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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“मां ।” - मुझे उसकी दबी हंसी सुनाई दी - “मां से मसखरी...”

“बस कर, बस कर और सुन ।”

“यस सर्र ।”

“सरसराये बिना सुन ।”

“यस, सर ।”

“आज घर से जरा जल्दी निकलना और अंधेरिया मोड़ पहुंचना ।”

“अंधेरिया मोड़ !”

“अंधेरिया मोड़ मालूम ?”

“ऑरविंदो मार्ग पर । कुतुब से आगे...”

“वही । वही । वहां से छतरपुर के लिये पैसेंजर ढ़ोने वाले वो टैम्पो चलते हैं जिन पर ग्रामीण सेवा लिखा होता है । अंधेरिया मोड़ उधर ग्रामीण सेवा टैम्पोज का अड्डा है । ठीक ?”

“ठीक ।”

“वैसे एक टैम्पो पर कल रात पौने ग्यारह बजे के करीब एक उम्रदराज शख्स सवार हुआ था और तोशनीवाल फार्म के करीब सड़क पर उतरा था । उसका हुलिया गौर से सुन ।”

मैंने बारीकी से केयरटेकर विष्णु कसाना का वो हुलिया बयान किया जो कि पिछली रात मुझे एसएचओ मतवाल चंद से तब सुनने को मिला था जबकि वो अपने थाने फोन पर बात कर रहा था ।

“ये कोई आम हुलिया नहीं है” - फिर मैंने जोड़ा - “खास हुलिया है जो कि ग्रामीण सेवा के ड्राइवर को आसानी से भूल जाने वाला नहीं है ।”

“ड्राइवर का हुलिया भी खास है तो उसे तलाश करने में आसानी होगी । बता दीजिये ।”

“वो मुझे कैसे मालूम होगा !”

“अच्छा ! सृष्टि में कुछ ऐसा भी है जो आपको नहीं मालूम !”

“बकवास न कर । यही तो वो काम है जो तूने करना है । उस टैम्पो ड्राइवर को लोकेट करना है और कनफर्म करना है कि कल रात पौने ग्यारह बजे मेरे बयान किये हुलिये का कोई आदमी वहां से छतरपुर के लिये सवार होकर रास्ते में तोशनीवाल फार्म के करीब उतरा था ।”

“भुस के ढ़ेर में सुई तलाश करने जैसा काम बता रहे हैं ! क्या पता अंधेरिया मोड़ से सैकड़ों ऐसे टैम्पो आपरेट करते हों !”

“मुझे उम्मीद नहीं । ग्रामीण सेवा एक हाल में ही जारी हुई नयी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सर्विस है जिसको कुछ खास रूट्स पर ही ऑपरेट करने की इजाजत है । इसलिये मुझे उम्मीद है कि उस अड्डे के ऐसे टैम्पो वाले वहां के रैगुलर होंगे और थोड़ी सी पूछताछ से ही कोई मुफीद नतीजा निकल आयेगा ।”

“न निकला तो ?”

“कहती है न निकला तो ? इसे कहते हैं रोते जाओ और मुर्दों की खबर लाओ ।”

“तो ?”

“तो आफिस आ कर मरना ।”

“निकला तो ?”

“तो क्या ? तो बल्ले बल्ले ! शाबाशियां ! पप्पियां जफियां !”

“खबरदार ! ऐसी किसी हरकत का खयाल भी किया तो मैं जाऊंगी ही नहीं ।”

“अरे, नहीं । ठीक है...”

“शाबाशी तक ठीक है । और वो भी मुंह जुबानी किस काम की ?”

“क्या मतलब ?”

“मेरा काम फील्ड में भटकना नहीं है । ये एक्स्ट्रा वर्क है - मेरी आफिस ड्यूटीज के अलावा है - इसलिये एक्स्ट्रा वर्क की एक्स्ट्रा वेजिज हासिल होनी चाहियें ।”

“क्या कहने !”

“अब जब आपको पेइंग क्लायंट मिल गया है तो क्या प्रोब्लम है ?”

“तुझे क्या पता है क्लायंट मिल गया है ? पेईंग या कैसा भी ?”

“पेईंग होना तो जरूरी है । घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या !”

“मुझे घोड़ा कहती है ?”

“आप खुद ही कहते हैं । अक्सर ।”

“अच्छा, अच्छा ! पर तुझे ये कैसे पता है कि क्लायंट मिल गया है ?”

“कल शाम पांच बजे तक तो आप आफिस में थे । किसी विष्णु कसाना की आज दिन चढ़ा नहीं कि आपको तलाश है तो रात किसी केस पर - पेईंग केस पर - ही काम कर रहे होंगे क्योंकि फोकट में तो आप कड़ाके की ठंड में महरौली, छतरपुर, अंधेरिया मोड़ वगैरह वगैरह के धक्के खाने से रहे ।”

“कमाल है ! तू तो मेरे से भी बड़ी डिटेक्टिव है ! ऐसी डिडक्टिव रीजनिंग...”

“वो तो खैर सोहबत का असर जानिये, मुझे तो ये भी मालूम है कि क्लायंट कोई बहन जी हैं ।”

“क्या !”

“जिसने आते ही आपका ‘क्विक फंक्शन’ वाला एक्सप्रैस ट्रीगर दबा दिया और हातिम चल पड़े खड़े पैर सब्ज शहजादी के लिये सात सवालों का जवाब पता करने ।”

“तौबा ! अरे, तू रजनी ही बोल रही है न ?”

“आफकोर्स, सर्र ।”

“फिर सरसराई । रजनी ही है तू । अब बोल करेगी ये काम ?”

“करूंगी, सर्र । आपके हुक्म की तामील होगी । न सिर्फ तामील होगी, ये बंदी शंकरकदी कोई कारआमद, आपकी पसंद और जरूरत का नतीजा भी निकाल के रहेगी ।”

“शाबाश ! तभी तो मैं कहता हूं - अलम में तुझसे लाख सही, तू मगर कहां !”

“इस जर्रानवाजी के लिये तो शुक्रिया अलग से जमा कर लीजिये, अब एक बात - आखिरी बात - और बता दीजिये ।”

“कौन सी बात ? पूछ !”

“रात को बतौर क्लायंट मिली बहन जी कैसी थी - पतंग जैसी, दर्शनी हुण्डी जैसी, या और भी वाह वाह !”

मैंने फोन बंद कर दिया ।

***

सात बजे वसंत कुंज में मैं तोशनीवाल के आलीशान दौलतखाने की कालबैल बजा रहा था ।

वातावरण में धुंध व्याप्त थी जो इतनी घनी थी कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था । उन दिनों सूरज या दोपहरबाद निकलता था या निकलता ही नहीं था । धुंध न भी होती तो अभी सूरज निकलने का टाइम नहीं हुआ था इसलिये अंधेरा था जिसको धुंध दोबाला कर रही थी ।

इतना अर्ली वहां आना गैरमुनासिब था । लेकिन जब उस हाउसहोल्ड के एक बाशिंदे को मेरे घर लेट आना गैरमुनासिब नहीं लगा था तो मुझे भी क्यों लगता ! इस बात ने और इस बात ने कि मैं नींद से महरूम था, मुझे उस घड़ी वहां पहुंचाया था, आगे जो होता देखा जाता ।

मैंने काल बैल दोबारा बजाई ।

जवाब फिर भी न मिला ।

अलबत्ता इस बार भीतर से एक कुत्ते के गुर्राने की, फिर अदब से भौंकने की आवाज आयी ।

बड़े घर का कुत्ता था, बेअदबी से कैसे भौंक सकता था ! खुद को तमीज तहजीब हो या न हो, कुत्ते को तो सिखानी पड़ती थी न ! मेहमान के सामने कुत्ते की वजह से हेठी हो, ऐसा तो कोई नहीं चाहता न !

तीसरी बार मैंने लम्बे अरसे तक बैलपुश से उंगली न हटाई ।

भड़ाक से मेन डोर खुला और सिर पर ऊनी टोपी पहने और जिस्म पर मोटी शाल लपेटता एक शख्स चौखट पर प्रकट हुआ ।

मैंने देखा फरार केयर टेकर विष्णु कसाना की तरह वो भी एक पिद्दी सा आदमी था और उसी की तरह साठ के पेटे में था ।

अपने मुलाजिमों के बारे में तोशनीवाल ने क्या कोई गज निर्धारित किया हुआ था !

“अरे, भई” - वो झल्लाया सा बोला - “क्या सारी कॉलोनी को जगाओगे ?”

“गुड मार्निंग !” - मैं मधुर स्वर में बोला ।

“ये कोई टाइम है...”

“मिस्टर तोशनीवाल !” - जानबूझ कर अंजान बनता मैं बोला ।

“नहीं” - तत्काल उसके जोशोखरोश को ब्रेक लगी - “मैं...मैं देवीलाल...मैं...”

