कह रहीं प्रिया, लेकिन ऐसे किसी को भी मालिक नहीं दिखा सकते।।"

युवराज भैया की इस बात पर प्रिया ने तुनक कर कहा" तो यह वकील किस दिन काम आएंगे अगर नाहर यह साबित नहीं कर पाएगा,तो हमारे पास दिल्ली का एक और बहुत बड़ा वकील है आप कहें तो हम उनसे बात करें।"

राज ने प्रिया की ओर देखा तो प्रिया ने राज से कहा "सिद्धार्थ सर के पिता जी वह भी तो दिल्ली में ही वकालत की प्रैक्टिस करते हैं हम सिद्धार्थ से बात करके उनके पिताजी से कहते हैं आपका केस लेने के लिए।।"

" कोई जरूरत नहीं है नाहर संभाल लेगा।" राज ने रूखा ,

सा जवाब दिया और वहाँ से उठ कर चला गया।।

3 दिन बाद प्रिंस की अस्पताल से छुट्टी हो गई और उसे लेकर सारे लोग घर वापस आ गये।।

अभी तक युवराज ने सारी बातों को दबा छुपा कर रखा हुआ था राज के ऑफिस में पुणे की कॉन्फ्रेंस के बाद उसकी छुट्टियों का आवेदन भेज दिया गया था वापस आकर उसे ज्वाइन करने से पहले अपने केस को रफा-दफा करना था।।

आखिर नियत तिथि पर, युवराज राज प्रेम प्रिंस नाहर सभी कलेक्ट्रेट ऑफिस में पटवारी के साथ-साथ उस जमीन से जुड़े सारे कागजों खसरे और नक्शे को लेकर उपस्थित हो गए।।

मौजूदा खसरे की ऑनलाइन जांच की गई सभी अफसरों के सामने हर दिशा से देखने के बाद पटवारी ने उस जमीन के बाबत सवाल करना शुरू किया3 Underscore इतना सिखाने पढ़ाने पर भी अंत समय में राज से झूठ नहीं कहा गया और उसने वहां सभी के सामने यह मान लिया कि उससे बहुत बड़ी चूक हो गई उसने सारे कागजातों पर बिना पढ़े ही दस्तखत कर दिये।।

चूंकि ज़मीन पे उस वक्त तक किसी ने मालिकाना हक के लिये वाद दायर नही किया था इसलिये राज और प्रिंस के ऊपर कोई भी कड़ी कार्यवाही ना कर उन्हे अपने पक्ष में वाद साबित करने का एक और मौका दिया गया,और एक हफ्ते का समय दे दिया गया।।

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वहाँ से बिना युवराज से नज़र मिलाए ही राज प्रेम के साथ निकल गया,उसने प्रिया को फ़ोन कर बड़े हनुमान मन्दिर बुला लिया।।

वहाँ साथ साथ दर्शन कर दोनो कुछ देर के लिये घाट पर चले गये,प्रिंस और प्रेम वहाँ से घर के लिये निकल गये।।

तालाब की सीढ़ियों पर बैठे बैठे राज ने दिन भर की सारी बात बन्सी को बता दी,बन्सी ने मुस्कुराते हुए राज को देखा और अपना पर्स खोल कुछ पेन जैसा निकाला__

" ये क्या है प्रिया ।"

" काजल है ,इधर आओ ज़रा !! हमारे पास अपना चेहरा लाओ।"

" कैसी बेशर्म हो गयी हो आजकल ,खुले आम किस करना चाहती हो,,छी . बन्सी को चिढा के राज हंसने लगा

" हवा में मत उड़िये पण्डित जी हम ऐसा कुछ नही करने वाले,,हम बस ये काजल का टीका आपको लगाना चाहते हैं,जिससे हमारे राज को किसी की नज़र ना लगे।"

" हम कोई छोटे बच्चे हैं,जो हमे काला टीका लगाओगी।।"

" छोटे बच्चे तो नही हो ,पर प्यारे बहुत हो,हम नही चाहते तुम्हे किसी की नज़र लगे।"

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प्रिया ने एक हाथ से राज का चेहरा जबर्दस्ती पकड़ा और दूसरे हाथ से सामने के बालों को थोड़ा पीछे कर राज के माथे पर टीका लगा दिया।।

राज ने प्रिया का हाथ झटक कर अपना चेहरा हटा लिया__" क्या बद्तमीज़ी है यार,,अम्मा का बोलेंगी देख कर, ये कौन नैकी अम्मा आ गयी तुम्हारी।"

" तो बता देना हमारे बारे में, पण्डित जी।"

" अब ये क्या नया राग है तुम्हारा पण्डित जी!! सीधे सीधे नाम लो ना।"

" नही अब हम राज नही बोलेंगे,,कल को बच्चे होंगे तो अच्छा लगेगा क्या बच्चो के सामने उनके पापा का हम नाम लें ।।"

" ओह्हओ!! अभी शादी हुई नही ,तुम बच्चो तक पहुंच गयी,,बड़ी जल्दी है तुम्हें ।।"

" जल्दी कैसे ना होगी!! अरे याद आया राज,हम 15 दिन की छुट्टी लेकर आये थे जिसमे 6 दिन तो खतम हो गये,अब इन बचे दिनों में हमारी शादी नही तो कम से कम सगाई तो हो ही जाये।"

" हम्म आज बाऊजी और युवराज भैया से बात करते हैं ।।"

दोनो अपनी बातों में खोये थे कि तभी कुछ पांच छै लड़के ,

ज़ोर ज़ोर से बात करते उसी तरफ चले आये और राज और प्रिया को देख उन लोगों की सीढियों के पास ही आकर खड़े हो बात करने लगे।।

"अरे गुड्डा भैया जी ई तो अपने राज भैया बैठे हैं।"

"का बोले कहां बैठे हैं?? हमें तो नजर नहीं आ रहे!! हां हां तुम तो सही बोले,, यह तो राज भैया बैठे हैं और किसके साथ बैठे हैं अरे यह तो प्रिया है! है ना,कैसी हो प्रिया??"

राज ने उन लोगों को देखा तो प्रिया का हाथ पकड़े वहाँ से जाने के लिये मुड़ने लगा।।

" अरे कहां चल दिए राज बाबू हम अभी आए और तुम अभी चल दिए।।"

" गुड्डा!! हमें तुमसे कोई बात नही करनी,,देखो जो झगड़ा फसाद था सब पुरानी बात थी,बचपना था,तुम्हारा भी और हमारा भी ,तो अब मिट्टी डालो उन सब बातों में।।क्या रखा है पुरानी बातों में ।।

राज के ऐसे बोलते ही गुड्डा राज के सामने हाथ जोड़ के खड़ा हो गया।।

" सही कहे गुरुदेव!! हम भी भूल जाना चाहते है, पर वो क्या है ना,तुम्हारा थप्पड़ अभी भी कान में गूंजता रहता है पर एक ही कान में,दूसरे से तो सुनाई ही देना बन्द हो गया था ना,उसका का करें,उसके लिये कोई उपाय बता दो।।"

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" अरे काहे इत्ता खींच रहे यार बात को,,,छोड़ भी दो ,अच्छा हमें मारना चाहते हो तो मार लो,अगर इसी से तुम्हारे कलेजे को ठंडक पड़ती है तो यही कर लो।प्रिया तुम जाओ।"

राज की बात पर प्रिया ने उसे घूर के देखा और गुड्डा की तरफ मुड़ गयी__

" काहे गुड्डा भूल गये हो क्या कि तुम राज से बात कर रहे हो??एक ही थप्पड़ में बहरे हो गये थे .

तुम्हे क्या लग रहा ,तुम छै हो और वो अकेला तो तुम जीत जाओगे ,अरे गधे हम उसके साथ है इसलिये इतना तमीज़ से तुमसे बात कर रहा ,समझे वर्ना अभी तुम्हे तुम्हारी नानी याद दिला देगा।।

" का बात है डाकू हसीना, बोलो ना अपने राज बाबू को ,की तुम्हारा हिस्सा बांटा कर ले हमारे साथ,हम सारा थप्पड़ वप्पड़ भूल जायेंगे .

गुड्डा की बात, पूरी होने के पहले ही उसके चेहरे पे एक घूंसा पड़ गया,,उसके बाद तो ताबड़तोड़ जो जो सामने आता गया राज ने सबकी लातों से घून्सो से जो धुनाई की कि उनमें से कोई वहाँ से उठ कर भागने की हालत में भी नही बचा।। पर सबसे बुरी हालत गुड्डा की ही करने के बाद जब राज प्रिया का हाथ पकड़ वहाँ से निकलने लगा तब गुड्डा ने अपने दोनों हाथों से राज का एक पैर पकड़ लिया,

राज ने पैर झटक कर छुड़ाने की कोशिश करी तब गुड्डा राज ,

को देख ज़ोर से हंसने लगा, राज अपना पैर छुड़ा कर चला गया__" यही तो हम चाहते थे राज बाबू।"

राज और प्रिया वहाँ से निकले ही थे कि राज के घर से फोन आ गया__ " हाँ अम्मा आ रहे,,घर ही आ रहें हैं ।"

सारे रास्ते दोनो चुपचाप बैठे रहे,,राज बुलेट चलाते हुए अपनी सोच में गुम था,और पीछे बैठी प्रिया अपनी सोच में ।

प्रिया को उसके घर उतार कर राज जाने को हुआ __" सुनो इतना मूड मत ऑफ़ करो,,भूल जाओ ना गुड्डा और उसके लड़कों को,,उनके आने के पहले इतनी प्यारी शाम थी ,उसे याद रखो बस!!"

