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Thriller हाफ़ मेंटल

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मारुति जेन थाने के गेट में प्रविष्ट हुई और प्रांगण में दायीं तरफ जाकर खड़ी हो गई।

डॉली ने दरवाजा खोला और अपना पर्स सम्भाले बाहर आ गई।

ठीक तभी हवलदार खुशीराम लगभग भागते हुए उसके करीब आया और माथे पर उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“जय हिन्द डॉली जी।”

दरवाजा बन्द कर डॉली उसकी तरफ मुड़ी और मुस्कुराई—

“कैसे हो खुशीराम?”

“आपकी मेहरबानी से ठीक हूं।”

“तुम्हारी बीवी कैसी है?”

“आपको बहुत याद कर रही है। जब से उसे पता चला है कि आप ही की मदद से वह बची है—तभी से वह बस आप ही को याद कर रही है। अगर आप वक्त पर मुझे पचास हजार नहीं देतीं तो....।” आवाज भर्रा गई उसकी।

“रिलेक्स खुशीराम....!” डॉली ने उसके कंधे पर थपकी दी—“अगर वो तुम्हारी पत्नी है तो मेरी भी तो भाभी हुई—हुई न?”

भावुक होते हुए खुशीराम ने अपना सिर हिला दिया।

“ठाकरे....!”

“साहब अपने आफिस में बैठे हैं।”

डॉली मुस्कुराई और सिकंदर ठाकरे के ऑफिस की तरफ बढ़ गई।

जैसे ही वह अपने ऑफिस में प्रविष्ट हुई—

“वल्लाह....लगता है आज मैडम कत्ल करने के इरादे से आई हैं।”

अपनी कुर्सी पर बैठा सिकंदर ठाकरे चहका।

डॉली एक कातिल हंसी हंसी—और आगे बढ़कर विजिटर चेयर पर बैठ गई।

“अजी जनाब—हम तो कब से पिघलने को तैयार हैं।” बड़े ही आशिकाना अंदाज में उसने सीने पर हाथ मारा—“बस तुम इशारा कर दो।”

डॉली ने मुस्कुराते हुए एक ठण्डी आह भरी। और अपनी बायीं छाती पर हाथ रखते हुए बोली—

“यह तन तो न जाने कब से तुम्हारे साथ बिछने को तड़प रहा है। मगर तुम ऐसे निर्दयी हो कि एक अबला की आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”

“यह कैसी बात कर रही हो तुम....तुम हां तो करो—फिर देखो—कैसे अपने जलवे दिखाता हूं।”

सिकंदर ठाकरे ने अपना सीना चौड़ा करते हुए बायीं आंख दबाई।

“हाऽऽऽ....!” डॉली ने सीने पर हाथ रखते हुए ठण्डी आह भरी—“मैं तो कब से तुम्हारे जलवे देखने को तरस रही हूं....मगर....!”

“मगर क्या?”

“तुम हो कि मेरी एक छोटी-सी आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”

“अरे मेरी जान—तुम मांगो तो सही—जान भी हाजिर है।”

“तुम्हारी जान नहीं चाहिये मुझे।”

“तो?”

“बस....नाक के नीचे जो झाड़ियां तुमने उगा रखी हैं वो....।”

“मूंछ नहीं मुंडाऊंगा।” दहाड़ उठा सिकंदर ठाकरे—साथ ही उसका हाथ अपने मुंह पर जा चिपका।

ठीक तभी एक सिपाही चाय की ट्रे लेकर भीतर दाखिल हुआ।

सिकंदर ठाकरे की दहाड़ उसने भी सुन ली थी—तभी तो वह हड़बड़ा उठा था—फिर हैरानी से ठाकरे को देखने लगा था।

हड़बड़ाया सिकंदर ठाकरे भी था—मगर उसने अपनी हड़बड़ाहट जाहिर नहीं होने दी—बस मुंह से हाथ हटाया और चेहरे को गम्भीर बनाते हुए बोला—

“रख दो।”

सिपाही ने आगे बढ़कर टेबल पर चाय रखी और खाली ट्रे उठाके बाहर आकर उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये और एक तरफ बढ़ गया।

सिकंदर ठाकरे की मूंछें न मुंडाने की दहाड़ का मतलब वह बिल्कुल भी नहीं समझ सका था।

अब उसे क्या पता कि उन दोनों के बीच कैसा रिश्ता है।

इधर ऑफिस में डॉली उसके जाते ही हौले से हंसी और चाय का कप उठा लिया।

सिकंदर ठाकरे भी मुस्कुराया और सिर पर हाथ फेरकर कप उठा लिया।

बस यही नोंक-झोंक होनी थी उनमें। मजाक जरूर भौंडा था उनका। मगर दोनों के दिलों में किसी भी तरह का कोई मैल नहीं था।

“कुछ बताया उस आतंकवादी ने?” डॉली चाय का घूंट भरते हुए बोली।

“अरे वो तो सिरे से ही मुकर गया कि वह आतंकवादी है।” सिकंदर ठाकरे बोला—“जबकि उसके पास से एक ऐ.के. सैंतालीस के अलावा तीन किलो आर.डी.एक्स. मिला है। और वो पट्ठा है कि उस सामान का अपना होने से भी इन्कार कर रहा है।”

“चाय पी लो—फिर देखते हैं उसे।” डॉली गम्भीरता से बोली।

दोनों चाय पीने लगे।

चाय पीकर डॉली खड़ी हुई।

“कहां है वो?”

“टॉर्चर सैल में....!” कहते हुए सिकंदर ठाकरे भी खड़ा हो गया।

“आओ....!” डॉली दरवाजे की तरफ मुड़ते हुए बोली।

दोनों टार्चर सेल में पहुंचे—जहां पर कि वह आतंकवादी दीवार से टेक लगाकर बैठा हुआ था—उसके दोनों पैर लकड़ी के स्लीपर में बने छेदों में फंसे हुए थे और हाथ पीछे पीठ पर बंधे थे।

डॉली को देखकर पहले तो वह चौंका—फिर गम्भीर हो गया।

बोला कुछ नहीं वह।

डॉली एक कुर्सी खिसकाकर उसके सामने बैठ गई।

उसके बैठते हुए आतंकवादी की निगाहें सीधा उसकी स्कर्ट के भीतर जा पहुंचीं।

हौले से मुस्कुराई डॉली और सिकंदर ठाकरे की तरफ देखे बिना बोली—

“तुम अभी जाओ ठाकरे।”

सिकंदर ठाकरे ने गहरी सांस छोड़ी और टॉर्चर सैल से बाहर निकल गया।

डॉली अपने हुस्न के जलवे दिखाती हुई आतंकवादी से बोली—“यह सब तुम्हारा है—बस जो मैं पूछूं सच-सच बता दो।”

“द....देखो....तुम लोग लाख बार मुझसे पूछ चुके हो। अरे जब मैं जानता ही कुछ नहीं तो बताऊंगा कहां से?”

“तो तुम आतंकवादी नहीं हो।”

“नहीं।”

“और वो आर.डी.एक्स., ऐ.के. सैंतालीस?”

“मैंने तो कभी आर.डी.एक्स. देखा तक नहीं—और न ही कभी गन पकड़ी है। तुम लोग खामखां एक नेक शहरी को तंग कर रहे हो।”

“कहां के रहने वाले हो?”

“क्या मतलब?” हड़बड़ाया वह।

“मैंने तुम्हारा पता पूछा है और एक नेक शहरी होने के नाते तुम्हें अपना नाम-पता बताने में कोई एतराज नहीं होना चाहिये।”

“मगर....!”

“चिंता मत करो....अपनी तसल्ली कर लेने के बाद तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।”

अब उस आतंकी के चेहरे पर हल्की-सी घबराहट उभरी।

“क्या हुआ? पता क्यों नहीं बता रहे?”

“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह आतंकी।

“क्यों?”

“जब तुम मुझे ही इतना सता रहे हो तो मेरे घरवालों की तो मिट्टी हराम कर दोगे। तुम कुछ भी कर लो....मैं कुछ नहीं बताने वाला।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।

“सोचा था कि अगर तुम मुझे सब कुछ बता दोगे तो मैं तुम पर अपनी जवानी लुटाकर तुम्हें खुश कर दूंगी। लेकिन लगता है तुम प्यार के नहीं मार के भूखे हो। कोई बात नहीं—जब तुम्हारी तमन्ना यही है तो फिर मैं क्या कर सकती हूं।”

“तुम कुछ भी कर लो—मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बताने वाला।”

“अपने साथियों के नाम भी नहीं बताओगे?”

“नहीं....!”

“वे कहां छुपे हैं—यह भी नहीं बताओगे?”

“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह।

डॉली के होंठों पर मुस्कान फैल गई।

“चलो....तुमने यह तो माना कि तुम्हारे साथी हैं, और यह भी माना कि वे कहीं छुपे हुए हैं।”

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह आतंकी—और फिर दृढ़ता से होंठ भींच लिये।

सचमुच उसने काफी बड़ी गलती कर दी थी।

डॉली हंसी और कोहनियां अपने घुटनों पर टिकाते हुए आगे को झुक गई।

आतंकी की निगाहें उसकी छातियों पर जा अटकीं जो कि उसके झुकने से बाहर उलटने को बेकरार हो रही थीं।

“इन्हें भूल जाओ अब।” डॉली बोली—“अब नहीं मिल सकतीं तुम्हें यह।”

आतंकी कुछ नहीं बोला—बस उसकी छातियों से निगाहें हटा लीं—और परे देखने लगा।

डॉली ने अपने पर्स में से रिवॉल्वर निकाली और उसका मुंह छत की तरफ करके ट्रिगर दबा दिया।

‘धांय....!’

