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Thriller फरेब

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“सारे सबूत कहते हैं कि वंशिका असली है और दिल कहता है कि चंद्रेश साहब झूठ नहीं बोल रहे हैं और मैं दिल की बात पहले सुनता हूँ। लेकिन सबूतों को झूठला नहीं सकता।” उसके चेहरे पर सोच के भाव थे।

“मुझे आपकी बात समझ में नहीं आ रही सर।” गंभीर स्वर में निरंजन ने कहा।

अब सब का ध्यान भाटी की तरफ ही था।

“इन्वेस्टिगेशन लगता है तगड़ी करनी पड़ेगी।” भाटी ने चहल-कदमी करते हुए अपनी मूंछो पर हाथ फेरते हुए कहा।

अचानक कमरे के दरवाजे पर आहट हुई। सबने चौंक कर दरवाजे की दिशा में देखा। दरवाजे पर एक तीस- बत्तीस बर्षीय युवक खड़ा दिखायी दिया, जिसके बाल बिखरे हुए थे, शरीर गोरे रंग का, आँखों पर गॉगल्स टिके हुए थे। आगंतुक युवक काले कलर की जींस पहने हुए था, जो फैशन के मुताबिक जगह-जगह से फटी हुई थी। ऊपर यलो कलर का शॉर्ट कुर्ता पहना हुआ था, जिस पर राजस्थानी डिजाईन के कई जानवर बने हुए थे। वह अपनी तरफ से पूरा लापरवाह जान पड़ रहा था। उसके हाथ में गिफ्ट और मिठाई का डिब्बा था। सब अनजानी नज़रों से उसे घूर रहे थे। वंशिका उसे देख कर खुशी से फूली नहीं समा रही थी। वह दौड़ते हुए दरवाजे की तरफ भागी और दौड़ कर उसके गले लग गयी।

“कैसे हैं आप भाई साहब?” वंशिका ने मीठे स्वर में कहा।

अब चौंकने की बारी चंद्रेश मल्होत्रा की थी। उसने नवयुवक की तरफ देखते हुए कहा, “वंशिका का कोई भाई नहीं था।”

भाटी ने हैरानी से उस नवयुवक की तरफ देखा।

“आपकी तारीफ?” भाटी ने पूछा।

“तारीफ उस खुदा की कीजिये जिसने मुझे बनाया?” नवयुवक ने उसी तरह चंचल स्वर में जबाव दिया।

राहुल उसके होठों से निकले शब्द सुनकर चौंक पड़ा। निशा ने उसके चेहरे पर चौंकने के भाव देखे। फिर राहुल को उन भावों पर नियन्त्रण करते हुए भी देख लिया।

“कहानी में किरदार बढ़ते ही जा रहे हैं।” भाटी मन ही मन बड़बड़ाया।

वंशिका सबकी ओर देखते हुए बोली, “यही है वह, जिसने मुझे बचाया था।” वंशिका के स्वर में आभार के भाव थे।

नवयुवक ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों पर नजरें घुमाई और मीठे स्वर में कहा, “बन्दे को सागर कहते हैं।”

“आप ठीक समय पर आये सागर भइया, ये सब मुझे गलत ठहरा रहे हैं।” वंशिका के स्वर में शिकायत के भाव थे।

“चिन्ता मत कर बहना, अब तेरा ये भाई आ गया है।” उसने सब को देखते हुए कहा और लाया हुआ सामान टेबल पर रख दिया।

“टेढ़े-मेढ़े जबाव देने के लिये हाजिर है, यह टेढ़ा-मेढ़ा आदमी।” उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

“आप कहाँ से पधारे।” उलझन भरी निगाहों से देखते हुए भाटी ने कहा।

“पधारे तो हम बत्तीस साल पहले ही थे, लेकिन लगता है हमारे जन्म लेने का कारण वंशिका को अपना हक दिलाना है।” गहरी साँस लेते हुए उसने जवाब दिया।

“जो भी पूछा जाये, उसका सीधा जवाब दो स्मार्ट बॉय, यह पुलिस की कार्यवाही है। अमिताभ जी का शो कौन बनेगा करोड़पति नहीं है।” भाटी ने कड़क स्वर में कहा।

“मुझे वंशिका ने फोन करके यहाँ बुलाया था।” उसके स्वर में व्यंग्य की जगह गंभीरता आ गयी।

“क्यों बुलाया था?” भाटी ने पूछा।

“क्योंकि इनके पतिदेव इन्हें अपनी पत्नी नहीं मान रहे थे।”

“तो आप इसमें क्या कर सकते हो?”

