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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“मिस्टर शर्मा” - फिर कातर भाव से बोली - “मुझे अफसोस है मैंने तुम्हें बुरा भला कहा । दिल से शर्मिंदा हूं मैं ।”

“नैवर माइंड ।”

“लेकिन अब तो कबूल करो कि चिट्ठी फर्जी नहीं है ।”

“किया ।”

“देर की मैंने तुम्हारे पास आने में । जल्दी आना चाहिये था । वक्त रहते आती तो शायद सुरभि जान से न जाती । गुनहगार हूं मैं अपनी बेटी की । हे भगवान ! हे भगवान !”

वो फूट फूट कर रोने लगी ।

“खामोश हो जाइये ।” - मैं बोला - “हो सकता है जो लाश बरामद हुई है, वो आपकी बेटी की न हो ।”

उसके रुदन को ब्रेक लगी ।

“ऐसा हो सकता है ?” - फिर फुसफुसाई ।

“होने को क्या नहीं हो सकता इस फानी दुनिया में ! फिर उम्मीद पर दुनिया कायम है । आंसू पोंछ डालिये ।”

सहमति में सिर हिलाते उसने फिर रूमाल निकाला और वो काम किया ।

“मु...मुझे डर लग रहा है...”

“आप कतई न डरिये । डरना तो अब सुजित त्रेहन नाम के कातिल का काम होगा, बहुत जल्द कानून के लम्बे हाथ जिसकी गर्दन के गिर्द होंगे ।”

“तुम कोशिश करोगे कि ऐसा जल्दी से जल्दी हो ?”

“जरूर ! यकीनन ! आई विल गिव माई हण्डर्ड पर्सेन्ट टु दिस केस, मैडम ।”

“थैंक्यू । तुम्हारी फीस...”

“मैं ले लूंगा ।”

“मैं ले कर आयी हूं ।”

“मैडम, मैंने बोला न...”

मैं खामोश हो गया । तब तक वो अपने पर्स में से एक चैक बरामद कर चुकी थी । उसने चैक मुझे सौंपा ।

मैंने चैक पर वहां निगाह डाली जहां रकम दर्ज होती थी ।

एक, दो, तीन, चार, पांच जीरो ! यानी एक लाख रुपया ।

जबकि मैं बताता तो उससे आधी रकम भी बतौर रिटेनर मुझे बाखुशी कुबूल होती ।

राज शर्मा ! - मैंने मन ही मन खुद अपनी पीठ थपथपाई - दि लक्की भाई !

‘ले लूंगा, ले लूंगा’ मुलाहजे का भजन था, ले ही लेनी थी । कोई वालंटियर तो था नहीं यूअर्स ट्रूली ! फिर घोड़ा घास से यारी तो नहीं कर सकता न ! करेगा तो खायेगा क्या !

“थैंक्यू !” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।

सिर हिला कर उसने मेरा थैंक्यू कबूल किया, फिर यूं अंजना की ओर घूमी जैसे पहली बार उसे वहां उसकी मौजूदगी का अहसास हुआ हो ।

“ये कौन है ?” - फिर बोली ।

“ये थी ।” - मैं बोला ।

“मतलब ?”

“समझिये जा नहीं रही, जा चुकी है ।”

“राज शर्मा !” - दांत किटकिटाती अंजना बोली - “यू सन आफ ए बिच !”

“ओरीजिनल, माई डियर, दि वैरी फर्स्ट ।” - मैं धीरज से मुस्कराता हुआ बोला - “इस जगत प्रसिद्ध बिच ने जितने सन पैदा किये हैं, उनमें सबसे पहला । पहलौठी का ।”

पांव पटकती वो वहां से रुखसत हुई ।

“आप पांच मिनट वापिस सोफे पर विराजिये” - पीछे मैं श्यामली से मुखातिब हुआ - “मैं चेंज करके आता हूं ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

मैं बैडरूम में दाखिल हुआ और मैंने अपने पीछे दरवाजा बंद कर लिया ।

कुछ क्षण मैं वहीं ठिठका खड़ा रहा और उस घड़ी जो मेरे जेहन में घुमड़ रहा था, उस पर विचार करता रहा । विचार करता रहा और सोचता रहा कि क्यों मुझे लग रहा था कि मेरी बेवक्त की मेहमान श्यामली तोशनीवाल को वहां कदम रखने से पहले ही खबर थी कि उसकी बेटी मर चुकी थी । पुलिस की टेलीफोन काल से उसे बेटी की मौत की खबर लगी होना उसका टोटल ड्रामा था ।

क्या पतंगबाज औरत थी ?

और पता नहीं किस फिराक में थी ?

***

हम छतरपुर पहुंचे ।

बारिश तब नहीं हो रही थी और अंधेरे में ये भी कहना मुहाल था कि मेरे फ्लैट से बीस किलोमीटर दूर के उस इलाके में बारिश हुई ही नहीं थी या हो कर बंद हो चुकी थी ।

तोशनीवाल फार्म की बाउंड्री वाल में एक विशाल फाटक था जो उस घड़ी पूरा खुला था और उसके पल्ले आजू बाजू के विशाल पिलर्स के पीछे छुपे हुए थे । आगे एक लम्बा ड्राइव वे था जिस के सिरे पर एक बहुत बड़ा अहाता था जिसमें फार्महाउस की एकमंजिला इमारत थी । अहाते में बायीं ओर तीन गाड़ियां खड़ी थीं जिनमें से एक पीसीआर वैन थी जिसके दोनों तरफ बड़ा बड़ा स्पैशल स्क्वायड, दिल्ली पुलिस लिखा था । वो वैन वहां इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव आफिसर-इन-चार्ज, स्पैशल स्क्वायड की मौजूदगी की परिचायक थी । स्पैशल स्क्वायड पुलिस का वो दस्ता था जो सिर्फ कत्ल के केसों की तफ्तीश के लिये भेजा जाता था । लिहाजा दिल्ली में कत्ल की हर वारदात में इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव की हाजिरी और दखल निश्चित था ।

दूसरी कार एक पुलिस जीप थी और तीसरी एक एम्बैसेडर थी । जीप जरूर लोकल थाने की थी, कार भी वहीं की हो सकती थी लेकिन ये भी मुमकिन था कि वो पुलिस लैब से आये एक्सपर्ट्स की थी ।

मैंने अपनी कार को उन गाड़ियों से विपरीत दिशा में कम्पाउंड के दूसरे बाजू में पार्क किया ।

“मैडम” - मैं बोला - “अभी आप यही ठहरिये, मैं भीतर के हालात मालूम करता हूं और फिर आपको खबर करता हूं ।”

“लेकिन...” - उसने व्याकुल भाव से कहना चाहा ।

“मैडम, अगर मरने वाली आपकी बेटी नहीं है तो भीतर आपका कोई काम नहीं है ।”

“लेकिन अगर वो सुरभि...”

“मैं मालूम करता हूं न ! ओके ?”

हिचकिचाते हुए उसने सहमति में सिर हिलाया ।

कार से निकल कर मैं आगे बढ़ा । मैंने फार्महाउस के कवर्ड ड्राइव वे में कदम रखा तो एक वर्दीधारी सिपाही मेन डोर के सामने के बरामदे की तीन सीढ़ियां उतरा और मजबूती से मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया ।

“कौन हो ?” - वो कर्कश स्वर में बोला - “कहां जा रहे हो ?”

“राज शर्मा हूं ।” - मैं जब्त से बोला - “पीडी हूं । इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव का दोस्त हूं । भीतर मौकायवारदात पर जा रहा हूं ।”

उसने गौर से मेरी सूरत का मुआयना किया ।

मुझे ऐसा न लगा कि उसने मेरी सूरत से या मेरे नाम से मुझे पहचाना था ।

“यहीं ठहरो ।” - वो पूर्ववत् कर्कश स्वर में बोला ।

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

वो भीतर गया और उलटे पांव वापिस लौटा ।

“जाओ ।” - और बोला ।

मैं भीतर दाखिल हुआ ।

मेन हाल में मुझे पांच पुलिसियों के दर्शन हुए । उन में से एक ने इंस्पेक्टर देवेन्द्र यादव तो होना ही था, दूसरा उसका मातहत, युवा सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर था, तीसरा मतवाल चंद नाम का इंस्पेक्टर था जिसको मैं पहचानता था और पहले से जानता था कि महरौली थाने का एसएचओ था । चौथा एक मेरे लिये नितांत अजनबी सब-इंस्पेक्टर था और पांचवां, जो कि वहां मौजूद इकलौता शख्स था जो वर्दी में नहीं था, जो सूरत से तो पुलिसिया ही जान पड़ता था लेकिन टैक्नीकल स्टाफ से भी हो सकता था ।

मतवाल चंद की मेरे पर निगाह पड़ी तो तत्काल उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये । उसने मेरी तरफ यूं देखा जैसे मैं कोई ऐसी डिश था जिसका उसने आर्डर नहीं दिया था ।

ऐसा ही मिजाज था उसका आदतन ।

सख्त ! खुंदकी ! असहिष्णुतापूर्ण !

मैंने अभिवादन किया - यूं कि एक ही में सबको शुमार कर लिया ।

“आओ, भई, पीडी साहब ।” - यादव बोला ।

मैंने खास उसका अभिवादन फिर किया ।

“इसका यहां क्या काम है ?” - मतवाल चंद बोला ।

उसके सवाल से और सवाल करने के लहजे से ही मैं समझ गया कि वो भी मुझे भूला नहीं था ।

“शायद निकल आये कुछ ।” - यादव सहज भाव से बोला - “ये मरने वाली की मां से वाकिफ है । मां - श्यामली तोशनीवाल - अभी थोड़ी देर पहले इसके फ्लैट पर इसके साथ थी” - वो मेरी तरफ घूमा - “अब कहां है ?”

“बाहर मेरी कार में बैठी है ।” - मैं बोला ।

“उसे खबर लग गयी ?”

“लग गयी लेकिन उम्मीद के खिलाफ उम्मीद कर रही है कि शायद मकतूला उसकी बेटी सुरभि न हो ।”

“वही है । शक की कोई गुंजायश नहीं । पक्की, पुख्ता शिनाख्त हुई है ।”

“कैसे मरी ?”

