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Thriller हाफ़ मेंटल

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तारा अब उस स्थिति में था कि उससे कुछ भी नहीं जाना जा सकता था क्योंकि मुर्दे बोलते नहीं।

“कपड़े उठा मेरे।” उसने दूसरे को घूरते हुए कहा।

दूसरा उठा और कोने में पड़े डॉली के कपड़े उठा लाया।

डॉली ने पहले को धक्का देकर नीचे गिराया और फिर शर्ट के बटन खोलने लगी।

उसने दूसरे से अपने कपड़े लिये। बड़े इत्मिनान से उन्हें पहना और फिर शर्ट उठा ली।

उसने दोनों को कहर भरी निगाहों से देखा और गुर्राई—“तुम जगवीर के कुत्ते तो हो—लेकिन तुम्हें उसका पता नहीं मालूम इसी वजह से तुम्हारी जान बची है—वर्ना अब तक इसकी तरह तुम भी लाशों में तब्दील हो चुके होते।”

दोनों के चेहरों पर हल्की-सी राहत उभर आई। लेकिन खौफ अभी भी बरकरार था।

“फिर भी....सांप तो हो ही तुम....! क्या पता कब डस लो।” डॉली बोली—“इलाके की पुलिस के आने तक तुम बेहोश ही रहो तो बेहतर होगा।”

कहने के साथ ही उसने अपने सामने खड़े दूसरे की कनपटी पर घूंसा दे मारा।

दूसरा उछलकर पीछे गिरा।

एकबारगी उसने उठने की कोशिश की—फिर वह अंधेरे की गर्त में डूबता चला गया।

उसी तरह उसने पहले को भी बेहोश कर दिया। उसने जरा भी प्रतिरोध नहीं किया।

दोनों को बेहोश कर डॉली पीछे खिड़की की तरफ बढ़ी।

खिड़की के करीब आकर उसने उसका पल्ला खोला और आवाज लगाई—

“भैया रंगीला!”

शीघ्र ही रंगीला खिड़की के बाहर खड़ा था।

“आ जाओ।”

कहते हुए डॉली पीछे हट गई।

रंगीला खिड़की में से कूद कर भीतर आ गया।

भीतर आते ही उसकी नजरें बेहोश पड़े दोनों गुण्डों पर पड़ीं तो वह फौरन बोल पड़ा—

“य....यही थे वे दोनों जो आपको होटल से लेकर आये थे और यह....।” कहते हुए जैसे ही उसने तीसरे को देखा, उसका कलेजा कांप उठा। आवाज वहीं-की-वहीं ठहर गई।

लाश की कनपटी में घुसी रिवॉल्वर बड़ी ही भयानक लग रही थी।

तभी पीछे से डॉली ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

बुरी तरह से चिहुंक उठा रंगीला और डॉली की तरफ देखा।

उसके पसीने से तर-बतर चेहरे को देख डॉली मुस्कुरा दी।

“कमाल है।” वह बोली—“डॉली का भाई—और इतने छोटे दिल का मालिक।”

“म....मैंने आज तक किसी की लाश नहीं देखी न....इसलिये।”

हड़बड़ाते हुए रंगीला ने आस्तीन से मुंह पोंछा।

“अभी एक और है गेट पर।” डॉली बोली।

“वो भाग गया है।”

“क्या?”

“हां....आप ने जब मुझे बाहर भेजा तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं गेट वाले को काबू करके आपका हाथ बटाऊं—मैंने सोच ही लिया—मगर हिम्मत नहीं पड़ रही थी। उधर जब भीतर से गोली चलने की आवाजें आईं तो मैं और घबरा गया। समझ में नहीं आया कि क्या करूं। आखिर हिम्मत करके मैंने बाहर से भीतर झांका। उसने खिड़की की तरफ इशारा किया—उस वक्त यह आप पर रिवॉल्वर फैंक रहा था—जिसे आपने कैच कर लिया था। आपको कुशल देख मेरी हिम्मत बढ़ी और तब मैं गेटमैन को काबू करने के लिये गेट की तरफ बढ़ा। जब मैंने दूर गेटमैन को देखा तो वह मोबाईल पर किसी से बात कर रहा था—और फिर मेरे देखते-ही-देखते वह गेट खोलकर बाहर निकल गया।”

“ओह!” डॉली के मुंह से निकला—“फिर तो यहां ठहरना बेकार है।”

“क्या मतलब?”

“यहां मुझे जगवीर के लिये लाया गया था। लगता है भीतर हुई गोलीबारी की आवाज सुनकर गेटमैन ने जगवीर को सूचित कर दिया होगा। ऐसे में वह यहां आने की बेवकूफी हरगिज नहीं करेगा।”

“यह जगवीर वही तो नहीं—जिसका हाथ हाल ही में हुए बम धमाकों में था।”

“हां....उसी जगवीर की तलाश में मैं यहां आई थी।”

“ओह!”

“खैर, कोई बात नहीं....अब वह बचकर नहीं जा सकता। वह जिस भी बिल में छुपा है—मैं उसे निकाल लूंगी।”

रंगीला कुछ नहीं बोला—बस सिर हिला दिया।

“आओ....चलें।” डॉली बोली।

दोनों बाहर की तरफ बढ़ गये।

रंगीला ने ठीक ही कहा था—गेट पर से गेटमैन गायब था।

“आप यहीं रुको....मैं बाईक लेकर आता हूं।”

कोठी से बाहर आकर बोला रंगीला और उधर बढ़ गया जिधर कि उसने बाईक खड़ी की थी।

डॉली वहीं गेट के पास खड़ी उसका इंतजार करने लगी।

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नटराज होटल में डॉली के कमरे में कुर्सियों पर आमने-सामने डॉली और रंगीला बैठे थे।

रंगीला के चेहरे पर इस वक्त ऐसी चमक थी जैसे उसने कोई बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो।

यह हकीकत ही तो थी।

डॉली उसके सामने बैठी थी—और उसने उसे अपना भाई बना लिया था। उस डॉली ने, जिसे सिर्फ साक्षात् देखने के लिये सिर्फ सपने ही लेता रहा था। मगर ऐसा मौका उसे कभी नहीं मिला था और जब मिला भी तो डॉली ने उससे रूखे स्वर में बात की थी—जबकि अब वह उसके सामने बैठी थी।

तभी वेटर कॉफी की ट्रे उठाये भीतर दाखिल हुआ।

कमरे में अब जहरीली गैस का प्रभाव खत्म हो चुका था।

कॉफी रखकर वेटर चला गया तो डॉली ने कॉफी का मग उठाया और रंगीला की तरफ बढ़ाते हुए बोली—“पहले तो सॉरी....।”

“सॉरी—कैसी सॉरी?” कॉफी लेते हुए हैरानी दर्शाई रंगीला ने।

“दरअसल खाने के दौरान मैं किसी से बात करने की कोशिश कम ही करती हूं। उस वक्त....।”

“मैं तो वो वक्त कब का भूल चुका हूं।” रंगीला बोला—“अरे इस वक्त की खुशी के नीचे वह दुख कब का दफन हो चुका है।”

“कहां रहते हो?” डॉली अपना मग उठाते हुए बोली।

“दीनापुर में। देसराज कालोनी में घर है मेरा। बीवी है, दो छोटे-छोटे बच्चे हैं—राहुल और सोना। आप कभी हमारे यहां आना—रानी आपसे मिलकर बहुत खुश होगी। आपको नहीं पता कि आप औरत जात के लिये कितना बड़ा काम कर रही हैं।”

“अच्छा....।” डॉली बोली।

“हां।”

“वो कैसे?”

“हिन्दुस्तानी औरत के बारे में यही कहा जाता है कि वह हाड़मांस का वो जीव है जो सिर्फ घर की चारदीवारी में ही रखने लायक है। औरत का मतलब....घर का काम काज करने वाली—बच्चे पैदा करने वाली—पति की हर आज्ञा का पालन आंख मूंदकर करने वाली और उसकी सेवा करने वाली होता है। लेकिन आपने तो औरत जात का अर्थ ही बदल दिया है। आपकी देखा-देखी अब औरतें वो काम भी करने लगी हैं जिन पर युगों-युगों से सिर्फ पुरुष का वर्चस्व ही समझा जाता था। आज औरत क्या-क्या कर सकती है—यह आपको देखकर ही पता चलता है।”

डॉली कुछ नहीं बोली—बस कॉफी पीते हुए मुस्कुरा भर दी।

“आज तक तो मैंने आपकी बहादुरी के किस्से बस पढ़े और सुने थे, मगर आज अपनी आंखों से आपकी बहादुरी देख ली। आज मुझे खुद पर फख्र हो रहा है कि मैं रंगीला गुप्ता डॉली का भाई हूं।”

कहते हुए रंगीला का सीना गज भर चौड़ा हो गया।

डॉली हौले से हंसी—“कॉफी पियो।” वह बोली।

रंगीला कॉफी पीने लगा।

कॉफी खत्म होने के पश्चात् डॉली ने कुर्सी की पुश्त से टेक लगाई और बोली—

“यहां क्या करने आये थे?”

“काम के सिलसिले में। कुछ ऑर्डर लेने थे।”

“कब तक रहोगे?”

“जब तक आप कहें।”

डॉली मुस्कुराई—“परसों राखी है, और....।”

“मैं समझ गया....परसों मैं अपनी बहन के हाथों से राखी बंधवा कर ही जाऊंगा। भला ऐसा मौका कैसे छोड़ सकता हूं मैं।” कहते हुए उसकी आवाज में जो खुशी टपक रही थी, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

“यहां कहां ठहरे हो?”

“यहीं—इसी होटल में—दो सौ तीन कमरे में।”

और फिर कुछ और बातें करने के पश्चात् रंगीला सोने के लिये कमरे से निकल गया।

उसके जाने के पश्चात् डॉली ने कुर्सी की पुश्त से टेक लगाई और आंखें बन्द करके गहरी सोचों में डूब गई।

थोड़ी देर तक वह यूं ही बैठी रही—फिर वह झटके से सीधी हुई और फोन को अपने सामने घसीटकर रिसीवर उठाया और कोई नम्बर डायल करने लगी।

दूसरी तरफ से घण्टी बजने की आवाज आई तो वह दूसरी तरफ से फोन के उठाये जाने का इंतजार करने लगी।

“हैलो....!” शीघ्र ही दूसरी तरफ से आवाज आई—“डी.आई.जी. रेजीडेंस....।”

“डी.आई.जी. साहब कहां हैं?” डॉली बोली।

“साहब सो रहे हैं....आप....?”

“डॉली ....साहब से फौरन बात कराओ मेरी।” डॉली अधिकारपूर्ण स्वर में बोली।

“म....गर वो सो रहे हैं और....।”

“फौरन बात कराओ मेरी।”

जिस अंदाज से डॉली ने फोन पर आदेश दिया था—उसी से पता चलता था कि दूसरी तरफ वाले की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। करीब दो मिनट बाद ही फोन पर एक अलसाई आवाज आई।

“हैलो....।”

“डी.आई.जी. साहब।”

“यस....!”

