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Thriller मिशन

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25 मार्च 2015

फ्लाईट 301

अरब सागर का वायुमंडल

फलक प्लेन की खिड़की के बगल वाली सीट पर मौजूद थी। वह उत्साह से बाहर के नज़ारे देख रही थी। मोहसीन उसके बाजू में था जो उसे कहीं दूर आसमान में बादल दिखा रहा था।

“वो देख फल्लू- पहाड़!”

“वो पहाड़ थोड़ी न है मामू। क्लाउड है।”

“अरे नहीं वो बर्फ का पहाड़ है। माउंट एवरेस्ट।”

“मम्मी देखो मामू झूठ बोल रहे हैं।”

सरीना मैगज़ीन पढ़ रही थी। उसने मोहसिन पर नज़र डाली और सर हिलाते हुए मुस्करा दी।

“टीचर ने बताया है...माउंट एवरेस्ट इज इन नेपाल। मामू आपकी टीचर ने आपको इतना भी नहीं सिखाया ?”

“अच्छा! बहुत बोलने लगी है।” कहकर मोहसिन उसके गुदगुदी करने लगा। फलक बुरी तरह से हंसने लगी।

“मोहसिन!” सरीना डांटते हुए बोली, “ज्यादा मस्ती नहीं। सीधे बैठो दोनों।”

तभी प्लेन बाएँ तरफ धीरे-धीरे झुकने लगा। एयरहोस्टेस जो फिलहाल पैसेंजर्स को चाय-कॉफ़ी सर्व कर रहीं थीं– लड़खड़ा गईं।

मोहसिन हंसकर बोला, “जीजी! जब प्लेन ही सीधा नहीं चल रहा तो हम कैसे सीधे बैठें।”

फलक भी दांत दिखाते हुए हंसने लगी।

प्लेन में सीट बैल्ट्स पहनने के निर्देश ज़ारी हो गए थे।

प्लेन में अधिकतर लोग सामान्य ढंग से बैठे थे पर कुछ ज़रूर थे जो व्यग्र होने लगे थे। एक संभ्रांत बिजनसमैन-सा प्रतीत होता व्यक्ति खड़े होकर एयरहोस्टेस से पूछने लगा, “ये प्लेन मुड़ क्यों रहा है ? कोई इमरजेंसी है क्या ?”

“सर प्लीज़! आप अपनी सीट पर बैठ जाएँ और सीट बैल्ट लगा लें। कभी-कभार खराब मौसम के कारण रूट चेंज करना पड़ जाता है।”

वह व्यक्ति बैठ तो गया पर फिर भी रोष भरे स्वर में बोलता गया। “मुझे मत सिखाओ मैं हजारों बार प्लेन में ट्रेवल कर चुका हूँ। जिस तरह ये प्लेन मुड़ा है- लग रहा है इसने पूरा नब्बे का कोण मारा है। आप पता करिए और इस दिशा बदलाव की क्या वजह है उसकी प्लेन में घोषणा करवाइए।”

“ज़रूर सर! प्लीज़ बी पेशेंट। पायलट जल्दी घोषणा करेंगे।”

एयरहोस्टेस जिसका नाम हिना था तेजी से आगे बढ़ते हुए बिजनस क्लास पहुंची फिर उसे पार करते हुए कॉकपिट के दरवाजे पर पहुंची। वह खड़े एक स्टीवर्ड और एयरहोस्टेस से वह मुखातिब हुई। वे दोनों परेशान से नज़र आ रहे थे।

“क्या हुआ प्लेन ने दिशा क्यों बदली ?” हिना ने पूछा।

“हम भी यहीं पता करने की कोशिश कर रहे हैं।” दूसरी एयरहोस्टेस बोली।

“तो ? क्या कह रहे हैं कैप्टन ?”

“अन्दर से कोई जवाब मिले तो न।” कहते हुए स्टीवर्ड ने कॉकपिट के बाहर लगे टचपेड पर पासकोड डाला पर दरवाजा फिर भी नहीं खुला।

हिना ने दरवाजा धकेलने की कोशिश की। “लगता है कोई टेक्नीकल फाल्ट है दरवाजे में।”

“आई हॉप सो...” दूसरी एयरहोस्टेस सहमे हुए स्वर में बोली। उसका चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया था।

हिना दरवाजे पर नॉक करने लगी, पर अन्दर से कोई प्रतिक्रिया हासिल नहीं हुई।

“कहीं दोनों ही पायलट्स को तो कुछ नहीं हो गया।” स्टीवर्ड बोला।

“कम ऑन!” दूसरी एयरहोस्टेस बोली, “दोनों पायलेट्स को एक साथ...कोई चांस नहीं।”

“क्यों नहीं! ऐसा पहले हो चुका है। तुम्हें वो सिप्रस से ग्रीस वाली फ्लाईट के बारे में नहीं पता ?”

उसने न में सर हिलाया।

“तभी! उस फ्लाईट में केबिन प्रेशर सिस्टम गलती से मैन्युअल पर रह गया था और प्लेन हवा में उठने के बाद अन्दर प्रेशर गिरता चला गया और प्लेन में दोनों पायलेट्स की मौत हो गई।”

“ओह गॉड! फिर क्या हुआ ?”

“फिर क्या। सबकुछ होने के बाद भी किसी को शायद नहीं सूझा कि प्रॉब्लम कहाँ है। अंत में एक अटेंडेंट ने कॉकपिट में आकर प्लेन सँभालने की कोशिश की पर...”

“पर... ?” एयरहोस्टेस के चेहरे पर हाहाकारी भाव थे।

“प्लेन पहाड़ों में क्रेश हो गया। सब मारे गए।”

“प्लीज़!” हिना बोली, “डराओ नहीं! आई एम श्योर दरवाजे में कुछ प्रॉब्लम है। इसे फिर से ट्राई करो...”

“अरे, कितनी बार...” स्टीवर्ड ने नंबर पंच किया। पर नतीज़ा सिफर निकला। उसने दरवाजे को खटखटाकर गहरी सांस ली।

“ज़रूर कैप्टन विक्रम या अजय में से किसी एक को कुछ हुआ है।” हिना चिंतित स्वर में बोली।

“तो वो अकेले क्या कर लेंगे ? दरवाजा तो खोलना चाहिए।” स्टीवर्ड बोला।

“प्लेन का दिशा बदलना फिर भी जस्टिफाई नहीं होता।” दूसरी एयरहोस्टेस बोली।

हिना चिंतित मुद्रा में कॉकपिट के दरवाजे को देखती रह गई।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

नई दिल्ली

शाम ढल रही थी।

राज बस में पीछे से तीसरी सीट पर खिड़की के पास बैठा था। अपनी ठोड़ी हथेली पर टिकाये वह बाहर देखते हुए ख्यालों की भंवर में फंसा हुआ था।

बस तेजी से शहर से बाहर निकलने के लिये अग्रसर थी।

नौकरी फ़िज़ूल ...

देशभक्ति फ़िज़ूल ...

यारी-दोस्ती फ़िज़ूल ...

किस पर शक करें और किस पर यकीन ?

क्या ये दिन देखने के लिये सीक्रेट सर्विस ज्वाइन की थी ? ये जिल्लत तो नहीं सही जायेगी कि कोई क्रिमिनल की तरह पूछताछ करे, इंटरनेशनल कोर्ट में पेशी के लिये भेज दे।

राज ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया। उसे वह पहले ही एयरप्लेन मोड पर डाल चुका था। उसने वह स्केच निकाला।

आरती!

आहूजा की गर्लफ्रेंड!

आखिरी सहारा!

आखिरी आस!

पता नहीं कहाँ मिलेगी ।

स्केच से किसी को ढूंढना मुश्किल है पर असम्भव नहीं। खासकर कि अगर वह कोई भगौड़ा मुजरिम न हो। असल में तो वह अब खुद एक भगौड़ा बन चुका था। संभावित है कि क्रिमिनल डेटाबेस को एक्सेस करने के जो ज़रिये उसे अभी तक हासिल थे अब उनका प्रयोग करने में उसे मुश्किलें आनी थीं। फिर भी कहीं न कहीं से जुगाड़ करना बड़ी बात न होगी। पर वो तब ही कारगर साबित होगा जब कि आरती कोई मुजरिम हो। अगर वो एक आम लड़की हुई जिसकी सम्भावना ज्यादा लग रही है तो क्रिमिनल डेटाबेस में उसकी कोई इन्फोर्मेशन उपलब्ध न होगी। इंटरनेट पर तो उसे वह कल से ही सर्च कर रहा था। पर जैसा कि उम्मीद थी नतीजा सिफर ही था। फिलहाल शिमला जाना उसे सही फैसला लगा। लड़की हिमाचल की थी तो उसके वहीं मौजूद होने के आसार ज्यादा थे और न भी हो तो उससे सम्बंधित कुछ बातें तो पता चलेंगी। जैसा कि मनोज ने कहा था कि आहूजा उससे मिलने हिमाचल जाया करता था, इसका मतलब लड़की खुद उससे मिलने कहीं बाहर नहीं निकली थी। फिर जब दो-तीन साल तक आहूजा सोहनगढ़ माइंस में रह रहा था, तो वैसे ही उनका आपस में मिलना-जुलना कभी नहीं हो पाया होगा। पर आहूजा कभी तो उसे कॉन्टेक्ट करता होगा। माइंस में इंटरनेट तो था। आहूजा की इंटरनेट एक्टिविटी से काफी कुछ पता चल सकता है। पर इन सब कामों के लिये रिसोर्सेज़ चाहिये थे।

राज ने फोन जेब में डाला और फिर कुर्सी रिलेक्स करके आँखें मूँद लीं।

☐☐☐
 
ज़ाहिद और सुरेश इस वक्त अपने होटल में बैठे चीफ के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल पर थे।

“मुझे डर था यही होने वाला है।” अभय की आवाज आई।

ज़ाहिद बोला, “सर हम सब जानते हैं कि जो राज ने सोहनगढ़ माइंस में किया वह एकदम जायज था। उसकी जगह कोई और होता, चाहे पुलिस या आर्मी, या हम में से ही कोई और होता तो भी यही करता। अगर आपके देश पर कोई न्यूक्लियर मिसाइल गिराने जा रहा होगा तो उसे रोकने के लिये मारना पड़े तो ये कोई जुर्म नहीं है।”

“हम जानते हैं! हम जानते हैं!” अभय कुछ उत्तेजित स्वर में बोला, “ राज ने जो किया, उससे हमें भी रत्ती भर आपत्ति नहीं है, पर हमारे सामने एक सिस्टम है। हमें साबित करना होगा कि वह इंटरपोल का एजेंट आतंकवादी धारणाएं रखता था। अगर उसकी जगह राज ने उस वक्त खलीली पर फायर किया होता तो आज कोई सवाल पूछने वाला नहीं होता। पर वो एक ब्रिटिश सिटिज़न था, एक इंटरपोल एजेंट था। रमन आहूजा गुप्त रूप से आतंकवादी था यह किसको पता है ? पता भी है तो सबूत किसके पास है ?”

“सर, सबूत मिल जायेंगे, इन्वेस्टिगेशन चल ही रही है, थोड़ा और जोर-शोर से रमन आहूजा के बैकग्राउंड पर काम करेंगे तो पता चल जायेगा।”

“हम भी यही चाहते हैं। तुम्हें क्या लगता है हमारी इच्छा है कि हम अपने एजेंट को इंटरनेशनल कोर्ट को सौंप दें ? प्रोटोकॉल के तहत जिसके खिलाफ इन्वेस्टिगेशन चल रही है उसको अरेस्ट या सस्पेंड करना पड़ता है या हम कोई और तरीका अपना लेते - उसे हाउस अरेस्ट वगैरह जैसा कोई और इंतजाम कर लेते। पर उसे देखो... कितना अनप्रोफेशनल बिहेवियर है! किसी मुजरिम की तरह भाग गया!”

इस बार सुरेश बोला, “सर, उसके ऊपर क्या बीत रही है यह भी समझने वाली बात है। इस वक्त उसका इमोशनल स्टेटस बहुत सेंसेटिव चल रहा है। उस मिशन में वह रिंकी के बहुत करीब आ गया था– उसे अपना सोलमेट मानने लगा था। उसकी मौत के बाद उसका क्या हाल था– वह मैंने और ज़ाहिद ने ही देखा था।”

“मुझे पता है सुरेश। जितना अच्छे से तुम दोनों राज को समझते हो, उतना न सही पर काफी कुछ मैं भी अपने एजेंटों के बारे में समझ रखता हूँ। देश के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश चल रही है और बहुतों की जानें गई हैं। इस वक्त हम जैसे लोगों को ही मजबूत रहना होता है। मिशन के बाद राज किस हाल में था वह हम समझते हैं इसीलिए उसे छुट्टी दे रखी थी ताकि वह अपने पर्सनल प्रॉब्लम से उभर सके। उसे साइकाइट्रिक हेल्प भी दिलवाने की कोशिश की थी। खैर, वह तो उसकी जिद के कारण कामयाब न हो सकी।”

“मुझे लगता है वह इस वक्त सही सोचने की दशा में नहीं है। कुछ टाइम अकेला रहेगा फिर वापस आ जायेगा।” ज़ाहिद बोला।

“हम यह सब अंदाजा नहीं लगा सकते। राज भले ही इमोशनली कभी-कभार बहक जाता है पर वह हेड स्ट्रांग है। अगर उसने भागने का फैसला किया है तो कुछ सोचा होगा। शायद अपने ऊपर लगे इलज़ाम हटाने के लिये निकला होगा। पर ये उसकी बेवकूफी है क्योंकि वह अकेला है - यह काम नहीं कर सकता। जो मदद हम लोग कर सकते हैं वह उसे कहां मिलेगी ? और हम तो इन्वेस्टिगेशन किसी भी सूरत में करने वाले हैं।”

“तो फिर क्यों न फटाफट आहूजा के बारे में कुछ सबूत निकाले जायें ताकि राज को सीबीआई, इंटरनेशनल कोर्ट या कहीं भी भेजने की जरूरत ही न पड़े।” सुरेश ने कहा।

“अब रातों-रात तो सब कुछ नहीं हो सकता। तुम लोग भी प्लेन हाईजैकिंग के केस में लगे हो जो ज्यादा महत्वपूर्ण है।”

ज़ाहिद बोला, “कोई बात नहीं सर, दोनों काम साथ में भी हो सकते हैं, और जैसा आपने बताया आहूजा की पोस्टिंग सीबीआई ऑफिस में ही थी तो इन्वेस्टिगेशन तो वहीं से शुरू होनी चाहिये।”

“यानि तुम सीबीआई में ही इन्वेस्टिगेट करोगे ?”

“सर, अभी हमें उसके खिलाफ सबूत निकालने के लिये उसके पास्ट को इन्वेस्टिगेट करना है तो शुरुआत वहीं से करनी होगी। सीबीआई में उसका ऑफिस, और वो जहाँ रुका था आदि...”

