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Thriller Sex Kahani छाया ( अनचाहे रिश्तों में पनपती कामुकता एव उभरता प्रेम)

भाग 10

माया जी का पश्चाताप

[मैं माया]
छाया की नौकरी लगने के दुसरे दिन मैं शर्मा जी की बाहों में संभोग के पश्चात नग्न लेटी हुई थी . शर्मा जी ने अपना चरमसुख प्राप्त कर लिया था परंतु मेरा चरमोत्कर्ष कुछ दिनों से नहीं हो रहा था.
शर्मा जी ने पूछा
"माया जी आजकल आप उदास रहती हैं और संभोग के समय भी आप में उत्तेजना कम प्रतीत होती है."
"मुझे आत्मग्लानि है"
"पर क्यों आपने तो ऐसा कुछ नहीं किया"
"नहीं मुझे इस बात का दुख है कि मैंने छाया को मानस से अलग कर दिया और आपके साथ इस तरह संभोग सुख का आनंद ले रही हूँ. जब यह विचार मेरे मन में आता है तो मेरी उत्तेजना कम हो जाती है."
"हां यह बात तो है. जब से मानस और छाया अलग हुए हैं मेरे मन में भी दुख है. पिछले कई दिनों से वह दोनों अपने जीवन का अनूठा सुख ले रहे थे. बिना संभोग किये निश्चय ही उन दोनों ने साथ में उन खुबसूरत पलों को जी भर कर दिया होगा."
"अब मैं क्या करूं मैं समझ में नहीं पा रही हूँ."
"ऐसी स्थिति में हम क्या कर सकते हैं? तुमने छाया से बात की क्या?"
"क्या बात करूं मैं उससे. जब मानस और उसका विवाह टूट ही गया है तो अब वो मानस के पास क्यों जाएगी? मैं उससे यह तो नहीं कह सकती कि तुम अपनी और मानस की यौन इच्छाओं की पूर्ति वैसे ही करती रहो जैसे करती आई थी."
"हां यह बात तो सही है. अब वह दोनों भविष्य में जब कभी एक नहीं हो सकते. उनका इस तरह साथ रहना उचित नहीं होगा." शर्मा जी भी चिंतित थे.
"पता नहीं छाया के मन में क्या चल रहा होगा? उससे पूछ पाने की मेरी हिम्मत नहीं है."
अगली सुबह मानस के पीठ में खिचाव था. छाया और शर्मा जी बाहर गए हुए थे. मैं मानस को देखकर द्रवित हो गयी. वह स्नान करने जा रहा था.
मैं अपने पुराने दिनों के बारे में सोचने लगी जब मैंने पहली बार मानस का वीर्य अपने हाथों में से छुआ था. मानस का वीर्य अपने हाथों से छूने के बाद कुछ दिनों तक वह मेरे ख्वाबों का शहजादा था. मैंने अपने मन में उसे लेकर कई प्रकार की कामुक कल्पनाएं अवश्य की थी परंतु उसके साथ इस तरह की बातें करना और उसे उकसाना मुझे पसंद नहीं आ रहा था क्योंकि वह उस समय एक किशोर था .
मैंने कुछ समय इंतजार करने की जरूरत होती पर समय बीतता गया वह छाया को पढ़ाता और दोनों साथ रहते मुझे उसके साथ कामुक होने में असहजता महसूस होती पर एकांत में मैंने हस्तमैथुन के लिए उसका सहारा अवश्य लिया था.
बेंगलुरु आने के बाद मैंने यह महसूस किया उसकी और छाया की दोस्ती हो चली थी. मुझे यह तो नहीं पता था कि दोनों अन्तरग कार्यों में लिप्त थे पर अपनी बेटी के साथ घूम रहे नवयुवक के से मैं इस तरह अन्तरंग सम्बन्ध नहीं रखना चाहती थी. अततः मैंने मानस को लेकर पनपती कामुकता का परित्याग कर दिया.
छाया और मानस को एक साथ नग्न देखने के बाद एक बार फिर मुझमे कामुकता ने जन्म ले लिया. मानस का नग्न और मांसल शरीर और बेहद खुबसूरत लिंग देखने के बाद मेरी योनि अक्सर गीली रहती और मैं अनजाने पुरुष के साथ संभोग के लिए लालायित रहती.
शर्मा जी से मुलाकात के पश्चात ही मेरी तृप्ति हुयी थी.
छाया की नौकरी लग जाने के पश्चात मेरा मन ख़ुशियों से भर गया था . मैंने और मेरी छाया ने जीवन की ढेर सारी ख़ुशियाँ पा लीं थीं। हम मानस के साथ खुश तो कई वर्षों से थे पर अब मेरी बेटी के नौकरी पाने के बाद मेरे मन में गजब का उत्साह था। इन सभी खुशियों के पीछे सिर्फ एक ही इंसान था मानस।
पिछले दो-तीन महीनों से छाया और मानस की नजदीकियां खत्म हो गयी थी. छाया अब अपने कमरे में रहती वह मानस के कमरे में नहीं जाती थी मुझे यह बात जानकर दुख होता कि जिस मानस ने छाया के साथ न जाने कितनी रातें नग्न होकर गुजारी होंगी उसे छाया के बिना कैसा महसूस होता होगा। मैंने उन दोनों को कामदेव और रति के रूप में एक दूसरे की बाहों में नग्न देखा था मुझे वह दृश्य कभी नहीं भूलता। छाया जैसी सुकुमारी और कोमलांगी के साथ नग्न हो कर कई रातें के बिताने के पश्चात अचानक मानस को जिस विरह का सामना करना पड़ता होगा यह मैं समझ सकती थी. मैंने अपने जीवन में वियोग का इतना दंश झेला था कि मुझे इन दो-तीन महीनों में ही मानस पर दया और करुणा आ रही थी।
मैं बाथरूम में नहाते समय एक बार फिर मानस के बारे में सोचने लगी। मैंने उसके एकांत को मैंने आनंद में बदलने की सोची यह कैसे होगा मैं नहीं जानती थी पर मैं उसके लिए कुछ ना कुछ करना चाहती थी। मेरी उम्र उससे इतनी भी ज्यादा नहीं थी की उसने कभी मेरे बारे में कुछ गलत ना सोचा हो।
इतना तो मैं दृढ़ प्रतिज्ञ थी कि मैं उसके साथ संभोग नहीं कर सकती थी परंतु मैंने अपने मन में कुछ सोच रखा था और आज मैं उसे अमल में लाना चाहती थी। नहाने के पश्चात मैंने अपनी सबसे सुंदर नाइटी पहनी जिसमें मेरा शरीर तो पूरा ढका हुआ था परंतु शरीर के उभार स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे।
बेंगलुरु आने के बाद मेरे रंग और चहरे पर निखार भी आ चुका था। यह सब मानस की ही देन थी और आज मैं इस सुंदरता का कुछ अंश उसे देना चाहती थी। मैं पूरी तरह तैयार होकर हॉल में आ गयी। मैंने एक कटोरी में तेल गर्म किया और मानस के कमरे की तरफ चल पड़ी।

[ मैं मानस]
बाथरूम से नहाकर निकलने के बाद मुझे अपनी पीठ का दर्द बढ़ता हुआ लगा मैंने मुश्किल से अपने शरीर को पोछा और बिस्तर पर आकर तोलिया पहने हुए ही लेट गया। मैं पेट के बल लेटा हुआ था । माया आंटी कब अंदर आई मैं देख नहीं पाया। मेरे बिल्कुल पास आने के बाद उन्होंने मेरी नंगी पीठ को छुआ और बोला


"मानस कहां पर दर्द है।"
मैं उनकी तरफ मुड़ा और इससे पहले मैं कुछ बोल पाता मेरा ध्यान उनकी नाइटी पर चला गया। यह नाइटी उनके ऊपर खूब खिल रही थी। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे माया जीअपनी उम्र से आंख मिचोली कर युवा हो गयीं थीं।
मेरा ध्यान कई दिनों बाद उनके स्तनों पर चला गया उनके स्तन उभरे हुए थे उनका आकार निश्चय ही छाया से बड़ा था। ( मेरे पास तुलना करने के लिए सिर्फ छाया ही थी सीमा से उनकी तुलना बेमानी थी मैंने उसे कई वर्ष पहले देखा था) उन्हें इस तरह देखकर मैं कुछ देर निशब्द रहा फिर मैंने अपनी पीठ पर हाथ लगाकर वह जगह दिखाई जहां दर्द हो रहा था.
उन्होंने अपने हाथों में तेल लगा कर उस जगह पर हल्की मालिश शुरू कर दी मुझे अच्छा लगा मैंने अपना सर वापस तकिये पर रख दिया और उनके कोमल हाथों के स्पर्श को अपनी पीठ पर महसूस करने लगा. उनका स्पर्श मेरे शरीर पर इस तरह शायद पहली बार हो रहा था. उनके हाथों की कोमलता छाया जैसी तो नहीं थी पर शायद उस से कम भी नहीं थी. उनके हाथ मेरी पूरी पीठ पर घूम रहे थे मैं इस अद्भुत आनंद में खोया हुआ था. अभी तक मुझे किसी उत्तेजना का एहसास नहीं हुआ था मैं अपनी पीठ दर्द में मिल रहे आराम से ही खुश था पर मैं मन ही मन माया आंटी के बारे में सोच जरूर रहा था कि आज वह इस तरह कैसे मेरे कमरे में आ गयीं. मैंने उनके हाथ अपनी कमर पर महसूस किया उनकी उंगलियां तोलिए के अंदर जाकर मेरे कमर के निचले भाग को मसाज दे रही थी. मैंने उनके हाथों को नहीं रोका कुछ समय पश्चात वह मेरे पैरों में भी तेल लगाने लगीं. उनमें यह कला अद्भुत थी उनकी उंगलियों का दबाव पैरों पर हर जगह पड़ता और मैं आनंद में खोया चला जा रहा था. उनके हाथ जब मेरी जाँघों की तरफ बढ़ते तब मुझे थोड़ा अजीब एहसास होता. मेरे राजकुमार ने अब मुझ से बगावत करना शुरू कर दिया था. वह छाया का गुलाम था पर शायद इन दो-तीन महीनों के एकांतवास से वह दुखी हो गया था. आज उसके आस पास नारी के कोमल हाथों की ठंडी बयार मिल रही थी इसीलिए वह उत्तेजित हो रहा था.
मुझे पेट के बल लेट होने की वजह से उसे व्यवस्थित करना अनिवार्य था अन्यथा दर्द बढ़ता ही जा रहा था मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उसे व्यवस्थित करने की कोशिश की. शायद माया आंटी में मेरी इस हरकत को देख लिया था उन्होंने कुछ कहा तो नहीं पर उनके हाथ मेरी जांघों पर और अंदर तक पहुंच गए थे. कुछ ही देर में उन्होंने अपने हाथों से मुझे पीठ के बल आने के लिए इशारा किया.
मैं शर्मा रहा था पर मैं पीठ के बल आ गया. मुझे माया आंटी को इस तरह मुझे मालिश करते हुए देखने में शर्म आ रही थी. परंतु मैं राजकुमार की उत्तेजना के अधीन था. मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं और सब कुछ नियति पर छोड़ दिया.
बंद आंखों में कल्पना को नई ऊंचाइयां मिलती हैं. मैंने आंखें बंद कर माया आंटी से नजरे चुराई थी पर आंखें बंद करते ही माया आंटी का चेहरा और कामुक शर्रीर मेरी आंखों के सामने आ गया. बंद आंखों से आज मैंने माया आंटी का नग्न शरीर देख डाला. नाइटी का आवरण मेरी कल्पना ने नोच कर फेंक दिया था.

माया आंटी के हाथ मेरे पैरों पर फिसल रहे थे और मेरी नजरें मेरी कल्पना में उनके शरीर पर एकतक लगी हुई थी. मैं अपनी निगाहों से अपने विचारों में उन्हें पैरों से लेकर सिर तक नग्न कर रहा था और वह अपने हाथों से मेरे पैरों की मालिश.
अब वह मेरे पेट और सीने पर तेल लगा रहीं थीं. मैं उनके सामने साक्षात था और वह मेरी कल्पना में थी. अचानक मुझे अपना तोलिया हटा हुआ महसूस हुआ यह अकस्मात हुआ था उसे खोलने की प्रक्रिया में माया आंटी का कोई योगदान था यह मैं नहीं जानता पर मेरा तनाव से भरा हुआ लिंग निश्चय ही माया आंटी की दृष्टि में आ गया होगा. मेरी आंखें अभी भी बंद थी पर सांस तेजी से चल रही थी. आगे क्या होने वाला था मैं खुद नहीं जानता. मुझे नेयाति पर भरोसा था. माया जी के हाथ मेरी जांघों के ऊपर मेरी कमर तक आ रहे थे पर बेचारा राजकुमार अभी किसी भी स्पर्श से वंचित था.
वह सिर्फ पूर्वानुमान में ही अपनी उत्तेजना कायम किए हुए तन कर खड़ा था. शायद कभी कोई उसका भी ख्याल रखेगा पर माया जी एक सुरक्षित दूरी बनाते हुए मेरी कमर और जाँघों के आसपास अपना हाथ घुमा रहीं थीं. मैं स्वयं उत्तेजना से पागल हो रहा था मैं चाहता था कि कब मेरा राजकुमार उनके हाथों में खेले पर मुझे सिर्फ और सिर्फ इंतजार करना था. अचानक मैंने माया आंटी को अपने दोनों पैरों पर बैठता हुआ महसूस किया उन्होंने मेरे दोनों पैरों को आपस में सटा दिया था और स्वयं मेरे घुटनों के थोडा उपर मेरी जाँघों पर पर बैठ गई थी. उन्होंने अपना सारा वजन अपने घुटनों पर ही रखा था जो मेरे दोनों तरफ बिस्तर पर थे.
मेरे पैर उनकी नंगी जांघों से टकराते ही मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे बैठते समय उनकी नाइटी स्वतः ही ऊपर उठ गई थी. उनकी नग्न जाँघों का स्पर्श अपनी जांघों से स्पर्श होता महसूस कर मेरा राजकुमार और तन गया.
मैंने अपनी आंखें अभी भी बंद की हुई थी मैंने माया आंटी को पिछले कई वर्षों में उन्हें कामुक निगाहों से नहीं देखा था. वह एक खूबसूरत महिला थी और मेरी होने वाली सास थीं. उनके हाथ मेरी जांघों पर से होते हुए मेरे पेट और छाती तक आ रहे थे. जब वह आगे की तरफ आती तो कई बार उनका पेट मेरे राजकुमार से टकराता उसकी उत्तेजना लगातार बढ़ रही थी. माया आंटी ने अपनी नाइटी उतारी थी या नहीं अब तो मैं नहीं जानता परंतु उनकी जांघे मेरे पैरों से छूती हुए एक कोमल और कामुक एहसास जरूर दे रही थी.
कुछ ही देर में मैंने उनके नग्न दिन नितंबों को अपने पैरों पर महसूस किया यह अद्भुत एहसास था मुझे ऐसा लगा जैसे वह पूरी तरह नग्न हो गई थी. मैं अपनी आंखें बंद किए हुए इस सुख को अनुभव कर रहा था अचानक वह अपनी कमर और पीछे की तरफ ले गई उनके कोमल नितंब मुझे अपने पैर के पंजों से छूते हुए महसूस हुए. वह मेरे पैरों की मालिश करते हुए और मेरे पेट तक आप आ रही थी इसके ऊपर आना संभव नहीं हो पा रहा था जब वह मेरे पेट तक पहुचातीं उनका मुख मंडल मेरे राजकुमार के समीप होता उनकी सांसों की गर्मी मेरे राजकुमार को कभी-कभी महसूस हो रही थी. राजकुमार का इंतज़ार ख़त्म हो रहा था.

[ मैं माया ]
मैं उसके पैरों पर तेल लगाते हुए उसकी नाभि तक जा रही थी बीच में उसका उत्तेजित लिंग मुझे आमंत्रण दे रहा था मैंने अपने हाथों से उसे पहली बार छुआ. राजकुमार में अचानक हलचल हुई मैंने मानस का चेहरा देखा उसने अभी भी अपनी आंखें बंद की हुई थी परंतु मेरे स्पर्श का उस पर असर हुआ था. उसके चेहरे पर सुखद अनुभूति हुई थी. अब मैं उसकी जांघों से कमर तक जाते समय अपने हाथ से उसके राजकुमार को स्पर्श कर रही थी और राजकुमार उछल रहा था. मानस का लिंग वास्तव में आकर्षक था. मेरी छाया उसे अकेला छोड़ गयी थी यह सोचकर मुझे मानस के लिंग को देखकर प्यार आ रहा था. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने नीचे झुक कर उस लिंग को चूम लिया. मेरे होठों का स्पर्श पाकर मानस की आंखें कुछ देर के लिए खुलीं पर उसने आखें बंद कर लीं. वह समझदार था. शायद वह समझता था की उसे शर्म के परदे को कायम रखते हुए मैं उसे ज्यादा सिख दे सकती थी.

मेरे मन में एक पल के लिए आया कि मैं मानस के लिंग को पूरी तरह अपने मुंह में ले लूं. पर मैं रुक गई मैंने अभी उसे अपने हाथों में लेकर और उत्तेजित करने के लिए सोचा. मेरे दिमाग में बार-बार वही बातें आ रही थी. यह वाही लिंग है जिसने मेरी बेटी छाया की कोमल योनी के साथ पिछले कई वर्षों तक संसर्ग किया है. मैंने इस सुंदर लिंग से अपनी प्यारी बेटी की छाया को जुदा कर दिया था. यह छाया के लिए सर्वाधिक प्रिय रहा होगा ऐसा मेरा अनुमान था. मैंने लिंग के अग्रभाग को अपने हथेलियों से से सहलाया. मुझे अपने नितंबों पर मानस के पैरों का दबाव महसूस हुआ. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसा मानस अपनी जांघों को ऊपर उठा रहा था. मैंने अपने दोनों हाथों से उसके लिंग को सहलाना शुरू कर दिया. मेरा बाया हाथ लिंग के निचले हिस्से पर अपनी पकड़ बनाए हुआ था तथा अंगूठे उसके अंडकोष को भी सहला रहे थे. मैं दाहिने हाथ से उसके लिंग को नीचे से ऊपर तक सहला रही थी. शिश्नाग्र तक पहुंचते-पहुंचते मैं अपनी हथेलियों का दबाव बढ़ा देती और मानस के चेहरे पर उत्तेजना और बढ़ जाती. शिश्नाग्र एक दम लाल हो गया था. गोरे रंग के राज्कुमार का लाल मुह देख कर मुझे एसा लगा हैसे कोई छोटा बच्चा गुस्से से लाल हो गया हो. मुझे एक बार फिर उसे चुमने की इच्छा हुई.
मैंने अपने होठों को मानस के लिंग पर जैसे ही रखा वीर धारा फूट पड़ी. मैं इस अप्रत्याशित वीर्य स्खलन से अव्यवस्थित हो गई वीर्य की पहली धार मेरे होंठो और चेहरे पर गिरी. मैंने अपना चेहरा हटाया परंतु तब तक मानस का हाथ उसके लिंग पर आ चुका था.