“फोन पर बोला तो था ! खुदकुशी की ।”

“कत्ल की कोई गुंजायश नहीं ?”

“एसएचओ साहब से पूछो ।”

मैंने मतवाल चंद की तरफ देखा ।

“न भी हो तो” - वो भुनभुनाया - “दूसरे पहलू पर भी विचार करना पड़ता है ।”

“दूसरा पहलू ! यानी कि कत्ल वाला ?”

“हां । जो दिखाई देता है, वो कातिल का स्टेज किया कवर आप भी हो सकता है लेकिन यादव साहब को मेरी राय से इत्तफाक नहीं ।”

“ओपन एण्ड शट केस है सुइसाइड का ।” - यादव बोला - “बुलेट के ऐंट्री वूंड के आसपास, कनपटी पर, चेहरे पर जले बारूद के कण छिटके साफ पता चलते थे । फिर गए खुद उसके हाथ में । क्लियर केस है खुदकुशी का ।”

“खुदकुशी की वजह ?”

“मालूम पड़ेगी । सामने आयेगी । अभी तो शुरुआत है तफ्तीश की ।”

“लाश कहां है ?”

“उठवा दी गयी है । पोस्टमार्टम के लिये भिजवा दी गयी है ।”

“इतनी जल्दी ! परिवार वालों को शिनाख्त का तो मौका देते !”

“वो मौका मोर्ग में भी हासिल हो सकता है ।”

“फिर भी...”

“राजधानी के कुछ हालिया हालात की वजह से आजकल पुलिस बहुत प्रेशर में है । बहुत हेठी, बहुत किरकिरी हो रही है पुलिस की । इसलिये मुस्तैदी दिखाना जरूरी था ।”

“फिर मेरे मां को यहां लाने का क्या फायदा हुआ ?”

“देर की तुमने लाने में । तुम्हारे आने के थोड़ी देर पहले ही तो उठवाई लाश !”

“हूं ।”

“अभी भी क्या आफत आ गयी है ! सफदरजंग की मोर्ग में गयी है लाश । मां वहां शिनाख्त कर सकती है ।”
 
“शिनाख्त - जिसे आपने पक्की, पुख्ता बताया - किसने की ?”

“यहां के केयरटेकर ने । विष्णु कसाना नाम है । ग्यारह बजे के करीब उसी ने आकर लाश बरामद की थी ।”

“आकर क्या मतलब ? केयरटेकर केयरटेकिंग के लिये यहां नहीं था ?”

“यहीं होता है लेकिन तब नहीं था ।”

“वजह ?”

“सिनेमा देखने गया हुआ था । ग्यारह बजे के करीब लौटा था तो अंधेरे में लाश से टकराकर ढेर होता बचा था ।”

“सुरभि तोशनीवाल की लाश से ?”

“हां ।”

“जिसे कि वो पहले से जानता पहचानता था ?”

“हां । आखिर मालिक की, उसके एम्पलायर की, बेटी थी ।”

“अंधेरे में लाश को पहचाना ?”

“जब यहां पहुंचा था, तब अंधेरा था । रोशनी की तो पहचाना ।”

“आई सी । अब कहां है ये...क्या नाम बोला था ?”

“विष्णु कसाना । कुछ याद नहीं रख सकते ?”

“सर्दी ज्यादा पड़े तो ऐसा कुछ हो जाता है ।”

“क्यों होने देते हो । भेजे को विस्की में रिंस करके रखा करो ।”

“वही करता हूं लेकिन वो किस्सा फिर कभी । मैं कह रहा था कि अब कहां है ये केयरटेकर विष्णु कसाना ?”

“महरौली थाने में ।”

“वहां क्यों ? क्या वो सस्पैक्ट है ?”

“नहीं, भई । वो अपना बयान रिकार्ड कराने के लिये वहां है, एक्सटेंसिव पूछताछ के लिये वहां है, आखिर वो केस का अहमतरीन गवाह है ।”

“किस बात का गवाह है ? खुदकुशी - या कत्ल - का चश्मदीद तो वो नहीं ! कत्ल या खुदकुशी जो हुआ उसके वाकया हो चुकने के बाद उसने तो खाली लाश बरामद की !”

“ये तुम कत्ल कत्ल क्यों भज रहे हो ?”

“सारी ! वारदात में उसकी कोई और इन्वोल्वमेंट हो सकती है ? उस पर किसी तरह के शुबहे की गुंजायश है ?”

“कैसा शुबह ?”

“आप बताइये ।”

“नहीं । नहीं हो सकती ।”

“ये तो” - मतवाल चंद पूर्ववत् भुनभुनाया - “वकीलों की तरह जिरह कर रहा है ! यादव साहब, क्यों आपने इसे इतनी छूट दी हुई है ?”

“हमेशा नहीं । हमेशा नहीं । रिपब्लिक डे करीब है न, सेंट वेलेंटाइन डे करीब है न ! इसलिये मैं फेस्टिव मूड में हूं ।”

“आपकी माया आप ही जानें वर्ना मेरे को तो पीडी की जात से नफरत है, इस धंधे से ही नफरत है ।”

“मैं पुलिस में ही भरती होना चाहता था, जनाब” - मैं सहज भाव से बोला - “लेकिन ये कह के डिसमिस कर दिया गया था कि कमीना कम था ।”

मतवाल चंद के चेहरे पर बड़े खूंखार भाव आये ।

“मजाक कर रहा है” - यादव जल्दी से बोला - “जानता है मेरी शह है इसलिये मजाक कर रहा है ।”

“बॉस” - मैंने भी तत्काल पैंतरा बदला - “पीडीज की तरह आपको मजाक भी पसंद नहीं तो आइंदा ये गुस्ताखी नहीं होगी ।”

“हां” - मतवाल चंद गुस्से से बोला - “ताकीद रहे ।”

“रहेगी, जनाब, रहेगी । अब एक बार अपनी जुबानी कह दीजिये कि गुस्ताखी माफ की, खता माफ की ?”

मतवाल चंद ने यादव की तरफ देखा ।

यादव हंसा ।

“ठीक है” - मतवाल चंद भुनभुनाया - “की ।”

“नो हार्ड फीलिंग्स ?”

“नो हार्ड फीलिंग्स ।”

“दिल में ! या आजू बाजू ऊपर नीचे कहीं !”

“क्या बोला ?”

“थैंक्यू बोला, सर ।”

“ठीक है, ठीक है ।”

“सर, केयरटेकर आपके थाने में है, मुझे मिलने का मौका देंगे ?”

“थाने पहुंचना, एएसएचओ के पास जाना, केयरटेकर अभी वहीं हुआ तो मिलना ।”

“ओके । थैंक्यू । लाश बरामद कहां से हुई थी ?”

“यहां से ।” - उसने फर्श पर एक जगह की तरफ इशारा किया, जहां - मैंने तब देखा कि - कार्पेट पर मृत शरीर की चाक से उकेरी सफेद आउटलाइन बनी हुई थी - “उस सोफे पर बैठी थी, जहां से मर कर यहां कार्पेट पर गिरी थी ।”

“केयरटेकर अंधेरे में लाश से टकराया ! वो यहां से गुजर रहा था ?”

“हां । पिछवाड़े में उसका कमरा है जिसमें दाखिले का रास्ता बाजू से है लेकिन वहां पहुंचने के लिये सारी इमारत का घेरा काटना पड़ता । ये वहां के लिये शार्टकट है । यहां से आगे गलियारा, गलियारे के सिरे पर पिछवाड़े का दरवाजा, जिससे आगे उसका कमरा ।”

“वहां तक अंधेरे में क्यों जा रहा था ?”

“कहता है यहां के चप्पे चप्पे से वाकिफ था, अंधेरे में चल कर अपने कमरे तक पहुंचने में उसे कोई प्राब्लम नहीं थी ।”

“आई सी ।”

“लेकिन अंधेरे की वजह और भी थी ।”

“और भी थी ! क्या ?”

“मेन स्विच ट्रिप हो गया था, जो वो कहता है कि किसी सर्कट में हालिया फाल्ट की वजह से अक्सर हो जाता था ।”

“मेन स्विच कहां है ?”

“बाहर । मेनडोर के सामने के बरामदे में ।”

“लाश से ठोकर खाने के बाद जहां जा के उसने मेन स्विच आन किया, यहां आकर रोशनी की तो पता चला कि जिस चीज से ठोकर खायी थी, वो उसके एम्प्लायर की नौजवान बेटी की लाश थी ?”

“नहीं । लाश के बारे में उसे पहले ही पता चल गया था । जब उसने ठोकर खायी थी तो पहला काम यही किया था कि यहां का स्विच आन किया था । जब रोशनी नहीं हुई थी तो समझ गया था कि मेन स्विच फिर ट्रिप कर गया था । तब उसने माचिस जला कर देखा था कि उसने किस चीज से ठोकर खायी थी ।”

“माचिस जला कर ! स्मोकर है ?”

“हां ।”

“फिर ?”

“फिर फौरन उसने पुलिस को फोन लगाया ।”

“पहले जाकर मेन स्विच की खबर न ली ?”

“नहीं, पहले पुलिस को फोन किया ।”

“बहुत जिम्मेदार, बहुत दानिशमंद बन कर दिखाया !”

“ठीक किया ।”

“टाइम फैक्टर उसकी बात की तसदीक करता है ?”

