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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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मैं कनाट प्लेस पहुंचा ।

सब-इंस्पेक्टर भूपसिंह रावत मुझे होटल की पहली मंजिल पर स्थित रिसैप्शन पर बैठा टीवी देखता मिला ।

“आओ, भई ।” - वो बोला - “तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ।”

“अच्छा !”

“इंस्पेक्टर साहब का फोन आया न ! बोले, तुम्हें किसी की शिनाख्त के लिये पुलिस की मदद की जरूरत थी ।”

“ओह !”

“आजकल साहब के सगे कैसे बने हुए हो ?”

“नहीं बना हुआ, यार । बस, यूं समझो कि साहब की मेहरबानी की बेमौसम बरसात हुई ।”

“बेमौसम बरसात तो बस होती ही है, टिकती कहां है !”

“ये मेहरबानी भी नहीं टिकने की, इसलिये जो हैल्प कर सकते हो, जल्दी करो ।”

“क्या चाहते हो ?”

मैंने उसे पेपरबैग में मौजूद गन दिखाई ।

“इससे दो वैरीफिकेशन चाहता हूं ।” - मैं बोला - “एक तो इस पर किसी की उंगलियों के निशान हैं जिनकी हो सके तो मैं पुलिस रिकार्ड से शिनाख्त चाहता हूं ।”

“ये तो कोई बड़ा काम नहीं । आजकल नोन क्रिमिनल्स का फिंगरप्रिंट्स रिकार्ड फुल्ली कंप्यूटराइज्ड है । एक कमांड से हकीकत सामने आ जायेगी कि इस पर के फिंगरप्रिंट्स वाले का कोई रिकार्ड है या नहीं ! दूसरी बात ?”

“ये बत्तीस कैलीबर की गन है ।” - मैं अर्थपूर्ण स्वर में बोला ।

“दिख रहा है मुझे । तो ?”

“तुम्हारे पास बत्तीस कैलीबर की एक बुलेट है जो तुमने डियर पार्क में एक पिकनिक हट की दीवार में से खोद कर निकाली थी ।”

तत्काल रावत सम्भल कर बैठा ।

“वो गोली” - फिर बोला - “इस गन से निकली थी ?”

“ये तो बैलेस्टिक्स एक्सपर्ट के पता लगाये पता लगेगा न !”

“ये गन तुम्हारे पास कहां से आयी ?”

मैंने बताया ।

“अरे !” - वो हैरानी से बोला - “तुम हथियारबंद थे, ये उनकी गन भी, तुम्हारे कब्जे में थी, फिर भी उन्हें निकल जाने दिया !”

“निकल के कहीं नहीं जाने वाले । नोन क्रिमिनल हुए तो पकड़े जायेंगे ।”

“जरूर ही पकड़े जायेंगे । अब तक दिल्ली में बैठे होंगे ! पता नहीं कहां के कहां पहुंच चुके होंगे !”

“अरे, रावत साहब, अभी से क्यों कलप रहे हो अपने साहब की तरह ! पहले उनके खिलाफ कुछ साबित तो हो ले...”

“हो नहीं चुका साबित ! तुम्हारे लाक्ड फ्लैट में घुसे, तुम पर हमला किया, तुम पर गन तानी ...”

“मौजूदा केस से ताल्लुक रखता कुछ साबित तो हो ले !”

“तुमने गलत किया लेकिन ....खैर ... और बोलो और क्या है ?”

मैंने मोबाइल में मौजूद उन दोनों की तसवीरें रावत को दिखाईं ।

“ओह !” - रावत बोला - “तस्वीरें खींच ली ! ये तो बड़ा काम किया !”

“ये उस्ताद है । बिरजे नाम है । इसके दायें हाथ की कलाई बुरी तरह से जख्मी है और ये बात इसे पहचनवायेगी - अब ये न पूछना क्यों जख्मी है, कैसे जख्मी है - ये इसका शागिर्द है, नाम मुझे मालूम नहीं । ये पुलिस के रिकार्ड में हुए तो इनका तमाम कच्चा चिट्ठा उजागर हो जायेगा ।”

“न हुए तो ?”

“तो किस्मत । तो इनकी शक्लों की तसवीरों का ही आसरा होगा इनकी तलाश में ।”

“हैडक्वार्टर जाना होगा । तुम्हारे सब कामों का वहीं होना मुमकिन है ।”

“ठीक है ।”

“कहां ठीक है ! मैं यहां खास ड्यूटी पर हूं ड्यूटी छोड़ कर नहीं जा सकता ।”

“इंस्पेक्टर साहब ने कहा न कि जा सकते हो !”

“साफ, दो टूक न कहा ।”

“फोन करो, अब कह देंगे ।”

वो हिचकिचाया ।

“हुज्जत न करो । लड़की को अब तुम्हारी प्रोटेक्शन की पहले जैसी जरूरत नहीं है । अब तुम्हारी यहां टोकन प्रेजेंस है । इस केस को अब खत्म समझो, इसलिये लड़की को अब कोई खतरा नहीं है ।”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“अरे, दो किलोमीटर पर तुम्हारा हैडक्वार्टर है । बड़ी हद एक घंटे में लौट आओगे ।”

“अच्छा !”

“ज्यादा टाइम लगे तो मैं वहां रुक जाऊंगा, तुम लौट आना ।”

“ठीक है । चलो ।”

********************************

हैडक्वार्टर पर एक्सपर्ट्स की पड़ताल से जो नतीजे सामने आये, वो बाकायदा मेरी पसंद के निकले । मसलन:

डियर पार्क वाली गोली उसी गन से चलाई गयी थी जो कि मैंने एसआई रावत को सौंपी थी ।

गन पर से उसका सीरियल नम्बर रेती से घिसकर मिटा दिया गया हुआ था, इसलिये उसकी ओनरशिप की पड़ताल मुमकिन नहीं रही थी ।

गन पर से उठाये गये स्पष्ट फिंगरप्रिंट्स का मैच पुलिस के रिकार्ड में मिला था जिसके अनुसार वो फिंगरप्रिंट्स बृजलाल नाम के एक नोन क्रिमिनल के थे ।

मेरे मोबाइल में मौजूद दो तसवीरों में से एक - उस्ताद की, बिरजे की - बृजलाल की थी ।

दूसरी तसवीर पुलिस की रोग गैलरी में नहीं थी लेकिन एक हवलदार ने उसे बृजलाल के जोड़ीदार रौशन रामपुरी के तौर पर पहचाना था ।

“इंस्पेक्टर साहब को रिपोर्ट करो ।” - मैं रावत से बोला - “शायद वो इन दोनों की तलाश और गिरफ्तारी की जरूरत महसूस करें ।”

“तुम क्या करोगे ?” - रावत बोला ।

वसंत लोक जाऊंगा । अभी वहीं जा रहा हूं । यादव साहब वहीं हैं, मुलाकात हो गयी तो मैं भी खबर करूंगा ।”

“ठीक है ।”

मेरे मोबाइल वाली तसवीरों का यहां कंप्यूटर पुलआउट निकाला गया था । कापी मुझे मिल सकती है ?”

“मालूम करता हूं ।”

उसने मुझे दोनों तसवीरों की कलर प्रिंटर से निकाली कापी ला के दी ।

********************************
 
वस्तुत: मैंने वसंत लोक का रुख न किया, मैं भीकाजी कामा प्लेस पहुंचा ।

तोशनीवाल एंटरप्राइसिज का आफिस बंद था । बंद प्रवेश द्वार पर एक नोटिस लगा था जिस पर दर्ज था:

दि आफिस इज क्लोज्ड फार इनडेफिनिट टाइम

ड्यू टू बीरीवमेंट इन सीएमडीज फैमिली

यानी सीएमडी के परिवार में मातम हुआ होने की वजह से आफिस अनिश्चित काल के लिये बंद था ।

उसी कम्पलैक्स में माथुर ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज का आफिस था, मैं वहां पहुंचा !

“राज शर्मा” - रिसैप्शन पर मैं बोला - “यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस । कल शाम को पूछा था कहां से बोल रहा हूं, क्या बनाता हूं, याद आया ?”

“यस, मिस्टर शर्मा ?” - व्यवसायसुलभ तत्पर और गम्भीर स्वर में रिसैप्शनिस्ट बोली ।

‘हां’ बोलते मुंह दुखता था साली का ।

“माथुर साहब से मिलना है ।”

“कान्फ्रेंस में हैं ।”

“कब फारिग होंगे ?”

“अभी तो बस शुरू हुई है, बहुत टाइम लगेगा ।”

“घंटों में तो नहीं लगेगा ?”

“लग सकता है । लगेगा ।”

“आई सी । मेरा काम माथुर साहब की प्राइवेट सैक्रेट्री से दो मिनट की मुलाकात से भी हो सकता है । पीएस साहिबा की क्या पोजीशन है ? वो भी कान्फ्रेंस में बिजी हैं ?”

“नहीं ।”

“तो मैं उनसे...”

“आफिस में नहीं हैं । बाहर गयी हैं किसी पर्सनल काम से ।”

“कब लौटेंगी ?”

“दो घंटे को बोल के गयी । जल्दी भी लौट सकती हैं ।”

“ठीक है । लौट के आता हूं ।”

उसने जवाब न दिया ।

साली मिजाज दिखा रही थी, बात करते अहसान कर रही थी ।

मेरा जाती तजुर्बा था कि बड़े कारपोरेट आफिसिज में फ्रंट आफिस का स्टाफ बडा मधुरभाषी होता था और आगंतुकों का स्वागत मधुर मुस्कराहट से, ‘वैलकम’ मुस्कराहट से करने का आदी होता था, ट्रेंड होता था । जरूर मेरे मुंह को बीट लगी थी जो मुझे वो ट्रीटमेंट हासिल नहीं हुआ था । साली जानती नहीं थी कि उस जैसियों का तो मैं सुबह नाश्ता करता था ।

********************************

मैं वसंत लोक होली एंजल पहुंचा ।

वहां लॉबी में इंक्वायरी पर ही मुझे ये गुड न्यूज मिल गयी कि प्वायजन केस शिव मंगल तोशनीवाल को रैगुलर रूम में शिफ्ट किया जा चुका था । मैंने रूम की बाबत दरयाफ्त किया और फिर उधर का रुख किया ।

दूसरी मंजिल पर मैंने लिफ्ट से बाहर कदम रखा ही था कि तोशनीवाल के रूम का दरवाजा खुला और पहियों वाला स्ट्रेचर धकेलता एक आर्डरली वहां से बाहर निकला । स्ट्रेचर एक सफेद चादर से ढ़ंका हुआ था और साफ पता चलता था कि चादर के नीचे कोई था ।

स्ट्रेचर के पीछे पीछे ही अत्यंत गम्भीर मुद्रा में डाक्टर शुक्ला ने कमरे से बाहर कदम रखा ।

वहां फिजा भारी थी, साफ लगता था कोई गम्भीर घटना घटित हुई थी ।

मैं लपक कर करीब पहुंचा ।

“क्या हुआ ?” - मैं व्यग्र भाव से बोला - “मिस्टर तोशनीवाल...”

“हद है दीदादिलेरी की !” - डाक्टर शुक्ला असहाय भाव से गर्दन हिलाता बोला - “क्या होगा इस मुल्क का !”

“क्या हुआ ?”

“दिन दहाड़े भरे पूरे हास्पिटल में कत्ल की कोशिश हुई ।”

“कोशिश ! कोशिश बोला ?”

“हां, भई । बच गये मिस्टर तोशनीवाल ईश्वर की कृपा से ।”

“तो.. .तो... उस स्ट्रेचर पर...”

“उनका कुत्ता था जो कि चॉकलेट खा के मरा ।”

“कुत्ता ! चॉकलेट !”

“तबीयत सुधरते ही मिस्टर तोशनीवाल अपने कुत्ते को याद करने लगे थे जो कि गुड साइन था । फरदर साइकॉलोजिकल एडवांटेज के लिये कुत्ते को यहां मंगवाया गया । मिस्टर तोशनीवाल बहुत खुश हुए । साढ़े तीन बजे के करीब कूरियर उनके लिये फूलों का बुके और चॉकलेट का बाक्स ले कर आया । बुके पर ‘गैट वैल सून’ का कार्ड लगा था इसलिये सहज ही सोच लिया गया कि किसी वैलविशर ने भेजा था । मिस्टर तोशनीवाल सुना है चॉकलेट्स पसंद करते हैं, उन्होंने बाक्स खोला और ये अच्छा इत्तफाक हुआ कि चॉकलेट पहले खुद खाने की जगह उन्होंने कुत्ते को खिलाई । कुत्ता ढेर हो गया तो पता लगा चॉकलेट में जहर था ।”

“जहर की शिनाख्त हुई ?”

“हां । स्ट्रिकनिन ।”

“तौबा !”

“बाल बाल बचे मिस्टर तोशनीवाल ! चॉकलेट पहले खुद खाते और फिर कुत्ते को खिलाते...”

डाक्टर के शरीर ने प्रत्यक्ष झुरझुरी ली ।

“वैसे कैसे हैं मिस्टर तोशनीवाल ?”

“पहले से बेहतर हैं । इम्प्रूव कर रहे हैं लेकिन फिर भी अभी उन्हें ज्यादा डिस्टर्ब किये जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।”

“इंस्पेक्टर साहब...”

“भीतर हैं । तुम्हारे आगे आगे ही पहुंचे ।”

मैंने कमरे में कदम रखा ।

यादव मुझे तोशनीवाल के सिरहाने खड़ा मिला । मैं उसके करीब पहुंचा ।

“बड़ी वारदात होते होते बची ।” - फिर धीरे से बोला ।

जवाब देने से पहले यादव मेरे साथ बैड से परे कमरे के एक कोने में सरक आया ।

“मालूम पड़ गया ?” - यादव संजीदा लहजे में बोला ।

“ऐन तुम्हारी नाक के नीचे...”

