• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller कागज की किश्ती

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
मोनिका घर से मछली खरीदने की नीयत से निकली थी लेकिन मछली खरीदने की जगह वह जाकर समुद्र के किनारे बैठ गयी।

अष्टेकर के आगमन ने उसे बहुत आन्दोलित कर दिया था।

उसने मिकी की तरफ देखा जो कि आते ही रेत में खेलने लग गया था।

वाकई एकदम अपने बाप का डुप्लीकेट लगता था।

उसके जेहन पर तीन साल पहले की उस रात का अक्स उभरा जब वह पहली बार मिकी के बाप से — विलियम से — क्रिसमस बाल में मिली थी। उस क्रिसमस बाल में धारावी का लगभग सारा क्रिश्‍चियन समुदाय उपस्थित था। बच्चे, बूढ़े, नौजवान, सब। खूब रौनक थी। विलियम अपने दोस्त एंथोनी फ्रांकोजा के साथ था। दोनों खूब पी रहे थे लेकिन विलियम को ज्यादा चढ़ गयी थी। फिर वह नशे में मोनिका के पीछे पड़ गया था, मोनिका पहले उससे रुखाई से पेश आयी थी, फिर उसने उसे डांटा था, थोड़ा-बहुत इंसल्ट भी किया था लेकिन विलियम हतोत्साहित नहीं हुआ था। वहां दर्जनों और विलियम जैसे लड़कों को फौरन हामी भरने वाली लड़कियां मौजूद थीं लेकिन विलियम ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। खुद उसके पीछे विलियम के दोस्त एंथोनी समेत कई लड़के पड़ रहे थे लेकिन उसने किसी को लिफ्ट नहीं दी थी।

फिर आधी रात के करीब एकाएक विलियम उसके सामने आ खड़ा हुआ और नशे में झूमता बोला — “चलो यहां से।”

“कहां?” — मोनिका हड़बड़ाई।

“कहीं भी। यहां से चलो।”

“तुम्हारे साथ?”

“हां।”

“मैं नहीं जाती।”

“तुम नहीं जाओगी तो मैं चला जाऊंगा।”

“अरे जाओ, न जाओ। मेरी बला से।”

“ठीक है। जाता हूं।”

उसने हाथ में थमा विस्की का गिलास जोर से फर्श पर पटका और फर्श को लगभग रौंदता हुआ वहां से विदा हो गया।

वह अविचलित भाव से उसे जाता देखती रही।

थोड़ी देर बाद एंथोनी फ्रांकोजा उसके करीब पहुंचा।

“क्या कह दिया था तुमने मेरे यार को?” — उसने पूछा।

“मैंने तो कुछ भी नहीं कहा था।” — वह बोली।

“चर्च की छत पर जो विशाल क्रॉस लगा हुआ है न, वह उस पर चढ़ कर बैठ गया है। कहता है तभी उतरेगा जब तुम उतरने को कहोगी।”

“क्या!”

“हां। यकीन नहीं तो बाहर चल कर देख लो।”

वह एंथोनी के साथ बाहर आयी।

विलियम इतनी खतरनाक हालत में क्रॉस पर चढ़ा बैठा था कि उसका कलेजा मुंह को आने लगा। क्रॉस टूट सकता था, नशे में होने की वजह से खुद उसकी पकड़ क्रॉस से छूट सकता था और वह सीधा साठ फुट नीचे सड़क पर आकर गिर सकता था।

“नाम क्या है तुम्हारे यार का?” — मोनिका ने पूछा।

“विलियम।” — एंथोनी ने बताया — “विलियम फ्रांसिस।”

“विलियम!” — वह चिल्लाकर बोली — “नीचे उतरो।”

“पहले वादा करो” — बड़ी खतरनाक हालत में क्रॉस के साथ झूलता विलियम बोला — “तुम मेरे साथ चलोगी।”

“अच्छा बाबा, चलूंगी।”

“वादा करो।”

“किया, बाबा।”

“से क्रॉस माई हार्ट एण्ड होप टु डाई।”

“क्रॉस माई हार्ट एण्ड होप टू डाई।”

“मेरा यार टोनी तुम्हारे वादे का गवाह है। ठीक?”

“ठीक।”

तब कहीं जाकर विलियम नीचे उतरा।

उस रोज सारी रात वह विलियम के साथ, उसकी दीवानगी के साथ, मुम्बई की सड़कों पर घूमती रही थी।

सुबह छः बजे वह उसे उसके घर छोड़ने आया था तो तब पहली बार विलियम ने उसका बदन छुआ था, तब उसने उसको अपनी बांहों में लेकर उसके होंठों पर एक चुम्बन जड़ दिया था।

“बस!” — वह बोली — “एक किस हासिल करने की खातिर इतना ड्रामा किया?”

“नहीं।” — वह गम्भीरता से बोला।

“तो?”

“किस वाली को हासिल करने की खातिर।”

“मतलब!”

“मैं आज ही तुमसे शादी कर रहा हूं।”

“क-क्या?”

“मैं ग्यारह बजे आऊंगा। तुम्हें चर्च ले जाने कि लिए। तैयार रहना। ब्राइड्स मेड बनने के लिए अपनी किसी सहेली को बुलाकर रखना। मेरा बैस्टमैन तो टोनी है ही!”

“लेकिन... लेकिन...”

वह चला गया।

मोनिका ने उसे नशे का प्रलाप समझा लेकिन ग्यारह बजे वह दुल्हे की सजधज में एंथोनी के साथ सचमुच आ धमका।

वह तैयार नहीं थी। तैयार होने का कोई मतलब ही नहीं था।

शादी फिर भी उसी रोज हुई। विलियम की जिद उस पर इस कद्र हावी हुई कि इंकार करना अपना भेजा खपाना था।

उसी रात को वह उसे हनीमून के लिए गोवा ले गया।

हनीमून से जब वह वापिस लौटी तो मिकी उसके पेट में था।

तब तक उसे यह मालूम हो चुका था कि उसका यूं आनन-फानन बना पति वास्तव में एक गैंगस्टर था।

लेकिन विलियम ने उससे वादा किया कि वह एक बड़ा हाथ मारेगा और फिर वह न सिर्फ अपना वो नामुराद धन्धा बल्कि वो शहर भी छोड़ देगा और अपनी खूबसूरत बीवी और होने वाले बच्चे के साथ कहीं और जाकर रहेगा।

अगले साल सितम्बर में मिकी पैदा हुआ।

मिकी के दूसरे जन्म दिन वाले दिन विलियम का कत्ल हो गया।

उस दौरान उसका जिगरी दोस्त एंथोनी जेल में था और ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी पर आक्रमण करने की सजा काट रहा था। विलियम ने उसे हमेशा समझाया था कि अगर कभी उसे कुछ हो जाए तो संकट की घड़ी में वह सिर्फ टोनी के पास जाए। लेकिन संकट की घड़ी जब सचमुच आई तो टोनी जेल में था।

अपने पति के कहे मुताबिक वह जेल में ही टोनी से मिलने गयी।

जेल में से ही टोनी ने ऐसा इन्तजाम किया कि वह उसके जेल से छूटने तक अपने बच्चे के साथ पूरी सुख-सुविधा से उसके फ्लैट में रह सके।

और दो महीने बाद वह जेल से छूटा तो मोनिका ने वहां से चले जाना चाहा लेकिन उसने मोनिका को अपने दिवंगत दोस्त का वास्ता देकर रोके रखा।

आज की तारीख में उसके टोनी के साथ जो ताल्लुकात थे, उस घड़ी तो उसने उनकी कल्पना भी नहीं की थी।

उसके मुंह से एक आह सी निकली।

फिर उसका ध्यान अष्टेकर की तरफ गया।

कैसा आदमी था? मिकी को कितनी अनुरागभरी निगाहों से देखता था। विलियम के कातिल को गिरफ्तार करने के लिए कितनी मेहनत कर रहा था बेचारा। दिन-रात एक किए दे रहा था एक ही केस पर। इन बातों की वजह से मोनिका को अष्टेकर अच्छा लगता था लेकिन पुलिसिया होने की वजह से नफरत के काबिल लगता था। टोनी ने हमेशा उसे यही कहा था कि अष्टेकर का भरोसा करना और सांप का भरोसा करना एक ही बात थी। ऐरे-गैरे की तो बात ही क्या थी, अपनी मुलाजमत में, अपनी लाइन आफ ड्यूटी वह अपने सगे बाप को बख्शने वाला नहीं था।

उसका ध्यान एंथोनी की तरफ गया।

कैसा आदमी था वो!

वह उसके पति का दोस्त था लेकिन अपने दोस्त की बीवी का पति और उसके बच्चे का बाप बनना चाहता था। क्या उसने कभी सोचा था कि जैसे आनन-फानन वह एक बार विधवा हुई थी, वैसे वह दोबारा भी विधवा हो सकती थी? विलियम अपराध की दुनिया को छोड़ने का ख्वाहिशमन्द था लेकिन टोनी का तो अपराध की दुनिया से रिश्‍ता मांस और नाखून का था। क्या वह उसको अपराध की दुनिया छोड़ने के लिए प्रेरित कर सकती थी? शायद नहीं। शायद उसकी किस्मत में पति का सुख लिखा ही नहीं था। क्या होगा उसका! क्या होगा मिकी का! विलियम की निशानी का!

“ममा चलो।”

उसने चौंक कर सिर उठाया।

मिकी उसका कन्धा हिला रहा था और अपलक उसे देख रहा था।

ऐन यूं ही विलियम उसकी तरफ देखा करता था।

उसने फिर एक आह भरी और उठ खड़ी हुई।
 
गुलफाम अली थाने में इन्स्पेक्टर अष्टेकर के हुजूर में पेश हुआ।

अष्टेकर ने एक सरसरी निगाह अपनी मेज के सामने खड़े गुलफाम अली के सिर से पांव तक डाली।

“इधर कोई कुसी-वुर्सी” — वह बोला — “गिराहक के बैठने के वास्ते नहीं रखता, बाप?”

“ये दुकान है?” — अष्टेकर आंखें निकालता बोला।

“अरे! अपुन तो साला थाने में आयेला है। बाप, बाटली ज्यादा मारने पर यही पंगा होता है कि मालूम नहीं पड़ता कि किधर पहुंच गयेला है।”

“बकवास बन्द।”

“बरोबर, बाप।”

“नागप्पा को क्यों मारा? उसके हाथ-पांव क्यों तोड़े?”

“कौन नागप्पा?”

“तू नागप्पा को नहीं जानता?”

“एक नागप्पा को अपुन जानता तो है पण अपुन को ये कोई नईं बताया कि उसका हाथ-पांव टूटेला है।”

“तू कौन से नागप्पा को जानता है?”

“रामचन्द्र नागप्पा को।”

“मैं भी उसी की बात कर रहा हूं।”

“क्या बात?”

“वो मिशन अस्पताल में पड़ा है।”

“च च च। बेचारा।”

“तूने क्यों मारा उसे?”

“कौन कहता है अपुन ने मारा। नागप्पा हमेरा नाम लियेला है?”

“अभी नहीं। अभी वो बेहोश है। लेकिन होश में आयेगा तो लेगा। लेगा अपने हमलावर का नाम।”

“कोई और बोलता है अपुन नागप्पा पर हाथ उठायेला है?”

“नहीं, लेकिन...”

“बाप, जब अपुन के खिलाफ कोई गवाह नेईं, जब मार खाने वाला अपुन का नाम नेई ले रहा तो तुम काहे वास्ते खाली पीली अपुन को हलकान कर रयेला है?”

“वो पास्कल के बार के करीब पड़ा पाया गया था। जैसी चोटें उसको लगी हैं, उनसे लगता है कि वह सीढ़ियों से नीचे धकेला गया था। मुझे मालूम हुआ है कि वो पास्कल के बार के ऊपरले माले पर पत्ते पीटने अक्सर जाता था, तू भी वहां तकरीबन हमेशा होता है...”

“अपुन की तरह और भी दर्जनों लोग उधर तकरीबन हमेशा होता है।”

“तो किसी का नाम ले। मैं उससे भी पूछताछ करता हूं।”

“बाप, तुम्हेरे को मालूम अपुन यूं खाली पीली किसी का नाम लेने वाला भीड़ू नेई।”

“कहीं तूने उस पर इसलिए तो हाथ नहीं उठाया था क्योंकि वो जानता था कि विलियम के कत्ल से तेरा कोई रिश्‍ता था?”

“ये विलियम बीच में किदर से आ गया, बाप?”

“नागप्पा बेहोशी में ‘विलियम विलियम’ और ‘जानता हूं जानता’ हूं भज रहा था।”

गुलफाम के नेत्र सिकुड़े।

“ऐसा?” — वो धीरे से बोला।

“अगर तू विलियम के कातिल के बारे में कुछ जानता है तो साफ-साफ बोल।”

“अपुन क्या जानता है?”

“स्साले! सवाल मैंने पूछा है।”

“अपुन कुछ नहीं जानता।”

“और नागप्पा की दुरगत तूने नहीं की?”

“नक्को।”

“न तुझे मालूम है उसे किसने मारा?”

गुलफाम ने इंकार में सिर हिलाया।

“मूंडी मत हिला। जुबान से बोल।”

“अपुन को कुछ नेई मालूम।”

“ठीक है। मैं नागप्पा के होश में आने तक इन्तजार करता हूं। लेकिन गुलफाम अली, इस बार मैंने तेरी दादागिरी न निकाली तो कहना। इस बार मैंने तुझे लम्बा न नपवाया तो कहना।”

“बाप, अपुन को दादा कौन बोला! अपुन तो भाड़े का टैक्सी चलाने वाला गरीब भीड़ू है जो...”

“दफा हो जा।”

जिस वक्त गुलफाम अली थाने से बाहर निकला, उस वक्त उसके जेहन में हथौड़े की तरह एक ही लफ्ज बज रहा था — नागप्पा!

खंडाला में एंथोनी के मां-बाप अंग्रेजों के जमाने की एक किराये की कोठी में रहते थे जहां कि शाम की पार्टी की तैयारियां जोरों से चल रही थीं।

उसके मां-बाप ने उसका पुरजोर स्वागत किया।

क्यों न करते! उसका आगमन हमेशा घर में और दौलत आने की गारन्टी होता था।

उन्हें टोनी पर गर्व था।

क्यों न होता! आखिर टोनी ही तो था जिसने उन्हें धारावी के झोंपड़-पट्टे से उठाकर खंडाला पहुंचाया था और यूं इज्जत और ठाट-बाट के साथ रहने के काबिल बनाया था।

जीसस ऐसा बेटा सबको दे — उसकी मां अक्सर कहा करती थी।

उनके प्रेजेन्ट उन्हें पेश किए।

मां के लिए डायमंड नैकलेस!

बाप के लिए हीरे की अंगूठी और हीरे का टाई पिन।

बाप को उसने एक लिफाफा भी थमाया जिसको खोले बिना बाप को मालूम था कि उसमें सौ-सौ के नोट थे।

मां-बाप ने कृतज्ञ भाव से अपने श्रवण पुत्र की तरफ देखा।

“ये सब मामूली है।” — टोनी बोला — “आपकी शादी की वर्षगांठ का असली गिफ्ट आपको चन्द दिनों में मिलेगा। क्रिसमस से पहले?”

“क्या?” — बाप आशापूर्ण स्वर में बोला।

“बंगला।”

“बंगला!”

“किराये का नहीं। आपका अपना।”

“यहीं? खण्डाला में?”

“हां। बंगला तैयार है। सिर्फ फर्निशिंग बाकी है जोकि चन्द दिनों में हो जायेगी।”

“बेटा!” — मां बोली — “तूने हमें बताया नहीं?”

“मैं आप लोगों को सरपराइज देना चाहता था।”

“ओह!” — मां पुलकित मन से बोली।

“ओह!” — पिता बाग-बाग होता बोला।

कुछ क्षण खामोशी रही।

“क्या बात है” — फिर उसकी मां चिन्तित भाव से बोली — “तू दुबला हो गया है।”

“नहीं, मां, तुझे वहम है” — वह बोला — “मैं तो बल्कि पहले से मोटा हो गया हूं।”

मन ही मन वह सोच रहा था कि जो आदमी अभी तीन हफ्ते पहले छः महीने की जेल की सजा काटकर आया हो, वो दुबला नहीं होगा तो क्या पहलवान होगा।

“बल्कि तू दुबली हो गई है, मां!” — प्रत्यक्षतः वह बोला।

“टोनी” — तभी उसके बाप ने घर में मौजूद एक मेहमान से उसका परिचय कराया — “ये कर्नल दानी साहब हैं।”

एंथोनी ने बड़े अदब से कर्नल से हाथ मिलाया।

“ये पूछ रहे थे कि तेरी लाइन आफ बिजनेस क्या है?”

“आपने क्या बताया?” — एंथोनी सशंक भाव से बोला।

“वही जो तूने बताया। तू किसी गौरमेंट के सीक्रेट डिपार्टमेंट में है जिसके बारे में किसी को बताने की मनाही है।”

“आपने ठीक बताया।”

“मैं तो मिलिट्री मैन हूं” — कर्नल बोला — “मुझे सीक्रेट रखना आता है।”

“कर्नल साहब,” — एंथोनी बोला — “वो क्या है कि...”