“करता है ।”

मेरी निगाह पैन होती हुई चारों तरफ घूमी तो उस दरवाजे पर अटकी जिससे दाखिल हो कर मैं वहां पहुंचा था । वहां दरवाजे के एक कब्जे से मुझे रंगीन सा कुछ लिपटा दिखाई दिया । मैं लम्बे डग भरता दरवाजे के करीब पहुंचा तो पाया कि वहां कपड़े की एक महीन सी धज्जी अटकी हुई थी । मैंने उसे कब्जे की पकड़ से आजाद किया तो पाया कि वो किसी जनाना पोशाक का गहरे नीले रंग के रेशमी कपड़े का पुर्जा था ।
 
मेरे जेहन में श्यामली तोशनीवाल की पोशाक का अक्स उभरा । शलवार सूट तो वो पहने थी लेकिन वो तो फिरोजी रंग का था ।

क्या दुपट्टा नीला था ।

फिरोजी रंग नीले जैसा ही तो होता था ।

फिर मेरी तवज्जो कब्जे की तरफ गयी ।

कब्जा चौखट और दरवाजे में बहुत कारीगरी से ठुका हुआ था, पीतल का था, कीमती था और ऐन दुरुस्त हालत में था, उसमें ऐसा कुछ नहीं था आम हालात में जिसके साथ कुछ उलझ पाता, अटक पाता ।

लेकिन हालात आम कहां थे ? वहां से एक लाश बरामद हुई थी और दो पुलिस अधिकारियों की उसके बारे में दो मुख्तलिफ राय थी ।

मतवाल चंद लम्बे डग भरता मेरे करीब पहुंचा और उसने मेरे हाथ से वो धज्जी छीन ली ।

यादव भी करीब पहुंचा ।

मुझे इस बात पर कोई हैरानी नहीं थी कि इतने पुलिसियों में से किसी को भी अभी तक - अभी तक, आखिर तो दिखाई देती ही - वो धज्जी नहीं दिखाई दी थी । आधी रात होने को थी, सख्त ठण्ड का मौसम था, सारे दिन की ड्यूटी की फटीग थी, सरकारी अमले के रिफ्लैक्सिज कमजोर हो जाना क्या बड़ी बात थी, वगैरह !

“खून लगा जान पड़ता है ।” - मैं धीरे से बोला ।

“क्या बड़ी बात है !” - यादव भुनभुनाया - “कनपटी में गोली धंसे तो खून बहता ही है ।”

“यहां रोशनी काफी कम जान पड़ती है । क्या वोल्टेज पूरी नहीं आ रही ?”

“यही बात है । केयरटेकर कहता है इधर लो वोल्टेज की प्राब्लम है ।”

“आई सी ।”

“सीएफएल बल्ब जो यहां लगे हैं, वो भी लो वोल्टेज के हैं ।”

“काहे को ?”

“भई, बाज लोगों को तीखी लाइट नापसंद होती है । कम रोशनी उन्हें रोमांटिक लगती है ।”

“क्या कहने !”

“वैसे लो वोल्टेज दुरुस्त करने का इंतजाम यहां है । बाहर मेन सप्लाई के साथ वोल्टेज स्टैबलाइजर लगा हुआ है लेकिन वो मैनुअल है, टॉगल घुमा कर वोल्टेज को कंट्रोल करना पड़ता है ।”

“इतने रईस आदमी, ऐसी हाईएण्ड प्रापर्टी और वोल्टेज स्टैबलाइजर मैनुअल ! कमाल है ?”

“उसने नहीं लगवाया । प्रापर्टी के ओरीजिनल मालिक ने लगवाया । केयरटेकर कहता है तोशनीवाल ने ये फार्महाउस रीसेल में खरीदा था । तभी से सीएफएल बल्ब भी लो वोल्टेज के हैं ।”

“तभी ! बहरहाल बात तो वोल्टेज की हो रही थी ।”

“हां । केयरटेकर कहता है वोल्टेज स्टैबलाइजर मेन स्विच के जंक्शन बाक्स से बहुत ऊंचा लगा हुआ है, वो हैण्डीकैप्ड है इसलिये उसका हाथ उस तक नहीं पहुंचा था । टॉगल तक उसका हाथ स्टूल पर चढ़ कर ही पहुंच सकता था लेकिन मौजूदा हालात की टेंशन में उसने स्टूल लेकर आने की कोशिश नहीं की थी । आखिर लो वोल्टेज के बावजूद बिजली तो आ ही रही थी...”

“हैण्डीकैप्ड है ?”

“हां । एक बांह दूसरी बांह से छोटी है । लंगड़ाता भी है ।”

“बांह कौन सी छोटी है ?”

“दायीं । कहता है कलाई और कोहनी के बीच कभी दो जगह से टूटी थी, ठीक से जुड़ नहीं पायी थी इसलिये टेढ़ी हो गयी थी, छोटी हो गयी थी, मैंने देखा था पूरी तरह से सीधी होती ही नहीं थी, फैलाने पर टेढ़ी ही रहती थी ।”

“लंगड़ाता कौन सी टांग से है ?”

“दायीं से । क्यों ?”

“वो कातिल है ।”

“क्या !”

“यकीनन वो कातिल है ।”

“तुम्हें कैसे मालूम ?”

मैंने उसे चिट्ठी की बाबत सविस्तार बताया ।

“कमाल है !” - मैं खामोश हुआ तो यादव मंत्रमुग्ध स्वर में बोला ।

“एसएचओ साहब” - मैं मतवाल चंद से मुखातिब हुआ - “अपने थाने फोन कीजिये और हिदायत जारी कीजिये कि उस शख्स को जाने न दिया जाये, वहीं रोक के रखा जाये । एक बार वो हाथ से निकल गया तो फिर पकड़ाई में नहीं आयेगा ।”

“क्या बक रहे हो ?” - मतवाल चंद झल्लाया ।

“ये खुदकुशी का केस नहीं है । ये कत्ल का केस है और वो कातिल है ।”

उस वक्त के मेरे लहजे की दृढ़ता का मतवाल चंद पर असर हुआ, तत्काल वो अपना मोबाइल निकाल कर उस पर नम्बर पंच करने लगा ।

“शर्मा” - यादव कर्कश स्वर में बोला - “इधर मेरी तरफ देखो ।”

“मैं देखता हूं जनाब” - मैं बोला - “लेकिन पहले तुम अपने फैलो इंस्पेक्टर साहब की तरफ देखो, उनके चेहरे की तरफ देखो, मुझे तो जिस पर से रंग उड़ता जान पड़ रहा है ।”

यादव ने मतवाल चंद की तरफ देखा ।

“क्या !” - मतवाल चंद कलपता सा कह रहा था - “चला गया ! बयान दर्ज करा के चला गया !...कहां गया ?...यहां तो लौटा नहीं ! कितना टाइम हुआ ?...क्या ! इतने में तो वो पैदल चल कर यहां पहुंच सकता था !...अभी चारों तरफ आदमी दौड़ाओ ! कंट्रोल रूम से कांटैक्ट करो । उसके लिये बमय मुकम्मल हुलिया आल पॉइंट बुलेटिन जारी करवाओ । क्या !...अरे, तुम्हारे पास बैठा था तुम्हें नहीं मालूम !...ठीक है, दर्ज करो । कद सवा पांच फुट के करीब, उम्र साठ के आसपास, सिर तीन चौथाई गंजा । सिर्फ सामने और कहीं कहीं ढाई बाल । आंखें काली, चेहरा गोल और उस पर तरह तरह की खरोंचों के परमानेंट निशान, दायीं बांह में डिफेक्ट, कोहनी के आगे से पूरी तरह से नहीं मुड़ती इस वजह से बायीं से काफी छोटी । दायें हाथ में डिफेक्ट । उंगलियां बाज के पंजों की तरह मुड़ी हुईं, अकड़ी हुईं । दाईं टांग में डिफेक्ट । लंगड़ा के चलता है । पोशाक खुद बयान कर सकोगे या वो भी मुश्किल है तुम्हारे वास्ते !...ठीक है, ठीक है । एक बात और ध्यान में रहे सबके । वो शख्स हथियारबंद हो सकता है, खतरनाक साबित हो सकता है । उस पर कातिल होने का शुबह है, ऐसा शख्स और कत्ल कर सकता है, ताकीद रहे ।”

उसने सम्बंध विच्छेद करके मोबाइल को जेब के हवाले किया और मेरी तरफ घूमा ।
 
“पकड़ा तो वो जायेगा ही” - वो दांत पीसता सा बोला - “लेकिन तब अगर वो कातिल साबित न हुआ तो, पीडी साहब, तुम्हारी खैर नहीं...”

“कमाल है !” - मैं बोला - “मैं आपका केस सुलझाने में, कातिल की शिनाख्त कराने में आपकी मदद कर रहा हूं और आप मुझे धमकियां जारी कर रहे हैं ।”

“...तमाम पीडीपंती भुला दूंगा । मतवाल चंद है मेरा नाम ! याद रहे !”

मैंने यादव की तरफ देखा ।

“तुम्हारा कोई मुलाहजा है तो यादव साहब से है, मेरे से नहीं है । समझ गये !”

“समझ गया, जनाब ! ऐसे मामलों में ये भी मेरे से कोई मुलाहजा नहीं मानते । ये आप से ज्यादा सख्त हाकिम हैं मेरे वास्ते । बहरहाल मेरे पर कहर बरपाने की जगह अभी तो आप इस बात का मातम मनाइये कि कातिल आपकी गिरफ्त में था, आपके थाने की हाजिरी भर रहा था, आपने उसे निकल जाने दिया ।”

“अभी मैं कुछ नहीं जानता । अभी मैं तुम्हारी जुबान पर जा रहा हूं । रिफ्लैक्स एक्शन में अभी मैंने इतना कुछ बोल दिया, इतनी हिदायत जारी कर दी । हो सकता है मुझे पछताना पड़े । अगर ऐसा हुआ तो...”

उसने फिर कहरबरपा निगाह से मेरी तरफ देखा ।

मैंने नकली जमहाई ली ।

वो और भड़कने को हुआ लेकिन यादव पहले बोल पड़ा - “वो चिट्ठी कहां है ?”

“चिट्ठी !” - मेरी भवें उठीं ।

“भई, जिसका अभी जिक्र किया !”

“अच्छा, वो ! वो तो मैडम के पास है लेकिन फोटोकापी मेरे पास है ।”

“दिखाओ ।”

मैंने फोटोकापी पेश की ।

रास्ते में एम्स के बाहर मुझे एक कैमिस्ट शाप दिखाई दी थी जहां कि फोटोकापी भी होती थी, वहीं से मैंने चिट्ठी की दो कापियां बनवाई थीं और ओरीजिनल श्यामला को सौंप दी थी ।

“इसे मैं रख रहा हूं ।” - यादव बोला ।

“नो प्राब्लम ।”

उसने उसे पढने की कोशिश न की, वह करके उसे अपनी वर्दी की एक जेब में रख लिया ।

हैरानी थी कि मतवाल चंद ने चिट्ठी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, उस सिलसिले में उसको वही काफी लगा जान पड़ता था जो उसने मेरी जुबानी सुना था ।

“लड़की लैफ्टी थी ?” - मैं बोला ।

“क्या ?” - मतवाल चंद बोला ।

“लैफ्टी ! लैफ्टहैण्डिड ! बायें हाथ से काम करने वाली !”

