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Thriller हाफ़ मेंटल

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करीब एक घण्टे बाद कांशी राणा ने अपनी जिप्सी शहर की सीमा के बाहर निकाली और उसे थोड़ा आगे चलकर एक कच्ची सड़क पर मोड़ दिया।

कच्ची सड़क पर धूल के बादल उड़ाते हुए जिप्सी आगे बढ़ने लगी।

हिचकोले खाते हुए जिप्सी करीब दो किलोमीटर चलकर रुकी तो जिप्सी के साथ-साथ कांशी राणा भी धूल से भरा हुआ नजर आ रहा था।

मगर उसने अपने कपड़ों पर लगी धूल की तरफ ध्यान नहीं दिया।

वह छलांग मारकर जिप्सी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।

चारों तरफ दूर-दूर तक बंजर पड़ी जमीन थी जिसमें जगह-जगह कंटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। बीच-बीच में बड़े-छोटे गड्ढे थे और उनमें से कई बड़े गड्ढों में पानी भरा हुआ था।

उसके दायीं तरफ करीब आधा किलोमीटर दूर एक खंडहर नुमा इमारत थी।

दूर से देखने पर वह कोई मस्जिद नजर आ रही थी।

अपने कपड़ों पर हाथ मारते हुए कांशी राणा उस इमारत की तरफ पैदल ही बढ़ने लगा।

अभी वह इमारत से थोड़ी दूर था कि तभी—

‘धांय....!’

गोली की आवाज गूंजी और उसके पैरों के पास की मिट्टी उखड़कर उछल गई।

कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया, फिर वहीं स्थिर हो गया।

खड़ा होने के साथ ही उसने हाथ भी सिर पर रख लिये और उधर देखने लगा जिधर से गोली चली थी।

तभी एक झाड़ी के पीछे से एक आदमी निकला जो कि ऐ.के. सैंतालीस से लैस था, और उसकी तरफ बढ़ा।

ऐ.के. सैंतालीस का रुख उसी की तरफ था और उंगली ट्रिगर पर दबी हुई थी।

कांशी राणा से कुछ कदम पहले आकर वह रुक गया और गुर्राया—

“कौन है तू?”

“कांशी राणा।” कांशी राणा बिना घबराये बोला—“इंस्पेक्टर कांशी राणा। जगवीर से बोलो कि मैं आया हूं।”

उस आदमी ने अपने बायें हाथ से जेब से वॉकी-टॉकी निकाला और उसका बटन दबाकर मुंह के पास ले जाते हुए बोला—

“इंस्पेक्टर कांशी राणा आया है।....ओ.के.....!”

उसने वॉकी-टॉकी जेब में डाला और कदम पीछे हटाते हुए बोला—“जा।”

कांशी राणा ने हाथ नीचे किये और कदम आगे बढ़ा दिये।

इमारत का ऊपरी गुम्बद मस्जिदनुमा तो था—मगर वो मस्जिद नहीं थी, बल्कि किसी इमारत के खंडहर थे। इमारत की चारदीवारी जगह-जगह से टूट रही थी तथा नीचे जमीन पर छोटी ईंटें जगह-जगह बिखरी हुई थीं।

ऐसे ही एक टूटे हुए स्थान से कांशी राणा भीतर दाखिल हुआ और इमारत के उस हॉल की तरफ बढ़ा जिसके ऊपर गुम्बद बना हुआ था।

उस हॉल के दायें-बायें कुछ और कमरे भी बने हुए थे। और वे सभी खस्ता हाल में थे। बस एक हॉल ही था जो अन्य कमरों से बेहतर नजर आ रहा था।

कांशी राणा हॉल में दाखिल हुआ।

दीवारों की तरह हॉल का फर्श भी छोटी ईंटों का बना हुआ था—दायीं तरफ आदमकद अलमारी दीवार में थी जिसका दरवाजा दीमक ने चट कर डाला था। बस उसके अवशेष ही नजर आ रहे थे, जिसके पीछे दीमक की खाई लकड़ी की शैल्फ लगी थी।

अलमारी के करीब ही साथ वाले कमरे में जाने का रास्ता था।

कांशी राणा ने उस तरफ अभी रुख ही किया था कि तभी हाथ में रिवॉल्वर लिये करीब तेईस-चौबीस साल का लड़का साथ वाले कमरे से निकला।

“हथियार है?” बिना किसी दुआ-सलाम के वह बोला।

“है।” कांशी राणा बोला।

“निकाल!” कहते हुए लड़के ने बायां हाथ आगे बढ़ाया।

कांशी राणा ने चुपचाप अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उसके बढ़े हाथ पर रख दी।

“अब जा!” लड़का उसकी रिवॉल्वर को अपनी पैंट की जेब में डालते हुए बोला।

कांशी राणा उसके बराबर से निकलकर साथ वाले कमरे में प्रविष्ट हो गया।

वह कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे के बीचोंबीच चमगादड़ों के बीट का ढेर लगा हुआ था और ऊपर छत में दर्जनों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके हुए शोर कर रहे थे।

कांशी राणा बीट के ढेर के करीब से निकलकर सामने वाली दीवार के करीब आकर ठिठका और दीवार की तरफ देखने लगा।

लगातार दो मिनट तक वह दीवार को इस तरह देखता रहा जैसे वह अपनी आंखों के सामने दीवार के एक ही हिस्से में कुछ तलाश कर रहा हो।

दो मिनट बाद जैसे चमत्कार हुआ।

दीवार एक तरफ हटने लगी और देखते-ही-देखते उसमें इतनी जगह बन गई कि एक आदमी भीतर प्रवेश कर सके।

कांशी राणा भीतर प्रवेश कर गया।

दायीं तरफ नीचे जा रही सीढ़ियां थीं।

सीढ़ियों की दोनों साइडों की दीवार से रगड़ खाते हुए वह नीचे उतरने लगा।

करीब पंद्रह सीढ़ियां उतरकर उसने स्वयं को एक हॉल में खड़ा पाया।

वह हॉल भी ऊपरी कमरों की तरह छोटी ईंट का बना हुआ था—मगर वह ऊपर की अपेक्षा काफी मजबूत था। एक तरफ दो ट्यूब लाईटें जल रही थीं जो कि बैटरी से चल रही थीं। उनके करीब ही एक दरी बिछी हुई थी जिस पर कि जगवीर एक निहायत ही खूबसूरत युवती के साथ बैठा हुआ था।

जगवीर करीब तीस साल का गोरे रंग का मगर सख्त और क्रूर आंखों वाला व्यक्ति था। जिसके बालों का रंग लाल था और उसने फ्रैंच कट दाढ़ी रखी हुई थी।

उस वक्त वह सिर्फ कच्छा-बनियान पहने हुए था—और उसके बाकी के कपड़े एक तरफ खूंटी पर टंगे हुए थे।

युवती ने नीचे स्कर्ट पहनी हुई थी—और ऊपर सिर्फ ब्रा पहने हुए थी। उसके करीब ही उसकी टॉप पड़ी थी और उसके साथ ही उसका जांघिया पड़ा हुआ था जो साफ बता रहा था कि स्कर्ट के नीचे उसने कुछ नहीं पहन रखा।

“आ राणा....!” कांशी राणा को देखते ही बोला जगवीर—“बैठ।”

कांशी राणा आगे बढ़कर उसके सामने दरी पर बैठ गया।

उसने एक नजर युवती के उभारों पर डाली, फिर पुनः जगवीर को देखने लगा।

“कोई खास खबर?” जगवीर ने पूछा।

“तभी तो आया हूं।”

“बोल।”

“पुलिस को तुम्हारा पता चल चुका है कि तुम इस शहर में हो।”

“क्या?” बुरी तरह से चौंका जगवीर।

“हां।”

“तुझे कैसे पता चला?”

“डॉली आई थी मेरे पास।”

“डॉली ....यह कौन है?”

“उसके आई-कार्ड से वकील ही नजर आ रही थी।”

“कमाल है....एक वकील मेरे बारे में पूछ रही है।” हैरानी जताई जगवीर ने।

“सरकार ने तुम्हें पकड़ने का काम उसे सौंपा है। ऐसे में जाहिर है कि वकील होने के साथ-साथ वह और भी बहुत कुछ है।”

“फिर तूने क्या बताया?”

कांशी राणा ने डॉली से हुई सारी बात उसे बता दी।

“ओह! तो वह नटराज होटल में ठहरी है।”

“हां।”

“दिखने में कैसी है वो?” कहते हुए जगवीर भेद-भरी मुस्कान मुस्कुराया।

कांशी राणा भी मुस्कुरा पड़ा—“बढ़िया है। क्लास—वन।” कहते हुए उसने बाईं आंख दबाई।

“इससे भी....!” जगवीर ने अपने पास बैठी युवती की उंगली दबाई—“बढ़िया है?”

कांशी राणा ने युवती की फीगर पर निगाह मारी—उसकी ब्यूटी को देखा, फिर उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला—

“सच बोलूं?”

“मैं सच ही सुनना चाहता हूं।” जगवीर बोला।

“तो सच है यह जगवीर कि यह डॉली के सामने कुछ भी नहीं।”

सुनकर उस युवती का चेहरा बुझ गया। आंखों में ईर्ष्या के भाव साफ नजर आने लगे।

“बेशक यह”—उसके चेहरे पर फैली नाराजगी को नजरंदाज करते हुए कांशी राणा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“यह बहुत खूबसूरत है। मगर वो....वो है।”

कहकर उसने जगवीर की तरफ देखा।

“कमाल है—ऐसी खूबसूरती को इतने बड़े काम पर लगाया गया है।” जगवीर ने हैरानी जताई—“जबकि खूबसूरत औरत तो कोमल होती है। बहादुरी का तो उससे मीलों दूर का वास्ता नहीं होता। लगता है सरकार को मैं कोई छोटा-मोटा मुजरिम नजर आ रहा हूं—जो उसने किसी खूंखार आदमी की बजाये एक हसीना को मेरे पीछे लगाया है। कोई बात नहीं....हम भी उससे गिरफ्तार होंगे।”

“क्या....?” हड़बड़ाया कांशी राणा।

“हथकड़ियों में नहीं....उसकी जुल्फों में कैद होंगे।”

“ओऽऽ....!” कांशी राणा ने दांत दिखाये—“ऐसी गिरफ्तारी अगर मुझे भी मिल जाये तो....।”

“घबरा नहीं....प्रसाद तुझे भी मिलेगा। आज रात को भोग मैं लगाऊंगा और सुबह पहला प्रसाद तुझे ही मिलेगा।”

कांशी राणा का चेहरा खिल उठा—उसकी आंखों के सामने डॉली का खूबसूरत चेहरा ही नहीं, उसका समूचा बदन—वो भी निर्वस्त्र नाचने लगा।

“क्या नाम बताया था तूने होटल का?”

तभी जगवीर के प्रश्न पर वह हड़बड़ाया और उस शानदार सपने से बाहर निकल आया।

“नटराज!” वह थूक सटककर बोला।

उसकी हालत ही बता रही थी कि डॉली के बारे में सोचकर वह बेतहाशा गर्म हो चुका था।

“कमरा नम्बर?” जगवीर ने पूछा।

कांशी राणा ने बताया।

“ठीक है—अब तू जा....कल तुझे प्रसाद के साथ-साथ बढ़िया इनाम भी मिल जायेगा।”

कांशी राणा ने एक भरपूर निगाह युवती पर डाली।

युवती ने तुनककर मुंह परे फेर लिया। निश्चय ही उसे डॉली की तारीफ बुरी लगी थी।

कांशी राणा ने गहरी सांस छोड़ी और खड़ा हो गया।

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“नमस्कार....!”

होटल नटराज के डायनिंग हॉल में टेबल पर बैठी खाना खा रही डॉली के कानों में आवाज पड़ी तो उसने गर्दन ऊपर उठाई।

करीब तैंतीस वर्ष का साधारण कद-बुत का व्यक्ति उसके सामने खड़ा था।

डॉली ने प्रश्न-भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा।

“कहिये।” वह बोली।

“अगर मैं गलत नहीं तो आप डॉली जी हैं....।”

उसकी आवाज में इज्जत और श्रद्धा के भाव थे।

“आप....!”

“मेरा नाम रंगीला है।” वह आदमी बोला—“दीनापुर में रहता हूं। आपके मैंने बहुत कारनामे पढ़े-सुने हैं—बहुत ही बड़ी वकील हैं आप....।”

“खाना खायेंगे?” डॉली उसकी बात को काटते हुए बोली।

“ज....जी नहीं।” हड़बड़ाया रंगीला।

“तो फिर मैं खा लूं?”

