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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“अरी, ईडियट, ये वन स्माल स्टैप है । उसके बाद जायंट लीप देखना ।”

“जायंट लीप क्या ?”

“ट्रिपपलेट्स ! लाइक फराह खान ! विद इन ए ईयर ।”

“अब बस कीजिये ।”

“बस भी करेंगे । घोड़ी भी करेंगे । बैंड भी करेंगे...”

“मैं बंद कर रही हूं ।”

“खबरदार !”

“तो फिर मतलब की बात कीजिये ।”

“सुबह मैंने मुझे एक काम बताया था...”

“वो भुस के ढ़ेर में सूई तलाश करने जैसा ?”

“वही । किया ?”

“किया । एक्स्ट्रा वेजिज की खातिर किया ।”

“मेरी खातिर, फर्म की खातिर, नहीं किया ?”

“आपकी खातिर अपने आप हो गया । समझिये, एक पंथ दो काज । समझ गये न ?”

“कहां ! मेरे में कहां रखी है इतनी अक्ल !”

“वही तो । मुझे मालूम था कि एक न एक दिन आप ये बात अपनी जुबानी कुबूल कर ही लेंगे ।”

“क्या ? ये कि मुझे अक्ल नहीं है ?”

“कहां रखी है । रख के भूल गये न !”

“अब बस कर ।”

“बस भी । डोली भी । विदा भी...”

“अब मेरी जुबान बोल रही है !”

“अनजाने में हो जाती है ये खता । आखिर तमाम बेहूदा बातें आप से ही सीखी हूं ।”

“अब हूदा बात कर, मर ।”

“हूदा ।”

“जो बे के बिना हो ।”

“अच्छा वो ! ठीक है, सुनिये । आपको जान कर खुशी होगी कि मैं भुस के ढ़ेर में से सूई तलाश कर ली थी ।”

“गुड !”

“वैसे तो ये मुहावरा ही गलत है ।”

“अच्छा !”

“हां । भुस के ढ़ेर को आग लगाओ, राख को छान लो, सूई हो गयी तलाश !”

“मैं होल्ड कर रहा हूं, शाम तक असल बात पर पहुंच जाये तो अहसान मानूंगा तेरा ।”

“सर, वो टैम्पो वाला मैंने तलाश कर लिया था” - तत्काल वो संजीदा हुई - “और बैटर न्यूज ये है कि उसे उस डेढ़ बांह वाले आदमी की याद थी जिसकी बाबत कि आपका सवाल था । पिछली रात अंधेरिया मोड़ से छतरपुर के लिये उसके ग्रामीण सेवा टैम्पो का जो अकेला पैसेंजर था इसलिये सारे रास्ते उसके साथ बतियाता रहा था ।”

“क्या कहता रहा था ?”

“कुछ नहीं । ड्राइवर कहता है कि ‘बेफिजूल की बातें करता रहा था’ । घूंट लगाये जान पड़ता था इसलिये जुबान को लगाम नहीं थी । ड्राइवर आजिज था उससे, कहता था तकरीबन बातों पर तो उसने कान ही नहीं दिया था ।”

“क्योंकि उसने अपने लिये एलीबाई गढ़नी थी, क्योंकि वो चाहता था कि ड्राइवर को वो याद रह जाये ।”

“अगर ये बात थी, सर, तो उसका मिशन कामयाब था । नहीं ?”

“हां । वो कहता था सिनेमा देख कर रात ग्यारह बजे लौटा था, यानी ठीक कहता था !”

“सर, आम लेने निकली को अमरूद भी मिल गया था ।”

“क्या मतलब ?”

“वो ड्राइवर कहता है कि शाम को साढ़े छ: बजे के करीब भी वैसा ही एक आदमी अंधेरिया मोड़ से उस फार्महाउस तक उसके टैम्पो पर गया था । वो भी इत्तफाक से उसके टैम्पो का अकेला पैसेंजर था ।”

“होगा । जब उसका काम ही पैसेंजर ढ़ोना है...तूने कहा वैसा ही आदमी ! क्या मतलब है तेरा ? उसकी भी एक बांह दूसरी बांह से छोटी थी - तेरी जुबान में वो भी डेढ़ बांह वाला था ?”

“नहीं ।”

“तो फिर उसका जिक्र किसलिये ?”

“इसलिये कि ड्राइवर उससे वाकिफ था, उसको बाईनेम जानता था ।”

“नाम बोल !”

“देवीलाल ।”

“क्या !”

“देवीलाल । सुनाई नहीं दिया, सर्र, कान में मक्खी तो नहीं घुस गयी ?”

देवीलाल कामन नाम था ।

“आगे बढ़ ।” - मैं तनिक उतावले स्वर में बोला - “और क्या बोला ड्राइवर ?”

“बोला, जब उसने पहली बार उसके साथ सफर किया था और अपना नाम बताया था तो गर्व से ये भी बताया था कि वो बहुत बड़े आदमी का - उसका कि जिसका वो फार्महाउस था जिस पर कि वो उतरता था - बटलर था ।”

“उतरता था ! अक्सर ?”

“हां । ड्राइवर कहता है कई बार उसने उसके टैम्पो में वो सफर किया था ।”

“कल का क्या कहता है ? वापिस भी लौटा था उसके टैम्पो पर ?”

“नहीं । सर, मेरी मनुहार पर उसने उस अड्डे के और ड्राइवर्स से पूछताछ की थी । उस अड्डे के सारे ड्राइवर देवीलाल की सूरत से वाकिफ थे और सबका कहना था कि कोई उसे वापिस नहीं लाया था ।”

“टैम्पो कब तक चलते हैं ?”

“बारह बजे तक ।”

“वो लौटा कैसे होगा ?”

“दो ही तरीके हैं । या तो किसी प्राइवेट व्हीकल से लिफ्ट हासिल की होगी या ढेर पैदल चला होगा - वहां तक जहां से कि नाइट सर्विस की बस मिल जाती, या ऑटो मिल जाता, टैक्सी मिल जाती ।”

“हूं ।”

“खबरें खत्म हुईं । कल इसी चैनल पर इसी वक्त फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिये रजनी शर्मा को आज्ञा दीजिये । नमस्कार ।”

“नहीं नमस्कार । रुक अभी ।”

“अब क्या है ?”

“एक काम और है ।”

“और काम ?”

“हां । कोई प्राब्लम ?”

“प्राब्लम तो कोई नहीं, सर्र, लेकिन पहले - सैटिस्फैक्ट्रिली एग्जिक्यूटिड - काम की एक्स्ट्रा वेजिज की तो कोई घोषणा सुनाई दे जाती !”

“तू क्या चाहती है ?”

“पहले बताइये, क्लायंट के लिये धक्के खा रहे हैं न !”

“क्या बोला ?”

“सॉरी ! क्लायंट के लिये ही काम कर रहे हैं न !”

“हां ।”

“फीस मिल गयी ?”

“हां ।”

“उसकी किसी परसेंटेज की घोषणा कीजिये ।”

“की ।”

“क्या “

“हंड्रेड पर्सेंट ।”

“सर, बंदी की डिमांड एक्स्ट्रा वेजिज की थी, रिश्वत की नहीं थी ।”

ऐसी ही भली लड़की थी रजनी ।
 
नहीं जानती थी किए भलमंसगी और वरजिनिटी दोनों ही अर्बन सोसायटी में आउट आफ फैशन हो चुकी थीं ।

“ओके, ओके ।” - मैं बोला - “उस बाबत हम फिर बात करेंगे, अभी सुन तूने और क्या करना है ।”

“बोलिये !”

“एम्प्लायर को बोलिये नहीं, फरमाइये कहते हैं लेकिन खैर, सुन । पीवीआर, साकेत जाना है...”

आगे मैंने उसे शिव मंगल तोशनीवाल की एलीबाई के बारे में बताया और बोला उसने वहां उस एलीबाई को क्रॉसचैक करना था ।

“शिव मंगल तोशनीवाल बड़ा बिजनेसमैन है, वीवीआईपी है, गूगल पर उसके नाम पर सर्च मारना, बमय तस्वीर तमाम बायोडाटा सामने आ जाएगा । तस्वीर का प्रिंटआउट निकाल लेना, पूछताछ में काम आएगा ।”

“आप तो बच्चे पढ़ा रहे हैं !”

“तुझे कौन पढ़ा सकता है !” - मैंने आह सी भरी - “तू तो आलम फाजिल है । बंद करता हूं ।”

मैंने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया ।

***

मैं वसंत कुंज पहुंचा ।

मुझे उम्मीद थी कि तोशनीवाल घर पर होगा, मेरी उम्मीद पूरी हुई ।

कोठी के पिछवाड़े में एक लॉन था जहां बैठा वो धूप सेंक रहा था और सिगार के कश लगा रहा था ।

उसका कुत्ता उसके कदमों में लेटा हुआ था जिसने मेरी आमद पर पंजों पर से सिर उठाया, शायद मुझे पहचाना और फिर कुनमुनाते हुए सिर झुका लिया ।

मैंने करीब पहुंच कर उसका अभिवादन किया ।

मुझे देख कर उसकी भवें उठी, फिर उसने एक करीबी, खाली कुर्सी की ओर इशारा किया ।

“थैंक्यू ।”

“कैसे आये ?”

“बेटी की क्या खबर है ?”

“पोस्टमार्टम अभी तक नहीं हुआ । मालूम पड़ा है दोपहरबाद होगा । फिर लाश की सुपुर्दगी । फिर...विदा ।”

उसने सिगार का लम्बा कश खींचा ।

“आई सी ।”

“तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया !”

“देता हूं । सपना टाहिलियानी को जानते हैं ?”

“जो सिद्धार्थ एन्क्लेव में रहती है ?”

“हां ।”

“जानता हूं । श्यामली की फ्रेंड है । क्यों पूछ रहे हो ?”

“उसका कत्ल हो गया है ।”

“क्या !” - वो सम्भल कर बैठा उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये - “कब ?”

“आज सुबह । अर्ली इन दि मार्निंग ।”

“गॉड ! गॉड ! ये क्या हो रहा है ! किसने किया ?”

“अभी मालूम नहीं ।”

“उसी ने ?”

“उसी ने किसने ?”

“सुजित त्रेहन ने ?”

“अभी मालूम नहीं । सुजित त्रेहन का नाम क्यों लिया आपने ? सपना टाहिलियानी का कभी कोई कांटैक्ट था उसके साथ ?”

“नेपाल में था न !”

“कैसे ?”

“भई, मैंने बोला न, श्यामली की फ्रेंड थी । श्यामली की फ्रेंड थी इसलिये फैमिली फ्रेंड थी । इसलिये सुजित त्रेहन से वाकिफ थी ।” - उसने एक क्षण ठिठक कर मेरी तरफ देखा और फिर बोला - “तुम्हारी सूरत से लगता है तुम्हें कोई बात कनफ्यूज कर रही है और मैं समझ रहा हूं वो बात कौन सी है ।”

“जी !”

