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Thriller कांटा

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“ए...एक और का क्या मतलब? क्या तू पहले कोई खून कर चुका है?"

“पहले कब?"

“म...मेरा मतलब जेल से छूटने के बाद से था?"

उसके होठों पर जहर बुझी मुस्कराहट उभरी।

दास विचलित हो उठा। उसका हौसला जवाब देने लगा था।

"त...तू यहां क्यों आया है गोपाल ?" उसने किसी तरह हौसला जुटाकर पूछा।

“काफी ठाट हैं तेरे तंदूरी मुर्गे?" गोपाल ने फिर उसका सवाल घोंट दिया था “करता क्या है? पुराने धंधों को छोड़े तो तुझे शायद जमाना हो गया?"

“म...मेरा धंधा आज बहुत स्ट्रेट है?"

“जरा बता तो सही कि आज तेरा वह स्ट्रेट धंधा क्या है और हां, विश्वास कर, मैं तेरे उस स्ट्रेट धंधे को नजर नहीं लगाऊंगा?"

“य...यह मेरा अपना घर है और दिल्ली के ऐसे इलाके में जिसके पास खुद की इतनी बड़ी बिल्डिंग हो, उसे कुछ करने की जरूरत नहीं होती। एक-एक कमरे का पांच-पांच हजार रुपया महीना किराया आता है। महीने का टोटल सत्तर हजार से ऊपर बैठता है।”

"बल्ले भई। क्या किस्मत पाई है तूने भी। बैठकर खा रहा है।”

“ऐसा ही समझ लो।”

“अ...और मैं वहां जेल में सड़ रहा था। पिछले पन्द्रह सालों से ऐड़ियां रगड़ रहा था।” उसने दांत किटकिटाए “सच-सच बताना देशी सुअर, बीते पन्द्रह सालों में क्या एक बार भी तुझे मेरी याद नहीं आई?"

"क...कौन कहता है कि मुझे तेरी याद नहीं आई?"

.

.

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“यानि कि आई। फिर भी एक बार भी जेल में आकर मुझसे मिलना गंवारा नहीं किया। मेरे बार-बार खबर भेजने के बाद भी तू मुझसे मिलने नहीं आया। सोचा होगा कि मैं अब कहां जेल से बाहर आने वाला था। पन्द्रह साल जैसे कभी खत्म ही नहीं होने वाले थे और मैं वहीं आंखें मूंद लेने वाला था।"

“म...मैं..."

.

“लक्की, तू मेरे गैंग का आदमी था मेरा सबसे ज्यादा खास था। हम दोनों ने साथ मिलकर बहुत गुल खिलाए थे। याद है तुझे या फिर भूल गया?"

“ह..हां। मैं इससे कहां इंकार कर रहा हूं लेकिन तुम्हारे जेल जाने के बाद सारा गैंग बिखर गया था। हम सब पुलिस के खौफ से अंडरग्राउंड हो गए थे, फिर सबने अपना-अपना रास्ता ढूंढ लिया था। ऐसे में मैं क्या करता?"

“बहुत कुछ कर सकता था। ऐसे में अगर उस वक्त तुम सारे के सारे हरामखोर खौफजदा न हुए होते और तुम सारे कमीने, कुत्ते, हरामियों ने थोड़ा सा हिम्मत से काम लिया होता तो मैं इतनी लम्बी सजा से बच सकता था और दो-चार साल की जेल काटकर बाहर आ जाता।"

+

“य...यह नामुमकिन था गोपाल ।” दास के लहजे में दृढ़ता उभरी “तुम्हारा केस बहुत मजबूत था।"

“केस को मजबूत और कमजोर पुलिस बनाती है। वह अगर चाहे तो मजबूत से मजबूत केस भी पलक झपकते अदालत में ढेर हो सकता है और कमजोर केस मील का पत्थर बन सकता है। मैं क्या कह रहा हूं कुछ समझ में आया विलायती गधे।"

“फि...फिर भी मदद तो तुम्हें आखिरकार हासिल हो गई थी।" “ठहर जा... हरामी...।” गोपाल एकाएक लाल कपड़ा दिखाए सांड की तरह भड़का “जो मदद हासिल हुई थी, वह क्या मुझे तेरे किए हासिल हुई थी?"

“व...वह...।” उसका दिल जोर से लरजा। वह अपनी बात पूरी न कर सका और होंठों पर जुबान फिराने लगा।

“वह मदद मुझे मेरे गैंग से हासिल नहीं हुई थी।” गोपाल अपने एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला “वह कहीं और से ही हासिल हुई थी। हासिल क्या हुई थी, मैंने जबरदस्ती गला दबाकर वह मदद हासिल की थी ब्लैकमेल करके हासिल की थी। क्योंकि इसके अलावा उस वक्त मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा था।"

“कि...किसको ब्लैकमेल किया था तु..तुमने?”

" जानकी लाल को।" उसने एक क्षण उसे घूरा फिर बोला “याद आया कुछ?"

“ह..हां।” उसने फंसे कंठ से स्वीकार किया “याद आया।"

“असल में जानकी लाल मेरा क्लाइंट था।" वह जरा ठहरकर बोला “एक काम किया था मैंने उसके लिए। यह अलग बात है कि उस काम की मैं उससे भरपूर कीमत ले चुका था। और अपने क्लाइंट से दगा करना मेरा उसूल नहीं, फिर भी मैंने उस वक्त जो कुछ भी किया, मरता क्या न करता वाली हालत में किया था।"

“तुम्हें अ..अफसोस हो रहा है?"

“ काहे का अफसोस। अफसोस तो तब होता जबकि मैंने उसे ब्लैकमेल न किया होता। मेरा वह क्लाइंट तो मुझे खूब फला। मैंने तो जेल में भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। जेल के अंदर रहकर भी उसे ब्लैकमेल करता रहा हूं।"

“ज..जेल में रहकर भी तुम उसे ब्लैकमेल कर रहे हो?" वह आश्चर्य से बोला

“और क्या? वहीं तो मुझे ज्यादा रुपयों की जरूरत थी। छप्परफाड़ रोकड़े की जरूरत थी?"

“ज..जेल में?"

“और क्या रस्साले जंगली भैंसे, वरना जेल की चक्की पीसना किसे मंजूर होने वाला था। वहां का जानवरों वाला खाना किसके हलक में उतरने वाला था। वहां का...।"

“म...मैं समझ गया। लेकिन तुम्हारे पास भी तो बहुत पैसा था लाखों रुपया था, उसका क्या हुआ?"

तब पहली बार उसके चेहरे पर बेचैनी के भाव आए थे।

“व..वह सारा रुपया कहां गया?" दास ने अपना सवाल दोहराया। “बेईमानी हो गया।"

“क...क्या?” किसने बेईमानी किया?"

“और कौन करेगा?" उसके जबड़े कस गए। वह अपने होंठ चबाता हुआ बोला “उसी हरामजादे ने किया, जो अपने गैंग का खजाना संभालता था उसका हिसाब-किताब रखता था?"

“वही कुत्ता।” उसने नफरत से दिया “हरामी के बीज ने पासा पलटा देख ऐसा फटका मारा कि आज तक हाथ ही नहीं

आया। आना-पाई भी नहीं छोड़ा कमीने ने। सब झाडू फेर गया। कोई खबर है तुझे उसकी?”

“स..साबिर की? नहीं।”

.

“सच कह रहा है न? झूठ तो नहीं बोल रहा मुझसे?"

“न...नहीं। एक बार उस दुनिया से किनारा करने के बाद मैंने फिर पलटकर उस तरफ नहीं देखा। तुम्हें भी तो मैं लगभग

भूल ही गया था।"

“मेरे साथ मारी गई भांजी में उसके साथ तूने अपना हिस्सा तो नहीं बंटा लिया?"

"खामखाह।" उसने विरोध जताया।

“यह इतनी ऊंची बिल्डिंग तेरा बाबा वसीयत करके मरा था क्या तेरे नाम? यह करोड़ से ऊपर की जगह क्या हराम में हासिल हो गई थी?"