“जो कोई भी है, मालिक नहीं है न !”

उसका सिर स्वयंमेव मशीन की तरह, बायें से दायें, दायें से बायें हिला ।

“तो तमीज से बात कर । अदब से पेश आना सीख घर आये मेहमान से - या ये बहुत मुश्किल काम है तेरे वास्ते ?”

“आ...आपकी.. .ता - तारीफ ?”

“मैं डिटेक्टिव हूं । डिटेक्टिव समझता है न !”
 
सिर फिर हिला - इस बार ऊपर से नीचे, हामी भरता ।

“जा के खबर कर ।”

“स ...साहब, अभी उठे नहीं ।”

“उठा ।”

उसकी शक्ल पर हाहाकारी भाव आये ।

“स.. साहब इतनी सुबह किसी से नहीं मिलते ।” - स्वर में दृढ़ता लाने का प्रयत्न करता वो बोला ।

“मेरे से मिलेंगे ।” - मैं भी लहजे में वही इफैक्ट पैदा करता बोला - “और कोई अहसान नहीं करेंगे । अहसान होगा तो मेरा उन पर होगा । समझा !”

“लेकिन...”

“अब हिल भी चुक ।”

“लेकिन...”

“बाजू हट !”

मैंने जबरन उसे बांह पकड़कर एक तरफ हटाया और भीतर कदम डाला ।

“मैं...मैं.. मैं” - वो हकलाता बोला - “बोलता हूं ।”

“शाबाश !”

“नाम ! नाम तो बोलना होगा ! साहब पूछेंगे तो...”

“मिस्टर राज शर्मा ।” - मैंने ‘मिस्टर’ पर खास जोर दिया ।

मालिक का मुंहलगा जो जान पड़ता था, उसके लिये तो एक तोशनीवाल ही इज्जत, मान सम्मान के काबिल था ।

उसने मेरे पीछे दरवाजा बंद किया और बोला - “यहीं ठहरिये ।”

“ठीक है ।”

वो घूमा और हाल से ही ऊपर को जाती फैंसी, सजावटी, दोनों तरफ रेलिंग लगी घुमावदार सीढ़ियों की ओर बढ़ा ।

कुत्ता सीढ़ियों के करीब खड़ा था जो कि उसके मेरे करीब से ही गुर्राया ।

“प्रिंस !” - देवीलाल बोला - “क्वाइट !”

कुत्ता खामोश हो गया और गुर्राहट की कसर तेजी से पूंछ हिला कर निकालने लगा ।

“सिट !”

वो बैठ गया ।

“कुछ नहीं कहेगा ।” - देवीलाल मेरे से बोला और फिर सीढ़ियां चढ़ने लगा ।

मैंने पीछे सहमति में सिर हिलाया ।

शेर जैसा कुत्ता था किसी विलायती नसल का । कहता तो क्या मैं वहां खड़ा रह पाता !

साहबान, मेरा जाती खयाल है कि बड़े लोग कुत्ते इसलिये रखते हैं क्योंकि उनमें खुद काट खाने की हिम्मत नहीं होती ।

हिम्मत करके मैं आगे बढ़ा और सीढ़ियों के दहाने पर जा खड़ा हुआ ।

आज्ञाकारी कुत्ते पर मेरी उस हरकत की कोई प्रतिक्रिया न हुई ।

गुड !

दहाने से मैंने ऊपर झांका तो देवीलाल मुझे एक बंद दरवाजे के सामने खड़ा दिखाई दिया जिसके पीछे से आती एक गुस्साई आवाज मुझे सुनाई दी - “डिटेक्टिव ! कौन डिटेक्टिव ! ये कोई टाइम है ! उसे बोल ग्यारह बजे मेरे आफिस में आये ।”

जवाब में देवीलाल ने कुछ मुनमुन की जो कि मेरी समझ में न आयी ।

फिर एकाएक वो दरवाजा खुला और एक ऊनी ड्रैसिंग गाउन पहनता, उसे शरीर पर व्यवस्थित करता एक रोबीला शख्स बाहर निकला, धड़धड़ करते सीढ़ियां उतरता वो मेरे करीब पहुंचा और यूं मेरे पर आंखें तरेरने लगा जैसे उम्मीद कर रहा हो कि मैं घबरा कर भाग खड़ा होऊंगा ।

मैंने आंख भर कर उसे देखा ।

कम्माल ! एक और पिद्दा !

जरूर इसी वजह से मालिक की जिद थी कि उसका कोई मेल एम्प्लाई कद में उससे निकलता हुआ न हो । कद में वो भी विष्णु कसाना और देवीलाल की तरह सवा पांच फुट के पेटे में ही जान पड़ता था, रंग उसका गोरा था और खोपड़ी खलवाट थी; कोई ढ़ाई बाल थे तो उसकी कनपटियों पर और पीछे गुद्दी पर थे । आंखें उसकी काली थीं और उम्र में वो साठ के पेटे में था ।

विष्णु कसाना और देवीलाल की तरह ।

कैसा विचित्र संयोग था !

और कैसा बाप था !

बेटी मोर्ग में पड़ी थी, वो सोता उठा था ।

मां जैसा ही ।

खानदान बड़ा हो जाये तो जज्बात छोटे हो जाते थे ।

मेरे भाग खड़ा होने के मामले में उसे अपनी उम्मीद पूरी होती न दिखाई दी तो वो कर्कश स्वर में बोला - “कौन हो, भई, तुम ? क्यों घुस आये हो यहां ? क्यों गले पड़ रहे हो ?”

करारी, रोबीली आवाज !

लगता था ठिगने कद की सारी कसर आवाज में निकल गयी थी ।

“मैंने नाम बोला था” - मैं शांति से बोला - “राज शर्मा । शायद आपके जमूरे ने आगे नहीं बताया । मैं...”

“शर्मा !” - सकपकाये भाव से उसने नाम दोहराया - “शर्मा ! तुम वो शख्स तो नहीं कल रात मेरी बीवी जिससे मिलने गयी थी ?”

“वही हूं ।” - मै तनिक सिर नवाकर बोला - “साक्षात ! राज शर्मा, दि ओनली वन ।”

“ओह !” - उसका लहजा नर्म पड़ा ।

मैंने गौर से उसकी सूरत का मुआयना किया । उसकी आंखों में नींद तब भी भरी हुई थी और निश्चय ही तब वो सोते से जगाया गया था ।

उसकी बीवी पीछे उसे सोता छोड़ कर गयी थी लेकिन बीच में उठ कर उसने पुलिस को काल लगायी थी कि मेरे से मिलने गयी उसकी बीवी लौटी नहीं थी ।

बीच में उठ कर क्या पता और भी कुछ किया हो, मसलन कहीं गया हो, लौट कर फिर सो गया हो और देवीलाल के जगाये उठा हो !

“श्यामली” - वो बोला - “रात मिली थी तुमसे ?”

“जी हां ।”

“अब कहां है वो ?”

“आपको नहीं मालूम ?”

“भई, जब वो गयी थी, मैं तो तब भी सोया हुआ था...”
 
“आप जल्दी सो जाने के आदी हैं ?”

“नहीं । कई दिनों बाद कल ही जल्दी सोया था । बहुत थका हुआ था । घनघोर नींद आयी, अभी भी देवीलाल न जगाता तो पता नहीं कब जागता ।”

“बीच में एक बार तो उठे !”

“क्या बोला ?”

“100 पर काल लगाने के लिये ! बीवी के बारे में !”

“अच्छा, वो ! भई, सोते जागते ही वो काम किया मैंने । कोई बुरा सपना आया जिसने कराया ।”

“इसी वजह से बीवी के बारे में कोई तसल्लीबख्श खबर हासिल किये बिना फिर सो गये !”

“अब क्या कहूं ? इस बुरी तरह थका हुआ था कि...” - वो ठिठका, सशंक भाव से उसने मेरी तरफ देखा, फिर वैसे ही लहजे से बोला - “श्यामली को कुछ हो तो नहीं गया ?”

“बेटी की ऐसी फिक्र न की !”

“उसकी बात जुदा है ।”

“जी !”

“उसका लाइफ स्टाइल ऐसा है कि लेट नाइट, लेट लेट नाइट, घर लौटना आम बात है । यही हाल उसके भाई का - शिशिर नाम है - है । पार्टी हॉपर्स हैं दोनों, लेट ही नहीं आते, अक्सर नहीं भी आते । अगले रोज आ कर ‘सारी डैड, यू नो हाउ इट इज’ कहना उनका तकिया कलाम बन गया है ।”

“आई सी । मेरे खयाल से आप पहले पता कर लें कि मैडम घर पर हैं या नहीं !”

“नहीं । पहले मैं तुम्हारी यहां आमद की वजह जानना चाहता हूं ।”

“जब आपको मैडम के वैलफेयर का अंदेशा है...”