“अरे, कोई हिन्ट तो दो!” — कर्नल जिदभरे स्वर में बोला।

“मैं सरकार के उस खुफिया विभाग में हूं जो कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों की सिक्योरिटी चैक करता है।”

“ओह! आई सी। आई सी।”

कर्नल की सूरत से तो नहीं लगा कि बात उसकी समझ में आयी थी बहरहाल एंथोनी को यह देखकर बड़ी राहत महसूस हुई है कि उसने उस बाबत आगे कोई सवाल न किया।

“आइये” — फिर एंथोनी विषय परिवर्तित करने की नीयत से बोला — “एक-एक ड्रिंक हो जाए।”

कर्नल दानी खुशी-खुशी उसके साथ हो लिया।

पेड़ों के झुरमुट के नीचे समुद्र के किनारे की रेत में लल्लू खुर्शीद के ऊपर लेटा हुआ था। दोनों के कपड़े अस्त-व्यस्त थे। लल्लू के विशाल शरीर के नीचे खुर्शीद गायब सी हो गई मालूम होती थी। लल्लू का पूरा भार उसके ऊपर था लेकिन वह उसे फूल जैसा हल्का लग रहा था।

वह उसकी जिस्मफरोश, गुनाहभरी जिन्दगी का एक नया तजुर्बा था।

लल्लू ने कसकर उसके कपोल पर एक चुम्बन अंकित किया।

“तेरे लिए, किचू, तेरे लिए।” — खुर्शीद उसके कान में फुसफुसाई — “पैसे के लिए नहीं। धन्धे के लिए नहीं। तेरे लिए। मेरा विश्‍वास करना।”

“मुझे पूरा विश्‍वास है।”

“तेरे लिये।”

“और मैं तेरे लिये। इस वक्त मैं राजा हूं। तू मेरी रानी है। यह जूहू बीच हमारी बादशाहत है।”

“भेजा फिरेला है साले किचू का।”

फिर उसने आंखें बन्द कर लीं और बड़े अनुराग से और कसकर लल्लू के साथ लिपट गयी।

हवलदार पाण्डुरंग को अष्टेकर खुद अपने साथ मिशन हस्पताल लेकर गया और रामचन्द्र नागप्पा वाले कमरे के सामने बैठा कर आया।

“इधर से हिलना, नहीं, पाण्डुरंग!” — अष्टेकर सख्त स्वर में बोला — “धार मारने भी नहीं जाना। धार मारनी है तो अभी मार कर आ।”

“नहीं, साहब” — पाण्डुरंग बोला — “जरूरत नहीं।”

“किसी भी अनजाने आदमी को भीतर नहीं जाने देने का है। हस्पताल के स्टाफ की भी शिनाख्त करके भीतर जाने देने का है। कोई कितना भी जोर मारे, अपने आपको नागप्पा का सगा बाप भी बताये तो उसे भीतर नहीं जाने देना का है।”

“बरोबर।”

“नागप्पा को होश आ जाये, वह बात करने के काबिल हो जाये तो फौरन मुझे फोन बजाना है। मैंने कहा फौरन,अगली सुबह नहीं। रात के चाहे कितने बजे हों, फोन बजाना है। समझ गया?”

“जी, साहब। बराबर समझ गया।”

“कोई कोताही हुई तो सस्पैंशन।”

“कोई कोताही नहीं होगी।”

“शोभा” — शान्ता तनिक उत्तेजित स्वर में बोली — “मैं कहती हूं टोनी का खुफिया अड्डा पास्कल के बार में ही है।”

“पागल हुई है!” — शोभा बोली — “वो तो कहीं दूर दराज जगह पर है। कार पर वहां पहुंचने में कम-से-कम बीस-पच्चीस मिनट लगते हैं।”

“टोनी खामखाह, हमें धोखा देने के लिए, मुम्बई की सड़कों पर इधर-उधर गाड़ी भगाता रहता है और फिर उसे वापिस पास्कल के बार वाली इमारत के पिछवाड़े में ले आता है।”

“तुझे कैसे मालूम? तू क्या नकाब में से झांक लेती है?”

“नहीं। इतनी हिम्मत तो मेरी कभी नहीं हुई। टोनी तो मुझे नकाब को हाथ भी लगाता देखता तो मेरी गरदन मरोड़ देता।”

“तो फिर?”

“मैंने मोड़ गिने हैं और हर मोड़ के वक्फे का हिसाब रखा है। ये दोनों काम आंखें बन्द होने पर भी हो सकते हैं। गाड़ी मोड़ काटे तो क्या पता नहीं लगता?”

“लगता है।”

“उसने दायां मोड़ काटा या बायां या यू टर्न दिया, क्या यह पता नहीं लगता?”

“लगता है।”

“कितनी देर बाद कोई मोड़ काटा, क्या गिनती गिन कर इसका हिसाब नहीं रखा जा सकता?”

“रखा जा सकता है।”

“तो फिर? अरी मूर्ख, इस हिसाब का जो नतीजा निकलता है वो यह है कि वह टोनी का बच्चा हमें पास्कल के बार से कार पर बिठाता है, थोड़ी देर मुम्बई की सड़कों पर इधर-उधर कार दौड़ाता है और वापिस हमें वही ले आता है जहां से कि वो चला होता है।”

“कमाल है!” — शोभा मन्त्रमुग्ध सी बोली। वह एक क्षण खामोश रही और फिर बोली — “लेकिन पास्कल के बार में वैसी कोई सजी-धजी जगह कहां है जिसमें टोनी हमें लेकर जाता है? उस इमारत की तो हर जगह हमारी देखी हुई है।”

“गलत। बेसमेंट नहीं देखी हुई।”

“बेसमेंट! उसमें बेसमेंट भी है?”

“जरूर होगी। होनी ही चाहिए। सफर के बाद जब टोनी गाड़ी खड़ी करता है और उसे कुछ क्षण बाद दोबारा चलाता है तो गाड़ी किसी ढ़लान पर लुढ़कती साफ मालूम होती है।”

“ऐसी कोई ढ़लान पास्कल के बार वाली इमारत में कहां है?”

“पिछवाड़े में एक लकड़ी का फाटकनुमा बन्द दरवाजा है जिसे कभी किसी ने खुला नहीं देखा। जरूर वह फाटक बेसमेंट के ढलुवां रास्ते के दहाने पर है। गाड़ी रोकने के बाद जो टोनी कार से निकलता है, वह जरूर उस फाटक को खोलने के लिए ही निकलता है।”

“ओह! शान्ता, उस फाटक की किसी झिरी में से झांक कर...”

“मैं ऐसी कोशिश कर भी चुकी हूं। फाटक में कोई झिरी नहीं है। फाटक खोले बिना उसके पार नहीं झांका जा सकता।”

“तो?”

“देख, अगर फाटक के पीछे एक ढलुवां रास्ता निकला और उसके पीछे कोई बेसमेंट निकली तो तू मानेगी कि मेरा अन्दाजा सही है?”

शोभा ने अनिश्‍चयपूर्ण ढंग से सहमति में सिर हिलाया।

“लेकिन” — फिर वह बोली — “फाटक पर कोई ताला-वाला भी तो होगा!”

“है। पर वह ताला खुल सकता है।”

“कैसे खुल सकता है? तू खोल सकती है?”

“पागल! मैं क्या तालतोड़ हूं!”

“तो?”

“वह ताला हमारे लिए कोई और खोलेगा।”

“और कौन?”

“वीरू तारदेव।”

धारावी थाने के ही परिसर में इन्स्पेक्टर अष्टेकर का क्वार्टर था जिसमें वह अकेला रहता था। उसने क्वार्टर का ताला खोला और भीतर दाखिल हुआ। क्वार्टर निहायत साफ-सुथरा था, उसकी सफाई करने के लिए एक नौकरानी रोज आती थी।

उसने वर्दी उतारी और उसकी जगह लुंगी बनियान पहन ली।

उसकी तवज्जो गुलफाम की तरफ गयी।

कोई बात थी जरूर जो वह घुटा हुआ मवाली जानता था। लेकिन बता नहीं रहा था। अष्टेकर उसे और उसके वर्तमान जोड़ीदार एंथोनी फ्रांकोजा को सख्त नापसन्द करता था लेकिन अगर उनमें से कोई विलियम के कातिल को पकड़वाने में उसकी मदद करता तो वह उसके सौ खून माफ कर सकता था।

और वह बसन्त हजारे का छोकरा करम चन्द पता नहीं कैसे उन घटिया मवालियों की सोहबत में आ फंसा था!

उसने अपने साफ-सुथरे क्वार्टर में एक सरसरी निगाह दौड़ायी।

साफ-सुथरा क्वार्टर!

लेकिन क्या यह साफ-सुथरापन उसे पसन्द था?

क्या यह बेहतर न होता कि यहां बच्चों की चिल्ल-पों मची होती, चार चीजें टूटकर बिखरी होतीं, चार टूटने वाली होतीं, सोफे को चिंगम चिपटी होती और कार्पेट पर दाल बिखरी होती। बच्चों की मां चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें चुप करा रही होती और खिलौने, कापियां उठाकर अलमारी में रखने को कह रही होती!

लेकिन वहां तो मरघट जैसी खामोशी थी।

उसने शीशे में अपनी सूरत देखी।

कितना बद्सूरत था वो!

अपनी नौजवान में भी तो वह उतना ही बद्सूरत था। बल्कि उससे ज्यादा।

लेकिन फिर भी मार्था नाम की वो क्रिश्‍चियन छोकरी उससे मुहब्बत करती थी।

बीस साल का था तब वो।

उसके मां-बाप ने उसकी मार्था से शादी नहीं होने दी थी। इसलिए नहीं होने दी थी क्योंकि वह क्रिश्‍चियन थी, और उनका बेटा — निकम्मा, बदसूरत बेटा — वीर मराठा जवान था। उसे मार्था से जुहू बीच के अन्धेरे में हुई अपनी उस आखिरी मुलाकात की याद आयी जिसमें जिन्दगी में पहली और आखिरी बार अष्टेकर किसी स्त्री से सम्भोगरत हुआ था। सम्भोग के बाद मार्था ने उसे कहा था कि अगले महीने उसकी शादी हो रही थी इसलिए वह उनकी आखिरी मुलाकात थी।

अपनी आइन्दा जिन्दगी में अष्टेकर ने हजारों बार अपने आपको कोसा था कि क्यों उसने अपने मां-बाप का कहना माना था। क्यों वह मार्था को लेकर कहीं भाग नहीं गया था!

फिर वह पुलिस में भरती हो गया था और अपने मां-बाप को सजा देने की खातिर उसने आज तक शादी नहीं की थी। दोनों शादी के लिए उसकी मिन्नतें, समानतें करते मर गये थे लेकिन उसने शादी नहीं की थी। शादी तो क्या, बावजूद पुलिस की नौकरी के हजारों वेश्‍याओं के इलाके धारावी में तैनात होने के, उसने किसी औरत से कभी जिस्मानी सुख नहीं उठाया था। उसकी वह ख्वाहिश मार्था से उसकी अलहदगी के साथ मर चुकी थी।
 
वह स्त्री मार्था — उसकी नौजवानी का पहला और आखिरी नाकाम प्यार — मकतूल विलियम की मां थी।

अपने वक्त के मशहूर तालातोड़ वीरू तारदेव ने चुटकियों में फाटक पर जड़ा मजबूत पैडलॉक खोल दिया।

इतने से ही शांता के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई।

फाटक के आगे ढ़लान और अन्धेरी बेसमेंट दिखाई दी तो उसने एक विजेता की सी निगाह से शोभा की तरफ देखा।

फिर वे तीनों चुपचाप भीतर दाखिल हुए।

पीछे फाटक बदस्तूर बन्द कर दिया गया। केवल उसके बाहर ताला नहीं जड़ा हुआ था लेकिन बाहर गली में घुप्प अन्धेरा होने की वजह से ऐन फाटक के सिर पर पहुंचे बिना वह बात खुलने वाली नहीं थी।

“अगर अभी टोनी आ गया तो?” — वीरू तारदेव भयभीत भाव से बोला।

“मैं भी यही सोच रही थी।” — शोभा बोली।

“नहीं आ सकता।” — शान्ता बड़े इत्मीनान से बोली।

“क्यों?”

“क्योंकि वह अपने मां-बाप से मिलने खण्डाला गया हुआ है।”

“तुझे कैसे मालूम?”

“महीने की इस तारीख को अपने मां-बाप को खर्चा-पानी देने के लिए वह हमेशा खण्डाला जाता है। सबको मालूम है।”

“मुझे तो नहीं मालूम!” — शोभा बोली।

“मेरे कू मालूम है।” — वीरू तारदेव राहत की सांस लेता बोला — “लेकिन भूल गया था।”

वीरू तारदेव के साथ शांता ने बात की थी। वह पूरी बात जाने बिना ताला तोड़ने को तैयार नहीं हुआ था। मजबूरन उसे वीरू तारदेव को टोनी के खुफिया अड्डे की सारी कथा सुनानी पड़ी थी। उसने टोनी के अड्डे का ताला खोलना था, यह सुनकर पहले तो उसके छक्के छूट गए थे लेकिन जब दो कड़क जवान लड़कियों ने उसके दोनों पहलुओं से लिपट कर उससे मनुहार की थी तो उसने हामी भर दी थी। फिर उसने यह भी कहा था कि नकदी के अलावा हाथ आने वाले कीमती माल को वह बिकवा सकता था जो कि और भी अच्छा था क्योंकि उन दोनों को तो चोरी के माल को ठिकाने लगाने का कोई तजुर्बा नहीं था।

“अगर उसका जोड़ीदार गुलफाम आ गया तो?” — एक क्षण की खामोशी के बाद वीरू फिर बोला।

“वो नहीं आने का।” — शांता बोली — “जब टोनी शहर में नहीं है तो वो काहे को इधर आयेगा?”

“फिर भी...”

“फिर भी यह कि अभी वो ऊपर बैठा पत्ते खेल रहा है और खूब हार रहा है। मैं खुद देखकर आयी हूं। जब वह हार रहा होता है तो वह पत्तों पर से कभी नहीं उठता।”

“अगर वह जीतने लगा तो?”

“तो भी अपनी मुकम्मल हार कवर करने में उसे बहुत वक्त लगेगा। डैडी, बातों में वक्त जाया मत करो। वो सामने बन्द दरवाजा है, उसे खोलो।”

“इस दरवाजे के पीछे” — शोभा संदिग्ध भाव से बोली — “टोनी का वह सजावटी अड्डा होगा!”

“जरूर होगा।” — शान्ता बोली।

“अगर न हुआ तो?”

“तो न सही।” — शान्ता तनिक झल्लाई — “समझेंगे कि मेहनत बेकार गई। होगा तो भी सामने आ जाएगा, नहीं होगा तो भी सामने आ जाएगा।”

शोभा खामोश हो गई।

शान्ता ने देखा बन्द दरवाजे के ताले पर वीरू तारदेव अपना हुनर आजमाना शुरू कर भी चुका था।

“तुम्हें टोनी से डर लगता है?” — एकाएक वीरू तारदेव बोला।

“मुझे तो बहुत डर लगता है।” — शोभा बोली।

“यानी कि शान्ता को नहीं लगता?”

“मुझे भी लगता है।” — शान्ता बोली।

“दोनों डरती हो, फिर भी इतनी हिम्मत कर रही हो?”

“हमने उससे बदला लेना है।”

“किस बात का?”

“हमें बिच कहने का। लैग पीस कहने का। पब्लिक में जलील करने का।”

“अगर उसे पता लग गया कि उसके साथ दगाबाजी तुम दोनों ने की है तो?”

“उसे सात जन्म पता नहीं लगेगा। वह हमें इतनी सूझबूझ और अक्ल के काबिल कहां समझता है! वह तो समझता है कि हमें” — वह एक क्षण ठिठककर बोली — “एक ही काम आता है।”

“फिर भी अगर...”

“अरे, काम करो अपना।” — शोभा बोली — “अभी तो यही पता नहीं इसके पीछे टोनी का अड्डा है भी या नहीं! मुझे तो घबराहट होने लगी है!”

“अच्छा, अच्छा।”

“टोनी को पता लग गया तो वह हमें जिंदा नहीं छोड़ेगा।”

“अरे कहा न, नहीं पता लगेगा।” — शान्ता झल्लाई।

शोभा चुप हो गई।

“डैडी!” — शान्ता बोली — “मेरे को लगता कि तेरे से ताला नहीं खुलने का। तू बूढ़ा हो गया है। सब हुनर भूल गया है।”

“ताला खुलकर रहेगा। मैं कुछ नहीं भूला हूं। तुम भी अपना वादा न भूलना।”

“कौन-सा?”

“लो। भूल भी गयीं! हिस्से के अलावा तुम दोनों ने मुझे यह साबित करने का मौका भी देना है कि मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं।”

“ठीक है। ठीक है। याद है हमें अपना वादा। तेरे को एक राइड मारने का है न तो वह...”

“एक राइड नहीं, अक्खी रात।”

“अच्छा, अच्छा! तू ताला खोल।”

“ताला तो खुल भी गया।”

उसने दरवाजे को धक्का दिया।

भीतर घुप्प अन्धेरा था।

“यहीं कहीं एक बिजली का स्विच होगा” — शान्ता भीतर दाखिल होती बोली — “जिससे कई बत्तियां जलती हैं।”

तभी उसे वह स्विच मिल गया। उसने स्विच ऑन किया। सारे में जगमग-जगमग हो गयी।

शान्ता के मुंह से खुशी की किलकारी निकलने लगी थी। उसके चेहरे पर एक विजेता की-सी चमक आ गयी। वह एकदम सही जगह पर पहुंची थी। उसका तुक्का तीर साबित हुआ था।

“यह तो” — शोभा मन्त्रमुग्ध स्वर में बोली — “खुल जा सिमसिम हो गया!”

वीरू तारदेव दोनों से लिपटने लगा।

“यह क्या कर रहा है?” — शान्ता हड़बड़ाई।

“खुशी का इजहार।” — वीरू तारदेव थूक की फुहार उसके चेहरे पर छोड़ता बोला — “तुम भी तो खुश हो रही हो...”

“साला, हरामी!” — शान्ता उसे परे धकेलती हुई बोली — “हर घड़ी एक ही बात सोचता है।”

“एक नहीं, दो।” — उसने खींसें निपोरीं — “शोभा भी तो है!”

“बकवास बन्द कर, साले, नहीं तो यहीं लाश बिछा दूंगी।”

“यह शराफत है तुम्हेरी?” — वह तत्काल गम्भीर हुआ और आहत भाव से बोला — “वादे से मुकर रही हो!”

“अरे, मेरे बाप, कौन छिनाल वादे से मुकर रही है लेकिन जगह तो देख! मौका तो देख! यह तो सोच कि हम यहां किसलिए आए हैं!”

“ठीक है। लेकिन बाद में...”

