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“आपकी चरणरज लेने आया हूं जजमान। मिल जाती तो जीवन धन्य हो जाता।” उसने गजब की दयनीयता दर्शाई। जो कि जानकी लाल के साथ-साथ अजय भी जानता था कि कितनी फर्जी थी उसने कहा “कुत्ते की दुर-दुर करती पुलिस की नौकरी से मुक्ति पा जाता।”
“काम की बात करो इंस्पेक्टर । जानकी लाल शुष्क स्वर में बोला।
“वही तो कर रहा हूं ।” वह बोला। सहसा उसकी निगाह अजय पर पड़ी और वह तत्क्षण उसकी ओर मुखातिब होकर बोला “लेकिन उससे पहले जरा इन छोटे श्रीमान का तआरूफ हो जाता तो बड़ा अच्छा रहता।”
“अच्छा ही रहेगा।” जानकी लाल बोला। फिर उसने उससे अजय का तआरूफ कराया।
"धन्यवाद श्रीमान।” मदारी ने खुश होकर एक बार जोर से डमरू बजाया “ऐसे महान लोगों के दर्शन करके मैं धन्य हो गया।"
"और जरा अपनी इस 'नगाड़ा' बजाने वाली आदत पर कंट्रोल रखो।” जानकी लाल ने उसे याद दिलाया “मत भूलो कि यह हास्पिटल का वार्ड है। यहां जोर से बोलने पर भी पाबंदी होती है। मरीजों को डिस्टर्ब होता है।"
“सारी श्रीमान। बताने का शुक्रिया। मैं आगे से ख्याल रखंगा।”
“और यह श्रीमान जजमान के अलावा क्या सामने वाले के लिए कोई और सम्बोधन नहीं आता है?"
“सरासर आता है जजमान।"
"तो फिर बोलते क्यों नहीं।"
"क्योंकि वह संबोधन खास लोगों के लिए नहीं है आम लोगों के लिए है, जिन्हें घास खाने वाला भी कहते हैं। आपको तो बिल्कुल पसंद नहीं आएगा।"
“फिर भी बताओ।” जानकी लाल अधिकारपूर्ण स्वर में बोला।
“आप बुरा मान जाएंगे।"
"नहीं मानूंगा।"
मदारी एक पल के लिए सोच में नजर आया।
“क..कीर्तिमान।” फिर वह बोला।
“यह तो जजमान और श्रीमान से भी ज्यादा अच्छा सम्बोधन है।” जानकी लाल ने कहा “इसमें बुरा मानने वाली भला क्या बात है?"
“बुरा मानने वाली बात इसके आगे है।” वह सकुचाते हुए बोला।
“आगे क्या है?"
"अंडमान।” उसने बताया “बेइमान।"
जानकी लाल तत्क्षण हड़बड़ाया।
“म..मैंने कहा था न श्रीमान, आप बुरा मान जाएंगे।” मदारी बोला।
“सचमुच बुरा मानने वाली बात है। बहरहाल...।” । उसने ठंडी सांस ली, फिर उसके लहजे में एकाएक व्यंग घुल गया “अगर तुम्हारी मुस्तैद ड्यूटी पूरी हो गयी हो तो अब तुम यहां से तशरीफ ले जा सकते हो?”
“अरे कीर्तिमान..।” वह चिहुंककर बोला “क्यों जुल्म कर रहे हो, ड्यूटी निभाने वाला अभी मैंने किया ही क्या है?”
“है भी नहीं कुछ तुम्हारे पास करने के लिए? मैं क्या जानता नहीं हूं दो-चार घिसे-पिटे सवाल छोड़ने के अलावा तुम्हारे पास और है ही क्या? गुनाहगार कहां पुलिस से पकड़े जाते हैं?"
“गुनाहगार से आपका क्या मतलब है जजमान?"
"तुम नहीं जानते? मुझे आफिस में घुसकर सरेआम शूट किया गया है। एक नहीं तीन-तीन गोलियां दागी गई हैं मुझ पर। अगर मैंने बुलेटप्रूफ न पहन रखा होता और मेरे अंगरक्षकों ने इतनी मुस्तैदी न दिखाई होती तो अब तक मेरी लाश का पोस्टमार्टम भी हो चुका होता। तुम सुन रहे हो न इंस्पेक्टर?"
