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“मिस्टर शर्मा” - फिर कातर भाव से बोली - “मुझे अफसोस है मैंने तुम्हें बुरा भला कहा । दिल से शर्मिंदा हूं मैं ।”
“नैवर माइंड ।”
“लेकिन अब तो कबूल करो कि चिट्ठी फर्जी नहीं है ।”
“किया ।”
“देर की मैंने तुम्हारे पास आने में । जल्दी आना चाहिये था । वक्त रहते आती तो शायद सुरभि जान से न जाती । गुनहगार हूं मैं अपनी बेटी की । हे भगवान ! हे भगवान !”
वो फूट फूट कर रोने लगी ।
“खामोश हो जाइये ।” - मैं बोला - “हो सकता है जो लाश बरामद हुई है, वो आपकी बेटी की न हो ।”
उसके रुदन को ब्रेक लगी ।
“ऐसा हो सकता है ?” - फिर फुसफुसाई ।
“होने को क्या नहीं हो सकता इस फानी दुनिया में ! फिर उम्मीद पर दुनिया कायम है । आंसू पोंछ डालिये ।”
सहमति में सिर हिलाते उसने फिर रूमाल निकाला और वो काम किया ।
“मु...मुझे डर लग रहा है...”
“आप कतई न डरिये । डरना तो अब सुजित त्रेहन नाम के कातिल का काम होगा, बहुत जल्द कानून के लम्बे हाथ जिसकी गर्दन के गिर्द होंगे ।”
“तुम कोशिश करोगे कि ऐसा जल्दी से जल्दी हो ?”
“जरूर ! यकीनन ! आई विल गिव माई हण्डर्ड पर्सेन्ट टु दिस केस, मैडम ।”
“थैंक्यू । तुम्हारी फीस...”
“मैं ले लूंगा ।”
“मैं ले कर आयी हूं ।”
“मैडम, मैंने बोला न...”
मैं खामोश हो गया । तब तक वो अपने पर्स में से एक चैक बरामद कर चुकी थी । उसने चैक मुझे सौंपा ।
मैंने चैक पर वहां निगाह डाली जहां रकम दर्ज होती थी ।
एक, दो, तीन, चार, पांच जीरो ! यानी एक लाख रुपया ।
जबकि मैं बताता तो उससे आधी रकम भी बतौर रिटेनर मुझे बाखुशी कुबूल होती ।
राज शर्मा ! - मैंने मन ही मन खुद अपनी पीठ थपथपाई - दि लक्की भाई !
‘ले लूंगा, ले लूंगा’ मुलाहजे का भजन था, ले ही लेनी थी । कोई वालंटियर तो था नहीं यूअर्स ट्रूली ! फिर घोड़ा घास से यारी तो नहीं कर सकता न ! करेगा तो खायेगा क्या !
“थैंक्यू !” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।
सिर हिला कर उसने मेरा थैंक्यू कबूल किया, फिर यूं अंजना की ओर घूमी जैसे पहली बार उसे वहां उसकी मौजूदगी का अहसास हुआ हो ।
“ये कौन है ?” - फिर बोली ।
“ये थी ।” - मैं बोला ।
“मतलब ?”
“समझिये जा नहीं रही, जा चुकी है ।”
“राज शर्मा !” - दांत किटकिटाती अंजना बोली - “यू सन आफ ए बिच !”
“ओरीजिनल, माई डियर, दि वैरी फर्स्ट ।” - मैं धीरज से मुस्कराता हुआ बोला - “इस जगत प्रसिद्ध बिच ने जितने सन पैदा किये हैं, उनमें सबसे पहला । पहलौठी का ।”
पांव पटकती वो वहां से रुखसत हुई ।
“आप पांच मिनट वापिस सोफे पर विराजिये” - पीछे मैं श्यामली से मुखातिब हुआ - “मैं चेंज करके आता हूं ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं बैडरूम में दाखिल हुआ और मैंने अपने पीछे दरवाजा बंद कर लिया ।
कुछ क्षण मैं वहीं ठिठका खड़ा रहा और उस घड़ी जो मेरे जेहन में घुमड़ रहा था, उस पर विचार करता रहा । विचार करता रहा और सोचता रहा कि क्यों मुझे लग रहा था कि मेरी बेवक्त की मेहमान श्यामली तोशनीवाल को वहां कदम रखने से पहले ही खबर थी कि उसकी बेटी मर चुकी थी । पुलिस की टेलीफोन काल से उसे बेटी की मौत की खबर लगी होना उसका टोटल ड्रामा था ।
क्या पतंगबाज औरत थी ?