“हां। बाद में। बाद में मजे में तू हमारे पहलू में ही मर न गया तो कहना।”

“मुझे ऐसी मौत पसन्द है।”

“अब चुप कर।”

तीनों आगे बढ़े।

वहां मौजूद माल की बहार देखकर वीरू तारदेव को पसीना आने लगा।

“हमें गाड़ी लेकर आना चाहिए था।” — उसके मुंह से निकला।

“गाड़ी आवाज करती।” — शान्ता बोली।

“इतना माल हम यूं कैसे ले जा पायेंगे?”

“हमने सब माल नहीं ले जाना, मूर्ख। टी.वी., वी.सी.आर. उठाने कहीं हमारे बस के हैं?”

“तो फिर?”

“रोकड़ा। बड़ी हद जेवर भी।”

“वो सब तो यहां कहीं दिखाई नहीं दे रहा।”

“वो सामनी स्टील की अलमारी खोल।”

वीरू तारदेव ने अलमारी खोली।

भीतर जेवरात थे लेकिन रोकड़े के नाम पर एक काला पैसा भी नहीं था।

रोकड़ा वहां कहीं से भी बरामद न हुआ।

शान्ता को भारी निराशा हुई। अब उन्हें वीरू तारदेव पर और उसकी ईमानदारी पर निर्भर करना पड़ना था क्योंकि माल बेचकर रोकड़ा वही खड़ा कर सकता था।

फिर तीनों ने जेवरात घड़ियां और हेरोइन वगैरह समेटनी आरम्भ कर दी। सारा माल वीरू तारदेव के लबादे जैसे कोट में समा गया। केवल एक-एक नैकलेस और एक-एक जोड़ी कानों के बुन्दें शान्ता और शोभा ने अपनी-अपनी जींस की जेबों में ठूंस लिए।

फिर वे निर्विघ्न बाहर निकल आये।

“कितने का माल उठाया होगा हमने?” — बाहर आकर शान्ता ने पूछा।

“होगा कोई दो-ढ़ाई लाख का।” — वीरू तारदेव लापरवाही से बोला।

हकीकतन वहां से उठाया गया नॉरकॉटिक्स का स्टाक ही उससे कई गुणा ज्यादा कीमत का था।

“बस!” — शोभा मायूसी से बोली।

“माल तो ज्यादा का है लेकिन चोर बाजार में तो इतने का ही बिकेगा!”

“ज्यादा का बेचने की कोशिश करना न!” — शान्ता बोली — “इतना रिस्क लिया और एक-एक लाख रुपया भी पल्ले न पड़ा तो क्या फायदा हुआ?”

“ठीक है। मैं कोशिश करूंगा।”

“मैं तो समझ रही थी कि पन्द्रह-बीस लाख रुपया तो वहां नकद ही पड़ा होगा। ज्यादा भी होता तो कोई बड़ी बात नहीं थी।”

“हमें हमारा हिस्सा कब मिलेगा?” — शोभा व्यग्र भाव से बोली।

“घबराओ नहीं, एकाध दिन में मिल जायेगा।”

“शान्ता, यह सब माल खुद ही लेकर चम्पत तो नहीं हो जायेगा?”

“हो के तो दिखाये। मैं साले को...”

“मैं कहीं नहीं जाने वाला।” — वीरू तारदेव हंसता बोला — “मेरा जनाजा तो पास्कल के बार में से ही उठना है। और फिर मेरा बड़ा इनाम तो यह है कि मैंने तुम दोनों के साथ अभी राइड मारनी है। तुम दोनों...”

“वीरू” — शान्ता एकाएक बर्फ से सर्द स्वर में बोली — “अगर तूने हमें धोखा देने की कोशिश की तो मैं टोनी को बता दूंगी कि उसका माल तूने लूटा है।”

वीरू तारदेव सकपकाया। हकीकतन तो वह उन्हें धोखा ही देने की ही सोच रहा था।

“फिर तुम्हारा क्या होगा?” — प्रत्यक्षतः वह बोला।

“हमारा जो होगा, हम भुगत लेंगी। तू यह सोच कि तब तेरा क्या होगा! और यह न समझना कि तू जाकर कहीं छुप जायेगा। टोनी तुझे पाताल में से भी खोद निकालेगा। हम लड़कियां हैं। हम टोनी जैसे मर्द को पिघलाने के सौ तरीके जानती हैं। हम माफी मांग लेंगी। कह देंगी कि तूने जबरन हमसे यह काम करवाया था लेकिन तू कुछ नहीं कर पायेगा। टोनी तुझे वो मौत मारेगा कि तू अगले जन्म तक उसका कहर नहीं भूल सकेगा।”

“अरे, क्यों खाली-पीली बोम मार रही है, शान्ता बाई। अपुन तो सपने में भी तेरे कू धोखा देने का खयाल नहीं करने का है।”

शान्ता खामोश रही।
 
सारे अभियान ने उसका बहुत दिल तोड़ा था। वह एक बहुत ही नाकाफी रकम के लिए टोनी का कहर जगा बैठी थी।

गुलफाम पहले ही मालूम कर चुका था कि मिशन हस्पताल में एक ही इंटेन्सिव केयर यूनिट था और वह पांचवें माले पर था।

लिफ्ट के रास्ते वह चौथे माले पर पहुंचा। उसके हाथ में एक प्लास्टिक का बैग था जिसे सम्भाले वह वहां के टायलेट में दाखिल हो गया। टायलेट में उसमे अपनी पतलून और जैकेट उतारी और उसके स्थान पर हस्पताल के आर्डरली की वर्दी पहन ली। उतारे हुए कपड़े बैग में भरकर उसने बैग वहीं रख दिया।

बाहर आकर वह सीढ़ियों के रास्ते पांचवें माले पर पहुंचा।

सीढ़ियों के दहाने से दीवार की ओट लेकर उसने गलियारे में झांका।

इन्टेन्सिव केयर यूनिट वाले कमरे के दरवाजे पर उसे हलवदार पाण्डुरंग एक पत्रिका के पन्ने पलटता बैठा दिखाई दिया।

गुलफाम ने आंखों ही आंखों मे गलियारे का जायजा लिया।

रात के एक बजे वहां मुकम्मल सन्नाटा था और गलियारे में स्टूल पर बैठे पाण्डुरंग के अलावा उसे कोई दूसरा जीव वहां दिखाई नहीं दे रहा था।

सीढ़ियों की ओट छोड़कर उसने गलियारे में कदम रखा।

पाण्डुरंग ने पत्रिका पर से निगाह हटाई और संदिग्ध भाव से उसकी तरफ देखा लेकिन जब उसने आर्डरली को उसकी दिशा में निगाह भी उठाये बिना विपरीत दिशा में जाते देखा तो वह फिर पत्रिका के पन्ने पलटने लगा।

जिधर गुलफाम बढ़ रहा था, उधर कोने में एक हाल-सा था जिसमें आगन्तुकों के बैठने के लिए एक सोफा और कुछ कुर्सियां पड़ी थीं। उनके मध्य में एक टेबल थी जिस पर कुछ अखबार और पत्रिकायें पड़ी थीं।

गुलफाम उस टेबल के करीब पहुंचकर ठिठका। उसने एक सतर्क निगाह पीछे दौड़ाई। वहां से गलियारे की लम्बाई में नहीं झांका जा सकता था इसलिए पाण्डुरंग उसे न दिखाई दिया।

वह मेज की तरफ आकर्षित हुआ। उसने अखबार और पत्रिकाओं का वरका-वरका फाड़ना आरम्भ कर दिया। कुछ ही क्षण बाद मेज पर फटे हुए कागज़ के पुर्जों का ढेर-सा लग गया। फिर उसने अपनी जेब से एक सिगरेट और एक भरी हुई माचिस निकाली। सिगरेट को आधा तोड़कर एक हिस्सा उसने फेंक दिया और दूसरा अपने होंठों में लगा लिया। भरी हुई माचिस में से उसने एक तीली निकाली और सिगरेट सुलगा लिया। उसने सिगरेट के तीन-चार लम्बे-लम्बे कश लगाये, फिर माचिस को तीलियों के मसाले वाली दिशा से थोड़ा सा खोला और सिगरेट के टुकड़े को तीलियों के बीच में यूं फंसा दिया कि उसका सुलगा हुआ भाग तीलियों के मसाले से कोई आधा इंच ऊंचा रह गया।

यूं तैयार की माचिस और सिगरेट उसने मेज पर पड़े कागज़ों के ढेर के नीचे रख दिये।

अब सिगरेट सुलगता हुआ जब तीलियों के मसाले तक पहुंचता तो सारी तीलियां सुलग जातीं, जोर का शोला उठता जो कागज़ों के ढेर को पकड़ लेता और फिर वहां आग की लपटों का बड़ा खूबसूरत वक्ती नजारा पैदा हो जाता।

सिगरेट के सुलगते हिस्से की लौ के तीलियों के मसाले तक पहुंचने में अभी बहुत वक्त था।

वह निर्विकार भाव से चलता वापिस सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। पाण्डुरंग की तरफ निगाह तक उठाये बिना वह सीढ़ियों के करीब पहुंचा और जान-बूझकर कदमों की तनिक ऊंची आवाज करता सीढ़ियां चढ़ने लगा।

पाण्डुरंग उसके कदमों की आवाज सुन रहा था। उसकी निगाह में वह बद्तमीज आर्डरली, जो इन्टेन्सिव केयर यूनिट के करीब भी दबे पांव नहीं चल सकता था, वहां से जा चुका था। वह फिर पत्रिका पढ़ने लगा।

गुलफाम दबे पांव सीढ़ियां वापिस उतरा और आखिरी सीढ़ी पर दीवार के साथ पीठ लगाकर खड़ा हो गया। उसके आगे एक खम्भा था जिसकी ओट उसे हासिल थी।

वह प्रतीक्षा करने लगा।

पाण्डुरंग भारी दिलचस्पी के साथ पत्रिका में वह लेख पढ़ रहा था जो जैकी श्राफ की प्रेमिकाओं की बाबत था और मन-ही-मन उसकी किस्मत से रश्‍क खा रहा था। तभी उसने नाक सिकोड़ी। धुएं की मुश्‍क थी। कहां से आ रही थी? उसने पत्रिका पर से सिर उठाया, दायें-बायें देखा तो वेटिंग हाल की तरफ से धुआं उठता पाया। उसके देखते-देखते वह धुआं आग की लपटों में तब्दील हो गया।

पाण्डुरंग फौरन पत्रिका फेंककर उधर भागा। हस्पताल को आग लग जाने से भी नागप्पा की जान को खतरा हो सकता था और इस वक्त उस पर अपनी जान से ज्यादा नागप्पा की जान की हिफाजत करने की जिम्मेदारी थी।

पाण्डुरंग के सीढ़ियों के आगे से गुजरते ही गुलफाम खम्बे की ओट से निकला, उसने गलियारे में कदम रखा और निर्विघ्न इन्टेन्सिव केयर यूनिट का दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल हो गया।

भीतर आठ बैड थीं जिनमें से पांच खाली थीं और तीन भरी हुई में से एक पर नागप्पा पड़ा था।

तीनों मरीज अचेत थे।

गुलफाम ने अपनी जुर्राब में से अपना उस्तुरा खींच लिया। उस्तुरा खोलते हुए वह नागप्पा की बैड के करीब पहुंचा। बायें हाथ से उसने नागप्पा की ठोढ़ी को थोड़ा ऊंचा किया ताकि गला तन जाता और फिर एक ही सिद्धहस्त वार से एक कान से दूसरे कान तक उसका गला काट दिया।

वेटिंग हॉल में कागज़ों की आग भारी मेज की लकड़ी को पकड़ चुकी थी और पाण्डुरंग एक कुर्सी की गद्दी से आग को थपक-थपककर उसे बुझाने की कोशिश कर रहा था।

गुलफाम ने नागप्पा के ऊपर पड़ी सफेद चादर से ही उस्तुरे को लगा खून पोंछा और उसे वापिस अपनी जुर्राब में खोंस लिया।

दरवाजे पर पहुंचकर उसने गलियारे में झांका।

वेटिंग हाल की तरफ से धुआं उठ रहा था। पाण्डुरंग कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

वह कमरे से निकला और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

अपने पीछे से हर क्षण वह पाण्डुरंग की आवाज आने की अपेक्षा कर रहा था लेकिन ऐसी कोई आवाज न आयी।

वह निर्विघ्न चौथे माले के टायलेट में पहुंच गया। वहां उसने आर्डरली की वर्दी, टोपी उतारकर अपने कपड़े पहने, वर्दी बैग में भरी और बैग वहीं पड़े कूड़ेदान में फेंक दिया।

जिस वक्त उसने हस्पताल से बाहर कदम रखा, उस वक्त पांचवें माले पर फायर अलार्म बजना अभी शुरू हुआ था।

रात के पौने दो बजे खण्डाला से लौटे एंथोनी ने अपने फ्लैट में कदम रखा।

मोनिका जाग रही थी।

उसके इन्तजार में या किसी और वजह से!

वजह जल्द ही सामने आ गयी।

“तुम्हारी गैरहाजिरी में अष्टेकर यहां आया था।” — वह बोली।

“कौन? वो पुलिसिया?

“हां!”

“क्यों? क्यों आया था? क्या चाहता था?”

“मेरे से रामचन्द्र नागप्पा नाम के किसी साउथ इण्डियन के बारे में सवाल कर रहा था। तुम जानते हो किसी नागप्पा को?”

“हां, जानता हूं।” — एंथोनी लापरवाही से बोला — “इलाके का मामूली डोप पैडलर है। अष्टेकर क्या कहता था उसके बारे में?”

“कहता था कि वह बेहोशी में विलियम-विलियम बड़बड़ा रहा था। टोनी, क्या वह शख्स विलियम का कातिल हो सकता है?”

“नहीं।”

“क्यों नहीं? जब वो...”

“अरे, कहा न, नहीं!” — एकाएक एंथोनी चिड़कर बोला — “नहीं हो सकता वो विलियम का कातिल। और मैंने तेरे को बोला है कि नहीं बोला कि विलियम के कातिल को मैं ढ़ूंढ़ कर रहूंगा? मैं न सिर्फ उसे ढ़ूंढ़ूंगा बल्कि खुद अपने हाथों से उसे उसकी करतूत की सजा दूंगा। मौत की सजा। एक दर्दनाक मौत की सजा। और सुन, तेरे को उस पुलिसिये से दूर-दूर रहने का है।”

“क्यों?”

“क्यों? पूछती है क्यों? क्योंकि मैं तेरे को ऐसा बोला।”

मोनिका हैरानी से उसका मुंह देखने लगी। उसे विश्‍वास नहीं हो रहा था कि वही आदमी उस वक्त उसके साथ इतनी सख्त जुबान बोल रहा था जो पिछली रात उसका प्यार पाने के लिए एक मंगते की तरफ गिड़गिड़ा रहा था।

“सुना?”

“हां, सुना।” — मोनिका बोली फिर एकाएक वह पलंग से उठी और दौड़कर बगल के बैडरूम में घुस गई।

एंथोनी को भीतर से चिटकनी लगाये जाने की आवाज यूं सुनाई दी जैसे गोली चली हो। एक क्षण को उसका जी चाहा कि वह दरवाजा तोड़ दे और घसीट कर मोनिका को बाहर निकाले। वह उसका थोबड़ा ऐसा बिगाड़ दे कि फिर कभी उसका जी उससे प्यार करने को न चाहे।

बड़ी मुश्‍किल से उसने अपने आप पर जब्त किया।

फिर वह भुनभुनाता हुआ उलटे पांव फ्लैट से बाहर निकल गया।

रास्ते में वह एक ही बात बार-बार सोच रहा था :

क्यों यह औरत हमेशा उसे हार का अहसास दिलाने में कामयाब हो जाती थी?

टेलीफोन की निरन्तर बजती घण्टी की आवाज से अष्टेकर की नींद खुली। उसने घड़ी पर निगाह डाली। दो बजने को थे। उसने रिसीवर उठाकर कान से लगाया और बोला — “हल्लो! अष्टेकर।”

दूसरी तरफ से बार-बार कुछ कहा जाने लगा जो कतई उसके पल्ले न पड़ा। जो कुछ लफ्ज उसकी समझ में आये, वो थे उस्तुरा, आग, गला, नागप्पा।

“तू पाण्डुरंग बोल रहा है न?”

“हां।”

“अपने होश काबू में कर। एक बार में एक लफ्ज बोल ताकि मेरी समझ में आये तू क्या कह रहा है!”

फिर जो अष्टेकर की समझ में आया, उसने उसका मन मसोस दिया। रो-धोकर एक सूत्र हाथ में आया था विलियम के कत्ल के केस में, वो भी खल्लास हो गया।

भारी मन में वह पलंग से उठा और हस्पताल जाने की तैयारी करने लगा।
 
खुर्शीद का घर वास्तव में दो कमरों का था इसलिए असल में उसकी बहन और मां को घर से कहीं चले जाने की जरूरत नहीं होती थी। उसकी बहन सोयी पड़ी थी लेकिन मां जाग रही थी। आधी रात को एक मर्द के साथ अपनी बेटी को घर आया देखकर उसके कान पर जूं भी न रेंगी।

खुर्शीद उसे जिस खूब सजे हुए बैडरूम में लाई, लल्लू उससे बहुत प्रभावित हुआ। वह बैडरूम क्या था, कीमती चीजों का गोदाम था।

“एक रण्डी के घर के लिहाज से कैसा है?” — खुर्शीद गर्वपूर्ण स्वर में बोली। लेकिन जब उसने लल्लू के चेहरे के भाव देखे तो उसे वह फिकरा जुबान से निकालने का अफसोस होने लगा।

“अब तू रण्डी नहीं है।” — लल्लू आहत भाव से बोला — “अब तू मेरी रानी है। पहले भी बोला।”

“मैं तो मजाक कर रही थी, किचू।”

“पहले तू कुछ भी थी, अब तू वो नहीं है। मेरी बीवी भला वो कैसी हो सकती है!”

“बीवी! तेरी बीवी!”

“हां। तू।”

“तू मुझे अपनी बीवी बनाना मांगता है?”

“हां।”

“क्यों?”

“अरी मूर्ख, जब तक बीवी नहीं बनेगी, बच्चे कैसे पैदा करेगी?”

“बच्चे!”