“नाक यहां नहीं थी, यार ।” - वो झुंझलाया - “एकाएक कहीं जाना पड़ गया । वो कूरियर मेरे पीछे आया ।”

“उसकी बाबत मालूम पड़ा कि...”

“फर्जी था । कूरियर था ही नहीं । बुके और चॉकलेट बाक्स यहां डिलीवर करके गया तो कोई डॉकेट साइन न कराया, कोई पीओडी साइन न कराई । कहीं किसी भेजने वाले का कोई नाम पता दर्ज नहीं था ।”

“दर्ज नहीं था या फर्जी था !”

“दर्ज ही नहीं था ।”

“कमाल है ! सामान किसी ने रिसीव किया या यूं ही पेशेंट के सिरहाने रख के चला गया ?”

“रिसीव किया । एक नर्स ने रिसीव किया । वो कहती है उसने पूछा भी था कोई साइन वाइन नहीं कराने ! बोला, नहीं कराने ।”

“नर्स कहां है ?”

“अभी यहीं थी । नर्सिंग स्टेशन पर होगी । क्यों ?”

“देखें जरा ।”

“लेकिन क्यों ?”

“आओ तो सही !”

तीव्र अनिच्छा का प्रदर्शन करता वो मेरे साथ चला ।

हम बाहर गलियारे में और आगे गलियारे के मध्य में स्थित नर्सिंग स्टेशन पर पहुंचे ।

नर्स वहां मौजूद थी । पूछने पर मालूम हुआ उसका नाम रोजीना था ।

“वो कूरियर” - मैं बोला - “जो मिस्टर तोशनीवाल के लिये बुके और चॉकलेट लाया, जो तुमने रिसीव किया...”

नर्स ने सशंक भाव से इंस्पेक्टर की तरफ देखा ।

यादव ने सहमति में सिर हिला कर उसे जवाब देने के लिये प्रेरित किया ।

“किया न !” – नर्स बोलीं – “बट फनी कूरियर ! कोई डाकेट साइन न कराया, कोई पीओडी एनडोर्स करने को न बोला ।”

“उसकी सूरत ठीक से देखी थी ?”

“देखा न ! फनी बिहेव करता था तो देखा न !”

“बयान करो ।”

“आई डोंट अंडरस्टैण्ड ।”

“वाट डिड ही लुक लाइक ?”

“ओह ! दैट ।”

उसने जो हुलिया बयान किया उसने मेरे जेहन में फौरन घंटी बजाई । मैंने अपने हालिया पोजेशन दोनों कम्प्यूटर प्रिंट्स जेब से निकाले और शागिर्द का प्रिंट उसको दिखाया ।

“ही वाज दि मैन ।” - प्रिंट पर निगाह पड़ते ही नर्स उत्तेजित भाव से बोली - “ही वाज दि मैन इनडीड । आई कैन रिकग्नाईज हिम फ्रॉम ए माइल ।”

यादव ने तसवीर मेरे हाथ से झपटी ।

“फट जायेगीं ।” - मैं बोला - “तुम्हारे रिकार्ड में है । इसे छीनने की कोई जरूरत नहीं ।”

“कौन है ये ?”

“रौशन रामपुरी नाम है । बृजलाल नाम के एक दूसरे बैड कैरेक्टर का जोड़ीदार है - शागिर्द है ।”

“क्या किस्सा है ?”

“यहां से हटो, बताता हूं ।”

मैंने नर्स को ‘थैंकयू’ बोला, हम वापिस तोशनीवाल के कमरे के दरवाजे पर पहुचें ।

“अब बोलो ।” - यादव उतावले स्वर में बोला ।

जो ड्रामा मेरे फ्लैट पर हुआ था, उसे मैंने सविस्तार दोहराया ।

“अरे, उन्हें रोका क्यों नहीं ?” - यादव कलपता-सा बोला ।

“जिसे जान से जाने की परवाह न हो” - मैं बोला - “उसे गन दिखा के नहीं रोका जा सकता ।”

“टांग में गोली मारता । लंगड़ा करता सालों को ।”

“फिर अभी भी मैं वहीं होता ।”

“शर्मा, गलत किया । उस साले तिजोरीतोड़ की खातिर...”

“अव्वल तो गलत किया नहीं, किया तो ऐसा न किया जिसे दुरुस्त न किया जा सकता हो ।”

उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“तुम्हारे महकमे ने उनकी तलाश शुरू कर भी दी हुई है । आज की तारीख बदलने से पहले काबू में न हों तो बोलना ।”

“न हुए तो ?”

“तो पुलिस की छवि बनाने के लिये सारे गुनाह मैं अपने सिर ले लूंगा । कनफैस कर लूंगा सब कत्ल मैंने किये ।”

“बकवास न कर ।”

“सरकार का हुक्म सिर माथे ।”

“ड्रामा भी मत कर ।”

मैं खामोश रहा ।

“तो ये दोनों जमूरे कातिल के लिए काम कर रहे थे !”

“वो तो अब जाहिर है । ये भी जाहिर है कि सिद्धार्थ एन्क्लेव में मकतूला सपना टाहिलियानी के फ्लैट में तलाशी के सिलसिले में जो उत्पात मचाया था, इन्होंने मचाया था ।”

“ये साले छंटे हुए बदमाश... इन्हें अनाड़ी, नौसिखिया कैसे कहा जा सकता है ?”

“क्या मतलब ?”

“मकतूला सपना टाहिलियानी के फ्लैट पर वहां की दुरगत देखकर कल जो खुद कहा था, वो भूल गया !”

“क्या ? क्या कहा था ?”

“वाकई भूल गया । अरे, कहा नहीं था कि घुसपैठिया कोई अनाड़ी था, नौसिखिया था वरना इतनी दुरगत हुई होती !”

“ओह !”

“लगता है याद आ गया । तब मेरा जोर बतौर कातिल, बतौर घुसपैठिया श्यामली तोशनीवाल पर था, क्योंकि एक औरत का ऐसे कामों में अनाड़ी, नौसिखिया होना समझ में आता है ।अब जबकि उसका भी कत्ल हो गया है तो वो तो घुसपैठिया वाले इलजाम से बरी हो गयी । अब क्या कहता है ?”

मैंने तुरंत उत्तर न दिया, मैंने उस नुक्ते पर गम्भीर विचार किया ।

“यादव साहब” - फिर बोला - “जो मैंने पहले कहा था वो भी गलत नहीं था, ये भी गलत नहीं है कि बृजलाल, रौशन रामपुरी की - उस्ताद शागिर्द की - जोड़ी को अनाड़ी, नौसिखिया नहीं कहा जा सकता - जो साले मेरे फ्लैट का इतनी नफासत से ताला खोलकर कि उस पर खरोंच तक नहीं आई थी भीतर घुसे बैठे थे वो अनाड़ी, नौसिखिया तो नहीं हो सकते !”

“फिर ?”

“फिर इसका एक ही मतलब है ।”

“क्या ?”

“तलाशी किसी और ने ली और अपनी नाकामी को आगे ट्रांसफर किया । ये भी बताया कि वहां एक तिजोरी थी जो कि आसानी से खोली नहीं जा सकती थी और ये कि तलाश की आइटम उस तिजोरी में बंद हो सकती थी । तब उन जमूरों ने टेकओवर जिन्हें खबर थी कि तिजोरी खोली जा चुकी थी, मेरी मौजूदगी में खोली जा चुकी थी, मैं तिजोरी खोलने वाले के साथ वहां अकेला था इसलिए मैंने...मैंने, बकौल उनके... ‘आइटम’ वहां से निकाली हो सकती थी । इसलिये वो दोनों मेरे फ्लैट में घुसे थे और ‘आइटम’ को तलाश कर रहे थे जबकि मैं ऊपर से पहुंच गया था ।”

“हूं ।”

“यादव साहब मेरा सवाल ये है कि उन्हें कैसे मालूम था कि बाद में तिजोरी मेरी मौजूदगी में खोल ली गयी थी और ‘आइटम’ मैंने उसमें से निकाल ली थी और इसलिये पुलिस के हाथ नहीं लगी थी ?”

“तूने निकाल ली थी ?”

“वो ऐसा समझ रहे थे ।”

“दाता ! तूने निकाल ली थी । उस्ताद तिजोरीतोड़ के साथ तिजोरी के सिरहाने अकेले होने का फायदा उठाया ।”

“वाट नानसेंस ! अरे, कहां की बात कहां पंहुचा रहे हो ! ये कोई वक्त है ऐसी बातें करने का !”

“शर्मा सच बता, तूने तिजोरी में से कुछ निकाला था ?”

“जिसकी मर्जी कसम उठवा लो, ऐसा कुछ नहीं किया था मैंने । अब मेरे पर एतबार लाओ, इस बात का पीछा छोड़ो और मेरे सवाल की तरफ तवज्जो दो । उन लोगो को कैसे मालूम था कि किसी की नाकाम तलाशी के बाद तिजोरी खोज ली गयी थी और मैंने...मैंने उसमें से कोई आइटम निकाली हो सकती थी ?”

“कातिल ने बताया - जिसके लिए वो काम कर रहे थे, उसने बताया ।”

“उसको कैसे मालूम था ? वो तो मौकायवारदात पर मौजूद नहीं था ! न हो सकता था !”

यादव कई क्षण खामोश रहा ।

“मेड !” – फिर एकाएक बोला – “मकतूला की मेड ! किरण ! ये जानकारी किसी ने उससे निकलवाई । वही तब फ्लैट में आ जा रही थी, छत वाले कमरे में बैठने की जगह दो बार नीचे आई थी, इतनी नादान वो नहीं थी कि न भांप पाती कि वहां क्या हो रहा था !”

“बात तो तुम्हारी ठीक है ! वो तो बैडरूम में मेरे और डिप्टी के सिर पर भी पहुंची थी !”

“उन दोनों बदमाशों में से कोई - या दोनों, या खुद कातिल - उससे मिला और प्यार से, मनुहार से या धमकी से उसने अपने मतलब की बात उससे निकलवाई...”
 
“और ये, गलत, नतीजा निकाला कि आइटम...उनकी जुबान में...मेरे कब्जे में थी इसलिये मेरे पर चढ़ दौड़े !”

“अब तो जाहिर है ऐसा ही हुआ । शर्मा, नाहक तूने उन्हें निकल जाने दिया ।”

“फिर, वहीं पहुंच गए !”

“चल, छोड़ । आइटम की बात कर । आइटम, आइटम बहुत हो गया, आइटम आखिर थी क्या ?”

“थी क्या । बहुवचन में बोले हर बार वो लोग । जरुर अनपढ़ थे, मुंह से ‘आइटम’ निकलता था, जेहन में ‘आइटम्स’ होता था ।”

“अरे, थी क्या ?”

“तारीख बदलने से पहले जान जाओगे ?”

“क्या मतलब है तेरा ? कहीं तू जान तो नहीं चुका ?”

“अरे नहीं ! जान चुका होता तो तुम से छुपा के रखता ! मजाल होती मेरी !”

“हां ।”

“यादव साहब, आनेस्ट” - मैंने अपने गले की घंटी को छुआ - “उस बाबत मैं कुछ नहीं जान चुका ।”

“तो फिर ये क्यों बोला तारीख बदलने से पहले मैं जान जाऊंगा ?”

“सब जान जायेंगे । मुझे यूं समझो कि इलहाम हो रहा है कि ये केस बस वाइंड अप हुआ कि हुआ ।”

“अरे, गोली तो नहीं दे रहा ?”

“नहीं । मेरी मजाल...”

“ढ़ंक के रख अपनी मजाल को । शर्मा, मैं बहुत बुरा आदमी हूं...”

“खामखाह अपने मुंह मियां मिट्ठू न बनो । इतने बुरे नहीं हो । तुमसे कहीं बुरे मौजूद हैं दिल्ली शहर में । फिर छ: बेटियों का बाप चाह कर भी इतना बुरा नहीं हो सकता । कहो कि मैंने गलत कहा !”

“सही गलत समझ में आये तो कुछ कहूं न !”

“अब पोजीशन क्या है ?”

“किसकी ?”

“केस की ? तोशनीवाल के साथ हुई नयी वारदात के कांटेक्स्ट में केस की ?”

“अरे, ये पूछ न कि मेरी...मेरी पोजीशन क्या है !”

“क्या है ?”

“जम के क्लास ले रहा है तोशनीवाल मेरी । मेरे को निकम्मा पुलिस वाला करार दे रहा है । इलजाम लगा रहा है कि पहले ऐन मेरी नाक के नीचे उसकी बीवी का खून हो गया, अब यहां उसका होते होते बचा । बाल बाल बचा । बड़े थियेट्रिकल अंदाज में कह रहा था कि उसकी खातिर प्रिंस शहीद हो गया, खुद मरके उसे जिंदगी दे गया ।”

“इतना कुछ कह रहा है तो बात कर सकता है न !”

“जाहिर है । क्यों ?”

“करते हैं । भीतर चलो ।”

हमने भीतर कदम रखा ।

डाक्टर शुक्ला भीतर मौजूद था और अपने मरीज का मुआयना कर रहा था ।

हम उसके फारिग होने का इंतजार करने लगे ।

“दि प्रॉग्रेस इस वैरी सैटिस्फैक्ट्री, मिस्टर तोशनीवाल ।” - आखिर उससे परे हटता डाक्टर शुक्ला बोला - “यू विल बी आल राइट इन नो टाइम ।”

“थैंक्यू ।” - तोशनीवाल क्षीण स्वर में बोला ।

“हम इनसे” - मैं बोला - “दो मिनट बात कर सकते हैं ?”