और पता नहीं किस फिराक में थी ?
***
हम छतरपुर पहुंचे ।
बारिश तब नहीं हो रही थी और अंधेरे में ये भी कहना मुहाल था कि मेरे फ्लैट से बीस किलोमीटर दूर के उस इलाके में बारिश हुई ही नहीं थी या हो कर बंद हो चुकी थी ।
तोशनीवाल फार्म की बाउंड्री वाल में एक विशाल फाटक था जो उस घड़ी पूरा खुला था और उसके पल्ले आजू बाजू के विशाल पिलर्स के पीछे छुपे हुए थे । आगे एक लम्बा ड्राइव वे था जिस के सिरे पर एक बहुत बड़ा अहाता था जिसमें फार्महाउस की एकमंजिला इमारत थी । अहाते में बायीं ओर तीन गाड़ियां खड़ी थीं जिनमें से एक पीसीआर वैन थी जिसके दोनों तरफ बड़ा बड़ा स्पैशल स्क्वायड, दिल्ली पुलिस लिखा था । वो वैन वहां इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव आफिसर-इन-चार्ज, स्पैशल स्क्वायड की मौजूदगी की परिचायक थी । स्पैशल स्क्वायड पुलिस का वो दस्ता था जो सिर्फ कत्ल के केसों की तफ्तीश के लिये भेजा जाता था । लिहाजा दिल्ली में कत्ल की हर वारदात में इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव की हाजिरी और दखल निश्चित था ।
दूसरी कार एक पुलिस जीप थी और तीसरी एक एम्बैसेडर थी । जीप जरूर लोकल थाने की थी, कार भी वहीं की हो सकती थी लेकिन ये भी मुमकिन था कि वो पुलिस लैब से आये एक्सपर्ट्स की थी ।
मैंने अपनी कार को उन गाड़ियों से विपरीत दिशा में कम्पाउंड के दूसरे बाजू में पार्क किया ।
“मैडम” - मैं बोला - “अभी आप यही ठहरिये, मैं भीतर के हालात मालूम करता हूं और फिर आपको खबर करता हूं ।”
“लेकिन...” - उसने व्याकुल भाव से कहना चाहा ।
“मैडम, अगर मरने वाली आपकी बेटी नहीं है तो भीतर आपका कोई काम नहीं है ।”
“लेकिन अगर वो सुरभि...”
“मैं मालूम करता हूं न ! ओके ?”
हिचकिचाते हुए उसने सहमति में सिर हिलाया ।
कार से निकल कर मैं आगे बढ़ा । मैंने फार्महाउस के कवर्ड ड्राइव वे में कदम रखा तो एक वर्दीधारी सिपाही मेन डोर के सामने के बरामदे की तीन सीढ़ियां उतरा और मजबूती से मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया ।
“कौन हो ?” - वो कर्कश स्वर में बोला - “कहां जा रहे हो ?”