“डॉली बोल रही हूं—फ्रॉम मुम्बई।”

“ओह आप....! फरमाइये।” दूसरी तरफ से आ रही आवाज में छाया आलस एकदम से दूर हो गया।

“पहचान लिया?”

“अजी आपको कौन नहीं जानता। इतनी बड़ी वकील और कानून की भक्त। आप तो हमारे हिन्दुस्तान की शान हैं। कहिये....कैसे याद किया?”

“इस वक्त मैं आप ही के शहर में हूं।”

“लगता है.....किसी खास वजह से आई हैं आप।”

“हां....गृह मंत्रालय से जगवीर को पकड़ने का काम मुझे सौंपा गया है। और मुझे पता लगा है कि वह यहीं इसी शहर में छुपा हुआ है।”

“ओह नो।”

“ओह यस।”

“कहां छुपा हुआ है वो?”

“यह अभी नहीं पता मुझे—आप फौरन सिटी थाने पहुंच जाइये।”

“इस वक्त?” दूसरी तरफ से हैरानी जताई गई।

“जी हां....!”

“कोई खास बात है क्या?”

“आप वहां पहुंचें—बाकी बातें वहीं करेंगे।”

“ओ.के.!” गहरी सांस छोड़ी गई दूसरी तरफ से—“मैं पहुंच रहा हूं।”

“थैंक्यू।”

कहकर डॉली ने रिसीवर रखा और कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई।

वह बेड के करीब आई और सिरहाने को उठाकर उसके नीचे रखी अपनी रिवॉल्वर उठाकर अपनी जीन्स की बैल्ट में फंसाई और ऊपर शर्ट कर ली।

और फिर वह कमरे से बाहर निकल गई।

कुछ ही देर में वह एक टैक्सी में बैठी थाने जा रही थी।

वक्त था रात के साढ़े बारह बजे।

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‘ट्रिन....ट्रिन....।’

फोन की घण्टी घनघनाई।

कांशी राणा ने झपटने वाले अंदाज में रिसीवर उठाया और कान से लगाते हुए बोला—“हैलो।”

“मैं बोल रहा हूं।”

दूसरी तरफ से जगवीर की आवाज सुनकर कांशी राणा का कलेजा जोरों से धड़क उठा।

उसी के फोन का ही तो इंतजार कर रहा था वह।

कांशी राणा को जगवीर ने कह जो रखा था कि उसे प्रसाद मिलेगा—और तब कांशी राणा ने भी उससे कहा था कि डॉली के काबू में आने के पश्चात् वह उसे इत्तला जरूर कर दे।

“शिकार फंसा?” तुरंत बोला कांशी राणा।

“फंसा तो मगर....।”

“मगर क्या?” पूछते हुए कलेजा धड़क गया कांशी राणा का।

“मालूम नहीं क्या हुआ?”

“क्या मतलब?”

“अभी थोड़ी देर पहले मुझे तारे का फोन आया था कि डॉली आ गई है। तब मैंने उसे कहा कि वह उसे नंगा करके बेड पर बांध दे।”

“फिर?”

“उससे थोड़ी देर बाद ही सुक्खे का फोन आ गया। उस वक्त मैं रास्ते में ही था। उसने कहा कि भीतर गोलियां चल रही हैं—और उसने मुझे वहां न पहुंचने के लिये कहा।”

“उसने बताया नहीं कि गोलियां कैसे चल रही हैं?”

“यह तू जाकर पता कर कि वहां क्या हुआ है। कहीं डॉली मर तो नहीं गई। या उसने तारे वगैरह को तो नहीं मार डाला।”

“ओह!”

“और अगर वह बच निकली है तो फौरन उसके होटल जा और उसे खत्म कर दे।”

“य....यह क्या कह रहे हो तुम?”

“मैं तेरी भलाई के लिये कह रहा हूं। अगर वह बच गई है और उसे पता चल गया है कि मैंने उसे उठवाया था तो वह सीधा तेरा गिरेबान पकड़ेगी। क्योंकि उसने तुम्हीं से कहा था मुझे ढूंढने के लिये—ऐसे में उसे जरा भी शक नहीं रह जायेगा कि तू मुझसे मिला हुआ है।”

“ओह नो।”

“इसलिये उसका फौरन मरना बहुत जरूरी हो जाता है—तभी तेरी गर्दन बच सकती है।”

“वो तो ठीक है।” कांशी राणा उलझे स्वर में बोला—“मगर एक कमसिन लौंडिया बंधी होने के बाद....वो भी नंगी हालत में बंधी होने के बाद कैसे भाग सकती है।”

“वही तो कह रहा हूं—तू फौरन पहले कोठी जा और पता कर। क्या पता तारे ने अपने ही साथियों को किसी बात पर मार डाला हो—और सुक्खे ने यूं ही घबराकर फोन कर दिया हो।”

“हूं....!” हुंकार भरी कांशी राणा ने—“तुम ठीक कह रहे हो। मैं अभी वहां जाता हूं।”

कहकर उसने रिसीवर रखा और खड़ा हो गया।

उसके जेहन में जगवीर की आखिरी बात ही फिट बैठी। उसे यही सही लगा कि तारे ने ही अपने साथियों पर गोली चलाई है और डॉली अभी भी वहीं बंधी हुई है और वो भी निर्वस्त्र।

यानि उस को भुनाने का पूरा मौका।

जगवीर द्वारा जो प्रसाद उसे मिलना था, अब उसे लग रहा था कि उसका भोग ही वह लगायेगा और प्रसाद जगवीर को मिलेगा।

उसने टेबल पर रखी अपनी कैप उठाई और उसे सिर पर डालते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

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इधर कांशी राणा की जिप्सी अभी थाने के गेट में ही थी कि तभी डॉली की टैक्सी ऐन उसके सामने आकर रुकी।

कांशी राणा ने फौरन जिप्सी रोकी और टैक्सी की तरफ देखा।

टैक्सी का पिछला दरवाजा खुला और जैसे ही उसने उसमें से डॉली को बाहर निकलते देखा—उसका कलेजा उछलकर उसके हलक में आ फंसा।

वह तो उसके निर्वस्त्र बंधी होने के सपने ले रहा था—मगर वह तो साक्षात् उसके सामने खड़ी थी।

वह भी पूरे कपड़ों में। बस शर्ट के ऊपरी दो बटन खुले हुए थे। वैसे ही जैसे सुबह देखा था उसने।

डॉली ठण्डे अंदाज में चलते हुए जिप्सी के ड्राइविंग डोर के करीब आई और मुस्कुराई—

“कहीं जा रहे हो इंस्पेक्टर?”

“हां....हां....!” हड़बड़ाया कांशी राणा—“राऊंड पर जा रहा हूं।”

“बड़ी ही सख्त ड्यूटी है पुलिस की।”

“क्या करें....ड्यूटी तो ड्यूटी है।” गहरी सांस छोड़ी कांशी राणा ने—“न रात को नींद....न दिन का चैन....।”

“मैं तो होटल में तुम्हारा इंतजार ही करती रही।” डॉली बोली—“याद है न मैंने दस बजे का वक्त दिया था तुम्हें—और तुम आये ही नहीं। क्यों?”

“मैं....मैं तो....।”

“आओ....अन्दर चलकर बात करते हैं।”

इन्कार करने का तो सवाल ही नहीं था। सो उसने वहीं से जिप्सी बैक कर दी और परिसर में ले जाकर रोक दी।

उसके जिप्सी से बाहर निकलने तक डॉली भी उसके करीब पहुंच गई।

दोनों साथ-साथ चलते हुए कांशी राणा के ऑफिस में पहुंचे।

“बैठो....!” डॉली स्वयं एक कुर्सी पर बैठते हुए बोली।

कांशी राणा टेबल के पहलू से निकलकर अपनी कुर्सी पर जा बैठा।

“हां....अब बोलो—क्यों नहीं पहुंचे तुम होटल में?”

“मैं गया तो था....मगर वहां आप नहीं मिलीं।” हल्की-सी हड़बड़ी में बोला कांशी राणा।

“किसी से पूछा कि मैं कहां हूं?”

“ह....हां....रिसेप्शनिस्ट से।”

“मगर वो तो कह रही थी कि उससे कोई पुलसिया मिलने नहीं आया।”

“वो झूठ बोल रही है। मैं उसके मुंह पर कह सकता हूं।”

“अच्छा।”

“मैं सच कहता हूं। आपके यहां से जाते ही मैंने अपने सारे मुखबिरों को खबर कर दी—। मगर रात नौ बजे तक कोई भी सूचना नहीं मिली मुझे और....।”

“फिर झूठ....।”

“यह सच है।”

“बकवास कर रहे हो तुम। और तुम्हारा झूठ यहीं से पकड़ा जाता है कि रिसेप्शन पर औरत नहीं, आदमी की ड्यूटी है।”

कांशी राणा का चेहरा पसीने-पसीने हो गया।

“म....गर मैं....।”

“जगवीर कहां है?” इस बार डॉली का स्वर सख्त था।

“म....मुझे क्या पता....मैं तो....।”

“बकवास बन्द करो अपनी!” फुंफकारी डॉली —“तुम जानते हो कि जगवीर कहां है और तुम उससे मिले हुए हो।”

“त....तुम मुझ पर इल्जाम लगा रही हो।”

“अभी तो मैं तुम्हें जूते भी लगाऊंगी।” डॉली की आंखों में कहर बरस उठा।

“ऐ....।” झटके से खड़ा हो गया कांशी राणा—“क्या समझती हो तुम खुद को—मेरे ही थाने में मुझे धमका रही हो—जानती हो एक इंस्पेक्टर को धमकी देने के जुर्म में मैं तुम्हें अभी इसी वक्त गिरफ्तार कर सकता हूं।”

“डॉली को गिरफ्तार करोगे तुम! मुझे गिरफ्तार करोगे!”

