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मैं कनाट प्लेस पहुंचा ।
सब-इंस्पेक्टर भूपसिंह रावत मुझे होटल की पहली मंजिल पर स्थित रिसैप्शन पर बैठा टीवी देखता मिला ।
“आओ, भई ।” - वो बोला - “तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ।”
“अच्छा !”
“इंस्पेक्टर साहब का फोन आया न ! बोले, तुम्हें किसी की शिनाख्त के लिये पुलिस की मदद की जरूरत थी ।”
“ओह !”
“आजकल साहब के सगे कैसे बने हुए हो ?”
“नहीं बना हुआ, यार । बस, यूं समझो कि साहब की मेहरबानी की बेमौसम बरसात हुई ।”
“बेमौसम बरसात तो बस होती ही है, टिकती कहां है !”
“ये मेहरबानी भी नहीं टिकने की, इसलिये जो हैल्प कर सकते हो, जल्दी करो ।”
“क्या चाहते हो ?”
मैंने उसे पेपरबैग में मौजूद गन दिखाई ।
“इससे दो वैरीफिकेशन चाहता हूं ।” - मैं बोला - “एक तो इस पर किसी की उंगलियों के निशान हैं जिनकी हो सके तो मैं पुलिस रिकार्ड से शिनाख्त चाहता हूं ।”
“ये तो कोई बड़ा काम नहीं । आजकल नोन क्रिमिनल्स का फिंगरप्रिंट्स रिकार्ड फुल्ली कंप्यूटराइज्ड है । एक कमांड से हकीकत सामने आ जायेगी कि इस पर के फिंगरप्रिंट्स वाले का कोई रिकार्ड है या नहीं ! दूसरी बात ?”
“ये बत्तीस कैलीबर की गन है ।” - मैं अर्थपूर्ण स्वर में बोला ।
“दिख रहा है मुझे । तो ?”
“तुम्हारे पास बत्तीस कैलीबर की एक बुलेट है जो तुमने डियर पार्क में एक पिकनिक हट की दीवार में से खोद कर निकाली थी ।”
तत्काल रावत सम्भल कर बैठा ।
“वो गोली” - फिर बोला - “इस गन से निकली थी ?”
“ये तो बैलेस्टिक्स एक्सपर्ट के पता लगाये पता लगेगा न !”
“ये गन तुम्हारे पास कहां से आयी ?”
मैंने बताया ।
“अरे !” - वो हैरानी से बोला - “तुम हथियारबंद थे, ये उनकी गन भी, तुम्हारे कब्जे में थी, फिर भी उन्हें निकल जाने दिया !”
“निकल के कहीं नहीं जाने वाले । नोन क्रिमिनल हुए तो पकड़े जायेंगे ।”
“जरूर ही पकड़े जायेंगे । अब तक दिल्ली में बैठे होंगे ! पता नहीं कहां के कहां पहुंच चुके होंगे !”
“अरे, रावत साहब, अभी से क्यों कलप रहे हो अपने साहब की तरह ! पहले उनके खिलाफ कुछ साबित तो हो ले...”
“हो नहीं चुका साबित ! तुम्हारे लाक्ड फ्लैट में घुसे, तुम पर हमला किया, तुम पर गन तानी ...”
“मौजूदा केस से ताल्लुक रखता कुछ साबित तो हो ले !”
“तुमने गलत किया लेकिन ....खैर ... और बोलो और क्या है ?”
मैंने मोबाइल में मौजूद उन दोनों की तसवीरें रावत को दिखाईं ।
“ओह !” - रावत बोला - “तस्वीरें खींच ली ! ये तो बड़ा काम किया !”
“ये उस्ताद है । बिरजे नाम है । इसके दायें हाथ की कलाई बुरी तरह से जख्मी है और ये बात इसे पहचनवायेगी - अब ये न पूछना क्यों जख्मी है, कैसे जख्मी है - ये इसका शागिर्द है, नाम मुझे मालूम नहीं । ये पुलिस के रिकार्ड में हुए तो इनका तमाम कच्चा चिट्ठा उजागर हो जायेगा ।”
“न हुए तो ?”
“तो किस्मत । तो इनकी शक्लों की तसवीरों का ही आसरा होगा इनकी तलाश में ।”
“हैडक्वार्टर जाना होगा । तुम्हारे सब कामों का वहीं होना मुमकिन है ।”
“ठीक है ।”
“कहां ठीक है ! मैं यहां खास ड्यूटी पर हूं ड्यूटी छोड़ कर नहीं जा सकता ।”
“इंस्पेक्टर साहब ने कहा न कि जा सकते हो !”