“ठीक है! मैं राज निकेतन से बात करूँगा। इधर सीबीआई सरकार को एक्शन के रूप में ये दिखाना चाह रही है कि राज को पूछताछ के लिये अरेस्ट किया गया है और साथ में इन्वेस्टिगेशन चल रही है। अब उसके गायब होने से हमारे ऊपर सवाल उठेंगे और अगर हम यह बताएंगे कि राज इस तरह भाग गया तो फिर उसके ऊपर और सख्त कदम उठाये जा सकते हैं और उन हालातों में हम लोग भी उसकी मदद नहीं कर पायेंगे।”

“सर! मेरा तो यही सजेशन है कि सीबीआई से कुछ दिन की मोहलत ली जाये, यह कहकर कि राज अभी जिन असाइनमेंट्स पर काम कर रहा है उनको पूरा करने में कुछ टाइम लगेगा, हैंडोवर देने में टाइम लगेगा, इसलिये कुछ समय बाई इन कर लिया जाये।”

“यह सब बातें कौन समझेगा ? मिनिस्ट्री तक जब ये बात पहुंचेगी तो वह सीधे बोल देंगे – उसके सारे काम किसी और को तुरंत दो और उसे भेजो।”

“पर सर ... हमें तो यही पहलू रखकर कोशिश करनी होगी।”

कुछ क्षण की शांति के बाद अभय बोला- “शायद इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। पर फिर हमारा एक काम और बढ़ जाता है। राज को ढूंढकर वापस लाना क्योंकि वह क्या करने निकला है और कितने समय में वापस आयेगा- हमें नहीं पता। अब उसे ढूंढने के टास्क पर किसको लगाया जाये ?”

अभय ने कहा और उसके बाद सन्नाटा छा गया। वाकई इस परिस्थिति में इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं था।

फिर अचानक अभय खुशमिजाज स्वर में बोला, “तुम दोनों से बेहतर उसे कोई और कन्विंस नहीं कर सकता।”

“सर यह काम मैं कर सकता हूँ।” सुरेश बोला।

“तुम उसे कन्विंस जरूर कर सकते हो पर मैं नहीं चाहता उसे ढूंढने और पकड़ कर लाने के चक्कर में तुम दोनों के बीच की दोस्ती खराब हो जाये। साथ ही अब प्लेन हाईजैकिंग के साथ तुम दोनों आहूजा के खिलाफ इन्वेस्टिगेशन करोगे, इसलिये ये मुमकिन नहीं होगा।”

कुछ पल और शांति रही फिर अभय बोला, “मैं सोच रहा हूँ किसी को उस पर लगाने के लिये और जब ज़रूरत पड़े उसे तुम रीमोटली एसिस्ट करना।”

“अच्छा आईडिया है सर।” सुरेश ने कहा।

“ठीक है! फिर मैं कोशिश करता हूँ सीबीआई से कुछ समय लेने के लिये और साथ ही आहूजा के बारे में पूछताछ के लिये समय देने के लिये। बाय फ़ॉर नाओ!”

“बाय सर!” ज़ाहिद और सुरेश ने संयुक्त स्वर में कहा।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

रात तक राज शिमला पहुँच चुका था।

अंतिम पड़ाव पर बस के रुकने के बाद सैलानी नीचे उतरने लगे।

राज भी अपनी सीट से उठा और चल दिया। सामान के नाम पर उसके पास सिर्फ एक हैंडबैग ही था। वह बस से बाहर आया। मौसम ठंडा था। अगस्त के महीने में बहुत ज्यादा तो नहीं पर फिर भी हिल स्टेशन होने के कारण ठंड तो थी ही।

बस स्टॉप से बाहर निकलना भी नहीं हुआ था कि होटल एजेंट्स ने जैसे उस पर हमला कर दिया।

एक एजेंट से होटल के कमरे के दाम पर मोलभाव करते हुए राज को ख्याल आया अभी डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड प्रयोग करने पर भी उसे ट्रेस किया जा सकता है। उसने अपने बटुए में चेक किया–उसके पास करीब पांच हज़ार रुपए कैश था।

उसे लगा उसने गलती की, उसे दिल्ली से ही अच्छा खासा कैश निकाल कर चलना चाहिये था।

उसने फिर इस बारे में ज्यादा सोचने की फ़िलहाल जरूरत नहीं समझी और एक एजेंट के साथ हो लिया जो उसे सस्ता रूम दिलाने का वादा कर रहा था। उसे एक सस्ते कमरे की ही तलाश थी। कोई सैर-सपाटे पर तो वह निकला नहीं था। ऐसे मौके पर अपनी कार की बहुत याद आ रही थी। देश भर में दूर-दूर तक काम के सिलिसिले में अक्सर वो अपनी कार ले जाना पसंद करता था, फिर चाहे सुरेश की कंपनी हो या अकेले। हालांकि उसे पता था प्रस्तुत हालातों में कार साथ होना उसके लिये मुसीबत बन सकता था।

वह सफर से थका हुआ था। होटल में चेकइन करके उसका थोड़ा बहुत हल्का खाना खाकर सोने का इरादा था।

एजेंट के पीछे चलते-चलते वह सड़क पर आ गया। एजेंट ने उसे अपनी बाइक के पीछे बैठा लिया और चल दिया। शिमला में अधिकतर नौजवान दंपत्ति या फिर फैमिली वाले दिखाई दे रहे थे। कई नवविवाहित जोड़े भी उनमें शुमार थे। अगस्त के महीने में भी अच्छी खासी चहल-पहल थी। आखिर शिमला उत्तर भारत के सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशनों में से एक जो था।

राज एजेंट के बताये होटल में पहुँचा। वहाँ अपनी एक नकली आई डी से उसने चेकइन किया और खाने का ऑर्डर देकर सीधे कमरे में पहुँच गया। बाथरूम जाकर फ्रेश होने के बाद वह आराम से बैड पर लेट गया।

उसका दिमाग रेस के घोड़े की तरह दौड़ने लगा था।

आखिर शुरुआत कहाँ से हो ?

अभी तो ये भी नहीं पता कि फिलहाल आहूजा की गर्लफ्रेंड यानि आरती शिमला तो क्या हिमाचल में भी थी कि नहीं।

फिर उसे ख्याल आया कि इस बात पर तो वह पहले भी विचार कर चुका था ।

कहीं से तो शुरुआत करनी है। पर अब शुरुआत किस तरह से हो ? लड़की का स्केच ही एक जरिया था और उसको इस्तेमाल करने के लिये किसी न किसी की मदद तो ज़रूर लगेगी।

खाना आ गया। उसने जल्दी से उसे निपटाया। फिर कमरे से जुड़ी बालकनी में आकर रात के अंधेरे में देवदार के पेड़ों का दीदार करते हुए उसने एक सिगरेट सुलगा ली।

यह काम तो कोई पुलिस वाला भी कर सकता है और अपनी पुलिस में काफी जान पहचान भी है। पर ध्यान रखना होगा कि किसी ऐसे पुलिस वाले को कॉन्टेक्ट न करूँ जिसके द्वारा सीक्रेट सर्विस तक खबर पहुँच जाये।

कुछ देर सोचने के बाद उसे एक नाम ध्यान में आ गया। राजस्थान में एक फोरेंसिक एक्सपर्ट था - जय पालिवाल, जिसके साथ एक पुराने केस में उसकी ट्यूनिंग अच्छी जमी थी। पालिवाल काम में तो अच्छा था ही, काम निकलवाने में भी माहिर था। उसने राज की ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर काफी मदद की थी।

वहीं इस काम के लिये सही रहेगा। ठीक! पर अगर लड़की क्रिमिनल बैकग्राउंड की न हुई फिर क्या किया जाये ?

वह सोच में डूब गया। उसने खत्म होती सिगरेट को अंदर आकर ऐश ट्रे में बुझाया और फिर लेट गया।

कुछ ही पल में नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया।

☐☐☐

वह सुबह जल्दी ही उठ गया और टहलता हुआ होटल के बाहर निकल आया और एक चाय की दुकान पर बैठकर अखबार पढ़ते हुए चाय पीने लगा। इस वक्त वह हिमाचल की राजधानी में था और उसे एक ऐसी लड़की की तलाश थी जिसका उसके पास सिर्फ स्केच मौजूद था। उसका नाम ज़रूर मालूम था पर उसके अलावा कोई और जानकारी नहीं थी। राज ने आरती नाम से हिमाचल में फेसबुक और इंटरनेट पर लड़कियां पहले ही तलाश की थीं पर यह भूस में से सुई ढूंढने जैसा काम था। उसने कई लड़कियों के प्रोफाइल देखे, कईयों पर कोई फोटो ही नहीं था या फिर किसी सेलिब्रिटी का फोटो लगा हुआ था। उसे हँसी आ गई थी। इस तरह तो असली आरती का प्रोफाइल सामने होते हुए भी वह उसे नहीं पहचान पायेगा और दूसरी सम्भावना यह भी हो सकती है कि उसने अपना प्रोफाइल डिलीट कर दिया हो।

क्या जय पालीवाल से स्केच ढूंढवाना काम आएगा ? कोशिश करने में कोई हर्ज तो नहीं और उसमें रिस्क भी कम था क्योंकि जय पालीवाल तक मेरे भागने की खबर पहुँचना मुमकिन नहीं था। क्योंकि मैं सीक्रेट सर्विस में हूँ इसलिये मेरे बारे में यह खबर मीडिया में आसानी से नहीं आने वाली ।

यह सोचते हुए उसने वहाँ एक लैंड लाइन फोन से जय का नंबर लगाया और स्केच की लड़की के बारे में पता करने का आग्रह किया। फिर उसे अपने एक ताज़ा बनाये ईमेल द्वारा स्केच भेज दिया।

हालांकि उम्मीद कम थी पर कोशिश करने में क्या जाता था। लड़की क्रिमिनल न सही अगर गुमशुदा भी हुई तो भी पता चल सकता था।

चाय पीने के बाद राज होटल में वापस जाने की बजाय शहर में घूमने लगा। ठंड में उसे सुस्ती महसूस हो रही थी जिसे भगाने के लिये और अपने दिमाग को निरंतर दौड़ाते रहने के लिये उसे घूमते रहना बेहतर लग रहा था।

ठंड अच्छी-खासी थी। उसने जैकेट की ज़िप ऊपर तक बंद कर ली और हाथ जेबों में डालकर तेजी से चलने लगा। सड़कों पर लोग बाग बेहद कम दिख रहे थे। यकीनन सैलानी अभी भी अपने-अपने होटलों में बिस्तरों की आगोश में थे।

राज के मन में अनेकों विचार तेज नदी के प्रवाह की तरह बहते चले जा रहे थे। वह आहूजा को याद कर रहा था। उसके मन में यह सवाल कौंध रहा था कि क्या वाकई उसने आहूजा को जान से मार कर सही कदम उठाया था ?

मैं उसके पैर या हाथ पर भी फ़ायर कर सकता था। उसे जान से मारने की जगह इतना घायल कर सकता था कि उसके कदम रुक जाते। वह कोई बुरा इंसान नहीं था, वह अपनी जान पर खेलकर दो साल से माइंस में रह रहा था और खलीली और उसके प्लान के खिलाफ ही काम कर रहा था हालांकि खलीली से बड़ा मास्टरमाइंड तो वह खुद था, जो वक्त रहते पासा पलटने की फिराक में था । पर एक बात समझ में नहीं आ रही कि अगर आहूजा भी इस बात से सहमत था कि भारत के अंदर न्यूक्लियर हमले हों तो फिर उसने खलीली को रोका ही क्यों ? क्या शुरू से ही उसका यहीं प्लान था या फिर उसी वक्त उसे यह ख्याल आया ? नहीं! सब कुछ पहले से प्लांड था क्योंकि यह बात चौधरी भी जानता था और वह उस प्लान का भागीदार था। आहूजा की कहानी सुनकर लगा था उसने लाइफ में काफी कुछ झेला था । उसका बचपन आसान नहीं था और उस नाज़ुक उम्र में हुए कुछ हादसे मन को इस तरह प्रभावित करते हैं कि इंसान की सोच समझ कुछ अलग ही हो जाती हैं । कुछ ऐसा ही आहूजा के साथ हुआ था । उसके पिता की मौत का उसके मनोभाव पर बेहद गहरा प्रभाव हुआ था और ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है। वह उसे रोक सकता था उसको बाद में समझाया जा सकता था।

सच में अगर देखा जाये तो उसे मारने के बाद से मेरे साथ कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है । उसके तुरंत बाद ही मैंने रिंकी को खो दिया और अब तो साला करियर दांव पर लगा हुआ है। शायद मुझे मेरे कर्मों का फल मिल रहा है । शायद जो कुछ बुरा मेरे साथ हो रहा है- मैं उसका हकदार हूँ।

सोचते-सोचते राज दौड़ने लगा। उसका मन उद्वेलित था। वह अपने मन में कौंधते उन विचारों को अपने शरीर के वेग से जैसे पछाड़ देना चाहता था।

कुछ देर लगातार दौड़ने के बाद उसकी सांस फूलने लगी और वह रुककर तेज-तेज सांस लेने लगा।

नहीं! मैंने जो किया सही किया। उस वक्त मैं देश का आम नागरिक नहीं एक सैनिक था, जिसे हर हालत में देश की रक्षा करनी थी। भले ही किसी की भी बलि चढ़ जाती। सैनिक दुश्मन पर गोली चलाने से पहले यह नहीं सोचता कि उसके दुश्मन का भी परिवार है, उसकी भी एक जिंदगी है। यह उसकी ड्यूटी होती है कि अपने देश के दुश्मन को खत्म करे। दुश्मन को मारना पाप नहीं होता।

राज शायद खुद को समझाने की कोशिश कर रहा था। पर उसे अपने मन को दिलासा देना मुश्किल हो रहा था।

अपने उद्वेलित मन और तेज सांसों को नियंत्रित करते हुए वह सड़क किनारे एक बेंच पर बैठ गया। कुछ देर वहाँ सुस्ताने के बाद वह उठा और वापस होटल की तरफ बढ़ गया।

होटल पहुँच कर कुछ देर टीवी देखने के उपरांत दोपहर उसने जय पालीवाल को फोन किया।

उसने तुरंत फोन का जवाब दिया।

“ राज भाई!”

“कुछ पता चला ?”

“हां! पता तो चला। एक बात बताओ वह आपकी जानने वाली तो नहीं थी ?”

“क्यों क्या हुआ ?”

“जो खबर मिली है वह अच्छी नहीं है पर मुझे लगता है आप प्रोफेशनली ही इसे ढूंढ रहे होंगे।”

“तुम्हारा सोचना सही है। जानने वाली होती तो मैं उसके बारे में पूरी तरह से जीरो नहीं होता। अब बताओ क्या पता चला ?”

“यह बात भी ठीक है। दरअसल यह लड़की पहले गुमशुदा थी और फिर इसकी लाश पाई गई थी।”

“ओह!” राज के मुंह से अफसोस भरा स्वर निकला। “हुआ क्या था ?”

“लड़की ने नदी में कूदकर सुसाइड कर ली थी।”

“कब की बात है ?”

“अभी पिछले महीने की।”

राज निःशब्द हो गया।

यकीनन यह आहूजा की गर्लफ्रेंड ही थी, जिसने उसकी मौत की खबर मिलने के बाद खुदकुशी कर ली।

“किस शहर की रहने वाली थी और कहां हुआ ये हादसा ?”

“मंडी की रहने वाली थी और मंडी में ही यह हादसा हुआ था।”

आगे बढ़ने का जो एक सहारा था वह भी गया। अब क्या किया जाये ? जाकर देखना होगा। डूबते को तिनके का सहारा ही काफी है। शायद मंडी जाकर कुछ पता चल सके।

“क्या हुआ भाई ? कुछ और आदेश ?”

