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“मां ।” - मुझे उसकी दबी हंसी सुनाई दी - “मां से मसखरी...”
“बस कर, बस कर और सुन ।”
“यस सर्र ।”
“सरसराये बिना सुन ।”
“यस, सर ।”
“आज घर से जरा जल्दी निकलना और अंधेरिया मोड़ पहुंचना ।”
“अंधेरिया मोड़ !”
“अंधेरिया मोड़ मालूम ?”
“ऑरविंदो मार्ग पर । कुतुब से आगे...”
“वही । वही । वहां से छतरपुर के लिये पैसेंजर ढ़ोने वाले वो टैम्पो चलते हैं जिन पर ग्रामीण सेवा लिखा होता है । अंधेरिया मोड़ उधर ग्रामीण सेवा टैम्पोज का अड्डा है । ठीक ?”
“ठीक ।”
“वैसे एक टैम्पो पर कल रात पौने ग्यारह बजे के करीब एक उम्रदराज शख्स सवार हुआ था और तोशनीवाल फार्म के करीब सड़क पर उतरा था । उसका हुलिया गौर से सुन ।”
मैंने बारीकी से केयरटेकर विष्णु कसाना का वो हुलिया बयान किया जो कि पिछली रात मुझे एसएचओ मतवाल चंद से तब सुनने को मिला था जबकि वो अपने थाने फोन पर बात कर रहा था ।
“ये कोई आम हुलिया नहीं है” - फिर मैंने जोड़ा - “खास हुलिया है जो कि ग्रामीण सेवा के ड्राइवर को आसानी से भूल जाने वाला नहीं है ।”
“ड्राइवर का हुलिया भी खास है तो उसे तलाश करने में आसानी होगी । बता दीजिये ।”
“वो मुझे कैसे मालूम होगा !”
“अच्छा ! सृष्टि में कुछ ऐसा भी है जो आपको नहीं मालूम !”
“बकवास न कर । यही तो वो काम है जो तूने करना है । उस टैम्पो ड्राइवर को लोकेट करना है और कनफर्म करना है कि कल रात पौने ग्यारह बजे मेरे बयान किये हुलिये का कोई आदमी वहां से छतरपुर के लिये सवार होकर रास्ते में तोशनीवाल फार्म के करीब उतरा था ।”
“भुस के ढ़ेर में सुई तलाश करने जैसा काम बता रहे हैं ! क्या पता अंधेरिया मोड़ से सैकड़ों ऐसे टैम्पो आपरेट करते हों !”
“मुझे उम्मीद नहीं । ग्रामीण सेवा एक हाल में ही जारी हुई नयी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सर्विस है जिसको कुछ खास रूट्स पर ही ऑपरेट करने की इजाजत है । इसलिये मुझे उम्मीद है कि उस अड्डे के ऐसे टैम्पो वाले वहां के रैगुलर होंगे और थोड़ी सी पूछताछ से ही कोई मुफीद नतीजा निकल आयेगा ।”
“न निकला तो ?”
“कहती है न निकला तो ? इसे कहते हैं रोते जाओ और मुर्दों की खबर लाओ ।”
“तो ?”
“तो आफिस आ कर मरना ।”
“निकला तो ?”
“तो क्या ? तो बल्ले बल्ले ! शाबाशियां ! पप्पियां जफियां !”
“खबरदार ! ऐसी किसी हरकत का खयाल भी किया तो मैं जाऊंगी ही नहीं ।”
“अरे, नहीं । ठीक है...”
“शाबाशी तक ठीक है । और वो भी मुंह जुबानी किस काम की ?”
“क्या मतलब ?”
“मेरा काम फील्ड में भटकना नहीं है । ये एक्स्ट्रा वर्क है - मेरी आफिस ड्यूटीज के अलावा है - इसलिये एक्स्ट्रा वर्क की एक्स्ट्रा वेजिज हासिल होनी चाहियें ।”
“क्या कहने !”
“अब जब आपको पेइंग क्लायंट मिल गया है तो क्या प्रोब्लम है ?”
“तुझे क्या पता है क्लायंट मिल गया है ? पेईंग या कैसा भी ?”
“पेईंग होना तो जरूरी है । घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या !”
“मुझे घोड़ा कहती है ?”
“आप खुद ही कहते हैं । अक्सर ।”
“अच्छा, अच्छा ! पर तुझे ये कैसे पता है कि क्लायंट मिल गया है ?”
