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करीब एक घण्टे बाद कांशी राणा ने अपनी जिप्सी शहर की सीमा के बाहर निकाली और उसे थोड़ा आगे चलकर एक कच्ची सड़क पर मोड़ दिया।
कच्ची सड़क पर धूल के बादल उड़ाते हुए जिप्सी आगे बढ़ने लगी।
हिचकोले खाते हुए जिप्सी करीब दो किलोमीटर चलकर रुकी तो जिप्सी के साथ-साथ कांशी राणा भी धूल से भरा हुआ नजर आ रहा था।
मगर उसने अपने कपड़ों पर लगी धूल की तरफ ध्यान नहीं दिया।
वह छलांग मारकर जिप्सी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।
चारों तरफ दूर-दूर तक बंजर पड़ी जमीन थी जिसमें जगह-जगह कंटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। बीच-बीच में बड़े-छोटे गड्ढे थे और उनमें से कई बड़े गड्ढों में पानी भरा हुआ था।
उसके दायीं तरफ करीब आधा किलोमीटर दूर एक खंडहर नुमा इमारत थी।
दूर से देखने पर वह कोई मस्जिद नजर आ रही थी।
अपने कपड़ों पर हाथ मारते हुए कांशी राणा उस इमारत की तरफ पैदल ही बढ़ने लगा।
अभी वह इमारत से थोड़ी दूर था कि तभी—
‘धांय....!’
गोली की आवाज गूंजी और उसके पैरों के पास की मिट्टी उखड़कर उछल गई।
कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया, फिर वहीं स्थिर हो गया।
खड़ा होने के साथ ही उसने हाथ भी सिर पर रख लिये और उधर देखने लगा जिधर से गोली चली थी।
तभी एक झाड़ी के पीछे से एक आदमी निकला जो कि ऐ.के. सैंतालीस से लैस था, और उसकी तरफ बढ़ा।
ऐ.के. सैंतालीस का रुख उसी की तरफ था और उंगली ट्रिगर पर दबी हुई थी।
कांशी राणा से कुछ कदम पहले आकर वह रुक गया और गुर्राया—
“कौन है तू?”
“कांशी राणा।” कांशी राणा बिना घबराये बोला—“इंस्पेक्टर कांशी राणा। जगवीर से बोलो कि मैं आया हूं।”
उस आदमी ने अपने बायें हाथ से जेब से वॉकी-टॉकी निकाला और उसका बटन दबाकर मुंह के पास ले जाते हुए बोला—
“इंस्पेक्टर कांशी राणा आया है।....ओ.के.....!”
उसने वॉकी-टॉकी जेब में डाला और कदम पीछे हटाते हुए बोला—“जा।”
कांशी राणा ने हाथ नीचे किये और कदम आगे बढ़ा दिये।
इमारत का ऊपरी गुम्बद मस्जिदनुमा तो था—मगर वो मस्जिद नहीं थी, बल्कि किसी इमारत के खंडहर थे। इमारत की चारदीवारी जगह-जगह से टूट रही थी तथा नीचे जमीन पर छोटी ईंटें जगह-जगह बिखरी हुई थीं।
ऐसे ही एक टूटे हुए स्थान से कांशी राणा भीतर दाखिल हुआ और इमारत के उस हॉल की तरफ बढ़ा जिसके ऊपर गुम्बद बना हुआ था।
उस हॉल के दायें-बायें कुछ और कमरे भी बने हुए थे। और वे सभी खस्ता हाल में थे। बस एक हॉल ही था जो अन्य कमरों से बेहतर नजर आ रहा था।
कांशी राणा हॉल में दाखिल हुआ।
दीवारों की तरह हॉल का फर्श भी छोटी ईंटों का बना हुआ था—दायीं तरफ आदमकद अलमारी दीवार में थी जिसका दरवाजा दीमक ने चट कर डाला था। बस उसके अवशेष ही नजर आ रहे थे, जिसके पीछे दीमक की खाई लकड़ी की शैल्फ लगी थी।