मैंने अपने हाथ से उसका लिंक पकड़े रखा था हमारी उंगलिया मिल गयीं. वीर्य उसके लिंग से लगातार बाहर हो रहा था और वह मानस के शरीर पर तथा मेरे शरीर पर गिर रहा था. हम दोनों वीर्य को अपने शरीर पर ही गिराना चाह रहे थे. मानस शर्म वश एसा कर रहा था और मैं उत्तेजनावश. मानस ने अब तक अपनी आंखें खोल लीं थी. मुझे अपने वीर्य में भीगा हुआ देखकर वाह मन ही मन प्रसन्न हो रहा था परंतु अब मैंने उसके चेहरे पर से नजर हटा ली थी.
मैं बिस्तर से उतर कर नीचे आ गई मेरी नाइटी ने स्वतः ही नीचे आकर मेरे नग्न जाँघों और को ढक लिया. मैं तेल का कटोरा अपने हाथों में लिये कमरे से बाहर आ गई. मेरे हाथ में मानस के वीर्य से सने हुए थे. यह वही वीर्य था जो आज से कुछ महीने पहले तक मेरी प्यारी छाया को भिगोया करता था. मैंने मानस के वीर्य से सने हाथों को एक बार फिर चूम लिया.
तीन-चार दिनों बाद छाया और मानस को एक साथ हंसते और साथ साथ बाहर घूमते हुए देख कर मेरे मन में एक बार लगा की फिर दोनों दोनों प्रेमी पास आ गए. अब मुझे मानस का हस्तमैथुन करने का थोड़ा अफसोस हो रहा था पर उस दिन अत्यधिक खुशी और कृतज्ञता में मैंने वह कदम उठा लिया था.
मुझे इस बात से खुशी थी की वो दोनों ही समझदार और जिम्मेदार थे. इसके अलावा वह दोनों एक साथ क्या करते होंगे यह मैं जानती तो जरूर थी पर उस बारे में मैंने सोचना बंद कर दिया. वह दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे मैंने भी उनकी खुशी में अपनी खुशी ढूंढ ली थी. अब मैं बिना किसी आत्मग्लानि के साथ शर्मा जी की बाहों में आनंद लेने देखने लगी.
 
भाग 11
छाया की भाभी सीमा
[ मैं छाया]
सामाजिक मजबूरियों की वजह से मां ने मेरे और मानस के रिश्ते को अब एक नया रूप दे दिया था. अब हम प्रेमी प्रेमिका नहीं रहे थे. हम दोनों इस बात से बहुत दुखी थे. पर हमारे बीच भाई बहन जैसे कोई संबंध नहीं बन सकते थे. हम दोनों ने इतनी राते एक साथ नग्न गुजारी थी की इस बात की परिकल्पना भी बेमानी थी.
पर परिस्थितियां बदल चुकी थी कुछ ही दिनों में मैंने और मानस में बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार कर लिया था. मैं घर में और सबके सामने मानस को "मानस भैया" ही कहती आखिर में यही सच हो रहा था पर मुझे अच्छा नहीं लगता था. अकेले में हमारी बात लगभग नहीं होती थी. यही मेरे लिए अच्छा था. जिस दिन मेरी नौकरी लगी थी उस दिन हमने एक दुसरे को कई दिनों बाद स्खलित भी कर दिया था. अब हम फिर से बातें करने लगे थे. मेरे मन में वो अब मेरे दोस्त बन चुके थे.
मेरी मां भी अब सामान्य हो गई थी. मैं और मेरी मां मानस के लिए एक उपयुक्त लड़की की तलाश करने लगे. मेरे मन में अचानक सीमा का ख्याल आया मैंने बिना किसी को बताए सीमा से बात करने की सोची.
अगले दिन में सीमा के घर पर थी. मैंने सीमा दीदी के लिए सुंदर फूलों का गुलदस्ता लिया और खूब सज धज कर उनके घर पहुंची. उन्होंने मुझे देखते ही बोला आ गई मेरी रानी और मुझे बाहों में भर लिया. कुछ ही देर में हम दोनों तरह- तरह की बातें करते हुए बिस्तर पर आ गए. हमें एक दूसरे के साथ नग्न होकर प्रेम करना बहुत अच्छा लगता था. हमें लगता था जैसे हम दोनों एक साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं. सीमा दीदी के स्खलित होने के पश्चात मैंने उन्हें बाहों में भरते हुए बोला.
"आजकल मानस भैया बहुत दुखी रहते हैं"
" क्यों क्या हो गया"
"अरे उनका अपनी गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप हो गया है पिछले दो-तीन महीनों में वह एकदम गुमसुम हो गए हैं "
सीमा दीदी ने कहा.
"मानस तो बहुत ही अच्छा है मैंने तो उसे चार-पांच साल पहले देखा था तब से अब तो वह काफी बदल गया होगा"
मैं समझ चुकी थी की सीमा के मन में अभी भी कहीं न कहीं मानस के लिए कोई जगह खाली थी.
मैंने सीमा दीदी को अपने घर पर बुला लिया यह मानस के लिए मेरी तरफ से एक उपहार जैसा था. शाम को सीमा दीदी हमारे घर पर आ गयीं. वह मानस भैया के घर आने से पहले पहुंच चुकी थी. शाम को ऑफिस से आने के बाद रोज की तरह मानस भैया अपने कमरे में चले गए. अक्सर उनके कमरे में चाय लेकर मां जाया करती थी पर आज सीमा चाय लेकर उनके कमरे में गई. सीमा बहुत सुंदर लग रही थी .

[मैं मानस]
"आप कौन"
" अरे चाय तो ले लीजिए.बताती हूं."
"मैं सच में आपको नहीं पहचान पा रहा हूं"
"हां हम बहुत पहले मिले थे और आपने मुझे पढ़ाया भी है."
"सीमा"
"हां मैं ही हूं"
" आओ बैठो कितने दिनों बाद तुम्हें देख रहा हूं इसलिए नहीं पहचान पाया और तुम भी तो काफी बदल गई हो"
सीमा ने चुटकी ली
"क्या बदल गया है"
मैं निरुत्तर था.
मैंने सोमिल के बारे में पूछा
" मेरा सोमिल से पिछले दो-तीन सालों से मिलना नहीं हो पा रहा है वह पता नहीं कहां होगा. मैंने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश की पर सफल नहीं हुई. हो सकता है वह भी मुझे ढूंढ रहा हो पर शायद अब उससे मिलना न हो पाए."
कुछ देर में छाया भी वहां आ गयी और बोली आज यहीं रुक जाओ हम सब रात में खूब सारी बातें करेंगे.

[मैं छाया]
सीमा दीदी अब मेरे कमरे में आ गई थी. मैंने उन्हें अपने कपड़े दे दिए जिसे पहन कर वह आराम कर सके मैंने उन्हें अपनी वही नाइटी दे दी जिसे पहनकर मैंने पहली बार इस घर में मानस का मुखमैथुन किया था. वह इसे बहुत पसंद करते थे . जब भी मेरा मन कामुकता से भरता मैं वह नाइटी पहन लेती मानस उसे देखते ही मेरे मन की बात समझ जाते और कुछ ही घंटों में हम बिस्तर पर एक दूसरे की काम पिपासा बुझा रहे होते. अब परिस्थितियां बदल गई थी. आज जब सीमा दीदी वही नाइटी पहन कर डाइनिंग टेबल पर खाना खा रही थी तो मैं मानस भैया का चेहरा ध्यान से देख रही थी. वह टकटकी लगाकर सीमा को देख रहे थे. मैं समझ रही थी. आज फिर उनमे कामुकता भरी हुई थी . पर आज उनका साथ देने के लिए कोई नहीं था कम से कम मैं तो नहीं थी. मुझे उन पर थोडी दया भी आई. खाना खाने के पश्चात हम बालकनी में आ गए थे. बेंगलुरु शहर का सुंदर नजारा मन मोहने वाला था. मानस की स्थिति का आकलन करना इतना कठिन भी नहीं था. मुझे पूरा विश्वास था की राजकुमार आज पूरी तरह तना होगा उसके पास दो- दो राजकुमारियां थी जिनके साथ उसने अठखेलियां की थी. दोनों ही राजकुमारियां अब रानी बनने के लिए तैयार थी और अपने यौवन के चरम पर थी. मैंने सीमा दीदी और मानस को मिलाने के लिए वापस गांव की बातें शुरू कर दीं. मैंने उन्हें छुपन छुपाई खेल की याद दिलाई और बोला
" रोहन और साहिल को छुपन छुपाई में बहुत आनंद आता था" मानस और सीमा हँस पड़े.
" आनंद तो आप दोनों को भी आता होगा तभी आप लोग हमेशा खेलने के लिए तैयार रहते थे"
मानस और सीमा मेरी इस छेड़छाड़ पर मुस्कुरा रहे थे. मैंने कहा
"मुझे बहुत नींद आ रही है मैं चली सोने" यह कहकर कुछ समय के लिए वहां से हट ली. जाने से पहले मैंने मानस भैया को अंदर बुलाया और उन्हें बोला
"सीमा को हमारे संबंधों के बारे में कुछ भी नहीं पता और आप भी नहीं बताइएगा. मैंने उसे सिर्फ इतना बताया है कि आपका किसी के साथ प्रेम संबंध था पर उससे आपका ब्रेकअप हो गया है." मैंने कई दिनों से उनसे हक़ से कोई बात नहीं की थी. मेरी यह हिदायत भरी बातें सुनकर वो बहुत खुश हो गए. और उन्होंने एक बार फिर बिना मुझसे कुछ कहे मुझे अपने आलिंगन में भरकर माथे पर चूम लिया और बोले
"छाया तुम बहुत अच्छी हो" उनके इस आलिंगन के दौरान मैंने उनके लिंग का तनाव महसूस कर लिया था.

[ मैं मानस]
वापस बालकनी में आने पर बातों ही बातों में सीमा ने पूछा
"आप शादी कब कर रहे हैं "
"जब कोई तुम्हारे जैसी अप्सरा मिल जाए" वह हंसने लगी.

हम रात लगभग 2:00 बजे तक बातें करते रहे. मुझे यह एहसास हो रहा था की वो मेरे करीब आना चाह रही है. सोमिल के मिलने की उम्मीद उसके मन में धीरे धीरे काम हो रही थी. छाया भी जगी हुई थी पर हमारे पास नहीं थी. अचानक उसने सीमा के मोबाइल पर मैसेज किया और सीमा ने मुझसे इजाजत ली. सीमा छाया के कमरे में जा चुकी थी और मैं बिस्तर पर अकेला बैठा सीमा को याद कर रहा था.

आज परिस्थितियां कितनी बदली हुई थी. सीक्रेट सुपरस्टार की तरह दिखने वाली सीमा आज एक अप्सरा जैसी सुंदर हो गई थी. छाया और सीमा दोनों ऐसी नवयुवतियां थी जिनमें खूबसूरती के लिए होड़ लगी थी. दोनों की जवानी अपने उफान पर थी सीमा जहां हष्ट पुष्ट और कसरत करके बनाया हुआ शरीर था वही छाया का शरीर अत्यंत कोमल था पर सुडोल था. दोनों के स्तन और नितंब भरे हुए थे.
उन दोनों का ख्याल करते हुए मेरा हाथ मेरे राजकुमार पर चला गया और उसे सहलाने लगा जितना ही मैं उन दोनों को याद करता उतना ही तनाव बढ़ता जाता मुझे यह नहीं समझ आ रहा था की राजकुमार किसके लिए ज्यादा बेचैन था. मैंने अपने आप को इस दुविधा से दूर करते हुए सिर्फ राजकुमारी पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया. राजकुमारी छाया की हो या सीमा की दोनों का स्वरूप लगभग एक ही था. मेरा राजकुमार यह जानता था राजकुमारी का मुख ध्यान आते ही राजकुमार लावा उगलने के लिए तैयार हो गया .
अगले दिन सीमा वापस जा रही थी. माया आंटी ने जाते समय सीमा के लिए दोपहर का खाना बना कर दे दिया था. वह बहुत खुश थी माया आंटी ने कहा
"सीमा बेटी छुट्टियों में यही आ जाया करो. तुम्हारा मन भी लगेगा और हम लोग भी तुमसे मिल लेंगे"
मैं और छाया सीमा को छोड़ने नीचे तक आए जाते समय मैंने भी सीमा से कहा
"तुम्हारे आने से बहुत अच्छा लगा हम तुम्हारा अगले वीकेंड पर भी इंतजार करेंगे"
वह खुश हो गई चली गई.
मैं और छाया दोनों एक दूसरे को देखते रहे. छाया ने सीमा को वापस लाकर मेरे लिए आगे की राह आसान कर दी थी.
 
भाग -12
छाया का मुझे मनाना
छाया ने वापस आते समय ने मुझसे कहा आपने मेरा बहुत ख्याल रखा है हमारे बीच जो फासला बन गया है उसे सिर्फ सीमा ही भर सकती है. सीमा एक अच्छी लड़की है मैं इस बात की गारंटी देती हूं. आप सीमा को स्वीकार कर सकते हैं. पर उसे आपको ही मनाना होगा. मैं छाया की समझदारी पर बहुत खुश था मैंने छाया से कहा
"मैं तुम्हारा गुनहगार हूं मैंने तुम्हारे साथ इतने दिनों तक अंतरंग वक्त बिताया है और हमें इस तरह अलग होना पड़ा यह मुझे अपराध बोध से ग्रसित रखता है"
उसने कहा
"उन अंतरंग पलों का जितना आनंद मैंने लिया है शायद आपने न लिया हो. वह मेरे लिए बहुमूल्य है मुझे उस बात का कोई अफसोस नहीं है. अपने कौमार्य को सुरक्षित रखते हुए यह संबंध मैं अब भी आपसे भी रख सकती हूँ मैं आपकी प्रेयसी न सही दोस्त तो अब भी हूँ."
घर का दरवाजा आ चुका था और हम दोनों अपने अपने कमरों की तरफ चले गए.

अगले शनिवार को छाया ने सीमा को फोन करके फिर से बुला लिया था. अब हमारे पास दो रातें थी हम तीनों ने बहुत सारा वक्त एक साथ गुजारा था. छाया बीच-बीच में मुझे और सीमा को पास लाने का पूरा प्रयास कराती. हम दोनों का मन भी परिस्थितियों वश एक दुसरे का हो चला था.. धीरे धीरे एक दो मुलाकातों में सीमा ने अपनी रजामंदी दे दी.

छाया अब घर के अभिभावक के रूप में काम कर रही थी. उसने माया आंटी को सारी बातें खुलकर बता दी. माया आंटी ने भी सीमा को सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह हमारे घर के लिए सर्वथा उपयुक्त थी. वह छाया की एक बहुत अच्छी सहेली थी और मेरे से पूर्व परिचित भी थी. माया आंटी ने सीमा के माता-पिता से हमारे संबंधों की बात की वह मुझे अच्छे से जानते थे और उन्होंने अपनी रजामंदी तुरंत दे दी.
कुछ ही दिनों में मेरी और सीमा की मंगनी हो गई और 3 महीनों के बाद का शादी का दिन भी निर्धारित हो गया. मेरे और सीमा के शादी के फैसले में छाया का बहुत बड़ा योगदान था। उसने ही हम दोनों का मिलन कराया था. हम दोनों उसके बहुत शुक्रगुजार थे. हम दोनों ने ही उसके साथ एकांत में वक्त बिताया था और अपनी काम पिपासा को उसकी मदद से हर संभव तरीके से बुझाया था. वह हम दोनों को हर तरीके से खुश रखती आई थी पर अब हम एक हो चुके थे और वह अकेली थी.
मंगनी का समारोह समाप्त हो जाने के बाद सभी लोग अपने-अपने घर वापस चले गए सीमा भी अपने परिवार वालों के साथ कुछ दिनों के लिए चंडीगढ़ चली गई.
आयोजन से थका हुआ मैं अपने कमरे में आराम कर रहा था. छाया चाय लेकर मेरे कमरे में आई मैं समझ गया माया आंटी घर पर नहीं हैं. मैंने फिर भी पूछा
"तुम"
उसने कहा
"वह दोनों लोग बाहर गए हैं दो-तीन घंटे में लौटेंगे" मैं उठकर चाय पीने लगा और वह भी मेरा साथ देने लगी उसने दो कप चाय लायी थी. मैंने एक बार फिर से उसे धन्यवाद दिया. वह भी बहुत खुश थी. चाय खत्म होने के बाद उसने मेरी चादर खींची और बोला
"जल्दी से नहा लीजिए मैं नाश्ता लगा रही हूं" चादर के हटते ही मेरा राजकुमार बाहर आ गया. मैं राजकुमार से खेलते खेलते सो गया था और अपनी पजामी को ऊपर करना भूल गया था. छाया मेरे राजकुमार को कई दिनों बाद देख रही थी. उससे बर्दाश्त ना हुआ उसने उसे अपने हाथों में ले लिया और कहा
"तुमने मेरी और मेरी राजकुमारी की बहुत मदद की है" ऐसा कहकर उसे प्यार से सहलाने लगी और मेरी उत्तेजना बढ़ने लगी. मेरे हाथ छाया की तरफ बढ़ने लगे यह सब अपने आप होता चला गया. कुछ ही देर मे छाया मेरी बाहों में थी.
हम दोनों कई महीनो बाद नग्न होकर एक दूसरे को बेतहाशा चूम रहे थे. छाया की राजकुमारी को छूते समय मुझे बालों का एह्साह हुआ. राजकुमारी बालों से ढक गई थी. पिछले कई दिनों से छाया प्रूरी तरह व्यस्त थी. शयद छाया ने अपनी राजकुमारी को सजाया संवारा नहीं था. आखिर वह करती भी किसके लिए. राजकुमारी को बालों में डूबा देख मैं थोड़ा दुखी हो गया. मैंने कहा राजकुमारी का क्या हाल बना रखा है. वह मुस्कुराकर बोली
"राजकुमार के वियोग में उसकी दाढ़ी बढ़ गई कहकर वह हंस पड़ी." कहते हुए उसने राजकुमार को सहला दिया.
उसकी हंसी पहले जैसी ही मादक थी. मैंने उसकी राजकुमारी देखना चाहा पर वो तैयार नहीं हुई शायद वह बालों की वजह से शर्मा रही थी.
कुछ ही देर में हम वापस एक दूसरे से लिपटे हुए अपने राजकुमार और राजकुमारी को एक दूसरे पर रगड़ रहे थे. हमारे होंठ एक दूसरे में फिर उलझे हुए थे. मैंने छाया के नितंबों को अपनी और खींच रखा था. कई महीनों बाद हम दोनों इस सुख का आनंद ले रहे थे. कुछ ही समय में मेरे राजकुमार ने राजकुमारी के कंपन महसूस कर लिए छाया के मुह से "मानस भैया ..........." की धीमी आवाज कई महीनो बाद आ रही थी.
मैं उसके चेहरे को चूम रहा था . मेरे राजकुमार ने भी वीर्यपात कर दिया। वीर्य हम दोनों के नाभि के आस पास फैल गया छाया अपना शरीर नीचे की तरफ ले गई अपने स्तनों से मेरी नाभि को छूकर वीर्य अपने स्तनों पर लगाया और नीचे झुकते हुए उसने मेरे राजकुमार को अपने होठों से चुंबन किया जिससे वीर्य की कुछ बूंदे उसके होठों पर लग गइ. वह वापस मेरे पास आयी और मेरे होठों पर किस करते हुए बोली
"हमारे बीच ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा बस आपको सीमा को बहुत खुश रखना होगा. जब तक वह खुश रहेगी आपको मेरा प्यार मिलता रहेगा. मैं आपको मंगनी में आपको कोई उपहार ना दे पायी थी. उम्मीद करती हूं कि मेरा यह उपहार आपको अच्छा लगा होगा"
छाया की बातें सुनकर मन प्रफुल्लित हो गया. उसने मुझे माफ कर दिया था. मैं उसे खुश करना चाहता था और वह मुझे उसका यह प्रेम आगे भी कायम रहेगा यह मेरे लिए स्वर्गीय सुख की बात थी. मैंने उसे अपने सीने से सगा लिया और उसे जीवन भर खुश रखने के मन ही मन वचनबद्ध हो गया.
मैंने उससे कहा छाया तुम बहुत अच्छी हो. वह मुस्कराई और बोली
"अच्छी दोस्त हूँ." उसने दोस्त पर विशेष जोर दिया था. मैं भी अब उसे अपना दोस्त मान चुका था.
कमरे से जाते समय भी वह नग्न ही थी. उसने अपने कपडे हाँथ में उठे हुए थे शायद वह नहाने जा रही थी. मैं उसके गोरे और मादक नग्न नितम्बों को हिलाते हुए देख रहा था. राजकुमारी के बढे हुए बाल भी जाँघों के बीच से दिखाई दे रहे थे.

