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एक नया संसार

"ये आपने अच्छा किया।" करुणा ने कहा__"दीदी ज़रूर इस संबंध में बड़े भइया से बात करेंगी।"

"हमसे बहुत बड़ी ग़लती हुई है करुणा।" अभय ने एकाएक अधीर होकर कहा__"आज मुझे एहसास हो रहा है कि क्यों मेरी देवी समान गौरी भाभी हम सबको छोंड़ कर इस हवेली से अलग खेतों में बने उस मकान पर रहती थी? सिर्फ इसी हरामज़ादे की वजह से करुणा। उस रात विराज आया था मुम्बई से, और सुबह उसने ही शिवा को मार मार कर अधमरा किया था। तब हमने सोचा था कि उसने बेवजह ही किसी खुंदक में शिवा को मारा था। जबकि अब मुझे सब बातों की समझ आई है कि क्यों विराज ने शिवा को मारा था?"

"क्या मतलब है आपका?" करुणा चौंकी।

"इसी नीच की वजह से करुणा।" अभय ने आवेश में कहा__"ये तो समझ ही गई हो तुम कि शिवा अपने ही घर की माॅ बहनों के बारे में ऐसी नीयत रखता है। उसने उसी नीयत से गौरी भाभी और हमारी फूल सी बच्ची निधि पर भी यही सब किया रहा होगा। इसी वजह से ये सब हुआ है।"

"लेकिन अगर ऐसी बात थी तो।" करुणा ने सोचने वाले भाव से कहा__"गौरी दीदी को इस बारे में बड़ी दीदी और बड़े भइया को बताना चाहिए था। अगर वो ये सब उनसे बताती तो वो अपने बेटे पर लगाम लगाती। लेकिन वो तो हवेली ही छोंड़ कर खेतों वाले मकान में गुड़िया के साथ रहने लगी थी। क्या सिर्फ इतनी सी बात की वजह से??"

"वजह तो हमें यही बताया था भइया भाभी ने कि गौरी भाभी ने प्रतिमा भाभी के कमरे से उनके जेवर चुराए थे।" अभय ने कहा__"और इतना ही नहीं बल्कि बड़े भइया को अपने रूप जाल में फसाने की कोशिश भी की थी। इस लिए बड़े भइया ने उन लोगों को हवेली से निकाल दिया था।"

"हाॅ तो ग़लत क्या था अभय?" करुणा ने अजीब भाव से कहा__"गौरी दीदी ने तो सच में बड़े भइया के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी। इस सबका सबूत भी दिखाया था प्रतिमा दीदी ने हम लोगों को। उन फोटोग्राफ्स में साफ साफ दिखता था कि कैसे गौरी दीदी ने बड़े भइया को उनके ही कमरे में अपनी बाहों में जकड़ा हुआ था।"

"क्या ये स्वाभाविक बात लगती है करुणा कि बड़े भइया गौरी भाभी के साथ उस स्थित में हों और दूसरा कोई उस स्थिति में उनकी फोटो खींचे?" अभय ने सोचने वाले भाव से कहा__"जबकि उस स्थिति में होना तो ये चाहिए था कि अगर गौरी भाभी ने बड़े भइया को ग़लत नीयत से जकड़ा हुआ था तो इस सबका बड़े भइया विरोध करते, और गौरी भाभी को इस सबके लिए डाॅटते। दूसरी बात उन लोगों की उस वक्त की फोटो बनाने वाला कौन था?? अगर फोटो खींचने वाली प्रतिमा भाभी थी तो उन्हें फोटो खींचने की बजाय इस सबको रोंकना था। आखिर फोटो खींचने के पीछे उनका क्या उद्देश्य था? क्या सिर्फ ये कि हम सब उन फोटोज़ को देख कर ये यकीन कर सकें कि गौरी भाभी सच में बड़े भइया के साथ ये सब करने की नीयत रखती हैं या ये सब करती भी हैं???"