“मेरे बच्चे। हमारे बच्चे।”

“मैं तेरी बीवी कैसे बन सकती हूं?”

“क्यों नहीं बन सकती? मेरे पास पैसा है। अपनी बीवी के लिए। अपने बच्चों के लिए। अपने कुनबे के लिए। जब राजा हो” — उसने अपनी छाती को टहोका — “रानी हो” — उसने खुर्शीद का गाल थपथपाया — “तो राजकुमार भी तो होने चाहियें।”

खुर्शीद भावुक हो उठी।

“ऐसी बातें मेरे से आज तक किसी ने नहीं कीं।” — वह भर्राये स्वर में बोली।

“ऐसी बातें उसी दिल से निकलती हैं जिसमें किसी का प्यार बसा हो।”

“तू कितने बरस का है रे, किचू?”

“देख।” — लल्लू ने आंखें तरेरीं — “अगर मेरी बीवी बनना है तो मुझे किचू कहना बन्द कर। मैं कोई बच्चा हूं! मैं बालिग हूं। मर्द हूं।”

“लेकिन कितने बरस का?”

“इक्कीस बरस का।”

“और मैं चौबीस की।” — खुर्शीद संकोचपूर्ण स्वर में बोली — “यह क्या जोड़ी हुई!”

“और मैं जो देखने में भैंसा लगता हूं। यह क्या जोड़ी हुई?”

“इतनी बातें कहां से सीखा?”

“अपने उस्ताद से। टोनी से।”

“टोनी! वो तो बहुत खतरनाक गैंगस्टर है, बहुत बुरा आदमी है।”

“औरों के लिए होगा, मेरे लिए नहीं। मुझे मंगते से किसी काबिल टोनी ने बनाया है। मालूम?”

“कैसे बनाया? तुझे भी चोरी, डकैती, स्मगलिंग की राह पर लगाकर?”

“यह मैं नहीं बता सकता।”

“मैं कुर्बान जाऊं। बीवी बनाना चाहता है लेकिन यह नहीं बताना चाहता कि गृहस्थी बसाने के लिए जो पैसा दरकार होता है, वो कैसे कमाता है!”

“जब बीवी बन जाएगी तो सब कुछ बता दूंगा।”

“अभी क्या कोई कसर रह गई है बीवी बनने में?”

“हां।”

“क्या?”

“तेरी मां तो यहां नहीं आती?”

“नहीं।”

“तो फिर पास आ, बताता हूं क्या कसर रह गयी है!”

खुर्शीद पास आयी तो लल्लू बाज की तरह उस पर झपटा।

“मालूम?” — थोड़ी देर बाद जबरन उसे अपने से दूर धकेलती खुर्शीद बोली।

“क्या?” — लल्लू बोला।

“मैं तेरे से शादी बनाने को तैयार हूं।”

“बढ़िया।” — लल्लू खुश होकर बोला — “मैं कल ही तुझे अपनी मां के पास लेकर चलता हूं ताकि वो हमारी शादी करा दे।”

एंथोनी को पता था कि रात के दो बजे भी गुलफाम कहां हो सकता था।

पास्कल के बार में वो उसे जुए की मेज पर जमा मिला।

एंथोनी के इशारे पर वह उठा और उसके करीब पहुंचा। एंथोनी उसकी बांह थामकर उसे एक कोने में ले आया और बोला — “यह मैं नागप्पा के बारे में क्या सुन रहा हूं? सुना है वो मुंह फाड़ रहा है?”

“अब नहीं फाड़ रहा।” — गुलफाम धीरे से बोला।

“मतलब?”

“अभी कोई” — गुलफाम ने घड़ी पर निगाह डाली — “पचास मिनट पहले वो अपने बनाने वाले के पास पहुंच गयेला है। मुंह की जगह गले से हंसता हुआ।”

“तू उस वक्त कहां था?”

“यहीं। शाम से ही इधर ही बैठेला है। पास्कल से पूछ ले। और किसी से पूछ ले। तेरी कहीं और बात नहीं बनती तो समझ ले तू भी यहीं था।”

“हूं तो सही मैं यहीं।”

“बरोबर।”

“वो क्या मुंह फाड़ रहा था? क्या भौंकना चाहता था?”

“बोलता था विलियम का कत्ल किसी” — गुलफाम अर्थपूर्ण स्वर में बोला — “और वजह से हुआ था।”

“अच्छा! उस पिनके से डोप पैडलर में इतनी अक्ल थी?”

“थी नहीं तो कहीं से आ गई होयेंगी।”

“लेकिन अब वो चैन की नींद सो रयेला है?”

“हां।”

“तो मैं भी जा के चैन की नींद सोऊं?”

“मजे से।”

एंथोनी ने बड़े कृतज्ञ भाव से गुलफाम का कन्धा थपथपाया और वहां से विदा हो गया।

अष्टेकर हस्पताल पहुंचा।

पुलिस के एक्सपर्ट उससे पहले वहां पहुंच चुके थे और फिंगरप्रिंट्स उठवाने का और फोटो वगैरह खींचने का काम हो रहा था।

उसने नागप्पा की तरफ यूं देखा जैसे अभी भी उसके उठकर बैठ जाने की उम्मीद कर रहा हो।

फोटग्राफर को लाश के गिर्द ज्यादा ही फुदकते पाकर अष्टेकर चिढ़कर बोला — “लाश की फोटो खींच रहा है कि सिनेमा की शूटिंग कर रहा है?”

“साहब” — फोटोग्राफर विनयशील स्वर में बोला — “मेरे पर क्यों खफा होते हो? मैं तो सिर्फ अपनी ड्यूटी कर रहा हूं!”

“हां। मेरे को मालूम। हम सभी अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। यह भी।” — उसने आग्नेय नेत्रों से पाण्डुरंग की तरफ देखा — “यह भी अपनी ड्यूटी करके हटा है। पूरी मुस्तैदी से।”

“साहब” — पाण्डुरंग कांपते स्वर में बोला — “मैं तो...मैं तो...”

“बकरी की तरह मिमियाने की ड्यूटी बेहतर कर सकता हूं। यही कहने जा रहा था न!”

पाण्डुरंग के मुंह से बोल न फूटा।

तभी प्लास्टिक का एक बैग हाथ में थामे ए.एस.आई. पाकीनाथ वहां पहुंचा।

“चौथे माले के टायलट के कूड़ेदान में से यह बैग बरामद हुआ है।”

अष्टेकर ने उसमें से निकली आर्डरली की वर्दी का मुआयना किया। वर्दी की कमीज के सारे अग्रभाग पर खून के छींटे दिखाई दे रहे थे।

“इसे लैब में भिजवाओ।” — अष्टेकर बोला — “उम्मीद तो नहीं लेकिन शायद बटनों से कोई फिंगरप्रिंट उठाए जा सकते हों। यह भी चैक कराओ कि इस पर लगा खून नागप्पा के ब्लड ग्रुप से मिलता है या नहीं!”

“यस, सर।”

वर्दी के नाप को देखकर अनायास ही उसका ध्यान गुलफाम अली की ओर जा रहा था। वह वर्दी ऐन गुलफाम अली के साइज की मालूम होती थी लेकिन वह जानता था कि उससे कुछ साबित नहीं होता था। गुलफाम अली के साइज के हजारों आदमी मुम्बई में तो क्या, उस इलाके में ही हो सकते थे।

पाकीनाथ को अभी भी अदब से सामने खड़ा पाकर अष्टेकर बोला — “अब क्या है?”

“नागप्पा की खोली से बरामद जो उस्तुरा हमने लैब में भिजवाया था, उसकी रिपोर्ट आई है।”

“क्या कहती है रिपोर्ट?”

“रिपोर्ट कहती है कि उस्तुरे पर जो खून लगा पाया गया था, वह विलियम के ब्लड ग्रुप का नहीं मिलता। लेकिन साहब, विलिमय के कत्ल को तो तीन महीने हो चुके हैं। हो सकता है वह उस्तुरा किसी और के कत्ल में दोबारा...”

अष्टेकर को घूरता पाकर वह खामोश हो गया। तब उसे अनुभव हुआ कि वह अपने अफसर को बहुत मामूली बात समझाने की कोशिश कर रहा था।

“सॉरी, सर।” — वह धीरे से बोला।

“मरने वाले का कोई होता सोता है?”

“नहीं।” — पाकीनाथ इंकार में सिर हिलाता बोला — “अपनी खोली में बिल्कुल अकेला रहता था। पहले इसका एक भाई इसके साथ रहता था लेकिन वो भी पता नहीं कहां गया।”

“मुझे पता है कहां गया!” — अष्टेकर बोला — “वो जेल गया। वो पिछले डेढ़ साल से जेल में है और अभी ढ़ाई साल और वहां रहेगा।”

“ओह!”

“यह भी अजीब इत्तफाक है कि यूं मरने वालों के या तो रिश्‍तेदार होते नहीं, होते हैं तो जेल में होते हैं।”

“विलियम के साथ तो ऐसा नहीं था!”

“हां, उसके साथ ऐसा नहीं था!” — अष्टेकर धीरे से बोला — “उसके रिश्‍तेदार हैं। हैं उसके रिश्‍तेदार।”

अष्टेकर पाण्डुरंग की तरफ घूमा।

“साहब” — पाण्डुरंग लगभग गिड़गिड़ाता बोला — “मेरी कोई गलती नहीं है। मैं तो...”

“नहीं” — अष्टेकर बोला — “तेरी कोई गलती नहीं है, पाण्डुरंग। गलती तो मेरी है। नागप्पा के सिरहाने पहरे पर मुझे खुद बैठना चाहिए था। मैंने गलती की जो घर सोने चला गया।”

“साहब, मैं तो एकदम...”

“और फिर कत्ल तो होते ही रहने चाहियें। कत्ल नहीं होंगे तो हमारी नौकरियों का क्या बनेगा? कातिल ने तो हमारे पर मेहरबानी की है कि उसने हमारे इतने सारे आदमियों को” — उसने अर्धवृत में अपने मातहतों की तरफ अपना एक हाथ घुमाया — “काम करने का, अपने जौहर दिखाने का मौका दिया है।”

“साहब, मैं आग से धोखा खा गया। वो आग...”

“कोई बात नहीं। अब घर जा! तेरी बीवी, तेरे बच्चे, तेरा दूध वाला, तेरा अखबार वाला, सब तेरा इन्तजार कर रहे होंगे। जा। शाबाश।”

पिटा-सा मुंह लिए पाण्डुरंग वहां से हिला।
 
कल्याण में सुबह सवेरे इन्स्पेक्टर पेनणेकर को फिफ्टी पर गोंद के थक्के पर बने अंगूठे के निशान की फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट प्राप्त हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक निशान स्पष्ट था, अंगूठे का ही था लेकिन पॉजटिव आइडेन्टिफिकेशन के लिए केवल एक निशान पर्याप्त नहीं था। नोन क्रिमिनल्स के फिंगरप्रिंट्स से उसका मिलान एक इन्तहाई लम्बा काम था। अलबत्ता अगर कोई सस्पेक्ट निगाह में हो तो उसके निशानों से उसका मिलान करके कोई फौरी नतीजा निकाला जा सकता था।

पेनणेकर के पास ऐसा कोई सस्पेक्ट नहीं था।

यानी इतना स्पष्ट उठा अंगूठे का निशान फिलहाल बेमानी था, बेकार था।

नौ बजे फोन की घण्टी ने एंथोनी को नींद से जगाया।

फोन गुलफाम अली का था। वह बुरी तरह से उत्तेजित था।

“टोनी!” — वह चिल्लाया — “अड्डा लुट गया।”

“क्या बकता है!” — अधलेटा-सा फोन सुनता टोनी हड़बड़ाकर सीधा हुआ — “कौन-सा अड्डा लुट गया?”

“हमारा एक ही तो अड्डा है।”

“वो कैसे लुट गया?”

“पता नहीं। आकर देख। फाटक खुला है। अन्दर का दरवाजा खुला है। अलमारी खुली है।”

“माल सारा उठ गया?”

“मोटा माल रखा है। उठ सकने वाला उठ गया।”

“ज्यादा कीमती तो उठ सकने वाला माल ही था!”

“कैश के लिए अलमारी में से होकर दीवार में हमने जो नई तिजोरी फिट करवाई थी, वो सलामत है। जरूर चोरों को उसकी खबर नहीं लगी।”

“लल्लू कहां है?”

“मेरे पास है। उस पर शक करना बेकार है। यह उसकी करतूत नहीं। उसने कुछ किया होता तो अब तक वो दुनिया के दूसरे सिरे पर पहुंचा होता।”

“तो फिर वहां कौन पहुंच गया?”

“यह तो तू बता।”

अपने आप ही एंथोनी का ध्यान शोभा और शांता की तरफ चला गया।

“मैं आता हूं।” — वह फोन में बोला — “फौरन आता हूं।”

उसने फोन पटक दिया और कूदकर बिस्तर से निकला।

मोनिका दूसरे बैडरूम की चौखट पर खड़ी थी।

“क्या हुआ?” — उसने पूछा।

“मेरा अड्डा लुट गया।”

उसने देखा मोनिका ने वह खबर यूं सुनी जैसी एंथोनी ने उसे टाइम बताया हो। उसके चेहरे पर चिन्ता या हमदर्दी का कतई कोई भाव न आया।

तेरे से समझूंगा साली — दांत पीसता वह मन-ही-मन बोला — मैं तेरे से जबरन वही प्यार हासिल करके दिखाऊंगा जो विलियम को हासिल था। तू मेरी थी, मेरी है और मेरी रहेगी। विलियम ने तो थोड़ी देर के लिए तुझे उधार ले लिया था। सब्र। थोड़ा और सब्र। फिर तू जानेगी और मैं जानूंगा। पता नहीं किस बात का घमण्ड है तुझे लेकिन साली, तेरा घमण्ड मैं तोड़कर ही रहूंगा।

वह इमारत से बाहर निकला तो सीधा जाकर अष्टेकर की छाती से टकराया।

“धीरे। धीरे।” — अष्टेकर उसे अपने से परे करता बोला — “यूं दौड़े कहां जा रहे हो?”

“इन्स्पेक्टर साहब, मुझे एक बहुत जरूरी काम से जाना है। आप रास्ते से हटिये।”

“जरूरी काम तो आते-जाते रहते हैं, टोनी, अष्टेकर खुद चलकर रोज-रोज नहीं आता। जिससे अष्टेकर ने बात करनी होती है, वो उसे थाने तलब करता है। मैं तुम्हें थाने तलब करूं या यहीं मेरे एक सवाल का जवाब देते हो?”

“सिर्फ एक सवाल न?” — एंथोनी हथियार डालता बोला।

“कल रात एक बजे तुम कहां थे?”

“पास्कल के बार में।”

“जवाब बहुत जल्दी दिया! यूं दिया जैसे पहले से पता था कि यह सवाल पूछा जाने वाला था!”

“ऐसी कोई बात नहीं।”

“यही सवाल मैंने तुम्हारे दोस्त गुलफाम अली से भी किया था। उसने भी यूं ही टिकाकर जवाब दिया था। मेरा सवाल अभी खत्म नहीं हुआ था कि उसने जवाब फेंक मारा था।”

“अब मैं क्या कहूं, इस बारे में!”

“तो तुम पास्कल के बार में थे?”

“हां। चाहो तो पास्कल से पूछ लो।”

“पास्कल का जवाब मुझे मालूम है। तुम्हें एलीबाई देना उसका काम है। इलाके के इतने बड़े दादा को वह नाराज थोड़े ही कर सकता है!”

“आपको वहम है, इन्स्पेक्टर साहब। मैं कोई दादा-वादा नहीं। मैं तो बहुत मामूली आदमी हूं। और यह एली... एली...”

“ऐलीबाई।”

“हां, एलीबाई। यह क्या बला हुयी जिसे मुझे देना आपने पास्कल का काम बताया? वो तो साला किसी को बुखार नहीं देता। कोई बाई किधर से देगा।”

“तुम नहीं जानते एलीबाई क्या होती है?”

“नहीं।”

“कमाल है! गुण्डे-बदमाश तो चाहे कितने भी अनपढ़ क्यों न हों, इस एक विलायती लफ्ज से तो खास तौर से वाकिफ होते हैं!”

“मैं नहीं वाकिफ।”

“ठीक है। अब वाकिफ हो लो। लाइन चेंज नहीं करोगे तो आगे भी काम आएगी यह वाकफियत। एलीबाई होती है गवाही। शहादत। जब तुम होवो एक जगह लेकिन दावा दूसरी जगह होने का करो तो जो आदमी तुम्हारे दावे की तसदीक के लिए बतौर गवाह पेश होगा, वो तुम्हें एलीबाई देता माना जाएगा। अब आई बात समझ में?”

“हां। आई। लेकिन मुझे किसी की इस... ये... एलीबाई की क्या जरूरत है! इलाबाई होती, खूबसूरत होती, नौजवान होती तो कोई बात थी। तब तो...”

“बकवास बन्द।”

“इन्स्पेक्टर साहब, क्या हुआ है कल रात एक बजे जिसके लिए मुझे इलाबाई की... मेरा मतलब है एली वाली बाई की...एलीबाई की जरूरत है?”

“कल रात एक बजे नागप्पा का खून हुआ है। हजामत बनाने वाले उस्तुरे से। नागप्पा को तो जानते थे न? रामचन्द्र नागप्पा को?”

“सूरत से पहचानता था। इन्स्पेक्टर साहब, आपने एक सवाल पूछने की बात की थी। अब तो कई सवाल हो गये! अब मैं जाता हूं।”

एंथोनी आगे बढ़ा तो अष्टेकर ने उसे पकड़कर वापिस घसीट लिया। एंथोनी की आंखों में खून उतर आया। बड़ी मुश्‍किल से उसने अपने आप पर जब्त किया।

“नागप्पा का गला ऐन उसी तरीके से रेता गया है जैसे विलियम का रेता गया था। उसका कत्ल उसकी जुबान बन्द करने के लिए किया गया है। वह विलियम के बारे में कुछ जानता था लेकिन बता नहीं पाया। ...बीच में न बोलो, अभी और सुनो... उसके घर से मर्डर वैपन जैसा एक उस्तुरा बरामद हुआ था, उस पर खून के धब्बे भी थे लेकिन लैबोरेट्री में टैस्ट करने पर मालूम हुआ है कि उस्तुरे पर लगा खून विलियम के ब्लड ग्रुप जैसा नहीं था। तुम्हें इस बारे में क्या कहना है?”