सीमा मेरी मंगेतर
[ मैं छाया ]
कुछ दिनों बाद सीमा वापस बेंगलुरु आ चुकी थी. अब वह मानस की मंगेतर थी. आज से कुछ महीनों पहले तक मैंने मानस की मंगेतर के रूप में मानस के कमरे में कई महीने व्यतीत किए थे. उसकी सुनहरी यादें अभी भी मन को गुदगुदा जाती और मुझे रुला जाती है. पर मैं स्थिति को मन से स्वीकार कर चुकी थी. मुझे पता था मानस मुझसे बहुत प्यार करते है मैं उनकी दोस्त बनकर भी सारा जीवन काट सकती थी. वह मेरे लिए समय समय पर दोस्त, प्रेमी, सखा, भाई, पिता सबकी भूमिका में आते और उसे बखूबी निभाते.
सीमा इस बार भी वीकेंड पर हमारे घर आई. मैंने उसके लिए आज विशेष इंतजाम कर रखा था. मानस को मैरून कलर की नाइटी बहुत पसंद थी. मैंने उनकी पसंद को ध्यान रखते हुए एक ट्रांसपेरेंट नाइटी खरीद ली थी. नाइटी के ऊपर एक गाउन भी था जिसे पहन लेने पर नाइटी की पारदर्शिता खत्म हो जाती थी . शाम को मैं सीमा को लेकर अपने कमरे के बाथरूम में गई और हम दोनों ने एक दूसरे को शावर के नीचे खूब प्यार किया. बाहर आने के बाद मैंने उसे नाइटी पहनाई जिसे देखकर वह बहुत खुश हो गयी.
वह अत्यंत सुंदर लग रही थी. उसने मुझसे कहा
*लगता है तुमने आज रात के लिए विशेष तैयारी कर रखी है. मेरी ननद मेरा इतना ख्याल रखेगी यह मैंने कभी नहीं सोचा था"
ननद शब्द सुनकर मेरे मन में बिजली दौड़ गई. मेरे और मानस के बीच बन चुके संबंधों में इस शब्द की कोई गुंजाइश नहीं थी पर यह सीमा के शब्द थे जो इससे पूरी तरह अनभिज्ञ थी. मैंने उसे सजाया. पैर्रों में आलता लगाया, पायल पहनाई बाल सवारे. मानस को सजे हुए पैर अच्छे लगते थे.
हम सब खाने की टेबल पर आ चुके थे. टेबल पर दो अत्यंत खूबसूरत नवयुवतियों को नाइटी में देखकर मानस के चेहरे पर खुशी स्पष्ट दिखाई दे रही थी. खाना खाने के पश्चात हम सब हमेशा की तरह मानस की बालकनी में चले गए. कुछ देर बात करने के बाद मैंने कहा
"अच्छा सीमा मैं चलती हूं तुम्हारे कपड़े मानस भैया के कमरे मैं ही रखे हैं तुम रात में यहीं सो जाना." इतना कहकर मैं मानस के कमरे से वापस आने लगी सीमा भी मुझे छोड़ने दरवाजे तक आई और बार-बार बोल रही थी
"यह ठीक नहीं रहेगा माया आंटी भी है कितना खराब लगेगा" मैंने उसकी राजकुमारी को ऊपर से छुआ और बोली
"एक बार इसको राजकुमार से मिला तो लो. पता नहीं इतने दिनों में राजकुमार का क्या हुआ होगा? आखिर विवाह तो राजकुमारी का भी होना है। उसे अपने होने वाले राजकुमार को देखने का पूरा हक है" मैं हंसते हुए वापस आ गइ सीमा भी हंसते हुए दरवाजा बंद कर रहे थी.

वर्षो बाद सीमा के साथ.

[मैं मानस ]
बालकनी से उठकर मैं भी कमरे में आ गया था. सीमा दरवाजे की चिटकिनी लगाकर मुड़ी ही थी कि मुझसे नजरें मिलते ही उसने अपनी नजरें झुका ली. उसे चिटकिनी लगाते देखकर मैंने हमारे बीच होने वाले घटनाक्रम को अंदाज़ कर लिया था. वह नजरें झुकाए खड़ी थी. मैं धीरे-धीरे उसके पास गया और उसका हाथ पकड़ लिया. इससे पहले कि वह कुछ बोल पाती मैंने उसके माथे पर चुंबन जड़ दिया. कुछ ही देर में हम दोनों एक दूसरे के आलिंगन में थे.

[मैं सीमा ]
आज लगभग 4-5 वर्ष बाद मैं मानस के साथ थी. हम दोनों ही काफी बदल गए थे. सोमिल से मेरी आखिरी मुलाकात आज से लगभग २-३ वर्ष पहले हुई थी. मैंने उसके बाद किसी और पुरुष से कोई संबंध नहीं रखा था. सोमिल की यादें मेरे जेहन में अभी भी ताजा थी. धीरे-धीरे हम दोनों एक दूसरे से प्यार कर बैठे थे. पर शायद नियति को यह मंजूर नहीं था. वह अचानक मेरी जिंदगी से दूर चला गया था और मैं चाह कर भी उसको नहीं ढूंढ पाई. मुझे नहीं पता कि वह मुझे ढूंढ रहा था या नहीं पर इस दूरी को खत्म करने का कोई उपाय नहीं बचा था . मेरे माता-पिता का दबाव मुझ पर लगातार बढ़ रहा था. उनकी इच्छा थी कि मैं शादी कर लूं. हालांकि मेरी उम्र अभी बाईस वर्ष की ही थी पर माता-पिता की नजरों में बेटियां शायद जल्दी बड़ी हो जाती है. वह मेरी शादी के लिए बहुत ही उत्सुक थे. उन्हें सोमिल से कोई दिक्कत नहीं थी परंतु वह तो ईद की चांद की तरह गायब हो गया था. मानस को अपना जीवनसाथी बनाना मेरे लिए गर्व की बात थी. पर वह मुझे किस प्रकार की लड़की समझते थे यह मेरे लिए प्रश्न चिन्ह था? मैंने किशोरावस्था में ही उसके साथ आगे बढ़कर सेक्स संबंध कायम किए थे यह मुझे अब लगता था कि लड़कियों को ऐसा नहीं करना चाहिए. मुझे लगता था मानस मुझे थोड़ी बदमाश टाइप की लड़की समझते होंगे. परंतु इस शादी के लिए उसने मुझे स्वीकार कर लिया था. मैं बहुत खुश थी और आज उसकी बाहों में लिपटी हुए उसके चुम्बनों का जवाब दे रही थी.
कुछ ही पलों में हमारे कपड़े एक दूसरे के शरीर से अलग होते चले गए. कौन किसके कपड़े कब खोल रहा था इसका हम दोनों को होश न था. शायद मानस को भी अपनी प्रेमिका से बिछड़े काफी समय हो चुका था और मैं तो किसी पुरुष शरीर को लगभग २-३ साल बाद छू रही थी. आगे क्या होने वाला था मुझे खुद नहीं पता पर मैंने दृढ़निश्चय किया हुआ था कि अपना कौमार्य विवाह के पहले भंग नहीं होने दूँगी. कुछ ही पलों में हम पूर्ण नग्न अवस्था में थे. मेरा हाथ मानस के राजकुमार को अपने आगोश में लिया हुआ था. परंतु मैं उसे देख नहीं पा रही थी क्योंकि हम दोनों के होंठ एक दूसरे में अभी भी सटे हुए थे.
अचानक "मानस भैया" ने मुझे को अपनी गोद में उठा लिया क्षमा कीजिएगा अब वह मेरे लिए "मानस भैया" नहीं थे. मैं उनकी मंगेतर बन चुकी थी.
उनका एक हाथ मेरी कमर को सहारा दिया हुआ था तथा दूसरा मेरी जांघों के नीचे था मैंने अपने हाथ उनकी गर्दन पर रख कर उन्हें पकड़ी हुयी थी. मेरा दाहिना स्तन उनके स्तन से से छू रहा था. उनका राजकुमार मेरे नितंबों के निचले भाग पर छूने लगा. वह मुझे गोद में लिए हुए धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ने लगे. मुझे यह दृश्य बेड के साथ लगे हुए आईने में दिखाई पड़ा. अत्यंत कामुक दृश्य था. मैं खुद भी शर्मा गई. उन्होंने मुझे बिस्तर पर लाकर रख दिया. बिस्तर पर एक सुंदर सी सफेद रंग की चादर बिछी हुई थी जिस पर 2 गोल्डन कलर के तकिए पड़े हुए थे. मुझे बिस्तर पर लिटाने के बाद उन्होंने मेरे सिर के नीचे तकिया रख दी और बहुत देर तक मुझे यूं ही निहारते रहे. मेरी आंखें शर्म से झुक गई थीं. उन्होंने मेरे हर भाग को बड़े प्रेम से देखा उनकी नजरें मेरे मुख मंडल से होते हुए स्तनों, कमर. नाभि मेरी जाँघों से होते हुए मेरे पैरों तक गयीं. हर भाग को वह अपनी कामुक निगाहों से देख रहे थे. मुझे लगता है वह पुरानी सीमा को आज नए रूप में देखकर खुश हो रहे थे. मेरी नजरें भी राजकुमार पर पड़ चुकी थी. राजकुमार पहले की तुलना में ज्यादा बलिष्ठ और युवा हो चुका था. उसकी कोमलता पहले से कुछ कम हो गई थी. राजकुमार पर तनी हुई नसें साफ साफ दिखाई पड़ रहीं थीं. उसका मुखड़ा आधे से ज्यादा खुला हुआ था और एकदम लाल दिखाई पड़ रहा था. राजकुमार रह-रहकर उछल रहा था मुझे उसे अपने हाथों में लेने का बहुत मन कर रहा था. पर आज मैं सब कुछ मानस के इशारे पर ही करना चाह रही थी. उनसे नजरें मिलते ही मैं अपनी आंखें बंद कर लेती थी। वह धीरे-धीरे बिस्तर पर आ गए और मेरी दोनों जांघों के बीच आने के बाद उन्होंने मेरे जांघों को फैलाना शुरू किया. मैं उनका इशारा समझ गई. मैंने अपने हाथों से जांघों को ऊपर की तरफ ले गयी. कुछ ही देर में मेरी दोनों जांघे मेरे पेट से सटी हुई थीं और पूरी तरह फैली थी. मेरी राजकुमारी कि दोनों होंठ अब अलग हो रहे थे. मैं अपनी राजकुमारी को इस तरह मानस के सामने खुला हुआ देखकर शर्म से पानी पानी हो रही थी. पर यह तो होना ही था राजकुमारी से निकलने वाला प्रेम रस दोनों होठों के बीच लबालब भर चुका था और धीरे धीरे नीचे की तरफ बहने को तैयार था. और अंततः वही हुआ प्रेम रस की बूंद होंठों से उतर कर नीचे की ओर बढ़ने लगी और देखते ही देखते मेरी दासी पर रुक गयी. मैं मानस के अगले कदम का इंतजार कर रही थी परंतु वह सिर्फ इस अद्भुत दर्शन का आनंद ले रहे थे. अचानक उनकी आवाज मेरे कानों तक आई
"सीमा तुम बहुत ही खूबसूरत हो" मैं तुम्हें अपनी मंगेतर के रूप में पाकर बहुत प्रसन्न हूँ. अपनी आंखें बंद कर लो और जब तक मैं ना कहूं आंखें मत खोलना. मैंने अपनी आंखें बंद कर ली अचानक मुझे अपनी राजकुमारी के होठों पर किसी चीज के रेंगने का एहसास हुआ मुझे लगा की मानस अपनी उंगलियां फिरा रहे हैं पर जल्दी ही मुझे एहसास हो गया कि यह उनकी जीभ थी.
मुझे मानस द्वारा किशोरावस्था में किया गया मुख मैथुन याद आ गया. वह वास्तव में एक दिव्य अनुभूति थी और आज लग रहा था वही अनुभूति दोबारा प्राप्त होने वाली थी. मेरी राजकुमारी को चूमने वाले वह पहले पुरुष थे. मेरे इतना सोचते सोचते उनकी जीभ दोनों होठों के अंदर काफी तेजी से घूमने लगी. जब वह मेरी राजकुमारी के मुख तक आती और अंदर तक प्रवेश कर जाती. उनके होंठ मेरी राजकुमारी के होठों से छूने लगते. पर एक स्थिति के बाद वह बाद रुक जाते. वो अपनी जीभ से मेरी राजकुमारी मुकुट को भी सहला रहे थे. राजकुमारी अत्यंत उत्तेजित हो रही थी. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था. अचानक उन्होंने अपने हाथ मेरे स्तनों की तरफ बढ़ाएं. मेरे स्तन जो पहले छोटे हुआ करते थे अब वह सुडौल और पर्याप्त बड़े हो चुके थे. मानस के हाथों में आते ही मेरे निप्पल एकदम कड़क हो गए. उन्होंने अपनी उंगलियों के बीच में मेरे निप्पल को जैसे ही लिया मेरी राजकुमारी के कंपन शुरू हो गए अगले 10- 15 सेकंड तक मेरी राजकुमारी कांपती रही और प्रेम रस बहता रहा. मानस ने स्थिति भापकर मेरी राजकुमारी को अपने होठों से यथासंभव घेर रखा था. राजकुमारी के स्खलित होते ही मेरी जांघें ढीली पड़ गयी. मैंने अपने दोनों पैर नीचे कर लिए. मानस भी अब अपना चेहरा मेरी जांघों के बीच से निकाल चुके थे. मेरी नजर उन पर पढ़ते ही ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई शेर अपना शिकार खाकर मुंह हटाया था. उनके होठों और नाक पर मेरा प्रेम रस लिपटा हुआ था. वह मेरी तरफ चुंबन करने आ रहे थे. मुझे पता था मुझे अपने ही प्रेम रस का स्वाद चखने को मिलेगा और हुआ भी यही उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पर लगा दिए. उन्होंने कहा
"आज चार-पांच वर्षो बाद अपनी प्यारी राजकुमारी से मिला हूं मुझे बहुत अच्छा लगा सीमा. मेरी जिंदगी में तुम्हारा स्वागत है" होठों पर चुंबन के दौरान उनका राजकुमार मेरी राजकुमारी के होठों पर अपनी दस्तक दे रहा था. वह कभी दरारों में प्रवेश करता और राजकुमारी के मुख तक पहुंचता कभी वह मेरी भग्नाशा को छूने के बाद वापस अपनी जगह पर पहुंच जाता. वो यह बार-बार कर रहे थे. लिंग का उछलना जारी था. जब वह मेरी राजकुमारी के मुख पर पहुंचते एक बार के लिए मैं डर जाती कि कहीं मेरा कौमार्य तो नहीं भंग हो जाएगा पर वह इस बात को समझते थे. विवाह पूर्व किया गया कौमार्य भंग उन्हें बिल्कुल नापसंद था. कुछ ही पलों में उनके राजकुमार कि आगे पीछे होने की गति बढ़ती गई और राजकुमार का लावा फूट पड़ा. एक बार फिर मैंने अपने स्तनों और चेहरे पर उनके वीर्य की धार महसूस की वह भी कई वर्षों बाद. हम दोनों इसी अवस्था में लिपट कर सो गए
 
छाया। भाग -13
विवाह की तैयारी
(मैं मानस)

हम लोगों ने तय किया की विवाह बेंगलुरु से ही किया जाए. सीमा के घर वाले चंडीगढ़ में थे पर वह बेंगलुरु आने के लिए तैयार हो गये थे. हम लोगों ने एक शादी का बड़ा हॉल बुक कर लिया था जिसमें वर वधू पक्ष के रहने के लिए अलग-अलग अवस्थाएं थी. मैरिज हाल खूबसूरत और अच्छी लोकेशन पर था तथा सर्व सुविधा सम्पन्न था.

मैंने गांव से सभी परिचित लोगों को निमंत्रित किया जो कमजोर लोग थे उनको फ्लाइट की टिकट तक भेज दी. निमंत्रण से बहुत खुश थे. सही समय पर गांव से सभी परिचित लोग आ चुके थे. गांव वालों की उपस्थिति ही विवाह कार्यक्रम में एक अलग किस्म का आनंद जोड़ देती है. उन्हें इन बड़ी शादियों की प्रतीक्षा होती है. शहर में रहने वाले लोग तो सिर्फ कुछ घंटों के लिए विवाह कार्यक्रम का आनंद लेते हैं और रात्रिभोज के बाद अपने अपने रास्ते चले जाते हैं पर गांव से आए लोग पूरे कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए रखते हैं और विवाह को रंगीन बनाए रखते हैं.

सीमा की ओर से मंजुला चाची ने कमान संभाल रही थी. थी और हमारी तरफ से माया आंटी ने. छाया इस क्कार्यक्रम की मुख्य निर्देशिका थी. सब उसकी राय से कार्यक्रम को आगे बढ़ाते. शर्मा जी भी अपनी विदेश यात्रा से आकर इस विशेष कार्यक्रम के शामिल थे. गांव वालों से उनका परिचय मेरे सीनियर अधिकारी के रूप में कराया गया था. वह इस कार्यक्रम में मेरे पिता की भूमिका में दिखाई पड़ रहे थे. वह पूरे जोर-शोर से इस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे.

गांव की शादियों में महिलाओं के झुण्ड का बड़ा योगदान होता है वह सब तरह तरह की रस्में करतीं हैं और इन रस्मो का भी एक अपना आनंद होता है. हमारा विवाह अंततः सभी की सहमति से हो रहा था. मुझे सिर्फ छाया की चिंता थी पर वह अब परिपक्व हो चुकी थी। उसका दुःख कभी उसके चेहरे पर नहीं आता. रस्मों के दौरान वह मेरे पास आती तो मुझे कभी कभी उसके चेहरे के पीछे उसके आंसू दिखाई दे जाते.

लड़कियां कितनी भी परिपक्व हो जाए अपनी भावनाएं नहीं छुपा पाती. आखिर मेरी प्यारी छाया भी एक लड़की ही थी।

इस विवाह में एकमात्र दुख मुझे छाया को लेकर ही था. पर धीरे-धीरे कार्यक्रम आगे बढ़ रहे थे. भविष्य में क्या होने वाला था मैं नहीं जानता पर मैं कहीं न कहीं इस बात को लेकर थोड़ा दुखी अवश्य था. महिलाओं का झुंड जब भी आता अलग-अलग प्रकार की रस्में करता इतनी सारी महिलाओं को एक साथ देख कर मन में अजीब अनुभूति होती अपने इस शादी में मैं मुख्य अतिथि जैसा महसूस कर रहा था. गांव के सभी लोग मुझे इज्जत और सम्मान की निगाहों से देख रहे थे मेरी प्रतिष्ठा शिखर पर थी. छाया को सजा धजा और खुश देख कर सब उसकी खुशी में मेरी उपलब्धता देखते. छाया अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी उसकी नौकरी के बारे में जानकर सब गांव वाले मुझे ही बधाई देते. पिछले कुछ दिनों में छाया ने अपना दुख को छुपाने के लिए अपनी कामुकता को और जीवंत कर दिया था. वह मुझे हर मौके पर खुश करने के लिए कुछ नया करती और मैं उसे अपनी पत्नी न बना पाने की लिए थोड़ा दुखी हो जाता.