"आप कहना क्या चाहते हैं अभय??" करुणा ना समझने वाले भाव से बोली।

"आज के इस हादसे से मेरे सोचने का नज़रिया बदल गया है करुणा।" अभय ने गंभीर लहजे में कहा__"हम सब जानते थे कि विजय भइया और गौरी भाभी किसी देवी देवता से कम नहीं थे। उन्होंने भूल से भी किसी के साथ कभी भी कुछ ग़लत नहीं किया था। वो पढ़ाई लिखाई में भले ही ज़ीरो थे, लेकिन जब से उन्होने खेती बाड़ी का काम सम्हाला था तब से हमारे घर के हालात हज़ार गुना बेहतर हो गए थे। यहाॅ तक कि उनकी मेहनत और लगन से किसी भी चीज़ की कभी कोई कमी न रही थी। उनकी ही मेहनत और रुपये पैसे से इतनी बड़ी हवेली बनी और उनके ही पैसों से बड़े भइया ने अपने कारोबार की बुनियाद रखी थी। माॅ बाबूजी विजय भइया और गौरी भाभी को सबसे ज्यादा मानते थे। विजय भइया और गौरी भाभी ने कभी भी मुझे किसी बात के लिए कुछ नहीं कहा, बल्कि विजय भइया ने तो उस समय के हिसाब से मुझे एक बुलेट मोटर साइकिल खरीद कर दी थी। पूरे गाॅव में किसी के पास बुलेट नहीं थी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने ही पैसों से बाबूजी के लिए एक शानदार कार खरीदी थी ताकि बाबूजी बड़े शान से उसमें सवारी करें। घर का बड़ा बेटा होने का जो फर्ज़ अजय भइया को निभाना चाहिये था वो फर्ज़ विजय भइया निभा रहे थे वो भी अपनी पूरी निष्ठा के साथ। मुझे याद है करुणा कि अजय भइया और प्रतिमा भाभी कभी भी विजय भइया और गौरी भाभी से ठीक से बात नहीं करते थे। बल्कि उनके हर काम में कोई न कोई नुक्स निकालते ही रहते थे। फिर समय गुज़रा और एक रात विजय भइया को किसी ज़हरीले सर्प ने काट लिया और वो इस दुनिया से चल बसे। उनके इस दुनिया से जाते ही हम सबकी खुशियों पर ग्रहण सा लग गया करुणा। माॅ बाबूजी को उनकी मौत से गहरा सदमा लगा था। हम सब उनके सदमे की वजह से परेशान हो गए थे। बड़े भइया और भाभी ने ही उन्हें सम्हाला था। एक दिन माॅ बाबूजी उसी कार से शहर जा रहे थे तो रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया और वो दोनो उस एक्सीडेंट की वजह से कोमा में चले गए। समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा था हम सबके साथ?"

"इन सब बातों को सोचने का क्या मतलब है अभय?" करुणा ने कहा__"जो होना था वो तो हो ही गया। इसमें कोई क्या कर सकता था भला?"

"मैं ये सब कभी नहीं भूला करुणा।" अभय ने कहा__"मैं कभी किसी से कुछ कहता नहीं मगर मेरे अंदर हमेशा ये सब गूॅजता रहता है। आज के इस हादसे ने मेरी आॅखें खोल दी है करुणा। इस हादसे ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है मुझे कि ये जो कुछ भी हुआ वो सब क्या सच था या फिर किसी झूॅठ को छुपाने के लिए उस पर इन सब बातों को गढ़ कर पर्दा डाला गया था? ये तो सच है करुणा कि माॅ बाप का खून और उनके अच्छे संस्कारों की वजह से ही कोई औलाद सही रास्तों पर चलते हुए भविश्य में अपने अच्छे काम और नाम की वजह से अपने माॅ बाप और कुल का नाम रोशन करते हैं। शिवा को देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है कि उसकी परवरिश और उसके खून में कितनी गंदगी है। दुनियाॅ में बहुत से ऐसे माॅ बाप हैं जिनके एक ही बेटा होता है मगर वो अपने एक ही बेटों को क्या ऐसे संस्कार देते हैं जिसकी वजह से वो अपने ही घर की माॅ बहनो पर बुरी नीयत रखे?? नहीं करुणा नहीं....कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसे माॅ बाप और ऐसे बेटे नहीं हैं। ज़रूर इनमें ही कहीं न कहीं कोई ख़राबी है। मैने फैंसला कर लिया है कि मैं खुद सारी सच्चाई का पता लगाऊॅगा।"

"सच्चाई???" करुणा चौंकी__"कैसी सच्चाई अभय?"
 