“करोड़ की तो यह आज है। पन्द्रह बरस पहले तो कौड़ियों के मोल भी कोई नहीं पूछता था।"

"अच्छा ।"

“और पन्द्रह बरस पहले मैंने इसे बस दो फ्लोर ही बनवाया था जो कि केवल दो लाख में बन गया था। और इतना रुपया तो मेरे पास वैसे ही था। आगे की बिल्डिंग इससे हासिल होने वाली किराये की रकम से ही बनी है।"

“यानि कि तूने भांजी में हिस्सा नहीं बंटाया? फिर भी जुर्म तो तूने किया है गुनाहगार तो तू मेरा बराबर है।” वह एकाएक ठिठका। उसने अपनी जेब से एक रिवॉल्वर सामने सेंटर टेबल पर रखा कि दास को उसका बखूबी दीदार हो पाता, फिर वह अर्थपूर्ण स्वर में बोला “इसे पहचानता है या इसे भूल गया।"

दास का चेहरा पीला पड़ गया।

“इ...इसे अंदर रख लो.।” वह घिघियाया सा बोला “प्लीज।"

“अरे, तू भी हद कर रहा है।” वह खासे नाटकीय स्वर में बोला “इसे अंदर ही रखना होता तो फिर मैंने बाहर ही क्यों निकाला होता। और अगर मैंने इसे तेरी फरियाद पर अंदर रख लिया तो फिर गुनाहगार को सजा कैसे दूंगा।”

"त...तुम्हारा गुनाहगार तो साबिर है, जिसने तुम्हें धोखा दिया तुमसे दगाबाजी की। तुम्हारा सारा रुपया हड़प कर गया। म..मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया। मैं तुम्हारा गुनाहगार नहीं हूं।"

“साबिर ने जो किया उसकी सजा बहुत भयानक होगी इतनी ज्यादा भयानक कि शायद तुझे यकीन नहीं आएगा। तेरी सजा इतनी भयानक नहीं होगी क्यों कि तेरा गुनाह छोटा है।"

“न...नहीं... गोपाल तुम ऐसा नहीं करोगे।"

“करूंगा नहीं क्या? बस समझ ले कि हो ही गया।” उसने रिवॉल्वर उठाकर उसकी ओर तान दिया, जिसकी नाल पर

साइलेंसर लगा था “एक दिन, दो कत्ल ।"

उसका हलक सूख गया। उसने इस तरह गोपाल को देखा जैसे कि हलाल होने को तैयार बकरा कसाई को देखता है।

“अभी मैंने तुझे बताया था कि एक कल मैं करके आया हूं।" सहसा गोपाल बोला “जानता है, वह बदनसीब कौन था जो मेरे हाथों कत्ल हुआ।”

"क...कौन, कौन था वह?"

“मेरा शुभचिंतक, मेरा मददगार, मेरा मोहसिन ।”

"ज.. जानकी लाल ।"

“वही। बहुत बड़ा आदमी बन गया है कमबख्त । आज वह...”

“बड़ा आदमी तो वह पहले भी था। नहीं तो तुम्हारी मदद कैसे करता? तुम्हें इतना रुपया कैसे देता?" ।

“स्साले मुर्ग मुसल्लम, आज वह अरबपति बन गया है। सारी दिल्ली उसका नाम जानती है। तूने भी जरूर सुना होगा?"

“क...कहीं तुम...।” दास एकदम से चिहुंककर बोला

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+

“जानकी लाल बिल्डर की बात तो नहीं कर रहे?"

"देखा।” वह विजयी भाव से बोला “मैंने कहा था न कि तूने भी उसका नाम जरूर सुना होगा। देख, कितना सही कहा था मैंने।"
 
"देखा।” वह विजयी भाव से बोला “मैंने कहा था न कि तूने भी उसका नाम जरूर सुना होगा। देख, कितना सही कहा था मैंने।"

“विश्वास नहीं होता।"

“क्या विश्वास नहीं होता?"

“य...यही कि आज का यह जानकी लाल अतीत का जानकी है। अगर यह सच है तो उसने वाकई आश्चर्यजनक तरक्की की है। लेकिन...।” सहसा उसे जैसे याद आया। वह तेजी से गोपाल की ओर पलटा “त...तुमने उसे खत्म कर दिया?"

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“यही तो मैंने बोला।"

“म..मगर क्यों? आखिर क्यों मारा तुमने उसे?"

“नहीं मारता तो वह मुझे मार देता। कमबख्त ने सुपारी लगा दी थी मेरी।"

“तुम्हें कैसे पता कि उससे तुम्हारी सुपारी लगाई थी।"

"जिसे सुपारी दी, वह मेरा चेला था। जेल में कितने ही साल उसने मेरी शार्गिदी की थी। उसने मुझे सब कुछ बता दिया

और सुपारी की सारी रकम मेरे कदमों में रख दी, कहने लगा कि मैं गुरु दक्षिणा समझकर स्वीकार कर लूं।"

“और कोई रास्ता भी तो नहीं था जानकी लाल के पास तुमसे निजात पाने का। पन्द्रह साल से ब्लैकमेलिंग का जहर पीता

आ रहा था वह और आइंदा भी पता नहीं कब तक यह सिलसिला चलने वाला था।"

“इसीलिए तो मैंने उसे मुक्ति दे दी और तेरी मुक्ति का रास्ता मुखर करने यहां आ पहुंचा?”

“म..मेरा यहां का पता तुम्हें किसने दिया?"

"देख लेना, ऐसे ही साबिर का पता लगाता बहुत जल्द उसके सिर पर पहुंच जाऊंगा। मेरे कहर से मेरा कोई भी दुश्मन नहीं बचने वाला। अब समाचार समाप्त हुए। अलविदा मेरे जिगर के टुकड़े।"

उसकी अंगुली ट्रिगर पर कस गई। आंखों में हिंसक चमक कौंध गई।

“ठ...ठहरो।” दास एकाएक सिहरकर जल्दी से बोला “ठहरो। गोली मत चलाना। मैं कहता हूं गोली मत चलाना प्लीज।"

गोपाल ठिठक गया और असमंजस भरे भाव से दास को देखने लगा।

"क्या कहना चाहता है बरसाती मेंढक?" वह उस पर पूर्ववत रिवॉल्वर ताने हुए बोला।

"क्या म..मेरी जानबख्शी का कोई रास्ता नहीं है?"

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“ओह, तो तू मुझसे सौदा करना चाहता है अपनी जान का सौदा?"

“ऐसा ही समझ लो।"

“एक रास्ता तो है, लेकिन वह तुझे मंजूर नहीं होगा।” गोपाल सोचूपूर्ण भाव से बोला।

“त...तुम रास्ता बताओ।”

“ए..एक हफ्ते के लिए अपनी फुलझड़ी को मेरे हवाले कर दे बस एक हफ्ते के लिए और समझ ले कि तेरी जान बच गई।"

"न...नहीं।" दास का लहजा कंपकंपा गया रोयां-रोयां खडा हो गया।

"क्या नहीं? इससे बढ़िया रास्ता तेरे लिए भला और क्या हो सकता है बासी टिंडे। और फिर मेरे साथ एक हफ्ता रह लेनेभर से तेरी फुलझड़ी कुछ घिस थोड़े ही न जाएगी उसका साइज थोड़े न छोटा हो जाएगा। अगर हो जाए तो कसम से एक करोड का जाना भर दंगा। अब बोल क्या कहता है?"

“श...शर्म कर गोपाल सुगंधा तेरी बेटी जैसी है। अगर तेरी कोई बेटी होती तो आज वह इतनी ही बड़ी होती।"

दास की आंखें एकाएक नफरत से जल उठी थी। वह हिकारत भरे स्वर में बोला।

“लफ्फाजी झाड़ना बंद कर चतुर सुजान। अपनी जान बचाने का तेरे पास यह पहला और आखिरी रास्ता है।"

“म...मैं अपने जीते जी ऐसा कभी नहीं होने दूंगा।” उसके चेहरे पर एकाएक दृढ़ता आई थी। उसका चेहरा सख्त हो गया था “हां, मेरी मौत के बाद तू जो चाहे कर सकता है?"