“राज शर्मा हूं ।” - मैं जब्त से बोला - “पीडी हूं । इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव का दोस्त हूं । भीतर मौकायवारदात पर जा रहा हूं ।”
उसने गौर से मेरी सूरत का मुआयना किया ।
मुझे ऐसा न लगा कि उसने मेरी सूरत से या मेरे नाम से मुझे पहचाना था ।
“यहीं ठहरो ।” - वो पूर्ववत् कर्कश स्वर में बोला ।
मैंने सहमति में सिर हिलाया ।
वो भीतर गया और उलटे पांव वापिस लौटा ।
“जाओ ।” - और बोला ।
मैं भीतर दाखिल हुआ ।
मेन हाल में मुझे पांच पुलिसियों के दर्शन हुए । उन में से एक ने इंस्पेक्टर देवेन्द्र यादव तो होना ही था, दूसरा उसका मातहत, युवा सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर था, तीसरा मतवाल चंद नाम का इंस्पेक्टर था जिसको मैं पहचानता था और पहले से जानता था कि महरौली थाने का एसएचओ था । चौथा एक मेरे लिये नितांत अजनबी सब-इंस्पेक्टर था और पांचवां, जो कि वहां मौजूद इकलौता शख्स था जो वर्दी में नहीं था, जो सूरत से तो पुलिसिया ही जान पड़ता था लेकिन टैक्नीकल स्टाफ से भी हो सकता था ।
मतवाल चंद की मेरे पर निगाह पड़ी तो तत्काल उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये । उसने मेरी तरफ यूं देखा जैसे मैं कोई ऐसी डिश था जिसका उसने आर्डर नहीं दिया था ।
ऐसा ही मिजाज था उसका आदतन ।
सख्त ! खुंदकी ! असहिष्णुतापूर्ण !
मैंने अभिवादन किया - यूं कि एक ही में सबको शुमार कर लिया ।
“आओ, भई, पीडी साहब ।” - यादव बोला ।
मैंने खास उसका अभिवादन फिर किया ।
“इसका यहां क्या काम है ?” - मतवाल चंद बोला ।
उसके सवाल से और सवाल करने के लहजे से ही मैं समझ गया कि वो भी मुझे भूला नहीं था ।
“शायद निकल आये कुछ ।” - यादव सहज भाव से बोला - “ये मरने वाली की मां से वाकिफ है । मां - श्यामली तोशनीवाल - अभी थोड़ी देर पहले इसके फ्लैट पर इसके साथ थी” - वो मेरी तरफ घूमा - “अब कहां है ?”
“बाहर मेरी कार में बैठी है ।” - मैं बोला ।
“उसे खबर लग गयी ?”
“लग गयी लेकिन उम्मीद के खिलाफ उम्मीद कर रही है कि शायद मकतूला उसकी बेटी सुरभि न हो ।”
“वही है । शक की कोई गुंजायश नहीं । पक्की, पुख्ता शिनाख्त हुई है ।”
“कैसे मरी ?”
“फोन पर बोला तो था ! खुदकुशी की ।”
“कत्ल की कोई गुंजायश नहीं ?”
“एसएचओ साहब से पूछो ।”
मैंने मतवाल चंद की तरफ देखा ।
“न भी हो तो” - वो भुनभुनाया - “दूसरे पहलू पर भी विचार करना पड़ता है ।”
“दूसरा पहलू ! यानी कि कत्ल वाला ?”
“हां । जो दिखाई देता है, वो कातिल का स्टेज किया कवर आप भी हो सकता है लेकिन यादव साहब को मेरी राय से इत्तफाक नहीं ।”
“ओपन एण्ड शट केस है सुइसाइड का ।” - यादव बोला - “बुलेट के ऐंट्री वूंड के आसपास, कनपटी पर, चेहरे पर जले बारूद के कण छिटके साफ पता चलते थे । फिर गए खुद उसके हाथ में । क्लियर केस है खुदकुशी का ।”
“खुदकुशी की वजह ?”
“मालूम पड़ेगी । सामने आयेगी । अभी तो शुरुआत है तफ्तीश की ।”
“लाश कहां है ?”
“उठवा दी गयी है । पोस्टमार्टम के लिये भिजवा दी गयी है ।”
“इतनी जल्दी ! परिवार वालों को शिनाख्त का तो मौका देते !”
“वो मौका मोर्ग में भी हासिल हो सकता है ।”
“फिर भी...”
“राजधानी के कुछ हालिया हालात की वजह से आजकल पुलिस बहुत प्रेशर में है । बहुत हेठी, बहुत किरकिरी हो रही है पुलिस की । इसलिये मुस्तैदी दिखाना जरूरी था ।”
“फिर मेरे मां को यहां लाने का क्या फायदा हुआ ?”
“देर की तुमने लाने में । तुम्हारे आने के थोड़ी देर पहले ही तो उठवाई लाश !”
