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Romance हरसिंगार/रानु

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मार्तण्ड सिंह के दिल की बात उनके चेहरे से प्रकट हो गई तो निर्भय सिंह ने कहा, 'अरे भई, कभी क्या हम जवान नहीं थे? क्या अपनी जागीर की सुन्दरियों को देखकर हमारे दिल नहीं मचल जाते थे? आखिर कैसे मालूम हो कि वह एक ठाकुर की संतान है।'

'ओ हो-हो-हा-हा-हा-हा!' मार्तण्ड सिंह का दिल निर्भय सिंह ने अपनी बातों द्वारा जीत लिया था। अपना युग याद करके मार्तण्ड सिंह बहुत जोर से ठहाका लगा उठे, 'हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा! आखिर भरी जवानी में किसका दिल किसी सुन्दरी को देखकर नहीं मचल जाता?

मार्तण्ड सिंह चले गए तो निर्भय सिंह बरामदे में रबड़े-खड़े गंभीर होकर सोचने लगे, जवानी में उनका दिल सुन्दरी को देखकर कहां मचलता था? उनका दिल तो भड़क उठता था-वाराना के शोले बनकर। फिर इन शोलों को बुझाने के लिए उन्हें उसी सुन्दरी की आवश्यकता पड़ जाती थी, जिसके कारण ये शोले भड़के होते थे। उनकी आखों के सामने रजनी का मुखडा घुम गया। उन्होंने अपने गंदे विचारों द्वारा रजनी के यौवन की रूप-रेखा देखी, उसकी चाल को याद किया तो होंठों पर एक बार फिर लार टपक आई। दिल के अंदर वासना के शोले भड़क गए। काश, इन शोलों को बुझाने का उनके पास कोई उपाय होता! काश, आज जागीरदारी वाला वही युग होता तो रंजनी को उनकी बांहों की शोभा बनने से कोई नहीं रोक सकता था। अचानक उस जमाने को याद करके उनकी आखों के सामने बेला का मुखड़ा चला आया। निर्भय सिंह कांप गए। कांपकर गभीर हो गए। क्या उस मरने वाली लड़की की तड़प तथा आह कभी व्यर्थ जाएगी? क्या उनके पापों का दण्ड उन्हें कभी नहीं मिलेगा?

दस-बारह दिन बीत गए। चंदभाल का दिल सूना हो गया। लॉन का वातावरण मानो पतझड़ की लपेट में आ गया था। यद्यपि मार्तण्ड सिंह ने कोठी में एक नया माली रख लिया था, फिर भी चंद्रभाल को ऐसा लगता, मानो लॉन में पहले जैसी हरियाली नहीं है, फूलों की मुस्कान उदासीनता में परिवर्तित हो चुकी है, सुगन्ध मिट चुकी है। सब-कुछ सुनसान था।

चंद्रभाल के पास अंशु भी आती थी। घंटों उसके पास बैठती उससे बातें करती। कुछ पूछती, फिर स्वयं उत्तर भी दे देती। वह मुस्कराती-चंद्रभाल के लिए। चंद्रभाल की अंशु बनकर वह उसे रजनी के अंधकार से दूर ले जाना चाहती थी, परन्तु जब ऐसा करने में वह असफल रहती तो चंद्रभाल की उदासीनता में सम्मिलित होकर स्वयं भी उदास हो जाती। परन्तु उसे विश्वास था एक दिन वह अवश्य अपने प्रयत्न में सफल हो जाएगी, चंद्राशु! बनकर उस पर छा जाएगी। वह चंद्रभाल की मुस्कान बन जाएगी।

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अंशु ने कभी चंद्रभाल से किसी प्रकार की शिकायत नहीं की कुछ मांगा भी नहीं। फिर भी चंद्रभाल को अंशु के दिल की स्थिति ज्ञात थी। अंशु को अपने प्यार पर पूरा विश्वास है, इसीलिए वह उसकी तथा रजनी की वास्तविकता से भिड़ा होने के बावजूद यहां आती है, ताकि उसका मन जीत ले। अपने भविष्य की चिन्ता न करते हुए उसने अब भी उससे अपनी अशाएं बांध रखी हैं। वह उससे आशा रखे भी क्यों नहीं? अपनी संगति के तीन बहुमूल्य वर्ष अंशु ने केवल उसी को तो दिए हैं और वह भी लंदन के सर्वाधिक रोमांचकारी क्लबों में। यही कारण था कि उसने कभी अंशु से मिलने से इंकार नही किया। लंदन में जब उसे संगति की आवश्यकता थी तो अंशु ने ही साथ दिया था। अब अंशु की संगति की आवश्यकता नहीं थी तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उसे आने से मना कर दे। अंशु भी एक लड़की थी। उसके पास भी एक दिल था-नन्हा सा दिल, जो केवल चंद्रभाल के लिए ही धड़कता था। चंद्रमाल किस प्रकार उसका दिल तोड़ने का साहस करता। कोई किसी से प्यार करे न करे, परन्तु किसी को अपने से प्यार करने से मना तो नहीं कर सकता है।

PIL 89%14:29 pm हरसिंगार अंशु आती है तो चंद्रभाल का ध्यान भी बहुत रखती। चन्द्रभाल जब कभी खाना नहीं खाता तो वह उसे खाने पर विवश करती। चंद्रभाल जब कभी शेव नहीं करता, उसकी दाढी काले कांटों समान दिखाई पड़ने लगती तो अंशु उसे शेव करने पर विवश कर देती। चंद्रभाल भी उसकी बात मानने से इंकार नहीं कर पाता। उसके मित्र उससे मिलने आते ही रहते थे। यदि वह उनके सामने दीवानों-सी सूरत बनाए रहता तो उन्हें हंसने का पूरा अवसर मिलता। मित्रों से मिलना उसने कम कर दिया था। मित्र उसे कहीं ले जाना चाहते तो वह अस्वस्थ होने का बहाना कर जाता। उसकी वास्ताविकता कोई नहीं जानता, केवल उसके घर वाले तथा अंशु के घर वाले जानते थे। यही कारण था कि वह अंशु से न मिलने का बहाना कभी नहीं बना सका। अंशु से मानो उसने एक खामोश समझौता कर रखा था कि वह उसे जीत सकती है तो जीत ले।