“इसीलिए तो तुझे मौत की नींद सुलाने जा रहा हूं, ताकि उसके बाद मैं जो चाहे कर सकू, नहीं?” उसने अपना रिवॉल्वर वाला हाथ पुनः ऊंचा किया। उसके चेहरे की नसें तन गईं।

“ग...गोपाल...।” दास का दम खुश्क होने लगा था। उस हत्यारे की आंखों में नाचती अपनी मौत उसे साफ नजर आई

थी “रुक जाओ। गोली मत चलाओ।"

“क्यों?" गोपाल ने तिरछी निगाहों से उसे देखा। रिवॉल्वर वाला हाथ उसने इस बार नीचा नहीं किया था “क्या कोई चॉयस है अभी तेरे पास?”

"ह...है तो सही।"

"क्या ?"

“प...पहले यह रिवॉल्वर तो नीचे करो।"

+

“पहले चायस बता।"

“म...मैं तुम्हें साबिर का पता बता सकता हूं।"

“हुच्च।” तत्काल गोपाल को जोर की हिचकी आई। उसने चिहुंककर दास को देखा और अविश्वास से बोला “क्या कहा

तूने? तू मुझे साबिर का पता बता सकता है?"

"ह...हां।"

"त...तू उसका पता जानता है?”

"ह..हां।"

“मगर तूने तो अभी कहा था कि तू उसका पता नहीं जानता।"

"मैंने झूठ बोला था?"

"क्यों झूठ कहा था? भांजी का हिस्सा खाया था, इसलिए झूठ कहा था ?"

“नहीं, क्योंकि उसने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने किसी को उसका सच बताया तो वह मुझे गोली मार देगा।"

“समझा।" उसने एक क्षण कुछ सोचा, फिर अपना रिवॉल्वर वाला हाथ नीचे गिरा लिया “कोई बात नहीं, तुझे दी गई अपनी धमकी पूरी करने के लिए वह अब जिंदा नहीं रहने वाला। उसका पता बोल, नाम बदलकर अगर उसने तेरी ही तरह अपना कोई दूसरा फैंसी नाम रख लिया हो तो वह भी बता। उसकी कोई तेरे जैसी फुलझड़ी हो तो फौरन से भी पहले बता। सुना तूने?"

"हां।"

“फिर भी अभी तक ड्रम की तरह लुढ़का बैठा है। बककर नहीं दिया कुछ?”
 
“वादा करो। पहले तुम वादा करो कि अगर मैंने बता दिया तो तुम मुझे नहीं मारोगे मेरी बेटी की अस्मत से नहीं खेलोगे?"

"चल, तू भी क्या याद करेगा किसी रईस से पाला पड़ा था। मैंने वादा किया।” वह बिना एक भी पल गंवाएं बोला।

“त...तुम अपने वादे से मुकर तो नहीं जाओगे?" दास ने सशंक भाव से उससे पूछा।

“ठहर जा हरामखोर। अब क्या हाथ में गंगाजल उठाने से तुझे यकीन आएगा?"

"मैं...मैं बताता हूं।"

“ऊदबिलाव के पुंडे। शुरू हो जा।"

“दास एक क्षण के लिए सोच में नजर आया, फिर उसने गोपाल को साबिर का पता बता दिया।

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बीएमडब्ल्यू यमुना के गहरे ढलान पर इस तरह औंधी पड़ी थी कि उसका आधा हिस्सा यमुना के बहते पानी में डूबा हुआ था, जबकि आधा बाहर सूखे में था। उसका अगला हिस्सा झुलसकर काला पड़ गया था। उसके अग्रभाग में लगी आग हालांकि बुझ चुकी थी लेकिन अगले समूचे हिस्से से जर्द काला धुआं तब भी उठ रहा था।

घटनास्थल के इर्द-गिर्द लोगों की भारी भीड़ जमा हो चुकी थी। ऊपर सड़क के किनारे भी ढेर सारे लोग खड़े थे और नीचे ढलवां स्थान पर भी काफी तमाशबीन लोग उतर आए थे। पुलिस की दो पेट्रोल कारें वहां पहुंच चुकी थीं। फायर ब्रिगेड की भी एक वैन वहां खड़ी थी। उसी फायर ब्रिगेड ने बीएमडब्ल्यू की आग पर काबू पाया था और उसके अंदर फंसे लोगों को बाहर निकाला था।

वह जानकी लाल की बीएमडब्ल्यू थी, जिसमें ड्राइवर समेत कुल चार लोग मौजूद थे। जानकी लाल आगे ड्राइवर की बगल में बैठा था जबकि पिछली सीट पर उसके दोनों हथियारबंद बॉडीगार्ड मौजूद थे।

वह लोग अक्षरधाम मंदिर से होते हुए प्रगति मैदान के लिए आगे बढ़ रहे थे जबकि बीच में पड़ने वाली यमुना के बिल्कुल करीब वह हादसा पेश आया था और पीछे से आती एक तेज रफ्तार स्कार्पियो ने बेहद खतरनाक ढंग से बीएमडब्ल्यू को ठोक दिया था।

उस वक्त स्कार्पियों की रफ्तार सौ से कम तो हरगिज भी नहीं थी। बीएमडब्ल्यू उस वक्त यमुना के दोनों ओर से कवर्ड पुल पर दाखिल होने ही वाली थी जबकि पीछे से लगने वाली जोरदार टक्कर से उसका संतुलन बिगड़ गया था और उसका ड्राइवर बुरी तरह बौखला गया था। जानकी लाल समेत दोनों बॉडीगॉर्ड भी बौखला गए थे। फिर भी ड्राइवर ने बीएमडब्ल्यू को कंट्रोल करने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन तभी पीछे आते ट्रैफिक के लश्कर में से किसी दूसरी तेज रफ्तार कार ने उसे आगे से ठोक दिया था।

बुरी तरह अनियंत्रित कार नीचे ढलान की ओर उतर गई, और फिर वह एक तेज आवाज के साथ उलट गई थी। उसके सभी शीशे झनझनाकर बिखर गए थे। फिर वह बेहद भयावह ढंग से कलाबाजी खाती हुई नीचे ढलान पर लुढ़कती चली गई थी।

वह दुर्घटना का बेहद भयावह मंजर था, जिसे देखकर सड़क का ट्रेफिक ठहर गया था। उसमें जबरदस्त हड़कम्प मच गया था।

बीएमडब्ल्यू में मौजूद किसी को भी संभलने का मौका नहीं मिल सका था।

कितनी ही पलटियां खाने के बाद बीएमडब्ल्यू यमुना किनारे पर पहुंचकर स्थिर हुई तो उसमें मौजूद एक भी शख्स ऐसा नहीं था जो कि सिर से पांव तक लहूलुहान नहीं हुआ था और उसके जिस्म की सभी दो सौ छः हड्डियों का चूरा नहीं बन गया था।

फिर रही-सही कसर एकाएक बीएमडब्ल्यू में लग जाने वाली आग ने पूरी कर दी थी, जो कि गर्म इंजन पर पेट्रोल गिरने की वजह से लगी थी। लेकिन फायर तथा पुलिस कंट्रोल को दी गई सूचना पर आनन-फानन मौकाये वारदात पर पहुंची फायर ब्रिगेड तथा पुलिस की दो पेट्रोल कारों में पहुंचे पुलिस कर्मियों ने बेहद चुस्ती-फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए बीएमडब्ल्यू की आग को बुझा दिया था और उसमें फंसे चारों लोगों को बाहर निकाल लिया था।
 
ड्राइवर का जिस्म स्टेयरिंग तथा बैक रेस्ट के बीच तब भी फंसा था। उसकी दर्दनाक हालत पर एक नजर डालने मात्र से ही अहसास हो गया था कि उसके जिस्म में जीवन के कोई चिन्ह शेष नहीं बचे थे। जानकी लाल की तरफ का कार का हिस्सा पानी में आधा डूबा हुआ था और उसका दरवाजा अपनी जगह से गायब हो गया था, जिसकी वजह से जानकी लाल का मृत जिस्म बाहर निकल आया था। उसकी हालत भी ड्राइवर से बेहतर नहीं थी। आग ने कमर से ऊपर का उसका समूचा जिस्म बुरी तरह झुलसा दिया था। उसकी सीट बेल्ट पूरी तरह जल गई थी। कमर से नीचे का लिबास अधजला था लेकिन जिस्म से बुरी तरह चिपक गया था। वह उस वक्त बहुत भयानक लग रहा था। उसकी हालत पर भी एक नजर डालने भर से ही अहसास हो जाता था कि वह मर चुका था, उसके जिस्म में भी प्राणों का चिन्ह शेष नहीं था।