“ठीक है ।” – डाक्टर बोला – “दो मिनट ।”

हम तोशनीवाल के सिरहाने पहुंचे ।

“क्या हुआ, जनाब ?” – मैं सहानुभूतिपूर्ण स्वर में उससे सम्बोधित हुआ ।

“अब क्या फायदा बताने का क्या हुआ !” - तोशनीवाल क्षीण किंतु खिन्न स्वर में बोला - “त्रेहन की दीदादिलेरी की इन्तहा हुई, ये हुआ । चाय में जहर से बच गया तो जहर वाली चॉकलेट भेज दीं । मालूम जो था उसे मैं चॉकलेट पसंद करता था । मैंने खाने के लिये एक चॉकलेट निकाली तो प्रिंस गुर्राने लगा, चॉकलेट की मांग करने लगा । मैंने वही चॉकलेट उसे खिला दी और अपने लिये नयी निकाल ली । तभी प्रिंस यूं कांपने लगा जैसे कोई जूड़ी के बुखार में कांपता है, फिर गिर पड़ा और तड़पने लगा । मुंह से झाग निकलने लगी, आंखें उलटने लगीं । मेरे प्राण कांप गये । मैंने चॉकलेट परे फेंकी और नर्स के लिये घंटी बजाने लगा । लगातार बजती घंटी की वजह से नर्स दौड़ी आयी, पीछे पीछे दो आर्डरली आये । फिर डाक्टर शुक्ला आये । गॉड ! गॉड !” - उसके शरीर ने जोर से झुरझुरी ली - “प्रिंस की जान चली गयी ताकि मेरी जान बच जाती । गॉड ! गॉड !”

उसकी आंखें भर आयी ।

“दैट विल बी एनफ ।” - हमारे पीछे से डाक्टर शुक्ला बोला ।

यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।

मैंने चॉकलेट बाक्स का मुआयना किया । उस पर स्टिकर लगा था:

मारबल डिपार्टमेंट स्टोर, वसंत कुंज ।

Chapter 5

मैं वसंत कुंज पहुंचा ।

मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से वहां हर कोई वाकिफ था ।

वो कोई बहुत बड़ा स्टोर नहीं था । वहां कनफेक्शनरी और मैडीसिंस का अलग काउंटर था । मैं वहां पहुंचा ।

एक अधेड़ व्यक्ति काउंटर की परली तरफ से मेरे सामने पहुंचा ।

“चॉकलेट्स ।” - मैं बोला - “ब्लैक पैशन । एक किलो का बाक्स ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया और ऐन वैसा बाक्स पेश किया जैसा मैं हस्पताल में देख कर आया था ।

“कीमत ?” - मैं बोला ।

“पंद्रह सौ रुपये ।”- सेल्समैन बोला ।

“इतनी महंगी चॉकलेट हर कोई तो नहीं खरीदता होगा !”

“खरीदते हैं । लेकिन किलो का बाक्स हर कोई नहीं खरीदता ।”

“हाल में किलो का बाक्स कब बेचा ?”

“आप क्यों पूछ रहे हैं ?”

“जवाब दो । मैं डिटेक्टिव हूं ।”

उसके चेहरे पर संदेह के भाव आये ।

मैंने उसे अपने आई-कार्ड की झलक दिखाई ।

मुझे कई बार तजुर्बा हो चुका था कि उस एक्शन से ही आम लोग बाग मुतमईन हो जाते थे और सहज ही समझ लेते थे कि मैं पुलिस के महकमे से था । उसके चेहरे से भी तत्काल संदेह के भाव छंटे और सम्मान के भाव आये ।

“कल शाम को ।” - वो बोला ।

“शाम को किस वक्त ?”

“सूरज डूबने के बाद । अंधेरा हो जाने के बाद । काफी बाद ।”

“टाइम बोलो, भई ।”

“कस्टमर की आमद का टाइम क्लॉक करके कौन रखता है !”

“ठीक ! लेकिन जब वो कस्टमर - खास कस्टमर, खास, कम डिमांड वाली आइटम का कस्टमर - तुम्हें याद आ गया है तो टाइम का कोई तो अंदाजा तुम्हें होना चाहिये या नहीं ?”

उसने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया ।

“वो अंदाजा ही बोलो ।”

उसके माथे पर बल पड़े, कई क्षण वो खामोश रहा ।

“सात से आठ ।” - फिर बोला ।

“जिस कस्टमर ने ब्लैक पैशन का एक किलो का डिब्बा खरीदा, वो कल शाम सात और आठ के बीच यहां था ?”

“हां । यही बोला मैंने ।”

“सुना मैंने । मर्द या औरत ?”

“मर्द ।”

“कैसा ?”

“कैसा क्या मतलब ?”

“देखने में कैसा था ? हुलिया, कद काठ, शक्ल सूरत बयान करो ।”

“ठिगना था । चेहरे पर तरह तरह के खरोंचों के निशान थे । एक बांह में कोई नुक्स था ।”

“कैसा नुक्स ?”

“टेढ़ी थी । मुड़ी हुई थी । दूसरी बांह से छोटी थी ।”

“छोटी कौन सी थी ? दायीं या बायीं ?”

“दायीं ।”

“और ?”

“लंगड़ा के चलता था ।”

“पहले कभी उस शख्स को देखा ?”

“नहीं पहले कभी नहीं देखा था, लेकिन...”

“लेकिन क्या ?”

“उसका कदकाठ एक और शख्स से मिलता था जो कि अक्सर यहां आता है । कोई फर्क था तो बस ये था कि उसके चेहरे पर खरोंचों के निशान नहीं थे, कैसे भी निशान नहीं थे । उसकी बांह में, चाल में भी कोई नुक्स नहीं था ।”

“वो कौन हुआ ?”

“नाम नहीं मालूम ।”

“आखिरी बार स्टोर में कब देखा था ?”

“दो दिन पहले ।”

“ठीक से याद है ?”

“हां । वजह है ठीक से याद होने की । तब वो सीधा इसी काउंटर पर पहुंचा था और सिंगल आइटम खरीद कर चला गया था ।”

“सिंगल आइटम क्या ?”

“चूहे मारने की दवा । कल शाम वाले - नुचे हुए चेहरे, लंगड़ी टांग और टेढ़ी बांह वाले - ग्राहक की तरफ मेरी खास तवज्जो इसलिये भी गयी थी कि उसने भी वही दवा खरीदी थी ।”

“रैट पायजन ?”

“हां ।”

“स्ट्रिकनिन ?”

“मुझे नहीं मालूम ।”

“मुझे बात को तरीके से समझने दो । कल शाम सात और आठ बजे के करीब यहां पहुंचे खास, शक्ल सूरत वाले जिस ग्राहक ने ब्लैक पैशन चॉकलेट का एक किलो का पैक खरीदा था, उसी ने तभी, चूहे मारने की दवा भी खरीदी थी ?”

“हां ।”

“क्या हां । चॉकलेट्स के साथ साथ रैट प्वायजन भी बेचते हो ?”
 
“वो कैमिस्ट शाप की आइटम है । कैमिस्ट शाप दायें बाजू है लेकिन ये काउंटर सांझा है । कल शाम वाला डिफार्म्ड कस्टमर जब यहां आया था, तब कैमिस्ट शाप का सेल्समैन बाई चांस यहां नहीं था । तब ब्लैकपैशन के किलो के पैक के बाद मैंने ही उसे रैट प्वायजन का पैकेट निकाल कर दिया था ।”

“ले के आओ ।”

“क्या ?”

“पैकेट ।”

“वो तो वो ले गया !”

“अरे, वो नहीं, वैसा पैकेट । है या नहीं ?”

“है ।”

“तो ले के आओ न, भई ।”

उसने पैकेट ला कर काउंटर पर रखा ।

वो ऐन वैसा पैकेट था जैसा पिछली रात देवीलाल के कमरे की अलमारी के टॉप शैल्फ पर से बरामद हुआ था ।

“इस पर” - मैं बोला - “रैट प्वायजन के नीचे स्ट्रिकनिन लिखा तो है !”

“हां, लिखा है । मैंने ध्यान नहीं दिया था ।”

“ये घातक जहर है !”

“साहब, जहर की बाबत मुझे मालूम है लेकिन मैं नाम से बेखबर था । मुश्किल स्पैलिंग्स वाला वर्ड है न, मेरे से प्रोनाउन्स नहीं होता ।”

“जब मालूम है ये जहर है तो ये भी तो मालूम होना चाहिये कि इसका कोई बेजा इस्तेमाल हो सकता है !”

“मालूम है । इसीलिये सावधानी बरतते हैं !”

“क्या ? क्या सावधानी बरतते हो ?”

“कस्टमर से कैशमीमो पर साइन कराते हैं और नाम और मोबाइल नम्बर लिखवाते हैं ?”

“कल लिखवाया था ?”

“हां । बिल्कुल !”

“दो दिन पहले भी ?”

वो परे देखने लगा ।

“जवाब दो ।”

“वो... वो क्या है कि.. .दो दिन पहले वाला नोन कस्टमर था, अक्सर यहां आता था ।”

“इसलिये उसे रूटीन से बरी कर दिया ! उससे परचेज पर साइन न कराये ! नाम, मोबाइल नम्बर लिखवाया !”

“ये. . .रूटीन हमारी खुद की है, कोई सरकारी फरमान नहीं है । जिस ग्राहक को हम पहचानते हैं, उसके लिये रूटीन को हम नजरअंदाज कर सकते हैं ।”

“दिस इज हाईली इररैगुलर...”

“खामखाह ! जब ऐसा कोई सरकारी नियम या हुक्म है ही नहीं...”

“ठीक ! ठीक ! कल शाम वाले कस्टमर के बारे में क्या कहते हो ? वो तो नोन कस्टमर नहीं था.. .या था ?”

“नहीं था । इसीलिये उससे कैशमीमो पर साइन कराये गये थे और नाम और मोबाइल नम्बर लिखवाया गया था ।”

“गुड ! यहां बिल कैसे बनाते हो ? कम्प्यूटर से या बिलबुक पर ।”

“दोनों तरह से । कल प्रिंटर डाउन था इसलिये बिल बिलबुक पर बनाया था ।”

“बिलबुक ले के आओ । मुझे कार्बन कापी दिखाओ ।”

उसने वो काम किया ।

फिर बिलबुक को एक जगह से खोल कर मेरे सामने रखा ।

कार्बन कापी पर कस्टमर का नाम उसके हस्ताक्षरों के नीचे कैपीटल लैटर्स में विष्णु कसाना दर्ज था ।

मैं मोबाइल निकाल कर उस पेज की तसवीर खींचने लगा ।

“फोटोकापी मिल सकती है ।” - सेल्समैन बोला - “फोटोकापियर यहीं है ।”

“फिर क्या वात है ! शुक्रिया पहले कुबूल करो ।”

वो कापी बना कर लाया ।

********************************
 
बाहर आ कर मैंने यादव का मोबाइल बजाया ।

कोई जवाब न मिला ।

फोन स्विच्ड ऑफ तो नहीं था, शायद म्यूट पर था, घंटी की उसे खबर नहीं लगी थी ।

मैंने उसके मातहत सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर को काल लगाई ।

तत्काल उत्तर मिला ।

“राज शर्मा बोल रहा हूं ।” - मै बोला - “कहां हो ? अपने इंस्पेक्टर साहब के साथ तो नहीं थे ?”

“ओखला में हूं ।” - जवाब मिला ।

“वहां कैसे पहुंच गये ?”

“जमना से विष्णु कसाना की लाश बरामद हुई है । बैराज के एक गेट में अटकी मिली ।”

“अरे ! कब ?”

“अभी दो घंटे पहले ।”

“कैसे मरा ?”

“पता लगेगा । लेकिन लाश की हालत से ये अभी मालूम है कि कब मरा !”

“अच्छा ! कब मरा ?”

“चार-पांच दिन हो गये जान पड़ते हैं ।”

“कैसे हो सकता है ! अभी परसों रात तो वो साक्षात तोशनीवाल फार्म पर मौजूद था, जहां उसने मालिक की बेटी की लाश बरामद की थी !”

“यादव साहब से डिसकस करना ।”

“अच्छी राय दी । यही करता हूं ।”

********************************

वस्तुत: मैंने भीकाजी कामा प्लेस का रुख किया ।

जहां या सूरजभान कपुर की कान्फ्रेंस खत्म हो चुकी हो सकती थी या दो घंटे के लिये बाहर गयी उसकी प्राइवेट सैक्रेट्री लौट आई हो सकती थी ।

मैं माथुर ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज के आफिस में पहुंचा तो पता लगा दूसरी बात हुई थी - सैक्रेट्री लौट आयी थी ।

मैंने रिसैप्शन पर बिग बॉस से नहीं तो उसकी पीएस से मुलाकात की अपनी दरखास्त दोहराई तो रिसैप्शनिस्ट साफ मेरे पर अहसान करते हुए फोन पर बात करने लगी ।

मैं धीरज से प्रतीक्षा करता रहा ।

और क्या करता ! गर्जमंद जो था !

रिसैप्शनिस्ट ने फोन वापिस क्रेडल पर रखा ।

मेरी भवें उठीं ।

“जाइये ।” - वो बोली ।

“कहां ?”

“साहब की पीएस के आफिस में ।”

“वो कहां है ?”

“मिस्टर शर्मा, आप पहले यहां आ चुके हैं ।”

“याददाश्त अच्छी है तुम्हारी । लेकिन मेरी इतनी अच्छी नहीं है । मसलन मुझे यही याद नहीं रहा था कि आंखों के अलावा भी तुम्हारी कोई चीज बड़ी है...”