राज मुस्कुरा के अपनी बुलेट मोड़ कर घर के लिये निकल गया।।

घर पहुंचते ही उसने देखा उसके घर के बाहर तीन चार बड़ी बड़ी गाडियाँ खड़ी थी,अपनी गाड़ी खड़ी कर अन्दर जाते ही युवराज ने आगे बढ़ कर हँसते हुए राज के हाथों को थाम कर उसे सबके सामने ले आया__" नेता जी,यही है हमारा छोटा भाई!! बहुत बहुत गर्व है हमें अपने भाई पर।।

हॉल में युवराज भैय्या और बाऊजी के अलावा रूपा भाभी के पिता जी उनके मौसा जी,भाभी के दोनो बड़े भाई,उनकी मौसी, नेता जी अपनी श्रीमती जी और दोनो लड़कों के साथ मौजूद थे।।

उन सभी को नमस्ते कर राज भीतर चला गया__

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" कहाँ रह गया था लल्ला,इत्ती अबेर कर दी,और ये क्या लग गया माथे पे ,दिखा ज़रा।।

बाहर खचाखच भरे हॉल में इतने लोगों को जो नही दिखा एक माँ की आंखों ने तुरंत ढूँढ लिया__

" अरे कुछ नही अम्मा,हल्की सी चोट है।।"

" कहाँ हल्की है,,दोनों भौंहो के बीच ऐसा सीधा कटा है,लग रहा शिव जी का तीसरा नेत्र बन गया है तेरे माथे पे," कहते हुए सुशीला ने ज़रा सी हल्दी राज की चोट पर लगा दी।।

" जा बेटा जल्दी से हाथ मुहँ धोकर कपड़े बदल कर आ जा,,मेहमान बैठे हैं नीचे।।

बिल्कुल ही बिना मन के राज अपने कमरे में चला गया,हाथ मुहँ धोकर निकला ही था कि अम्मा हाथ में दूध का गिलास थामे ऊपर चली आयी__

उसके बिस्तर पर उन्होने कुर्ता निकाल रख छोड़ा था__" अम्मा ये कुर्ता काहे निकाला,रात में हम लोवर टी शर्ट ही तो पहनते हैं,जानती हो फिर भी ।।"

"पहुना लोगन के सामने ई घर का कपड़ा में जाओगे, इत्ता बड़ा आदमी के लड़िका हो,बड़े भाई का भी नाम है,खुद आफीसर बन गये हो पर सुधरोगे काहे??ई हल्दी वाला दूध पी के नीचे आ जाओ जल्दी।।

राज ने हँस के अपनी अम्मा को देखा और कुर्ता डाल दूध पीकर वो नीचे हॉल में चला आया।।

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उसके नीचे आते ही नेता जी ने उठ कर उससे हाथ मिलाया और एक एक कर अपने साथ आये अपने सारे बंधु बांधवों का उससे परिचय कराने लगे, उसके बाद उन्होनें राज के पिता की तरफ हाथ जोड़ दिये__

" शर्मा जी,आपके राजकुमार हमारे पूरे परिवार को बहुत पसंद हैं,,दो भाइयों में इकलौती कन्या है हमारी,बड़े लाड़ प्यार में पली है . हमें हमेशा से ही संस्कारी घर द्वार की चाह थी,वर्ना नेता और राजनीतिज्ञों के एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे पर हमें आपके से घर की ही तलाश थी,बहुत पहले किसी शादी में आपके राजकुमार को देखे थे,तभी से हमें गौरी के लिये पसंद आ गये थे,फिर अभी जब दामाद बाबू हमसे मिलने आये तब पता चला की राजकुमार तो अधिकारी भी बन गये हैं,तब हम सोचे अब देर करना ठीक नही है नेता जी!!

शर्मा जी आप आज्ञा दें तो हम बरीक्षा संगे संग करे देते हैं,उसके बाद आराम से पत्रा वत्रा दिखा के तिलक और फेरों का मुहूर्त निकलवा लेंगे।

हमारी गौरी का फोटो आप सब देख ही चुके हैं, बहन जी तो चतुर्वेदी के यहाँ की शादी में गौरी से मिल भी चुकी हैं ।।"

राज के बाजू वाली कुर्सी में बैठी सुशीला ने तुरंत हाँ में सर हिला दिया,तभी नेता जी की श्रीमती जी ने एक तस्वीर सुशीला के हाथ में पकड़ा दी जिसे उन्होनें मुस्कुराते हुए राज के हाथ में रख दी, राज इन सब बातों से चकित अपनी अम्मा को देखने लगा।

अम्मा ने उसे मुस्कुरा के देखा और अपने आंचल से उसे ढांप कर उसके पीछे खड़ी हो गयी,,नेता जी की बहन के पति ,

जो पेशे से सचिवालय मे सेक्रेटरी थे ने अपनी पंडिताई का परिचय देते हुए मंत्रोच्चार प्रारम्भ कर दिया__

नेता जी के बड़े बेटे ने खड़े होकर सबसे पहले कुंकुम का तिलक राज के माथे खींचा और एक एक कर कीमती सुसज्जित थालों को उसकी गोद मे रखना शुरु कर दिया।

राज के दायीं और खड़ी रूपा सारे थाल उसकी गोद से लेकर अपने किनारे रखती चली गयी।।

युवराज के फोन पर तब तक प्रिंस और प्रेम भी वहाँ पहुंच चुके थे, दोनो हतप्रभ राज को और राज उन्हें देख रहा था।।

बारी बारी से वधु पक्ष से सभी सम्मानित पुरूष सदस्यों ने कुछ ना कुछ राज के हाथों पर रख दिया,अंत में वधु की माँ राज के सामने चली आयी।

लाल रेशमी साड़ी में लिपटी नेता जी की धर्मपत्नी स्वयं बहुत सुंदर थी,उन्हें देख कर ही उनकी कन्या के ओजस्वी रूप का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता था,,आगे बढ कर उन्होनें एक चार तोले की मोटी सी चेन राज के गले में डाल दी और राज की अम्मा के आगे हाथ जोड़ दिये__" बहन जी वैसे तो हमारे में औरतें बरीक्षा में आती नहीं पर हम इन सब दकियानूसी बातों को नही मानते,, आपका लड़का खरा सोना है,अब हमने गले में चेन डाल इसे हमेशा हमेशा के लिये अपना कर लिया है,,ध्यान रखियेगा हमारे कुंवर जी का।।"

सुशीला ने भी हँस कर दोनों हाथ जोड़ दिये।।

ये सारा कार्यक्रम ऐसी जल्दबाजी में हुआ कि राज को ,

अम्मा बाऊजी या युवराज भैया से बात करने का कोई मौका ही नही मिल पाया,इसके बाद खा पीकर देर रात सभी मेहमान एक एक कर चले गये पर रूपा के माता पिता और उसके दोनो भाई उस रात वही रूक गये।।

सभी का सोने का प्रबंध अलग अलग कमरों में करने पर भी रूपा के भाईयों के लिये कोई व्यवस्था बनती ना देख सुशीला ने उन दोनों का बिस्तर भी राज के कमरे में ही लगवा दिया।।

इस सारे फसाद में आधी रात बीत गयी और राज को अम्मा से कुछ भी कहने का मौका नही मिल पाया।।रात मे कमरे में भाभी के भाईयों की उपस्थिति के कारण राज प्रिया से कोई बात नही कर पाया ,,प्रिया बार बार फोन करेगी और बात करने की असमर्थता उसे समझानी मुश्किल होगी यह सोच कर राज ने फोन ही बन्द कर दिया और सो गया।।

क्रमशः
 
राज प्रिया को उसके दरवाज़े पे उतार कर चला गया,प्रिया भीतर गयी और बिना रसोई की ओर झाँके ही सीढियां चढ़ ऊपर अपने कमरे में चली गयी, शर्मिला रसोई की खिड़की से राज को जाते हुए देख चुकी थी,उसने प्रिया के लिये चाय बनाई और अपनी और उसकी चाय लिये ऊपर प्रिया के कमरे में पहुंच गयी।

"राज आये रहे तुम्हें छोड़ने?"

" हाँ,,क्यों पूछ रही?"