“वो यूं ही मेरे मुंह से निकल गया था । उस चिट्ठी के बाद, जिसे ले कर श्यामली कल रात तुम से मिलने गयी थी, मेरा माइंडसैट ऐसा बन गया है कि मेरे को हर किसी के वैलफेयर का अंदेशा है - हर किसी में मुझे भी शामिल समझो - इसलिये कुछ बातें बेवजह मुंह से निकल जाती हैं ।”

“आई सी ।”

“आओ, उधर चल कर बैठते हैं ।”

हम हाल के ड्राईंगरूम की तरह सुसज्जित हिस्से में पहुंचे और आमने सामने बैठे ।

“अब बोलो, क्या बात है ?” - वो चिंतित, शंकित भाव से बोला - “कोई बुरी खबर है ?”

“है तो ऐसा ही ।” - मैं धीरे से बोला ।

“गॉड ! किसके बारे में ?”

“आपकी बेटी के बारे में ।”

“क्या हुआ उसे ?”

मैंने बताया ।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया, उसका शरीर जोर से कांपा ।

“गॉड ! गॉड !” - वो कांपती आवाज में बोला - “किसने किया ये जुल्म ? पकड़ा गया ?”

“अभी नहीं ।” - मैं बोला ।

“नहीं ! ये तो और भी बड़ा जुल्म है !”

“लेकिन पकड़ा जायेगा । यकीनन पकड़ा जायेगा । क्या पता पकड़ा जा भी चुका हो ! जब कातिल की शिनाख्त हो चुकी हो तो उसका बच पाना बहुत मुश्किल होता है, बल्कि नामुमकिन होता है । कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं ।”

“मुझे मालूम है कितने लम्बे होते हैं । कत्ल के आधे केसों में कातिल पकड़ाई में नहीं आता...”

“ये आपकी खामखयाली है ।”

“... त्रेहन भी नहीं पकड़ा जाने वाला ।”

“त्रेहन !”

“सुजित त्रेहन ! जिसने वो नामुराद चिट्ठी लिखी । जिसने बाजरिया वो चिट्ठी सारे कुनबे के लिये धमकी जारी की । मार डालेगा वो सबको एक एक करके । शुरुआत कर भी दी ।

मैं खामोश रहा ।

“तो” - फिर वो बोला - “विष्णु कसाना असल में सुजित त्रेहन है ।”

“जी !”

“भई, जब कह रहे हो कि कातिल विष्णु कसाना है तो वो सुजित त्रेहन के अलावा और कौन हो सकता है ! मामूली केयरटेकर का मेरी बेटी से क्या लेना देना ! जो लेना देना था, वो तो सुजित त्रेहन का था । केयरटेकर की शक्ल में चाल चल गया, शातिर चाल चल गया, खूनी चाल चल गया ।”

“केयरटेकर को मुलाजमत में किसने रखा था ?”

“मैंने ही रखा था । क्यों ?”

“खुद आपने रखा था या आपके हुक्म पर, आपके लिये ये काम किसी दूसरे ने किया था ।”

“नहीं, खुद मैंने किया था ।”

“तो फिर आपने उसे पहचाना क्यों नहीं ? जब आप यकीनी तौर से कह रहे हैं कि वो ही सुजित त्रेहन था तो क्यों आपने नौकरी पर रखते वक्त उसे न पहचाना ?”

“भई, बाइस साल गुजर गये, एक जिंदगी गुजर गयी, इतने सालों में इंसान की शक्ल में जमीन आसमान का फर्क आ जाता है । फिर मेरी निगाह में तो सुजित त्रेहन मर चुका था, तकरीबन चौथाई सदी का अरसा हो गया था उसे मरे हुए, कैसे मुझे सूझता, कैसे कोई दूरदराज का भी खयाल आता कि विष्णु कसाना नाम का वो शख्स - हैण्डीकैप्ड जानकर, उस पर तरस खाकर जिसे मैंने केयरटेकर की नौकरी दी - सुजित त्रेहन हो सकता था ! मेरे सामने वो शिखर कोंटी टॉप के बर्फीले पर्वत शिखर से वो हजार फुट की गहराई में जा कर गिरा, ऐसी बर्फीली खुर्द में जा कर गिरा जिस तक कोई आदमजात पहुंच नहीं सकता था, कैसे मैं मान लेता कि जिंदा बच गया था ! गिरने से न मरा होता तो सबजीरो टैन्परेचर ने जान ले ली होती ।”

“इतने यकीन से आप ये बात कह रहे हैं, फिर भी केयरटेकर की कल्पना उसी शख्स के तौर पर कर रहे हैं जो कि जिंदा बचा हो ही नहीं सकता ।”

“चिट्ठी की वजह से । उस कम्बख्त चिट्ठी की वजह से । वो चिट्ठी लिख कर उसने साबित कर दिया था कि अनहोनी हुई थी, चमत्कार हुआ था, उसके साथ वही हुआ था जो नहीं हो सकता था ।”

“तब भी आपकी तवज्जो अपने केयरटेकर की तरफ न गयी ?”

“कल शाम ही तो मिली थी चिट्ठी ! मुझे क्या पता था कि उसका पहला वार यूं आनन फानन होगा ! कुछ सोचने विचारने का टाइम तो हासिल हुआ ही नहीं था ! चिट्ठी पर बातरतीब या बेतरतीब कोई ऐतबार तक नहीं बना था मेरा । मुझे तो चिट्ठी एक घटिया, बेहूदा, जलील, प्रैक्टीकल जोक ही जान पड़ा था । कैसे पूरे बाइस साल बाद मुर्दा अपनी बर्फीली कब्र में से उठ खड़ा हुआ हो सकता था ! कैसे... कैसे सकता था ?”

“कैसे का जवाब चिट्ठी में दर्ज है ।”

“हां, दर्ज है । दर्ज तो ये भी है कि बीस साल तक याददाश्त खोयी रही, फिर एकाएक - इतने लम्बे अरसे के बाद - लौट भी आयी । ये कोई मानने की बात है ?”

“न मानने वाली कौन सी बात है इसमें ? बीस साल पहले जिस अलामत का इलाज नहीं था, उसका हाल में निकल आया होगा । मैडीकल साईंस में नित नयी रिसर्च होती है, नित नये चमत्कार होते हैं ।”

“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”

“सुजित त्रेहन के बारे में कुछ और बताइये ।”

“क्या बताऊं ? बिजनेस में मेरा बराबर का पार्टनर था । मेरी ही उम्र का था । मेरे जैसे ही कद काठ का था, अलबत्ता कद में एक-डेढ़ इंच लम्बा था मेरे से । जान बूझ कर बहुत हाई हील पहनता था और निहायत दुबला पतला था - इतना कि मैं उसे बीनपोल त्रेहन कहा करता था - इसलिये और लम्बा लगता था । मेरे सामने उसके साथ दुर्घटना घटी, वो पर्वत शिखर से गिरा, वो हजार फुट नीचे इतनी गहरी खुर्द में जा कर गिरा कि ऊपर से दिखाई भी नहीं देता था कि कहां जा कर पड़ा ! कैसे मैं मान लूं कि वो शख्स जिंदा बच गया, और बच जाने के बाद बाइस साल नमूदार न हुआ !”

“फिर भी आप कहते हैं आपकी बेटी का कत्ल उसी ने किया, वही केयरटेकर बना आपकी मुलाजमत में था ?”

“मैं नहीं कहता, तुम कहते हो । जब तुम कातिल केयरटेकर को बता रहे हो तो चिट्ठी की रू में उसका त्रेहन होना लाजमी हुआ या न हुआ ?”

“यूं तो हुआ !”
 
“ऊपर से मैं कन्फ्यूज्ड हूं । कातिल त्रेहन के सिवाय कोई हो नहीं सकता, त्रेहन जिंदा नहीं हो सकता, चिट्ठी मुझे किसी का किया प्रैक्टीकल जोक जान पड़ती है, कातिल केयरटेकर है और फरार है, केयरटेकर त्रेहन है, त्रेहन जिंदा नहीं हो सकता । गॉड ! गॉड ! इतनी बातें एक दूसरे में गड्डमड्ड हैं कि मेरा दिमाग भन्नाता है, नहीं समझ में आता कि किस बात को यकीन में लाऊं या किसको न लाऊं ।”

“प्रैक्टीकल जोक कैसे हो सकती है चिट्ठी ! चिट्ठी लिखने के लिये प्रैक्टीकल जोकर को बाइस साल पहले की नेपाल की उस मिसएडवेंचर की नालेज होनी चाहिये । थी किसी को ?”

“नहीं । उस हादसे के वक्त उस बर्फीले पर्वत शिखर पर मेरे और त्रेहन के अलावा कोई नहीं था ।”

“आप दोनों अकेले ही उस एडवेंचर पर निकले थे ?”