अनूठा उपहार
(मैं छाया)

मानस भैया के तिलक का कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. विवाह तींन दिन बाद होने वाला था. जिस विवाह की कल्पना में हम दोनों ने पिछले 3-4 वर्ष निकाले थे वो दिन आ चुका था. पर नियत की विडंबना थी मेरी जगह वहां सीमा दीदी को बैठना था. मानस और मैं एक दूसरे से अभी भी बहुत प्यार करते थे पर जो होना था वह हो रहा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं मानस को क्या उपहार दूं पर मैं उसे यादगार बनाना चाहती थी. अंततः दृढ़ निश्चय करने के बाद मैंने मानस से कुछ घंटे एकांत में बिताने का समय मांगा. वह बोले
" इस शादी के बीच में यह कैसे संभव होगा "
" मैंने कहा यह आप देखिए."
"तुम खुद भी कैसे फ्री हो पाओगी सब तैयारी तुम्हारे ही मार्गदर्शन में हो रही है"
"मैं ब्यूटी पार्लर के नाम पर समय निकाल लूंगी"
मेरी बातों में जिद थी वो मान गये. मेरी बात टालना उनके लिए असंभव था. वो मुझे बहुत प्यार करते थे.

हमने विवाह मंडप के अलावा कुछ होटलों में भी कमरे से ले रखे थे. एक होटल के कमरे के गेस्ट को आने में समय था. मानस ने दो दिन बाद दोपहर में ३.०० बजे का समय निर्धारित किया. मेरे पास २ दिन का वक्त था. मैंने अपनी पूरी तैयारी कर ली और हम तय वक्त पर होटल के लिए निकल चुके थे. मानस बार-बार मुझे प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहे थे वह समझ नहीं पा रहे थे कि मैं उनके साथ क्या करने वाली हूँ. आपसी प्यास तो हम समारोह के बीच भी बुझा ही लेते थे. कार की सीट पर पीछे बैठे बैठे हैं वह मेरे हाथों को सहला रहे थे. मेरे चेहरे पर भी घबराहट भी और मन में भी. एक कुछ ही देर में हम होटल के कमरे में थे.

[मैं मानस]

कमरे में पहुंचते ही छाया ने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया और मेरे राजकुमार को अपने हाथों सहलाते हुए कहा
"इस राजकुमार को मैंने बहुत प्यार किया है और कल से यह किसी और का हो जाएगा" मैं इसे एक अनूठा उपहार देना चाहती हूँ. आपको मुझे इसमें सहयोग करना होगा."
मैं अभी भी उसकी मंशा समझ नहीं पा रहा था पर उसके हाथों में आते ही राजकुमार स्वयं उठ खड़ा होता था इसमें मेरा कंट्रोल बिल्कुल भी नहीं होता था.
जैसे छोटे बच्चे अपनी माँ को देखते ही उसके गोद में आने के लिए अपना हाँथ आगे बढ़ा देते हैं वैसे ही मेरा राजकुमार तन कर छाया के हाँथ में आ जाता था.
मैंने उसे अपने आगोश में ले लिया मैंने कहा
" ठीक है जो तुम्हें लगता है वह करो" उस दिन उसने एक सुंदर सा सलवार सूट पहना हुआ था. उसने दुपट्टे से मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी और मुझे बिस्तर पर लिटा दिया. मेरे कपड़े उसने पहले ही खोल दिए थे मैं बिस्तर पर नग्न लेटा हुआ था. मेरा राजकुमार पूरी तरह अपना छाया के हाथो अपना स्खलन कराने के लिए तैयार था. मेरी आंखों पर पट्टी बंधी होने की वजह से मैं छाया को नहीं देख पा रहा था. छाया अब मेरे ऊपर आ चुकी थी और मुझे उसके स्तनों का एहसास हो रहा था. मेरे हाथ उसके स्तनों को सहला रहे थे. उसके होंठ मेरे होंठों पर थे. राजकुमार राजकुमारी के होंठो में अपना स्थान तलाश रहा था. कुछ ही देर में छाया धीरे-धीरे मेरे छाती को चुमती हुई नीचे की तरफ बढ़ी. अब राजकुमार उसके मुख में अठखेलियां कर रहा था. उसने अबकी बार अपने मुख से एक कृत्रिम योनि का निर्माण किया और राजकुमार को वह सुख देने लगी. राजकुमार को यह क्रिया बहुत पसंद थी और वह उछल रहा था अचानक मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे छाया उसके ऊपर कोई चीज लपेट रही थी. राजकुमार उस अनजाने आवरण के अंदर आ गया था. एक बार के लिए मैं डर गया की कही छाया ने बदला लेने के लिए कुछ और तो नहीं सोचा है?
पर वह मेरी प्यारी छाया थी. बदला ? यह असंभव था. हम दोनों एक दुसरे के लिए जान भी दे सकते थे.
मेरी आंखें बंद थी और कौतुहल चरम पर. राजकुमार का तनाव कुछ कम जरूर हुआ पर वह वापस सामान्य रूप से तन गया था. छाया अपने हाथों से राजकुमार को सहला रही थी कुछ ही देर में मुझे अपनी कमर पर छाया के बैठने का एहसास हुआ. उसके दोनों पैर मेरी जांघों के दोनों ओर थे. उसकी राजकुमारी राजकुमार के संपर्क में थी. पर उस लिपटी हुए चीज की वजह से दोनों में सीधा संपर्क नहीं हो पा रहा था. मैं अपने हाथ उस चीज को हटाने के लिए बढाया पर उसे छाया ने रोक लिया छाया. वह एक बार फिर मेरे होठों तक आई और मुझे प्यार से चूम लिया.
कुछ ही देर में मुझे अपने राजकुमार के मुख पर किसी पतले और सकरे रास्ते का अनुभव हुआ. छाया का वजन मेरे राजकुमार पर बढ़ता जा रहा था. राजकुमार अब दर्द में था पर वह उस पतले रास्ते में प्रवेश कर रहा था. जैसे जैसे छाया की कमर धीरे-धीरे नीचे आ रही थी राजकुमार उस अनजानी सकरी और तंग गुफा में जा रहा था. छाया हांफ रही थी. मैं समझ नहीं पा रहा था की छाया यह क्या कर रही हैं. मैं तो अद्भुत आनद में था. राजकुमार ने यह अनुभव पहली बार प्राप्त किया था. मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपना कौमार्य आज ही परित्याग कर रही हो. यह मेरे लिए पीड़ादायक चीज होती मैंने उसे वचन दिया था कि उसका कौमार्य भंग नहीं होने दूंगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भावावेश में आकर ऐसा कर रही हो. मैं इतना सोच ही रहा था की तभी छाया के नितंबों का एहसास मुझे अपनी जाँघों पर हुआ. राजकुमार अनजानी गुफा में पूरी तरह प्रवेश कर चुका था. छाया की कोई और गतिविधि मुझे महसूस नही ही रही थी।
राजकुमार उस गहरी गुफा में जाने के बाद पूरी तरह तन चुका था. अचानक छाया मेरी तरफ झुकी और मेरे होठों को अपने होंठों के बीच ले लिया और मेरी आंखों पर पड़ी हुई पट्टी स्वयं ही हटा दी. मैंने आंखें खोली और अपनी उसकी आंखों में आंसू थे. आंसू की एक बूंद मेरे गाल पर भी गिरी. मैंने अपने हाथों से उसके आंसू पोछे और उसके गाल अपने गाल से सटा लिए . मैं उससे यह भी नहीं पूछ पा रहा था उसने मेरे राजकुमार के साथ क्या किया. कुछ ही देर में वह सामान्य हो गई और वापस मेरे होठों को चूमने लगी. अब वह अपनी कमर को आगे पीछे कर रही थी. मेरा राजकुमार उस अनजानी और गहरी गुफा मैं आगे पीछे हो रहा था. वह तो इन्हीं गुफाओं की प्रतीक्षा में पिचले २५ वर्षों से था. उसे पतले और तंग रास्ते हमेशा से पसंद थे. उसकी उछल कूद बढ़ रही थी. मैं इस अद्भुत आनंद के लिए छाया का ऋणी हो रहा था. मुझे बार-बार चूमती जा रही थी. उसने कमर हिलाने की गति बढ़ा दी. कुछ ही देर में मेरे राजकुमार ने गहरी गुफा की चाल से अपनी गति मिला ली. अब मेरी कमर भी उसी गति में हिलने लगी. छाया मुझे चूमती जा रही. कुछ ही देर में राजकुमार स्खलित होने के लिए तैयार था मैं अपने राजकुमार को उस गुफा से बाहर निकालना चाहता था और हमेशा की तरह अपनी प्यारी छाया को भिगोना चाहता था पर मैंने राजकुमारी के कंपन अभी तक महसूस नहीं किये थे. राजकुमार राजकुमारी को छोड एक अलग ही दुनिया में आनंद ले रहा था. एक बार के लिए मुझे लगा जैसे छाया ने कोई कृत्रिम योनी लायी थी. पर छाया मुझसे सटी हुए थी मैं नीचे नहीं देख पा रहा था. राजकुमार का लावा फूटने वाला था मैं उसे बाहर निकालना चाह रहा था पर बिना छाया के सहयोग के बाद संभव नहीं था. वह अपनी गति को विराम नहीं दे रही थी अंततः राजकुमार ने अपना वीर्य उसी गहरी गुफा में छोड़ दिया. इसका आनंद भी अद्भुत था. वीर्य प्रवाह के दौरान थे मैं अपनी कमर को बड़ी तेजी से हिला रहा था. राजकुमार भी गहरे तक उतर जाना चाह रहा था.
वीर्य स्खलन समाप्त होते ही मैं सुस्त हो गया. छाया मुझे अभी भी चूम रही थी. कुछ देर बाद छाया उठ रही थी. मेरा राजकुमार उसकी इस अनजानी गुफा से बाहर आ रहा था. मुझे उसकी राजकुमारी मुझे स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. और मेरा राजकुमार अभी भी अनजानी गुफा के अंदर था.
मुझे समझते देर न लगी कि आज छाया ने मेरे वचन की लाज रखते हुए मेरे राजकुमार को उपहार में अपनी प्रिय दासी को समर्पित किया था. छाया की दासी से राजकुमार अब बाहर आ रहा था वह पूर्णता स्वच्छ और साफ दिखाई दे रहा था. छाया ने अपने हाथों से उस रबड़ नुमा चीज को बाहर निकाला. मेरा सारा वीर्य उस रबड़ नुमा थैली में एकत्रित हो गया था. छाया उसे लेकर बाथरूम की तरफ चल पड़ी. वापस आने के बाद उसने मुझे फिर से चुमाँ और राजकुमार को अपने हाथों से सलाया राजकुमार बहुत खुश था. उसने उछल कर अपने अंदाज में छाया को धन्यवाद दिया.
मैंने छाया की राजकुमारी को सहलाने की कोशिश की उसने रोक दिया और कहा
"चलिए देर हो रही है कुछ ही देर में हम दोनों वापस टैक्सी में थे" मैंने छाया का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा
" छाया तुम अनूठी हो और तुम्हारा उपहार भी अनूठा था" मेरी बातें सुनकर वह बहुत खुश हो गई थी उसने मेरा हाथ चूम लिया और कहां
"मानस भैया मुझे भूख लगी है. मैंने दो दिन से अन्न नहीं खाया है."
मैं समझ गया और फिर से उसे चूम लिया. मैंने उसकी पसंद का पिज्जा लिया वो उसे खाते हुए बोली
"मैं आपकी और अपने राजकुमार की खुशी के लिए किसी हद तक जा सकती हूँ" मैं मुस्कुरा रहा था पर मेरी आँखों में आसू थे. कुछ ही देर में हमारी गाड़ी विवाह मंडप के पोर्च में थी.
 
भाग -14
विवाह कार्यक्रम

(मैं छाया)
मानस की हल्दी का कार्यक्रम हो रहा था। गांव से आई हुई सारी महिलाएं मानस को हल्दी लगा रही थी और तरह-तरह के विवाह गीत गा रही थीं। विवाह गीत की मधुरता हर सुनने वाले के कान में शहद घोल देती है। कुंवारी लड़कियां और कुंवारे लड़के इन गीतों को सुनने के पश्चात स्वयं को एक बार अवश्य उस जगह रख इन गीतों का आनंद लेते हैं। मानस भैया की हल्दी और चुमावन की रस्म में गाए जाने वाले गीतों में मुझे उनकी बहन कह कर संबोधित किया जा रहा था। मेरे लिए यह रिश्ता असहनीय हो गया था। मेरे और मानस के अलग होने में इसी रिश्ते का सबसे ज्यादा योगदान था। परंतु जो होना था वह रोका नहीं जा सकता था।
हल्दी की रस्म के पश्चात मानस कमरे से लगे बाथरूम में जाने लगे और सारी महिलाएं उस कमरे से बाहर आ गयीं। मेरी मां ने कहां अरे मानस की हल्दी तो ले लो बहू (सीमा) को भेजना होगा। सीमा की हल्दी के लिए शायद यह एक रस्म थी। मेरे मुंह से तपाक से निकला "मां मैं लेकर आती हूं" मैंने कमरे का दरवाजा खटखटाया और मानस ने दरवाजा खोला। वह अब तक तोलिया लपेटकर नहाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने पास पड़ी हल्दी का कटोरा उठाया और उनके पास आकर तोलिया हटा दिया। राजकुमार पता नहीं क्यों तनाव में था। मुझे लगा शायद हल्दी की रस्म में कई महिलाओं के हाथ शरीर पर लगने से राजकुमार उत्तेजित हो गया था। मैंने मुस्कुराते हुए अपने हाथों से हल्दी निकाली और राजकुमार पर लगा दी। मानस भैया बोले छाया मत करो कोई आ जाएगा। मैंने कहा
*मां ने कहा है आपके शरीर की हल्दी सीमा भाभी के लिए जाएगी इसलिए मैं आपसे शरीर से हल्दी ले रही हूँ" वह मेरी हल्दी लेने की इस विधि को देखकर मुस्कुराने लगे और अपने आलिंगन में ले लिया। मैंने राजकुमार को हल्दी से पूरा भिगो दिया और फिर अपने हथेलियों से दबाव बढ़ाते हुए उसके ऊपर लगी हुई सारी हल्दी उतार ली। मानस भैया के राजकुमार से निकली हुई लार इस हल्दी में शामिल हो चुकी थी। शायद यह लार सीमा भाभी के लिए उनका प्यार था। मैं उस अनूठी हल्दी को लेकर बाहर आ गयी। जब मैं मानस भैया के लिंग से अठखेलियां कर रही थी तो उन्होंने मेरे स्तनों को छू लिया था जिससे मेरे कंधों पर और स्तनों के ऊपर कपड़ों पर हल्दी के दाग लग गए थे। जैसे ही मैं कमरे से बाहर आई गांव की एक लड़की ने टोका "छाया दीदी मानस भैया के साथ साथ आपको भी थोड़ी हल्दी लग गई" मैं शरमा गई पास में खड़ी कई सारी महिलाएं हंसने लगी. वह यह तो नहीं समझ पायीं कि यह मानस के हाथों का कमाल था पर मेरी मां मुस्कुरा रही थी वह जान रही थी कि मैंने और मानस ने हल्दी की रस्म अपने हिसाब से ही निभा ली थी।
मां ने कहा छाया हल्दी लेकर जा और सीमा के घर वालों को दे दे वो इंतजार कर रहे होंगे। मैं मुस्कुराते हुए सीमा दीदी के कमरे की ओर चल पड़ी कुछ ही देर में सीमा भाभी की भी हल्दी की रस्म शुरू हो गई कमरे से आ रही हंसी की आवाजें आ रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे महिलाएं सीमा दीदी के प्यारे स्तनों और कोमल शरीर पर हल्दी लगा रही होंगी मैं भी उसमें शामिल होना चाह रही थी पर यह संभव नहीं था। मैंने इंतजार किया मैंने उस हल्दी में से कुछ भाग अपने हिस्से के लिए बचा कर रख लिया था। जैसे ही हल्दी की रस्म खत्म हुई और सारी महिलाएं बाहर आ गई तो मैंने सीमा दीदी को मोबाइल पर मैसेज कर मुझे बुलाने के लिए कहा । वह नहाने जाने से पूर्व मुझे बुलाने के लिए किसी लड़की को भेजा। मैं बाहर लॉन में इंतजार ही कर रही थी उनके बुलावे पर मैं अपने हाथ में थोड़ी सी हल्दी लिए हुए उनके कमरे में आ गयी। सीमा ने दरवाजा बंद कर लिया वह निश्चय ही यह जानती थी कि मेरे मन में कुछ ना कुछ जरूर चल रहा था उसने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया मैं पूरी सजी-धजी थी और वह हल्दी में डूबी हुई। मैंने सीमा दीदी का घाघरा खोल दिया वह अपने वजन से नीचे की तरफ सरक गया और सीमा दीदी मेरी आंखों के सामने कमर के नीचे नंगी हो गयीं। महिलाओं ने उनकी जांघों तक में हल्दी लगा दी थी पर उनकी राजकुमारी एकद साफ बची थी। मैंने अपने हाथों में ली हुई हल्दी को उनकी राजकुमारी पर लगा दिया मानस भैया के राजकुमार के लार में डूबी हुई वह हल्दी उनकी राजकुमारी पर लगाते समय मुझे हर्ष हो रहा था। वह मुस्कुरा रही थी उन्होंने कहा
"मेरा सारा शरीर तो हल्दी से मेरे रिश्तेदारों ने ढक दिया था सिर्फ यही जगह बाकी थी जो मेरी प्यारी छाया के लिए ही बची थी सच कहूं तो मुझे भी तुम्हारी इसी अदा का इंतजार था उन्होंने मुझे होठों पर चूम लिया हमारे पास समय कम था।

(मैं मानस)

मैं छाया को तैयारियों में व्यस्त देखकर उसका ऋणी हो रहा था। पिछले दिन उसका दिया हुआ अनूठा उपहार अद्भुत था। मुझे नहीं पता की सुहागरात के बाद संभोग में मुझे ज्यादा सुख मिलता या नहीं पर जो सुख छाया ने दिया था वह अद्भुत था. विवाह के दिन भी वह कई बार मेरे राजकुमार को तनाव में ले आती उसे सहलाती और बिना स्खलित किये हट जाती. एक दो बार मैंने भी उसके नितंबों को छुआ और राजकुमारी को सहला दिया इस भरी भीड़ भाड़ में ऐसा करना पर्याप्त रिस्क लेने जैसा था. पर यही तो उसकी आदत थी वह विषम परिस्थितियों में भी उत्तेजना कायम रखती थी.
लड़के की बहन होने के कारण इस कार्यक्रम में वह मुख्य भूमिका में थी. बारात जाने के दौरान उसने जी भर कर डांस किया था. सभी लोग उसके नृत्य के कायल थे। नृत्य कला में वह पहले भी पारंगत थी. उसने अपने कालेज में भी कई प्रोग्राम किए थे. उस नवयौवना का मादक नृत्य देखकर सारे लोग अचंभित थे. उसका नृत्य सबको अलग-अलग सुख दे रहा था। विवाह में आए मनचले लड़के उस नृत्य को देखकर अपने अपने राजकुमार में जरूर तनाव महसूस कर रहे होंगे. घोड़े की पीठ पर बैठा मैं स्वयम उसका नृत्य देखकर अचंभित हो रहा था. पर आज वह एक अलग किस्म के नशे में थी. उसने पूरे रास्ते नृत्य किया. उसकी वेशभूषा अत्यंत सुंदर थी. वह पूरे समय हमारे साथ विवाह कार्यक्रम में रही उसकी सुंदरता वधू पक्ष में भी चर्चा का विषय थी. हम दोनों एक आदर्श भाई बहन की भांति दिखाई पड़ रहे थे।
पुरुष और स्त्री में संबंध आपकी निगाहों से होता है. आज से 1 वर्ष पहले माया आंटी को हम दोनों कामदेव और रति दिखाई पड़ रहे थे पर आज लोगों की निगाहों में हम आदर्श भाई बहन के रूप में खड़े थे. हमें यह रिश्ता पूर्णतयः अस्वीकार था. छाया मेरी ऐसी प्रेमिका थी जिससे मेरा विवाह ना हो पाया था. पर हमारी आत्माएं पहले ही मिल चुकीं थीं।
अंततः विवाह संपन्न हुआ छाया ने मेरा और सीमा दोनों का ख्याल रखा था। विवाह संपन्न होने के बाद हम दोनों को बधाई दी. वह बहुत खुश लग रही थी. उसने सीमा के गाल पर पप्पी ली और मेरे चरण छुए.
विवाह संपन्न हो चुका था मैं सीमा के घरवालों के बीच कुछ देर और रहा उनके द्वारा दिए गए उपहारों को स्वीकार करता रहा.
अगले दिन दोपहर तक सारे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे. विवाह कार्यक्रम में आए लोग भी वापस जा रहे थे. छाया भी आज रात की तैयारियों में लग गई थी. आज मेरी और सीमा की सुहागरात थी.
 