“श्यामली का जिक्र आता है तो तुम्हारा अनकांशस माईंड भी उसे मेरी पत्नी तसलीम करता है । लेकिन तब श्यामली मेरी नहीं, सुजित त्रेहन की पत्नी थी ।”

“ओह ! ओह ! जनाब, आपने मेरे कनफ्यूजन को बिल्कुल ठीक पहचाना । सच पूछें तो ऐन यही बात थी ।”

वो खामोश रहा, उसने अपने सिगार का कश लगाया ।

“आपको बतौर कातिल सुजित त्रेहन का खयाल क्यों आया ?”

“पता नहीं । यूं ही आ गया बस । वो.. .कातिल हो सकता है सपना का ?”

“अभी कुछ नहीं मालूम । पुलिस को फिलहाल तो ऐसा कोई क्लू नहीं मिला है जिसकी बिना पर उस पर कातिल होने का शक किया जा सकता हो ।”

“आई सी ।”

“अब मैं आप से एकाध ऐसी बात पूछना चाहता हूं जो कि आपकी निजी जिंदगी से ताल्कुक रखती है । मुझे अहसास है कि आम हालात में वैसी किसी बात का जवाब देना आपको कुबूल न होता लेकिन आप जानते हैं - आप से बेहतर कौन जानता है - कि हालात आम नहीं हैं । पहले आपकी बेटी का कत्ल, फिर आपकी नेपाल से वाकिफ महिला का कत्ल...”

“आई अंडरस्टैण्ड । पूछो, क्या पूछना चाहते हो ?”

“सुरभि आपकी बेटी थी ?”

उसके चेहरे ने कई रंग बदले, वो आंदोलित दिखाई देने लगा ।

“औलाद के मामले में” - मैं जल्दी से बोला - “मां से ज्यादा प्रमाणिक बात कोई नहीं कर सकता । और ये मैडम का बयान है कि सुरभि असल में सुजित त्रेहन की बेटी है । आपका खास सर्वेंट देवीलाल दावा करता है वो आपकी बेटी है । आप क्या कहते हैं ?”

“तुमने ठीक कहा इन मामलों में अथारिटी मां ही होती है । जो श्यामली कहती है, वही ठीक है । सुरभि सुजित त्रेहन की बेटी थी । देवीलाल सर्वेंट है, उसने तो उसी बात पर यकीन करना हुआ जो कि आंखों को दिखाई देती है । ऐसी गम्भीर बात में कौन सर्वेंट को कंफीडेंस में लेता है ! फिर हमारी निगाह में मेरे और श्यामली के अलावा इस बात की किसी को खबर नहीं थी, देवीलाल को कैसे होती !”

“आप बताइये !”

“नहीं थी । नहीं हो सकती थी । तभी तो उसने कहा कि वो मेरी बेटी थी ।”

“वो इस वक्त कहां है ?”

जो जवाब हासिल होने की मैं अपेक्षा कर रहा था, वो न हुआ ।

“वो तुम्हारे पीछे चला आ रहा है ।” - तोशनीवाल बोला - “चाय लाया है मेरे लिये ।”

मैंने घूम कर पीछे देखा तो देवीलाल मुझे चाय की ट्रे सम्भाले उधर आता दिखाई दिया ।

उसने ट्रे को एक करीबी टेबल पर रखा और वापिस जाने को हुआ तो मैंने उसे टोका - “रुको अभी ।”

देवीलाल ठिठका, उसकी प्रश्नसूचक निगाह मेरी तरफ उठी ।

“तुमने मुझे बताया नहीं कि कल तुम छतरपुर गये थे !”

वो सकपकाया ।

“वो भी कत्ल के वक्त के आसपास । शाम छ: और सात बजे के बीच !”

उसके गले की घंटी जोर से उछली ।

“जवाब दो !” - मैं डपट कर बोला ।

“क - कौन कहता है ?”

“अंधे हो ! देख नहीं सकते कौन कहता है !”

उसका शरीर जोर से कांपा, जोर से उसने थूक निगली ।

“जवाब दे !” - तोशनीवाल क्रूर स्वर में बोला - “अगर तेरा सुरभि के कत्ल से कोई रिश्ता निकला तो, देवीलाल” - तोशनीवाल ने दांत किटकिटाये - “तेरी खैर नहीं ।”

“मेरा कोई रिश्ता नहीं, साहब ।” - देवीलाल कांपती आवाज में बोला ।

“छतरपुर गया था ?”

“हां । लेकिन कत्ल के बाद । सात बजे के करीब ।”

“क्यों ? क्यों गया था ?”

“आपको तो, साहब, मालूम है क्यों गया था ! कल दिन में जोर से बारिश हुई थी और आंधी जैसा माहौल पैदा हुआ था । ऐसा कुछ होने पर आप ही का हुक्म कि मैं देख के आया करूं कि वहां कोई नुकसान तो नहीं हुआ !”

“ओह ! तो कल इसलिये गये थे ?”

“जी हां ।”

“आगे क्या हुआ था ?”

“मैं मेन डोर को अपनी चाबी से खोल कर भीतर गया था । वहां अंधेरा था । अंधेरे में मैं फर्श पर पड़ी बिटिया की लाश से ठोकर खा गया था । जब मुझे पता चला था कि वहां क्या कांड हुआ था तो मेरे प्राण कांप गये थे । मैं फौरन वहां से निकल लिया था ।”

“क्यों ?” - मैं उसे घूरता बोला - “मालिक की बेटी मरी पड़ी पायी, तुम्हें वहां से भाग खड़ा होना चाहिये था ! मालिक को खबर की होती ! पुलिस को खबर की होती !”

“म - मैं खौफ खाये था । मेरे प्राण गले में अटके हुए थे । मैं पुलिस को खबर करता तो मुझे अंदेशा था कि पुलिस मुझे ही कातिल करार देती ।”
 
“क्यों भला ?”

“मेरा पुलिस रिकार्ड है ।”

“क्यों ?”

“मैं सजायाफ्ता मुजरिम हूं ।”

“क्या किया था ?”

“डकैती में शामिल था ।”

“कब ?”

“साहब की खिदमत में आने से बहुत पहले ।”

“कितनी लगी थी ?”

“पांच साल ।”

“तौबा !”

“जवानी की बात है, साहब । दोस्तों ने गुमराह किया था । गलत सोहबत ने बर्बाद किया था । लेकिन तब से आज तक मक्खी नहीं मारी ।”

“पुलिस को काल न लगाई, साहब को खबर न की तो क्या किया ?”

“भाग निकला । बाहर निकल कर बस ताला वापिस लगाया और सरपट भागा ।”

“पीछे कितनी देर ठहरे ?”

“दो मिनट । बड़ी हद तीन मिनट ।”

मैंने अपलक उसकी तरफ देखा ।

“मेरा यकीन कीजिये, साहब” - वो गिड़गिड़ाता सा बोला - “कत्ल तो बड़ी दूर की बात है, मैं तो बिटिया की कनकी उंगली के नाखून को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था । वो मेरी बेटी के समान थी । साहब” - वो तोशनीवाल की ओर घूमा - “आप तो जानते ही हैं, आप तो मेरा यकीन कीजिये ।”

“पहले पुलिस कर ले” - तोशनीवाल शुष्क स्वर में बोला - “फिर कर लूंगा ।”

“पहुंचे ग्रामीण सेवा टैम्पो पर थे” - मैं बोला - “लौटे भी वैसे ही थे ?”

“हां ।”

मैंने घूरकर उसे देखा ।

“नहीं ।”

“तो ?”

“दहशत में चलता रहा था, चलता रहा था...”

“और यहां पहुंच गये थे ?”

“नहीं । जब मुझे कुतुब दिखाई दिया था तो थमा था । फिर वहां से बस पर सवार हुआ था ।”

“हूं ।”

“स - साहब, अब म ... मेरा...मेरा क्या होगा ?”

“कोई करतूत नहीं की, किसी करतूत की पर्दादारी नहीं कर रहे हो तो कुछ नहीं होगा ।”

“मैंने कुछ नहीं किया, साहब । मैं बेगुनाह हूं ।”

“तो टिक के रहो । कहीं खिसक जाने की, गायब होने की कोशिश की तो बुरी होगी तुम्हारे साथ । ऐसी दुरगत होगी कि पहली, डकैती वाली, दुरगत तुम्हें ऐसी लगेगी जैसे फूल झरे थे ।”

“मैं कहीं नहीं जाऊंगा, साहब, मैं यहीं...”

“जायेगा ।” - तोशनीवाल बोला - “जाना पड़ेगा ।”

“जी !”

“अब तू यहां नहीं रह सकता । अपना सामान समेट और निकल जा यहां से ।”

उसके चेहरे का रहा सहा रंग भी उड़ गया ।

“कमीने ! जानता था सुरभि वहां मरी पड़ी थी फिर भी खामोश रहा !”

“साहब, मेरी मजबूरी थी । मैं पुलिस की जानकारी में आने से हर हाल में बचना चाहता था, सिर्फ इस वजह से...”

“शट अप !”

“मैं कहां जाऊंगा, साहब ! यहां के अलावा मेरा कोई ठिकाना नहीं, कभी बनाने का खयाल तक न किया । जेल से निकलने के बाद से मैं आपके चरणों में पनाह पाये हूं । अब कहां जाऊं ?”

“जहन्नुम में । दूर हो जा मेरी नजरों से ।”

भारी कदमों से वो वहां से लौट चला ।

आंदोलित तोशनीवाल पीछे चाय की ट्रे की तरफ आकर्षित हुआ ।

उसने अपने लिये चाय बनायी और ट्रे को मेरी तरफ सरका दिया ।

मैं अपने लिये चाय बनाने लगा ।

तोशनीवाल ने बायें हाथ से चाय का कप थामा, दायें में थमे सिगार का कश खींचा तो पाया वो बुझ चुका था । झुंझलाते हुए उसने चाय का कप नीचे रखा, सिगार फिर सुलगाया, उसका लम्बा कश लगा कर उसे ऐश ट्रे के एक खींचे में टिकाया और बायां हाथ बड़ा कर चाय का कप फिर उठा लिया ।

मैं अपलक उसे देख रहा था ।

“क्या देखते हो ?” - वो बोला ।

“कुछ नहीं ।” - मैं बोला - “सोच रहा था आप फारिग हों तो कुछ अर्ज करूं ?”

“क्या कहना चाहते हो ?”

“मेरी राय में अभी देवीलाल को न निकालिये । ये निकल गया तो मुमकिन है दोबारा हाथ ही न आये । जब तक तफ्तीश जारी है, तब तक इसका उपलब्ध रहना जरूरी है । सर, आई होप यू अडरस्टैंड माई पॉइंट ।”

उसने तनिक हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया ।

“तो उसे रोकिये । बोलिये रुकने को ।”

“जरूरत नहीं । पालतू कुत्ता है । ऐसे ही नहीं चला जाने वाला ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“ठीक है फिर । फिर भी उसकी बाबत पुलिस को खबर करना जरूरी है । आखिर उसने एक बड़ी बात छुपा कर रखी है । इस सिलसिले में उसकी पसंद नापसंद को खातिर में नहीं लाया जा सकता ।”

“करो ।”

“जमा, हो सकता है पुलिस फिलहाल उसको बिना छेड़े उसकी निगरानी कराना चाहे !”