“मुझे उसका एड्रेस वगैरह बताओ।”

जय ने बताया जिसे राज ने अपने फोन में लिख लिया। फिर दुआ-सलाम के साथ कॉल समाप्त की।

फोन रखकर वह कुछ पल होटल के काउंटर पर ही ठगा-सा खड़ा रह गया।

मेरी वजह से सिर्फ आहूजा ही नहीं बल्कि एक बेगुनाह की मौत भी हो गई। अगर आहूजा आज ज़िंदा होता, भले ही जेल में होता, तो वो भी ज़िंदा होती। क्योंकि जेल जाने के बाद भी उसके वापस आने की आस होती, कुछ नहीं तो उसे मुज़रिम जानकर छोड़ देती, भुला देती, फिर भी जिंदा होती।

“सर आप ठीक हैं ?”

काउंटर बॉय की आवाज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया।

“हाँ!”

“कुछ सेवा की जाए ?”

“हाँ! बिल बना दो। चैक आउट करना है।”

उसने राज के इस अप्रत्याशित निर्णय से चौंककर उसे देखा पर राज का ध्यान कहीं और था। वह किसी गहरी उधेड़बुन में खोया हुआ था।

☐☐☐
 
23 मार्च 2013

फ्लाईट 301

अरब सागर का वायुमंडल

फ्लाईट को अपने निर्धारित पथ से मुड़े हुए एक घंटा हो गया था। प्लेन के पैसेंजर्स परेशान होने लगे थे। कई लोग अपनी सीटों से खड़े हो गए थे और कुछ अब कॉकपिट के पास पहुँच गए थे। उन्हें अब ये ज्ञात हो गया था कि कॉकपिट के अन्दर कोई नहीं जा पा रहा। फ्लाईट अटेंडेंट्स उन्हें समझाने-बुझाने में अब असफल हो रहे थे। जब वे खुद ही इन परिस्थितयों से आशक्त थे तो दूसरों को कब तक समझाते। फिर भी वे प्रयास कर रहे थे।

“सर, कभी-कभी होता है ऐसा। एयर करेंट, चक्रवात जैसी चीज़ों से प्लेन को अपनी दिशा बदलनी पड़ती है। आप लोग प्लीज़ अपनी सीट पर बैठ जाएँ। कुछ ही देर में प्लेन अपनी सही दिशा में उड़ेगा– आप देखिएगा।” हिना बोले जा रही थी।

“मैडम! वो सब तो ठीक है।” वह बिजनसमैन बोला जिसने प्लेन के मुड़ने पर सब से पहले आशंका जताई थी। “पर पायलट्स कोई अनाउंसमेंट क्यों नहीं कर रहे ? आप लोगों से बात क्यों नहीं कर रहे ? इतनी सी बात तो फ्लाईट में तुरंत बता दी जाती है।”

“कभी-कभी कम्युनिकेशन फेल्योर हो जाता है।”

“अरे, तो आप कॉकपिट के अन्दर जाकर क्यों नहीं पूछते ?”

“दरवाजा नहीं खुल रहा-कुछ प्रॉब्लम है।” दूसरी एयरहोस्टेस ने नर्वस भाव से कहा।

“ये तो हद हो गई।” वह एक सहयात्री की तरफ देखते हुए बोला, “सारी प्रॉब्लम्स एक साथ हो रही हैं। अरे ऐसा कहीं होता है ?”

एक दूसरा गंजा आदमी अपनी पतली आवाज़ में बोलने लगा– “मैडम! हमें जानना है चल क्या रहा है। कहीं ये प्लेन हाइजैक तो नहीं किया जा रहा ?”

बस उसके मुंह से ‘हाइजैक’ शब्द निकला नहीं कि लोगों में दहशत की लहर दौड़ गई।

“हाइजैक! ओह माई गॉड!” बिजनस क्लास में एक अधेड़ विदेशी महिला, जो अभी तक इत्मीनान से बैठी मैगज़ीन पढ़ रही थी, उसके मुंह से चीत्कार निकली।

पल भर में ‘हाइजैक’ शब्द जंगल की आग की तरह प्लेन के बिजनस क्लास से इकॉनमी क्लास की अंतिम पंक्ति तक पहुँच गया। यात्री जो अभी तक सिर्फ हैरान-परेशान थे, अब सहम गए थे।

“आप कुछ भी कह रहे हैं।” हिना बोली, “प्लीज़! इस तरह बाकी पैसिंजर्स को डराइये नहीं। आई रिक्वेस्ट यू!”

“सर, आप भी कमाल करते हैं। प्लेन हाइजैक हो रहा होता तो कोई हाईजैकर्स दिखाई तो देते।” स्टीवर्ड ने कहा।

“हमें क्या पता ये प्लान किसका है। पायलट्स का भी हो सकता है।”

“अरे भाईसाब! मुझे तो लगता है ये पूरा स्टाफ मिला हुआ है।” गंजा फिर से अपनी पतली आवाज़ में बोला।

तभी एक वरिष्ठ आदमी उठा और सभी को शांत रहने का इशारा करते हुए बोला, “प्लीज़! आप लोग शांत हो जाइये। ऐसा कभी नहीं होता। आपने कभी देखा है कि एयरप्लेन का स्टाफ प्लेन हाइजैक करे।”

“पर सर जी, कुछ पता भी तो लगे। ऐसे कैसे कोई कुछ बता ही नहीं पा रहा। प्लेन न जाने कहाँ उड़ा जा रहा है।” बिजनसमैन बोला।

इधर सरीना भी अन्य यात्रियों की तरह खौफजदा थी। मोहसिन और फलक सामने लगी स्क्रीन में कार्टून विडिओ देखते हुए हंस रहे थे।

“चुप रहो।” सरीना झुंझलाते हुए बोली।

“जीजी! क्यों डर रही हो।” मोहसिन बोला, “कुछ नहीं हुआ है। प्लेन हवा में उड़ने के लिये ही तो बना है- कभी तो लेफ्ट राईट होगा।”

“पर इतना शोर-शराबा क्यों हो रहा है। कोई कह रहा है कि प्लेन हाइजैक हो गया है।”

वह हंसा- “पर कोई हाईजैकर तो दिख नहीं रहा।”

“या अल्लाह! खैर रखना...” वह आँखें बंद कर के बड़बड़ाने लगी।

“आप नाहक ही परेशान हो रही हैं। मैं देख कर आता हूँ।” वह उठने की कोशिश करते हुए बोला।

“चुपचाप बैठे रहिए।” सरीना ने उसे डांटा।

कॉकपिट के बाहर माहौल बिगड़ता जा रहा था। कई पैसेंजर्स उठ खड़े हुए थे। इकॉनमी सेक्शन से भी कुछ लोग उस तरफ आ गये थे। प्लेन का स्टाफ अब उनको संयमित रख पाने में असफल हो रहा था।

स्टीवर्ड जिसका नाम रोहित था, उसके पसीने छूटने लगे थे कि तभी वह चौंका।

कॉकपिट के दरवाजे के पास लगे स्पीकर से आवाज़ आई। रोहित उसकी तरफ आकर्षित हुआ।

“स्टाफ! स्टाफ! कैप्टन विक्रम दिस साइड!”

“कैप्टन! रोहित दिस साइड! प्लीज़ बोलिए। क्या हो गया था ? हम कब से दरवाजा खलने की कोशिश कर रहे हैं।”

“मैं और अजय भी वो कोशिश कर रहे हैं पर कुछ भी फंक्शन काम नहीं कर रहा। दरअसल...दरसअल... ऐसा लग रहा है पूरा प्लेन किसी और के कंट्रोल में है।”

“ये...ये आप क्या बोल रहे हैं कैप्टन ? ऐसा कैसे हो सकता है ? क्या आप एयर कंट्रोलर से भी संपर्क नहीं कर पा रहे ?”

“कुछ भी काम नहीं कर रहा। तुम प्लीज़...” और अचानक विक्रम की आवाज़ आनी बंद हो गई। स्पीकर पर सन्नाटा छा गया।

“कैप्टन ? कैप्टन ?” रोहित स्पीकर पर हाथ मारते हुए चीखा।

विक्रम की आवाज़ सारे स्टाफ के साथ कुछ पैसेंजर्स को भी सुनाई दी थी।

“ये सब साजिश है।” गंजा व्यक्ति बोला, “ऐसा कैसे हो सकता है ?”

“सर, प्लीज़ ये डेफिनेटली कोई टेक्नीकल प्रॉब्लम है।” हिना बोला, “आई एम श्योर कुछ ही देर में सब कंट्रोल में होगा।”

“अरे मैडम...”

तभी बिजनस क्लास का एक पैसेंजर्स बोला, “आई नो व्हाट इट इज़!”

सब उसकी तरफ मुड़े।

वह अपनी सीट पर आराम से बैठा हुआ था। उसने पोलो शर्ट पहनी हुई थी जो उसके कसरती बदन पर खूब फब रही थी। उसके गेंहुए चेहरे पर फ्रेंच कट दाढ़ी थी और उसकी आँखों पर काले फ्रेम का चश्मा था। वह बोला-

“ये इलेक्ट्रॉनिक हाइजैकिंग हो सकती है। किसी ने प्लेन के सॉफ्टवेयर को हैक कर लिया है.”

“सर, प्लीज़!” जेनी नामक दूसरी एयरहोस्टेस बोली, “इस तरह अफवाहें न फैलाएं। ऐसा पॉसिबल नहीं।”

“बिलकुल पॉसिबल है। मैं एक सॉफ्टवेयर कम्पनी का मलिक हूँ। आई नो स्टफ!”

“आई थिंक ही इज़ राइट।” विदेशी महिला बोली, “आई हर्ड अबाउट इट!”

सबसे ज्यादा बोलने वाला बिजनसमैन जिसका नाम अरुण खुराना था, वह सभी बिजनस क्लास वालों पर बारी-बारी से नज़र डालने लगा। फिर वह आगे बढ़कर उस लड़के के पास पहुँचा जो खिड़की वाली सीट पर बैठा निरंतर अपने लैपटॉप पर लगा हुआ था। उसने सिर पर अपनी जैकेट का हुड डाला हुआ था।

“हे यू!” वह उसकी सीट के पास आकर बोला, “क्या कर रहे हो ?”

लड़के के हाथ की-बोर्ड पर रुक गये। उसने चौंककर उसकी तरफ देखा। लड़के की दाढ़ी मूंछ बढ़ी हुईं थीं। उसकी आँखों में थकान साफ़ दिखाई दे रही थी।

“आखिर तुम कर क्या रहे हो ?” अरुण ने फिर से पूछा।

“काम करा रहा हूँ। डू यू माइंड ?” उसने हाथ फैलाते हुए पूछा।

“प्लेन में इतना अफरा-तफरी मची हुई है। प्लेन शायद हाइजैक हो गया है...एंड यू... ?”

“तो क्या मैं भी खड़ा होकर चीखने-चिल्लाने लगूं ?”

“नॉट नेसेसरी, पर कोई ऐसे माहौल में काम कैसे कर सकता है ?”

तब तक वहाँ वह सॉफ्टवेयर कंपनी का मालिक भी पहुँचा। उसका नाम अब्दुल था।

“इफ यू डोंट माइंड मेट...क्या मैं तुम्हारा लैपटॉप देख सकता हूँ ?” उसने अपना चश्मा एडजस्ट करते हुए पूछा।

“ऑफ कोर्स आई माइंड! ये मेरी कंपनी का लैपटॉप है और मैं एक काँफिडेंशियल कोड पर काम कर रहा हूँ। मैं इसे नहीं दिखा सकता।”

अरुण बोला, “आई रिक्वेस्ट। ये कोई नॉर्मल हालात नहीं है।”

“पर मैं ही क्यों दिखाऊं लैपटॉप ? सबके लैपटॉप बारी-बारी चैक कीजिए।”

“ज़रूर देखेंगे...पर पहले...”

“आपको लग रहा है मैं यहाँ से बैठकर प्लेन हाइजैक कर रहा हूँ ? यू आर आउट ऑफ योर माइंड! यहाँ बिना किसी नेटवर्क के मैं कैसे प्लेन के सिस्टम में घुस सकता हूँ ?”

“पॉसिबल है! अगर पहले से पूरी प्लानिंग के साथ आया जाये।” अब्दुल ने कहा।

“यू डोंट नो एनिथिंग! मैं अपना लैपटॉप नहीं दिखाऊंगा।”

अरुण और अब्दुल उसे घूरने लगे। फिर अचानक अब्दुल उस पर झपट पड़ा। दोनों के बीच लैपटॉप को लेकर छीना-झपटी होने लगी।

दो और पैसिंजर्स अब्दुल को लैपटॉप छीनने में सहायता करने लगे।

फिर वह अब्दुल के हाथों में था।

“व्हाट द...” उसने गाली दी, फिर निश्चिंत स्वर में बोला, “देख लो। इत्मीनान से देखो। अगर कुछ मिले तो मुझे बताना।”

अब्दुल ने लैपटॉप को जांचना शुरू कर दिया।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

होटल से चेक आउट करके राज बस स्टॉप पहुँचा वहाँ पर उसे मंडी के लिये बस मिल गई बस द्वारा वह चार घंटे के अंदर मंडी पहुँच गया।

मंडी पहुँचकर उसे ठंड से कुछ राहत महसूस हुई क्योंकि मंडी शिमला की तरह ज्यादा ऊंचाई पर नहीं था। जहां शिमला में इस वक्त कड़ाके की ठंड पड़ रही थी मंडी में मौसम खुशनुमा था। सिर्फ स्वेटर में भी राज का काम चल रहा था। जैकेट की फ़िलहाल जरूरत नहीं पड़ रही थी।

बस स्टॉप पर उतरने के बाद पहले तो राज ने बाथरूम में घुस कर अपना हुलिया बदला। काफी दिनों से उसने शेव नहीं की थी तो उसने अपनी दाढ़ी और मूंछें बढ़ी ही रहने दी। उसके अलावा कुछ और मेकअप करके उसने अपनी शक्ल में काफी बदलाव कर लिया।

फिर एक बजट होटल में चेकइन करने के बाद वह शहर में निकला।

मंडी शहर में काफी चहल-पहल थी। जहां शिमला ज्यादातर टूरिस्ट की आवाजाही से भरा पड़ा था उसके विपरीत मंडी कारोबारी गतिविधियों से ओत-प्रोत था। कारोबार की दृष्टि से यह शहर हिमाचल प्रदेश का मुख्य स्थल था।

आरती की इन्वेस्टिगेशन करने के बारे में राज के दिमाग में एक प्लान था। जैसा कि जय पालीवाल से उसे पता चला था उसका केस देवली स्थित पुलिस थाने में दर्ज था।

वे देवली पुलिस थाने पहुँचा। उसने ड्यूटी ऑफिसर से मिलने की मांग की। वह एक महिला पुलिस थाना था और वहाँ यूँ राज को देख कर कुछ महिला पुलिस कांस्टेबल हैरान थी।

“क्या काम है ?” एक ने राज से पूछा।

“मैं सीक्रेट सर्विस से हूँ।” राज अपना आई कार्ड तेजी से दिखाते हुए बोला। उसे मालूम था सीक्रेट सर्विस नाम सुनते ही पुलिस वालों को अलर्ट हो जाना था। कोई भी उसका आईडी कार्ड ध्यान से देखने की जरूरत नहीं समझता और न ही वह ऐसा मौका देने वाला था क्योंकि उसने आईकार्ड पर लगे फोटो के विपरीत काफी मेकअप किया हुआ था और अपना असली नाम बताना तो वैसे भी सीक्रेट सर्विस वाले के लिये जरूरी नहीं था।

वह थाना इंचार्ज इंस्पेक्टर सुनीता पुजारी से मिला।

“आइए सर... कहिये कैसे आना हुआ ?” वह कुछ नर्वस भाव से बोली। राज को महसूस हुआ कि उसका किसी सीक्रेट सर्विस वाले से पहली बार पाला पड़ रहा था।

“मैं आरती नाम की एक लड़की की मौत की इन्वेस्टिगेशन के सिलसिले में आया हूँ।”

सुनीता सोच में पड़ गई। फिर याद करते हुए बोली, “वो जिसने नदी में कूदकर खुदखुशी कर ली थी ?”