“इनके पति को समझाने की कोशिश करता।” सागर बोला।

अचानक निरंजन बोल पड़ा, “आपने इनको क्यों बचाया?”

“क्यों, किसी को बचाना जुर्म है क्या कानून की नजर में? अजीब मुसीबत है किसी को बचाओ, तो मुसीबत, नहीं बचाओ तो मुसीबत।” व्यंग्यभरे स्वर में सागर बोला। निरंजन कट के रह गया।

“ये आपको कहाँ मिली थी?” भाटी ने प्रश्न पूछा।

“इनका कार से एक्सीडेन्ट हो गया था। काफी दिनों तक इनकी याददाश्त गायब रही। याददश्त वापस आने पर यह अपने घर जाने की जिद करने लगी। मैं भी इनके साथ ही आने वाला था, लेकिन किसी कारणवश आ नहीं सका।” साधारण स्वर में सागर ने जबाव दिया।

“आपका पेशा क्या है?” निरंजन ने सवाल किया।

“झूठ को सच और सच को झूठ साबित करना ही मेरा पेशा है।”

“मतलब?” निरंजन ने पूछा।

“वकालत करता हूँ इंस्पेक्टर साहब।” लापरवाही से सागर ने जवाब दिया।

“तभी पुलिस का खौफ नहीं है।” भाटी बोला।

“क्या? पुलिस से डरना चाहिये?” सवालिया निगाह से भाटी को देखता सागर बोला।

तभी राहुल निशा की तरफ देख कर बोला, “हमें चलना चाहिये इंस्पेक्टर साहब। अब तो हमारी यहाँ कोई जरूरत नहीं है।”

“जाइये जनाब, आपकी तो क्या, अब तो हमारी भी यहाँ कोई जरुरत नहीं है।” भाटी ने उठते हुए कहा।

“इंस्पेक्टर साहब, अब मेरा क्या होगा?” बेचैनी से चंद्रेश ने कहा।

“आपकी चाल पीट गयी है चंद्रेश साहब, आप के गवाह खुद ही मुकर गये, इसमें हम क्या कर सकते हैं।” उखड़े स्वर में भाटी बोला।

“लेकिन यह सब झूठ है।”

“हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। चलो निरंजन।” भाटी ने बाहर की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा।

निरंजन भी उठ खड़ा हुआ और चंद्रेश के कन्धे पर हाथ रख कर बोला”संभालो अपने आपको।”

दरवाजे के पास आकर भाटी ठहर गया और घूम कर सागर की तरफ देखते हुए बोला, “मुझे लगता है हमारी मुलाकात बहुत जल्द होगी। तब जाकर पता चलेगा कि आप कितने पानी में हैं।” विश्वास भरे स्वर में भाटी बोला।

“शौक से भाटी साहब, उस वक्त का इस नाचीज को भी इन्तजार रहेगा।” शांत भाव से मुस्करा कर सागर ने जबाव दिया। भाटी और निरंजन घूम कर वापस चले गये।

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इनोवा में बैठी निशा ओबेराय ने कार चलाते हुए राहुल मकरानी की और देखा, “तुम सागर की आवाज सुनकर चौंक क्यों गये थे?” निशा ने सवाल पूछा।

“मुझे फोन पर जो आवाज सुनाई दी, वह सौ प्रतिशत सागर की थी। चितिंत स्वर में राहुल बोला।

“कौन सी आवाज की बात कर रहे हो?”

“वही आवाज, जो दोपहर में फोन आया था उसकी जैसी।”

“जो हमें ब्लैकमेल कर रहा था?” बेचैनी से निशा बोली।

“यानि की गड़बड शुरू हो गयी है।” निशा थोड़ा रुककर वापस बोली।

दोनों की नजरें मिली, दोनों सोच में डूब गये।

“कार के शीशे चढ़ा लो, ठंड लग रही है।” राहुल बोला।

“अब कहाँ जाना है?” निशा ने कार के शीशे चढ़ाते हुए कहा।

“मुझे तो बस घर छोड़ दो। अब आराम करना चाहता हूँ।” थके स्वर में राहुल बोला।

निशा ने कार का रुख जागृति अपार्टमेंट की तरफ कर दिया। कार में शान्ति छाई हुई थी। दोनों अपनी- अपनी सोच में डूबे हुए थे। वाहनों की तेज रोशनी हर पल जगमगा रही थी। निशा ने ब्रेक लगाए। राहुल की सोच टूटी सामने शानदार इमारत ‘जागृति’ दिखायी दी। उसने कार का दरवाजा खोला और बाहर निकला।