“करूंगा....ऐसे....।” कांशी राणा ने चुटकी बजाई।

“तो करो....देखती हूं कितना दम है तुम में।” डॉली जहर उगलते हुए बोली—“मगर एक बात दिमाग में अभी से बिठा लो....मुझे तो तुम गिरफ्तार करोगे सो करोगे—तुम खुद को गिरफ्तार समझो।”

“क्या मतलब?” हड़बड़ाया कांशी राणा।

“अभी पता चल जायेगा।”

इधर डॉली ने बात पूरी की, उधर डी.आई.जी. ने ऑफिस में प्रवेश किया।

रात के इस वक्त डी.आई.जी. को अपने सामने देख बुरी तरह से बौखला उठा कांशी राणा—साथ ही उसका हाथ अपने आप ही उसके माथे पर जा पहुंचा।

डी.आई.जी. के स्वागत में डॉली भी खड़ी हो गई।

डी.आई.जी. ने बड़ी गर्मजोशी से डॉली से हाथ मिलाया और बोला—

“खैरियत तो है मिस डॉली जो रात के इस वक्त....।”

“खैर ही तो नहीं है डी.आई.जी. साहब।” डॉली गम्भीरता से बोली।

“मैं समझा नहीं।”

“जब कानून के रक्षक ही कानून को कुचलने में लग जायेंगे तो खैर कहां से रहेगी—जब खाकी वर्दी वाले गुण्डे-मवालियों से मिल जायेंगे तो खैर कहां रहेगी। जब पुलिस वाले पब्लिक का दर्द बांटने की बजाये दर्द देने वालों के तलवे चाटने लगेंगे तो खैर कहां रहेगी।”

“य....यह आप क्या कह रही हैं मिस डॉली ....आप पुलिस पर इल्जाम लगा रही हैं।”

डी.आई.जी. की आवाज में नाराजगी थी।

“एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है डी.आई.जी. साहब—और आपके तालाब की गंदी मछली यह है।”

डॉली ने उंगली भाले की तरह कांशी राणा की तरफ सीधी की।

“आप जानती हैं मिस डॉली कि आप क्या कह रही हैं? आप एक पुलिस ऑफिसर पर इल्जाम लगा रही हैं।”

“सारी दुनिया जानती है कि डॉली किसी पर तभी उंगली उठाती है जब उसे पूरा यकीन हो जाता है कि वो वाकई में गुनहगार है।”

“क्या गुनाह किया है इसने?”

“जगवीर को छुपा रखा है इसने। जगवीर जिस पर सैंकड़ों मासूमों के खून का इल्जाम है। जिसके पीछे पूरी इण्डिया की पुलिस हाथ धोकर पड़ी है—उसी जगवीर को यह जनाब पनाह दिये हुए हैं।”

“य....यह झूठ है।” कांशी राणा ने डॉली की बात का विरोध किया—“मैं स....च कहता हूं सर कि मैं उसे जानता तक नहीं।”

बात करते-करते कांशी राणा ने होंठ भींच लिये—क्योंकि डी.आई.जी. का हाथ ऊपर उठ गया था, जो उसे चुप रहने का हुक्म था।

“आप....” डी.आई.जी. की निगाहें डॉली के चेहरे पर फिक्स हुईं—“इंस्पेक्टर कांशी राणा पर बहुत बड़ा इल्जाम लगा रही हैं। क्या इतना बड़ा आरोप लगाने का आपके पास कोई प्रमाण है—या कोई ऐसी दलील है जो यह मानने को बाध्य करती हो कि आप सही कह रही हैं।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और बोली—

“इस शहर में मेरी आमद पूरी तरह से गुप्त रखी गई थी—ताकि जगवीर को किसी भी सोर्स से पता न चल सके कि सरकार को उसके यहां छुपे होने का पता चल चुका है। सरकार को यह तो पता था कि वह इसी शहर में कहीं छुपा है—लेकिन यह नहीं पता था कि वह कहां छुपा है। सो मजबूरन मुझे दोपहर को कांशी राणा से मिलना पड़ा—मैंने इसे अपनी आमद के बारे में बताया—और दस बजे तक अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा। लेकिन यह नहीं आया—हां, जगवीर के आदमी मुझे बेहोश कर मुझे अगवा करके जरूर ले गये।”

“ओह!”

“मगर मैं बच निकली। जगवीर को मेरे निकल जाने का पता चल चुका था—सो वह मेरे पास नहीं आया....वर्ना अब तक तो वह ऊपर पहुंच चुका होता....।”

डॉली ने डी.आई.जी. को सारी बात बताई—लेकिन उसने बीच में रंगीला का नाम नहीं आने दिया। फिर वह बोली—

“अब आप खुद ही सोचिये—जगवीर को मेरे यहां आने का पता कैसे लगा? यहां तक कि उसे होटल और कमरे का नम्बर भी पता था। जिसमें मैं ठहरी हुई थी। जबकि इसका पता सिर्फ और सिर्फ इसे ही था।”

उसने कांशी राणा की तरफ उंगली सीधी की।

कांशी राणा के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं।

अगर डॉली अकेली होती तो कोई बड़ी बात नहीं थी कि वह उसे गोली मार देता—लेकिन डी.आई.जी. की वहां मौजूदगी से वह कुछ नहीं कर सकता था—साथ ही उसे अब यह भी पता चल गया था कि वह लड़की कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं है—बल्कि बहुत ऊंची चीज है। वर्ना डी.आई.जी. खुद चलकर थाने नहीं आता।
 
डॉली की बात डी.आई.जी. को ठीक लगी। तभी तो उनकी सख्त निगाहें सीधा कांशी राणा के चेहरे पर जा टिकी थीं।

“मिस डॉली क्या कह रही हैं?” वे सख्त स्वर में बोले।

कांशी राणा ने जोरो से थूक सटकी।

“म....मैं बेगुनाह हूं सर....मुझ पर आरोप लगाया जा रहा है। हो सकता है सैंटर से ही किसी ने जगवीर को खबर कर दी हो।”

“बेशक ऐसा हो सकता है।” डॉली बोली—“लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि मैं नटराज होटल के छह सौ सात नम्बर में ठहरूंगी। सिवाये तुम्हारे।”

कांशी राणा की बोलती बन्द।

“यू आर सस्पैंडिड इंस्पेक्टर।” डी.आई.जी. के स्वर में सख्ती उभर आई—“तुम जैसे देशद्रोही की हमारे विभाग को कोई जरूरत नहीं।” उन्होंने डॉली की तरफ देखा—“आप अपने ढंग से इससे पूछताछ कर सकती हैं मिस डॉली —पूरी पुलिस फोर्स जगवीर को पकड़ने के लिये आपको तैयार मिलेगी।”

“थैंक्यू सर!” डॉली ने बड़ी अदा से सिर हिला दिया। साथ ही उसके होंठों पर जहरीली मुस्कान रेंग गई।

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थाने के टॉर्चर सैल में कांशी राणा लोहे की कुर्सी पर बैठा था।

उसके सामने एक अन्य कुर्सी पर डॉली बैठी थी। डी.आई.जी. डॉली को कांशी राणा से मालूमात हासिल करने का जिम्मा सौंप गये थे....और यह कह गये थे कि पता चलते ही वह एस.पी. को फोन कर दे। वे एस.पी. को कह देंगे कि उसके हुक्म का पालन किया जाये।

इस तरह कुछ वक्त के लिये उस थाने की एस.एच.ओ. डॉली बन गई थी—और कांशी राणा इस वक्त उसके सामने बैठा था।

वर्दी अब कांशी राणा के बदन पर नहीं थी। उसे तो डी.आई.जी. ने अपने सामने ही उतरवा लिया था—और अब वह पायजामे-कुर्ते में था।

कांशी राणा की रंगत इस वक्त पीली पड़ी हुई थी। मगर भीतर-ही-भीतर वह स्वयं को मजबूत कर रहा था।

वह जानता था कि अगर उसने जुबान खोल दी तो उसकी नौकरी तो जायेगी ही—साथ में उसे वही सजा मिलेगी जो जगवीर को मिलेगी। सो नौकरी बचाने और सजा से बचने के लिये उसने अपने होंठ बन्द रखने का फैसला कर लिया था।

डॉली को वह अभी भी एक नाजुक और कमसिन हसीना समझ रहा था। जिसकी मार को उसने अपने बदन पर ऐसा समझना था मानो वह उसे फूलों से मार रही हो।

हां....इतना जरूर समझ गया था कि वह कोई मामूली छोकरी नहीं—बल्कि बहुत पहुंची हुई चीज है।

उसके सामने डॉली बिल्कुल शांत बैठी उसके चेहरे पर हो रहे परिवर्तनों को देख रही थी—जैसे वह उसके चेहरे को देखकर ही उसके मन के भावों को पढ़ रही हो।

आखिर वह कुर्सी से उठी और उसके सामने आ खड़ी हुई।

“देखो कांशी राणा!” वह बड़े ही शांत भाव में बोली—“जगवीर एक ऐसा मुजरिम है—जिसे आज नहीं तो कल पकड़ ही लिया जायेगा—और जब भी वह पकड़ा गया तो मेरी प्राथमिकता यही रहेगी कि मैं उसे गोली मार दूं। क्योंकि ऐसे शख्स को जेल की रोटी खिलाना भी सरकार का नुकसान होगा। अब ऐसे आदमी को, जिसकी मौत ने उसे देख लिया है, तुम बचाने की कोशिश कर रहे हो। चन्द रुपयों की खातिर तुमने अपनी नौकरी को तो दांव पर लगाया ही साथ ही अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा दी। मेरी मानो तो उसका पता बता दो—मैं अभी भी तुम्हें और तुम्हारी नौकरी को बचा सकती हूं। बस तुम उसका पता बता दो कि वह कहां छुपा है।”

“मैं नहीं जानता।”

थूक सटकते हुए बोला कांशी राणा।

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और टॉर्चर रूम में बांह फैलाते हुए बोली—

“यह टॉर्चर सैल देख रहे हो न कांशी राणा—न जाने इसी सैल में तुमने कितने मुजरिमों के मुंह खुलवाये होंगे। मतलब यह कि यहां पड़े हर औजार का पता है तुम्हें कि किसे किस तरह प्रयोग किया जाता है। और यह भी पता है कि किस मुजरिम पर कौन-सा औजार यूज करने से वह जल्द ही जुबान खोल देगा। क्या यह अच्छा लगेगा कि अब वही औजार तुम पर आजमाये जायें? मैं अभी भी कहती हूं—बता दो कि जगवीर किस जगह पर छुपा है?”

“म....मैं सच कहता हूं—मैं कुछ नहीं जानता।” कांशी राणा बोला—“और एक बात तुम भी गांठ बांध लो।”

“क्या?”