" नही बस ऐसे ही,कब तक की छुट्टियाँ हैं लाली,फिर तुम्हरे जाने की तैयारी भी तो करनी होगी।"

" हम्म अभी समय है मम्मी,हम दस दिन बाद जायेंगे।"

" बहुते बदल गयी हो बिटिया,आजकल कुच्छो नही बताती अपनी माँ को।"

प्रिया अपनी माँ को देख मुस्कुरा उठी,और आगे बढ कर शर्मिला की गले में दोनों बाहें डाले झूल गयी।

" सही समय पर सब बता देंगे मम्मी,ज्यादा टेंशन ना लो।"

" कब आयेगा तुम्हारा सही समय लाड़ो?? कहीं ज्यादा देर ना कर बैठना,अपनी माँ से क्या छिपाना,हमे बता दो।"

मुस्कुराते हुए आँखें नीची किये आखिर प्रिया ने अपने और राज की पुणे में हुई सारी बातचीत और सब कुछ शर्मिला को बता दिया,शर्मिला ने आगे बढ प्रिया को गले से लगा लिया__

" हमें तो शुरु से ही राजकुमार बहुते पसंद थे,तुम्ही दोनो जाने काहे झगड़ बैठे,अब तुम्हरे पापा को भी बता दें ।"

" नही मम्मी!! राज अपने घर में बात करने के बाद खुद आयेंगे पापा से बात करने, वो सब संभाल लेंगे, हमें पूरा भरोसा है, अब सब ठीक हो जायेगा।।"

तभी नीचे से वीणा अपने पति और बच्चे के साथ धमक पड़ी _" अरी प्रिया कहाँ हो भई ,देखो तुम्हरे जीजा तुमसे मिलने आयें हैं ।"

वीणा की आवाज़ सुन दोनों नीचे उतर गयी।

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रात भर राज का फोन बन्द रहा,सुबह जागने पर भी जब राज का फोन बन्द ही आया तब प्रिया ने प्रेम को फ़ोन किया,जब उसने भी राज के फोन के बारे में अनभिज्ञता जताई तब हार कर प्रिया ने धड़कते हृदय से युवराज भैया को फोन मिला दिया,

उन्होनें प्रिया को घर तुरंत आने का न्योता दे डाला _" हम तब तक कुछ नही बताएंगे जब तक तुम खुद घर नही आ जाती,आखिर राज की बचपन की दोस्त हो,तुम्हे भी खुशखबरी पता होनी चाहिये,ऐसा करो जल्दी से घर चली आओ।"

खुशखबरी सुन माथा तो ठनका पर प्रिया को यह भी लगा कि हो सकता है राज का केस रफा दफा हो गया हो इसिलिए भैय्या इतने प्रसन्न हैं,वो तैयार होकर राज के घर को चल दी।।

प्रिया राज के घर पहुंची कि उसे दालान में ही राज की दादी मिल गयी__" कैसन हो बिटिया?? बीमार रही का,बड़ी दुबरा गयी हो।"

" प्रणाम दादी! हम ठीक हैं,राज कहाँ हैं?"

" घूमत बागत हुई हैं,इहैं कहीं,जाओ ऊपर कमरा में देख लो।"

प्रिया जल्दी से आंगन को पार करती सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर को निकल गयी,राज के कमरे में पहुंची तो वहाँ राज के साथ दो और लड़कों को देख झिझक कर बाहर ही रुक गयी__ " ,

आओ अन्दर आ जाओ प्रिया ,ये भाभी के भाई हैं ।"

प्रिया के अंदर आते ही वह दोनों वहां से उठकर बाहर चले गए।। राज को जब तसल्ली हो गई कि वह दोनों कमरे से काफी दूर निकल गए तब उसने प्रिया को अंदर पकड़ कर बैठा दिया __"तुम यहां कैसे ??"

" तो क्या करते तुम्हारा कोई अता पता ही नहीं था फोन भी बंद आ रहा था युवराज भैया से बात हुईं उन्होंने कहा खुशखबरी है तुरंत घर चली आओ तो हमें लगा तुम्हारा केस सॉल्व हो गया,फिर हम चले आये।"

" अरे कोई केस सॉल्व नहीं हुआ प्रिया यहां तो हम दूसरे चक्कर में फंस गए हैं।"

राज अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था की राज की अम्मा एक ट्रे में कुछ मिठाइयां और पानी के गिलास लिये ऊपर चली आई।।

2 दिन से सारी तैयारियों में व्यस्त राज की अम्मा सीढ़ियां चढ़कर ही हाँफ गई ट्रे को टेबल पर रख वही पलंग पर बैठ सुस्ताने लगी।

"अभी फोन आया था समधी जी का राज!! कह रहे हैं पत्रा दिखा लिया है उन्होंने 4 दिन बाद का ही शादी का मुहूर्त है कल सुबह सबको निकलने कह रहे हैं पास ही उनका गांव हैं जहां उनका बहुत बड़ा फार्म हाउस है,, वहीं से सब कुछ करने बोल रहे हैं।

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5 दिन का कार्यक्रम रहेगा कल सब पहुंचेंगे परसों तिलक चढ़ जाएगा और उसके अगले दिन मेहंदी संगीत और चौथे दिन शादी अब समझ नहीं आ रहा है, इतना सारा तैयारी कैसे इतनी जल्दी जल्दी करें।।"

प्रिया राज को राज प्रिया को देखने लगा।। हिचकिचाते हुए राज ने अपनी अम्मा से कहा__ "इतनी क्या हड़बड़ी हो गई है हम कहीं भागे जा रहे हैं क्या??"

" वही तो हमें नहीं समझ आ रहा बेटा नेताजी को इतनी का हड़बड़ी हो गई है,, हम तो दो-तीन महीना के बाद तारीख निकालने बोले रहे।"

प्रिया ने आंखों ही आंखों में राज से प्रश्न किया राज ने आंखों से ही उसे चुप रहने का इशारा कर दिया।।

"किसकी शादी की बात हो रही है, अम्मा जी?"

" रजुआ की और किसकी?"

प्रिया के सवाल पर अम्मा ने जवाब, दिया।।

प्रिया देखो हम जानते हैं जो भी तुम दोनों के बीच था और जो नहीं भी था,, हम अम्मा है राज कि उसे भी अच्छे से जानते हैं हम समझते हैं तुम दोनों अब दोस्त हो,, हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं है।। बल्कि हम तो कहते हैं तुम भी चलो,, राज की सबसे अच्छी दोस्त हो उसे समझती हो उसके सबसे खुशी वाले दिन में तुम्हारा उसके साथ रहना जरूरी है।। यही ,

पास ही गांव है हम तुम्हारी अम्मा से पूछ लेते हैं तुम भी चलो कल सुबह।।

हम जब निकलेंगे तो तुम्हें लेते चलेंगे शादी के बाद ही लौटना अब,क्यों चलोगी ना?"

" जी हम??!!बस इतना बोल प्रिया राज की अम्मा को देखती रह गयी।"

" हां तुम!! हम सुबह तुमको लेते चलेंगे।"

पता नही सुशीला ने क्या सोच कर ऐसा कहा और प्रिया ने भी क्या सोचा,पर उन दोनों औरतों के हृदय में चल रहे द्वंद से अपरिचित राज स्वयं मे दुखी था,, उसे इस सब से बाहर निकलने का कोई उपाय नही दिख रहा था।

अम्मा के नीचे जाते ही राज प्रिया को पिछली शाम की हर घटना एक सांस में बता गया, कि कैसे वो निरुपाय बैठा रह गया, और उसकी बरीक्षा कर गया नेता जी का परिवार।।

सबकुछ ऐसी जल्दबाजी में होता देख उसे कुछ समझ नही आ रहा था,इधर उसके कमरे में प्रिया बैठी रो रही थी,उसे चुप करवाने में असमर्थ वो खुद अपने कमरे की खिड़की पे खड़ा बाहर देख रहा था, तभी प्रिंस और प्रेम चले आये__

" भैय्या जी ई सब का हो रहा है,हम का सुन कर आ रहे हैं नीचे से?"

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" अबे हमे क्या पता,तुम क्या सुन कर आ रहे हो?"

" अरे प्रिया तुम भी यहाँ हो?? भैय्या जी नीचे सब बतिया रहे कि आपके ससुराल मतलब ऊ नेता जी के घर से फोन आया रहा कि कले उनके रामपुर के फ़ार्म हाऊस निकलना है परों दिन आपका तिलक है कल शाम को आपकी सगाई है,और तिलक के अगले दिन मेहंदी संगीत और बस उसका अगला दिन आपका शादी है।"

" शादी नही सालों बर्बादी है हमारी, यहाँ हमारे घर में ही कोई हमारी नही सुन रहा,हम किससे बोलें क्या बोलें,,और अम्मा प्रिया को भी कल संग चलने का न्योता दे डाली है।"

" तो तुम क्या चाह रहे,हम ना चले साथ,जिससे तुम आराम से शादी कर लो।"

" अरे यार कोई समझाओ इसको ,हमारा दिमाग अभी बहुत खराब है,गुस्से में कुछ उटपटांग बोल देंगे तो फिर गुर्रा के घर चली जायेगी।"

राज की इस बात पर प्रिया आंखें पोंछ कर मुस्कुराते हुए राज के पास आ गई उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ कर उसने अपनी तरफ घुमाया और बोली

"भरोसा रखो राज बाबू हम पर अब हम तुमसे नाराज होकर कहीं नहीं जाएंगे,, हमें समझ में आ गया तुम्हारे बिना हम नहीं जी सकते।। हम कल चलेंगे तुम्हारे साथ अगर तुम चाहो तो .

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पता नही तुम्हें किसी और से शादी करते देख पायेंगे या नही,पर हाँ कल सगाई होने तक तो ये उम्मीद कर ही सकते हैं कि हो सकता है कोई चमत्कार घट जाये और तुम्हारी शादी रुक जाये, अगर कल तुम्हारी सगाई हो गयी तब फिर उसके बाद हम वापस आ जायेंगे।

"बड़ी फिल्मी हो गई हो तुम प्रिया ।"

प्रेम की इस बात पर प्रिया मुस्कुरा के रह गयी__" अब भगवान पे भरोसा रखने के अलावा और उपाय भी क्या है हमारे पास,,चलो अब हम जा रहे हैं हमें भी तो तैयारी करनी है तुम्हारी सगाई की।"

प्रिया जैसे ही उठ कर जाने को हुई,राज ने उसे खींच कर अपने गले से लगा लिया__

" हमें पूरा भरोसा है प्रिया हमारी शादी तुमसे ही होगी,बस तुम हमे छोड़ कर कहीं मत जाना।"

" हम तुम्हें छोड़ कहीं नहीं जायेंगे,हमें पूरा भरोसा है अपने गणेश जी पर,वो तुम्हारी किसी और से शादी होने ही नही देंगे।।"

" चलो हम तुम्हें घर छोड़ देते हैं ।" प्रेम ऐसा कहकर प्रिया के साथ ही सीढिय़ां उतर गया,राज अपनी खिड़की पे खड़ा प्रिया को जाते हुए देखता रहा।।

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कहीं दूर बजते उदास गाने की धुन कमरे तक तैरती चली आयी__

सांझ ढले गगन तले

हम कितने एकाकी

छोड़ चले नैनो को

किरणों के पाखी .