“ह....हां....आ....प खाइये....स....सॉरी....।”

रंगीला पुनः हड़बड़ाया और उसके सामने से हट गया।

डॉली पुनः डिनर पर झुक गई। रंगीला के उसके सामने से हटते ही उसने उसे अपने दिमाग से निकाल दिया।

हालांकि उसने उसकी आंखों में अपने प्रति इज्जत के भाव देखे थे। जबकि अन्य मर्द हमेशा उसे ललचाई निगाहों से ही देखते थे। मगर उसे किसी की भी परवाह नहीं थी।

खाना समाप्त कर उसने नेपकिन से हाथ पौंछे और खड़ी हो गई।

उसने अपनी रिस्टवॉच में वक्त देखा।

साढ़े नौ बज चुके थे—और कांशी राणा को उसने दस बजे तक का वक्त दे रखा था। सो उसने अपने कमरे में ही जाना उचित समझा।

छठी मंजिल पर कमरा था उसका, सो वह लिफ्ट की तरफ बढ़ी।

लिफ्ट द्वारा वह छठी मंजिल पर पहुंची और बायीं तरफ के गलियारे में आगे बढ़ने लगी।

बायीं तरफ छह कमरे छोड़कर सातवें कमरे के सामने वह रुकी और जेब से चाबी निकालकर उसे की-होल में डाला और चाबी को दायीं तरफ घुमाकर चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गई।

अभी उसने बेड की तरफ दो कदम ही बढ़ाये थे कि उसे वातावरण में जहरीली गैस का आभास हुआ।

सिर एकदम से भारी होने लगा था उसका और दम घुटने लगा था।

“खतरा....!”

फौरन उसके जेहन में यह एक शब्द हथौड़े के समान बजा।

बिजली की-सी फुर्ती से वह पीछे मुड़ी।

लेकिन मुड़ नहीं पाई वह, बल्कि उसके घुटने मुड़ गये। और वह वहीं फर्श पर बिछ गई।

उसकी आंखें तो हरकत कर रही थीं—मगर दिमाग चेतना-शून्य हो गया था। जुबान भी बन्द हो गई थी। ठीक तभी उसके ऐन सामने वाले कमरे का दरवाजा खुला और दो व्यक्ति बाहर निकले।

दोनों ने पहले गलियारे में इधर-उधर देखा।

कोई नजर नहीं आया उन्हें।

तुरंत दोनों आगे बढ़े और डॉली के कमरे में दाखिल हो गये।

आनन-फानन में उन्होंने डॉली को उठाया और सीधा खड़ा कर कमरे से बाहर इस तरह ले आये जैसे किसी शराबी को सम्भालने की कोशिश कर रहे हों वो।

मजे की बात यह थी कि कमरे में फैली जहरीली गैस का उन पर कोई असर नहीं हुआ था।

उसे सम्भाले हुए वे अपने कमरे में आ गये।

“जल्दी से बोतल निकाल।” एक बोला और डॉली की बाजू अपनी गर्दन में डाल उसे सम्भाल लिया। तुरंत दूसरे ने डॉली को छोड़ा और सामने टेबल पर से बोतल उठाकर वापस आया और ढक्कन खोलकर बोतल उसके मुंह से लगा दी।

कुछ शराब डॉली के पेट में गई और कुछ उसके जिस्म पर जा गिरी।

उसने बोतल बन्द कर वापस टेबल पर रखी और आकर डॉली की दूसरी बाजू अपनी गर्दन में पिरो दी।

“अब ठीक है।” पहला बोला—“अब हर कोई यही समझेगा कि इसने बहुत पी रखी है।”

दोनों उसे सम्भाले कमरे से निकले और लिफ्ट की तरफ बढ़े।

लड़खड़ाते हुए घिसटते हुए डॉली उनके साथ चल रही थी।

लिफ्ट द्वारा दोनों हॉल में आये और गेट की तरफ बढ़े।

“कितनी बार कहा है कि ज्यादा न पीया करो।” एक बोला।

“करा दी न हमारी बेइज्जती।” दूसरा बोला।

“अब डॉक्टर उल्टियां करायेगा—तब ठीक होंगी तुम।” पहला बोला।

यह डायलॉग उन्होंने जानबूझ कर कहे थे, ताकि आसपास की टेबलों पर बैठे लोगों को संदेह न हो।

लेकिन कोने की टेबल पर एक शख्स ऐसा था जिसकी आंखों में संदेह साफ नजर आ रहा था।

रंगीला था वह।

अभी थोड़ी देर पहले ही उसने डॉली को ठीक-ठाक खाना खाते देखा था। उससे बात भी की थी उसने और उसे कहीं से भी ऐसा नहीं लगा था कि उसने शराब पी हुई थी। ऐसे में इतनी जल्दी शराब के नशे में कोई चूहा भी टुन्न नहीं हो सकता, फिर वह तो इंसान थी।

और उसे बाहर ले जा रहे दोनों शख्स कौन थे?

उसे इसके पीछे कोई भारी साजिश महसूस हो रही थी।

डॉली के बारे में वह काफी कुछ पढ़ चुका था। उसे पता था कि वह कानून की बेटी के तौर पर जानी-जाती थी और अपराध के प्रति उसे दिली नफरत थी। ऐसे में जाहिर था कि उसने सैंकड़ों दुश्मन बना लिये थे।

कहीं डॉली को ले जाने वाले उसके दुश्मन तो नहीं?

डॉली का फैन तो था ही वह सो अपने फेवरिट को बचाने के लिये वह फौरन टेबल छोड़कर खड़ा हो गया।

उस वक्त दोनों डॉली को सम्भाले गेट के करीब पहुंच चुके थे।

अपनी तरफ से लापरवाही दर्शाते हुए वह टेबलों के बीच से निकलते हुए उनके पीछे-पीछे गेट से निकल गया।

ठीक तभी एक मारुति जेन गेट के सामने आकर रुकी और एक व्यक्ति ड्राइविंग डोर खोलकर बाहर निकला और पिछला दरवाजा खोल दिया।

दोनों में से पहले ने डॉली को छोड़ा और कार की पिछली सीट पर बैठ गया।

तब दूसरे ने डॉली को पिछली सीट पर डाला—जिसे पहले ने भीतर खींच लिया—और फिर दूसरा भी भीतर प्रवेश कर गया।

ड्राईवर बना व्यक्ति पुनः स्टीयरिंग के पीछे बैठा और स्टार्ट कर दी।

जैसे ही कार आगे बढ़ी, ठीक तभी थोड़ी दूरी पर बाईक पर बैठे रंगीला ने भी बाईक स्टार्ट की और कार के पीछे लगा दी।

इधर कार की पिछली सीट पर डॉली पहले वाले व्यक्ति पर गिरी पड़ी थी—जिससे कि उस आदमी के भीतर पल-प्रतिपल आग भड़क रही थी। उसकी सांसें तेज चल रही थीं—और चेहरा लाल-भभूका हो गया था।

उसे ऐसा लगने लगा कि वह अपने साथ लगी आग को और ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पायेगा और जल्दी ही पिघल जायेगा।

जगवीर की तरफ से उन्हें हुक्म था कि उन्हें डॉली के किसी अंग को छूना नहीं। और अभी तक उन्होंने उसको कहीं से भी नहीं छुआ था।

मगर अब....!

अब उसे ऐसा लग रहा था कि मामला उसकी बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

आखिर उसका सब्र जवाब दे ही गया।

उसने चोर निगाहों से अपने साथी की तरफ देखा।

वह सामने देख रहा था।

धीरे से उसका बायां हाथ ऊपर उठा और डॉली के शरीर पर जा पहुंचा।

जैसे ही उसने उसको दबाया—

करंट का तेज झटका लगा उसे।

उसका दिल किया कि वह अभी डॉली को सीट पर गिराये और उसे आगोश में ले ले।

“सम्भल के—।”

तभी उसके कानों में अपने साथी की फुंफकार पड़ी।

सिर से पांव तक कांप उठा वह—और हाथ फौरन नीचे गिर गया।

“म....मैं तो इसे सम्भाल रहा था।

वह हड़बड़ाते हुए अपने साथी से बोला—जो कि उसी की तरफ देख रहा था।

उसके भीतर पक रहा सारा लावा पानी में तब्दील हो चुका था।

“छातियों को पकड़कर सम्भाल रहा था।”

“न....हीं....म....मैंने तो....।”

“अब हाथ ऊपर न उठे।”

कहकर दूसरे ने गर्दन सीधी कर ली।

मन-ही-मन अपने साथी को सौ-सौ गालियां निकालते हुए पहला भी सामने देखने लगा।

डॉली की छातियां अभी भी उसकी बांह से टकरा रही थीं—मगर अब उस पर खौफ की ऐसी चादर पड़ गई थी कि उसे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था।

कार पूरी गति से सड़क पर दौड़ रही थी।

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साढ़े दस बजे कार एक दोमंजिला कोठी के मेन गेट के सामने रुकी।

ड्राईवर ने हॉर्न बजाया।

‘पीं....पीं....!’

तुरंत कोठी का फाटक खुला और कार खुले गेट में प्रवेश कर हाई-वे पर आगे बढ़ने लगी।

गेट खोलने वाले ने तुरंत गेट बन्द कर दिया।

कार कम्पाऊंड के सामने आकर रुकी और उसी के साथ ही दूसरे व्यक्ति ने दरवाजा खोला और बाहर आ गया।

वापस मुड़कर वह झुका और डॉली की बांह पकड़कर उसे बाहर खींच लिया।

पीछे-पीछे पहला भी बाहर आ गया।

डॉली को सम्भाले दोनों कम्पाऊंड में दाखिल हुए और दरवाजे की तरफ बढ़े। तभी कोठी का मेन डोर खुला।

सामने उन्हीं की तरह पच्चीस-छब्बीस वर्ष का युवक था।

डॉली को देख वह एक तरफ हो गया।

दोनों भीतर दाखिल हो गये।

“उस्ताद को फोन कर दे कि शिकार आ गया है।” दूसरा दरवाजा खोलने वाले से बोला।

दरवाजा खोलने वाले ने सिर हिला दिया।

दोनों डॉली को सम्भाले हॉल में आये और सामने वाले कमरे में ले जाकर उसे डबलबेड पर लिटा दिया।

तभी दरवाजा खोलने वाला भीतर प्रविष्ट हुआ।

“फोन किया उस्ताद को?” पहला बोला।

“हां....उस्ताद आ रहा है। उसने कहा है कि इसके कपड़े उतार इसे नंगी कर दो।” उसने डॉली की तरफ इशारा किया—“और इसके हाथ-पैर बांध दो और फिर इसे इंजेक्शन लगा देना।”

सुनकर दोनों ने गहरी सांस छोड़ते हुए एक दूसरे को देखा।

बहुत बड़ा इम्तिहान था यह उनका।

बला-सी खूबसूरत और परियों जैसे हुस्न की मलिका के कपड़े उतारना और कुछ भी न करना—किसी इम्तहान से कम नहीं था। उससे आसान काम तो एवरेस्ट पर चढ़ना था।

मगर जगवीर का हुक्म था।

पालन तो करना ही था उन्हें।

दरवाजा खोलने वाला वापस चला गया।

अब डॉली की बांहें तथा टांगें चौड़ी होकर बेड के पांवों से बंधी हुई थीं—और वह सिर से पांव तक पूरी तरह से निर्वस्त्र थी।

उसकी आंखें सब कुछ देख तो रही थीं—मगर वह कुछ भी करने के काबिल नहीं थी।

“निकाल इंजेक्शन!”

दूसरे ने पहले से कहा।

पहले ने जेब से पहले एक सिरिंज निकालकर उसका रैपर फाड़ा और फिर जेब से एक शीशी निकालकर उसमें से सिरिंज भरी और इंजेक्शन डॉली के कूल्हे पर लगा दिया।

“अब चल....!”

पहला सीधा होते हुए बोला।

“हां....अगर....” दूसरा बोला—“और थोड़ी देर तक खड़े रहे तो एक बार फिर बाथरूम जाना पड़ेगा।” कहकर वह हौले से हंसा।

पहला भी हंसा। और आगे बढ़कर डॉली के कपड़े उठा लिये।

और फिर दोनों ने जी भर के पहले डॉली को देखा—फिर कमरे से बाहर निकल गये।

उसी के साथ ही कमरे का दरवाजा बन्द हो गया।

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इंजेक्शन ने जादू का-सा असर किया।

एक मिनट बीतते-बीतते डॉली पूरी तरह से ठीक हो चुकी थी।

होश में आते ही वह पहले तो हड़बड़ाई, फिर जैसे ही वह उठने को हुई—एक गहरी सांस उसके मुंह से निकल गई। उसे आभास हो गया कि वह बंधी हुई है।

तभी उसे अपने जिस्म पर ठण्डक का अहसास हुआ।

गर्दन उठाते हुए उसने अपने जिस्म पर निगाह मारी।

कपड़े का एक रेशा तक नहीं था उसके बदन पर।

उसे समझते देर नहीं लगी कि वह दुश्मन की कैद में है। और जिस तरह से उसे बेलिबास करके बांधा गया है, उससे दुश्मन की नीयत का साफ पता चल रहा था।

मगर उससे उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। न जाने कितने ही लोगों से वह सम्बन्ध बना चुकी थी। सो दुश्मन की नीयत की तरफ से ध्यान हटाकर वह दुश्मन के बारे में सोचने लगी।

‘कौन हो सकता है वो....जिसने उसे कैद किया हुआ है?’

‘जगवीर।’

फौरन यह नाम उसके जेहन में कौंधा।

लेकिन जगवीर को कैसे पता चला कि वह उसी को पकड़ने यहां आई हुई है? जबकि उसने तो इस ऑपरेशन को गुप्त रखा हुआ था।

फिर उसे पता कैसे चल गया?

