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“ओह।" अजय ने महसूस किया, वह सही कह रही थी।
“आओ, यहां से चलें।” अजय ने बेध्यानी में उसका हाथ पकड़ा और तेजी से एक ओर बढ़ता हुआ बोला।
हसीना ने ऐतराज न किया। वह उसके साथ खिंचती चली गई। फिर जैसे ही वह दोनों लोगों की निगाहों से बाहर हुए, उसने झटककर अजय से अपना हाथ छुड़ा लिया और थमककर खड़ी हो गई।
अजय भी ठिठककर रुक गया।
“थ..थैक्यू...।" वह पलकें झुकाकर धीरे से बोली।
कितने ही पल खामोशी में बीते। दोनों में से कोई कुछ न बोला।
“त...तुम यहां क्या कर रहे हो?” फिर उसने नजर उठाकर पूछा। उसका संकोच किसी हद तक जाता रहा था।
“वही जो आप कर रही हैं।"
“ओह नो।” वह तत्काल खिलखिलाकर उन्मुक्त भाव से हंसी फिर बच्चों जैसी चपलता से बोली “मगर यह कैसे हो सकता है?"
“क्यों नहीं हो सकता?” अजय चकराया।
“म..मैं तो यहां अपने लिए सूट खरीदने आई थी।” वह बोली।
अजय तनिक हड़बड़ा गया लेकिन वह फौरन ही संभल गया। “आ..आप हमेशा सूट ही पहनती हैं?" उसने पूछा “जींस और
टॉप नहीं पहनतीं।"
"वह तो मैं कभी नहीं पहनती।"
“मगर क्यों? जबकि आप पर तो जींस बहुत अच्छी लगेगी। बहुत शानदार फिगर है आपकी।"
“फिर भी मैं नहीं पहनती।"
"लेकिन क्यों?"
“शानदार फिगर दिखाने के लिए अकेले जींस और टॉप ही नहीं होता।" वह निःसंकोच बोली “और भी बहुत सारे लिबास होते हैं।”
"अच्छा ।"
उसने माथे पर फिसल आई अपनी उसी जिद्दी लट को फूंककर ऊपर उड़ाया।
“जो लिबास...।” फिर वह बोली “मैंने इस वक्त पहन रखा है, क्या वह जींस-टॉप है?"
"नहीं।"
"फिर भी क्या उसमें मेरी फिगर साफ नहीं दिख रही?"
“सरासर दिख रही है।"
“सो देयर।” उसने लापरवाही से कंधे उचकाये “फिर वही पोशाक क्यों न पहनी जाए, जो औरत के लिए ही बनी है, जिसमें हमारा मुल्क-कल्चर भी झलकता है। सबसे बड़ी बात जिस पर कोई इल्जाम लगाती अंगुली नहीं उठती।"
“इसीलिए आप जींस-टॉप नहीं पहनतीं, हमेशा सूट ही पहनती हैं?”
“आप ऐसा कह सकते हैं।"
“काफी शानदार नजरिया है आपका।” अजय उसके ख्यालात से प्रभावित हुए बिना न रह सका था “एकदम आपकी ही तरह। मगर कितनी लड़कियां इस तरह से सोचती हैं?"
“कोई तो सोचती ही होगी। कौन नहीं जानता जनाबेआली कि औरत के रूप में कुदरत ने आदमी को एक नायाब तोहफा दिया है। क्यों दिया है, यह भी हर कोई जानता है। मगर क्या कोई उस तोहफे के रहस्य की परतें सरे बाजार उधेड़ने बैठ जाता है।"
“न..नहीं....?” अजय हड़बड़ाया और जल्दी से बोला। वह जितनी बुद्धिमान थी, उतनी ही बेबाक भी थी।
"फिर उस रहस्य को जताने का इतना उतावलापन क्यों?"
“जींस के काफी खिलाफ मालूम पड़ती हैं आप?"