“जो मुनासिब लगता है, करो ।”

मैं मोबाइल निकाल कर यादव को फोन करने लगा ।

तोशनीवाल ने चाय की चुस्की ली और सिगार फिर उठा लिया ।

टेलीफोन से फारिग होकर मैंने नया सवाल किया - “मेरे यहां दो फेरों के बीच क्या देवीलाल यहां से निकल कर कहीं गया था ?”

“मालूम नहीं ।” - उसने जवाब दिया - “यहां और भी नौकर हैं जो कल छुट्टी पर थे लेकिन आज तुम्हारे जाने के बाद लौट आये थे । इस वजह से मेरा ध्यान देवीलाल की तरफ नहीं गया था । पंद्रह मिनट पहले वो चाय पूछने यहां आया था, उससे पहले और तुम्हारे यहां पहले फेरे के बाद वो कोठी में था या नहीं, मुझे नहीं मालूम ।”

“मैडम के बारे में क्या कहते हैं ? यहां आने के बाद फिर कहीं गयी थी ?”

“हां । दो घंटे पहले मेरी कार ले कर निकली थी । कहां जा रही थी, न मैंने पूछा था, न उसने बताया था ।”

“अभी लौटी नहीं ?”

“मेरे खयाल से तो नहीं ! लौटी होती तो यहां कार की आवाज मुझे सुनाई दी होती ।”

“आई सी ।”

“तुम...कहीं सपना के कत्ल के साथ उसका रिश्ता जोड़ने की कोशिश तो नहीं कर रहे हो ?”

“आपको ऐसी कोई गुंजायश दिखाई देती है ?”

“नहीं, बिल्कुल नहीं । श्यामली के सपना से बड़े मधुर सम्बंध थे । मैं श्यामली की कल्पना सपना के कातिल के तौर पर नहीं कर सकता ।”

“ये आपका बड़प्पन है । मैडम की नेपाल में सपना से वाकफियत कैसे बनी थी ?”

“मुझे नहीं मालूम । तुम्हारे इस सवाल का जवाब श्यामली ही बेहतर दे सकती है, उससे पूछना ।”

“सपना का हसबैंड..”

“नहीं है । डाइवोर्सी है...थी वो ।”

“डाइवोर्स हालिया वाकया है या. ..”

“हालिया नहीं है । नेपाल से ही डाइवोर्सी है...थी । त्रेहन के साथ जो हादसा गुजरा था, उससे भी दो साल पहले से ।”

“कोई आस औलाद ?”

“एक लड़की थी तब आठ साल की जो डाइवोर्स में सपना के - मां के - हिस्से आयी थी ।”

“आई सी । सपना से उसकी जिंदगी में आपकी मुलाकात तो होती रहती होगी !”

“मुलाकात ?”

“गाहे बगाहे ! कभी कभार ! जैसी एक ही शहर में रहते दो वाकिफ बाशिन्दों में मुमकिन होती है ?”

“अच्छा, वो ! हां, भई होती थी । लेकिन होली दीवाली जैसी ही समझो ।”

“कभी उसके घर गये ?”

“सिद्धार्थ एन्क्लेव ?”

“अगर एक से ज्यादा घर न हों तो हां ।”

“एक ही है । नहीं, मैं नहीं गया सिद्धार्थ एन्क्लेव उसके घर कभी ।”

“वजह ?”

“कभी बुलाया नहीं उसने ?”

“मैडम से तो खतोकिताबत भी थी, वो तो आती जाती रहती होंगी !”

“मैडम से पूछना ।”

“मैंने फ्लैट देखा सिद्धार्थ एन्क्लेव वाला । बहुत आलीशान था ।”

“तो ?”

“उसकी आय का साधन क्या था ?”

“भई, सुना है हसबैंड बहुत पैसे वाला था । नेपाल में सैटल्ड बड़ा ट्रांसपोर्टर था, डाइवोर्स सैटलमेंट में मोटा माल मिला होगा !”
 
“जो कि बाइस जमा दो, चौबीस साल से चला आ रहा है ?”

“मुमकिन है । मुझे ये तो नहीं मालूम न कि मोटा माल कितना मोटा था ! माल खुद मोटा हो तो मूल को तो छूना भी नहीं पड़ता, इंटरेस्ट से ही ऐश हो जाती है ।”

“सही फरमाया आपने । सपना की बेटी, जो अब बत्तीस साल की होगी, वो कहां है ?”

“कहां है क्या मतलब ?”

“मां के साथ तो नहीं रहती थी ! मां तो सिद्धार्थ एन्क्लेव वाले फ्लैट में अकेली रहती थी !”

“इन बातों की मुझे कोई खबर नहीं । सपना से मेरी कभी कभार की बहुत मुख्तसर मुलाकात में उसकी बेटी का जिक्र कभी नहीं उठा था ।”

“बेटी, जो आपने दस साल की देखी थी, आज दिखाई दे तो पहचान लेंगे ?”

“उम्मीद नहीं ।”

“ठीक !” - मैंने चाय का कप नीचे रखा और उठ खड़ा हुआ - “इजाजत दीजिये ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

***

मैं नेहरू प्लेस स्थित अपने आफिस पहुंचा ।

आफिस खुला था और रजनी वहां रिसैप्शन पर मौजूद थी ।

पता नहीं लौट भी आयी थी या गयी ही नहीं थी ।

“सर आ गये !” - मेरे पर निगाह पड़ते ही वो हर्षित स्वर में बोली - “कायनात चालू की जाये ।”

मैंने उससे निगाह न मिलाई, उसके सामने से गुजरता मैं भीतर अपने निजी कक्ष में पहुंचा ।

मैं अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर ढ़ेर हुआ और फिर इंटरकाम में भरसक हाई एग्जीक्युटिव के मैनरिज्म नकल करता बोला - “प्लीज, कम इन ।”

“क्यों ?” - रजनी की आवाज आयी ।

“भीतर आ ।”

“क्यों ?”

“बात करनी है ।”

“अभी सामने से गुजर के गये, तब नहीं कर सकते थे ?”

“जुबान लड़ाती । है ! बेअदबी करती है ! हुक्मउदूली करती है !”

फोन बंद हो गया ।

मैं वापिस बजर बजाने ही लगा था कि बीच का दरवाजा खुला और वो चौखट पर प्रकट हुई ।

मैंने रिसीवर वापिस क्रेडल पर रख दिया ।

उसने चौखट से कंधा लगाया और बड़ी नजाकत से एक हाथ अपने कूल्हे पर टिकाया ।

मेरा कलेजा मुंह को आने लगा ।

कितनी खुबसूरत थी !

चेहरे पर गुलाब जैसी ताजगी और कुलीनता की वो चमक थी जो अमूमन उसकी उम्र की दिल्ली की लड़कियों में देखने को नहीं मिलती थी ।

हजार खूबियां थी उसमें । कोई खामी थी तो सिर्फ एक ।

शरीफ लड़की थी ।

इसीलिये चील के घौंसले में मांस की तरह थी, फिर भी सेफ थी ।

“क्या है ?” - वो बोली ।

“क्या है !” - मैं भुनभुनाया - “तुझे नहीं मालूम क्या है ! सोमवार है । चौदह जनवरी है । तेरी मर्जी हुई, तूने इजाजत दी तो कल पंद्रह भी हो जायेगी । परसों सोलह भी...”

वो निचला होंठ दबाकर हंसी ।

दिलफरेब हंसी ।

“क्यों हंसती है ?” - मैं डपट कर बोला ।

“आप हंसाते हैं ।”

“मैं कमेडियन हूं ?”

“नहीं ।”

“शुकर ।”

“इतना टेलेंट कहां है आप में !”

मैंने आंखें तरेर कर उसकी तरफ देखा ।

वो फिर हंसी ।

“अब बोलिये” - फिर संजीदा हुई - “क्या हुक्म है ?”

“याद नहीं रख सकती कुछ ? क्या बोला था मैंने ?”

“क्या बोला था ?”

“बोला था - भीतर आ ।”

“आ तो गयी !”

“चौखट पर खड़ी है - न पता लगता है भीतर है, न पता लगता है बाहर है ।”

उसनै चौखट का आसरा छोड़ा और एक कदम भीतर डाला ।

“अब बोलिये ।” - फिर बोली ।

“इधर आ के मेरी गोद में बैठ ।”

“क्या !”

“और एक पपी दे ।”

“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर !”

“अरे, हाई स्पीड, हाई वोल्टेज पप्पी नहीं, नानफैटनिंग, लो कैलोरी, विटामिन एनरिच्ड पप्पी दे ।”

वो हंसी ।

“अच्छा चल, एक पप्पी आधी आधी कर लेते हैं ।”

“अब बस कीजिये ।”

“तू समझती है मुझे एक मामूली पप्पी से महरूम रख कर तू बहुत बड़ा काम कर रही है ?”

“हां ।”

“क्या हां ?”

“आपको उंगली पकड़ कर पाहुंचा न पकड़ने देने की कोशिश करके बहुत बड़ा काम कर रही हूं ।”

“बहुत होशियारी आ गयी है !”

“आप ही ने सिखाई ।”

“लेकिन अक्ल न आयी । आयी होती तो कोई चाय काफी पूछती ?”

“वो मेहमान से पूछी जाती है, क्लायंट से पूछी जाती है, आप मेहमान हैं ? क्लायंट हैं ?”

“अच्छा, अच्छा ! अब इधर आ के मर ।”

“किधर आ के । आपकी गोद में...”

“अरे, मेरे सामने कुर्सी पर बैठ आ कर ।”

उसने आगे बढ़ के एक विजिटर्स चेयर पर कब्जा किया ।

“क्या कहूं मैं तेरे को ! क्या करूं मैं तेरा ! तेरे को तो मुहब्बत की ए बी सी भी नहीं आती !”

“वो तो है !”

“जब जानती है तो सीखती क्यों नहीं ?”

“क्योंकि मुझे एक्स वाई जैड से डर लगता है ।”

“तेरे को डर लगता है ! दुनिया को डराने वाली तू और तेरे को डर लगता है !”

वो हंसी ।

“अब बोल, क्या हुआ ?”

“अभी कहां से हुआ ! शादी के बाद होगा ।”

“हे भगवान !”

“आ गया न भगवान याद ! ऐसे ही आप मुझे कलपाते हैं ।”

“मेरा मुकाबला करेगी ! बराबरी करेगी !”

“क्या हर्ज है ! गॉड हैज क्रियेटिड आल मैन ईक्वल ।”

“कौन बोला ?”

“अमिताभ बेचैन ।”

“कौन ?”

“सन आफ हरबंस राय बेचैन ।”

“तौबा ! नाम बिगाड़ती है इतने बड़े स्टार का । कम्बख्त, सुनेगा तो घर आ के मारेगा ।”

“मारे ! जब मारने आयेगा तो उसके दर्शन तो हो जायेंगे जिसकी मैं इतनी बड़ी फैन हूं ।”

“सपने देखती रह ।”

वो हंसी ।
 
“तो बिग बी खास तेरे को बोला कि गॉड हैज क्रियेटिड आल मैन ईक्वल ?”