दोनों इंस्पेक्टरों की निगाहें मिलीं ।

“क्यों पूछ रहे हो ?” - यादव बोला ।

मैंने अपने बायें हाथ की पहली उंगली अपनी कनपटी से सटाई, और बोला - “सोचो !”

यादव का चेहरा गम्भीर हुआ ।

“मालूम नहीं ।” - फिर बोला - “लेकिन जान लेना क्या बड़ी बात होगी जबकि मकतूला की मां बाहर तुम्हारी कार में मौजूद है ।”

“वो बेटी के बुरे की आशंका से पहले ही बुरी तरह से सहमी हुई है । मौजूदा हालात में आप उसे अपनी पूछताछ का निशाना बनायेंगे, तो वो हास्पिटल केस ही होगा ! श्मशान घाट केस भी हो तो कोई बड़ी बात नहीं !”

“अरे, क्या बक रहे हो ! तफ्तीश न करने की सलाह दे रहे हो ?”

“तफ्तीश मुल्तवी करने की सलाह दे रहा हूं । अपनी पूछताछ को कल सुबह तक टाल दीजिये, फिर जो जी में आये पूछना । करना ।”

“तुम कौन होते हो हमें डिक्टेट करने वाले !” - मतवाल चंद गुर्राया ।

“मैं कोई नहीं होता लेकिन मकतूला का बाप होता है । आप साहबान भूल रहे हैं कि मकतूला वीवीआईपी शिव मंगल तोशनीवाल की बेटी थी, उसको मालूम पड़ा कि पुलिस उसकी बीवी को हलकान कर रही है तो वो सीधा पुलिस कमिश्नर से बात करेगा । चीफ मिनिस्टर से या उससे भी ऊपर करे तो कोई बड़ी बात नहीं ।”

“मालूम पड़ा ! कैसे मालूम पड़ेगा ?”

“मैं बोलूंगा न ! अभी ! इसी वक्त !”

“हलक से जुबान खींच लूंगा ।”

“ओके । गो अहेड !”

“अरे, क्या समझते हो तुम अपने आपको ! पुलिस से बैर मोल लेकर, पुलिस की मुखालफत करके तुम अपने पीडी के धंधे में रह लोगे !”

“मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा, जनाब, यादव साहब गवाह हैं, न कभी पहले मैंने ऐसा किया है, न आइंदा करूंगा । मैं दरिया में रह कर मगर से बैर का नतीजा जानता हूं । मेरी सिर्फ इतनी दरख्वास्त है कि वो औरत परेशान है, हलकान है, बेटी के अंजाम से पहले ही अधमरी हालत में है, अब आप एकाएक उसके पीछे पड़ेंगे तो पूरी मरी हो के रहेगी । लिहाजा उस पर तरस खाइये और उससे जो पूछताछ करनी है वो कल तक के लिये मुल्तवी कीजिये ।”

“कल तो वो अपने डिफेंस में दस कहानी गढ़ लेगी ।”

“किस डिफेंस में ? उसे कौन से डिफेंस की जरूरत है ? जो कातिल प्रत्यक्ष है, उसको दरकिनार करके अब आप उसको कातिल करार देते उसके पीछे पड़ेंगे ! मां को बेटी का कातिल ठहराने की हिमाकत करेंगे । उस मां को मर्डर सस्पैक्ट बनाने की नादानी करेंगे जो अपनी बेटी की, बेटे की, पति की खैर मनाती इतनी ठंड के मौसम में बारिश में भीगती, आधी रात को मदद की गुहार लगाने मेरे पास पहुंची ! फिर ये न भूलिये कि उसकी भगवानदास रोड पर मेरे फ्लैट में आमद का और यहां हुए कत्ल का तकरीबन एक वक्त है और इस जगह में और मेरे फ्लैट में बीस किलोमीटर का फासला है । वो एक ही वक्त में बीस किलोमीटर के फासले पर वाकया के दो जगहों पर मौजूद नहीं हो सकती थी ।”

“कत्ल का वक्त अभी निर्धारित नहीं है ।” - यादव बोला ।

“आपने बोला न कि ग्यारह बजे...”

“ग्यारह बजे केयरटेकर सिनेमा देख कर यहां वापिस लौटा था और उसने लाश बरामद की थी । ये कौन बोला कि कत्ल तभी हुआ था ? कत्ल ग्यारह बजे से पहले, काफी पहले, बहुत पहले हुआ हो सकता है । केयरटेकर का कहना है कि वो यहां से शाम छ: बजे निकला था । उसकी यहां से रवानगी और वापिसी के बीच पांच घंटे का वक्फा है । कत्ल उस दौरान कभी भी हुआ हो सकता है । मां उस दौरान कभी भी यहां आयी हो सकती है ।”

“बेटी का कत्ल करने ?”

“कुछ भी ।”

“तो मेरे पास क्यों आयी ?”

“एलीबाई गढ़ने । तुम्हारी सूरत में अपना डिफेंस खड़ा करने ।”

एलीबाई गढ़ने !

मेरे जेहन पर लाख रुपये के चैक का अक्स कौंधा ।

तो क्या ये वजह थी उस औरत के लाख रुपये की रकम के चैक से एडवांस में लैस होकर मेरे पास पहुंचने की ?

लाख रुपया शुरुआती फीस के तौर पर - रिटेनर के तौर पर - ज्यादा था लेकिन रिश्वत के तौर पर कम था, बहुत कम था ।

“तुम्हारा नारा जो है” - यादव कह रहा था - “कि जो राज शर्मा का क्लायंट है, वो बेगुनाह है । अभी देख लो, कितना जोर लगा रहे हो उसकी तरफ से बतौर कातिल तवज्जो हटाने के लिये !”

“अब मंजूर हो गया आपको कि ये खुदकुशी का नहीं, कत्ल का केस है ?”

“अभी तफ्तीश का शुरुआती दौर है, अभी हर जुदा थ्योरी काबिले-गौर है ।”

“मेरा तो” - मतवाल चंद बोला - “शुरू से खयाल था कि ये कत्ल का केस था । अब मेरे खयाल की तसदीक हो गयी ।”

“तसदीक हो गयी !” - मैं बोला - “वो कैसे ?”

“उस औरत की यहां हाजिरी स्थापित है ।”

“जी ! क्या फरमाया ?”

“केयरटेकर ने” - जवाब यादव ने दिया, शायद उसे लगा था कि मतवाल चंद की जवाब देने की मंशा नहीं थी - “जब लाश बरामद की थी तो तब उसने लाश के पहलू में एक जनाना पर्स पड़ा पाया था । उसने पहले पर्स को मकतूला की ही मिल्कियत समझा था लेकिन फिर उसने नोट किया था कि पर्स पर मां के नाम के इनीशियलर एम्बोस्ड थे - उस पर ‘एस टी’ गुदा था जो कि श्यामली तोशनीवाल के नाम के प्रथमाक्षर हैं ।”

“मकतूला के नाम के भी हैं ।”

“क्या बोला ?”

“सुरभि तोशनीवाल । इनीशियल्स ‘एस टी’ !”

“ओह ! मेरा ध्यान इस तरफ नहीं गया था ।”

“केयरटेकर की ऑब्जरवेशन को ही सतबचन मान लिया था !”

“बकवास न कर । पर्स की इनवेंट्री से भी साबित हुआ था कि वो श्यामली तोशनीवाल का था ।”
 
“आई सी । वो पर्स अब कहां है ?”

“यहीं है ।”

“मैं देख सकता हूं ?”

“काहे को ?” - मतवाल चंद भुनभुनाया ।

कमीना ? कितना खिलाफ था मेरे ?

“क्या फर्क पड़ता है !” - यादव बोला ।

मतवाल चंद परे देखने लगा ।

यादव ने अपने सब-इंस्पेक्टर को इशारा किया ।

तोमर ने एक शापिंग बैग में से पर्स बरामद किया और मुझे सौंपा ।

मैंने पर्स को उलटा पलटा, सरसरी तौर पर उसका मुआयना किया, फिर उसे खोला ।

पर्स में लिपस्टिक, कंघी, शीशा, पाउडर पफ, रूमाल, वगैरह जैसा आम जनाना सामान था, कुछ छोटे बड़े नोट थे, एक कायन पर्स था और एक चिट्ठी थी जो किसी सपना टाहिलियानी ने श्यामली तोशनीवाल को लिखी थी । लिफाफे पर दिल्ली - 110014 की चार दिन पहले की डाकखाने की गोल मोहर ठुकी हुई थी । चिट्ठी में हालचाल पूछने बताने के अलावा और कुछ नहीं था ।

मैंने पर्स एसआई तोमर को वापिस लौटा दिया ।

“तो” - मैं बोला - “आपके खयाल से ये पर्स श्यामली तोशनीवाल का है ।”

“शर्मा, बच्चे बहला रहा है ?” - यादव बोला - “हमारे यकीन से ये पर्स श्यामली तोशनीवाल का है ।”

“जो किसी ने चोरी कर लिया और यहां प्लांट कर दिया ।” - मैं आशापूर्ण स्वर में बोला ।

“किसने ?”

“एक ही कैंडीडेट है इस ऑनर के काबिल ।”

“कौन ?”

“ये भी कोई पूछने की बात है ! केयरटेकर, और कौन ! पर्स प्लांट करने में उसकी एडवांटेज है । यूं उस पर से फोकस हटता है । यूं कत्ल का आल्टरनेट कैंडीडेट वजूद में आता है । ठीक !”

“नहीं ठीक । तुम्हारा अपने क्लायंट को कैसे भी डिफेंड करना, उसकी हिमायत करना बनता है लेकिन उसकी खातिर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करना नहीं बनता । इसलिए बाज आओ ।”

“मैं अभी भी कहता हूं” - मतवाल चंद झुंझलाये स्वर में बोला - “कि उस औरत को पूछताछ के लिये हिरासत में लिया जाना चाहिये ।”

“जनाब” - मैं जल्दी से बोला - “उसकी तरफ से मैं बयान देने को तैयार हूं ।”

“तुम्हारे बयान की क्या औकात है ?”