“तुमने मुझ बेगुनाह को फंसाया है—मुझे नौकरी से निकाला है। और मैं वो शख्स हूं जो अपना बदला लेकर ही चैन की सांस लेता है। देख लेना—बहुत जल्द मैं तुमसे ऐसा बदला लूंगा कि तुम्हारे दांतों तले पसीना आ जायेगा।”

डॉली का चेहरा एकदम से सख्त हो उठा। आंखों में अंगारे दहकने लगे।

“मैं कहती हूं कि तूने यह शब्द क्यों बोले कांशी राणा!” वह गुर्राई—“इसलिये न कि मेरे दिल में यह बात बैठ जाये कि तु सचमुच बेगुनाह है। मगर तू जानता नहीं कि डॉली क्या चीज है? मैं वो बला हूं जो सामने वाले के हलक में हाथ डालकर उसके भीतर के बन्द दरवाजों को खोल दे। तू चीज ही क्या है। डॉली के सामने तो बड़े-बड़े सूरमाओं की जुबान खुल जाती है।”

“जुबान उन्हीं की खुलती है जिसने अपने भीतर गुनाह छुपा रखे होते हैं—और मेरे भीतर ऐसा कुछ भी नहीं। जब मैं कुछ जानता नहीं तो बताऊंगा कहां से।”

“खैरियत जमा रख—तू बोलेगा—और सब कुछ बोलेगा। तू बतायेगा कि जगवीर कहां है। तू यह भी कबूल करेगा कि तू उसका यार है—तू यह भी भौंकेगा कि तूने उससे कितना रुपया खाया है। सब कुछ बोलेगा तू।”

“कोशिश करके देख ले।”

“वो तो करूंगी ही। तुझ जैसे कुत्ते पर कौन-सा पट्टा सूट करेगा—मैं यह जानती हूं।” डॉली गुर्राई—“अभी तक तो मैं तेरे साथ नर्मी से पेश आ रही थी—अब तुझे पता चलेगा कि डॉली क्या चीज है।”

कहने के साथ ही उसने उसकी कनपटी पर घूंसा दे मारा।

कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया—फिर उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़क गई।

डॉली का नपा-तुला घूंसा इतनी ही जोर से लगा था कि वह ज्यादा-से-ज्यादा पांच मिनट ही बेहोश रहे।

उसे बेहोश कर डॉली उसके कपड़े उतारने लगी।

करीब पांच मिनट बाद जब कांशी राणा को होश आया तो स्वयं को कुर्सी पर नंगा बंधा देख पहले तो हड़बड़ाया फिर उसके होंठों पर मुस्कान फैल गई।

“लगता है—!” वह डॉली को देखते हुए बोला—“मर्दों को नंगा देखने का बहुत शौक है तुम्हें।”

“देखने का ही नहीं—उनके साथ बिछने का भी शौक है।” डॉली मुस्कुराई—“अब तक पता नहीं कितने ही मर्दों को खा चुकी हूं मैं। अगर तू जुबान खोलने के ऐवज में मेरी सवारी करने की शर्त रखता तो यकीनन मैं हां कर देती।”

कांशी राणा ने कुछ कहने के लिये मुंह खोला—फिर होंठ बंद कर लिये।

डॉली मुस्कुराई और उसके करीब आकर उसके कंधों पर हाथ रखते हुए बोली—

“अब तुम देखो मेरा कमाल....।”

“वो तो देख ही रहा हूं।” कांशी राणा उसकी फीगर को देखते हुए बोला, जो कि उसके झुकने से कांशी राणा की आंखों के ऐन सामने बाहर को चमक रही थीं।

“यह कमाल तो कुछ भी नहीं—अभी तो कमाल देखोगे— वो भी गर्दन झुका कर देखोगे।”

कहकर डॉली सीधी हुई और एक तरफ बढ़ गई।

उससे तीन-चार कदम ही दूर फर्श पर एक दस्ताना पड़ा था, जो कि डॉक्टर यूज करते हैं। उसके साथ में एक पुड़िया पड़ी थी।

डॉली ने दस्ताना उठाकर अपने दायें हाथ पर चढ़ाया, फिर पुड़िया उठा ली।

कांशी राणा धड़कते दिल से उसको देखे जा रहा था।

डॉली उसकी तरफ मुड़ी और उसके सामने आकर पुड़िया उसके सामने कर उसे खोला।

पुड़िया में रखी वस्तु को देख न चाहते हुए भी कांशी राणा का कलेजा दहल उठा।

लाल पिसी हुई मिर्च थी पुड़िया में।

“लाल मिर्च है यह।” बोली डॉली —“ज्यादा नहीं....सिर्फ पचास ग्राम है। अगर यह पचास ग्राम मिर्च तुम बर्दाश्त कर गये तो मैं विश्वास कर लूंगी कि तुम बेगुनाह हो। और हां—पानी नहीं है अन्दर—इसलिये जब भी जुबान खोलना—बर्दाश्त की हद टूटने से पांच मिनट पहले खोलना, क्योंकि पानी आने में पांच मिनट तो लग ही जायेंगे।”

कहने के साथ ही डॉली ने दायें हाथ से मिर्ची की चुटकी भरी और उसकी जांघों के जोड़ पर फैंक दी।

“अब नजरें झुकाओे, और गर्दन भी नीची करके कमाल देखो।” डॉली कुटिलता से हंसी।

कांशी राणा कुछ नहीं बोला—बस होंठों को भींचे नीचे देखने लगा।

कुछ पलों तक तो उसे कुछ खास असर नहीं हुआ—फिर धीरे-धीरे मिर्च ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया।

पहले तो उसे हल्की-सी हड़कन शुरू हुई—फिर धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि वहां आग लग रही हो।

पैर कुर्सी के पायों के साथ बंधे हुए थे उसके और हाथ हत्थों से—सो वह न तो जांघों को भींच सकता था न ही हाथों से मसल सकता था।

नतीजा—वह अपने कूल्हे हिलाने लगा।

“लगता है अभी पूरा मजा नहीं आया—लो—अब आ जायेगा मजा।”

कहने के साथ ही डॉली ने चुटकी भर मिर्च और वहां गिरा दी।

मिर्च की जलन के कारण उसको पसीना आने लगा—और जितना पसीना बढ़ता—जलन उतनी तेज होती जाती।

पहले तो कांशी राणा के मुंह से सी-सी की आवाजें निकलीं। फिर कराहें निकलीं और फिर वह जोर-जोर से चीखने लगा।

बुरी तरह से तड़प रहा था वह—लेकिन बंधा होने की वजह से कुछ भी नहीं कर पा रहा था।

उसे ऐसा लग रहा था कि मानो उसकी जांघों के बीच की जगह तेजाब से जला दी गई हो।

“क्यों....मजा आ रहा है न?” उसे चीखते देख कुटिलता से हंसी डॉली —“अभी तो शुरूआत है—अभी तो सिर्फ एक-डेढ़ ग्राम मिर्च ही गिरी है—असली मजा तो तब आयेगा जब पूरी-की-पूरी मिर्च तुम्हारे ऊपर होगी।”

“न....हीं....प....पानी डालो....म....मैं....मर रहा हूं....प्लीज....।”

“सॉरी....पानी दूर है....।”

“मैं मर जाऊंगा।”

“तेरे जैसों का मर जाना ही बेहतर है।”

“आ....आ....ह....।”

चीखते हुए वह सिर इधर-उधर झटकने लगा। अपने कूल्हे बार-बार उचकाने लगा।

लेकिन मिर्च का प्रभाव कम होने की बजाये और भी उग्र होता चला गया।

तीन मिनट....सिर्फ तीन मिनट में ही टूट गया वह।

कांशी राणा जो अपने भीतर को पूरी तरह से दृढ़ किये हुए था—वह हल्के से टॉर्चर से ही टूट गया।

“अ....आ....पानी....मैं बताता हूं....सब कुछ बताता हूं....प्लीज....पानी डालो....वर्ना मैं जल जाऊंगा।”

डॉली दरवाजे की तरफ मुड़ी और ऊंचे स्वर में बोली—“पानी लाओ।”

कहकर उसने पुनः कांशी राणा की तरफ देखा—“पानी आने में पांच मिनट लगेंगे—तब तक बताओ—कहां है जगवीर?”

“प...पांच मिनट में तो मैं जल जाऊंगा।”

“ऐसे ही बातें करते रहोगे तो देर होती रहेगी। इसलिये जल्दी बताओ।”

“वो पुराने घर में है—आ....ह....उफ....।”

“पुराना घर कहां है?”

चीखते-कराहते कूल्हे उछालते हुए कांशी राणा ने बताया।

“पुराने घर में कहां छुपा है वो?”

कांशी राणा ने बेसमेंट में जाने का रास्ता बताया।

“और कौन-कौन है वहां पर?”

“पांच-छः साथी हैं उसके आ....ह....सी....सी....” सब कुछ बताता चला गया वह।

जब डॉली ने उससे सब कुछ जान लिया तो वह अपने स्थान से हिली और उसके पीछे चली गई।

कांशी राणा ने गर्दन पीछे घुमाई तो पलभर के लिये तो वह सारी जलन ही भूल गया।

उसके पीछे पानी की बाल्टी पड़ी थी—साथ में सरसों का तेल भी पड़ा था।

यानि बाहर की तरफ मुंह करके उसने उसे दिखाने के लिये ही हांक लगाई थी—जबकि पानी और तेल उसने पहले से ही तैयार कर रखा था।
 
डॉली ने पहले मिर्च की पुड़िया को बंद करके नीचे रखा—फिर दस्ताना उतारा—फिर उसने बाल्टी उठाई और दूसरे हाथ से तेल की बोतल उठाकर उसके सामने आ खड़ी हुई।

उसने बोतल नीचे रखी—फिर बाल्टी को उठाकर ऊपर किया और धीरे-धीरे उसकी जांघों के बीच पानी डालने लगी।

पानी बर्फीला था—तभी तो कांशी राणा को पूरी ठण्डक का अहसास होने लगा था।

उसकी जलन खत्म होने लगी।

“यह तो एक ट्रेलर था कांशी राणा।” डॉली बाल्टी में से पानी गिराते हुए बोली—“डॉली के पास तो ऐसे-ऐसे नुस्खे हैं कि चट्टान भी मुंह खोल दे। रहा न घाटे में। नौकरी भी गई—सजा भी मिली और मैं भी नहीं मिली। अगर पहले ही हां कर देता तो आज की रात तू मेरे साथ कलाबाजियां खा रहा होता।”

कांशी राणा कुछ नहीं बोला—बस सी-सी करता रहा।

पानी डालकर डॉली ने तेल की बोतल उठाई और उसे उलटकर आधी से ज्यादा खाली कर दिया।

“यह तेल तुझे राहत पहुंचायेगा। अब तू यहां आराम कर, मैं चली तेरे यार को खत्म करने।”

कहकर वह वहां से हटी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

कुछ ही देर में वह कांशी राणा के ऑफिस में टेबल पर बैठी एस.पी. का नम्बर डायल कर रही थी।

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करीब पौन घण्टे बाद पुलिस की दो गाड़ियां उस स्थान पर रुकीं, जहां पर कि कांशी राणा ने अपनी जिप्सी रोकी थी जब वह जगवीर से मिलने गया था।

दोनों गाड़ियों के पीछे एम्बेसडर थी—और उसके पीछे एक खुली जिप्सी जिसमें कि एस.पी. के बॉडीगार्ड थे।

जिप्सी के रुकते ही उसमें से पांचों बॉडीगार्ड बाहर कूदे और एम्बेसडर को चारों तरफ से घेर लिया।

तभी एम्बेसडर का पिछला दरवाजा खुला और उसमें से पहले एस.पी. बाहर निकला, फिर उसके पीछे-पीछे डॉली बाहर आई।