जबकि पीछे मौजूद दोनों बॉडीगॉर्ड बुरी तरह जख्मी थे। आग की लपटों की भीषणता शायद इस हद तक वहां नहीं पहुंची थी जितनी कि आगे थी। इसीलिए वे बच गए थे। उनकी सांसें व नब्ज चल रही थीं। उन्हें फौरन अस्पताल पहुंचा दिया गया था। किंतु बदकिस्मत ड्राइवर और जानकी लाल को अस्पताल भिजवाने की जरूरत पेश नहीं आई थी। उन पर एक नजर डालने से ही पुलिस को पता चल गया था कि वह दोनों मर चुके थे। लिहाजा उनकी अधजली लाशों को निकालकर ढलान पर ही रख दिया गया था।

उस वारदात को अंजाम देने वाली काली स्कार्पियो गधे का सींग बन चुकी थी।

तभी इंस्पेक्टर मदारी वहां पहुंचा।

मगर तब तक लोकल थाने का एसएचओ भी अपने दल-बल के साथ वहां पहुंच चुका था।

वह पैंतीस साल की उम्र का एक हृष्ट-पुष्ट नौजवान था, जो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाकर एसएचओ बना था। वह इंस्पेक्टर मदारी का बिग फैन था और उसे अपना आदर्श मानता था। उसका नाम किशोर था। वहां प्रत्यक्षदर्शियों में कई लोग ऐसे थे जो जानकी लाल तथा उसकी कार को पहचानते थे, लिहाजा मरने वालों की शिनाख्त फौरन ही हो गई थी। और क्योंकि इंस्पेक्टर किशोर को मालूम था कि जानकी लाल पर पहले भी एक नहीं तीन-तीन बार कातिलाना हमला हो चुका था और उस मामले को इंस्पेक्टर मदारी देख रहा था, इसलिए वह दर्दनाक खबर उसने खुद ही इंस्पेक्टर मदारी को मोबाइल पर दी थी।

उसके बाद उसने जानकी लाल की बेटी रीनी और दामाद संदीप को भी फोन करके वहां बुला भेजा था। वह दोनों उड़ते हुए लगभग फौरन ही वहां पहुंच गए थे। आगे की कार्यवाही के लिए भी उन दोनों की वहां मौजूदगी जरूरी थी। आखिर वह दोनों मकतूल जानकी लाल के सबसे करीबी संबंधी थे।

जानकी लाल की ड्राइवर की बीवी भी मौके पर पहुंच चुकी थी। उसने अधजली हालत में होने के बावजूद स्पष्ट तौर पर लाश

की पहचान अपने पति के तौर पर कर दी थी।

जबकि रीनी ने उस कार को अपने पिता की कार के तौर पर साफ पहचान लिया था। कार में मौजूद पेपर्स भी उसे जानकी लाल की कार होने की तस्दीक कर रहे थे। जबकि जानकी लाल की भयावह लाश और विकृत चेहरा रीनी देख नहीं सकी थी और वहीं बेहोश होकर गिर गई थी। मगर संदीप ने खासी नाटकीयता के बाद लाश को अपने ससुर की लाश के तौर पर भी पहचान लिया था और पुलिस के सामने उसकी शिनाख्त कर दी थी।

उसके साथ अजय भी मौजूद था।

उन दोनों के करने के लिए अब वहां कुछ भी नहीं बचा था, क्योंकि उस अवस्था में जानकी लाल तथा ड्राइवर की छिन्न-भिन्न लाश को न तो अजय पहचान सका था न ही खुद मदारी।

लेकिन जो कुछ हुआ, उससे अकेले इंस्पेक्टर मदारी ही नहीं, अजय भी सकते में आ गया था।

तेज-तेज कदमों से चलती प्राची अपनी बॉस के चैम्बर में पहुंची तो उसने उस वक्त उसे काफी असामान्य और हड़बड़ाया हुआ पाया। उसके बॉस के चेहरे पर बदहवासी के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे आंखों में बैचेनी के भाव नुमायां हो रहे थे। उसकी बॉस का नाम नैना चौधरी था, जो कि ड्रीम ड्रेगन नामक एक कंस्ट्रक्शन कंपनी की मालकिन थी। जिसकी गिनती शहर की प्रमुख कंस्ट्रक्शन कंपनियों में होती थी और जो जानकी लाल की ब्लूलाइन कंस्ट्रक्शन की सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी थी।

नैना चौधरी की उम्र पैंतालीस बरस थी, लेकिन इस उम्र में भी उसमें ऐसा कसाव और तीखापन था जो टीनएज लड़कियों को भी मात करता था। वह हमेशा हिंदुस्तानी कल्चर का प्रतीक पारंपरिक परिधान साड़ी पहनती थी और अपने लम्बे बालों को जूड़े की शक्ल में गूंथकर रखती थी। उसमें वह इतनी आकर्षक और सेक्सी लगती थी कि सामने वाला उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था और यह सोचने पर मजबूर हो जाता था कि जब उस समय यह आलम था तो वह हुस्न जवानी में क्या गुल खिलाता होगा।

नैना चौधरी अविवाहित थी और जैसे उसने अविवाहित ही रहने की कोई भीष्म प्रतिज्ञा ली हुई थी। उसके आगे-पीछे भी कोई नहीं था। वह दुनिया में बिल्कुल अकेली थी।

अपनी सेक्रेटरी प्राची को अपने केबिन में आयी देख नैना इस तरह चौंकी, जैसे कि चैम्बर में उसकी सेक्रेटरी नहीं, बल्कि तूफान घुस आया था।

उसकी हालत देखते ही प्राची ठिठक गई थी।

उसकी हालत महसूस करते ही उसकी आंखें सोचने वाले अंदाज में सिकुड़ गई थीं। मुखड़े पर संशय के भाव आ गए।

“आ..आर यू ओके मैडम?” उसने नैना से असमंजस भरे भाव से पूछा।

“य..यस।” नैना ने जल्दी ही खुद को नियंत्रित किया और फिर वह गहरी सांस भरती हुई बोली “यस, आय एम ओके।"

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मगर प्राची को उसकी बात पर यकीन नहीं आया था। “आ..आप कुछ परेशान लग रही हैं मैम?" वह बोली। "ऐसी कोई बात नहीं है। त..तुम जा सकती हो।"

“म...मैं दरअसल आपको कुछ बताने आई थी।” वह पहलू बदलकर व्यग्र भाव से बोली।

“क..क्या? क्या बताने आई हो तुम?"

"इ..इंस्पेक्टर मदारी आया है।” उसने बताया “आपसे फौरन मिलना चाहता है?"

“क्या कहा?" नैना चौंकी थी “इ...इंस्पेक्टर मदारी आया है और वह मुझसे मिलना चाहता है?"

“जी हां। बड़ा अजीब पुलिस वाला है। आपसे मिले बिना नहीं जाने की जैसे कसम खाकर आया है।"
 
“ल...लेकिन मैं इस वक्त किसी से भी मिलना नहीं चाहती।" “मैंने कहा न मेम, वह बिना मिले नहीं जाने वाला। मैं उसे हरगिज भी मना नहीं कर सकती।"

“अ..अगर...।" वह प्राची को घूरकर बोली “अगर मना किया तो वह क्या करेगा? तुम्हें गिरफ्तार कर लेगा।"

“जी नहीं मैम। वह डमरू बजा-बजाकर मुझे बहरा कर देगा।"

“ओह।” उसने एक क्षण सोचा, फिर जैसे उसने आइंदा पेश आने वाले हालात के लिए खुद को तैयार कर लिया था। वह अपने आपको सहज बनाये रखने का भरसक प्रयास करती हुई बोली “ठीक है, उसे आने दो।”

प्राची ने तत्क्षण सहमति में सिर हिलाया, फिर वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई।

दूसरे पल दरवाजा खुलने के साथ डमरू के बजने की आवाज नैना के कानों में पड़ी। फिर इंस्पेक्टर मदारी ने अंदर कदम रखा।

“जय भोलेनाथ की।” उसने आते ही डमरू के सुर-ताल के साथ नैना का अभिवादन किया और गौर से उसके सौम्य मुखड़े को देखता बोला “जी आया नूं।"

“क...क्या आया?" नैना ने चिहुंककर पूछा।

“चैन आया।” उसने स्पष्ट किया “देख नहीं रहीं बाहर कितनी गरमी है आग बरस रही है। मगर यहां कितना ठंडा-ठंडा कूल-कूल है।" वह चुप हुआ, फिर नैना के चेहरे पर अपनी निगाह गड़ाकर बोला “है न मनोरमा जी?"