“कल शाम पांच बजे तक तो आप आफिस में थे । किसी विष्णु कसाना की आज दिन चढ़ा नहीं कि आपको तलाश है तो रात किसी केस पर - पेईंग केस पर - ही काम कर रहे होंगे क्योंकि फोकट में तो आप कड़ाके की ठंड में महरौली, छतरपुर, अंधेरिया मोड़ वगैरह वगैरह के धक्के खाने से रहे ।”
“कमाल है ! तू तो मेरे से भी बड़ी डिटेक्टिव है ! ऐसी डिडक्टिव रीजनिंग...”
“वो तो खैर सोहबत का असर जानिये, मुझे तो ये भी मालूम है कि क्लायंट कोई बहन जी हैं ।”
“क्या !”
“जिसने आते ही आपका ‘क्विक फंक्शन’ वाला एक्सप्रैस ट्रीगर दबा दिया और हातिम चल पड़े खड़े पैर सब्ज शहजादी के लिये सात सवालों का जवाब पता करने ।”
“तौबा ! अरे, तू रजनी ही बोल रही है न ?”
“आफकोर्स, सर्र ।”
“फिर सरसराई । रजनी ही है तू । अब बोल करेगी ये काम ?”
“करूंगी, सर्र । आपके हुक्म की तामील होगी । न सिर्फ तामील होगी, ये बंदी शंकरकदी कोई कारआमद, आपकी पसंद और जरूरत का नतीजा भी निकाल के रहेगी ।”
“शाबाश ! तभी तो मैं कहता हूं - अलम में तुझसे लाख सही, तू मगर कहां !”
“इस जर्रानवाजी के लिये तो शुक्रिया अलग से जमा कर लीजिये, अब एक बात - आखिरी बात - और बता दीजिये ।”
“कौन सी बात ? पूछ !”
“रात को बतौर क्लायंट मिली बहन जी कैसी थी - पतंग जैसी, दर्शनी हुण्डी जैसी, या और भी वाह वाह !”
मैंने फोन बंद कर दिया ।
***
सात बजे वसंत कुंज में मैं तोशनीवाल के आलीशान दौलतखाने की कालबैल बजा रहा था ।
वातावरण में धुंध व्याप्त थी जो इतनी घनी थी कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था । उन दिनों सूरज या दोपहरबाद निकलता था या निकलता ही नहीं था । धुंध न भी होती तो अभी सूरज निकलने का टाइम नहीं हुआ था इसलिये अंधेरा था जिसको धुंध दोबाला कर रही थी ।
इतना अर्ली वहां आना गैरमुनासिब था । लेकिन जब उस हाउसहोल्ड के एक बाशिंदे को मेरे घर लेट आना गैरमुनासिब नहीं लगा था तो मुझे भी क्यों लगता ! इस बात ने और इस बात ने कि मैं नींद से महरूम था, मुझे उस घड़ी वहां पहुंचाया था, आगे जो होता देखा जाता ।
मैंने काल बैल दोबारा बजाई ।
जवाब फिर भी न मिला ।
अलबत्ता इस बार भीतर से एक कुत्ते के गुर्राने की, फिर अदब से भौंकने की आवाज आयी ।
बड़े घर का कुत्ता था, बेअदबी से कैसे भौंक सकता था ! खुद को तमीज तहजीब हो या न हो, कुत्ते को तो सिखानी पड़ती थी न ! मेहमान के सामने कुत्ते की वजह से हेठी हो, ऐसा तो कोई नहीं चाहता न !
तीसरी बार मैंने लम्बे अरसे तक बैलपुश से उंगली न हटाई ।
भड़ाक से मेन डोर खुला और सिर पर ऊनी टोपी पहने और जिस्म पर मोटी शाल लपेटता एक शख्स चौखट पर प्रकट हुआ ।
मैंने देखा फरार केयर टेकर विष्णु कसाना की तरह वो भी एक पिद्दी सा आदमी था और उसी की तरह साठ के पेटे में था ।
अपने मुलाजिमों के बारे में तोशनीवाल ने क्या कोई गज निर्धारित किया हुआ था !
“अरे, भई” - वो झल्लाया सा बोला - “क्या सारी कॉलोनी को जगाओगे ?”
“गुड मार्निंग !” - मैं मधुर स्वर में बोला ।
“ये कोई टाइम है...”
“मिस्टर तोशनीवाल !” - जानबूझ कर अंजान बनता मैं बोला ।
“नहीं” - तत्काल उसके जोशोखरोश को ब्रेक लगी - “मैं...मैं देवीलाल...मैं...”
“जो कोई भी है, मालिक नहीं है न !”
उसका सिर स्वयंमेव मशीन की तरह, बायें से दायें, दायें से बायें हिला ।
“तो तमीज से बात कर । अदब से पेश आना सीख घर आये मेहमान से - या ये बहुत मुश्किल काम है तेरे वास्ते ?”
“आ...आपकी.. .ता - तारीफ ?”