इस बीच चंद्रभाल से उसके पिता की एक भी बात नहीं हुई। मार्तण्ड सिंह मानो अपनी जिद पर अड़े थे कि जब तक उनका बेटा रजनी का विचार छोड़कर अंशु को अपनाने के लिए तैयार नहीं होगा, वह उससे बात नहीं करेंगे 1 मार्तण्ड सिह अंशु को अपना प्रस्ताव स्वीकार कराकर इस प्रकार फंस चुके थे कि उनके लिए अब रजनी के पक्ष में सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चंद्रभाल अपने पिताजी के विचारों से अनभिज्ञ था। उसने भी अपने पिताजी की चिन्ता नहीं की। उसकी बातें केवल मां से ही हुआ करती थी। मां से जब भी भेंट होती वह बड़ी आशा से मां की आखों में झांकता। शायद मां ने अपने पति से रजनी का विषय छेड़ा हो, शायद उसके पिताजी मान गए हों, परन्तु जब उसे निराशा मिलती तो उसका दिल डूब जाता। फिर भी उसे अपनी मां पर विश्वास था। वह जानता था कि उसके पिताजी रजनी को इतनी आसानी से अपने कुल की लक्ष्मी बनाने के लिए तैयार नहीं होंगे। चंद्रभाल को पूरा विश्वास था कि उसके प्यार के साकार होने में देर अवश्य है, परंतु अंधेर नहीं।

उधर अंशु भी अपनी कोठी में पलंग पर लेटी देर तक करवटें बदलती रहती। वह हर पल चंद्रभाल के लिए ही सोचती। प्राय: उसके अंदर डर समाने लगता कि यदि वह चंद्रभाल का दिल नहीं जीत सकी तो उसके प्यार का क्या परिणाम होगा?परन्तु प्यार करने वाले भविष्य का चिन्ता नहीं करते।इसके अतिरिक्त उसे चंद्रभाल के माता-पिता का बहुत बड़ा सहारा था। चंद्रभाल के पिता ने उससे वायदा किया था कि वह उसे ही अपनी बहू बनाएंगे। हर स्थिति में। यही सब सोचकर अंशु अपना भय दूर कर लेती थी और अगले दिन चंद्रभाल का दिल जीतने की फिर आशा कर बैठती थी। उसे मानो चंद्रभाल का दिल जीतने की एक चुनौती मिली थी, अपने प्यार को साकार बनाने की चुनौती मिली थी, अपने प्यार के कारण चंद्रभाल को रजनी के अंधकार से निकालने की चुनौती मिली थी, जिसे वह स्वीकार कर चुकी थी। इसीलिए अपनो प्रयत्न जारी रखने के लिए वह अपना साहस बनाए रखने में सफल हो जाती थी।
 
परन्तु निर्भय सिंह इतने दिन बीतने के बाद कुछ निराश-से हो चले थे। हर क्षण उन्हें चिन्ता लगी रहती कि यदि चंद्रभाल सीधे रास्ते पर नहीं आया, तब क्या होगा? तब तो उन्हें निश्चय ही कोई ऐसी तरकीब निकालनी पड़ेगी, जिससे हर स्थिति में उनकी बेटी का विवाह चंद्रमाल से ही हो। परन्तु वह तरकीब क्या हो सकती है? क्या हो सकती है वह तरकीब? यदि रजनी उनकी बेटी के रास्ते में नहीं होती तो चंद्रभाल को उनकी बेटी से विवाह करने से आज कोई भी नहीं रोक सकता था। निर्भय सिंह रजनी को कोसते-कम्बख्त कहीं की! यदि आज वह उनके हाथ पड़ जाए तो उसे छटी का दूध याद दिला दें। चली है चंद्रभाल से प्यार करने! इसमें कोई संदेह नहीं था कि यदि निर्भय सिंह का वश चलता, यदि वह अब-भी जागीरदार होते तो उन्हें रजनी का अपहरण करने से कोई नहीं रोक सकता था।

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समय बीत रहा था।

एक दिन चंद्रभाल अपने कमरे में नीली बत्ती जलाए खिड़की पर बैठा हुआ था। रात के लगभग बारह बजे होंगे।

कोठी का पिछला लॉन बिल्कुल सूना था। हवाएं चल रही थीं। हवा के झोंकों पर हरसिंगार के फूल टहनियों से टूटकर नीचे गिर रहे थे। इन फूलों का जीवन रजनी तक ही सीमित था।

क्षितिज पर कही-कहीं बदलियों के टुकड़े छाए हुए थे। चंद्रमा उदास था-चंद्रभाल के समान। चद्रमा के आंसू अपने दामन में जज्ब केरने के लिए ये बदलियां चंद्रमा का मुख ढक लेती थीं। शायद अब उन बदलियों का दामन भी आंसुओ से तर हो चुका था। वर्षा के रूप में ये आंसू कभी भी बरस सकते थे।

चंद्रभाल की दृष्टि माली के क्वार्टर पर बिछी हुई थी कि अचानक विचारों में तल्लीन वह चौंक पड़ा। माली का द्वार अचानक ही खुल पड़ा था। द्वार से एक छाया निकली तो चंद्रभाल की आखें ठिठक गई। छाया कोठी की ओर ही बढ़ रही थी। चंद्रभाल के दिल की धड़कन तेज हो गई। उसकी दीवानगी ने उसे तुरन्त बता दिया कि यह रजनी ही है। उससे सब नहीं हो सका। वह तुरन्त उठा और बगल वाले बरामदे द्वारा कोठी के बाहर निकल आया। छाया- कोठी के समीप आ चुकी थी। चंद्रभाल के पग उसकी ओर तेज हो गए।

उसने लपककर छाया को अपनी बांहों में समा लेना चाहा, उससे अब और अधिक सब्र नहीं हो रहा था, परन्तु तभी एक अपरिचित स्वर सुनकर वह चौंकते हुए रुक गया।

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'कुंवर साहब!' छाया उसे रात के इस पहर देखकर चौंकते हुए कह रही थी, 'आप और यहां? आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?'

