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एक नया संसार

उस वक्त रात के एक बज रहे थे। अजय सिंह अपने कमरे में अपनी बीवी प्रतिमा के साथ घमासान सेक्स करने में ब्यस्त था। दोनो ही मादरजात नंगे थे। इस वक्त अजय सिंह प्रतिमा को पिछवाड़े से ठोंके जा रहा था।

"ले मेरी जान और ले।" अजय सिंह प्रतिमा को घोड़ी बनाकर तथा एक हाॅथ से उसके सिर के बाल पकड़े उसके पिछवाड़े में दनादन पेलते हुए बोला__"अपने पिछवाड़े को और टाइट कर मेरी रंडी साली।"

"आहहहहह ऐसे ही आआआहहहह और जोर से अंदर तक घुसा न भड़वे साले।" प्रतिमा मजे में बोलती जा रही थी__"आआहहह हाॅ ऐसे ही..हुमच हुमच के बजा मेरी गाॅड को वर्ना तेरे लंड को काट कर फेंक दूॅगी आआआहहहहह।"

"साली मेरा लंड काट कर फेंक देगी तो फिर किससे अपनी चूॅत और गाॅड मरवाएगी बोल मादरचोद साली रंडी?"अजय सिंह ने प्रतिमा के गोरे गोरे किन्तु गद्देदार गाॅड पर जोर से थप्पड़ मारते हुए कहा।

"आआआहहहह उसकी चिंता तू मत कर अजय सिंह।" प्रतिमा ने कहा__"दुनियाॅ बहुत बड़ी है, जिसको भी अपनी चूत और गाॅड दिखाऊॅगी वो साला कुत्ते की तरह अपनी लार टपकाते हुए दौड़ा चला आएगा।"

"अच्छा....मतलब तू सारी दुनिया से अपनी चूत और गाॅड मरवा लेगी?" अजय सिंह ने फिर से उसके पिछवाड़े पर जोर से थप्पड़ मारते हुए कहा__"और किस किस से मरवाएगी साली?"

"आआआहहहह और जोर से पेल न भड़वे की औलाद साले दम नहीं है क्या?" प्रतिमा ने अपने सिर को उठा पीछे अजय सिंह की तरफ देख कर कहा__"मैं तो विजय से भी अपनी चूत और गाॅड मरवाना चाहती थी और इसके लिए मैंने कितनी कोशिश की, मगर वो हरामी साला हरिश्चंद्र था न। उसने हर बार मुझे इज्जत मर्यादा का पाठ पढ़ा कर दुत्कार दिया। मेरे जैसी खूबसूरत सेक्सी औरत को दुत्कार दिया था उस हिंजड़े ने। आआहहहह तभी तो मर गया हरामी।"

"अरे सही सही बोल कुतिया।" अजय सिंह ने प्रतिमा की गाॅड से अपने हथियार को निकाल कर उसे पलटा कर बिस्तर पर सीधा लेटाया और फिर उसकी दोनो टाॅगों को उठा कर प्रतिमा के सिर के दोनो तरफ झुका दिया जिससे उसका पिछवाड़ा अच्छे से उठकर पोजीशन में आ गया। अजय सिंह ने फिर से उसकी गाॅड में लंड डाल कर पेलना शुरू कर दिया।

"आआहहहह हाॅ सही से ही तो बोल रही हूॅ आआआहहह।" प्रतिमा ने मजे में आहें भरकर कहा।

"सही सही कहाॅ बोल रही है साली?" अजय सिंह अपने एक हाॅथ से प्रतिमा की एक चूॅची को जोर से मसल कर कहा__"मेरा भाई क्या ऐसे ही मर गया था??"

"आआआहहहह और जोर जोर से मसल न साले भड़वे।" प्रतिमा ने अपने एक हाॅथ को नीचे से बढ़ा कर अपनी चूॅत के दाने को मसलते हुए मजे में कहा__"आआआहहहह हाॅ ऐसे ही...हाय इस मज़े के लिए तो मैं सबकी रंडी बनने को तैयार हूॅ अजय। मेरी वो ख्वाहिश कब पूरी करोगे तुम??"

"कर दूॅगा मेरी जान।" अजय सिंह झुक कर प्रतिमा के होठों पर एक जोरदार चुंबन लिया फिर बोला__"मुझे याद है....तेरी ख्वाहिश...कि तू तीन तीन लंड से एक साथ मज़े करना चाहती है...अपने सभी छेंद पर एक साथ लंड डलवाना चाहती है। रुक जा कुछ दिन करता हूॅ कुछ। मगर पहले ये तो बता कि कैसे मेरा भाई मर गया था?"

"आआआहहहहहह मरना ही था उस कमीने को..आआहहह मेरी बात मान लेता तो आज ज़िंदा होता और ऐस भी करता। मगर सत्यवादी बने रह कर मर जाना ही नियति में लिखा लिया था उसने....आआआहहह मगर एक बात है उसका लंड तुमसे भी बड़ा था..पूरा का पूरा साॅड था वो।"
 
"तुमने कब देखा उसके लंड को?" अजय सिंह ने एक पल रुक कर पूछा और फिर से धक्के लगाने लगा।

"आआआहहह एक दिन दोपहर में खेत पर गई थी अपनी गरमा गरम चूत लेकर।" प्रतिमा ने कहा__"सोच लिया था कि आज इस कमीने से अपनी चूत और गाॅड दोनो मरवा कर ही जाऊॅगी। उस समय खेत मे कोई नहीं था। खेत के मकान के एक कमरे में वो विजय कमीना दोपहर को आराम फरमा रहा था। मैं चुपके से अंदर कमरे मे पहुॅची...आआआहहहह....देखा तो वो गहरी नींद में सोया हुआ नज़र आया। बदन में ऊपर एक बनियान तथा नीचे लुंगी लगा रखी थी उसने। मुझे लगा इससे बढ़िया सुनहरा मौका इससे चुदने का फिर नहीं मिलेगा। ये सोचकर मैंने जल्दी से अपने बदन से सारे कपड़े उतार कर नंगी हो गई और चुपके से विजय की तरफ बढ़ी जो पास ही चारपाई पर सोया हुआ था।"

"क्या हुआ रुक क्यों गई?" अजय सिंह प्रतिमा के एकाएक चुप हो जाने पर कहा__"आगे क्या हुआ था फिर??"