उसने काल बैल बजाई ।

फौरन एक चपरासी रिसैप्शन पर पहुंचा जिसे रिसैप्शनिस्ट ने आवश्यक निर्देश दिये, मुझे उसके हवाले किया और मेरी तरफ से पीठ फेर ली ।

चपरासी ने मुझे प्राइवेट सैक्रेट्री के आफिस में पहुंचाया ।

मैं उसके सामने एक विजिटर्स चेयर पर बैठा, मैंने उसका अभिवादन किया ।

“यस, मिस्टर शर्मा” - वो मधुर स्वर में बोली - “कल जिमखाना में साहब से मुलाकात हो गयी थी ?”

“हां । बहुतु ही तसल्लीबख्श मुलाकात हुई थी । बहुत मेहरबान हैं, माथुर साहब ।”

“आज तो मुलाकात नहीं होगी क्योंकि... ”

“लम्बी कान्फ्रेंस में हैं । मालूम हुआ मुझे । लेकिन मेरा मकसद तुम्हारे से भी हल हो सकता है ।”

“ऐसा ?”

“हां ।”

उसके चेहरे पर अनिश्चय के भाव आये ।

“दूसरी बार आया हूं ।” - मैं बोला - जैसे मेरा यूं कोई क्रेडिट बन सकता हो ।

“अच्छा ! ”

“डेढ़ घंटा पहले आया था तो पता चला था तुम आफिस में नहीं थी ।”

“मैं... मैं जरा.. .ठीक है । करो हल मतलब ।”

“थैंक्यू । शिल्पी तायल... कत्ल की खबर लगी ?”

“हां ।” - उसके लहजे में फौरन उदासी आयी - “लगी तो सही ! कितनी कठिन है जिंदगी राजधानी में !”

“तुम्हारी फ्रेंड थी ?”

उसकी भवें उठी ।

“खुद माथुर साहब ने बताया । लंच इकट्ठे होता था ।”

“ये भी बोला ?”

“बोला तो इसके अलावा भी बहुत कुछ लेकिन वो किस्सा फिर कभी । अभी मैं शिल्पी तायल के घर का पता जानना चाहता हूं ।”

“क्यों ?”

“है कोई वजह जो तुम्हें समझाना मुश्किल है ।”

“कोशिश करो ।”

“टाइम जाया होगा ।”

“साहब लम्बी कांफ्रेंस में हैं इसलिये है मेरे पास टाइम ।”

“मेरे पास नहीं है ।”

“मुझे उसका पता कैसे मालूम होगा !”

“वैसे ही जैसे सखी को सखी से और बहुत कुछ मालूम होता है ।”

“आई डोंट अंडरस्टैण्ड ।”

“ट्राई टू । जब उसने ये तक बताया कि कभी उसके एम्पलायर का उससे अफेयर था, ये तक बताया कि कभी उसकी मां भी उसके एम्पलायर की मुलाजिम थी, ये तक बताया कि... ”

“दैट विल बी एनफ ।” - वो जल्दी से बोली ।

मैं खामोश हो गया ।

“कैसे जाना इतना कुछ ?”

“माथुर साहब ने बताया ।”

“कमाल है ! इतना मुंह लगाया कल तुम्हें !”

“हां । वो बिजी न होते तो पता मैं उन्हीं से पूछता ।”

“उन्हें मालूम होता ?”

“तुमसे मालूम करते न !”

वो सकपकाई ।

“मेरी दरख्वास्त पर । मुंहलगा जो ठहरा मैं उनका !”

“हूं ।”

“इतना सोच विचार बेमानी है । मुझे मालूम है वो चितरंजन पार्क के एक किराये के फ्लैट में रहती थी ।”

“ये कैसे मालूम है ?”

“उसी ने बताया था ।”

“यानी मिले थे उससे !”

“हां । अभी कल ही मिला था ।”

“तो पता उसी से पूछा होता !”

“तब जरूरत नहीं थी । तब मालूम नहीं था इतनी जल्दी उस अंजाम को पहुंचेगी जिसको कि पहुंची ।”

“हां ।” - उसने अवसादभरी गहरी सांस ली - “उसका कत्ल हुआ है । कत्ल के बाद पता क्या कोई सीक्रेट रहा होगा ! तुम डिटेक्टिव हो, पुलिस से भी मालूम कर सकते हो ।”

“बिल्कुल ठीक ! लेकिन मुझे उंगली से अंगूठे तक पहुंचने के लिये कोहनी तक वाला रूट पकड़ने की आदत है । जमा, तुम्हारे जैसी प्राइम ब्यूटी से लम्बी लम्बी हांकने की आदत है ।”

उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये ।

“क्योंकि मेरा मिजाज लड़कपन से आशिकाना है ।”

“बस करो । नोट करो । सी-460, सैकंड फ्लोर, विपिनचंद्र पाल मार्ग, चितरंजन पार्क ।”

“थैंक्यू । अकेली रहती थी ?”

“नहीं, एक फ्लैटमेट थी । है । चित्रिका मुखर्जी नाम है ।”

“बंगाली !”

“भई, जब मुखर्जी है तो...”

“ठीक । ठीक । तायल के बारे में क्या कहती हो ?”

“क्या कहूं ?”

“शिल्पी कौन जात हुई ?”

“मुझे नहीं मालूम ।”

“कोई अंदाजा ?”

“नहीं है । लेकिन फिर एक अंदाजा है भी ।”

“क्या ?”

“शायद बंगाली हो - इसीलिये बंगाली फ्लैटमेट चुनी हो - शायद उसका नाम किसी लम्बे नाम का छोटा एडीशन हो ! जैसे मुखोपाध्याय का मुखर्जी होता है ।”

“चटटोपाध्याय का चटर्जी होता है ! बंद्योपाध्याय का बनर्जी होता है !”

“वही ।”

“लहजे से बंगाली लगती थी ?”

“नहीं, भई, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं थी । दिल्ली में पुराने बसे बाशिंदों का एक ही लहजा होता है । दिल्ली वाला ।”

“ठीक । ये फ्लैटमेट...चित्रिका मुखर्जी...ये क्या करती है ?”

“नौकरी ही करती है । काल सेंटर की ।”

“वो तो शिफ्ट की जॉब होती है !”

“हां ।”

“फिर तो हो सकता है घर पर हो !”

“हो सकता है । ट्राई करके देखो ।”

“राय का शुक्रिया, मैडम” - मैं उठ खड़ा हुआ - “सहयोग का डबल शुक्रिया ।”

“वैलकम ।”

“वैसे एक बात का अफसोस है ।”

“किस बात का !”

“सखी की सखी का नाम बताया, अपना नाम न बताया ।”

वो हंसी ।

खनकती हंसी । तौबाशिकन हंसी । मेरी खास जानी पहचानी, हंसी तो फंसी वाली हंसी ।

“हिमानी ।” - फिर बोली - “हिमानी पाहूजा ।”

नाम मैंने फ्यूचर प्रास्पैक्ट्स की लिस्ट में दर्ज कर लिया ।

********************************
 
बीस मिनट बाद मैं चितरंजन पार्क पहुंचा सी-460 के सैकण्ड फ्लोर की घंटी बजा रहा था ।

घुटनों से जरा नीचे तक आने वाली टाइट जींस और वूलन स्कीवी पहने एक सांवली रंगत वाली, कटे बालों वाली निहायत दुबली लेकिन बढिया बनी हुई युवती ने दरवाजा खोला ।

“यस ?” - वो सहज भाव से बोली ।

“चित्रिका मुखर्जी ?” - मैंने अदब से पूछा ।

वो सकपकाई, उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“हां ।” - फिर बोली ।

“मैं राज शर्मा ।” - मैंने उसे अपने आइ-कार्ड की झलक दिखाई - “डिटेक्टिव ! आप की फ्लैटमेट शिल्पी तायल के.. .सिलसिले में यहां आया ।”

“पुलिस तो आके जा चुकी है !”

“पुलिस डिटेक्टिव नहीं हूं प्राइवेट डिटेक्टिव हूं ।”

“प्राइवेट डिटेक्टिव का यहां क्या काम ?”

“बाई चांस है । वो क्या है कि शिल्पी के एम्प्लायर मिस्टर शिव मंगल तोशनीवाल ने मुझे एंगेज किया है ।”

“शिल्पी के मर्डर की तफ्तीश के लिये ?”

“मल्टीपल मर्डर्स की तफ्तीश के लिये । आपको पता चला ही होगा कि उनकी बेटी सुरभि और पत्नी श्यामली का भी मर्डर हुआ है । तीनों कत्ल एक ही जंजीर की कड़ियां हो सकते हैं । यू अंडरस्टैंड माई पॉइंट ?”

“आई थिंक आई डू । प्लीज कम इन ।”

“थैंक्यू ।”

मैंने भीतर सुसज्जित ड्राईंगरूम में कदम रखा तो उसने मेरे पीछे दरवाजा बंद किया ।

“काफी बड़ा फ्लैट है !” - मैं हर तरफ निगाह दौड़ाता बोला ।

“थ्री बैडरूम, ड्राईंग डायनिंग, सर्वेंट रूम ।” - वो बोली ।

“किराया भी बड़ा ही होगा ?”

“ऐसा ही है ।”

“थ्री बैडरूम... यानी कोई तीसरा फ्लैटमेट भी...”

“नहीं । खाली है । लेकिन फर्निश्ड है । गैस्टरूम की तरह यूज होता है ।”

“आई सी । मैडम, इससे पहले मैं अपनी इनवैस्टिगेशन के सिलसिले में आगे बढूं इजाजत हो तो कुछ दुनियादारी की बात करूं ? ऐसी बात करूं जिससे कि मेरी जिज्ञासा शांत हो ?”

“जिज्ञासा ! किसकी बाबत ?”

“आप ही की बाबत ।”

“ठीक है, करो ।”

“खफा तो नहीं होगी न !”

“नहीं ।”

“प्रॉमिस ?”

“यस ।”

“आप टोटल इतनी ही हैं ?”

“क्या बोला ?”

“दो बार सामने से गुजरेंगी तो आपकी परछाई मेरे पर पड़ पायेगी ।”

उसकी हंसी छूट गयी ।

“अरे मैं साइज जीरो हूं ।” - फिर हंसी दबाती बोली ।

“यानी कि हैं ही नहीं !”

“लगता है साइज जीरो का मतलब नहीं समझते हो !”

“समझता तो हूं लेकिन...अब मैं क्या कहूं ! जितनी कुल हो, उससे ज्यादा का तो सलमान खान ब्रेकफास्ट करता होगा ।”

वो फिर हंसी ।

“बस करो अब” - इस बार उसने हंसी दबाने की कोशिश न की - “काफी दुनियादार बन चुके । अब मतलब की बात करो... जो कि करने आये हो ।”

“ओके । शिल्पी का रूम कौन सा है ?”

उसने एक बंद दरवाजे की ओर इशारा किया ।

“पुलिस आपकी मौजूदगी में यहां आयी थी ?”

“और कैसे आती ! मेन डोर तोड़ कर ?”

“सारी ! कुछ हाथ लगा ?”

“नहीं । मेरे खयाल से तो वो लोग इस नीयत से आये ही नहीं थे, वो तो लगता था कि उस जगह से महज वाकिफ होने आये थे जहां कि ...वो रहती थी ।”

“फिर भी उसका सामान वगैरह तो टटोला होगा ?”

“हां । खानापूरी तो की !”

“आप से भी पूछताछ की होगी !”

“की थी लेकिन वो भी खानापूरी ही थी । कब से वाकिफ थी ! कब से साथ रह रही थी ! मरने वाली का कोई दुश्मन ! कोई खास दोस्त ! वो वारदात होने से पहले मरने वाली का मूड कैसा था ! क्या डरी हुई थी ! किसी बात से परेशान थी ! नार्मल डेली लाइफ शिड्यूल में कोई सडन चेंज थी ! वगैरह ।”

“आई सी ।”

“खास तौर से मेरे से ये पूछा था कि क्या मुझे मरने वाली के किसी रिश्तेदार, किसी सगे सम्बंधी की कोई खबर थी !”

“थी ?”

“नहीं । लेकिन...”

“लेकिन क्या ?”

“एक दो बार जब वो फोन पर थी तो लगा था जैसे अपनी मां से बात कर रही हो । आउट आफ क्युरियोसिटी मैंने उस बाबत सवाल किया था तो जवाब मिला था, मुझे गलतफहमी हुई थी, उसकी मां तो जिंदा नहीं थी, कबकी मर चुकी थी ।”

“कब से यहां रह रही थी ?”

“पांच साल से ।”

“शुरू से ही आप यहां उसके साथ थीं ?”

“हां ।”

“ये फ्लैट फर्निश्ड मिला था ?”

“नहीं, खुद फर्निश किया था ।”

“सब कुछ बहुत एक्सपेंसिव दिखाई दे रहा है । मोटा खर्चा हुआ होगा !”

“उसी ने किया ।”

“जी !”

“आई डोंट हैव ए बिग सैलरी । मैं लग्जरी अफोर्ड नहीं कर सकती ।”

“वो कर सकती थी ?”

“कर ही सकती थी । तभी तो सारा खर्चा किया !”

“सारा ! आपने कुछ भी शेयर न किया ?”

“कुछ तो शेयर करने को मैं तैयार थी - बाकायदा आफर की थी - लेकिन उसने जनरासिटी दिखाई थी, बड़े दिल वाली बात की थी, कहा था जरूरत नहीं थी ।”

“यहां का किराया भी वो ही भरती थी ?”

“अरे, नहीं, भई । मैंने बोला मैं लग्जरी अफोर्ड नहीं कर सकती थी, ये कब बोला कि बेसिक्स भी अफोर्ड नहीं कर सकती थी !”

“लेकिन वो चाहती तो सारा किराया खुद भर सकती थी ? हैसियत थी उसकी ।”

“हैसियत तो थी बराबर !”

“एक बिजनेस टाइकून की प्राइवेट सेक्रेट्री ही तो थी ! बहुत ज्यादा तनख्वाह भी होगी तो कितनी होगी ?”

