S
StoryPublisher
Guest
मारुति जेन थाने के गेट में प्रविष्ट हुई और प्रांगण में दायीं तरफ जाकर खड़ी हो गई।
डॉली ने दरवाजा खोला और अपना पर्स सम्भाले बाहर आ गई।
ठीक तभी हवलदार खुशीराम लगभग भागते हुए उसके करीब आया और माथे पर उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“जय हिन्द डॉली जी।”
दरवाजा बन्द कर डॉली उसकी तरफ मुड़ी और मुस्कुराई—
“कैसे हो खुशीराम?”
“आपकी मेहरबानी से ठीक हूं।”
“तुम्हारी बीवी कैसी है?”
“आपको बहुत याद कर रही है। जब से उसे पता चला है कि आप ही की मदद से वह बची है—तभी से वह बस आप ही को याद कर रही है। अगर आप वक्त पर मुझे पचास हजार नहीं देतीं तो....।” आवाज भर्रा गई उसकी।
“रिलेक्स खुशीराम....!” डॉली ने उसके कंधे पर थपकी दी—“अगर वो तुम्हारी पत्नी है तो मेरी भी तो भाभी हुई—हुई न?”
भावुक होते हुए खुशीराम ने अपना सिर हिला दिया।
“ठाकरे....!”
“साहब अपने आफिस में बैठे हैं।”
डॉली मुस्कुराई और सिकंदर ठाकरे के ऑफिस की तरफ बढ़ गई।
जैसे ही वह अपने ऑफिस में प्रविष्ट हुई—
“वल्लाह....लगता है आज मैडम कत्ल करने के इरादे से आई हैं।”
अपनी कुर्सी पर बैठा सिकंदर ठाकरे चहका।
डॉली एक कातिल हंसी हंसी—और आगे बढ़कर विजिटर चेयर पर बैठ गई।
“अजी जनाब—हम तो कब से पिघलने को तैयार हैं।” बड़े ही आशिकाना अंदाज में उसने सीने पर हाथ मारा—“बस तुम इशारा कर दो।”
डॉली ने मुस्कुराते हुए एक ठण्डी आह भरी। और अपनी बायीं छाती पर हाथ रखते हुए बोली—
“यह तन तो न जाने कब से तुम्हारे साथ बिछने को तड़प रहा है। मगर तुम ऐसे निर्दयी हो कि एक अबला की आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”
“यह कैसी बात कर रही हो तुम....तुम हां तो करो—फिर देखो—कैसे अपने जलवे दिखाता हूं।”
सिकंदर ठाकरे ने अपना सीना चौड़ा करते हुए बायीं आंख दबाई।
“हाऽऽऽ....!” डॉली ने सीने पर हाथ रखते हुए ठण्डी आह भरी—“मैं तो कब से तुम्हारे जलवे देखने को तरस रही हूं....मगर....!”
“मगर क्या?”
“तुम हो कि मेरी एक छोटी-सी आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”
“अरे मेरी जान—तुम मांगो तो सही—जान भी हाजिर है।”
“तुम्हारी जान नहीं चाहिये मुझे।”
“तो?”