“हाँ, वहीं।”

“अच्छा सर! पर वह तो सीधा साधा खुदकुशी का केस था उसके लिये आप यहाँ आ गए!”

“कुछ बेहद गंभीर मुद्दा जुड़ा हुआ है उस लड़की से, डायरेक्टली नहीं पर किसी और के थ्रू, इसलिये मेरे लिये यह पता करना बहुत जरूरी है कि उस लड़की ने खुदकुशी क्यों की। साथ ही उस लड़की के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी निकालनी है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।”

सुनीता के चेहरे पर नर्वस भाव कुछ और बढ़ गये। इस छोटे से थाने में बैठकर आज से पहले उसने शायद ही कभी इतने गंभीर मुद्दे के बारे में सुना था।

“मैं आशा करता हूँ कि आप मेरी पूरी मदद करेंगी।”

“जी सर! बिल्कुल करेंगे, जो भी हो सकेगा करेंगे। मैं आपको उसकी फाइल दिखाती हूँ।” कहकर उसने कॉन्स्टेबल से आरती की फाइल मंगवाई।

“मैं कुछ समय यह फाइल पढ़ना चाहता हूँ।” राज ने कहा।

“जी जरूर! अरे सर के लिये चाय ले आओ।”

“थैंक यू! इस केस की इन्वेस्टिगेशन आपने ही की थी ?”

“बिल्कुल सर। यह लड़की कॉलेज के बाद काफी समय से दिल्ली में नौकरी कर रही थी अभी कुछ ही दिन पहले घर वापस आई थी परिवार वालों का कहना था कि काफी दुखी थी, नौकरी छोड़ कर आ गई थी, पर उसका कारण उसने किसी को नहीं बताया बस यही कहा कि अब नौकरी अच्छी नहीं लग रही थी। घर वालों ने भी कहा कि ठीक है लड़की का मन नौकरी से भर गया तो अब उसकी शादी करा दी जाये। हालांकि उन्होंने लड़की पर कोई प्रेशर नहीं डाला था पर फिर इस ने खुदकुशी कर ली।”

“यानि खुदकुशी की वजह तो पता ही नहीं चली ?”

“जी! नहीं पता चली! परिवार वालों को तो इससे ज्यादा कुछ पता नहीं था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट्स से भी लड़की के साथ कुछ गलत हुआ हो या फिर वह प्रेग्नेंट रही हो ऐसी कोई भी जानकारी पता नहीं चली।”

“पर अगर लड़की दिल्ली में ही नौकरी कर रही थी। वहीं पर रह रही थी तो यह सब जानकारी तो वहीं पर पता चल सकती थी।”

“जी कह तो आप सही रहे हैं...”

“पर इस दिशा में आपने कोई कोशिश नहीं की ?”

वह निरुत्तर हो गई।

“चलिए कोई बात नहीं। वह मैं पता करवा लूंगा। इस रिपोर्ट में क्या लिखा है ? यह कहां नौकरी करती थी ?”

वह रिपोर्ट में झाँकने लगी।

“कोई बात नहीं मैं देख लूंगा। इस रिपोर्ट की एक फोटो कॉपी निकलवा दीजिए और इसके पैरेंट्स का एड्रेस मुझे दे दीजिए।”

“जी ज़रूर!”

पुलिस थाने से राज आरती के परिवार वालों से मिलने पहुँचा।

वह एक मध्यम दर्जे का घर था। आरती के माता-पिता काफी बूढ़े हो चले थे। कुछ झिझक के साथ उन्होंने राज का स्वागत किया।

“आपके परिवार में और कौन-कौन है ?” कुर्सी पर बैठते हुए राज ने पूछा।

“हम दो हैं और हमारा बड़ा बेटा है - वह चेन्नई में काम करता है।”

“अच्छा आरती से कितना बड़ा है ?”

“चार साल बड़ा है। अपनी फैमिली के साथ वहीं सेटल है। अभी तीन दिन पहले ही वापस गया। आरती ने जो कुछ किया उससे हम सभी अभी तक शॉक्ड हैं। हमें विश्वास नहीं हो रहा कि वह इस तरह हमें छोड़ कर चली गई। बहुत होनहार लड़की थी हमारी। कम बोलती थी पर ऐसा तो हमें कभी नहीं लगा कि उसे कोई बहुत बड़ी दिक्कत है।”

“परिवार में वह आप में से किसके ज्यादा करीब थी ?”

“लाड़ली तो वह हम सब की थी। पर वह बहुत शर्मीली थी। बचपन से ही अपने मन की बातें खुद तक ही सीमित रखती थी।” इस बार आरती की मां ने कहा।

“दिल्ली में काम क्या करती थी ?”

“उसने कंप्यूटर का कोर्स किया था उसके बाद से दिल्ली में ही पाँच साल से नौकरी कर रही थी।”

“घर आती जाती थी न ? आप लोग भी उससे मिलने जाते थे ?”

“हम तो बस शुरू में गए थे। बाद में तो वही आती थी। अब इस उम्र में हम दोनों से कहीं ज्यादा आना जाना होता भी नहीं।”

राज ने सहमति में सिर हिलाया।

“उसकी कंपनी का नाम बताइए उससे संबंधित कोई डॉक्यूमेंट आपके पास हो तो दिखाइए।”

“अपने सारे डॉक्यूमेंट तो वह साथ में ही रखती थी। यहाँ उसका कमरा है। पुलिस ने वह चेक किया था। कुछ खास तो नहीं मिला आप चाहें तो देख सकते हैं।”

राज ने आरती का कमरा देखा।

“हमने उसके सामान के साथ ज्यादा छेड़खानी नहीं की है। वैसे भी उसका यहाँ पर कोई खास सामान नहीं है।”

“और वह सामान जो दिल्ली में है ?”

“हाँ! वो उसकी दोस्त जब घर आयेगी तो साथ लेकर आएगी। वह मंडी की ही रहने वाली है।”

“उसका नाम और नंबर आपके पास हो तो मुझे दे दीजिए।”

“पल्लवी नाम है उसका। यह लो नंबर लिख लो।” कह कर उन्होंने अपने मोबाइल में नंबर ढूंढा और फिर राज को बताया।

कुछ देर और बात करने के बाद राज ने उनसे विदा ली और फिर वहाँ से सीधे अपने होटल आ गया।

होटल आते-आते आठ बज गया था।

रात हो गई थी और अब वहाँ भी ठंड बढ़ गई थी। उसने खाने का ऑर्डर दिया और खाना कमरे पर ही भेजने का निर्देश दे दिया। कमरे में पहुँचते ही उसने आरती की फाइल का अध्ययन करना शुरू किया।

पुलिस के मुताबिक ये एक सीधा साधा केस था। उस दिन आरती सुबह-सुबह ही गायब हो गई थी। बिना बताए घर से कहीं निकलना उसकी आदत नहीं थी। फिर चार घंटे बीतने के बाद घर वालों ने पड़ोसियों से पूछा और फिर किसी ने पुलिस को बताने की सलाह दी। पुलिस ने जब पूछताछ शुरू की तो पता चला वह सुबह अकेले ही ब्यास नदी के किनारे गई थी। नदी के पास किसी ने इस बात की पुष्टि की कि वह लड़की नदी के पास चलती हुई दिखाई दी थी।

पुलिस को शक हुआ कि शायद वह नदी में गिर गई है इसलिये नदी में खोजबीन चालू की गई और फिर दो दिन बाद उसकी लाश नदी प्रवाह में काफी दूर एक जगह पत्थरों में अटकी हुई पाई गई।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर पर किसी ऐसी चोट का निशान नहीं था जिससे क़त्ल का शक बनता। कुछ चोटें थी जो कि शर्तिया नदी के पत्थरों से लगी थीं। उसके अलावा सब कुछ ठीक था। फेफड़ों में पानी भरने की वजह से मौत हुई थी- यही पोस्टमार्टम का निष्कर्ष था।

बालकनी में आकर राज ने सिगरेट सुलगा ली और फिर सोच में डूब गया।

इतनी दूर जिसको ढूंढते हुए आया, जिससे उसे आहूजा की जानकारी मिलने की उम्मीद थी, वह ही अब इस दुनिया मे नहीं थी।

अब आगे कैसे बढ़ा जाये ?

फिलहाल उसके पास एक जरिया था वह थी उसकी दोस्त पल्लवी जिसका नंबर उसे हासिल था। अगर वह उसकी करीबी दोस्त थी तो जाहिर है उसकी पर्सनल लाइफ की जानकारी भी रखती होगी। यह सोच कर राज नीचे लैंडलाइन फोन इस्तेमाल करने के लिये पहुँचा।

पहली बार रिंग जाती रही किसी ने फोन नहीं उठाया। अनजान नंबर के साथ आजकल ऐसा ही होता है। दूसरी बार जब उसने फोन मिलाया तब दूसरी तरफ से एक लड़की की आवाज आई।

“हेलो!”

“आप पल्लवी बोल रही हैं ?”

“हां जी! आप कौन ?”

“मैं एक सीक्रेट सर्विस ऑफीसर बोल रहा हूँ। आपकी दोस्त आरती की मौत की इन्वेस्टिगेशन चल रही है। उसी सिलसिले में आपसे बात करनी थी।”

“ब...बोलिए - मैं क्या मदद कर सकती हूँ ?” उसके स्वर में कुछ घबराहट उभरी।

“आप मंडी कब आने वाली हैं ? मैं सोच रहा था अगर आप इधर आ रही हैं तो बैठकर आराम से बातचीत हो जायेगी।”

“जी अभी तो कुछ दिन पहले ही आकर गई हूँ। अब दोबारा तो अगले महीने ही आना होगा।”

“अच्छा कोई बात नहीं। फिलहाल मैं आप से फोन पर ही बात करके काम चला लूंगा। आप उसी की कंपनी में काम करती हैं ?”

“नहीं जी! मैं दूसरी जगह काम करती हूँ।”

“फिर आरती से दोस्ती कैसे हुई ?”

“दोस्ती तो मंडी में हुई थी। हम एक ही कॉलेज में थे। दिल्ली में शुरू में हम साथ रहते थे फिर मेरी शादी हो गई और मैं उसी सोसाइटी की दूसरी बिल्डिंग के एक फ़्लैट में अपने हसबैंड के साथ शिफ्ट हो गई।”

“अच्छा! यानि आपके फ़्लैट आस-पास ही हैं ?”

“हाँ!”

“फिर तो रोजाना मुलाकात हो जाती होगी।”

“रोज तो नहीं पर अक्सर...”

“तो आरती फ़िलहाल अकेले रहती थी ?”

“हाँ!”

“ओके! मुझे आरती की पर्सनल लाइफ के बारे में जानना है। क्योंकि यहाँ पुलिस से जो जानकारी मुझे मिली है उससे उसकी सुसाइड की कोई स्पष्ट वजह समझ में नहीं आई है।”

“जी! यह तो मुझे भी नहीं पता। जहाँ तक मुझे पता है उसकी यहाँ नौकरी ठीक-ठाक चल रही थी। फिर अचानक ही उसने नौकरी छोड़ दी और कहा कि अब घर जा रही है। मैंने उससे पूछा हुआ क्या, तो उसने बस यही कहा कि बस अब मन नहीं लग रहा है यहाँ। घर जाऊंगी।”

“अच्छा! क्या उसका कोई बॉयफ्रेंड था ?”

वह चुप हो गई।

“देखिए मुझसे कोई बात मत छुपाइये। जवान लड़की ने खुदकुशी की है इसलिये यह सब चीजें मेरे लिये जानना बहुत जरूरी है। लड़कियां तो अक्सर अपनी दोस्त से यह सब बातें शेयर करती हैं। आपको जो पता है मुझे बता दीजिए आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।”

“देखिए आरती बहुत कम ही बोलती थी। मैं उसकी बचपन से दोस्त जरूर थी पर वह हर चीज मेरे साथ शेयर नहीं करती थी। मेरे ख्याल से उसका बॉयफ्रेंड जरूर था। क्योंकि दिल्ली में जब उससे मिलती थी तो उसे अक्सर किसी के फोन या मैसेज आते थे और उसके हाव-भाव से ये अंदाजा तो मैंने लगा लिया था कि उसका किसी के साथ अफेयर चल रहा है। एक बार ये ज़रूर बोली थी कि उसका कोई फ्रेंड है लंडन में। मैं हमेशा बोलती थी कि वह जरूर तेरा बॉयफ्रेंड है तो वह हंसकर टाल देती थी और साफ मना करती थी।”

“आपने फोटो तो देखा होगा उसका ?”

“हां! एक बार दूर से दिख गया था। उसने दिखाया नहीं था। उसका तो यही कहना था कि उसके बहुत से ऐसे फ्रेंड है। शायद वह जिस कंपनी में काम करती थी वह उनका क्लाइंट था। इसलिये उसका यही कहना था कि प्रोफेशनल टाइप की दोस्ती है। तो मैंने भी फिर कभी ज्यादा जोर नहीं डाला।”

“ओके! आरती का ईमेल आईडी तो आपके पास होगा ? वह मुझे बता दीजिए।”

पल्लवी ने बताया। राज ने उसे नोट कर लिया और फिर बोला, “जरूरत पड़ने पर मैं आपको दोबारा फोन करूंगा।”

“जी जरूर!” राज ने फोन काटा और वापस अपने कमरे में आ गया। खाना आ गया था। खाना खाते हुए वह अब यही सोचने लगा कि आरती के ईमेल आईडी और फोन नंबर से जानकारी किस तरह निकलवाई जाये। सीक्रेट सर्विस के ऑफिस में बैठकर यह सब काम करवाना चुटकियों का खेल था पर एक भगौड़े जासूस को ये सारी सुविधाएँ कहाँ हासिल होती हैं।

खाना खाने के बाद वह कमरे में ही टहलने लगा। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

राज को लगा बैरा बर्तन लेने और बिल पर साइन लेने के लिये आया होगा। उसने तुरंत दरवाजा खोल दिया।

दरवाजा खुलते ही उसने अपने सामने एक नकाबपोश को खड़ा पाया जिसके हाथों में एक छोटा सा पिस्टल मौजूद था। नकाबपोश अंदर आ गया उसका पूरा चेहरा काले नकाब से ढका हुआ था, सिर्फ आंखें चमक रही थी, जिनमें खतरनाक भाव थे। राज के हाथ स्वतः ही ऊपर उठ गये और वह पीछे हटता चला गया।

राज ने नकाबपोश के पीछे झांककर चौंकने का अभिनय किया पर नकाबपोश पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और फिर अचानक ही पिस्टल जेब में रखा और हाथ फैलाकर कराटे की मुद्रा में आ गया। राज को आश्चर्य हुआ इस तरह का अक्सर फिल्मों में ही देखा जाता था। पिस्टल होते हुए भी वह उसे मारने की जगह लड़ने का मौका दे रहा था। इसका मतलब यह कोई ऐसा व्यक्ति था जो उससे नफरत करता था और मारने से पहले उसकी पिटाई करना चाहता था या फिर कोई ऐसा था जो उसकी जान लेने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। वह जो भी था उसे पहचानता था।

ऐसा कौन है जो यहाँ मंडी में मेकअप के बावजूद मुझे पहचान गया।

अभी राज सोच ही रहा था कि नकाबपोश ने तेजी से राज के ऊपर हाथ घुमाया। राज ने उसे अपने हाथों से रोक लिया और जवाब में मार्शल आर्ट का रंग दिखाते हुए पैर घुमाया जो नकाबपोश के मुंह पर जाकर लगा और वे पीछे जा गिरा। वह आश्चर्य से उसे देखते हुए उठा। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि राज इस तरह से लड़ने का हुनर भी जानता होगा।

“क्या बात है भाई ? मार्शल आर्ट सीखने आये हो क्या ? देखो ट्रेनिंग देने की फीस लगती है। फ्री में तो यह काम...”