घर पहुंच कर प्रिया फूट फूट कर रो पड़ी,उसकी आवाज़ सुन शर्मिला दौड़ी चली आयी।।

" का हुई गा गुड़िया,कुछ तो बताओ,तुम्हें ऐसे सिसकते देख हमारा कलेजा मुहँ को आ रहा प्रिया "

रोते रोते प्रिया ने सारी बात अपनी माँ से कह दी,शर्मिला अपना सर पकड़े वही जमीन पर ढ़ेर हो गयी।।प्रिया ने अपनी माँ को संभाला और उसे ऊपर पलंग पर लेटा दिया,,पानी गिलास में निकाल कर अपनी माँ को पिलाने के बाद प्रिया वहीं शर्मिला के सिरहाने बैठी उसका सर सहलाती रही__

" घबराओ मत माँ . हमारे नसीब में जो लिखा होगा उसे कोई नही बदल सकता।"

दोनो बात कर रहीं थी कि नीचे प्रिया के पापा चले आये,उन्होने वहीं से उसकी माँ को आवाज़ लगाई,,शर्मिला के नीचे जाने पर उन्होनें बताया की उन्हें किसी ज़रूरी काम से कल सुबह ही बाहर जाना है इसिलिए आज रात ही सारी ,

तैयारी कर, लेना।।

शर्मिला ने उसके बाद अपने पति से अपनी बिटिया की मनमानी छिपा ली,अभी वो उन्हें चाय पकड़ा कर रसोई की तरफ मुड़ ही रही थी कि दरवाज़े पे किसी ने दस्तक दी,उसने देखा तो सामने बन्टी खड़ा था।।

बन्टी उन दोनों को प्रणाम कर प्रिया को पूछ उसके कमरे की तरफ बढ़ गया,,प्रिया के पिता के नाक भौ सिकोड़ने पर शर्मिला ने ये कह कर बात संभाल ली कि बन्टी प्रिया को शुरु से बहन मानता चला आ रहा है,कुछ अति आवश्यक कार्य होने से ही वो इतनी हड़बड़ी में ऊपर चला गया।

" अरे बन्टी भैय्या आप यहाँ?? आप कब आये बॉम्बे से?"

" बस आज ही पहुंचा,रानी भी आयी है . प्रिया घर पहुंचते ही राज की बरीक्षा गौरी से हो गयी ये पता चला . सुनो अभी ज्यादा कुछ नही बता पाऊंगा ,बस ये कहना चहता हूँ कि कल तुम भी हम लोगों के साथ रामपुर चलोगी,चलोगी ना।।विश्वास रखो मैं कुछ गलत नही होने दूंगा।।"

" ठीक है भैया चलेंगे,कम से कम कल शाम तक एक आखिरी उम्मीद तो है ही ।"

" अरे बिल्कुल मेरे शेर ,,,तुम ही उस गीदड की बीवी बनोगी,पूरा विश्वास है मुझे।"

" क्या भैय्या राज आपको कहाँ से गीदड़ लग रहे।"

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" कमीना गीदड़ नही तो क्या है,ऐसे पूरे शहर का गुण्डा बना फिरता है,जब घर की बात आये तो लाज भरी नयी दुल्हन बन जाता है,अब तक उसे तुम्हारे बारे में बात कर लेनी चाहिये थी,पता नही घोड़ी चढ़ने के बाद बोलेगा या भान्वर पड़ती रहेगी तब सबसे बोलेगा कि उसे तुमसे शादी करनी है।।"

" आपका उनके लिये प्यार ही तो है जो आप इतने नाराज़ हो रहे हैं,वैसे इसमे उनकी कोई गलती नही बन्टी भैय्या,,वो घर भर के बड़ो का लिहाज़ ही इतना करते हैं कि उनके लिये दूसरों के सामने कुछ भी बोलना बहुत कठिन है।"

" अरे वाह!! तुम बड़ी समझदार हो गयी हो, चलो फिर अभी मैं चलता हूँ,तुम अपने घर बता देना सुबह मैं ही आऊंगा तुम्हे लेने,ठीक 8 बजे तैयार रहना।।

रात प्रिया अपनी खिड़की पर खड़ी कुछ सोच में डूबी थी तभी प्रिया के पास माला का फोन आया फोन उठाते ही प्रिया की आवाज सुन माला ने उससे पूछा कि वह कहां है और क्या चल रहा है हैरान-परेशान प्रिया ने माला को सारा हाल कह सुनाया__

" तू परेशान मत हो प्रिया मैं कल सुबह की फ्लाइट से पहुंचती हूँ वहां तेरे पास!! मैं तुझे ऐसे समय में अकेले नहीं छोडूंगी।। यहां से तो डायरेक्ट फ्लाइट है तू टेंशन मत ले मैं आ रही हूं।।बस मुझे रामपुर वाला अपना लाइव लोकेशन भेज देना मैं टैक्सी से ट्रैक कर लूंगी।"

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" माला एक काम करना,आते समय याद से हमारी आलमारी से हम दोनो की अँगूठीयाँ लेते आना,हो सकता है माणिक पहन लेंगे तो हमारी राशि पर के जिद्दी ग्रह जिद छोड़ कर हमारी बात मान जायें ।"

" बिल्कुल मेरी जान !! तुम दोनो की साथ करी शॉपिंग का सारा सामान भी लेती आऊंगी,,वैसे भी उस सामान का यहाँ क्या काम?"

.

अगले दिन प्रिया अपना थोड़ा बहुत समान बैग में भर कर तैयार हो गयी,नियत समय पर एक मिनी वॉल्वो उसके घर के बाहर आकर रुक गयी।

प्रिया के पिता तब तक बाहर जा चुके थे ,अपनी माँ से विदा ले वो वॉल्वो में सवार हो गयी।।

रामपुर वहाँ से लगभग 110 किमी था ,दो वॉल्वो का इन्तज़ाम वधु पक्ष की तरफ से किया गया था,जिसमे एक गाड़ी में सभी बड़े बुज़ुर्ग जिनमें दोनों पक्षों के माता पिता तथा अन्य रिश्तेदार मौजूद थे,और दूसरी गाड़ी में दोनो घरों के बच्चे बैठे थे।।

इतनी अल्प अवधि में दूर दराज़ के रिश्तेदारों को कार्ड छपवा कर भेजना मुश्किल होने से सभी को फोन द्वारा ही सुचित कर दिया गया था,सभी का सगाई वाले दिन तक पहुंचना असम्भव था, अधिकांश रिश्तेदार तिलक की शाम तक ही पहुंचने वाले थे।।

शर्मा परिवार के जितने परिचित उसी शहर के थे उनके घर पर शर्मा जी मय श्रीमती जी मिठाई काजू- मखानों के डब्बे के साथ हाथ पर पान सुपारी रख टीका कर न्योता दे आये थे।

समय की कमी को पैसों की अति ने ढांप लिया, दुल्हन के गहने जोड़े से लेकर दूल्हे की राजसी शेर्वानी तक रातों रात तैयार हो चुकी थी।।

बारात बैंड,धुमाल पार्टी,लेनदेन के कपड़े,दुकानों से खरीदी जा सकने वाली हर वस्तु तैय्यार थी, ताजा तरीन मिठाईयों के लिये शहर का सबसे बड़ा हल्वाई साथ ही जा रहा था।

इस तरह सारे साजो सिंगार के साथ शर्मा जी और नेता जी की गाड़ी विवाह की पटरी पर चलने को तत्पर थी।।

सारे बड़ो को एक गाड़ी में बैठा कर लड़के दूसरी गाड़ी में अपनी व्यवस्था देख रहे थे,दुल्हन की कोई तीन चार मुहँलगी सखियाँ सहेलियां बहनें उसके साथ ही थी,प्रिंस प्रेम और बाकी लड़कों का पूरा फोकस उनकी तरफ ही था।।

दूसरी गाड़ी में राज के साथ प्रिंस प्रेम बन्टी रानी,रूपा भाभी ,रेखा लल्लन ,पिंकी रतन गौरी और उसकी सहेलियां थी..गाड़ी को जब मेन रोड में मोड़ने से पहले बन्टी ने प्रिया के घर के सामने रुकवाया और प्रिया बस, में चढ़ी तो तुरंत गौरी ने बन्टी से पूछ लिया__" ये कौन है जिसके लिये आप इधर इतनी संकरी सी गली में गाड़ी को घुमवा दिये।"

" हमारी पक्की सहेली है, प्रिया ।" रानी के ऐसा बोलते ही गौरी ने मुहँ बना लिया__" ऐसे एक एक के लिये रुकते रहे,तब तो शाम तक में पहुचेंगे।"
 
" भाभी जी ! बडी जल्दी है आपको।" बन्टी के ऐसा कहते ही बाकी लड़कों का एक ज़ोर का कहकहा लगा ,और गाड़ी आगे बढ़ गयी ।।