"तुम रुक गए तो मैं भी रुक गई।" प्रतिमा ने कहा__"तुम मेरी कुटाई करते रहो...तभी तो मजे में बताऊगी न।"

"ओह हाॅ।" अजय सिंह चौंका और फिर से धक्के लगाते हुए बोला__"अब बताओ।"

"आआहहहहह हाॅ ऐसे ही आआआहहह जोर जोर से चोदो मुझे।" प्रतिमा ने मजे से आंखें बंद करते हुए कहा__"विजय चारपाई पर चूॅकि गहरी नींद में सोया हुआ था इस लिए उसे ये पता नहीं चला कि उसके कमरे में कौन क्या करने आया है? मैं उसके हट्टे कट्टे शरीर को देख कर आहें भरने लगी थी। चारपाई के पास पहुॅच कर मैंने दोनों हाॅथों से विजय की लुंगी को उसके छोरों से पकड़ कर आहिस्ता से इधर और उधर किया। जिससे विजय के नीचे वाला हिस्सा नग्न हो गया। लुंगी के अंदर उसने कुछ नहीं पहन रखा था। मैंने देखा गहरी नींद में उसका घोंड़े जैसा लंड भी गहरी नींद में सोया पड़ा था। लेकिन उस हालत में भी वह लम्बा चौड़ा नज़र आ रहा था। उसका लंड काला या साॅवला बिलकुल नहीं था बल्कि गोरा था बिलकुल अंग्रेजों के लंड जैसा गोरा। कसम से अजय उसे देख कर मेरे मुॅह में पानी आ गया था। मैंने बड़ी सावधानी से उसे अपने दाहिने हाॅथ से पकड़ा। उसको इधर उधर से अच्छी तरह देखा। वो बिलकुल किसी मासूम से छोटे बच्चे जैसा सुंदर और प्यारा लगा मुझे। मैंने उसे मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे किया तो उसका बड़ा सा सुपाड़ा जो हल्का सिंदूरी रंग का था चमकने लगा और साथ ही उसमें कुछ हलचल सी महसूस हुई मुझे। मैंने ये महसूस करते ही नज़र ऊपर की तरफ करके गहरी नींद में सोये पड़े विजय की तरफ देखा। वो पहले की तरह ही गहरी नींद में सोया हुआ लगा। मैंने चैन की साॅस ली और फिर से अपनी नज़रें उसके लंड पर केंद्रित कर दी। मेरे हाॅथ के स्पर्श से तथा लंड को मुट्ठी में लिए ऊपर नीचे करने से लंड का आकार धीरे धीरे बढ़ने लगा था। ये देख कर मुझमें अजीब सा नशा भी चढ़ता जा रहा था, मेरी साॅसें तेज़ होने लगी थी। मैंने देखा कि कुछ ही पलों में विजय का लंड किसी घोड़े के लंड जैसा बड़ा होकर हिनहिनाने लगा था। मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि विजय जाग रहा हो और ये देखने की कोशिश कर रहा हो कि उसके साथ आगे क्या क्या होता है? मगर मुझे ये भी पता था कि अगर विजय जाग रहा होता तो इतना कुछ होने ही न पाता क्योंकि वह उच्च विचारों तथा मान मर्यादा का पालन करने वाला इंसान था। वो कभी किसी को ग़लत नज़र से नहीं देखता था, ऐसा सोचना भी वो पाप समझता था। मेरे बारे में वो जान चुका था कि मैं क्या चाहती हूॅ उससे इस लिए वो हवेली में अब कम ही रहता था। दिन भर खेत में ही मजदूरों के साथ वक्त गुज़ार देता था और देर रात हवेली में आता तथा खाना पीना खा कर अपने कमरे में गौरी के साथ सो जाता था। वह मुझसे दूर ही रहता था। इस लिए ये सोचना ही ग़लत था कि इस वक्त वह जाग रहा होगा। मैंने देखा कि उसका लंड मेरी मुट्ठी में नहीं आ रहा था तथा गरम लोहे जैसा प्रतीत हो रहा था। अब तक मेरी हालत उसे देख कर खराब हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि जल्दी से उछल कर इसको अपनी चूत के अंदर पूरा का पूरा घुसेड़ लूॅ। किन्तु जल्दबाजी में सारा खेल बिगड़ जाता इस लिए अपने पर नियंत्रण रखा और उसके सुंदर मगर बिकराल लंड को मुट्ठी में लिए आहिस्ता आहिस्ता सहलाती रही। उसको अपने मुह में भर कर चूसने के लिए मैं पागल हुई जा रही थी, जिसका सबूत ये था कि मैं अपने एक हाथ से कभी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगती तो कभी अपनी चूॅत को। मेरे अंदर वासना अपने चरम पर पहुॅच चुकी थी। मुझसे बरदास्त न हुआ और मैंने एक झटके से नीचे झुक कर विजय के लंड को अपने मुह में भर लिया....और यही मुझसे ग़लती हो गई। मैंने ये सब अपने आपे से बाहर हो कर किया था। विजय का लंड जितना बड़ा था उतना ही मोटा भी था। मैंने जैसे ही उसे झटके से अपने मुह में लिया तो मेरे ऊपर के दाॅत तेज़ी से लंड में गड़ते चले गए और विजय के मुख से चीख निकल गई साथ ही वह हड़बड़ा कर तेज़ी से चारपाई पर उठ कर बैठ गया। अपने लंड को मेरे मुख में देख वह भौचक्का सा रह गया किन्तु तुरंत ही वह मेरे मुह से अपना लंड निकाल कर तथा चारपाई से उतरकर दूर खड़ा हो गया। उसका चेहरा एक दम गुस्से और घ्रणा से भर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि कुछ देर तो मुझे कुछ समझ ही न आया कि ये क्या और कैसे हो गया। होश तो तब आया जब विजय की गुस्से से भरी आवाज़ मेरे कानों से टकराई।

"ये क्या बेहूदगी है?" विजय लुंगी को सही करके तथा गुस्से से दहाड़ते हुए कह रहा था__"अपनी हवस में तुम इतनी अंधी हो चुकी हो कि तुम्हें ये भी ख़याल नहीं रहा कि तुम किसके साथ ये नीच काम कर रही हो? अपने ही देवर से मुह काला कर रही हो तुम। अरे देवर तो बेटे के समान होता है ये ख़याल नहीं आया तुम्हें?"

मैं चूॅकि रॅगे हाॅथों ऐसा करते हुए पकड़ी गई थी उस दिन इस लिए मेरी ज़ुबान में जैसे ताला सा लग गया था। उस दिन विजय का गुस्से से भरा वह खतरनाक रूप मैंने पहली बार देखा था। वह गुस्से में जाने क्या क्या कहे जा रहा था मगर मैं सिर झुकाए वहीं चारपाई के नीचे बैठी रही उसी तरह मादरजात नंगी हालत में। मुझे ख़याल ही नहीं रह गया था कि मैं नंगी ही बैठी हूॅ। जबकि,,,

"आज तुमने ये सब करके बहुत बड़ा पाप किया है।" विजय कहे जा रहा था__"और मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। क्या समझता था मैं तुम्हें और तुम क्या निकली? एक ऐसी नीच और कुलटा औरत जो अपनी हवस में अंधी होकर अपने ही देवर से मुह काला करने लगी। तुम्हारी नीयत का तो पहले से ही आभास हो गया था मुझे इसी लिए तुमसे दूर रहा। मगर ये नहीं सोचा था कि तुम अपनी नीचता और हवस में इस हद तक भी गिर जाओगी। तुममें और बाज़ार की रंडियों में कोई फर्क नहीं रह गया अब। चली जाओ यहाॅ से...और दुबारा मुझे अपनी ये गंदी शकल मत दिखाना वर्ना मैं भूल जाऊॅगा कि तुम मेरे बड़े भाई की बीवी हो। आज से मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं...अब जा यहाॅ से कुलटा औरत...देखो तो कैसे बेशर्मों की तरह नंगी बैठी है?"
 