“हूं ।”
“अभी भी क्या आफत आ गयी है ! सफदरजंग की मोर्ग में गयी है लाश । मां वहां शिनाख्त कर सकती है ।”
“नैवर माइंड ।”
“लेकिन अब तो कबूल करो कि चिट्ठी फर्जी नहीं है ।”
“किया ।”
“देर की मैंने तुम्हारे पास आने में । जल्दी आना चाहिये था । वक्त रहते आती तो शायद सुरभि जान से न जाती । गुनहगार हूं मैं अपनी बेटी की । हे भगवान ! हे भगवान !”
वो फूट फूट कर रोने लगी ।
“खामोश हो जाइये ।” - मैं बोला - “हो सकता है जो लाश बरामद हुई है, वो आपकी बेटी की न हो ।”
उसके रुदन को ब्रेक लगी ।
“ऐसा हो सकता है ?” - फिर फुसफुसाई ।
“होने को क्या नहीं हो सकता इस फानी दुनिया में ! फिर उम्मीद पर दुनिया कायम है । आंसू पोंछ डालिये ।”
सहमति में सिर हिलाते उसने फिर रूमाल निकाला और वो काम किया ।
“मु...मुझे डर लग रहा है...”
“आप कतई न डरिये । डरना तो अब सुजित त्रेहन नाम के कातिल का काम होगा, बहुत जल्द कानून के लम्बे हाथ जिसकी गर्दन के गिर्द होंगे ।”
“तुम कोशिश करोगे कि ऐसा जल्दी से जल्दी हो ?”
“जरूर ! यकीनन ! आई विल गिव माई हण्डर्ड पर्सेन्ट टु दिस केस, मैडम ।”
“थैंक्यू । तुम्हारी फीस...”
“मैं ले लूंगा ।”
“मैं ले कर आयी हूं ।”
“मैडम, मैंने बोला न...”
मैं खामोश हो गया । तब तक वो अपने पर्स में से एक चैक बरामद कर चुकी थी । उसने चैक मुझे सौंपा ।
मैंने चैक पर वहां निगाह डाली जहां रकम दर्ज होती थी ।
एक, दो, तीन, चार, पांच जीरो ! यानी एक लाख रुपया ।
जबकि मैं बताता तो उससे आधी रकम भी बतौर रिटेनर मुझे बाखुशी कुबूल होती ।
राज शर्मा ! - मैंने मन ही मन खुद अपनी पीठ थपथपाई - दि लक्की भाई !
‘ले लूंगा, ले लूंगा’ मुलाहजे का भजन था, ले ही लेनी थी । कोई वालंटियर तो था नहीं यूअर्स ट्रूली ! फिर घोड़ा घास से यारी तो नहीं कर सकता न ! करेगा तो खायेगा क्या !
“थैंक्यू !” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।
सिर हिला कर उसने मेरा थैंक्यू कबूल किया, फिर यूं अंजना की ओर घूमी जैसे पहली बार उसे वहां उसकी मौजूदगी का अहसास हुआ हो ।
“ये कौन है ?” - फिर बोली ।
“ये थी ।” - मैं बोला ।
“मतलब ?”
“समझिये जा नहीं रही, जा चुकी है ।”
“राज शर्मा !” - दांत किटकिटाती अंजना बोली - “यू सन आफ ए बिच !”
“ओरीजिनल, माई डियर, दि वैरी फर्स्ट ।” - मैं धीरज से मुस्कराता हुआ बोला - “इस जगत प्रसिद्ध बिच ने जितने सन पैदा किये हैं, उनमें सबसे पहला । पहलौठी का ।”
पांव पटकती वो वहां से रुखसत हुई ।
“आप पांच मिनट वापिस सोफे पर विराजिये” - पीछे मैं श्यामली से मुखातिब हुआ - “मैं चेंज करके आता हूं ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं बैडरूम में दाखिल हुआ और मैंने अपने पीछे दरवाजा बंद कर लिया ।
कुछ क्षण मैं वहीं ठिठका खड़ा रहा और उस घड़ी जो मेरे जेहन में घुमड़ रहा था, उस पर विचार करता रहा । विचार करता रहा और सोचता रहा कि क्यों मुझे लग रहा था कि मेरी बेवक्त की मेहमान श्यामली तोशनीवाल को वहां कदम रखने से पहले ही खबर थी कि उसकी बेटी मर चुकी थी । पुलिस की टेलीफोन काल से उसे बेटी की मौत की खबर लगी होना उसका टोटल ड्रामा था ।
क्या पतंगबाज औरत थी ?