“कुछ नहीं।”

“कुछ कहना चाहिए तुम्हें। तुम विलियम को अपना जिगरी दोस्त बताते थे। उसके कातिल की तलाश में तुम्हें पुलिस की मदद करनी चाहिए।”

“हैरानी है कि पुलिस को ऐसे आदमी की मदद की जरूरत है जिसे वह गैंगस्टर करार देती है।”

“हैरान हो लो लेकिन मदद भी करो।”

“विलियम के कत्ल में इतनी ज्यादा दिलचस्पी का मतलब, इन्स्पेक्टर साहब? आप तो यूं इस केस के पीछे पड़े हुए हैं जैसे आपका कोई सगेवाला कत्ल हो गया हो!”

अष्टेकर ने तुरन्त जवाब न दिया। वह कुछ क्षण खामोश रहा, फिर धीरे से बोला — “यह मेरी नौकरी है... मेरी ड्यूटी है।”

“घिसे हुए रिकार्ड की तरह आपकी नौकरी, आपकी ड्यूटी की सुई एक ही केस पर क्यों अटकी हुई है, इन्स्पेक्टर साहब?”

“अभी तुझे कहीं जाने की जल्दी है इसलिए जा।” — अष्टेकर एकाएक सांप की तरफ फुंफकारा — “लेकिन जाते-जाते एक बात सुनता जा।”

“क्या?”

“बहुत जल्द एक दिन ऐसा आएगा जब तू एक चूहे की तरह मेरे पिंजरे में फंसा तड़फड़ा रहा होगा। जब मैं तेरी बांह उखड़कर उसी से तुझे मारूंगा।”

“बायी बांह उखाड़ना इन्स्पेक्टर साहब क्योंकि दायीं से तो मैंने पुलिस के हफ्ते के चैक साइन करने होते हैं।”

“ठहर जा, साले।”

“हां, मारो मुझे। उठाओ हाथ मेरे पर। ताकि यह साबित हो जाये कि एक गैंगस्टर में और एक पुलिसिये में उन्नीस बीस का ही फर्क होता है।”

अष्टेकर का हवा में उठा हाथ अपने आप नीचे गिर गया।

उसने एक गहरी सांस ली और फिर एंथोनी के रास्ते से हट गया।

एंथोनी एक विजेता की तरह शान से चलता वहां से विदा हो गया।

पीछे खड़ा अष्टेकर ऊपर फ्लैट में रहते उस बच्चे के बारे में सोचता रहा जिसकी सूरत विलियम से मिलती थी।

कोलीवाड़े की जिस चारमंजिला चाल के एक कमरे में वीरू तारदेव रहता था, उसके नीचे एक चाय की दुकान थी जिस पर टेलीफोन लगा हुआ था। वीरू तारदेव ने शांता को खुद बताया था कि बावक्ते-जरूरत वह चाय वाला उसे फोन पर बुला देता था।

शान्ता और शोभा पोस्ट ऑफिस के टेलीफोन बूथ में घुसी हुई थीं और यह नम्बर मिलाकर वीरू तारदेव के लाइन पर आने का इन्तजार कर रही थीं।

एक लम्बे इन्तजार के बाद वीरू तारदेव लाइन पर आया तो शान्ता बड़े व्यग्र भाव से बोली — “मैं शान्ता बोल रही हूं। माल ठिकाने लगा? रोकड़ा बना?”

“इतनी जल्दी यह काम कैसे हो जायेगा?” — उसे वीरू तारदेव की आवाज सुनाई दी।

“क्यों नहीं हो जायेगा? तूने क्या कोई एक-एक आइटम बेचनी है! तूने तो कहा था कि सब माल एक ही बिचौलिया खरीदने वाला था!”

“हां। मैंने बिचौलिये से बात की थी। उसका नाम शेख मुनीर है। माटूंगा में पीजा पार्लर चलाता है। उसने मेरे को शाम को आने को बोला है।”

“हमें रोकड़ा कब मिलेगा?”

“कल सुबह। हर हालत में।”

“तू हमें कहां मिलेगा कल? कब मिलेगा?”

“कल दस बजे। शेख मुनीर के पीजा पार्लर के सामने।”

“ठीक है। हम आयेंगी। तब हमें हर हाल में रोकड़ा मिल जाना चाहिए।”

“मिल जायेगा।”

“वीरू, धोखा किया तो याद रखना...”

लेकिन वीरू तारदेव लाइन काट चुका था।

गुलफाम अली ने नुकसान को चालीस लाख के पेटे में आंका।

एंथोनी अंगारों पर लोट रहा था और पिंजरे मे बन्द शेर की तरह अड्डे के फर्श को रौंदता फिर रहा था।

गुलफाम अली और लल्लू खामोश एक तरफ बैठे थे।

एंथोनी एक बार उनके सामने ठिठका। उसने मेज पर पड़ी विस्की की बोतल उठायी, उसके साथ मुंह लगाकर एक घूंट पिया और फिर गुर्राया — “ताले बड़ी चतुराई से खोले गये हैं। कहीं कोई खरोंच नहीं। कहीं कोई निशान नहीं। यह किसी उस्ताद तालातोड़ का काम है।”

“वीरू!” — गुलफाम के मुंह से निकला — “वीरू तारदेव!”

“नक्को। वो साला पिलपिलाया हुआ बूढ़ा, न मुंह में दांत, न पेट में आंत, वो ऐसी हिम्मत नहीं कर सकता। उसको तो यहां का पता भी पता नहीं हो सकता।”

“उसे हिम्मत कराने वाला, पता बताने वाला कोई मिल गया होगा!”

एंथोनी का ध्यान फौरन शान्ता और शोभा की तरफ गया।

“तुम दोनों में से कोई कभी किसी को यहां तो नहीं लाया?” — एंथोनी बोला।

दोनों के सिर इंकार में हिले।

“मैं लाया था। उन दो फंटियों को लाया था। कई बार लाया था। लेकिन सिर पर नकाब ओढ़ा कर लाया था। उस नकाब में से झांकना नामुमकिन था।”

“नकाब पर कोई ताला तो फिट नई होयेंगा!” — गुलफाम बोला।

“नकाब उन्होंने नहीं उतारी थीं। उतारी होतीं तो मुझे खबर लगती।”

“तो?”

“तो भी अगर किसी को यहां की खबर हो सकती थी तो उन्हीं दोनों को हो सकती थी। यहां की खबर लगना और बात है लेकिन यहां कीमती माल की मौजूदगी की खबर होना और बात है। यह खबर उन हरामजादियों को ही थी। उनकी खबर लेनी होगी।”

“ले लेंगे। वो बार में रोज आती हैं।”

“अगर यह करतूत उनकी हुई तो अब शायद न आयें। रहती कहां हैं?”

“पता नहीं लेकिन पता लगाया जा सकता है। ये कोई मुश्‍किल काम नेई।”

“पता लगाओ। पता लगाओ ताकि मैं अपने हाथों में उनकी गरदनें मरोड़ सकूं।”

“वो ताले नहीं खोल सकतीं। उनके साथ जो तालातोड़ था, गर्दन उसकी मरोड़नी होगी।”

“हां। उसकी भी।” — फिर वह लल्लू की तरफ घूमा — “अष्टेकर तेरे को मिला?”

“नहीं।” — लल्लू बोला।

“क्यों? तेरे घर नहीं पहुंचा वो?”

“पहुंचा होगा। मैं रात को घर नहीं गया था।”

“वो तेरे से यही सवाल करेगा कि कल रात एक बजे तू कहां था! इसका कोई चल सकने लायक जवाब सोच कर रखना।”

“क्यों?”

“नागप्पा का कत्ल हो गया है। रात एक बजे। मिशन हस्पताल में। तुझे किसी दूसरी जगह अपनी मौजूदगी साबित करके दिखानी पड़ सकती है।”

“मैं खुर्शीद के साथ था।”

“खुर्शीद के साथ! सारी रात?”

“हां।”

“नशे में इस जगह के बारे में उस रण्डी के सामने कहीं तू ही तो मुंह नहीं फाड़ बैठा था?”

“मैंने उससे ऐसी कोई बात नहीं कही। और टोनी, उसको रण्डी मत बोल।”

“रण्डी को रण्डी न बोलूं तो क्या बोलूं? साध्वी बोलूं? संन्यासिनी बोलूं? नन बोलू?”

“वो मेरी होने वाली बीवी है।”

एंथोनी हक्का-बक्का सा उसका मुंह देखने लगा।

“तू! लल्लू! शादी कर रहा है! उस... खुर्शीद से?”

“हां।”

“वो तैयार है?”

“हां।”

“अबे अहमक, पहले शादी लायक औकात तो बना ले! शादी करके बीवी कहां रखेगा? उस खोली में! अपनी मां और दादी के साथ! चारों इकट्ठे सोया करोगे?”

“मैं कहीं और जगह ले लूंगा। मेरे पास अस्सी हजार रूपये हैं।”

“अस्सी हजार रुपये हैं। साले ढंग की जगह की इससे दुगनी पगड़ी लगती है। ढंग की क्या, बेढंगी जगह की भी इससे दुगनी पगड़ी लगती है।”

“मैंने घाटकोपर वाले जिस बैंक के बारे में बताया था, उस पर जल्दी हाथ मार लेते हैं।”

“गुलफाम , सुन रहा है लल्लू की बात! साला एक बार हमारे साथ काम करने के बाद अब सलाहें देने के काबिल भी हो गया है।”

गुलफाम खामोश रहा।
 
“पहला काम पहले।” — एंथोनी कर्कश स्वर में बोला — “पहले हमने उन जुड़वां आइटमों का पता लगाना है। बरोबर?”

गुलफाम ने तत्काल, और लल्लू ने हिचकिचाते हुए एक क्षण बाद, सहमति में सिर हिलाया।

माटूंगा के पीजा पार्लर के मालिक का नाम शेख मुनीर था लेकिन कभी किसी ने उसे उस नाम से पुकारा जाता नहीं सुना था। हर कोई उसे डिब्बा कहकर पुकारता था और उसे कभी भी अपने उस नाम से एतराज नहीं हुआ था।

पीजा पार्लर का मालिक और फैंस (चोरी के माल की खरीद-फरोख्त करने वाला) बनने से पहले वह कबाड़ी था और गली-गली घूमकर डिब्बे और बोतलें इकट्ठी किया करता था। उसके पुराने धन्धे में उसका नाम डिब्बा पड़ा था जोकि आज तक चला आ रहा था।

वह वीरू तारदेव को पिछवाड़े के एक बन्द कमरे में ले आया।

चोरी का सारा सामान वीरू तारदेव ने उसके सामने बिछा दिया।

माल देखकर डिब्बे की आंखें फैल गयीं। उसने यूं हैरानी से वीरू तारदेव की तरफ देखा जैसे वह कोई अजूबा हो।

“यह सारा हाथ तू मारेला है?” — डिब्बा बोला।

“हां।” — वीरू तारदेव शान से बोला।

“किधर से मारा?”

“मार दिया किधर से भी।”

“साला हलकट। तभी हजामत बनाकर आएला है और थूक का फव्वारा भी नहीं छोड़ रयेला है।”

“डिब्बे, माल देख और कीमत बोल।”

सारी घड़ियां, जेवर और नशेबाजी का स्टाक परखने में डिब्बे ने आधा घण्टा लगाया।

“पांच।” — फिर वह बोला।

“पांच।” — वीरू तारदेव हड़बड़ाया — “भेजा फिरेला है। अबे, बीस-पच्चीस का तो यह साला नशे का स्टाक ही है।”

“ये अपुन की लाइन नहीं। इसे तो अपुन तेरे पर मेहरबानी करके ले रहा है। तू इसे कहीं और बेच ले।”

“मैं और किसी को नहीं जानता।”

“क्यों नहीं जानता? तू खुद भी तो यही कुछ बेचता है!”

“रिटेल में। मेरे सप्लायर को पता लग गया कि मेरे पास इन चीजों का इतना बड़ा स्टाक है तो वह मेरी लाश गिरा देगा। वो समझेगा मैंने डायरेक्ट स्मगलिंग शुरू कर दी है।”

“अपुन तो इतना ही रोकड़ा दे सकता है।”

“बहुत कम है। तेरे कू भी मालूम है कि यह बहुत कम है।”

डिब्बा खामोश हो गया।

“तू तो...”

“ठहर, जरा सोचने दे।”

वह और कई क्षण खामोश रहा।

“ठीक है।” — अन्त में वह बोला — “तू मेरा पुराना यार है। तेरे वास्ते मैं ऐसा करता हूं, मैं यह नशे वाला माल किसी और को दिखाता हूं। अगर माल उधर चला गया तो दस पर्सेन्ट कमीशन अपुन का और सारा बाकी रोकड़ा तेरा। मंजूर?”

“मुझे पता कैसे चलेगा कि माल चल गया है? और कितने में चला है?”

“रात बारह के बाद इधर फोन करना। या कल सुबह सवेरे इधर आ जाना।”

“ठीक है लेकिन कल सुबह मेरा काम जरूर हो जाए।”

“क्यों? ऐसी क्या हड़बड़ी है?”

“मैं ये शहर छोड़ रहा हूं। हमेशा के लिए। जो रोकड़ा मिलेगा, उससे मुम्बई से बहुत दूर किसी छोटी जगह पर जाकर चैन से बुढ़ापा काटूंगा। सारी जिन्दगी कुत्ते की तरह दुर-दुर करते गुजारी है। ऊपर वाले ने मौका दिया है तो जिन्दगी के आखिरी दिन तो चैन से काट लूं।”

डिब्बा असमंजसपूर्ण निगाह से उसका मुंह देखता रहा।

लल्लू अड्डे से अपने घर लौटने की जगह फिर खुर्शीद के घर पहुंच गया।

“तू फिर आ गया!” — वह बड़े प्यार से बोली।

“हां।” — लल्लू बोला — “मेरे साथ चल।”

“कहां?”

“मेरे घर।”

“तेरे घर?”

“हां। शादी के बाद तू अपनी मां के साथ ही थोड़े ही रहती रहेगी!”

“क्या हर्ज है?”

“है हर्ज। शादी के बाद लड़की को ससुराल में रहना पड़ता है। अब कम से कम अपना ससुराल देख तो ले!”

“ससुराल!” — वह हंसी — “कौन-कौन हैं मेरे ससुराल में?”

“मेरी मां और दादी।”

“बस?”

“बस।”

“हाय, कोई देवर भी होता तो कितना मजा आता!”

“साली, देवर से आशनाई करती?”

“तो क्या हुआ? सारी भाभियां करती हैं। तेरी मां क्या बहुत ज्यादा उम्र की है? अभी बच्चा पैदा नहीं कर सकती?”

“कमीनी, वह विधवा है।”

“ओह!”

वह खुर्शीद के साथ अपनी खोली पर पहुंचा।

उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि खुर्शीद ने खोली से नाक न चढ़ायी।

उसको देखते ही दोनों वृद्धाओं के चेहरे खिल उठे।

“अरे, लल्लू” — दादी बोली — “तू आ गया।”

“हमारे तो प्राण सूखे हुए थे।” — मां बोली — “इतने बुरे-बुरे खयाल आ रहे थे।”

“रात को न आना हो तो” — दादी बोली — “बता कर तो जाया कर, रे। कल का गया दोपहर को लौटा है। सोचता नहीं तेरे पीछे तेरी फिक्र में हमारा क्या हाल होता होगा!”

ऐसी ही कितनी और बातें कर चुकने के बाद कहीं जाकर उनकी तवज्जो खुर्शीद की तरफ गयी।

“अरे” — मां बोली — “ये कौन है तेरे साथ?”

“मां” — लल्लू बोला — “ये तेरी बहू है।”

मां के हाथ से कड़छी छूट गयी। उसका मुंह खुले का खुला रह गया। वह हक्की-बक्की सी लल्लू का मुंह देखने लगी।

“तूने” — फिर उसके मुंह से निकला — “शादी कर ली?”

“अभी नहीं की। लेकिन करनी है।”

“करनी है! मां से बिना पूछे! दादी से बिना पूछे!”

“पूछने ही तो आया हूं!”

“शादी यूं होती है!” — दादी भुनभुनाई — “बीवी लाया है या बाजार से बकरी खरीद कर लाया है!”

खुर्शीद ने तत्काल लल्लू की तरफ देखा। लल्लू ने आंखों आंखों में उसे आश्‍वासन दिया।

“लड़की है तो बहुत सुन्दर!” — मां उसे निहारती बोली — “बेटी, नाम क्या है तेरा?”

“खुर्शीद।” — खुर्शीद धीरे से बोली।

“खुर्शीद!” — मां चिंहुक कर एकदम पीछे हटी — “तू मुसलमान है?”

“हां।”

“हूं।” — मां ने उसकी तरफ से पीठ फेर ली — “मैं चाय बनाती हूं।”

“चाय रहने दे, मां।” — मां के बदलते तेवर देखकर लल्लू बोला — “मुझे खुर्शीद को इसके घर छोड़ने जाना है।”

“एक पुलिस वाला तुझे पूछता यहां आया था। अष्टेकर नाम बताया था उसने। कहता था, थाने में बड़ा दरोगा था।”

“मुझे क्यों पूछ रहा था?”

“कहता था कि किसी हस्पताल में किसी का खून हो गया था। उसी बारे में वह तेरे से बात करना चाहता था। कहता था फिर आयेगा।”

“खुद आएगा! मुझे थाने आने के लिए नहीं बोल कर गया?”

“नहीं। कहता था क्योंकि तेरा बाप उसका दोस्त था इसलिए वह तेरा लिहाज कर रहा था।”

“हूं। मैं जा रहा हूं। अभी आता हूं।”

उसने खुर्शीद की बांह थामी और उसके साथ खोली से बाहर निकल आया।

“मुझे यह बखेड़ा तो सूझा ही नहीं था!” — बाहर सड़क पर आकर लल्लू बोला — “मुझे तो सूझा ही नहीं था कि मैं हिन्दू हूं, तू मुसलमान है।”

“ये शादी नहीं होने की।” — खुर्शीद बोली।

“ये शादी जरूर होगी।” — लल्लू दृढ़ स्वर में बोला।

“तेरी अम्मायें मुसलमान बहू कबूल करती नहीं मालूम होतीं।”

“तेरी मां भी तो हिन्दू दामाद से ऐतराज कर सकती है!”