प्रिया आगे बढ़ रही थी कि रानी ने बड़े प्यार से उसका हाथ पकड़ उसे अपने बाजू में बैठा लिया।।

" तो चलो भाई लोग,रास्ता लम्बा भी है तो क्यों ना थोड़ा गाना बजाना कर लिया जाये,क्या कहते हो आप लोग।"बन्टी के सवाल पर सभी ने सहर्ष हामी भर दी।।

सबसे पहले गाने की शुरुवात बन्टी ने ही करी__

" हम अपनी नयी नयी होने वाली भाभी जी के लिये गाना गा रहे हैं,प्रिया जी आप भी ध्यान दें__

ओ मारिया ओ मरीया, ओ मारिया हो हो

अरे जॉनी जब बोला था तुझसे

शादी करेगी मुझसे

कैसे कहा था यह बता आ आ आ

" यहाँ जानी की जगह आप लोग राज समझे।"

सभी बन्टी की बात पर हँस पड़े ।।

इसके बाद एक एक कर गानों की महफिल सजती चली गयी,सब के सब राज के भी पीछे पड़ गये पर राज का गाने का बिल्कुल भी मन नही था और गौरी की सखियाँ "प्लीज़ जीजू प्लीज जीजू " बोल बोल कर पीछे पड़ गयी थी,आखिर प्रिया से नही रहा गया__" सब इतना कह रहे हैं तो गा दो ना ,

कुछ।"

गौरी ने प्रिया को देखा और फिर राज को,,राज प्रिया को ही देख रहा था।।

राज ने एक भर नज़र प्रिया को देखा और अपना गाना शुरु किया__

सच मेरे यार है, बस वही प्यार है

जिसके बदले में कोई तो प्यार दे

बाक़ी बेकार है, यार मेरे .

जिस हाथ में इक हाथ है उस हाथ की क्या बात है,

क्या फ़ासले, क्या मंज़िलें इक हमसफ़र गर साथ है

जिसकी क़िस्मत कोई यूँ सँवार दे वो ही दिलदार है,

यार मेरे .

प्रिया की आंखें छलक आयी जिसे उसने सबसे छिपा के पोंछ लिया पर देखने वाले ने आखिर देख ही लिया।।

लगभग 2 घंटे में सब रामपुर के रिसॉर्ट पहुंच गए।

बहुत बड़े से लॉन के दोनों तरफ दो ऊंची ऊंची इमारतें थी जिनमें काफी सारे कमरे बने हुए थे उसी से लगा हुआ नेता जी का फॉर्म हाउस भी था।।

एक तरफ बारातियों और एक तरफ घरातीओं के रुकने का इंतजाम था।। सब अपना-अपना सामान उठाएं अपनी दिशाओं में चलते बने लड़के भाग भागकर सारी व्यवस्था देख रहे थे और सबको अलग-अलग कमरों में सुव्यवस्थित ले जाते जा रहे थे।

प्रिया को रानी ने अपने साथ अपने कमरे में रोक लिया।

नीचे हॉल में खाने के बाद सब अपने कमरों में शाम की तैयारियों के लिये चले गये,,रानी के लाख बुलाने पर भी प्रिया खाने के लिये नीचे नही गयी उसे वहाँ ना पाकर राज भी बिना खाये चला गया।

रानी एक प्लेट में खाना लिये ऊपर कमरे में चली आयी, और बन्टी राज को पकड़ उस कमरे मे ले आया ।।

राज को वहाँ देख प्रिया की आंखें भर आईं , तभी माला का फ़ोन आया ,माला से बात कर प्रिया ने बन्टी को नीचे माला को लेने भेज दिया।।

ऊपर आते ही माला प्रिया से लिपट गयी__

'ये क्या हो गया प्रिया ! अब क्या होगा सर??"

" हम लोग देखते हैं क्या हो सकता है,वैसे राज तुम दोनो के इस तरह खाना छोड़ने से कुछ नही होने वाला,तुम दोनो खाना खाओ,रानी तुम दोनो को एक ज़रुरी बात बताना चाहती है,मैं तब तक नीचे से माला जी के लिये भी खाना ले आता हूँ ।"

रानी-- राज जब मुझे बॉम्बे में तुम्हारी शादी का पता चला तो मैं और ये बहुत खुशी से तुम्हारी शादी मे शरीक होने दौडे चले आये पर यहाँ घर पहुंचते ही रुपा भाभी ने जब गौरी से तुम्हारी बरीक्षा का बताया और उसकी फोटो दिखायी तो मैं एक पल को चौंक गयी और मैनें इन्हें सारी बात कह सुनाई,बात ये है कि मैं जब डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में इंटर्नशीप कर रही थी तभी शहर की सुप्रसिद्ध महिला रोग विशेषज्ञ ड़ॉ नीलिमा के पास शाम के समय मे उनके केस असिस्ट किया करती थी,उसी समय एक शाम ड़ॉ नीलिमा की अनुपस्थिती में मैं ही उनकी ओ पी डी देख रही थी,तब एक जोड़ा केबिन में आया,उन्होने खुद को शादीशुदा बतलाया ,नाम भी कुछ और लिखवा कर अपनी समस्या बताई ,और उनकी समस्या यह थी कि उनकी शादी को सिर्फ 5 महीने हुए थे और वो लड़की प्रेग्नेंट हो गयी थी उन्हें इतनी जल्दी बच्चा नही चाहिये ,

था,मैनें अपनी तरफ से समझाने की कोशिश की पर वो लोग अपनी ही बात पर अडे थे तो मैने दवा लिख के दे दी और पांच दिन बाद आकर जांच करवाने कह दिया,हालांकि वो दोनों उसके बाद नही आये,क्योंकि उनका काम तो हो गया था,,जानते हो राज ये तुम्हें क्यों बता रही हूँ, क्योंकि वो लड़की यही गौरी थी,,मैं इसका चेहरा नही भूल सकती .

राज प्रिया बन्टी माला सभी चुप बैठे थे,किसी को उस वक्त कुछ नही सूझ रहा था,तभी प्रिया को अचानक कुछ याद आया__

" माला तुम हमारी अँगूठीयाँ लेकर आयी हो??"

" हां लायी तो हूँ।" ये कह कर माला ने अँगूठीयाँ निकाल कर प्रिया के हाथ मे रख दी, प्रिया ने वहीं रानी के लिये रखे दूध के गिलास से एक कटोरी मे थोड़ा दूध निकाला और एक एक कर दोनो अँगूठीयाँ उस दूध में भिगो कर धो लीं ।

प्रिया-- राज हमारी एक बात मानोगे,शाम को भले ही जो हो अभी हमें ये अंगूठी पहना दो।

राज और बाकी लोग आश्चर्य से प्रिया को देखने लगे,पर उसके ज़िद करने पर राज ने अंगूठी प्रिया को पहना दी और प्रिया ने राज को।।

प्रिया-- हमारा मानना है कि जब दो लोगों के एक साथ अग्नि के फेरे फिरते हैं ना तो उनके ग्रह नक्षत्र भी अपनी चाल बदल देते हैं,हो सकता है इन अँगूठीयों से भी हमारे ग्रह सही चलने लगें,और ये सारी मुश्किलें रुकावटें दूर हो जायें ।।

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बन्टी-- वो सब तो ठीक है लेकिन मेरा ये कहना है कि ये गौरी वाली बात मौसी जी को या किसी बड़े को बतानी तो पड़ेगी ही,,जानबूझ कर मक्खी तो नही निगल सकते ना।

रानी-- आप ठीक कह रहे हो,पर ये बात मुझे या आपको ही मौसी जी को बतानी पड़ेगी ,राज खुद जायेंगे बताने तो इनकी बात पर कौन यकीन करेगा।

उसी समय युवराज किसी काम से बन्टी के कमरे मे आया और उसे अपने साथ ले गया।।

रानी सुबह से भाग दौड़ मे थक गयी थी इसलिये आराम करने लेट गयी,राज अपने कमरे में चला गया,और माला प्रिया के साथ रह गयी।।

शाम हो गयी,,सारी तैय्यारियाँ अपने चरम पर थी,सभी उत्साहित थे,वधु पक्ष ही सारा सब कुछ देख रहा था पर इसका मतलब ये बिल्कुल नही था कि वर पक्ष खाली बैठा था,दोनो ही तरफ के पण्डित अपने अपने गांव देस की बड़ाई और अपनी पंडिताई झाड़ने मे लगे थे,ठीक 7 बजे का मुहूर्त था।।

राज के कमरे में उसके दोस्त रूपा के भाई राज के फूफा सभी उसे घेर घार के कुछ ना कुछ शिक्षा दे रहे थे,और ये सब सुन सुन कर राज को रुलाई आ रही थी,पर वो लड़का था वो भी दूल्हा,उसे रोना कहाँ जँचता??