“म...मेरा नाम मनोरमा नहीं, नैना है।” नैना ने उसे याद दिलाया “नैना चौधरी।"

"मुझे मालूम है चौधराइन जी। लेकिन मैं क्या करूं, मुझे मनोरमा जी ज्यादा अच्छा लगता है। आपको मेरे मनोरमा कहने से कोई ऐतराज है?"

"नहीं है। पर पहले तुम यह डमरू बजाना बंद करो।"

“अच्छा।” उसका चेहरा उतर गया, स्वर मलिन हो गया, जैसे कि नैना ने उसका रिजाइन मांग लिया हो। वह अपने हाथ

को रोकता हुआ बोला “लो, अब आप इतना जोर देकर कह रही हैं तो मैंने बंद कर दिया।"

“य...यहां क्यों आए हो इंस्पेक्टर?" नैना ने उससे पूछा।

“सामने से गुजर रहा था।" वह खुद को दीन-हीन बनाकर बोला “अचानक आपकी याद आ गई तो चरण रज लेने चला आया। मिल जाती मनोरमा जी तो धन्य हो जाता कुत्ते जैसी दुर-दुर करती इस पुलिस की नौकरी से मुक्ति मिल जाती।"

“इंट्रेस्टिंग।” नैना की भवें उठीं। क्या मजाल जो वह तनिक भी प्रभावित हुई हो “मुझे तुम्हारी इस आदत के बारे में मालूम है इंस्पेक्टर। बात को जलेबी की तरह घुमाना तो कोई तुमसे सीखे। बहरहाल, अगर तुमने चरण रज ले ली हो तो जा सकते हो।"

“बस थोड़ी सी कसर रह गई है।"

“जल्दी वह भी पूरी करो।"

"नीचे अभी मैंने दूरबीन लगाकर हर कोने-खुदरे का मुआयना किया, लेकिन वह नजर नहीं आई, जिसकी मुझे तलाश थी।"

“कि..किसकी बात कर रहे हो तुम इंस्पेक्टर किसकी तलाश है तुम्हें ?

“आपकी दुलारी कार की?"

“ओह।” नैना के जेहन में खतरे की घंटी घनघनाने लगी थी। वह संभलकर कुर्सी पर बैठ गई “तो तुम मेरी कार को तलाश करते यहां आए हो।"

"दूरबीन के साथ आया था, मगर सारी मेहनत जाया गई। आपकी कार का यहां पहिया भी नजर नहीं आया।"

"तुम्हें मेरी कौन सी कार की तलाश है?"

"ज..जी?"

“जी क्या? कोई एक कार तो है नहीं मेरे पास लगभग आधा दर्जन कारें हैं। और सबसे बड़ी बात, क्यों तलाश कर रहे हो तुम मेरी कार को दूरबीन लेकर?"

“सब कुछ मेरी जुबान से ही उगलवाएंगी मनोरमा जी अपने दिमाग ए शरीफ को कोई तकल्लुफ नहीं देंगी?"

“मुझे बात को घुमा-फिराकर सुनने की आदत नहीं है इंस्पेक्टर । तुम्हें जो कुछ भी कहना है साफ-साफ कहो।” नैना

का लहजा शुष्क हो गया था।

“वही तो कह रहा हूं, मगर आप समझ ही नहीं रहीं।"

"क्या कहा है तुमने अभी?"

“आपके धुर प्रतिद्वंद्वी श्री-श्री एक हजार आठ सौ पचपन जानकी लाल अब दुनिया में नहीं रहे। इस बार उनके मुकद्दर ने उनका साथ छोड़ दिया और उन्होंने 'खुदा विहार' के लिए मैराथन दौड़ लगा दी।”

“ज...जानकी लाल की मौत की खबर मुझे लग चुकी है।” वह सावधानी से अपने लफ्जों को तौलती हुई बोली। उसे अहसास हो गया था कि झूठ बोलने का अब कोई फायदा नहीं था। वह काइयां इंस्पेक्टर यूं ही वहां तक नहीं आ पहुंचा था। उसके खिलाफ जरूर कोई क्लू पुलिस के हाथ लग गया था, जिसने उस इंस्पेक्टर को वहां तक पहुंचा दिया था।
 
“जहे नसीब मनोरमा जी।" मदारी खुश होकर बोला और उसने वार्निग के बावजूद एक बार फिर डमरू बजाया “आपने कबूल तो किया। कैसे मालूम हुआ यह आपको? टीवी पर देखा या बीबीसी पर सुना?”

“म..मैं...।” वह तनिक व्यग्र हुई थी “उस वक्त खुद वहां मौजूद थी।"

“क...कहां मौजूद थीं आप उस वक्त ? जहां श्री-श्री का देहावसान हुआ था?"

“हां। मैं....मैं उस वक्त वहां यमुना के पुल पर मौजूद थी, ज....जहां जानकी लाल की बीएमडब्ल्यू का एक्सीडेंट हुआ था।"

“अरे क्या कह रही हैं?" मदारी गहन अविश्वास से बोला। नैना के उस कबूलनामे पर उसे जोर का झटका लगा था “अ...आप उस वक्त वहां मौजूद थीं?"

“यही तो बताया है मैंने?”

"मगर आप वहां क्या कर रही थीं?"

“वहीं, जो वहां पर मौजूद हर कोई कर रहा था जानकी लाल भी?”

“अर्थात्...”

“कोर्ट जा रही थी।"

“कौन से कोर्ट जा रही थीं? उधर एक से ज्यादा कोर्ट पड़ते हैं।”

“हाई कोर्ट। वहां मेरी तारीख थी।"

"क्यों? क्या किया था आपने?"

“वह कारोबारी मामला था, जो कि कारोबार में चलता ही रहता है। रास्ते में ही यमुना का पुल पड़ता है जहां कि अचानक ही उस बीएमडब्ल्यू का एक्सीडेंट हो गया।"

“वह एक्सीडेंट नहीं कत्ल है मनोरमा जी। श्री-श्री की कार को जान बूझकर ठोका गया है। और एक नहीं दो-दो कारों ने उसे ठोककर नीचे यमुना में ढकेला है। उसे ठोकने वाली पहली कार एक काली स्कार्पियो थी, जिसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं हो सका, जबकि दूसरी कार...।” वह एक क्षण के लिए ठिठका, उसने एक अर्थपूर्ण निगाह नैना पर डाली फिर बोला “सफेद क्रूज थी, जिसके बारे में सबकुछ मालूम हो गया है। वह निस्संदेह आपकी कार थी, और सूत्र चीख-चीखकर बता रहे हैं कि घटना के वक्त उस कार को आप खुद चला रहीं थीं।"

"ह...हां।” नैना के चेहरे पर व्याकुलता के भाव आ गए थे। वह पहलू बदलकर बोली “मैं कबूल करती हूं कि उस वक्त कार को मैं ही चला रही थी। लेकिन जानकी लाल के एक्सीडेंट में मेरा कोई हाथ नहीं है इंस्पेक्टर।"

“कैसे हाथ नहीं है। आपकी क्रूज ने उसे टक्कर नहीं मारी थी क्या?”

“बीएमडब्ल्यू को स्कार्पियो ने टक्कर मारी थी और वह असंतुलित हो गई थी। यह केवल इत्तेफाक है इंस्पेक्टर कि मैं भी वहां से गुजर रही थी और उस वक्त मेरी कार जानकी लाल की बीएमडब्ल्यू के ठीक पीछे थी।"

+

“ओहो। तो आप फरमा रही हैं कि...यह केवल इत्तेफाक है?"