इस बार नकाबपोश राज पर हाथ पैरों से कराटे के अंधाधुंध वार करने लगा। राज कुछ को डिफेंड कर पाया कुछ उसे झेलने पड़े। वाकई नकाबपोश प्रोफेशनल था पर राज भी अपने मार्शल आर्ट का कौशल दिखाते हुए उसके साथ जूझ रहा था।

जब नकाबपोश को ये अहसास हो गया कि राज पर काबू पाना मुश्किल है तो उसने फिर से अपनी जेब से पिस्टल निकाली और राज पर तान दी। तभी दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक होने लगी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि जिस तरह उन दोनों ने कमरे में उठा-पटक मचा रखी थी उसकी आवाज होटल में बाकी लोगों तक पहुंची न हो।

पल भर के लिये नकाबपोश का ध्यान हटा और राज ने उसका पूरा फायदा उठाते हुए उसके पैरों की तरफ डाइव लगा दी।

वह पिस्टल नहीं चला पाया और औंधे मुंह सामने की तरफ गिरा। पर गिरते ही इस बार वह फुर्ती से उठा और तेजी से बालकनी की तरह दौड़ पड़ा। देखते ही देखते वह बालकनी से नीचे कूद गया।

राज ने आश्चर्य से उस तरफ देखा और उठकर बालकनी में पहुँचा। वह कमरा तीसरी मंजिल पर था।

नकाबपोश बालकनी से लटक कर नीचे ग्राउंड फ्लोर पर बने टॉयलेट की छत पर कूद कर और फिर वहाँ से नीचे उतरकर होटल के बाहर पहुँच चुका था। बाहर निकलते ही वह तेजी से भागने लगा। राज ने नीचे की तरफ देखा पर उसे लगा उसे ऐसा स्टंट भारी पड़ सकता है।

न जाने किस मिट्टी का बना था।

राज वापस कमरे में आया और उसने दरवाजा खोला। कमरे के बाहर होटल का मैनेजर, एक वेटर व दो-तीन लोग और थे। सब उससे कुशल मंगल पूछने लगे। राज ने बताया कि न जाने कौन था जिस ने हमला किया। मैनेजर ने उसे पुलिस को रिपोर्ट करने की सलाह दी। पर राज ने इंकार कर दिया। राज ने कहा वह शायद उसका लैपटॉप आदि चोरी करने के इरादे से आया था। उसने यह बात नहीं बताई कि उसके पास हथियार भी मौजूद था।

उसके बाद सब अपने-अपने काम पर चले गये और राज ने कमरा अंदर से बंद कर लिया। उसने बालकनी अंदर से बंद कर ली और फिर सोचने लगा।

उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई

हमले से इस बात की पुष्टि हो गई है कि मैं सही ट्रैक पर हूँ । मंडी आते ही मुझ पर हमला हुआ । आरती के घर जाने और उसके केस के बारे में जानकारी निकालते ही हमला हुआ । मतलब उसकी मौत में ज़रूर कोई ऐसा रहस्य छिपा है जो यह लोग उजागर नहीं होना देना चाहते। यानि जो भी हो आरती की मौत खुदकुशी नहीं थी।

☐☐☐
 
दूसरे दिन राज उठा और फिर नाश्ता करते हुए सोच में डूब गया। उसके दिमाग में सिर्फ आरती घूम रही थी। अचानक ही उसके दिमाग में एक विचार कौंधा और वह भागकर नीचे पहुँचा और फिर उसने लैंडलाइन से पल्लवी का नंबर लगाया। पल्लवी ने कुछ ही देर में फोन उठाया।

राज व्यग्रता के साथ बोला, “सुबह-सुबह ज्यादा समय नहीं लूंगा। सिर्फ एक सवाल पूछना था।”

“ज़रूर पूछिए सर।”

“क्या तुम्हें मालूम है आरती दिल्ली से किस तारीख को और कितने बजे निकली थी ?”

पल्लवी कुछ याद करते हुए बोली, “हाँ उसने बताया था छह तारीख को सुबह निकल रही है।”

“कितने बजे ? शायद बताया होगा... ?” राज ने आशापूर्ण लहजे में पूछा।

“नहीं, समय तो नहीं बताया था पर आठ बजे की बस से ही निकली होगी... हमेशा की तरह।”

“ओके और दिल्ली से मंडी आने में कितना समय लगता है ?”

“करीब नौ घंटे।”

“यानि अगर सुबह उसने साढ़े आठ की बस भी ली होगी तो मंडी पहुँचते-पहुँचते शाम के पाँच-छह बज गये होंगे ?”

“हाँ! आप सही कह रहे हैं। मैं भी अक्सर सुबह साढ़े आठ की बस ही लेती हूँ, वह शाम छह बजे तक पहुँच ही जाती है।”

“ठीक है! थैंक यू! बाय बाय।”

फिर राज हाथ मसलते हुए उठा और चल दिया। पैदल चलते हुए ही वह कुछ मिनटों में आरती के घर पहुँचा। आरती के मां-बाप घर पर ही मिले। वहाँ पहुँचते ही उसने सीधे यह सवाल पूछा- “आरती दिल्ली से किस दिन और कितने बजे घर आई थी ?”

“क्या हो गया ?” उसके पिता ने चौंकते हुए पूछा।

“प्लीज़ बताइए। यह जानना मेरे लिये बहुत जरूरी है।”

आरती का पिता उलझन में पड़ गया। उसने अपनी बीवी की तरफ देखा। वह मोबाइल में देखने लगी, शायद मैसेज देख रही थी।

“वह सात तारीख को आई थी। यह देखिए सात को सुबह-सुबह उसका मैसेज आया था, कि मैं दिल्ली से निकल गई हूँ।”

राज की आंखें चमक उठी।

“मुझे इसी बात का अंदेशा था।”

“क्यों ? क्या हुआ ? इससे क्या पता चला ?” उसके पिता ने उलझन भरे भाव के साथ पूछा।

“असलियत में आरती दिल्ली से छह तारीख को चली थी, सात को नहीं।”

“ऐसा कैसे हो सकता है ?” आरती की मां ने पूछा- “अगर वह छह को चली होती तो छह को ही मंडी पहुँच जाती और घर आ जाती। पर वह तो सात की शाम को आई थी। इसका मतलब सात की सुबह ही दिल्ली से चली होगी...”

“आपका कहना सही है, अगर वह सात को चली होती तो। वह छह तारीख को कहां गई, अगर ये पता चल जाये तो काफी रहस्य खुल सकते हैं।”

दोनों राज को इस तरह देख रहे थे जैसे उसके सिर पर सींग उग आए हों।

“अब मैं चलता हूँ। आपसे बाद में मिलूँगा।”

“अरे मगर...” आरती के पिता बोलते ही रह गए पर राज अपनी धुन में तेजी से वहाँ से निकल गया।

फिर उसने एक पब्लिक फोन पकड़ा और किसी को फोन किया। दूसरी तरफ से आवाज आते ही वह बोला-

“तेजश्री! मैं राज बोल रहा हूँ। तुम्हारे लिये एक काम है जो तुम्हें मुझे आज की आज ही करके देना है।”

“पांय लागू राज सर! आप तो सर्वव्यापक हैं आप सर्वशक्तिमान हैं। आप हुकुम कीजिए।” तेजश्री बोली। वह एक आईटी प्रोफेशनल थी जो कि अक्सर सीक्रेट सर्विस के काम आती थी।

राज तुरंत बोला, “तुम्हें एक ईमेल आईडी दे रहा हूँ। कैसे भी करके तुम्हें उसे हैक करना है और हैक करके मुझे उसका एक्सेस देना है।”

“ राज सर! यह तो एक मामूली-सा काम है। आप तो जानते ही हैं मैं कितनी टैलेंटेड हूँ। कोई बड़ा काम दिया कीजिए। तभी मजा आएगा।”

“तुम यह काम तो करो। बड़े काम भी दूंगा।”

“देंगे न पक्का ?”

“हां पक्का।”

“सीक्रेट सर्विस में परमानेंट नौकरी भी दिलवाएंगे न ?”

“अरे यार...” राज बड़बड़ाया – “आगे कभी कोई ओपनिंग निकली तो सबसे पहले तेरा ही नाम दूंगा।”

“मुझे आप पर पूरा भरोसा है, राज सर। मुझे देश के लिये कुछ करना है। ये प्राइवेट नौकरी में कुछ नहीं रखा। अंग्रेजों की गुलामी है ये बस। आई रिस्पेक्ट यू। यू वर्क फॉर अवर कंट्री! आई एम प्राउड ऑफ यू! आप...”

“अच्छा-अच्छा! ठीक है! अब रख रहा हूँ।”

“जी! मैं हैक करते हु आपको पासवर्ड मैसेज करती हूँ।”

“नहीं! मैसेज नहीं करना। मेरे फोन में कुछ प्रॉब्लम है. मैं एक ईमेल देता हूँ- नोट कर...हाँ! इस पर भेजना।”

“ओके! पांय लागू राज सर!”

राज ने फोन काट दिया।

उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। काफी दिनों बाद उसने कुछ हल्का महसूस किया था।

लगता है सही दिशा में बढ़ रहा हूँ। एक बार ईमेल अकाउंट हाथ में आ जाये, काफी कुछ पता चल सकता है।

वहाँ से राज सरकारी अस्पताल पहुँचा, जहां पर आरती की लाश का पोस्टमार्टम हुआ था। वहाँ भी राज ने उसी तरह से फटाफट अपना आईडी दिखाया और डॉक्टर से भेंट की।

वह एक नौजवान डॉक्टर था, जिसका नाम मनीष खुराना था। राज उसके साथ कैफेटेरिया में चाय पर बैठा।

“तो डॉक्टर मनीष!” राज बोला, “मैंने पुलिस की रिपोर्ट में अटैच्ड पोस्टमार्टम की रिपोर्ट देखी थी। फिर भी कुछ अनसुलझे सवाल थे इसलिये मुझे लगा आपसे मिलकर शायद उनके जवाब मिल सकें।”

“जी! मैं जवाब देने की पूरी कोशिश करूंगा।” मनीष बोला।

“वेरी गुड! सबसे पहले तो मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपने आरती की शिनाख्त कैसे की ?”

“यह आप कैसी बात कर रहे हैं ? शिनाख्त करना तो पुलिस का काम होता है। मैं तो डॉक्टर हूँ। मेरे पास तो डेड बॉडी आ गई और मैंने पोस्टमार्टम किया।”

“हां! मैं अच्छी तरह से जानता हूँ आपने यही किया होगा पर पुलिस ने रिपोर्ट में लिखा था कि लाश दो दिन तक पानी में पड़े रहने की वजह से बुरी तरह से फूल गई थी और लड़की का चेहरा पहचानना मुश्किल था। ऐसे में अक्सर मेडिकल साइंस की मदद से डेड बॉडी की पहचान की जाती है। मैं बस यह जानना चाहता हूँ - क्या आपके द्वारा ऐसी कोई कोशिश की गई थी ?”

“जी नहीं! मुझसे जितना कहा गया मैंने वही किया। मैंने सिर्फ पोस्टमार्टम किया था।”

“चलिए बहुत अच्छा! यह बात साफ हो गई। दूसरी बात यह जानना चाहता था कि उसकी मौत का सही समय क्या था ?”

“जी ?” मनीष ने आँखें फैलाई।

“अक्सर पोस्टमार्टम में मौत का वक्त भी बताया जाता है न ?”

मनीष बगले झांकने लगा।

“दरअसल उसकी तो जरूरत समझी नहीं गई। डूब कर मरी थी। अब कितने बजे मरी थी यह बताना तो बहुत मुश्किल होता है...”

“फिर भी एक टाइम रेंज तो दी ही जाती है ?”

“जी मुझे माफ करिए... पर किसी ने इतनी डिटेल नहीं पूछी थी। शायद जरूरत नहीं समझी गई।”

“ओह!” राज निराशाजनक स्वर में बोला, “सच कहूँगा - यहाँ की पुलिस प्रणाली देख कर काफी दुःख हुआ है।”

“मैं तो इस काम में नया हूँ। यहाँ कोई एक्सपीरियंस डॉक्टर है नहीं। जो पुराने हैं भी वह यह काम करना नहीं चाहते...”

“कोई बात नहीं। मैं समझ सकता हूँ। फिर भी अब अगर आपको सोचना पड़े तो आपको क्या लगता है ? लाश पानी में कितने समय से पड़ी रही होगी ?”

“जी अब उसमें क्या सोचना ? लड़की दो दिन से गायब थी...”

“वह भूल जाओ।” इस बार राज ने सख्ती के साथ उसकी बात काटी – “बस ये सोचो कि लाश मिली है। अब यह बताओ कि उसका मुआयना देखकर क्या लगा था कितने दिनों से पड़ी थी पानी में ?”

मनीष असमंजस में पड़ गया, विचार करने लगा।

“देखिए पुख्ता तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। पर लाश अच्छी-खासी फूली हुई थी, जैसे कि कई-कई दिन तक पानी में पड़ी रहने के बाद हो जाती है।”

“यानि दो दिन से काफी ज्यादा ? राइट ?”

“शायद! मैं सिर्फ अनुमान ही लगा सकता हूँ। डूबी हुई लाश देखने का ज्यादा अनुभव नहीं है मेरे पास।”

“कोई बात नहीं। मेरे पास है वह अनुभव। तुम हाथ से दिखाओ–कितनी फूली थी। कितना बड़ा चेहरा था, उसका ?”

मनीष ने उसे अजीब नज़र से देखा फिर अगल-बगल देखते हुए हाथ फैलाये, पहले कुछ ज्यादा, फिर कुछ सोचते हुए कम किया, फिर एक नाप पर रुकते हुए बोला, “इतनी होगी ।”

राज ध्यान से देखते हुए बोला, “अच्छा ठीक है! यह बात बहुत सही बताई! मजा आ गया।”

मनीष ने राज को इस तरह से देखा जैसे उसे हैरानी हुई हो कि किस बात पर राज को मजा आ गया।

मनीष से विदा लेकर राज शहर में निकला और यूं ही घूमने लगा।

शाम के वक्त जब राज अपने होटल में आराम कर रहा था तब उसे तेजश्री का ईमेल आया। उसने ईमेल में ही लिखा था – राज सर! यह लीजिए -आपका पासवर्ड- .......