अम्मा बार बार उसके कमरे के चक्कर लगा रही थी,कभी पूजा के लिये कांसे का थाल निकालने, कभी चांदी की कटोरी मे हल्दी पानी घोल स्वस्तिक बनाने,पर माँ को आज अपने ,

लाड़ले को देखने की फुरसत ही नही थी,बेचारा चाह कर भी अम्मा से बात नही कर पा रहा था।

युवराज भैय्या भी बन्टी को लिये जो गायब हुए वापस दिखे ही नही और बाऊजी के सामने उसकी जबान वैसे भी नही चलती थी,वो चुप लगाये बैठा रहा।

सही समय पर उसे लिये उसकी मित्र मंडली बड़ी शान से नीचे हॉल में पहुंच गयी।।हॉल सिर्फ वधु पक्ष और वर पक्ष के लोगों से ही खचाखच भरा था,बाहर के लोगो के नाम पर सिर्फ वधु की कुछ सखियाँ और प्रिया और माला ही थे।

जगमगाते गुलाबी लहंगे में सजी गौरी भी अपनी माँ भाभियों और सखियों के साथ स्टेज के नीचे तक चली आयी।।

राज ने उसे देखने के बाद स्टेज से नीचे किनारे रानी के पास खड़ी प्रिया के मायूस चेहरे को देखा और उसे अपने ऊपर क्रोध आने लगा,उसने सोच लिया जैसे ही अँगूठीयाँ सामने लायी जायेंगी वो सबके सामने प्रिया से अपने सम्बंधो को स्वीकार कर लेगा।।

ठेठ फिल्मी स्टायल में गौरी को चार तरफ से उसके भाई और भाई के दोस्त चुनरी उसके सर पे खींचे स्टेज तक ले आये,वो धीमे से आकर राज के पास खड़ी हो गयी,उन दोनो को वहाँ रखे सोफे पर बैठा दिया गया।।

माईक लेकर गौरी का भाई अपना और परिवार का परिचय सबसे करवाने लगा__

" आप सभी हमारे निवेदन पर आज यहाँ उपस्थित हुए और ,

हमारी लाड़ली बहन की सगाई और शादी के गवाह बनने जा रहें हैं,इस खुशी के मौके पर मैं राज्यवर्धन आप सभी का स्वागत करता हूँ और हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ,हमारा परिवार वैसे तो किसी परिचय का मोहताज नही है पर फिर भी मैं पूरे परिवार से आप सभी का एक छोटा सा परिचय करवाना चाहता हूँ,अब आप सभी सामने लगी स्क्रीन पर हमें और हमारे परिवार को देख पायेंगे।"

जिस तरफ राज्यवर्धन ने इशारा किया सभी की निगाहें उसी तरफ उठ गयी__
 
एक बडी स्क्रीन पर फ़िल्मों जैसे ही नेता जी के परिवार का नाम आना प्रारम्भ हुआ,उसके बाद एक एक कर घर के सदस्यों के कुछ आड़े टेढ़े,कभी अकेले कभी ग्रुप के फोटो आने शुरु हुए . नेता जी की हाथ जोड़ी तस्वीर के बाद श्रीमती जी के साथ किसी मॉल का उद्घाटन करती तस्वीर तो कभी किसी मूक बधिर स्कूल के बच्चों के बीच मुस्कुराते नेता जी की तस्वीर स्क्रीन पर चमकने लगी।।

" हद है यार,,बड़े शो ऑफ़ हैं तुम्हारे ससुर राज,कौन ऐसा सब दिखावा करता है होने वाले समधियों के सामने।" बन्टी की बात पर वहीं बैठे प्रेम प्रिंस और बाकी लोग हंसने लगे।।

नेता जी और उनकी श्रीमती जी की तस्वीरों से फुरसत हुए की गौरी के दोनो बड़े भाई किन्हीं हट्टे कट्टे राजपूतों के समान कभी रायफल कभी घोड़ों पे सवार सजे संवरे नज़र आने लगे .

" भाई राज ,बड़ा नमूना खानदान है यार!! अब इन लोगों का ये फिल्मी "फोटो दिखाओ" सेशन देख कर तो चीख चीख के कहने का मन कर रहा है कि तेरा भाई तेरी शादी यहाँ कतई ना होने देगा।"

बन्टी की इस बात पर राज भी मुस्कुरा दिया__" किसी तरह बचा ले भाई,,प्रिया से शादी करवा दे अपने बेटे का नाम बन्टी ही रखूंगा,माँ कसम!"

वधु पक्ष का ये फिल्मी ड्रामा देख वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर हँसी दौड़ी चली आयी थी पर सभी इधर उधर मुहँ फेर कर अपनी हँसी छिपाने की असफल कोशिश कर रहे थे।।

" भैय्या जी हम लोगों ने तो ऐसी कुछ फोटो वाली तैय्यारी करी ही नही।"

प्रिंस के सवाल पर राज ने उसे घूर कर देखा__" ये सब ड्रामा हमें सूट करता है का बे!!"

" नही भैय्या जी आपकी पर्सनैलिटी पर तो हीरोइन को भगा के ले जाना सूट करता है,,हम तो कहतें हैं जब तक सब हियाँ टाईम पास कर रहे आप चुपके से प्रिया को लिये निकल जाओ।"

स्क्रीन पर अचानक गाना बदला और लता मंगेशकर की आवाज़ में मधुरतम तराना छिड़ गया__

कैसा है कौन है वो जाने कहाँ है

जिसके लिये मेरे होठों पे हाँ है।

अपना है या बेगाना है वो,

सच है या कोई अफसाना है वो

कर बैठा भूल वो ,ले आया फूल वो

उससे कहो जाये चांद लेके आये

मेरे ख्वाबों में जो आये,आके मुझे छेड़ जाये .

दिलवाले दुल्हनीया ले जायेंगे के इस बेमिसाल गाने पर नृत्यरत भावी कुलवधु को देख राज की दादी ने माथा पकड़ लिया__राम राम!! ई आज कल की मेहरिया ,लाज शरम तनिको नही लगे,,सब गंगा जी मा बहा आईं हैं,बताओ होने वाले ससुर जेठ के सामने कौन पतोहू ऐसन ठुमका लगाये पड़ी हैं,घोर कलजुग है राम!! घोर कलजुग!!"

बगल में बैठी राज की अम्मा ने अपना हाथ सासु जी के हाथ पर रख उन्हें चुप रहने का इशारा किया__" तुम आईं बड़ी हमें रोकने वाली,अरी ऐसी निर्लज्ज से तुम ना निभा पाओगी सुसीला ,हम तो कह रहे राज से एक दिन ना निभेगी इसकी,अभी भी सोच लो।"

" अम्मा जी तनिक धीमे कहिये ,कोई सुन ना ले।"

कैसी ये रुत आई रुत आई

कैसी ये रुत आई .

सुन के मैं शरमाई शरमाई

सुन के मैं शरमाई .

कानों में कह गयी क्या

कानों में कह गयी क्या

जाने ये पुरवाई, आ .

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पहने फूलों ने किरणों के हार

ऐसा मौसम देखा पहली बार

कोयल कूह्के कूह्के गाये मल्हार

कूह्के कूह्के गाये मल्हार

निंदिया से जागी बहार

ऐसा मौसम देखा पहली बार

बेहिसाब खूबसूरत नगमों में इठलाती बलखाती गौरी किसी भी एंगल से किसी चलचित्र की तारिका से कम नही लग रही थी,कभी जीन्स में उछलती कभी स्कर्ट में फुदकती,कहीं अपनी शिफॉन की साड़ी का सलमा सितारा जड़ा आंचल लहराती तो कभी सुनहरी लहंगे में बलखाती गौरी की तस्वीरे देख देख एक तरफ जहाँ वधु पक्ष गौरवान्वित हुआ जा रहा था वहीं वर पक्ष में भावी वधु के ससुर निरर्थक अपने चश्मे को साफ कर बाजू में बैठे राज के फूफा से उनके व्यापार की प्रगति पे विचार विमर्श करने मे व्यस्त दिखने का बहाना कर रहे थे तो युवराज कुछ देर मोबाइल पे टाईम पास करने के बाद पानी पीने के बहाने उठ कर चलता ही बना .

कुछ भी हो शर्मा परिवार के संस्कार इतने आधुनिक युग में भी भावी जेठ को बहू का नृत्य देखने से रोक ही गये।।

रूपा तो मन ही मन प्रसन्नता के शिखर पर थी,आये दिन बेचारी अपनी बहन रेखा की आधुनिकता पर अपनी सास से लेक्चर जो सुनती थी,वहीं सुशीला घोर रसातल में डूबी जा रही थी।।

सब को लगा गीत की समाप्ती के साथ ही इस घोर निरर्थक बनावटी आडम्बर से मुक्ति मिल गयी , पर तभी एक ,

बार फिर गौरी का भाई माईक संभाले स्टेज पर चला आया,और उसके साथ ही चली आयी वधु के चचेरे फुफेरे भाईयों की फौज।।

सारे के सारे भाई मिल कर " बहना ओ बहना तेरी डोली मै सजाउंगा " पे इधर उधर हिल डुल कर नाचने लगे ,और उनमें से एक जाकर अपनी सौभग्यवती बहना को भी पकड़ लाया।।

वधु पक्ष के इस शानदार कार्यक्रम के समाप्त होते ही वर पक्ष ने चैन की सांस ली।।

" हुई गा,,अब नेग चार भी निबटाओ बहुरिया " राज की दादी का संयम कहीं क्रोध की सीमा ना लाँघ जाये सोच सुशीला जल्दी से उठ पूजा पाठ की तैय्यारियों में लग गयी।।

स्टेज पर लगे सोफे से एक किनारे नीचे तीन तरफ से घेर कर गद्दियां लगी थी,जिनके किनारों पर केले के छोटे पेड़ और गेंदे के फूलों से सजे कलश एक के ऊपर एक सजे थे।।

एक तरफ वर पक्ष तो दुजी तरफ वधु पक्ष के बैठने की व्यवस्था थी, दोनो तरफ के पंडितों ने अपनी अपनी गद्दी संभाल ली थी।।

आखिरकार पण्डितों ने मन्त्रोच्चार प्रारम्भ किया,,और कलश पूजना प्रारम्भ, किया ही था कि अचानक उस हॉल मे कुछ पोलिसकर्मियों ने प्रवेश किया__" राज शर्मा कौन है?"

