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“अरी, ईडियट, ये वन स्माल स्टैप है । उसके बाद जायंट लीप देखना ।”
“जायंट लीप क्या ?”
“ट्रिपपलेट्स ! लाइक फराह खान ! विद इन ए ईयर ।”
“अब बस कीजिये ।”
“बस भी करेंगे । घोड़ी भी करेंगे । बैंड भी करेंगे...”
“मैं बंद कर रही हूं ।”
“खबरदार !”
“तो फिर मतलब की बात कीजिये ।”
“सुबह मैंने मुझे एक काम बताया था...”
“वो भुस के ढ़ेर में सूई तलाश करने जैसा ?”
“वही । किया ?”
“किया । एक्स्ट्रा वेजिज की खातिर किया ।”
“मेरी खातिर, फर्म की खातिर, नहीं किया ?”
“आपकी खातिर अपने आप हो गया । समझिये, एक पंथ दो काज । समझ गये न ?”
“कहां ! मेरे में कहां रखी है इतनी अक्ल !”
“वही तो । मुझे मालूम था कि एक न एक दिन आप ये बात अपनी जुबानी कुबूल कर ही लेंगे ।”
“क्या ? ये कि मुझे अक्ल नहीं है ?”
“कहां रखी है । रख के भूल गये न !”
“अब बस कर ।”
“बस भी । डोली भी । विदा भी...”
“अब मेरी जुबान बोल रही है !”
“अनजाने में हो जाती है ये खता । आखिर तमाम बेहूदा बातें आप से ही सीखी हूं ।”
“अब हूदा बात कर, मर ।”
“हूदा ।”
“जो बे के बिना हो ।”
“अच्छा वो ! ठीक है, सुनिये । आपको जान कर खुशी होगी कि मैं भुस के ढ़ेर में से सूई तलाश कर ली थी ।”
“गुड !”
“वैसे तो ये मुहावरा ही गलत है ।”
“अच्छा !”
“हां । भुस के ढ़ेर को आग लगाओ, राख को छान लो, सूई हो गयी तलाश !”
“मैं होल्ड कर रहा हूं, शाम तक असल बात पर पहुंच जाये तो अहसान मानूंगा तेरा ।”
“सर, वो टैम्पो वाला मैंने तलाश कर लिया था” - तत्काल वो संजीदा हुई - “और बैटर न्यूज ये है कि उसे उस डेढ़ बांह वाले आदमी की याद थी जिसकी बाबत कि आपका सवाल था । पिछली रात अंधेरिया मोड़ से छतरपुर के लिये उसके ग्रामीण सेवा टैम्पो का जो अकेला पैसेंजर था इसलिये सारे रास्ते उसके साथ बतियाता रहा था ।”
“क्या कहता रहा था ?”
“कुछ नहीं । ड्राइवर कहता है कि ‘बेफिजूल की बातें करता रहा था’ । घूंट लगाये जान पड़ता था इसलिये जुबान को लगाम नहीं थी । ड्राइवर आजिज था उससे, कहता था तकरीबन बातों पर तो उसने कान ही नहीं दिया था ।”
“क्योंकि उसने अपने लिये एलीबाई गढ़नी थी, क्योंकि वो चाहता था कि ड्राइवर को वो याद रह जाये ।”
“अगर ये बात थी, सर, तो उसका मिशन कामयाब था । नहीं ?”
“हां । वो कहता था सिनेमा देख कर रात ग्यारह बजे लौटा था, यानी ठीक कहता था !”
“सर, आम लेने निकली को अमरूद भी मिल गया था ।”
“क्या मतलब ?”
“वो ड्राइवर कहता है कि शाम को साढ़े छ: बजे के करीब भी वैसा ही एक आदमी अंधेरिया मोड़ से उस फार्महाउस तक उसके टैम्पो पर गया था । वो भी इत्तफाक से उसके टैम्पो का अकेला पैसेंजर था ।”
“होगा । जब उसका काम ही पैसेंजर ढ़ोना है...तूने कहा वैसा ही आदमी ! क्या मतलब है तेरा ? उसकी भी एक बांह दूसरी बांह से छोटी थी - तेरी जुबान में वो भी डेढ़ बांह वाला था ?”
“नहीं ।”
“तो फिर उसका जिक्र किसलिये ?”
“इसलिये कि ड्राइवर उससे वाकिफ था, उसको बाईनेम जानता था ।”
“नाम बोल !”
“देवीलाल ।”
“क्या !”
“देवीलाल । सुनाई नहीं दिया, सर्र, कान में मक्खी तो नहीं घुस गयी ?”
देवीलाल कामन नाम था ।
“आगे बढ़ ।” - मैं तनिक उतावले स्वर में बोला - “और क्या बोला ड्राइवर ?”