“नहीं। मैं जींस के खिलाफ नहीं हूं। हर वह लिबास अच्छा है जिसमें औरत का बदन पूरा छिपता है। मगर यह तहजीब तो आखिर इंसान को होनी ही चाहिए कि बदन को किस तरह छिपाया जाए उसे छिपाने के लिए या फिर उसे दिखाने के लिए। खैर...जाने दो, मैं भी क्या बकवास लेकर बैठ गई।"
अजय मुग्ध हो उठा था और प्रभावित नजरों से उसे देखने लगा था।
“लेकिन...।" सहसा वह संभली थी और हैरान होकर बोली “यह सब मैं तुम्हें क्यों बता रही हूं। तुम तो मेरे लिए अजनबी हो।"
“अब कहां अजनबी हूं।” अजय ने फौरन प्रतिवाद किया “हम एक बार पहले भी तो मिल चुके हैं।"
“अजनबी दोबारा भी मिल सकते हैं। अच्छा अब मैं चलती हूं। बॉय...."
.
.
.
.
“ब..बस एक सवाल।” अजय व्यग्र होकर जल्दी से बोला "प्लीज।"
“क्या पूछना चाहते हो तुम?" वह रुक गई थी। उसने फिर चेहरे पर ढलक आई बालों की जिद्दी लट को फूंक मारकर यथास्थान पहुंचाया था।
"आपका नाम?"
“अरे पागल हुए हो?" वह इस तरह बोली, जैसे कि अजय ने कोई अनहोनी बात पूछ ली हो "पिछली बार बताया तो था
मैंने कि मैं अजनबियों को अपना नाम नहीं बताती।"
“ओह...।” अजय के चेहरे पर मायूसी फैल गई। एक बार फिर उसके दिल को धक्का लगा था और यह बात शायद उस
लड़की से छिप नहीं सकी थी।
“मायूस मत होना जेंटलमैन।” वह कोमल भाव से बोली। उसने अपलक उसे देखा था “कहते हैं हर दो अजनबी के बीच अक्सर कहानी लिखी होती है, जो आखिरकार अपने अंजाम को पहुंचकर ही रहती है। अगर हमारे दरम्यान भी सचमुच कोई कहानी लिखी है तो हम फिर से मिलेंगे और फिर उस कहानी के किरदार बनकर सिलसिला शुरू करेंगे।
“आओ, यहां से चलें।” अजय ने बेध्यानी में उसका हाथ पकड़ा और तेजी से एक ओर बढ़ता हुआ बोला।
हसीना ने ऐतराज न किया। वह उसके साथ खिंचती चली गई। फिर जैसे ही वह दोनों लोगों की निगाहों से बाहर हुए, उसने झटककर अजय से अपना हाथ छुड़ा लिया और थमककर खड़ी हो गई।
अजय भी ठिठककर रुक गया।
“थ..थैक्यू...।" वह पलकें झुकाकर धीरे से बोली।
कितने ही पल खामोशी में बीते। दोनों में से कोई कुछ न बोला।
“त...तुम यहां क्या कर रहे हो?” फिर उसने नजर उठाकर पूछा। उसका संकोच किसी हद तक जाता रहा था।
“वही जो आप कर रही हैं।"
“ओह नो।” वह तत्काल खिलखिलाकर उन्मुक्त भाव से हंसी फिर बच्चों जैसी चपलता से बोली “मगर यह कैसे हो सकता है?"
“क्यों नहीं हो सकता?” अजय चकराया।
“म..मैं तो यहां अपने लिए सूट खरीदने आई थी।” वह बोली।
अजय तनिक हड़बड़ा गया लेकिन वह फौरन ही संभल गया। “आ..आप हमेशा सूट ही पहनती हैं?" उसने पूछा “जींस और
टॉप नहीं पहनतीं।"
"वह तो मैं कभी नहीं पहनती।"
“मगर क्यों? जबकि आप पर तो जींस बहुत अच्छी लगेगी। बहुत शानदार फिगर है आपकी।"
“फिर भी मैं नहीं पहनती।"
"लेकिन क्यों?"
“शानदार फिगर दिखाने के लिए अकेले जींस और टॉप ही नहीं होता।" वह निःसंकोच बोली “और भी बहुत सारे लिबास होते हैं।”
"अच्छा ।"
उसने माथे पर फिसल आई अपनी उसी जिद्दी लट को फूंककर ऊपर उड़ाया।
“जो लिबास...।” फिर वह बोली “मैंने इस वक्त पहन रखा है, क्या वह जींस-टॉप है?"