विजय की बातों से ही मुझे ख़याल आया कि मैं तो अभी नंगी ही बैठी हुई हूॅ तब से। मैंने सीघ्रता से अपनी नग्नता को ढॅकने के लिए अपने कपड़ों की तरफ नज़रें घुमाई। पास में ही मेरे कपड़े पड़े थे। मैंने जल्दी से अपनी साड़ी ब्लाउज पेटीकोट तथा ब्रा पैन्टी को समेटा किन्तु फिर मेरे मन में जाने क्या आया कि मैं वहीं पर रुक गई।

विजय की बातों ने मेरे अंदर ज़हर सा घोल दिया था। जो हमेशा मुझे इज्ज़त और सम्मान देता था आज वही मुझे आप की जगह तुम और तुम के बाद तू कहते हुए मेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाए जा रहा था। मुझे बाजार की रंडी तक कह रहा था। मेरे दिल में आग सी धधकने लगी थी। मुझे ये डर नहीं था कि विजय ये सब किसी से बता देगा तो मेरा क्या होगा। बल्कि अब तो सब कुछ खुल ही गया था इस लिए मैंने भी अब पीछे हटने का ख़याल छोंड़ दिया था।

मैने उसी हालत में खिसक कर विजय के पैर पकड़ लिए और फिर बोली__"तुम्हारे लिए मैं कुछ भी बनने को तैयार हूॅ विजय। मुझे इस तरह अब मत दुत्कारो। मैं तुम्हारी शरण में हूॅ, मुझे अपना लो विजय। मुझे अपनी दासी बना लो, मैं वही करूॅगी जो तुम कहोगे। मगर इस तरह मुझे मत दुत्कारो...देख लो मैंने ये सब तुम्हारा प्रेम पाने के लिए किया है। माना कि मैंने ग़लत तरीके से तुम्हारे प्रेम को पाने की कोशिश की लेकिन मैं क्या करती विजय? मुझे और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। पहले भी मैंने तुम्हें ये सब जताने की कोशिश की थी लेकिन तुमने समझा ही नहीं इस लिए मैंने वही किया जो मुझे समझ में आया। अब तो सब कुछ जाहिर ही हो गया है,अब तो मुझे अपना लो विजय...मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए।"

"बंद करो अपनी ये बकवास।" विजय ने अपने पैरों को मेरे चंगुल से एक झटके में छुड़ा कर तथा दहाड़ते हुए कहा__"तुझ जैसी गिरी हुई औरत के मैं मुह नहीं लगना चाहता। मुझे हैरत है कि बड़े भइया ने तुझ जैसी नीच और हवस की अंधी औरत से शादी कैसे की? ज़रूर तूने ही मेरे भाई को अपने जाल में फसाया होगा।"

"जो मर्ज़ी कह लो विजय।" मैंने सहसा आखों में आॅसू लाते हुए कहा__"मगर मुझे अपने से दूर न करो। दिन रात तुम्हारी सेवा करूॅगी। मैं तुम्हें उस गौरी से भी ज्यादा प्यार करूॅगी विजय।"

"ख़ामोशशशश।" विजय इस तरह दहाड़ा था कि कमरे की दीवारें तक हिल गईं__"अपनी गंदी ज़ुबान से मेरी गौरी का नाम भी मत लेना वर्ना हलक से ज़ुबान खींचकर हाॅथ में दे दूॅगा। तू है क्या बदजात औरत...तेरी औकात आज पता चल गई है मुझे। तेरे जैसी रंडियाॅ कौड़ी के भाव में ऐरों गैरों को अपना जिस्म बेंचती हैं गली चौराहे में। और तू गौरी की बात करती है...अरे वो देवी है देवी...जिसकी मैं इबादत करता हूॅ। तू उसके पैरों की धूल भी नहीं है समझी?? अब जा यहाॅ से वर्ना धक्के मार कर इसी हालत में तुझे यहाॅ से बाहर फेंक दूॅगा।"

मैं समझ चुकी थी कि मेरी किसी भी बात का विजय पर अब कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। उल्टा उसकी बातों ने मुझे और मेरे अंतर्मन को बुरी तरह शोलों के हवाले कर दिया था। उसने जिस तरीके से मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया था उससे मेरे अंदर भीषण आग लग चुकी थी और मैंने मन ही मन एक फैंसला कर लिया था उसके और उसके परिवार के लिए।

"ठीक है विजय सिंह।" फिर मैंने अपने कपड़े समेटते हुए ठण्डे स्वर में कहा था__"मैं तो जा रही हूं यहाॅ से मगर जिस तरह से तुमने मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया है उसका परिणाम तुम्हारे लिए कतई अच्छा नहीं होगा। ईश्वर देखेगा कि एक औरत जब इस तरह अपमानित होकर रुष्ट होती है तो भविष्य में उसका क्या परिणाम निकलता है??"

इतना कह कर मैं वहाॅ से कपड़े वगैरा पहन कर चली आई थी। फिर उसके बाद क्या हुआ ये तो तुम्हें पता ही है अजय।

"हाॅ मेरी जान।" अजय सिंह जो जाने कब से रुका हुआ था अब फिर से प्रतिमा की गाॅड में लंड डाल कर धक्के लगाने लगा था, बोला__"मेरे कहने पर तुमने इस सबकी कोशिश तो बहुत की मगर वो बेवकूफ का बेवकूफ ही रहा। सोचा था कि मिल बाॅट कर सब खाएंगे पियेंगे मगर उसकी किस्मत में मरना ही लिखा था तो मर गया।"

"आआआआहहहह अब जरा मेरी चूॅत का भी कुछ ख़याल करो।" प्रतिमा ने सहसा सिसकते हुए कहा__"इसके साथ भी इंसाफ करो न आआआहहहह।"

अजय ने प्रतिमा के पिछवाड़े से लंड निकाल कर उसकी चूॅत में एक ही झटके से पेल दिया और दनादन धक्के लगाने लगा।
 
"आआआहहहहह अअअअजजजयययय ऐसे ही जोर से करते रहो।" प्रतिमा ने आनंद में सिसकते हुए कहा__"आआहह बहुत मज़ा आ रहा है।"

"ले मेरी रंडी और ले।" अजय के धक्कों की रफ्तार बढ़ती जा रही थी__"करुणा की चूॅत और गाॅड कब दिलाओगी यार। अब इंतज़ार नहीं होता मुझसे।"

"आआआआहहह कोशिश तो कर ही रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा__"कल भी गई थी उसके पास। पहले तो कुछ समय के लिए मुझे लगा कि वह शीशे में उतर गई है लेकिन जल्द ही मेरी सारी कोशिशों पर पानी भी फिर गया।"

"मुझे लगता है तुम्हारी सारी कोशिशें यू ही बेकार जाती रहेंगी।" अजय ने जोर का शाॅट मारते हुए कहा__"जबकि मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता। कसम से जब भी उसे देखता हूॅ तो लगता है कि अभी उसे जबरजस्ती अपने नीचे लेटा कर उसकी चूॅत और गाॅठ की ठोंकाई शुरू कर दूॅ।"

"आआआआहहहहह थोड़ा और जोर से धक्के मारो।" प्रतिमा ने कहा__"ऐसा सोचना भी मत अजय। वो ऐसी वैसी औरत नहीं है। जबरजस्ती करने से मुसीबत भी हो सकती है। अभय को ज़रा भी पता चला तो अंजाम अच्छा नहीं होगा।"

"तो फिर क्या करूॅ मैं?" अजय ने आवेश में कहने के साथ ही पूरी रफ्तार से धक्के लगाने लगा था__"तुमसे तो कुछ हो ही नहीं रहा।"

"आआआआहहहहहह मेरे पपपपास एएएक प्लललान है अजय।" प्रतिमा धक्कों की वजह से बुरी तरह पड़ी पड़ी हिल रही थी__"उससे शायद तुम्हाहाहारा काम होहोहो सकता है।"

"अरे तो जल्दी बताओ न डियर।" अजय सिंह अपने चरम पर पहुॅचते हुए बोला__"क्या प्लान है तुम्हारे पास?"