‘कांशी राणा।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

एक वही था जिसे उसकी आमद का और आने के मकसद का पता चला था।

‘वो कांशी राणा जगवीर का कुत्ता है।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई और उसी के साथ ही उसके जबड़े भिंचते चले गये। आंखों में कहर उभर आया।

दांतों पर दांत जमाये हुए उसने पूरी शक्ति से अपनी बांहों को झटका दिया।

मगर रस्सी ढीली होने की बजाये और भी टाईट हो गई।

एक ही झटके में वह समझ गई कि जोर-आजमाईश करनी बेकार है।

‘फिर क्या किया जाये?’

उसने मन-ही-मन सोचा।

अब तो दुश्मन के आने के बाद ही कुछ किया जा सकता है।

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

तभी....

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इधर कोठी का गेट बन्द हुआ—उधर रंगीला की बाईक ऐन गेट के सामने आकर रुकी।

सीट पर बैठे-बैठे ही उसने बन्द गेट की तरफ देखा—फिर बाईक को आगे बढ़ाकर थोड़ी दूर ले जाकर बाईक को सड़क से उतारकर वापस कोठी के सामने आ खड़ा हुआ।

इतना तो उसे यकीन हो चुका था कि उसकी फेवरिट डॉली खतरे में है और उसे खतरे से बचाने के लिये वह अपनी जान की बाजी लगाने को भी तैयार था।

कुछ देर तो वह यूं ही कोठी के सामने खड़ा चारदीवारी को देखता रहा—फिर हिम्मत करके चारदीवारी की तरफ बढ़ा।

हथियार के नाम पर उसके पास सुईं तक नहीं थी। फिर भी वह हिम्मत कर रहा था।

उसने चारदीवारी के सिरे को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

चारदीवारी पर चढ़ने के लिये उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी—और इसी मशक्कत में उसके घुटने भी छिल गये थे।

मगर वह कामयाब हो गया था।

उसने चारदीवारी पर लेटकर ही भीतर झांका।

गेट के करीब उसे एक आदमी कुर्सी पर बैठा नजर आया, जिसकी पीठ उसी की तरफ थी।

रंगीला धड़कते दिल से लटककर नीचे उतरा।

वह जानता था कि अगर गेट पर बैठे आदमी ने उसे देख लिया तो उसका बचना नामुमकिन हो जायेगा—तो वह अपनी तरफ से पूरी तरह से चौकन्ना हो अंधेरे में लुकते-छिपते दीवार के साथ लगते हुए आगे बढ़ा और कोठी के बराबर से निकलकर पीछे के लॉन में आ गया।

अंधेरे में दुबककर उसने पीछे का नजारा किया।

कोई भी नजर नहीं आया उसे।

आश्वस्त हो वह कोठी की पिछली साईड की पहली खिड़की के करीब आया—और आहिस्ता से भीतर झांका।

कमरे में उसे तीन आदमी बैठे नजर आये, जो किसी बात पर हंस रहे थे—मगर खिड़की पर लगे शीशे के कारण उसे उनकी हंसी की आवाज नहीं आ रही थी। उनमें से दो तो वही थे जिन्हें उसने होटल में देखा था।

इस वक्त रंगीला का कलेजा धाड़-धाड़ कर उसकी पसलियों से टकरा रहा था।

वह झुका और खिड़की के नीचे से होते हुए आगे बढ़ गया।

अगले कमरे की खिड़की के करीब आकर उसने भीतर झांका।

कमरा पूरी तरह से खाली था।

रंगीला अगले कमरे की तरफ बढ़ा।

तीसरे कमरे की खिड़की में से उसने जैसे ही भीतर झांका—उसका कलेजा उछलकर उसके हलक में आ फंसा। बेड पर निर्वस्त्र बंधी हुई डॉली उसके सामने थी।

डॉली को बेलिबास देखकर भी उसके दिल में कोई गलत भावना नहीं आई।

सीधे होकर उसने सावधानी बरतते हुए पहले इधर-उधर देखा, फिर खिड़की के पट को धकेला।

खुशकिस्मती से पल्ला भीतर से बंद नहीं था।

रंगीला ने राहत की सांस ली और खिड़की में चढ़कर भीतर कूद गया।

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Thriller हाफ़ मेंटल

“लो बॉस —एक पैग लगा लो।”

“ऊहूं....मैं ऐसे नहीं पीयूंगा।”

“तो फिर कैसे पीयेंगे बॉस ?”

“मुर्गा ला साथ में। मुर्गा समझता है न दो टांगों वाला—एक चोंच वाला—लाल रंग का।”

“मैं समझ गया बॉस । मैं अभी लाया।”

कहकर भीमा ने अपने पीछे खड़ी युवती की तरफ इशारा किया जो कि सिर्फ पैंटी और ब्रा पहने हुए थी।

युवती तुरंत वहां से हटी और शीघ्र ही वह वापस लौटी तो उसके हाथ में एक प्लेट थी जिसमें कि भुना हुआ मुर्गा था।

भीमा ने उससे प्लेट ली और सिंहासन नुमा कुर्सी की तरफ मुड़ा जिस पर सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा पहने करीब पचास साल का व्यक्ति बैठा था।

उसका कुर्ता-पायजामा इस कदर मैला हो रहा था मानो कई दिनों से उसने वही पहन रखा हो। जगह-जगह राल टपकने के निशान पड़े हुये थे।

कुर्ता-पायजामा पहने वह शख्स कुणाल ठाकुर था।

कुणाल ठाकुर का इस वक्त का हुलिया बहुत बिगड़ा हुआ था—उसके सफेद बाल उलझ रहे थे—आंखों में सूनापन नजर आ रहा था—दाढ़ी बढ़ी हुई थी और चेहरा पसीने के जम जाने से काला हो रहा था।

गोल चेहरे वाला कुणाल ठाकुर अण्डरवर्ल्ड का बेताज बादशाह था।

उसे जानने वाले कहते हैं कि वह बिहार का रहने वाला था। वहां किसी बात पर उसका पड़ोसी से झगड़ा हो गया और उसने गुस्से में आकर उस पूरे परिवार को ही जिन्दा जला डाला था और फिर वहां से भागकर यहां रामनगर में आकर रिक्शा चलाने लगा।

एक रिक्शा चालक से तरक्की करते-करते आज वह अण्डरवर्ल्ड का डॉन बना हुआ था।

बड़े-बड़े लीडर—पुलिस अफसर उसके दरबार में आकर उसे सलाम करते थे।

वह जिसके भी सिर पर हाथ रख देता—उसका तो समझ लो बेड़ा पार हो गया और जिस पर उसकी नजर टेढ़ी पड़ जाती, समझो उस पर शनि सवार हो गया।

इस वक्त वह अपनी सिंहासन नुमा कुर्सी पर पैर रखे घुटनों को छाती से लगाये कुछ सहमा-सहमा-सा नजर आ रहा था।

उसकी आंखें बता रही थीं कि उसका दिमाग कुछ हिला हुआ है।

भीमा—

गैंडे जैसा सख्त शरीर वाला काले रंग का व्यक्ति उसका बॉडीगार्ड होने के साथ-साथ उसका दायां हाथ भी था।

उसने पैग और प्लेट कुणाल ठाकुर के सामने रखी और उदास स्वर में बोला—

“लीजिये बॉस —मुर्गा भी आ गया।”

अण्डरवर्ल्ड में कुणाल ठाकुर को बॉस के नाम से ही जाना जाता था।

चिकन देखकर कुणाल ठाकुर ऐसे खुश हुआ—जैसे किसी बच्चे को उसकी मनपसंद डिश मिल गई हो।

उसने तुरंत प्लेट में से मुर्गा उठाया और उसकी एक टांग तोड़कर बाकी का मुर्गा प्लेट में वापस रखा और भीमा से पैग लेकर उसकी तरफ देखा।

“खा लूं?” वह ऐसे सिर हिलाकर बोला जैसे खाने की इजाजत मांग रहा हो।

भीमा ने जबरदस्ती होंठों पर मुस्कान लाते हुए इजाजत देने वाले अंदाज में सिर हिलाया।

कुणाल ठाकुर ने टांग को पैग में डुबोया और फिर उसे खाने लगा।

घिन लाने वाली हरकत थी यह उसकी। मगर भीमा के चेहरे पर जरा भी घिन नहीं थी।

“ऐसे तो बड़ा मजा आता है।” वह खुश होते हुए बोला।

“हमें तो बॉस की खुशी चाहिये बस।” भीमा होंठों पर मुस्कान लाते हुए बोला।

टांग खाते हुए ही कुणाल ठाकुर ने सामने देखा—

सात आदमी हाथ बांधे खड़े थे उसके सामने।

वे सभी कुणाल ठाकुर के वफादार थे।

“तुम सब भी मजा लो।” वह टांग आगे कर उन सातों की तरफ घुमाते हुए बोला—“इन सभी को मुर्गा दो और पैग पिलाओ।”

बात करने के दौरान ही दो बार उसके मुंह से थूक निकलकर उसके कपड़ों पर गिरी—साथ ही दांतों द्वारा पिसा हुआ गोश्त भी थोड़ी बहुत मात्रा में टपका।

“जो हुक्म बॉस ।”

भीमा तुरंत बोला और गर्दन पीछे मोड़ अपने पीछे खड़ी युवती की तरफ देखा।

युवती उसके इशारा करने से पहले ही समझ गयी—सो वह तुरंत मुड़ी और हॉल से बाहर निकल गई।

कुणाल ठाकुर टांग को बार-बार शराब में डुबोकर उसे खा रहा था। ऐसे में शराब तथा उसकी राल उसके कपड़ों पर बार-बार गिर रही थी।

थोड़ी देर बाद युवती हाथों में बड़ी ट्रे उठाये वहां पहुंची और भीमा के इशारे पर वहां खड़े सातों आदमियों के सामने जा खड़ी हुई।

ट्रे में सात गिलास शराब से लबालब भरे थे और एक प्लेट में मुर्गे की टांगें रखी थीं। बारी-बारी से सभी एक-एक गिलास और टांग उठाने लगे।

युवती उनके सामने से हटी तो सभी के हाथों में एक-एक गिलास था और दूसरे हाथ में टांग थी।

“खाओ....खाओ! बड़ा मजा आयेगा।”

कुणाल ठाकुर टांग वाला हाथ हिलाते हुए बोला।

सभी सातों ने अपने-अपने हाथ में पकड़ी टांग गिलासों में डुबोई और उसे खाने लगे।

कुणाल ठाकुर अपनी आंखें चमकाते हुए सभी को देख रहा था।

तभी उसकी चमकती आंखों में सहसा ही कहर उभर आया।

चेहरा वीभत्स हो उठा।

उसकी खूंखार हो रही आंखें दायीं तरफ के दूसरे व्यक्ति पर टिकी हुई थीं—जिसका चेहरा ऐसा हो रहा था जैसे उसे मांस को इस तरह खाने से घिन हो रही हो।

सहसा ही कुणाल ठाकुर के हाथ में थमी मुर्गे की टांग उसके हाथ से छूटी और सीधी उस व्यक्ति के मुंह पर जा पड़ी।

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह।

इधर कुणाल ठाकुर ने फौरन जेब से रिवॉल्वर निकाली और—

‘धांय!’

गोली सीधी उस व्यक्ति के सीने में जा धंसी।

हाथ में पकड़ा पैग और मुर्गे की टांग उसके हाथ से छूट गईं और वह सीने को पकड़े औंधे मुंह कटे वृक्ष की तरह फर्श पर जा टकराया।

“साला हरामी—मुंह बना रहा था—!” गुस्से में गुर्राया कुणाल ठाकुर—“इतनी स्वादिष्ट टांग खा रहा था—वो भी फोकट में—फिर भी मुंह बना रहा था।”

सभी के चेहरे सन्न रह गये।

निगाहें उस लाश पर जा अटकीं जो अभी पल भर पहले हाथों में जाम और मुर्गे की टांग पकड़े था।

वही जाम अब कई टुकड़ों में बंटा उसके आसपास बिखरा हुआ था—और मुर्गे की टांग उसके गाल के नीचे दबी हुई थी।

कुणाल ठाकुर ने टांगें लटकाईं और पैरों को फर्श पर टिकाते हुए खड़ा हो गया।

जेब में रिवॉल्वर रखते हुए उसने बाकियों की तरफ देखा।

“तुम क्यों रुक गये—खाओ-खाओ।”

सभी ने तुरंत मुर्गे की टांगें शराब में डुबोईं और ऐसे खाने लगे जैसे वे जिन्दगी में पहली बार ऐसी स्वादिष्ट चीज खा रहे हों।

कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर कमीज की साईड की जेब में डाली और कमीज से हाथ पौंछते हुए लाश की तरफ बढ़ा।

लाश के करीब आकर वह झुका और लाश के गाल के नीचे दबी मुर्गे की टांग को खींचकर उसे अपने बायें हाथ में पकड़े गिलास में डुबोया और चटखारे लेकर खाने लगा।
 
भीमा का दिल कर रहा था कि वह जोर-जोर से रोने लगे। उसका दिल रो भी रहा था—लेकिन अपनी आंखों में आंसू नहीं आने दिये उसने।

कल तक जो कुणाल ठाकुर दूसरों के सामने अपनी जूठन फैंकता था, आज वो किसी दूसरे की जूठन खा रहा था।