"नहीं।"
"फिर भी क्या उसमें मेरी फिगर साफ नहीं दिख रही?"
“सरासर दिख रही है।"
“सो देयर।” उसने लापरवाही से कंधे उचकाये “फिर वही पोशाक क्यों न पहनी जाए, जो औरत के लिए ही बनी है, जिसमें हमारा मुल्क-कल्चर भी झलकता है। सबसे बड़ी बात जिस पर कोई इल्जाम लगाती अंगुली नहीं उठती।"
“इसीलिए आप जींस-टॉप नहीं पहनतीं, हमेशा सूट ही पहनती हैं?”
“आप ऐसा कह सकते हैं।"
“काफी शानदार नजरिया है आपका।” अजय उसके ख्यालात से प्रभावित हुए बिना न रह सका था “एकदम आपकी ही तरह। मगर कितनी लड़कियां इस तरह से सोचती हैं?"
“कोई तो सोचती ही होगी। कौन नहीं जानता जनाबेआली कि औरत के रूप में कुदरत ने आदमी को एक नायाब तोहफा दिया है। क्यों दिया है, यह भी हर कोई जानता है। मगर क्या कोई उस तोहफे के रहस्य की परतें सरे बाजार उधेड़ने बैठ जाता है।"
“न..नहीं....?” अजय हड़बड़ाया और जल्दी से बोला। वह जितनी बुद्धिमान थी, उतनी ही बेबाक भी थी।
"फिर उस रहस्य को जताने का इतना उतावलापन क्यों?"
“जींस के काफी खिलाफ मालूम पड़ती हैं आप?"
“नहीं। मैं जींस के खिलाफ नहीं हूं। हर वह लिबास अच्छा है जिसमें औरत का बदन पूरा छिपता है। मगर यह तहजीब तो आखिर इंसान को होनी ही चाहिए कि बदन को किस तरह छिपाया जाए उसे छिपाने के लिए या फिर उसे दिखाने के लिए। खैर...जाने दो, मैं भी क्या बकवास लेकर बैठ गई।"
अजय मुग्ध हो उठा था और प्रभावित नजरों से उसे देखने लगा था।
“लेकिन...।" सहसा वह संभली थी और हैरान होकर बोली “यह सब मैं तुम्हें क्यों बता रही हूं। तुम तो मेरे लिए अजनबी हो।"
“अब कहां अजनबी हूं।” अजय ने फौरन प्रतिवाद किया “हम एक बार पहले भी तो मिल चुके हैं।"
“अजनबी दोबारा भी मिल सकते हैं। अच्छा अब मैं चलती हूं। बॉय...."
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“ब..बस एक सवाल।” अजय व्यग्र होकर जल्दी से बोला "प्लीज।"
“क्या पूछना चाहते हो तुम?" वह रुक गई थी। उसने फिर चेहरे पर ढलक आई बालों की जिद्दी लट को फूंक मारकर यथास्थान पहुंचाया था।
"आपका नाम?"
“अरे पागल हुए हो?" वह इस तरह बोली, जैसे कि अजय ने कोई अनहोनी बात पूछ ली हो "पिछली बार बताया तो था
मैंने कि मैं अजनबियों को अपना नाम नहीं बताती।"
“ओह...।” अजय के चेहरे पर मायूसी फैल गई। एक बार फिर उसके दिल को धक्का लगा था और यह बात शायद उस
लड़की से छिप नहीं सकी थी।
“मायूस मत होना जेंटलमैन।” वह कोमल भाव से बोली। उसने अपलक उसे देखा था “कहते हैं हर दो अजनबी के बीच अक्सर कहानी लिखी होती है, जो आखिरकार अपने अंजाम को पहुंचकर ही रहती है। अगर हमारे दरम्यान भी सचमुच कोई कहानी लिखी है तो हम फिर से मिलेंगे और फिर उस कहानी के किरदार बनकर सिलसिला शुरू करेंगे।