'ऊं चंद्रभाल ने अपनी स्थिति संभाली।

उसने ध्यान से देखा। उसके सामने रजनी नहीं, माली की पत्नी खड़ी थी।

चंद्रभाल ने पूछा, 'तुम इतनी रात में कहां जा रही हो?' 'उनकी तबियत बहुत खराब हो रही है।' माली की पत्नी ने कहा। 'उनकी' से उसका मतलब अपने पति से था। उसने बात जारी रखी। बोली, 'चौकीदार से कहने जा रही हूं कि एक तांगा ला दे, ताकि उन्हें अस्पताल पहुंचा दू।'

चंद्रभाल ने उसकी बातों में रुचि नहीं ली। उसने एक गहरी सांस ली और फिर उसे अपने रात के इस पहर कोठी से बाहर निकलने का मकसद बताए बिना ही वह आगे बढ़ गया। माली की पत्नी भी कोठी के सामने वाले भाग की ओर बढ़ गई।

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___ चंद्रभाल जाकर कोठी के पिछले लॉन में रखी पत्थर की बेंच पर बैठ गया। उसे ऐसा लगा, मानो मां ने उसके पिता से रजनी का विषय अब तक नहीं छेड़ा है। मां-तो आरंभ से ही यह चाहती आई है कि अंशु उसकी बहू बने। रजनी के विरुद्ध तो वह स्वयं भी थी शायद। मां अभी भी नहीं बदली है। मां ने उसे रोक रखा है, ताकि रजनी से दूर रहकर उसे रजनी का प्यार भुलाने में आसानी हो सके।

सबने अंशु को इसीलिए छूट दे रखी है, ताकि वह उसके दिल और दिमाग से रजनी का विचार भुलाकर अपना स्थान बना ले। परन्तु ऐसा नहीं होगा, कभी नहीं। वह तो रजनी का है और रजनी उसकी। उन्हें एक-दूसरे से कोई भी अलग नहीं कर सकता।
 
सहसा चंद्रभाल का माथा ठनका। उसे एक विचार आया तो वह कांप गया। ऐसा तो नहीं कि मां ने उसे आशा दिलाकर इसलिए रोक रखा है कि कुसुम्पटी में रजनी का विवाहे हो जाए ८ वह अपना निर्णय तब देंगी, जब रजनी का विवाह हो जाए? ऐसी तो नहीं कि उसके पिता ने बाबा को छिपाकर इतना धन दे दिया हो कि वह रजनी का बिवाह शीघ्र ही कर दें? आखिर एक गरीब व्यक्ति को क्या चाहिए, अपने बच्चों का सुख-चैन, खासतौर पर अपनी लड़की का सुख-चैन, जो पैदा होते ही घर का सबसे बड़ा बोझ बन जाती है।

नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। रजनी का विवाह कहीं और नहीं हो सकता। चंद्रभाल मानो मन-ही-मन बड़बड़ा उठा-रजनी उसकी है

और वह अपनी रजनी का। वे दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं -अपनी जान, अपनी आत्मा से भी बढक़र। उसने तय कर लिया, वह सुबह ही कुसुम्पटी के लिए निकल जाएगा -अपने घर वालों को बिन बिताए ही। वह रजनी से मिलेगा। उसे अपने साथ ले आएगा और फिर मां के सामने खड़ा करके कहेगा, 'मां, यही तुम्हारी बहू है।

इसे स्वीकार करके आशीर्वाद दो। यदि अब तक तुम पिताजी से रजनी के विषय में बात नहीं कर सकी तो अब कर लो। तुम्हें अब रजनी का विषय छेड़ने में आसानी हो जाएगी।' चंद्रभाल ने सोच लिया, यदि घर वालों ने रजनी को स्वीकार कर लिया तो ठीक है, नहीं स्वीकार किया तो वह अपनी रजनी के साथ कहीं और चला जाएगा-कहीं दूर-जहां उन दोनों के मिलन की बीच कोई दीवार बनने का प्रयत्न नहीं करेगा।

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सुबह का समय था। राजमार्ग पर एक सफेद विदेशी कार सड़क से चिपकी बहुत तेजी के साथ भाग रही थी। चंद्रभाल ही कार चला रहा था। रास्ते में जितनी कारें मिलतीं, जितने ट्रक मिलते, चंद्राभाल सबको ओवरटेक करता हुआ मानो जल्द से जल्द अपनी रजनी के पास पहुंच जाना चाहता था। चलने से पहले उसने किसी को कुछ नहीं बताया था। बता देता तो शायद जाने न दिया जाता। शायद मां इस बार उसे अपनी सौगन्ध देकर रोक लेती। गाड़ियों की चाबियां एक कमरे में दीवार से लगे बोर्ड पर लूंगी रहती थीं। उसने चाबी उठाई थी और पोर्टिको से गाड़ी निकालकर सीधा कुसुम्पटी के लिए चल पड़ा था। कुसुम्पटी में रजनी के गांव पहुंचते-पहुंचते उसे रात के नौ बज गए।

वह एक मकान पर पहुंचा। छोटा-सा घर-खपरैलदार दरवाजा बंद था। द्वार खटखटाया तो एक व्यक्ति निकला। उससे उसने रजनी के पिता हीरालाल कां घर पूछा, तो तुरन्त ज्ञात हो गया कि वह कहां रहता है। परन्तु इस घनी वर्षा में रास्ता ठीक से दिखाई नहीं देता। चंद्रभाल ने पैसे देकर हीरालाल के घर तक छोडने को कहा तो उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया। गाड़ी वाले बाबू को इतनी रात गए हीरालाल से जाने कैसा आवश्यक काम पड गया हो। उस व्यक्ति के लड़के को लेकर चंद्रभाल रजनी के घर पहुंचा। छोटा-सा घर-यह भी खपरैल का था, परन्तु बरामदा भी था।