भाग -15
सीमा की सुहागरात
सीमा पारंपरिक अंदाज में शीशे के गिलास में दूध लिए हुए कमरे में आई उसने सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी. उसके शरीर पर आभूषण बहुत खिल रहे थे. छाया द्वारा बनवाया गया हार उसके गले में था. साड़ी की वजह से उसके स्तन स्पष्ट रूप से उभरे हुए दिख रहे थे. लाल रंग की साड़ी के बीच से गोरा पेट स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था. पेट के बीच में उसकी नाभि खूबसूरती पर चार चांद लगा रही थी. साड़ी में स्त्रियों का उभार एक अलग ही रूप ले लेता है. साड़ी में सादगी और कामुकता दोनों का मिश्रण होता है यह आज दिखाई पड़ रहा था. आज उसकी कामुकता हावी थी साड़ी का रंग लाल था और आंखों मेमे भी लालिमा थी, आंखों में काजल और पलको की सजावट ने उसे और मादक बना दिया था. छाया ने मुझे बताया था की सीमा अभी तक कुंवारी है. मैं भी आज तक कुवारां ही था. छाया द्वारा दिया गए अनूठा उपहार पता नहीं किस श्रेणी में रखा जाएगा पर मेरे लिए तो वह अविस्मरणीय था. सीमा धीरे धीरे मेरे पास आ रही थी. उसने मुझे गिलास दिया. मैंने उसे अपने बगल में बैठा लिया. आज मैं भी इस सुहागरात के पल को अपनी जानकारी के हिसाब से यादगार बनाना चाहता था. मैंने अपने हाथों से वही दूध सीमा को पिलाना चाहा उसने अपने होंठ लगाए और एक घूंट पी लिया. मैंने भी थोड़ा सा दूध पीकर गिलास बगल में रख दिया. सीमा मेरे अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही थी. अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने और सीमा ने इसी बिस्तर पर रासलीला की थी. पर आज की बात विशेष थी. सीमा ने ही मुझे सबसे पहले सेक्स से परिचित कराया था. यह राजकुमार पहले उसका ही दीवाना था पर सीमा में संवेदना की कमी मुझे महसूस होती थी. वह राजकुमार को प्यारी तो थी पर ऐसा लगता था जैसे उसके लिए सिर्फ यही राजकुमार नहीं था बल्कि वह कई और राजकुमारों की सेवा करती थी. इस उधेड़बुन में सीमा व्यग्र हो रही थी. मैंने उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया और हथेलियों से उसे सहलाने लगा.
" अंततः तुम मेरी हो गई"
"हां मुझे खुशी है कि मैं कि मैंने जिस राजकुमार को अपनी राजकुमारी से मिलाया था आज वही राजकुमार उसका कौमार्य भेदन करेगा " कहकर वह मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे गालों पर चूम लिया . मैंने उसे बताया उसकी दी गई गुरु दक्षिणा को मैंने अभी तक संभाल कर रखा है. वह यकीन नहीं कर पा रही थी. मैंने अलमारी खोलकर वह लाल पैंटी बाहर निकाल दी जिस पर हम दोनों के प्रेम रस के दाग लगे हुए थे. उसे देख कर वह बहुत खुश हुयी. उसने उस पेंटी को सीधा किया उसने मुझे चूम लिया और बोली
"सच में आप बहुत अच्छे हैं. मैं तो आपको यह मजाक में दिया था"
"तुम्हारी दी हुई थी इस दक्षिणा ने मेरे जीवन में बदलाव लाया था. तुम्हारा राजकुमारी दर्शन मेरे जीवन की अद्भुत खड़ी थी. तुम मेरी कामकला की सूत्रधार हो" वह मुस्कुराते हुए और आकर मेरे आलिंगन में आ गई. कुछ ही देर में हमारे वस्त्र हमारा साथ छोड़ते गए. सीमा के वस्त्र उतारते समय अजीब अनुभूति हो रही थी. कभी-कभी मुझे उसके स्तनों में छाया के स्तन दिखाई देते. सीमा के शरीर की कसावट मुझे तुरंत हकीकत में ले आते. कुछ ही देर में सीमा पूर्णतयः नग्न थी. वह अत्यंत मादक लग रही थी. हाथ पैरों में मेहदी की सजावट तथा कौमार्य भेदन की उत्सुकता ने उसे और शर्मीला बना दिया था. उसके चेहरे और शरीर में छाया जैसी कोमलता नहीं थे परंतु एक मदमस्त यौवना की तरह स्त्री सुलभ लज्जा अवश्य थी. उसके शरीर के उभार दर्शनीय थे मैंने उसे भी गोद में उठा लिया जिस तरह से मैं छाया को उठाया करता था. सीमा को उठाने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो छाया से ज्यादा भारी थी फिर भी मैंने उसको चूमते हुए बिस्तर पर ले आया कुछ ही देर में हम दोनों अपने प्रेमलीला में व्यस्त हो गए.

सीमा की राजकुमारी को चूमते समय राजकुमार उछलने लगा था. उसे इंतजार अब बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था. इतनी मादक नव योजना सामने जांघें फैलाए नग्न लेटी हुई थी यह दृश्य मात्र ही राजकुमार के उछलने के लिए काफी था. सीमा की राजकुमारी के मुख पर प्रेम रस की बूंदे आ चुकी थी. मेरे राजकुमार ने उसके होठों के बीच अपनी जगह बनानी शुरू कर दी. प्रेम रस की वजह से उसकी फिसलन बढ़ चुकी थी . राजकुमार ने सबसे पहले इसी से स्नान का आनंद लिया. शायद उसे वह सुख याद आ रहा था जब वह बार-बार छाया की
राजकुमारी के मुख में जाता और वापस आ जाता. वैसे इस क्रिया की शिक्षा भी सीमा ने ही दी थी. हम लोग छुपन छुपाई के दौरान कई बार इसका आनंद भी लिया था. आज भी राजकुमार उसी आनंद में मशगूल था. मेरी नजरें सीमा से मिलते ही वह मुस्कुरा पड़ी. उसे भी शायद वह छुपन छुपाई का खेल याद आ रहा था. हम कुछ देर इसी अवस्था में रहे राजकुमार उसके मुख में हर बार कुछ ज्यादा अंदर प्रवेश कर रहा था. सीमा की धड़कनें बढ़ रहीं थीं. यह क्रिया धीरे-धीरे तीव्र होती जा रही थी . राजकुमार अब राजकुमारी के अंदर प्रवेश करने लगा था. वह अंदर प्रवेश करता है तथा उसके होठों के बीच से बाहर आ जाता. अचानक मेरा सब्र टूट गया मैंने सीमा के होठों पर किस किया और उसकी रजामंदी से राजकुमार अन्दर प्रवेश करा दिया. सीमा को तेज दर्द हुआ उसने अपने होंठ अपने दांतो के नीचे दबा लिया मैंने अपने होंठ में उसके होंठों को लेकर प्यार से चूसने लगा. सीमा की राजकुमारी अब रानी बन गयी थी. धीरे धीरे सीमा खुश हो गई थी. शायद जितने दर्द की उसने कल्पना की थी उससे कम दर्द हुआ था.
स्त्री की उत्तेजना उसके प्रथम संभोग के दर्द को कम कर देती हैं ऐसा मैंने पढ़ा था और आज अपनी आंखों से देख रहा था. सीमा की राजकुमारी पूरी तरह उत्तेजित थी और प्रेमरस बहा रही थी और इसी अवस्था में उसका कौमार्य भेदन हुआ था. कुछ देर इसी अवस्था में रहते हुए मैंने अपने राजकुमार को सीमा के अंदर और भी गहराई तक प्रविष्ट करा दिया. राजकुमार का लगभग पूरा सीमा की राजकुमारी के अंदर था. सीमा की अनुभूति एक अलग तरह की थी. उसकी आंखों में हल्के हल्के आंसू थे निश्चय ही वह शुरुआती दर्द के रहे होंगे पर अब उसमें खुशी के आंसू भी शामिल हो चुके थे. वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी. मैं उसे उसकी जीत पर बधाई दे रहा था. मैं उसके माथे और गाल को बार-बार चूम रहा था और उसे यह बता रहा था कि उसने विजय प्राप्त कर ली है. वह खुश थी कुछ ही देर में मैंने अपनी कमर को थोड़ा आगे पीछे करना शुरू किया. मेरे राजकुमार के बाहर आने और अन्दर जाने जाने से राजकुमारी भी आनंद उठा रही थी. कुछ देर तक यह सुख लेने के बाद उसने मुझे नीचे आने का इशारा किया मैं समझ गया वह ऊपर आना चाहती है. सीमा पहली बार में ही सारे सुख ले लेना चाहती थी या हो सकता इस अवस्था में उसे कष्ट हो रहा हो. मुझे लगा था जैसे उसने भी ब्लू फिल्मे अवश्य देखी थी.
अंततः मैं नीचे और सीमा मेरे ऊपर आ चुकी थी. राजकुमार राजकुमारी से दूर था अचानक मेरी नजर उसके राजकुमारी पर पड़ी जो अब रक्तरंजित हो चुकी थी. मेरा राजकुमार भी घायल लग रहा था पर यह रक्त उसका नहीं था. यह विजय तिलक उसकी रानी ने लगाया था। सीमा का ध्यान उस ओर जाता इससे पहले ही मैंने उसे अपनी ओर खींच लिया और उसके होठों को फिर से चूम लिया. सीमा के स्तन मेरे सीने से सटे हुए थे. मैं उसके होठों को चूम रहा था. राजकुमार राजकुमारी से मिलने के लिए अपना रास्ता तलाश रहा था और कुछ ही देर में वह उसके मुख में प्रवेश कर रहा था. .
सीमा के प्रेमरस की मात्रा रक्त से ज्यादा थी जो राजकुमार को रास्ता दिखा रही थी. आगे प्रवेश करने के लिए या तो सीमा या मुझे अपनी कमर को आगे पीछे करना था. मैंने यह कार्य सीमा के हवाले कर दिया था और चुपचाप शांत पड़ा हुआ था. राजकुमार राजकुमारी के मुख के अंदर था. मैं सीमा को प्यार से चुंबन ले रहा था अचानक मैंने सीमा की राजकुमारी को पीछे की तरफ जाते महसूस किया. सीमा की कमर पीछे जा रही थी. राजकुमार राजकुमारी में विलुप्त हो रहा था. राजकुमारी राजकुमार के ऊपर आ रही थी और उसे अपनी आगोश में ले रही थी. कुछ ही देर में मेरा लिंग अब पूरी तरह प्रवेश कर चुका था. वह बहुत खुश थी की मेरे लिंग को अपने अंदर पूरी तरह ले पा रही थी. उसका दर्द खत्म हो चुका था वह अपनी कमर को धीरे-धीरे आगे पीछे करने लगी. मैं उसके स्तनों और नितंबों को सहला रहा था. कुछ ही देर में घायल राजकुमारी उग्र रूप ले चुकी थी. मैं महसूस कर पा रहा था कि अब स्खलित होने वाली थी. मैंने सीमा को अपने आगोश में ले लिया. मैंने अपनी कमर की गति को सीमा सीमा की कमर की गति से मिला लिया. मेरी इस क्रिया ने राजकुमार और राजकुमारी के बीच चल रहे संघर्ष को और बढ़ा. दिया. राजकुमारी अब स्खलित रही थी. मेरा राजकुमार की तीव्र गति, सीमा के स्खलन को बढ़ा रही थी. मैंने सीमा की अपने ऊपर पूरी तरह लिटा लिया था तथा अपने हांथो से उसे अपने से सटाया हुआ था. वह चाह कर भी हिल नहीं सकती थी. मैं चाहता तो अपनी कमर को विराम देकर राजकुमारी का सामान्य स्खलन हो जाने देता. परंतु आज का दिन विशेष था. मेरा एक हाथ उसकी कमर को मुझसे चिपकाए हुए थे तथा दूसरा उसकी पीठ पर था. उसके होंठ मेरे होंठों में थे. स्खलित हो रही राजकुमारी में राजकुमार का इस तरह तीव्र गति से अंदर बाहर होना सीमा से सहन नहीं हो रहा था वह कांप रही थी. मुझे उसकी कंपकपाहट अच्छी लग रही. वह राजकुमारी को हटाना चाह रही पर यह संभव नहीं था. राजकुमार ने भी अपना लावा उडेलना शुरू कर दिया था. अंततः राजकुमारी का स्खलन हो गया. आज मैंने अपना सारा वीर्य राजकुमारी के अंदर ही छोड़ दिया था. हम दोनों कुछ देर इसी अवस्था में रहे. राजकुमारी के अंदर भरा हुआ मेरा वीर्य अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा था. जैसे-जैसे राजकुमार का तनाव कम होता वैसे वैसे बहाव तेज होता. इसी अवस्था में एक दुसरे को चुमते हुए हम कब सो गए पता ही नहीं चला.
एक बार मेरी नींद खुली मैं बाथरूम गया और आने के बाद मैंने देखा सीमा गहरी नींद में सोई हुई है. चादर हटी हुई थी. उसकी दोनों जांघों के बीच से झाकती उसकी रक्त रंजित राजकुमारी को देखकर मुझे अत्यंत उत्तेजना हुयी. मैंने सीमा को बाहों में ले लिया उसकी नींद खुल चुकी थी. वह मुझे फिर से प्यार करने लगी शायद उसने भी इस सुहागरात को यादगार बनाने की सोची होगी पर अत्यधिक थकावट की वजह से उसे नींद आ गई थी. वह पूरी तरह खुश लग रही थी. रक्त रंजित राजकुमारी के बारे में कुछ भी याद नहीं था. कुछ ही देर में राजकुमारी का प्रेम रस राजकुमार को आकर्षित करने लगा. दोनों एक दूसरे के संपर्क में आ रहे थे और हम दोनों एक बार फिर संभोगरत हो गए.

मानस, सीमा और मैं
[मैं छाया]

मानस और सीमा हनीमून से वापस आ चुके थे. सीमा के पास मुझे बताने के लिए बहुत कुछ था पर हम दोनों के पास समय बहुत कम था. शाम को नौकरी से आने के बाद मुश्किल से एक 2 घंटे का समय मिलता जो घर के कार्य निपटाने में चला जाता. रात में सीमा और मानस एक कमरे में चले जाते और मैं मैं अकेली रह जाती. पर कुछ ही दिनों बाद मानस को ऑफिस के कार्य से 2 दिनों के लिए बेंगलुरु से बाहर जाना पड़ा. यह मेरे और सीमा के लिए एक उचित अवसर था. मानस के जाने के बाद मैं और सीमा घर में अकेले रह गए थे. हमने उस दिन जानबूझकर छुट्टी ले ली थी मुझे सीमा के साथ सेक्स किए हुए लगभग 20 दिन बीत चुके थे. सीमा भी मुझे उतना ही प्यार करती थी हम दोनों एक दूसरे के लिए दो जिस्म एक जान थे. यदि वह पुरुष होती तो निश्चय ही मेरी मंगेतर होती ऐसा वह कहती थी.

सुबह घर के कार्य निपटाने के बाद हम दोनों बिस्तर पर आ चुके थे. सीमा अब शादीशुदा हो चुकी थी. उसने मुझे अपनी सुहागरात से लेकर हनीमून तक के सारे किस्से सुना डालें. मानस शुरू से ही रोमांटिक थे यह बात मैं भली-भांति जानती थी. मुझे पूरी उम्मीद थी कि इन दोनों का हनीमून बहुत ही सुखद और यादगार तरीके से गुजरा होगा. सीमा की बातें सुन सुन कर मेरी राजकुमारी प्रेम रस छोड़ने लगी थी. जब वह मानस के बारे में बात करती तो वह शर्मा जाती थी. मैंने पूछा
"मानस का राजकुमार ज्यादा अच्छा था या सोमिल का"
वह हंस पड़ी बोली
"दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं मानस का राजकुमार थोड़ा छोटा सा पर है बहुत प्यारा"
वह मानस के बारे में बात करते समय थोड़ा सकुचा रही थी. मैंने पूछा तो उसने कहा
"मानस तुम्हारा भाई है तुम उसके बारे में यह सब बातें कैसे कर सकती हो?" मैंने उन्हें सामान्य करने के लिए कहा
"वह मेरा भाई बाद में है पहले मेरा जीजा है" कह कर हंस दी. वह भी हंसने लगी.