“शायद हो कोई !”

“क्या कहना चाहते हो ?” - यादव बोला ।

“मुझे यहां हुए कत् ... हादसे की खबर तुम्हारी फोन काल से लगी थी और उस बाबत आगे श्यामली तोशनीवाल को बताया था लेकिन तब मुझे साफ लगा था कि उस खबर में उसके लिये नया कुछ नहीं था, अपनी बेटी के अंजाम से वो पहले से वाकिफ थी ।”

यादव ने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

“बॉस” - मैं मुसाहिबी अंदाज से बोला - “मैं हमेशा पुलिस के साथ हूं ।”

“कोई भेद है ।”

“कोई भेद नहीं ।”

“शायद इसलिये मुंह फाड़ा क्योंकि जानते हो कि ये बात वैसे भी हमें मालूम हो के रहनी थी ।”

“अब आप तो, जनाब, लगता है मुझे किसी बात का यश देना ही नहीं चाहते ।”

“हमारा तरफदार बन कर दिखाना चाहते हो तो उस औरत को हिरासत में लिये जाने की मुखालफत क्यों कर रहे हो ?”

“आपकी मुखालफत नहीं कर रहा, उसके लिये हमदर्दी जता रहा हूं । वो बेटी के अंजाम के बारे में पहले से जानती थी तो इतने से ही वो कातिल नहीं साबित हो जाती । न ही यहां से, मौकायवारदात से उसके पर्स की बरामदी से वो कातिल साबित हो जाती है ।”

“इन बातों को सामने लाये जाने पर वो उनकी कोई सफाई तो देगी या नहीं ?”

“देगी । देनी पड़ेगी । लेकिन इस वक्त वो इस बाबत पुलिस की क्रॉसक्वेश्चनिंग को झेल पाने के हाल में नहीं है । आप मेरा यकीन जानिये कि आप उस पर एक निगाह डालेंगे तो आप भी यही फैसला करेंगे !”

वो सोचने लगा ।

“फिर सौ बातों की एक बात, कत्ल उसने किया होता तो मेरे पास हरगिज न आती ।”

“वजह मैंने बताई तो है ! एलीबाई गढ़ने के लिये आयी ।”

“कैसे होता ये ? मैं क्या उसकी खातिर, एक अंजान औरत की खातिर, झूठ बोलता !”

“मोटे माल की खातिर झूठ बोलते । मैं क्या तुम्हें जानता नही !”

“मैंने आज तक पैसे की खातिर किसी गिल्टी क्लायंट की हिमायत नहीं की ।”

“झूठ ! हैण्डसमली पेईंग क्लायंट की खातिर तुम कुछ भी कर सकते हो । मैं क्या जानता नहीं दिल्ली के राज शर्मा नाम के टॉप के हरामी को ! साले सौ हरामी मरे होंगे तो एक राज शर्मा पैदा हुआ होगा ।”

“हजार । और जब मरूंगा तो हजारों हरामी मातम करेंगे कि उन्होंने अपना लीडर खो दिया । लेकिन वो किस्सा फिर कभी । अभी आप मेरी बात मानिये, उसे घर जाने दीजिये, उसे इतने बड़े सदमे को झेल पाने का मौका दीजिये, सुबह तक जब वो काफी हद तक नार्मल हो चुकी होगी, तब जो जी में आये, कीजियेगा ।”

मतवालचंद पहले ही उस राय पर नाक चढ़ाने लगा ।

यादव भी हिचकिचाया ।

“यादव साहब” - मैं चेतनावनीभरे स्वर में बोला - “होगा तो वही जो मैं कह रहा हूं । मेरी दरख्वास्त से नहीं होगा तो कमिश्नर के हुक्म से होगा ।”

“खामखाह !” - मतवाल चंद गुस्से से बोला - “अभी तोशनीवाल को वारदात की खबर नहीं है ।”

“क्यों भला ? केयरटेकर ने जब पुलिस को फोन किया था तो अपने एम्प्लायर को फोन नहीं किया था ?”

“नहीं किया था । मैंने खासतौर से पूछा था ।”

“क्यों भला ?”

“कहता था घबरा गया था, बौखला गया था, खौफजदा था, फौरन उस जरूरत की तरफ उसका ध्यान नहीं गया था । फिर जब तक ध्यान गया था तब तक हम पहुंच गये थे ।”

“कोई बात नहीं । जो काम वो न कर सका, वो मैं कर दूंगा ।”

“क्या कर दोगे ? तोशनीवाल को तुम खबर करोगे ?”

“आप उसकी बीवी के साथ बेरहमी से पेश आयेंगे तो और क्या करूंगा ?”

“उससे पूछताछ करना” - यादव भी गुस्से से बोला - “उसका बयान दर्ज करना, किन्हीं मुद्दों पर उससे सफाई मांगना बेरहमी से पेश आना है ?”
 
“हमदर्दी से पेश आना नहीं है । इस वक्त वो बेचारी औरत, जिसकी जवान बेटी मर गयी है, हमदर्दी की तालिब है ।”

“ये बहुत बढ़ बढ़ के बोल रहा है” - मतवाल चंद बोला - “मैं इसे अभी अंदर करता हूं ।”

“यहां बड़ी वारदात वाकया हुई है जिसकी बाबत आप लोग अब ये राग अलापते नहीं रह सकते कि ये खुदकुशी का केस है । हर बात इसके कत्ल का केस होने की तरफ साफ इशारा कर रही है । ये कत्ल का केस न होता तो केयरटेकर एकाएक फरार न हो गया होता ।”

“अभी ये बात स्थापित नहीं है” - यादव बोला - “कि वो फरार हो गया है ।”

“तो कहां गया ?”

“आ जायेगा । आता ही होगा ।”

“लखनऊ वाया सहारनपुर वाला रूट पकड़ बैठा क्या ?”

“अगर वो कातिल है तो फरार ही नहीं रहेगा, बहुत जल्द पकड़ा जायेगा ।”

“वो कातिल है तो श्यामली के पीछे क्यों पड़े हैं ?”

“अरे, मैंने ‘अगर’... ‘अगर’ बोला कि नहीं बोला ?”

“लेकिन...”

“त्रिवेदी !” - मतवाल चंद नाम नामालूम सब-इंस्पेक्टर से सम्बोधित हुआ - “थाम इसे !”

“मैं कह रहा था” - मैं जल्दी से बोला - “ये कत्ल की बड़ी वारदात है । मैं तो मीडिया की पहले से यहां मौजूदगी की उम्मीद कर रहा था, न्यूजपेपर्स और टीवी चैनल वाले अभी यहां पहुंचे नहीं तो पहुंचते ही होंगे । फिर आप मुझे नहीं, उन लोगों को भी बतायेंगे कि क्यों आप मुझे हिरासत में ले रहे हैं ! क्या गुनाह किया है मैंने ! मैं चिल्ला चिल्ला के मीडिया के सामने पुलिस की हाई हैंडिडनैस को उजागर करूंगा । मैं पुरजोर आवाज उठाऊंगा कि....”

“दैट्स एनफ ।” - यादव सख्ती से बोला - “शर्मा, स्टॉप शाउटिंग !”

मैं खामोश हुआ ।

“कातिल के मामले में अभी कनफ्यूजन की स्थिति है इसलिये फिलहाल किसी को हिरासत में लिये जाने की जरूरत नहीं । ये काम कल सुबह तक इंतजार कर सकता है । तब तक शायद फरार केयरटेकर विष्णु कसाना भी पकड़ाई में आ जाये...”

“लेकिन...” - मतवाल चंद ने आवेश से कहना चाहा ।

“मतवाल चंद जी” - यादव धीरज से लेकिन पूर्ववत् सख्त लहजे से बोला - “ये मेरा केस है । मैं इस केस का इंचार्ज हूं क्योंकि मैं स्पैशल स्क्वायड का आफिसर-इन-चार्ज हूं जिसका काम कत्ल के केसों की तफ्तीश करना है । आप यहां इसलिये मौजूद हैं क्योंकि कत्ल आपके थाने की हद में वाकया हुआ है । इसलिये बरायमेहरबानी आप मेरी - स्पैशल स्क्वायड की - मदद कीजिये; मेरे पर, मेरे किसी फैसले पर या मेरी तफ्तीश पर हावी होने की कोशिश न कीजिये । दरख्वास्त है आप से ।”

मतवाल चंद सकपकाया, हकबकाया, उसने बेचैनी से पहलू बदला फिर सप्रयास परे देखने लगा ।

“जा सकते हो ।” - यादव मेरे से बोला - “अपनी क्लायंट को भी ले जा सकते हो, लेकिन उसे खबरदार करके रखना कि कल सुबह आठ बजे पुलिस से मुलाकात के लिये तैयार मिले ।”

“यस, बॉस !” - मैं उत्साह से बोला - “एण्ड...”

“निकल लो !” - यादव ने मुझे बीच में ही टोक दिया - “वर्ना हो सकता है मेरा फैसला बदल जाये ।”

“यस, सर ।”

मैंने उसका अभिवादन किया, घूमा और लम्बे डग भरता वहां से बाहर निकल गया । बाहर मैं पार्किंग में खड़ी अपनी कार के करीब पहुंचा और उसकी ड्राइविंग सीट पर जा बैठा ।

श्यामली ने व्यग्र, व्याकुल, त्रस्त भाव से मेरी तरफ देखा ।

“मैडम” - मैं संजीदगी से बोला - “आपके लिये बुरी खबर है ।”

“वही थी !” - उसके मुंह से निकला - “सुरभि ?”

“जी हां ।”

“मेरी बेटी गयी !”

“ईश्वर को जिनसे ज्यादा प्यार होता है, उन्हें वो जल्दी अपने पास बुला लेता है ।”

उसने दरवाजा खोलकर बाहर निकलने की कोशिश की ।

“वो भीतर नहीं है ।” - मैं धीरे से बोला ।

वो ठिठकी, उसका हाथ स्वयंमेव ही हैंडल पर से हट गया ।

“भीतर नहीं है !” - उसके मुंह से निकला ।

“सफदरजंग हस्पताल की मोर्ग में है, जहां कि पोस्टमार्टम होगा ।”

“ओह !”