गोली छत में जा धंसी और थोड़ा-सा प्लास्टर उखड़कर सीधा आतंकी के सिर पर आ गिरा।

हड़बड़ाकर आतंकी ने पहले ऊपर देखा, फिर डॉली के हाथ में थमी रिवॉल्वर को देखकर मुस्कुरा पड़ा।

बोला कुछ नहीं वह—बस मुस्कुराता रहा।

डॉली के होंठों पर भी मुस्कान रेंग गई।

“मैं जानती हूं कि तुम्हें मौत का जरा भी खौफ नहीं। आई.एस.आई. ने तुम्हारे दिमागों को साफ करके उनमें यह भर दिया है कि अगर तुम मर गये तो सीधे जन्नत में जाओगे। दुश्मन के हाथों तुम्हारी मौत तुम्हें खुदा के करीब ले जायेगी। और तुम्हारे जेहन में यह भरा गया है कि हिन्दुस्तानी हुकूमत मुसलमानों पर कहर ढा रही है—उनकी बेटियों की अस्मत लूटी जा रही है और तुम्हें इन सबका बदला लेने को उकसाया जाता है। इसीलिये तुम मौत से बेखौफ हो।” उसने एक गहरी सांस छोड़ी और आगे बोली—“मैं पाकिस्तान की तमाम करतूतों को बताकर अपना वक्त खराब नहीं करना चाहती। उन करतूतों को सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान जानते हैं—तभी तो उनके दिलों में पाकिस्तान के प्रति नफरत है। खैर....अपना मुंह बन्द ही रखना—खोलना नहीं—और अपने कलेजे को भी मजबूत कर लेना।” कहने के साथ ही वह सीधी हुई और कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई।

“ठाकरे....!” उसने दरवाजे की तरफ मुंह करके आवाज लगाई।

सिकंदर ठाकरे बाहर ही खड़ा था—तभी तो वह फौरन भीतर आ गया था।

“इन साहब को कुर्सी पर बिठाओ और हाथ-पैर बांध देना।” वह बोली—“मैं अभी आई।”

कहकर वह बाहर निकल गई।

पीछे-पीछे सिकंदर ठाकरे भी बाहर आया और आवाज आई—

“खुशीराम....!”

तुरंत खुशीराम दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा।

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करीब पन्द्रह मिनट बाद जब डॉली टॉर्चर सैल में प्रविष्ट हुई तो उसने दोनों हाथों में एक मटका उठा रखा था।

कांस्य का मटका था वह।

खूब बड़ा सारा।

मटका देखकर आतंकी के चेहरे पर हैरानी उभरी—लेकिन वह बोला कुछ नहीं।

“यह मटका....!” तभी ठाकरे हैरानी से बोला।

“जादू का मटका है यह।” डॉली उसे अपनी कमर के साथ लगाकर मटके के गले में बांह पिरोती हुई हंसी—“जंच रहा है न मुझ पर?”

“अगर घाघरा-चोली पहनी होती तो जरूर जंचता। इन कपड़ों में नहीं—मगर यह जादू का मटका कैसे हो गया?”

डॉली ने करीब ही पड़ा एक डण्डा उठाकर मटके को अपनी हथेली पर खड़ा किया और उस पर डण्डा मारा।

“टन्न....!” एक तेज आवाज पैदा हुई।

“देखा जादू?” हंसी डॉली ।

“जादू?” हैरानी जताई सिकंदर ठाकरे ने—“मुझे तो सिर्फ टन्न की आवाज ही सुनाई दी—“कोई जादू तो नजर आया नहीं।”

“यह जुबान खुलवाने वाला जादू है। जो टन्न की आवाज से पैदा होता है।”

“मैं अभी भी कुछ नहीं समझा। भला इस मामूली मटके से तुम इसका मुंह कैसे खुलवा सकती हो?”

“अभी तुम्हारे सामने ही होगा जादू।”

कहकर डॉली मटके को उठाके आतंकी के सामने आ खड़ी हुई।

“कलेजा मजबूत कर लिया न?” वह मुस्कुराई।

आतंकी कुछ नहीं बोला—बस होंठों को और भी सख्ती से भींच लिया।

“शाबाश—होंठों को ऐसे ही बन्द रखना—खोलना नहीं।”

आतंकी ने और भी जोरों से होंठ भींच लिये।

“अब मैं तेरे सिर पर यह मुकुट पहनाऊंगी।”

कहते हुए डॉली ने मटके को उल्टा कर उसे दोनों हाथों से पकड़ा और उसके सिर के ऊपर करते हुए बोली—

“घबराओ नहीं—मरोगे नहीं तुम—बस थोड़े से पटाखे तुम्हारे कानों में फटेंगे—फिर या तो तुम बहरे हो जाओगे या पागल—मगर मरोगे तुम हरगिज नहीं।”

कहकर उसने वह मटका आतंकी के सिर पर डाला और छोड़ दिया।

मटका उसके कंधों पर आकर ठहर गया।

अब आतंकी के धड़ पर सिर नहीं बल्कि वह घड़ा नजर आ रहा था।

मटके के भीतर चेहरा आते ही आतंकी के कानों में सांय-सांय होने लगी।

हवा उसके कंधों के पास से भीतर प्रवेश कर रही थी।

“एक छोटा-सा पटाखा फोड़ने जा रही हूं।”

तभी डॉली की गूंजती आवाज उसके कानों में पड़ी—साथ उसे डॉली के मुंह का स्पर्श अपने सीने के पास महसूस हुआ।

वह अपनी आवाज उसके कानों तक पहुंचाने के लिये ही मुंह को घड़े के मुंह के करीब लाई थी।

हालांकि वह साधारण आवाज में बोली थी—मगर आतंकी को ऐसा लगा जैसे लाऊडस्पीकर उसके कानों के पास बजा हो।

डॉली सीधी हुई और उंगली की बटें बनाकर मटके पर दस्तक दी।

बाहर खड़े सिकंदर ठाकरे को वह आवाज साधारण लगी थी—मगर आतंकी को ऐसा लगा जैसे उसके कानों के पास विस्फोट हुआ हो।

न चाहते हुए भी उसका कलेजा जोरों से धड़क उठा। साथ ही वह अपने कलेजे को मजबूत करने की कोशिश करने लगा। वह समझ गया था कि आगे क्या होगा।

डॉली ने मुस्कुराते हुए एक बार सिकंदर ठाकरे को देखा—फिर वही डण्डा उठाकर बोली—

“अब देखो इस जादुई मटके का कमाल।”

कहने के साथ ही उसने मटके पर डण्डे का प्रहार किया।

‘टनाक्....!’

सिकंदर ठाकरे के कानों में तेज आवाज पड़ी और वह अपने दायें कान में उंगली दे खुजाने लगा।

जब बाहर खड़े सिकंदर ठाकरे के कानों में सांय-सांय होने लगी थी तो आतंकी की हालत का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था।

उसका तो सिर मटके के भीतर था।

उसे ऐसा लगा जैसे उसके कानों के साथ लगाकर परमाणु बम फोड़ा गया हो।

एक ही धमाके ने उसके दिल को दहलाकर रख दिया था।

अभी पहले धमाके की गूंज उसके कानों में ही गूंज रही थी कि तभी दूसरा धमाका गूंजा।

और फिर उसके कानों में लगातार विस्फोट होने लगे।

आठ-दस धमाकों में ही उसे अपना दिमाग फटता महसूस होने लगा।

सिर भारी हो गया।

उसे ऐसा लगा जैसे वह ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर पायेगा। फिर भी वह होंठों को भींचे बर्दाश्त करता रहा।

परमाणु बम बार-बार उसके कानों के पास फटकर उसके कलेजे को दहला रहे थे।

आखिर उसका जी मिचलाने लगा।

उसने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की मगर रोक नहीं सका।

उसका मुंह पूरा-का-पूरा खुल गया और पिछला सारा खाया-पीया बाहर आ गया।

कै से उसका मुंह, गर्दन तथा गर्दन से नीचे के कपड़े सराबोर हो गये।

अब एक नहीं—दो-दो यातनायें पड़ रही थीं उस पर।

एक तो बम फट रहे थे—दूसरे बदबू से उसका हाल बुरा हो रहा था।

नतीजा—

वह टूट गया।

उसे टूटना पड़ा।

“रोको....!” वह चीखा—“मैं बताता हूं।”

चीखने के साथ-साथ उसने सिर को भी जोर-जोर से हिलाया।

बाहर मटके पर डण्डे बरसा रही डॉली को उसकी आवाज सुनाई तो नहीं पड़ी—मगर मटके के आगे-पीछे हिलने से वह रुक गई कि वह कुछ कहना चाहता है। सो उसका डण्डा वहीं रुक गया।

उसने सिकंदर ठाकरे की तरफ देखते हुए मटके को निकालने का इशारा किया।

सिकंदर ठाकरे आगे बढ़ा और आतंकी के सामने आकर मटके को पकड़ा जो कि डण्डे की चोटों के कारण कई जगहों पर से पिचक गया था।

उसने मटके को ऊपर उठाया तो उसका जी मिचला उठा।

आतंकी का चेहरा कै से भरा हुआ था और वहां से बदबू उठ रही थी।

“म....मैं बताता हूं....।” आतंकी डॉली के बोलने से पहले ही बोल उठा—“मेरा बाप निसार अहमद है और मैं पाकिस्तान में कराची में रहता हूं। म....मैं सब कुछ बता दूंगा—मगर खुदा के लिये पहले मेरे मुंह से गंदगी साफ कर दो।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और बोली—“इसका मुंह साफ करवाओ ठाकरे।”

सिकंदर ठाकरे ने मटका नीचे रखा और दरवाजे की तरफ मुड़ गया।

पीछे-पीछे डॉली भी बाहर निकल आई।

“अब वो टूट चुका है।” वह ठाकरे से बोली—“तुम उससे हर जानकारी ले सकते हो।”

सिकंदर ठाकरे जो एक सिपाही को आवाज देने जा रहा था—चौंककर डॉली को देखने लगा।

“अरे जब मुंह तुमने खुलवाया है तो पूछताछ भी तुम ही करो न।”

“वो तुम कर लो।”

“मगर तुम....?”