“ह..हां। यह इत्तेफाक के अलावा और कुछ नहीं है। मैंने भी अपनी कार को इमरजेंसी ब्रेक लगाए थे लेकिन स्कार्पियो से टक्कर के बाद जानकी लाल की बीएमडब्ल्यू पूरी तरह से अपना संतुलन खो बैठी थी और ब्रेकों पर घिसटती हुई, बुरी तरह लहराकर उसने अपनी लेन छोड़ दी थी, केवल इतना ही नहीं वह मेरी लेन के सामने आ गई थी। मैंने उसको बचाने की पूरी-पूरी कोशिश की थी, लेकिन मैं उसे रोक नहीं सकी और मेरी क्रूज ने उसे कट मार दिया था। अगर उस वक्त मेरी जगह तम होते इंस्पेक्टर तो तम भी उसे रोक नहीं पाते। मगर यह सच है कि मैंने जानबूझकर कुछ भी नहीं किया। सब कुछ अपने आप ही हो गया था।"

"हूं।" मदारी ने गहरी सांस ली, फिर कुछ क्षण सोचने के बाद बोला “बहरहाल चाहे जैसे भी हुआ, लेकिन आपके ही कर कमलों से हुआ। स्कार्पियो से टकराने के बाद श्री-श्री के ड्राइवर ने कार को संभाल लिया था और नीचे ढलान पर 'बेलन' बनने से बचा लिया था। लेकिन उसके तुरंत बाद आपकी क्रूज ने जो उम्दा शॉट लगाया, उसने बीएमडब्ल्यू को सड़क से नीचे उतरने पर मजबूर कर दिया, जहां कि आगे गहरी ढलान थी और जो आखिरकार इतने बड़े हादसे का सबब बना।"

"मैं फिर कह रही हूं इंस्पेक्टर कि ...वह सब मैंने जानबूझकर नहीं किया।” वह पुरजोर स्वर में बोली “सब कुछ इतना अप्रत्याशित था कि पल भर के लिए मैं खुद हक्की-बक्की रह गई थी, फिर मुझे खुद नहीं पता कि कब वह सब हो गया। वह तो ढलान पर गिरती बीएमडब्ल्यू को देखकर मुझे होश आया था।"

“और फिर होश आते ही..." मदारी के स्वर में गहरा व्यंग उभरा “आप वहां से गधे की सींग बन गईं?"

“और मैं क्या करती, कोई जानबूझकर अपनी गरदन फंदे में तो नहीं फंसाता है।"

“क्या फायदा हुआ? गरदन बच तो न पाई?"

"मैं खुद इस बात पर हैरान हूं। मैंने तो सोचा था कि मेरी कार को किसी ने नहीं पहचाना था। उसके नम्बर की तरफ किसी की तवज्जो नहीं गई थी। म...मैंने कितना गलत सोचा था?"

“लिहाजा आप बेकसूर हैं? सारा कसूर बीएमडब्ल्यू का ही है मरहूम श्री-श्री का ही है।"

“नहीं। उनका कसूर कैसे हो सकता है। उन्होंने कोई जानबूझकर तो कार को सड़क से नीचे थोड़े ही न उतारा होगा।"

"तो फिर?"

“वह काली स्कार्पियो। उसने जान बूझकर जानकी लाल की कार को टक्कर मारी थी?"

“यह आप कैसे कह सकती है कि काली स्कार्पियो ने जान बूझकर श्री-श्री की कार को टक्कर मारी थी।"

"क्योंकि मैं उस वक्त दोनों कारों के एकदम पीछे ही थी। वह तेज रफ्तार काली स्कार्पियो मेरी क्रूज को ओवरटेक करके आगे निकली थी। उस वक्त उसकी रफ्तार बेहद तूफानी थी। उसका ड्राइवर जैसे खुदकुशी पर आमादा मालूम होता था। उसने मेरी आंख के सामने बीएमडब्ल्यू ठोकी थी।"

“क्या आप दावे के साथ कह सकती हैं कि स्कार्पियो ने जानबूझकर बीएमडब्ल्यू को ठोका था?"

“और क्या? नहीं तो क्या ऐसे भीड़ भरे ट्रैफिक में कोई इस खतरनाक ढंग से ड्राइविंग करता है क्या?"

“यानि कि आप उस वाक्ये की चश्मदीद गवाह हैं। आपने सब कुछ अपनी आंखों से होता देखा है?"

“अ..और क्या?" उसने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया। “बीएम डब्ल्यू के पीछे अकेले आप ही तो नहीं होंगी, आपके आस-पास और भी बहुत सारी दूसरी कारें होंगी। फिर तो वह सब भी उस वाकये के चश्मदीद गवाह होंगे। उन लोगों ने भी वह सब अपनी आंखों से होता देखा होगा मनोरमा जी, जो कि आपने देखा है?"
 
“बिल्कुल देखा होगा।” नैना निःसंकोच बोली।

“मगर मुझे तो एक भी भद्रपुरुष ऐसा नहीं मिला, जिसने वह सब देखा होने का इतना मजबूत दावा किया हो? मजबूत क्या, दावा ही किया हो।"

"इसमें मैं क्या कर सकती हूं। यह तो आपका नकारापन है।"

“जहेनसीब! काफी क्रांतिकारी ख्यालात हैं, पुलिस के बारे में आम आदमी के। खैर.. अब एक बात और बताइए?"

"जरूर।"

“आप सारा इल्जाम काली स्कार्पियो पर थोपना चाहती हैं?"

“चाहती क्या हूं, सारा इल्जाम ही उस पर आना चाहिए।"

“क्या आपने स्कार्पियो का नम्बर नोट किया था?"

“उसमें जब कोई नम्बर ही नहीं था फिर नोट कहां से करती।”

“आपका मतलब है कि स्कार्पियो में कोई नम्बर प्लेट नहीं थी?"

"और क्या? वह एकदम नई थी, जैसे कि सीधी शोरूम से निकल कर आई हो।”

“इसीलिए उसमें नम्बर प्लेट नहीं लगी थी?"

“जी हां। उसकी नम्बर प्लेट वाली जगह पर एक कागज चिपका था। जिस पर कोई नम्बर लिखा था, जो कि मुझे याद नहीं।"

“क्यों याद नहीं?"

"क्योंकि वह नम्बर बहुत छोटे अंकों में लिखा था, जहां पर मेरी केवल एक नजर ही पड़ी थी। जब तक उस पर संदेह जाता, वह तूफान की तरह वहां से जा चुकी थी और दिखाई देना बंद हो गई थी।"

“वह टेम्परेरली रजिस्ट्रेशन नम्बर होता है, जो शोरूम से निकली नई कारों को दिया जाता है। शायद किसी की उस पर तवज्जो गई हो और उसने उस नम्बर को नोट कर लिया हो?"

"ऑफकोर्स। तुम्हें उस आदमी को खोजना चाहिए उसका पता लगाना चाहिए।"

“अगर ऐसा कोई भद्रपुरुष होगा तो खातिरजमा रखिए मनोरमा जी, वह मुझसे छुपा नहीं रह पाएगा। लेकिन आप शायद यह भूल रही हैं कि अगर गुनाहगार स्कार्पियो वाला नहीं है, तो क्या आपको यह बताने की जरूरत है कि फिर गुनाहगार कौन होगा?"

“नहीं।" वह दो टूक बोली “तब तो निश्चित रूप से गुनाहगार केवल मैं ही साबित होने वाली हूं।"

“बजा फरमाया, मनोरमा जी। वैसे देखा जाए तो कितनी अजीब बात है! इस मामले में आपके साथ इत्तेफाक का कितना बड़ा दखल है।”

“क्या मतलब है तुम्हारा इंस्पेक्टर?"

“अपने सबसे करीबी दुश्मन के घातक एक्सीडेंट के वक्त आप उसकी कार के ठीक पीछे मौजूद थीं। यह भी कुछ कम इत्तेफाक नहीं है कि यदि आपकी कार ने ऐसे नाजुक लम्हें में जरा धैर्य से काम लिया होता और अपना वह उम्दा शाट न दिखाया होता तो निश्चित रूप से श्री-श्री की मौत की घड़ी टल जाती। स्कार्पियो वाले भद्रमानव की इतनी खतरनाक ज्यादती के बावजूद श्री-श्री की मौत टल जाती। आपको नहीं लगता?"