फिर उसने अपना सिर झुकाया और अपने दोनों हाथों में अपना मुंह छुपा लिया । उसकी हिलती पीठ से मुझे अहसास हो रहा था कि वो खामोश हिचकियां लेती रो रही थी ।

क्या वो भी ड्रामा था ? - मैंने मन ही मन सोचा - क्या हाथों में मुंह इसलिये छुपाये थी कि मैं देख न पाता कि वो सच में रो रही थी या नहीं !

क्या वो औरत अपनी बेटी की, अपनी औलाद की, कातिल हो सकती थी !

“मैडम, प्लीज कंट्रोल युअरसैल्फ ।”

अपने हाथों पर से उसने अपना सिर उठाया तो मुझे उसका आंसुओं से भीगा चेहरा दिखाई दिया ।

एक्टिंग !

और क्या !

वो औरत क्या जो मेड टु आर्डर टसुवे न बहा सके ।

मैंने अपना रूमाल निकाल कर उसकी तरफ बढाया । उसने रुमाल न लिया, पर्स खोलकर उसने उसमें से अपना रूमाल बरामद किया और उससे रगड़ कर अपना चेहरा पोंछने लगी ।

मैंने देखा रूमाल गुलाबी था, चारों तरफ लगी झालर वाला था, मोनोग्राम्ड था, उसके एक कोने में महरून रंग से इंगलिश के दो अक्षर एस और टी कढ़े हुए थे ।

मैंने कार को पार्किंग से निकाला और ड्राइव वे पर डाला ।

हैडलाइट्स की रौशनी में मुझे वहां ऐसा कुछ दिखाई दिया जो कि आती बार भी दिखाई दिया होना चाहिये था लेकिन इत्तफाक था, या तब मेरी तवज्जो का मरकज कहीं और था, नहीं दिखाई दिया था ।

बारिश से नम हुए ड्राइव वे में एक तरफ एक खूब बड़ा आयताकार हिस्सा खुश्क था ।

जाहिर था कि वहां कोई बड़े साइज की कार खड़ी रही थी जिसकी वजह से उसकी चेसिस के नीचे की जमीन पर बारिश का पानी नहीं पड़ा था और वो खुश्क बनी रही थी । खुश्क आयत के इर्द गिर्द चार टायरों के निशान स्पष्ट बने हुए थे और उनकी चौड़ाई भी जाहिर करती थी कि वहां कोई बड़े साइज की कार खड़ी रही थी ।

मैंने हैडलाइट्स को हाई बीम पर लगाया और कार से बाहर निकला ।

“क्या बात है ?” - वो व्यग्र भाव से बोली ।

मैंने उत्तर न दिया, संतुलित कदमों से चलता मैं फाटक पर पहुंचा तो मुझे नया कुछ दिखाई दिया ।
 
मैंने उत्तर न दिया, संतुलित कदमों से चलता मैं फाटक पर पहुंचा तो मुझे नया कुछ दिखाई दिया ।

बायें पिलर पर से, जमीन से कोई डेढ़ फुट ऊपर से, पलस्तर उखड़ा हुआ था । आगे वही चौड़े टायरों के निशान अंधेरिया मोड़ की ओर घूमते दिखाई दे रहे थे ।

मैंने मोबाइल निकाला और रेडियो टैक्सी के लिये फोन लगाता वापिस लौटा और कार में सवार हुआ । कार को रिवर्स गियर में डाल कर मैंने उसे वापिस पार्किंग में पहुंचाया और हाई बीम को ऑफ किया ।

“क्या बात है ?” - उसने फिर अपना सवाल दोहराया ।

जवाब देने से पहले मैंने एक सिग्रेट सुलगाया ।

“मैडम” - फिर बोला - “सारी, मैं आपको आपके दौलतखाने पर ड्रॉप करने नहीं जा सकता । एक टैक्सी अभी यहां पहुंचती ही होगी...”

“वो तो ठीक है लेकिन एकाएक यू चेंज आफ प्रोग्राम की वजह क्या है ?”

“वजह का ताल्कुक ऐसी बातों से है जिनको अभी खुद मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा हूं इसलिये वो किस्सा फिर कभी । अभी आप एक जुदा बात सुनिये ।”

“क्या ?” - वो सशंक भाव से बोली ।

“भीतर जो पुलिस अधिकारी मौजूद है, वो पूछताछ के लिये आपको हिरासत में लेना चाहते थे ।”

वो सकपकाई ।

“अभी भी आपके लिये हुक्म है कल सुबह आठ बजे उनकी पूछताछ के लिये आप उन्हें तैयार मिलें ।”

वो और सकपकाई, फिर उसने बड़े कठिन भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

“जब तक टैक्सी नहीं पहुंचती, तब तक मेरी एकाध बात का जवाब दीजिये ।”

“पूछो । कुछ भी पूछो ।”

“सुरभि लैफ्टी थी ?”

“लैफ्टी । नहीं तो !”

“आम लोगों की तरह सब काम सीधे हाथ से करती थी ?”

“बिल्कुल ! क्यों पूछ रहे हो ?”

“सुजित त्रेहन !” - मैने उसके सवाल की तरफ तवज्जो न दी - “वो लैफ्टी था ?”

“नहीं ।” - वो एक क्षण ठिठकी - “बाइस साल हो गये ! क्या पता इस बीच ऐसा कुछ हुआ हो कि मजबूरन उसे अपना बायां हाथ इस्तेमाल में लाना सीखना पड़ा हो !”

“इस लम्बे अरसे की शुरुआत में ही ऐसा कुछ हुआ था । चिट्ठी में दर्ज था । उसने उसमें एक टूटी टांग और एक टूटी बांह का जिक्र किया था । चिट्ठी के मुताबिक बांह उसकी दायीं टूटी थी जो रेस्क्यू के बाद ठीक से नहीं जुड़ पायी थी और वो एक बांह से - दायीं बांह से - एक तरह से लाचार हो गया था, अपाहिज हो गया था । आपको ऐसा मुमकिन जान पड़ता है ?”

“हां ।”

“आपको सुरभि की मौत की पहले से खबर थी ?”

“क्या...क्या कह रहे हो ?”

“जवाब दीजिये ।”

“पहले से कब से ?”

“भगवान दास रोड मेरे फ्लैट पर आने से पहले से ?”

“यू आर टाकिंग नानसेंस ।”

“मुझे कई बार ऐसा लगा कि...”

“गलत लगा । लगने में और होने में फर्क होता है ।”

“सही कहा आपने । लेकिन जब कुछ लगता है तो उसकी कोई वजह होती है । कई बार फिजा भारी लगने लगती है, कई बार उस हवा से सूंघ मिलने लगती है जिसमें दूसरा जना भी सांस ले रहा हो । क्यों मुझे लगा कि आपको खबर थी...”

“नहीं थी । नहीं थी । मैं सुरभि के अंजाम से जाती तौर पर वाकिफ नहीं थी । चिट्ठी में उसकी बाबत जो लिखा था उससे बार बार मुझे अंदेशा सताता था कि सुरभि अब इस दुनिया में नहीं थी । इसी वजह से मुझे फार्महाउस जाने की दहशत थी कि कहीं मेरा अंदेशा हकीकत में न बदल जाये । इसी वजह से तुम्हारे साथ चलने की पेशकश मुझे कुबूल थी ।”

“आई सी ।”

मुझे उसकी बात जंची थी ।

“चैक - लाख रुपये की रकम का तैयारशुदा चैक - साथ ले के आयी थीं !” - फिर भी मैं बोला ।

“तो ? क्या कहा था तुमने पीछे अपने फ्लैट पर ?”

“क्या कहा था ?”

“प्रोफेशनल हो ! फीस के लिये काम करते हो ! तुम्हारा क्या खयाल है, इस बात की तुम्हारे अपनी जुबानी कहे बिना मुझे खबर नहीं थी !”

“रकम कैसे मुकर्रर की ?”

“जवाब तुम्हें बुरा लगेगा ।”

“लगने दीजिये ।”

“अपनी औकात से मुकर्रर की, न कि तुम्हारी औकात से ।”

“हूं । सर्वड मी राइट ।”

“आई एम ए बिजनेसमैंस वाइफ । सो आई नो दैट वैन यू वांट दि बैस्ट, यू शुड नो दैट दि बैस्ट कास्ट्स हाई । नो ?”

“यस, मैडम । यू आर एब्सोल्यूटली राइट देयर ।”

तभी ड्राइव वे और फ्रंट यार्ड वहां पहुंचती एक कार की हैडलाइट्स से रोशन हुआ ।

“टैक्सी आ गयी है” - मैं बोला - “घर पहुंच कर अपने फैमिली फिजीशियन को तलब कीजियेगा, वो आपको कोई नींद की गोली या सिडेटिव का कोई इंजेक्शन दे देगा तो बाकी की रात आप चैन से सो पायेंगी ।”

“मैं चैन से नहीं सोना चाहती” - वो दृढ़ता से बोली - “मैं सोना ही नहीं चाहती...”

“जी !”

“....ताकि सुजित आये तो मुझे सोते में ही न मार डाले, ताकि मैं उसे अपने होशोहवास में मिलूं और हकीकत से वाकिफ करा सकूं ।”

“हकीकत !”

“कि शिशिर उसका बेटा है । यूं वो मुझे मार भी डालेगा तो शिशिर की जान तो बख्श देगा ! उसे हकीकत मालूम होगी तो जो सजा वो मेरे को देगा, वो अपनी औलाद को क्यों देगा ?”

“ये बात आप ये जानते बूझते कह रही हैं कि सुरभि का उसने क्या हश्र किया है ?”