वो भी मजे ले-लेकर खा रहा था।

मगर वह बोला कुछ नहीं, मन-ही-मन अपने आंसुओं को पी गया।

जब कुणाल ठाकुर ने टांग खा ली और पैग पी लिया तो भीमा उसके करीब आया और बड़े ही अपनत्व भरे स्वर में बोला—

“आपके सोने का वक्त हो गया है बॉस ।”

“सोने का वक्त हो गया?” आंखें फाड़ते हुए बोला कुणाल ठाकुर।

“हां बॉस ।”

“तो फिर चल—सुला मुझे और बढ़िया-सी लोरी सुनाना।”

“चलो।”

कहकर उसने छहों को लाश उठाने तथा वहां से जाने का इशारा किया और फिर कुणाल ठाकुर को अपने साथ लेकर हॉल के दायीं तरफ के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

वह अर्धनग्न युवती उनके पीछे-पीछे चल रही थी।

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अपने कमरे में फर्श पर बैठा भीमा फर्श पर घूंसे मारे जा रहा था। उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे और चेहरे पर कहर झलक रहा था।

साफ नजर आ रहा था कि वह गुस्से में तो है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा।

भीमा का वह कमरा काफी खूबसूरती से सजा हुआ था।

कमरे के बीचों-बीच शानदार डीलक्स साईज का बेड लगा हुआ था जिस पर कि सफेद सिल्क की चादर बिछी थी।

बेड के करीब ही एक शानदार सोफा सैट था जिसके बीच में सैंटर टेबल पड़ी थी। दायीं तरफ कोने में एक टी.वी. स्टैण्ड पर टी.वी. रखा हुआ था।

पूरा कमरा एयरकंडीशंड था।

मगर वह बैठा हुआ था नंगे फर्श पर और बायें हाथ की हथेली फर्श पर टिकाये दायें हाथ से फर्श पर घूंसे मार रहा था।

तभी कदमों की आहट सुनकर उसने अपना आंसुओं से भरा चेहरा उधर घुमाया।

करीब तेईस-चौबीस साल का अच्छी सेहत और लम्बे कद वाला युवक भीतर प्रवेश कर रहा था।

उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे जो उसकी सारी खूबसूरती को खराब कर रहे थे। वर्ना उसकी पर्सनाल्टी काफी अच्छी थी।

उसके चेहरे पर भी उदासी और गुस्से के मिलेजुले भाव थे।

वह कबीर था, कबीर प्रसाद।

कुणाल ठाकुर का लड़का—उसका लख्ते जिगर।

अपने बेटे को वह कबीर नहीं कबीरा कहकर बुलाता था।

कबीर को देख भीमा की आंखों से बहने वाले आंसुओं में तेजी आ गई।

“छोटे बाबू....!” उसकी आवाज भर्रा गई—“यह क्या हो गया बॉस को?”

“सब ठीक हो जायेगा भीमा अंकल।” उसके करीब आकर गहरी सांस छोड़ी कबीर ने—“सब ठीक हो जायेगा—बस एक बार उस औरत का पता चल जाये जिसने भद्रानाथ चाचू को मारा है। फिर देखना कैसे ठीक होंगे बॉस ।”

“यही तो पता नहीं चल रहा छोटे बाबू।” भीमा फिर से फर्श पर मुक्का मारते हुए बोला—“उसी हरामन की वजह से ही तो बॉस की यह हालत हुई है। एक मामूली-सी औरत भद्रानाथ जी को खत्म कर गई। यही सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाये बॉस —जिसका सीधा असर उनके दिलो-दिमाग पर पड़ा और वे आधे पागल हो गये। जिस भद्रानाथ के सामने बड़े-बड़े सूरमाओं का पेशाब निकल जाता था—उस भद्रानाथ को एक औरत ने मार डाला—कैसे विश्वास किया जा सकता है? बॉस को भी यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ था। मेरी आंखों के सामने आज भी वह दृश्य उभरता है तो मैं सिहर उठता हूं। कितने खुश थे उस दिन बॉस । इनाम बांट रहे थे वे सभी को जब....।”

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“शाबाश मेरे शेर....शाबाश।” कुणाल ठाकुर एक व्यक्ति के सामने खड़ा उसके कंधे पर थपकी दे रहा था—“कमाल कर दिया तूने तो—एक ही झटके में तूने मुझे चार करोड़ का फायदा करा दिया। वो भी बिना कोई खर्च किये।”

“मैं तो आपका एक तुच्छ सेवक हूं बॉस —और मेरा सबसे पहला फर्ज आपकी वफादारी बनता है और दूसरा आपकी तिजोरी भरना।”

“वाह, क्या डायलॉग मारा है।” हंसा कुणाल ठाकुर— “भीमा....!” उसने अपने पीछे खड़े भीमा को पुकारा।

तुरंत भीमा उसके पीछे से निकलकर उसके बराबर आ खड़ा हुआ।

“जी बॉस ।” वह बोला।

“अरे भई—इन्होंने हमारे लिये इतना कुछ किया”—उसने वहां खड़े चार व्यक्तियों की तरफ इशारा किया—“अब हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है न कि हम भी इन्हें कुछ दें।”

“हुक्म करें बॉस ।”

“चारों को पांच-पांच लाख रुपये हमारी तरफ से बतौर इनाम दिये जायें।”

चारों के चेहरे ऐसे खिल गये जैसे उनके भीतर खुशी का पुतला उछलकूद मचा रहा हो।

“जो हुक्म बॉस ।” भीमा बोला।

“तो फिर खड़ा क्यों है, जाकर बीस लाख लेकर आ—हम अपने हाथों से इनाम देंगे इन्हें।”

भीमा ने सिर हिलाया और जैसे ही वह वहां से हटने को हुआ, तभी वहां एक व्यक्ति पहुंचा।

“दीनापुर से एक आदमी आया है बॉस ।” वह सिर को झुकाते हुए बोला—“अपना नाम जैकी बता रहा है और आपसे फौरन मिलना चाहता है।”

दीनापुर का नाम सुनते ही कुणाल ठाकुर का चेहरा खिल उठा।

“जैकी तो अपने यार भद्रा का आदमी है। जा ले के आ उसे।”

वह आदमी वापस मुड़ा और बाहर निकल गया।

शीघ्र ही जैकी हॉल में दाखिल हो उसकी तरफ बढ़ा।

उसकी उखड़ी हुई सांस और घबराया हुआ चेहरा देखकर कुणाल ठाकुर बुरी तरह से चौंक उठा—साथ ही उसके जेहन में अंजान आशंकायें सिर उठाने लगीं।

“क्या बात है?” जैकी के अपने करीब आते ही वह बोला—“मुंह क्यों उतरा हुआ है तेरा—सब खैरियत तो है न?”

सहसा ही जैकी फफकते हुए कुणाल ठाकुर के पैरों में गिर पड़ा।

“हम लुट गये बॉस !” वह उसके पैरों को अपने आंसुओं से धोते हुए बोला—“बर्बाद हो गये।”

उसकी इस हरकत पर बुरी तरह से हड़बड़ा उठा कुणाल ठाकुर।

झुककर उसने उसे कंधों से पकड़कर खड़ा किया और आंसुओं से भीगे चेहरे को देखते हुए गुर्राया—

“क्या हुआ? मेरा यार ठीक तो है न?”

“ब....बॉस नहीं रहे।” जैकी पुनः फफक पड़ा।

कुणाल ठाकुर के पैरों तले से धरती खिसक गयी। भद्रा की मौत की खबर से उसे बहुत ही गहरा सदमा लगा।

“मेरा भद्रा मर....गया?” उसने सिर को अपने दायें कंधे की तरफ झुकाया।

“ह....हां बॉस ।”

“नहीं....तू....तू झूठ बोलता है....बकवास करता है तू। दुनिया की ऐसी कोई ताकत नहीं जो भद्रा का बाल भी बांका कर सके। उसकी ताकत को जानता हूं मैं....वह इतनी आसानी से मरने वाला नहीं। क....कैसे मरा....हार्ट अटैक हुआ क्या उसे?”

“न....हीं....।” रोते हुए बोला जैकी।

“तो क्या उसने खुद को गोली मार ली?”

“न....हीं।”

“तो फिर कैसे मर सकता है वह? क्या मिलिट्री ने तोपखाना लाकर उस पर हमला किया?”

“उन्हें एक लड़की ने मारा था।”

“लड़की ने!” बुरी तरह से उछल पड़ा कुणाल ठाकुर।

“हां बॉस ....बीच चौराहे पर बॉस को उसने पीट-पीटकर मार डाला।”

कुणाल ठाकुर के जेहन को जबरदस्त झटका लगा।

“य....यह क्या कह रहा है तू? एक औरत ने हाथों से पीट-पीटकर भद्रा को मार डाला?”

“ह....हां बॉस ....अ....और मारा भी सैंकड़ों लोगों के बीच।”

“और उसके वफादार कहां थे....तू कहां था उस वक्त?”

“मैं तो बॉस के काम से दिल्ली गया हुआ था। मेरे पीछे ही उस औरत ने न सिर्फ बॉस का साम्राज्य खत्म कर दिया बल्कि बॉस को भी मार डाला।”

“कमाल है....एक मामूली औरत ने भद्रा को मार डाला! वह भद्रा जो अपने एक ही घूंसे से दीवार को तोड़ने की ताकत रखता था—उसे एक औरत ने मार डाला!”

“ह....हां....बॉस ।”

“तो फिर तू जिन्दा क्यों है? भद्रा के साथ तू क्यों नहीं मर गया?”

सहसा ही काले नाग की तरह फुंफकार उठा वह।

कुणाल ठाकुर के इस बदले रूप को देख बुरी तरह से कांप उठा जैकी।

“ब....बॉस ....म....मैं....।”

बात भी पूरी नहीं कर पाया वह कि कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर निकालकर उस पर फायर कर दिया।

‘धांय....!’

गोली सीधी जैकी के कलेजे में जा धंसी।

जैकी जोरों से चीखा और वहीं गिरकर छटपटाने लगा।

तभी कुणाल ठाकुर की रिवॉल्वर उसके चारों वफादारों की तरफ घूमी।

रिवॉल्वर का रुख अपनी तरफ होते देख चारों के तो देवता ही कूच कर गये।

“मेरा यार मर गया....।” कुणाल ठाकुर कहर भरे स्वर में बोला—“एक मामूली औरत ने उसे बीच चौराहे में सैकड़ों लोगों के बीच मार डाला—और तुम्हारी आंखों में एक भी आंसू नहीं आया। जबकि मुझे देखो—मैं रो रहा हूं....मेरा दिल रो रहा है। नहीं, तुम मेरे वफादार नहीं हो सकते—और ऐसे कुत्तों को जिन्दा रहने का कोई हक नहीं।”

कहने के साथ ही वह ट्रेगर दबाता चला गया।

‘धांय....धांय....धांय....धांय....!’

उसकी रिवॉल्वर ने एक के बाद एक चार शोले उगले—और वे चारों कटे वृक्षों की तरह एक-दूसरे से उलझते हुए नीचे गिर पड़े।

बेचारे।

कहां उन्हें पांच-पांच लाख इनाम मिल रहा था और कहां उन्हें सिर्फ एक-एक गोली मिली।

उसने रिवॉल्वर वाली बांह नीचे लटकाई और भीमा की तरफ मुड़ा।

“मैंने इन्हें मारकर ठीक किया न भीमा?”

वह अपनी आंखें चौड़ी करते हुए बोला। उसका निचला होंठ नीचे लटक गया था और वहां से दो बूंदें राल की टपक रही थीं। उसका यह बदला हुआ रूप देखकर भीमा भीतर-ही-भीतर कांप उठा।

साफ नजर आ रहा था कि इस वक्त उसका दिमाग अपने काबू में नहीं है।

और यह सच भी था।

भद्रानाथ की मौत को बर्दाश्त नहीं कर पाया था वह। सहसा झटका लगा था उसे और वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा था।

“ह....हां बॉस ।” भीमा हड़बड़ाते हुए बोला—“अ....आपने बिल्कुल ठीक किया।”

सहसा ही कुणाल ठाकुर की आंखें भर आईं।

“एक लड़की ने—एक मामूली लड़की ने मेरे यार को मार डाला—वो भी सरे बाजार—बीच चौराहे पर। मुझे उस लड़की का नाम पता चाहिये—जरा मैं भी तो देखूं—क्या बला है वो। ऐसी क्या खासियत है उसमें जो उसने मेरे हाथी जैसे ताकतवर यार को मार डाला।”

“जो हुक्म बॉस । अब आप यह रिवॉल्वर मुझे दे दीजिये।”

कहते हुए उसने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

निश्चय ही भीमा को यह डर लग रहा था कि कहीं उस पर फिर से पागलपन का दौरा सवार न हो जाये।

“क्यों?”

गुर्राया कुणाल ठाकुर—साथ ही उसके माथे पर बल पड़ गये।

“रिवॉल्वर खाली हो चुकी है बॉस —इसे लोड भी तो करना है।”

“अभी एक गोली है इसमें....” कहते हुए कुणाल ठाकुर ने रिवॉल्वर उस पर तान दी—“चलाकर दिखाऊं?”