“मुझे फौरन जाना है! कोई मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहा है।” कहते हुए डॉली की आंखों के आगे बिच्छू का चेहरा नाच उठा।

उसकी बात सुन सिकंदर ठाकरे चौंक पड़ा—साथ ही हल्की-सी ईर्ष्या भी उसके चेहरे पर उभरी।

“अभी तो दिन चढ़ा है!” वह चिढ़े स्वर में बोला—“और तुम....!”

“डॉली के लिये दिन क्या रात क्या। बस जब दिल किया दिल भर लिया।”

“तो मुझसे भी दिल भर लो न—मैं क्या मर गया हूं।”

“मूंछें....!” डॉली उसकी मूंछों की तरफ इशारा करते हुए हंसी—“तुम मूंछें कटवाओ मैं....।”

“जाओ....!” सिकंदर ठाकरे उसकी बात काटते हुए हौले से चीखा।

डॉली पुनः हंसी और परिसर की तरफ बढ़ गई।

“खुशीराम....!” तभी ठाकरे ने सिपाही को आवाज लगाई।

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डॉली अपने बेडरूम में दाखिल हुई और सीधा वार्डरोब की तरफ बढ़ी।

वार्डरोब के सामने आकर उसने उसका दरवाजा खोला और अपनी दायीं बांह भीतर डाल पता नहीं ऐसा क्या जादू किया कि वार्डरोब के करीब ही फर्श फटने लगा और फटे स्थान में नीचे जाती सीढ़ियां नजर आने लगीं।

यह बेसमेंट में प्रवेश करने का उसका अपना पर्सनल रास्ता था।

डॉली के बेसमेंट के बारे में तो आप काफी कुछ जानते ही हैं। वह वहां कई तरह के प्रयोग भी करती है और वहीं पर उसका टॉर्चर सैल भी है। जहां पर वह बड़े-बड़े पत्थरों को पिघलाने के एक से बढ़कर एक नायाब तरीके अपनाती है।

सीढ़ियां उतरकर वह बेसमेंट के जिस कमरे में खड़ी हुई, वहां दायीं तरफ एक लम्बी टेबल पर शीशे के कई जार रखे थे जिनमें कि अलग-अलग रंगों के रसायन नजर आ रहे थे।

उन सभी को नजरंदाज करते हुए वह सामने वाली दीवार के सामने पहुंची और ताली बजाई।

तुरंत प्रतिक्रिया हुई।

दीवार फट गई और उसमें बाहर जाने का रास्ता बन गया।

वह उस रास्ते से निकली और एक लम्बे गलियारे में आ गई।

पैदल ही आगे बढ़ते हुए वह गलियारे के अन्त वाले दायीं तरफ के कमरे के दरवाजे में प्रवेश कर गई।

सामने एक कुर्सी पर बिच्छू बंधा हुआ था।

उसके पैर कुर्सी के पायों से बंधे हुए थे, और हाथ हत्थों से।

डॉली को अपनी तरफ देखते देख बिच्छू ने मुंह परे फेर लिया।

डॉली के होंठों पर जहरीली मुस्कान उभर आई।

बड़े ही ठण्डे अंदाज में चलते हुए वह उसके सामने आकर रुकी और उसके बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया।

“तेरे इस तरह आंखें फेरने से मैं न तो गायब हो जाऊंगी और न ही मेरा इरादा तुझे छोड़ देने का बनेगा।”

“मैं मरने से नहीं डरता।”

बिच्छू अपनी आवाज में दृढ़ता लाते हुए बोला।

“इसका पता तो तब चलेगा जब मौत तेरे सामने होगी। फिलहाल तो तू यह बोल कि तू है कौन? और मुझे उठाने के लिये तू इतनी बड़ी फौज को लेकर क्यों आया था?”

जो बात डॉली ने उससे पूछी थी—उसका जवाब देने में बिच्छू को कोई एतराज नजर नहीं आया।

“भद्रानाथ को तूने ही मारा था न?” वह डॉली की आंखों में घूरते हुए बोला।

सुनकर डॉली बुरी तरह से चौंकी।

“तू....दीनापुर के भद्रा की बात कर रहा है?” वह सोचपूर्ण स्वर में बोली।

“हां....!”

“ओह....तो तू उसका कोई सगेवाला है—और उसकी मौत का बदला लेने आया है।” वह कुटिलता से मुस्कुराई—“अरे बेवकूफ! पहले दीनापुर में पता तो कर लेना था—जूतों से पीट-पीटकर मारा था मैंने भद्रा को—वो भी पब्लिक के सामने। अगर यह तू पहले जान लेता तो....।”

“तेरी इसी हरकत ने तो बॉस को हाफ़ मेंटल बना दिया है।” उसकी बात को काटते हुए गुर्राया बिच्छू—“अब वो तभी ठीक होंगे जब वो तेरे खून से अपने हाथ रंग लेंगे।”

डॉली की आंखें सिकुड़ गईं। उसकी बात का उसने बुरा नहीं माना—हां—बॉस के बारे में जरूर सोच रही थी वह। यह नाम उसने तब भी सुना था—जब बिच्छू उसे उठाने आया था।

“यह....बॉस कौन है?” वह बोली।

“हमारे बॉस हैं—अन्नदाता हैं तुम्हारे—रामनगर चली जाओ—सब पता चल जायेगा।” बिच्छू बोला—“भद्रानाथ बॉस का जिगरी दोस्त था—तूने उसे मारकर अपनी मौत के परवाने पर दस्तखत कर दिये हैं। डॉली —अब तो खुद ऊपर वाला भी आकर तुझे बॉस के कहर से नहीं बचा सकता।”

डॉली के होंठों पर जहरीली मुस्कान फैल गई।

“यह तो वक्त ही बतायेगा कि कहर किस पर टूटता है।” वह गहरी सांस छोड़ते हुए बोली—“फिलहाल तो तू यह बता कि तेरे बॉस का असली नाम क्या है?”

“कुणाल ठाकुर।”

“उसे मेरा पता कैसे चला?”

डॉली के इस सवाल पर बिच्छू हड़बड़ा उठा। साथ ही उसके चेहरे पर हल्का-सा आतंक उभरा।

बाकी सब कुछ तो उसने बेखौफ बता दिया था—लेकिन अब उसे दहशत हो रही थी—और उसकी वजह भी थी। वह जानता था कि उसने रंगीला का नाम बता दिया और यह बता दिया कि वह मर गया है तो कोई बड़ी बात नहीं कि वह गुस्से में आकर उसे गोली से उड़ा दे।

इसी वजह से उसके चेहरे की रंगत उड़ी थी।

उसकी उड़ी हुई रंगत से ही डॉली ने उसका चेहरा पढ़ लिया था। उसे समझते देर नहीं लगी कि कुणाल ठाकुर को उसका पता लगने की बात गहरी है।

“बोल....!” उसके मुंह से इस बार गुर्राहट उबली—“उसे मेरा पता कैसे चला?”

जवाब में बिच्छू ने जोरों से थूक सटकी। बोला कुछ नहीं वह, बस उसके होंठ फड़फड़ाकर रह गये।

“लगता है मौत की शक्ल दिखानी ही पड़ेगी तुझे।” डॉली फुंफकारी।

बिच्छू ने गहरी सांस छोड़ी और गम्भीरता से बोला—

“जिस अंदाज से तुमने मेरे समेत मेरे सभी साथियों को मारा—उसी से पता चल जाता है कि तुम मेरी जुबान भी खुलवा सकती हो। इसलिये मेरे लिये बेहतर यही है कि मैं बता दूं लेकिन....!”

“लेकिन क्या?”

“मेरी एक शर्त है।”

“शर्त?”

“जुबान खोलने की शर्त।”

डॉली के होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई।

“क्या तुम शर्त रखने की स्थिति में हो?”

“नहीं, फिर भी शर्त रख रहा हूं।”

डॉली ने पल भर के लिये सोचा—फिर बोली—

“बताओ—क्या शर्त है तुम्हारी—लेकिन उसे मानने के लिये मैं बाध्य नहीं हूंगी।”

“बहुत छोटी-सी शर्त है।”

“बोलो।”

“मुझसे यह जानने के बाद कि बॉस को तुम्हारा पता कैसे लगा—तुम मुझे गोली मार दोगी।”

“क्...या मतलब?” बुरी तरह से उछल पड़ी डॉली ।

बिच्छू ने गहरी सांस छोड़ी और गम्भीर स्वर में बोला—

“बॉस से गद्दारी करने की मैं सोच भी नहीं सकता। यूं भी जो तुम पूछ रही हो वो गद्दारी नहीं—और जो कुछ मैंने बताया वो भी गद्दारी नहीं। लेकिन....अगर मैं खाली हाथ वापस गया तो मेरी जो हालत होगी वो मैं ही जानता हूं। नाकामी की सजा सिर्फ और सिर्फ मौत है—वो भी बहुत बुरी मौत। और मैं बुरी मौत नहीं मरना चाहता। इसीलिये मैं तुम्हारे सामने शर्त रख रहा हूं....।”

“कि जानने के बाद मैं तुम्हें गोली मार दूं?”