"आआआआआहहहहह अजय और जोर से करो मैं छूटने वाली हूॅ आआआहह।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही जबरदस्त झटका खाया। उसकी कमर कमान की तरह झटके खाते हुए तनी हुई थी और कुछ ही पल में वह शान्त पड़ गई।

"आआआहहह प्रतिमा मैं भी आया।" अजय सिंह भी झड़ते हुए प्रतिमा के ऊपर पसर गया।

अभी ये दोनो अपनी अपनी साॅसें बहाल ही कर रहें थे कि बेड के एक तरफ टेबल पर रखे लैण्डलाइन फोन की घण्टी घनघना उठी। फोन की घण्टी से दोनों ही चौंके।

"इतनी रात को भला किसका फोन हो सकता है?" दोनो के मन में एक ही सवाल उभरा।

"उठ कर देखो न किसका फोन है?" अजय के नीचे दबी प्रतिमा ने कसमसाते हुए कहा।

अजय सिंह किसी तरह उठ कर केड्रिल से रिसीवर को उठाकर काॅन से लगाने के साथ ही कहा__"ह हैलो।"

".............................."

"क क्या???" उधर से कुछ कहा गया जिसे सुन कर अजय बुरी तरह उछल पड़ा था।

".............................."

"ये तुम क्या कह रहे हो?" अजय का चेहरा सफेद फक्क पड़ता चला गया__"और और कैसे हुआ ये सब?"

".............................."

"ओके ओके हम आ रहे हैं।" कहने के साथ ही अजय ने रिसीवर को वापस केड्रिल पर पटका और तुरंत ही उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

कुछ देर बाद अजय सिंह बाथरूम से हाॅथ मुॅह धोकर निकला और आनन फानन में अपने कपड़े पहने उसने।

"अरे क्या बात है अजय?" प्रतिमा बुरी तरह चौंकते हुए बेड पर उठकर बैठते हुए बोली__"इतनी रात को कहाॅ जा रहे हो तुम? और और अभी किसका फोन आया था?"

"अभी कुछ बताने का समय नहीं है।" अजय सिंह कार की चाभी अपने एक हाॅथ में थामते हुए बोला__"अभी मुझे यहाॅ से फौरन ही निकलना होगा, मेरा इंतज़ार मत करना।"

कहने के साथ ही अजय सिंह कमरे से बाहर निकल गया जबकि प्रतिमा नंगी हालत में ही भाड़ की तरह अपनी आॅखें और मुॅह फाड़े दरवाजे की तरफ देखती रह गई इस बात से बेख़बर की दो आॅखें निरंतर उसके नंगे जिस्म को देखे जा रही हैं।

अजय सिंह को शहर में अपनी कपड़ा मील की फैक्टरी पहुॅचते पहुॅचते लगभग सुबह हो गई थी। देर रात तक तो वह खुद ही अपनी पत्नी प्रतिमा के साथ मौज मस्ती में ब्यस्त रहा था।

अजय सिंह ने जब फैक्टरी के सामने अपनी कार रोंकी तो वहाॅ का माहौल ही अलग था। हर तरफ आग और धुएॅ का साम्राज्य नज़र आ रहा था। फैक्टरी के चारो तरफ भीषण आग की लपटें आसमान को छूती नज़र आ रही थी। दमकल की कई गाड़ियाॅ इस आग को बुझाने की कोशिश में लगी हुई थी। फैक्टरी में काम करने वाले कुछ मजदूर भी इधर उधर नज़र आ रहे थे।
 
अजय सिंह की हालत तो फोन में मिली जानकारी से ही खराब थी किन्तु खुद अपनी आॅखों से ऐसा भयानक मंज़र देख कर उसकी रही सही कसर भी काफूर हो गई। उसके चेहरे पर उसी तरह के भाव थे जैसे सब कुछ लुट जाने पर होते हैं।

अजय सिंह लुटे पिटे भाव के साथ कार से नीचे उतरा और फैक्टरी की तरफ चल दिया। अभी वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि उसका पीए दीनदयाल शर्मा उसकी तरफ ही आता हुआ नज़र आया। उसके चेहरे पर भी बड़े अजीब से भाव थे।

"सब कुछ बरबाद हो गया सर।" दीनदयाल करीब पहुॅचते ही हताश भाव से बोला__"कुछ भी शेष नहीं बचा। फैक्टरी के हर हिस्से में भीषण आग लगी हुई है। पिछले दो घंटे से फायर ब्रिगेड वाले इस आग पर काबू पाने की कोशिश में लगे हुए हैं।"

"क कैसे हुआ दीनदयाल?" अजय सिंह की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी गहरे कुएॅ से बोल रहा हो__"आख़िर कैसे हुआ ये सब? फैक्टरी में आग कैसे लग गई?"

"मुझे खुद भी कुछ समझ में नहीं आ रहा सर कि ये सब कैसे हो गया?" दीनदयाल दीन हीन लहजे से ही कहा__"फैक्टरी के अंदर आग लगने का सवाल ही नहीं था क्योकि इसके काफी तगड़े इतजामात थे। यहाॅ तक कि फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को भी फैक्टरी के अंदर बीड़ी सिगरेट तम्बाकू या गुटका खाने की इजाज़त नहीं थी।"

"तो फिर कैसे लगी ये आग?" अजय सिंह आवेश मे बोला__"मुझे इस बारे में ठोस सबूत के साथ जानकारी चाहिए दीनदयाल। तुम जानते हो कि इससे हमें कितना बड़ा नुकसान हुआ है। जिस तरह आग लगी हुई नज़र आ रही है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि फैक्टरी के अंदर की हर चीज़ ख़ाक़ में मिल चुकी है। तुम अंदाज़ा लगा सकते हो कि कितना नुकसान हो गया है।"

"मैं जानता हूॅ सर।" दीनदयाल ने कहा__"पूरी की पूरी फैक्टरी ही जल गई है, ये कोई मामूली बात नहीं है। ये करोड़ों से भी ऊपर का नुकसान है।"

"पुलिस को सूचित किया?" अजय सिंह ने पूॅछा।

"जी सर पुलिस को सूचित कर दिया गया है और पुलिस का एक इन्स्पेक्टर अंदर आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा है।" दीनदयाल ने कहा__"वो कह रहा है कि आज के बाद से यहाॅ के थाने से उसका तबादला हो जाएगा और अब उसकी जगह पर आपकी बेटी रितू सिंह बघेल इंस्पेक्टर का चार्ज सम्हालेंगी।"

"ओह आई सी।" अजय सिंह के चेहरे पर सोचपूर्ण भाव नुमायां हुए__"तो वही हुआ जो हम नहीं चाहते थे, ख़ैर।"

कहने के साथ ही अजय सिंह फैक्टरी की तरफ बढ़ गया। ये लिखने की आवश्यकता नहीं कि उसके पीछे पीछे ही उसका पीए दीनदयाल भी बढ़ गया था।

कुछ देर में ही अजय सिंह उस इंस्पेक्टर के सामने था जिसकी पुलिस की वर्दी पर लगी नेम प्लेट पर उसका नाम अनिल वर्मा लिखा नज़र आया। कद काठी से ठीक ठाक ही नज़र आ रहा था वह। तीस से बत्तीस की उमर का रहा होगा। उसने अजय सिंह को देख कर बड़े ही अदब से नमस्ते किया।