“मैं मोबाइल पर बात करता हूँ।” राहुल ने कार के अन्दर झाँक कर कहा।

निशा की गर्दन सहमति से हिली। उसने कार आगे बढ़ा दी। राहुल की सर्तक निगाह हर तरफ घुमी। सामने चाय की दुकान पर रंगा-बिल्ला बैठे नजर आये, जो उसे देखकर खूंखार ढंग से मुस्कुराने लगे। बिल्ला के चेहरे पर चाकू का निशान बहुत ही खतरनाक लग रहा था। घबराकर राहुल तेज गति से अपार्टमेंट में दाखिल हो गया। उसे हर समय यह डर लग रहा था कि उसके पीछे-पीछे रंगा-बिल्ला आ रहे हैं। अपने फ्लैट में पहुँचने के बाद तुरन्त उसने चार-पाँच सिटकनी लगाई। उसे अभी भी ङर था कि वे दरवाजा तोड़कर अन्दर आ जायेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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थाने में निरंजन और भाटी चाय और नाश्ते का आनन्द ले रहे थे।

“सर एक बात पर आपने ध्यान दिया?” निरंजन कुछ सोचते हुए बोला।

“क्या हुआ?” चाय का घूँट भरकर भाटी निरंजन को देखने लगा।

“कड़ियाँ घूम फिर कर आपस में मिल रही हैं।” निरंजन गंभीर स्वर में बोला।

“मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा?”

“सर सुमित अवस्थी, निशा ओबेराय, वंशिका मल्होत्रा, चंद्रेश मल्होत्रा, राहुल मकरानी, विमल इन सब किरदारों को एक कड़ी जोड़ती है।” गहरी साँस लेता निरंजन बोला।

“कौन-सी कड़ी निरंजन?” भाटी ने कुर्सी पर सीधा बैठते हुए सिगरेट सुलगाते हुए पूछा।

“सुखाड़िया कालेज, इन सब का सम्बन्ध कही ना कही सुखाड़िया कालेज से है।” भाटी चिहुँक उठा। उसकी आँखें हैरानी से फैल गयी।

“गुड जॉब निरंजन, पता नहीं यह बात कैसे मेरे दिमाग से निकल गयी। तुमने सही चीज पकड़ी है। हो सकता है सुमित मर्डर केस का सुराग भी हमें यहाँ से मिले।” भाटी के स्वर में उत्तेजना के भाव थे।

“सारा मामला सुलझाने के लिये लगता है विमल से सारी कहानी दोबारा से सुननी पड़ेगी।” भाटी के स्वर में सोच के भाव आ गये

“तुम विमल को फोन लगाओ। मैं उस से बात करता हूँ।” निंरजन ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और विमल का नम्बर डायल करने लगा।

थोड़ी देर तक रिंग होने के बाद एक शांत स्वर निरंजन के कान से टकराया, “हैलो कौन?”

“विमल जी, मैं निरंजन बोल रहा हूँ। आपको भाटी सर याद कर रहे हैं। लीजिये उनसे फोन पर बात कर लीजिये।” कहकर निरंजन ने मोबाइल भाटी के हाथ में दे दिया।

भाटी ने फोन कान से लगाया, “हलो विमल, कैसे हो?” भाटी ने पूछा।

“ठीक हूँ सर।” दूसरी तरफ से आवाज आयी।

“अमां यार, तुमसे कुछ काम याद आ गया। ऊपर माउंट आबू कब आ रहे हो?”