अलमारी के करीब ही साथ वाले कमरे में जाने का रास्ता था।
कांशी राणा ने उस तरफ अभी रुख ही किया था कि तभी हाथ में रिवॉल्वर लिये करीब तेईस-चौबीस साल का लड़का साथ वाले कमरे से निकला।
“हथियार है?” बिना किसी दुआ-सलाम के वह बोला।
“है।” कांशी राणा बोला।
“निकाल!” कहते हुए लड़के ने बायां हाथ आगे बढ़ाया।
कांशी राणा ने चुपचाप अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उसके बढ़े हाथ पर रख दी।
“अब जा!” लड़का उसकी रिवॉल्वर को अपनी पैंट की जेब में डालते हुए बोला।
कांशी राणा उसके बराबर से निकलकर साथ वाले कमरे में प्रविष्ट हो गया।
वह कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे के बीचोंबीच चमगादड़ों के बीट का ढेर लगा हुआ था और ऊपर छत में दर्जनों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके हुए शोर कर रहे थे।
कांशी राणा बीट के ढेर के करीब से निकलकर सामने वाली दीवार के करीब आकर ठिठका और दीवार की तरफ देखने लगा।
लगातार दो मिनट तक वह दीवार को इस तरह देखता रहा जैसे वह अपनी आंखों के सामने दीवार के एक ही हिस्से में कुछ तलाश कर रहा हो।
दो मिनट बाद जैसे चमत्कार हुआ।
दीवार एक तरफ हटने लगी और देखते-ही-देखते उसमें इतनी जगह बन गई कि एक आदमी भीतर प्रवेश कर सके।
कांशी राणा भीतर प्रवेश कर गया।
दायीं तरफ नीचे जा रही सीढ़ियां थीं।
सीढ़ियों की दोनों साइडों की दीवार से रगड़ खाते हुए वह नीचे उतरने लगा।
करीब पंद्रह सीढ़ियां उतरकर उसने स्वयं को एक हॉल में खड़ा पाया।
वह हॉल भी ऊपरी कमरों की तरह छोटी ईंट का बना हुआ था—मगर वह ऊपर की अपेक्षा काफी मजबूत था। एक तरफ दो ट्यूब लाईटें जल रही थीं जो कि बैटरी से चल रही थीं। उनके करीब ही एक दरी बिछी हुई थी जिस पर कि जगवीर एक निहायत ही खूबसूरत युवती के साथ बैठा हुआ था।
जगवीर करीब तीस साल का गोरे रंग का मगर सख्त और क्रूर आंखों वाला व्यक्ति था। जिसके बालों का रंग लाल था और उसने फ्रैंच कट दाढ़ी रखी हुई थी।
उस वक्त वह सिर्फ कच्छा-बनियान पहने हुए था—और उसके बाकी के कपड़े एक तरफ खूंटी पर टंगे हुए थे।
युवती ने नीचे स्कर्ट पहनी हुई थी—और ऊपर सिर्फ ब्रा पहने हुए थी। उसके करीब ही उसकी टॉप पड़ी थी और उसके साथ ही उसका जांघिया पड़ा हुआ था जो साफ बता रहा था कि स्कर्ट के नीचे उसने कुछ नहीं पहन रखा।
“आ राणा....!” कांशी राणा को देखते ही बोला जगवीर—“बैठ।”
कांशी राणा आगे बढ़कर उसके सामने दरी पर बैठ गया।
उसने एक नजर युवती के उभारों पर डाली, फिर पुनः जगवीर को देखने लगा।
“कोई खास खबर?” जगवीर ने पूछा।
“तभी तो आया हूं।”
“बोल।”
“पुलिस को तुम्हारा पता चल चुका है कि तुम इस शहर में हो।”
“क्या?” बुरी तरह से चौंका जगवीर।
“हां।”
“तुझे कैसे पता चला?”