उसने द्वार खटखटाया। कुछ देर बाद दरवाजे की दरारों में प्रकाश की झलक तेज हुई। कोई अंदर से दरवाजे की ओर बढ़ रहा था। फिर दरवाजा खोलने का स्वर उत्पन्न होकर बाहर होती वर्षा में खो गया। दरवाजा खुलने लगा-च्यू के एक स्वर के साथ। चंद्रभाल के दिल की धड़कन तेज हो गई। दरवाजा खुल गया। एक लड़की हाथ में लालटेन लिए खड़ी थी...मटमैली सफेद साड़ी में... एक विधवा के समान। उसके मुखड़े पर हल्का अंधकार था। तब भी चंद्रभाल ने उसे तुरंत पहचान लिया। उसकी रजनी उसके सामने खड़ी थी। रजनी अपने हाथ की लालटेन ऊपर उठाती हुई उसे ही पहचानने का प्रयत्न कर रही थी।

'रजनी!' चंद्रभाल ने एक गहरी सांस के साथ कहा...मद्धिम स्वर में, रजनी की ओर कुछ झुककर।
 
रजनी के हाथ में लालटेन कांप गई ( लालटेन छूटते-छूटते बची। लौ फफक गई। दिल बहुत जोर से धड़का। अपने कानों पर उसे विश्वास ही नहीं हुआ। लालटेन संभालकर पकड़ते हुए चंद्रमाल को बहुत ध्यान से देखा। कुंवर साहब? रजनी ने पहचाना तो आखों पर विश्वास नहीं हुआ। आंखें फटी की फटी रह गईं।

उसके कुंवर साहब ..क्या हालत बना रखी थी उन्होंने उसके प्रेम में, उसकी दीवानगी में, उसकी जुदाई में, जुदाई की तड़प में! ऊपर से नीचे तक पानी से भीगकर तर। आखिर वह उसे लेने आ ही गए...उसके कुंवर साहब। आते भी क्यों नहीं? आखिर वह उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही थी...पूरे विश्वास के साथ उसके बापू ने कहा था कि वह उसका विवाह शीघ्र ही कर देगा, परन्तु उसने सोच रखा था कि जब तक वह कुंवारी रहेगी, अपनी सांसों में केवल कुंवर साहब को ही बसाए रखेगी। जब बिबाह का दिन आएगा तो इन सांसों को तोड़ देगी...आत्महत्या कर लेगी ...चंद्रभाल के वियोग में आंसू बहा-बहाकर रजनी एक मुरझाए फूल के समान हो गई थी। उसे स्वयं सहारे की आवश्यकता थी, परन्तु अपने कुंवर साहब को बेसहारा देखकर रो पड़ने को उसके होंठ कांपने लगे। उसने लालटेन फेंककर कुंवर साहब की छाती से लिपट जाना चाहा, चंद्रभाल ने हाथ बढ़ाकर रजनी को अपनी बांहों में समा लेना चाहा,

परन्तु तभी एक स्वर सुनकर दोनों चौंक गए।

'कौन है बेटी? इस वर्षा में कौन यहां आया है?' बाबा अंदर के दूसरे कमरे से आते हुए पूछ रहे थे

रजनी के लालटेन थामे हुए हाथ रुक गए। चंद्रभाल ने भी स्वयं को संभाल लिया।

'बाबा...बाबा कुंवर साहब आए हैं।' रजनी ने कहा। 'क्या?' बाबा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने समीप आकर रजनी

से लालटेन ली। फिर चंद्रभाल के मुख के समीप उठाकर उसे बहुत ध्यान से देखा। पहचानां तो बोला, 'कुंवर साहब...आप?'

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_ 'हां बाबा, मैं हूं मैं... चंद्रभाल।' चंद्रभाल ने कहा, 'मैं अपनी रजनी को लेने आया हूं-सदा के लिएं।'

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बाबा गुमसुमका रह गया। उसने एक क्षण रजनी को देखा। अपने प्रेमी को देखकर क्षण भर में ही रजनी के मुखड़े पर रौनक लौट आई थी। दोनों ही एक-दूसरे के लिए तड़प रहे थे। उसने चंद्रभाल को देखा। चंद्रभाल की स्थिति पर उसका दिल भर आया। कुंवर साहब रजनी को प्यार नहीं करते होते तो इतनी दूर से क्यों आते? उसने कहा, 'हमारे इस छोटे से घर में प्रवेश करना पसंद कीजिएगा?'

चंद्रभाल ने एक बार रजनी को देखा। फिर बिना कोई उत्तर दिए जब उसने कमरे में प्रविष्ट होने के लिए पग उठाए तो रजनी तथा बाबा ने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया।'

अंदर कमरे की दीवारें पक्की थी। फर्श पर ईटें बिछी हुई थीं। चंद्रभाल के कीचड़ में सने जूतों और शरीर से टपकते पानी से फर्श गंदा हो गया। कमरे में दो चारपाइयां, एक छोटी मेज, एक लोहे की पुरानी कुर्सी थी। तार्को पर किताबों के साथ भगवान की मूर्ति भी थी।

बाबा ने कुर्सी चंद्रभाल की ओर बढ़ाई तो वह उस पर बैठ गया। तभी अंदर के कमरे से रजनी का बापू भी चला आया। इससे पहले वह अंदर के कमरे में अपनी छोटी बेटी कम्मो के साथ बैठा हुआ था। कम्मो बीमार थी। इस कमरे में वह बाबा तथा चंद्रभाल की बात सुनकर ही आया था। इतने वर्षों बाद चंद्रभाल ने उसे देखा, परन्तु तब भी पहचान गया। रजनी के बापू की लम्बी लटों में मानो केवल सफेदी की ही वृद्धि हुई थी। रजनी के बापू ने भी चंद्रभाल को पहचान लिया तो वह भी फटी-फटी आखों से उसे देखने लगा। रजनी तथा चंद्रभाल की बात उसे बाबा से ज्ञात हो चुकी थी।

'छोटे मालिक रजनी को लेने आए हैं।' सहसा बाबा ने हीरालाल से कहा।

हीरालाल ने रजनी को देखा। रजनी अपने प्रेमी की बन जाने को तड़प रही थी। वह असमंजस में पड़ गया। अपनी जवान बेटी को वह बिन ब्याहे छोटे मालिक के साथ इस प्रकार अकेले कैसे भेजे ?