“सर अभी तो मैं व्यस्त हूँ। फ्री होते ही आपको फोन कर लूँगा।”

“कब तक फ्री हो जाओगे? नहीं तो नीचे आकर मैं मिल लेता हूँ तुमसे।”

“नहीं सर, सोमवार को मेरा रेस्ट है। मैं ऊपर आकर आप से मिलता हूँ। बहुत दिन हो गये नक्की झील पर गये हुए।” साधारण स्वर में विमल बोला।

“ठीक है, मैं तुम्हारा इंतजार करता हूँ। ऊपर पहुँच कर फोन करना।” भाटी ने अपनेपन से कहा।

“जी सर, मैं ऊपर आकर आप से सम्पर्क करता हूँ।” भाटी ने फोन काट दिया।

“आप विमल को इतनी अच्छी तरह कैसे जानते हैं सर?” निरंजन ने उत्सुकता से सवाल किया।

“मेरे दोस्त का छोटा भाई है। अभी-अभी उसकी यहाँ पोस्टिंग हुई है।” भाटी ने समान्य स्वर में कहा।

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थाने में रखा फोन बज उठा। निरंजन ने फोन उठाया, “हैलो, सब इस्पेक्टर निरंजन दिस साइड।”

दूसरी तरफ से खरखराती आवाज सुनाई दी, “ भाटी से बात करनी है।”

“कौन बोल रहा है।” निरंजन ने भावहीन स्वर में पूछा।

“मैं कौन बोल रहा हूँ आप इसकी चिन्ता ना करें, मैं आपका क्या फ़ायदा करा सकता हूँ, उस पर ध्यान दें।” खरखराती आवाज पुनः कानों में पड़ी।

“हमारा फायदा?” चौंकते हुए निरंजन ने कहा, “आज बायपास नाके के पास से एक बुलेरो गुजरेगी। उसका नम्बर है RJ-38, M-2270, उसमें आप के काम की चीज है।”

“आप कहाँ से बोल रहे हैं?”

“मैं कहाँ से बोल रहा हूँ, यह चिन्ता आप न करें, उस बुलेरो की चिन्ता करें, तो आपको फायदा होगा।” यह कह कर सामने से फोन रख दिया गया।

निरंजन के चेहरे पर सोच के भाव थे। उसने अपना मोबाइल निकाला और नम्बर मिलाने लगा। थोड़ी देर रिंग होने के बाद आवाज सुनाई दी। भाटी का स्वर निरंजन के कानों से टकराया।

“कैसे फोन किया निरंजन?” भाटी ने शांत स्वर में प्रश्न किया।

“सर, अभी-अभी किसी ने फोन करके बताया है कि आज बायपास नाके के पास से बुलेरो में अवैध सामान जाने वाला है।”

“नाके के पास नाकाबन्दी का इन्तजाम करो और तुम वहाँ पर नजर रखो।” भाटी ने कहा।

“सर, हो सकता है सूचना गलत हो।”

“सूचना सही हो या गलत इसमें ढील नहीं होनी चाहिये।” दाँत भीँच कर भाटी ने कहा।

“जी सर, मैं वहाँ की बागडोर अपने हाथ में ले लूँगा।” निंरजन ने सर्तक स्वर में कहा।

“बेहतर होगा। मेरी जरूरत हो, तो कॉल करना।”

“जी सर।” कह कर निरंजन ने मोबाइल ऑफ कर दिया।

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बायपास नाके पर पुलिस पूरे दल-बल सहित उपस्थित था। गाड़ियों को पूरी तरह चेक करने के बाद ही आगे बढ़ने दिया जा रहा था। निरंजन व्यस्त था। तभी अचानक एक सफेद कलर की बुलेरो उन्हें दूर से आती दिखायी दी।

निरंजन ने हाथ देकर उसे रुकने का इशारा किया। पास आने पर निरंजन ने पैनी नजर नम्बर प्लेट पर गडाई। नंबर वही थे, जिनकी सूचना फोन पर उन्हें मिल चुकी थी।

ड्राइवर ने शराफत से गाड़ी पास में लाकर रोक दी। निरंजन हैरान रह गया। गाड़ी का नंबर दूर से स्पष्ट चमक रहा था, RJ-38, M-2270. सब सतर्क हो गये। गाड़ी रुकते ही निरंजन ने ड्राइवर को बाहर निकलने के लिये कहा। वह शराफत से बाहर आ गया। निरंजन ने गाड़ी की ऐसी तलाशी ली, जैसे भूसे में से सुई की तलाश करनी है, पर कुछ ना मिला। निरंजन ने हताशाभरी नज़रों से ड्राइवर को देखा और पुलिसिया स्वर में गुर्राया, “किसकी गाड़ी है?”

“खान साहब की।” ड्राइवर ने निडर भाव से कहा। उस पर निरंजन की वर्दी का भी कोई असर ना पड़ा। वह निरंजन की आँखों में आँखे डाल कर बोला।

“कौन खान?”