“बोला, जब उसने पहली बार उसके साथ सफर किया था और अपना नाम बताया था तो गर्व से ये भी बताया था कि वो बहुत बड़े आदमी का - उसका कि जिसका वो फार्महाउस था जिस पर कि वो उतरता था - बटलर था ।”
“उतरता था ! अक्सर ?”
“हां । ड्राइवर कहता है कई बार उसने उसके टैम्पो में वो सफर किया था ।”
“कल का क्या कहता है ? वापिस भी लौटा था उसके टैम्पो पर ?”
“नहीं । सर, मेरी मनुहार पर उसने उस अड्डे के और ड्राइवर्स से पूछताछ की थी । उस अड्डे के सारे ड्राइवर देवीलाल की सूरत से वाकिफ थे और सबका कहना था कि कोई उसे वापिस नहीं लाया था ।”
“टैम्पो कब तक चलते हैं ?”
“बारह बजे तक ।”
“वो लौटा कैसे होगा ?”
“दो ही तरीके हैं । या तो किसी प्राइवेट व्हीकल से लिफ्ट हासिल की होगी या ढेर पैदल चला होगा - वहां तक जहां से कि नाइट सर्विस की बस मिल जाती, या ऑटो मिल जाता, टैक्सी मिल जाती ।”
“हूं ।”
“खबरें खत्म हुईं । कल इसी चैनल पर इसी वक्त फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिये रजनी शर्मा को आज्ञा दीजिये । नमस्कार ।”
“नहीं नमस्कार । रुक अभी ।”
“अब क्या है ?”
“एक काम और है ।”
“और काम ?”
“हां । कोई प्राब्लम ?”
“प्राब्लम तो कोई नहीं, सर्र, लेकिन पहले - सैटिस्फैक्ट्रिली एग्जिक्यूटिड - काम की एक्स्ट्रा वेजिज की तो कोई घोषणा सुनाई दे जाती !”
“तू क्या चाहती है ?”
“पहले बताइये, क्लायंट के लिये धक्के खा रहे हैं न !”
“क्या बोला ?”
“सॉरी ! क्लायंट के लिये ही काम कर रहे हैं न !”
“हां ।”
“फीस मिल गयी ?”
“हां ।”
“उसकी किसी परसेंटेज की घोषणा कीजिये ।”
“की ।”
“क्या “
“हंड्रेड पर्सेंट ।”
“सर, बंदी की डिमांड एक्स्ट्रा वेजिज की थी, रिश्वत की नहीं थी ।”
ऐसी ही भली लड़की थी रजनी ।
“जायंट लीप क्या ?”
“ट्रिपपलेट्स ! लाइक फराह खान ! विद इन ए ईयर ।”
“अब बस कीजिये ।”
“बस भी करेंगे । घोड़ी भी करेंगे । बैंड भी करेंगे...”
“मैं बंद कर रही हूं ।”
“खबरदार !”
“तो फिर मतलब की बात कीजिये ।”
“सुबह मैंने मुझे एक काम बताया था...”
“वो भुस के ढ़ेर में सूई तलाश करने जैसा ?”
“वही । किया ?”
“किया । एक्स्ट्रा वेजिज की खातिर किया ।”
“मेरी खातिर, फर्म की खातिर, नहीं किया ?”
“आपकी खातिर अपने आप हो गया । समझिये, एक पंथ दो काज । समझ गये न ?”
“कहां ! मेरे में कहां रखी है इतनी अक्ल !”
“वही तो । मुझे मालूम था कि एक न एक दिन आप ये बात अपनी जुबानी कुबूल कर ही लेंगे ।”
“क्या ? ये कि मुझे अक्ल नहीं है ?”
“कहां रखी है । रख के भूल गये न !”
“अब बस कर ।”
“बस भी । डोली भी । विदा भी...”
“अब मेरी जुबान बोल रही है !”
“अनजाने में हो जाती है ये खता । आखिर तमाम बेहूदा बातें आप से ही सीखी हूं ।”
“अब हूदा बात कर, मर ।”
“हूदा ।”
“जो बे के बिना हो ।”
“अच्छा वो ! ठीक है, सुनिये । आपको जान कर खुशी होगी कि मैं भुस के ढ़ेर में से सूई तलाश कर ली थी ।”
“गुड !”
“वैसे तो ये मुहावरा ही गलत है ।”
“अच्छा !”
“हां । भुस के ढ़ेर को आग लगाओ, राख को छान लो, सूई हो गयी तलाश !”
“मैं होल्ड कर रहा हूं, शाम तक असल बात पर पहुंच जाये तो अहसान मानूंगा तेरा ।”
“सर, वो टैम्पो वाला मैंने तलाश कर लिया था” - तत्काल वो संजीदा हुई - “और बैटर न्यूज ये है कि उसे उस डेढ़ बांह वाले आदमी की याद थी जिसकी बाबत कि आपका सवाल था । पिछली रात अंधेरिया मोड़ से छतरपुर के लिये उसके ग्रामीण सेवा टैम्पो का जो अकेला पैसेंजर था इसलिये सारे रास्ते उसके साथ बतियाता रहा था ।”
“क्या कहता रहा था ?”