“सुरभि की हकीकत से वो वाकिफ नहीं था, शिशिर की हकीकत से वाकिफ होगा । मैं वाकिफ कराऊंगी ।”

“अच्छी सोच है । अच्छी उम्मीद है । बहरहाल आपकी माया आप ही जानें । अब जाइये ।”

वो कार से उतरी और जा कर टैक्सी में सवार हो गयी । तत्काल टैक्सी वहां से वापिस दौड़ चली ।

अभी उसने इतनी जज्बाती बात की थी फिर भी मैं सोचे बिना न रह सका - कैसी मां थी ! बेटी मोर्ग में पड़ी थी, वो घर जा रही थी ।

टैक्सी मेरी दृष्टि से ओझल हो गयी तो मैंने आखिरी कश लगा कर सिग्रेट को तिलांजलि दी और कार से बाहर निकला ।

“जरा इधर आना ।” - मैंने अधिकारपूर्ण स्वर में बरामदे में खड़े सिपाही को आवाज लगाई ।

हिचकिचाता हुआ वो मेरे करीब पहुंचा । हुज्जत शायद उसने इसलिये नहीं की थी क्योंकि वो मुझे अपने साहब लोगों का करीबी समझ रहा था ।

“कब से यहां हो ?” - मैंने पूछा ।

“तभी से” - वो तनिक हड़बड़ाया - “जब से पुलिस बल यहां है ।”

“बारिश तुम्हारे सामने शुरू हुई थी ?”

“नहीं । जब हम लोग यहां पहुंचे थे, तब तक हो चुकी थी ।”

“कैसी ?”

“कैसी क्या मतलब ?”

“भई, तेज हलकी या दरम्यानी ?”

“मुझे क्या पता ? मेरे सामने कब हुई ?”

“माहौल से अंदाजा तो लगाया जा सकता है, यार !”

“अंदाजे की बात है तो हल्की । मामूली । कोई जलथल हमें यहां नहीं मिला था ।”

यानी मेरा अंदाजा सही था, बारिश तेज हुई होती तो बड़ी कार पर बरसता पानी यकीनन आसपास से बहकर उस सूखी आयत को भी भिगो गया होता जो कि अभी तब भी सूखी थी ।

तभी फार्महाउस का मेन डोर खुला और इंस्पेक्टर यादव ने बाहर कदम रखा ।

मुझे देखकर वो सकपकाया, ठिठका ।

“अभी यहीं हो !” - फिर कर्कश स्वर में बोला ।

“इत्तफाक से ।” - मुस्कराता मैं बोला ।

“इत्तफाक गया तेल लेने । वजह बताओ साफ साफ । बिना हुज्जत के ।”
 
मैंने उसे ड्राइव वे की सूखी आयत और फाटक के छिले हुए पिलर की बाबत बताया ।

“क्या मतलब हुआ इसका ?” - यादव सकपकाया सा बोला - “ये कि किसी बड़ी गाड़ी पर बारिश के दौरान कोई यहां पहुंचा...”

“कातिल !”

“...और वापिसी में बेध्यानी में उसकी कार पिलर से टकराई !”

“हां । अगर वो कातिल था तो कत्ल बारिश के दौरान हुआ । कत्ल का टाइम फैक्टर निर्धारित करने के लिये ये अच्छा नुक्ता है ।”

“हूं । इतना बड़ा फाटक है फिर भी गाड़ी पिलर से टकरा दी !”

“अनाड़ी होगा । या बड़ी गाड़ी हैंडल करने के मामले में नातजुर्बेकार होगा । या...”

मैं जानबूझ कर ठिठका ।

“या क्या ?” - यादव बोला ।

“या कत्ल के बाद की दहशत उस पर हावी थी इसलिये गाड़ी न सम्भली । मौकायवारदात से रुखसत होने की कातिल को जल्दी होती है इसलिये उससे लापरवाही हो सकती है, अभी तो पिलर को ही छीला, वो बड़ा एक्सीडेंट कर सकता था वक्ती एक्साइटमेंट के हवाले ।”

“हूं ।”

“इंस्पेक्टर साहब, अब किसी ऐसी बड़ी गाड़ी का पता लगाओ जो बायीं ओर से ठुकी हुई हो और फिर कातिल आपकी गिरफ्त में ।”

“शर्मा, दिल्ली में तीस लाख कारें हैं ।”

“सब मर्सिडीज या बी एम डब्ल्यू होंडा जैसी बड़ी, हाई एण्ड नहीं, ऐसी कोई ज्यादा नहीं होंगी !”

“दिल्ली में रईसी का, रईसों का बोलाबाला है, हजारों में फिर भी होंगी ।”

“सबके मालिक तोशनीवाल से ताल्लुक रखते नहीं होंगे ।”

“तुम्हारा मतलब है कातिल कोई तोशनीवाल से ताल्लुक रखता शख्स है !”

“हो सकता है ।”

“यानी कातिल केयरटेकर है भजन छोड़ रहे हो ?”

“काहे को ? बतौर मुलाजिम तोशनीवाल से उसका ताल्लुक है या नहीं है ?”

“उसके कब्जे में कोई बड़ी गाड़ी क्योंकर हो सकती है ?”

“तफ्तीश का मुद्दा है ।”

“शर्मा, केयरटेकर की दायीं बांह बहुत खस्ताहाल थी - मुड़ी तुड़ी, नोची, खंसोटी - और दायां हाथ बांह से भी ज्यादा बुरे हाल में था । उंगलियां बाज के पंजे की तरह मुड़ी हुई और अकड़ी हुई थीं । मैं नहीं समझता कि ऐसा आदमी किसी बड़ी कार को ठीक से ड्राइव कर सकता था ।”

“नहीं कर सकता था न ! तभी तो पिलर में दे मारी !”

यादव ने उस बात पर विचार किया ।

“पकड़ा जायेगा ।” - फिर बोला ।

“बड़े यकीन से कह रहे हो !” - मैं बोला ।

“हां, भई ।”

“एसएचओ मतवाल चंद करेगा ये काम ?”

“मैं करूंगा । मेरी टीम करेगी । सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर बहुत काबिल नौजवान है, कंप्यूटर विजर्ड है, वो कार का पता निकाल लेगा । फिर आगे...देखेंगे ।”

“देखना । वही कातिल है । लड़की लैफ्टी नहीं थी - मां ने कनफर्म किया है - खुदकुशी के लिये वो बायां हाथ भला क्यों इस्तेमाल करती ! सही हाथ इस्तेमाल करती तो गोली दायीं कनपटी में लगी होती । केयरटेकर लैफ्टी था - मजबूरन लैफ्टी था, क्योंकि उसका दायां हाथ किसी काम का नहीं था - सालों से उसे बायें हाथ से काम चलाने का अभ्यास था, लिहाजा गोली चलाते वक्त उसे ध्यान ही नहीं आया कि लड़की उसकी तरह लैफ्टी नहीं थी ।”

“शर्मा, एक बात बता । तू कहता है कि केयरटेकर उसका पुराना पार्टनर है, तो फिर कैसे मुमकिन है कि तोशनीवाल ने, उसके एम्प्लायर ने, उसे न पहचाना !”

“बीच का बाईस साल का वक्फा न भूलो, यादव साहब । इतने लम्बे अरसे में एक दुनिया बदल जाती है, पुराना पार्टनर न बदला होता ! दूसरा जवाब ये है कि हो सकता है नौकरी पर तोशनीवाल ने उसे खुद न रखा हो, हो सकता है ये काम उसके किसी मैनेजर ने या ऐसे ही आदमी ने किया हो और तोशनीवाल ने आज तक केयरटेकर की शक्ल ही न देखी हो ।”

यादव के चेहरे पर आश्वासन के भाव न आये ।

“ये जगह हालिया परचेज है । बहुत मुमकिन है अभी इसका सही और मुनासिब इस्तेमाल न शुरू हुआ हो ! इस सिलसिले में आज कल पड़ती कड़ाके की ठंड को भी ध्यान में रखना ।”

“हूं ।”

“घर का ऐश्वर्य, सुख सुविधा छोड़ कर क्यों भला तोशनीवाल यहां आयेगा ?”

“बेटी भी तो आयी ?”

“क्या पता क्यों आयी ? जिंदा रहती तो बताती !”

“ठीक !”

“और क्या सामने आया तफ्तीश में ? टैक्नीशियंस की रिपोर्ट क्या कहती है !”

“वही कहती है जो प्रत्यक्ष है । कत्ल पच्चीस कैलीबर की उस गन से हुआ है जो मकतूला के हाथ में थमी पायी गयी थी । कनपटी का सुराख भी गोली के पच्चीस कैलीबर की होने की तसदीक करता है । गोली जब निकाल ली जायेगी और बैलेस्टिक एक्सपर्ट को उपलब्ध होगी तो वो निर्विवाद रूप से स्थापित कर देगा कि वो उसी गन से निकली थी जो कि उसके हाथ में थमी थी । कनपटी में धंसी गोली से उसकी तत्काल मृत्यु हुई थी । कनपटी में सुराख के अलावा जिस्म पर वायलेंस का कोई दूसरा निशान नहीं पाया गया था ।”

“कत्ल का वक्त क्या निर्धारित किया गया है ?”

“शाम छ: और सात के बीच का । जो हल्की बारिश इधर हुई थी, तुम्हारी नयी खोज के तहत उसका टाइम भी इस टाइम से टैली करता है ।”

“गन पर कोई फिंगरप्रिंट्स ?”

“थे न ! मकतूला के थे न ! जब गन उसके हाथ में थी तो उस पर फिंगरप्रिंट्स और किसके होते ?”

“उसके अलावा कोई फिंगरप्रिंट्स ?”

“न ! न गन पर, न मैगजीन पर, न बाकी बची किसी बुलेट पर ?”

“लड़की ने मैगजीन में बुलेट खुद भरी होती खुद - खुदकुशी के इरादे से - मैगजीन को गन में लोड किया होता तो उसके फिंगरप्रिंट्स तो उन चीजों पर पाये जाने चाहिये थे ! मेरी हकीर राय में मैगजीन पर या बुलेट्स पर कोई प्रिंट्स न मिलना अपने आप में सबूत है इस बात का कि वो प्रिंट्स मिटाये गये थे और ऐसी मंशा कातिल की हो सकती है कि उसके प्रिंट्स अलायकत्ल पर से कहीं से बरामद न हो ।”

“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”

“शायद ?”
 
“ठीक कह रहे हो ।”

“थैंक्यू । कोई और बात ?”