“वो नहीं करेगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरी मां मेरे काबू में है। लेकिन तू अपनी मां के काबू में है। मैं बालिग हूं। खुदमुख्तार हूं। तू... तू लल्लू है।”

“मैं भी बालिग हूं, खुदमुख्तार हूं।” — लल्लू गुस्से से बोला — “इक्कीस साल का हूं। मेरी मां न माने, मैं फिर भी तेरे से शादी करूंगा।”

“फिर कैसे करेगा?”

“शादी कोर्ट में भी होती है। तू मेरे साथ अभी कोर्ट में चल।”

“सोच ले, लल्लू।”

“सोच लिया और तू मुझे लल्लू कहना बन्द कर।”

“ठीक है। चल।”

कोर्ट में जाकर लल्लू को मालूम हुआ कि शादी की रजिस्ट्री के लिए दो गवाहों की जरूरत होती थी और मैरिज रजिस्ट्रार को पहले एक महीने का नोटिस देना पड़ता था।

लल्लू को बड़ी मायूसी हुई।

फिर नोटिस दाखिल करके वे वापिस लौटे आये।

वापिसी में घाटकोपर के बैंक का खयाल उसे बार-बार आ रहा था।

वहां एक ही हाथ ऐसा तगड़ा पड़ सकता था कि वारे न्यारे हो जाते।

लल्लू कभी वहां कैन्टीन ब्वाय की नौकरी करता था। तभी से उसे मालूम था कि हर महीने चार बार निश्‍चित तारीख को निश्‍चित समय पर वहां से कम से कम साठ लाख रुपया एक बख्तरबन्द गाड़ी में ढ़ोया जाता था। लल्लू जो कुछ उस सिलसिले में जानता था, वह सब वह टोनी को बता चुका था।

अनायास ही लल्लू उस विपुल धनराशि में बराबर के हिस्से के सपने देखने लगा।

किंग्ज सर्कल रेलवे स्टेशन के सामने की एक चारमंजिला इमारत के करीब एंथोनी अपनी फियेट कार में बैठा सिगरेट के कश लगा रहा था।

गुलफाम अली द्वारा हासिल की जानकारी के मुताबिक उसी इमारत की दूसरी मंजिल के एक कमरे में वे दोनों फंटियां रहती थीं।

अपने कमरे में वे मौजूद नहीं थीं इसलिए एंथोनी अपनी कार में बैठा उनके लौटने का इन्तजार कर रहा था। गुलफाम को वह कहकर आया था कि अगर वो दोनों पास्कल के बार में दिखाई दें तो वह उसे वहां से बुलाकर ले जाये।

उसकी निगाह अपने आप ही इलाके में चारों तरफ घूम गयी। सड़क पर अधनंगे, फटे हाल बच्चे खेल रहे थे। उनमें से कई इसी उम्र में समैक पीना सीख चुके थे और जो कमाते थे सब समैक में फूंक देते थे, जेबकतरे और कारों के टायर चोर तो वे अभी थे, उन्हीं में से भविष्य के बड़े दादा, बड़े गैंगस्टर पैदा होने वाले थे।

कभी वह खुद भी उन्हीं की तरह फटेहाल, अधनंगा सड़क पर घूमा करता था और किसी असुरक्षित कार का पहिया उतार कर लुढ़का ले जाने की फिराक में रहा करता था।

उन दिनों अष्टेकर हवलदार हुआ करता था।

अष्टेकर उन दिनों भी उसकी नीयत पहचानता था इ‍सलिए कई बार तो आते-जाते खामख्वाह, चेतावनी के तौर पर उसे दो डण्डे जमा जाता था। ऐसा वह सिर्फ उसके साथ ही नहीं, उसकी उम्र के बाकी लड़कों के साथ भी किया करता था।

सिवाय विलियम फ्रांसिस के।

पता नहीं क्यों विलियम को वह कभी डन्डा नहीं जमाता था, उसकी तरह वह उसे कानों से पकड़कर जमीन से तीन फुट ऊंचा नहीं कर देता था। विलियम को उन दिनों जो सबसे ज्यादा मार पड़ी थी, वह एक झांपड़ था जो तब पड़ा था जबकि अष्टेकर ने विलियम और एंथोनी समेत कोई छ:-सात लड़कों को चरस पीते पकड़ा था। बाकी जनों की अष्टेकर ने मार-मार कर चमड़ी उधेड़ दी थी लेकिन विलियम को सिर्फ एक झांपड़ रसीद किया था।

कोई एक घण्टे के उकता देने वाले इन्तजार के बाद एंथोनी ने शोभा और शान्ता को सड़क पर चली आती देखा।

एंथोनी ने नया सुलगाया सिगरेट फेंक दिया और अपनी पतलून की बैल्ट में खुंसी रिवॉल्वर की मूंठ को टटोला।

दोनों उसकी दिशा में निगाह उठाये बिना इमारत में दाखिल हो गयीं।

एंथोनी कार से बाहर निकला।

उनके पीछे-पीछे वह इमारत में दाखिल हुआ।

शोभा कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द कर रही थी जबकि एंथोनी ने दरवाजे को ऐसा जोर का धक्का दिया कि पल्ला उसके हाथ से छूट गया।

उसने भीतर कदम रखा।

उस पर निगह पड़ते ही दोनों के चेहरे पीले पड़ गये।

“हल्लो!” — एंथोनी बोला।

उन्होंने उत्तर न दिया।

“क्या बात है? मेरी आइटमें मुझे देखकर खुश नहीं हुयीं!”

“नहीं, टोनी।” — शान्ता बोली — “हम तो बहुत खुश हुयी है। हां, हैरानी जरूर हो रही है तुम्हें यहां देखकर।”

“हमें मालूम नहीं था” — शोभा बोली — “कि तुम्हें हमारे घर का पता मालूम था।”

“नहीं मालूम था। आज ही मालूम हुआ है।”

“कैसे आए?” — शान्ता बोली।

“तुम्हें लेने आया हूं।”

“क्या!”

“आज बोर हो रहा था इसलिए तुम दोनों की याद आ गई। चलो।”

“कहां?”

“वहीं जहां हमेशा जाती हो। मेरे अड्डे पर। चलकर मस्ती मारेंगे।”

“टोनी, वहां नहीं।” — शान्ता तुरन्त बोली।

“क्यों?” — एंथोनी के माथे पर बल पड़े।

“हमसे नकाब नहीं ओढ़ी जाती।”

“वहां बन्द माहौल में घुटन महसूस होती है।” — शोभा बोली।

“कमाल है! पहले तो ऐसी शिकायत तुम्हें कभी नहीं हुई थी!”

“हुई थी।” — शान्ता बोली — “पहले दिन से हुई थी लेकिन हम कहती नहीं थीं।”

“ओके! ओके! चलो, कहीं और चलते हैं।”

“यहीं क्यों नहीं रुक जाते हो?” — शान्ता बोली — “यहां...”

“नहीं। यहां मेरा दम घुटता है। और फिर ड्राइव का भी तो मजा लेने का है!”

शान्ता ने शोभा की तरह देखा।

शोभा ने असहाय भाव से कन्धे उचकाये।

“ठीक है।” — शान्ता बोली — “चलो।”

तीनों नीचे आकर कार में सवार हो गए। एंथोनी ड्राइविंग सीट पर, दोनों लड़कियां पीछे। एंथोनी ने कार आगे बढ़ाई।

“किधर जाने का है?” — शान्ता बोली।

“अभी देखती जाओ।” — एंथोनी बोला।

वह उन्हें वरसोवा बीच के एक उजाड़ हिस्से में ले आया।

उसने कार का इंजन बन्द किया और घूमकर पीछे देखा।

“कभी कार में ठुकी हो?” — एंथानी बोला।

दोनों ने इंकार में सिर हिलाया।

“तो फिर आज तुम दोनों को नया तजुर्बा होने वाला है। कपड़े उतारो।”

“नहीं, टोनी” — शोभा बोली — “कार में नहीं।”

“तो फिर अड्डे पर चलो।”

“वहां से तो कार ही ठीक है।” — शान्ता बोली।

“यहां कोई आ गया तो?” — शोभा बोली।

“कोई नहीं आने का। उजाड़ तो पड़ी है सब तरफ।”

“फिर भी...”

“फिर भी ऐसा सही कि बारी-बारी। एक जनी लेटे दूसरी पहरेदारी करे। कोई आता दिखेगा तो सम्भल जायेंगे।”

“टोनी, यूं क्या फायदा...”

“है फायदा। आज मेरा यूं ही एडवेंचर मारने का मूड बन रयेला है। तू कपड़े उतार।”

“मैं!” — शोभा हड़बड़ाई।

“हां। शान्ता पहरेदारी करेगी।”

“सारे?”

“हां।”

“लेकिन...”

“सुना नहीं! उतारती है या मैं खुद फाड़कर उतारूं।”

“अच्छा, अच्छा।”

शोभा ने अपनी जींस, स्कीवी वगैरह उतारकर कार के फर्श पर डाल दीं।

“वाह! कितनी शानदार बनी हुई है तू! ये बुन्दे मैंने पहले तो तेरे कान में नहीं देखे!”

“ये... ये मैंने आज ही खरीदे हैं।” — शोभा बोली।

एंथोनी ने हाथ बढ़ाकर एक बुन्दे को परखा।

“काफी कीमती मालूम होते हैं।” — बुन्दे से हाथ हटाये बिना वह बोला — “कहां से खरीदे?”

“हर्नबी रोड से।”

“कितने के?”

“च... चार हजार के।”

“माल तो चार हजार से ज्यादा का लगता है! मुझे तो यह दस हजार कीमत का माल लग रहा है!”

“म... मैंने तो चार हजार ही दिए थे!”

“नकद?”

“हां।”

“इतना रोकड़ा था तेरे पास?”

“मैंने जमा किया था।”

“इन बुन्दों की खातिर?”

“हां।”

“जो कि तेरे कानों में इतने शानदार लग रहे हैं।”
 
एकाएक एंथोनी ने हाथ में थमे बुन्दे को एक जोर का झटका दिया। शोभा का कान कट गया। बुन्दा एंथोनी के हाथ में आ गया। शोभा पीड़ा से बिलबिलायी, उसने चिल्लाने के लिए मुंह खोला तो एंथोनी ने फुर्ती से रिवॉल्वर निकाल कर उसकी नाल उसके मुंह में घुसेड़ दी। शोभा की चीख उसके हलक में ही घुटकर रह गयी।

“तूने भी” — उसने शान्ता की तरफ देखा — “कोई नया जेवर खरीदा है? हर्नबी रोड से? आधी से कम कीमत पर?”

आतंकित शान्ता ने इंकार में सिर हिलाया।

“क्यों? क्यों नहीं खरीदा? अभी बाद में खरीदेगी?”

शान्ता ने उत्तर न दिया। उसने जोर से थूक निकली।

“हरामजादियो” — एंथोनी हिंसक भाव से बोला — “तैयार हो जाओ अपने बनाने वाले के पास पहुंचने के लिए।”

“टोनी! टोनी!” — भय और पीड़ा से रोती-बिलखती शोभा बोली, नाल मुंह में होने की वजह से वह बड़ी मुश्‍क‍िल से बोल पा रही थी — “मेरी बात सुनो।”

“क्या सुनायेगी साली?”

“प्लीज। प्लीज, मेरी बात सुनो।”

एंथोनी ने रिवॉल्वर उसके मुंह से बाहर खींच ली।

“बोल, क्या कहती है?”

शोभा के कटे कान से खून टप्प-टप्प करके उसके नंगे कन्धे पर गिर रहा था लेकिन उस घड़ी उसकी उस तरफ तवज्जो नहीं थी।

“टोनी” — वह रोती हुई बोली — “मेरा कोई कसूर नहीं। सब किया-धरा शान्ता का है। इसी ने मुझे मजबूर किया कि...”

“क्या सब किया-धरा शान्ता का है?” — एंथोनी के स्वर में नम्रता आ गयी।

“वही... वही जो... जिसकी वजह से...”

“मैंने तो कुछ भी नहीं कहा!” — उसने शान्ता की तरफ देखा — “शान्ता, यह क्या कह रही है तेरी जोड़ीदार? तूने इसे क्या करने पर मजबूर किया था?”

शान्ता के मुंह से बोल न फूटा।

एंथोनी के खाली हाथ का एक झन्नाटेदार थप्पड़ शान्ता के मुंह पर पड़ा।

शान्ता की गरदन फिरकनी की तरह घूमी। उसकी आंखों से आंसू छलछला आए।

“ताला किसने खोला?” — एंथोनी का स्वर फिर क्रूर हो उठा।

“वीरू तारदेव ने।” — शोभा बोली।

“उस कुत्ते के पिल्ले की इतनी मजाल हो गयी?”

“शान्ता ने उसे पटाया था।”

“अड्डे का पता कैसे मालूम हुआ?”

“वो भी शान्ता को ही मालूम था।”

“कैसे? नकाब में से झांकती थी?”

“नहीं।”

“तो?”

शोभा ने बताया।

“शाबाश!” — एंथोनी प्रशंसात्मक स्वर में बोला — “शाबाश शान्ता बाई, शाबाश! मैं तो तेरे साथ इतनी मुहब्बत से पेश आता रहा और तूने मुझे उसका यह सिला दिया! माशूक तो बहुत वफादार होती हैं। तू कैसी माशूक है जो तूने मेरा अड्डा लुटवा दिया?”

“टोनी” — शान्ता सिर झुकाए बोली — “मुझे माफ कर दो।”

“ओके। कर दिया माफ। अब कपड़े उतार।”

शान्ता ने बिना कोई हुज्जत किए कपड़े उतार दिए।

“अब यूं ही नंगी घर तक भाग सकती है तो भाग जा। मैं तुझे गोली नहीं मारूंगा।”

शान्ता अपनी जगह से न हिली।

“माल कहां है?”

“वीरू तारदेव के पास।”

“सारा?”

“ऐसे बुंदों का एक और जोड़ा और दो नैकलेस हमारे पास हैं।”

“कहां?”

“हमारे घर में।”

“वीरू तारदेव माल का क्या करेगा?”

“बेचेगा और हमें हिस्सा देगा।”

“अभी बेचा नहीं?”

“नहीं।”

“कब हिस्सा देगा?”

“कल। सुबह दस बजे।”

“कहां मिलेगा वो तुम्हें?”

“माटूंगा में। शेख मुनीर के पीजा पार्लर के सामने।”

“हूं। कार से निकलो।”

“क... क्या?”

“पिछली सीट पर हम तीनों नहीं लेट सकते। सामने पेड़ों का झुरमुट है। वहां चलो।”

“टोनी” — शोभा बोली — “किसी ने देख लिया तो?”

“अरे, दूर-दूर तक चिड़िया का बच्चा नहीं है। चलो, जल्दी करो।”

तीव्र अनिच्छा का प्रदर्शन करती दोनों कार से बाहर निकलीं और पेड़ों के झुरमुट की तरफ बढ़ीं।

“तुम भी तो आओ।”

“तुम चलो, मैं गाड़ी बन्द करके तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहा हूं।”

दोनों आगे बढ़ीं।

वे दस कदम आगे बढ़ी होंगी कि एंथोनी ने आवाज लगाई।

दोनों ने घूमकर देखा।

एंथोनी ने दोनों को शूट कर दिया।

शाम को ट्रेन से कल्याण लौटता जोगलेकर शाम का अखबार पढ़ रहा था। अखबार में कल्याण की बैंक डकैती का फिर जिक्र था। उस जिक्र में दो बातें ऐसी थीं कि जिनकी वजह से जोगलेकर ने बाकी अखबार पढ़ने की जगह वही खबर कोई दस बार पढ़ी।

एक तो बैंक की तरफ से डकैतों को पकड़वाने के लिए बीस हजार रुपये के इनाम की घोषणा की गई थी।

दूसरे, कल्याण थाने के इन्स्पेक्टर पेनणेकर का एक इण्टरव्यू छपा था जिसमें एक अंगूठे के निशान का जिक्र था। पेनणेकर के अनुसार वह निशान गोंद जैसे पेस्ट के एक फिफ्टी पर लगे थक्के पर से उठाया गया था और निश्‍चय ही डकैतों में से ही किसी के अंगूठे का था। वह गोंद जैसा पेस्ट निश्‍चय ही डकैतों के चेहरों पर नकली दाढ़ी-मूंछ चिपकाने के लिए इस्तेमाल किया था।

जोगलेकर को उस छोकरे की याद आयी जिसका परसों उसने रेल का भाड़ा भरा था। उसके चेहरे पर गोंद जैसा पेस्ट लगा उसने खुद देखा था और छोकरे ने, जिसने अपना नाम लल्लू बताया था, कबूल भी किया था कि वह नकली दाढ़ी चिपकाने के काम आने वाली गोंद थी।

तो क्या वह छोकरा बैंक डकैतों में से एक था?

क्या उसने झूठ बोला था कि वह एक्टर था और किसी फिल्म की लोकेशन शूटिंग से लौट रहा था?

अपने खयालों में वह बीस हजार रुपये के नोट गिनने लगा।

फिर उसे उस कागज़ के पुर्जे का खयाल आया जिस पर लल्लू ने उसे अपना नाम और पता लिखकर दिया था।

उसने अपनी जेबें टटोलीं।

कागज़ का पुर्जा किसी जेब से बरामद न हुआ।

फिर उसे खयाल आया कि आज वह दूसरा सूट पहनकर आया था।

तभी गाड़ी कल्याण स्टेशन पर रुकी।

घर पहुंचते ही उसने सबसे पहले सूट की सुध ली। सूट अलमारी में नहीं था।

उसने बीवी को बुलाया।

“मेरा नीला सूट कहां गया, जमना बाई?”