मैंने और मानस ने इस भाई बहन के थोपे गए अनचाहे रिश्ते का दंश झेला था। इसने हमारे पवित्र और पावन मिलन को रोक दिया था। हमारा मिलन तो अभी भी होता था पर उसमें सामाजिक मान्यता नहीं थी। मैंने और मानस में दृढ़ निश्चय कर लिया था कि इस अनचाहे रिश्ते में हम अपने प्रेम को कायम रखेंगे। यह भाई बहन का शब्द अब हमारी उत्तेजना का सबसे बड़ा स्रोत था। जैसे ही हम यह शब्द सुनते हमारी उत्तेजना चरम पर पहुंच जाती मानस भैया का राजकुमार भी इन संबोधनों को सुनकर हमारी सहमति में अपना सर हिलाने लगता और मेरी राजकुमारी मुस्कुरा उठती।
सीमा ने मानस के राजकुमार के बारे में विस्तार से बताया. मुझे सुनकर खुशी हो रही थी कि वह मुझसे बेझिझक होकर बातें कर रही थी. बातों ही बातों में मैंने उससे कहा
"मुझे तुम्हें संभोग करते हुए देखना है."
"धत पगली ऐसा कैसे हो सकता है तुम्हें शर्म नहीं आएगी. मानस तुम्हारा भाई है क्या तुम अपने भाई को अपनी आंखों के सामने नग्न होकर मेरे साथ संभोग करते हुए देख पाओगी?"
मैंने कहा
"मुझे संभोग करते हुए देखना है यह अलग बात है कि संभोग करने वाला कौन है. मैं देख लूंगी पर क्या आप यह दर्शन सुख मुझे दिला पाओगी."
सीमा के हाव भाव देखकर ऐसा लगता था जैसे उसे इन बातों में आनंद आ रहा था. वह मन ही मन मुझे इन सब दृश्यों को दिखाने की प्लानिंग कर रही थी. उसने मुझसे फिर बोला
"क्या सच में तुम देखना चाहती हो?"
मैंने कहा
"जरूर"
कुछ ही देर में हम दोनों फिर आलिंगन बद्ध हो चुके थे. धीरे धीरे हम नग्न होते गए और कुछ ही देर में हम एक दूसरे की बाहों में थे. मैंने सीमा से कहा मुझे रानी साहिबा के दर्शन करने है. उसकी राजकुमारी अब रानी बन चुकी थी. मैंने उसकी जांघों को फैला कर देखा सच में राजकुमारी के होंठ फैल चुके थे अब राजकुमारी का मुख बिना उंगलियां लगाए ही दिख रहा था. उसकी लालिमा होठों से झांक रही थी. शादी से पहले तक सीमा की राजकुमारी के दोनों होंठ आपस में चिपके रहते थे पर आज 15 दिनों के अंदर ही राजकुमारी के दोनों होठों में थोड़ी दूरी आ चुकी थी और राजकुमारी का मुख से झलक रहा था. मैंने सीमा को चूम लिया और कहा सच में राजकुमारी और रानी में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है. वह हंसने लगी और बोली
"यह तुम्हारे मानस भैया का किया धरा है. पिछले 15 दिनों में 45 बार राजा जी ने रानी पर चढ़ाई की है. मैंने सीमा की रानी साहिबा को चूम लिया सीमा खुश हो गयी थी. उसकी रानी को भी एक अलग आनंद प्राप्त हुआ था. कुछ ही देर में हम दोनों एक दूसरे की रानी और राजकुमारी को अपने होठों से तृप्त कर रहे थे. यह कला मुझे सीमा ने हीं सिखाई थी. कुछ ही देर में हम दोनों स्खलित हो गए. और उसी अवस्था में सो गए. सीमा मेरी अंतरंग सहेली भी थी और एक अच्छी दोस्त भी. मैं उसे कभी दीदी कहती कभी भाभी कभी नाम लेकर भी पुकारती वह हर स्थिति में मुझसे खुश रहती थी और हर हाल में मेरी खुशी चाहती थी.
अपने रूम में वह मेरे लिए उचित जगह की तलाश में थी जहां से मैं उसके और मानस के संभोग को देख सकूं. आखिरकार कमरे में बने ड्रेसिंग एरिया में उसने एक जगह खोज ली. उसने मुझसे कहा तुम यहीं पर छुप जाना और यहां से तुम हम दोनों का संभोग देख सकती हो पर ध्यान रहे मानस तुम्हारा भाई है यह तुम्हें निर्णय लेना है कि उसे मेरे साथ नग्न होकर संभोग करते हुए देखना तुम्हें अच्छा लगेगा या नहीं. मैंने उसे फिर चूम लिया एक बार फिर सीमा के संबोधन ने मेरी राजकुमारी को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया था मैं स्वयं शरमा रही थी. दो-तीन दिनों बाद मानस वापस आ चुके थे.
मेरे मन में नयी उम्मीद जाग चुकी थी।
 
भाग -16
अविश्वसनीय ननद
[मैं सीमा]

सम्भोग दर्शन

शनिवार को हम तीनों की ऑफिस की छुट्टियां थीं. सीमा ने आज शाम को ही मेरे लिए संभोग दर्शन की व्यवस्था की थी. रात को संभोग से कुछ देर पहले ही उसने मानस को किचन में कॉफी बनाने के लिए भेज दिया और इसी दौरान मुझे ड्रेसिंग एरिया में आकर छुप जाने के लिए कहा. कुछ ही देर में मानस दो कप कॉफी लेकर आ चुके थे . वह दोनों कॉफी पीते पीते मेरे ही बारे में बात कर रहे थे. सीमा ने कहा
"शादी के दिन छाया कितनी खूबसूरत लग रही थी. मैंने अपने गांव के कई लड़कों और चचेरे भाइयों को उसके बारे में कामुक बातें करते हुए सुना था मुझे लगता है वह विवाह योग्य हो चुकी है" मानस ने कहा " हां, हमें छाया की शादी कर देनी चाहिए."
"हां सच में वह भी अब जवान हो गई उसका भी मन करता होगा."
"हां यह तो शरीर की स्वाभाविक जरूरत है. तुम भी अपने ऑफिस में कोई लड़का देखो"
सीमा ने कहा "हां मैं भी देखूंगी."
उन दोनों की काफी खत्म हो चुकी थी. कुछ ही देर में मानस और सीमा ने एक दुसरे के कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मानस को नग्न देखकर मेरी राजकुमारी एक बार फिर प्रेम रस से भीगने लगी. मानस के नग्न शरीर से मैंने जितना संपर्क बनाया था और उसके आगोश में जितनी रातें गुजारी थी अभी सीमा के लिए दूर की बात थी. पर आज नियति के खेल ने मेरी जगह सीमा को रख दिया था. मानस अनभिज्ञ होकर सीमा के स्तनों से खेल रहे थे और उसकी जांघों के बीच आकर अपने राजकुमार को उसकी रानी के मुख और होठों के बीच में रगड़ रहे थे. सीमा खुद इस तरह लेटी थी जिससे मुझे उसकी रानी स्पष्ट दिखाई पड़े. यह दृश्य मेरी राजकुमारी के लिए असहनीय हो रहा था कुछ ही देर में राजकुमार रानी के अंदर प्रवेश कर गया. सीमा को पता था मैं यह सब देख रही हूं वह मुझे और उत्तेजित करने के लिए आह.. की आवाज निकाली. मानस ने अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया था और सीमा मानस को अपनी तरफ खींच रही थी. उनकी सम्भोग क्रिया तेजी से आगे बढ़ रही थी. सीमा अपनी कला का प्रदर्शन मेरे सामने खुश होकर कर रही थी. उसे मुझे संभोग दर्शन कराने में एक अलग आनंद मिल रहा था. कुछ ही देर में सीमा डॉगी स्टाइल में आ चुकी थी. मानस उसकी कमर को पकड़ कर पीछे से धक्के लगा रहे थे. मेरी आखों के सामने एक जीती जागती ब्लू फिल्म चल रही थी. मेरे हाथ अपनी राजकुमारी को सहला रहे थे. इससे पहले मानस और सीमा स्खलित होते मैं यह दृश्य देख कर अपने विवाह की कल्पना और कामना करने लगी.
कुछ ही समय पश्चात मानस और सीमा स्खलित हो गए. सीमा के स्तन भी मानस के प्रेम रस से सन गए थे। सीमा ने जानबूझकर मानस को फिर किचन में कॉफी का कप रखने के लिए भेजा और मैं कमरे से बाहर निकल गइ.
अगले दिन सीमा ने मुझे अपनी बांहों में भरते हुए मेरा अनुभव पूछा. मैं चटखारे लेकर अपने अनुभव को उसे बतायी. वह बहुत खुश थी कि उसने अपनी सहेली को संभोग सुख के साक्षात दर्शन कराए थे. पर मैं कहां संतुष्ट होने वाली थी मैंने उससे कहा मुझे राजकुमार को छूना है. मैंने आज तक किसी पुरुष का लिंग अपने हाथों से नहीं छुआ. वह हंस रही थी. उसने मुझसे कहा
" पगली वो तुम्हारा भाई है सगा ना सही सौतेला है. तुम उसका लिंग अपने हाथों में लोगी क्या तुम्हें शर्म नहीं आएगी?"
मैंने उससे कहा
"जब उसे पता चलेगा तब ना मुझे तो उसे छूकर एहसास करना है."
उसे मेरी इन सब बातों में बहुत मजा आता था उसने कहा ठीक है. रविवार को रात को उसने मुझे फिर उसी तरह छुपा दिया और सेक्स के दौरान मानस की आंखों पर पट्टी बाँध दी. मानस की आंखों पर पट्टी बजे होने की वजह से वो हमें देख नहीं पा रहे थे. छाया ने मुझे अपने पास बुला लिया. बिस्तर पर अब मैं और सीमा दोनों थे. मानस नग्न अवस्था में बिस्तर पर लेटे हुए थे. सीमा ने मुझे इशारा किया और मैंने मानस का लिंग अपने हाथों में ले लिया. मानस के चेहरे पर एक अजब सा भाव आया. वह मेरे हाथों की अनुभूति पहचानते थे पर वह यह यकीन नहीं कर सकते थे की सीमा की उपस्थिति में मैं यह कर सकती हूँ. वह आंखें बंद किए हुए इसका आनंद ले रहे थे. मैंने उनके लिंग को अपरिचित की भांति छूकर महसूस कर रही थी. सीमा मेरे चेहरे को देख कर हंस रही थी. और आंखों से ही प्रश्न कर रही थी कि मुझे कैसा महसूस हो रहा है?
मैं बड़ी उत्सुकता से राजकुमार को आगे पीछे कर रही थी. लिंग में तनाव बढ़ चुका था और वह उछल रहा था. मानस के राजकुमार की यह उछाल मैंने कई वर्षों तक महसूस की थी. कुछ ही देर में मैंने अपने हाथ उनके राजकुमार से हटा लिए. सीमा ने उसी स्थिति में मानस के राजकुमार पर अपनी रानी को रख दिया और कुछ ही देर में राजकुमार रानी में विलुप्त हो गया. इतने करीब से सीमा को सम्भोग करते देख मेरी राजकुमारी पानी पानी हो रही थी. सीमा की कमर के ऊपर जाते ही कुछ देर के लिए राजकुमार दिखाई पड़ता और फिर रानी में विलुप्त हो जाता. सीमा मेरे सामने ही सम्भोग कर रही थी और मैं उसके बगल में खड़ी थी. यह एक अद्भुत दृश्य था. मैं वहां से हट कर वापिस जाने लगी पर सीमा ने मेरा हाथ पकड़ लिया. जीवंत संभोग को इतने करीब से देख कर मेरे मन में अभूतपूर्व वासना का संचार हुआ था मैं उत्तेजना से कांप रही थी. मेरी उत्तेजना को शांत करने वाले मेरे दोनों ही साथी मुझे छोड़ आपस में संभोग कर रहे थे मैं तरस रही थी. उन दोनों की खुशी को देख कर मैं मन ही मन खुश भी थी. एक न एक दिन यह सुख मुझे भी प्राप्त होना था. मैं ईश्वर से इसके लिए प्रार्थना भी कर रही थी मेरा कौमार्य भेदन भी मानस भैया के राजकुमार द्वारा ही हो पर शायद यह असंभव था हम दोनों ही वचनबद्ध थे. मानस भैया के लिंग से वीर्य वर्षा होते ही मेरा साक्षात दर्शन खत्म हो चुका था. मैं सधे हुए कदमों से धीरे-धीरे चलते हुए कमरे से बाहर आ गयी दरवाजा मैंने सटा दिया था.
सीमा ने मुझे बाद में यह बताया कि मेरी उपस्थिति में उसे संभोग करने में एक अलग किस्म का मजा आता है. वह चाहती थी कि काश मैं हमेशा उस समय उसके पास ही रहती.
अगले दिन मानस मेरे पास किचन में आए मैं चाय बना रही थी उन्होंने पूछा "छाया क्या तुम कल मेरे कमरे में आई थी?"
"मैंने कहा कब"
"जब मैं और सीमा साथ थे" वो खुलकर नहीं बोल रहे थे.
"नहीं"
"सच बताओ ना"
"क्यों क्या हो गया?"
"कल अचानक मुझे महसूस हुआ कि तुम्हारे हाथों ने राजकुमार को छुआ था" मैंने कहा
"अब आप मुझे भूलकर सीमा दीदी में मन लगाइए" और हंसने लगी. वह देखिये मेरी भाभी की उमर लंबी है... सीमा कमरे से निकलकर किचन में आ रही थी.
मानस भैया डाइनिंग टेबल पर बैठकर चाय पीते हुए अपनी दोनों परियों को एक साथ देख रहे थे उनके मन में उठे कई प्रश्न अधूरे थे पर मुझे उनका उत्तर देना अभी आवश्यक नहीं लग रहा था. उनके इंतजार में ही हम सबकी भलाई थी.
एक दिन मानस की आंखों पर पट्टी बांधकर फिर सीमा ने मुझे अपने पास बुला लिया मैं मानस का लिंग सहला रही थी तभी उसने मेरे घागरे का नाड़ा खोल दिया मैं पूरी तरह नग्न हो चुकी थी. कुछ ही देर में उसने मेरा टॉप भी हटा दिया. अब हम दोनों पूरी तरह नंगे थे. सीमा मेरी राजकुमारी को छू रही थी और मैं मानस के लिंग को अपने हाथों से खिला रही थी. मुझे मानस के लिंग को हिलाते देखकर उसके मन में एक अजीब किस्म की खुशी आती थी. उसने मुझसे चुप रहने के लिए कहा और मानस के हाथ लाकर मेरी राजकुमारी पर रख दिए. मानस की उंगलियां मेरी राजकुमारी को बहुत अच्छे से पहचानती थीं. मानस जान चुके थे उन्होंने सीमा से कहा
"अरे तुम्हारी रानी तो आज अलग ही लग रही है"
"हां मैंने इसे विशेष रूप से तैयार किया है" सीमा अभी मानस के मनोदशा से अनभिज्ञ थी
सीमा को इस खेल में मजा आ रहा था. उसने मुझे झुकने का इशारा किया और मानस के हाथ मेरे स्तनों पर रख दिए. मानस पूरी तरह जान चुके थे कि मैं वहीं पर पूर्ण नग्न अवस्था में थी. उन्होंने मुझे अपने पास खींच लिया. मैं पूर्ण नग्न अवस्था में मानस भैया के ऊपर आ चुकी उनके एक हाथ मेरी पीठ पर और दूसरा नितंबों पर आ गया. सीमा हतप्रभ थी.उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें. मानस भैया लगातार मुझे सहला रहे थे कुछ ही सेकंड में उसने स्वयं मानस की आंखों पर से पट्टी हटा दी. शायद वह डर गई थी की थोड़ी ही देर में मानस भैया का राजकुमार मेरी राजकुमारी का कौमार्य भेदन कर देता और वह इस अनचाही घटना की जिम्मेदार होती। सीमा सिर झुका कर खड़ी हो गई । वह अबोध नवबधु की तरह नग्न अवस्था में सिर झुकाए खड़ी थी और अपराध बोध से ग्रस्त थी.
उसे मानस मिलने वाले डांट की प्रतीक्षा थी. उसने स्वयं की उत्तेजना के लिए कुछ ऐसा कर दिया था जो उसकी नजर में एक असीम गुनाह था. उसकी आंखों में थोड़े आंसू भी थे. वह डर से कांप रही थी मानस भैया के चेहरे पर मुस्कान थी. मैं भी मुस्कुरा रही थी.
अचानक ही मानस ने हाथ बढ़ाकर सीमा को अपने पास खींच लिया. मानस भैया की एक तरफ मैं और दूसरी तरफ से वह आ चुकी थी. हम तीनों नग्न अवस्था में बिस्तर पर एक साथ थे. वह सीमा के आंसू पूछ रहे थे और अपने होठों से उसके गालो और होठों को चूम रहे थे. सीमा सुबक कर रही थी. मानस के प्यार से वह धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी. उसमे थोड़ी हिम्मत आ गई थी. सीमा सुबकते हुए बोली
"मुझे माफ कर...." वह कुछ बोल पाती इससे पहले हम दोनों हंस पड़े. सीमा आश्चर्यचकित होकर हमें देख रही थी. मानस ने उसे उठाकर हम दोनों के बीच में कर दिया. हम दोनों सीमा के गालों को चूम रहे थे. मानस ने सारी बातें एक ही बार में उसे बता दी. सीमा मेरी तरफ मुड़ी और मेरे काम खींचते हुए बोली
"तू तो मेरी पक्की सहेली थी. कम से कम तू तो बता देती. मैंने उसे होठों पर चूम लिया मानस का राजकुमार अपनी रानी को खोजता हुआ उसमें प्रवेश कर चुका था. हमारा अद्भुत मिलन गंगा जमुना और सरस्वती की भांति हो चुका था सरस्वती जिस तरह विलुप्त है मेरी खुशियों में भी अभी ग्रहण लगा हुआ था. मैं अभी भी संभोग सुख से वंचित थी पर हम तीनों के मिलन का आनंद एक नई उपलब्धि थी.
सीमा को यकीन ही नहीं हो रहा था कि हम दोनों पिछले तीन-चार वर्षो से यह कार्य साथ में करते आ रहे हैं. उसने मेरा कौमार्य देखा था और उसके लिए यह यकीन करना संभव नहीं हो पा रहा था कि इतने दिनों तक साथ में रहने के बाद मेरा कौमार्य किस तरह सुरक्षित था.
सीमा हम दोनों के बीच में थी मानस की कमर हिलाने की वजह से उसका शरीर धीरे-धीरे एक लय में हिल रहा था. मैं उसके स्तनों को प्यार से सहला रही थी. वह मंद मंद मुस्कुराते हुए आने वाले जीवन की कल्पना कर रही थी. निश्चय ही उसकी इस कल्पना में मेरा भी स्थान था.
 