आगे की गाड़ियों से हथियारबन्द सिपाही कूद-कूदकर बाहर निकलने लगे।

“पुराना घर किधर है?” डॉली ने एस.पी. से पूछा—साथ ही इधर-उधर गर्दन घुमाई।

मगर सिवाये अंधेरे के कुछ भी नजर नहीं आया।

“उधर!” एस.पी. ने दाईं तरफ इशारा किया।

डॉली ने सिपाहियों की तरफ देखा और कड़े शब्दों में बोली—

“पुराने घर में जगवीर छुपा हुआ है—उसे किसी भी सूरत में गिरफ्तार करना है—और अगर वह भागने की कोशिश करे तो बेशक उसे गोली से उड़ा दिया जाये।”

“एक्शन!” तभी एस.पी. ने आदेश दिया।

तुरंत सभी सिपाही मुड़े और पुराने घर की तरफ बढ़ने लगे।

डॉली ने एस.पी. के बॉडीगार्ड की तरफ देखा और बोली—

“तुम अपने ऑफीसर की बॉडी को गार्ड करो—मैं चली।”

“किधर....!” हड़बड़ाया एस.पी.।

“डॉली को सिर्फ हुक्म देने की आदत नहीं—उसे फील्ड में रहना ज्यादा अच्छा लगता है।”

“मगर आप....।”

“खातिर जमा रखिये—जगवीर की मौत का सेहरा आप ही के सिर बंधेगा।”

डॉली हंसी और बॉडीगार्डों के बीच में से निकलकर अंधेरे में गायब हो गई।

एस.पी. वहीं खड़ा सोचता रहा कि वह क्या करे....क्या न करे।

आखिर उसने भी एक्शन में आने का मन बनाया और वह भी पुराने घर की तरफ बढ़ गया।

बॉडीगार्ड उसे निरंतर घेरे हुए थे।

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‘पिंक....पिंक....!’

वॉकी-टॉकी ने आवाज लगाई तो युवती के साथ चिपक कर सो रहे जगवीर की आंखें फौरन खुल गईं।

जगवीर के साथ-साथ युवती की भी आंखें खुल गईं।

जगवीर उससे अलग हुआ और अपने करीब ही पड़े वॉकी-टॉकी को उठाकर उसका बटन दबाया और वॉकी-टॉकी को मुंह के पास ले जाते हुए बोला—

“क्या बात है?”

“खतरा....।” दूसरी तरफ से घबराई आवाज आई—“पुलिस पुराने घर को चारों तरफ से घेर रही है।”

सुनकर जगवीर पहले तो बुरी तरह से चौंका, फिर उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।

उसे समझते देर नहीं लगी कि कांशी राणा पुलिस के हत्थे चढ़ गया है और उसने सब कुछ भौंक दिया है।

“खत्म कर दो सभी को।” वह गुर्राया—“एक भी बचकर नहीं जाना चाहिये।”

“लेकिन वे तादाद में हमसे कई गुना ज्यादा हैं।” आवाज आई।

“मगर उन्हें तुम्हारी पोजीशन का तो नहीं पता।”

“मगर हम....।”

“बकवास नहीं हरामखोर—मुकाबला करो।”

कहकर उसने वॉकी-टॉकी बन्द किया और उसे परे फैंककर खड़ा हो गया।

“आप खड़े क्यों हो गये सरकार?” युवती बैठते हुए बोली।

“यहां से हमारा दाना-पानी उठ चुका है।” जगवीर खूंटी पर लटके अपने कपड़ों की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“ओह!”

“और....!” जगवीर खूंटी पर अपनी पैंट की जेब में से रिवॉल्वर निकालते हुए बोला—“तेरा दाना-पानी इस दुनिया से उठ चुका है।”

“न....हीं....।” हौले से चीखी युवती।

रिवॉल्वर ने उसकी रंगत को एकदम से पीला कर डाला था।

“सॉरी डार्लिंग—जगवीर को फालतू के बोझ लादने का कोई शौक नहीं। मैं जहां भी जाऊंगा—मुझे वहां नई छोकरी हासिल हो जायेगी।”

“न....हीं....म....मुझे मत मारो।”

“खून करना तो मेरी आदत है। अगर यह आदत छूट गई तो मैं फौरन मर जाऊंगा—और मौत से मुझे बहुत डर लगता है—इसलिये विदा।”

कहकर उसने ट्रिगर दबा दिया।

‘धांय....!’

उस छोटे से कमरे में गोली की आवाज ऐसे गूंजी जैसे एटमबम फटा हो।

गोली सीधी युवती की छाती में जा समाई और वह पीछे को गिरकर छटपटाने लगी।

जगवीर ने रिवॉल्वर की नाल में फूंक मारी और फिर अपने कपड़े उतारकर उन्हें पहनने लगा।

कपड़े पहनकर उसने रिवॉल्वर पैंट की जेब में डाली और एक एमरजेंसी लाईट उठाकर सामने दीवार की तरफ बढ़ा।

दीवार के करीब आकर उसने एमरजेंसी लाईट उधर उठाई और दीवार को इस तरह से देखने लगा जैसे वह वहां पर कुछ ढूंढ रहा हो।

शीघ्र ही उसकी निगाहें एक उभरी हुई ईंट पर जा टिकीं।

उसने बायें हाथ से लाईट को पकड़ा और दाहिना हाथ ऊपर कर उस ईंट को भीतर की तरफ दबाया।

तुरंत प्रतिक्रिया हुई।

दीवार एक तरफ हल्की-सी गड़गड़ाहट के साथ हटने लगी। और सामने एक लम्बी सुरंग नजर आने लगी।

एमरजेंसी लाईट सम्भाले वह उस सुरंग में दाखिल हुआ और आगे बढ़ने लगा।

सुरंग में सीलन भरी बदबू फैली हुई थी—मगर जगवीर को जैसे उसकी कोई परवाह नहीं थी।

वह आगे बढ़ता जा रहा था।

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‘धांय....!’

एक तेज धमाका हुआ।

“आ....ह....!”

गोली एक सिपाही की बांह में जा घुसी और राईफल उसके हाथों से छूटकर नीचे गिर पड़ी।

उसके साथ चल रहे सिपाहियों ने फौरन स्वयं को नीचे गिरा लिया।

अभी उन्होंने ढंग से पोजीशन भी नहीं ली थी कि उन पर हमला शुरू हो गया था।

जख्मी हुए सिपाही ने भी स्वयं को नीचे गिरा लिया था।

ठीक तभी—

‘रेट....ट....ट....ट....!’

गोलियों की बाढ़ एक झाड़ी के पीछे से निकली और नीचे गिरे पड़े सिपाहियों के ऊपर से होते हुए निकल गई।

अपने साथी को गोली लगते देख अन्य सिपाही तैश में आ गये—और उन्होंने भी अपनी राईफलों के मुंह खोल दिये।

‘धांय....धांय....धांय।’

दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं।

तभी पुराने घर में से भी गोलियां चलने लगीं।

दोनों तरफ से गोलियों का आदान-प्रदान होने लगा।

गोली-बारी के बीच-बीच में इंसानी चीखें भी उठ रही थीं—और वे चीखें गुण्डों की थीं।

जैसे ही कोई चीख उठती—सिपाहियों में एक नया जोश भर जाता।

‘धांय....धांय....’ और ‘रेट....रेट....’ की आवाजों से चारों दिशायें दहल रही थीं।

सिपाही गोलियां चलाने के साथ-साथ पुराने घर की तरफ भी रेंगते हुए बढ़ रहे थे।

ज्यादा देर नहीं लगी उन्हें दुश्मन पर काबू पाने में।

सिर्फ दस मिनट लगे।

दस मिनट में सारा खेल खत्म हो गया।

पुराने घर से गोलियों की बाढ़ आनी बन्द हो गई थी।

“जवानों—आगे बढ़ो।” तभी एस.पी. की आवाज वहां गूंजी।

अपने अफसर की आवाज सुन कई सिपाही पोजीशनों से निकले और पुराने घर की तरफ भागे।

टार्चों की रोशनी से वहां रोशनी की कई लकीरें नाचने लगीं।

कुछ ही देर में पुराने घर पर पुलिस का कब्जा हो गया।

एस.पी. अपने गार्डों से घिरा पुराने घर में प्रविष्ट हुआ और सीधा उस दीवार के सामने आ खड़ा हुआ—जहां पर कि पहले कांशी राणा खड़ा था।

डॉली ने वहां रास्ता पैदा करने का तरीका उसे बता ही दिया था—सो दो मिनट तक वह दीवार को देखता रहा—और फिर उसके मुंह से हैरत भरी सिसकारी निकल गई जब उसने वहां रिक्त स्थान पैदा होते देखा।

गार्डों की टार्चें तुरंत रिक्त स्थान की तरफ उठ गईं।

मगर सामने कोई खतरा पेश नहीं आया।

“आओ।” कहते हुए एस.पी. ने भीतर कदम रखा और सीढ़ियां उतरने लगा।

पीछे-पीछे कतार में उसके बॉडी गार्ड—और उनके पीछे सिपाही उतरने लगे।

शीघ्र ही एस.पी. बेसमेंट में था।

मगर पंछी उड़ चुका था।

बेसमेंट में युवती की लाश के साथ कुछ अन्य सामान पड़ा था।

मगर उड़ चुके पंछी ने बता दिया था कि वह किस दिशा में उड़ा है।

सुरंग सामने नजर आ रही थी।

एस.पी. ने गार्डों की तरफ देखे बिना ही एक हाथ एक तरफ फैलाया और बोला—“टॉर्च—।”

तुरंत एक टॉर्च उसके फैले हाथ पर आ थमी।

“आगे बढ़ो।” वह टॉर्च की रोशनी सुरंग में फैंकते हुए बोला—“जगवीर इसी रास्ते से भागा है।”

तुरंत तीन गार्ड सुरंग में प्रवेश कर गये—जिनमें से दो के हाथों में टॉर्च थी।

“तुम लोग यहां की तलाशी लो।” एस.पी. ने सिपाहियों को आदेश दिया—“और ऊपर जाओ।”

कहकर वह भी टॉर्च सम्भाले सुरंग में दाखिल हो गया।

उसके पीछे उसके दोनों गार्ड भी दाखिल हुए और आगे बढ़ने लगे।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
जगवीर की सुरंग यात्रा का अन्त करीब आठ मिनट बाद एक कुएं के तल में हुआ।

वह एक सूखा कुआं था—जिसकी एक साईड में वो सुरंग थी जिसमें से कि वो अभी-अभी निकला था।

कुएं में सूखे पत्ते तथा सूखी घास के तिनकों के अलावा ईंट-रोड़े बिखरे हुए थे।

तभी उसे अपने करीब ही हल्की-सी सरसराहट सुनाई दी।

न चाहते हुए भी जगवीर का कलेजा धड़क उठा—और उसी के साथ ही उसकी निगाहें सरसराहट की तरफ घूम गईं। ठीक तभी सूखे पत्तों में से एक फन ऊपर उठा।

एमरजैंसी लाईट में उस काले नाग को देख जगवीर का कलेजा मुंह को आ गया—जो अपना फन उठाये उसे ही घूर रहा था। और उसके ऐन सामने मौत खड़ी थी जो किसी भी वक्त उस पर झपट सकती थी।

मगर मौत झपट नहीं पाई उस पर—उससे पहले ही जगवीर ने स्वयं को सम्भाल लिया और रिवॉल्वर निकालकर बिना कोई वक्त गंवाये गोली चला दी।

‘धांय....!’