'क्या मुझ पर विश्वास नहीं?' चंद्रभाल ने पूछा।

'नहीं छोटे मालिक, ऐसी बात नहीं। हमें आप पर पूरा विश्वास है, परन्तु... हीरालाल ने किसी प्रकार का जोखिम उठाना उचित नहीं समझा।
 
'यदि मुझ पर विश्वास नहीं है तो साथ तुम भी चलो।' चंद्रभाल ने हीरालाल की बात काटकर कहा, 'यदि रजनी को ले जाने के बाद भी मेरे घर वालों ने रजनी को स्वीकार नहीं किया तो मैं रजनी के साथ अपनी कोठी सदा के लिए छोड़ दूंगा। वैसे मेरा विश्वास करो, रजनी के लिए अब मां मेरा साथ दे रहीं हैं।'

हीरालाल भी चंद्रभाल के प्रेम की सीमा देखकर चकित था। उसने सोचा, रजनी कितनी भाग्यवान है! किसी के भाग्य का लिखा कोई कैसे मिटा सकता है? रजनी के भाग्य में क्या लिखा था?

'इस समय तो आप बहुत भीग चुके हैं।' सहसा बाबा ने चंद्रभाल की स्थिति पर दया करके कहा, यदि बुरा न लगे तो हमारे कपड़े पहन लीजिए।'

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'नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूं।' चंद्रभाल ने कहा।

'आपको ठंड लग जाएगी।' बाबा ने कहा।

'रजनी मेरे पास रहेगी तो मुझे कुछ भी नहीं होगा। रजनी को साथ ले जाकर मैं अपने जीवन का निर्णय तुरंत कर लेना चाहता हूं।'

'क्या आप इतनी रात में जाना चाहते हैं? हीरालाल ने पूछा।

'मैं अभी जाना चाहता हूं इसी समय।' चंद्रभाल ने कहा और रजनी को देखा। रजनी अपने, घर वालों के लिए एक पहेली बनकर खड़ी हुई थी। उसे भेजा जाए या नहीं?

'लेकिन..!' हीरालाल ने असमंजस में पड़ते हुए कहा। उसकी छोटी बेटी बीमार थी, इसलिए उसके जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। बात उसने जारी रखी। बोला, 'लेकिन मैं कैसे जा सकता हूं?'

'तुम वास्तव में नहीं जा सकते।' बाबा ने कहा। फिर चंद्रभाल को उसने बताया, 'रजनी की छोटी बहन बीमार है।' बाबा ने हीरालाल को देखा। बोला, 'तुम यहीं रह जाओ। मालिक के साथ मैं चला जाता हूं।'

हीरालाल को बाबा का सुझाव पसंद आया। उसने इजाजत दे दी। रजनी को मानो संसार की सबसे बड़ी प्रसन्नता मिल गई। कुंवर साहब के घर वाले उसे स्वीकार नहीं करेंगे, तब भी वह कुंवर साहब की ही बनकर रहेगी...

कहीं और संसार के किसी भी कोने में। उसे कुंवर साहब के साथ जरा भी घुटन नहीं होगी। उनकी संगति में उसे कांटों पर भी सुहानी तथा मीठी नींद आ जाएगी।

सुबह की किरणें फूटकर जीवन के नये दिन का संदेश दे रही थी। चंद्रभाल की सफेद कार राजमार्ग पर सुबह की किरणों में चमकती चली जा रही थी। वर्षा कभी की रुक गई थी। चंद्रभाल ने कार की अपनी ओर की खिडकी का शीशा गिरा दिया था। हवाओं के झोंकों द्वारा उसके भीगे कपड़े सुख गए थे। इस समय रजनी उसके कंधे पर प्यार से सिर टेके विण्ड-स्कीन द्वारा बाहर के वातावरण को देख रही थी।

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दिन निकलने लगा तो चंद्रभाल बाबा की ओर से सावधान होकर सामने से दर्पण द्वारा पिछली सीट पर भी ध्यान रखने लगा। कुछ देर बाद बाबा ने आखें खोली तथा करवट लेनी चाही तो चंद्रभाल ने रजनी को अपने से अलग कर दिया। एक होटल के सामने कार रोककर उसने अपने तथा रजनी और बाबा के मुंह-हाथ धोने का प्रबंध किया। चंद्रभाल का अपना मन नाश्ता करने को जरा भी नहीं था, परन्तु उसने रजनी तथा बाबा को नाश्ता कराना आवश्यक समझा, परन्तु उन्होंने भी कुछ नहीं खाया।

बाबा का मन कुछ खाने के लिए इसीलिए नहीं हुआ, क्योंकि वह अब तक दुविधा में था। पता नहीं, कुंवर साहब के पिता उसकी बच्ची को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करेंगे भी या नहीं? परन्तु रजनी को अब इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं थी। वह जानती थी कि कुंवर साहब के पिता उसे स्वीकार करें या नहीं, उसे हर स्थिति में अब कुंवर साहब के साथ ही रहना है। उसने इसलिए कुछ नहीं खाया, क्योंकि चंद्रभाल ने कुछ खाना पसंद नहीं किया, क्योंकि उसे अपने घरवाले से अपने तथा रजनी के विषय में निर्णय जल्द-से-जल्द सुन लेने की चिन्ता थी। तीनों ने केवल चाय ही पी।