“हां!”

“आसान मौत मरना चाहते हो।”

“तभी तो शर्त रखी है।”

डॉली ने सोचपूर्ण अंदाज में अपनी ठोड़ी उंगली के पोर से ठकठकाई, फिर सिर को हल्का-सा झटका देकर बिच्छू के चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोली—

“मैं वादा नहीं कर रही कि मैं तुम्हें गोली मारूंगी।”

“ल....लेकिन....!”

“हां....अगर तुम्हारी बातों से मुझे गुस्सा आ गया तब बात और है। वर्ना तुम यहां से सीधे जेल में जाओगे।”

“ल....लेकिन मैं....।”

“बेकसूर लोगों का बिना वजह खून बहाना मेरी फितरत नहीं बिच्छू। इसलिये मैं ऐसा वादा हरगिज नहीं करूंगी और तुम्हें बताना भी पड़ेगा। अगर जिद करोगे तो जुबान खुलवाने के मेरे पास एक नहीं सैंकड़ों रास्ते हैं। अब बोलो—तुम बोल रहे हो कि नहीं।”

जिस खुरदुरे अंदाज में डॉली ने बात की थी—उसे सुन बिच्छू की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। उसकी ताकत को तो वह देख ही चुका था। वह जान गया था कि उसके सामने खड़ी वह हसीन-तरीन युवती जो कह रही है, उसे कर गुजरने का माद्दा भी रखती है। और वह यह भी जानता था कि उसकी बात सुनकर डॉली उसे गोली नहीं मारेगी—और कुणाल ठाकुर के हाथों वह बुरी मौत मरना नहीं चाहता था। सो उसने खुद ही आसान मौत मरने का फैसला कर लिया।

उसने गहरी सांस छोड़ी और डॉली की तरफ देखते हुए बोला—

“तुम्हारा पता बॉस को रंगीला के जरिये पता चला।”

“भी....म....सेन।” एक तेज झटका लगा डॉली को।

न चाहते हुए भी उसका कलेजा धड़क उठा था।

“दीनापुर वाला रंगीला—उसका पता मैंने ही लगाया था। उसी ने बुलाया था न तुम्हें दीनापुर—भद्रानाथ को खत्म करने के लिये।”

डॉली कुछ नहीं बोली—बस उसे घूरती रही।

“बड़ी मुश्किल से पता चला उसका—और वो पता मुझे ही चला—मैं रंगीला को लेकर सीधा बॉस के पास पहुंचा और फिर जिस तरह मैंने उसकी जुबान खुलवाई, वो मैं ही जानता हूं। दांतों तले पसीना आ गया मेरे। बड़ा ही सख्तजान निकला था वह। टांगें काट डालीं मैंने उसकी—बांहें काट डालीं। तब भी नहीं बोला वह। और फिर जब मैंने उसे उसी हालत में सड़क पर फैंक देने का ऐलान किया, तब जाकर उसने तुम्हारा नाम बताया—वो भी इस शर्त पर कि उसे जिन्दा न छोड़ा जाये।”

“य....यानि रंगीला....।”

“मर गया....।”

डॉली का चेहरा कानों तक लाल हो उठा। आंखें अंगारे बरसाने लगीं।

झपटकर उसने बिच्छू के बालों को अपनी मुट्ठी में पकड़ा और उसे झिंझोड़ते हुए नागिन की तरह फुंफकारी—

“हरामखोर....मेरे भाई को मार डाला तूने।”

“ज....जुबान जो खुलवानी थी उसकी—आ....ह।” पीड़ा भरे स्वर में बोला बिच्छू।

डॉली ने तुरंत रिवॉल्वर निकाली और—

‘धांय....!’

गोली सीधी बिच्छू के सीने में जा धंसी।

बिच्छू पहले तो चीखा फिर उसके होंठों पर फीकी मुस्कान उभर आई।

“थ....थैंक्....यू....री....मा राठौर....। त....तुम्हारे हा....थों आ....सान मौत....म....मरने के....लिये....ही मैं....ने झूठ....ब....बो....ला था....भ....भी....मसेन को मैं....ने न....हीं....ब....बाऊ....जी....न....ने....।”

बात अधूरी ही रह गई उसकी। गर्दन एक तरफ लटक गई।

मर चुका था वह।

लेकिन डॉली उसकी अधूरी छोड़ी बात को समझ गई थी। तभी तो उसके होंठों से गहरी सांस छूट गई थी। अपने धर्म-भाई की मौत को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई थी, तभी तो तैश में आ गई थी।

मगर अब उसे अपनी जल्दबाजी पर अफसोस हो रहा था—और खुद पर गुस्सा भी आ रहा था कि वह इतनी जल्दी तैश में क्यों आ गई।

मगर अब किया भी क्या जा सकता था।

तीर तो कमान से निकल कर शिकार भी कर चुका था।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
‘ट्रिन....ट्रिन....।’

फोन की घण्टी घनघना उठी।

जम्हाई लेते हुए सिकंदर ठाकरे ने रिसीवर उठाया और उसे कान से लगाते हुए माऊथपीस में बोला—

“हैलो....!”

“फारिग हो गये आतंकवादी से?” दूसरी तरफ से डॉली की आवाज आई।

“बस अभी कुछ देर पहले ही फारिग हुआ हूं। सुबह उसे लेकर अदालत जाना है और....।”

“यह काम सब-इंस्पेक्टर कर लेगा।”

“क्या मतलब?”

“तुम दो घण्टे के अंदर-अंदर मेरी कोठी पहुंचो।”

“क्या बात है....खैरियत तो है?” चौंकते हुए बोला सिकंदर ठाकरे।

“मैं घर फोन करके तुम्हारी छुट्टी मंजूर करवा रही हूं।”

“ल....लेकिन....।”

गहरी सांस छोड़ कर रह गया सिकंदर ठाकरे। दूसरी तरफ से सम्बंध विच्छेद हो गया था।

जिस गम्भीरता से दूसरी तरफ से डॉली ने बात की थी—वह उसी से समझ गया था कि कोई बड़ी बात हो गई है—और उसे सुलझाने के लिये वह डॉली के साथ बाहर जा रहा है।

कहां....?

यह उसे पता नहीं था।

उसने पुनः गहरी सांस छोड़ी और एक सिपाही को बुलाकर उसे सब-इंस्पेक्टर बंसल को बुलाने का हुक्म सुना दिया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“अरे बाबा, हम कहां जा रहे हैं? यह तो बोलो। अपने घर में चाय तक नहीं पिलाई तुमने—यहां तक कि भीतर भी नहीं घुसने दिया। बाहर से ही कार में बिठाया और चल पड़ीं। आखिर बात क्या है? किस आपरेशन पर ले जा रही हो मुझे....कम-से-कम पता तो चले।”

सिकंदर ठाकरे डॉली की तरफ देखते हुए तनिक झल्लाये स्वर में बोला।

पन्द्रह किलोमीटर तक का सफर कर चुके थे वे—और अब मुम्बई की सीमा से बाहर निकल चुके थे। मगर अभी तक डॉली ने उससे कोई बात नहीं की थी। बस कार ड्राईव करते हुए सामने सड़क पर निगाहें टिकाये हुए थी।

उसका चेहरा गम्भीर था—और वह जबड़ों को बार-बार भींच रही थी।

उसका चेहरा देखकर सिकंदर ठाकरे यह तो समझ ही गया था कि मामला गम्भीर है। गम्भीर क्या बहुत ज्यादा गम्भीर है। वर्ना कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी वह हमेशा मुस्कराती ही रहती थी। बस इसी वजह से वह अभी तक चुप बैठा हुआ था कि वह स्वयं ही सब कुछ बता देगी।

मगर जब उसने डॉली के होंठ खुलते नहीं देखे तो उसके सब्र का बांध टूट गया और उसने अपना मुंह खोल दिया।

लेकिन डॉली ने तब भी कुछ नहीं कहा—बस कार ड्राईव करती सामने देखती रही।

“अरे बाबा, मैं तुमसे पूछ रहा हूं।।” सिकंदर ठाकरे उसके कंधे पर हाथ मारते हुए तीखे स्वर में बोला—“जुबान को लकवा मार गया है क्या?”

तब जाकर डॉली ने उसकी तरफ देखा।

बुरी तरह से उछल पड़ा सिकंदर ठाकरे।

आंखों में हैरानी का सागर ठाठें मारने लगा।

उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जो वह देख रहा है, वो सच है या सपना।

बात ही ऐसी थी।

डॉली की आंखों में आंसू चमक रहे थे।

एक ऐसी महिला की आंखों में वह आज पहली बार आंसू देख रहा था—जिसमें उसने हमेशा कठोरता के ही दर्शन किये थे। भावनाओं की उसके दिल में कोई जगह नहीं थी।

उसके लिये अगर उसका अपना कुछ था तो था—भारतवर्ष और कानून।

और आज वह उसकी आंखों में आंसू देख रहा था। ऐसे में उसका बुरी तरह से चौंकना स्वाभाविक ही था।

“ऐ....त....तुम रो रही हो?” वह हैरानी दर्शाते हुए उसकी तरफ उंगली सीधी करते हुए बोला।

डॉली ने गर्दन सीधी की।

“मेरा भाई मर गया ठाकरे....।” उसके गले से भर्राई आवाज निकली।

एक और झटका लगा सिकंदर ठाकरे को।

“तुम्हारा भाई?” वह हैरानी से बोला—“तुम्हारा भाई कहां से आ गया?”