“बस....नाक के नीचे जो झाड़ियां तुमने उगा रखी हैं वो....।”
“मूंछ नहीं मुंडाऊंगा।” दहाड़ उठा सिकंदर ठाकरे—साथ ही उसका हाथ अपने मुंह पर जा चिपका।
ठीक तभी एक सिपाही चाय की ट्रे लेकर भीतर दाखिल हुआ।
सिकंदर ठाकरे की दहाड़ उसने भी सुन ली थी—तभी तो वह हड़बड़ा उठा था—फिर हैरानी से ठाकरे को देखने लगा था।
हड़बड़ाया सिकंदर ठाकरे भी था—मगर उसने अपनी हड़बड़ाहट जाहिर नहीं होने दी—बस मुंह से हाथ हटाया और चेहरे को गम्भीर बनाते हुए बोला—
“रख दो।”
सिपाही ने आगे बढ़कर टेबल पर चाय रखी और खाली ट्रे उठाके बाहर आकर उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये और एक तरफ बढ़ गया।
सिकंदर ठाकरे की मूंछें न मुंडाने की दहाड़ का मतलब वह बिल्कुल भी नहीं समझ सका था।
अब उसे क्या पता कि उन दोनों के बीच कैसा रिश्ता है।
इधर ऑफिस में डॉली उसके जाते ही हौले से हंसी और चाय का कप उठा लिया।
सिकंदर ठाकरे भी मुस्कुराया और सिर पर हाथ फेरकर कप उठा लिया।
बस यही नोंक-झोंक होनी थी उनमें। मजाक जरूर भौंडा था उनका। मगर दोनों के दिलों में किसी भी तरह का कोई मैल नहीं था।
“कुछ बताया उस आतंकवादी ने?” डॉली चाय का घूंट भरते हुए बोली।
“अरे वो तो सिरे से ही मुकर गया कि वह आतंकवादी है।” सिकंदर ठाकरे बोला—“जबकि उसके पास से एक ऐ.के. सैंतालीस के अलावा तीन किलो आर.डी.एक्स. मिला है। और वो पट्ठा है कि उस सामान का अपना होने से भी इन्कार कर रहा है।”
“चाय पी लो—फिर देखते हैं उसे।” डॉली गम्भीरता से बोली।
दोनों चाय पीने लगे।
चाय पीकर डॉली खड़ी हुई।
“कहां है वो?”
“टॉर्चर सैल में....!” कहते हुए सिकंदर ठाकरे भी खड़ा हो गया।
“आओ....!” डॉली दरवाजे की तरफ मुड़ते हुए बोली।
दोनों टार्चर सेल में पहुंचे—जहां पर कि वह आतंकवादी दीवार से टेक लगाकर बैठा हुआ था—उसके दोनों पैर लकड़ी के स्लीपर में बने छेदों में फंसे हुए थे और हाथ पीछे पीठ पर बंधे थे।
डॉली को देखकर पहले तो वह चौंका—फिर गम्भीर हो गया।
बोला कुछ नहीं वह।
डॉली एक कुर्सी खिसकाकर उसके सामने बैठ गई।
उसके बैठते हुए आतंकवादी की निगाहें सीधा उसकी स्कर्ट के भीतर जा पहुंचीं।
हौले से मुस्कुराई डॉली और सिकंदर ठाकरे की तरफ देखे बिना बोली—
“तुम अभी जाओ ठाकरे।”
सिकंदर ठाकरे ने गहरी सांस छोड़ी और टॉर्चर सैल से बाहर निकल गया।
डॉली अपने हुस्न के जलवे दिखाती हुई आतंकवादी से बोली—“यह सब तुम्हारा है—बस जो मैं पूछूं सच-सच बता दो।”
“द....देखो....तुम लोग लाख बार मुझसे पूछ चुके हो। अरे जब मैं जानता ही कुछ नहीं तो बताऊंगा कहां से?”
“तो तुम आतंकवादी नहीं हो।”
“नहीं।”
“और वो आर.डी.एक्स., ऐ.के. सैंतालीस?”
“मैंने तो कभी आर.डी.एक्स. देखा तक नहीं—और न ही कभी गन पकड़ी है। तुम लोग खामखां एक नेक शहरी को तंग कर रहे हो।”
“कहां के रहने वाले हो?”
“क्या मतलब?” हड़बड़ाया वह।
“मैंने तुम्हारा पता पूछा है और एक नेक शहरी होने के नाते तुम्हें अपना नाम-पता बताने में कोई एतराज नहीं होना चाहिये।”
“मगर....!”
“चिंता मत करो....अपनी तसल्ली कर लेने के बाद तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।”
अब उस आतंकी के चेहरे पर हल्की-सी घबराहट उभरी।
“क्या हुआ? पता क्यों नहीं बता रहे?”
“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह आतंकी।
“क्यों?”