वह उठ कर बैठ गया और फिर उसने अपने फोन पर जीमेल खोल कर आरती के ईमेल आईडी को तेजश्री के दिये पासवर्ड से लॉगइन किया।

लॉगइन सफल रहा। राज की आंखें चमक उठी। वह उसकी ईमेल देखने लगा - अधिकतर प्रोमोशनल टाइप की मेल्स दिखीं। फिर उसे बैंक स्टेटमेंट दिखे और बस टिकट के ईमेल भी दिखे।

वाह! यही तो चाहिये था । अगर ऑनलाइन टिकट बुक न किया होता तो मुश्किल आती ।

उसने टिकट का ईमेल खोला।

तो ये था किस्सा!

छह तारीख का जो टिकट उस ईमेल में था, वह दिल्ली से धर्मशाला का था।
 
राज मुस्कुराया।

तो ये बात है - आरती जी पहले गई थी दिल्ली से धर्मशाला और मंडी पहुंची वह सात की शाम को यानी असल में वह धर्मशाला छह की शाम को पहुँच गई थी। वहाँ उसने छह की रात गुजारी और सात की सुबह भी और दोपहर करीब मंडी के लिये निकली होगी। अब आगे सवाल है कि आहूजा की मौत से उचटने की वजह से ही वह नौकरी वगैरह छोड़कर दिल्ली से रुखसत हुई पर घर जाने की जगह धर्मशाला जाने का क्या मतलब है ? क्या धर्मशाला से आहूजा का कुछ कनेक्शन है ?

अब क्या किया जाये ? धर्मशाला जाऊं ? पर धर्मशाला जा कर करूंगा क्या ? सिर्फ इतना ही पता चला है कि यह लड़की छह तारीख की शाम को धर्मशाला पहुंची थी। उसके बाद कहां गई उसके सिरे कहां से मिलेंगे ? कैसे मिलेंगे ?

सोचते हुए राज ने बालकनी में पहुँचकर सिगरेट सुलगा ली। अचानक उसे नकाबपोश की याद आई। वह चारों तरफ देखने लगा।

काश कि वह नकाबपोश ही दुबारा हमला कर दे। तो उसे दबोच कर कुछ पता किया जाये।

राज ने लंबा कश लिया और ढेर सारा धुआं छोड़ दिया।

☐☐☐

24 मार्च 2013, रात्रि 1 बजे

फ्लाईट 301

अब्दुल ने उस लड़के का लैपटॉप वापस कर दिया था। उसे उसमे ऐसी कोई संदिग्ध बात दिखाई न दी जिससे ऐसा लगे कि वह प्लेन के सॉफ्टवेयर सिस्टम को हैक कर रहा हो।

“मैंने पहले ही कहा था।” वह आँखें तरेरकर बोला। लैपटॉप वापस मिलते ही वह एक बार फिर उस पर काम करने के लिये बैठ गया।

“कमाल है!” अरुण उसे देखकर बुदबुदाया। “कोई इतना निश्चिंत कैसे हो सकता है ? मिस्टर...”

“अब्दुल!”

“मिस्टर अब्दुल! प्लेन और किस तरह हाइजैक हो सकता है ?”

“सबसे ज्यादा कन्विनियेंट तो पायलेट्स के लिये ही है।”

“वो तो एक सम्भावना है ही, पर जैसा यू सेड... इलेक्ट्रॉनिक हाइजैकिंग का और क्या तरीका हो सकता है ?”

“प्लेन बनाने वाली कंपनी के अंदर ही किसी ने सॉफ्टवेयर को मेनिपुलेट किया हो सकता है।”

“लेकिन फिर उसे कंट्रोल कैसे किया जा रहा है ?”

“बहुत आसान है।”

तभी कॉकपिट की तरफ से चीखने की आवाज़ ने उन्हें आकर्षित किया। उस तरफ स्टीवर्ड रोहित और पतली आवाज़ वाले गंजे के बीच हाथापाई होने लगी थी।

“ये तुम लोगों कि साजिश है... तुम सब मिले हो।” वह चीख रहा था।

लोगों ने बीच-बचाव करके दोनों को अलग किया।

“प्लीज़! आप लोग समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ?” हिना चिल्लाने लगी, “हम भी आप ही लोगों की तरह फंसे हैं।”

गंजे को जबरदस्ती एक सीट पर बैठा दिया गया।

“भाईसाब! आराम से...लड़ाई-झगड़े से क्या फायदा ?” उसके पास बैठा पैसिंजर बोला।

“मुझे क्या बोल रहे हैं ? ये लोग ही प्लेन उड़ा रहे हैं और इन्हें ही नहीं पता प्लेन कहाँ जा रहा है। कब से प्लेन उड़ रहा है! अब तक तो कतर क्या लंडन पहुँच जाते। ये इन्हीं लोगों की साजिश है। आप देखना अभी ये कहीं लैंड होगा और उसके बाद ये भारत सरकार से पैसों की मांग करेंगे।”

“चुप रहो, अगर और बकवास की तो...” रोहित उसकी तरफ लपका, पर बाकि लोगों ने उसे रोक लिया।

“क्या करेगा ? मारेगा मुझे ? तुम सब पर केस करूँगा मैं...”

“सर! प्लीज़!” अरुण उसके पास पहुँचा। “अभी तो हमें ये भी नहीं पता कि ये प्लेन ठीक-ठाक लैंड होने वाला है भी कि नहीं। वी शुड बी यूनाइटेड। हमें मिलकर इस मुसीबत से बाहर निकलना होगा।”

“प्लेन काफी देर से एक ही दिशा में उड़ रहा है।” अब्दुल बोला, “जिस तरह का डाईवर्ज़न इसने लिया था इसकी दिशा साउथ की तरफ होगी। रात के एक बज गये हैं अब तक तो ये श्रीलंका के आस-पास कहीं होगा।”

“राइट! सोचने वाली बात है- जिसने भी प्लेन हाइजैक किया है इसको कहाँ लेकर जा रहा है ?”

“शायद मॉरिशियस!” कोई बोला।

“श्रीलंका ही जा रहा होगा, वहाँ LTTE है।”

“LTTE इज़ डेड!”

“सब चल रहा है...उनका लीडर ही मरा है, ऑर्गेनाईजेशन इज़ स्टिल देयर।”

“इन्डियन ओशन में कई आइलैंड हैं।” एक वरिष्ठ बोला।

“पर हर आइलैंड में इतना बड़ा प्लेन लैंड करने के लिये एयरस्ट्रिप भी तो होनी चाहिये।” अब्दुल बोला।

“उनमे से कुछ ब्रिटिश टेरिटरी हैं- वहाँ ऐसी एयरस्ट्रिप मिलेंगी।”

“ब्रिटिश क्यों करेंगे...”

अचानक अरुण बोला, “अगर प्लेन हाइजैक फिरौती की नीयत से किया है तो लैंडिंग के बारे में ज़रूर सोचा गया होगा।”

“और अगर ये टेररिज्म के लिये किया गया हो तो ?” अब्दुल शून्य में घूरते हुए गंभीर स्वर में बोला, “फिर तो एयर स्ट्रिप हाईजैकर्स के लिये कोई इशु नहीं होगा। वे इसे इंडियन ओशन में कहीं भी क्रेश कर सकते हैं।”

उसकी इस बात से सभी पैसिंजर्स के बीच भय की लहर दौड़ गई। सभी निःशब्द थे।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

नई दिल्ली

अभय कुमार ने फिलहाल राज के लिये सीबीआई से और होम मिनिस्ट्री से बात करके समय मांग लिया था। उसका यही कहना था कि जब तक सीक्रेट सर्विस आहूजा की इन्वेस्टिगेशन पूरी नहीं कर लेती वह राज को नहीं सौंप सकती। क्योंकि राज खलीली के मिशन में अहम एजेंट था इसलिये उसका इन्वेस्टिगेशन में होना अनिवार्य था। अभय के दिये इन तर्कों को सीबीआई मानना तो नहीं चाहती थी पर होम मिनिस्ट्री ने अनुमति दे दी और फिर भारत सरकार ने उसी हिसाब से लियोन को भी जवाब दिया–यानि दो महीने इंतजार करने के लिये कह दिया गया।

साथ ही अभय ने राज से इस बारे में भी बात की कि आहूजा के खिलाफ इन्वेस्टिगेशन के लिये सीक्रेट सर्विस के एजेंट सीबीआई ऑफिस आएंगे। पहले तो राज थोड़ा झिझका, उसने कहा इसकी कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वह पहले ही जांच-पड़ताल कर चुके हैं और आहूजा के खिलाफ यहाँ ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं जिससे वह आतंकवादी साबित हो। पर अभय ने कहा क्योंकि उसके खिलाफ सबूत एकत्रित करने का जिम्मा सीक्रेट सर्विस को है तो ये उन्हें करना ही होगा। राज ने फिर ज्यादा हुज्जत नहीं दिखाई।

ज़ाहिद और सुरेश ने सीबीआई ऑफिस आने से पहले राज को फोन करके अनुमति ले ली थी। राज ने उन्हें सीबीआई के इंटरपोल विंग में पहुँचने को कहा, जो कि सीबीआई के लोधी रोड स्थित ऑफिस के ब्लॉक नंबर ४ में हुआ करता था। वहाँ उन्हें मनोज रामचंद्रन से मिलने को कहा गया।

उन्हें कुछ देर गेट पर इंतजार करना पड़ा, फिर मनोज ने गेट पर आकर उन्हें एस्कोर्ट किया और एंट्री करवाने का बाद अन्दर ले गया।

“मैं आपको सीधे इंटरपोल ऑफिस ले चलता हूँ।” कहते हुए वह राहदारी में तेजी से आगे बढ़ता चला गया।

कुछ देर बाद वो एक भव्य दरवाजे पर पहुँचे जिस पर ‘नेशनल सेन्ट्रल ब्यूरो –इण्डिया’ लिखा हुआ था। मनोज एक्सेस कार्ड के सहारे अन्दर दाखिल हुआ। अन्दर अच्छा-ख़ासा ऑफिस था–काफी लोग काम कर रहे थे। वहाँ एक छोटा मीटिंग रूम था। उसने चाभी से उसका लॉक खोला फिर अन्दर आकर लाईट जला दी।

अन्दर कुछ कुर्सी, कंप्यूटर टेबल, फोन, प्रिंटर आदि मौजूद थे।

“इसी कमरे में तीन साल पहले आहूजा काम किया करता था।”

“उसके साथ कौन काम किया करता था ?” सुरेश ने पूछा।

“वैसे तो वो ज्यादातर इंडिपेंडेंटली काम करता था, पर कभी-कभी मैं उसे असिस्ट करता था।”

“आप इसी ऑफिस में पोस्टेड हैं ?”

“हाँ! बतौर एनालिस्ट।”

“आहूजा इनमे से किसी सिस्टम पर काम किया करता था ?” सुरेश वहाँ रखे कंप्यूटर देखते हुए बोला।

“नहीं! उसका खुद का लैपटॉप था। वह उसी पर काम करता था।”

“प्रिंट आउट वगैरह ?”

“उसके गायब होने पर हमने सबकुछ चैक किया था, वह अपने पीछे कोई सुराग नहीं छोड़ गया था।”

सुरेश ने हामी भरी।

“इस ऑफिस में आपके आलावा और किसी से उसकी बातचीत होती थी ?” ज़ाहिद ने पूछा।

“नहीं! मेरे से भी सिर्फ काम से काम, मतलब की बात वो करता था। कोई पर्सनल बात उसने कभी नहीं की।”

“वो रहता कहाँ था ?”

“सरकारी गेस्ट हॉउस में। वहाँ भी पूरी जांच की गई थी। वह अपने पीछे एक रत्ती भर क्लू भी नहीं छोड़ गया था।”

“तो उसके तीन साल अनाधिकृत रूप से गायब रहने के बारे में इंटरपोल क्या बोलता है ?” ज़ाहिद ने पूछा, “क्या तीन साल किसी एजेंट के गायब रहने के बाद भी इंटरपोल उसे अपना एजेंट मानता है ?”

“ये लियोन का आउटलुक है। पर मैं समझ रहा हूँ–आप क्या कहना चाहते हैं। अगर कोई इतने लम्बे अरसे गायब रहे तो उसे वैसे ही नौकरी से बर्खास्त माना जाना चाहिये, फिर उस दशा में इंटरपोल का इतने सवाल पूछने का अधिकार ही नहीं बनता। पर मामला कोई आम नौकरी का हो तो फिर भी चल जाता पर यहाँ आतंकवाद जैसे संगीन मामले उसकी गुमशुदगी के साथ गुत्थम-गुत्था थे, तो इंटरपोल अवश्य उससे हर जानकारी निकलवाता, उससे ये इंश्योर करता कि उसने इंटरपोल की जानकारियों का कोई गलत प्रयोग तो नहीं किया, आदि।”

“यानि वो मानते हैं कि आहूजा का लिंक आंतकवादी गतिविधियों से था ?” सुरेश ने आँखों में चमक के साथ कहा। ये सवाल उसके कहने के अंदाज़ से लगा कि उसने मनोज से न करके खुद से किया हो।

“बिना सबूत के वो कुछ नहीं मानने वाले।”

“उसे आखिरी बार कब और किसने देखा था ?” ज़ाहिद ने पूछा।

“इस ऑफिस से तो वो देर रात निकला था, गार्ड ने पुष्टि की थी कि निकलते वक़्त उसके पास लैपटॉप बैग था और वो यहाँ से अपनी सरकारी कार में गेस्ट हाउस गया था।”

“और गेस्ट हाउस में ?”

“गेस्ट हाउस वो पहुँचा ज़रूर था, पर दूसरे दिन किसी को नहीं मिला। रात में वो कब निकला, कैसे निकला, किसी को खबर नहीं।”

“हम्म...! यानि वो हवा हो गया।”

“उस वक़्त उसे ढूंढने कोई लियोन से क्यों नहीं आया ?” सुरेश ने पूछा।

“आये थे न, पर यहाँ इन्वेस्टिगेशन से यहीं लगा कि वह भारत से लन्दन वापस चला गया। वो तो उसकी यहाँ मौत के बाद अब सबको समझ आया कि वह कभी भारत छोड़कर गया ही नहीं था।”

“आई सी!”

कुछ देर और बात करने के बाद सुरेश और राज वहाँ से रुखसत हुए।

☐☐☐

सीबीआई कार्यालय से निकलने के बाद ज़ाहिद और सुरेश ने अलग-अलग दिशा में निकलने का फैसला किया। सुरेश उस गेस्ट हाउस पर जांच-पड़ताल के लिये निकला जहाँ आहूजा रुका था और ज़ाहिद निक के बारे में पूछताछ करने जेएनयू की तरफ चल दिया।

जेएनयू के पास स्थित निक के ठिकाने के आस-पास पूछताछ करने पर ज़ाहिद को उसके कुछ दोस्त मिले जो कि निक के साथ वाकफियत रखते थे। सबका यही कहना था कि दो साल से उन्होंने निक के बारे में कुछ भी नहीं सुना था। वह किसी को कोई जानकारी दिये बगैर अचानक ही गायब हो गया था। उससे पहले वह अक्सर जेएनयू के विद्यार्थियों के साथ और अपने बैंड के मेंबर्स के साथ देखा जाता था। उसके रॉक बैंड के बारे में भी इन्वेस्टिगेट करते हुए ज़ाहिद को उनके बैंड के एक मेंबर के बारे में पता चला जो फिलहाल दिल्ली में ही था। वह आखिर तक निक के साथ था और बैंड का रेगुलर मेंबर था। वह एक ड्रमर हुआ करता था और फिलहाल एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। उसका नाम कुलदीप सिंह उर्फ कूल्स था। वो एक लंबा चौड़ा सरदार था।

ज़ाहिद उससे उसकी कंपनी के पास एक रेस्टोरेंट में मिला।

चाय पीते हुए ज़ाहिद ने पूछा, “तो आखिरी बार तुमने निक के साथ कब परफॉर्म किया था ?”