“साफ, दो टूक न कहा ।”
“फोन करो, अब कह देंगे ।”
वो हिचकिचाया ।
“हुज्जत न करो । लड़की को अब तुम्हारी प्रोटेक्शन की पहले जैसी जरूरत नहीं है । अब तुम्हारी यहां टोकन प्रेजेंस है । इस केस को अब खत्म समझो, इसलिये लड़की को अब कोई खतरा नहीं है ।”
उसने उस बात पर विचार किया ।
“अरे, दो किलोमीटर पर तुम्हारा हैडक्वार्टर है । बड़ी हद एक घंटे में लौट आओगे ।”
“अच्छा !”
“ज्यादा टाइम लगे तो मैं वहां रुक जाऊंगा, तुम लौट आना ।”
“ठीक है । चलो ।”
********************************
हैडक्वार्टर पर एक्सपर्ट्स की पड़ताल से जो नतीजे सामने आये, वो बाकायदा मेरी पसंद के निकले । मसलन:
डियर पार्क वाली गोली उसी गन से चलाई गयी थी जो कि मैंने एसआई रावत को सौंपी थी ।
गन पर से उसका सीरियल नम्बर रेती से घिसकर मिटा दिया गया हुआ था, इसलिये उसकी ओनरशिप की पड़ताल मुमकिन नहीं रही थी ।
गन पर से उठाये गये स्पष्ट फिंगरप्रिंट्स का मैच पुलिस के रिकार्ड में मिला था जिसके अनुसार वो फिंगरप्रिंट्स बृजलाल नाम के एक नोन क्रिमिनल के थे ।
मेरे मोबाइल में मौजूद दो तसवीरों में से एक - उस्ताद की, बिरजे की - बृजलाल की थी ।
दूसरी तसवीर पुलिस की रोग गैलरी में नहीं थी लेकिन एक हवलदार ने उसे बृजलाल के जोड़ीदार रौशन रामपुरी के तौर पर पहचाना था ।
“इंस्पेक्टर साहब को रिपोर्ट करो ।” - मैं रावत से बोला - “शायद वो इन दोनों की तलाश और गिरफ्तारी की जरूरत महसूस करें ।”
“तुम क्या करोगे ?” - रावत बोला ।
वसंत लोक जाऊंगा । अभी वहीं जा रहा हूं । यादव साहब वहीं हैं, मुलाकात हो गयी तो मैं भी खबर करूंगा ।”
“ठीक है ।”
मेरे मोबाइल वाली तसवीरों का यहां कंप्यूटर पुलआउट निकाला गया था । कापी मुझे मिल सकती है ?”
“मालूम करता हूं ।”
उसने मुझे दोनों तसवीरों की कलर प्रिंटर से निकाली कापी ला के दी ।
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सब-इंस्पेक्टर भूपसिंह रावत मुझे होटल की पहली मंजिल पर स्थित रिसैप्शन पर बैठा टीवी देखता मिला ।
“आओ, भई ।” - वो बोला - “तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ।”
“अच्छा !”
“इंस्पेक्टर साहब का फोन आया न ! बोले, तुम्हें किसी की शिनाख्त के लिये पुलिस की मदद की जरूरत थी ।”
“ओह !”
“आजकल साहब के सगे कैसे बने हुए हो ?”
“नहीं बना हुआ, यार । बस, यूं समझो कि साहब की मेहरबानी की बेमौसम बरसात हुई ।”
“बेमौसम बरसात तो बस होती ही है, टिकती कहां है !”
“ये मेहरबानी भी नहीं टिकने की, इसलिये जो हैल्प कर सकते हो, जल्दी करो ।”
“क्या चाहते हो ?”
मैंने उसे पेपरबैग में मौजूद गन दिखाई ।
“इससे दो वैरीफिकेशन चाहता हूं ।” - मैं बोला - “एक तो इस पर किसी की उंगलियों के निशान हैं जिनकी हो सके तो मैं पुलिस रिकार्ड से शिनाख्त चाहता हूं ।”
“ये तो कोई बड़ा काम नहीं । आजकल नोन क्रिमिनल्स का फिंगरप्रिंट्स रिकार्ड फुल्ली कंप्यूटराइज्ड है । एक कमांड से हकीकत सामने आ जायेगी कि इस पर के फिंगरप्रिंट्स वाले का कोई रिकार्ड है या नहीं ! दूसरी बात ?”
“ये बत्तीस कैलीबर की गन है ।” - मैं अर्थपूर्ण स्वर में बोला ।
“दिख रहा है मुझे । तो ?”
“तुम्हारे पास बत्तीस कैलीबर की एक बुलेट है जो तुमने डियर पार्क में एक पिकनिक हट की दीवार में से खोद कर निकाली थी ।”
तत्काल रावत सम्भल कर बैठा ।
“वो गोली” - फिर बोला - “इस गन से निकली थी ?”
“ये तो बैलेस्टिक्स एक्सपर्ट के पता लगाये पता लगेगा न !”
“ये गन तुम्हारे पास कहां से आयी ?”