“तनख्वाह की बात नहीं थी !”

“अच्छा ! यानी आमदनी का कोई और भी जरिया था ! कोई मेजर इनवेस्टमेंट्स, कोई हैवी इनहैरिटेंस...”

“मेरे खयाल से नहीं । लेकिन जब भी कोई हैवी एक्सपेंडिचर पेश होता था, उसको मीट करने के लिये रिक्वायर्ड सम उसके पास होता था ।”

“इस वाबत कभी सवाल न किया !”

“मैं क्यों करती ! आई एम नाट स्टूपिड । वाई वुड आई लुक दि गिफ्ट हॉर्स इन दि माउथ !”

“वैरी वैल सैड ।”

“मैं उसकी जनरासिटी का सुख पा रही थी, मैं क्यों सवाल करती !”

“ठीक ! जब वो इतनी संपन्न थी, इतनी सेल्फसफीशेंट थी तो फ्लैटमेट किसलिये ?”

“कम्पनी के लिये ।”

“आई सी । पुलिस ने उसके रूम को सील नहीं किया ?”

“जाहिर है कि नहीं किया । करते भी किसलिये ! वो मौकायवारदात तो नहीं ! फिर भी किसी वजह से करते तो सारा फ्लैट सील करते ।”

“ठीक ! अभी दोबारा आयेंगे ?”

“ऐसा कुछ बोल के तो नहीं गये !”

“फिर तो मेरे खयाल से मकतूला के कम में मेरे भी एक निगाह फिरा लेने में कोई हर्ज नहीं होगा !”

“मुझे तो कोई हर्ज दिखाई नहीं देता !”

“तो फिर...इजाजत है ?”

“हां । लेकिन एक बात है ।”

“क्या ?”

“तुम्हारे आने से पहले मैं लैपटॉप पर बहुत इम्पोर्टेन्ट वर्क कर रही थी, मैं तुम्हारे साथ वहां खड़ी नहीं हो सकती ।”

वाह ! चुपड़ी और दो दो । अनुमति और निर्विघ्न ! अबाध !

“मैं किसी चीज के साथ कोई छेड़खानी नहीं करूंगा । बाद में चाहें तो मेरी तलाशी ले लीजियेगा ।”

“जरूरत नहीं । आई कैन सी यू हैव ऐन आनेस्ट फेस ।”

वाह ! वाह ! बहुत तरह की तारीफ आपके खादिम को बहुत बार हासिल हुई लेकिन दिल्ली और आसपास चालीस कोस तक के टॉप के हरामी को आनेस्ट फेस किसी ने पहली बार बोला ।

“थैंक यू ! सो... मे आई ?”

“यस । गो अहैड ।”

मैं निर्देशित रूम के दरवाजे पर पहुंचा और उसे धकेल कर भीतर दाखिल हुआ ।

कनखियों से मैंने देखा कि वो बाजू के कमरे में चली गयी थी जो कि जरूर उसका बैडरूम था ।

मैंने फाइव स्टार होटल के डीलक्स रूम की तरह सुसज्जित कमरे की तरफ तवज्जो दी । मुझे पूरी छूट मिली थी इसलिये मैंने धीरज से हर चीज का मुआयना करना शुरू किया ।

दस मिनट बाद वार्डरोब के एक शैल्फ में मुझे कुछ उम्मीद दिखाई थी ।

जो कि बेमानी भी साबित हो सकती थी ।

उस शैल्फ में रखे सामान को - जो कि ज्यादातर अंडरगारमेंट्स थे - निकाल कर मैंने उसे खाली किया तो पाया कि उसकी भीतरी दीवार पर उसकी पूरी लम्बाई चौड़ाई को कवर करता शाहरुख का एक क्लोजअप पोस्टर लगा हुआ था ।

वार्ड रोब के अंदर !

जनाना साजोसामान से तकरीबन कवर्ड !

किसलिये ?

मकतूला शाहरुख की फैन थी तो उसे बैडरूम में किसी प्रोमिनेंट जगह पर लगाती !

मैंने पोस्टर को टटोला, बोर्ड को कई बार, कई जगह ठकठकाया ।

नतीजा सिफर ।

फिर मुझे अहसास हुआ कि पोस्टर बोर्ड पर पेस्टिड नहीं था, खाली चारों तरफ से सैलोटेप से बोर्ड पर चिपकाया गया हुआ था ।

नाजायज हरकत थी लेकिन मैंने पोस्टर को वहां से हटाने का फैसला किया ।

बैडरूम में एक दीवार के साथ लगा एक फैंसी राइटिंग डैस्क था जहां मुझे डिस्पेंसर में सैलोटेप भी दिखाई दिया और कलमदान में वैसा स्टेशनरी आइटम चाकू भी दिखाई दिया जिसका फल एक ट्रिगर सरकाने से बाहर निकलता था ।

मैंने दोनों चीजें अपने कब्जे में कीं और वार्डरोब पर वापिस लौटा ।

मैंने चाकू का फल एक इंच बाहर निकाला और उसकी तीखी नोक को सावधानी से पोस्टर के चारों किनारों पर फेरा तो सैलोटेप कटता चला गया और पोस्टर दीवार से अलग हो गया ।

आशापूर्ण निगाहों से मैंने पीछे के बोर्ड का मुआयना किया ।

बेकार !

वो बस बोर्ड ही था ।

राइटिंग डैस्क पर एक लांग आर्म टेबल लैम्प पड़ा था जिसकी कनैक्टिंग कॉर्ड भी काफी लम्बी थी । मैंने लैम्प को अपने काबू में किया, कॉर्ड को पूरा फैलाया, लांग आर्म को पूरा खोला तो उसका सीएफएल ट्यूब वाला हैड आराम से वार्डरोब के उस शैल्फ तक पहुंच गया जिसमें से शाहरुख पद्चयुत किया जा चुका था ।

लैम्प की तीखी रोशनी में मैंने शैल्फ के पिछले हिरसे का मुआयना किया तो चारों भुजाओं से कोई दो दो इंच परे एक बेहद वारीक लकीर से बनी आयत के दर्शन हुए । एक निगाह में वो आयत ऐसी लगती थी जैसे किसी ने पेंसिल से बोर्ड पर उकेरी हो ।

पेंसिल से खामखाह ! - मैंने खुद से जिरह की - जरूर कोई भेद था ।

चाकू की तीखी बारीक नोक को मैंने आयत की एक भुजा पर रखा और धीरे धीरे फल पर दबाव डाला ।

नोक बोर्ड में दाखिल होने लगी ।

ढक्कन !

वो ढ़क्कन था, वैसे ही बोर्ड का जैसे से वार्डरोब बनी थी और जो इतनी चतुराई से फिट किया गया था कि वार्डरोब के भीतर के अंधेरे में नहीं दिखाई देने वाला था । मुझे भी दिखाई न देता अगरचे कि मुझे उस शैल्फ को टेबल लैंप की तीखी रोशनी से रोशन करना न सूझा होता ।

मैंने और गौर से मुआयना किया तो एक जगह मुझे एक महीन पेच का सिर दिखाई दिया । चाकू की नोक से मैंने उस पेच को खोलना शुरू किया तो जल्दी ही कोई डेढ़ इंच लम्बा वो पेच मेरे हाथ में आ गया । पेच की जगह मैंने दस्तक दी तो दो खुफिया ढ़क्कन बीच में कहीं फिक्स धुरे पर घूम गया । ढ़क्कन का एक सिरा पीछे मौजूद झरोखे के भीतर दाखिल हो गया और दूसरा बाहर निकल आया ।

रिवॉल्विंग डोर की तरह ।

लैंप की रोशनी में मैंने भीतर हाथ डाला ।

भीतर से जो चीजें बरामद हुई, वो थीं:

एक सीडी ।

एक डैथ सर्टिफिकेट ।

एक स्टेटमेंट ।

सर्टिफिकेट और स्टेटमेंट फोटोकॉपी थी, सीडी ओरीजिनल थी या कापी थी, कहना मुहाल था । वैसे जब वाकी दो डाकूमेंट कापी थे तो सीडी का भी कापी होना ही बनता था ।

यानी तीनों के ओरीजिनल कहीं और महफूज थे ।

आइटम ! बहुवचन में !

जिनकी बरामदी की उम्मीद किसी को कहीं से थी और मौजूद वो कहीं और पाई गयी थीं ।

और ओरिजिनल्स अभी किसी तीसरी जगह महफूज थीं ।

अब हर राज उजागर हो रहा था, हर राज पर पड़े पर्दे उड़ रहे थे ।

अब मैं नहीं कह सकता था कि निशां मिलता है कातिल का, मगर कातिल नहीं मिलता ।

राइटिंग टेबल पर लैपटॉप और प्रिंटर मौजूद था ।

मैंने डैथ सर्टिफिकेट और स्टेटमेंट को स्कैन करके उनकी कापी निकाली और वहीं मौजूद एक ब्लैंक डिस्क पर कागजात और सीडी को डुप्लीकेट किया । फिर सीडी से लैपटाप पर ट्रांसफर हुई मूवी को अपने मोबाइल पर ट्रांसफर किया । लैपटॉप पर से मैंने सब कुछ इरेज कर दिया और अपनी मेहनत को अपने कोट की भीतरी जेब से हवाले किया । खुफिया खाने का सामान मैंने यथास्थान पहंचा कर ढ़क्कन को वापिस पोजीशन पर किया, उसमें पेंच डाला और सेलौटेप से शाहरुख की तसवीर पूर्ववत् शैल्फ के पिछले हिस्से पर टेप की । शैल्फ से निकाला सामान भी मैंने यथास्थान पहुंचाया और वार्ड रोब को बंद करके वापिस ड्राईंगरूम में पहुंचा ।

फ्लैटमेट चित्रिका मुखर्जी शायद तब भी अपने ‘इम्पोर्टेन्ट वर्क’ के साथ ही मसरूफ थी ।

“मैडम !” - मैंने आवाज लगाई - “मिस मुखर्जी !”

वो अपने कमरे से बाहर निकली ।

“कुछ मिला ?” - उसने पूछा ।

मायूसी जताते मैंने इंकार में सिर हिलाया ।

“कुछ होता तो पुलिस को ही मिल गया होता !” - वो बोली ।

“वही तो ! बहरहाल सहयोग का शुक्रिया ।”

“वैलकम !”

मैंने अपलक उसे देखा ।

“अब क्या है ?” - वो बोली ।

“वही है ।'।

“क्या ?”

“साइज जीरो । जेहन से निकलता ही नहीं !”

“न निकले । क्या प्राब्लम है ?”

“प्राब्लम तो कोई नहीं लेकिन.. .मैं सोच रहा था.. .सोच रहा था...”

“क्या ?”

“बेसन लगा के तल लूं तो कोई इजाफा होगा साइज में !”

वो जोर से हंसी ।

“साइज जीरो प्लस वन हो जायेगा या नहीं !”

“अरे, मैं मुर्गी हूं जो बेसन लगा के तल लोगे ?”

जवाब में मैंने हंसी में उसका साथ दिया ।

“वैसे” - वो बोली - “आदमी दिलचस्प हो ।”

“जहेनसीब !”

“कभी फिर मिलना ।”

“ये...इनवीटेशन है ?”

“यही समझ लो ।”

“फिर तो खूब पहचान लो राज हूं मैं, जिंसेउल्फत का फकीर हूं मैं ।”

“हा हा । वाह, भई !”

“फिर मिला तो झोली भर के जाऊंगा ।”

“किससे ?”

“जिंसेउल्फत से ।”

“ठीक है । लेकिन अब.. .हा हा.. .जाओ तो सही ! जाओगे तो फिर आओगे न !”

हंसी में उसका साथ देते मैंने रुखसत पायी ।

क्या खूब कहा था किसी गूढ़ज्ञानी ने:

जिंदगी के हरपल में प्यार, हर लम्हे में खुशी; खो दो तो यादें, जी लो तो जिंदगी ।

********************************
 
मैं फिर होली एंजल्स हस्पताल पहुंचा ।

यादव तब भी तोशनीवाल के कमरे में मौजूद था ।

मैंने उसे बाहर बुलाया ।

“फोन म्यूट पर लगाया हुआ है ?” - मैंने पूछा ।

“नहीं तो !”

“देखो ।”

उसने फोन निकाल कर उसकी स्क्रीन पर निगाह डाली ।

“म्यूट पर है” - फिर बोला - “लेकिन मैंने नहीं लगाया । पता नहीं कैसे खुद ही पहुंच गया ।”

“होता है ।”

“ठीक करता हूं । लेकिन तुम मेरा फोन जनरल पर करवाने तो नहीं आये !”

“वो चॉकलेट...जहर वाली...जो यहां तोशनीवाल को डिलीवर हुई...वसंत कुंज में ही स्थित मारवल डिपार्टमेंट स्टोर से खरीदी गयी थी ।”

“बहुत बड़ी खोज की ! ये तो बाक्स पर ही दर्ज था । स्टिकर की सूरत में ।”

“बाक्स पर खरीदने वाले का हुलिया तो दर्ज नहीं था !”

यादव सकपकाया, उसने घूर कर मुझे देखा ।

“वहां गये थे ?” - फिर बोला ।

“हां ।”

“वहां से खरीदने वाले का हुलिया पता लगा ?”

“हां । खरीदार ठिगना था, चेहरे पर तरह तरह की खरोंचों के निशान थे और एक बांह टेढ़ी थी, मुड़ी हुई थी, दूसरी से - बायीं से - छोटी थी । लंगड़ा के चलता था ।”

“और ?”

“अभी और भी ?”