भीमा पहले तो हड़बड़ाया—फिर उसके होंठों पर भीगी मुस्कान फैल गई।

“चलाइये बॉस !” वह बोला—“आपके हाथों मरूंगा तो दिल को तसल्ली तो रहेगी कि मैंने अपनी वफा निभाई।”

“न....न....न....!” कुणाल ठाकुर ने सिर दायें-बायें हिलाया—“बेवकूफ समझता है क्या तू मुझे—अगर तू ही मर गया तो उस हरामन को कौन ढूंढेगा—जिसने मेरे यार को मारा....साली एक मामूली औरत मेरे यार को मार गई।”

वह बच्चों की तरह बिलख पड़ा और वहीं फर्श पर बैठ गया।

आसपास लाशें बिखरी हुई थीं—और वह बार-बार भद्रानाथ को याद करते हुए रो रहा था। साथ ही वह बार-बार वही डायलॉग दोहरा रहा था कि एक मामूली-सी औरत ने उसके यार को मार डाला।
 
“बस उसी दिन से बॉस आधे पागल हो गये।” भर्राये स्वर में कह रहा था भीमा—“कभी एकदम ठीक हो जाते हैं तो कभी पूरे पागल हो उठते हैं। अपना आपा खो बैठते हैं और सामने जो भी होता है उसे खत्म कर देते हैं। डॉक्टर टंडन ने साफ कह दिया है कि जब तक बॉस खुद अपने हाथों से उस औरत को खत्म नहीं करेंगे, तब तक वे ऐसे ही पागल बने रहेंगे। मगर वो औरत है कि उसका पता ही नहीं चल रहा। यहां तक कि उसका नाम भी पता नहीं चल पा रहा। महीना भर से ऊपर हो गया है और अभी तक उस औरत का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा—जबकि मैंने पचास आदमी दीनापुर में उसकी तलाश में लगा रखे हैं। पता नहीं कब उस हरामन का पता चलेगा—कब बॉस उसे मारेंगे और कब वो ठीक होंगे?”

कहते हुए वह दरिंदा फफक पड़ा।

“हौंसला रखो भीमा अंकल।” कबीर उसके करीब बैठते हुए गम्भीर लहजे में बोला—“कभी-न-कभी तो उसका पता चलेगा ही। बस यूं समझ लो कि अभी तक वह अपनी खुशकिस्मती के कारण ही हमारी निगाह में नहीं चढ़ पाई। आखिर कभी तो उसकी बदनसीबी उस पर सवार होगी। और जिस दिन भी ऐसा हुआ—उसी दिन उसका क्रियाकर्म हो जायेगा।”

“पता नहीं कब आयेगा वो दिन?” ठण्डी सांस भरते हुए बोला भीमा।

“आयेगा—जरूर आयेगा। मुझे देखो—मैं तो बॉस का अपना खून हूं। मैं भी तो सब्र रखे हुए हूं।”

“मैं....आप नहीं छोटे बाबू....मैं....।”

बात बीच में ही रह गई भीमा की—उसके मोबाईल की घण्टी बज उठी थी।

‘ट्रिन....ऽ....ऽ....।’

उसने अपनी जेब से मोबाईल फोन निकाला और उसकी स्क्रीन पर निगाह डाली।

“दीनापुर से आया है फोन।” वह चौंकते हुए बोला।

“देखो....किसका फोन है?” कबीर के स्वर में भी हल्की उत्तेजना उभर आई।

भीमा ने ओ.के. का बटन दबाया और मोबाईल कान से लगाते हुए बोला—

“हैलो....!”

“मैं सलीम बोल रहा हूं मास्टर।”

दूसरी तरफ से आती आवाज को सुन भीमा और भी सतर्क हो गया।

सलीम को उसने अन्यों के साथ दीनापुर भेजा हुआ था।

“हां बोल....क्या रिपोर्ट है?” वह बोला—“पता लगा उस औरत का?”

“नहीं मास्टर....!”

भीमा के चेहरे पर निराशा फैल गई।

“फोन क्यों किया?” वह भरे स्वर में बोला।

“वो औरत तो नहीं मिली मास्टर, मगर हमें उस आदमी का पता चल गया है जिसने उस औरत को दीनापुर में बुलाया था।”

“य....यानि वह औरत दीनापुर की नहीं थी?” चौंकते हुए बोला भीमा।

“यस मास्टर।”

“उस आदमी से पूछताछ की?”

“वो यहां नहीं है।”

“क्या मतलब?”

“वो रामनगर में अपनी रिश्तेदार की मौत में गया हुआ है।”

“या....नि वो हरामी यहां आया हुआ है?”

“यस मास्टर?”

“कहां?”

दूसरी तरफ से एक पता बताया गया।

“नाम बोल उसका।”

“भीम....रंगीला।”

भीमा ने आगे कुछ भी सुनने की जरूरत नहीं समझी। तुरंत उसने मोबाईल बन्द किया और फर्श पर खड़ा हो गया।

“क्या कह रहा था सलीम?” कबीर भी उसके साथ खड़ा होते हुए बोला।

भीमा ने उसे सब कुछ बताया। फिर बोला—“अब उस हरामन का पता लगने में देर नहीं लगेगी। मैं रंगीला नाम के उस कुत्ते के हलक में हाथ देकर उगलवा लूंगा कि उसने किसे बुलाया था—बस एक बार पता लगने की देर है—फिर उसे यहां लाने में देर नहीं लगेगी।”

कहते हुए गुस्से से भीमा के नथुने फूलने-पिचकने लगे।

“इस काम को आप ही अंजाम दीजिये भीमा अंकल—रंगीला को लेने आप ही जाइये।”

“वो तो मैं ही जाऊंगा।”

कहते हुए भीमा के मुंह से कुत्ते की-सी गुर्राहट उबली और आंखों में कहर बरसने लगा।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“राम नाम....!”

“सत्य है।”

“सच बोलो।”

“गत है।”

शवयात्रा में एक आदमी ‘राम नाम’ कह रहा था—और बाकी के ‘सत्य है’ बोल रहे थे।

आगे चार आदमी एक अर्थी को कंधा दिये चल रहे थे—उसके आगे करीब बीस-बाईस साल का युवक बनियान और धोती पहने चल रहा था—जिसके हाथ में थाली थी और थाली में जौं के आटे के बने पिंड रखे थे—साथ में एक लोटा था जिसमें से वह थोड़ा-थोड़ा पानी निकालकर छींटें मार रहा था। साथ-साथ वह रोता भी जा रहा था।

अर्थी के पीछे लोगों का हुजूम था।

शवयात्रा उस वक्त कुरानी रोड से निकल रही थी—जब एकाएक एक ओपन जीप सामने से आई और सबसे आगे चल रहे लड़के के सामने आ खड़ी हुई।

थाली पकड़े पानी का छिड़काव कर रहे युवक का रोना एकदम से रुक गया।

अब उसके चेहरे पर आतंक की छाया साफ नजर आ रही थी।

“मा....स्टर।” उसके होंठों से कांपता स्वर निकला।

हां....जीप की ड्राइविंग सीट पर भीमा ही बैठा था। और पीछे की सीटों पर स्टेनगनों से लैस छह आदमी बैठे थे।

युवक के रुकते ही उसके पीछे अर्थी को कंधा दे रहे चारों व्यक्ति भी रुक गये।

युवक की तरह उनके चेहरे भी फक्क पड़े हुए थे—और आंखों में आतंक नजर आ रहा था।

तभी जीप के पीछे बैठे गुण्डे हाथों में स्टेनगन पकड़े छलांग लगाकर नीचे उतरे और युवक के सामने आ खड़े हुए।

“ऐ....नीचे रखो मुर्दे को!” एक गुण्डा गुर्राया।

इन्कार करने की हिम्मत किसमें थी।

तुरंत चारों ने अर्थी को कंधे से उतारा और खड़े हो गये।

भीमा अपनी सीट से उतरा और आगे आकर जीप के बोनट पर आ बैठा।

“सभी को नीचे बिठाओ।” वह गुर्राया।

“सारे नीचे बैठ जाओ।” एक अन्य गुण्डा दहाड़ा।

अर्थी के पीछे चल रहे लोगों को अब तक भीमा का पता चल चुका था—सो वे नीचे बैठने लगे।

तभी एक आदमी खड़ा हुआ और आवेश भरे स्वर में बोला—

“यह कैसी गुण्डागर्दी है जो शवयात्रा के....आ ऽ ऽ ऽ!”

बाकी के शब्द चीख में तब्दील हो गये उसके।

एक गुण्डे ने अपनी गन का मुंह खोल दिया था, और तड़-तड़ करती दर्जनों गोलियां उसकी खोपड़ी में जा समाई थीं। उसका जिस्म जोरों से उछला और आसपास बैठे व्यक्तियों पर जा गिरा।

हड़बड़ाते हुए वे लोग इधर-उधर छितरा गये और वह व्यक्ति लाश में तब्दील हो नीचे सड़क पर गिर गया।

उसकी मौत से भीड़ में से कुछ घुटी-घुटी चीखें जरूर निकली थीं—मगर कोई विरोध करने के लिये खड़ा नहीं हुआ।

हां—आखिर के जो कुछ लोग खड़े थे—वे फौरन नीचे बैठ गये।

इधर सबसे आगे खड़े लड़के ने पीछे देखा—फिर बुरी तरह से थर-थर कांपते हुए भीमा को देखने लगा।

भीमा बोला कुछ नहीं, बस उंगली के इशारे से उसे अपनी तरफ बुलाया।

युवक कांपती टांगों पर किसी तरह अपना वजन सम्भाले उसकी तरफ बढ़ा और उसके सामने आ खड़ा हुआ।

“अभी-अभी जो मरा वो कौन था?” भीमा उसे घूरते हुए बोला।

“म....मेरा प....पड़ोसी था।” युवक के मुंह से कांपता स्वर निकला।

“और जो अर्थी पर पड़ा है वो कौन है? तेरी मां—या बाप?”

“म....मां....!” युवक की आवाज भर्रा गई।

“च....च....च....!” भीमा ने अफसोस जताया।

सहसा ही युवक उसके पैरों को पकड़ रोने लगा।

“म....मेरी मां की मिट्टी खराब मत करो मास्टर! तुम....।”

“घबरा नहीं....कुछ नहीं होगा तेरी मां की मिट्टी को....सीधा खड़ा हो।”

युवक कांपते हुए—आंसू बहाते हुए खड़ा हो गया।

“मुझे बस एक आदमी की तलाश है।” वो ही प्यार से बोला भीमा—“और इस वक्त वो इन्हीं लोगों में है।” उसने दूर तक नजर आ रहे सिरों की तरफ बांह लम्बी की—“बस तू हमें यह बता दे कि वो कहां है—फिर तू अपनी मां की लाश को ले जाकर फूंक सकता है। वर्ना तुझे एक नहीं बल्कि इन सभी की लाशें फूंकनी होंगी।”

युवक ने जोरों से थूक सटकी।

“क....किसकी तलाश है?”

“दीनापुर में कौन रहता है तेरा?”

“मौसी।”

“तेरे मौसा का नाम बोल।”

“भ....रंगीला।”

“बस वही चाहिये मुझे....पीछे मुड़ और बोल....कौन है रंगीला?”

भीमा के कहर के बारे में रामपुर का बच्चा-बच्चा जानता था। रामपुर का शायद ही कोई ऐसा आदमी होगा जिसने सरेआम कत्ल होते न देखा हो। रामपुर में कभी भी कहीं भी कुछ भी अनर्थ हो सकता था—मगर उस अनर्थ का विरोध करने वाला कोई नहीं होता। यहां तक कि पुलिस भी उस अनर्थ को होते देख आंखें मूंद लेती थी।

यूं समझ लो कि एक तरह से जानवरों की जिन्दगी जी रही थी रामपुर की जनता।

किसी की भी जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं था। किसी की भी बहन-बेटी सुरक्षित नहीं थी।

जब भी दिल करता बॉस के गुण्डे आते और किसी भी लड़की को उठाकर ले जाते।

रामपुर में कानून का नहीं बॉस का राज चलता था और भीमा उसका सेनापति—बॉडीगार्ड उसका सब कुछ था—और रामपुर में मास्टर के नाम से जाना जाता था।

जिधर से भी उसकी गाड़ी निकलती—उधर की सड़कें खाली हो जातीं।

ऐसा खौफ था भीमा का।

ऐसे में उस युवक की क्या हालत हो रही थी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था।

अकड़ वह सकता नहीं था।

इन्कार करने का मतलब था मौत और उसके मौसा का पता भीमा ने फिर भी लगा लेना था।

वह नहीं बताता तो उसकी मौत के बाद कोई दूसरा बता देता।

सो वह मुड़ा और लोगों की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया।

सड़क पर बैठे लोग उसकी और भीमा की बातों से अंजान थे—सो उत्सुकता से युवक की ओर देख रहे थे।

युवक की निगाहें भीड़ में से अपने मौसा को ढूंढ रही थीं।

तभी उसकी निगाहें रंगीला पर जा टिकीं।

“मौ....सा जी।” वह भर्राये स्वर में बोला।

तुरंत रंगीला खड़ा हो गया।

“वह है रंगीला?” तभी पीछे से गुर्राया भीमा।

“ह....हां मास्टर।” युवक उसकी तरफ गर्दन मोड़ते हुए थूक सटकते हुए बोला।

भीमा ने तुरंत अपने गनमैनों की तरफ इशारा किया।

उसी वक्त दो गनमैन भीड़ में झपटे।

उन्हें रास्ता देने के लिये बैठे हुए लोग फौरन इधर-उधर गिर पड़े। फिर भी तीन-चार की टांगों को रौंदते हुए वे रंगीला तक जा पहुंचे।

झपटकर एक ने उसके बाल पकड़े और उसे घसीटते हुए बाहर की तरफ बढ़ा।

दूसरा उसके पीछे-पीछे था।

बालों के खिंचने से रंगीला के होंठों से कराहें फूट पड़ीं।

बेदर्दी से उसे लगभग घसीटते हुए वे भीमा के सामने ले आये और फिर उसके बालों को छोड़ दिया गया।

“क....कौन हैं आप लोग?” रंगीला भीमा को देखते हुए हैरानी से बोला—“म....मैं तो आपको जानता तक नहीं—और इस शहर में मैं दस साल बाद आया हूं। फिर ये मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों?”