भाग -17

त्रिकोणीय प्रेम
(मैं मानस)

सीमा ने छाया को अपने साथ लाकर हम तीनों की जिंदगी में एक नया रोमांच पैदा कर दिया था माया आंटी इस समय घर पर अकेली ही रहती थी. शर्मा जी अभी भी विदेश से नहीं लौटे थे. आंटी के लिए उनकी अनुपस्थिति खलती तो जरूर थी पर यह नियत का ही खेल था.
घर पर हम चार लोग आनंद पूर्वक रह रहे थे. सीमा के आ जाने से छाया का मेरे कमरे में आना जाना सामान्य बात हो गई थी कभी-कभी तो रात को माया आंटी भी कमरे में आ जाती हम सब गांव की बातें करते और पुराने दिनों को याद करते. जाते वक्त वो छाया को अपने साथ चलने के लिए कहतीं ताकि मुझे और सीमा को निजी पल मिल सकें. छाया उनके साथ चली तो जरूर जाती कुछ ही देर में वह वापस हमारे कमरे में आ जाती.
मेरे सेक्स जीवन में एक नया रोमांच पैदा हो चुका था बिस्तर पर हम तीनों बिना वस्त्रों के पूर्णतया नग्न होकर एक दूसरे के आगोश में लिपटे होते. छाया अभी तक कुंवारी थी और इसीलिए हम सबकी प्यारी थी. हम सब तो संभोग का सुख ले रहे थे पर छाया इस सुख सुख से वंचित थी. हम दोनों उसका विशेष ध्यान रखते थे . सबसे विषम स्थिति छाया की थी वह सीमा को कभी दीदी बोलती कभी भाभी मेरे लिए भी उसके संबोधन अब अलग-अलग प्रकार के होते थे. सामान्यतयः हो मुझे नाम से नहीं बुलाती थी पर कभी-कभी उसे मुझे मानस भैया बोलना ही पड़ता था. खासकर सीमा के आने के बाद. जब से हमारे प्रेम प्रसंग पर माया आंटी ने विराम लगाया था मैं उसके लिए मानस भैया बन चुका था. पर यह हम दोनों में से किसी को यह स्वीकार्य नहीं था. लेकिन वह सभी के सामने मुझे मानस भैया ही बोलते थी. और इसी कारण कभी-कभी वह अंतरंग पलों में भी मुझे मानस भैया बोलती थी.
मैं हंस पड़ता और वह भी शर्मा जाती. हम तीनों बिस्तर पर वह सारे कार्य करते हैं जो एक पुरुष और 2 स्त्रियां मिलकर कर सकते थे. छाया के पास वह सारे गुण थे जो उसे मेरी और सीमा की चहेती बनाए रखते. अब तो उसने सीमा को अपने निकट में ही संभोग करते हुए भी देख लिया था. ब्लू फिल्मों में दिखाये गये सारे आसान और गतिविधियां अब हमारे जीवन में आ चुकीं थी. दोनों ही युवतियां शारीरिक शारीरिक रूप से दक्ष थी. उनके शरीर लचीले थे. वह मेरे ऊपर तरह-तरह के प्रयोग करती और मुझे थका देतीं. प्रेम कीड़ा का अद्भुत आनंद आता था. छाया के दाहिने स्तन पर मेरा कब्जा हुआ करता था और बाएं स्तन पर सीमा का हम दोनों उसे गालों से चूमना शुरु करते हैं और उसकी गर्दन होते हुए उसके स्तनों तक आ जाते. उसके स्तनों को अपने मुंह में चुभलाते हुए हमारे हाथ उसकी नाभि के दोनों तरफ से नीचे जा रहे होते. हमारे हाथ धीरे-धीरे उसकी जांघों तक पहुंच जाते. उन्हें फैलाते हुए उसकी राजकुमारी के दोनों होठों पर हम दोनों का अधिकार होता. उसकी राजकुमारी के होठों को चुमते समय हमारे होंठ आपस में मिल जाते. सीमा और मुझमे यही होड़ लग जाती कि छाया को पहले कौन खुश कर दें. छाया हम दोनों के सिर पर हाथ फिराती रहती. कुछ ही देर में उसकी जांघों में बेचैनी बढ़ जाती. हम स्थिति समझ जाते और अंततः राजकुमारी को सीमा के हवाले कर मैं उठकर ऊपर की तरफ आ जाता और वापस दोनों स्तनों को अपने कब्जे में ले लेता. हम पहले छाया को स्खलित करते इस क्रिया में हम दोनो स्वयम उत्तेजित हो जाते. कुछ ही समय में मैं सीमा की जांघों के बीच उसकी रानी में अपने राजा को प्रवेश करा रहा होता और छाया सीमा के स्तनों को मुंह में लेकर प्यार से चूस रही होती.
कई बार छाया अपनी राजकुमारी को सीमा के मुख पर रख देती थी और मेरी तरफ चेहरा करके मुझसे सटी रहती थी. मैं सीमा का योनि मर्दन कर रहा होता और साथ ही साथ छाया के दोनों स्तनों को भी सहला रहा होता. कभी मेरे हाथ में छाया के स्तन पर होते कभी सीमा के. सीमा छाया की राजकुमारी को अपने होठों से चूस रही होती. यह अवस्था हम तीनों की पसंदीदा थी. इस अवस्था में हम तीनों कई बार एक साथ स्खलित होते थे. उस समय मेरे वीर्य की धार अब दोनों अप्सराओं को एक साथ भिगोती. मैं अपने वीर्य को दोनों के स्तनों पर मलता और मेरे कहने से पहले ही वह दोनों अपने स्तन एक दूसरे से रगड़ने लगतीं और मैं उनके नितंबों को सहलाने लगता. अंत में हम तीनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए मुस्कुराते और एक दूसरे के आलिंगन में आकर सो जाते. छाया को सुबह माया आंटी के उठने से पहले कमरे से बाहर जाना होता. सामान्यतः छाया हमारे खेल की समाप्ति के बाद ही अपने कमरे में चली जाती. हम दोनों उसकी कमी महसूस करते हुए और उसके बारे में बात करते हुए सो जाते.

हम तीनों तरह-तरह के प्रयोग करते हुए अपना सुखद वैवाहिक जीवन जी रहे थे. हमें हर पल छाया के लिए एक उचित वर की तलाश थी जिससे उसे भी संभोग का सुख मिल सके. नए आसनों के प्रयोग में एक बार दुर्घटना होते होते बची. छाया सीमा के ऊपर थी उन दोनों के स्तन एक दूसरे से टकरा रहे थे और दोनों एक दुसरे को चूम रहीं थीं. मैं बाथरूम से निकलकर बाहर आया मुझे यह दृश्य अद्भुत लगा दोनों की जांघे आपस में सटी हुई थीं. मुझे 2 राजकुमारियां एक दूसरे से सटी हुई प्रतीत हो रही थी. ऐसा लग रहा था एक गुलाबी गुलाब की कली और लाल गुलाबी कली को आपस में सटा कर रख दिया गया था. इतना मोहक दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था. नीचे लेटी सीमा की जांघें फैली हुई थीं. उसकी रानी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी. मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और तुरंत ही जाकर अपने राजकुमार को सीमा की रानी में प्रवेश करा दिया और छाया की राजकुमारी को अपने हाथों से सहलाने लगा. वह दोनों मुस्कुरा रहीं थीं. उन दोनों के स्तन अभी भी एक दूसरे से सटे हुए थे और दोनों आलिंगन में थी. मेरी उंगलियां छाया की राजकुमारी के होठों को फैलातीं और उसके मुख में गुदगुदी करतीं. मैंने सीमा की रानी से अपने राजकुमार को निकाला और अपने तनाव की वजह से वह बिना कुछ कहे हैं छाया की योनि के मुख पर आ गया. उत्तेजना बस मेरे राजकुमार का तनाव राजकुमारी के मुख पर स्वभाविक रूप से हो गया. कामोत्तेजना के उद्वेग में राजकुमार छाया की राजकुमारी की कौमार्य झिल्ली तक पहुंच गया था. छाया राजकुमार के इस अप्रत्याशित आगमन की प्रतीक्षा में नहीं थी वह चौक गयी. और झटके से सीमा के ऊपर से हटकर बिस्तर पर आ गयी और मेरी तरफ देखने लगी. मुझे अपराध बोध हुआ और मैं हंस पड़ा. मैंने सिर्फ इतना कहा
"यह स्वयं ही वहां कूदकर चला गया" वह दोनों हंस पड़े. छाया उठकर मेरे राजकुमार के पास आयी जैसे उसे दंड देने जा रही थी. राजकुमार के पास आकर उसने उसे अपने मुंह में ले लिया और उसे कुछ देर चूस कर उसे सीमा की रानी में वापस प्रविष्ट करा दिया. वह मुस्कुरा रही थी और मैं भी. अगले कुछ महीने तक छाया हमारे लिए इश्वर का वरदान थी.
माया आंटी को अभी तक हमारे इस त्रिकोणीय प्रेम के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और हम सब प्रसन्न थे.
छाया का नया जीवन

नयी नौकरी.
[मैं छाया]
मैं अपनी नई नौकरी ज्वाइन कर चुकी थी. मेरा ऑफिस घर से कुछ दूरी पर था. ऑफिस की गाड़ी मुझे लेने आती और ऑफिस खत्म होने के बाद घर छोड़ जाती. मेरी जिंदगी में यह एक नया अनुभव हो रहा था. ऑफिस के बाकी दोस्तों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगता. हम सब दिन भर अपने बारे में एक दूसरे से बातें किया करते. ऑफिस में अधिकतर पुरुष थे और कुछ महिलाएं थी. मेरे पक्की सहेली पल्लवी भी इसी कंपनी में थी. हमारे दिन बड़े अच्छे से बीतने लगे. घर पर मानस और सीमा के साथ मेरी रातें रंगीन थीं ही दिन भी अच्छे से कट जा रहा था. सारे सुख मिल गए थे एक ही कमी थी वो सम्भोगसुख.
2 महीने की ट्रेनिंग के बाद हमें हमारे डिपार्टमेंट में शिफ्ट किया गया मेरे नए बॉस मिस्टर एस के मल्होत्रा थे उनकी उम्र लगभग मानस के जैसी होगी. वह अत्यंत सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व के थे. वह हष्ट पुष्ट भी थे. वह हमेशा सख्त स्वभाव के लगते थे हम लोग उनके पास मिलने गए पर जितने कठोर वो दिखते थे उतनी ही नम्रता से हम सब से मिले.

कुछ ही दिनों में हम सब अपने कार्य में व्यस्त हो गए. मल्होत्रा जी मुझसे हमेशा अच्छे से बात करते थे. डिपार्टमेंट के बाकी लोग उनसे डरते थे परंतु मुझे उन से डर नहीं लगता था. मैं अपने कार्य में दक्ष थी और इस बात को वह पूरी तरह पसंद करते थे. कुछ ही दिनों में वह मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे. वह मुझे हर बात में गाइड करते और मेरे कार्यों से खुश रहते थे. कभी-कभी वह मेरे निजी जीवन के बारे में भी पूछते. मैं उन्हें उचित दूरी बनाकर अपने बारे में बताती. बातों ही बातों में मुझे यह भी मालूम चला कि वह शादीशुदा नहीं थे. घर पर हमेशा मानस और सीमा मुझे शादी के लिए प्रेरित करते रहते थे वह दोनों भी मेरे लिए कोई अच्छा लड़का देख रहे थे मुझे मल्होत्रा जी धीरे-धीरे अच्छे लगने लगे थे परंतु मैं यही प्रतीक्षा कर थी कि वह खुद ही प्रपोज करें पर ऐसा नहीं हो रहा था. हम दोनों एक दोस्त की भांति कई महीने तक रहे पर हमारे बीच में हमेशा एक मर्यादा कायम रही..

मैंने सीमा भाभी को मल्होत्रा जी के बारे में बता दिया था. हम दोनों उनके बारे में बातें करते थे. सीमा भाभी उन्हें देखने की जिद करती थी. एक दिन मैंने ऑफिस में उनके साथ एक सेल्फी ली और सीमा भाभी को दिखाया वह देखते ही चौक गई. मैंने पूछा
"क्या हुआ" वह बात टाल गयीं और बोलीं
"अरे यह तो बहुत हैंडसम है. तुम्हें इससे बात आगे बढ़ानी चाहिए "
मुझे सीमा दीदी के विचार जानकर बहुत खुशी हुई.
मैं और मल्होत्रा जी आने वाले समय में और करीब आते गए.
 
भाग -18
सीमा और सोमिल
[मैं सीमा]
छाया द्वारा उसके बॉस के साथ फोटो देखकर मेरे होश फाख्ता हो गए. यह तो सोमिल था. सोमिल कुमार मल्होत्रा. वह बेंगलुरु में था यह जानकर मैं अपने आप को उससे मिलने से रोक नहीं पायी. मैंने किशोरावस्था में जीवन के दो-तीन साल उसके साथ गुजारे थे और अब छाया उसके संपर्क में आई थी. मैं सोमिल से मिलने को बेचैन हो उठी. मैंने छाया के ऑफिस से सोमिल का फोन नंबर प्राप्त किया और उसे एक दिन फोन किया
" सोमिल"
"जी, आप कौन"
"मैं सीमा को जानती हूँ"
"सच. मुझे बताइए ना आप कौन हैं?"

"आप चाहे तो अपनी पुरानी मित्र सीमा से मिल सकते है . कावेरी गार्डन, आज शाम ६.०० बजे."
"मैं जरूर आउंगा"
मैंने फ़ोन काट दिया.
मैं उस दिन सोमिल से मिलने को लेकर बहुत उत्साहित थी. आज कई वर्षों बाद हम एक दूसरे से मिलने वाले थे. अब मैं शादीशुदा थी परंतु उससे मिलकर अपनी स्थिति को बताना जरूरी था वरना मैं हमेशा इस अपराध बोध में रहती कि मैंने सोमिल के साथ किया वादा नहीं निभाया. यह अलग बात थी कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी पिछले दो-तीन वर्षों में हमारा संपर्क पूरी तरह टूट गया था और हम चाह कर भी एक दुसरे से संपर्क नही कर पा रहे थे.
मैं शाम को सज धज कर सोमिल से मिलने के लिए निकल रही थी. मैंने जानबूझकर आज साड़ी पहनी थी और माथे पर सिंदूर भी स्पष्ट रूप से लगाया था. मुझे लगा यदि सोमिल मुझे इस स्थिति में देखेगा तो एक बार में ही सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगीं और हम आसानी से बात कर पाएंगे वरना हम अपनी पुरानी बातों और किए गए वादों में ही डूबे रहेंगे. मैं तैयार होकर घर से निकल चुकी थी.
पार्क में सोमिल मेरा इंतजार कर रहा था. उसके हाथ में एक फूलों का गुलदस्ता था. मुझे देखते ही वह मेरी तरफ दौड़ पड़ा और बिना कुछ कहे मुझे अपनी बाहों में भर लिया. मैंने भी उसे निराश नहीं किया और हम दोनों एक बार गले मिल गए. अचानक उसने मेरे माथे पर सिंदूर देखा और जिसका मुझे अंदाजा था वही बात हुयी वह एक झटके में ही सारी कहानी समझ गया और उसकी आंखों में आंसू भर आए. उसने मेरी तरफ देख कर कहा
"सीमा में पिछले दो-तीन वर्षों से तुम्हें पागलों की तरह ढूंढ रहा हूं. मैंने भी उसे यही बात बतायी.
"हम लोगों ने भी तुम्हें ढूंढने की बहुत कोशिश की मैं अपने पापा के साथ चंडीगढ़ भी गई परंतु तुमने अपना मकान छोड़ दिया था. आस पड़ोस में पूछने पर भी कोई तुम्हारा पता नहीं बता पा रहा था. मैं क्या करती? मेरे पिता मुझ पर लगातार दबाव बना रहे थे और अंततः मैं तुम्हारे सामने इस स्थिति में खड़ी हूं."
सोमिल पूरी तरह मेरी बात समझ रहा था. मैंने उससे पूछा कि
"तुमने अभी तक शादी नहीं की ? हालांकि यह बात मुझे पता थी पर फिर भी मैंने पूछा."
सोमिल की आंखों में अभी तक आंसू सूखे नहीं थे. उसने कहा
"सीमा मैंने सिर्फ तुमसे प्यार किया है और मैं तुमसे ही शादी करना चाहता था. याद है, मैंने तुम्हारे सामने एक वचन भी दिया था".
मुझे उसका वजन याद जरूर था पर मैं उसे अपने मुंह से नहीं कहना चाहती थी. मैंने हल्की अनभिज्ञता जताते हुए उससे पूछा
"कौन सा वचन"
वह बोला
"जाने दो"
मैंने फिर उससे पूछा "बताओ ना कौन सा वचन"
उसने फिर से टाल दिया.
अब हम एक पेड़ के छांव के नीचे बने बेंच पर बैठ गए थे. वह मुझ से तरह-तरह की बातें कर रहा था उसने पूछा
"तुम्हारी शादी किससे हुई है? मैंने उसे बताया. वह धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था. बातों ही बातों में मैंने उससे उसकी नौकरी के बारे में पूछा. उसने घर से बताया कि वह इस कंपनी में मैनेजर की भूमिका में है. और फिर मैंने उससे पूछा
"क्या पिछले दो-तीन वर्षों में तुम्हारा किसी से संपर्क नहीं हुआ है"
"नहीं सीमा. मैं दिल से तुम्हें ढूंढ रहा था परंतु मेरा सौभाग्य या दुर्भाग्य कि तुम आज मुझसे मिली वह भी इस अवस्था में."
"मैं मान ही नहीं सकती की पिछले दो-तीन वर्षों में तुम्हारा किसी लड़की से संपर्क ना हुआ हो . तुम तो शुरू से ही डोरे डालने में एक्सपर्ट हो"
वह हंसने लगा उसने कहा
"मुझे जो सुख तुमसे प्राप्त हुए थे वह मेरे लिए मेरी यादों में अपनी जगह बना चुके थे मुझे किसी और को लाने की जरूरत नहीं थी. मैंने तुम्हारे इंतजार में यह समय गुजार लिया था. पर अभी पिछले कुछ दिनों से तुम से मिलती जुलती एक लड़की मेरे ऑफिस में आई है. वह मुझे अच्छी लगने लगी है. तुम्हारे जैसी ही है पर अत्यंत कोमल और मासूम है.
"इसका मतलब मैं कोमल नहीं थी"
"अरे नहीं वह बात नहीं है शरीर की बनावट सबकी अलग-अलग होती है. पर बातचीत करने और बातचीत के अंदाज में तुम दोनों मुझे एक जैसी ही दिखाई देती हो"
मैं समझ गई थी कि वह छाया के बारे में बात कर रहा है. मैंने उससे उस लड़की के बारे में और पूछा. वह कुछ देर छाया के बारे में बात करता रहा फिर बात को वापिस मुझ पर ले आया. मैंने कहा
"तुम उससे मिलकर अपने प्यार का इजहार करो अब तो हमारा मिलना संभव नहीं है"
उसने बोला
"मैं शादी नहीं कर सकता"
"क्यों?"
"बस ऐसे ही"
मैंने जिद की.
"सीमा छोड़ो ना. जो बातें अब संभव नहीं है उनके बारे में क्या बात करना"
"मैं सब संभव कर दूंगी."
"पक्का" वो हँसने लगा."
"प्लीज बताओ ना"
उससे कहा
"मैंने चंडीगढ़ में तुम्हारे कहने पर एक तुम्हें एक वचन दिया था और जब तक वह वचन पूरा नहीं होता मैं अपनी पत्नी के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा"
मैं घबरा गई उसके इस बात पर मैं क्या जवाब दूं मैं सोच नहीं पा रही थी. मुझे उसका वचन तो याद था पर फिर भी मैंने दोबारा कहा
"देखो हम दोनों ने विवाह करने की सोची थी उस समय ये बातें ठीक थी पर अब मैं शादीशुदा हूं"
उसने फिर कहा
"शायद तुम उस वचन को भूल गई हो. मेरे बेंगलुरु आने से पहले तुम आशंकित थी कि मैं तुम्हारी अनुपस्थिति में किसी और लड़की के संपर्क में आ जाऊंगा और उससे संभोग कर लूंगा. मैंने तुम्हें बार बार यह बात समझायी कि मैं सिर्फ तुमसे ही प्रेम करता हूं और मैं कभी यह नहीं करूँगा. परंतु तुम मेरी बात नहीं मानी. और तुमने मुझसे वचन लिया या कि मैं अपना पहला संभोग तुम्हारे साथ ही करूंगा. तुम्हारी आशंका को मिटाने के लिए ही मैंने तुम्हें यह वचन दिया था."
मैं निरुत्तर हो गई थी
"पर अब यह असंभव है. क्या कोई और रास्ता नहीं है"
"मुझे नहीं पता. छाया मुझे अच्छी तो लगती है पर मैं उससे अपने प्यार का इजहार नहीं कर सकता क्योंकि मुझे पता है मैं अपने वचन को पूरा किए बिना उसके साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा. देखते हैं नियति ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है" वह चुप हो गया था.
लगभग 2 घंटे बीत चुके थे हमने पास के रेस्टोरेंट में जाकर कुछ नाश्ता किया और अब विदा लेने का वक्त था. सोमिल ने कहा फिर कब मुलाकात होगी मैंने भी उसे नियति पर ही छोड़ दिया था. हम दोनों अपने अपने घर की तरफ पर चल पड़े.