डॉली ने स्टेयरिंग से बायां हाथ हटाकर अपनी आंखों को पौंछा और पुनः स्टीयरिंग पकड़ते हुए बोली—

“मेरा धर्मभाई था वह।”

“धर्मभाई?”

“हां!”

“मगर तुम तो....।”

“सिर्फ यार ही पालती हूं—यही कहना चाहते हो न तुम?”

बुरी तरह से हड़बड़ा उठा सिकंदर ठाकरे।

ठीक ही तो कह रही थी डॉली । सिकंदर ठाकरे ने अभी तक सिर्फ उसकी आशिकी के ही चर्चे सुने थे। हां, अपने प्रति उसने उसके दिल में कोमल भावनाओं को पनपते जरूर देखा था। लेकिन किसी की बहन बनना....यह वह पहली बार सुन रहा था। तभी तो हैरान हो रहा था वह।

उसे चुप देख डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।

“मेरे एक नहीं....कई भाई भी हैं ठाकरे। उन्हीं में से एक रंगीला भी था। मगर मैं उसे सिर्फ एक ही बार राखी बांध पाई। दूसरी बार राखी बंधवाने से पहले ही उसे मार डाला गया।”

“य....यह रंगीला था कौन? कहां रहता था वह? और यह तुम्हारा भाई कैसे बन गया?”

सिकंदर ठाकरे के शब्दों से ही उसके भीतर की आतुरता नजर आ रही थी।

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और कार की रफ्तार बढ़ा दी।

उसकी निगाहें विण्डस्क्रीन पर जमी हुई थीं, जिस पर कि अब धुंधले-धुंधले अक्स उभर रहे थे।

यह तस्वीरें करीब छह महीने पहले की थीं जब वह नील नगर गई हुई थी।

तब उसे तलाश थी जगवीर की, जिसके पीछे पूरे हिन्दुस्तान की पुलिस लगी हुई थी।

एक गुप्त सूचना के आधार पर वह नील नगर गई थी—और उस वक्त वह नील नगर के पुलिस स्टेशन में वहां के एस.एच.ओ. इंस्पैक्टर कांशी राणा के ऑफिस में प्रविष्ट हुई थी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इंस्पेक्टर कांशी राणा ने ललचाई निगाहों से डॉली को देखा।

उस वक्त डॉली काले रंग की जीन्स पहने थी—और ऊपर पीले रंग की शर्ट पहने हुए थी।

शर्ट जीन्स में थी सो उसके उभार जानलेवा अंदाज में उभरे हुए थे—ऊपर से उसकी शर्ट के ऊपरी बटन खुले हुए थे।

बस एक बटन और खुल जाता तो भीतर का सारा मामला सामने आ जाता।

एक हसीन तरीन युवती—वो भी फैशनेबल कपड़ों में कांशी राणा के ऑफिस में प्रविष्ट हुई थी। ऐसे में उसका कलेजा धड़कना स्वाभाविक था।

और कलेजा धड़का भी था उसका। जिसका सबूत उसके गले की घण्टी थी जो कि बार-बार उछल रही थी।

अपने भारी कूल्हे मटकाते हुए डॉली आगे बढ़ी और एक विजिटर चेयर पर बैठ गई।

कांशी राणा अभी भी एकटक उसे निहारे जा रहा था। एक अजीब-सी हवस उसकी आंखों में झांक रही थी। उसकी निगाहें एकटक उसके उभारों पर ही टिकी हुई थीं।

डॉली एक-दो पल तो उसे देखती रही—फिर अपना हाथ आगे कर उसके चेहरे के सामने चुटकी बजाते हुए बोली—

“होश में आओ इंस्पेक्टर।”

हड़बड़ाया कांशी राणा और उसकी छातियों से निगाहें हटाकर उसके चेहरे को देखने लगा।

“क्या तुम यहां आने वाली हर औरत की ब्यूटी ऐसे ही देखते हो?” डॉली उसे घूरते हुए बोली।

एक बार फिर हड़बड़ाया कांशी राणा, फिर उसके होंठ फैल गये।

“कोई-कोई फूल ऐसा होता है—जिसे देखकर ही आदमी मदहोश हो जाता है। ऊपर वाले ने लगता है तुम्हें फुरसत में बनाया है। और....।”

“सिर्फ मतलब की बात करो।” डॉली उसे बीच में ही टोकते हुए बोली।

कांशी राणा हल्के से हड़बड़ाया—फिर स्वयं को सम्भालते हुए निगाहें डॉली के चेहरे पर गड़ाते हुए बोला—

“तुम्हारा नाम?”

“डॉली ।”

“काम?”

“जगवीर की तलाश में आई हूं।”

डॉली ने यह शब्द कहे तो सामान्य अंदाज में थे—मगर कांशी राणा के लिये यह जैसे परमाणु बम का विस्फोट था। बुरी तरह से चौंकते हुए वह ऐसे खड़ा हुआ कि कुर्सी पीछे को उलट गई।

हड़बड़ाते हुए वह पीछे हाथ कर झुका और कुर्सी को सीधा कर उस पर वापस बैठते हुए पहले जोरों से थूक सटकी, फिर बोला—

“क....कौन हो तुम?”

“बताया तो, डॉली ।”

“जगवीर से तुम्हारा क्या रिश्ता है?”

“वही जो पुलिस का चोर से होता है। कानून का मुजरिम से होता है।”

“क्या मतलब....मैं कुछ समझा नहीं।”

“मुम्बई से आई हूं मैं। भारत सरकार की तरफ से मुझे आदेश मिला है जगवीर को पकड़ने का—और मुझे पता चला है कि वह यहां नील नगर में छुपा हुआ है।”

कहकर डॉली ने अपनी शर्ट की जेब में से अपना वकील वाला आई कार्ड निकाला और उसे कांशी राणा के सामने करते हुए बोली—

“यह मेरा आई कार्ड है। ज्यादा तसल्ली के लिये गृहमंत्रालय में फोन कर सकते हो।”

“अ....आपने कह दिया तो तसल्ली कैसी?” हड़बड़ाते हुए बोला कांशी राणा—“ल....लेकिन हमें तो ऐसी कोई सूचना नहीं मिली कि जगवीर यहां इस शहर में है।”

“कमाल है।” डॉली ने हैरानी जताई—“चालीस खून अभी हाल ही में किये हैं उसने। भरे चौक में बम फैंककर उसने चालीस बेगुनाहों की जान ली है। उससे पहले भी वह कई बड़े-बड़े अपराध कर चुका है। इतना बड़ा अपराधी नील नगर में है और तुम्हें कोई जानकारी नहीं।”

“म....मगर....!”

“पूरे शहर में अपने मुखबिरों को सचेत कर दो।” डॉली ने उसकी बात काटी—“वह यहीं इसी शहर में छुपा हुआ है। मुझे हर हाल में उसका पता चाहिये। वो भी आज ही। कल रात के दस बजे तक मुझे जगवीर की खबर मिल जानी चाहिये। अभी चार बजे हैं। यानि छह घण्टे हैं तुम्हारे पास।”

कांशी राणा ने थूक सटकते हुए सिर हिला दिया।

“मैं होटल नटराज में ठहरी हूं—कमरा नम्बर छह सौ सात। जैसे ही उसकी सूचना मिले—मुझे फौरन खबर कर देना।”

कांशी राणा ने पुनः सिर हिला दिया।

डॉली खड़ी हो गई।

“को....कोई चाय-पानी तो....।”

“सॉरी....इतना वक्त नहीं है मेरे पास।”

डॉली रूखे अंदाज में बोली और पलटकर कूल्हे मटकाते हुए बाहर निकल गई।

कांशी राणा कुछ देर तक तो दरवाजे को खाली-खाली निगाहों से घूरता रहा—फिर उसने एक ठण्डी आह भरी और कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया।

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करीब एक घण्टे बाद कांशी राणा ने अपनी जिप्सी शहर की सीमा के बाहर निकाली और उसे थोड़ा आगे चलकर एक कच्ची सड़क पर मोड़ दिया।

कच्ची सड़क पर धूल के बादल उड़ाते हुए जिप्सी आगे बढ़ने लगी।

हिचकोले खाते हुए जिप्सी करीब दो किलोमीटर चलकर रुकी तो जिप्सी के साथ-साथ कांशी राणा भी धूल से भरा हुआ नजर आ रहा था।

मगर उसने अपने कपड़ों पर लगी धूल की तरफ ध्यान नहीं दिया।

वह छलांग मारकर जिप्सी से उतरा और इधर-उधर देखने लगा।

चारों तरफ दूर-दूर तक बंजर पड़ी जमीन थी जिसमें जगह-जगह कंटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। बीच-बीच में बड़े-छोटे गड्ढे थे और उनमें से कई बड़े गड्ढों में पानी भरा हुआ था।

उसके दायीं तरफ करीब आधा किलोमीटर दूर एक खंडहर नुमा इमारत थी।

दूर से देखने पर वह कोई मस्जिद नजर आ रही थी।

अपने कपड़ों पर हाथ मारते हुए कांशी राणा उस इमारत की तरफ पैदल ही बढ़ने लगा।

अभी वह इमारत से थोड़ी दूर था कि तभी—

‘धांय....!’

गोली की आवाज गूंजी और उसके पैरों के पास की मिट्टी उखड़कर उछल गई।

कांशी राणा पहले तो हड़बड़ाया, फिर वहीं स्थिर हो गया।

खड़ा होने के साथ ही उसने हाथ भी सिर पर रख लिये और उधर देखने लगा जिधर से गोली चली थी।

तभी एक झाड़ी के पीछे से एक आदमी निकला जो कि ऐ.के. सैंतालीस से लैस था, और उसकी तरफ बढ़ा।

ऐ.के. सैंतालीस का रुख उसी की तरफ था और उंगली ट्रिगर पर दबी हुई थी।

कांशी राणा से कुछ कदम पहले आकर वह रुक गया और गुर्राया—

“कौन है तू?”