“नहीं । हुआ तो कौम से मुखातिब लेकिन मैंने भी सुना ।”

मैंने जेब से सफेद रुमाल निकाला और उसे झंडी की तरह उसके और अपने बीच लहराने लगा ।

“लगता है सरंडर कर रहे हैं सर्र ।”

“यही बात है । अब रहम खा मेरे पर ।”

वो संजीदा हुई ।

“साकेत गयी थी ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

“पीवीआर से क्या पता लगा ?”

“वही जो आप चाहते थे कि...न लगता ।”

“मतलब ?”

“तोशनीवाल की एलीबाई कनफर्म हुई ।”

“अच्छा !”

“हां । सिनेमा बफ है इसलिये वहां की जानी पहचानी फिगर है । एक उशर ने चार बज कर पांच मिनट पर उसके वहां पहुंचने की और भीतर उस हाल में जा कर बैठने की पक्की तसदीक की है जिसमें ‘इंकार’ दिखाई जा रही थी ऐन स्क्रीनिंग शुरू होने के वक्त वो वहां पहुंचा था ।”

“फिल्म खत्म होने तक वहीं था ?”

“फिल्म का रसिया फिल्म देखने आया बीच में और कहां चला जाता !”

“जवाब दे ।”

वो कुछ क्षण खामोश रही, फिर धीरे से बोली - “इस बात की तसदीक नहीं हुई है ।”

“वजह ! शो खत्म होने पर उशर ने उसे जाते न देखा ?”

“यही बात है । और वजह भी बोलो उसने ।”

“क्या ?”

“दर्शक पहुंचते एक एक, दो दो करके हैं लेकिन फिल्म खत्म होने पर निकलते इकट्ठे हैं । दूसरे, एंट्री पर सिक्योरिटी चैक होता है, टिकट चैक होता है, एग्जिट पर किसी चैक की जरूरत नहीं होती । तीसरे, एंट्री एक ही जगह से होती है, एग्जिट कई होते हैं ।”

“हूं । '

“इजाजत हो तो ये बंदी कुछ अर्ज करे ?”

“क्या कहना चाहती है ?”

“कोई शख्स फर्जी एलीबाई सैट करता है तो इस बात की तरफ खास तवज्जो देता है कि कोई गवाह हो । आपका बंदा बीच में उठ कर चुपचाप कहीं चल दिया होता और एक अरसे बाद लौटा होता तो शो खत्म होने पर उसने खास जतन से वहां अपनी हाजिरी दर्ज करवाई होती । वो वहां की नोन फिगर था, अपना मकसद पूरा करने के लिये खामखाह किसी से बात कर सकता था ताकि उस किसी को याद रहता कि शो खत्म होने पर ही वो हाल से बाहर निकला था । उसने ऐसी कोई कोशिश न की, इसलिये लगता है कि शाम वो वहां जेनुइन फिल्म दर्शक था ।”

“रजनी” - मैं प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “तूने तो कमाल कर दिया !”

वो बड़ी शान से मुस्कराई ।

“शाबाशी ले इधर आ के ।”

“यहीं दीजिये ।”

“मेरी बांह दस फुट की नहीं है जो यहीं से तेरी पीठ तक पहुंच सके ।”

“फिर शुरू हो गये !”

“तू चला ले अपनी सौ सुनार की, देख लेना लुहार की एक की भी बारी एक न एक दिन आ के रहेगी ।”

“काश मैं आपके साथ आपका एंथुजियाज्म शेयर कर पाती ।”

“अब छोड़ । जा, वो काम कर जो तेरे बस का है ।”

“मेरे बस का तो हर काम है, इस वक्त आपकी निगाह में कौन सा है ?”

“जा के नींचे रेस्टोरेंट में फोन कर, काफी मंगा, बर्गर मंगा ।”

“आपके लिये काफी, मेरे लिये बर्गर !”

“अरी कम्बख्त, मेरे लिये काफी, मेरे लिये बर्गर । भूख लगी है ।”

“और मेरे लिये ?”

“वही ।”

“तो यूं कहिये न कि दो काफी, दो बर्गर आर्डर करूं !”

“कहा । अब टल ।”

अपनी हंसी दबाती वो उठी और वहां से विदा हुई ।
 
पीछे मैंने डनहिल का पैकेट निकाल कर एक सिग्रेट सुलगाया और अपनी चेयर पर अधलेटा सा पड़ कर, आंखें बंद करके उसके कश लगाने लगा ।

सिग्रेट खत्म हुआ तो मैं कुर्सी पर सीधा हो कर बैठा, मेज पर पड़ा अपना लैपटॉप मैंने अपने करीब सरकाया और उस पर इंटरनैट चालू किया ।

मकसद काठमाण्डू में स्थापित अपने सिंधी फ्रेंड को मेल भेजना था ।

फ्रेंड का नाम विशाल चंद ज्ञानचंदानी उर्फ विशु जी दानी था । वो एक अरसे से नेपाल में बसा हुआ था और राजधानी काठमाण्डू में बत्तीस पुतली के इलाके में उसी नाम से जानी जाने वाली सड़क पर स्थित आफिस से दानी सर्विसिज के नाम से ट्रैवल एजेंसी चलाता था, माउंटेनियरिंग और ट्रैकिंग ट्रिप्स अरेंज करता था और काठमाण्डू और बाहर के इंडीविजुअल और ग्रुप टूर आपरेट करता था । वो उधर का पुराना बाशिंदा था इसलिये मुझे यकीन था बड़ी आसानी से वो जानकारी वो मेरे लिये जुटा सकता था जिसकी कि मुझे जरूरत थी ।

जो मेल मैंने उसे भेजी, वो थी:

सन 1991 में सुजित त्रेहन नाम का एक इन्डियन कोंटी टॉप नाम के एक बर्फीले पर्वत शिखर से गिरकर मर गया बताया जाता है ? ये जानकारी निकालने की कोशिश करो कि क्या लाश बरामद हुई थी ? हुई थी तो क्या उसकी शिनाख्त हुई थी दोनों काम हुए थे तो उसके डैथ सर्टिफिकेट की कापी निकलवाने की कोशिश करना है ।

बहुत अर्जेंट काम है, जितनी जल्दी अंजाम दोगे उतना ही बड़ा अहसान तुम्हारा मेरे पर होगा ।

राज शर्मा

दिल्ली, इण्डिया

मैंने लैपटॉप से किनारा किया और तनिक हिचकिचाते हुए मोबाइल पर इंस्पेक्टर यादव को काल लगाई ।

“नमस्ते ।” - काल लगी तो मैं बोला - “शर्मा बोल रहा हूं ।”

“बोल, भई” - वो तिक्त भाव से बोला - “तू भी बोल ।”

“क्या बात है ! कलप रहे हो !”

“और मेरा काम क्या है ! कैसे फोन किया ?”

“ऐसे ही किया । सोचा शायद कोई नयी खबर हो !”

“क्यों न हो ! खबरों की तो बरसात हो रही है ।”

“अब क्या हुआ ?”

“सोच !”

“हे भगवान ! कहीं हैट्रिक तो नहीं हो गयी !”

“वही हुआ ।”

“जिसका नम्बर लगा था, वो...वो..”

“नहीं ।”

“तो और कौन ?”

“एक माडर्न, खूबसूरत, नौजवान लड़की । हौज खास, डियर पार्क में मरी पड़ी पायी गयी । वहां जो पिकनिक हट्स हैं, उनके करीब ।”

“कैसे मरी ?”

“गला रेत दिया किसी ने ।”

“मर्डर !”

“और क्या !”

“किसने किया ?”

“क्या पता ? गला रेतने वाला अपनी करतूत के बाद क्या पीछे अपना विजिटिंग कार्ड छोड़ के गया होगा !”

“नहीं । लेकिन सोचा शायद तफ्तीश से कुछ पता चला हो !”

“मैं अभी बस यहां पहुंचा ही हूं ।”

“सारी ! है कौन ये...ये नयी मकतूला ?”

“अभी नाम के सिवाय कुछ मालूम नहीं । नाम भी इसलिये मालूम है क्योंकि उसके पास से बरामद वोटर आई-कार्ड पर दर्ज था ।”

“पहली दो वारदातों के साथ कोई रिश्ता ? कोई टाई अप ?”

“अभी तक तो नहीं दिखाई दिया, मकतूला की अच्छी तरह पड़ताल हो जाये, मालूम पड़ जाये कौन थी, क्या करती थी, फिर शायद दिखाई दे ।”

“आई सी । नाम क्या मालूम हुआ ?”

“शिल्पी तायल ।”

तौबा !

मेरी आंखों के आगे तोशनीवाल की हसीनतरीन प्राइवेट सैक्रेट्री का चुलबुला, हंसता मुस्कराता चेहरा घूम गया ।

“यादव साहब” - मैं धीरे से बोला - “टाई अप तो है सरासर !”

“तुम्हें क्या मालूम ! तुम्हें तो अभी बस कत्ल की खबर लगी है !”

“मुझे अभी मालूम है, आपको थोड़ी देर में मालूम हो जायेगा ।”

“क्या ? क्या मालूम हो जायेगा ? साफ बोल, शर्मा, और जल्दी बोल ।”

“ये - शिल्पी तायल - शिव मंगल तोशनीवाल की प्राइवेट सेक्रेट्री है ।”

“क्या !”

“आज ही सुबह मैं तोशनीवाल के भीकाजी कामा प्लेस स्थित आफिस में उससे मिला था ।”

“तोशनीवाल की प्राइवेट सैक्रेट्री से, जिसका नाम कि शिल्पी तायल था ?”

“हां ।”

“नाम कामन हो सकता है ।”

“वोटर आई-कार्ड पर चितरंजन पार्क का पता है ?”

“हां ।”

“फिर वही है ।”

कुछ क्षण खामोशी रही ।

“आ के शिनाख्त कर ।” - फिर उसने हुक्म दनदनाया ।

“आता हूं ।”

“फौरन पहुंच ।”

“ओके ।”

तत्काल मैं आफिस से निकला ।

कॉफी, बर्गर अभी मेरी किस्मत में नही लिखा था ।

***

मैं नये घटनास्थल पर पहुंचा ।

जहां कि पुलिसियों का - जिनमें लोकल थाने के अधिकारी भी थे - टैक्नीशियंस का हजूम जमा था ।

मेरी निगाह स्वयंमेव लाश की दिशा में उठी ।

लाश जहां से बरामद हुई थी, वहीं पड़ी जान पड़ती थी, सिर्फ उसको एक सफेद चादर से ढंक दिया गया था । वो जगह वो काटेजों के बीच में थी जहां एक पेड़ की ओट भी उपलब्ध थी इसलिये फासले से उस जगह पर किसी की निगाह नहीं पड़ सकती थी । साफ जान पड़ता था कि पीठ के बल पड़ी थी, चादर में भी उसकी शानदार फिगर छुपाये नहीं छुप रही थी ।

मेरी आंखों के सामने फिर उसका ताजा गुलाब जैसा खिला चेहरा घूमा ।

वाट एन एण्ड ! वाट एन एण्ड !

सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं ।

मैंने सप्रयास उधर से निगाह हटाई, फिर मेरी निगाह भटकती हुई यादव पर जा कर ठिठकी । मैंने संजीदगी से उसका अभिवादन किया ।

लम्बे डग भरता वो मेरे करीब पहुंचा और बांह पकड़ कर मुझे चादर से ढ़ंकी लाश के सिरहाने लेकर गया । उसने झुक कर लाश के चेहरे पर से चादर सरकाई और मेरी तरफ देखा ।

जोर से थूक निगलते मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“वही है ?” - यादव बोला ।

“हं - हां ।” - मैं फंसे कण्ठ से बोला ।

“शिल्पी तायल ! तोशनीवाल की प्राइवेट सेक्रेट्री ?”

“हां ।”

उसने चेहरे को वापिस चादर से ढंक दिया और सीधा हुआ ।

मैंने लाश की तरफ से पीठ फेरी, कुछ कदम परे हटा और फिर कांपते हाथों से एक सिग्रेट सुलगाने लगा ।

यादव मेरे करीब ।

“क्या बात है ?” - मुझे घूरता बोला - “लाश पहली बार देखी ?”

“लाश तो पहली बार नहीं देखी, विद इन ट्वेंटी फोर आवर्स तीसरी बार देखी, लेकिन.. .अब क्या बोलूं ?”

“पहली मुलाकात में ही धड़का लग गया !”

मैं खामोश रहा ।

“एक दूसरे में गड्ड मड्ड तीन कत्ल ऊपर नीचे हो गये । बड़ा केस बन गया । मैं फौरन कुछ न कर सका तो मेरा डीसीपी मेरी बुरी - और कमिश्नर उसकी बुरी - गत बनायेगा । टीवी वाले तो पहले ही मेरी छीछालेदारी पर उतरे हुए हैं ।”

“मालूम पड़ गया ?”

“हां । आखिर ।”

“नम्बर तो श्यामली का था ?”

“ब्लफ था । पहले ही बोला । हमारी तवज्जो श्यामली की तरफ मोड़ दी और सिद्धार्थ एंक्लेव में वारदात कर दी । फिर यही वारदात कर दी ।”

“यानी अब बतौर मर्डर सस्पैक्ट श्यामली को बरी कर रहे हो ?”

“कनफ्यूज्ड हूं यार । सपना टाहिलियानी के कत्ल में श्यामली की हाजिरी जान पड़ती थी लेकिन यहां...यहां कैसे ? कैसे ?”

“शुरुआती तहकीकात से क्या मालूम पड़ा ?”

“यही कि इसे मरे ढाई तीन घंटे हो चुके हैं । मैंने बोला ही था कि किसी ने गला रेत दिया । किसी तेज धार वाले हथियार से । एक्सैसिव ब्लीडिंग । आलमोस्ट इंस्टेंट डैथ । हाथापाई, जोरजबरदस्ती के कोई निशानात नहीं । ये भी मुमकिन लगता है कि लड़की यहां बेहोशी या नीमबेहोशी की हालत में लाई गयी थी । घास में एडियों से बने ऐसे निशान पाये गये हैं जैसे उसके बेहोश जिस्म को घसीट कर वहां लाया गया हो जहां कि वो मरी पड़ी है, और जहां जो उसके साथ बीती, थोड़े किये उस पर किसी की निगाह न पड़ती ।”

तभी एक एम्बुलेंस वहां पहुंची जिसमें से एक स्ट्रेचर लिये दो व्यक्ति बाहर निकले जिन्होंने चादर समेत लाश को उठा कर पहले स्ट्रेचर पर डाला और फिर उसे एम्बुलेंस में पहुंचाया । तत्काल एम्बुलेंस वहां से रवाना हो गयी ।

उसके बाद सम्बंधित डीसीपी वहां पहुंचा तो तत्काल यादव समेत तमाम के तमाम पुलिसिये मुस्तैदी की प्रतिमूर्ति बने दिखाई देने लगे ।

फिर मीडिया का जमघट वहां लगने लगा जो कि लगता था कि डीसीपी को फालो करता वहां पहुंचा था ।

डीसीपी का नाम गोगिया था, मैं उसके नाम और सूरत से वाकिफ था क्योंकि एक बार पहले मेरा उससे वास्ता पड़ चुका था ।
 
डीसीपी की निगाह पैन होती तमाम चेहरों पर फिरी और मेरे पर आ कर ठिठकी । तत्काल उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये ।

“ये यहां क्या कर रहा है ?” - उसने डपट कर यादव से पूछा - “पीडी यहां क्या कर रहा है ?”

“ये बतौर पीडी यहां नहीं है, सर ।” - यादव विनयशील स्वर में बोला ।

“तो क्यों है ?”

“इसने लाश की शिनाख्त की है ।”

“एक्सप्लेन ।”

यादव ने मेरी तरफ देखा ।

मैंने अदब से बयान किया कि कैसे मैं मकतूला से वाकिफ था, उसे जानता पहचानता था ।

डीसीपी की त्योरी में फर्क आया ।

“डीसीपी साहब” - एक मीडिया पर्सन बोला - “चौबीस घंटे के अंदर अंदर शहर में तीन कत्ल हो गये, इस बारे में आपने क्या कहना है ?”

“तफ्तीश अभी बस शुरु हुई है” - डीसीपी बोला - “इसलिये अभी कुछ कहना प्रीमेच्योर होगा ।”

“इस कत्ल के बारे में न ! माना कि सिद्धार्थ एंक्लेव वाले कत्ल के बारे में भी । लेकिन छतरपुर वाले कत्ल को हुए तो पूरी रात बीत गयी, पूरा दिन बीतने जा रहा है । उसके बारे में क्या कहते हैं ?”

“तफ्तीश अभी जारी है ।”

“क्या ये सच है” - एक दूसरा रिपोर्टर बोला - “आप मानते हैं कि कातिल छतरपुर के फार्महाउस का बतौर केयरटेकर मुलाजिम विष्णु कसाना था जो कि पुलिस की गिरफ्त में था लेकिन सम्बंधित अधिकारियों की नालायकी से हाथ से निकल गया ?”

“पकड़ा जायेगा । बहुत जल्द पकड़ा जायेगा ।”

“निकल क्यों जाने दिया गया ?”

“इंक्वायरी होगी । रिस्पांसिबलिटी फिक्स की जायेगी । दोषी पाये गये अधिकारी पर एक्शन होगा ।”

“सुनने में आया है” - तीसरा रिपोर्टर बोला - “कि वो विष्णु कसाना नाम का केयरटेकर असल में सुजित त्रेहन नाम का एक शख्स था जो कभी - बाइस तेइस साल पहले - लोकल बिजनेस टाइकून शिव मंगल तोशनीवाल का - जो कि मकतूला सुरभि तोशनीवाल का पिता है और मौकायवारदात फार्महाउस का मालिक है - पार्टनर हुआ करता था, जिसे मरा समझा जा रहा था, जो अब एकाएक प्रकट हो गया था और बदले की भावना से प्रेरित होकर अब शिव मंगल तोशनीवाल को, उसके कुनबे को, तबाह करने पर तुला था ?”

“उस बाबत भी तफ्तीश अभी जारी है ।”

“जो तीन कत्ल अभी तक हुए हैं, उन तीनों के लिये, आप क्या कहते हैं, विष्णु कसाना उर्फ सुजित त्रेहन जिम्मेदार है या नहीं ?”

“अभी मैं इस बात पर कमैंट नहीं करना चाहता लेकिन मैं आप लोगों को यकीन दिलाना चाहता हूं कि बहत्तर घंटे के भीतर पुलिस हर राज पर से पर्दा उठाने में कामयाब हो जायेगी और आपके हर सवाल का जवाब देने में, आप की हर शंका का समाधान करने में, सक्षम होगी । टिल दैन आई हैव नो कमैंट्स टु आफर ।”

“ये तो पुलिस का हमेशा का दावा है लेकिन बहत्तर घंटे में कोई केस हल होता तो नहीं !”

“सदाना मर्डर केस को एक महीना हो गया है ।” - एक महिला रिपोर्टर बोली ।

“तफ्तीश जारी है ।”

“वो तो हमेशा ही जारी होती है ।”

“हमेशा के लिये आटोमैटिक पर लगी है ।” - रिपोर्टरो की भीड़ में से कोई बोला ।

सब में हंसी की लहर दौड़ पड़ी ।

“आई विल हैव नन आफ दैट ।” - डीसीपी गुस्से से बोला - “प्लीज बिहेव ऐवरीबाडी इन ए नाइस एण्ड डीसेंट मैनर ।”

तत्काल सामूहिक हंसी पर ब्रेक लगी ।

“शहर में कत्ल-दर-कत्ल होने लगना” - फिर कोई बोला - “क्या पुलिस की अलगर्जी और लापरवाही को उजागर नहीं करता ? इजंट इट ए बैड कमेंट्री ऑन पुलिस एफिशियेंसी ?”

“दैट बिल बी एनफ । नो मोर क्येश्चंस । प्लीज डिसपर्स ।”

कोई भी मीडिया पर्सन अपनी जगह से न हिला ।

डीसीपी ने यादव को पास बुला कर उसे कुछ निर्देश दिये और फिर आनन फानन वहां से कूच कर गया ।

पीछे मीडिया कुछ अरसा इंस्पेक्टर यादव के गले पड़ा फिर एक एक, दो दो करके वो भी वहां से रुखसत हो गये ।

तभी सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर वहां पहुंचा ।

उसने करीब आ कर यादव को सैल्यूट मारा ।

“मालूम था मैं यहां था ?” - यादव बोला ।

“कंट्रोल रूम से मालूम किया, सर ।” - तोमर बोला ।

“कोई खास बात ?”

“है तो सही !”

“क्या ?”

“आपके हुक्म के मुताबिक मैं अंजना रांका से मिला था । वो डिफेंस कालोनी के अपने फ्लैट में तो मुझे नहीं मिली थी लेकिन पूसा रोड पर वुडलैंड क्लब में मिल गयी थी जहां की कि वो शो गर्ल है । मैं वहां उसके ड्रैसिंग रूम में उससे मिला था तो पहले तो इसी बात पर भड़कने लगी कि मैं वहां क्यों आया, फिर कोई बात करने को राजी न हो के दी । मैं मुंह खोलता था, वो ‘शट अप’ बोलती थी; कोई सवाल करना शुरू करता था, वो पहले ही ‘गैट आउट, गैट आउट’ भजने लगती थी ।”

“गिरफ्तार करना था साली को । नजदीकी थाने लेकर जाता, तमाम कसबल निकल जाते ।”

“वो धमकी जारी की थी मैंने । उस पर कोई असर नहीं हुआ था । उलटे मुझे धमकाने लगी थी कि वो शहर के इतने बड़े आदमी की करीबी थी जो मुझे क्या, मेरे अफसरों को भी सैट कर देता ।”

“तोशनीवाल !” - मैं बोला ।

“हां ।”

“बहरहाल” - यादव बोला - “कुछ हाथ न आया !”

“कुछ तो आया, सर जी ।” - तोमर का स्वर रहस्यपूर्ण हो उठा ।

“अच्छा ! क्या ?”