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" हम हैं,कहिये?" राज के ऐसा कहते ही उनमें से एक ने आगे बढ़ कर राज के हाथ में हथकडी डाल दी ।।युवराज दौड़ कर आगे बढ आया__" अरे कारण तो बताइये, मेरे भाई ने ऐसा किया क्या है आखिर??

" 307 लगी है इन पर,हत्या की कोशिश किये है।"

इंस्पेक्टर के ऐसा कहते ही राज बौखला गया__

" अरे किसकी हत्या की कोशिश किये है,हमे भी तो बताओ ।"

" गुड्डा सिंह चौहान की!! बाकी बातें थाने में चल के कीजियेगा ।"

वहाँ उपस्थित जन समूह में कोलाहल मच गया, दोनों ही पक्ष के लोगों में अफरा तफरी मच गयी, राज के पिता अपना माथा पकड़े पास की कुर्सी पर टिक गये__" पहले ही समझाते थे गुण्डागर्दी कम करो,पर हमारी कोई सुने तब तो?"

सभी हैरान परेशान इधर से उधर हो रहे थे,युवराज ने तुरंत नाहर को आवाज़ दी और वो दोनों रुपा के पिता के साथ पुलिस वालों से सारी बात जानने का प्रयास करने लगे।।

भागते दौड़ते लोगों को रोक रोक कर दादी क्या हुआ जानने का प्रयास करने लगी,,पर इस कठिन संकट के समय में कोई थी जो चुपके से मुस्कुराते हुए फोन पकड़े हॉल से बाहर निकल गयी_" मुझे तो लगा तुम पर भरोसा कर के भारी भूल कर दी मैनें,,यहाँ तो आज मेरी सगाई उस राज के साथ ही हो जानी थी,अच्छा हुआ सही समय पर पुलिस वाले ,

आ गये,तुम क्या अब तक अस्पताल में ही पड़े हो,लगता है कोई आ रहा है,बाद मे फोन करती हूँ ।"

गौरी फोन बन्द कर पीछे मुड़ी तो सामने प्रिया खड़ी थी__" इस सब नौटंकी की क्या ज़रूरत थी गौरी,अगर राज से शादी नही करनी थी तो साफ साफ भी तो मना कर सकती थी ना।"

" घर पर कोशिश की थी लेकिन हमारे पिता जी गुड्डा से हमारी शादी को तैय्यार ही नही होते,हम क्या करें बोलो।।इसिलिए तो शहर से इतनी दूर आकर इतनी जल्दबाजी में शादी निबटा देना चाहते थे,खैर हमें राज या उसके घर वालों से कोई लेना देना नही है,अब कम से कम कुछ समय के लिये शादी का संकट तो टल ही गया।" बड़ी लापरवाही से कंधे झटक गौरी वापस अन्दर चली गयी।

और पोलिस वाले राज को अपनी गाड़ी में बैठा कर वहाँ से शहर के लिये निकल गये,उनके जाते ही नेता जी ने अपना भाषण शुरू कर दिया__" माफ कीजिएगा शर्मा जी लेकिन अब यह रिश्ता नहीं हो पाएगा हम तो राज को बहुत सीधा लड़का समझते थे पर ऐसे जेल जाने वाले लड़के से हम अपने घर का संबंध नहीं कर सकते,माफ कीजिएगा।

देखते ही देखते उत्सव और रंगीनियों का माहौल अवसाद और दुख में बदल गया वधू पक्ष ने अपना सामान समेटना और वहां से निकलना शुरु कर दिया राज के वहां से जाते ही युवराज और नाहर दूसरी गाड़ी में तुरंत ही निकल गए थे बचे लोगों को प्रिंस प्रेम और बंटी समेटकर शहर की ,

ओर निकल पड़े।।

थोड़ी देर पहले होने वाली सगाई की रौनक वाली शाम एक उदास शाम में बदल चुकी थी।।

शहर पहुंचते तक में बस में प्रिया ने बंटी और बाकी सबसे उस शाम की सारी बात कह सुनाई,, उसने यह भी बताया कि राज ने गुड्डा पर बिल्कुल भी जानलेवा हमला नहीं किया था और वह इस बात की गवाही देने को तैयार है।।

शहर पहुंचते ही बंटी प्रिया को लिए थाने पहुंच गया, वहां प्रिया की गवाही पर युवराज की तरफ से नाहर ने अग्रिम जमानत के पेपर तैयार करके थाने में जमा करवा दिए।

थाना इंचार्ज नाहर का दोस्त था और युवराज को भी जानता था इसिलिए उसने पेपर अगले दिन ही कोर्ट में प्रस्तुत करने और अगले दिन ही राज को छोड़ देने का हर सम्भव प्रयास करने का भरोसा दिलाया, आखिर राज को थाने मे ही छोड़ कर उन सब को वापस लौटना पड़ा।।

प्रिया को भी युवराज ने समझा बुझा कर घर भेज दिया।।

रात भर में ही दौड़ भाग कर युवराज ने गुड्डा की फर्जी मेडिकल रिपोर्ट भी डॉक्टर से मिल कर जांच करा ली और उसकी असल रिपोर्ट की कॉपी अपने पास रख ली,अगले दिन कोर्ट खुलते ही सबसे पहले सारे कागज़ात संभाले बन्टी नाहर और युवराज वहाँ पहुँचे और तमाम औपचारिकताओं को पूरा कर राज को साथ लिये घर चले आये।

राज को घर आया देख अम्मा दौड़ कर लोटे में पानी लिये भागी आयी,राज के सर से उतार रोते हुए उससे लिपट , Page, In

गयी,राज सबसे एक बार मिल ऊपर अपने कमरे में चला गया।।

धीरे धीरे शादी वाले घर में मेहमानों का आना शुरु होने लगा,शाम को ही तिलक की रस्म होनी थी पर यहाँ वधु और वधु पक्ष का कोई अता पता ना था।।

ऐसे समय में अम्मा को परेशान होते देख युवराज ने उनसे कहा कि सब को फोन करके सुचित कर देना सही होगा कि विवाह कुछ समय के लिये स्थगित कर दिया गया है,पर अम्मा के सर दर्द का कारण तो कुछ और ही था__

" अरे सबको फोन तो कर देंगे,पर हमरी चिंता का कारण कुछ और है,,हमसे पण्डित जी राज की कुंडली देख जाते जाते कह गये हैं कि सोमवार शाम को अमृत चौघड़िया में तिलक चढ़े और परसों सतमुखी मुहूर्त पुष्य नक्षत्र में भान्वर पड़ जाये तो राज के सब संकट कट जायेंगे और अगर इस मुहूर्त में छोरे का ब्याह ना हुआ तो ये लड़का कभी शादी नही करेगा।।"

" कहाँ की बात लिये बैठी हो अम्मा,जो लड़की वाले राज पे इत्ता सा भरोसा ना रख सके अब उनके पैर पड़ने तो नही जाऊंगा मैं ।"युवराज की बात पर बन्टी उछल पड़ा __

" सवाल ही नही उठता भैय्या ऐसे जाहिलों से संबंध जोड़ना भी नही है,पर मौसी जी की बात पर अगर विचार करें तो वाकई कल शाम की घटना से अपमानित राज कहीं जिंदगी भर के लिये ब्रम्हचारी ना हो जाये,मैं तो कहता

हूँ,फटाफट एक अच्छी लड़की देखो मौसी और लड़के के हाथ पीले कर दो।"

" काहे बेसिर पैर की फेंक रहे हो बन्टी,अभी अचानक कहाँ से लड़की मिल जायेगी,हमारे सोचने भर से क्या पड़ोस में पैदा हो जायेगी।।"

" क्या आइडिया दिया युवराज भैय्या!! मान गये आपके दिमाग को!! पड़ोस में लड़की भी ढूंढ डाली।"

बन्टी की पहेलियों को बूझने में असमर्थ युवराज ने झल्ला के ज़रा तेज़ आवाज़ मे कहा_" अबे क्या कह रहे हो यार!! साफ साफ कहो ना।"

बन्टी ने एक बार अपनी मौसी फिर दादी और युवराज भैय्या को देखा और शुरु हो गया__" तीन साल पहले जिस पड़ोस की लड़की के घर बात करने गयी थी मौसी ,क्या उसी लड़की के घर एक बार और बात नही की जा सकती?"

सुशीला ने आंखे फाड़ कर बन्टी को देखा__" प्रिया?"

अब तक कुछ कुछ बात युवराज को भी समझ आने लगी उसने बन्टी को गले से लगा लिया__" ये बात!! साला अब तक हमरे दिमाग में काहे नही आया बे!! प्रिया से अच्छी लड़की राज के लिये और हो कौन सकती है,पर बन्टी एक समस्या है।।"

" क्या भैय्या जी??"

,

" हमें राज और प्रिया से भी तो पूछना पड़ेगा,ऐसे ही थोड़े फेरे करा देंगे।"

" हां जैसे गौरी के टाईम तो बड़ा पूछ पूछ के किये थे,हम कहतें हैं,अभी के अभी प्रिया के घर चल के उन लोगों से बात चीत कर के शाम को तिलक लेकर आने मना लिजिये,,राज को हम मना लेंगे, काहे मौसी,ठीक कह रहें हैं?"