“कांशी राणा।” कांशी राणा बिना घबराये बोला—“इंस्पेक्टर कांशी राणा। जगवीर से बोलो कि मैं आया हूं।”

उस आदमी ने अपने बायें हाथ से जेब से वॉकी-टॉकी निकाला और उसका बटन दबाकर मुंह के पास ले जाते हुए बोला—

“इंस्पेक्टर कांशी राणा आया है।....ओ.के.....!”

उसने वॉकी-टॉकी जेब में डाला और कदम पीछे हटाते हुए बोला—“जा।”

कांशी राणा ने हाथ नीचे किये और कदम आगे बढ़ा दिये।

इमारत का ऊपरी गुम्बद मस्जिदनुमा तो था—मगर वो मस्जिद नहीं थी, बल्कि किसी इमारत के खंडहर थे। इमारत की चारदीवारी जगह-जगह से टूट रही थी तथा नीचे जमीन पर छोटी ईंटें जगह-जगह बिखरी हुई थीं।

ऐसे ही एक टूटे हुए स्थान से कांशी राणा भीतर दाखिल हुआ और इमारत के उस हॉल की तरफ बढ़ा जिसके ऊपर गुम्बद बना हुआ था।

उस हॉल के दायें-बायें कुछ और कमरे भी बने हुए थे। और वे सभी खस्ता हाल में थे। बस एक हॉल ही था जो अन्य कमरों से बेहतर नजर आ रहा था।

कांशी राणा हॉल में दाखिल हुआ।

दीवारों की तरह हॉल का फर्श भी छोटी ईंटों का बना हुआ था—दायीं तरफ आदमकद अलमारी दीवार में थी जिसका दरवाजा दीमक ने चट कर डाला था। बस उसके अवशेष ही नजर आ रहे थे, जिसके पीछे दीमक की खाई लकड़ी की शैल्फ लगी थी।

अलमारी के करीब ही साथ वाले कमरे में जाने का रास्ता था।

कांशी राणा ने उस तरफ अभी रुख ही किया था कि तभी हाथ में रिवॉल्वर लिये करीब तेईस-चौबीस साल का लड़का साथ वाले कमरे से निकला।

“हथियार है?” बिना किसी दुआ-सलाम के वह बोला।

“है।” कांशी राणा बोला।

“निकाल!” कहते हुए लड़के ने बायां हाथ आगे बढ़ाया।

कांशी राणा ने चुपचाप अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर उसके बढ़े हाथ पर रख दी।

“अब जा!” लड़का उसकी रिवॉल्वर को अपनी पैंट की जेब में डालते हुए बोला।

कांशी राणा उसके बराबर से निकलकर साथ वाले कमरे में प्रविष्ट हो गया।

वह कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे के बीचोंबीच चमगादड़ों के बीट का ढेर लगा हुआ था और ऊपर छत में दर्जनों की संख्या में चमगादड़ उल्टे लटके हुए शोर कर रहे थे।

कांशी राणा बीट के ढेर के करीब से निकलकर सामने वाली दीवार के करीब आकर ठिठका और दीवार की तरफ देखने लगा।

लगातार दो मिनट तक वह दीवार को इस तरह देखता रहा जैसे वह अपनी आंखों के सामने दीवार के एक ही हिस्से में कुछ तलाश कर रहा हो।

दो मिनट बाद जैसे चमत्कार हुआ।

दीवार एक तरफ हटने लगी और देखते-ही-देखते उसमें इतनी जगह बन गई कि एक आदमी भीतर प्रवेश कर सके।

कांशी राणा भीतर प्रवेश कर गया।

दायीं तरफ नीचे जा रही सीढ़ियां थीं।

सीढ़ियों की दोनों साइडों की दीवार से रगड़ खाते हुए वह नीचे उतरने लगा।

करीब पंद्रह सीढ़ियां उतरकर उसने स्वयं को एक हॉल में खड़ा पाया।

वह हॉल भी ऊपरी कमरों की तरह छोटी ईंट का बना हुआ था—मगर वह ऊपर की अपेक्षा काफी मजबूत था। एक तरफ दो ट्यूब लाईटें जल रही थीं जो कि बैटरी से चल रही थीं। उनके करीब ही एक दरी बिछी हुई थी जिस पर कि जगवीर एक निहायत ही खूबसूरत युवती के साथ बैठा हुआ था।

जगवीर करीब तीस साल का गोरे रंग का मगर सख्त और क्रूर आंखों वाला व्यक्ति था। जिसके बालों का रंग लाल था और उसने फ्रैंच कट दाढ़ी रखी हुई थी।

उस वक्त वह सिर्फ कच्छा-बनियान पहने हुए था—और उसके बाकी के कपड़े एक तरफ खूंटी पर टंगे हुए थे।

युवती ने नीचे स्कर्ट पहनी हुई थी—और ऊपर सिर्फ ब्रा पहने हुए थी। उसके करीब ही उसकी टॉप पड़ी थी और उसके साथ ही उसका जांघिया पड़ा हुआ था जो साफ बता रहा था कि स्कर्ट के नीचे उसने कुछ नहीं पहन रखा।

“आ राणा....!” कांशी राणा को देखते ही बोला जगवीर—“बैठ।”

कांशी राणा आगे बढ़कर उसके सामने दरी पर बैठ गया।

उसने एक नजर युवती के उभारों पर डाली, फिर पुनः जगवीर को देखने लगा।

“कोई खास खबर?” जगवीर ने पूछा।

“तभी तो आया हूं।”

“बोल।”

“पुलिस को तुम्हारा पता चल चुका है कि तुम इस शहर में हो।”

“क्या?” बुरी तरह से चौंका जगवीर।

“हां।”

“तुझे कैसे पता चला?”

“डॉली आई थी मेरे पास।”

“डॉली ....यह कौन है?”

“उसके आई-कार्ड से वकील ही नजर आ रही थी।”

“कमाल है....एक वकील मेरे बारे में पूछ रही है।” हैरानी जताई जगवीर ने।

“सरकार ने तुम्हें पकड़ने का काम उसे सौंपा है। ऐसे में जाहिर है कि वकील होने के साथ-साथ वह और भी बहुत कुछ है।”

“फिर तूने क्या बताया?”

कांशी राणा ने डॉली से हुई सारी बात उसे बता दी।

“ओह! तो वह नटराज होटल में ठहरी है।”

“हां।”

“दिखने में कैसी है वो?” कहते हुए जगवीर भेद-भरी मुस्कान मुस्कुराया।

कांशी राणा भी मुस्कुरा पड़ा—“बढ़िया है। क्लास—वन।” कहते हुए उसने बाईं आंख दबाई।

“इससे भी....!” जगवीर ने अपने पास बैठी युवती की उंगली दबाई—“बढ़िया है?”

कांशी राणा ने युवती की फीगर पर निगाह मारी—उसकी ब्यूटी को देखा, फिर उसके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए बोला—

“सच बोलूं?”

“मैं सच ही सुनना चाहता हूं।” जगवीर बोला।

“तो सच है यह जगवीर कि यह डॉली के सामने कुछ भी नहीं।”

सुनकर उस युवती का चेहरा बुझ गया। आंखों में ईर्ष्या के भाव साफ नजर आने लगे।

“बेशक यह”—उसके चेहरे पर फैली नाराजगी को नजरंदाज करते हुए कांशी राणा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“यह बहुत खूबसूरत है। मगर वो....वो है।”

कहकर उसने जगवीर की तरफ देखा।

“कमाल है—ऐसी खूबसूरती को इतने बड़े काम पर लगाया गया है।” जगवीर ने हैरानी जताई—“जबकि खूबसूरत औरत तो कोमल होती है। बहादुरी का तो उससे मीलों दूर का वास्ता नहीं होता। लगता है सरकार को मैं कोई छोटा-मोटा मुजरिम नजर आ रहा हूं—जो उसने किसी खूंखार आदमी की बजाये एक हसीना को मेरे पीछे लगाया है। कोई बात नहीं....हम भी उससे गिरफ्तार होंगे।”

“क्या....?” हड़बड़ाया कांशी राणा।

“हथकड़ियों में नहीं....उसकी जुल्फों में कैद होंगे।”

“ओऽऽ....!” कांशी राणा ने दांत दिखाये—“ऐसी गिरफ्तारी अगर मुझे भी मिल जाये तो....।”

“घबरा नहीं....प्रसाद तुझे भी मिलेगा। आज रात को भोग मैं लगाऊंगा और सुबह पहला प्रसाद तुझे ही मिलेगा।”

कांशी राणा का चेहरा खिल उठा—उसकी आंखों के सामने डॉली का खूबसूरत चेहरा ही नहीं, उसका समूचा बदन—वो भी निर्वस्त्र नाचने लगा।

“क्या नाम बताया था तूने होटल का?”

तभी जगवीर के प्रश्न पर वह हड़बड़ाया और उस शानदार सपने से बाहर निकल आया।

“नटराज!” वह थूक सटककर बोला।

उसकी हालत ही बता रही थी कि डॉली के बारे में सोचकर वह बेतहाशा गर्म हो चुका था।

“कमरा नम्बर?” जगवीर ने पूछा।

कांशी राणा ने बताया।

“ठीक है—अब तू जा....कल तुझे प्रसाद के साथ-साथ बढ़िया इनाम भी मिल जायेगा।”

कांशी राणा ने एक भरपूर निगाह युवती पर डाली।

युवती ने तुनककर मुंह परे फेर लिया। निश्चय ही उसे डॉली की तारीफ बुरी लगी थी।

कांशी राणा ने गहरी सांस छोड़ी और खड़ा हो गया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
“नमस्कार....!”