गोली नाग के फन को कुचलती हुई निकल गई—और उसी के साथ ही फन जैसे उठा था—वैसे ही नीचे गिर पड़ा।

राहत भरी गहरी सांस छोड़ी उसने और एमरजैंसी लाईट में पूरे कुएं में देखा कि कोई और जहरीला जीव तो नहीं वहां पर। कोई भी नजर नहीं आया उसे।

पूरी तरह से आश्वस्त होकर उसने कुएं की दीवारों पर निगाह मारी तो अपने पीछे उसे सीढ़ी नजर आई।

दीवार में सरिये फिट करके ऊपर को जाती सीढ़ियां बनाई गई थीं।

उसने रिवॉल्वर जेब में डाली—एमरजैंसी लाईट का कुण्डा मुंह से पकड़ा और फिर एक-एक सीढ़ी ऊपर चढ़ने लगा।

शीघ्र ही वह आखिरी सीढ़ी पार कर कुएं की मुंडेर पर गया और फिर एमरजेंसी लाईट को दांतों से निकालकर हाथ में पकड़ते हुए मुंडेर से धरती पर छलांग लगा दी।

“आ गये मेरे मियां मिट्ठू।”

तभी उसके पीछे से आवाज उभरी।

बिजली की-सी गति से चौंकते हुए वह पीछे मुड़ा।

सामने डॉली खड़ी थी।

“मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी मेरे राजा।” डॉली बड़ी अदा से बोली।

“कौन हो तुम?” अपनी हैरत को भीतर-ही-भीतर दबाने की कोशिश करते हुए गुर्राया जगवीर।

“वही—जो बिस्तर पर बंधी तुम्हारे आने का इंतजार कर रही थी—मगर तुम हरजाई नहीं आये—सो मजबूरन मुझे यहां आना पड़ा।”

जगवीर की आंखें फट पड़ीं।

“डॉली ।” उसके होंठों से अस्फुट स्वर निकला।

“यस माई डियर जगवीर।” डॉली कूल्हों पर हाथ टिकाते हुए बोली—“हैरान हो रहे हो मुझे यहां देखकर कि मुझे कैसे पता चल गया कि तुम यहां से निकलोगे। ऐसे पुराने घरों के बारे में मैंने काफी जानकारियां एकत्र कर रखी हैं जिनमें मैकेनिज्म होता है। मैं जानती हूं जिस पुराने मकान में ऐसे गुप्त बेसमेंट वगैरह होते हैं—वहां बाहर निकलने के लिये गुप्त दरवाजे भी होते हैं। और ऐसे रास्ते कुएं—खंडहर या गुफा वगैरह ही होते थे—वो भी वहां से काफी दूर—सो मैं पुराने घर में तुम्हें ढूंढने की बजाये इधर-उधर निकल पड़ी। अंधेरे में मुझे यह कुआं भी दिखाई नहीं दिया था मगर तुम्हारी चलाई गोली की आवाज जब कुएं से गूंजती हुई बाहर निकली तो सीधा मेरे कानों में पड़ी। और मैं सीधी इधर आई और जब मैंने नीचे झांका तो मेरे सपनों का राजकुमार मुंह में एमरजेंसी लाईट पकड़े ऊपर आ रहा था। और....।”

बात अधूरी ही रह गई उसकी—तभी जगवीर ने रिवॉल्वर निकाली और बिना किसी चेतावनी के ट्रिगर दबा दिया।

गोली डॉली की तरफ लपकी।

मगर वह तो बात करने के दौरान ही सतर्क थी—सो बिजली की-सी फुर्ती से एक तरफ छलांग लगा दी।

गोली उसके कान को हवा देती हुई निकल गई।

अभी डॉली नीचे गिरी ही थी कि जगवीर ने पुनः फायर कर दिया।

‘धांय....!’

दंग रह गया वह।

डॉली के बदन ने अभी जमीन को छुआ ही था जब उसने फायर किया था। मगर वह जमीन को छूते ही पुनः उछल गई—जैसे किसी गेंद को जमीन पर फैंका गया हो और वह पुनः जमीन से लगते ही उछल गई है।

किसी इंसान के बस का काम नहीं हो सकता था यह।

मगर वह तो अपनी आंखों से देख रहा था—वो भी एक इंसान को।

ऐसे में हैरत तो होनी ही थी उसे।

और जब तक वह हैरत के समुद्र से बाहर निकलता—डॉली का जिस्म पुनः उछला और उसके पैर की जबरदस्त ठोकर जगवीर के रिवॉल्वर वाले हाथ पर पड़ी।

जगवीर को ऐसा लगा मानो उसके हाथ से कोई पहाड़ आ टकराया हो।

इतना जबरदस्त वार तो किसी मर्द का नहीं सहा था उसने—और वह तो एक औरत थी।

रिवॉल्वर उसके हाथ से छिटककर परे जा गिरी।

जब तक वह सम्भलता—डॉली की टक्कर उसकी छाती पर पड़ी।

जगवीर उछलकर पीछे जा गिरा और एमरजेंसी लाईट उसके ऊपर आ गिरी।

जगवीर को ऐसा लगा जैसे उसके सीने की पांच-सात हड्डियां चटक गई हों।

अब उसे अहसास हो रहा था कि वह मामूली-सी नाजुक-सी हसीना कोई छोटी-मोटी चीज नहीं—बल्कि बहुत बड़ी तोप थी।

अपने दर्द की परवाह न करते हुए वह तेजी से उठा और पागल भैंसे की तरह डॉली की तरफ झपटा।

और जैसे ही वह डॉली के करीब पहुंचा—डॉली उछली और हवा में ही अपनी टांगें विपरीत दिशा में फैला लीं।

जगवीर उसकी टांगों के नीचे से आगे को निकल गया और हड़बड़ाते हुए रुककर जैसे ही पलटा—

“ठाक....!”

डॉली की लात उसके मुंह पर पड़ी।

जगवीर चीखता हुआ उछलकर पीछे जा गिरा।

उसका मुंह एक ही वार से लहूलुहान हो गया।

फिर भी उसने स्वयं को सम्भाला और जैसे ही उसने खड़ा होने की कोशिश की—उसका शरीर ढीला पड़ा तथा निगाहें डॉली के हाथ में थमी रिवॉल्वर पर टिक गईं, जिसकी इकलौती आंख उसी को घूर रही थी।

“यूं तो तू तड़प-तड़पकर मरने के लायक है।” डॉली फुंफकारी—“जितने बेगुनाहों का तूने खून बहाया है उतनी ही बार तू फांसी पर चढ़ाया जाये—तो भी सजा पूरी नहीं होगी तेरी—मगर मेरे पास इतना वक्त नहीं कि मैं तुझे तेरे गुनाहों के हिसाब से सजा दूं....सो....।”

उसने बात अधूरी छोड़ दी। और उसकी बात को पूरा किया उसकी रिवॉल्वर ने।

‘धांय....धांय....!’

एक के बाद एक दो शोले उगले उसकी रिवॉल्वर ने।

पहली गोली सीधी उसके माथे में जा धंसी और दूसरी गोली पहली गोली के ठीक ऊपर लगी।

क्या मजाल जो जगवीर के माथे में हुए सुराख में एक सूत का भी इजाफा हुआ हो।

वह वहीं पीठ के बल पलटा और पसर गया।

गहरी सांस छोड़ते हुए उसने रिवॉल्वर अपनी जीन्स की बैल्ट में फंसाई और एक तरफ गिरी पड़ी एमरजेंसी लाईट को उठा लिया, जो कि अभी भी जल रही थी।

वापस जाने के लिये उसने मुंह पुराने घर की तरफ किया—और फिर एक बार कुएं की तरफ देखा।

ठीक तभी कुएं में से पीली लाईट बाहर को निकली।

तुरंत वह कुएं के करीब आई और कुएं में झांका।

मुस्कुरा पड़ी वह।

एस.पी. सरिये की सीढ़ियां चढ़ता ऊपर आ रहा था और उसके पीछे तीन और सीढ़ियां चढ़ रहे थे। एक कुएं के तल में खड़ा टॉर्च की रोशनी ऊपर फैंक रहा था।

डॉली हटकर एस.पी. का इंतजार करने लगी।

शीघ्र ही इंतजार खत्म हुआ।

एस.पी. बाहर आया—और जैसे ही उसकी नजर डॉली पर पड़ी—वह बुरी तरह से उछल पड़ा।

“अ....आप यहां....?”

“यस....!” डॉली हंसी—“मैं यहां....।”

“आ....प यहां कैसे पहुंच गईं?” हैरानी से बोला एस.पी.।

डॉली ने उसे बताया—फिर जगवीर की लाश की तरफ इशारा करते हुए बोली—

“आपका मुजरिम!”

एस.पी. ने जगवीर की लाश की तरफ देखा और फिर डॉली की तरफ हैरानी से देखने लगा।

“अ....आपने मारा उसे?”