“जब तुम मुझे ही इतना सता रहे हो तो मेरे घरवालों की तो मिट्टी हराम कर दोगे। तुम कुछ भी कर लो....मैं कुछ नहीं बताने वाला।”
डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।
“सोचा था कि अगर तुम मुझे सब कुछ बता दोगे तो मैं तुम पर अपनी जवानी लुटाकर तुम्हें खुश कर दूंगी। लेकिन लगता है तुम प्यार के नहीं मार के भूखे हो। कोई बात नहीं—जब तुम्हारी तमन्ना यही है तो फिर मैं क्या कर सकती हूं।”
“तुम कुछ भी कर लो—मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बताने वाला।”
“अपने साथियों के नाम भी नहीं बताओगे?”
“नहीं....!”
“वे कहां छुपे हैं—यह भी नहीं बताओगे?”
“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह।
डॉली के होंठों पर मुस्कान फैल गई।
“चलो....तुमने यह तो माना कि तुम्हारे साथी हैं, और यह भी माना कि वे कहीं छुपे हुए हैं।”
बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह आतंकी—और फिर दृढ़ता से होंठ भींच लिये।
सचमुच उसने काफी बड़ी गलती कर दी थी।
डॉली हंसी और कोहनियां अपने घुटनों पर टिकाते हुए आगे को झुक गई।
आतंकी की निगाहें उसकी छातियों पर जा अटकीं जो कि उसके झुकने से बाहर उलटने को बेकरार हो रही थीं।
“इन्हें भूल जाओ अब।” डॉली बोली—“अब नहीं मिल सकतीं तुम्हें यह।”
आतंकी कुछ नहीं बोला—बस उसकी छातियों से निगाहें हटा लीं—और परे देखने लगा।
डॉली ने अपने पर्स में से रिवॉल्वर निकाली और उसका मुंह छत की तरफ करके ट्रिगर दबा दिया।
‘धांय....!’
गोली छत में जा धंसी और थोड़ा-सा प्लास्टर उखड़कर सीधा आतंकी के सिर पर आ गिरा।
हड़बड़ाकर आतंकी ने पहले ऊपर देखा, फिर डॉली के हाथ में थमी रिवॉल्वर को देखकर मुस्कुरा पड़ा।
बोला कुछ नहीं वह—बस मुस्कुराता रहा।
डॉली के होंठों पर भी मुस्कान रेंग गई।
“मैं जानती हूं कि तुम्हें मौत का जरा भी खौफ नहीं। आई.एस.आई. ने तुम्हारे दिमागों को साफ करके उनमें यह भर दिया है कि अगर तुम मर गये तो सीधे जन्नत में जाओगे। दुश्मन के हाथों तुम्हारी मौत तुम्हें खुदा के करीब ले जायेगी। और तुम्हारे जेहन में यह भरा गया है कि हिन्दुस्तानी हुकूमत मुसलमानों पर कहर ढा रही है—उनकी बेटियों की अस्मत लूटी जा रही है और तुम्हें इन सबका बदला लेने को उकसाया जाता है। इसीलिये तुम मौत से बेखौफ हो।” उसने एक गहरी सांस छोड़ी और आगे बोली—“मैं पाकिस्तान की तमाम करतूतों को बताकर अपना वक्त खराब नहीं करना चाहती। उन करतूतों को सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान जानते हैं—तभी तो उनके दिलों में पाकिस्तान के प्रति नफरत है। खैर....अपना मुंह बन्द ही रखना—खोलना नहीं—और अपने कलेजे को भी मजबूत कर लेना।” कहने के साथ ही वह सीधी हुई और कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई।
“ठाकरे....!” उसने दरवाजे की तरफ मुंह करके आवाज लगाई।
सिकंदर ठाकरे बाहर ही खड़ा था—तभी तो वह फौरन भीतर आ गया था।
“इन साहब को कुर्सी पर बिठाओ और हाथ-पैर बांध देना।” वह बोली—“मैं अभी आई।”
कहकर वह बाहर निकल गई।
पीछे-पीछे सिकंदर ठाकरे भी बाहर आया और आवाज आई—
“खुशीराम....!”