“उसके चेहरे पर प्रकट हुए हिचकिचाहट के भाव मुझे वहां के नीमअंधेरे में भी दिखाई दिये ।”

“कुछ तो है, यादव साहब, जिसकी पर्दादारी है ।”

तभी बारिश की एक बूंद मेरी नाक पर टपकी ।

वैसा ही कुछ शायद यादव के साथ भी हुआ ।

“चलो ।” - वो बोला ।

“कहां ?” - मैं सकपकाया ।

“अपनी कार में । बेमौसम की बरसात है, इस बार तेज हो सकती है ।”

तो बारिश से बचने के लिये सरकार मेरी कार में सवार होना चाहती थी ।

हम कार में जा बैठे तो जल्दी ही मुझे पता चला कि मेरा खयाल गलत था ।

“लाइट जला ।” - यादव ने आदेश दिया ।

मैंने कार की भीतर की बत्ती आन की ।

उसने जेब से अपना बटुवा निकाला और उसमें से एक कागज का पुर्जा बरामद किया । उसने उसकी तह खोलीं और पुर्जा आगे मुझे थमा दिया ।

“देख” - वो बोला - “और कद्र कर मेरी कि कम से कम इस बार कोई पर्दादारी नहीं है ।”

मैंने उत्सकता और सस्पेंस में कागज का मुआयना किया जिसके एक कोने में खून लगा दिखाई दे रहा था और जिस पर मुख्तसर इबारत दर्ज थी:

अगला नम्बर श्यामली का

“तौबा !” - मेरे मुंह से निकला - “इतनी दीदादिलेरी !”

यादव खामोश रहा ।

“कहां से मिला ?” - मैंने पूछा ।

“लाश के नीचे से ।”

“कमाल है ! फिर भी कहते हो कि ये खुदकुशी का केस है !”

“अब नहीं कहता ।”

“तो कातिल केयरटेकर ?”

“हो सकता है । अगर वही तोशनीवाल का बाइस साल पहले का पार्टनर है तो यकीनन हो सकता है ।”

“उसकी बाबत कुछ और बताओ ?”

“और क्या बताऊं ? आम, मामूली आदमी था । उसके हैण्डीकैप के अलावा और तो कोई खासियत उसमें थी नहीं । लेकिन” - एकाएक उसके लहजे में यूं तबदीली आयी जैसे कोई भूली बात याद आ गयी हो - “फिर थी भी ।”

“क्या ?”

“उसके अंदाजेबयां में थी । आदतन - या अनजाने में - अपनी तहरीर के कुछ अल्फाज को दोहराता था ।”

“मैं समझा नहीं ।”

“समझ । मसलन कहता था ‘गरीब आदमी की भी कोई जिंदगी है !... कोई जिंदगी है !’ या ‘ये झूठ है.. .झूठ है... कि खुदा ने सबको बराबर बनाया है ।’ मैंने मिसाल दी है शर्मा, समझ में आयी !”

“आई !”

उसने पुर्जा मेरी उंगलियों में से निकाल लिया और बोला - “चल ।”

“चलूं ! कहां ?”

“अरे, रात यहीं खोटी करेगा ? अपने घर जा के लगेगा कि नहीं ?”

“लेकिन तुम ?”

“मैं तेरी लिफ्ट । हैडक्वार्टर पहुंचा मेरे को । भगवान दास रोड से जरा ही तो आगे है ।”

“अरे, यादव साहब, फासला कोई प्राब्लम नहीं लेकिन तुम्हारी जीप...”

“उसकी अभी यहां जरूरत है ।”

“ओह !”

मैंने कार का इंजन स्टार्ट किया और उसे बैक करके वापिसी के रास्ते पर डाला ।

“तो” - कुछ क्षण बाद मैं बोला - “ये उसकी स्पीच की स्पैशियलिटी थी कि अल्फाज को दोहराता था !”

“हां ।”

“आवाज कैसी थी ?”

“तीखी । लेकिन सहज, स्थिर, संतुलित । साठ के पेटे में था लेकिन बिना किसी कम्पकम्पाहट के ऐन क्लियर, स्पष्ट बोलता था ।... एक बात मैंने और भी नोट की थी, उत्तेजित होता था तो ऊंचा बोलने लगता था और उसकी एक आंख फड़कने लगती थी ।”

“एलीबाई यही कि सिनेमा देखने गया हुआ था जहां से कि ग्यारह बजे लौटा था ?”

“हां ।”

“कहां गया था सिनेमा देखने ?”

“कनाट प्लेस ।”

“इतनी दूर !”

“कहता था पसंद की फिल्म वहीं लगी हुई थी ।”

“आवाजाही का साधन ?”

“बस और ग्रामीण सेवा ।”

“क्या ?”

“अरे, वो छोटे छोटे टैम्पो नहीं चलते आजकल सबअर्बन, रूरल रूट्स पर आवाजाही के लिये ! जिन पर ग्रामीण सेवा लिखा होता है ! छतरपुर और अंधेरिया मोड़ के बीच में चलते हैं । कहता है वापिसी में ऐसे एक ग्रामीण सेवा टैम्पो पर बैठ कर फार्म पर पहुंचा था । उसने खुद बोला था कि रात की उस घड़ी वो टैम्पो में अकेला पैसेंजर था और सारे रास्ते ड्राइवर से बतियाता आया था । इतने से काबू में आ जायेगा वो टैम्पो वाला । फिर क्रॉस चैक करेंगे टाइम फैक्टर के लिहाज से उसकी एलीबाई को ।”
 
“कत्ल उसकी गैरहाजिरी में हुआ ।”

“जाहिर है । अगर उसकी एलीबाई स्टैण्ड करती है तो निश्चित है ।”

“कोई भेद है ।”

“है तो सामने आयेगा न ! तूने उस पर कातिल का लेबल लगा दिया इसलिये तेरे कहने भर से तो नहीं हो जायेगा न भेद ! या हो जायेगा ?”

“केयरटेकर की तरह दोहरा रहे हो !”

वो सकपकाया, फिर हंसा ।

हम लक्ष्मीबाई नगर में फ्लाईओवर पर थे कि बारिश तेज हो गयी, फिर मौनसून जैसी मूसलाधार होने लगी । रात की उस घड़ी सड़कें वैसे ही सुनसान थी, बारिश ने उन्हें और सुनसान कर दिया ।

इंडिया गेट के बाद तिलक मार्ग पर दाखिल होते होते बारिश यूं बंद हुई जैसे कि कभी हुई ही नहीं थी ।

मैंने यादव को पुलिस हैडक्वार्टर के सामने उतारा और वापिस भगवानदास रोड लौटा ।

अपने फ्लैट का ताला खोलते वक्त मैंने घड़ी पर निगाह डाली ।

दो बजने को थे ।

Chapter 2

बाकी की रात मुझे नींद न आयी ।

छ: बजे तक करवटें बदलते रहने के बाद आखिर मैंने मन पक्का किया और बिस्तर छोड़ा । मैं नित्यकर्म से निवृत हुआ और किचन में जा कर अपने लिये चाय और हलका सा नाश्ता तैयार करने लगा ।

उस रोज का अखबार तब तक पहुंच चुका था । मैंने उस पर सरसरी निगाह डाली तो पाया कि उसमें सुरभि तोशनीवाल के कत्ल का कोई जिक्र नहीं था, जो कि अपेक्षित भी था । हर अखबार आधी रात को छपना शुरू हो जाता था और तब तक तो मौकायवारदात पर मीडिया के दर्शन भी नहीं हुए थे । खबर अलबत्ता टीवी पर हो सकती थी लेकिन मैंने उसे आन न किया ।

चाय चुसकते और बटर टोस्ट चुभलाते मैंने मुकंदलाल का मोबाइल बजाया ।

मुकंदलाल दिल्ली पुलिस में हवलदार था, पहले सस्पेंड था, सस्पेंशन में आधी तनखाह पाता था इसलिये अतिरिक्त कमाई के लालच में मेरे छोटे मोटे काम - जिनमें अधिकतर फुटवर्क ही होता था - करने को तैयार हो जाता था । हाल ही में अपनी नौकरी पर बहाल हो गया था तो मेरी मदद करने के मामले में आनाकानी करने लगा था, फिर भी कोई छोटा मोटा काम हो, आसान काम हो, तो करने को तैयार हो जाता था ।

मेरी निगाह में उस घड़ी एक छोटा मोटा, आसान काम था ।

जवाब न मिला । दोबारा काल लगाई तो भी जवाब न मिला ।

मैंने लैंडलाइन पर उसके घर फोन किया ।

मालूम पड़ा आजकल वो नाइट ड्यूटी कर रहा था - क्या ड्यूटी कर रहा था, बीवी को नहीं मालूम था - रात दस बजे घर से निकलता था लेकिन लौटने का कोई टाइम निर्धारित नहीं था ।

मोबाइल क्यों नहीं सुनता था ?

कोई वजह बीवी बयान न कर सकी ।

मैंने अपनी सैक्रेट्री रजनी को उसके मोबाइल पर काल लगाई ।

तत्काल उत्तर मिला ।

“ऐ हुस्न जरा जाग” - मैं तरन्नुम में बोला - “तुझे इश्क जगाये...”

“मैं पांच बजे उठती हूं हर मौसम में । जागिंग पर जाने के लिये ।”

“...दीवाना तेरा लाया है लिप्टन की ये चाय ।”

“गुड मार्निग, सर्र ।”

“पहचान लिया ?”

“फौरन ! सुबह सवेरे ऐसी ओछी, छिछोरी बात और कौन कर सकता है ?”

“मुझे ओछा कहती है ? छिछोरा कहती है ?”

“आपकी बात को ?”

“एम्प्लायर से ऐसे पेश आते हैं ?”

“एम्प्लाई से ऐसे पेश आते हैं ?”

“मैं तेरे से बहस नहीं करना चाहता सुबह सवेरे ।”

“गुड ! फिर तो बंद करती हूं ।”

“अरे, नहीं, नहीं । खबरदार !”

“तो उचरिये कुछ ।”

“एक काम है ।”

“किसको ?”

“अरे, तेरे को और किसको ?”

“आपको मेरे वर्क शिड्यूल की क्या खबर ?”

“अरे, एक मेरा...मेरा काम है जिसको तूने अंजाम देना है ।”

“तो यूं कहिये न कि तनख्वाह कमानी है !”

“तनख्वाह नहीं कमानी, मेरी मां, अहसान करना है मेरे पर ।”
 
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