“तुम्हारी शक्ल पर लिखा है ।”

“ठीक पहचाना । उसी डिफॉर्म्ड आदमी ने वो जहर भी खरीदा था जो कि चॉकलेट्स में पाया गया था ।”

“स्ट्रिकनिन ?”

“चूहे मारने की दवा की सूरत में ।”

“खरीदार देवीलाल ?”

“उसका खयाल कैसे आया ?”

“भई, उसके कमरे में से वो दवा बरामद हुई थी ।”

“देवीलाल भी ।”

“भी क्या मतलब ?”

“उसने वो दवा खरीदी थी, वहीं से खरीदी थी लेकिन दो दिन पहले खरीदी थी ।”

“दो दिन बाद विष्णु कसाना का बहुरूप धारण करके फिर खरीदी । जब चॉकलेट का बाक्स खरीदा ।”

“जो चीज उसके पास पहले से थी, उसे फिर खरीदने का क्या मतलब ?”

“विष्गु कसाना के पास नहीं थी । सिर्फ चॉकलेट खरीदता तो ये अपने आप में सबूत होता कि विष्णु कसाना का बहुरूप धारण करके वही मारबल डिपार्टमेंट स्टोर पर पहुंचा था ।”

मैं खामोश रहा ।

“खामखाह मुंह बना के मत दिखा । इस बाबत कल रात तोशनीवाल की कोठी पर तूने जो प्रवचन किया था, उसे तू भूल गया जान पड़ता है । कल तेरा ही इसरार था कि देवीलाल मोटे तौर पर केयरटेकर विष्णु कसाना जैसा ही था, वो थिएट्रिकल मेकअप का ज्ञाता था और बांह को आस्तीन में खींचकर टेढ़ी अकड़ाकर उसके दूसरी बांह से छोटी होने का भ्रम बनाया जा सकता था । लंगड़ा कर चल सकता था ।”

“कहा तो था मैंने ऐसा ! तो देवीलाल विष्णु कसाना बन के उस स्टोर में अपनी फसादी खरीद के लिये गया !”

“विष्णु कसाना तो न गया ! न जा सकता था । उससे पहले, बहुत पहले, वो मर चुका था । जमना से उसकी लाश बरामद हुई है जिसकी हालत कहती है कि उसे मरे चार पांच दिन हो भी चुके हैं ।” - एकाएक उसने ठिठक कर, घूर कर मुझे देखा - “तू चौंका नहीं ?”

“चौंका हूं यादव साहब, सरासर चौंका हूं ।”

यादव संदिग्ध भाव से पूर्ववत् मुझे घूरता रहा ।

“अगर विष्णु कसाना पांच दिन पहले मर चुका था” - मैं बोला - “तो फिर कातिल - तोशनीवाल परिवार के पीछे पड़ा कातिल - वो तो नहीं हो सकता ! कातिल तो फिर कोई और हुआ !”

“देवीलाल । वही सुजित त्रेहन है ।”

“बड़ की हांक रहे हो !'

“तो और क्या करूं ? साला कुछ पल्ले ही नहीं पड़ रहा । एक बात पर टिकता हूं तो उसको काटती दूसरी बात उसको ओवरलैप करने लगती है ।”

मैं हंसा ।

“साली जमना से लाश की बरामदी ने केस को और पेचीदा कर दिया । जब केयरटेकर पांच दिन पहले मर चुका था तो छतरपुर के फार्महाउस पर कौन था जिसने सुरभि तोशनीवाल की लाश बरामद की थी, जिसने इतनी जिम्मेदारी से पुलिस को वारदात की खबर की थी और फिर इतने गैरजिम्मेदाराना तरीके से फरार हो गया था !”

“इसीलिये फरार हो गया क्योंकि जानता था कि टिका रहता तो देर सबेर पता चल के रहता कि वो केयरटेकर विष्णु कसाना नहीं था ।”

“तौबा ! वो नहीं था तो कौन था ?”

“तोशनीवाल...अब कैसा है ?”

“पहले से बेहतर है । क्यों ?”

“जिन सवालों के जवाब नदारद हैं, वो उसके पास हो सकते हैं । हमें उससे फिर बात करनी चाहिये ।”

उसके चेहरे पर अनिश्चय के भाव आये ।

“हर्ज क्या है ?”

“मेरे पास उसको कहने को और कुछ नहीं है ।”

“मेरे पास है । तुम चलो तो सही !”

“शर्मा, इस केस में तू परछाई की तरह मेरे साथ बना हुआ है इसलिये चल, चलता हूं ।”

“थैंक यू ।”

हम तोशनीवाल के कमरे में उसके सिरहाने पहुंचे ।

आहट पा कर उसने सप्रयास आंखें खोलीं ।

“अब क्या है ?” - फिर तनिक अप्रसन्न भाव से बोला ।

“आपके लिये न्यूज है ।” - मैं बोला ।

“क्या ?”

“आपका खेल खत्म हो गया है ।”

“मेरा कौन सा खेल ?”

“जो आपने आखिर तक बड़ी चतुराई से खेला ।”

“अरे, क्या पहेलियां बुझा रहे हो ! साफ कहो जो कहना है ।”

“साफ सुनना चाहते है तो दिल मजबूत कर लीजिये ।”

“अब कह भी चुको ।”

“आप कातिल हैं ।”

“क्या !”

“आप कातिल हैं । सब किया धरा आपका है ।”

“क्या बकते हो ?”
 
“आपको अपनी फैमिली से नफरत है क्योंकि आप समझते हैं कि आपकी बीवी ने आपको धोखा दिया, उसने जानबूझ कर छुपा के रखा कि आपसे शादी के वक्त वो प्रेग्नेंट थी, आपके पार्टनर सुजित त्रेहन के बच्चे की मां बनने वाली थी । आपकी बीवी ने आपको धोखा दिया था, उसने जो जुडवां बच्चे पैदा किये थे उनके पिता आप नहीं थे । ऐसी फैमिली से आपको क्या लगाव होता, फिर भी एक लम्बा अरसा आपने समाजी रिश्तों को निभाया । यूं निभाया कि पत्नी के पति बने रहे, बच्चों के बाप बने रहे और अपनी प्लेबॉय वाली छवि भी आपने बनाये रखी । फिर दो साल पहले आपकी जिंदगी में अंजना रांका के कदम पड़े और आपको बीवी बच्चे अपने रास्ते की रुकावट लगने लगे ।”

“अब ?”

“फिर एक उद्देश्य और भी था । अपने पार्टनर का बिजनेस में हिस्सा हड़पने की आपकी कोशिश नाकाम रही थी क्योंकि इस करार को कोर्ट ने जायज करार नहीं दिया था कि एक पार्टनर मर जाये तो दूसरा आटोमैटिकली पूरे बिजनेस का मालिक बन जाये । कोर्ट ने पत्नी को पति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना था, नतीजतन बिजनेस में आपके पार्टनर के हिस्से की वारिस आपकी बीवी को करार दिया था । पूरे बिजनेस का मालिक बनने की आपकी ख्वाहिश बीवी को खत्म किये बिना पूरी नहीं हो सकती थी ।”

“लेकिन अब ?”

“दो साल पहले आप अंजना रांका के संपर्क में आये थे । तब से अब तक कभी भी ।”

“उससे पहले के बीस साल मुझे अपने बीवी बच्चों से कोई शिकायत न हुई ?”

“बराबर हुई लेकिन आशिकी ने पहले ऐसा बेतहाशा जोश कभी न मारा ।”

“अंजना में हीरे मोती जड़े हैं ?”

“आप बेहतर जानते हैं । आप वुमेनाइजर हैं....”

“क्या !”

“आप वुमेनाइजर हैं, हर खूबसूरत औरत पर लाइन मारते हैं । सैक्स के मामले में आपका उसूल जान पड़ता है कि औरत चिड़िया भी हो तो कुबूल, मर्द बादशाह भी हो तो नाकबूल ।”

“नानसैंस ।”

“बाइस साल पहले की कोंटी टॉप की पिकनिक के दौरान आपने बोला था आप लोगों के साथ एक महिला थी जो कि आपकी बीवी की - जो तब सुजित त्रेहन की बीवी थी - फ्रेंड थी । उस महिला का नाम बताइये ।”

“क्यों ?”

“क्यों क्या ! जब उसके वजूद को न छुपाया तो नाम को छुपाने का क्या मतलब ?”

“मैं इतनी पुरानी बात का आज जिक्र जरूरी नहीं समझता ।”

“समझिये । क्योंकि बाईस साल पहले उस महिला की कहानी नेपाल में ही खत्म नहीं हो गयी थी, वो कहानी जारी रही थी, अभी कल तक जारी थी ।”

“क्या मतलब ?”

“वो महिला सपना टाहिलियानी थी ।”

वो सकपकाया ।

“और मुझे ये भी शक है - आपकी औरतखोर फितरत के मद्देनजर शक है - कि वो नेपाल में श्यामली की नहीं, आपकी फ्रेंड थी । जैसे उस पिकनिक पर सुजित त्रेहन के साथ श्यामली थी, वैसे आपके साथ सपना थी ।”

“बहुत लम्बी लम्बी छोड़ रहे हो !”

“हम उसका साइज बाद में नापेंगे, अभी मैं मेन मुद्दे पर आता हूं जो कि ये है कि आपको बीवी बच्चे अपने रास्ते की रुकावट लगने लगे । नतीजतन आपके जेहन में एक शैतानी स्कीम उभरी जिसके तहत आप सबको खत्म करके इल्जाम अपने कब के मर चुके पार्टनर सुजित त्रेहन पर थोप सकते थे जो कि अपने साथ हुए आपके जुल्म का बदला लेने के लिये जैसे कब्र से उठ खड़ा हुआ था जबकि असल में वो बाईस साल पहले ही नेपाल में मर चुका था...”

“मेरा भी यही खयाल था लेकिन मौजूदा वाकयात, मौजूदा हालात गवाह हैं कि मेरा खयाल गलत था ।”

“आपके मारे मर चुका था । इसीलिए इस हकीकत से आप से बेहतर कौन वाकिफ हो सकता था !”

“बकवास ! अब जबकि वो जिंदा निकल आया...”

“नहीं निकल आया । ये” - मैंने विशु की मेल के एक हिस्से का प्रिंट पेश किया - “उसका प्रामाणिक डैथ सर्टिफिकेट है...”

यादव ने कागज मेरे हाथ से झपटा ।

“आपका खयाल गलत था, सरासर गलत था, कि कोंटी टॉप से दो हजार फुट गहरी खोह में गिरने के बाद उसके नामोनिशान का पता नहीं लाग्ने वाला था । असल में पता भी लगा था, उसकी शिनाख्त भी हुई थी और बाकायदा डैथ सर्टिफिकेट जारी हुआ था ।”

“सरकारी महकमों में - वो घर के हों या बाहर के - ऐसी गलतियां, ऐसी लापरवाहियां आम होती हैं । बाईस साल पहले नेपाल के सरकारी अमले ने इस मामले में क्या किया, मुझे नहीं मालूम लेकिन यहां पहुंच कर त्रेहन ने क्या किया वो मुझे मालूम है ।”

“क्या किया ?”

“बहुत कुछ किया - जो जग जाहिर है - शुरुआत मुझे धमकीभरी चिट्ठी लिखने से की ।”

“वो कंप्यूटर पर तैयार की गयी चिट्ठी थी और जो कोई भी बाईस साल पहले के उस वाकये से वाकिफ था, ये काम कर सकता था । आप वाकिफ थे ।”

“उस पर उसके साइन थे, जो कि कंप्यूटर से तैयार नहीं किये जा सकते थे और श्यामली ने - उसकी तब की बीवी ने - उनकी पक्की शिनाख्त की थी ।”

“बाईस साल बाद ।”

“ऐसी बातें किसी को नहीं भूलतीं, ताजिंदगी याद रहती हैं ।”

“ये याद रहता है कि कोई शख्स कैसे साइन करता था - पूरा नाम लिखता था, इनीशियल्स लिखता था, इनीशियल्स और सरनेम लिखता था, जो लिखता था स्ट्रेट लिखता था या उसे कोई फैंसी, सजावटी शेप देता था - साइन की बारीकियां इतनी मुद्दत के बाद किसी को याद नही रह सकतीं । आप इस हकीकत से वाकिफ थे इसलिये आपने खुद वो चिट्ठी तैयार की और उस पर सुजित त्रेहन के साइन बनाये । कोई बड़ी बात नहीं कि आप ही ने बीवी को प्राम्प्ट किया हो कि वो साइन त्रेहन के थे । बहरहाल वो चिट्ठी असली नहीं हो सकती थी क्योंकि त्रेहन वो चिट्ठी लिखने के लिये जिंदा नही था । ये बात एक दृसरे तरीके से भी साबित होती है जो कि आपके इस रोशन खयाल की भी पालिश उतार देगा कि डैथ सर्टिफिकेट जारी करने में नेपाल के सरकारी महकमे से गलती हुई थी । उस दूसरे तरीके का जिक्र मैं बाद में करूंगा, अभी तरतीब से मुझे अपनी बात कहने दीजिये और ये मान के चलने दीजिये कि आपका भूतपूर्व बिजनेस पार्टनर आज की तारीख में न जिंदा था, न जिंदा हो सकता था । अपने फायदे के लिये, अपनी स्कीम को अमल में लाने के लिये आपने डेढ़ बांह वाला, लंगड़ी चाल वाला, विष्णु कसाना पैदा किया । जानबूझ कर, सोच विचार के एक डिफार्म्ड केयरटेकर मुलाजमत में रखा जो कि मील से बतौर एक्सीडेंटल केस पहचाना जाता । ऐसा इसलिए जरूरी था क्योंकि ऊंचाई से गिरा शख्स रास्ते में ही अटक गया हो - जैसा कि आपने चिट्ठी में बयान किया - तो जान उसकी भले ही बच गयी हो, भारी टूट फूट होना लाजमी था । ऐसी रैडीमेड टूट फूट वाला शख्स बड़ी शिद्दत से आपने विष्णु कसाना की सूरत में तलाश किया । यहां ये सवाल बेमानी हो जाता है कि आपने बतौर सुजित त्रेहन उसे क्यों न पहचाना ! जब वो सुजित त्रेहन था ही नहीं, हो ही नहीं सकता था, तो ऐसी पहचान के क्या मायने ! विष्णु कसाना के जरिये तो आपने ये भ्रम खड़ा करना था कि वो असल में सुजित त्रेहन था जिसने अपने नापाक इरादों के जेरेसाया आपके फार्महाउस में बतौर केयरटेकर नौकरी कर ली थी । बहरहाल आपने सुजित त्रेहन की धमकी वाली उस फर्जी चिट्ठी के जरिये इस बात को स्थापित किया कि वो नेपाल में हुए हादसे में जान से नहीं गया था लेकिन अपाहिज हो गया था - एक बांह बिगड़ गयी थी, एक टांग लंगड़ाने लगी थी और चेहरा नोचा खसोटा गया था । आगे विष्णु कसाना को त्रेहन साबित करने के लिये, कातिल साबित करने के लिये जरूरी था कि वो कभी पुलिस की पकड़ में न आता, हमेशा के लिये गायब हो जाता, इसलिए पांच दिन पहले आपने उसका कत्ल किया और लाश ओखला बैराज के पास जमना में डुबो दी ।”
 
“नानसैन्स ! अटर नानसैन्स !” - वो भड़का - “जिसने परसों रात फार्महाउस पर सुरभि की लाश बरामद की थी, जिसने पुलिस को बाकायदा वारदात की खबर की थी, जो पुलिस की आमद तक वहां पूरी जिम्मेदारी से मौजूद था...”