परिवारों की सहमति
[मैं सीमा]
छाया के कहने पर एक बार फिर हमारे शयनकक्ष में ब्लू फिल्म लगाइ गई. मैं और छाया दोनों ही पूर्ण नग्न होकर बिस्तर पर मानस का इंतजार कर रहे थे. फिल्म शुरू होते ही वह भी बिस्तर पर आ गए. हम तीनों एक दूसरे से लिपटकर फिल्म देखने लगे. सीडी में एक युवती से दो युवक प्यार कर रहे थे. उनका प्यार जैसे-जैसे परवान चढ़ता गया हम तीनों उत्तेजित होते चले गए. छाया बीच में थी उसके एक तरफ मैं थी और दूसरी तरफ मानस थे. हम दोनों ही उससे बहुत प्यार करते थे और उसे हर सुख देना चाहते थे क्योंकि वह अभी तक संभोग का सुख नहीं ले पायी थी. उसे हमारे होठों और उंगलियों की कला से ही काम चलाना था. इसलिए हम सबसे पहले उसका ही ध्यान रखते थे. वह भी हम दोनों का बहुत साथ देती थी. फिल्म में एक महिला को दो पुरुषों से संभोग करते हुए देखकर अचानक मेरे मुंह से निकल गया क्या हकीकत में ऐसा भी होता है. छाया तुरंत बोल पड़ी
"हां दीदी मैंने एक बार सपना भी देखा था." हम तीनों हंस पड़े मानस ने कुछ नहीं कहा वह चुप ही रहे फिल्म खत्म होने के बाद हम सब सामान्य हो चुके थे .

एक दिन मानस ने मुझसे पूछा उस दिन तुम किसी और पुरुष के साथ संभोग करने की बात कर रही थी. मैंने कहा
"हां. क्या यह सच में संभव होता है?
"आजकल इस दुनिया में सब कुछ संभव है. आजकल लोग अपनी कल्पनाओं को जीते हैं. कुछ को यह मौक़ा मिलता है और कुछ सिर्फ कल्पना में ही यह सोचते रह जाते हैं."
उन्होंने हंसते हुए कहा
"तुम यदि इस बात के लिए अपना मन बनाती हो तो हो सकता है तुम्हें कभी इसका मौका मिल जाए. पर तुम्हें यह बात मुझे स्पष्ट रूप से बतानी होगी" वो फिर हसने लगे और मेरी रानी पर हाथ फेरने लगे.
मैं कुछ बोल नहीं पायी
"पर मेरे मन में सोमिल का ख्याल आ गया"
मेरे दिमाग में एक योजना बनने लगी. आखिर छाया मेरी ननद थी और मानस की बहन भी उन दोनों की ख़ुशी में मुझे भी खुशी मिलती.
मैंने मानस से एस के मल्होत्रा की हकीकत बता दी और उसके वचन के बारे में भी। वह हंसने लगे मैंने कहा मुझे आपकी अनुमति चाहिए। उन्होंने मजाक किया हां तो वचन पूरा कर देना वह तुम्हारे नंदोई बनने वाले हैं इतना कहकर संभोग क्रिया में मस्त हो गए.
कुछ दिनों बाद मैं फिर एक बार फिर सोमिल से मिली वह बहुत खुश था. हम दोनों ने कई सारी बातें की. मैंने छाया की बात दोबारा छेड़ी तो वह बोल उठा छाया वास्तव में बहुत अच्छी है. मैंने कहा
"तुम उसके परिवार वालों से मिले हो या नहीं?"
"अभी तो नहीं पर वह बार-बार जिद करती है"
"तो एक बार मिल लो"
"पर इन सब मेल मुलाकात का अंत क्या होगा यही सोच कर मैं डर जाता हूँ. मेरे पास उसे देने के लिए कुछ नहीं है. तुमने मुझसे वह वचन लेकर मुझे मझधार में डाल दिया है"
"कोई बात नहीं. हो सकता है मैं तुम्हारा वचन पूरा कर दूं"
"क्या कहा तुमने"
"वही जो तुमने सुना"
"क्या सच में ऐसा संभव है"
"जब तुमने दिल से यह चाहा है तो हो सकता है संभव हो"
"मैं इतना कह कर वहां से उठकर चल दी"
मैनें मुड़कर देखा उसके चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित खुशी थी. मैं भी मुस्कुराते घर वापस आ रही थी. रास्ते में टैक्सी को हाथ देती इससे पहले मानस अचानक आ गए उन्होंने मुझसे पूछा
"इधर कहां घूम रही हो"
"सोमिल से मिलने आयी थी."
"ओह.. कर किया वचन पूरा"
" हाँ कर लिया. आप भी ना?" मेरे उत्तर में हां और ना का मिश्रण था जिसे उन्होंने हाँ समझा और वह पूरे रास्ते शांत रहे. मैंने भी इस बारे में कोई बात करना उचित नहीं समझा. मैने मन ही मन सोच लिया कभी ऐसी ही एक छोटी मुलाकात में सोमिल के वचन को भी पूरा कर दूंगी जो इस विवाह की अनिवार्य कड़ी थी.

कुछ दिनों बाद छाया ने बताया कि मल्होत्रा जी शनिवार को हमारे घर आने के लिए तैयार हो गए हैं. हम सब बहुत खुश थे. छाया और मैंने उनके लिए कई पकवान बनाए और घर को भी बहुत अच्छे से सजाया था . मानस बाजार से दो बढ़िया बुके भी ले आए थे. हम सब उनका इंतजार कर रहे थे. आज सोमिल को यह बात पता चलनी थी कि जिस लड़की से वह प्रेम करता है वह मेरी ननंद थी. वह ठीक समय पर घर पर आ गया. दरवाजा मानस ने खोला था. उन्होंने बुके देकर उसका स्वागत किया और अंदर हाल में ले आए. हॉल में मुझे देखकर सोमिल कुछ बोल नहीं पाया वह मुझे एकटक देखता रहा. मैंने सिर्फ मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया. माया आंटी को देखकर उसने उनके चरण छुए उनसे आशीर्वाद लिया. मानस ने सोमिल को बैठने के लिए कहा और दूसरा बुके उसके हाथ में दे दिया. उसके दिमाग में ढेरों प्रश्न थे पर वह शांत था.

छाया ने एक बार हम सबका परिचय कराया उसने बताया
"यह मेरी माँ हैं, ये मानस भैया हैं और ये मेरी सीमा भाभी हैं और मैं आपकी जूनियर" कह कर हंसने लगी. धीरे-धीरे हम सब सामान्य हो गए और आपस में बातें करने लगे. सोमिल की निगाहों में अभी भी मुझे लेकर प्रश्न थे. काफी देर रात बातें करने के बाद हम लोगों ने खाना खाया. खाने के पश्चात सोमिल अपने घर की तरफ रवाना हो गया. उसके जाने के बाद मानस बहुत खुश थे मानस ने कहा
"मल्होत्रा जी वास्तव में एक जिम्मेदार व्यक्ति लगते हैं छाया तुम्हारी पसंद बहुत ही अच्छी है. पर क्या वह भी तुम्हें पसंद करते हैं "
"पसंद करते हैं तभी तो हम लोगों से मिलने यहां तक आ गए" मैंने कहा.
मानस और मैं दोनों ही बहुत खुश थे. माया आंटी तो सोमिल को देखकर फूली नहीं समा रहीं थीं. उनका होने वाला दामाद इतना खूबसूरत और काबिल होगा शायद उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. मल्होत्रा जी को देखकर सभी काफी खुश हो गए थे.

कुछ दिनों बाद मैंने सोमिल से फिर मुलाकात की बातों के दौरान मैंने उसके माता-पिता से मिलने के लिए समय मांगा उसने कहा
"आप लोग अगले शनिवार को हमारे घर पर आ जाइए मैं पापा मम्मी को बता दूंगा"
वह अब शादी के लिए मन बना रहा था.
उसने मुझसे फिर पूछा
"सीमा क्या यह सच में हो पाएगा"
मैंने उससे कहा
"अपने वचन को पूरा करने के बाद तुम कुवारें नहीं रहोगे. मैं तुम्हारे वचन की लाज रखूंगी पर इस बात का ध्यान रखना कि तुम्हारी छाया ने आज तक किसी के साथ संभोग नहीं किया है. और वह अक्षत यौवना है. यदि तुमने अपना पहला संभोग मेरे साथ किया तो तुम्हें उसके साथ किए गए पहले संभोग का सुख नहीं प्राप्त होगा." मैंने उससे यह बात उससे जोर देकर कही थी ताकि वह छाया जैसी सुन्दर , कोमल एवं कुंवारी लड़की के साथ संभोग करने की लालसा में मुझसे संभोग करने की जिद छोड़ दे.
"उसने कहा मैं वचनबद्ध हूं. छाया का कुवांरापन मेरे लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना मेरा वचन.मेरे वचन की उसकी लाज रखना"
मैंने उसे हंसते हुए कहा
"तथास्तु नंदोई जी" वह अपने संबोधन पर हंस पड़ा.
हम सब सोमिल के परिवार वालों से मिलने उसके घर पर आए जाये. सोमिल का घर हमारे घर से थोड़ा दूर था. उसका घर भी बहुत सुंदर था पर छोटा था. उसके माता-पिता के अलावा उसका एक छोटा भाई भी था. हम सभी का भव्य स्वागत किया गया. सोमिल के पिता मुझे पहचानते थे. वह मेरे और सोमिल के संबंधों के बारे में भी कुछ हद तक जानते थे. उन्होंने मुझसे कहा सीमा बिटिया तुम तो बहुत बड़ी हो गई और तुमने शादी कब कर ली.
"पिछले साल ही हुई है. यह मेरे पति मानस हैं यह मेरी ननद छाया है और यह मेरी सास माया जी हैं. छाया ने उठकर सोमिल के माता पिता के पैर छुए. सोमिल की मम्मी ने उसे अपने गले लगा लिया और बोला
"अरे यह कितनी सुंदर है. सोमिल मुझसे बार-बार कहता था पर मुझे यकीन नहीं होता था. आज छाया को देखने के बाद लग रहा है कि सोमिल सच कहता था"
वो छाया से मिलकर बहुत खुश थी. छाया पहली नजर में ही उन्हें पसंद आ गई थी. उसकी इतनी तारीफ सोमिल पहले ही कर चुका था. सिर्फ आंखों से देखना बाकी था . सोमिल के पिता जी ने कहा
"छाया हम लोगों को बहुत पसंद है मुझे लगता है सोमिल और छाया भी एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं. हमें इन दोनों का विवाह कर देना चाहिए." हम सब भी बहुत खुश हो गए. माया आंटी ने कहा
"सोमिल जैसा दामाद पाकर हम सब भी बहुत खुश हैं" हम सब ने साथ में खाना खाया और विदा लेने की बारी आ गयी. हम लोगों ने सोमिल उनके माता-पिता और उनके छोटे भाई के लिए कई तरह के उपहार ले गए थे. वापस आते समय सोमिल के माता पिता ने अपनी नई बहू और हम सभी के लिए कई सारे उपहार दिए.
सोमिल मुझे जाते हुए देख रहा था और मुस्कुरा रहा था. मैंने शर्म से पलकें झुका लीं और सिर झुकाए हुए आगे चल पड़ी. छाया का विवाह पक्का हो गया था.
 
भाग 19
छाया के विवाह की तैयारी
[मैं सीमा]
बेंगलुरु शहर में मोबाइल की उपलब्धता धीरे-धीरे होने लगी थी. हम सब ने भी अपने लिए एक एक मोबाइल खरीद लिया था. मोबाइल पर हम सब की बातें आसान हो चुकी थी. एक दूसरे से मिलना भी अब इतना कठिन नहीं रहा था हम आपस में एक दूसरे से बात करते और कभी कभार मिल लिया करते थे. शादी के दिन धीरे-धीरे करीब आते जा रहे थे. हम सब शादी की तैयारियों में मशगूल थे.
मानस में छाया की शादी की तैयारी में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी. उसने गांव के सभी लोगों को न्योता भेजा था. अब जब समाज की नजरों में छाया उसकी बहन हो ही चुकी थी तो वह उसकी शादी बहुत धूमधाम से करना चाहते थे. गांव में उनकी प्रतिष्ठा वैसे ही बनी हुई थी. सभी उनकी तारीफ करते थे कि कैसे उन्होंने छाया को अपनी बहन के रूप में अपना लिया था और उसका जीवन ग्रामीण स्तर से उठाकर उसने उच्च स्तर पर ले आया था. मैं जानती थी कि मानस छाया को बहन नहीं मानता था बल्कि वो उसकी प्रेमिका थी. पर अब तो उसकी शादी थी. हम तीनों हमेशा एक साथ रहते थे. वह हम दोनों की प्यारी थी. वो मेरी छोटी बहन, ननद और कभी कभी सौतन लगती थी. सौतन बोलने पर वह दुखी हो जाती थी. वो कहती
"दीदी मैंने अपने आप को मानस को आपको समर्पित किया है. आप जब चाहेंगी मैं आप दोनों के बीच से हट जाउंगी."
मैं उसे चुम्बन लेती और बोलती
"तुम हम दोनों के बीच की कड़ी हो. जब तक जीवन हैं तुम हम दोनों की प्यारी रहोगी." वह खुश हो जाती. छाया बहुत ही अच्छी थी.
हम लोगों ने शादी में अपने सभी दोस्तों और रिश्तेदारों को बुलाया था. पर छाया ने अपनी सहेलियों को बुलाने से साफ मना कर दिया था. उन्हें मानस और उसकी असलियत मालूम थी. छाया यह बात अपनी सहेलियों को नहीं बता सकती थी कि मानस से उसका ब्रेकअप हो गया है. मानस उसका भाई था यह बताना उसके लिए संभव नहीं था. पर उसकी सहेली पल्लवी यह बात जानती थी.

मानस ने एक बहुत बड़ा मैरिज हॉल बुक किया हुआ था. जिसमें गांव से आने वाले सभी लोग रुके हुए थे. गांव की महिलाएं और बच्चे इस भव्य व्यवस्था से बहुत खुश थे. वह इस उत्सव का पूरा आनंद लेते थे. वहां पर सभी के अलग-अलग कमरे बुक थे. खानपान की भी उत्तम व्यवस्था थी. गांव के लोग इन बातों में बहुत खुश थे और मानस की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे थे. हम सब भी सुबह-सुबह वही पहुंच जाते और दिन भर उन लोगों के साथ रहते थे. छाया की खूबसूरती गांव वालों के लिए आश्चर्य का विषय थी. मैं भी उतनी ही खूबसूरत थी परंतु छाया की कोमलता उसे मुझसे दो कदम आगे रखती.
मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं था मैं छाया से बहुत प्यार करती थी. जब हम दोनों एक साथ होते तो गांव वाले यही कहते आ गई ननद भाभी की जोड़ी . हम दोनों पक्की सहेलियां भी थी. गांव की महिलाएं और लड़कियां छाया को अपने साथ बैठा आशीर्वाद देतीं और अपने अंदाज में उससे सुहागरात और शादी के बाद की बातें करतीं. मैंने एक बार देखा, एक गांव की एक लड़की अपने घुटनों को मोड़कर और घुटने के ऊपर और नीचे के दोनों मांसल भागों को अपनी उंगलियों से सटाकर योनि का आकार बना रही थी और अपनी उंगली को उसमें फंसा कर छाया को सम्भोग के बारे में बता रही थी. छाया भी मुस्कुराते हुए वह सब सुन रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे आई आई टी के प्रोफेसर को कोई पाइथागोरस थ्योरम समझा रहा हो...

छाया साक्षात रति थी यह उन्हें नही पता था. उसके चेहरे की मासूमियत उसका सबसे बड़ा हथियार थी. विवाह समारोह में आया हुआ कोई भी व्यक्ति चाहे वह पुरुष हो या महिला या कितना भी कुत्सित विचारों वाला हो वह यह बात सोच नहीं सकता था कि छाया मेरे और मानस के बीच की कड़ी थी. मैं और मानस यह सोच कर ही उत्तेजना से भर जाते थे कि हमारी प्यारी छाया की शादी हो रही है और कुछ ही दिनों मैं वह संभोग सुख का आनंद ले पाएगी.
छाया ने अपनी कामुकता को बड़ी खूबसूरती से जिया था. बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने आसपास में मानस जैसा साथी मिल जाता है और वह उनकी सारी इच्छाओं की पूर्ति करता है. छाया मानस से तीन-चार महीनों के लिए दूर थी पर भगवान ने उसे मुझसे मिला दिया था. मैंने उसकी कामुकता को उस दौरान भी सीचतीं रही. मेरे विवाह के बाद से तो उसे दोहरा मजा मिल रहा था मैं और मानस उसकी हर इच्छा पूरी करते थे.
अब कुछ दिनों बाद उसे संभोग सुख प्राप्त होने वाला था. हम सब बहुत खुश थे. उसने एक दिन मुझसे बातों ही बातों में एक बात बोली
"सीमा दीदी जब तक मेरी शादी नहीं हो जाती पूरे विवाह समारोह में आप अपनी पैंटी नहीं पहनियेगा और मैं भी नहीं पहनूंगी. हम दोनों बीच-बीच में मानस भैया का ख्याल रखते रहेंगे. जब तक वह उत्तेजित रहेंगे तब तक वह दुखी नहीं होंगे"
मैंने उससे कहा
"अरे इसकी फुर्सत कहां मिलेगी."
"आप सिर्फ मानस भैया को यह बात बता दीजिएगा"
मैने मुस्कुराते हुए कहा
"मैं यह बात सोमिल को भी बता दूंगी"
वह हंसते हुए बोली
"अरे वह एकदम सज्जन है. वह यह सब काम शादी के पहले नहीं करेंगे"
हम दोनों हँसने लगे.
छाया मेरे गले लगते हुए कान में बोली
"आपकी शादी में भी मैंने पैंटी नहीं पहनी थी. मानस भैया सुहाग रात मनाने तक मुझे सहलाते रह गए थे." वह हसते हंसते भाग गयी. सच में वह बड़ी नटखट थी.
हम सब अपने काम में मशगूल हो गए. छाया ने सच ही कहा था मेरे बताने से पहले ही उसने मानस को बता दिया था. जहां भी मौका मिलता वह मेरे पास आते मेरे घागरे को ऊपर करते मेरी रानी और नितंबों को सहला देते तथा अपने राजकुमार में तनाव भर कर चले जाते. मैं भी कभी-कभी उनके राजकुमार को अपने हाथों में लेकर दबा देती और उनके तनाव को महसूस करती. यह बड़ा आकर्षक लगता था. दिन भर हम एक दूसरे को उत्तेजित करते रहते मुझे पता था वह यही काम छाया के साथ भी कर रहे थे. मुझे यह और भी उत्तेजक लगता है कि छाया की दो-तीन दिनों में शादी है और वह अपने मानस भैया के साथ यह सब काम कर रही है पर छाया की यही मादकता और कामुकता उसका स्वभाव था. हम इसका आनंद ले रहे थे. छाया कभी-कभी मेरे पास भी आती और और मेरी रानी को हाथ लगा कर देखती और बोलती
"दीदी इसको सूखने नहीं देना है"
रात में घर पहुंचते-पहुंचते हम लोग पूरी तरह उत्तेजित रहते और अपने अपने अंदाज में अपना स्खलन करते. कभी कभी छाया विवाह भवन में भी स्खलन करा देती थी.
छाया की राजकुमारी अब राजकुमार को आगोश में लेने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी थी
 
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