“मैं डिटेक्टिव हूं । डिटेक्टिव समझता है न !”
“बस कर, बस कर और सुन ।”
“यस सर्र ।”
“सरसराये बिना सुन ।”
“यस, सर ।”
“आज घर से जरा जल्दी निकलना और अंधेरिया मोड़ पहुंचना ।”
“अंधेरिया मोड़ !”
“अंधेरिया मोड़ मालूम ?”
“ऑरविंदो मार्ग पर । कुतुब से आगे...”
“वही । वही । वहां से छतरपुर के लिये पैसेंजर ढ़ोने वाले वो टैम्पो चलते हैं जिन पर ग्रामीण सेवा लिखा होता है । अंधेरिया मोड़ उधर ग्रामीण सेवा टैम्पोज का अड्डा है । ठीक ?”
“ठीक ।”
“वैसे एक टैम्पो पर कल रात पौने ग्यारह बजे के करीब एक उम्रदराज शख्स सवार हुआ था और तोशनीवाल फार्म के करीब सड़क पर उतरा था । उसका हुलिया गौर से सुन ।”
मैंने बारीकी से केयरटेकर विष्णु कसाना का वो हुलिया बयान किया जो कि पिछली रात मुझे एसएचओ मतवाल चंद से तब सुनने को मिला था जबकि वो अपने थाने फोन पर बात कर रहा था ।
“ये कोई आम हुलिया नहीं है” - फिर मैंने जोड़ा - “खास हुलिया है जो कि ग्रामीण सेवा के ड्राइवर को आसानी से भूल जाने वाला नहीं है ।”
“ड्राइवर का हुलिया भी खास है तो उसे तलाश करने में आसानी होगी । बता दीजिये ।”
“वो मुझे कैसे मालूम होगा !”
“अच्छा ! सृष्टि में कुछ ऐसा भी है जो आपको नहीं मालूम !”
“बकवास न कर । यही तो वो काम है जो तूने करना है । उस टैम्पो ड्राइवर को लोकेट करना है और कनफर्म करना है कि कल रात पौने ग्यारह बजे मेरे बयान किये हुलिये का कोई आदमी वहां से छतरपुर के लिये सवार होकर रास्ते में तोशनीवाल फार्म के करीब उतरा था ।”
“भुस के ढ़ेर में सुई तलाश करने जैसा काम बता रहे हैं ! क्या पता अंधेरिया मोड़ से सैकड़ों ऐसे टैम्पो आपरेट करते हों !”
“मुझे उम्मीद नहीं । ग्रामीण सेवा एक हाल में ही जारी हुई नयी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सर्विस है जिसको कुछ खास रूट्स पर ही ऑपरेट करने की इजाजत है । इसलिये मुझे उम्मीद है कि उस अड्डे के ऐसे टैम्पो वाले वहां के रैगुलर होंगे और थोड़ी सी पूछताछ से ही कोई मुफीद नतीजा निकल आयेगा ।”
“न निकला तो ?”
“कहती है न निकला तो ? इसे कहते हैं रोते जाओ और मुर्दों की खबर लाओ ।”
“तो ?”
“तो आफिस आ कर मरना ।”
“निकला तो ?”
“तो क्या ? तो बल्ले बल्ले ! शाबाशियां ! पप्पियां जफियां !”
“खबरदार ! ऐसी किसी हरकत का खयाल भी किया तो मैं जाऊंगी ही नहीं ।”
“अरे, नहीं । ठीक है...”
“शाबाशी तक ठीक है । और वो भी मुंह जुबानी किस काम की ?”
“क्या मतलब ?”
“मेरा काम फील्ड में भटकना नहीं है । ये एक्स्ट्रा वर्क है - मेरी आफिस ड्यूटीज के अलावा है - इसलिये एक्स्ट्रा वर्क की एक्स्ट्रा वेजिज हासिल होनी चाहियें ।”
“क्या कहने !”
“अब जब आपको पेइंग क्लायंट मिल गया है तो क्या प्रोब्लम है ?”
“तुझे क्या पता है क्लायंट मिल गया है ? पेईंग या कैसा भी ?”
“पेईंग होना तो जरूरी है । घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या !”
“मुझे घोड़ा कहती है ?”
“आप खुद ही कहते हैं । अक्सर ।”
“अच्छा, अच्छा ! पर तुझे ये कैसे पता है कि क्लायंट मिल गया है ?”
“कल शाम पांच बजे तक तो आप आफिस में थे । किसी विष्णु कसाना की आज दिन चढ़ा नहीं कि आपको तलाश है तो रात किसी केस पर - पेईंग केस पर - ही काम कर रहे होंगे क्योंकि फोकट में तो आप कड़ाके की ठंड में महरौली, छतरपुर, अंधेरिया मोड़ वगैरह वगैरह के धक्के खाने से रहे ।”
“कमाल है ! तू तो मेरे से भी बड़ी डिटेक्टिव है ! ऐसी डिडक्टिव रीजनिंग...”