“वो आप थे ।”

“क्या !”

“आप थियेट्रिकल मेकअप के एक्सपर्ट हैं - जेएनयू के प्रोफेसर मजूमदार ने इस बात की तसदीक की है - आप मेकअप से अपने चेहरे पर अपने केयरटेकर के चेहरे जैसी खरोंचो के निशान बना सकते थे, केयरटेकर के ढ़ाई बालों जैसे विग से अपनी गंजी खोपड़ी उसकी थ्री क्वार्टर गंजी खोपड़ी जैसी बना सकते थे, उंगलियां टेढ़ी कर सकते थे, बांह को आस्तीन में खींच कर, अकड़ा कर जाहिर कर सकते थे कि वो टेढ़ी थी, दूसरी बांह से कदरन छोटी थी, और लंगड़ी चाल बना लेना बच्चों का खेल था । आपकी स्कीम के तहत महरौली थाने से निकल कर केयरटेकर का गायब हो जाना जरूरी था क्योंकि तभी तो वो कातिल करार दिया जाता, तभी तो पुलिस को ये विश्वास दिलाया जा पता कि असल में वो केयरटेकर था ही नहीं, वो तो धमकीभरी चिट्ठी का ओरिजिनेटर सुजित त्रेहन था जो कि अपनी धमकी पर खरा उतर कर दिखाने की खातिर एडवांस में आपके फार्महाउस का केयरटेकर बना बैठा था । यहां ये बात भी गौरतलब है कि फार्महाउस में लो वोल्टेज प्रॉब्लम थी - परसों रात नहीं थी तो आपने बना दी थी जो कि कोई मुश्किल काम नहीं था । वहां मैनुअल वोल्टेज स्टैबलाइजर लगा हुआ था जिसका टॉगल वोल्टेज बढ़ाने के लिये ही नहीं, वोल्टेज घटाने के लिये भी घुमाया जा सकता है - बहरहाल कैसे भी थी, परसों रात सुरभि के कत्ल के मौकायवारदात पर, आपके फार्महाउस पर वोल्टेज लो थी और वहां लो वोल्टेज के सीएफएल बल्ब लगे हुए थे । इन दोनों बातों का मिलाजुला असर ये था कि वहां पूरी रोशनी नहीं थी बल्कि यूं कहिये कि वहां नीमअंधेरे का माहौल था । क्यों था ऐसा ? क्योंकि ये इंतजामात आपने वहां जानबूझ कर किये थे ताकि पुलिस वाले अच्छी तरह से आपकी सूरत न देख पाते और यूं आपके मेकअप का राज छुपा रहता । उस दौरान केयरटेकर की बाबत ये सवाल भी उठा था कि वारदात की खबर लगने के बाद उसने पुलिस को फोन किया, अपने एम्पलायर को फोन न किया । क्यों न किया ? क्योंकि जो कुछ मैंने अभी बयान किया, इसकी रु में एम्पलायर को फोन करने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता । वो खुद अपने आपको फोन भला कैसे करता ! इसी वजह से ऐसी किसी जरूरत का उसको - आपको - खयाल तक न आया । इसीलिये इस बाबत सवाल होने पर ‘केयरटेकर’ ने कहा था कि वो घबरा गया था, बौखला गया था, खौफजदा था, फौरन उस जरूरत की तरफ उसका ध्यान नहीं गया था, वगैरह ।” - मैं एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “जनाब, इन तमाम बातों का लुब्बोलुआब ये है कि सुरभि का कत्ल आपने किया, लिहाजा ‘सुजित त्रेहन’ ने अपनी धमकी के पहले फेज पर खरा उतर कर दिखाया । नहीं ?”

उसने जवाब न दिया ।

“गौर फरमाइये कि कितनी बातें वारदात में आपके रोल की चुगली करती हैं ! आपने मौकायवारदात पर बीवी का पर्स प्लांट किया, उस पर्स पर सहूलियत से काबिज होना आपसे बेहतर किसी के लिए मुमकिन नहीं था । एक हफ्ते से लाक्ड गैराज में अनयूज्ड खड़ी बीवी की कार पर काबिज होना भी आपके लिये मुमकिन था । वारदात में बीवी का रोल बनाने के लिये, प्लांटिड पर्स की इवीडेंस को और मजबूत करने के लिए आपने कार को - बीवी की काली ट्योटा को - जानबूझ कर फार्म के फाटक के पिलर से टकराया, लेकिन ऐसे नपे तुले ढंग से टकराया कि कार को कोई मेजर डैमेज न होता, टक्कर ऐसी न मारी कि कार या तो चलने के ही काबिल न रहती, या उसको हुआ डैमेज मील से दिखाई देता और एक्सीडेंट की बाबत दरयाफ्त करने के लिये कहीं पुलिस ही उसे न रोक लेती । फाटक इतना बड़ा था कि कार का पिलर से टकराना शकउपजाऊ बात थी लेकिन परसों रात मैंने भी यही समझा कि या तो ड्राइवर अनाड़ी था, बड़ी गाड़ी को हैंडल करने के मामले में नातजुर्बेकार था, या कत्ल के बाद की दहशत उस पर हावी थी इसलिये गाड़ी न सम्भली । बहरहाल अब मुझे मालूम है कि वो एक प्लांड, इंजीनियर्ड एक्सीडेंट था केस में बीवी की इनवाल्वमेंट बनाने के लिये ।”

“लेकिन” - यादव पहली बार बोला - “वहां मेन डोर में फंसी पायी गयी नीले, झीने, रेशमी कपड़े की महीन धज्जी तो बीवी की नहीं थी ! वो तो एसआई तोमर खबर लाया था कि अंजना रांका की एक ड्रैस का हिस्सा थी !”

“इससे यही साबित होता है कि ये अपने तरकश में कई तीर रखने और उन्हें चलाने में माहिर हैं । बीवी पर इल्जाम आता तो मुमकिन है वो साबित कर दिखाती कि वारदात के वक्त वो कहीं और थी और अपनी कार उसने एक अरसे से नहीं चलाई थी ।”

“ऐसे तो अंजना रांका भी अपनी मौजूदगी कहीं और साबित करके दिखा सकती थी !”

“तो फिर बतौर कातिल रैडीमेड कैण्डीडेट सुजित त्रेहन तो था ही ! देखो न, इनका ये रट लगाये रहना जरूरी था कि वो जिंदा नहीं हो सकता था, अब जिंदा नहीं हो सकता था तो कत्ल का कोई आल्टरनेट कैण्डीडेट तो होना चाहिये ! तो ऐसे कैण्डीडेट दो थे । यूं और कुछ नहीं होता तो केस में कनफ्यूजन तो पैदा होता ! और हर कनफ्यूजन असल कातिल के - इन के - फायदे में होता ।”

“हूं ।”

“इसी कनफ्यूजन को दोबाला करने के लिये जब ये केयरटेकर बने अंधेरिया मोड़ से ग्रामीण सेवा टैंपो पर सवार हुए थे तो ड्राइवर से लगातार बतियाते रहे थे ताकि बाद में अगर उससे पूछताछ होती तो उसकी गवाही स्थापित कर पाती कि वो ग्यारह बजे के करीब फार्महाउस पर लौटा था । असल में इस गवाही का कोई हासिल नहीं था क्योंकि कत्ल ग्यारह बजे के आसपास तो हुआ नहीं था, कत्ल तो शाम छ: और सात के बीच में हुआ था और केयरटेकर असल में तब कहां था, ये स्थापित करने का जरिया पुलिस के हाथ से निकल गया था क्योंकि वो फरार हो गया था, जो कि उसने होना ही था क्योंकि वो केयरटेकर था ही नहीं । केयरटेकर को तो ये पांच दिन पहले जलसमाधि दे चुके थे । अब पुलिस पड़ी तलाश करती रहती केयरटेकर को । न मिलता तो यही कहती कि वो सुजित त्रेहन था सुरभि के कत्ल के बाद जिसका केयरटेकर बना रहना जरूरी नहीं रहा था ।”

“उसने चिट्ठी में पहला शिकार पहले ही अंडरलाइन कर दिया । सुरभि परसों शाम फार्महाउस का रुख न करती तो ?”

“तो चिट्ठी भी परसों जारी न हुई होती । जमा, सुरभि का पहला शिकार होना जरूरी भी नहीं था । इन्होंने तीन कत्ल करने थे; जिसका भी, जहां भी इनका दांव लग जाता, उसी का जिक्र बतौर पहला शिकार चिट्ठी में होता ।”

“यानी कत्ल पहले हुआ, चिट्ठी बाद में जारी हुई ।”

“जाहिर है । इनसे पूछो चिट्ठी इनको कब डिलीवर हुई थी ?”

“शाम सात बजे ।” - तोशनीवाल बोला - “ये कोई राज नहीं है ।”

“ओह !” - यादव के मुंह से निकला ।

“धज्जी के मामले में आपसे चूक हुई जनाब ।” - मैं आगे बढ़ा - “उसको खून लगा था - जो कि कत्ल के बाद ही लग सकता था । यानी कि कातिल की रुखसती के वक्त दुपट्टा दरवाजे में अटक कर फटा और धज्जी कब्जे में अटकी रह गयी । ये अच्छी सोच थी लेकिन अगर ऐसा हुआ होता तो दुपट्टे को भी वहां खून लगा होना चाहिये था जहां से कि धज्जी फटी थी । लेकिन ऐसा नहीं था । इंस्पेक्टर साहब ने अपनी अपने जिस एसआई का जिक्र किया, वही ये पक्की खबर लाया था कि दुपट्टे के फटे हिस्से पर खून नहीं लगा हुआ था ।”

“धो दिया होगा !” - तोशनीवाल बुदबुदाया ।

“आसान काम क्यों न किया ? दुपट्टे का वजूद ही क्यों न खत्म कर दिया ? ‘न रहे बांस न बजे बांसुरी’ के अंदाज से ! फिर कैसे साबित हो पाता वो धज्जी अंजना रांका की ड्रैस का हिस्सा थी ?”

तोशनीवाल ने जवाब न दिया ।

“वो किस्सा छोड़ो ।” - यादव उतावले स्वर में बोला - “इस बात का खुलासा करो कि लड़का कैसे बच गया ? उसकी चाय में भी जहर क्यों नहीं था... ताकि किस्सा तमाम होता ?”

“दूसरी चिट्ठी में - श्यामली की सुजित त्रेहन को लिखी, मौकायवारदात पर गुच्छामुच्छा पाई गयी चिट्ठी में - लड़के के जिक्र की वजह से । चिट्ठी तो जाहिर है कि इन्हीं का कारनामा था लेकिन इनकी तरफ कोई दूरदराज की भी तवज्जो न जाये, ये सुनिश्चित करने के लिये इन्होंने चिट्ठी में श्यामली की तरफ से ये रहस्योद्घाटन दर्ज किया कि शिशिर सुजित त्रेहन का लड़का था । अब लड़का बचा रहता तो यही तो समझा जाता कि कातिल जज्बाती हो गया था, उससे अपनी औलाद को खत्म करना नहीं बना था । यूं और स्थापित होता कि त्रेहन का वजूद था और इनकी तरफ कोई उंगली न उठती ।”

“मिशन तो यूं पूरा न होता न इनका ! इन्होंने तो कुनबा खत्म करना था !”

“करना था न ! लेकिन जल्दी क्या थी ! बाकी बचे एक बटा तीन काम को ये बाद में फुरसत से, इत्मीनान से निपटा सकते थे । बाद में ये कभी शिशिर के फैटल एक्सीडेंट का इंतजाम कर सकते थे । इन कामों में माहिर तो ये हैं ही ! फिर ये न भूलो कि इन्हें दो प्रोफेशनल्स की मदद हासिल थी ।”

“ओह !”

“प्रोफेशनल्स !” - तोशनीवाल बोला - “प्रोफेशनल्स कौन ?”