“सर जी, वो नीले रंग की सिल्क के कपड़े की धज्जी सी जो छतरपुर के फार्महाउस के मेनडोर के एक कब्जे में अटकी पायी गयी थी...आपको याद है न वो ?”

“याद है । उसकी क्या बात है !”

“ऐन उस कपड़े का, उस डिजाइन का, उस रंग का एक दुपट्टा वहां उसके ड्रैसिंग रूम में मौजूद था । सर जी, दुपट्टे का पल्लू एक जगह से नुचा हुआ था और जो नुचा था, वो वही कपड़े की धज्जी थी ।”

“पक्की बात ?”

“बिल्कुल पक्की बात, सर जी ।”

“दुपट्टे पर” - मैंने एकाएक सवाल किया - “खून के धब्बे थे ?”

तोमर ने अपने अफसर की तरफ देखा ।

“जवाब दे ।” - यादव बोला ।

“नहीं ।” - तोमर बोला - “नहीं थे । खून का कोई छोटा मोटा धब्बा भी मुझे दुपट्टे पर दिखाई नहीं दिया था ।”

“ओह !” - मैं खामोश हो गया ।

“अब मेरे लिये क्या हुक्म है ?” - तोमर बोला ।

“हैडक्वार्टर चलते हैं ।” - यादव बोला ।

“सर जी कल शाम से ड्यूटी पर हूं !”

“इस बारे में वहीं बात करेंगे ।”

उनका प्रोग्राम सुन कर मैंने भी वहां से रुखसत पायी ।

कार में पहुंच कर मैंने श्यामली तोशनीवाल को काल लगाई ।

तत्काल उत्तर मिला ।

“राज शर्मा बोल रहा हूं ।” - मैं बोला - “सपना टाहिलियानी की खबर लग गयी ?”

“हां ।” - वो गमगीन लहजे से बोली - “मिस्टर शर्मा, ये क्या हो रहा है ?”

“अभी और भी बुरी खबर है ।”

“अभी और भी ?”

“हां ।”

“क्या ?”

“शिल्पी तायल ! आपके हसबैंड की प्राइवेट सैक्रेट्री ! वाकिफ हैं ?”

“नहीं । उसकी क्या बात है ?”

“पांच साल से सैक्रेट्री थी वो तोशनीवाल साहब की !”

“होगी !”

“कभी उनके आफिस नहीं गयी ?”

“पता नहीं कब से नहीं गयी ! पांच साल से तो कहीं ज्यादा लम्बे अरसे से नहीं गयी ।”

“उससे पहले कब गयीं ?”

“जब कभी हसबैंड ले के गया । शुरू शुरू में कभी ले जाता था साथ-कभी अपनी कारपोरेट शानोशौकत दिखाने के लिये तो कभी इसलिये कि वहीं से कहीं और जाने का पहले से प्रोग्राम बना होता था - फिर धीरे धीरे चाव घटता गया, घटते घटते खत्म हो गया । उसने साथ ले जाना बंद कर दिया तो मुझे तो यूं समझो कि आफिस का खयाल आना ही बंद हो गया ।”

“अकेले आप वहां कभी नहीं गयी ?”

“नैवर ।”

“पिछले पांच सालों में गयी होतीं तो आपके लिये चिंता की एक नयी वजह पैदा हो गयी होती ।”

“क्या मतलब ?”

“बाला की हसीन थी ये शिल्पी तायल । इतनी कि फिल्म एक्ट्रेसिज भी मात ।”

“थी क्यों कह रहे हो ? अब रिजाइन कर गयीं ?”

“रिजाइन नहीं कर गयी, मैडम लेकिन गयी ।”

“कहां ! कहां गयी ?”

“समझिये ।”

“कहीं उसका भी.. .उसका भी.. .क - कत्ल तो...”

“यही बात है ।”

“गॉड ! ये क्या हो रहा है ?”

“अभी तो गॉड को ही पता है कि क्या हो रहा है !”

“कब हुआ ? कहां हुआ ? क्यों हुआ ?”

कब और कहां का जवाब मैंने दिया । क्यों का जवाब कहां था मेरे पास ।

“ओह !” - वो बोली - “यही बताने को फोन किया ?”

“एक बात और भी थी ।”

“क्या ?”

“आपके लिये एक एडवाइस है ।”

“क्या ?”

“कुछ दिन के लिये कहीं गायब हो जाइये ।”

“अच्छा !”

“फौरन ।”

“फौरन ! फौरन तो मुमकिन नहीं !”

“क्यों भला ?”

“एक घंटे में सुरभि का अंतिम संस्कार है । रात को घर में एक मेहमान आ रहा है ।”

बड़े लोगों की बातें थी । दाह संस्कार और मेहमानवाजी एक ही लैवल के काम थे ।

“कोई खास मेहमान ?”

“खास ही समझो ।”

“सिर्फ खास मेहमान ! और कोई नहीं ?”

“और भी ।”

“आई सी । तो आपका ये खास मेहमान...”

“मेरा नहीं । मेरी नहीं ।”

“हसबैंड का ?”

“हां ।”

“कौन ?”

“अंजना रांका ।”

“मेरे को बात को ठीक से समझने दीजिये । वो फैंसी औरत जिसका आपके हसबैंड से अफेयर है, आपकी जानकारी में, आपकी मौजूदगी में, आपके घर पर आ रही है !”

“हां ।”

“सम्वेदना प्रकट करने के लिये न ! कंडोलेस के लिये न !”
 
“डिनर के लिये भी ।”

“आप कभी मिली हैं इस.. .इस अंजना रांका से ?”

“नहीं । सिर्फ नाम से वाकिफ हूं ।”

मुझे उसी जवाब की उम्मीद थी । कभी मिली होती तो पिछली रात मेरे फ्लैट पर अंजना रांका को उसने फौरन पहचाना होता ।

“मातम के इमीजियेट बाद खुशी मनाने का रिवाज है आप लोगों के यहां ?”

“अब क्या कहूं ! कहता है कोई सम्वेदना प्रकट करने आये तो उसे डिनर सर्व करने में कोई हर्ज नहीं ।”

“सम्वेदना प्रकट करने आया शख्स डिनर का तमन्नाई नहीं होता । किसी भी खातिर का तमन्नाई नहीं होता ।”

“मैं समझती हूं लेकिन वो समझे तब न !”

“ओह !”

“मैंने उसे बहुत समझाया था लेकिन वो नहीं मानता, नहीं सुनता । डीसेंसी से नाता तोड़ चुका है । बेशर्म हो गया है । बेलिहाज हो गया है । उस औरत पर ऐसा लट्टू है कि उसे राजी रखने के लिये कुछ भी कर सकता है । कोई बड़ी बात नहीं कि ये डिनर का प्रोग्राम उनकी मिलीभगत ही मुझे एमबैरेस करने की ।”

“ओह, नो ।”

“यही बात है । जरूर यही बात है । बेटी मेरी मरी है न ! मिस्टर शर्मा, तुम चाहो तो मुझे एमबैरेसमेंट से बचा सकते हो ।”

“कैसे ?”

“डिनर का मेरा इनवीटेशन कुबूल करो । शाम को तुम मेरे मेहमान ।”

“मैं !”

यानी कि जिस लानत को मैं अभी कोस के हटा, उसमें मैं भी शरीक !

“मेरी खातिर ।”

“अच्छा !”

“भले ही अपनी कम्पनी के लिये किसी फ्रेंड को साथ ले आना लेकिन आना जरूर ।”

“आपके हसबैंड को ऐतराज नहीं होगा ?”

“क्यों होगा ? कोई उसका मेहमान हो सकता है तो मेरा नहीं हो सकता ?”

“फिर भी हुआ तो ?”

“तो मिट्टी झाड़ दूंगी । मेहमान की भी । मुंह नोच के घर से निकलूंगी कमीनी को ।”

“खुदा न करे ऐसी नौबत आये ।”

“तो आ रहे हो न !”

“मैडम, क्लायंट की खिदमत के तौर पर आपका इनवीटेशन कुबूल है ।”

“थैंक्यू ।”

“हाजिरी का वक्त बताइये ।”

“नौ बजे ।”

“आई विल बी देवर ।”

“फ्रेंड कौन होगा साथ ? कोई गर्लफ्रेंड ?”

मैं उसे क्या बताता कि मेरी हालिया गर्लफ्रेंड तो वही थी जो कि पहले ही इनवाइटिड थी ।

“देखूंगा ।” - मैं बोला ।

“ठीक है, देखना । लेकिन - विद ऑर विदाउट फ्रेंड - आना जरूर ।”

“आपका हुक्म...”

“दरख्वास्त ।”

“...सिर माथे ।”

मैंने सम्बंधविच्छेद कर दिया और फिर यादव को काल लगाई ।

“हैडडक्वार्टर पहुंच गये ?” - मैंने पूछा ।

“नहीं ।” - जवाब मिला - “रास्ते में हूं ।”

“खुद ड्राइव कर रहे हो ?”

“नहीं ।”

“गुड । तो एक बात । शाम को एक डिनर का न्योता है । साथ चलते हो ?”

“न्योता किसको है ?”

“मेरे को ।”

“फिर मेरा क्या काम ?”

“इजाजत है फ्रेंड को साथ लाने की ।”

“मकसद क्या है ? बतौर फ्रेंड क्यों चुना ?”

“जब सुनोगे कि मकसद कहां है, किन लोगों की मौजूदगी में है, तो दोनों सवालों का जवाब मिल जायेगा ।”

“मैं सुन रहा हूं ।”

मैंने डिनर की बाबत उसे बताया ।

“ओह !” - यादव बोला - “तो वो फुलझड़ी वहां होगी जिसने मेरे सब-इंस्पेक्टर को डांट के भगा दिया !”

“हमारे शाम के होस्ट की हूल देकर ।”

“जिस के दुपट्टे का फटा टुकड़ा फार्महाउस से बरामद हुआ !”

“अभी आयी बात समझ में कि कितनी गुंजायशें हैं मौजूदा तफ्तीश के आगे बढने की अगरचे कि वहां डिनर में शिरकत करोगे ।”

“मैं जरूर करूंगा । टाइम बोलो ।”

“नौ ।”

“कहां मिलोगे ?”

“इस बाबत हम फिर बात कर लेंगे । नौ से पहले ।”

“ठीक है ।”

“कोई और नयी बात ?”

“इतनी जल्दी ! अभी दस मिनट तो हुए हैं मिले हुए !”

“फिर भी शायद हो ! कोई नयी नहीं तो कोई ऐसी जो भूल गयी हो, जेहन से उतर गयी हो !”

“ऐसी तो है एक ।”

“तो बताओ न !”

“बल्कि दो ।”

“ओ, कम आन नाओ ।”

“बता दूं ?”

“प्लीज ।”

“प्लीज कहते हो तो सुनो । उस सिद्धार्थ एन्क्लेव वाली औरत सपना टाहिलियानी का रखरखाव, रहन सहन तुमने देखा था अपनी आंखों से । कैसा था ?”

“शाही ! बादशाही ! टॉप क्लास ! रिचविच क्लास ! क्यों ?”

“कैसे मेनेटेन करती थी ?”