" अब जैसी राम जी की इच्छा!! लगता है प्रिया ही हमरे रजुआ के नसीब मा लिखी है।" सुशीला की बात पर उसकी सास तुनक गयी__

" अरी तो बैठी काहे हो ,का थाली बजाये तब जाओगी ,सुनो हमें भी ले चलो ऊ तिवारीन तो अक्सर दुर्गा मन्दिर में मिलती रहती है,पैर छूती है हमारे।।"

सासु माँ को समझा बुझा के युवराज को संग लिये राज की अम्मा प्रिया के घर पहुंच गयी__

एक रात पहले की सारी बात प्रिया ने अपनी माँ को कह सुनाई थी,जैसे ही दरवाज़े पर राज की अम्मा को प्रिया की अम्मा ने देखा,झट आगे बढ कर उनके चरण स्पर्श कर लिये,राज की अम्मा ने उन्हें पकड़ कर उठाया और अपने दोनों हाथ जोड़ दिये .

आखिर एक माँ की पीर दुजी माँ ने समझ ली, दोनों होने

वाली समधने एक दूसरे से गले लगी रो पड़ी,तब तक में अन्दर से प्रिया के पिता और बुआ भी चले आये।।

युवराज ने एक एक कर सारी बातें उन्हें समझाई। शर्मा परिवार वैसे भी उनका जाना पहचाना परिवार था,फिर अब तो राज भी सरकारी नौकरी में था,किसी भी सामान्य मध्यम वर्गीय पिता के लिये आवश्यक सभी योग्यताओं में खरे उतरते वर के लिये मना करने का कोई वाजिब कारण उनके पास शेष नही था,फिर भी पत्नि और बहन को लिये अन्दर जाकर आवश्यक सलाह मशविरा कर बाहर आकर उन्होनें भी सहमती दे ही दी,बस उनकी चिंता इतनी ही थी कि सिर्फ दो दिन में सारी तैय्यारियाँ होना असम्भव था जिसके लिये सारी जिम्मेदारी युवराज ने अपने कन्धों पर ले ली।।

राज ऊपर अपने कमरे में पहुंचा ही था कि प्रिंस और प्रेम भी वहाँ पहुंच गये उसी समय प्रिया का फोन भी आ गया__" अभी बहुत दिमाग खराब है प्रिया बात नही कर पायेंगे।"

" तुम्हारा दिमाग सही करने के लिए ही तो फोन किए हैं, गुड्डा गौरी का ही बॉयफ्रेंड है और उस दिन वह तुमसे जानबूझकर झगड़ा किया था जिससे तुम उसको मारो और वह तुम्हारे ऊपर चार्जेस लगवा कर गौरी से होने वाली सगाई रुकवा सके, अब जेल जाने वाली बात सोच सोच कर अपना दिमाग मत खराब करो कोई गुनाह करके तुम थाने नहीं गये थे समझे, अब हँसो और जल्दी से कुछ खा पी लो ,वर्ना हम ,
 
फिर तुम्हारे घर धमक जायेंगे,,चाहे जैसे भी हुआ पर आखिर तुम्हारी सगाई टल तो गयी ना।।"

" ठीक है अब तुम फोन रखो तब तो हम कुछ खायें पियें,यहाँ भाभी हमारा नाश्ता लिये सामने ही खड़ी हैं ।

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कहतें हैं जन्म,मृत्यु और विवाह ऊपर वाला हमारे पैदा होने से पहले ही हमारे भाग्य मे लिख जाता है,और सही समय आने पर सिलसिलेवार सब कुछ वही घटित होता है जो राम जी रच चुके हैं ।।

उसी शाम तिवारी जी अपने बड़े जमाता, बडे भाई जीजा और कुछ गिने चुने रिश्तेदारों के साथ फल मेवे और मिठाइयों की टोकरीयां सजाये चांदी का नारियल सुपारी और पान पे हल्दी कुंकुम लिये राज का तिलक कर आये।।दोनों तरफ के पण्डितों ने राजकुमार और प्रिया के नाम की लग्न पत्रिका लिख कर अक्षत सिंचित कर दोनों घरों के मुखिया लोगों के हाथों में रख दी।

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अगले दिन सुबह वर के स्नान से अभिषेक करी हल्दी से पुर्वान्ग संपन्न हुआ।।

प्रिया को हल्दी से पीले किये पटले पर बिठाया गया और उसकी रिश्ते की भाभियाँ मामियां उसकी दीदी,माला और सखी सहेलियों ने पण्डित जी के कहे अनुसार तेल हल्दी चढ़ा दी।

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समय कब पलट जाये इसका कोई भरोसा नही, दो दिन पहले जो प्रिया राज से विवाह के लिये भावुक हुई जा रही थी,आज उसके नाम की हल्दी चढ़ने के बाद उसके रंग में रंगी अपने घर और माता पिता के लिये उसी भावुकता में डूबी बैठी थी।।

मन में आह्लाद था,अनुराग था,उमंग थी,सपनों के पूर्ण होने का उत्साह था पर संग था अपने घर से बिछड़ने का भाव!! अपना कमरा,अपनी खिड़की, अपना पलंग,अपनी किताबें अब इनमें से क्या अपना रह गया था,बार बार यही सोच कर उसकी आंखें भीगी जा रही थी कि तभी अम्मा लावे और नारियल लेने कमरे मे चली आई__

बिटिया की भीगी पलकें सारा सब कह गयी,माँ ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया__" मेरी लाड़ो तू पराई थोड़े ही हुई जा रही है मेरे लिये,,ये कल भी तेरा ही घर था कमरा था,और कल भी ये तेरा ही रहेगा,, इसमें सब कुछ ऐसा ही मिलेगा बिटिया जब भी तू अपने घर आयेगी,सदा खुश रहो।।"

अधिक भावुकता के लिये भी समय शेष कहाँ था, झट अपनी आंखें पोंछ शर्मिला नीचे उतर गयी और नीचे जाकर माला को सब समझा कर ऊपर भेज दिया।।

" तो यहाँ रोती बैठी है हमारी हीरोइन,, यार लव मैरिज वालों को रोते मैनें पहली बार देखा है।।"

" अरे घबराहट तो होगी ना,, मैरिज तो मैरिज ही है,अपना ,

घर छोड़ के आखिर एक दूसरे घर तो जाना ही है,सिर्फ उन्हें ही तो जानतें हैं,बाकी तो सब अनजाने ही हैं।" प्रिया को पता नही था कि माला ने राज को फोन लगा कर स्पीकर ऑन रखा हुआ है,माला ने अब फोन प्रिया के सामने कर दिया__

" तो ये बात है ,इसलिये कल तिलक के बाद से तुमने ना तो कोई फोन किया ना बात की!!

" राज तुम!! तुमने सब सुन लिया?"

" मत डरो प्रिया,,ना तो हम तुम्हें तुम्हारे घर वालों से अलग करेंगे और ना ही खुद बदलेंगे,,हम अब तक जैसे थे बिल्कुल ऐसे ही हमेशा रहेंगे।।हम वही राज है भरोसा रखो,बेवकूफियां करने वाला राज!!अपनी प्रिया से खूब प्यार करने वाला राज!!"

"हम्म तुम पर पूरा भरोसा है हमें,पर सुनो अब हम तुम्हें राज नही कहेंगे।"

" फिर क्या कहोगी?"

" परसों बताएंगे जब तुम्हारे कमरे में हम साथ होंगे तब।"

मुस्कुराते हुए प्रिया ने फोन बन्द कर माला को वापस कर दिया।।

अगले दिन नियत तिथी और मुहूर्त पर बारात के आते ही सारे नेगचार निपटाते प्रिया की बुआ के बेटे ने अपने दोस्तों के साथ मिल राज को गोद मे उठाये उठाये ही स्टेज पर पहुंचा दिया।।

गणेश पूजन के बाद युवराज ने नव वधु का सारा चढावा प्रिया की ओली में डाल के उसे धीरे से आशीर्वाद दिया__" खूब खुश रहो प्रिया , सदा सौभाग्यवती रहो।"

फेरों के लिये चढ़ावे की बनारसी साड़ी में सजी प्रिया धीरे धीरे चलती हुई आकर राज के सामने बैठ गयी, राज और प्रिया दोनो ही आज एक दूसरे को शर्म से देख नही पाये .

संस्कृत के मधुर श्लोकों के साथ शाखोच्चार प्रारम्भ हुआ और प्रिया के माता पिता ने उसका हाथ राज के हाथ में रख कुश के साथ कन्यादान संपन्न किया,प्रिया को राज के बायीं ओर बैठाते ही उसकी अम्मा ने क्षण भर में पराई हो गयी कन्या को देखा और अपने आंसू पोंछ लिये।।

राज ने एक बार प्रिया की ओर देखा और मुस्कुराते हुए नीचे देखने लगा।।

सारी रस्में निभाते हुए आखिर में राज ने अपने बाएँ हाथ से प्रिया को घेर उसमें सिंगरौटा थामे अपने दाहिने हाथ मे चांदी के सिक्के से सिन्दूर निकाला और नाक पर से होते हुए उसकी मांग मे भर दिया।।।

सात फेरों के संपन्न होते होते भोर का तारा भी उदित होने लगा था जिसे दिखा कर वर वधु पर दोनों पक्ष और पुरोहितों ने पुष्पवर्षा करनी प्रारम्भ कर दी।।

समाप्त
 
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