"दोनों कान से सुन रहा हूं श्रीमान।"
“कल या कत्ल की कोशिश गुनाह होता है और गुनाह करने या करवाने वाला गुनाहगार कहलाता है। इस केस में भी एक गुनाहगार है। यह मुझ पर तीसरा जानलेवा हमला है, जिसमें इस बार बस मैं अपने मुकद्दर से ही बचा हूं। और मेरा वह गुनाहगार आज भी आजाद घूम रहा है।"
“कहां आजाद घूम रहा है कीर्तिमान। वह तो भोले भंडारी उसकी आत्मा को शांति दे, फना हो चुका है। आपके जांबाज अंगरक्षकों ने उसे मार गिराया। अब मरने के बाद कोई भला कैसे आजाद घूम सकता है। यह रहस्य मेरी समझ में कदापि नहीं आ रहा। वह आजादी तो केवल उसकी रूह को ही हासिल हो सकती है।"
“इंस्पेक्टर।” जानकी लाल ने उसे बेहद कड़ी निगाहों से देखा था “या तो तुम खुद को बेवकूफ दर्शा रहे हो या मुझे बेवकूफ समझने की गलती कर रहे हो? जो मरा, उसके बारे में मालूम हो चुका है वह एक किलर था, किराये पर कत्ल करना जिसका पेशा था और उसका बाकायदा पुलिस रिकार्ड भी था। उस किलर की मुझसे कोई दुश्मनी नहीं हो सकती। उसे निश्चित रूप से मेरे कत्ल के लिए हायर किया गया था। उसे मेरे कत्ल की बाकायदा सुपारी दी गई थी। असली गुनाहगार वह है, जो पुलिस की पकड़ से दूर है। आजाद घूम रहा है कानून की खिल्ली उड़ा रहा है और तुम आज तक उसका पता नहीं लगा पाए। शर्म आनी चाहिए तुम्हें इंस्पेक्टर बल्कि चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।"
“वह क्या है कीर्तिमान कि ड्यूटी के दौरान मैं चुल्लू तो क्या कटोरे भर पानी में डूबकर भी नहीं मर सकता। पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी जो निभाना होता है और सरकार की मोटी तनख्वाह को हलाल करना होता है।"
“बकवास बंद करो इंस्पेक्टर, पुलिस का निकम्मापन किसी से छिपा नहीं है।"
“यह मुझ पर सरासर गलत इल्जाम है जजमान।” मदारी ने प्रतिवाद किया “इंस्पेक्टर मदारी और चाहे कुछ भी हो सकता है लेकिन वह निकम्मा नहीं हो सकता।”
“तो फिर वह गुनाहगार अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? वह आज तक खुला क्यों घूम रहा है?"
"क्योंकि वह बहुत रसूख वाला इंसान है। मेरी तो क्या, उसे गिरफ्तार करने की मजाल मेरे डीसीपी साहब की भी नहीं हो सकती। चुटकी बजाने से पहले वह हम दोनों की वर्दी उतरवा देगा। मैं तो खैर वर्दी पहनता ही नहीं हूं लेकिन समस्या । डीसीपी साहब की है, जो वर्दी के अलावा और कुछ भी नहीं पहनते। और भोलेनाथ न करे, अगर उनकी वर्दी उतर गई तो नंगे हो जाएंगे।”
"शटअप इंस्पेक्टर, कानून से ऊपर कोई नहीं है।"
“काम की बात करो इंस्पेक्टर । जानकी लाल शुष्क स्वर में बोला।
“वही तो कर रहा हूं ।” वह बोला। सहसा उसकी निगाह अजय पर पड़ी और वह तत्क्षण उसकी ओर मुखातिब होकर बोला “लेकिन उससे पहले जरा इन छोटे श्रीमान का तआरूफ हो जाता तो बड़ा अच्छा रहता।”
“अच्छा ही रहेगा।” जानकी लाल बोला। फिर उसने उससे अजय का तआरूफ कराया।
"धन्यवाद श्रीमान।” मदारी ने खुश होकर एक बार जोर से डमरू बजाया “ऐसे महान लोगों के दर्शन करके मैं धन्य हो गया।"
"और जरा अपनी इस 'नगाड़ा' बजाने वाली आदत पर कंट्रोल रखो।” जानकी लाल ने उसे याद दिलाया “मत भूलो कि यह हास्पिटल का वार्ड है। यहां जोर से बोलने पर भी पाबंदी होती है। मरीजों को डिस्टर्ब होता है।"
“सारी श्रीमान। बताने का शुक्रिया। मैं आगे से ख्याल रखंगा।”
“और यह श्रीमान जजमान के अलावा क्या सामने वाले के लिए कोई और सम्बोधन नहीं आता है?"
“सरासर आता है जजमान।"
"तो फिर बोलते क्यों नहीं।"
"क्योंकि वह संबोधन खास लोगों के लिए नहीं है आम लोगों के लिए है, जिन्हें घास खाने वाला भी कहते हैं। आपको तो बिल्कुल पसंद नहीं आएगा।"
“फिर भी बताओ।” जानकी लाल अधिकारपूर्ण स्वर में बोला।
“आप बुरा मान जाएंगे।"
"नहीं मानूंगा।"
मदारी एक पल के लिए सोच में नजर आया।
“क..कीर्तिमान।” फिर वह बोला।
“यह तो जजमान और श्रीमान से भी ज्यादा अच्छा सम्बोधन है।” जानकी लाल ने कहा “इसमें बुरा मानने वाली भला क्या बात है?"
“बुरा मानने वाली बात इसके आगे है।” वह सकुचाते हुए बोला।
“आगे क्या है?"