“नहीं । साथ में त्रेहन की बीवी थी । उनकी एक फैमिली फ्रेंड थी, उसकी दस साल की बेटी थी, सामान वगैरह उठाने के लिये और जनरल हैल्प के लिये वो सर्वेंट थे लेकिन तब ऐसा इत्तफाक हुआ था कि वो सब लोग पीछे कैम्प में रह गये थे ।”

“आपने कभी उस मिसएडवेंचर का किसी से जिक्र किया ?”

“नहीं, कभी नहीं ।”

“लिहाजा दो ही जने उस हादसे के जामिन थे, एक मर गया, दूसरे ने उस बाबत कभी जुबान न खोली, तो फिर कैसे किसी को - सम्भावित पत्र लेखक प्रैक्टीकल जोकर को - उस हादसे की जानकारी हो सकती थी ? फिर प्रैक्टीकल जोक उसे बाइस साल खामोश रहने के बाद ही क्यों सूझा ?”

उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।

“जमा मौजूदा वाकया गौरतलब है । उसके जेरेसाया अभी भी आपको लगता है कि चिट्ठी प्रैक्टीकल जोक है ?”

“अगर सच में सुरभि मर चुकी है - उसका कत्ल हो चुका है - तो अब चिट्ठी को सीरियसली न लेना मेरी हिमाकत होगी ।”

“फिर तो आप को ये भी मानना पड़ेगा कि सुजित त्रेहन जिंदा है - कैसे भी, किसी भी नामुमकिन, किसी भी करिश्माई, तरीके से - जैसा कि उसने चिट्ठी में बयान किया है - जिंदा है !”

“हां ।”

“और इस बात की पूरी सम्भावना है कि केयरटेकर ही सुजित त्रेहन था ?”

“है तो सही ।”

“और वो अपने कारनामे को - करतूत को, कामयाब करतूत को - फिर दोहरायेगा ?”

वो सकपकाया ।

“भूमिका वो बना भी चुका है । अपना अगला शिकार न सिर्फ वो चुन चुका है, एनाउन्स भी कर चुका है ।”

“क्या ! तुम्हें कैसे मालूम ?”

मैंने उसे मौकायवारदात से बरामद उस कागज के पुर्जे की बाबत बताया जिस पर दर्ज था - अगला नम्बर श्यामली का ।

“गॉड ! गॉड !”

पता नहीं सुख की घड़ियों में भी यूं उसे गॉड याद आता था या नहीं ।

“गॉड !”

फिर !

अब उसके चेहरे पर गहन चिंता के भाव थे ।

“लिसन !” - एकाएक वो बोला - “यू आर आलरेडी एंगेज्ड बाई माई वाइफ... दि फैमिली ! नो ?”

मेरी भवें उठी ।

“यहीं ठहरो ।” - वो बोला ।

“जी !”

“और मुझे प्रोटेक्ट करो ।”

“आपको...आपको प्रोटेक्ट करूं ?”

“जो खाका तुमने अभी खींचा है उसकी रू में तुम खुद समझ सकते हो कि मुझे प्रोटेक्शन की जरूरत है ।”

“सिर्फ आपको ?”

“मुझे प्रोटेक्ट करने की जिम्मेदारी अपने सिर लो और अपनी फीस बोलो । तब तक की फीस बोलो जब तक कि वो पकड़ा न जाये ।”

कैसा खुदगर्ज, खुदपरस्त आदमी था !

पुर्जे पर साफ दर्ज था कि अगला नम्बर श्यामली का था, चिट्ठी में साफ दर्ज था कि उसकी बारी आखिर में आने वाली थी, फिर भी उस घड़ी वो सिर्फ और सिर्फ अपनी प्रोटेक्शन का राग अलाप रहा था । मुझे फैमिली ने एंगेज किया था लेकिन प्रोटेक्शन की जरूरत फैमिली को नहीं, उसे थी ।

“सारी !” - मैं बोला ।

“क्या बोला ?”

“मैं डिटेक्टिव हूं सिक्योरिटी एजेंट नहीं ।”

“लेकिन फैमिली ने तुम्हें एंगेज किया है !”

“श्यामली ने । आपकी बीवी ने । जिस काम के लिये एंगेज किया है, वो मैं करूंगा ।”

“क्या करोगे ?”

“आपकी बेटी के कत्ल के राज की तह तक पहुंचने की कोशिश करूंगा । आपके केयरटेकर विष्णु कसाना उर्फ सुजित त्रेहन को तलाश करके उसे गिरफ्तार कराने की कोशिश करूंगा ।”

“लेकिन...”

“क्या आप नहीं चाहते कि वो - कातिल - ऐसे अंजाम तक पहुंचे, ऐसे खतरनाक अंजाम तक पहुंचे कि सोचे कि काश वो बाइस साल पहले नेपाल में ही मर गया होता !”

“वो तो ठीक है लेकिन... मेरा क्या होगा !”

“वही होगा जो मंजूरेखुदा होगा ।”

“ये खोखली तसल्ली है ।”
 
“जब उसका अंजाम बुरा होगा तो जाहिर है कि आपका भला होगा । जब मैं उसकी फिराक में लगूंगा तो वो आपके करीब नहीं फटक पायेगा, कोशिश करेगा तो खता खायेगा ।”

उसके चेहरे पर आश्वासन के भाव न आये ।

“अपने भूतपूर्व पार्टनर के बारे में कुछ और बताइये !”

“और क्या बताऊं ?” - वो हाथ फैलाता बोला - “और क्या है बताने लायक ? सिवाय चिट्ठी के ! उसकी बाबत बाजरिया श्यामली तुम पहले से ही जानते हो ।”

“मैडम कहां हैं ?”

“मुझे नहीं मालूम । मैंने कल रात की उस घड़ी से उसे नहीं देखा जब उसने मुझे सोते से जगा कर बताया था कि वो तुमसे मिलने जा रही थी ।”

“आपको ये भी नहीं मालूम कि रात घर लौटी या नहीं !”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“बड़े अच्छे हसबैंड हैं आप !”

वो खामोश रहा ।

“आ कर काल बैल तो बजाई होगी ! किसी ने” - मैंने परे खड़े देवीलाल की तरफ देखा - “उसे दरवाजा तो खोला होगा !”

तत्काल देवीलाल का सिर मशीनी अंदाज से इंकार में हिलने लगा ।

“उसके पास मेनडोर की चाबी है ।” - तोशनीवाल धीरे से बोला - “फैमिली में सबके पास मेनडोर की चाबी है । रात बिरात लौटने पर काल बैल बजाना जरूरी नहीं होता ।”

“फिर तो हो सकता है वो कब की लौट चुकी हों और अपने बैडरूम में हों !”

“कैसे हो सकता है ? इतना बड़ा वाकया हो गया, आके मुझे तो खबर करती !”

“पता कीजिये ।”

“क्या ?”

“अरे, देखिये जा कर, मैडम अपने बैडरूम में हैं या नहीं ! कहां है उनका बैडरूम ?”

उसने सीढ़ियों की तरफ इशारा किया ।

“जा के पता कीजिये ।”

उसने देवीलाल की तरफ देखा ।

मैंने घूर कर उसे देखा ।

वो हड़बड़ाया, फिर खुद उठा और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा ।

मैं उसके पीछे हो लिया ।

हिचकिचाता सा देवीलाल हम दोनों के पीछे चल पड़ा ।

हम पहली मंजिल पर के गलियारे में पहुंचे जहां के एक बंद दरवाजे पर तोशनीवाल ने दस्तक दी ।

कोई उत्तर न मिला ।

उसने दरवाजे को धकेला तो पाया वो लाक्ड नहीं था ।

हमने आगे पीछे भीतर कदम डाला ।

बैडरूम खाली था ।

मेरी निगाह पैन होती एक सिरे से दूसरे सिरे तक फिरी ।

बैड का हाल बताता था कि रात की किसी भी घड़ी वो इस्तेमाल में नहीं आयी थी । परले सिरे की तीन खिड़कियों में से एक खिड़की खुली थी जिससे सर्दियों की सुबह की तेज, बर्फीली हवा भीतर दाखिल हो रही थी । मैंने उस पर पहुंच कर बाहर झांका तो पाया वो लान में खुलती थी और जमीन से कोई पंद्रह-सोलह फुट की ऊंचाई पर थी । लिहाजा बिना सीढी या कमंद के उधर से आवाजाही मुमकिन नहीं थी ।

तभी नीचे कहीं आहट हुई ।

सबके कान खड़े हुए ।

कोई सीढियों पर खट खट कदम डालता ऊपर आ रहा था ।

“वो आ गया !” - तोशनीवाल दहशतनाक लहजे से बोला - “मिस्टर शर्मा, मुझे बचाओ ।”

पट्ठा बात को कुछ ज्यादा ही घसीट रहा था ।

“चुप रहिये ।” - मैं डपट कर बोला - “कत्ल गवाहों के सामने नहीं होता ।”

“वो गवाहों को भी मार डालेगा ।”

“बाप का माल है !”