“शायद तुम ठीक कह रहे हो इंस्पेक्टर।” नैना ने बड़ी शराफत से स्वीकार किया।

मदारी ने हैरानी से उसे देखा।

"ऐसे मुझे क्या देख रहे हो इंस्पेक्टर।” उसे इस तरह अपनी ओर देखता पाकर नैना ने कहा “यही सच है। बहरहाल, भले ही जानकी लाल से कट्टर प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन जी चाहे तो यकीन कर लो, हम केवल आपस में कम्पटीटर ही थे। अपनी इस सोच को बदलो कि हम एक-दूसरे के दुश्मन थे। उसकी मौत का मुझे सख्त अफसोस है?"

"मुझे भी सख्त अफसोस है।”

नैना के चेहरे पर उलझन के भाव आए। उसने अपलक मदारी को देखा।

"बात को समझिए मन को हरने वाली अर्थात् मनोहरा जी।" उसने स्पष्ट किया “मेरा मतलब केवल इतना ही है कि श्री-श्री की मौत पर अफसोस करने वाले कम जश्न मनाने वाले ज्यादा हैं।”

“म..मैं कुछ समझी नहीं।”

“समझ जाएंगी, बस आगे का खेल जरा समझकर खेलिएगा। क्योंकि इस खेल में अब दिल्ली पुलिस के इस मनहूस इंस्पेक्टर का दखल हो गया है, जो सरकार से हासिल होने वाली तनख्वाह की पाई-पाई हलाल करने में यकीन रखता है।” वह ठिठका, फिर नैना को देखकर एकाएक उसने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये थे और जबरदस्ती दांत निकालता हुआ बोला “बुरा मत मानिएगा मनोरमा जी, अब मैं इजाजत चाहता वह एकाएक खामोश हो गया।

अचानक ही उसका मोबाइल बजने लगा था।
 
“ऊंह।” उसने बुरा सा मुंह बनाया। वह नैना से मानो क्षमा याचना सी करता हुआ बोला। उसने नैना को रिएक्ट करने का मौका फिर भी नहीं दिया था “य...यह कमबख्त पुलिसवालों का मोबाइल भी बड़ा कमबख्त होता है मनोरमा जी। हमेशा गलत वक्त पर बजता है, और जब बजता है तो उठाना ही पड़ता है जैसे कि मैं अभी उठाने वाला हूं।"

नैना कुछ न बोली। वह खामोशी से बस मदारी को घूरती रही। मदारी ने फोन रिसीव किया और मोबाइल कान से लगाकर सहज भाव से बोला “जय भोलेनाथ की।” फिर दूसरी तरफ से जो कुछ बताया गया, उसे सुनकर वह यूं उछला जैसे कि उसे बिच्छू ने डंक चुभो दिया हो।

चेहरे पर कई रंग आए और चले गए।

नैना ध्यानपूर्वक उसके चेहरे को देख रही थी।

“क..क्या हुआ इंस्पेक्टर?" मदारी ने फिर जैसे ही मोबाइल कान से हटाया वह पूछे बिना न रह सकी थी। उसके चेहरे पर स्वाभाविक कौतूहल उभर आया था।

"वही मनोरमा जी, जो नहीं होना चाहिए था।" मदारी बेहद आंदोलित भाव से बोला।

“क...क्या? क्या नहीं होना चाहिए था?"

"कल्ल ।"

“व..व्हाट?" नैना चौंक पड़ी थी “कल? अब किसका कत्ल हो गया?"

“बताने का वक्त नहीं है। फिलहाल मुझे जाना होगा। जय भोलेनाथ की।"

मदारी फिर एक पल के लिए भी वहां नहीं रुका था।

वह पलटकर तेजी से बाहर निकल गया। चैम्बर के ठीक बाहर नैना की सेक्रेटरी का काउंटर था, जहां प्राची पूरी मुस्तैदी से मौजूद थी।

उसने मदारी को तेजी से बाहर जाते देखा था और उसके असामान्य हाव-भावों को भी महसूस कर लिया था। उससे पहले जितनी देर मदारी अंदर नैना के केबिन में रहा था, प्राची बेहद बेचैन रही थी और अंदर क्या चल रहा था, भांपने का प्रयास करती रही थी। लेकिन नैना का चैम्बर साउंडप्रूफ था इसलिए वह अपने उस कुप्रयास में कामयाब नहीं हो सकी थी।

फिर जैसे ही मदारी बाहर निकला, वह चौकन्नी हो गई थी। कुछ क्षणों तक वह बड़े धैर्य से इंतजार करती रही थी। फिर जैसे ही मदारी आंखों से ओझल हुआ, उसने फौरन अपना मोबाइल निकाल लिया, फिर फुर्ती से एक सावधान निगाह अपनी बॉस के बंद केबिन पर डाली और मैसेज पंच करने लगी।

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संजना को देखते ही सहगल अपने ऊपर से नियंत्रण खो बैठा। उसने इस तरह झपट्टा मारकर उसे अपनी बांहों से दबोचा कि क्या बाज अपने शिकार को दबोचता होगा। उसकी इस प्रत्याशित हरकत पर संजना बुरी तरह बौखला गई और उसके हलक से घुटी-घुटी सी चीख निकल गई। मगर उसकी परवाह किए बिना सहगल ने संजना के गुदाज बदन को अपनी बांहों में उठा लिया और उसे ले जाकर बिस्तर पर पटक दिया।

"ऊई मां।" संजना के होठों से फिर चीख निकल गई “क्या करते हो?"

“अभी कहां कुछ किया है मेरी जान।” सहगल लिबास के ऊपर से उसके बदन पर हाथ फिराता शरारत से बोला “ वह तो आगे करूंगा।"

"छ...छोड़ो मुझे।" संजना तड़पकर बोली “पहले मेरी बात सुनो।”

“अभी सुनने का वक्त नहीं आया है। थोड़ी देर के बाद सुनूंगा।”

“इ...इतना बेसब्र क्यों हो रहे हो बॉस। मैं क्या कहीं भागी जा रही हूं।” संजना प्रतिरोध भरे स्वर में बोली। “भागोगी तो तब जबकि मैं तुम्हें भागने दूंगा।"

"अरे कम से कम वह तो जान लो कि जिस काम के लिए मैं गई थी, उसका क्या हुआ?"

“उसमें भला क्या पूछना?" सहगल तनिक ठिठक गया था और संजना के गदराये जिस्म के हर उभार तथा हर कटाव को वह भूखी तथा ललचाई नजरों से टटोलने लगा था “तुमने पहले भी कभी मुझे निराश किया है जो आज करोगी। मुझे सौ फीसदी यकीन है मेरा काम एकदम चौकस हुआ होगा।"

“यह तो है। म...मैं बकाया रकम उसे खुद अपने हाथों से देकर आई हूं।”

"देखा।” वह विजेता के से अंदाज से बोला “मैंने कहा था न कि काम एकदम चौकस हुआ होगा। कुछ कह तो नहीं रहा

था वह बदबख्त?"

“वही तो मैं तुम्हें बताना चाहती थी।"

"क...क्या?"

"मैंने रुपयों का सूटकेस देकर तुम्हारी तरफ से उसे शुक्रिया भी बोला था।"

“शु...शुक्रिया?"

“हां। आखिर उसने तुम्हारा काम इतना चौकस जो किया है तुम्हारे सबसे बड़े दुश्मन जानकी लाल को पलक झपकते ठिकाने लगा दिया और तुम्हारा बदला पूरा हो गया।"

“हां।” उसे जैसे याद आया था। उसने स्वीकार किया “यह तो है। शुक्रिया बोलने लायक काम तो उसने सचमुच किया है। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। मुझे पूरा यकीन था कि वह मुझे जरा भी निराश नहीं करेगा।"

“यह यकीन तुम्हें आखिर क्यों था। क्या तुम पहले भी उससे कोई काम करवा चुके हो? मेरा मतलब किसी की सुपारी लगवा चुके हो?"

“वह पन्द्रह साल से जेल में था और जेल से वह भला किसकी सुपारी लगा सकता था मेरी बन्नो।"

"तो फिर?"