होटल नटराज के डायनिंग हॉल में टेबल पर बैठी खाना खा रही डॉली के कानों में आवाज पड़ी तो उसने गर्दन ऊपर उठाई।

करीब तैंतीस वर्ष का साधारण कद-बुत का व्यक्ति उसके सामने खड़ा था।

डॉली ने प्रश्न-भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा।

“कहिये।” वह बोली।

“अगर मैं गलत नहीं तो आप डॉली जी हैं....।”

उसकी आवाज में इज्जत और श्रद्धा के भाव थे।

“आप....!”

“मेरा नाम रंगीला है।” वह आदमी बोला—“दीनापुर में रहता हूं। आपके मैंने बहुत कारनामे पढ़े-सुने हैं—बहुत ही बड़ी वकील हैं आप....।”

“खाना खायेंगे?” डॉली उसकी बात को काटते हुए बोली।

“ज....जी नहीं।” हड़बड़ाया रंगीला।

“तो फिर मैं खा लूं?”

“ह....हां....आ....प खाइये....स....सॉरी....।”

रंगीला पुनः हड़बड़ाया और उसके सामने से हट गया।

डॉली पुनः डिनर पर झुक गई। रंगीला के उसके सामने से हटते ही उसने उसे अपने दिमाग से निकाल दिया।

हालांकि उसने उसकी आंखों में अपने प्रति इज्जत के भाव देखे थे। जबकि अन्य मर्द हमेशा उसे ललचाई निगाहों से ही देखते थे। मगर उसे किसी की भी परवाह नहीं थी।

खाना समाप्त कर उसने नेपकिन से हाथ पौंछे और खड़ी हो गई।

उसने अपनी रिस्टवॉच में वक्त देखा।

साढ़े नौ बज चुके थे—और कांशी राणा को उसने दस बजे तक का वक्त दे रखा था। सो उसने अपने कमरे में ही जाना उचित समझा।

छठी मंजिल पर कमरा था उसका, सो वह लिफ्ट की तरफ बढ़ी।

लिफ्ट द्वारा वह छठी मंजिल पर पहुंची और बायीं तरफ के गलियारे में आगे बढ़ने लगी।

बायीं तरफ छह कमरे छोड़कर सातवें कमरे के सामने वह रुकी और जेब से चाबी निकालकर उसे की-होल में डाला और चाबी को दायीं तरफ घुमाकर चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गई।

अभी उसने बेड की तरफ दो कदम ही बढ़ाये थे कि उसे वातावरण में जहरीली गैस का आभास हुआ।

सिर एकदम से भारी होने लगा था उसका और दम घुटने लगा था।

“खतरा....!”

फौरन उसके जेहन में यह एक शब्द हथौड़े के समान बजा।

बिजली की-सी फुर्ती से वह पीछे मुड़ी।

लेकिन मुड़ नहीं पाई वह, बल्कि उसके घुटने मुड़ गये। और वह वहीं फर्श पर बिछ गई।

उसकी आंखें तो हरकत कर रही थीं—मगर दिमाग चेतना-शून्य हो गया था। जुबान भी बन्द हो गई थी। ठीक तभी उसके ऐन सामने वाले कमरे का दरवाजा खुला और दो व्यक्ति बाहर निकले।

दोनों ने पहले गलियारे में इधर-उधर देखा।

कोई नजर नहीं आया उन्हें।

तुरंत दोनों आगे बढ़े और डॉली के कमरे में दाखिल हो गये।

आनन-फानन में उन्होंने डॉली को उठाया और सीधा खड़ा कर कमरे से बाहर इस तरह ले आये जैसे किसी शराबी को सम्भालने की कोशिश कर रहे हों वो।

मजे की बात यह थी कि कमरे में फैली जहरीली गैस का उन पर कोई असर नहीं हुआ था।

उसे सम्भाले हुए वे अपने कमरे में आ गये।

“जल्दी से बोतल निकाल।” एक बोला और डॉली की बाजू अपनी गर्दन में डाल उसे सम्भाल लिया। तुरंत दूसरे ने डॉली को छोड़ा और सामने टेबल पर से बोतल उठाकर वापस आया और ढक्कन खोलकर बोतल उसके मुंह से लगा दी।

कुछ शराब डॉली के पेट में गई और कुछ उसके जिस्म पर जा गिरी।

उसने बोतल बन्द कर वापस टेबल पर रखी और आकर डॉली की दूसरी बाजू अपनी गर्दन में पिरो दी।

“अब ठीक है।” पहला बोला—“अब हर कोई यही समझेगा कि इसने बहुत पी रखी है।”

दोनों उसे सम्भाले कमरे से निकले और लिफ्ट की तरफ बढ़े।

लड़खड़ाते हुए घिसटते हुए डॉली उनके साथ चल रही थी।

लिफ्ट द्वारा दोनों हॉल में आये और गेट की तरफ बढ़े।

“कितनी बार कहा है कि ज्यादा न पीया करो।” एक बोला।

“करा दी न हमारी बेइज्जती।” दूसरा बोला।

“अब डॉक्टर उल्टियां करायेगा—तब ठीक होंगी तुम।” पहला बोला।

यह डायलॉग उन्होंने जानबूझ कर कहे थे, ताकि आसपास की टेबलों पर बैठे लोगों को संदेह न हो।

लेकिन कोने की टेबल पर एक शख्स ऐसा था जिसकी आंखों में संदेह साफ नजर आ रहा था।

रंगीला था वह।

अभी थोड़ी देर पहले ही उसने डॉली को ठीक-ठाक खाना खाते देखा था। उससे बात भी की थी उसने और उसे कहीं से भी ऐसा नहीं लगा था कि उसने शराब पी हुई थी। ऐसे में इतनी जल्दी शराब के नशे में कोई चूहा भी टुन्न नहीं हो सकता, फिर वह तो इंसान थी।

और उसे बाहर ले जा रहे दोनों शख्स कौन थे?

उसे इसके पीछे कोई भारी साजिश महसूस हो रही थी।

डॉली के बारे में वह काफी कुछ पढ़ चुका था। उसे पता था कि वह कानून की बेटी के तौर पर जानी-जाती थी और अपराध के प्रति उसे दिली नफरत थी। ऐसे में जाहिर था कि उसने सैंकड़ों दुश्मन बना लिये थे।

कहीं डॉली को ले जाने वाले उसके दुश्मन तो नहीं?

डॉली का फैन तो था ही वह सो अपने फेवरिट को बचाने के लिये वह फौरन टेबल छोड़कर खड़ा हो गया।

उस वक्त दोनों डॉली को सम्भाले गेट के करीब पहुंच चुके थे।

अपनी तरफ से लापरवाही दर्शाते हुए वह टेबलों के बीच से निकलते हुए उनके पीछे-पीछे गेट से निकल गया।

ठीक तभी एक मारुति जेन गेट के सामने आकर रुकी और एक व्यक्ति ड्राइविंग डोर खोलकर बाहर निकला और पिछला दरवाजा खोल दिया।

दोनों में से पहले ने डॉली को छोड़ा और कार की पिछली सीट पर बैठ गया।

तब दूसरे ने डॉली को पिछली सीट पर डाला—जिसे पहले ने भीतर खींच लिया—और फिर दूसरा भी भीतर प्रवेश कर गया।

ड्राईवर बना व्यक्ति पुनः स्टीयरिंग के पीछे बैठा और स्टार्ट कर दी।

जैसे ही कार आगे बढ़ी, ठीक तभी थोड़ी दूरी पर बाईक पर बैठे रंगीला ने भी बाईक स्टार्ट की और कार के पीछे लगा दी।

इधर कार की पिछली सीट पर डॉली पहले वाले व्यक्ति पर गिरी पड़ी थी—जिससे कि उस आदमी के भीतर पल-प्रतिपल आग भड़क रही थी। उसकी सांसें तेज चल रही थीं—और चेहरा लाल-भभूका हो गया था।

उसे ऐसा लगने लगा कि वह अपने साथ लगी आग को और ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पायेगा और जल्दी ही पिघल जायेगा।

जगवीर की तरफ से उन्हें हुक्म था कि उन्हें डॉली के किसी अंग को छूना नहीं। और अभी तक उन्होंने उसको कहीं से भी नहीं छुआ था।

मगर अब....!

अब उसे ऐसा लग रहा था कि मामला उसकी बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

आखिर उसका सब्र जवाब दे ही गया।

उसने चोर निगाहों से अपने साथी की तरफ देखा।

वह सामने देख रहा था।

धीरे से उसका बायां हाथ ऊपर उठा और डॉली के शरीर पर जा पहुंचा।

जैसे ही उसने उसको दबाया—

करंट का तेज झटका लगा उसे।

उसका दिल किया कि वह अभी डॉली को सीट पर गिराये और उसे आगोश में ले ले।

“सम्भल के—।”

तभी उसके कानों में अपने साथी की फुंफकार पड़ी।

सिर से पांव तक कांप उठा वह—और हाथ फौरन नीचे गिर गया।

“म....मैं तो इसे सम्भाल रहा था।

वह हड़बड़ाते हुए अपने साथी से बोला—जो कि उसी की तरफ देख रहा था।

उसके भीतर पक रहा सारा लावा पानी में तब्दील हो चुका था।

“छातियों को पकड़कर सम्भाल रहा था।”

“न....हीं....म....मैंने तो....।”

“अब हाथ ऊपर न उठे।”

कहकर दूसरे ने गर्दन सीधी कर ली।

मन-ही-मन अपने साथी को सौ-सौ गालियां निकालते हुए पहला भी सामने देखने लगा।

डॉली की छातियां अभी भी उसकी बांह से टकरा रही थीं—मगर अब उस पर खौफ की ऐसी चादर पड़ गई थी कि उसे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था।

कार पूरी गति से सड़क पर दौड़ रही थी।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
साढ़े दस बजे कार एक दोमंजिला कोठी के मेन गेट के सामने रुकी।

ड्राईवर ने हॉर्न बजाया।

‘पीं....पीं....!’