“खानदानी रईस होगी !”

“नहीं थी । मालूम पड़ा है कि पांच साल पहले तक वास्तु कंसल्टेंट थी और न्यू फ्रेंड्स कालोनी में एक वन बैडरूम फ्लैट में - वो भी किराये का - रहती थी ।”

“और अब एक्सपेंसिव पैंथाउस में रहती थी !”

“हां । सुबह देखा ही था तुमने !”

“अपना ?”

“नहीं, किराये का । लेकिन फैंसी फरनिशिंग अपनी ? असैंट कार अपनी । क्या समझा ?”

“समझा तो सही कुछ ?”

“एक्सपेंसिव ड्रैसिज, ज्यूलरी, दि वर्क्स, जब कि आय का कोई प्रत्यक्ष साधन नहीं । कोई मालदार रिश्तेदार मरके उसे अपना वारिस नहीं बना गया, कोई हैवी इनवेस्टमेंट्स नहीं जिनका कि हैवी डिवीडेंड आता हो । हमने बैंक एकाउंट भी चैक करवाया है । उसमें भी कोई बड़ा बैलेंस नहीं है । पिछले पांच साल से उसकी ये हाई फाई लाइफ चल रही है बिना आय के किसी प्रत्यक्ष साधन के । शर्मा, तेरे खयाल से ये करिश्मा क्योंकर हुआ होगा ?”

“कोई मर्द होता तो कहता स्मगलर बन गया, भाई बन गया, कोई नौजवान औरत होती तो कहता बाई बन गयी, लेकिन उस जैसी उम्रदराज औरत के संदर्भ में तो एक ही तरीका मुमकिन है ।”

“कौन सा ?”

“ब्लैकमेल ।”

“हमें भी यही बात जान पड़ती है ।”

“शिकार कौन ?”

“सुजित त्रेहन ! क्योंकि अब स्थापित है कि वो उन लोगों से नेपाल से वाकिफ थी । शर्मा, क्योंकि उसका कत्ल हुआ है इसलिये जाती तौर पर मेरा ऐतबार विष्णु कसाना उर्फ सुजित त्रेहन पर है । ब्लैकमेल खूनी खेल है । कोई शिकार ताजिंदगी ब्लैकमेल होता नहीं रह सकता । कभी तो उसके सब्र का पैमाना छलकना ही होता है । सुजित त्रेहन का छलका तो उसने ब्लैकमेल को खत्म करने के लिये ब्लैकमेलर को खत्म कर दिया ।”
 
“तुम चिट्ठी को भूल रहे हो । चिट्ठी में उसका जो एजेंडा दर्ज था, उसमें तोशनीवाल परिवार ही शामिल था बस । और सुरभि का कत्ल करके उसने अपने एजेंडा को मोहरबंद किया था, तोशनीवाल की हस्ती मिटाने की दिशा में पहला कदम उठाया था और श्यामली का नम्बर लगा कर दूसरे कदम की तैयारी की थी । इसमें ब्लैकमेलर कहां से आ गया ?”

“तुम चिट्ठी की बातों पर जा रहे हो । चिट्ठी की कुछ - या कई - बातें फरेब भी हो सकती हैं । चिट्ठी के मुताबिक वो एक साल से इधर है लेकिन क्या सबूत है ? हो सकता है वो कई सालों से यहां हो, उसके पांच साल से यहां होने का तो हिंट भी मिल रहा है क्योंकि पांच साल पहले ही मुकतूला सपना टाहिलियानी की औकात संवरनी शुरू हुई थी ।”

“हूं ।”

“झूठा तो वो शख्स स्थापित हो ही चुका है । वो एक कत्ल की घोषणा करता है और कर कोई दूसरा ही देता है, तीसरा ही देता है । बतौर नैक्स्ट विक्टिम श्यामली के नाम की घोषणा करके वो हमारी तवज्जो श्यामली की तरफ लगा देता है और खुद कोई और ही, कोई नया ही खेल खेल जाता है । शर्मा, बहुत शातिर मुजरिम से पाला पड़ा है, आगे भी उसकी चाल समझना मुश्किल साबित हो सकता है ।”

“ठीक । लेकिन अता पता उसका कोई नहीं ! हैण्डीकैप की वजह से केयरटेकर की जो खास शिनाख्त मुमकिन है, उसकी वजह से तो उसे जरूर पकड़ा जाना चाहिये ।”

“पकड़ा जायेगा । अभी तो उसे गायब हुए चौबीस घंटे भी नहीं हुए !”

“बहरहाल सपना टाहिलियानी का कत्ल इसलिये हुआ क्योंकि वो ब्लैकमेलर थी और उसका शिकार ब्लैकमेल से आजिज था !”

“ऐसा ही जान पड़ता है ।”

“लिहाजा सुजित त्रेहन के दो एक्टिव प्रोजेक्ट थे - एक तोशनीवाल परिवार को नेस्तानाबूद करके अपना बदला चुकाना और दूसरा ब्लैकमेलर से हमेशा के लिये पीछा छुड़ाना ।”

“हां ।”

“दूसरी बात ?”

“दूसरी बात की बुनियाद भी सिद्धार्थ एन्क्लेव वाली मकतूला सपना टाहिलियानी ही है । उसके लैटरबाक्स से हमने कंप्यूटर पर तैयार किया गया एक रुक्का बरामद किया है जिस पर दर्ज है - अगला नम्बर दीक्षा भटनागर का ।”

“दीक्षा भटनागर ! ये कौन हुई ?”

“टेलीफोन डायरेक्ट्री में एक दीक्षा भटनागर दर्ज है । हमने उससे बात की थी । वो कहती है वो न किसी तोशनीवाल को जानती है, न किसी त्रेहन को जानती है और न मकतूला सपना टाहिलियानी को जानती है जिसके लैटर बाक्स से वो उसके नाम वाला रुक्का बरामद हुआ ।”

“कहां रहती है ?”

“अर्जुन नगर । जो कि डियर पार्क से ऐन सड़क पार है । हरसुख मार्ग पर उसका घर है और सड़क पार ही वो पिकनिक हट्स हैं जिसमें से दो के बीच अभी पीछे लाश पड़ी मिली थी ।”

“कहीं तुम्हारा इशारा इस तरफ तो नहीं कि इत्तफाक से उसने शिल्पी तायल का कत्ल वाकया होता देखा हो सकता है ?”

“हो सकता है । इसीलिये मैंने इस दीक्षा भटनागर की निगरानी का इंतजाम किया है ।”

“गुड । ये नया रुक्का तुमने कहा कि लैटरबाक्स से बरामद हुआ ?”

“हां ।”

“डाक से आया ?”

“नहीं, ऐसे ही पड़ा था । लिफाफे में भी नहीं था । कोई दस्ती डाल के गया ।”

“कौन ?”

“क्या पता ?”

“सुबह के अंधेरे में कोई लैटरबाक्स पर पहुंचा और...”

“क्या पता कब पहुंचा ! रुक्का तो अभी आधा घंटा पहले बरामद हुआ ।”

“लैटरबाक्स कहां है ? फ्लैट के बाहर !”

“नहीं । ग्राउंड फ्लोर पर । इमारत के बाहर । वहां कई हैं पिजन खेल जैसे लैटर बाक्स । हर फ्लैट का एक । ढ़क्कन पर नाम और नम्बर लिखा हुआ ।”

“लैटरबाक्स में से क्यों ? जैसे पहले ऐसा रुक्का लाश के पास से बरामद हुआ था, वैसे इस बार क्यों नहीं ?”

“क्या पता ?”

“वो आसान काम था !”

“भई, मैं क्या कहूं इस बारे में ! कातिल ने क्या किया, क्यों किया, वही बेहतर जानता है । पकड़ाई में आयेगा तो सवाल करेंगे ।”

“बरामदी इतनी देर से क्यों ?”

“मुमकिन था अभी भी न होती । किसी को लैटरबाक्स का खयाल ही नहीं आया था । आधा घंटा पहले भी एक सिपाही की तवज्जो लैटरबाक्सिज की कतार की तरफ गयी और हमें उसके वजूद की खबर लगी और सुबह का उसमें पड़ा रुक्का अब कहीं जा कर बरामद हुआ ।”

“सुबह का पड़ा कैसे ?”

“भई, कत्ल सुवह मुंह अंधेरे हुआ या नहीं ! लैटरबाक्स में रुक्का डालने क्या कातिल लौट के आया होगा !”

“वो कंप्यूटर जनरेटिड रुक्का उसके पास पहले से तैयार था तो काहे को लौट के आया होगा !”

“वही तो ?”

“लेकिन पहले से तैयार !”

“इसमें हैरानी की कौन सी बात है ! जो रुक्का उसने छतरपुर में सुरभि के सिरहाने छोड़ा था, वो भी तो तैयारशुदा ही था !”

“ठीक । यादव साहब, कातिल के आपरेशंस का फील्ड बढ़ता क्यों जा रहा है ? घोषणा उसने श्यामली तोशनीवाल के नाम की की, कत्ल सपना टाहिलियानी का हुआ और अब ये नया नाम दीक्षा भटनागर वजूद में आ गया !”

“अभी कुछ नहीं कहा जा सकता । तफ्तीश जारी है ।”

“ठीक ! दीक्षा भटनागर का पूरा पता बता सकते हो ?”

“जुबानी याद नहीं । डायरेक्ट्री में दर्ज है । देखना ।”

सम्बंधविच्छेद हो गया ।

डायरेक्ट्री तुरंत उपलब्ध नहीं थी इसलिये मैंने डायरेक्ट्री इंक्वायरी से दीक्षा भटनागर का पता और फोन नम्बर दरयाफ्त किया ।

मैंने उस नम्बर पर काल लगायी ।

जवाब में एक सशंक, सावधान हल्लो मुझे सुनाई दी ।

“गुड ईवनिंग, मैडम” - मैं मधुर स्वर में बोला - “मेरा नाम राज शर्मा है, मैं एक रजिस्टर्ड प्राइवेट डिटेक्टिव हूं और पुलिस की एसोसियेशन में एक हालिया मर्डर केस पर काम कर रहा हूं ।”

“तो ?” - वो बोली ।

“उसी सिलसिले में आपसे बात करना चाहता हूं ।”

“क्या बात ?”

“मिलूंगा तो बोलूंगा न ?”

“कब ?”

“अभी । फौरन ।”

“होल्ड करो ।”

वो माउथपीस पर हाथ रखकर किसी से कोई खुसर पुसर करने लगी । खुसर पुसर को समझना तो मुहाल था लेकिन इतना अंदाजा मुझे फिर भी हुआ कि उसके साथ कोई मर्द था जिससे कि वो मेरी दरख्वास्त की बाबत मशवरा कर रही थी ।

कौन होगा !

“मिस्टर शर्मा” - एकाएक आवाज आयी - “लाइन पर हो ?”

“जी हां ! क्या हुक्म है ?”