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कार चली जा रही थी। राजमार्ग पर यातायात चालू था। ट्रक और कारें थोड़ी-थोड़ी दूर पर मिल जाती थीं।

सड़क के दोनों ओर खेत थे, छोटे-छोटे गांव थे। किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। सहसा सामने से आती दो कारें एक-दूसरे के समीप, अगल-बगल चलती हुई चंद्रभाल की कार का रास्ता रोकती-सी मालूम हुई।

यद्यपि सड़क काफी चौड़ी थी, फिर भी सावधानी बरतकर चंद्रभाल ने कार धीमी कर दी। फिर उसने कार को अपने बाएं, सड़क के किनारे पटरी से उतार भी दिया, परन्तु आने वाली कारें मानो उसका रास्ता सामने से हर स्थिति में रोकने पर उतारू थी। चंद्रभाल को कार रोकनी ही पड़ गई। दोनों कारों ने आकर रुकते हुए चंद्रभाल की कार को घेर-सा लिया। चंद्रभाल को कुछ समझ में नहीं आया, परन्तु आने वाले खतरे से वह सावधान अवश्य हो गया। सामने की कारों से कुछ व्यक्ति निकले। देखने में ही वे गुण्डे लगते थे। रजनी का दिल एक अज्ञात भय से धड़क उठा। बाबा भी असमंजस में पड़ गया। यह सब क्या होने वाला है?

गुण्डे चंद्रभाल की कार के समीप आए। चंद्रभाल की कार को उन्होंने घेर लिया। एक मूंछदार व्यक्ति रजनी की ओर वाले द्वार पर आया। खिड़की पर झुकते हुए उसने रजनी को बहुत ध्यान से देखा। भेद भरे ढंग से मुस्कराया...कुत्ते के समान होंठों को चाटते हुए। रजनी ऊपर से नीचे तक कांप गई। चंद्रभाल ने बदमाश को बुरी तरह डांटते हुए पूछा, 'क्या बात है? क्या चाहते हो?'

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बदमाश चंद्रभाल की बात की परवाह न करते हुए एक हाथ की उंगलियों द्वारा अपनी एक ओर की मूंछे ऐंठने लगा। फिर मानो स्वयं से ही बोला, 'लड़की तो सचमुच बड़ी जानदार है!'

चंद्रभाल को समझते देर न लगी कि इन बदमाशों की नीयत अच्छी नहीं है। उसने कार से बाहर निकलकर बदमाशों का सामना करना चाहा कि तभी रजनी के द्वार पर झुके व्यक्ति ने उससे कहा, 'हम इसे ले जाने आए हैं।' उस बदमाश ने मुट्ठी बांध कर अंगूठे द्वारा रजनी की ओर संकेत किया।

रजनी के शरीर का रक्त-जमने लगा। गला सूख गया। यह क्या बैठे-बिठाए मुसीबत आन पड़ी? मन-ही-मन वह अपने बचाव के साथ चंद्रभाल की सुरक्षा के लिए भी भगवान से प्रार्थना करने लगी। बाबा की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे!

बदमाश की बात सुनकर चंद्रभाल के शरीर में आग लग गई थी। उसने पूछा, 'क्यो? यह तुम्हारी बहन लगती है ?

बदमाश को चंद्रभाल से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी। उसे अपने साथियों पर कुछ अधिक विश्वास था। क्रोध में भड़ककर उसने तुरंत रजनी का हाथ पकड़ लिया। तथा दूसरे हाथ से द्वार का लॉक खोलने लगा। रजनी चीख पड़ी1 स्थिति गंभीर बन चुकी थी। गंभीरता को चंद्रभाल समझ चुका था। रजनी के बचाव के लिए उसने अपनी ओर का द्वार खोला। उसने रजनी को थामे बदमाश की ओर लपकना चाहा कि तभी एक दूसरे बदमाश ने उसके मुंह पर एक भरपूर मुक्का मारा।

चंद्रभाल कलाबाजी खाकर वहीं गिर पड़ा। उसने उठना चाहा कि उस बदमाश ने उसकी छाती पर एक भरपूर लात मारी चंद्रभाल की मानो छाती फट गई। रजनी चीख पड़ी। अब तक वह कार से नहीं निकली थी। कार स्टेयरिंग व्हील मजबूती से पकड़े वह चीखने लगी। उसको पकड़ने में बाबा भी उसका साथ दे रहा था। वह चीख रहा था, 'बचाओ...बचाओ!' परन्तु इस समय मानो सारे संसार में उसे बचाने वाला कोई नहीं था। इस समय राजमार्ग पर से कोई गाड़ी आ जा नहीं रही थी, जो उसकी पुकार सुनती। रजनी के द्वार के समीप खड़ा व्यक्ति कार का द्वार खोलने के बाद रजनी को जल्द से जल्द बाहर खींच लेना चाहता था कि तभी चंद्रभाल स्वयं को संभालकर उस व्यक्ति पर झपटा।
 
रजनी का चीख सुनकर उसके अंदर की शाक्त दागुना हा गई थी। परन्तु रजनी की कलाई थामने वाला व्यक्ति व्यावसायिक गुण्डा था। उसने रजनी को छोड़कर चंद्रभाल के मुख पर एक भरपूर घुसा मारा।