“वो तो खैर सोहबत का असर जानिये, मुझे तो ये भी मालूम है कि क्लायंट कोई बहन जी हैं ।”
“क्या !”
“जिसने आते ही आपका ‘क्विक फंक्शन’ वाला एक्सप्रैस ट्रीगर दबा दिया और हातिम चल पड़े खड़े पैर सब्ज शहजादी के लिये सात सवालों का जवाब पता करने ।”
“तौबा ! अरे, तू रजनी ही बोल रही है न ?”
“आफकोर्स, सर्र ।”
“फिर सरसराई । रजनी ही है तू । अब बोल करेगी ये काम ?”
“करूंगी, सर्र । आपके हुक्म की तामील होगी । न सिर्फ तामील होगी, ये बंदी शंकरकदी कोई कारआमद, आपकी पसंद और जरूरत का नतीजा भी निकाल के रहेगी ।”
“शाबाश ! तभी तो मैं कहता हूं - अलम में तुझसे लाख सही, तू मगर कहां !”
“इस जर्रानवाजी के लिये तो शुक्रिया अलग से जमा कर लीजिये, अब एक बात - आखिरी बात - और बता दीजिये ।”
“कौन सी बात ? पूछ !”
“रात को बतौर क्लायंट मिली बहन जी कैसी थी - पतंग जैसी, दर्शनी हुण्डी जैसी, या और भी वाह वाह !”
मैंने फोन बंद कर दिया ।
***
सात बजे वसंत कुंज में मैं तोशनीवाल के आलीशान दौलतखाने की कालबैल बजा रहा था ।
वातावरण में धुंध व्याप्त थी जो इतनी घनी थी कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था । उन दिनों सूरज या दोपहरबाद निकलता था या निकलता ही नहीं था । धुंध न भी होती तो अभी सूरज निकलने का टाइम नहीं हुआ था इसलिये अंधेरा था जिसको धुंध दोबाला कर रही थी ।
इतना अर्ली वहां आना गैरमुनासिब था । लेकिन जब उस हाउसहोल्ड के एक बाशिंदे को मेरे घर लेट आना गैरमुनासिब नहीं लगा था तो मुझे भी क्यों लगता ! इस बात ने और इस बात ने कि मैं नींद से महरूम था, मुझे उस घड़ी वहां पहुंचाया था, आगे जो होता देखा जाता ।
मैंने काल बैल दोबारा बजाई ।
जवाब फिर भी न मिला ।
अलबत्ता इस बार भीतर से एक कुत्ते के गुर्राने की, फिर अदब से भौंकने की आवाज आयी ।
बड़े घर का कुत्ता था, बेअदबी से कैसे भौंक सकता था ! खुद को तमीज तहजीब हो या न हो, कुत्ते को तो सिखानी पड़ती थी न ! मेहमान के सामने कुत्ते की वजह से हेठी हो, ऐसा तो कोई नहीं चाहता न !
तीसरी बार मैंने लम्बे अरसे तक बैलपुश से उंगली न हटाई ।
भड़ाक से मेन डोर खुला और सिर पर ऊनी टोपी पहने और जिस्म पर मोटी शाल लपेटता एक शख्स चौखट पर प्रकट हुआ ।
मैंने देखा फरार केयर टेकर विष्णु कसाना की तरह वो भी एक पिद्दी सा आदमी था और उसी की तरह साठ के पेटे में था ।
अपने मुलाजिमों के बारे में तोशनीवाल ने क्या कोई गज निर्धारित किया हुआ था !
“अरे, भई” - वो झल्लाया सा बोला - “क्या सारी कॉलोनी को जगाओगे ?”
“गुड मार्निंग !” - मैं मधुर स्वर में बोला ।
“ये कोई टाइम है...”
“मिस्टर तोशनीवाल !” - जानबूझ कर अंजान बनता मैं बोला ।
“नहीं” - तत्काल उसके जोशोखरोश को ब्रेक लगी - “मैं...मैं देवीलाल...मैं...”
“जो कोई भी है, मालिक नहीं है न !”
उसका सिर स्वयंमेव मशीन की तरह, बायें से दायें, दायें से बायें हिला ।
“तो तमीज से बात कर । अदब से पेश आना सीख घर आये मेहमान से - या ये बहुत मुश्किल काम है तेरे वास्ते ?”
“आ...आपकी.. .ता - तारीफ ?”
“मैं डिटेक्टिव हूं । डिटेक्टिव समझता है न !”