“रंगीला है न तेरा नाम?” भीमा उसे घूरते हुए गुर्राया।

“हां, मगर....!”

“दीनापुर से आया है न तू?”

“हां....।”

“भद्रानाथ को तो शायद भूल गया होगा तू। महीना भर हो गया है उसे मरे हुए।”

सुनकर रंगीला पहले तो बुरी तरह से चौंका—फिर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“त....तुम....?”

“तेरा चेहरा ही बता रहा है कि भद्रानाथ की मौत का कारण तू ही है। अब बाकी बातें बाद में....डालो इसे गाड़ी में।”

तुरंत गुण्डों ने उसे जकड़ लिया।

भीमा बोनट से उतरा और युवक की तरफ देखते हुए क्रूरता से मुस्कुराया—

“ले जा अपनी मां को फूंकने के लिये।”

कहकर वह जीप की तरफ मुड़ गया।

उसने देखा नहीं कि युवक के चेहरे पर किस तरह के भाव उभर रहे हैं। उसे तो बस रंगीला से मतलब था, जिसे उसने काबू कर लिया था।

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“बॉस ....!”

खर्राटे लेते कुणाल ठाकुर ने हड़बड़ाते हुए ऐसे आंखें खोलीं जैसे वह जागते हुए ही कोई बुरा सपना देख रहा हो। मगर जब उसने सामने खड़े भीमा को देखा तो वह मुस्कुरा पड़ा।

“बड़ा ही शैतान है तू....मुझे ही डरा दिया। डरूं कैसे नहीं....।” वह बैठते हुए उदास हो गया—“जब मेरे यार भद्रा को एक मामूली औरत ने मार डाला—वो भी सैंकड़ों लोगों के बीच तो मैं....।”

“उसी औरत की बात करने आया हूं बॉस ....।”

भीमा उसकी बात काटते हुए बोला।

सुनकर सहसा ही कुणाल ठाकुर के चेहरे पर उत्तेजना फैल गई।

“मुझे बता कौन है वो हरामजादी—नाम बोल उसका।”

“अभी उसका नाम पता नहीं चला।”

“क्या?”

“मगर हमें वो आदमी मिल गया है जो उस औरत को दीनापुर में लेकर आया था। और इस वक्त वह आप ही के जूते खाने का इंतजार कर रहा है।”

“कहां है वो?” फुंफकार उठा कुणाल ठाकुर।

“टार्चर रूम में....कुर्सी से बंधा हुआ है।”

बस और कुछ नहीं पूछा कुणाल ठाकुर ने। वह बेड से उतरा और लगभग भागने वाले अंदाज में भीमा को एक तरफ धकेलते हुए कमरे से निकल गया।

कहीं वह उसे जान से ही न मार दे—यही सोचकर भीमा उसके पीछे भागा। अगर रंगीला मर गया तो फिर उस औरत के बारे में जानना मुश्किल हो जायेगा।

हॉल पार कर वह सामने वाले कमरे में प्रविष्ट हुआ तो कुणाल ठाकुर उसे दायीं तरफ बेसमेंट में जाने वाली सीढ़ियां उतरते नजर आया।

वह भी उसके पीछे-पीछे लपका।

नीचे उतरते ही काफी बड़ा हॉल था—जिसके दायीं तरफ कतार में तीन कमरे बने थे और एक कमरा ऐन सामने था।

कुणाल ठाकुर सामने वाले कमरे की तरफ बढ़ा और उसका दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया। सामने कुर्सी पर रंगीला बैठा था।

उसके दोनों हाथ कुर्सी के हत्थों से जकड़े हुए थे और पैर पायों के साथ बंधे हुए थे।

उसे देखते ही कुणाल ठाकुर पर छाया पागलपन और भी ज्यादा हो गया।

दांत किटकिटाने लगा था वह और लार उसके मुंह से गिरने लगी थी।

तुरंत उसने जेब में हाथ डाला।

शुक्र था कि उसकी जेब में रिवॉल्वर नहीं थी—वर्ना वह तो उसे खत्म ही कर देता।

रिवॉल्वर को अपनी जेब में न पा उसका पागलपन और भी बढ़ गया और वह उसके करीब आकर टूट पड़ा उस पर।

“हरामजादे....सूअर की औलाद....कुत्ते....तूने बुलाया था उस औरत को....मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा—खत्म कर दूंगा तुझे।”

कुछ ही पलों में ही रंगीला लहुलुहान हो गया।

कुणाल ठाकुर के शक्तिशाली घूंसों ने उसके नाक-सिर-ठोड़ी वगैरह फोड़ डाले थे।

और फिर कुणाल ठाकुर ने दोनों हाथों से उसका सिर पकड़ लिया।

उसके करीब खड़ा भीमा बुरी तरह से घबरा गया।

“न....नहीं बॉस ....” वह चीखा—“इसे खत्म नहीं करना।”

कुणाल ठाकुर की जिस्मानी ताकत जानता था वह। और जब कुणाल ठाकुर किसी का सिर दोनों हाथों से पकड़ लेता था तो उस आदमी की मौत निश्चित हो जाती थी। वह सिर्फ एक ही झटका देता था और सामने वाले की गर्दन की हड्डी टूट जाती थी।

तभी तो वह चीखा था।

उसका सिर पकड़े हुए ही कुणाल ठाकुर ने उसकी तरफ गर्दन मोड़ी—

“नहीं....मैं इस हरामखोर को जिन्दा नहीं छोडूंगा। इसने उस औरत को बुलाया था जिसने मेरे यार को मारा था....। और तू कहता है कि मैं इसे खत्म न करूं....लगता है तू भी मेरे दुश्मनों से मिल गया है।” उसके बोलने के दौरान भीमा के चेहरे पर थूकों के इतने छींटे पड़े कि उसका पूरा मुंह ही छींटों से भर गया।

मगर क्या मजाल जो उसके चेहरे पर घिन उभरी हो—या उसने अपना चेहरा साफ किया हो।

हां—दुःख जरूर उभर आया था उसके चेहरे पर।

“आप....आप मुझे जान से चाहे मार डालें बॉस —मेरी बोटी-बोटी कर दें। लेकिन ऐसा कभी न कहना कि मैं दुश्मनों से मिल गया हूं।”

“तो फिर इसे खत्म न करने को क्यों कह रहा है तू?”

“जरा सोचिये....अगर यह मर गया तो हमें उस मामूली औरत का पता कैसे चलेगा जिसने भद्रानाथ जी को मारा था? फिर हम उसे ढूंढेंगे कहां से?”

“अरे....।” कुणाल ठाकुर रंगीला का सिर छोड़ हैरानी से अपनी ठोड़ी के नीचे उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“इसके बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं।”

“तभी तो मैं आपको मना कर रहा था।”

“चल....!” कुणाल ठाकुर एक तरफ हटते हुए बोला—“तू बात कर—पूछ इससे कि उस हरामन को कहां छुपा रखा है इसने?”

भीमा रंगीला के सामने आ खड़ा हुआ।

उसने पहले आस्तीन से अपना थूकों से भरा चेहरा साफ किया फिर कहर भरी निगाह रंगीला के चेहरे पर डाली, जिसके लहूलुहान चेहरे पर पीड़ा के साथ-साथ होंठों पर मुस्कुराहट थी।

उसे मुस्कुराते देख आग-बबूला हो उठा वह।

“हरामजादे मुस्करा रहा है तू!” वह फुंफकारा।

रंगीला के होंठों पर फैली मुस्कान और भी तेज हो गई।

“खामखा ही बांधा मुझे। अरे यह सवाल मुझसे वहां शवयात्रा में भी पूछ लेते तो मैं फौरन उसका जवाब देता।”

भीमा के होंठों पर जहरीली मुस्कान उभर आई।

“ऐसा क्या?”

“बिल्कुल ऐसा....। क्योंकि शैतान उसे तभी याद करता है जब उसे मौत की जरूरत पड़ जाती है और इंसान उसे तब याद करता है जब उसे उसकी मदद दरकार होती है। और इंसान तो तुम हरगिज नहीं हो सकते। जो आदमी—” उसने कुणाल ठाकुर की तरफ देखा—“भद्रा की मौत से पागल हो उठा हो—जो....” उसने भीमा की तरफ देखा—“शवयात्रा में गोली चलाकर किसी की हत्या कर दे, वह इंसान कैसे हो सकता है?”

“बकवास नहीं!” फुंफकारा भीमा—“नाम बोल उसका—कौन है वो हरामजादी?”

“वो हरामजादी नहीं....बल्कि देवी है देवी—और उस देवी का नाम है—डॉली । पता भी बताऊं?”

“बोल....!” चिढ़े स्वर में बोला भीमा।

“मुम्बई चले जाओ। वहां किसी भी बच्चे से, जो बोलना सीख रहा हो, उसका पता पूछ लेना। क्योंकि वहां के बच्चे सबसे पहले मां कहना नहीं सीखते—बल्कि उन्हें डॉली बोलना सिखाया जाता है। इतनी इज्जत है उसकी वहां। और वह तुम्हें या तो अपनी कोठी में मिलेगी या फिर अदालत में। और अगर वह दोनों जगहों पर नहीं मिलती तो समझ लेना कि वो भद्रा जैसे किसी महिषासुर के संहार के लिये निकली हुई है।” कहकर वह पुनः मुस्कुराया—“और कुछ पूछना है?”

भीमा उसके मुस्कुराने से और भी ज्यादा फुंक गया।

उसका दिल तो किया कि वह अभी उसके सिर पर ऐसा घूंसा मारे कि उसका भेजा बाहर आ गिरे। लेकिन उसने ऐसा किया नहीं—बल्कि एक तरफ हटते हुए कुणाल ठाकुर की तरफ देखा।

“क्या नाम बताया इसने उसका?” कुणाल ठाकुर बोला।

“डॉली —मुम्बई में रहती है। आप हुक्म करें तो मैं अभी बिच्छू को उसे लाने के लिये रवाना कर दूं?”

“हां....!” खुश होते हुए कुणाल ठाकुर ने सिर को हिलाया—“तू भेज उन्हें।” कहकर उसने रंगीला की तरफ इशारा किया और बड़ी ही मासूमियत से बोला—“अब मैं इसे खत्म कर दूं?”

मुस्कुराया भीमा।

“अब यह आपका शिकार है बॉस —! मगर इसे मारते समय अपने दिल में यह बात जरूर बिठाये रखना कि भद्रानाथ की मौत में इसका बराबर का हिस्सा था। डॉली को बुलाने वाला यही था।”

यह बात उसने जानबूझकर कही थी ताकि कुणाल ठाकुर के दिमाग में यह बात बैठ जाये और हो सकता था कि रंगीला को मारने के पश्चात् वह कुछ हद तक ठीक हो जाये।

कुणाल ठाकुर आंखें चमकाते हुए रंगीला की तरफ बढ़ा। उसके हाथ आगे की तरफ इस तरह फैले हुए थे जैसे वह उसका गला दबाने के लिये उसकी तरफ बढ़ रहा हो।

उसको पागलों वाले अंदाज में अपनी तरफ बढ़ते देख रंगीला के चेहरे की रंगत पहले तो पीली पड़ी—फिर वह एक गहरी सांस छोड़ते हुए मुस्कुराने लगा।

“एक और महिषासुर के जीवन की उल्टी गिनती शुरू होने जा रही है।” वह बड़बड़ाया—“अब जैसे ही डॉली को पता चलेगा कि मैं मारा गया हूं—वह फौरन यहां पहुंच जायेगी।”

इधर उसके सामने आकर कुणाल ठाकुर रुका और अपनी आंखें चौड़ी करते हुए गुर्राया—

“तो तू है वो हरामी जिसने मेरे यार की मौत को बुलाया था।” थूक की फुहार रंगीला के चेहरे पर पड़ी।

“अब मैं तेरी वो हालत करूंगा कि तू मौत मांगेगा—मगर मैं तुझे मरने नहीं दूंगा। खिलौने की तरह पहले तेरे से खेलूंगा—फिर एक-एक करके तेरे पुर्जे तोडूंगा।”

थूक की फुहार पुनः रंगीला के चेहरे पर पड़ी।

जिस अंदाज से कुणाल ठाकुर बोला था—रंगीला उसी से समझ गया कि वह उसे बहुत ही बुरी मौत मारेगा। और पागल आदमी का क्या भरोसा कि वह कब क्या कर दे।

मौत का डर नहीं था उसे—लेकिन वह बुरी मौत नहीं मरना चाहता था।

सो उसने तुरंत मौत को गले लगाने का रास्ता तलाशा, ताकि उसे कष्ट न उठाना पड़े।

उसने अपने मुंह में ढेर सारा थूक इकट्ठा किया और—

“आक्....थू....।”

ढेर सारा थूक कुणाल ठाकुर के मुंह पर जा पड़ा।

“हरामी के पिल्ले!” वह गुर्राया—“मुंह पर थूकता है। साले बात करनी भी नहीं आती। पागल कहीं का!” एक तो मुंह पर थूक का गिरना—ऊपर से ढेर सारी गालियां।

कुणाल ठाकुर का चेहरा कानों तक लाल हो उठा। गुस्सा सातवें आसमान पर जा चढ़ा।

“तूने मेरे मुंह पर थूका!”