रजनी फिर चीख पड़ी। चंद्रभाल के मुख पर ऐसा पूरी शक्ति के साथ लगा था। उसका संतुलन डगमगा गया, वह लड़खड़ा गया, परन्तु उसके संभलने से पहले उस गुण्डे ने चंद्रभाल पर चूंसे का एक और आक्रमण कर दिया। चंद्रभाल डगमगाते कदमों से सड़क के बीचमें आ गया। तभी सड़क पर, कार के सामने की ओर से, कुछ ट्रक एक के पीछे एक चले आ रहे थे। पहले ट्रक का चालक बहुत ध्यान से मारपीट करने वालों से अधिक चंद्रभाल की सफेद कार को देख रहा था। कार का नम्बर पढ़ने के लिए उसने अपने ट्रक की गति कुछ धीमी कर दी थी। उसके ट्रक के सामने लड़खड़ाकर चंद्रभाल अचानक ही आ गया। चालक ने तुरन्त ब्रेक दबाकर पहिए बाई ओर मोड़ते हुए जाम कर दिए। परन्तु ट्रक आगे बढ़ चुका था। ट्रक की बाडी के एक कोने से चंद्रभाल की कनपटी पर ऐसा धक्का लगा कि वह छिटककर गिर पड़ा। रजनी से उसकी स्थिति देखी नहीं गई, वह चीखती हुई कार से कूदकर बाहर निकली और चंद्रभाल से लिपट गई।

चंद्रभाल की कनपटी फट गई थी। रक्त निकलकर कान तथा गर्दन पर फैलने लगा था। पूरे शरीर में बहुत सख्त दर्द उठा। ऐसा लगा, मानो उसका दम निकल जाएगा। उसने उठने का प्रयत्न किया, परन्तु शरीर की ताकत जवाब दे गई। दिल डूबने लगा तो उसने बड़ी असहाय दृष्टि से रजनी को देखा। रजनी उससे लिपटी फूट-फूटकर रो पड़ी थी। अपनी बेबसी पर चंद्रभाल की आखें छलक आईं। क्या वह इस योग्य भी नहीं रहा कि अपनी रजनी की सुरक्षा इन गुण्डों से कर सके? उसने रजनी से कुछ कहना चाहा, परन्तु होंठ खुले तो फिर खुले ही रह गए। उसके होश जाते रहे। होंठों से केवल गरम-गरम हवा रह गई थी। उसकी आखों के पपोटे बंद होने लगे, परन्तु आंखों में अब भी हल्की-सी जान बाकी थी। बंद होती आखों से उसने क्षण भर के लिए देखा, ट्रकों का कारवां धीमा होकर रुक गया था। चंद्रभाल बेहोश हो गया। आगे वाला ट्रक चंद्रभाल की टक्कर होने से रुका तो उसके पीछे एक पंक्ति में सभी ट्रक रुक गए। टक्कर के बाद ट्रक चालक निकल सकता था, परन्तु चंद्रभाल की सफेद विदेशी कार ने उसे रोक लिया। वह कार का नम्बर पढ़ चुका था। कार उसकी फैक्टरी के मालिक जागीरदार मार्तण्ड सिंह की थी। टक्कर के बाद जब उसने चंद्रभाल को पहचाना तो उसे ट्रक से उतरना ही पड़ा। चंद्रभाल पर आक्रमण होते हुए वह देख ही चुका था। उसने अन्य ट्रकों के चालकों को सहायता के लिए आवाज लगाई तो सभी चालाक तथा उनके क्लीनर ट्रकों से बाहर कूद पड़े। सब गुण्डों पर टूटे तो लड़ाई का पासा पलट गया। कुछ गुण्डे अपनी कारों में जा बैठे। कार बैक करके रास्ता बनाया और भाग निकले। कुछ गुण्डे पैदल ही अगल-बगल ढलवानों पर उतरकर खेतों में भाग खड़े हुए।

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इस बीच रजनी का बाबा भी कार से बाहर निकल आया था। मार्तण्ड सिंह की फैक्टरी का ट्रक चालक चंद्रभाल के पास आया। उसने यह सोचा भी नहीं था कि ट्रक धीमा करने के बावजूद गाड़ी की बाडी से चंद्रभाल को इतनी सख्त चोट आई होगी। उसने अपने मालिक के बेटे को रक्त में डूबा देखा तो उसके होश जाते रहे। एक सुन्दरी को चंद्रभाल की छाती से लिपटकर रोते देखा तो कुछ समझ नहीं सका। छोटे मालिक का विवाह तो ठाकुर निर्भय सिंह की बेटी से होने वाला था! परन्तु चालक ने इस विषय पर एक क्षण भी सोचने का प्रयास नहीं किया। वह तुरंत चंद्रभाल के समीप बैठा।
 
उसने चंद्रभाल का मस्तक छुआ। फिर चिन्तित होकर बोला, 'अरे! छोटे मालिक तो बेहोश हो गए हैं!'

छोटे मालिक? रजनी ने आश्चर्य से ट्रक चालाक को देखा। बाबा वहीं रजनी पर झुका उसकी पीठ पर हाथ रखे हुए मानो खामोश जुबान से उसे सांत्वना दे रहा था। उसने भी ट्रक चालक को बहुत ध्यान से देखा। यह ट्रक-चालक कुंवर साहब को कैसे जानता है?

'तुम जानते हो इन्हें?' सहसा वहां खड़े एक ट्रक-क्लीनर ने आश्चर्य से पूछा।

'चानता?' मार्तण्ड सिंह के ट्रक-चालक ने कहा, 'अरे, उन्हीं का तो मैं नमक खाता हूं। यह हमारे मालिक के बेटे हैं -कुंवर साहब।'

रजनी तथा बाबा को मानो सहारा मिल गया। कोई तो मिला उनकी सहायता करने वाला, वरना चंद्रभाल की ऐसी गंभीर स्थिति में वे क्या करते और क्या नहीं करते?