“अयूब खान।” ड्राइवर ने शांत स्वर में कहा।

“गाड़ी उठाओ और मेरे पीछे-पीछे थाने ले आओ।” निरंजन बोला।

“किस जुर्म में?” ड्राइवर ने विरोध किया।

“थाने चल, वहाँ तुझे तेरा गुनाह भी बता देंगे।” निरंजन ने कहा।

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थाने में आकर निरंजन ने भाटी को पूरा किस्सा बताया।

“मामला जितना सीधा दिख रहा है, उतना सीधा है नहीं।” भाटी सोच भरे स्वर में बोला।

“क्या मतलब सर?” निरंजन ने चौकते हुए पूछा।

भाटी ने रुल अपनी बायी हथेली पर मारते हुए कहा, “ हम जानते हैं कि खान का कारोबार ड्रग्स से जुड़ा है। हमारे पास फोन आता है, गाड़ी भी पकड़ी जाती है, पर माल नहीं पकड़ा जाता।”

“आप क्या कहना चाहते हैं सर?”

“यह कोई साजिश है, जो अभी हमारे माइंड में नहीं आ रही।” भाटी बेचैनी से बोला।

इतने में थाने में रखे रंग बिरंगे फोन में से एक की घण्टी बजी भाटी ने फोन उठाया।

“हलो भाटी स्पींकिग।” भाटी ने कहा।

“यह क्या गुण्डागर्दी मचा रखी है आप लोगों ने। क्या कोई अन्धेरगर्दी है?” गुस्से में पूछा गया।

“आप कौन साहब बोल रहे हैं?” भाटी समान्य स्वर में बोला।

“खान बोल रहा हूँ, अयूब खान। मेरी गाड़ी आपके थाने की क्यों शोभा बढ़ा रही है। बिना वजह?” गुस्से में खान बोला।

“हमें खबर मिली थी उसमें अवैध सामान जा रहा है, इसलिये तफ्तीश के लिये थाने लाई गयी थी।” भाटी अपना क्रोध पीते हुए बोला।

“वाह इंस्पेक्टर साहब, गाड़ी में कुछ मिला नहीं, फिर काहे की तफ्तीश?” व्यंग्य भरे स्वर में खान बोला।

“हमें हमारा काम मत सिखाओ मिस्टर खान।” भाटी ने गुस्से में कहा।

“तुम्हारा डिब्बा पड़ा है किसी को भेज कर मँगवा लेना।” कहकर गुस्से में भाटी ने फोन रखा।

निरंजन ने गंभीर निगाहों से भाटी को देखा।

“गाड़ी में कुछ नहीं मिला। लौटानी तो पड़ेगी ही।” भाटी ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

निरंजन की गर्दन सहमति से हिली।

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राम सेवक थाने के बाहर टी स्टाल पर बैठा चाय के मजे ले रहा था। अचानक मोबाइल की घंटी बजने लगी। राम सेवक बुरा-सा मुँह बनाते हुए उसकी स्क्रीन की तरफ देखने लगा। स्क्रीन पर अननोन नम्बर दर्शा रहा था। उसने फोन उठा कर कान से लगाया। दूसरी तरफ से आवाज आयी “चाय-पानी हो गया हो तो थोड़ा ध्यान घर की तरफ भी दो।” व्यंग्य भरे स्वर में कहा गया।

“कौन बोल रहा है? क्या हुआ मेरे घर में?”

“आप आजकल चाय-पानी ज्यादा ही पीने लगे हैं और उधर आप के घर में आपकी बीवी आपके दोस्त के साथ नैन-मटक्का कर रही है।”

“क्या बक रहे हो?” गुस्से में राम सेवक बोला

“बक नहीं रहा, घर जाकर देखो, आपकी बीवी क्या गुल खिला रही है?” कह कर सामने से फोन काट दिया गया।

राम सेवक ने रिसीव कॉल में जाकर उसी नम्बर पर फोन लगाया, तो फोन पर आवाज आयी, आप जिस व्यक्ति से बात करना चाहते हैं वह आउट ऑफ नेटवर्क है। गुस्से में राम सेवक ने फोन को बन्द कर जेब में रखा और उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी बाइक उठाई और घर की तरफ चल दिया। बाइक उसने घर से थोड़ी दूरी पर खड़ी की और पैदल ही घर पर पहुँचा तो देखा कि घर में शंकर दयाल बैठा हुआ सिगरेट के कश लगा रहा है।