वह कुत्ते की तरह गुर्राया—और अपने दोनों हाथों में उसका सिर पकड़कर एक तेज झटका दिया।

“कड़क्....!” की हल्की-सी आवाज के साथ रंगीला की गर्दन की हड्डी टूट गई और उसका बदन बुरी तरह से हिलने लगा।

“मुझे गाली निकाली तूने।” वह आस्तीन से अपना मुंह पौंछते हुए दहाड़ा और एक जबर्दस्त घूंसा उसकी कनपटी पर रसीद कर दिया।

कुणाल ठाकुर के बाजुओं की ताकत का पता उसके घूंसे से चला।

एक ही घूंसे में रंगीला का भेजा बाहर बिखर गया।

रंगीला दो-चार पल और तड़पा—फिर शांत हो गया।

कुणाल ठाकुर आस्तीन से अपने चेहरे को पौंछते हुए पीछे मुड़ा तो भीमा को सामने खड़ा पाया।

“तूने देखा भीमा”—कुणाल ठाकुर की आवाज भर्रा गई—“इसने मेरे मुंह पर थूका—मुझे गाली निकाली।”

“आपने इसे मारकर ठीक किया बॉस ।”

कहते हुए भीमा ने गहरी सांस छोड़ी। रंगीला की चाल वह समझ गया था। और वह अपनी चाल में सफल भी रहा था। बहुत ही आसान मौत मरा था वह।

मगर वह कुछ कर भी तो नहीं सकता था। कुणाल ठाकुर के गुस्से पर काबू पाना उसके बस की बात नहीं थी। अगर वह पागल न होता तो बात और थी—एक पागल को समझाया नहीं जा सकता था—बस उसकी हां-में-हां ही मिलाई जा सकती थी।

रंगीला को मारकर कुणाल ठाकुर ठीक नहीं हुआ था—बल्कि उस पर पागलपन का भूत और भी गहरा हो गया था।

अब तो बस डॉली ही थी उसका इलाज।

“बिच्छू को बुला।” तभी गुर्राया कुणाल ठाकुर—“उस हरामन को ले के आने का हुक्म मैं खुद दूंगा उसे।”

भीमा कुछ नहीं बोला—बस सिर हिला दिया।

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“इसे उस लड़की का नाम बता भीमा।”

“डॉली ।”

“पता भी बता।”

भीमा ने बिच्छू को डॉली का पता भी बताया।

कुणाल ठाकुर रंगीला की लाश की तरफ पीठ करके बैठा था। उसने अपनी बायीं बांह घुटने पर रखी हुई थी और दायीं हथेली फर्श पर टिकाई हुई थी।

उसके सामने बिच्छू सिर झुकाये खड़ा था। बिच्छू के बराबर में ही भीमा खड़ा था।

बिच्छू करीब पैंतीस साल का गेंडे जैसी गर्दन वाला लम्बा ऊंचा व्यक्ति था।

बेशक उसका रंग गोरा था—मगर उसकी खूंखार आंखें—क्रूर चेहरा उसकी दरिंदगी को साफ जाहिर कर रहे थे।

कुणाल ठाकुर के पेशे में बिच्छू की हैसियत भीमा जैसी तो नहीं थी फिर भी वह उसका एक विश्वसनीय सिपहसालार था।

“नाम-पता सुन लिया?” भीमा के चुप होते ही बोला कुणाल ठाकुर।

“जी बॉस ।” बिच्छू बड़े ही आदर भरे स्वर में बोला।

“तू जानता है डॉली को? पता है कौन है वो? वो....वो वही है जिसने मेरे यार भद्रा को मार डाला।”

कुणाल ठाकुर की आवाज भर्रा गई—आंखों में आंसू भर आये।

“त....तू उसे ले के आ। यहां पर ले के आ—मेरे सामने। ले के आयेगा ना?”

वह ऐसे बोला जैसे वह बिच्छू के सामने गिड़गिड़ा रहा हो।

बिच्छू ने गर्दन उठाई और कुणाल ठाकुर की तरफ देखते हुए बोला—“आप निश्चिंत रहिये बॉस —कल शाम को वह औरत आपके सामने होगी—और आप उसे अपने हाथों से सजा दे रहे होंगे।”

“शाबाश!” कुणाल ठाकुर ने खुश होते हुए ताली बजाई—“मैं उसे अपने हाथों से मारूंगा। एक मामूली औरत ने मेरे यार को मार डाला। जरा मैं भी तो देखूं—कौन है वो। अब जा—ले के आ उसे।”

बिच्छू ने सिर हिलाया और उसकी तरफ पीठ कर ली।

कुणाल ठाकुर ने गर्दन पीछे मोड़ी और रंगीला की लाश को देखते हुए हंसा—

“ही....ही....ही....अब आयेगा मजा—मैं उसे तेरे सामने खत्म करूंगा। ही....ही....ही....।”

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“लगता है आज मैडम कत्लेआम करने जा रहीं हैं।”

पार्वती शीशे में से डॉली को देखते हुए मुस्कुराई—जो कि अपनी टॉप का ऊपरी हुक बन्द कर रही थी।

“वो कैसे?” बड़ी ही शोख अदा से बोली डॉली ।

“अरे मैडम....” पार्वती ने ठण्डी सांस छोड़ी—“ऐसे पहनावे में बाहर निकलेंगी तो फुटपाथों पर लाशें बिछ जायेंगी—जो भी आपको देखेगा अपना दिल थामकर वहीं गिर पड़ेगा।”

डॉली खिलखिलाई और शीशे की तरफ पीठ फेर पार्वती की तरफ मुड़ी।

“औरत अगर श्रृंगार न करे तो मर्द उसे पूछे ही न। मर्दों के बीच औरत की औकात तभी बनती है जब वह ऐसे ही कपड़े पहने—अपनी चाल में नजाकत लाये।”

कहते हुये उसने बड़ी ही अदा से अपने जिस्म को हिलाया और फिर बेड की तरफ ऐसे बढ़ी जैसे रैंप पर कोई मॉडल चल रही हो।

सचमुच उसके कपड़े ऐसे ही थे।

सफेद रंग की शार्ट टॉप। ऐसी कि बस मुश्किल से उसकी आधी छातियां ही ढक पा रही थीं। टॉप के गले के किनारे पर सफेद रंग की ही कढ़ाई की हुई थी—जिसमें उसकी शानदार गुलाबी छातियां और भी ज्यादा खूबसूरत लगने लगी थीं।

बस यूं समझ लो कि टॉप ऊपर से नीचे तक इतनी छोटी थी कि नीचे से अगर टॉप में उंगली डाली जाये तो उंगली टॉप के गले में से नजर आने लगे।

ऐसे ही स्कर्ट थी उसकी।

उसकी जांघों को नहीं बल्कि सिर्फ उसके नितम्बों को ही ढक पा रही थी—या यूं समझ लो कि अपनी पैंटी को छुपाने के लिये उसने वो स्कर्ट पहनी थी।

वह बेड पर बैठी तो स्कर्ट में से उसकी पैंटी नजर आने लगी।

मगर डॉली को भला इसकी परवाह कहां थी। वह झुकी और बेड के नीचे से सफेद रंग के ही ऊंची हील के सैंडिल निकाले और उन्हें पहनने लगी।

सैंडिल के पत्तीनुमा फीते उसके घुटनों तक जाली बनाते हुए पहुंच गये।

सैंडिल पहनकर वह खड़ी हुई—एक नजर अपने आपको शीशे में निहारा—फिर खुद के ही अक्स को आंख मारकर पलट गई।

उसकी इस हरकत पर पार्वती हौले से हंस पड़ी। बोली कुछ नहीं वह।

“मेरा पर्स ले आना।”

डॉली उसकी हंसी को नजरअंदाज करते हुए बोली और अपने कूल्हे मटकाते हुए कमरे से बाहर निकल गई।

कुछ ही देर में वह अपनी आलीशान कोठी के पोर्टिको में खड़ी थी—जिसमें कि आगे-पीछे छः अलग-अलग कम्पनियों की गाड़ियां खड़ी थीं।

उसने अपने लिये मारुति जेन का चुनाव किया और उसका ड्राइविंग डोर खोलकर स्टेयरिंग के पीछे बैठ गई।

उसने कार स्टार्ट की और उसे चलाते हुए ड्राईव-वे पर आ गई जहां कि पार्वती उसका सफेद रंग का पर्स लिये खड़ी थी।

खिड़की में से हाथ निकालकर उसने पर्स लिया और मेन गेट की तरफ बढ़ी जिसके पल्ले मुरारी खोल रहा था।

ऐसे अंग दिखाऊ कपड़े आज उसने शौक से नहीं पहने थे बल्कि उसके पीछे एक वजह थी।

परसों उसने एक खूंखार आतंकवादी को पकड़ा था और इस नेक काम में सिकंदर ठाकरे उसके साथ था। उस आतंकवादी ने यह तो कबूल कर लिया था कि वह आतंकवादी है लेकिन अभी यह नहीं बताया था कि उसके साथी कौन-कौन हैं—और कहां-कहां हैं।

सिकंदर ठाकरे का अभी आधा घण्टा पहले ही उसे फोन आया था—जिसमें उसने अपने हाथ खड़े कर दिये थे कि वह उससे कुछ भी नहीं उगलवा पायेगा। सो डॉली ने उसकी जुबान खोलने का बीड़ा स्वयं उठाया—अपने उसी काम को अंजाम देने के लिये उसने ऐसे कपड़े पहने थे।

सिकंदर ठाकरे के बारे में वह जानती थी कि वह पत्थर को भी मोम बनाने की कुव्वत रखता है—जब ऐसे इंस्पेक्टर ने ही हाथ खड़े कर दिये हों तो जाहिर था कि आतंकवादी काफी सख्तजान है। और ऐसे सख्तजान व्यक्ति को मोम बनाने के लिये उसे शारीरिक नहीं मानसिक रूप से टॉर्चर किया जाता है—और ऐसे कामों का उसे अच्छा-खासा तजुर्बा था। तभी तो वह ऐसे कपड़े पहनकर निकल रही थी।

कार ड्राईव करते हुए वह अभी गेट से निकली भी नहीं थी कि तभी—

‘चीं....ऽ....ऽ....ऽ....!’

ब्रेकों की तीव्र चरमराहट के साथ एक मैटाडोर वैन ऐन उसकी जेन के आगे आ खड़ी हुई।

अगर डॉली फौरन ब्रेक न मार लेती तो अवश्य ही उसकी जेन मैटाडोर से भिड़ जाती।

बस—दो-तीन इंच का फासला ही रह गया था टक्कर होने में।

जिस अंदाज में मैटाडोर उसकी कार के सामने आकर रुकी थी—उसी से डॉली समझ गई थी कि गड़बड़ है। ऐसे में वह सतर्क न हो—ऐसा कैसे हो सकता था।

गेट के करीब खड़ा मुरारी भी सतर्क हो उठा था। साथ ही उसका हाथ उसकी जेब में रखी रिवॉल्वर के दस्ते पर जा टिका था।

तुरंत मैटाडोर के दरवाजे खुले और देखते-ही-देखते उसमें से दस मुस्टंडे बाहर आ गये। उन सबके बाहर आने के पश्चात् ही बिच्छू बाहर निकला।

सभी गुंडे चाकुओं—हथियारों वगैरा से लैस थे।

डॉली भी कार से बाहर आ गई और कार के बोनट से टेक लगाकर खड़ी हो गई।

“ऐ छोकरी....!” तभी बिच्छू उसके करीब आते हुए गुर्राया—“डॉली यहीं रहती हैं?”

कहते हुए उसकी निगाहें डॉली की शानदार छातियों पर जा टिकीं।

“हां....!” मन-ही-मन मुस्कराई डॉली —“क्यों?”

“कहां है वो?”

“तेरे सामने ही तो खड़ी है।”

बुरी तरह से चौंका बिच्छू—फिर उसके होंठों पर व्यंग भरी मुस्कान फैल गई।

“तू....तू डॉली है?” वह हंसा।

“क्यों?” डॉली की मुस्कान तेज हो गई—“क्या मैं डॉली नहीं हो सकती?”