“आपको मालूम है ।” - मैं बोला - “उन्हीं में से एक के संदर्भ में सुनिये कि कहां फिर आपकी बद्किस्मती का रोल आता है । हायर्ड हैल्प की मदद से केयरटेकर की लाश आपने जमना में डुबोई लेकिन वो डूबी न रही, डुबोने के पांच दिन बाद तैर कर सतह पर आ गयी और ओखला बैराज के एक गेट में आ फंसी जहां से कि अभी थोड़ी देर पहले बरामद हुई । आप सुबह से यहां पड़े हैं, आपको तो ये बात मालूम हुई नहीं होगी !”

“पता नहीं क्या कह रहे हो !”
 
“पांच दिन पहले शाम को आप महरौली, सुलतान बार पर पहुंचे थे और वहां मौजूद अपने केयरटेकर से मिले थे । तब आप सिर पर गोल्फ कैप पहने थे और एक्स्ट्रा हाई हील के जूते पहने थे जिनकी वजह से आप अपने सवा पांच फुटे कद से काफी लम्बे लग रहे थे । इन वजुहात से केयरटेकर ने तो आपकी सूरत में वहां पहुंचा अपना एम्पलायर ही देखा लेकिन और लोगों ने कुछ और देखा ।”

“और क्या ?”

“जो आप दिखाना चाहते थे । यहां मैं इमरान डिप्टी का जिक्र करना चाहता हूं । जानते हैं न उसे ?”

उसके चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव आये ।

“कल रात आपकी कोठी पर मातम मनाने आये मेहमानों में मौजूद था !”

“अच्छा वो ! हां, हाल ही में वो मेरे से मिला था क्योंकि कुछ बिजनेस डीलिंग्स में मेरी मदद कर सकता था ।”

“मिले थे तो एक खूबी तो आपने उसमें नोट की होगी !”

“क्या !”

“उम्र में फर्क था, थोड़ा कद में फर्क था, वो सिर से गंजा नहीं था, वर्ना काफी हद तक आपसे मिलता जुलता था । शक्ल नहीं मिलती थी फिर भी गोरी रंगत और क्लीनशेव्ड सूरत की वजह से कोई फासले से देखता तो उसको आपके डिप्टी होने का मुगालता हो सकता था ।”

“खामखाह !”

“इसी वजह से वक्ती तौर पर आपने उसे मुंह लगाया था । वो ईडियट समझ रहा था कि वो आपसे ताल्लुकात बना रहा था जबकि हकीकतन आप उससे ताल्लुकात बना रहे थे । डिप्टी कहता था कि आप उसे छूट देने लगे थे, मुंह लगाने लगे थे क्योंकि आपको उसमें कुछ भा गया था लेकिन जो भा गया था, वो वो नहीं था जो डिप्टी समझ रहा था, वो वो था जो मैंने बयान किया । जो जनरल कनफ्यूजन आप खड़ा करके रखना चाहते थे, उसमें वो कंट्रीब्यूटर था । इसी मिशन के तहत परसों रात जब आप अपना बयान दर्ज करा के महरौली थाने से निकले थे तो आधी रात के करीब - जाहिर है कि केयरटेकर के बहुरूप में - आप सुलतान बार पहुंचे जहां खामखाह आपने डिप्टी के लिये बेमतलब का, न समझ में आने वाला, मैसेज छोड़ा कि वो आपको घाट पर मिले । यूं नाहक आपने केयरटेकर का, सुजित त्रेहन का, सम्बन्ध डिप्टी से जोड़ा और कई मामलों में पहले से कनफ्यूज्ड पुलिस के कनफ्यूजन में इजाफा किया ।”

“मैंने ऐसा कुछ न किया, सब तुम्हारी कल्पना की उपज है ।”

“बहरहाल बात केयरटेकर की और उसके मर्डर की हो रही थी । आप बार में केयरटेकर से मिले और तफरीह के लिये कहीं और चलने की पेशकश की ।”

“मेरी ! अपने केयरटेकर जैसे निचले दर्जे के, मामूली मुलाजिम के साथ तफरीह !”

“केयरटेकर को ये बात अजीब लगी होगी लेकिन साथ ही मालिक का हुक्म भी तो लगी होगी कि उसने मालिक के साथ जहां वो ले जा रहा था, चलना था । बाद में मालिक - आप - उस अजीब व्यवहार की कोई वजह बताता या न बताता, उसका जिक्र करने के लिये केयरटेकर ने जिंदा तो बचना नहीं था । वहां आप दोनों को नौका विहार की पेशकश हुई थी जो आपने ठुकरा दी थी - क्योंकि आपका नौका विहार प्रीप्लांड था, प्रीशिड्यूल्ड था - और अंधेरे में कहीं निकल गये थे । वहां आपके एक हायर्ड हैण्ड ने - नाम बृजलाल - घाट से चुपचाप एक नाव खोल ली थी जिस पर सवार हो कर आप तीन जने दरिया बीच गये थे जहां केयरटेकर का कत्ल कर दिया गया था और उसकी लाश में वजन बांध कर लाश को पानी में डुबो दिया गया था । घाट के भीकू नाम के एक नाव वाले ने दो आदमी घाट पर पहुंचते देखे थे और थोड़ी देर बाद दो आदमी घाट से रुखसत होते देखे थे, लिहाजा वहां कुछ नहीं हुआ था, सिवाय इस मामूली वाकये के कि एक नाव किसी तरह से घाट पर से खुल गयी थी और किनारे से परे दरिया में पहुंच गयी थी लेकिन असल में ये हुआ था कि जो दो जने वहां पहुंचे थे, वो आप और केयरटेकर थे और जो दो जने वहां से रुखसत हुए थे वो आप और आपका भाड़े का टट्टू बृजलाल थे । ये है उस जमूरे की तसवीर ।”

मैंने उसे मोबाइल से खींची और बाद में कंप्यूटर से प्रिंट की तसवीर दिखाई ।

तब पहली बार वो मुझे बेचैन लगा लेकिन बहुत जल्दी उसने खुद पर काबू पाया ।

“तुम पागल हो ।” - फिर भड़का - “हो पागल बराबर । तुम्हारे दिमाग में शर्तिया कोई नुक्स है जिसमें सिर्फ शैतानी सोच पनपती है । जिसकी ऐसी सोच हो वही ये प्रलाप कर सकता है कि मैं अपने बीवी बच्चों का बुरा चाहूंगा । क्यों भला मेरे जैसा कोई शख्स अपने बीवी बच्चों का बुरा चाहेगा ?”

“अपनों का नहीं चाहेंगे न ! गैर के बच्चों से आपने क्या लेना है ! और धोखेबाज बीवी से क्या भीगना ! फिर आप कोई आम आदमी तो हैं नहीं ! आपकी थैली में दम है इसलिये आप दमदार हैं, इसलिये आप जो चाहे कर सकते हैं, इतने खुशफहम हैं कि समझते हैं कि कोई उंगली आपकी तरफ नहीं उठ सकती । इन अदर वर्ड्स, यू आर सो पावरफुल दैट यू कैन डू ऐनीथिंग एण्ड गैट अवे विद इट ।”

“नानसैंस !”

“मैं करता हूं न सेंस पैदा !”

“करो ।”

“आप लैफ्टी हैं ।”

“क्या !”

“और इस बात को छुपाने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन अंजाने में आपका बायां हाथ ही चलता है । कल आपकी कोठी के बैकयार्ड में मैंने आपके साथ चाय शेयर की थी तो आपने कप को बायें हाथ से थामा था, फिर जब आपने नोट किया था कि मैं देख रहा था तो फौरन आपने उसे दायें हाथ में ले लिया था । यूं आपका बायां हाथ चलते मैंने और भी दो तीन बार नोट किया था । जब बायें हाथ से तमाम काम करने की आदत हो तो कितना ही कंट्रोल आप करें, कभी कभार लापरवाही हो जाना लाजमी है । वो लापरवाही परसों रात छतरपुर में भी हुई जबकि आपने सुरभि को शूट करते वक्त बायां हाथ इस्तेमाल किया, आपने उसकी बाईं कनपटी में गोली उतारी । फौरन आपको अपनी गलती का अहसास हो भी गया होता तो वो कोई ऐसी गलती नहीं थी जिसे कि आप सुधार पाते । गलत कहा मैंने ?”

“और ?” - वो बड़े सब्र से बोला ।

“बकौल इंस्पेक्टर साहब” - मैंने यादव की तरफ इशारा किया - “केयरटेकर अल्फाज दोहरा के बोलता था, उत्तेजित हो जाता था तो उसकी आवाज ऊंची हो जाती थी, एक आंख फड़कने लगती थी । जनाब,ये तमाम खूबियां मैंने आप में देखीं ।”

“क्या !”

“कई बार मैंने आपको अलफाज दोहरा के बोलते सुना । अभी ही याद कीजिये कि जब आपने मुझे पागल करार दिया था तो क्या कहा था ! आपने कहा था ‘तुम पागल हो, हो बराबर पागल’ । ये आपके - रिपीट, आपके, केयरटेकर के नहीं - अंदाजेबयां की खूबी की ताजा मिसाल है, भड़कते है तो जिस पर आपका काबू नहीं रहता । अभी भी भड़के थे तो आवाज भी अपने आप ऊंची हो गयी थी - बावजूद आपकी मौजूदा खस्ता हालत के ऊंची हो गयी थी - और एक आंख भी फड़कने लगी थी । ये अपने आप में सबूत है कि परसों रात आपके फार्महाउस पर बतौर केयरटेकर जो शख्स पुलिस के रूबरू हुआ था, वो आप थे... क्योंकि केयरटेकर तो तब तक कब का मर खप चुका था ।”

“बकवास !” - वो फिर भड़का लेकिन तत्काल उसने अपने गुस्से और एकाएक ऊंची हो गयी आवाज पर काबू पाया - “ये मेरे पर साइकोलोजिकल प्रैशर बनाने की एक घिनौनी चाल है और, मुझे कहते अफसोस होता है कि, इंस्पेक्टर साहब उसमें शामिल हैं... बाकायदा शामिल हैं ।”

यादव ने बेचैनी से पहलू बदला ।

“जनाब” - मैं सविनय बोला - “बेहतर होता कि ऐसा कोई फैसला आप बाकी बात सुन लेने के बाद करते ।”

“ठीक है, सुनाओ । बाज तो आओगे नहीं सुनाने से क्योंकि तुम्हें पुलिस की शै है । कहो, और क्या है तुम्हारे पास ?”

“और जहर का मामला है ।”

“उसका क्या मामला है ?”

“जहर आपने खाया लेकिन मरे नहीं...”

“वजह मालूम नहीं तुम्हें ? भूल गये मैं कहां पड़ा हूं !”

“.. .क्योंकि नाप जोख कर, सोच समझ कर खाया । आपके सिवाय ये किसी को मालूम नहीं हो सकता था कि जहर से आपकी जान नहीं जाने वाली थी । कोई अनहोनी न हो जाये, इसलिये आपने सुनिश्चित किया कि डाक्टरी इमदाद आपको जल्द-अज-जल्द हासिल होती ।”

“कैसे ?”

“वो हस्पताल छांटा जो सबसे करीब था और एम्बुलेंस के लिये खुद वहां फोन किया । ब्रेकफास्ट टेबल पर आपके साथ जेनुइन हादसा हुआ होता, एम्बुलेंस के लिये फोन किसी और ने - जैसे कि आपके बेटे ने, जो कि ब्रेकफास्ट में शामिल था - किया होता तो आपकी औकात और हैसियत के मद्देनजर किसी टॉप के हस्पताल को काल लगाई होती । ऐसा हस्पताल एम्स हो सकता था, साकेत का मैक्स हो सकता था लेकिन आपको, आपकी स्कीम को ये होली एंजल - जो कि एक छोटा सा प्राइवेट नर्सिंग होम है - सूट करता था । सबने तसदीक की कि एम्बुलेंस आनन फानन आपकी कोठी पर पहुंची थी क्योंकि जहर खाने से पहले ही आपने एम्बुलेंस के लिये फोन कर दिया था ।”

“बकवास ! एम्बुलेंस के लिये काल किसी औरत ने की थी ।”

मैंने अपलक उसे देखा ।

“क्या है ?”

“आपको कैसे पता ?”

“किसी ने बोला था ।”

“कब ?”

“मेरे होश में आने के बाद ।”

“किसने ?”

“ध्यान नहीं । शायद किसी नर्स ने । या किसी आर्डरली ने । या किसी डाक्टर ने ।”

“स्विच बोर्ड की काल्स की उनको भी क्या खबर ?”

“मुझे नहीं पता ।” - उसके स्वर में झुंझलाहट का पुट आया ।

“ऐसी काल्स की खबर या काल ओरीजिनेट करने वाले को होती है या रिसीव करने वाले को होती है जो कि शांता नाम की यहां की स्विच बोर्ड आपरेटर है ।”

“उसने किसी को कुछ बोला होगा । किसी ने किसी को बोला होगा । ये बात किसी को कहते मैंने सुना था तो सुना था ।”

“ये डैमेज कंट्रोल की कोशिश है ।”

“ये अपनी वाहियात बात मुझ पर थोपने की तुम्हारी वाहियात कोशिश है ।”

“आप बूढ़े हो गये हैं ।”

“क्या बकते हो ?”

“आपका दिल जवान है, आपकी ख्वाहिशात जवान हैं लेकिन आपकी सोच, आपकी समझ, आपकी प्रेजेंस आफ माइड सब कुछ बुढ़िया गया है, इसीलिये अनजाने में गलतियां करते हैं ।”

“गलतियां !”

“जी हां । प्लूरल में । जैसी गलती अभी आप से हुई वैसी - ज्यादा डैमेजिंग, बल्कि फैटल - गलती आप पहले भी कर चुके हैं ।”

वो सकपकाया, उसके माथे पर बल पड़े ।

“पहले कब ?” - फिर बोला तो साफ चिंतित लगा ।
 
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