और पता नहीं किस फिराक में थी ?
***
हम छतरपुर पहुंचे ।
बारिश तब नहीं हो रही थी और अंधेरे में ये भी कहना मुहाल था कि मेरे फ्लैट से बीस किलोमीटर दूर के उस इलाके में बारिश हुई ही नहीं थी या हो कर बंद हो चुकी थी ।
तोशनीवाल फार्म की बाउंड्री वाल में एक विशाल फाटक था जो उस घड़ी पूरा खुला था और उसके पल्ले आजू बाजू के विशाल पिलर्स के पीछे छुपे हुए थे । आगे एक लम्बा ड्राइव वे था जिस के सिरे पर एक बहुत बड़ा अहाता था जिसमें फार्महाउस की एकमंजिला इमारत थी । अहाते में बायीं ओर तीन गाड़ियां खड़ी थीं जिनमें से एक पीसीआर वैन थी जिसके दोनों तरफ बड़ा बड़ा स्पैशल स्क्वायड, दिल्ली पुलिस लिखा था । वो वैन वहां इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव आफिसर-इन-चार्ज, स्पैशल स्क्वायड की मौजूदगी की परिचायक थी । स्पैशल स्क्वायड पुलिस का वो दस्ता था जो सिर्फ कत्ल के केसों की तफ्तीश के लिये भेजा जाता था । लिहाजा दिल्ली में कत्ल की हर वारदात में इन्स्पेक्टर देवेंद्र यादव की हाजिरी और दखल निश्चित था ।
दूसरी कार एक पुलिस जीप थी और तीसरी एक एम्बैसेडर थी । जीप जरूर लोकल थाने की थी, कार भी वहीं की हो सकती थी लेकिन ये भी मुमकिन था कि वो पुलिस लैब से आये एक्सपर्ट्स की थी ।
मैंने अपनी कार को उन गाड़ियों से विपरीत दिशा में कम्पाउंड के दूसरे बाजू में पार्क किया ।
“मैडम” - मैं बोला - “अभी आप यही ठहरिये, मैं भीतर के हालात मालूम करता हूं और फिर आपको खबर करता हूं ।”
“लेकिन...” - उसने व्याकुल भाव से कहना चाहा ।
“मैडम, अगर मरने वाली आपकी बेटी नहीं है तो भीतर आपका कोई काम नहीं है ।”
“लेकिन अगर वो सुरभि...”
“मैं मालूम करता हूं न ! ओके ?”
हिचकिचाते हुए उसने सहमति में सिर हिलाया ।
कार से निकल कर मैं आगे बढ़ा । मैंने फार्महाउस के कवर्ड ड्राइव वे में कदम रखा तो एक वर्दीधारी सिपाही मेन डोर के सामने के बरामदे की तीन सीढ़ियां उतरा और मजबूती से मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया ।
“कौन हो ?” - वो कर्कश स्वर में बोला - “कहां जा रहे हो ?”
“राज शर्मा हूं ।” - मैं जब्त से बोला - “पीडी हूं । इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव का दोस्त हूं । भीतर मौकायवारदात पर जा रहा हूं ।”
उसने गौर से मेरी सूरत का मुआयना किया ।
मुझे ऐसा न लगा कि उसने मेरी सूरत से या मेरे नाम से मुझे पहचाना था ।
“यहीं ठहरो ।” - वो पूर्ववत् कर्कश स्वर में बोला ।
मैंने सहमति में सिर हिलाया ।
वो भीतर गया और उलटे पांव वापिस लौटा ।
“जाओ ।” - और बोला ।
मैं भीतर दाखिल हुआ ।
मेन हाल में मुझे पांच पुलिसियों के दर्शन हुए । उन में से एक ने इंस्पेक्टर देवेन्द्र यादव तो होना ही था, दूसरा उसका मातहत, युवा सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर था, तीसरा मतवाल चंद नाम का इंस्पेक्टर था जिसको मैं पहचानता था और पहले से जानता था कि महरौली थाने का एसएचओ था । चौथा एक मेरे लिये नितांत अजनबी सब-इंस्पेक्टर था और पांचवां, जो कि वहां मौजूद इकलौता शख्स था जो वर्दी में नहीं था, जो सूरत से तो पुलिसिया ही जान पड़ता था लेकिन टैक्नीकल स्टाफ से भी हो सकता था ।
मतवाल चंद की मेरे पर निगाह पड़ी तो तत्काल उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये । उसने मेरी तरफ यूं देखा जैसे मैं कोई ऐसी डिश था जिसका उसने आर्डर नहीं दिया था ।
ऐसा ही मिजाज था उसका आदतन ।
सख्त ! खुंदकी ! असहिष्णुतापूर्ण !