“तू....!” बिच्छू ने उसके आगे बांह लम्बी कर ऊपर से नीचे की—“तू तो मक्खन मलाई है—बिस्तर पर लड़ने की चीज है तू तो....तेरा हुस्न ही बता रहा है कि तू सिर्फ भोगने की चीज है—तोड़ने की नहीं।”

जबकि डॉली के होंठों पर जहर उभर आया।

“मगर तू कौन है?” वह बोली—“और डॉली से क्यों मिलना चाहता है?”

“यह छोकरी तो रास्ता ही नहीं दे रही उस्ताद।” तभी एक गुण्डा बिच्छू से बोला।

“मुझे तो लगता है वो इसकी मां है।” दूसरा बोला।

“क्यों न इसी को काबू में कर लें।” तीसरे ने सलाह दी—“इसकी मां अपने आप ही खुद को हमारे हवाले कर देगी।”

बिच्छू के होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई। अपने साथी का विचार उसे बढ़िया लगा था।

“तू ठीक कह रहा है धनिया!” वह बोला—“बॉस के लिये यह छोकरी बहुत बड़ी औषधि का काम करेगी। काबू कर लो इसे और बांधकर गाड़ी में डाल दो।”

कहते हुए उसने डॉली की तरफ उंगली सीधी की।

“पकड़ इसे!” एक गुण्डे ने हाथ में पकड़ी हॉकी अपने साथी की तरफ बढ़ाई—“यह तो ऐसी कोमल है कि पकड़ना भी आहिस्ता से पड़ेगा कि कहीं हड्डी न टूट जाये।”

अपने साथी को हॉकी पकड़ाकर गुण्डा डॉली की तरफ बढ़ा जो कि पूरी तरह से लापरवाह नजर आ रही बोनट के साथ लगकर खड़ी थी। बांहों को अपने सीने पर बांधे हुए—जैसे कुछ हो ही न रहा हो।

मुरारी को उसने पहले ही इशारा कर दिया था कि वह तब तक कुछ न कहे जब तक कि वह इशारा न करे....सो मुरारी ने हाथ जेब से निकाल लिया था।

इधर गुण्डा डॉली की तरफ बढ़ रहा था—उधर बिच्छू ने मुरारी की तरफ गर्दन घुमाई।

“अपनी मालकिन से बोल कि वह चुपचाप बाहर निकल आये—वर्ना उसकी छोकरी को यहीं गाड़ी में ही सभी रगड़ डालेंगे।”

मुरारी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया—बस चुपचाप खड़ा रहा।

हालांकि उसके शब्दों से उसे गुस्सा तो जरूर आया था—मगर डॉली ने उसे कुछ भी न करने को कह रखा था—सो भीतर-ही-भीतर वह खून का घूंट पीकर रह गया।

“तू पहले मैडम को तो काबू में कर हरामखोर।” वह मन-ही-मन बड़बड़ाया।

“लगता है अपनी छोटी मालकिन की इज्जत लुटते तू अपनी आंखों से देखना चाहता है।” उसे हिलता न देख बोला बिच्छू—“कोई बात नहीं....देख....फिर बाद में चले जाना। और फिर....।”

आगे के शब्द मुंह से नहीं निकल पाये उसके। क्योंकि तब तक गुण्डा डॉली के करीब पहुंच चुका था।

ठीक तभी—

जैसे कोई बिजली चमकी।

डॉली की लम्बी टांग पूरी शक्ति से उसके पेट में पड़ी।

गुण्डा अपने स्थान से उछला और पांच फीट पीछे खड़े अपने साथी से जा टकराया और उसे साथ लिये जमीन पर ढेर हो गया।

ऐसे में बिच्छू के मुंह से शब्द क्या निकलने थे। वह अवाक्-सा डॉली को देखने लगा जो कि उसी तरह से सीने पर हाथ बांधे बोनट के साथ लगकर खड़ी थी।

होंठों पर एक मधुर मुस्कान लिये हुए।

बिच्छू के साथ आये गुण्डे भी स्तब्ध रह गये।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि जिस्म से नाजुक नजर आने वाली वह रूप की रानी इतनी फुर्तीली और शक्तिशाली हो सकती है।

“क्यों मियां?” डॉली बिच्छू को देखते हुए हंसी—“मेरा ख्याल है अब तुझे विश्वास हो गया होगा कि तू डॉली के सामने खड़ा है।”

कहते हुए उसने तीन-चार दफा चुटकी बजाई।

बिच्छू पहले तो हड़बड़ाया, फिर उसका चेहरा भभक उठा।

“तू सचमुच डॉली है।” वह गुर्राया—“अच्छा हुआ जो तूने साबित कर दिया कि तू ही वो है जिसके लिये मैं रामपुर से यहां आया हूं—वर्ना मैं तो तुझे चखकर छोड़ देने वाला था। मगर अब, अब तू चखी नहीं जायेगी—बल्कि मेरे साथ रामपुर जायेगी तू।”

“वो तो मेरी मर्जी पर है कि मैं जाऊंगी कि नहीं। तू यह बता कि तू मुझे वहां ले जाना क्यों चाहता है?”

“चिंता मत कर—वहां पहुंचेगी तो सब पता चल जायेगा। काबू करो इसे।” बिच्छू अपने साथियों से बोला—“बेशक इसकी टांगें ही क्यों न तोड़नी पड़ें—इस पर काबू करो। मगर ध्यान रहे—मरनी नहीं चाहिये यह।”

आदेश सुन गुण्डे हाकियां, छुरे सम्भाले डॉली की तरफ बड़े ही खतरनाक भावों से बढ़े।

डॉली भी अब गम्भीर हो गई—और उसने अपने हाथों को खोल दिया—तथा बोनट से हट गई।

मुरारी भी सतर्क हो उठा—साथ ही उसका हाथ पुनः उसकी जेब में रेंग गया।

दस और एक का मुकाबला था—और एक भी वो जो समाज में कमजोर जाना जाता है।

मगर वह कमजोर नहीं थी।

तभी तो वह उनको धूल चटाने के लिये तैयार खड़ी थी।

गुण्डे उससे कुछ फीट दूर आकर ठिठक गये।

आंखों-ही-आंखों में उनमें इशारे हुए और फिर सभी एक साथ डॉली पर झपटे।

मगर....

कोई छू भी नहीं पाया उसे।

डॉली का बदन रबड़ के गुड्डे की मानिंद उछला और उनके सिरों के ऊपर से होते हुए पीछे सड़क पर लैंड कर गया। गुण्डे आपस में उलझ गये—और इसी उलझन में दो गुण्डे नीचे गिर पड़े।

बाकी तेजी से पीछे पलटे।

ठीक तभी डॉली का जिस्म पुनः उछला और—

‘ठाक्....ठाक्....!’

उसकी दोनों टांगें एक साथ चलीं। और दो गुण्डे सीधा जेन के बोनट पर पीठ के बल गिरे और कलाबाजी खाकर जेन की पिछली साईड में सड़क पर जा गिरे।

इधर डॉली पुनः सड़क पर आ खड़ी हुई थी। और बिच्छू—वह आंखें फाड़े उस अबला को देख रहा था जो इस वक्त उसे किसी बला से कम नजर नहीं आ रही थी।

बाकी के गुण्डे पलभर के लिये हड़बड़ाये, फिर हुंकारें भरते हुए डॉली की तरफ झपटे।

मगर....वह डॉली ही क्या जो उन गुण्डों के काबू में आ जाती।

फिरकनी की तरह घूमी वह और जब वह रुकी तो गुण्डे सड़क पर पड़े नजर आ रहे थे।

“साली....!” चीखा बिच्छू—“हराम की खा-खाकर बस चर्बी ही बढ़ाते जा रहे हो। एक लौंडिया नहीं सम्भाली जा सकती क्या तुमसे—उठो....।”

गुण्डे हड़बड़ाते हुए उठे और पुनः डॉली पर टूट पड़े।

कार के पीछे गिरे गुण्डे भी अपने साथियों में शामिल हो गये।

मगर कोई डॉली को छू भी नहीं पाया। यहां तक कि उनके हथियार भी कुछ नहीं कर पाये—जबकि डॉली की लातें घूंसे उन पर कहर बरपा रहे थे।
 
गुण्डों की चीखें उबल रही थीं और वे एक-एक करके ढेर होते जा रहे थे।

और बिच्छू—वह डॉली को ऐसे देख रहा था जैसे वह दुनिया का आठवां अजूबा देख रहा हो।

हड्डी तो उसे जैसे नजर ही नहीं आ रही थी डॉली के जिस्म में। ऐसे उसका जिस्म मुड़-तुड़ रहा था। और फुर्ती—जैसे बिजली प्रवेश कर गई हो उसमें।

पांच मिनट भी नहीं बीते कि सारे गुण्डे इधर-उधर बिखरे पड़े हांफ रहे थे।

किसी का माथा फट गया था तो किसी की नाक से खून बह रहा था, कोई अपनी टांग की टूटी हड्डी को सहला रहा था तो कोई अपनी टूटी बांह पकड़े हुए था।

उनके हाथों में पकड़े हथियार इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

डॉली ने गर्दन बिच्छू की तरफ मोड़ी और कुटिलता से हंसी।

“तेरी यह फौज तो फुस्स निकली रे—अब तू दिखा अपना दम-खम।”

पलक झपकते ही बिच्छू के हाथ में रिवॉल्वर चमकने लगी।

“मानता हूं तू बड़ी पहुंची हुई चीज है।” वह गुर्राया—“मेरे दस मुस्टंडों को तूने धराशायी कर दिया। मगर अभी मैं बचा हूं। और देख ले—मेरे हाथ में क्या है।” उसने रिवॉल्वर उंगलियों में नचाई—“बस दो गोलियां खर्च होंगी और तेरे घुटने टूट जायेंगे। और....!”

‘धांय....!”

तभी धमाका हुआ और बिच्छू का हाथ फनफना उठा।

रिवॉल्वर उसके हाथ से छूटकर एक तरफ जा गिरी।

हड़बड़ाते हुए उसने अपना हाथ पकड़ लिया और गर्दन दाईं तरफ मोड़ी—जहां मुरारी हाथ में रिवॉल्वर लिये खड़ा था।

“फाऊल-पर-फाऊल किये जा रहा है तू।” वह हंसा—“पहले दस कुत्ते मैडम से भिड़ने के लिये भेज दिये और अब रिवॉल्वर निकाल रहा है।”

ठीक तभी डॉली की टांग चली और बिच्छू चीखता हुआ उछलकर पीछे जा गिरा।

बड़े इत्मिनान से डॉली ने उसका रिवॉल्वर उठाया और उसे अपने चेहरे के पास ले जाते हुए बोली—

“यह बच्चों के खेलने की चीज नहीं है! घोड़ा दब जाये तो जान निकल जाती है।”

कहने के साथ ही उसने रिवॉल्वर का रुख उसकी तरफ किया और—

‘धांय....धांय....धांय....!'

रिवॉल्वर से पटाखे छूटने लगे।

गोलियां बिच्छू के सिर से बस एक आधा इंच दूर ही सड़क को उखाड़ने लगीं—और बजरी उड़कर उसके सिर से टकराने लगी।

बिच्छू को काटो तो खून नहीं।

अपनी मौत उसे सामने नजर आ रही थी।

राहत की सांस उसने तब छोड़ी जब रिवॉल्वर खाली हो गई।

उसने थोड़ा उठकर पीछे सड़क पर देखा।

जहां उसका सिर था—वहां उसके चारों तरफ छह गड्ढे बने हुए थे।

उसने डॉली की तरफ देखा—जिसके होंठों पर विषैली मुस्कान थी।

“चाहती तो बड़े आराम से यही छह गोलियां तेरे भेजे में उतार सकती थी।” वह बोली—“मगर अभी तुझे मेरे सवालों के जवाब देने हैं—इसी वजह से तू अभी तक जिन्दा है। और फिलहाल मेरे पास अभी इतना वक्त नहीं—सो आकर तेरे से बात करूंगी।”

कहने के साथ ही उसने अपनी टांग चला दी।

ठोकर सीधी उसकी कनपटी पर पड़ी और वह वहीं लम्बा हो गया।

“इसे उठाकर अन्दर ले जाओ मुरारी।” वह बोली।

मुरारी तुरंत बेहोश पड़े बिच्छू की तरफ लपका।

डॉली घायल पड़े गुण्डों से मुखातिब हुई—

“फौरन दफा हो जाओ यहां से—अगर मेरे तीन गिनने तक मुझे यहां कोई भी नजर आया तो अपनी मौत का वह खुद जिम्मेदार होगा।”

डॉली की इस गर्जना ने सभी के कलेजे दहला दिये। जिनकी हड्डियां टूटी हुई थीं, वे पीड़ा की परवाह न करते हुए घिसटते हुए गिरते-पड़ते मैटाडोर की तरफ लपके।

“एक....!” डॉली दहाड़ी।

गुण्डे बुरी तरह से हड़बड़ाये और मैटाडोर में घुसने लगे।

“दो....!”

तीन कहने की नौबत नहीं आई।

गुण्डे वहां से ऐसे भागे जैसे गधे के सिर से सींग।

डॉली हौले से हंसी और जेन की तरफ बढ़ गई।

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