'चलो-चलो, छोटे मालिक को उठाने में मदद करो।' मार्तण्ड सिंह के ट्रक-चालक ने कहते हुए चंद्रभाल के सिर के नीचे अपने दोनों हाथ रखे, बात उसने जारी रखी। बोला, 'इन्हें तुरंत ही अस्पताल पहुंचाना है।'

ट्रक-चालकों ने चंद्रभाल को संभालकर कार की पिछली गद्दी पर लिटा दिया। रजनी भी चंद्रभाल के साथ कार के अंदर बैठने को दीवानी हुई जा रही थी। उसकी तड़पती स्थिति लोगों से देखी नहीं जा रही थी। ट्रक-चालक के अतिरिक्त सभी यह समझ रहे थे कि रजनी घायल व्यक्ति की धर्मपत्नी है, यद्यपि रजनी के वस्त्र साधारण थे, परन्तु उसका रंग-रूप ऐसा था, मानो वह सुन्दरता की रानी हो। ट्रक-चालक जैसे ही चंद्रभाल को कार के अंदर लिटाकर द्वार पर से हटा, रजनी द्वार के बंद होने से पहले ही कार में प्रविष्ट हो गई। कार विदेशी थी लम्बी-चौड़ी। पिछली गद्दी र्क पायदान पर इतना स्थान था कि रजनी वहीं सिमटकर किसी प्रकार घुटनों के बल बैठ गई और चंद्रभाल से लिपट गई तो मार्तण्ड सिंह के ट्रक-चालक को मानो सोचने की आवश्यकता पड़ गई। आखिर यह लड़की कौन है कुछ न कुछ अधिकार तो इसका छोटे मालिक पर अवश्य ही होगा, वरना इस प्रकार क्यों तड़पती? उसने रजनी से कुछ पूछना उचित नहीं समझा। छोटे मालिक से इस लड़की का जाने क्या संबंध हो? वह कार के अंदर बैठा-स्टेयरिंग व्हील के सामने, तो दूसरी ओर बाबा भी आ खड़ा हुआ'।

चालक ने बाबा की ओर एक बार देखा। फिर विण्द्धस्क्रीन द्वारा सामने देखता हुआ बोला, 'ऐसा लंगता है, जैसे मैंने इससे पहले भी आपको कहीं देखा है।'

'कुछ दिनों पहले तक मैं मालिक की कोठी का माली था।' बाबा ने कहा, 'हो सकता है बेटा, तुमने मुझे कोठी पर ही देखा हो।'

चालक को मार्तण्ड सिंह की कोठी पर कई बार जाने का अवसर प्राप्त हो चुका था। उसने सोचा, बूढ़े को उसने शायद वहीं देखा हो। परन्तु एक माली क्या उसकी बेटी का उसके छोटे मालिक के साथ इतने अधिक मेलजोल का कारण कुछ समझ में नहीं आया। उसने पूछा, 'परन्तु आप लोग मालिक के साथ इस प्रकार कार में बैठकर कैसे आ रहे थे?

'छोटे मालिक हमें स्वयं लेने आए थे--हमारे गांव कुसुम्पटी में।' बाबा ने कहा।

लेने आए थे? कुसुम्पटी में?' चालक को अपने छोटे मालिक का इतनी दूर जाकर अपने माली तथा उसकी बेटी को लाने का कारण कुछ संमझ में नहीं आया। उसने पूछा' 'क्यों ?'

'ये छोटे मालिक की निजी बातें हैं।' बाबा ने बात समाप्त कर देनी चाही। चालक ने उसकी सहायता अवश्य की थी, परन्तु उसकी जिज्ञासापूर्ण बातें उसे पसंद नहीं आ रही थी।

अस्पताल से पहले मार्तण्ड सिंह की कोठी पड़ती थी, एक मोड़ से कुछ ही दूर बाद। चालक को अचानक विचार आया कि क्यों न वह छोटे मालिक को उनकी कोठी पहुंचा दे? छोटे मालिक के माता-पिता उन्हें जाने किस अस्पताल में भर्ती करना पसंद करें? अपनी इच्छा से यदि वह छोटे मालिक को किसी अस्पताल में भर्ती करेगा तो छोटे मालिक के ईलाज में देर हो सकती है। बड़े मालिक स्वयं अपने सुपुत्र को किसी अस्पताल में लेकर जाएंगे तो उनकी पहुंच द्वारा इलाज तुरंत आरंभ हो सकता है। उसने एक मोड़ पर तुरंत ही कार घुमाई और कोठी का रास्ता पकड़ लिया ।

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कोठी की बैठक में मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी के साथ इस समय निर्भय सिंह भी बैठे हुए थे। तीनों का ही सही अनुमान था कि चंद्रभाल कहां जा सकता है। फिर भी मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी अपने बेटे के लिए कुछ अधिक ही चिन्तित थीं। उनका बेटा गायब था, बिना कुछ बताए, इसलिए उनका चिन्तित होना स्वाभाविक था। मार्तण्ड सिंह अपने बेटे के साहस पर बड़बड़ा रहे थे। क्रोध में उनका शरीर आग-बबूला हुआ जा रहा था। पति-पत्नी दोनों को ही डर समाया हुआ था कि बेटा अपनी दीवानगी में आकर रजनी से विवाह न कर बैठे। यह चिन्ता निर्भय सिंह को भी सता रही थी। फिर भी वह मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी को पूरे विश्वास के आश्वासन दे रहे थे कि ऐसी बात कभी नहीं हो सकती, जिससे इतना बडे कुल की मान-मर्यादा पर कोई उंगली उठाए।

पिछले दिन जब अंशु कोठी आई थी तथा काफी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद भी उसकी भेंट चंद्रभाल से नहीं हुई थी तो वह निराश होकर चली गई थी। शाम को भी जब चंद्रभाल कोठी नहीं लौटा था तो मार्तण्ड सिह तथा उनकी धर्मपत्नी की चिन्ता बढ़ गई थी। मार्तण्ड सिह की धर्मपत्नी ने जब चंद्रभाल के मित्रों से फोन द्वारा पूछा तो सभी ने अज्ञानता प्रकट करते हुए बताया कि उनकी भेंट तो चंद्रभाल से कई दिनों से नहीं हुई। मां जानती थीं कि उनके बेटे ने केवल रजनी के ही कारण अपने मित्रों से मिलना बंद कर रखा है, फिर भी ऐसी स्थिति में वह उनके मित्रों से नहीं पूछतीं तो किससे पूछतीं? चंद्रभाल की इस भेद भरी हरकत पर उसके मित्र स्वयं चिन्तित हो उठे थे।

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