“अजी दो साल से ज्यादा हो गये। अभी तो याद ही नहीं आ रहा है मुझे। लगता है... अरे नई...दरअसल ढाई साल हो गये जी। हमने सीएपी कॉलेज के कल्चरल फेस्टिवल में जाकर एक शो किया था। वो शो के बाद निक से एक ही बार मिला और वही लास्ट मुलाकात थी। उसके बाद मैं जॉब में बिजी, फिर वह भी कहीं बिजी, कभी कॉन्टेक्ट नहीं किया। फिर एक बार जब याद आया... फोन किया, तो उसका फोन ही नहीं मिल रहा था। उसके घर का एक चक्कर लगाया तो वहाँ से भी वह जा चुका था। पता नहीं किधर गायब...”

वह कुछ ज्यादा बोलने वाला शख्स लग रहा था इसलिये ज़ाहिद ने उसे काटकर अगला सवाल किया-

“निक की फोटो तो होगी तुम्हारे पास ? दिखाओ।”

“हां जी! फोटो ही फोटो हैं। एक क्या बहुत सी फोटो हैं। हम लोगों ने शुरू के दो सालों में तो इतने परफॉर्मेंस की थी...आपको परफॉर्मेंस की फोटो दिखा देता हूँ। कहो तो कॉलेज की फोटो दिखा दूंगा।” कहते हुए वह अपना फोन खोलकर गैलरी में दो साल पुराने फोटो दिखाने लगा। फिर उसने अपने रॉक बैंड के फोटो दिखाए, जिसमें कम कद का छोटी-छोटी आँखों वाला एक शख्स गिटार बजाता दिख रहा था।

“यहीं है- देख लीजिए। आपको भेजता हूँ। आप अपना नंबर बताओ।”

ज़ाहिद ने बताया। कुलदीप ने कई फोटो फॉरवर्ड कर दिये।

“तुमने इसे फिर ढूंढने की कोशिश नहीं की ?”

“जी! बताया तो...उसके घर गया था। वहाँ पर नहीं था। अब और कहां ढूंढता ? वैसे भी वह एक जगह टिकने वाला बंद तो था नहीं। उसकी बातों से ही लगता था - कहीं हवा में उड़ना चाहता था। कभी कुछ तो कभी कुछ! न जाने कौन-कौन से बिजनस करता था। नौकरी तो कभी उसने कोई की नहीं। हो सकता है कोई लंबी फिराक में कहीं निकल गया होगा... बता कर तो कुछ भी नहीं गया।”

“निक का कोई और ऐसा परिचित जिनसे वह अक्सर मिलता-जुलता हो ?”

“एक तो उसका वह पायलट दोस्त था...”

“कौन ? विक्रम ?”

“हां विक्रम! अक्सर हमारे परफॉर्मेंस में आया करता था। ड्रेसिंग रूम में ही डायरेक्ट एंट्री मारता था। काफी गहरा यार था उसका।”

“उसके अलावा कोई ?”

कुलदीप इधर-उधर देखते हुए सोचने लगा।

“आराम से सोच समझ कर जवाब दो।” ज़ाहिद बोला।

“आप यह तो बताओ चक्कर क्या है जी ?”

“एक तरह से समझ लो– निक गायब हो चुका है।” ज़ाहिद समझाते हुए बोला, “और उसका गायब होना इतनी गहरी साजिश से ताल्लुकात रखता है जिसका सम्बन्ध देश की सुरक्षा से जुड़ा है।”

“हैं!” उसने आँखें फाड़कर देखा। “वह कैसे जी ?”

“वो तो मैं नहीं समझा सकता। फिलहाल यही समझो कि निक का जल्द से जल्द मिलना बेहद जरूरी है।”

“हाँ जी! आप सही कह रहे हो। अब इस तरह से किसी का गायब हो जाना भी तो ठीक नहीं होता है। उसका आगे-पीछे भी कोई नहीं था पर फिर भी दोस्त तो बहुत थे। ऐसे कहां गायब हो गया ?”

“तुम सोचो।”

कुलदीप सोचने लगा।

“उसके और परिचित कौन थे ? उसका कोई और खास दोस्त ? उसकी कोई गर्लफ्रेंड ?”

उसने इंकार में सिर हिलाया।

“लड़कियों को बस लाइन मारता था। फ्रेंड बनाने तक की नीयत तो उसकी कभी रही नहीं। एक बार तो एक लड़की को सीधा प्रपोज भी कर दिया। लड़की ने पलट कर ‘हां’ बोल दिया। तो ये बोला– मैं मजाक कर रहा था।” कहकर कुलदीप हंसने लगा

ज़ाहिद चुपचाप उसे देखता रहा। फिर उसने पूछा, “ध्यान से याद करो कुलदीप। तुम अक्सर उसके साथ बैंड में रहते थे, परफॉर्म करते थे। कोई और खास शख्स जो अक्सर उससे मिलता था ? या वह मिलने जाता था ? सोचो–उससे मिलने वाला कोई ऐसा शख्स जो तुम्हें कुछ अजीब सा लगा हो ?”

कुलदीप अपनी कनपटी पर हाथ रख कर टेबल की तरफ देखने लगा– मानो सोचने का भरसक प्रयास कर रहा हो।

“ऐसा कोई शख्स तो नहीं याद आ रहा। पर वह अपने अजीबोगरीब बिजनस के लिये अक्सर कुछ जुगाड़ लगाकर बड़े लोगों मीटिंग करता रहता था। आप समझ रहे हैं न–ऊपर तक पहुँच वाले लोगों के साथ।”

“इस तरह का कोई हाई प्रोफाइल शख्स याद आ रहा है जिससे वे अक्सर मिलता था ?”

“एक बार किसी मिनिस्टर के सेक्रेटरी से मिलने की बात कर रहा था। कह रहा था उसकी मदद से उसको बिजनेस डील भी मिल रही है।”

“नाम बताओ उस सेक्रेट्री या मिनिस्टर का।”

“कोई नॉर्थ ईस्ट का नाम था कमजुम...शायद! नाम याद नहीं आ रहा है।”

“कोमजुम लोल्लेन तो नहीं ?” ज़ाहिद ने कहा।

“हां शायद कोमजुम लोल्लेन ही था।”

“वह तो केंद्रीय मंत्री जोमिन तुकी का सेक्रेटरी है। जोमिन तुकी यानि कि साइंस एन्ड टेक्नोलॉजी मिनिस्टर। इंट्रेस्टिंग! आखिर बिजनस था क्या निक का ? कुछ तो आईडिया लगा होगा ?”

“कोई एक बिजनस रहा हो तो बताऊँ। पता नहीं क्या-क्या करता था। एक बार तो कुछ इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट की डीलरशिप ले ली थी। मुझे भी बोल रहा था पैसे लगाने को पर मैंने मना कर दिया। इस तरह के कई नये-नये बिजनस ट्राई करता रहता था, ज्यादा डिटेल मुझे पता नहीं।”

“कोई बात नहीं।” ज़ाहिद बोला, “तो जोमिन तुकी का नाम तुमने कब सुना ? कुछ और याद करो उस बारे में।”

“करीब तीन साल पहले की बात है। उसे फोन आया था कोमजुम लोल्लेन का हमारी बैंड प्रैक्टिस के बीच में। मैंने पूछा भाई इतना अर्जेंट किसका फोन है तो गर्व से बोला कि सेंट्रल मिनिस्टर जोमिन तुकी के सेक्रेटरी का है। जोमिन तुकी नाम मैंने तब पहली बार सुना। फिर मैंने या बाकी बैंड के मेंबर्स ने कोई और सवाल उससे किया नहीं, तो यह बात बाद में कभी हुई नहीं।”

“इसके अलावा और कोई बात अगर बाद में ध्यान आए तो मुझे कॉल करना।”

“ज़रूर सर जी!”

फिर ज़ाहिद ने कुलदीप से विदा ली।

उसने सुरेश को फोन किया। वह फ्री हो गया था। ज़ाहिद ने उसे रेंटेड कार से जाकर पिकप किया।

सुरेश के कार में बैठते ही ज़ाहिद बोला, “पायलेट्स के कनेक्शन निक से और निक का कनेक्शन कोमजुम लोल्लेन से और कोमजुम लोल्लेन का कनेक्शन केंद्रीय मंत्री से पता चला है।”

कहकर उसने गेयर में डालकर गाड़ी आगे बढ़ा दी और फिर कुलदीप से हुई पूरी बात बताई।

“ये निक जो भी है बहुत इंपॉर्टेंट किरदार बनता जा रहा है।” सुरेश बोला, “उसका मिलना बिल्कुल जरूरी हो गया है। उसका फोटो मैं हेडक्वार्टर भेज रहा हूँ। तुरंत सरवैलेंस पर लगवा दिया जायेगा।”

“वह तो है पर फिलहाल कोमजुम लोल्लेन पर भी हाथ डाला जा सकता है।”

“पर यह काम आसान नहीं होगा।”

“बहुत मुश्किल भी नहीं होने वाला।” ज़ाहिद आक्रामक स्वर में बोला, “यह कोई आम मामला नहीं है। भारत का विमान गायब हुआ है और अगर इस साजिश में पॉलीटिशियंस की कोई मिलीभगत है तो उन पर भी हाथ डाला जायेगा।”

“तुम सही कह रहे हो।” सुरेश बोला, “चीफ को बोलते हैं कि कोमजुम लोल्लेन से मीटिंग अरेंज करवाएं। मेरे ख्याल से होम मिनिस्ट्री हमारा यह काम आसान करवा देगी।” कहते हुए सुरेश ने मोबाइल पर अभय का फोन लगाया और सारी स्थिति से अवगत किया।

अभय ने सारी बात सुनकर कहा – “मैं बहुत जल्दी कोमजुम लोल्लेन से तुम लोगों की मीटिंग अरेंज करवाता हूँ।”

फोन काटकर सुरेश ने गहरी सांस छोड़ी।

ज़ाहिद ने पूछा, “गेस्ट हाउस पर कुछ पता चला ?”

“वहाँ का स्टाफ तो एकदम टिपिकल सरकारी टाइप था, कुछ भी काम की बात पता नहीं चली। मैंने उसका कमरा भी खुलवाया था।”

“दो साल में तो कई लोग उसमे रुककर गए होंगे।”

“ट्रू! वहाँ कुछ भी पता नहीं चल सका।”

“मुश्किल है, हर बार भाग्य साथ नहीं दे सकता पुराने केस सुलझाने में। जैसे तुमने लम्बे अरसे से बंद पड़े मिनाज़ के फ़्लैट से सबूत ढूंढ निकाले थे [3] ।”

“वो एक मर्डर केस था इसलिये चांस भी थे कुछ मिलने के। अब हमें सोचना पड़ेगा कि गेस्ट हाउस से गायब होने के बाद आहूजा के कदम कहाँ-कहाँ पड़े हो सकते हैं।”

“उसने कहा था कि आईएसआई का एजेंट बनने के लिये उसने चार साल लगाये थे।”

“और दो साल वो माइंस के अन्दर था। हमें उसके हिसाब से सोचना होगा कि उसने क्या किया होगा। उसने खुद को आईएसआई का एजेंट कैसे स्टेब्लिश किया होगा- क्या उसने खुद को नये एजेंट के रूप में भर्ती किया या किसी और की जगह ले ली ?”

ज़ाहिद सामने ट्रैफिक की तरफ देखते हुए गहन सोच में था। “रज़ा मलिक! वो एक अधेड़ उम्र के एजेंट के रूप में था! आईएसआई में मौजूद हमारा कोई मोल इस बारे में बता सकता है।”

“गुड आइडिया! इल्यास से बात करता हूँ।” कहकर सुरेश ने इल्यास नामक उस डबल एजेंट को फोन किया जो कि आईएसआई में सीक्रेट सर्विस का जासूस था।

“हेल्लो सर! बोलिये।”

“सब खैरियत ?”

“जी!”

“एक मैसेज करने वाला हूँ। उसकी कुछ जानकारी निकालने की कोशिश करो।”

“ज़रूर!” कहकर उसने फोन काट दिया।

सुरेश ने उसे एसएमएस में रज़ा मालिक लिख भेजा।

फिर वे दोनों वहाँ से सीधे अपने गेस्ट हाउस पहुँचे।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

राज बालकनी में ही खड़ा था। उस वक्त वह चौंक गया जब उसे होटल के ठीक सामने सड़क के किनारे एक खास व्यक्ति दिखाई दिया। उसे वह खास इसलिये लगा कि उसकी दृष्टि बार-बार चोरी-छिपे राज के होटल की तरफ जा रही थी। उसने भूरे रंग का स्वेटर पहना हुआ था, और कानों और गले को ढंकने के लिये मफलर बाँध रखा था।

राज को साफ़ लगा कि वह वहाँ किसी और कारण से नहीं बल्कि होटल की निगरानी करने की नीयत से ही खड़ा है। ऐसा उसे अपनी ट्रेनिंग और तजुर्बे से पता करना बड़ी बात नहीं थी। वह व्यक्ति अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था, जबकि उसका ध्यान पूरी तरह अखबार में नहीं था। चोरी-छिपे वह बार-बार होटल की तरफ देख रहा था।

आखिर यह चाहता क्या है ? मेरी निगरानी कर रहा है या किसी और की ? पता करना पड़ेगा।

राज कमरे में लौट आया। उसने जैकेट पहनी और पिस्टल उसकी जेब में छिपा लिया। कमरे की लाइट ऑन छोड़कर वह बाहर निकल आया।

वह होटल से नीचे उतरा और सामने से निकलने की जगह पीछे किचन की ओर से निकल कर बगल वाली इमारत के प्रांगण में कूदकर आ गया। फिर उस इमारत से बाहर निकलने लगा। उसे यकीन था कि उस व्यक्ति की नज़र होटल पर ही होगी।

वह सावधानी बरतते हुए ईमारत से बाहर निकला और सड़क पर आ गया। सड़क की दूसरी तरफ उसे भूरे स्वेटर वाला अभी भी दिखाई दे रहा था। राज विपरीत दिशा में आगे चला गया और फिर सड़क पार करके उस तरफ आ गया जिधर भूरे स्वेटर वाला था। वह सावधानी से उसकी तरफ चलने लगा। उसे दिखा भूरे स्वेटर वाला अब विपरीत दिशा में जा रहा था। राज भी तेजी से उसके पीछे चलने लगा। दोनों तेजी से चल रहे थे पर दौड़ने की कोशिश कोई भी नहीं कर रहा था।

फिर अचानक नकाबपोश ने एक रिक्शा रुकवाया और उसमे बैठ कर रिक्शा वाले को कहीं जाने का निर्देश दिया।

तब तक राज भी दौड़कर वहाँ पहुँचा और जबरन रिक्शा के अंदर आ बैठा।

रिक्शा वाले और भूरे स्वेटर वाले दोनों ने हैरानी से उसे देखा।

“अरे रिक्शा मैंने पहले देखा था।” राज बोला।

“देखा होगा, पर मैं पहले बैठ गया। तुम उतरो।” भूरे स्वेटर वाले ने धमकी भरे स्वर में कहा।

“चलो कुछ दूर ही जाना है। आधे पैसे में दे दूँगा।”

रिक्शा वाले ने पलटकर भूरे स्वेटर वाला को देखा।

उसने अनमने भाव से राज को देखा फिर रिक्शा वाले को सहमति दी।

रिक्शा आगे बढ़ गया। दोनों विपरीत दिशा में बाहर देख रहे थे।

कुछ ही पल बाद राज ने पूछा, “किसे ढूंढने आये थे ?”