“डॉली आई थी मेरे पास।”
“डॉली ....यह कौन है?”
“उसके आई-कार्ड से वकील ही नजर आ रही थी।”
“कमाल है....एक वकील मेरे बारे में पूछ रही है।” हैरानी जताई जगवीर ने।
“सरकार ने तुम्हें पकड़ने का काम उसे सौंपा है। ऐसे में जाहिर है कि वकील होने के साथ-साथ वह और भी बहुत कुछ है।”
“फिर तूने क्या बताया?”
कांशी राणा ने डॉली से हुई सारी बात उसे बता दी।
“ओह! तो वह नटराज होटल में ठहरी है।”
“हां।”
“दिखने में कैसी है वो?” कहते हुए जगवीर भेद-भरी मुस्कान मुस्कुराया।
कांशी राणा भी मुस्कुरा पड़ा—“बढ़िया है। क्लास—वन।” कहते हुए उसने बाईं आंख दबाई।
“इससे भी....!” जगवीर ने अपने पास बैठी युवती की उंगली दबाई—“बढ़िया है?”
कांशी राणा ने युवती की फीगर पर निगाह मारी—उसकी ब्यूटी को देखा, फिर उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला—
“सच बोलूं?”
“मैं सच ही सुनना चाहता हूं।” जगवीर बोला।
“तो सच है यह जगवीर कि यह डॉली के सामने कुछ भी नहीं।”
सुनकर उस युवती का चेहरा बुझ गया। आंखों में ईर्ष्या के भाव साफ नजर आने लगे।
“बेशक यह”—उसके चेहरे पर फैली नाराजगी को नजरंदाज करते हुए कांशी राणा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“यह बहुत खूबसूरत है। मगर वो....वो है।”
कहकर उसने जगवीर की तरफ देखा।
“कमाल है—ऐसी खूबसूरती को इतने बड़े काम पर लगाया गया है।” जगवीर ने हैरानी जताई—“जबकि खूबसूरत औरत तो कोमल होती है। बहादुरी का तो उससे मीलों दूर का वास्ता नहीं होता। लगता है सरकार को मैं कोई छोटा-मोटा मुजरिम नजर आ रहा हूं—जो उसने किसी खूंखार आदमी की बजाये एक हसीना को मेरे पीछे लगाया है। कोई बात नहीं....हम भी उससे गिरफ्तार होंगे।”
“क्या....?” हड़बड़ाया कांशी राणा।
“हथकड़ियों में नहीं....उसकी जुल्फों में कैद होंगे।”
“ओऽऽ....!” कांशी राणा ने दांत दिखाये—“ऐसी गिरफ्तारी अगर मुझे भी मिल जाये तो....।”
“घबरा नहीं....प्रसाद तुझे भी मिलेगा। आज रात को भोग मैं लगाऊंगा और सुबह पहला प्रसाद तुझे ही मिलेगा।”
कांशी राणा का चेहरा खिल उठा—उसकी आंखों के सामने डॉली का खूबसूरत चेहरा ही नहीं, उसका समूचा बदन—वो भी निर्वस्त्र नाचने लगा।
“क्या नाम बताया था तूने होटल का?”