उसको देख कर शंकर दयाल हड़बड़ा उठा “ अरे तेरी तो ड्यूटी चल रही हैं।”

“और तू यहाँ कौन-सी ड्यूटी कर रहा है कमीने?” गुस्से में राम सेवक बोला।

“जबान संभाल कर बात राम, सुनीता भले ही तेरी बीवी है, लेकिन वह मुझे चाहती है।” गहरी सांस लेकर शंकर दयाल बोला।

“साले, कमीने, गद्दार, पीठ में छुरा घोपता हैं।”

“गाली मत दे।” उखड़े स्वर में शंकर दयाल बोला

राम सेवक ने गुस्से में जेब से पिस्तौल निकाली और शंकर दयाल पर तान दी।

“रिवाल्वर मेरे पास भी है।” शंकर दयाल ने गुस्से से कहा।

“आपस में लड़ने से कोई फायदा नहीं, अभी पता चल जायेगा कि सुनीता किसको ज्यादा प्यार करती है।” शंकर दयाल बोला।

“यह कैसे सबित होगा?” बेचैनी से राम सेवक बोला।

“हम दोनों हवा में फायर करते हैं और फिर गिर जाते हैं। सुनीता जिससे ज्यादा प्यार करती है। उसके पास आकर रोने लगेगी। हो जायेगा फैसला, हम समझ जायेंगे कि वह उसी को प्यार करती है।” शंकर दयाल ने सुझाव दिया।

सहमति से गर्दन हिलाते हुए राम सेवक ने अपनी सहमति दे दी।

दोनों ने एक साथ हवा में फायर कर दिया और धड़ाम से गिर गये। गोली की आवाज सुनते ही सुनीता बाहर भाग कर आयी। दोनों की तरफ देखकर बाथरूम के पास पहुँची और धीमे स्वर में बोली, “बाहर निकल आइये निगम साहब, ये दोनों तो आपस में ही लड़ मरे।”

बाथरूम से डरते हुए निगम साहब बाहर निकले। दोनों को घूरते हुए देखा, ”तंग कर दिया था साले शंकर दयाल ने, जब देखो कबाब में हड्डी बन जाता था। अच्छा हुआ, जो दोनों का एक ही बार में काम तमाम हो गया।” गहरी सांस लेती सुनीता बोली।

“अच्छा हुआ जो शंकर दयाल के आते ही मैंने राम सेवक को फोन कर दिया। ताकि शंकर दयाल का काम तमाम हो जाये।”

“पर यहाँ तो कमाल हो गया। तीर निशाने पर लगा। एक तीर से दो शिकार हो गये। एक साथ दोनों से छुट्टी मिल गयी “ हँसते हुए सुनीता ने कहा।

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“बहुत अच्छे दिमाग के सारे कपाट खुल गये।” शंकर दयाल ने उठते हुए कहा।

“साली, छिनाल तू औरत हैं या औरत के नाम पर धब्बा? आज तुझे मैं नहीं छोडूंगा।” राम सेवक का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

सुनीता दोनों को जिन्दा देख कर थर-थर काँपने लगी। निगम अजीब-सी उलझन भरी निगाहों से दोनों को देखने लगा।

राम सेवक ने सुनीता को रुई की तरह धुनना शुरु कर दिया। मौका देखकर निगम ने भागने की कोशिश की, किन्तु शंकर दयाल ने उसे पकड़ लिया।

“आप कहाँ जा रहे हैं जनाब, बिना प्रसाद लिये?”

कहकर शंकर दयाल उस पर पागल कुत्ते की तरह टूट पड़ा। थोड़ी मार खाने के बाद निगम शंकर दयाल को चकमा देकर भाग गया। शंकर दयाल का ध्यान राम सेवक की तरफ गया। वह सुनीता को रुई के समान धुन रहा था। उसने दोनों का बीच बचाव कराया।

“अरे क्या कर रहा है मार ही डालेगा का क्या?” राम सेवक को अलग कर शंकर दयाल बोला।

“हाँ, इसे छोडूंगा नहीं, मार डालूँगा।” गुस्से में राम सेवक बोला।

सुनीता राम सेवक से माफी माँगने लगी।

“दफा हो जा, दोबारा दिखी, तो जिन्दा नहीं बचेगी।” राम सेवक क्रोध से सुनीता को देख कर बोला।