“क्या ?” वह राज की तरफ पलटा।

“होटल पर नज़र रखे हुए थे।”

“कौन बोला ?”

“तुम्हारी आँखें।”

“तुम हो कौन ? क्यों फालतू मुझ से भिड़ रहे हो ?”

“मैं कौन हूँ वो तो तुम जानते ही होगे। पर तुम कौन हो ये भी तो मुझे पता होना चाहिये।” कहते हुए राज ने अपना पिस्टल निकला और आराम से जांघ पर रख लिया।

“ये...क्या!” वह बुरी तरह से चौंका।

“पहली बार देखा है ?”

अचानक ही उसने राज पर कोहनी से प्रहार किया और चलते रिक्शा से ही बाहर कूद गया।

राज दर्द से चिहुंक उठा। वह इसके लिये तैयार नहीं था। कोहनी का जबरदस्त प्रहार उसके चेहरे पर हुआ था। उसका पिस्टल नीचे गिर गया था। उसने उसे उठाया। तब तक रिक्शा वाले ने ब्रेक लगा दिये थे। राज तेजी से बाहर निकला। रिक्शा चालक ने पिस्टल देख लिया था इसलिये वह फिर वहाँ रुका नहीं।

भूरे स्वेटर वाला रिक्शा से कूदकर रास्ते पर गिरा ज़रूर था पर उसके बाद वह फुर्ती के साथ उठा और दौड़ते हुए एक गली में प्रविष्ट हो गया था। राज भी सड़क पार करते हुए उस गली की तरफ दौड़ा।

गली के अंदर पहुँचने पर राज को वह व्यक्ति कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी गली के अंत की तरफ से कूदने की आवाज़ आई।

राज दौड़कर उस तरफ पहुँचा। गली के अंत में एक छह फिट ऊंची दीवार थी। राज उस पर चढ़ गया। दूसरी तरफ कुछ अँधेरा था और इक्का-दुक्का अंडर-कंस्ट्रक्शन इमारतें थी।

वह सावधानी के साथ उस तरफ उतर आया। मुख्य सड़क से आने का रास्ता काफी आगे दिखाई दे रहा था।

इतनी जल्दी तो वो उस तरफ से नहीं भाग पाया होगा ।

उस तरफ काफी धूल-मिट्टी थी, शायद कंस्ट्रक्शन के कारण। राज की नज़र नीचे गई। उसे तलाश थी क़दमों के निशान की। पर वहाँ अनगिनत निशान थे, शायद दिन में उस तरफ काम करने वाले मजदूरों के।

वह नीचे झुककर निरीक्षण करने लगा। बारीकी से देखने पर उसे एक तरफ की धूल कुछ हवा में उड़ती नज़र आई। उस दिशा में एक मकान दिखाई दिया जो अँधेरे में डूबा हुआ था।

राज सीधे न जाते हुए, छिपते हुए, घूमकर मकान के पीछे जा पहुँचा। फिर पीछे घूमते हुए उसकी खिड़कियों के पास जा खड़ा हुआ ताकि अगर अंदर कोई हो तो उसे आहट मिल सके।

किसी तरह का संकेत न मिलने पर उसने ज़मीन से एक चिकना गोल पत्थर उठाया अपना पिस्टल साधा और घूमते हुए सामने की तरफ आ गया और फिर दबे पांव दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। उसने मुख्य द्वार को धीरे से धकेला तो पाया वह खुला हुआ था। शायद वह एक वीरान पड़ा मकान था, जहाँ कोई सालों से नहीं रह रहा था।

राज ने पत्थर लिया और फिर मकान की फर्श पर अंदर की तरफ लुढ़का दिया। वह तेज आवाज़ करते हुए अंदर लुढ़कता चला गया और उसी समय राज दौड़कर बाहर की तरफ भागा और ओट में छिप गया।

दूसरे ही पल राज की चाल काम आई। मकान से उसका विरोधी दौड़ते हुए बाहर आया। जैसा कि राज ने चाल चली थी शायद उसे लगा कि अंदर कोई बम लुढ़काया गया है।

उस पर नज़र पड़ते ही राज ने उस पर हमला कर दिया। उसने विरोध करना चाहा। उसके हाथ में भी पिस्टल था। राज ने पहले उसका हाथ झटक कर उसे गिराया और फिर जमकर उसकी धुनाई की।

जब वह बेहाल होकर ज़मीन पर गिर गया तब राज ने पूछा-

“अब बोल- कौन है तू ? किस फ़िराक में था ? किसने भेजा था तुझे ?”

वह चुपचाप ज़मीन पर पड़ा रहा। राज ने उसे एक ठोकर मारी फिर झुककर उसकी जेबें टटोलने लगा। उसने विरोध किया तो फलस्वरुप उसके मुंह पर एक जबरदस्त घूँसा रसीद किया।

जेब से कुछ रुपये और रसीदों के सिवा कुछ नहीं मिला।

“बोलना शुरू कर। अगर पुलिस के सामने ही बोलने वाला है तो ये भी सही।”

“मैंने किया क्या है जो मैं पुलिस से डरूं ?” वह निर्भीक स्वर में बोला।

एक पल को राज भी सोच में पड़ गया। आखिर वो सिर्फ उसके होटल के बाहर खड़ा निगरानी कर रहा था।

“जासूसी भी एक जुर्म होता है अगर दूसरे देश के खिलाफ की जाये।”

“मैं जासूस नहीं हूँ।”

“अब इसका फैसला तो पुलिस ही करेगी।”

फिर राज उसे लेकर उस तरफ की गली से होते हुए मुख्य सड़क पर पहुँचा।

वह अभी किसी रिक्शा या टैक्सी की रह ही देख रहा था कि अचानक उसे अपने पीछे किसी का आभास हुआ।

“रिवॉल्वर साइलेंसरयुक्त है।” सर्द लहजे में आवाज़ आई – “किसी को पता भी नहीं चलेगा। चलो अब अपना रिवॉल्वर अपनी जेब में रखो।”

राज ने अपनी पिस्टल जो छिपाकर मफलर वाले के पेट में लगा रखी थी, को आज्ञाकारी ढंग से अपनी जेब के हवाले कर लिया।

अगले ही पल उसके सिर पर पीछे से जबरदस्त प्रहार हुआ। वह चकराकर नीचे जा गिरा।

☐☐☐

राज को जब होश आया तब सड़क सुनसान पड़ी थी।

वह अपने सिर को सहलाते हुए उठा।

चोट हो गई। सही लीड मिली थी पर हाथ से निकल गई। पर अब ये तो साफ़ हो गया है कि यहाँ बहुत बड़ी साजिश चल रही है और ये लोग नहीं चाहते कि मैं उसकी तह तक पहुंचूं। मैं आरती के घर गया, पुलिस स्टेशन गया, हॉस्पिटल गया, यानि इस दौरान मुझ पर इन लोगों की नज़र थी और वो मेरे हर कदम पर नज़र रख रहे थे।

सोचते हुए राज उठा। उसने अपने कपड़े झाड़े और धीरे-धीरे होटल की तरफ चल दिया। उसने जैकेट की जेब में हाथ डाला। पिस्टल मौजूद था।

गनीमत है कि पिस्टल लेकर नहीं गए।

जैकेट की दूसरी जेब में उसे कुछ कागज़ महसूस हुए। उसने उन्हें निकाला। उसे याद आया कि कुछ रुपये और कागज़ मफलर वाले की तलाशी में उसे मिले थे। उसने रुपये वापस जेब में डाले और एक-एक करके कागजों को देखना शुरू किया। दो रेस्टोरेंट के खाने के बिल थे। वे मंडी के ही रेस्टोरेंट थे। फिर उसे एक बस का टिकट दिखाई दिया। वह धर्मशाला से मंडी का तीन दिन पहले का टिकट था।

हम्म ...आरती भी दिल्ली से धर्मशाला गई थी और ये भी स्पेशल मिशन पर धर्मशाला से यहाँ आया । इस साजिश की जड़ें धर्मशाला तक फैली हैं ।

उसे एक कागज़ और मिला। वह धर्मशाला के किसी आश्रम में दिये दान की रसीद थी।

जासूस सरीखे लोगों का आश्रम में क्या काम ? लगता है अब वहाँ जाना ही पड़ेगा।

☐☐☐

वर्तमान समय

नई दिल्ली

अगले दिन शाम को ज़ाहिद और सुरेश कोमजुम लोल्लेन के ऑफिस में थे। उससे मिलने के लिये उन्हें आधा घंटा इंतजार करना पड़ा।

फिर चपरासी ने उन्हें कैबिन में जाने का इशारा किया। ज़ाहिद और सुरेश कोमजुम लोल्लेन के कैबिन में दाखिल हुए।

कोमजुम लोल्लेन औसत ऊंचाई, गोर रंग का पचपन की उम्र का होने के बावजूद एक फिट व्यक्ति था, जिसकी आंखें छोटी-छोटी थीं, जिन पर एक फ्रेम्लेस चश्मा चढ़ा था। सफेद शर्ट और पैंट पहने हुए वह कुर्सी पर बैठा किसी फाइल में व्यस्त था। उन दोनों के अंदर आते ही बिना नज़र उठाये उन्हें बैठने का इशारा करके वह वापस फाइल में डूब गया। ज़ाहिद और सुरेश ने आसन ग्रहण किया। ज़ाहिद निरंतर उसे घूरे जा रहा था जबकि सुरेश ऑफिस के अंदर चारों तरफ नज़र घुमा रहा था। करीब पाँच मिनट उनका समय खराब करने के बाद कोमजुम लोल्लेन ने फ़ाइल बंद की और उनकी तरफ देखा।

“सीक्रेट सर्विस का हमारे ऑफिस में आज पहली बार कदम पड़ा है। बताइए क्या सेवा की जाए ?”

उसकी साफ़ हिंदी सुनकर ज़ाहिद और सुरेश चौंके, फिर ज़ाहिद बोला-

“हम लोग लापता फ्लाइट 301 की इन्वेस्टिगेशन कर रहे हैं।”

“ओह! याद है हमें। वाकई एक अजूबे से कम नहीं था। पूरा का पूरा प्लेन गायब हो गया और आज तक उसका कुछ पता नहीं चला। बहुत अच्छा कर रहे हैं आप लोग। उसका पता लगना चाहिए।”

“उसी सिलसिले में आपकी मदद चाहिए।”

“जरूर बोलिए। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी आपके किसी काम आ सकी तो इससे ज्यादा गर्व की बात क्या होगी हमारे लिये।”

“सुनकर अच्छा लगा फिलहाल सिर्फ आपकी मदद ही मिल जाये तो काफी होगा।” ज़ाहिद बोला।

“जरूर! आज्ञा दीजिए।”

“आप निक नाम के किसी लड़के को जानते हैं ?”

“निक ?”

सुरेश ने अपने मोबाइल में निक की तस्वीर निकालकर उसके सामने रख दी। कोमजुम ने फोन उठाया और अपना चश्मा उतारकर बेहद गौर से उसे देखने लगा।

“जाना-पहचाना सा लग रहा है। पर कुछ याद नहीं आ रहा।”

“जायज है। करीब तीन साल हो चुके हैं।” सुरेश बोला, “हमने इसकी फोन हिस्ट्री निकलवाई थी और उसमें आप से हुई कई कॉल्स की डिटेल पता चली है।”

“ओह अच्छा! फिर तो जान-पहचान वाला ही होगा तभी फोन पर बात हुई होगी। रुको मैं अपने फोन में देखता हूँ। उसका नंबर... उसका नंबर क्या है ? आप बताएंगे ?”

ज़ाहिद ने नंबर बताया। कोमजुम लोल्लेन ने अपने फोन में टाइप किया और फिर बोला, “अच्छा हां! निक! बीटा सॉल्यूशंस नाम की किसी नई कंपनी का मालिक था और वह हमसे उसका प्रमोशन करवाना चाह रहा था, किसी साइंस एग्झीबिशन में बुलाकर... और जहां तक हमें याद आ रहा है उस एग्झीबिशन में हम नहीं जा पाए थे। उसके बाद हमने प्रमोट करने के लिये उसे लिखित रूप में कुछ वाक्य लिख कर दिये थे। बस इतनी ही वाकफियत थी।”

ज़ाहिद और सुरेश उसे ध्यान से देख रहे थे।

“इसका मतलब आप उससे कभी फेस टू फेस नहीं मिले ?” सुरेश ने पूछा।

“नहीं! मिलने का मौका ही नहीं आया। फोन पर ही कनेक्शन बना था। लड़का अच्छा था। उसका बिजनस मॉडल अच्छा था तो हमने उसको प्रमोट करने के लिये जो हो सकता था वह किया। वैसे क्या मैं जान सकता हूँ कि इस लड़के का फ्लाइट गायब होने से क्या रिश्ता है ?”

“हम लोग वही पता करने की कोशिश कर रहे हैं। जब से इस इन्वेस्टिगेशन में लगे हैं घूम-फिरकर इस लड़के पर ही पहुँचते हैं इसलिये यह हमारी इन्वेस्टिगेशन का अहम किरदार बन गया है। मामला और दिलचस्प हो गया है क्योंकि अब यह लड़का खुद कुछ समय से गायब है और इसका कोई ठौर-ठिकाना पता नहीं चल पा रहा है।” सुरेश ने कहा।

“वाकई काफी हैरानी वाली बात है। जैसा कि आपने कहा–कुछ न कुछ कनेक्शन तो जरूर होगा।”

“आपको उसके बारे में कोई और जानकारी है जो हमारे काम आ सके ?” ज़ाहिद ने पूछा।

“जो मैं जानता था मैंने बता दिया। कभी उससे मुलाकात भी नहीं हुई। मुझे दुख है कि मैं आपके ज्यादा काम नहीं आ सका।”

कहकर कोमजुम लोल्लेन ने आँखों से ऐसा इशारा दिया कि ज़ाहिद और सुरेश को उस से विदा लेने के लिये उठना पड़ा।

“आप के समय के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया।” ज़ाहिद ने कहा और नमस्कार की मुद्रा में आ गया। सुरेश ने भी वैसा ही किया।

कोमजुम लोल्लेन ने मुस्कुराकर आंखें झपकाई। ज़ाहिद और सुरेश उसके ऑफिस से बाहर निकले और फिर बाहर जाती हुई राहदारी में आ गये।

“अब क्या करना है ?” सुरेश ने पूछा।

“इस पर नज़र रखने का इंतजाम करना पड़ेगा।”

“वीआईपी है।”

“तो फिर वीआईपी इंतजाम करना पड़ेगा।” ज़ाहिद सामने देखते हुए बोला।

☐☐☐
 

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