तभी जगवीर के प्रश्न पर वह हड़बड़ाया और उस शानदार सपने से बाहर निकल आया।
“नटराज!” वह थूक सटककर बोला।
उसकी हालत ही बता रही थी कि डॉली के बारे में सोचकर वह बेतहाशा गर्म हो चुका था।
“कमरा नम्बर?” जगवीर ने पूछा।
कांशी राणा ने बताया।
“ठीक है—अब तू जा....कल तुझे प्रसाद के साथ-साथ बढ़िया इनाम भी मिल जायेगा।”
कांशी राणा ने एक भरपूर निगाह युवती पर डाली।
युवती ने तुनककर मुंह परे फेर लिया। निश्चय ही उसे डॉली की तारीफ बुरी लगी थी।
कांशी राणा ने गहरी सांस छोड़ी और खड़ा हो गया।
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कच्ची सड़क पर धूल के बादल उड़ाते हुए जिप्सी आगे बढ़ने लगी।
हिचकोले खाते हुए जिप्सी करीब दो किलोमीटर चलकर रुकी तो जिप्सी के साथ-साथ कांशी राणा भी धूल से भरा हुआ नजर आ रहा था।
मगर उसने अपने कपड़ों पर लगी धूल की तरफ ध्यान नहीं दिया।
वह छलांग मारकर जिप्सी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।
चारों तरफ दूर-दूर तक बंजर पड़ी जमीन थी जिसमें जगह-जगह कंटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। बीच-बीच में बड़े-छोटे गड्ढे थे और उनमें से कई बड़े गड्ढों में पानी भरा हुआ था।
उसके दायीं तरफ करीब आधा किलोमीटर दूर एक खंडहर नुमा इमारत थी।
दूर से देखने पर वह कोई मस्जिद नजर आ रही थी।
अपने कपड़ों पर हाथ मारते हुए कांशी राणा उस इमारत की तरफ पैदल ही बढ़ने लगा।
अभी वह इमारत से थोड़ी दूर था कि तभी—
‘धांय....!’
गोली की आवाज गूंजी और उसके पैरों के पास की मिट्टी उखड़कर उछल गई।
कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया, फिर वहीं स्थिर हो गया।
खड़ा होने के साथ ही उसने हाथ भी सिर पर रख लिये और उधर देखने लगा जिधर से गोली चली थी।
तभी एक झाड़ी के पीछे से एक आदमी निकला जो कि ऐ.के. सैंतालीस से लैस था, और उसकी तरफ बढ़ा।
ऐ.के. सैंतालीस का रुख उसी की तरफ था और उंगली ट्रिगर पर दबी हुई थी।
कांशी राणा से कुछ कदम पहले आकर वह रुक गया और गुर्राया—
“कौन है तू?”
“कांशी राणा।” कांशी राणा बिना घबराये बोला—“इंस्पेक्टर कांशी राणा। जगवीर से बोलो कि मैं आया हूं।”
उस आदमी ने अपने बायें हाथ से जेब से वॉकी-टॉकी निकाला और उसका बटन दबाकर मुंह के पास ले जाते हुए बोला—
“इंस्पेक्टर कांशी राणा आया है।....ओ.के.....!”
उसने वॉकी-टॉकी जेब में डाला और कदम पीछे हटाते हुए बोला—“जा।”
कांशी राणा ने हाथ नीचे किये और कदम आगे बढ़ा दिये।
इमारत का ऊपरी गुम्बद मस्जिदनुमा तो था—मगर वो मस्जिद नहीं थी, बल्कि किसी इमारत के खंडहर थे। इमारत की चारदीवारी जगह-जगह से टूट रही थी तथा नीचे जमीन पर छोटी ईंटें जगह-जगह बिखरी हुई थीं।
ऐसे ही एक टूटे हुए स्थान से कांशी राणा भीतर दाखिल हुआ और इमारत के उस हॉल की तरफ बढ़ा जिसके ऊपर गुम्बद बना हुआ था।
उस हॉल के दायें-बायें कुछ और कमरे भी बने हुए थे। और वे सभी खस्ता हाल में थे। बस एक हॉल ही था जो अन्य कमरों से बेहतर नजर आ रहा था।
कांशी राणा हॉल में दाखिल हुआ।