“नहीं....इसे तो आपने मारा है—पूरा आधा घण्टा गोलीबारी हुई—तब जाकर यह मरा। मैं तो सिर्फ खानापूरी के लिये आपके साथ थी।”

एस.पी. पहले तो हड़बड़ाया, फिर मुस्कुरा पड़ा—

“थैंक्यू।”

“इट्स ओ.के.—अब प्लीज मुझे वापस मेरे होटल में छोड़ दें—आप जो चाहे करते रहें।”

एस.पी. ने तुरंत सिर हिलाया और बोला—

“मैं खुद आपको छोड़ने जाऊंगा—इस तरह मैं ज्यादा-से-ज्यादा देर आपके साथ रहने का गर्व तो पा सकूंगा।”

डॉली बोली कुछ नहीं—बस मुस्कुरा दी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

होटल नटराज के कमरा नम्बर छह सौ सात में डॉली और रंगीला थे।

रंगीला कुर्सी पर बैठा था और डॉली उसके सामने खड़ी थी।

पंजाबी सलवार-कमीज में वह बहुत जंच रही थी और हैरत की बात तो यह थी कि उसने अपने सिर को दुपट्टे से ढांप रखा था।

उसके हाथों में थाली थी जिसमें कि चावल के कुछ दाने केसर के अलावा एक राखी पड़ी थी।

लाल धागों से बनी हुई थी वह राखी।

रंगीला ने सिर पर तौलिया रखा हुआ था।
 
डॉली ने बड़े प्रेम से पहले केसर का टीका रंगीला के माथे पर लगाया, फिर चावल के दाने लगाये और फिर थाली में से राखी निकालकर थाली को टेबल पर रखा और बड़े ही स्नेह से रंगीला की बढ़ी कलाई पर वह धागा बांधकर राखी को चूम लिया।

“भगवान करे मेरे भाई की उम्र हजारों-हजारों साल हो।”

उसने रंगीला को दिल से दुआ दी।

रंगीला ने भी उस राखी को चूमा—फिर डॉली ने अपने भाई का मुंह मीठा किया और हाथ आगे बढ़ाते हुए बोली—

“बहन का नजराना।”

रंगीला ने जेब में हाथ डाला और एक तह किया हुआ चैक निकालकर उसके हाथ पर रख दिया।

“गरीब भाई बस इतना ही दे सकता है बहना।”

कहते हुए उसकी आवाज भर्रा गई।

डॉली ने चैक खोलकर देखा।

पचास हजार का चैक था वह—बियरर चैक।

“य....ह....कम हैं?” वह हैरानी से बोली।

“तुम्हारी हैसियत के अनुसार तो कुछ भी नहीं।”

“प्यार से भाई का दिया हुआ आशीर्वाद भी बहन के लिये करोड़ों अरबों का होता है। और तुम तो आशीर्वाद के साथ-साथ पचास हजार भी दे रहे हो।”

“भगवान करे मेरी बहन को किसी की भी नजर न लगे। वो अपने हर मकसद में कामयाब होती रहे और लोगों की भलाई करती रहे—कानून की सेवा करती रहे, और भारत माता की रक्षा करती रहे।”

“काफी लम्बा-चौड़ा आशीर्वाद दे दिया बहन को।”

डॉली हंसी।

रंगीला भी हंस पड़ा।

“खैर....अब तो हमारा बहुत करीबी रिश्ता बन गया है भैया—जब कभी भी तुम्हें मेरी जरूरत महसूस पड़े—बस एक आवाज लगा देना। तुम्हारी बहन दौड़ी चली आयेगी।”

रंगीला ने सिर हिला दिया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“बस....!” डॉली की आवाज भर्रा गई—“वही सिर्फ एक ही बार राखी बांध पाई मैं उसे....दोबारा राखी बांधने का मौका ही नहीं दिया उसने, उससे पहले ही वो....।”

डॉली की आवाज भर्रा कर चुप हो गई।

और सिकन्दर ठाकरे—

वह हैरानी से आंखें फाड़े डॉली को देखे जा रहा था।

उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह वही चुलबुली, सैक्सी, मर्दमार युवती है जिसे वह रोज देखा करता था—या कोई और है।

उसे वह कोई और ही नजर आ रही थी।

जिस डॉली को वह वर्षों से जानता था—वह तो पत्थर-दिल औरत थी—जिसके दिल में भावनाओं के लिये कोई जगह नहीं थी। रिश्ते-नाते उसके लिये कुछ भी नहीं थे।

अगर उसका किसी के साथ कोई रिश्ता था तो कानून के साथ।

मगर इस वक्त वह जिस डॉली को देख रहा था—वह तो कोई और ही नजर आ रही थी। वह वो नजर आ रही थी जिसके सीने में दिल भी था—और उस दिल में भावनायें और संवेदनायें भी थीं।

तभी तो वह अपने उस भाई के लिये रो रही थी जो उसका मुंहबोला भाई था।

ऐसे में जाहिर था उसे हैरत तो होनी थी।

कार की सीट पर बैठे-बैठे ही उसने पहलू बदला और कार ड्राईव कर रही डॉली के चेहरे को देखते हुए बोला—“फिर क्या हुआ?”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी—उल्टे हाथ से अपनी धुंधला रही आंखों को साफ किया और एक बार फिर वह अतीत की गहराइयों में गोते लगाने लगी।

उसके करीब छह महीने बाद एक दिन....।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

कमरे में ट्यूबलाईट का दूधिया प्रकाश फैला हुआ था और कमरे के बीचों-बीच पड़े शानदार डीलक्स साईज के डबलबैड पर डॉली पेट के बल लेटी थी। उसकी दोनों कोहनियां अपने सिरहाने पर टिकी हुई थीं और हाथों में कोई पत्रिका थी जिसे वह पढ़ रही थी।

उसके बदन पर कपड़े का एक रेशा तक नहीं था।

पार्वती उसकी पीठ पर किसी सुगंधित तेल की मालिश कर रही थी।

मालिश करने के साथ-साथ पार्वती उसके संगमरमरी बदन को ललचाई निगाहों से देखे जा रही थी।

हालांकि सैंकड़ों बार उसने डॉली के एक-एक अंग की अपने हाथों से मालिश की थी मगर उसका दिल कभी नहीं भरा। हर बार जब भी वह मालिश करती तो उसका दिल यही करता कि वह हमेशा-हमेशा उसके बदन पर हाथ फेरती रहे।

‘ट्रिन....ट्रिन....।’

तभी बैड की पुश्त पर रखे फोन की घण्टी घनघना उठी।

पत्रिका पर से निगाहें हटाकर डॉली ने गर्दन ऊपर की तरफ टेढ़ी करके फोन को देखा—और फिर एक हाथ ऊपर उठाकर फोन को उठाकर अपने सामने रख रिसीवर उठाया और कान से लगाते हुए बोली—

“हैलो....।”

“मैं भीम....तुम्हारा भाई।”

दूसरी तरफ से रंगीला की भर्राई आवाज सुनकर डॉली चौंक उठी।

“खैरियत तो है भैया?” वह माऊथपीस में बोली।

“तुमने कहा था बहना कि जब भी मुझे तुम्हारी जरूरत पड़े—आवाज लगा लेना। आ....आज तुम्हारे इस बदकिस्मत भाई को तुम्हारी जरूरत पड़ गई है बहन....।”

“क्या हुआ? कुछ बताओ तो सही।”

“तुम फौरन यहां आ जाओ। तुम्हारी जरूरत मुझे ही नहीं....पूरे दीनापुर को है मेरी बहन। प्लीज....।”

डॉली ने गर्दन दाईं तरफ मोड़कर वाल क्लॉक की तरफ देखा।

रात के साढ़े दस बज रहे थे।

“ओ.के.....मैं कल दोपहर तक तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगी।”

“मैं स्टेशन पर....!”

“मैं अपनी गाड़ी में ही आऊंगी....तुम्हारे घर का पता मालूम है मुझे—मैं पहुंच जाऊंगी।”

“मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा।”

“मगर बात क्या है?”

“तुम....आओगी तो तुम्हें सब पता चल जायेगा।”

दूसरी तरफ से रंगीला की आवाज आई और फिर सम्बंध विच्छेद हो गया।

डॉली ने गहरी सांस छोड़ते हुए रिसीवर क्रेडिल पर टिकाया और सीधी होकर बैड की पुश्त से टेक लगा ली। पार्वती ने चुपचाप अपने हाथ पीछे खींच लिये।

“क्या बात है मैडम....किसका फोन था?” वह उसके चेहरे को गौर से देखते हुए बोली।

“मेरे भाई का....!” डॉली ने उसे फोन पर हुई बात बताई, फिर बोली—“मेरे जाने की तैयारी करो....। मेरा भाई मुसीबत में है—इसलिये मेरा फौरन वहां पहुंचना बहुत जरूरी है।”

पार्वती कुछ नहीं बोली—बस बैड से उतर गई।

डॉली भी बैड से उतरी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई।

और फिर—

पौन घण्टे बाद डॉली अपनी सैन्ट्रो ड्राईव करती अपनी आलीशान कोठी के आलीशान गेट से बाहर निकल रही थी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
छह महीने पहले जिस रंगीला को राखी बांधी थी, वो रंगीला डॉली को कहीं से भी नजर नहीं आ रहा था।

जिस रंगीला की सूरत उसके जेहन में थी—अब वह काफी बदली हुई थी।

उसका खिला रहने वाला चेहरा मुरझाया हुआ था—आंखें भीतर को धंसी हुई थीं—बाल बिखरे हुए थे, शेव बढ़ी हुई थी—और ऐसा लग रहा था जैसे वह कई महीनों से नहाया न हो। गर्दन पर जमी हुई मैल स्पष्ट नजर आ रही थी।

डॉली को देखकर पहले तो वह उसे खाली-खाली निगाहों से देखता रहा—फिर वह आगे बढ़ा और उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा।

डॉली चुप रही। बस उसकी पीठ पर थपकी देती रही।

उसने पूछा नहीं कि क्या हुआ? उसकी हालत ऐसे कैसे हो गई?

उसका चेहरा ही बता रहा था कि उसके साथ बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है।

वह अनर्थ क्या था—यह उसे मालूम नहीं था।

इसलिये उसने खुलकर रंगीला को रो लेने दिया—ताकि उसके भीतर का बवाल बाहर आ जाये—उसके पश्चात् ही उसने उससे पूछने का मन बनाया हुआ था।

सुबह आठ बजे वह दीनापुर पहुंची थी और रंगीला के घर पहुंचते-पहुंचते उसे साढ़े आठ बज गये थे।

मगर वह हैरान थी कि अभी तक किसी चाय वाले की भी दुकान तक नहीं खुली। बाजार बन्द मिले उसे—हां—लोगों को इधर-से-उधर जाते अवश्य देखा था उसने—यानि कोई कर्फ्यू वगैरह तो लगा नहीं था—फिर दुकानें क्यों नहीं खुलीं? यही सोचकर वह हैरान हो रही थी। आखिर यह सोचकर कि रंगीला से पूछेगी—उसने अपना ध्यान उधर से हटा लिया।

काफी देर तक रंगीला डॉली से लिपटकर फूट-फूटकर रोता रहा। आखिर वह उससे अलग हुआ और अपनी आंखों को पोंछते हुए वहीं फर्श पर बैठ गया।

“बैठो बहन!” वह एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोला और गहरी सांस छोड़ दी।

डॉली कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गई।

“क्या हुआ?” वह गम्भीर स्वर में बोली।

“सब....सब बर्बाद हो गया।” रंगीला की आवाज एक बार फिर भर्रा गई—“कुछ भी नहीं बचा।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और अपने घुटनों पर कोहनियां टिकाकर आगे को झुकते हुए गम्भीर लहजे में बोली—“तुम्हारी आवाज....तुम्हारा चेहरा ही बता रहा है भैया कि तुम्हें बहुत गहरी चोट लगी है। मगर अगर ऐसे ही रोते रहोगे तो मुझे क्या बताओगे। इसलिये पहले खुद पर काबू पाओ—फिर मुझे बताओ।”

रंगीला ने पुनः अपनी आंखें पौंछीं और दो-तीन गहरी सांस छोड़कर खुद को काबू में करने की कोशिश की, फिर बोला—

“तुम्हारी भाभी—भतीजा-भतीजी....कुछ भी नहीं बचा बहना....इस दुनिया में तुम्हारा यह भाई बिल्कुल अकेला रह गया है....।”

“क्या?” बुरी तरह से चौंक उठी डॉली —“क्या हुआ उन्हें? कोई एक्सीडेंट या....।”

“रैना भद्रा की हवस का शिकार हो गई और....।”

“यह भद्रा कौन है?”