“आ जाइये ।”

सम्बंधविच्छेद हो गया ।

***

मैं अपनी मंजिल पर पहुंचा ।

जहां मैं पहुंचा था, मौकायवारदात से वहां पैदल निकल लेता तो जल्दी पहुंच जाता । कार से पहले उलटा आना पड़ता था और फिर ग्रीन पार्क से घेरा काट कर हरसुख मार्ग पर दाखिल होना पड़ता था ।

वो एक दोमंजिला कोठी थी जिसके आगे मैंने क्षण भर को ब्रेक लगाई ।
 
उस क्षणिक हाल्ट में भी मुझे लगा कि एक खिड़की का पर्दा तनिक सरका था और पीछे से पलक झपकने जितने अरसे के लिये एक मर्दाना सूरत नुमायां हुई थी । मैं कार को आने बढा ले गया । तीसरी कोठी के करीब मैंने कार रोकी और वापिस लौटा । मैंने पिछवाड़े की सर्विस लेन का रास्ता तलाश किया और उस पर चलता अपना निशाना कोठी के पिछवाड़े में पहुंचा । वहां सन्नाटा था और कोई आवाजाही नहीं थी । खामोशी से मैंने पिछवाड़े की दीवार फांदी और बैक यार्ड में पहुंचा । पिछवाड़े के बरामदे में तीन बंद दरवाजे थे जिनको मैंने बारी बारी ट्राई किया ।

दायां दरवाजा भीतर से बंद नहीं था ।

मैंने उस दरवाजे में बाल बाल करके एक झिरी पैदा की और उसमें आंख लगा कर भीतर झांका ।

भीतर एक बल्ब जल रहा था जिसकी रोशनी में मुझे दिखाई दिया कि वो किचन थी और खाली थी । मैंने भीतर कदम रखा और दबे पांव चलता भीतरी दरवाजे पर पहुंचा । मैंने उसको भी ट्राई किया तो उसे खुला पाया । उसके आगे एक गलियारा था जो आगे एक हाल में खत्म होता था और हाल से ऊपर को जाती सीढ़ियां थीं ।

एक बात मुझे बहुत परेशान कर रही थी, हलकान कर रही थी ।

वहां मरघट जैसा सन्नाटा था ।

जब घर खाली नहीं था, अभी थोड़ी देर पहले वहां किसी ने फोन काल रिसीव की थी, उस किसी के साथ किसी मर्द की भी हाजिरी थी, तो घर आकूपाइड था, इस बात की चुगली करती कोई तो आहट, कोई तो धमक वहां होनी चाहिये थी !

दबे पांव मैंने गलियारा पार किया और सीढ़ियों के दहाने पर पहुंचा ।

उनके ऊपरले सिरे के सामने ही एक बंद दरवाजा था जिसके नीचे से रोशनी की एक बारीक लकीर नुमायां हो रही थी ।

पूर्ववत् दबे पांव मैं ऊपर पहुंचा । उस दरवाजे के साथ पहले मैंने एक कान सटाया, फिर झुक कर की-होल में आंख लगाई ।

कान में दबी - न समझ में आ सकने वाली - आवाजें सुनी, आंख ने भीतर एक मर्द और एक औरत की मौजूदगी की तसदीक की । दोनों के शरीर एक ही बार मुझे दिखाई दिये थे जबकि वो बारी बारी की-होल के आगे से गुजरे थे । की-होल संकरा था इसलिये इतनी गुंजायश नहीं थी कि मैं भीतर सारे कमरे में निगाह दौड़ा पाता ।

फिर एक नया नजारा पेश हुआ ।

मर्द मुझे परे खिड़की के करीब दिखाई दिया, उसकी मेरी तरफ पीठ थी फिर भी मैंने साफ उसके हाथ में थमी गन देखी । औरत उसके करीब खड़ी थी और उसकी तवज्जो भी खिड़की की तरफ ही जान पड़ती थी ।

गन !

किसलिये ?

क्या गन दिखा कर वो शख्स औरत को काबू किये था ?

था कौन ?

सुजित त्रेहन !

लेकिन खिड़की के पास खड़ा शख्स तो नौजवान जान पड़ता था और लम्बा चौड़ा, कद्दावर शख्स था । केयरटेकर विष्णु कसाना ही अगर सुजित त्रेहन था तो वो लम्बा चौड़ा, कद्दावर कैसे हो सकता था !

बहरहाल जो कोई भी था, इरादा खतरनाक रखता था, वर्ना हाथ में गन न होती !

क्या करूं ?

वहां अपनी मौजूदगी की हाजिरी लगाऊं ?

क्या ऐसा करना उचित होगा ?

गन से जो खतरा उस औरत को था फिर वो मुझे भी तो होता !

देखा जायेगा ।

मेरे को आया जान कर वो शख्स गन छुपा सकता था, एक गवाह के सामने उसके इस्तेमाल से गुरेज कर सकता था ।

या गन गवाह पर भी इस्तेमाल कर सकता था ।

डबल मर्डर दिल गुर्दे का काम था ।

लेकिन अगर सब किया धरा सुजित त्रेहन का था तो तीन कत्ल तो वो पहले ही कर चुका था, दो और कर गुजरना उसके लिये क्या बड़ी बात होती !

लेकिन वो त्रेहन नहीं था, त्रेहन नहीं हो सकता था ।

मैंने रिस्क लेने का फैसला किया ।

मैंने दरवाजे का हैंडल घुमा कर उसे धक्का दिया और भीतर कदम डाला ।

“हल्लो !” - मैं बोला ।

दोनों चौंक कर घूमे ।

मर्द को मैंने फौरन पहचाना ।

वो यादव की टीम का एक सदस्य सब-इंस्पेक्टर भूपसिंह रावत था जिससे मेरा पहले भी दो तीन बार वास्ता पड़ चुका था । यादव ने कहा था कि उसने दीक्षा भटनागर की निगरानी का इंतजाम किया था जिसका सहज स्वभाविक मतलब मैंने खुफिया निगरानी ही लगाया था, मुझे कैसे मालूम होता कि निगरानी सब्जेक्ट के सिर पर सवार होकर भी होती थी ।

“तुम !” - रावत के मुंह से निकला ।

“अरे, रावत साहब” - मैं तनिक हंसता हुआ बोला - “मैं भी इतना ही हैरान हुआ तुम्हें यहां देख के ।”

“भीतर कैसे आये ?” - महिला अप्रसन्न भाव से बोली ।

“जब भीतर दिखाई दे रहा हूं तो आया ही किसी तरह से । जब यहां मेरी आमद का इंतजार इतने गैरमामूली तरीके से हो रहा था तो मेरा भी जी चाहा कि मैं गैरमामूली तरीके से, खास स्टाइल से, ऐंट्री लूं ।”

“तुम वही हो जिसने अभी थोड़ी देर पहले मुझे फोन किया था ?”

“वही है ।” - रावत बोला - “राज शर्मा । पीडी ।”

“मेरी आमद के बारे में” - मैं बोला - “मुझे होल्ड कराके मैडम ने तुम्हारे से मशवरा किया था ?”

“हां । और मुझे कोई और ही शक हुआ था ।”

“क्या ?”

“कातिल - सुजित त्रेहन - तुम्हारा नाम इस्तेमाल करके यहां ऐंट्री बनाने की जुगत कर रहा था ।”

“ओह !”

“इसीलिये मैं सावधान था । उसके लिये तैयार था ।”

“मेरी जगह कातिल आया होता तो तुम्हारी तैयारी किसी काम न आती । मैं कोठी के भीतर पहुंच गया था, ये दरवाजा खोल कर यहां आ गया था और तुम्हें मेरे हल्लो बोलने से पहले मेरी खबर नहीं लगी थी । मेरी जगह कातिल आया होता तो तुम दोनों यहां मरे पड़े होते, बावजूद तुम्हारे हाथ में थमी गन के ।”

“मेरी निगाह फ्रंट पर थी, मेन रोड पर थी और मैं उधर से ही तुम्हारे - किसी के - यहां पहुंचने की उम्मीद कर रहा था ।”

“कोई गलती नहीं थी तुम्हारी । फिर जहां मौत मंडराती हो, वहां एक शख्स निगरानी के लिये काफी भी तो नहीं होता !”

रावत ने चिंतित भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

मैंने महिला की तरफ तवज्जो दी जो कि अब साफ साफ भयभीत दिखाई दे रही थी ।

“आप” - मैं बोला - “दीक्षा भटनागर ही हैं न ?”

उसने जल्दी से सहमति में सिर हिलाया ।

“मैं गलत, नाजायज तरीके से यहां दाखिल होने के लिये माफी चाहता हूं लेकिन जो अंदेशा आपको था, वो मेरे को भी तो था ! इसलिये...आई होप यू अंडर स्टैण्ड माई पॉइंट ।”

उसका सिर फिर सहमति में हिला ।

“आपने समझा कि मैं कातिल था जो राज शर्मा बन के फोन कर रहा था और मैंने समझा ये” - मैंने रावत की तरफ इशारा किया - “कातिल था जो कि खिड़की के पीछे छुपा खड़ा मेरी आमद का इंतजार कर रहा था । बहरहाल अंत भला सो भला । नाओ रिलैक्स ।”

धीरे धीरे उसका चेहरा नार्मल होने लगा ।

“अब उस बात की इजाजत दीजिये जिसकी वजह से मैं यहां आया हूं ।”

उसकी भवें उठी ।

“एकाध सवाल पूछने की इजाजत दीजिये ।”

“पूछो । वैसे मुझे उम्मीद नहीं कि तुम्हारे मन माफिक मुझे कुछ मालूम होगा ।”

“आज सुबह सिद्धार्थ एन्क्लेव में जो कत्ल हुआ, उसकी खबर लगी ?”

“हां, लगी । पुलिस से लगी ।”

“आप मकतूला सपना टाहिलियानी से वाकिफ थीं ?”

“ये सवाल पुलिस ने भी मेरे से पूछा था । मेरा जवाब है नहीं, मैंने कभी ये नाम भी नहीं सुना था । न सपना टाहिलियानी का, न तोशनीवाल फैमिली में से किसी का । मैं समझ नहीं पा रही हूं कि कातिल क्यों मेरे पीछे पड़ा है ! क्या वो सच में मुझे मार डालेगा ?”

“ऐसा नहीं होगा ।” - रावत पूरे विश्वास के साथ बोला - “हम नहीं होने देंगे ।”

“एसआई साहब ठीक कह रहे हैं ।” - मैं बोला - “आप मेरी दूसरी बात की तरफ तवज्जो दीजिये, मैडम । आज दिन में किसी वक्त सामने डियर पार्क में एक और कत्ल हुआ और जहां लाश पड़ी पायी गयी थी, वो जगह बस सड़क पार ही है । यानी कि यहां से, आपकी खिड़की पर से, दिखाई देती है । मेरा सवाल ये है कि क्या आपने कुछ देखा ।”

“क्या ? कत्ल होता ?”

“या मकतूला को बगलों से थामकर, घसीट कर पिकनिक हट्स की ओट में ले जाये जाते ?”

“नहीं, मैंने कुछ नहीं देखा । जो वक्त उस वारदात का बताया जाता है, उस वक्त तो मैं यहां थी ही नहीं । पिछली रात मेरी कहीं और अपने फ्रेंड्स के साथ गुजरी थी और मैं तो दोपहरबाद घर लौटी थी ।”
 
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