"ठाकुर साहब बड़े ही अफसोस की बात है।" फिर उस इंस्पेक्टर ने कहा__"कि आपकी फैक्टरी में लगी आग से दूर दूर तक कुछ भी साबुत बचा हुआ नज़र नहीं आ रहा है। इससे इस बात का अंदाज़ा लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है कि इस हादसे से आपको भारी भरकम नुकसान हो गया है, अगर...।"

अजय सिंह ने उसके 'अगर' पर अचानक ही कहते हुए रुक जाने पर उसकी तरफ सवालिया निगाहों से देखा।

"अगर आपने अपनी इस फैक्टरी का जीवन बीमा पहले से नहीं करवाया हुआ है तो।" फिर उसने ये कह कर अपने पिछले कथन को पूरा किया__"वैसे पूछना तो नहीं चाहिए मगर फिर भी आपसे पूॅछने की ये हिमाक़त कर ही लेता हूॅ, ड्यूटी इज ड्यूटी भले ही आज ही बस के लिए यहां के एरिये का इंचार्ज हूॅ कल से तो आपकी बेटी ही इस सबकी तहकीक़ात करेंगी न। ख़ैर, तो मैं ये पूछने की हिमाक़त कर रहा था कि..क्या लगता है आपको...ये आग किसने लगाई हो सकती है आपकी इस विसाल फैक्टरी में?"
 
"ये पता लगाना तो तुम्हारा काम है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने तनिक कठोरता से कहा था, उसे इस इंस्पेक्टर का बिहैवियर आज कुछ बदला हुआ लगा था, इसके पहले तो ये सब खुद उसके ही पालतू कुत्ते जैसे थे, बोला__"और अगर नहीं पता लगा सकते तो यहाॅ तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है समझे?"

"अरे आप तो नाराज़ हो गए लगते हैं ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने मुस्कुराकर कहा__"माफ कीजियेगा। पर सवाल तो मैंने ठीक ही पूॅछा था आपसे।"

"हाॅ तो हमें भी इस बारे में भला कैसे पता होगा कि ये आग किसने लगाई है?" अजय सिंह उखड़े हुए लहजे से बोला__"अगर पता होता तो क्या वो अब तक ज़िन्दा बचा होता?"

"हाॅ ये तो है।" इंस्पेकटर ने अजीब भाव से अपने सिर को हिलाया__"आपके हाॅथों अब तक तो उसका कल्याण हो जाना निश्चित ही था।"

"वैसे ये तुम कैसे कह सकते हो?" सहसा इस बीच दीनदयाल ने सवाल किया__"कि फैक्टरी में लगी ये आग किसी के द्वारा लगाई गई है?"

"देखा आपने ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने तपाक से कहा__"आपका ये पीए कितना दिमाग़दार है? मेरे पूॅछने पर जो सवाल आपको पहले ही मुझसे पूॅछना चाहिये था वो आपने नहीं पूॅछा लेकिन आपके इस दीन के दयाल ने पूॅछ लिया। ख़ैर, अब जबकि पूॅछ ही लिया है तो मुझे भी सवाल का जवाब देने में कोई ऐतराज़ नहीं है। बात दरअसल ये है ठाकुर साहब कि फैक्टरी में लगी आग अगर साधारण रूप से लगी होती तो उसका रूप इतना उग्र न होता, ऐसा मेरा मानना है..जोकि बाॅकि सबके नज़रिये से ग़लत भी हो सकता है। ख़ैर....अब जबकि आग इस प्रकार भीषण रूप से लगी हुई है कि फैक्टरी का कोई कोना तक खाली नहीं बचा है तो कहीं न कहीं मन में ये बात आ ही जाती है कि हो सकता है ये आग किसी के द्वारा सोच समझ कर तथा तसल्ली से इस प्रकार लगाई गई हो कि आपकी फैक्टरी का कोई भी हिस्सा राम नाम सत्य होने से न बच सके।"

अजय सिंह को इंस्पेक्टर की ऊल जलूल बातों से गुस्सा तो बहुत आ रहा था किन्तु वो उसकी इन सब बातों से सहमत भी था। यकीनन ऐसा हो सकता था। क्योंकि पिछले कुछ समय से जिस तरह की घटनाएं उसके साथ घट रही थी उससे यही ज़ाहिर होता था कि एक बार फिर किसी ने उसके साथ इस प्रकार का नुकसानदायी खेल खेला है। ये अलग बात है कि इस बार इस खेल में उसकी समूची फैक्टरी को ही आग के हवाले कर दिया गया था। अजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर कौंन है जो उसके साथ ये सब कर रहा है?

"ठाकुर साहब इसी दुनियाॅ में हैं न आप?" उधर इंस्पेक्टर ने अजय सिंह को गहरी सोच में डूबे हुए देखकर कहा__"अगर हैं तो प्लीज ज़रा ग़ौर फरमाइये, मुझे आपसे कुछ सवालात करने हैं।"

"कैसे सवालात इंस्पेक्टर?" अजय सिंह बोला।

"यही कि फैक्टरी में लगी इस भीषण आग में किसी की जान तो नहीं गई न?" इंस्पेक्टर ने पूछा__"क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो आपके लिए मुसीबत हो सकती है। फैक्टरी तो जल ही गई ऊपर से इस आग में जिनकी जान चली गई होगी उससे लम्बा बखेड़ा भी खड़ा हो जाएगा। अच्छा खासा केस बनेगा और आपको कानून की गिरफ्त में भी लेना पड़ सकता है।"

"ज्यादा बकवास करने की ज़रूरत नहीं है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह गुर्राया__"जो भी होगा हम देख लेंगे। तुम अपना काम करो और फुटास की गोली लो, समझे??"

"जैसी आपकी मर्ज़ी ठाकुर साहब।" इंस्पेक्टर ने कहा और एक तरफ बढ़ गया।

"दीनदयाल।" इंस्पेक्टर के जाने के बाद अजय सिंह दीनदयाल से मुखातिब होकर कहा__"इस सबका न्यूज और मीडिया वालों को पता नहीं चलना चाहिए।"

"वैसे तो अब तक ये बात लगभग फैल ही चुकी होगी सर।" दीनदयाल ने कहा__"फिर भी न्यूज और मीडिया वालों से कुछ भी छुपा नहीं रह सकेगा। क्योंकि ये कोई साधारण मामला नहीं है, वो तो अच्छा हुआ कि हमारी फैक्टरी शहर से हट कर तथा शहर की आबादी से बहुत दूर थी जिससे फैक्टरी के अलावा बाकी और किसी का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। वर्ना सोचिए अगर ये फैक्टरी शहर में किसी आबादी वाली जगह पर होती तो क्या होता? आग की भीषण लपटों से आस पास के मकानों या और भी बहुत सी चीज़ों पर आग लग जाती जिसके परिणाम की कल्पना ही बड़ी भयंकर है। इस सबके बाद हम कहीं मुॅह छुपाने के काबिल नहीं रह जाते। जनता और कानून हमारे पीछे ही पड़ जाते।"
 
"जो नहीं हुआ उसके बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है दीनदयाल।"अजय सिंह ने गहरी साॅस ली__"यूॅ तो कानूनी रूप से इस बात की जाॅच तो होगी ही कि फैक्टरी में आग लगने की मुख्य वजह क्या थी? मगर....हमें तो पहले से ही इस बात का अंदेशा है कि इस सबमें उसी का हाॅथ है जिसने पिछले कुछ समय से हमारे साथ खेल खेलना शुरू किया है। समझ में नहीं आता कि आख़िर क्यों कर रहा है वो ऐसा? क्यों हमें बरबाद करने पर तुला हुआ है वो?"