तुरंत खुशीराम दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा।
¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
डॉली ने दरवाजा खोला और अपना पर्स सम्भाले बाहर आ गई।
ठीक तभी हवलदार खुशीराम लगभग भागते हुए उसके करीब आया और माथे पर उल्टा हाथ रखते हुए बोला—“जय हिन्द डॉली जी।”
दरवाजा बन्द कर डॉली उसकी तरफ मुड़ी और मुस्कुराई—
“कैसे हो खुशीराम?”
“आपकी मेहरबानी से ठीक हूं।”
“तुम्हारी बीवी कैसी है?”
“आपको बहुत याद कर रही है। जब से उसे पता चला है कि आप ही की मदद से वह बची है—तभी से वह बस आप ही को याद कर रही है। अगर आप वक्त पर मुझे पचास हजार नहीं देतीं तो....।” आवाज भर्रा गई उसकी।
“रिलेक्स खुशीराम....!” डॉली ने उसके कंधे पर थपकी दी—“अगर वो तुम्हारी पत्नी है तो मेरी भी तो भाभी हुई—हुई न?”
भावुक होते हुए खुशीराम ने अपना सिर हिला दिया।
“ठाकरे....!”
“साहब अपने आफिस में बैठे हैं।”
डॉली मुस्कुराई और सिकंदर ठाकरे के ऑफिस की तरफ बढ़ गई।
जैसे ही वह अपने ऑफिस में प्रविष्ट हुई—
“वल्लाह....लगता है आज मैडम कत्ल करने के इरादे से आई हैं।”
अपनी कुर्सी पर बैठा सिकंदर ठाकरे चहका।
डॉली एक कातिल हंसी हंसी—और आगे बढ़कर विजिटर चेयर पर बैठ गई।
“अजी जनाब—हम तो कब से पिघलने को तैयार हैं।” बड़े ही आशिकाना अंदाज में उसने सीने पर हाथ मारा—“बस तुम इशारा कर दो।”
डॉली ने मुस्कुराते हुए एक ठण्डी आह भरी। और अपनी बायीं छाती पर हाथ रखते हुए बोली—
“यह तन तो न जाने कब से तुम्हारे साथ बिछने को तड़प रहा है। मगर तुम ऐसे निर्दयी हो कि एक अबला की आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”
“यह कैसी बात कर रही हो तुम....तुम हां तो करो—फिर देखो—कैसे अपने जलवे दिखाता हूं।”
सिकंदर ठाकरे ने अपना सीना चौड़ा करते हुए बायीं आंख दबाई।
“हाऽऽऽ....!” डॉली ने सीने पर हाथ रखते हुए ठण्डी आह भरी—“मैं तो कब से तुम्हारे जलवे देखने को तरस रही हूं....मगर....!”
“मगर क्या?”
“तुम हो कि मेरी एक छोटी-सी आरजू भी पूरी नहीं कर सकते।”
“अरे मेरी जान—तुम मांगो तो सही—जान भी हाजिर है।”
“तुम्हारी जान नहीं चाहिये मुझे।”
“तो?”