“लेकिन..”

“प्लीज कीप क्वाईट ।”

बेचैनी से पहलू बदलते उसने होंठ भींच लिये ।

मैं - मेरी देखा देखी वो दोनों भी - कमरे के खुले दरवाजे पर पहुंचा । हम तीनों की निगाह सीढ़ियों के दहाने पर टिकी थी । मैं सहज था, देवीलाल सहज था, सिर्फ तोशनीवाल ऐसी सूरत बनाये था जैसे उसे दिल का दौरा पड़ने वाला हो ।

नौटंकीबाज !

सीढ़ियों के दहाने पर पहले एक सिर फिर पूरा शरीर प्रकट हुआ ।

श्यामली !

अच्छा एण्टीक्लाइमैक्स था ।

हम लोगों को अपने बैडरूम के दरवाजे पर खडे पा कर वो सकपकाई, फिर वहीं थमक कर खड़ी हो गयी ।

“क्या है ?” - नर्वस भाव से उसके मुंह से निकला ।

“एक बजे की छतरपुर से चली अब यहां पहुंची !” - मैं अपलक उसे देखता बोला ।

“पहले मोर्ग में गयी ।” - वो कातर भाव से बोली ।

“मोर्ग में गयीं !”
 
“हां । छतरपुर से रवाना होते ही मेरा अंतर मुझे धिक्कारने लगा कि मैं कैसी मां थी जो बेटी का मरा मुंह देखे बिना, उसकी लाश को लावारिस छोड़ कर घर जा रही थी ।”

शुकर ! शुकर !

“अभी तक वहीं थीं ?”

“हां ।

“मुझे तो खबर की होती !” - तोशनीवाल शिकायतभरे लहजे से बोला ।

श्यामली ने उत्तर न दिया, वो परे देखने लगी ।

“क्या हुआ वहां ?” - मैंने पूछा ।

“कुछ नहीं ।” - वो बोली - “मैंने लाश की सुपुर्दगी की बाबत सवाल किया तो पता चला पोस्टमार्टम से पहले वो मुमकिन नहीं था और पोस्टमार्टम ऐज ए स्पैशल केस रात को ही होने वाला था..”

“क्या था स्पैशल केस में ?”

“मुझे नहीं पता । वहां पर तैनात सब-इंस्पेक्टर ने जो कहा, वो मैंने बोला ।”

“फिर पता लगा कि पोस्टमार्टम करने वाला डाक्टर नहीं मिल पा रहा था । फिर बोला गया कि पोस्टमार्टम डे टाइम में - ग्यारह बजे के बाद कभी - होगा । तब मैं लौट आयी ।”

“अभी सीधी वहीं से आ रही हैं ?”

“हां । नाओ एक्सक्यूज मी, मेरे को टायलेट जाना है ।”

हमने उसके लिये रास्ता छोड़ दिया । उसने भीतर जा कर अपने पीछे दरवाजा बंद कर लिया ।

तभी नीचे फिर आहट हुई ।

मैंने सीढ़ियों के दहाने पर जा कर नीचे झांका ।

एक नौजवान लड़का हाल में दाखिल हो रहा था ।

उसकी चाल, शक्ल, सब चुगली कर रहे थे कि टुन्न था ।

मुझे अंदाजा था कि वो कौन था फिर भी मैंने सवाल किया तो मेरे अंदाजे की तसदीक हुई ।

शिशिर ! मकतूला का जुड़वां ! काफी हद तक हमशक्ल !

हम सब नीचे पहुंचे ।

युवक की बिलौरी निगाह स्वामी और भृत्य से उचटती मेरे पर पड़ी ।

“कौन हो तुम ?” - उसने रोब से बोलने की कोशिश की लेकिन नशे की वजह से मिमिया कर ही रह गया ।

“ये भोर भये तक पीता है” - मैंने पिता से सवाल किया - “या भोर भये पीता है ?”

“वाट नानसेंस !” - युवक झल्लाया - “आई आस्क्ड हू आर यू ? आनसर मी ।”

“ये तेरी मां का एंगेज किया हुआ पीडी है” - जवाब पिता ने दिया - “राज शर्मा नाम है ।”

“वाट द हैल इज मैंट बाई ए पीडी ?”

“प्राइवेट डिटेक्टिव ।”

“डिटेक्टिव !”

“प्राइवेट ।”

“ओह !”

“रात को कहां थे ?” - मैंने सवाल किया ।

“तुम कौन होते हो पूछने वाले ? आर यू माई वाइफ ?”

“वैरी स्मार्ट ! वैरी स्मार्ट, इनडीड !”

“इधर मेरी तरफ देख, कमीने !” - तोशनीवाल गुस्से से बोला ।

“यस, डैड !”

“बीती रात तेरी बहन का कत्ल हो गया है ।”

उसका नशा यूं उड़ा जैसे बिजली का स्विच ऑफ करने से रोशनी गायब हो जाती है ।

“सुरभि !” - वो फुसफुसाया ।

“कितनी बहनें हैं तेरी !”

“क - कैसे... कैसे हुआ ? क - क्या हुआ ? किसने किया ?”

“अच्छे सवाल हैं ।” - मैं बोला ।

“का - कातिल पकड़ा गया ?”

“नहीं ।”

“पता तो लगा होगा कि कौन है... या हो सकता है ?”

“हां, लगा ।”

“कौन ?”

मैंने बताया ।

“गॉड ! ममी ने चिट्ठी के बारे में बोला था । लेकिन मैं तो मजाक ही समझा था ।”

गॉड को याद करने के मामले में यकीनन बाप पर गया था ।

“तुम चाहते हो कातिल पकड़ा जाये ?” - मैं बोला ।

“हां ।” - वो भड़के लहजे से बोला - “और मेरे हवाले किया जाये । ताकि मैं खुद अपने हाथों से उसकी हड्डी बोटी अलग कर सकूं ।”

“तो मदद करो ।”

“किसकी ?”

“मेरी, और किसकी ! अभी पुलिस आएगी तो उसकी ।”

“पुलिस आएगी !”

“आठ बजे । आती ही होगी ।”

“क्या मदद करूं ?”

“अभी कैसे लौटे ? टैक्सी पर ?”

“खुद कार चला के ।”

“इस हालत में ?”

“क्या हुआ है मेरी हालत को ? मैं क्या पहली बार खुद ड्राइव करके लौटा हूं ।”

“कहां से लौटे ? कहां थे ?”

“एक सीक्रेट रेव पाटी में था । आल नाइट सैशन था । कहां था, नहीं बता सकता ।”

“कार कौन सी चलाते हो ?”

“होंडा ।”

“कहां है ?”

“गैराज में ।”

“दिखाओ चल कर ।”
 
यार्ड में फाटक के ऐन सामने एक वहुत बड़ा गैराज था जिसमें आजू बाजू चार कारें खड़ी हो सकती थीं । वहां चार बड़ी कारें खड़ी थीं जिनकी बाबत उसने मुझे बताया :

सफेद मर्सिडीज शिव मंगल तोशनीवाल की थी ।

काली ट्योटा श्यामली तोशनीवाल की थी ।

नीली असैंट मकतूला सुरभि की थी ।

ग्रे होंडा बेवड़े छोकरे की थी ।

लेकिन उन चारों कारों में से मेरी तवज्जो का मरकज सिर्फ और सिर्फ काली ट्योटा थी जिसका बायां बम्पर ठुका हुआ था ।

साफ जाहिर होता था किए ताजा ठुका था ।

मैंने कार के भीतर निगाह डाली तो पाया कि चाबी इग्नीशन में लटक रही थी । मैं जा कर ड्राइविंग सीट पर बैठा, मैंने चाबी को थामा फिर हौले से उसे घुमाया ।

तत्काल वाइपर चलने लगे ।

मैंने इग्नीशन आफ किया और उस बात पर मनन करता कार से बाहर निकला ।

“गैराज खुला रहता है ?” - मैंने छोकरे से सवाल किया ।

“नहीं” - वो बोला - “लाक्ड रहता है ।”

“अभी तो खुला था !”

“देवीलाल को भेजता न लॉक करके आने को ! लेकिन... भीतर कोई और ही कथा हो गयी ।”

“आओ, चलें ।”

हम कोठी में वापिस लौटे ।

मैंने देखा वहां से मेरी मुख्तसर सी गैरहाजिरी के दौरान श्यामली भी नीचे पहुंच गयी हुई थी ।

मैं करीब पहुंचा ।

“मिस्टर शर्मा” - वो बोली - “कोई प्रॉग्रेस...”

“मिस्टर शर्मा में क्या प्रॉग्रेस होनी है, मैडम” - मैं बोला - “भले ही प्रॉग्रेस का जमाना है लेकिन...”