सुनीता मुँह छुपा कर रोने लगी।

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घर का माहौल गंभीर था, जिसे सागर जोक्स सुना कर दूर करने का प्रयास कर रहा था। दूसरी तरफ चंद्रेश सोच रहा था कि पहले ही एक समस्या थी, अब दो-दो हो गयी है। वह इस से छुटकारा पाने का उपाय सोच रहा था। सागर कोई जोक्स सुना रहा था, जिसे सुनकर वंशिका हँस रही थी।

“सुनो वंशिका, एक नया जोक सुनो।” सागर ने कहा“मरने के बाद तीन इंजीनियर नर्क लोक पहुँचे। तीनों अगल-अलग देश के थे। एक अमेरिकी, एक पाकिस्तानी और एक भारतीय। यमराज तीनों को देखकर बोले, देखो यह नर्क लोक का गेट काफी दिनों से खराब पड़ा है। इसे सही कराने में कितना खर्च आयेगा? पकिस्तान वाले ने ध्यान से देखा, फिर बोला तीस हजार रुपए। यमराज बोले, कैसे पाकिस्तानी इंजीनियर बोला, दस हजार मैटिरियल के दस हजार मजदूरी और दस हजार मेरी मेहनत के। यमराज ने अमेरिका वाले को देखा, फिर पूछा, तुम क्या कहते हो। अमेरिका का इंजीनियर बोला, चालिस हजार रुपए।”कैसे?” यमराज ने पूछा। बीस हजार का मैंटिरियल दस हजार मजदूरी और दस हजार मेरे। यमराज ने भारतीय इंजीनियर से पूछा, तुम क्या कहते हो? भारतीय इंजीनियर ने बिना देखे ही बोला नब्बे हजार रूपए। यमराज हैरानी से बोला, कैसे? बिना देखे तुमने बता दिया। भारतीय इंजीनियर बोला, “देख भाई यमराज, तीस हजार तेरे, तीस हजार मेरे बाकी बचे तीस हजार का यह इस पाकिस्तानी इंजीनियर को ठेका दे देते हैं, यह जाने और इसका काम।”

जोक सुनते ही वंशिका जोर-जोर से हँसने लगी। सागर पागलों की तरह उसे देख रहा था।

“बस अब मत हँसाओ।” वंशिका पेट पकङ कर हँसती हुई बोली।

“बस एक और सुन लो, नहीं तो मुझे नींद नहीं आयेगी।” सागर गंभीर स्वर में बोला।

“ठीक है, ठीक है केवल एक।” वंशिका उसके चेहरे को देख कर हँसते हुए बोली।

सागर के चेहरे से ऐसा लगा जैसे उसे जहान भर की खुशी मिल गयी।

सागर ने जोक प्रारंभ किया“एक बार क्राइम के सम्बन्ध में सब देशों की क्राइम एक्सपर्ट की मीटिंग हो रही थी। अमेरिका का एक्सपर्ट बोला, हम क्राइम के बारह घण्टे के अन्दर मुजरिम को पकड़ लेते हैं। जापानी एक्सपर्ट बोला, हम पाँच घण्टे के अन्दर मुजरिम को पकड़ लेते हैं। भारतीय एक्सपर्ट बोला, यह तो कुछ भी नहीं, हमें तो क्राइम होने के दो घण्टे पहले ही मालूम होता हो जाता है कि कहाँ क्राइम होने वाला हैं और मुजरिम कौन है?” सागर ने गंभीर स्वर में जोक्स खत्म किया।

“तुम्हारा भी जबाव नहीं सागर।” वंशिका सागर को देख कर बोली।

चंद्रेश के चेहरे पर जहाँ भर की नाराजगी भरी हुई थी। वह मन ही मन बोला, “पुलिस को क्राइम का पहले पता होता है, तभी तो तुम यहाँ हो।” बड़बड़ाते हुए चंद्रेश बोला।

“आप ने कुछ फरमाया जीजाजी?” सागर चंद्रेश को देख कर बोला।

“तुमसे किसने कहा मुझे जीजाजी कहने को।” उखड़े स्वर में चंद्रेश बोला।

“लगता हैं जीजाजी का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ?” सागर वंशिका की तरफ देख कर बोला।

वंशिका ने मुँह बना कर चंद्रेश की तरफ देखा।

“कब तक तुमको और इसको झेलना पड़ेगा?” गुस्से से सागर की और देख कर वंशिका से चंद्रेश ने कहा।