“बस....नाक के नीचे जो झाड़ियां तुमने उगा रखी हैं वो....।”
“मूंछ नहीं मुंडाऊंगा।” दहाड़ उठा सिकंदर ठाकरे—साथ ही उसका हाथ अपने मुंह पर जा चिपका।
ठीक तभी एक सिपाही चाय की ट्रे लेकर भीतर दाखिल हुआ।
सिकंदर ठाकरे की दहाड़ उसने भी सुन ली थी—तभी तो वह हड़बड़ा उठा था—फिर हैरानी से ठाकरे को देखने लगा था।
हड़बड़ाया सिकंदर ठाकरे भी था—मगर उसने अपनी हड़बड़ाहट जाहिर नहीं होने दी—बस मुंह से हाथ हटाया और चेहरे को गम्भीर बनाते हुए बोला—
“रख दो।”
सिपाही ने आगे बढ़कर टेबल पर चाय रखी और खाली ट्रे उठाके बाहर आकर उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये और एक तरफ बढ़ गया।
सिकंदर ठाकरे की मूंछें न मुंडाने की दहाड़ का मतलब वह बिल्कुल भी नहीं समझ सका था।
अब उसे क्या पता कि उन दोनों के बीच कैसा रिश्ता है।
इधर ऑफिस में डॉली उसके जाते ही हौले से हंसी और चाय का कप उठा लिया।
सिकंदर ठाकरे भी मुस्कुराया और सिर पर हाथ फेरकर कप उठा लिया।
बस यही नोंक-झोंक होनी थी उनमें। मजाक जरूर भौंडा था उनका। मगर दोनों के दिलों में किसी भी तरह का कोई मैल नहीं था।
“कुछ बताया उस आतंकवादी ने?” डॉली चाय का घूंट भरते हुए बोली।
“अरे वो तो सिरे से ही मुकर गया कि वह आतंकवादी है।” सिकंदर ठाकरे बोला—“जबकि उसके पास से एक ऐ.के. सैंतालीस के अलावा तीन किलो आर.डी.एक्स. मिला है। और वो पट्ठा है कि उस सामान का अपना होने से भी इन्कार कर रहा है।”
“चाय पी लो—फिर देखते हैं उसे।” डॉली गम्भीरता से बोली।
दोनों चाय पीने लगे।
चाय पीकर डॉली खड़ी हुई।
“कहां है वो?”
“टॉर्चर सैल में....!” कहते हुए सिकंदर ठाकरे भी खड़ा हो गया।
“आओ....!” डॉली दरवाजे की तरफ मुड़ते हुए बोली।
दोनों टार्चर सेल में पहुंचे—जहां पर कि वह आतंकवादी दीवार से टेक लगाकर बैठा हुआ था—उसके दोनों पैर लकड़ी के स्लीपर में बने छेदों में फंसे हुए थे और हाथ पीछे पीठ पर बंधे थे।
डॉली को देखकर पहले तो वह चौंका—फिर गम्भीर हो गया।
बोला कुछ नहीं वह।
डॉली एक कुर्सी खिसकाकर उसके सामने बैठ गई।
उसके बैठते हुए आतंकवादी की निगाहें सीधा उसकी स्कर्ट के भीतर जा पहुंचीं।
हौले से मुस्कुराई डॉली और सिकंदर ठाकरे की तरफ देखे बिना बोली—
“तुम अभी जाओ ठाकरे।”
सिकंदर ठाकरे ने गहरी सांस छोड़ी और टॉर्चर सैल से बाहर निकल गया।
डॉली अपने हुस्न के जलवे दिखाती हुई आतंकवादी से बोली—“यह सब तुम्हारा है—बस जो मैं पूछूं सच-सच बता दो।”
“द....देखो....तुम लोग लाख बार मुझसे पूछ चुके हो। अरे जब मैं जानता ही कुछ नहीं तो बताऊंगा कहां से?”
“तो तुम आतंकवादी नहीं हो।”
“नहीं।”
“और वो आर.डी.एक्स., ऐ.के. सैंतालीस?”
“मैंने तो कभी आर.डी.एक्स. देखा तक नहीं—और न ही कभी गन पकड़ी है। तुम लोग खामखां एक नेक शहरी को तंग कर रहे हो।”
“कहां के रहने वाले हो?”
“क्या मतलब?” हड़बड़ाया वह।
“मैंने तुम्हारा पता पूछा है और एक नेक शहरी होने के नाते तुम्हें अपना नाम-पता बताने में कोई एतराज नहीं होना चाहिये।”
“मगर....!”
“चिंता मत करो....अपनी तसल्ली कर लेने के बाद तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।”
अब उस आतंकी के चेहरे पर हल्की-सी घबराहट उभरी।
“क्या हुआ? पता क्यों नहीं बता रहे?”
“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह आतंकी।
“क्यों?”