“मिस्टर शर्मा, मैं केस की प्रॉग्रेस की बात कर रही थी ।”

“ओह, सॉरी ! वो भी हो जायेगी, मैडम” - मैं एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “आप चाहेंगी तो अभी ।”

“मैं चाहूंगी ?”

“जी हां ।”

“कैसे ?”

“एकाध सवाल का जवाब दे कर ।”

“जो रात पूछ चुके, उनके अलावा ?”

“जी हां ।”

“ठीक है, पूछिए । एकाध क्यों, जितने जी चाहे पूछिए । आप डिटेक्टिव हैं, सवाल नहीं पूछेंगे तो कैसे बीतेगी ?”

“ऐग्जैक्टली ।”

“पूछिये, क्या पूछना चाहते हैं ?”

“इस हाउसहोल्ड में चार प्राणी हैं” - मकतूला को याद करके मैंने ‘थे’ कहना चाहा लेकिन आगे बढा - “और सबकी अपनी अपनी कार है । आपकी ब्लैक ट्योटा है । ठीक ?”

“ठीक ।”

“कल शाम को कहां थी ? रात को कहां थी ?”

“कौन ?”

“कौन नहीं, मैडम, क्या । आपकी कार ! ट्योटा ! काली !”

“ओह ! यहीं थी । गैराज में खड़ी थी । एक हफ्ते से खड़ी है ।”

“यानी एक हफ्ते से कहीं नहीं गयीं ?”

“नहीं, भई । अपनी कार खुद चला के कहीं नहीं गयी । जहां गयी, टैक्सी पर गयी ।”

“वजह ?”

“सिवाय इसके कोई नहीं कि कभी कभी मैं सैल्फड्राइविंग से आजिज आ जाती हूं ।”

“एक हफ्ते से आजिज थीं ?”

“हां ।”

“ड्राइवर ! ड्राइवर की क्या पोजीशन है ?”

“दो हैं । लेकिन मुझे उनकी ड्राइविंग पसंद नहीं ।”

“नापसंदगी की वजह ?”

“तेज चलाते हैं ।”

“लेकिन रैश नहीं चलाते ।” - तोशनीवाल जल्दी से बोला - “ये खुद चलाये तो पचास-साठ से ऊपर नहीं जाती । इससे ऊपर की स्पीड इसे तेज जान पड़ती है ।”

“आई ड्राइव सेफ ।” - श्यामली विरोध में बोली ।

“कल” - वार्तालाप का सूत्र मैंने वापिस अपने हाथ में लिया - “कत्ल के वक्त के आसपास आपकी कार छतरपुर में थी - आपके फार्महाउस पर थी...”

“ये नहीं हो सकता ।”

“ये स्थापित तथ्य है । कैसे स्थापित है, मालूम पड़ जायेगा, फिलहाल ऐतबार लाइये मेरी बात पर । अब बोलिये, क्या कहती हैं आप इस बारे में ?”

“मैं क्या कहूं ! सिवाय इसके कि एक हफ्ते से मैंने अपनी कार को हाथ नहीं लगाया ।”

“फिर ये करतब कैसे हुआ ? कैसे कार छतरपुर का, आपके फार्महाउस का, चक्कर लगा आयी ?”

“मुझे नहीं मालूम । मुझे सिर्फ इतना मालूम है कि एक हफ्ते से मैंने कार नहीं चलाई । अब ठीक से बताओ, पहले बताओ, क्या स्थापित है ? कैसे स्थापित है ?”

मैंने उसे ट्योटा के ठुके हुए बम्पर और फार्महाउस के फाटक के छिले हुए पिलर की बाबत बताया ।

“ओह !”

“आपकी कार की विंडस्क्रीन भी इस बात की साफ चुगली करती है कि वो बारिश में बाहर निकाली गयी थी । जिस किसी ने भी कार को यहां गैराज में वापिस ला कर खड़ा किया था, उसने वाइपर ऑफ नहीं किये थे । जा के देखेंगी, इग्नीशन आन करेंगी तो पायेगी कि अभी भी चल रहे हैं ।”

“कमाल है !”

“अब इस कमाल का कोई मिजाज में आने लायक जवाब तो दीजिये ।”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“हो सकता है” - फिर बोली - “सुरभि मेरी कार लेकर गयी हो !”

“बिना आपको बताये ?”

“क्या जरूरत थी ! उसे मालूम था कार एक हफ्ते से खड़ी थी गैराज में । उसकी असैंट में खड़े पैर कोई प्राब्लम आ गयी होगी, वो मेरी कार ले गयी होगी !”

“ऐसा हुआ था तो कार वापिस कौन लाया ?”

“मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं ।”

मैंने अपलक उसकी तरफ देखा ।
 
“मेरी तरफ यूं देखने का कोई फायदा नहीं”- वो सख्ती से बोली - “कोई मतलब नहीं । अगर तुम मुझे अपनी बेटी का कातिल करार देना चाहते हो तो साफ ऐसा बोलो । बोलो कि जिस मां ने औलाद को जीवन दिया, उसी ने जीवन वापिस छीन लिया । ताकीद रहे कि ऐसा बोलोगे तो सुजित की चिट्ठी को तुम्हें सिरे से खारिज करना पड़ेगा । ऐसा करने का मतलब होगा कि तुम्हारे पास कोई केस नहीं है । यू हैव नथिंग टु वर्क अपॉन । फिर कुछ करने की जगह इंतजार करना सुजित के हाथों मेरी शहादत का ।”

“वैरी वैल सैड ! लेकिन, मैडम, मेरा मकसद आपको कातिल करार देना नहीं है बल्कि उन हालात से वाकिफ कराना है जिनकी वजह से बतौर कातिल आपकी तरफ मजबूत उंगली उठती है । मेरा, मेरी फर्म यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस का, मोटो है कि जो राज शर्मा का क्लायंट है, वो निर्दोष है । इसी वजह से मैं आपका तरफदार हूं और रहूंगा । और इसी वजह से मैं आपको हालात से नावाकिफ नहीं रख सकता ।”

“आई एप्रिशियेट दैट । एण्ड आई एम थैंकफुल टु यू । ये जो मजबूत उंगली तुम्हें मेरी तरफ उठी दिखाई देती है, मेरी कार के अलावा उसकी मजबूती और कहां है ? किस बात में है ?”

“आपका पर्स सुरभि की लाश के करीब फर्श पर पड़ा पाया गया था ।”

उस बात ने तोशनीवाल को भी चौंकाया, वो विचित्र भाव से श्यामली की तरफ देखने लगा ।

“उस पर दर्ज है” - श्यामली बोली - “कि वो कत्ल के वक्त वहां गिरा ? गिरते ही आटोमैटिकली कोई तारीख, कोई वक्त रजिस्टर हो गया उस पर ?”

“ऐसा कहीं होता है !”

“लाश के करीब वो पर्स मिला था या सुरभि लाश बन कर पर्स के करीब गिरी थी ? या पर्स कहीं और था, लाश कहीं और थीं और दोनों का मिलाप इरादतन मुझे फंसाने के लिये - मेरी तरफ वो मजबूत उंगली उठाने के लिये, जिसका अभी तुमने जिक्र किया था - कराया गया था ?”

“आप कहना चाहती हैं आपका वो पर्स कभी और आपसे वहां छूटा था !”

“यही कहना चाहती हूं । एक हफ्ते से मुझे मेरा एक पर्स नहीं मिल रहा । जाहिर था मैं उसे कहीं रख कर भूल गयी थी । पिछले दिनों जिन जगहों पर मेरा फेरा लगा था, उनमें से एक फार्महाउस भी थी जिसका कि पर्स के सिलसिले में मुझे खयाल नहीं आया था । कातिल ने वो पर्स वहां कहीं पड़ा देखा और केस में पेच डालने के लिये पर्स को लाश के करीब सरका दिया । बस, इतनी सी बात है ।”

“इतनी सी बात तो नहीं है !”

“क्यों भला ?”

“पर्स में किसी सपना टाहिलियानी की आपके नाम चिट्ठी थी जिस पर डिलीवरी पोस्ट आफिस की चार दिन पहले की तारीख की मोहर लगी हुई थी । अगर आपसे पर्स हफ्ता पहले फार्महाउस में छूटा था तो उसमें चार दिन पहले डिलीवर हुई चिट्ठी मौजूद नहीं हो सकती थी ।”

“तो चार दिन पहले छूटा होगा ! मैंने अपना एक पर्स पिछले हफ्ते में खोया था, वो हफ्ता पहले नहीं तो चार दिन पहले खोया होगा !”

“मामा ठीक कह रही हैं ।” - शिशिर एकाएक बोल पड़ा - “किसी की एक मामूली पर्स जैसी कोई आइटम कब खोई, ठीक से कौन याद रख सकता है !”