"अंडमान।” उसने बताया “बेइमान।"
जानकी लाल तत्क्षण हड़बड़ाया।
“म..मैंने कहा था न श्रीमान, आप बुरा मान जाएंगे।” मदारी बोला।
“सचमुच बुरा मानने वाली बात है। बहरहाल...।” । उसने ठंडी सांस ली, फिर उसके लहजे में एकाएक व्यंग घुल गया “अगर तुम्हारी मुस्तैद ड्यूटी पूरी हो गयी हो तो अब तुम यहां से तशरीफ ले जा सकते हो?”
“अरे कीर्तिमान..।” वह चिहुंककर बोला “क्यों जुल्म कर रहे हो, ड्यूटी निभाने वाला अभी मैंने किया ही क्या है?”
“है भी नहीं कुछ तुम्हारे पास करने के लिए? मैं क्या जानता नहीं हूं दो-चार घिसे-पिटे सवाल छोड़ने के अलावा तुम्हारे पास और है ही क्या? गुनाहगार कहां पुलिस से पकड़े जाते हैं?"
“गुनाहगार से आपका क्या मतलब है जजमान?"
"तुम नहीं जानते? मुझे आफिस में घुसकर सरेआम शूट किया गया है। एक नहीं तीन-तीन गोलियां दागी गई हैं मुझ पर। अगर मैंने बुलेटप्रूफ न पहन रखा होता और मेरे अंगरक्षकों ने इतनी मुस्तैदी न दिखाई होती तो अब तक मेरी लाश का पोस्टमार्टम भी हो चुका होता। तुम सुन रहे हो न इंस्पेक्टर?"
"दोनों कान से सुन रहा हूं श्रीमान।"
“कल या कत्ल की कोशिश गुनाह होता है और गुनाह करने या करवाने वाला गुनाहगार कहलाता है। इस केस में भी एक गुनाहगार है। यह मुझ पर तीसरा जानलेवा हमला है, जिसमें इस बार बस मैं अपने मुकद्दर से ही बचा हूं। और मेरा वह गुनाहगार आज भी आजाद घूम रहा है।"
“कहां आजाद घूम रहा है कीर्तिमान। वह तो भोले भंडारी उसकी आत्मा को शांति दे, फना हो चुका है। आपके जांबाज अंगरक्षकों ने उसे मार गिराया। अब मरने के बाद कोई भला कैसे आजाद घूम सकता है। यह रहस्य मेरी समझ में कदापि नहीं आ रहा। वह आजादी तो केवल उसकी रूह को ही हासिल हो सकती है।"
“इंस्पेक्टर।” जानकी लाल ने उसे बेहद कड़ी निगाहों से देखा था “या तो तुम खुद को बेवकूफ दर्शा रहे हो या मुझे बेवकूफ समझने की गलती कर रहे हो? जो मरा, उसके बारे में मालूम हो चुका है वह एक किलर था, किराये पर कत्ल करना जिसका पेशा था और उसका बाकायदा पुलिस रिकार्ड भी था। उस किलर की मुझसे कोई दुश्मनी नहीं हो सकती। उसे निश्चित रूप से मेरे कत्ल के लिए हायर किया गया था। उसे मेरे कत्ल की बाकायदा सुपारी दी गई थी। असली गुनाहगार वह है, जो पुलिस की पकड़ से दूर है। आजाद घूम रहा है कानून की खिल्ली उड़ा रहा है और तुम आज तक उसका पता नहीं लगा पाए। शर्म आनी चाहिए तुम्हें इंस्पेक्टर बल्कि चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।"
“वह क्या है कीर्तिमान कि ड्यूटी के दौरान मैं चुल्लू तो क्या कटोरे भर पानी में डूबकर भी नहीं मर सकता। पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी जो निभाना होता है और सरकार की मोटी तनख्वाह को हलाल करना होता है।"
“बकवास बंद करो इंस्पेक्टर, पुलिस का निकम्मापन किसी से छिपा नहीं है।"
“यह मुझ पर सरासर गलत इल्जाम है जजमान।” मदारी ने प्रतिवाद किया “इंस्पेक्टर मदारी और चाहे कुछ भी हो सकता है लेकिन वह निकम्मा नहीं हो सकता।”
“तो फिर वह गुनाहगार अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? वह आज तक खुला क्यों घूम रहा है?"
"क्योंकि वह बहुत रसूख वाला इंसान है। मेरी तो क्या, उसे गिरफ्तार करने की मजाल मेरे डीसीपी साहब की भी नहीं हो सकती। चुटकी बजाने से पहले वह हम दोनों की वर्दी उतरवा देगा। मैं तो खैर वर्दी पहनता ही नहीं हूं लेकिन समस्या । डीसीपी साहब की है, जो वर्दी के अलावा और कुछ भी नहीं पहनते। और भोलेनाथ न करे, अगर उनकी वर्दी उतर गई तो नंगे हो जाएंगे।”
"शटअप इंस्पेक्टर, कानून से ऊपर कोई नहीं है।"