“जब तुम मुझे ही इतना सता रहे हो तो मेरे घरवालों की तो मिट्टी हराम कर दोगे। तुम कुछ भी कर लो....मैं कुछ नहीं बताने वाला।”
डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।
“सोचा था कि अगर तुम मुझे सब कुछ बता दोगे तो मैं तुम पर अपनी जवानी लुटाकर तुम्हें खुश कर दूंगी। लेकिन लगता है तुम प्यार के नहीं मार के भूखे हो। कोई बात नहीं—जब तुम्हारी तमन्ना यही है तो फिर मैं क्या कर सकती हूं।”
“तुम कुछ भी कर लो—मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बताने वाला।”
“अपने साथियों के नाम भी नहीं बताओगे?”
“नहीं....!”
“वे कहां छुपे हैं—यह भी नहीं बताओगे?”
“नहीं बताऊंगा।” दृढ़ता से बोला वह।
डॉली के होंठों पर मुस्कान फैल गई।
“चलो....तुमने यह तो माना कि तुम्हारे साथी हैं, और यह भी माना कि वे कहीं छुपे हुए हैं।”
बुरी तरह से हड़बड़ा उठा वह आतंकी—और फिर दृढ़ता से होंठ भींच लिये।
सचमुच उसने काफी बड़ी गलती कर दी थी।
डॉली हंसी और कोहनियां अपने घुटनों पर टिकाते हुए आगे को झुक गई।
आतंकी की निगाहें उसकी छातियों पर जा अटकीं जो कि उसके झुकने से बाहर उलटने को बेकरार हो रही थीं।
“इन्हें भूल जाओ अब।” डॉली बोली—“अब नहीं मिल सकतीं तुम्हें यह।”
आतंकी कुछ नहीं बोला—बस उसकी छातियों से निगाहें हटा लीं—और परे देखने लगा।
डॉली ने अपने पर्स में से रिवॉल्वर निकाली और उसका मुंह छत की तरफ करके ट्रिगर दबा दिया।
‘धांय....!’
गोली छत में जा धंसी और थोड़ा-सा प्लास्टर उखड़कर सीधा आतंकी के सिर पर आ गिरा।
हड़बड़ाकर आतंकी ने पहले ऊपर देखा, फिर डॉली के हाथ में थमी रिवॉल्वर को देखकर मुस्कुरा पड़ा।
बोला कुछ नहीं वह—बस मुस्कुराता रहा।
डॉली के होंठों पर भी मुस्कान रेंग गई।
“मैं जानती हूं कि तुम्हें मौत का जरा भी खौफ नहीं। आई.एस.आई. ने तुम्हारे दिमागों को साफ करके उनमें यह भर दिया है कि अगर तुम मर गये तो सीधे जन्नत में जाओगे। दुश्मन के हाथों तुम्हारी मौत तुम्हें खुदा के करीब ले जायेगी। और तुम्हारे जेहन में यह भरा गया है कि हिन्दुस्तानी हुकूमत मुसलमानों पर कहर ढा रही है—उनकी बेटियों की अस्मत लूटी जा रही है और तुम्हें इन सबका बदला लेने को उकसाया जाता है। इसीलिये तुम मौत से बेखौफ हो।” उसने एक गहरी सांस छोड़ी और आगे बोली—“मैं पाकिस्तान की तमाम करतूतों को बताकर अपना वक्त खराब नहीं करना चाहती। उन करतूतों को सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान जानते हैं—तभी तो उनके दिलों में पाकिस्तान के प्रति नफरत है। खैर....अपना मुंह बन्द ही रखना—खोलना नहीं—और अपने कलेजे को भी मजबूत कर लेना।” कहने के साथ ही वह सीधी हुई और कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई।
“ठाकरे....!” उसने दरवाजे की तरफ मुंह करके आवाज लगाई।
सिकंदर ठाकरे बाहर ही खड़ा था—तभी तो वह फौरन भीतर आ गया था।
“इन साहब को कुर्सी पर बिठाओ और हाथ-पैर बांध देना।” वह बोली—“मैं अभी आई।”
कहकर वह बाहर निकल गई।
पीछे-पीछे सिकंदर ठाकरे भी बाहर आया और आवाज आई—
“खुशीराम....!”
तुरंत खुशीराम दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा।
¶¶,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,