"हैरत की बात है सर।" दीनदयाल ने गंभीरता से कहा__"हमें अब तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चल पाया। वो हर बार धोखे से हमारा कुछ न कुछ नुकसान कर देता है और हम कुछ नहीं कर पाते।"

ये दोनो ऐसे ही अपना माथा पच्ची करने में लगे रहे। फैक्टरी के अंदर अब काफी हद तक आग पर काबू पा लिया गया था।

....................

उधर मुम्बई में आज एक बार फिर सब लोग एक साथ ड्राइंगरूम में रखे कीमती सोफों पर बैठे हुए थे।

"शहर के मशहूर बिजनेस मैन अजय सिंह की फैक्टरी में लगी आग, जिसमें सबकुछ जल कर खाक़ हो गया।" निधि ने अखबार में छपी ख़बर को पढ़ते हुए कहा__"मिली जानकारी के अनुसार ये आग उस समय लगी जब सारा शहर रात के अॅधेरे में गहरी नींद सोया पड़ा था। रात दो से तीन बजे के बीच फैक्टरी में आग लगी, और धीरे धीरे समूची फैक्टरी भीषण आग की चपेट में आ गई। फैक्टरी में मौजूद वर्कर खुद इस बात से अंजान हैं। फैक्टरी में लगी आग के उग्र रूप धारण करने से पहले ही फायर ब्रिगेड वालों को सूचित किया गया, जब तक दमकल की गाड़ियाॅ वहाॅ पहॅची तब तक फैक्टरी में लगी आग भयंकर रूप धारण कर चुकी थी। लगभग चार घंटे की मसक्कत के बाद फायर ब्रिगेड द्वारा इस भयंकर आग पर काबू पाया गया। फैक्टरी में आग लगने की सूचना फैक्टरी के मालिक अजय सिंह बघेल को दे दी गई थी। फैक्टरी में आग लगने से जो करोड़ों का नुकसान हुआ है उससे फैक्टरी के मालिक अजय सिंह गहरे सदमे में हैं। हमें विश्वस्त सूत्रों द्वारा ये पता चला है कि फैक्टरी के मालिक अजय सिंह ने अपनी फैक्टरी का कोई जीवन बीमा वगैरा नहीं करवा रखा था, इस लिए अब आप समझ सकते हैं कि आग लगने की वजह से फैक्टरी के मालिक अजय सिंह का कितना नुकसान हुआ होगा। फैक्टरी में आग लगने की वजह अभी तक सामने नहीं आई है। इस बारे में अभी पुलिस द्वारा जाॅच पड़ताड़ की जा रही हैं।"

"कैसी रही अंकल?" विराज ने होठों पर मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए कहा__"अजय सिंह को एक और झटका दे दिया मैंने।"

"तो क्या यही वो काम था जिसे तुम अजय सिंह के बिजनेस पार्टनर अरविंद सक्सेना द्वारा अंजाम देने की बात कह रहे थे?" जगदीश ने हैरत से कहा__"पर कैसे हुआ ये सब?"

"हाॅ राज कैसे किया तुमने ये सब?" गौरी ने भी चौंकते हुए पूछा।

"सब कुछ शुरू से और अच्छे से आप लोगों को बताता हूॅ।" विराज ने एक लम्बी साॅस खींचते हुए कहा__"जब अजय सिंह का बिजनेस पार्टनर अरविंद सक्सेना अपने उन फोटोग्राफ्स की वजह से मेरे इशारों पर काम करने को तैयार हो गया तो मैने उससे अजय सिंह के बिजनेस से संबंधित और भी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हाॅसिल की जिसका किसी को कुछ पता नहीं था।"

"क्या मतलब??" विराज की इस बात पर सब एक साथ चौंके थे__"कैसी जानकारी??"

"अरविंद सक्सेना के अनुसार।" विराज ने इत्मीनान से कहा__"अजय सिंह कपड़ा मील की आड़ में गैर कानूनी धंधा भी करता है। जिसमें गाॅजा, अफीम, चरस, आदि कई चीज़ें शामिल हैं। इन सबसे उसे लाखों करोड़ों का भारी मुनाफा होता है। चूॅकि ये गैर कानूनी धंधा है इस लिए इसमें उसे कानून का भी डर था मगर उसने अपनी चतुराई से कानून को भी इसमें शामिल कर लिया। कहने का मतलब ये कि इस धंधे से होने वाले मुनाफे में पुलिस और कानून के कई सारे नुमाइंदों का भी हिस्सा होता था। पुलिस और कानून का साथ मिलते ही ये धंधा और भी जोर शोर से चलने लगा मगर छिप छिपाकर ही। अजय सिंह की फैक्टरी शहर से बाहर ऐसी जगह पर है जहाॅ आबादी न के बाराबर ही है इस लिए फैक्टरी में ही इन सब चीज़ों का भी एक अलग से कारखाना बनाया गया था जो फैक्टरी के नीचे तहखाने में था। अब आप समझ सकते हैं कि अजय सिंह क्या है? कपड़ा मील की कमाई से इतना मुनाफा नहीं था जितना इस गैर कानूनी धंधे से था। ये तो ख़ैर शुरूआत है, अभी और भी बहुत सी चीज़ें हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता।"

"तुम तो जान ही गए होगे न?" जगदीश ने कहा__"फिर तो कोई समस्या ही नहीं है।"

"मुझे भी उतना ही पता है जितना सक्सेना को पता था।" विराज ने कहा।

"क्या मतलब??" जगदीश चौंका।
 
"सक्सेना अजय सिंह का पार्टनर ज़रूर था अंकल।" विराज कह रहा था__"लेकिन उसे खुद ये नहीं पता था कि उसका बिजनेस पार्टनर अजय सिंह वास्तव में है क्या? अरविंद सक्सेना एक फट्टू किस्म का इंसान था तथा साफ दिल का, ये अलग बात है कि उसका कैरेक्टर बाॅकी चीज़ में अजय सिंह से जुदा नहीं था। हाॅ ये जरूर था कि सक्सेना गैर कानूनी काम करने से डरता था, और शायद यही वजह रही थी कि अजय सिंह ने इस धंधे में सक्सेना को शामिल न करके उसे इससे दूर ही रखा। ख़ैर, एक दिन सक्सेना को किसी वजह से ये पता चल गया कि अजय सिंह गैर कानूनी धंधा भी करता है। उसने अपनी आखों से फैक्टरी के बेसमेंट में बने एक अलग ही कारखाने को देखा था। अजय सिंह को ये पता नहीं था कि सक्सेना उसकी असलियत जान चुका है। सक्सेना ने कभी अजय सिंह से इस बात का ज़िक्र भी नहीं किया। क्योकि वह जानता था कि इस धंधे में कोई किसी का नहीं होता, अगर बात इधर से उधर हो गई तो उसकी जान भी जा सकती है। सक्सेना उस दिन से परेशान भी रहने लगा किन्तु उसने ये सब अजय सिंह पर ज़ाहिर न होने दिया। वो अब किसी तरह अजय सिंह से पार्टनरशिप तोड़कर उससे कहीं दूर चला जाना चाहता था, मगर सवाल था कि कैसे करे ये सब? फिर एक दिन वो मेरी पकड़ में आ गया, मैने जब उसे अपने तरीके से टार्चर करके उससे अजय सिंह के बारे में पूॅछा तथा उससे पार्टनरशिप तोड़ने की बात कही तो वह कुछ देर न नुकुर करने के बाद इसके लिए तैयार हो गया। उसने मुझसे शर्त रखी कि इस सबमें उसका नाम नहीं आना चाहिए और उसे सुरक्षित इस देश से बाहर परिवार सहित भेज दिया जाए। मुझे उसकी शर्त से कोई आपत्ति नहीं थी इस लिए मैंने भी उसकी शर्त मान ली।"

"तो अजय सिंह का एक सच ये भी बाहर आ गया कि वह अपने इस बिजनेस की आड़ में गैर कानूनी काम भी करता है।" जगदीश ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"खैर तो तुमने इस सबके बाद सक्सेना से कैसे इस काम को अंजाम दिलवाया?"