दीवारों की तरह हॉल का फर्श भी छोटी ईंटों का बना हुआ था—दायीं तरफ आदमकद अलमारी दीवार में थी जिसका दरवाजा दीमक ने चट कर डाला था। बस उसके अवशेष ही नजर आ रहे थे, जिसके पीछे दीमक की खाई लकड़ी की शैल्फ लगी थी।
अलमारी के करीब ही साथ वाले कमरे में जाने का रास्ता था।
कांशी राणा ने उस तरफ अभी रुख ही किया था कि तभी हाथ में रिवॉल्वर लिये करीब तेईस-चौबीस साल का लड़का साथ वाले कमरे से निकला।
“हथियार है?” बिना किसी दुआ-सलाम के वह बोला।
“है।” कांशी राणा बोला।
“निकाल!” कहते हुए लड़के ने बायां हाथ आगे बढ़ाया।
कांशी राणा ने चुपचाप अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उसके बढ़े हाथ पर रख दी।
“अब जा!” लड़का उसकी रिवॉल्वर को अपनी पैंट की जेब में डालते हुए बोला।
कांशी राणा उसके बराबर से निकलकर साथ वाले कमरे में प्रविष्ट हो गया।
वह कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे के बीचोंबीच चमगादड़ों के बीट का ढेर लगा हुआ था और ऊपर छत में दर्जनों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके हुए शोर कर रहे थे।
कांशी राणा बीट के ढेर के करीब से निकलकर सामने वाली दीवार के करीब आकर ठिठका और दीवार की तरफ देखने लगा।
लगातार दो मिनट तक वह दीवार को इस तरह देखता रहा जैसे वह अपनी आंखों के सामने दीवार के एक ही हिस्से में कुछ तलाश कर रहा हो।
दो मिनट बाद जैसे चमत्कार हुआ।
दीवार एक तरफ हटने लगी और देखते-ही-देखते उसमें इतनी जगह बन गई कि एक आदमी भीतर प्रवेश कर सके।
कांशी राणा भीतर प्रवेश कर गया।
दायीं तरफ नीचे जा रही सीढ़ियां थीं।
सीढ़ियों की दोनों साइडों की दीवार से रगड़ खाते हुए वह नीचे उतरने लगा।
करीब पंद्रह सीढ़ियां उतरकर उसने स्वयं को एक हॉल में खड़ा पाया।
वह हॉल भी ऊपरी कमरों की तरह छोटी ईंट का बना हुआ था—मगर वह ऊपर की अपेक्षा काफी मजबूत था। एक तरफ दो ट्यूब लाईटें जल रही थीं जो कि बैटरी से चल रही थीं। उनके करीब ही एक दरी बिछी हुई थी जिस पर कि जगवीर एक निहायत ही खूबसूरत युवती के साथ बैठा हुआ था।
जगवीर करीब तीस साल का गोरे रंग का मगर सख्त और क्रूर आंखों वाला व्यक्ति था। जिसके बालों का रंग लाल था और उसने फ्रैंच कट दाढ़ी रखी हुई थी।
उस वक्त वह सिर्फ कच्छा-बनियान पहने हुए था—और उसके बाकी के कपड़े एक तरफ खूंटी पर टंगे हुए थे।
युवती ने नीचे स्कर्ट पहनी हुई थी—और ऊपर सिर्फ ब्रा पहने हुए थी। उसके करीब ही उसकी टॉप पड़ी थी और उसके साथ ही उसका जांघिया पड़ा हुआ था जो साफ बता रहा था कि स्कर्ट के नीचे उसने कुछ नहीं पहन रखा।
“आ राणा....!” कांशी राणा को देखते ही बोला जगवीर—“बैठ।”
कांशी राणा आगे बढ़कर उसके सामने दरी पर बैठ गया।
उसने एक नजर युवती के उभारों पर डाली, फिर पुनः जगवीर को देखने लगा।
“कोई खास खबर?” जगवीर ने पूछा।
“तभी तो आया हूं।”
“बोल।”
“पुलिस को तुम्हारा पता चल चुका है कि तुम इस शहर में हो।”
“क्या?” बुरी तरह से चौंका जगवीर।
“हां।”
“तुझे कैसे पता चला?”
“डॉली आई थी मेरे पास।”
“डॉली ....यह कौन है?”