“यह तो गलत बात है जीजाजी, आपकी बीवी को तो आपको उम्र भर झेलना है।” शांत भाव से मुस्करा कर सागर बोला।

“तुम कब दफा हो रहे हो यहाँ से?” चंद्रेश ने सागर से कहा।

“मेरा क्या है जीजाजी दीदी का घर है। जब तक दीदी चाहेगी, रह लूँगा, जब धक्के मारकर निकाल देगी, चला जाऊँगा।” सागर मासूमियत से वंशिका की तरफ देख कर बोला।

“किसकी हिम्मत जो तुम्हें मेरे घर से निकाले, जब तक मर्जी है रहो।” तीखे स्वर में चंद्रेश को घूरकर देखते हुए वंशिका ने कहा।

“मुझे ही कोई उपाय सोचना पड़ेगा तुम लोगों के लिये?” चंद्रेश बडबड़ाता हुआ बाहर निकल गया।

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राहुल मकरानी ने अपने घर के भीतर आकर दरवाजे को अच्छी तरह बन्द किया। घड़ी में टाइम देखा, रात के आठ बज रहे थे। हर तरफ अन्धेरा छाया हुआ था। खिड़की के पास नीचे उसने झांका, रंगा-बिल्ला ऊपर की तरफ देख कर आपस में बात कर रहे थे। घबराकर राहुल खिड़की से अलग हट गया। इनसे बचने का उपाय सोचने लगा, तभी उसके मोबाइल की रिंगटोन बजने लगी। राहुल ने स्क्रीन पर नम्बर देखा नया नम्बर था। उसने मोबाइल उठा कर बात शुरू की, “हलो कौन बोल रहा है?”

“राहुल साहब मजे हो रहे है?” दूसरी तरफ से मीठे स्वर में सवाल किया गया।

“मैंने आपको नहीं पहचाना।” राहुल ने कहा।

“हमने सोचा संकट के समय आपको हमारी याद आयेगी।” विश्वास भरे स्वर में कहा गया।

“कैसा संकट?”

“खान के पैसे खाकर पूछ रहे हो कैसा संकट?” राहुल चिहुँक उठा। उसके स्वर में हैरानी के भाव थे।

“देसाई साहेब आप?”

“सही पहचाना मिस्टर राहुल, अगर बचना चाहते हो, तो हमारा साथ दो।” देसाई का स्वर उसके कानों में पड़ा।

“आप तो खान के साथ थे। उनसे अलग कब से हो गये। मैं जानता हूँ खान के पैसे खाकर मैं बच नहीं सकता।” राहुल बेबसी से बोला।

“किसी वहम में ना पड़ो। खान और हमारे रास्ते अलग-अलग हो गये हैं।”

“ऐसा कैसे हो सकता देसाई साहेब? आप तो खान की ताकत जानते हैं।”

“तुम उसकी चिन्ता मत करो। वह हम देख लेंगे तुम ये बताओ कि हमारा साथ दोगे या नहीं?” देसाई ने स्पष्ट स्वर में कहा।

राहुल ने सोचा, आगे कुँआ, पीछे खाई है। दोनों तरफ मौत तय है। खान के पैसे नहीं देने पर सौ प्रतिशत मौत है, यहाँ तो थोड़े-बहुत बचने के चाँस भी हैं। राहुल बोला “ठीक हैं देसाई साहब, मैं आपके साथ हूँ। मुझे क्या करना होगा।” गहरी सांस लेते हुए राहुल बोला।

“तुम्हें क्या करना है, बता दिया जायेगा। बस तुम्हारी “हाँ” सुननी थी। अब देखते हैं कि खान हमारा धन्धा बन्द करता है या हम नशे के कारोबार को जड़ से खत्म करते हैं।” देसाई विश्वास भरे स्वर में बोला।

“लेकिन एक समस्या है।” राहुल के मुँह से निकला।

“रंगा-बिल्ला की तुम चिन्ता मत करो, उन्हें हम देख लेंगे।” देसाई क्रूरता से बोला।

“रंगा-बिल्ला के बारे में आप जानते हैं?” राहुल हैरानी भरे स्वर में बोला।

“उस भाई कहने वाले पहलवान का तो हम वह हाल करेंगे, कि आगे से वह किसी को भाई कहने लायक नहीं रहेगा।” देसाई के स्वर में हल्के व्यंग्य के साथ गुस्से के भाव थे।

“मुझे क्या करना है?” राहुल बोला।
 

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