“और ?” - मैं धीरज से बोला ।

“और क्या ?” - वो हड़बड़ाया ।

“मां के लाडले ने मां की हिमायत में कुछ और कहना हो !”

वो और हड़बड़ाया, फिर वैसे ही उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“तो फिर खामोश रहो । खामोश रहना । अच्छे बच्चे तभी बोलते हैं जब उन्हें बोलने को बोला जाये । फालोड ?”

उसने कोई सख्त बात कहने के लिये मुंह खोला, फिर कुछ सोच कर होंठ भींच लिये ।

“मैडम” - मैं वापिस श्यामली की तरफ घूमा - “कार और पर्स की बाबत जो सफाई आपने दी, उस पर मैं तो यकीन कर लूंगा लेकिन पुलिस नहीं करने वाली । पुलिस की यही दलील होगी कि जब कातिल - चिट्ठी लिखने वाला, सुजित त्रेहन - सुरभि के बाद आपको जान से मार देना चाहता है तो कत्ल के इलजाम में आपको फंसाने की जुगत करने का क्या मतलब ? क्या हासिल ? कत्ल के इलजाम में आपके गिरफ्तार हो जाने से, जेल में बंद हो जाने से, तो उसका मकसद हल नहीं होता । इतने से तो उसका बदला नहीं उतरता ! उतरता था तो फिर वो धमकी जारी करने का क्या मतलब कि अगला नम्बर आपका था ! आप जेल में बंद हो जातीं तो क्योंकर वो मौत की राह पर आपका नम्बर लगा पाता ?”

“मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा ।”

“पर्स तो मान लिया उसे फार्महाउस में कहीं पड़ा दिखाई दे गया, कार तक वो अपनी पहुंच कैसे बना सकता था ? कैसे वो यहां के लाक्ड गैराज में से आपकी कार चोरी कर सकता था, फार्महाउस में उसे जानबूझकर ठीक कर चुपचाप यहां गैराज में वापिस पहुंचा सकता था ?”

“अरे, बोला न, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा, मैं कुछ नहीं जानती । या तो मेरे पर ऐतबार लाओ या बतौर कातिल मुझे गिरफ्तार करो लेकिन भगवान के लिये ये जिरहबाजी बंद करो ।”
 
“गिरफ्तार करना पुलिस का काम है । पुलिस” - मैंने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली - “आती ही होगी । उनसे गुहार लगाइये, शायद वो आपका कहना मान ले ।”

“कहना मान ले ?”

“आप चाहती हैं न गिरफ्तार होना !”

“तौबा ! अरे, मैंने जिरहबाजी बंद करने को कहा था । कहा था अगर... अगर जिरहबाजी बंद नहीं कर सकते तो मुझे गिरफ्तार करो । आयी बात समझ में ?”

“हां ।”

“तो क्यों खपे को खपा रहे हो ?”

“मेरे खयाल से आपको रैस्ट की जरूरत है ।”

उसने त्योरी चढ़ा कर मेरी तरफ देखा, फिर कठिन भाव से एक बार सहमति में सिर हिलाया, फिर घूमी और सीढ़ियां चढ़ने लगी ।

“अगर” - पीछे मैं बोला - “किसी को कोई ऐतराज न हो तो मैं चंद सवाल पूछना चाहता हूं ।”

“पूछो ।” - तोशनीवाल बोला ।

“अकेले में । वन बाई वन ।”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“मेरी स्टडी है ।” - फिर बोला - “वहां चले जाओ ।”

“कहां ?”

उसने हाल के पिछवाड़े के सीढियों के करीब के एक बंद दरवाजे की तरफ इशारा किया ।

“दरवाजा खुला है ।” - वो बोला - “जा सकते हो ।”

“थैंक्यू ।”

मैंने जा कर खुद को ऐश्वर्यशाली ढंग से सजी स्टडी में स्थापित किया । मैं स्टडी के मालिक की शानदार चमड़ा मढ़ी कुर्सी पर जा कर बैठा और फिर वहां सबसे पहले देवीलाल को तलब किया ।

“बैठो ।” - मैं बोला ।

उसने बैठने का उपक्रम न किया, उसके चेहरे पर संकोच के भाव आये ।

“सुना नहीं !”

झिझकता सा वो सिर झुकाये एक विजिटर्स चेयर पर बैठा ।

“मेरी तरफ देखो ।”

उसने सप्रयास सिर उठाया ।

“जब तुमने मेरी जुबानी सुना था कि सुरभि मर चुकी थी तो तुम्हारी शक्ल पर बड़े अजीब भाव आये थे । वजह बोलो ।”

“मैं तभी जागा था ।” - वो बोला - “जब सुनने को मिला कि मालिक की बेटी का कत्ल हो गया था तो कैसे...कैसे मैं इतने बड़े वाकये से निर्लिप्त रह सकता था ?”

“नहीं रह सकते थे । लेकिन मेरा वो मतलब नहीं था । देवीलाल, कत्ल की बात सुनकर तुम हैरान नहीं हुए थे, आहत लगने लगे थे ।”

“लगना ही था, सर । सुरभि से मेरा बहुत लगाव था, बहुत प्यार था ।”

“मैंने तो सुना है ऐसे जज्बात उसके लिये किसी के मन में भी नहीं थे !”

“मोटे तौर पर ये बात सच है, सर । शायद इसीलिये मेरा दिल उससे ज्यादा भीगता था । अपने आप मेरे मन में उसके लिये पुत्री तुल्य अनुराग उमड़ता था । उसके लिये कोई प्रेमभाव था तो वो मेरे मन में था, या मैडम के मन में था - आखिर मां थी - बाकी लोग तो...अब क्या बोलूं !”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“एक बात शायद आपको मालूम न पड़ी हो, सुरभि की पैदायश के वक्त से ही इस हाउसहोल्ड में मेरी मुलाजमत है । इस वजह से मेरी आंखों के सामने वो पली पुसी और बड़ी हुई है । उसके जन्म से ही मेरा उसका हर घड़ी का साथ था इसलिये मैं अपनी खुद की औलाद की तरह, जो कि बद्किस्मती से नहीं थी, उसे चाहता था । आप मेरी भावनाओं को समझ सकते है...”

“हां । तो तुम्हारा और तोशनीवाल परिवार का बीसेक साल का साथ है ?”

“साढ़े इक्कीस साल का ।”

“लम्बा अरसा है, काफी लम्बा अरसा है, लिहाजा सबके मिजाज से वाकिफ हो !”

“जी हां ।”

“हर किसी का हर इन एण्ड आउट जानते समझते हो !”

“है तो सही ऐसा ही !”

“गुड ! अब अपनी निजी राय बताओ - मां ने बेटी का कत्ल किया हो सकता है ?”

“नहीं, हरगिज नहीं । मैंने अभी अर्ज किया...मैंने अभी अर्ज किया कि मेरे अलावा, बल्कि मेरे से भी ज्यादा, अगर कोई को दिल से चाहता था तो वो श्यामली मैडम थी । कैसे कोई स्नेह और वात्सल्य भरी माता अपनी औलाद के इस हद तक खिलाफ हो सकती है कि खुद उसकी जान ले ले ! मैं सात जन्म विश्वास नहीं कर सकता कि सुरभि के साथ जो अनहोनी हुई है, उसकी वजह उसकी अपनी मां है ।”

“बाकियों के बारे में क्या कहते हो ?”

“नहीं । मैं बाप की, भाई की कल्पना बतौर कातिल नहीं कर सकता । इतना जुल्म, इतना अंधेर मुमकिन नहीं । फिर कोई वजह भी तो हो !”

“किसी को उसकी मौत से कोई लाभ होगा !”

“यही न कि यूं सम्पति का एक दावेदार घट जायेगा ! जब कोठार भरे हों तो उनके और भर जाने से क्या फर्क पड़ता है ! फिर भी कोई ऐसे लाभ का तमन्नाई है तो मैं यही कहूंगा कि दौलतमंद होना किसी लानत से कम नहीं ।”

“बहुत पते की बात कही, देवीलाल ! लेकिन कौन होगा इस फानी दुनिया में जिसको इस लानत से परहेज होगा, इंकार होगा ?”

वो खामोश रहा ।

“अपने एम्प्लायर के बारे में क्या कहते हो ?”

उसकी भवें उठीं ।

“सुना है तोशनीवाल साहब किसी फुलझड़ी पर फिदा हैं !”

“फुलझड़ी !”

“बारबाला ! शो गर्ल ! कोई दम है इस बात में ?”

“है तो सही, सर ।” - उसका स्वर दब गया, सावधान हो गया - “कानाफूसी है तो बराबर !”

“कानाफूसी छोड़ो । ये बोलो - साफ दो टूक बोलो - बात सच है या नहीं ?”

“सर, मेरी शामत न आ जाये मुंह फाड़ने पर !”