“कुछ नहीं । ड्राइवर कहता है कि ‘बेफिजूल की बातें करता रहा था’ । घूंट लगाये जान पड़ता था इसलिये जुबान को लगाम नहीं थी । ड्राइवर आजिज था उससे, कहता था तकरीबन बातों पर तो उसने कान ही नहीं दिया था ।”
“क्योंकि उसने अपने लिये एलीबाई गढ़नी थी, क्योंकि वो चाहता था कि ड्राइवर को वो याद रह जाये ।”
“अगर ये बात थी, सर, तो उसका मिशन कामयाब था । नहीं ?”
“हां । वो कहता था सिनेमा देख कर रात ग्यारह बजे लौटा था, यानी ठीक कहता था !”
“सर, आम लेने निकली को अमरूद भी मिल गया था ।”
“क्या मतलब ?”
“वो ड्राइवर कहता है कि शाम को साढ़े छ: बजे के करीब भी वैसा ही एक आदमी अंधेरिया मोड़ से उस फार्महाउस तक उसके टैम्पो पर गया था । वो भी इत्तफाक से उसके टैम्पो का अकेला पैसेंजर था ।”
“होगा । जब उसका काम ही पैसेंजर ढ़ोना है...तूने कहा वैसा ही आदमी ! क्या मतलब है तेरा ? उसकी भी एक बांह दूसरी बांह से छोटी थी - तेरी जुबान में वो भी डेढ़ बांह वाला था ?”
“नहीं ।”
“तो फिर उसका जिक्र किसलिये ?”
“इसलिये कि ड्राइवर उससे वाकिफ था, उसको बाईनेम जानता था ।”
“नाम बोल !”
“देवीलाल ।”
“क्या !”
“देवीलाल । सुनाई नहीं दिया, सर्र, कान में मक्खी तो नहीं घुस गयी ?”
देवीलाल कामन नाम था ।
“आगे बढ़ ।” - मैं तनिक उतावले स्वर में बोला - “और क्या बोला ड्राइवर ?”
“बोला, जब उसने पहली बार उसके साथ सफर किया था और अपना नाम बताया था तो गर्व से ये भी बताया था कि वो बहुत बड़े आदमी का - उसका कि जिसका वो फार्महाउस था जिस पर कि वो उतरता था - बटलर था ।”
“उतरता था ! अक्सर ?”
“हां । ड्राइवर कहता है कई बार उसने उसके टैम्पो में वो सफर किया था ।”
“कल का क्या कहता है ? वापिस भी लौटा था उसके टैम्पो पर ?”
“नहीं । सर, मेरी मनुहार पर उसने उस अड्डे के और ड्राइवर्स से पूछताछ की थी । उस अड्डे के सारे ड्राइवर देवीलाल की सूरत से वाकिफ थे और सबका कहना था कि कोई उसे वापिस नहीं लाया था ।”
“टैम्पो कब तक चलते हैं ?”
“बारह बजे तक ।”
“वो लौटा कैसे होगा ?”
“दो ही तरीके हैं । या तो किसी प्राइवेट व्हीकल से लिफ्ट हासिल की होगी या ढेर पैदल चला होगा - वहां तक जहां से कि नाइट सर्विस की बस मिल जाती, या ऑटो मिल जाता, टैक्सी मिल जाती ।”
“हूं ।”
“खबरें खत्म हुईं । कल इसी चैनल पर इसी वक्त फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिये रजनी शर्मा को आज्ञा दीजिये । नमस्कार ।”
“नहीं नमस्कार । रुक अभी ।”
“अब क्या है ?”
“एक काम और है ।”
“और काम ?”
“हां । कोई प्राब्लम ?”
“प्राब्लम तो कोई नहीं, सर्र, लेकिन पहले - सैटिस्फैक्ट्रिली एग्जिक्यूटिड - काम की एक्स्ट्रा वेजिज की तो कोई घोषणा सुनाई दे जाती !”
“तू क्या चाहती है ?”
“पहले बताइये, क्लायंट के लिये धक्के खा रहे हैं न !”
“क्या बोला ?”
“सॉरी ! क्लायंट के लिये ही काम कर रहे हैं न !”
“हां ।”
“फीस मिल गयी ?”
“हां ।”
“उसकी किसी परसेंटेज की घोषणा कीजिये ।”
“की ।”
“क्या “
“हंड्रेड पर्सेंट ।”
“सर, बंदी की डिमांड एक्स्ट्रा वेजिज की थी, रिश्वत की नहीं थी ।”
ऐसी ही भली लड़की थी रजनी ।