"हे भगवान।" गौरी आश्चर्यचकित भाव के साथ कह उठी__"कितना गिरा हुआ इंसान है ये, ऐसा कोई काम नहीं बचा जो इसने किया नहीं है।"

"मेरा बस चले तो।" निधि ने बुरा सा मुॅह बनाते हुए कहा__"ऐसे ब्यक्ति को बीच चौराहे पर गोली मार दूॅ, हाॅ नहीं तो।"

"सक्सेना के बाॅकी जो छोटे मोटे कारोबार थे उन्हें मैंने आपके द्वारा खरीद लिया।" विराज कह रहा था__"और उसके एकाउन्ट में पैसा भी डलवा दिया गया। साथ ही उसको उसके परिवार सहित विदेश जाने का इंतजाम भी कर दिया गया था। अब सक्सेना के पास एक ही काम रह गया था जिसे वो मेरे कहने पर करने वाला था। कल रात उसने फैक्टरी जा कर बेसमेंट में तीन टाइम बम्ब फिट किये थे। ये काम उसने बड़ी सावधानी से तथा किसी की नज़र में आए बिना किया था। इस बात का खयाल किया गया था कि उस समय फैक्टरी में कोई न हो क्योंकि इससे बाॅकी तमाम वर्कर्स की या बहुत से बेकसूर लोगों की जान जाने का भी भीषण खतरा था। फिर सक्सेना ने बताया कि फैक्टरी में हप्ते में एक दिन का अवकाश होता है और इत्तेफाक़ से कल अवकाश ही था। तीन घंटे के टाइम के बाद बमों को फटना था। बमों के फटने से पहले ही सक्सेना अपने परिवार के साथ विदेश जाने वाली फ्लाइट पर बैठ कर निकल लिया था और इधर तीन घंटे बाद फैक्टरी के अंदर धमाका हो जाना था और खेल खतम।"

"बहुत खूब बेटे।" जगदीश के चेहरे पर प्रसंसा के भाव थे, बोला__"जब दिमाग़ से ही काम हो जाए तो हाॅथ पैर चलाने की ज़रूरत ही क्या है? वेल डन बेटे....आई एम प्राउड आफ यू।"

"वाह भइया वाह आपने तो कमाल ही कर दिया।" निधि ने खुशी में झूमते हुए कहा__"और साड़ी को फाड़ कर रुमाल कर दिया, हाॅ नहीं तो।"

"बेटा जो कुछ भी करना बहुत सोच समझ कर करना।" गौरी अंदर ही अंदर अपने बेटे के इस सराहनीय कार्य से खुश तो थी किन्तु प्रत्यक्ष में उसने यही कहा__"क्योंकि तुम जिसके साथ ये जंग कर रहे हो वो बहुत खराब आदमी है।"

"फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने सहसा ठंडे स्वर में कहा__"उस खराब आदमी के पर ही तो कुतर रहा हूॅ और एक दिन उसे अपाहिज भी कर दूॅगा। उसके लिए बहुत कुछ सोच रखा है मैंने। समय आने पर आप देखेंगी कि उसका क्या हस्र करता हूॅ मैं।"

"इस धमाके के बाद तो उसकी हालत खराब हो गई होगी बेटे।" जगदीश ने कहा__"संभव है कि इस हादसे की जाॅच ही न करवाए वो।"

"आपने बिलकुल ठीक कहा अंकल।" विराज ने कहा__"फैक्टरी में हुए इस भीषण काण्ड की जाॅच नहीं करवाएगा वो। क्योकि इससे उसे मिलेगा तो कुछ नहीं बल्कि उल्टा जाॅच से फॅस ज़रूर जाएगा। पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट वाले हर चीज़ को बारीकी से जाॅचेंगे परखेंगे। उस दौरान वो लोग फैक्टरी का चप्पा चप्पा छान मारेंगे और इस सबसे उन्हें वो सबूत भी मिलेंगे जो इस बात की चीख चीख कर गवाही देंगे कि शहर का मशहूर बिजनेस मैन ग़ैर कानूनी धंधा भी करता था। बस खेल खतम।"

"देखते हैं क्या होता है?" जगदीश ने कहने के साथ ही पहलू बदला__"वैसे अब आगे का क्या करने का विचार है?"

"अभी और कुछ नहीं करना है।" सहसा गौरी ने हस्ताक्षेप किया__"अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना कुछ, ये काम तो होता ही रहेगा।"

"गौरी बहन सही कह रही है राज।" जगदीश ने अपनेपन से कहा__"कुछ दिन में तुम्हारा काॅलेज भी शुरू हो जाएगा इस लिए अपने मन को थोड़ा शान्त भी रखो।"

"मैं भी यही सोच रहा हूॅ।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"कुछ दिन अजय सिंह को भी अपनी हालत पर काबू पा लेना चाहिए। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि हादसे पर हादसे देख कर वह हार्ट अटैक से ही मर जाए। फिर किससे मैं अपने तरीके से इंतकाम ले सकूॅगा?"

"एक के मर जाने से क्या होता है भइया?" निधि ने कहा__"सब उसके जैसे ही तो हैं, उनका भी वही हाल करना, हाॅ नहीं तो।"

निधि की बात पर सब मुस्कुरा कर रह गए।
 
अजय सिंह की हवेली में इस वक्त बड़ा ही अजीब सा माहौल था। ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर इस वक्त परिवार के लगभग सभी सदस्य बैठे हुए थे। अजय सिंह, प्रतिमा, शिवा, अभय सिंह, करुणा, दिव्या तथा अभय व करुणा का दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा शगुन। शगुन अपनी माॅ करुणा के साथ की इस वक्त शान्त बैठा था कदाचित सब कोई खामोश व गुमसुम बैठे हुए थे इस लिए उन सबको देखकर वह भी चुपचाप बैठा था वर्ना आम तौर पर वह कोई न कोई विचित्र सी हरकतें करता ही रहता था। इन लोगों के बीच परिवार के दो सदस्य अभी अनुपस्थित थे, और वो थीं अजय सिंह व प्रतिमा की दोनों बेटियाॅ। अजय की छोटी बेटी नीलम मुम्बई में है, हलाॅकि उसे फैक्टरी में लगी आग की वजह से हुए भारी नुकसान की सूचना दे दी गई थी और वह मुम्बई से निकल भी चुकी थी यहाॅ आने के लिए। जबकि अजय सिंह की बड़ी बेटी रितू सुबह पुलिस स्टेशन चली गई थी, क्योंकि आज उसे चार्ज सम्हालना था। रितू को अपने पिता के साथ हुए हादसे का दुख तो था लेकिन वो कर भी क्या सकती थी? हाॅ ये ज़रूर उसके दिमाग़ में था कि इस केस की छान बीन वो बारीकी से खुद करेगी तथा इसके साथ ही यह पता भी लगाएगी कि ये सब कैसे हुआ??