“भद्रानाथ है उसका नाम। इस शहर में कानून की नहीं.....उसकी हुकूमत चलती है। बहुत बड़ा गुण्डा है वो और बहुत ऊंची राजनैतिक पहुंच रखता है।”

“ओह! मगर उससे तुम्हारी क्या दुश्मनी हो गई जो....।”

“मेरी क्या दुश्मनी हो सकती है उससे। मैं तो एक सीधा-सादा व्यापारी हूं—जिसकी दुनिया अपने बीवी-बच्चों तक ही सीमित थी।”

“तो फिर....!”

“वो तो ऐसा पिशाच है जिसकी नजर में जो भी औरत चढ़ गई, बस समझ लो रात को वह उसके बिस्तर पर पहुंच गई।”

“ओह नो।” डॉली ने हैरानी जाहिर की।

“मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूं। साथ ही भद्रानाथ के बारे में भी बताता हूं।”

कहकर रंगीला ने गहरी सांस छोड़ी और अपनी दुखभरी दास्तान डॉली को बताने लगा।

“करीब साल भर पहले भद्रानाथ का आतंक शुरू हुआ था यहां। उससे पहले वह सत्ता पक्ष की पार्टी का एक नेता था जो कि अपने बाहुबल और गुण्डागर्दी के बल पर अपने नेता की चुनावों में मदद करता था, और बदले में उसे अपने नेता से ढेर सारी दौलत मिलती थी।

इस शहर में उसकी दहशत का डंका तब बजा—जब उसने अपने ही नेता को मार डाला। हकीकत का तो किसी को नहीं पता था, मगर बाद में जब विपक्षी नेता ने वकील से उसका केस लड़ा तो हकीकत सामने आ गई।

उस रोज वह अपने नेता, जो कि सत्ता पक्ष का एम.एल.ए. था, के साथ एक नृत्य समारोह में था।”

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

स्टेज पर गायक हाथ में माईक पकड़े गाना गाने के साथ-साथ नाच भी रहा था। और एक अर्धनग्न युवती चमकीले और झिलमिल करते कपड़े पहने उसके साथ नाच रही थी।

साफ पता चल रहा था कि युवती को नाचना बिल्कुल नहीं आता। हां—उत्तेजक मुद्रायें बनाने में वह माहिर थी। बस यूं कह लो कि नाचने के नाम पर वह वहां मौजूद लोगों की भावनाओं को भड़का रही थी।

गायक जाना-माना था सो उसे देखने के लिये लोग भी बहुत आये थे।

सबसे आगे विशिष्ट व्यक्ति कुर्सियों पर विराजमान थे—जिनमें एम.एल.ए. रामरतन भी था।

रामरतन के करीब ही एस.पी., डी.एस.पी. और कुछ गणमान्य व्यक्ति थे।

रामरतन के ऐन पीछे वाली लाईन में उसके ऐन पीछे भद्रानाथ बैठा था।

उस वक्त भद्रानाथ का दबदबा तो बहुत था दीनापुर में मगर वह वहां का अभी बादशाह नहीं बना था।

रामरतन बड़ी तन्मयता से युवती के नृत्य को देख रहा था। गाने के बोल की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं था और न ही वह युवती के पैरों को देख रहा था। वह तो बस उसके थिरकते अंग-प्रत्यंग को देख रहा था।

वह ही क्या—वहां मौजूद हर व्यक्ति की नजर उस युवती पर थी, जो अपनी उत्तेजक मुद्राओं से लोगों को हलकान कर रही थी।

रामरतन के पास बैठे एस.पी. और डी.एस.पी. की निगाहें भी युवती पर थीं।

और जैसे ही गाना खत्म हुआ, लोगों का शोर गूंजने लगा। लोग सीटियां बजाने लगे।

उसी शोर में एक हल्की-सी ‘पिट’ की आवाज उभरी। और उसी के साथ ही रामरतन की गर्दन एक तरफ लटक गई।

उसकी खोपड़ी के पृष्ठ भाग से भल-भल करके खून बहने लगा।

गर्दन लटकी और सीधा एस.पी. के कंधे पर जा लगी।

एस.पी. ने चौंककर रामरतन की तरफ देखा।

तब तक रामरतन के कंधे—उसकी शर्ट खून से लथपथ हो चुके थे।

इतने लोगों के बीच एम.एल.ए. का खून!

पलभर में ही शोर मच गया।

एस.पी. ने बिना कोई वक्त गंवाये भद्रानाथ को दबोच लिया।

चूंकि वह ऐन रामरतन के पीछे बैठा था—और गोली रामरतन की खोपड़ी के पृष्ठभाग में लगी थी—सो सारा संदेह उसी पर जाता था।

स्टेज पर हो रहा कार्यक्रम फौरन बन्द कर दिया गया।

लोग वहां से भागने लगे—और पुलिस ने उस जगह को चारों तरफ से घेर लिया।

कुर्सी पर अभी भी रामरतन की लाश पड़ी थी—और भद्रानाथ को चार सिपाही ऐसे दबोचे हुए थे जैसे उन्हें डर हो कि कहीं वह भाग न जाये।

और भद्रानाथ ऐसे बैठा हुआ था जैसे कुछ हुआ ही न हो।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

‘खट्....खट्....खट्....।’

बूटों की आवाजों ने भद्रानाथ की निगाहें हवालात के सींखचों वाले दरवाजे की तरफ घुमा दीं।

उस वक्त वह हवालात में बैठा हुआ था।

चेहरा अभी भी निश्चिंत था—जैसे कुछ हुआ ही न हो—जबकि वह जानता था कि इस वक्त शहर में क्या हो रहा होगा।

रामरतन के समर्थक पुलिस के कान खा रहे होंगे और जलूस निकालकर ‘भद्रानाथ को फांसी दो’ के नारे लगा रहे होंगे। साथ ही लोग यह भी कह रहे होंगे कि भद्रानाथ तो रामरतन का आदमी था—ऐसे में वह उसका खून कैसे कर सकता है। कुल मिलाकर शहर के हालात विस्फोटक थे, यह वह जानता था।

तभी हवालात के बंद दरवाजे के सामने एस.पी. के साथ इंस्पेक्टर और तीन हवलदार आकर रुके।

“दरवाजा खोलो।” इंस्पेक्टर ने एक हवलदार को आदेश दिया।

तुरंत उस हवलदार ने चाबी से ताला खोला और हवालात का दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया।

हवालात में पहले एस.पी. प्रविष्ट हुआ, उसके पीछे इंस्पेक्टर और उसके पीछे से हवलदार घुसे जो कि आगे बढ़कर भद्रानाथ के दायें-बायें खड़े हो गये।

एस.पी. उसके सामने आकर रुका और गम्भीर स्वर में बोला—“इसमें तो कोई शक नहीं भद्रानाथ कि यह खून तुमने ही किया है?”

“बेशक!” भद्रानाथ बेखौफ बोला—“इतनी जल्दी भला और कौन कर सकता है खून....। रामरतन के पीछे मैं ही तो बैठा हुआ था।”

“तो तुम कबूल करते हो कि खून तुमने ही किया है?”

“हां....करता हूं।”

एस.पी. के चेहरे पर हैरानी उभरी। वह तो यह सोच रहा था कि उसे सख्ती बरतनी पड़ेगी उसका मुंह खुलवाने के लिये। मगर वह तो पहले ही सब बताने के लिये तैयार बैठा था।

“क्यों?” स्वयं की हैरानी पर किसी तरह से काबू पाते हुए एस.पी. ने पूछा—“क्यों किया तुमने ऐसा? जबकि तुम रामरतन के सबसे विश्वसनीय आदमी थे।”

भद्रानाथ के होंठों पर जहरीली मुस्कान फैल गई। मगर वह तुरंत गम्भीर हो गया।

“चार साल पहले का बदला लिया है मैंने।” कहते हुए उसकी आवाज में विषाद भर आया।

“क्या मतलब?”

“मेरी बहन के साथ रेप किया था उस कुत्ते ने—और मेरी बहन को आत्महत्या के लिये मजबूर कर दिया था—लेकिन मरने से पहले मेरी बहन ने मुझे उस कुत्ते के बारे में बता दिया था।”

“ओह!”

“बस मैं मौके की तलाश में जुट गया। मैं जानता था कि मैं उसे सीधे तौर पर नहीं मार सकता—क्योंकि उसे मारने के लिये उसके पास पहुंचना जरूरी था। सो मैंने पहले दीनापुर में अपनी बदमाशी का दबदबा बनाया—और इस तरह मैं रामरतन की आंखों में चढ़ गया। नेताओं को ऐसे बदमाशों की जरूरत होती ही रहती है। इस तरह मैं उसके करीब पहुंचा और फिर धीरे-धीरे मैं उसका इतना बड़ा विश्वास पात्र बन गया कि वह मुझ पर आंख मूंदकर विश्वास करने लगा। अब बस मुझे किसी बढ़िया मौके की तलाश थी....।”

“और वह मौका आज मिला तुम्हें?”

“नहीं....मौका तो आज भी नहीं था। इस तरह तो मैं उसको कई बार मार चुका होता।”

“तो फिर बेमौके क्यों मारा तुमने उसे?”

“तैश में आ गया था मैं—स्टेज पर जो लड़की नाच रही थी—उसे वह पाना चाहता था। इसके लिये उसने बांह पीछे करके मुझे इशारा भी कर दिया था। बस मैं बर्दाश्त नहीं कर सका—मुझे लगा कि वह मुझसे मेरी बहन को मांग रहा है।”

“ओह!”

“बस मैंने रिवॉल्वर निकाली और उसकी खोपड़ी में गोली उतार दी।”

“मगर मुझे तो गोली की आवाज नहीं आई।”

“मैं हमेशा रिवॉल्वर पर साइलैंसर लगाकर रखता था।”

“कहां है वो रिवॉल्वर?”

“वो तो मैंने तुरंत पीछे फैंक दी थी।”

एस.पी. ने गहरी सांस छोड़ते हुए इंस्पेक्टर को देखा और बोला—

“मर्डर वेपन की तलाश की जाये।”

“यस सर।”

“और इसका बयान दर्ज करके चालान काटकर सुबह अदालत में पेश करो।”

“यस सर।” इंस्पेक्टर तत्परता से बोला।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 

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