मैंने बताया ।
“अरे !” - वो हैरानी से बोला - “तुम हथियारबंद थे, ये उनकी गन भी, तुम्हारे कब्जे में थी, फिर भी उन्हें निकल जाने दिया !”
“निकल के कहीं नहीं जाने वाले । नोन क्रिमिनल हुए तो पकड़े जायेंगे ।”
“जरूर ही पकड़े जायेंगे । अब तक दिल्ली में बैठे होंगे ! पता नहीं कहां के कहां पहुंच चुके होंगे !”
“अरे, रावत साहब, अभी से क्यों कलप रहे हो अपने साहब की तरह ! पहले उनके खिलाफ कुछ साबित तो हो ले...”
“हो नहीं चुका साबित ! तुम्हारे लाक्ड फ्लैट में घुसे, तुम पर हमला किया, तुम पर गन तानी ...”
“मौजूदा केस से ताल्लुक रखता कुछ साबित तो हो ले !”
“तुमने गलत किया लेकिन ....खैर ... और बोलो और क्या है ?”
मैंने मोबाइल में मौजूद उन दोनों की तसवीरें रावत को दिखाईं ।
“ओह !” - रावत बोला - “तस्वीरें खींच ली ! ये तो बड़ा काम किया !”
“ये उस्ताद है । बिरजे नाम है । इसके दायें हाथ की कलाई बुरी तरह से जख्मी है और ये बात इसे पहचनवायेगी - अब ये न पूछना क्यों जख्मी है, कैसे जख्मी है - ये इसका शागिर्द है, नाम मुझे मालूम नहीं । ये पुलिस के रिकार्ड में हुए तो इनका तमाम कच्चा चिट्ठा उजागर हो जायेगा ।”
“न हुए तो ?”
“तो किस्मत । तो इनकी शक्लों की तसवीरों का ही आसरा होगा इनकी तलाश में ।”
“हैडक्वार्टर जाना होगा । तुम्हारे सब कामों का वहीं होना मुमकिन है ।”
“ठीक है ।”
“कहां ठीक है ! मैं यहां खास ड्यूटी पर हूं ड्यूटी छोड़ कर नहीं जा सकता ।”
“इंस्पेक्टर साहब ने कहा न कि जा सकते हो !”
“साफ, दो टूक न कहा ।”
“फोन करो, अब कह देंगे ।”
वो हिचकिचाया ।
“हुज्जत न करो । लड़की को अब तुम्हारी प्रोटेक्शन की पहले जैसी जरूरत नहीं है । अब तुम्हारी यहां टोकन प्रेजेंस है । इस केस को अब खत्म समझो, इसलिये लड़की को अब कोई खतरा नहीं है ।”
उसने उस बात पर विचार किया ।
“अरे, दो किलोमीटर पर तुम्हारा हैडक्वार्टर है । बड़ी हद एक घंटे में लौट आओगे ।”
“अच्छा !”
“ज्यादा टाइम लगे तो मैं वहां रुक जाऊंगा, तुम लौट आना ।”
“ठीक है । चलो ।”
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हैडक्वार्टर पर एक्सपर्ट्स की पड़ताल से जो नतीजे सामने आये, वो बाकायदा मेरी पसंद के निकले । मसलन:
डियर पार्क वाली गोली उसी गन से चलाई गयी थी जो कि मैंने एसआई रावत को सौंपी थी ।
गन पर से उसका सीरियल नम्बर रेती से घिसकर मिटा दिया गया हुआ था, इसलिये उसकी ओनरशिप की पड़ताल मुमकिन नहीं रही थी ।
गन पर से उठाये गये स्पष्ट फिंगरप्रिंट्स का मैच पुलिस के रिकार्ड में मिला था जिसके अनुसार वो फिंगरप्रिंट्स बृजलाल नाम के एक नोन क्रिमिनल के थे ।
मेरे मोबाइल में मौजूद दो तसवीरों में से एक - उस्ताद की, बिरजे की - बृजलाल की थी ।
दूसरी तसवीर पुलिस की रोग गैलरी में नहीं थी लेकिन एक हवलदार ने उसे बृजलाल के जोड़ीदार रौशन रामपुरी के तौर पर पहचाना था ।
“इंस्पेक्टर साहब को रिपोर्ट करो ।” - मैं रावत से बोला - “शायद वो इन दोनों की तलाश और गिरफ्तारी की जरूरत महसूस करें ।”
“तुम क्या करोगे ?” - रावत बोला ।
वसंत लोक जाऊंगा । अभी वहीं जा रहा हूं । यादव साहब वहीं हैं, मुलाकात हो गयी तो मैं भी खबर करूंगा ।”
“ठीक है ।”
मेरे मोबाइल वाली तसवीरों का यहां कंप्यूटर पुलआउट निकाला गया था । कापी मुझे मिल सकती है ?”
“मालूम करता हूं ।”
उसने मुझे दोनों तसवीरों की कलर प्रिंटर से निकाली कापी ला के दी ।
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