मैंने अभिवादन किया - यूं कि एक ही में सबको शुमार कर लिया ।
“आओ, भई, पीडी साहब ।” - यादव बोला ।
मैंने खास उसका अभिवादन फिर किया ।
“इसका यहां क्या काम है ?” - मतवाल चंद बोला ।
उसके सवाल से और सवाल करने के लहजे से ही मैं समझ गया कि वो भी मुझे भूला नहीं था ।
“शायद निकल आये कुछ ।” - यादव सहज भाव से बोला - “ये मरने वाली की मां से वाकिफ है । मां - श्यामली तोशनीवाल - अभी थोड़ी देर पहले इसके फ्लैट पर इसके साथ थी” - वो मेरी तरफ घूमा - “अब कहां है ?”
“बाहर मेरी कार में बैठी है ।” - मैं बोला ।
“उसे खबर लग गयी ?”
“लग गयी लेकिन उम्मीद के खिलाफ उम्मीद कर रही है कि शायद मकतूला उसकी बेटी सुरभि न हो ।”
“वही है । शक की कोई गुंजायश नहीं । पक्की, पुख्ता शिनाख्त हुई है ।”
“कैसे मरी ?”
“फोन पर बोला तो था ! खुदकुशी की ।”
“कत्ल की कोई गुंजायश नहीं ?”
“एसएचओ साहब से पूछो ।”
मैंने मतवाल चंद की तरफ देखा ।
“न भी हो तो” - वो भुनभुनाया - “दूसरे पहलू पर भी विचार करना पड़ता है ।”
“दूसरा पहलू ! यानी कि कत्ल वाला ?”
“हां । जो दिखाई देता है, वो कातिल का स्टेज किया कवर आप भी हो सकता है लेकिन यादव साहब को मेरी राय से इत्तफाक नहीं ।”
“ओपन एण्ड शट केस है सुइसाइड का ।” - यादव बोला - “बुलेट के ऐंट्री वूंड के आसपास, कनपटी पर, चेहरे पर जले बारूद के कण छिटके साफ पता चलते थे । फिर गए खुद उसके हाथ में । क्लियर केस है खुदकुशी का ।”
“खुदकुशी की वजह ?”
“मालूम पड़ेगी । सामने आयेगी । अभी तो शुरुआत है तफ्तीश की ।”
“लाश कहां है ?”
“उठवा दी गयी है । पोस्टमार्टम के लिये भिजवा दी गयी है ।”
“इतनी जल्दी ! परिवार वालों को शिनाख्त का तो मौका देते !”
“वो मौका मोर्ग में भी हासिल हो सकता है ।”
“फिर भी...”
“राजधानी के कुछ हालिया हालात की वजह से आजकल पुलिस बहुत प्रेशर में है । बहुत हेठी, बहुत किरकिरी हो रही है पुलिस की । इसलिये मुस्तैदी दिखाना जरूरी था ।”
“फिर मेरे मां को यहां लाने का क्या फायदा हुआ ?”
“देर की तुमने लाने में । तुम्हारे आने के थोड़ी देर पहले ही तो उठवाई लाश !”
“हूं ।”
“अभी भी क्या आफत आ गयी है ! सफदरजंग की मोर्ग में गयी है लाश । मां वहां शिनाख्त कर सकती है ।”