“विश्वास हासिल करने के और भी बहुत से तरीके हो सकते हैं। तुम नहीं समझोगी गुले गुलजार।"

“जरूरत भी क्या है मुझे समझने की।" संजना ने मुंह बिसूरा “वैसे तुम खुद उसके पास क्यों नहीं गए? पहले एडवांस तुमने मेरे ही हाथों उसे पहुंचाया भी था।"

“जो बॉस होता है, वह केवल हुक्म देता है, खुद कुछ नहीं करता।" "क्या कहने? मैं बेईमान हो जाती और सारा पैसा लेकर भाग जाती तो?"

“कौन क्या कर सकता है और क्या नहीं, इसका मुझे बहुत पुराना तजुर्बा है।"

"फिर भी...?”

“जाने दो न हनी। तुम्हें उसके पास भेजने की एक और भी वजह थी।"

"क..क्या ?"

"मैं चाहता था कि वह तुम पर लटू हो जाए।"

"म..मुझ पर लटू हो जाए।" वह तनिक चौंकी थी और उलझकर बोली “मगर तुम उसे मुझ पर लटू कराना क्यों चाहते हो?"

“ताकि तुम उसे शीशे में उतार सको।”

“उ...उस किलर को उस हत्यारे को?"

"क्यों भई! वह हत्यारा भी तो आखिरकार एक मर्द है, जिन्हें साबुत हज्म कर जाने का तुम्हें अच्छा तर्जुबा है।"

"लेकिन तुम यह सब क्यों चाहते हो?"

"है कोई वजह?"

“मुझे वह वजह नहीं बताओगे?"

“नहीं! क्योंकि अभी मेरा काम खत्म नहीं हुआ है।"

"म...मतलब?"

|

“जानकी लाल सेठ का कत्ल तो केवल आरंभ है। अभी मेरे खून की प्यास बुझी नहीं है। अभी और लाशें गिरने वाली हैं।"

"व्हाट?" वह चिहुंककर उसे देखने लगी थी “अब और किसकी लाश गिरने वाली है?"

“इतनी जल्दी भी क्या है। मालूम हो जाएगा।"

"लेकिन..."

“घबराओ मत जाने तमन्ना। जहन्नुम रसीद होने वालों की उस लिस्ट में तुम्हारा नाम शामिल नहीं है। तुम तो पूरे सौ साल जीने वाली हो।"

“म...मगर जानकी लाल के बाद अब और कौन है जो तुम्हारा दुश्मन है?"

"मैंने कहा न मालूम हो जाएगा।"

“बॉस!” संजना ने अपलक उसे देखा। उसकी आंखों में संदेह के कीड़े गिजबिजाने लगे थे “तुम आखिर खेल क्या खेल रहे हो?"

"बहुत ही दिलचस्प खेल है जाने तमन्ना, तुम जरा भी बोर नहीं होगी?"

"बात अगर केवल कत्ल की है तो वह तुम सुपारी देकर उस किलर से करा सकते हो उसके लिए उसे शीशे में उतारने की भला क्या जरूरत है मुझे मोहरा बनाने की क्या जरूरत है?"

"ताकि वह किलर मेरा खेल समझने न पाए।"

“अगर वह समझ गया तो क्या होगा?"

"अनर्थ हो जाएगा।"

“ओह। लगता है सुपारी देकर सीधे रास्ते से कत्ल करवाने से वह समझ जाएगा कि तुम क्या खेल खेल रहे हो?"

"यकीनन!”

“जबकि अगर मैंने उसे शीशे में उतारकर अपनी जुल्फों में उलझाकर यह काम कराया तो वह नहीं समझ पाएगा?"

"हरगिज भी नहीं।"

"इतना यकीन है तुम्हें।”

“ऑफकोर्स स्वीटी।"

“लगता है उसे काफी करीब से जानते हो?"

"बहुत ज्यादा।"

"इतना ज्यादा तो कोई किसी को तभी जान सकता है जबकि उससे कोई पुराना नाता हो?"

“ ऐसा ही समझ लो?"

“यानी कि मुझे उसके सामने भी कपड़े उतारने होंगे अपने आशिकों की लिस्ट में एक नाम का इजाफा और करना होगा?"
 
“क्या फर्क पड़ता है! वह बहुत शानदार आदमी है। तुम्हें मायूस नहीं करेगा।"

"बड़े दावे से कह रहे हो।"

“आजमाकर देख लेना।"

“उसमें तो बस जरा सी ही कसर रह गई थी।"

“आजमाकर देखने में?"

"ह..हां।"

"मैं कुछ समझा नहीं?"

“वहीं तो मैं तुम्हें समझाना चाहती थी। लेकिन तुम समझने के मूड में ही कहां थे?"



अब हूं। फौरन समझा डालो।"

“मेरे हाथ से रुपयों वाला सूटकेस लेकर उसने दूसरे हाथ से मुझे वापस कर दिया था।"

"क्यों भला?”

"मर मिटा था मुझ पर फिदा हो गया था। एक बार तो मैं डर ही गयी थी कि कहीं मुझे दबोचकर नीचे न गिरा दे, जैसे इस वक्त तुमने गिरा रखा है।"

“नामुमकिन"

"क्या ?"

“वह औरत से जबरदस्ती करने में विश्वास नहीं रखता। वह औरत को राजी करके ही उसके साथ हमबिस्तर होता है। जहां तक मुमकिन होता है वह बलात्कार से बचता है।"

"बहुत खूब। कितना ज्यादा जानते हो तुम उसके बारे में, लेकिन जितना भी जानते हो, सही जानते हो। उसने सचमुच मेरे साथ जबरदस्ती की कोशिश नहीं की थी, जबकि वहां इसका मौका था। अगर वह चाहता तो मेरे साथ सरासर जबरदस्ती कर सकता था, मगर उसने ऐसा नहीं किया। उसने केवल मुझे प्रपोज किया मुझे राजी करने का प्रयास किया।"

“तुम्हें वह रुपयों से भरा सूटकेस वापस लौटाकर?”

“हां।” कहने लगा “उसकी तरफ से मेरा यह एक छोटा सा तोहफा था, जो कि अगर मैं कबूल कर लेती तो उसे बहुत खुशी होती।"

“तुमने वह तोहफा कबूल नहीं किया?"

“नहीं। मेरे तो कुछ समझ में नहीं आया था। वह मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था। उस सूटकेस में दस लाख रुपये थे।"

"तब तो तुमने अपना बहुत बड़ा नुकसान किया?"

“यह तो है।"

“अब तो तुम्हें उसका अफसोस हो रहा होगा? आखिर दस लाख कोई मामूली रकम नहीं होती। और बदले में बदले में उसे ऐसा क्या चाहिए था जो तुम पहले ही जी भरके नहीं लुटा चुकी। नो?”

“तुम मेरी इंसल्ट कर रहे हो बॉस।" “फौरन जाकर उसका तोहफा कबूल करो।" “मैं कर लूंगी। उसने मुझे वक्त दे रखा है, मगर...।"

“मगर क्या?"

“वह बहुत खतरनाक आदमी है। उम्र कैद की सजा काटकर अभी बाहर आया है और आते ही फिर एक कत्ल कर चुका है। उससे और कत्ल कराने का इरादा बनाए बैठे हो। म...मैं किसी मुसीबत में न फंस जाऊं?"

“पहली बात तो यह डार्लिंग कि गुनाहगार तुम नहीं, वह है। दूसरी बात, फिर मैं कब काम आऊंगा।"

“ओहो।"

“अब तुम चुप करो और मुझे जश्न मनाने दो।"

"ज...जश्न?"

“मेरा मतलब, मुझे मेरी कामयाबी का जश्न मनाने दो।" उसका संजना पर थोड़ी देर के लिए शिकंजा फिर से कस गया, जो कि थोड़ी देर के लिए ढीला हो गया था।

इस बार शिकंजा ऐसा कसा कि संजना को अपनी हड्डियां चटकती महसूस हुईं।

उसके हलक से फिर घुटी-घुटी सी चीख निकल गई। उसने सहगल का प्रतिरोध करने की कोशिश की, लेकिन वह कामयाब न हो सकी।
 

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