तुरंत कोठी का फाटक खुला और कार खुले गेट में प्रवेश कर हाई-वे पर आगे बढ़ने लगी।

गेट खोलने वाले ने तुरंत गेट बन्द कर दिया।

कार कम्पाऊंड के सामने आकर रुकी और उसी के साथ ही दूसरे व्यक्ति ने दरवाजा खोला और बाहर आ गया।

वापस मुड़कर वह झुका और डॉली की बांह पकड़कर उसे बाहर खींच लिया।

पीछे-पीछे पहला भी बाहर आ गया।

डॉली को सम्भाले दोनों कम्पाऊंड में दाखिल हुए और दरवाजे की तरफ बढ़े। तभी कोठी का मेन डोर खुला।

सामने उन्हीं की तरह पच्चीस-छब्बीस वर्ष का युवक था।

डॉली को देख वह एक तरफ हो गया।

दोनों भीतर दाखिल हो गये।

“उस्ताद को फोन कर दे कि शिकार आ गया है।” दूसरा दरवाजा खोलने वाले से बोला।

दरवाजा खोलने वाले ने सिर हिला दिया।

दोनों डॉली को सम्भाले हॉल में आये और सामने वाले कमरे में ले जाकर उसे डबलबेड पर लिटा दिया।

तभी दरवाजा खोलने वाला भीतर प्रविष्ट हुआ।

“फोन किया उस्ताद को?” पहला बोला।

“हां....उस्ताद आ रहा है। उसने कहा है कि इसके कपड़े उतार इसे नंगी कर दो।” उसने डॉली की तरफ इशारा किया—“और इसके हाथ-पैर बांध दो और फिर इसे इंजेक्शन लगा देना।”

सुनकर दोनों ने गहरी सांस छोड़ते हुए एक दूसरे को देखा।

बहुत बड़ा इम्तिहान था यह उनका।

बला-सी खूबसूरत और परियों जैसे हुस्न की मलिका के कपड़े उतारना और कुछ भी न करना—किसी इम्तहान से कम नहीं था। उससे आसान काम तो एवरेस्ट पर चढ़ना था।

मगर जगवीर का हुक्म था।

पालन तो करना ही था उन्हें।

दरवाजा खोलने वाला वापस चला गया।

अब डॉली की बांहें तथा टांगें चौड़ी होकर बेड के पांवों से बंधी हुई थीं—और वह सिर से पांव तक पूरी तरह से निर्वस्त्र थी।

उसकी आंखें सब कुछ देख तो रही थीं—मगर वह कुछ भी करने के काबिल नहीं थी।

“निकाल इंजेक्शन!”

दूसरे ने पहले से कहा।

पहले ने जेब से पहले एक सिरिंज निकालकर उसका रैपर फाड़ा और फिर जेब से एक शीशी निकालकर उसमें से सिरिंज भरी और इंजेक्शन डॉली के कूल्हे पर लगा दिया।

“अब चल....!”

पहला सीधा होते हुए बोला।

“हां....अगर....” दूसरा बोला—“और थोड़ी देर तक खड़े रहे तो एक बार फिर बाथरूम जाना पड़ेगा।” कहकर वह हौले से हंसा।

पहला भी हंसा। और आगे बढ़कर डॉली के कपड़े उठा लिये।

और फिर दोनों ने जी भर के पहले डॉली को देखा—फिर कमरे से बाहर निकल गये।

उसी के साथ ही कमरे का दरवाजा बन्द हो गया।

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इंजेक्शन ने जादू का-सा असर किया।

एक मिनट बीतते-बीतते डॉली पूरी तरह से ठीक हो चुकी थी।

होश में आते ही वह पहले तो हड़बड़ाई, फिर जैसे ही वह उठने को हुई—एक गहरी सांस उसके मुंह से निकल गई। उसे आभास हो गया कि वह बंधी हुई है।

तभी उसे अपने जिस्म पर ठण्डक का अहसास हुआ।

गर्दन उठाते हुए उसने अपने जिस्म पर निगाह मारी।

कपड़े का एक रेशा तक नहीं था उसके बदन पर।

उसे समझते देर नहीं लगी कि वह दुश्मन की कैद में है। और जिस तरह से उसे बेलिबास करके बांधा गया है, उससे दुश्मन की नीयत का साफ पता चल रहा था।

मगर उससे उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। न जाने कितने ही लोगों से वह सम्बन्ध बना चुकी थी। सो दुश्मन की नीयत की तरफ से ध्यान हटाकर वह दुश्मन के बारे में सोचने लगी।

‘कौन हो सकता है वो....जिसने उसे कैद किया हुआ है?’

‘जगवीर।’

फौरन यह नाम उसके जेहन में कौंधा।

लेकिन जगवीर को कैसे पता चला कि वह उसी को पकड़ने यहां आई हुई है? जबकि उसने तो इस ऑपरेशन को गुप्त रखा हुआ था।

फिर उसे पता कैसे चल गया?

‘कांशी राणा।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

एक वही था जिसे उसकी आमद का और आने के मकसद का पता चला था।

‘वो कांशी राणा जगवीर का कुत्ता है।’

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई और उसी के साथ ही उसके जबड़े भिंचते चले गये। आंखों में कहर उभर आया।

दांतों पर दांत जमाये हुए उसने पूरी शक्ति से अपनी बांहों को झटका दिया।

मगर रस्सी ढीली होने की बजाये और भी टाईट हो गई।

एक ही झटके में वह समझ गई कि जोर-आजमाईश करनी बेकार है।

‘फिर क्या किया जाये?’

उसने मन-ही-मन सोचा।

अब तो दुश्मन के आने के बाद ही कुछ किया जा सकता है।

वह मन-ही-मन बड़बड़ाई।

तभी....

¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
इधर कोठी का गेट बन्द हुआ—उधर रंगीला की बाईक ऐन गेट के सामने आकर रुकी।

सीट पर बैठे-बैठे ही उसने बन्द गेट की तरफ देखा—फिर बाईक को आगे बढ़ाकर थोड़ी दूर ले जाकर बाईक को सड़क से उतारकर वापस कोठी के सामने आ खड़ा हुआ।

इतना तो उसे यकीन हो चुका था कि उसकी फेवरिट डॉली खतरे में है और उसे खतरे से बचाने के लिये वह अपनी जान की बाजी लगाने को भी तैयार था।

कुछ देर तो वह यूं ही कोठी के सामने खड़ा चारदीवारी को देखता रहा—फिर हिम्मत करके चारदीवारी की तरफ बढ़ा।

हथियार के नाम पर उसके पास सुईं तक नहीं थी। फिर भी वह हिम्मत कर रहा था।

उसने चारदीवारी के सिरे को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

चारदीवारी पर चढ़ने के लिये उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी—और इसी मशक्कत में उसके घुटने भी छिल गये थे।

मगर वह कामयाब हो गया था।

उसने चारदीवारी पर लेटकर ही भीतर झांका।

गेट के करीब उसे एक आदमी कुर्सी पर बैठा नजर आया, जिसकी पीठ उसी की तरफ थी।

रंगीला धड़कते दिल से लटककर नीचे उतरा।

वह जानता था कि अगर गेट पर बैठे आदमी ने उसे देख लिया तो उसका बचना नामुमकिन हो जायेगा—तो वह अपनी तरफ से पूरी तरह से चौकन्ना हो अंधेरे में लुकते-छिपते दीवार के साथ लगते हुए आगे बढ़ा और कोठी के बराबर से निकलकर पीछे के लॉन में आ गया।

अंधेरे में दुबककर उसने पीछे का नजारा किया।

कोई भी नजर नहीं आया उसे।

आश्वस्त हो वह कोठी की पिछली साईड की पहली खिड़की के करीब आया—और आहिस्ता से भीतर झांका।

कमरे में उसे तीन आदमी बैठे नजर आये, जो किसी बात पर हंस रहे थे—मगर खिड़की पर लगे शीशे के कारण उसे उनकी हंसी की आवाज नहीं आ रही थी। उनमें से दो तो वही थे जिन्हें उसने होटल में देखा था।

इस वक्त रंगीला का कलेजा धाड़-धाड़ कर उसकी पसलियों से टकरा रहा था।

वह झुका और खिड़की के नीचे से होते हुए आगे बढ़ गया।

अगले कमरे की खिड़की के करीब आकर उसने भीतर झांका।

कमरा पूरी तरह से खाली था।

रंगीला अगले कमरे की तरफ बढ़ा।

तीसरे कमरे की खिड़की में से उसने जैसे ही भीतर झांका—उसका कलेजा उछलकर उसके हलक में आ फंसा। बेड पर निर्वस्त्र बंधी हुई डॉली उसके सामने थी।

डॉली को बेलिबास देखकर भी उसके दिल में कोई गलत भावना नहीं आई।

सीधे होकर उसने सावधानी बरतते हुए पहले इधर-उधर देखा, फिर खिड़की के पट को धकेला।

खुशकिस्मती से पल्ला भीतर से बंद नहीं था।

रंगीला ने राहत की सांस ली और खिड़की में चढ़कर भीतर कूद गया।

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