“उसके आई-कार्ड से वकील ही नजर आ रही थी।”
“कमाल है....एक वकील मेरे बारे में पूछ रही है।” हैरानी जताई जगवीर ने।
“सरकार ने तुम्हें पकड़ने का काम उसे सौंपा है। ऐसे में जाहिर है कि वकील होने के साथ-साथ वह और भी बहुत कुछ है।”
“फिर तूने क्या बताया?”
कांशी राणा ने डॉली से हुई सारी बात उसे बता दी।
“ओह! तो वह नटराज होटल में ठहरी है।”
“हां।”
“दिखने में कैसी है वो?” कहते हुए जगवीर भेद-भरी मुस्कान मुस्कुराया।
कांशी राणा भी मुस्कुरा पड़ा—“बढ़िया है। क्लास—वन।” कहते हुए उसने बाईं आंख दबाई।
“इससे भी....!” जगवीर ने अपने पास बैठी युवती की उंगली दबाई—“बढ़िया है?”
कांशी राणा ने युवती की फीगर पर निगाह मारी—उसकी ब्यूटी को देखा, फिर उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला—
“सच बोलूं?”
“मैं सच ही सुनना चाहता हूं।” जगवीर बोला।
“तो सच है यह जगवीर कि यह डॉली के सामने कुछ भी नहीं।”
सुनकर उस युवती का चेहरा बुझ गया। आंखों में ईर्ष्या के भाव साफ नजर आने लगे।
“बेशक यह”—उसके चेहरे पर फैली नाराजगी को नजरंदाज करते हुए कांशी राणा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“यह बहुत खूबसूरत है। मगर वो....वो है।”
कहकर उसने जगवीर की तरफ देखा।
“कमाल है—ऐसी खूबसूरती को इतने बड़े काम पर लगाया गया है।” जगवीर ने हैरानी जताई—“जबकि खूबसूरत औरत तो कोमल होती है। बहादुरी का तो उससे मीलों दूर का वास्ता नहीं होता। लगता है सरकार को मैं कोई छोटा-मोटा मुजरिम नजर आ रहा हूं—जो उसने किसी खूंखार आदमी की बजाये एक हसीना को मेरे पीछे लगाया है। कोई बात नहीं....हम भी उससे गिरफ्तार होंगे।”
“क्या....?” हड़बड़ाया कांशी राणा।
“हथकड़ियों में नहीं....उसकी जुल्फों में कैद होंगे।”
“ओऽऽ....!” कांशी राणा ने दांत दिखाये—“ऐसी गिरफ्तारी अगर मुझे भी मिल जाये तो....।”
“घबरा नहीं....प्रसाद तुझे भी मिलेगा। आज रात को भोग मैं लगाऊंगा और सुबह पहला प्रसाद तुझे ही मिलेगा।”
कांशी राणा का चेहरा खिल उठा—उसकी आंखों के सामने डॉली का खूबसूरत चेहरा ही नहीं, उसका समूचा बदन—वो भी निर्वस्त्र नाचने लगा।
“क्या नाम बताया था तूने होटल का?”
तभी जगवीर के प्रश्न पर वह हड़बड़ाया और उस शानदार सपने से बाहर निकल आया।
“नटराज!” वह थूक सटककर बोला।
उसकी हालत ही बता रही थी कि डॉली के बारे में सोचकर वह बेतहाशा गर्म हो चुका था।
“कमरा नम्बर?” जगवीर ने पूछा।
कांशी राणा ने बताया।
“ठीक है—अब तू जा....कल तुझे प्रसाद के साथ-साथ बढ़िया इनाम भी मिल जायेगा।”
कांशी राणा ने एक भरपूर निगाह युवती पर डाली।
युवती ने तुनककर मुंह परे फेर लिया। निश्चय ही उसे डॉली की तारीफ बुरी लगी थी।
कांशी राणा ने गहरी सांस छोड़ी और खड़ा हो गया।
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