“कुछ नहीं होगा । बात तुम्हारे मेरे बीच ही रहेगी । जवाब दो ।”

“सच है ।”

“कौन है वो दिलकश दिलरुबा ?”

“अंजना रांका...”

मैं चौंका, सम्भल कर बैठा ।

“...लेकिन ये उसका असली नाम नहीं है । आपको मालूम ही है ऐसी लड़कियां अपने ऐसे धंधों मे अपना नाम बदल कर शामिल होती हैं । लेकिन इत्तफाकन मुझे उसका असली नाम भी मालूम है जो कि मोहना सावंत है । सुना है मुम्बई से है ।”

मोहना सावंत उर्फ अंजना रांका ! जो गुजरी रात मेरी बांहों में थी ! जो मकतूला के पिता की हालिया माशूक थी । लखनऊ वाया सहारनपुर कत्ल से उसका ताल्कुक बनता था ।

क्या वो कातिल हो सकती थी ?

खामखाह !

कत्ल के वक्त के आसपास तो वो शोला बनी युयर्स ट्रूली को नख से सिख तक सेंक रही थी ।

कातिल वो भले ही नहीं हो सकती थी लेकिन कत्ल से उसका - दूरदराज का या नजदीकी - कोई रिश्ता तोशनीवाल से उसकी डोर जुड़ी होने की वजह से फिर भी हो सकता था ।

देखेंगे ।
 
“कत्ल के वक्त तुम कहां थे ?” - मैंने गया सवाल किया ।

“मुझे क्या मालुम ?” - वो सहज भाव से बोला ।

“क्या बोला ?”

“मुझे तो मालूम नहीं कत्ल का वक्त...”

“काफी सयाने हो !”

“...फिर कैसे बताऊं उस वक्त मैं कहां था !”

“कल शाम को कहां थे ?”

“यहीं था । कल मैंने शाम की या रात की किसी भी घड़ी घर से बाहर कदम नहीं रखा था । कल नौकरों की छुट्टी थी इसलिये मेरे पर वैसे ही जिम्मेदारी बनती थी कि मैं यहां से कहीं न जाता । यहां से बाहर भी कदम न रखता ।”

“काफी जिम्मेदार आदमी हो !”

“आपने मेरे से और कुछ पूछना है ?”

“नहीं । सहयोग का शुक्रिया देवीलाल । अब जाओ और लड़के को यहां भेज दो ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया और उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ा ।

खामोशी से मैं उसे जाता देखता रहा ।

दरवाजे पर पहुंच कर उसका हाथ हैंडल पर पड़ा ।

“सुरभि का पिता कौन था ?”

उसका हाथ जैसे हैंडल पर फ्रीज हो गया । पीठ पीछे से भी मुझे लगा जैसे उसका शरीर धनुष की तरह तन गया हो ।

बड़े यत्न से वो वापिस घूमा ।

“क्या फरमाया ?” - उसने पूछा ।

उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे लेकिन वो ड्रामा हो सकता था ।

“सुरभि के पिता के बारे में पूछा” - मैं बोला - “कौन था ?”

“तोशनीवाल साहब थे ।”

“पक्की बात ?”

“कैसी बातें करते हैं आप ! और कौन होता ?”

“तुम सुरभि को जन्म से जानते हो, तुम बताओ ।”

“तोशनीवाल साहब उसके पिता थे ।”

“ठीक है, जाओ ।”

उसके जाते ही शिशिर तोशनीवाल स्टडी में पहुंचा ।

पिछली रात की बाबत उसने वही कहा जो वो पहले कह चुका था - सारी रात चली रेव पार्टी में था ।

मैंने उससे जिद करके पूछा, पुलिस के नाम से डराया, बोला, वही सवाल पुलिस डण्डे से पूछेगी लेकिन वो पार्टी के मुकाम की बाबत कुछ बताने को तैयार न हुआ । बोला, टॉप सीक्रेसी उसमें शामिल होने की पहली शर्त थी । ऐसी पार्टियों पर बाद में भी कार्यवाही हो जाती थी, ड्रग्स बरामद हो जायें तो व्यापक पकड़ धकड़ होती थी - ऐसी कि जमानत नहीं होती थी ।

मैंने पुरजोर लहजे से कहा कि वो साबित करके दिखाता कि पिछली रात वो कत्ल के मौकायवारदात पर नहीं हो सकता था ।

तब उसने सीक्रेसी के वादे पर पार्टी में उसके साथ शामिल अपने जैसे दो युवकों के नाम और मोबाइल नम्बर बताये । मैंने दोनों को फोन लगाया, दोनों से अलग अलग जवाब मिला कि पिछली रात आठ बजे से सुबह छ: बजे तक शिशिर गुड़गांव में उनके साथ था ।

पार्टी की जगह का पता बताने से उन्होंने भी इंकार कर दिया ।

“घर से कितने बजे निकले थे ?” - मैंने पूछा ।

“साढ़े छ: बजे ।” - वो बोला ।

“सीधे पार्टी में गये थे ?”

“और कहां जाता ? एक ही तो काम था मुझे पिछली रात जिसके लिये मैं निकला था ।”

“छतरपुर के लिये डाईवर्शन कर लेते तो भी टाइम पर ही मुकाम पर पहुंचते !”

“डाईवर्शन ! किसलिये ?”

“कत्ल के लिये ।”

“गॉड ! यू आर टाकिंग नानसेंस ! मैं भला क्यों अपनी बहन का कत्ल करूंगा ?”

“वजह तुम बताओ ।”

“वजह न कोई है, न हो सकती है । फिर सौ बातों की एक बात ! मुझे क्या सपना आना था कि सुबह की घर से निकली सुरभि शाम को फार्महाउस पर थी !”

“तुम सुबह तक टुन्न थे । ऐसा क्यों ?”

“बोला न, पार्टी सारी रात चली थी ।”

“रेव पार्टी ! जिसमें ड्रग्स की प्रधानता होती है !”

“हां ।”

“तुम ड्रग्स नहीं लेते ?”

“हैवी ड्रग्स नहीं लेता । हेरोइन, कोकीन, एस्टेसी वगैरह से दूर रहता हूं लेकिन ऐसी पार्टी हो तो हशीश का सूटा बराबर लगाता हूं ।”

“हशीश यानी कि चरस ?”

“हां ।”

“साथ में विस्की ?”

“आई हैव नो प्राब्लम ।”

“घर तो गिरते पड़ते पहुंचे !”

“वहम है तुम्हारा । कार चला के आया कि नही आया !”

“क्या पता कहां से आये !”

“कहां से आया ! अभी बात कराई नहीं मैंने तुम्हारी दो जनों से कन्फर्मेशन के लिये कि कहां से आया !”

“हमउम्र दोस्त, चरसी दोस्त, बेवड़े दोस्त सिखाये पढाये जा सकते हैं ।”

“गो टु हैल !” - वो उछल कर खड़ा हुआ - “आई एम नाट आनसरेबल टु यू । बहुत लिहाज कर लिया मैंने तुम्हारा । आई एम लीविंग ।”

“आई डोंट माइंड । अपने पापा को बोलना जरा यहां आयें ।”

वो चला गया ।

पीछे मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया जिसकी कि मुझे बहुत अरसे से तलब लग रही थी ।

निशां मिलता है कातिल का - मैं बड़बड़ाया - मगर कातिल नहीं मिलता ।

सिग्रेट अभी आधा खत्म हुआ था कि शिव मंगल तोशनीवाल ने भीतर कदम रखा ।

मैंने सिग्रेट को टेबल पर पड़ी ऐश ट्रे में झोंका और उठने का उपक्रम किया ।

“सारी, सर ।” - मैं बोला - “मैं आपकी चेयर पर बैठा हूं ।”

“नैवर माइंड ।” - वो बोला - “मेहमान हो, मेहमान चेयर पर क्या, सिर माथे ।”

“जबरदस्ती का मेहमान ।”

“फिर भी । कीप सिटिंग । प्लीज ।”

मैं वापिस कुर्सी पर ढ़ेर हुआ, वो मेरे सामने एक विजिटर्स चेयर पर बैठ गया ।

“बोलो” - फिर बोला - “क्या चाहते हो ?”

“कल शाम की अपनी मूवमेंट्स बयान कीजिये ।” - फिर मैंने भी उसकी तरह जोड़ा - “प्लीज ।”

उसने अपलक मेरी तरफ देखा ।

मैंने भी मैच करती निगाह से उसकी तरफ देखा ।

“ये ऑफेंस लेने लायक सवाल नहीं है ।” - फिर बोला - “न ही आप इस बात से बेखबर हैं कि मैं आपसे क्या पूछने वाला था ।”

उसकी भवें उठीं ।

“ये नहीं हो सकता कि इस बाबत आपने अपने मुलाजिम से, अपने बेटे से, कुछ न दरयाफ्त किया हो । सो, देयर ।”
 
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