“ड्राईक्लीनर के पास गया और कहां गया!” — बीवी नाक चढ़ाकर बोली — “इतना तो मैला था!”

“अरे, उसकी जेबें देखीं। उनमें से एक में...”

“जेबों में था क्या? एक सड़ा-सा कागज़ का पुर्जा था, कुछ बस की टिकटें थीं और...”

“वो पुर्जा कहां गया?”

“उसे मैंने टिकटों के साथ फाड़कर कूड़े में फेंक दिया।”

जोगलेकर को बीस हजार के नोट पुर्जा-पुर्जा हुए कूड़े में उड़ते दिखाई दिये।

“और खाली पर्स मैंने उधर मेज के दराज में रख दिया है।”

खाली पर्स!

टिकट चैकर का दिया हुआ पर्स!

जोगलेकर यूं बगूले की तरह मेज की तरफ झपटा कि उसकी बीवी हक्की-बक्की सी उसका मुंह देखने लगी।

कब्रिस्तान में मुकम्मल सन्नाटा था।

एक मोटे पेड़ के तने के पीछे छुपा अष्टेकर दो महिलाओं और एक बच्चे को हाथों में फूल लिये विलियम की कब्र की ओर बढ़ता देख रहा था। उनमें से एक महिला मोनिका थी, बच्चा मिकी था जो कि अपनी मां की उंगली थामे था।

दूसरी औरत मार्था थी।

विलियम की मां। मिकी की दादी।

अष्टेकर ने बड़े अरमान से मार्था की तरफ देखा।

पचास के पेटे में थी मार्था लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर वही नूर था जो उसने तीस साल पहले तब देखा था जब वह जुहू बीच की तनहाई में उससे आखिरी बार मिली थी। जवान बेटे की मौत का गम और अवसाद भी उस नूर पर हावी नहीं हो पा रहा था।

अष्टेकर के मन में हूक सी उठी।

यह औरत, जिसे उसकी बीवी होना चाहिए था, किसी और की बीवी थी। उस औरत के लिये उसके मन में जो ख्वाहिश थी, वो आज तीस साल बाद बुढ़ापे में भी खत्म नहीं हुई थी। कम नहीं हुई थी।

उन तीनों ने विलियम की कब्र पर फूल चढ़ाये और वहां से विदा हो गयीं।

जब वे कब्रिस्तान के फाटक से बाहर निकल गयीं तो वह पेड़ की ओट में से निकला।

भारी कदमों से चलता वह विलियम की कब्र के पास पहुंचा।

उसने अपनी पीक कैप उतार कर हाथ में ले ली और अपलक फूलों से ढंकी कब्र को देखने लगा।

फिर उसने यूं झुककर कब्र को छुआ जैसे विलियम के जिस्म की छू रहा हो, उसे प्यार कर रहा हो।

‘मेरा बेटा!’ — वह होंठों में बुदबुदाया — ‘मेरा बेटा!’

लल्लू ने थूक से लिफाफा बन्द किया, उस पर लिखा पता एक बार फिर पढ़ा और लिफाफा लेटर बॉक्स में धकेल दिया।

खुर्शीद को लिफाफे में एक पचास रुपये के नोट की झलक साफ मिली थी।

“यह कौन सी अम्मा को रोकड़ा डाक से भेज रहा है?” — खुर्शीद ने पूछा।

“पागल हुई है!” — लल्लू बोला — “यह तो मैंने किसी आदमी से ट्रेन में पचास रुपये उधार लिये थे, उसे वापिस भेज रहा हूं।”

“ओह!”

“तू तो यूं जलकर दिखा रही है जैसे मैं सचमुच ही किसी छोकरी को...”

“मेरी जूती जलती है।”

“अब मैं घर जाता हूं। बहुत रात बीत गयी है। कल भी मैं घर नहीं गया था। मेरी मां और दादी सोच-सोचकर हलकान हो रही होंगी कि मैं कहां मर गया।”

“अपनी मां और दादी का तू बहुत खयाल करता है।”

“कहां करता हूं! करना चाहिए लेकिन कर नहीं पाता। बेचारी बूढ़ी औरतों का मेरे सिवाय और है कौन इस दुनिया में!”

“हूं।”

“चल मैं तुझे घर छोड़कर आऊं।”

“क्यों? मैं बच्ची हूं? खुद घर नहीं जा सकती?”

“तो जा।”

“उलटे चल मैं तुझे घर छोड़कर आऊं।”

“मुझे! मुझे किस लिये?”

“क्योंकि तू लल्लू है, किचू है। रास्ते में अंधेरे में डर गया तो?”

लल्लू ने जोर से उसके कूल्हे पर चिकोटी काटी।

“उई, मां!” — खुर्शीद दर्द से चिल्लाई।

“अब फूट।”

जोगलेकर ने प्लास्ट‍िक की एक थैली में महफूज पर्स इन्स्पेक्टर पेनणेकर को पेश किया और ट्रेन में मिले लल्लू नाम के उस विशालकाय नौजवान की सारी कहानी सुनाई जिसको उसने पचास रुपये उधार दिये थे और जिसके चेहरे पर उसने वह गोंद जैसा पेंट चिपका देखा था जिसका जिक्र अखबार में था। उसने आगे कहा कि लल्लू नाम का वह नौजवान डकैतों में से एक हो सकता था, वह पर्स उसका हो सकता था और उस पर से उसकी उंगलियों के निशान बरामद किये जा सकते थे।

जोगलेकर को लल्लू का बड़ी बारीकी से हुलिया बयान करने के लिये कहा गया।

उसने ईनाम की बाबत सवाल किया।

“अगर पर्स से उठाया गया कोई प्रिंट” — पेनणेकर बोला — “हमारे पास उपलब्ध अंगूठे के प्रिंट से मिल गया तो यह सिद्ध हो जायेगा कि आपको मिला वह कथित लल्लू बैंक डकैतों में से एक था। बड़े अफसोस की बात है कि उसके पते वाला पुर्जा आप सम्भाल कर न रख सके।”

“वो मेरी बीवी ने...”

“हां। सुना मैंने। खैर! अब आपको कल यहां आना होगा और पुलिस के आर्टिस्ट के साथ बैठना होगा।”

“वो किस लिये?”

“ताकि आपके बयान के मुताबिक वह लल्लू की तसवीर बना सके। ऐसी तसवीर को कम्पोजिट पिक्चर कहते हैं। तरह-तरह के नयन नक्शों की कम्पोजीशन आर्टिस्ट तब तक तैयार करेगा जब तक आप नहीं कह देंगे कि उसकी बनाई तसवीर आपके लल्लू से मिलती थी। मेहनत का काम है। आपका काफी वक्त जाया होगा। आप ऐसा करने को तैयार हैं?”

जोगलेकर ने लल्लू के बारे में सोचा। साला कैसा हरामी निकला था! वादा करके भी पचास रुपये नहीं भेजे थे उसने। अच्छा हो अगर वही बैंक डकैत निकले।

“ऐसे अगर” — फिर वह बोला — “वो शख्स पकड़ा गया तो ईनाम...”

“आप ही को मिलेगा।”

“फिर क्या वान्दा है! मैं कल सुबह सवेरे ही आ जाऊंगा।”

खुर्शीद अपने घर वाली इमारत में कदम रखने लगी तो एक आदमी प्रेत की तरह उसके सामने आ खड़ा हुआ।

वह अचकचा कर एक कदम पीछे हट गयी।

“धन्धे से लौट रही हो, खुर्शीद बेगम!”

खुर्शीद ने देखा, वह इन्स्पेक्टर अष्टेकर था।

“क्या चाहते हो?” — वह शुष्क स्वर में बोली।

“कुछ पूछना चाहता हूं।”

“किस बाबत?”

“कई बातों की बाबत। उनमें से एक बात हजारे की बाबत है। हजारे को जानती है न? जिसे लल्लू भी कहते हैं!”

“मेरी जाती जिन्दगी से किसी को कोई वास्ता नहीं होना चाहिये।”

“किसी को नहीं होना चाहिये लेकिन पुलिस को होना चाहिये। है। रण्डी की जाती जिन्दगी से पुलिस का वास्ता बराबर होता है। कभी गिरफ्तार हुई है?”

खुर्शीद का सिर अपने आप ही इंकार में हिला।

“यानी कि इत्तफाकन ही भारी फजीहत से बची हुई है। कोर्ट-कचहरी। थाना-चौकी। जमानत। सजा-जुर्माना। क्या?”

“मैंने धन्धा छोड़ दिया है।”

“वाकेई!”

“अल्लाह कसम, मैंने धन्धा छोड़ दिया है।”

“हजारे की वजह से?”

खुर्शीद ने सहमति में सिर हिलाया।

“उस से मुहब्बत करती है?”

“हां।”

“फिर तो मेरी बात और भी गौर से सुन। इस लड़के का बाप मेरा दोस्त था इसलिये मैं उसका भला चाहता हूं। उससे मुहब्बत करती है तो तू भी उसका भला चाहती होगी। चाहती है न?”

“हां।”

“तो उसकी खातिर — और खुद अपनी खातिर — उसे समझा कि वह वो कुत्ती सोहबत छोड़ दे जिसमें वह आजकल फंसा हुआ है।”

खुर्शीद ने प्रश्‍नसूचक नेत्रों से उसकी तरफ देखा।

“मैं टोनी और गुलफाम की बात कर रहा हूं। तू जानती है न उन्हें?”

खुर्शीद ने सहमति में सिर हिलाया।

“वो दोनों बड़े खतरनाक मवाली हैं। चोरी, डकैती, स्मगलिंग, खून-खराबा, हर काम में उनका दखल है। चालाक इतने हैं कि अपने खिलाफ कोई सबूत नहीं छोड़ते। मेरे पास उनके खिलाफ जरा भी कुछ हो तो सालों को अभी बन्द कर दूं। टोनी एक बार जेल की हवा खा आया है लेकिन वह सजा मामूली थी, उसके बड़े-बड़े कारनामों के मुकाबले में उसका अपराध मामूली था।”

“क्या किया था उसने?” — खुर्शीद उत्सुक भाव से बोला।

“उसने मेरे पर — एक आन ड्यूटी पुलिस अधिकारी पर — हाथ उठाया था।”

“ओह!”

“खुर्शीद बेगम, अपराध कागज़ की नाव की तरह होता है जो बहुत देर तक, बहुत दूर तक नहीं चल सकती। यह बात तूने वक्त रहते हजारे को समझानी है। उसके दोनों उस्ताद देर-सवेर कानून के चंगुल में जरूर फंसेंगे और जब फंसेंगे तो बहुत बुरा फंसेंगे। अगर तू वाकेई उससे मुहब्बत करती है तो यह बात तू उसे समझा। तेरे समझाये वह समझ जायेगा। हो सके तो उसे यहां से ले जा।”

“कहां?”

“कहीं भी। किसी और शहर में। मुम्बई से दूर। टोनी और गुलफाम की काली छाया से दूर।”

“वह न गया तो?”

“जाएगा। तेरे कहने से जाएगा। न जाए तो रस्से बांध के, घसीट के ले के जा।”

“मैं कोशिश करूंगी।”

“दिल से कह रही है?”

“हां।”

“शाबाश! अगर तू ऐसा कर पायी तो समझना तेरे इस एक ही नेक काम ने तेरी गुनाहों से पिरोई जिन्दगी के सारे पाप धो दिए। तूने एक नेक, नादान, कमअक्ल, कमउम्र नौजवान को बैमौत मरने से बचा लिया।”

फिर अष्टेकर लम्बे डग भरता वहां से विदा हो गया।

लल्लू घर पहुंचा तो उसकी मां ने बताया कि कोई आदमी कहकर गया था कि उसे टोनी बुला रहा था।

वह उलटे पांव पास्कल के बार में पहुंचा।

टोनी और गुलफाम उसे अड्डे पर मिले।

टोनी को उसने पगलाये हुए सांड की तरह बिफरा पाया।
 
वह नशे में धुत्त था और सीधे बोतल से अभी और विस्की पी रहा था।

“वो हरामजादा, कुत्ते का पिल्ला, कंजर का बीज” — वह चिल्ला रहा था — “वो मच्छर, वो खटमल, वो भुंगा, वो वीरू तारदेव, वो मुझे चूना लगा गया। उसकी ऐसी मजाल हो गयी। किसी को पता लगेगा कि एंथोनी फ्रांकोजा वीरू तारदेव नाम के अर्थी के फूल के लूटे लुट गया तो वह मेरे पर हंसेगा, मेरे मुंह पर थूकेगा। मेरी इज्जत का, मेरे दबदबे का जनाजा निकल जाएगा। यह वीरू तारदेव नाम का कुत्ता, जिन्दा नहीं रहना चाहिए। इसे अगली सुबह देखनी नसीब नहीं होनी चाहिए।”

“उसे मार देना क्या बड़ी बात है!” — गुलफाम गम्भीरता से बोला — “लेकिन अगर वो मर गया तो माल हासिल नहीं होने का।”

“माल वैसे भी हासिल नहीं होने का। माल अब तक कहीं का कहीं पहुंच चुका होगा। अब वो कौड़ियों का मोल ही हासिल हो सकता है जो उस हरामी के पिल्ले को माल बेचकर मिला होगा। वह एक मामूली रकम होगी जिसके लिए मैं उसे जिन्दा नहीं रहने दे सकता। एंथोनी फ्रांकोजा की मूंछ नोचने की हिम्मत करने वाला भीड़ू जिन्दा नहीं रह सकता। वह मरेगा, आज ही रात मरेगा... और लल्लू के हाथों मरेगा।”

लल्लू बुरी तरह चौंका।

“लल्लू आज साबित करके दिखाएगा कि इसकी छाती पर कितने बाल हैं! आज यह करम चन्द बनकर दिखाएगा। करम चन्द हजारे बनकर दिखायेगा। करम चन्द हजारे साहब बनकर दिखाएगा। साबित करके दिखायेगा कि यह हमारी सोहबत के काबिल है। हमारी बराबरी के काबिल है।”

लल्लू का दिल धाड़-धाड़ उसकी पसलियों से बजने लगा।

“लेकिन टोनी” — उसने अपने एकाएक सुख आए होंठों पर जुबान फेरी — “मर्डर...”

“हां।” — एंथोनी दहाड़ा — “मर्डर!”

“इसकी” — गुलफाम बोला — “पतलून गीली हो रही है।”

“मैं... मैं...”

“डर रहा है, साला।” — टोनी बोला — “वाकेई पेशाब निकल रहा है इसका।”

“मैं नहीं डर रहा।” — लल्लू गुस्से से बोला।

“तो फिर वीरू तारदेव के मर्डर के लिए हां बोल।”

“हां तो मैं बोलता हूं लेकिन मैं यह कह रहा था कि पहले हम उससे रोकड़ा वसूल कर लेते तो...”

“रोकड़े की कोई अहमियम नहीं, साले। वो और आ जाएगा। हम कल ही तेरे घटकोपर वाले बैंक पर हाथ साफ कर देंगे, फिर रोकड़ा ही रोकड़ा होगा। लेकिन पहले वीरू तारदेव खल्लास होना मांगता है। बोल, करेगा यह काम कि नहीं?”

“करूंगा।” — लल्लू छाती फुलाकर बोला।

“शाबाश! शाबाश करम चन्द, शाबाश!”

खुर्शीद गुमसुम अपने घर में बैठी थी और मन ही मन रिहर्सल कर रही थी कि जब लल्लू मिलेगा तो वह उसे क्या समझाएगी, कैसे समझाएगी। इन्स्पेक्टर की बात उसे जंची थी। टोनी और गुलफाम जैसे खतरनाक मवालियों की सोहबत में लल्लू तबाह हो सकता था।

दरवाजे पर दस्तक हुई।

उसने उठ कर दरवाजा खोला तो चौखट पर लल्लू को खड़ा पाया। वह नशे में इतना धुत्त था कि अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था।

“क्या बात है?” — वह नाक चढ़ाकर बोली — “आज बार की सारी शराब अकेला पीके आयेला है?”

“सॉरी किधर!” — भीतर आने के उपक्रम में वह गिरता-गिरता बचा — “अभी तो बहुत बच रयेली है। देख।” — उसने जेब से बोतल निकाल कर खुर्शीद को दिखाई।

“कैसे आया?”

“तेरे कू बताने आया।”

“क्या?”

“कि मैं तेरे कू बहुत मुहब्बत करता हूं।”

“मेरे को मालूम है।”

“पहले से मालूम है?”

“हां।”

“मैं पहले भी ऐसा बोला?”

“हां। कई बार।”

“फिर तो मैं इधर बेकार आया। बेकार टाइम वेस्ट किया। मेरे कू तो कहीं और जाने का था! टेम क्या हुआ है?”

“सवा नौ।”

“फिर तो अपनु चला। मेरे को दस बजे कहीं पहुंचने का है। बहुत जरूरी काम करने का है।”

“कहां पहुंचना है? क्या जरूरी काम करना है?”

“वो छोकरी लोगों को बताने का काम नहीं है।”

“मैं छोकरी लोग नहीं हूं। तेरी होने वाली बीवी हूं। मुझे बता। मुझे सबकुछ बता। तू कहां जाता है? क्या करता है? किन लोगों के साथ उठता-बैठता है?”

“मैं अभी नहीं बता सकता।”

“क्यों? किसी ने मना किया है?”

“किसने?”

“तू बता। बोल? टोनी ने मना किया है? गुलफाम ने मना किया है? लल्लू, मैं सब जानती हूं। तू कोई इज्जतदार काम नहीं करता। तू उन खतरनाक मवालियों का साथी है। तू चोर है। डकैत है। तू...”

“और तू क्या है? तू रण्डी है।”

खुर्शीद को यूं लगा जैसे किसी ने उसके कलेजे पर घूंसा मारा हो। अपने सामने खड़े आदमी से उसे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि वह उसे रण्डी बोलेगा। उसकी आंखों में आंसू छलक पड़े।

आंसू देखते ही लल्लू को अपने कथन पर पछतावा होने लगा। उसने आगे बढ़कर खुर्शीद को अपनी बांहों में ले लिया। खुर्शीद पत्थर का बेहिस बुत बनी उसकी बांहों में समा गई।

“अपुन सॉरी बोलता है, रानी।” — लल्लू बोला — “वो खामखाह मेरे मुंह से निकल गया। कसम गणपति की, मैं दिल से नहीं बोला।”

“लल्लू, चल, यह शहर छोड़ दें। यह शहर हमारे लिए नहीं है। यह शहर हमारा खून पी जाएगा। हमारी जान ले लेगा। कहीं और चल, लल्लू।”

“चलेंगे। जरूर चलेंगे। जहां तू कहेगी, चलेंगे। अगले ही हफ्ते...”