(आप सबको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ये सब लोग इस तरह गुमसुम से क्यों बैठे हुए थे। फिर भी बताना तो हर लेखक का फर्ज़ होता है कि वो हर बात को विस्तार से अपने पाठकों को बताए भी और समझाए भी।)

"क्या कुछ पता चला भैया कि फैक्टरी में किस वजह से आग लगी थी?" सहसा वहाॅ पर फैले इस सन्नाटे को अभय सिंह ने अपने कथन से चीरते हुए कहा__"आपने तो कहा था न कि पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग इसकी बारीकी से छान बीन कर रहे थे?"

"किसी को कोई सुराग़ नहीं मिला छोटे।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"सबका यही कहना है कि शार्ट सर्किट की वजह से फैक्टरी में आग लगी थी। उस दिन क्योंकि अवकाश था इस लिए फैक्टरी में काम करने वाले वर्कर्स नहीं थे। फैक्टरी के अंदर कोई नहीं था और जो वहाॅ पर गार्ड्स वगैरा थे वो सब तो बाहर ही रहते हैं इस लिए किसी को पता ही नहीं चला कि फैक्टरी के अंदर कब क्या हुआ? जब तक पता चला तब तक फैक्टरी के अंदर भरे कपड़ों के स्टाक में आग पकड़ चुकी थी। फैक्टरी का इन्ट्री गेट बाहर से लाॅक था जिसकी चाभी मैनेजर के पास थी उस रात। मैनेजर किसी काम से बाहर था, तो आनन फानन में लाॅक तोड़ने की कोशिश की गई। लाक ऐसा था कि दरवाजे के अंदर से कनेक्टेड था जिसे खोल पाना आसान न था इस लोहे के दरवाजे को फिर किसी तरह ट्रक द्वारा तोड़ना पड़ा। इस काम में समय लग गया जिस वजह से आग ने उग्र रूप धारण कर लिया। फिर फायर ब्रिगेड वालों को सूचित किया गया। जब तक दमकल की गाड़ियाॅ वहाॅ पहुॅची तब तक फैक्टरी के अंदर लगी आग बेकाबू हो चुकी थी और फिर सब कुछ खाक़ हो गया।"

(आप लोग समझ ही गए होंगे कि अजय सिंह ये सब बातें अपने से बना कर ही अभय से कही थी। भला वो और क्या बताता उन लोगों से?)

"मैं इस बात को नहीं मानती डैड।" सहसा तभी ड्राइंगरूप में इंस्पेक्टर की वर्दी पहने हुए अजय सिंह की बेटी इंस्पेक्टर रितू ने दाखिल होते हुए कहा।

पुलिस इंस्पेक्टर की वर्दी में बला की खूबसूरत लग रही थी रितू। ऐसा लगता था जैसे ये पुलिस की वर्दी जन्म जन्मांतर से बनी ही उसके लिए थी। उसे इस रूप में देखकर वहाॅ बैठे सब लोगों की आॅखें फटी की फटी रह गईं। एकटक, अपलक देखते ही रह गए थे सब लोग उसे। वर्दी की टाइट फिटिंग में उसके बदन के वो सब उभार स्पष्ट नज़र आ रहे थे जिससे उसके भरपूर जवान हो जाने का पता चल रहा था। अजय सिंह तथा शिवा की आंखें कुछ अलग ही नज़ारा कर रही थी। ये बात किसी ने महसूस की हो या न की हो किन्तु उन बाप बेटों की फितरत से बाखूबी परिचित प्रतिमा ने साफ तौर पर महसूस किया। और अभय व करुणा की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए उसने तुरंत ही उन बाप बेटों को उनकी वास्तविक स्थित में ले आने की गरज से किन्तु सावधानी से कहा__"वाह मेरी बेटी पुलिस की वर्दी में कितनी सुन्दर लग रही है, कहीं किसी की नज़र न लग जाए तुझे। चल मैं तेरे कान के नीचे नज़र का काला टीका लगा देती हूॅ।"

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है माॅम।" रितु ने हॅस कर कहा__"यहाॅ पर सब अपने ही तो बैठे हैं। भला अपनों की भी कहीं नज़र लगती है क्या?"

"क्या पता?" प्रतिमा ने एक सरसरी सी नज़र अपने पति व बेटे पर डाली फिर बोली__"लग भी सकती है।"

अजय सिंह और शिवा दोनो ही प्रतिमा की इस बात पर चौंके और सम्हल कर बैठ गए। ये देख प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराई थी।

"बहुत बहुत बॅधाई हो रितू।" करूणा ने मुस्कुराकर कहा__"आज से तुम पुलिस वाली बन गई हो।"

"धन्यवाद चाची जी।" रितू ने कहा तथा एक हाॅथ में पकड़े हुए पुलिस रुल को अपने दूसरे हाॅथ की हॅथेली पर हल्के से मारते हुए कहा__"मैं आपकी इस बात को नहीं मानती डैड कि आपकी फैक्टरी में लगी आग किसी शार्ट सर्किट की वजह से लगी है।"

"ये तुम क्या कह रही हो बेटी?" अजय सिंह मन ही मन उसकी इस बात से चौंका था किन्तु चेहरे पर उन भावों को उजागर न करते हुए प्रत्यक्ष में कहा __"अगर आग शार्ट सर्किट की वजह से नहीं लगी है तो फिर किस वजह से लगी है? जबकि पुलिस और फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग अपनी छान बीन में इसी बात की पुष्टि करके गए थे?"

"यही तो हैरानी की बात है डैड।" रितू ने चहलकदमी करते हुए कहा__"वो लोग उस बात की पुष्टि कर गए जिसका कहीं कोई वजूद ही नहीं था, जबकि उस तरफ उन लोगों ने ज़रा भी ग़ौर नहीं किया जिस तरफ किसी बात के प्रमाण मिल जाने के किसी हद तक चान्सेस थे।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" अजय सिंह इस बार लाख कोशिशों के बाद भी अपने चेहरे पर बुरी तरह चौंकने के भाव न छिपा सका। वह तो चकित भी हो गया था कि उसकी बेटी जो अब तक साधारण सी थी वो अब इस रूप में ऐसी बातें भी करने लगी थी। उसे समझ न आया कि उसकी बेटी के अंदर कौन सा जासूसी कीड़ा समा गया है?

"मेरा मतलब तो स्वीमिंगपुल में भरे पानी की तरह साफ ही है डैड।" उधर रितू अजीब से अंदाज़ में अपने ही बाप की धड़कने बढ़ाते हुए कह रही थी__"मुझे तो ऐसा लगता है जैसे फैक्टरी में छान बीन करने आए पुलिस तथा फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग छान बीन की महज औपचारिकता निभा कर चले गए हैं। वर्ना इतने भीषण काण्ड की इतनी मामूली सी वजह बता कर नहीं चले जाते बल्कि कुछ और ही पता करते।"
 
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