“अगले हफ्ते नहीं। आज ही। अभी सवा नौ बजे हैं। स्टेशन पर चलते हैं। जहां की भी गाड़ी तैयार होगी उस पर चढ़ जायेंगे।”

“नहीं, आज नहीं। आज के बाद कभी। वादा करता हूं।”

“आज क्यों नहीं?”

“आज मेरा एक इम्तहान है। आज मैंने कुछ साबित करके दिखाना है।”

“क्या साबित करके दिखाना है?”

“तू नहीं समझेगी।”

“क्यों नहीं समझूंगी?”

“कहा न, नहीं समझेगी।” — उसने उसे अपनी बांहों से आजाद किया — “मैं जाता हूं।”

“कहां?”

“जहां मुझे काम है।”

“आज रात यहीं रुक जा न, लल्लू!”

“नहीं। जाना है।”

“मुझे ठुकरा कर जा रहा है?”

“यह बात नहीं। मैं... मैं लौट के आता हूं।”

और वह खुर्शीद के दोबारा जुबान खोल पाने से पहले वहां से बाहर निकल गया।

सड़क पर आकर उसने बोतल की बची हुई विस्की पी और बोतल फेंक दी।

फिर उसने पतलून की बैल्ट में खुंसी उस रिवॉल्वर को टटोला जो उसे गुलफाम ने दी थी।

वीरू तारदेव का कत्ल करने के लिए।

एंथोनी को मोनिका टी.वी. देखती मिली। वह एक बहुत झीनी, बहुत चित्ताकर्षक गुलाबी रंग की नाइटी पहने थी।

मिकी सोया पड़ा था।

“जरा टी.वी. बन्द कर और मेरी बात सुन।” — एंथोनी बोला।

रिमोट कन्ट्रोल का बटन दबाकर मोनिका ने टी.वी. बन्द किया।

एंथोनी सोफे पर उसकी बगल में बैठ गया।

मोनिका प्रश्‍नसूचक नेत्रों से उसकी तरफ देखने लगी।

“अब वो कहानी खतम।” — एंथोनी बोला।

“कौन-सी कहानी खतम?” — मोनिका बोली।

“विलियम के कत्ल की कहानी खतम। इसलिए खतम क्योंकि विलियम का कातिल मौत की सजा पा चुका है। जैसा कि मैंने कहा था कि वह पाएगा।”

“कौन था विलियम का कातिल?”

“रामचन्द्र नागप्पा नाम का आदमी। कल रात गुलफाम ने मिशन हस्पताल में ऐन वैसे ही उस्तुरे से उसका गला काट दिया था जैसे से नागप्पा ने विलियम का काटा था। नागप्पा और विलियम नशे की नयी चली गोलियों के व्यापार में पार्टनर थे, रुपये-पैसे को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया था जिसकी वजह से नागप्पा ने विलियम का गला रेत दिया था। पुलिस ने विलियम के खून से रंगा उस्तुरा भी नागप्पा के घर से बरामद किया है।”

“हूं।” — मोनिका आश्‍वासनहीन स्वर में बोली।

“अब यह कहानी खतम हो चुकी है। खून का बदला खून से लिया जा चुका है। अब बोल, राजी है?”

“हां।”

“तो फिर मेरी बांहों में आ।”

मोनिका आपने स्थान से हिली भी नहीं।
 
एंथोनी ने जबरन उसे दबोच लिया। वह सोफे पर लेट गया और उसने मोनिका को अपने ऊपर खींच लिया। उसके उतावले हाथ उसकी नाइटी सरकाने की कोशिश में उसका पुर्जा-पुर्जा करने लगे।

रिमोट तब भी मोनिका के हाथ में था। उसने टी.वी. का स्विच आन कर दिया।

उस वक्त उसके लिए एंथोनी के साथ अभिसार से ज्यादा दिलचस्प तो टी.वी. का बोर प्रोग्राम था।

लल्लू कोलीवाड़े की उस चारमंजिला इमारत के सामने खड़ा था जिसकी तीसरी मंजिल के एक कमरे में वीरू तारदेव मौजूद था। उसने वहां जाना था, रेडियो को फुल वाल्यूम पर करना था और वीरू तारदेव की खोपड़ी से गुलफाम की दी रिवॉल्वर सटाकर उसका भेजा उड़ा देना था।

वह खुर्शीद को याद कर रहा था और अभी भी उसे रण्डी कहने के लिए पछता रहा था। उसके दिल के किसी कोने से आवाज उठ रही थी कि उस वक्त उसे खुर्शीद के हर हुक्म की तामील करने को तत्पर उसके पहलू में होना चाहिए था, न कि कत्ल का खौफनाक इरादा लिए वीरू तारदेव के दरवाजे पर। वह खुर्शीद के सांचे में ढले नंगे जिस्म की कल्पना करने की कोशिश करता था तो उसे वीरू तारदेव का चारों तरफ छितराया भेजा दिखाई देने लगता था।

सड़क के ऐन पार उतनी ही ऊंची एक इमारत की छत पर आंखों पर दूरबीन लगाए गुलफाम मौजूद था। अपनी वर्तमान स्थ‍िति में उसे एक खिड़की में से अपने कमरे में बैठा वीरू तारेदव भी दिखाई दे रहा था और इमारत के प्रवेशद्वार के सामने ठिठका खड़ा लल्लू भी दिखाई दे रहा था।

उस वक्त लल्लू का रोम-रोम खुर्शीद के पहलू में पहुंचने के लिए तड़प रहा था। वह उसे रण्डी कहने के लिए फिर से माफी मांगना चाहता था। फिर यह सोचकर कि जितनी जल्दी वह वहां से निबटेगा, उतनी ही जल्दी खुर्शीद के पास पहुंच पायेगा, उसने इमारत के भीतर कदम रखा।

कूड़े और पेशाब की मिली-जुली बदबू सूंघता वह तीसरी मंजिल पर पहुंचा।

चाल में हर तरफ बच्चों की चिल्ल-पों, बड़ों की तकरार और रेडियो, टी.वी. का शोर-शराबा बरपा था।

उसने वीरू तारदेव के दरवाजे पर दस्तक दी।

भीतर रेडियो बज रहा था। यानी उसे ठीक बताया गया था कि वीरू तारदेव आधी रात तक फिल्मी गाने सुनने का आदी था।

वीरू तारदेव ने दरवाजा खोला।

लल्लू ने उसे जोर से धक्का दिया और भीतर दाखिल हुआ। उसने अपने पीछे दरवाजा बन्द कर दिया और दरवाजे के करीब ही पड़े रेडियो की आवाज ऊंची कर दी। अपनी जैकेट खोलकर उसने पतलून की बैल्ट में से रिवॉल्वर खींच कर हाथ में ली ली। उसके धक्के से नीचे फर्श पर लुढके पड़े वीरू तारदेव की तरफ उसने रिवॉल्वर तान दी।

“मुझे मत मारना। मुझे मत मारना।” — आतंकित वीरू तारदेव पागलों की तरह प्रलाप करने लगा — “मैंने क्या किया है? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

उससे ज्यादा आतंकित लल्लू दांत भींचे, रिवॉल्वर ताने उसके सामने खड़ा था। उसका मुंह एकदम सूख गया था और उसे तर करने की नाकाम कोशिश में उसके गले की घण्टी बार-बार उछल रही थी।

वीरू तारदेव रो रहा था, फरियाद कर रहा था, अपनी जिन्दगी की भीख मांग रहा था।

सड़क के पार की इमारत की छत पर मौजूद गुलफाम को दोनों दिखाई दे रहे थे। गुलफाम यह सोचकर दांत पीस रहा था कि लल्लू बुत बना क्यों खड़ा था, अपना काम करके वो वहां से फूट क्यों नहीं रहा था! खिड़की खुली थी, गलियारे से गुजरता कोई और भी तो भीतर झांक सकता था।

रिवॉल्वर अपने सामने ताने लल्लू ने आगे कदम बढ़ाया। उसने रिवॉल्वर की नाल वीरू तारदेव की कनपटी से लगा दी। अब उसे सच ही अपना पेशाब निकलने को हो रहा महसूस हो रहा था।

वीरू तारदेव यूं फूट-फूटकर रो रहा था कि लल्लू को उस पर तरस आने लगा। उसका अपना दिल यूं पसीजने लगा कि उसे डर लगने लगा कि कहीं वह भी न रोने लगे। बेचारा बूढ़ा, लाचार आदमी कैसे बिलख-बिलख कर फरियाद कर रहा था और अपनी जिन्दगी की भीख मांग रहा था!

“साले, हरामजादे, कमीने” — फिर नशे में लल्लू की वाणी मुखर हो उठी — “तेरे जैसे मच्छर को मसलने में मेरी बेइज्जती है। तू तो पहले ही मरा पड़ा है। मरे हुए को क्या मारूं मैं! चल उठकर खड़ा हो।”

वह खड़ा न हुआ तो लल्लू ने उसकी बांह पकड़कर झटकी और उसे जबरन उठाया।

जिबह होने को तैयार बकरे की सी कातर निगाह से उसकी तरफ देखता, अभी भी रोता और थर-थर कांपता वीरू तारदेव आंधी में हिलते पेड़ की तरह अपनी कमजोर टांगों पर झूमता-लहराता उसके सामने खड़ा रहा।

“कुत्ते! कमीने! तू खुशकिस्मत है कि तुझे मैं मारने आया। मेरी जगह कोई और होता तो वह तुझे मारकर कब का यहां से चला भी गया होता। तेरे में कोई दमखम दिलेरी बची होती तो मैं तुझे मारता। तेरे जैसे मुर्दे के खून से अपने हाथ रंगना मेरी तौहीन है। साले, शुक्र मना कि मैं और जनों जैसा नहीं। मैं टोनी जैसा नहीं। मैं गुलफाम जैसा नहीं। मैं अपने जैसा हूं। और मैं मुर्दे को नहीं मारता। समझा। समझा, हरामजादे!”

वीरू तारदेव समझा कुछ भी नहीं था — आतंक के आधिक्य ने कुछ समझने की स्थ‍िति में उसे छोड़ा ही नहीं था — लेकिन फिर भी उसकी गर्दन अपने आप ही जल्दी-जल्दी स‍हमति में हिलने लगी।

“अब अपनी खैरियत चाहता है तो एक मिनट में यहां से भाग जा। इस शहर से दूर भाग जा। कहीं इतनी दूर कूच कर जा जहां कोई तुझे ढ़ूंढ़ न सके। कोई सामान-वामान उठाने में वक्त जाया न करना। कपड़े तक न बदलना। जैसे खड़ा है, वैसे ही हवा हो जा यहां से। समझ गया?”

पहले से ही सहमति में हिलती गरदन को वीरू तारदेव ने और जोर से हिलाया।

“मैं जा रहा हूं। मेरे पीछे-पीछे ही तू यहां से निकलता दिखाई देना चाहिये।”

फिर रिवॉल्वर वापिस पतलून की बैल्ट में खोंसता वह वहां से बाहर निकल गया।

कुछ क्षण बाद दूरबीन से गुलफाम ने लल्लू को नीचे सड़क पर एक ओर लपकते देखा और ऊपर कमरे में वीरू तारदेव को एक पुराने से सूटकेस में कपड़े भरते देखा।

उसने एक गहरी सांस ली, दूरबीन अपनी आंखों पर से हटायी, अपनी जुर्राब में खुंसे उस्तुरे को चैक किया और फिर उठकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

एंथोनी शेख मुनीर के पीजा पार्लर के पिछवाडे़ के बन्द कमरे में उसके सामने मौजूद था।

“डिब्बे” — एंथोनी सख्ती से बोला — “वो माल मेरा है।”

“था।” — डिब्बा बड़े इत्मीनान से बोला।

“वो मेरे कू वापिस मांगता है।”

“भेजा फिरेला है, टोनी! फैंस के पास से आगे गया माल कहीं वापिस मिलता है!”

“मिलता है।”

“मिलता है तो वापिस खरीदने पर मिलता है। तेरे को मालूम नहीं ऐसा माल जाता कौड़ियों के मोल है, वापिस पूरी कीमत पर लौटता है।”

“वीरू तारदेव को तू कितना रोकड़ा देने का है?”

“अपना कमीशन काट कर सात लाख।”

“वो रोकड़ा मेरे को दे।”

“काहे कू?”

“क्योंकि माल मेरा था।”

“मेरे पास उसे वीरू तारदेव लाया था।”

“वो अब रोकड़ा वसूल करने इधर नहीं आने का।”

“क्यों?”

“क्योंकि एंथोनी फ्रांकोजा के माल पर हाथ साफ करने वाला जिन्दा नहीं बचता।”

“ऐसा?”

“हां।”

“वो... खल्लास हो गया?”

“हां।”

“ठीक है। मैं कल के अखबार में उसके कत्ल की न्यूज पढ़ लूं, फिर तेरे कू फोन लगाता हूं। फिर आकर रोकड़ा ले जाना।”

“ठीक है।” — एंथोनी उठता बोला — “लेकिन एक बात याद रखना, डिब्बे।”

“क्या?”

“मेरे साथ धोखा किया तो मैं तेरा ये फैंसी पीजा पार्लर जलाकर राख कर दूंगा और इसी में तेरी चिता जला दूंगा।”

“धमकी देता है?” — डिब्बा आंखें निकालता बोला।

“हां, धमकी देता है। साले, बहरा है कि अन्धा है! धमकी नहीं देता तो क्या लव सांग सुनाता है!”

डिब्बा तिलमिलाया, उसने बेचैनी से पहलू बदला और फिर बदले स्वर में बोला — “तेरा रोकड़ा सेफ है, टोनी। बस जरा मेरे कू वीरू तारदेव के खल्लास हो जाने की पक्की खबर लगने दे फिर अपुन खुद तेरा रोकड़ा तेरे पास पहुंचा देगा।”

“गुड।”

लल्लू ने जाकर खुर्शीद का दरवाजा खटखटाया। उसने दरवाजा न खोला।

“क्या है, लल्लू?” — खुर्शीद दरवाजे की परली तरफ से बोली।

“कैसे जाना?” — लल्लू हैरानी से बोला — “बिना देखें, सुने...”

“इतनी रात गए यूं मेरा दरवाजा और कोई नहीं खटखटाता। फिर मुझे पता था कि तू आएगा।”

“दरवाजा तो खोल!”

“नहीं।”

“मैं तेरे से माफी मांगने आया हूं।”

“उसकी जरूरत नहीं। मुझे तौहीन बर्दाश्‍त करने की आदत है। और फिर रण्डी को ही तो रण्डी बोल तू!”

“तो फिर दरवाजा क्यों नहीं खोलती?”

“क्योंकि मैं सोचना चाहती हूं। मुझे रण्डी कहने के अलावा तूने और जो कुछ कहा, उसके बारे में सोचना चाहती हूं।”

“और मैंने क्या कहा?”

“तू नशे में था इसलिए भूल गया।”

“तू याद दिला दे।”

“तूने कहा तेरा कोई इम्तहान है। तूने कुछ साबित करके दिखाना है।”

“वो तो... वो तो...”

“लल्लू, मैं तेरे से प्यार करती हूं लेकिन जो लल्लू तू बनकर दिखाना चाहता है, मैं उससे प्यार कर सकूंगी या नहीं, यह मेरे को सोचना पड़ेगा।”

“तू दरवाजा तो खोल!”

“नहीं। तू फिर आना।”

“फिर कब?”

“कुछ दिन बाद। अभी मुझे सोचने दे।”

“तू अभी दरवाजा नहीं खोलेगी?”

“नहीं।”

“मैं दरवाजा तोड़ दूंगा।”

“तोड़ दे।”

“मैं तेरी चौखट पर सिर पटक-पटक कर मर जाऊंगा।”

“मर जा। फिर कम-से-कम तू वो बनने से तो बच जायेगा जो तू बनना चाहता है।”

“मैं नहीं चाहता। मैं नहीं बना। मैं कुछ साबित करके नहीं दिखा सका। मैं इम्तहान में फेल हो गया।”

“मुझे तेरी बात पर विश्‍वास नहीं।”

“मेरा विश्‍वास कर, साली।”

“एक बार फेल हो गया है तो क्या हुआ, फिर कोशिश करेगा।”

लल्लू खामोश हो गया। उससे कहते न बना कि वह फिर कोशिश नहीं करेगा।

“ठीक है।” -अन्त में वह हथियार डालता बोला — “जाता हूं।”

भीतर से आवाज न आई।

मन-मन के कदम रखता लल्लू वहां से विदा हुआ।

टी.वी. पर वीडियो से ब्लू फिल्म चल रही थी लेकिन मोनिका उसमें कोई रुचि नहीं लेती दिखाई दे रही थी। लगता था कि वह किसी मजबूरी के बस में होकर टी.वी. स्क्रीन की तरफ झांक रही थी।

“तू खुश नहीं?” — एंथोनी कहे बिना न रह सका।

“किस बात से?” — मोनिका हड़बड़ा कर बोली।

“कि विलियम के कातिल को मैंने ऊपर भिजवा दिया!”

“उसे कोई खास सजा नहीं मिली। नींद में ही ऊपर पहुंच गया। पता भी नहीं लगा होगा कि मर रहा है।”

“मतलब?” — एंथोनी के माथे पर बल पड़ गए।

“अच्छा होता अगर यह काम कानून करता। तब वह जेल में एड़ियां रगड़ता, अपनी मौत के इन्तजार में तड़पता, तब मेरे कलेजे में ठण्डक पड़ती।”
 

Similar threads

S
Replies
14
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
61
Views
62
StoryPublisher
S
S
Replies
74
Views
75
StoryPublisher
S
S
Replies
108
Views
109
StoryPublisher
S
Back
Top