"वहीं सच्चाई करुणा।" अभय ने मजबूत लहजे में कहा__"जो हमसे छुपाई गई और उसके बदले कुछ और ही हमें दिखाया गया। उस समय मैंने इस सबका पता करने की कोशिश इस लिए नहीं की थी क्यों जो कुछ मुझे सबूत के साथ दिखाया गया था उससे मैं अत्यधिक क्रोध और गुस्से में था। उस सूरत में मैं उन लोगों की शकल तक नहीं देखना चाहता था। मगर अब नहीं, अब मैं पता लगाऊॅगा इस सबका। मैं मुम्बई जाऊगा करुणा...और गौरी भाभी तथा उनके दोनो बच्चों को ढूढूॅगा। उनसे ही सच्चाई का पता चलेगा। मैने अपने गुस्से और नाराज़गी की वजह से इतने साल बर्बाद कर दिये। कभी सोचा तक नहीं कि एक बार गौरी भाभी से भी पूछ लेना चाहिए कि उन पर जो आरोप लगाया गया था वो सच भी था या झूॅठ? काश! मैंने ये सब उनसे पूछा होता। अरे कानून भी हर मुजरिम को अपनी सफाई में कुछ कहने का अवसर देता है, जबकि मैंने तो पूॅछा तक नहीं था। मान लो कि अगर गौरी भाभी पर लगाए गए सारे आरोप सिरे से ही ग़लत हों तो सोचो क्या होगा करुणा? मैं अपनी ही नज़रों में गिर जाऊॅगा। कितना बड़ा पापी कहलाऊॅगा कि अपनी देवी समान भाभी पर लगे झूॅठे आरोपों को सच मान कर उनके बारे में क्या क्या सोच लिया था मैंने?? मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी करुणा....मैं तो शर्म से ही मर जाऊॅगा।"

"खुद को सम्हालिए अभय।" करुणा की आॅखें छलक पड़ी थी__"यकीनन हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। मगर अब जो हो गया उसे लौटाया भी तो नहीं जा सकता न? ईश्वर जानता है कि इस सबके बाद भी हमने कभी उनका बुरा नहीं चाहा है। हमें जो कुछ बताया गया था उससे हमें दुख ज़रूर पहुॅचा मगर इसके बावजूद हमने कभी उनके बारे में बुरा नहीं चाहा। आज आपने अगर इस सबका पता लगाने का फैसला कर ही लिया है तो ये अच्छी बात है अभय। सच्चाई का पता तो चलना ही चाहिए।"

"तुम चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कहा__"मैंने अब इस बात को जानने का फैसला कर लिया है कि इस सबके पीछे की सच्चाई क्या है। मैं कल ही स्कूल में लम्बी छुट्टी की अर्ज़ी दे दूॅगा। अब मेरे पास सिर्फ यही काम रहेगा..किसी भी हाल में सच्चाई का पता लगाना।"

"आप हर सच्चाई का ज़रूर पता लगाइये अभय।" करुणा ने कहा__"लेकिन इस बात का भी ध्यान दीजिए कि वो लोग भी शान्त नहीं बैठेंगे जिन्होंने गौरी दीदी पर ये सब आरोप लगाये थे। संभव है कि अपनी पोल खुल जाने के डर से वो कोई भी कठोर कदम उठा लें। इस लिए उन लोगों से सतर्क और सावधान रहिएगा।"

"चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"मुझे पता है कि अपने रास्ते पर आने वाली रुकावट से कैसे निपटना है।"

"फिर भी सावधान रहिएगा।" करुणा ने कहा__"क्योंकि इस सबसे ये तो समझ आ ही गया है कि वो लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं।"

"कुछ भी करने वालों को मैं देख लूॅगा करुणा।" अभय ने कहा__"मेरे मुम्बई जाने के बाद तुम यहाॅ सबकी देख भाल अच्छे से करना। दिव्या तब तक स्कूल नहीं जाएगी जब तक मैं मुम्बई से लौट नहीं आता।"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ही मुम्बई चलें?" करुणा ने कहा__"कौन जाने आपके जाने के बाद यहाॅ कैसे हालात बन जाएॅ? उस स्थिति में मैं अकेली औरत भला किसी का कैसे मुकाबला करूॅगी??"

"मैं तुम सबको मुम्बई नहीं ले जा सकता क्योंकि मुम्बई में तुम लोगों को लिए मैं कहाॅ कहाॅ भटकूॅगा? अंजान शहर में अपना कहीं कोई ठिकाना भी तो होना चाहिए।" अभय ने कहा__"इस लिए तुम ऐसा करो कि कुछ दिन के लिए दिव्या और शगुन को लेकर अपने मायके चली जाओ। वहाॅ तुम सब सुरक्षित रहोगे, और मैं भी तुम लोगों के लिए निश्चिंत रहूॅगा।"

"हाॅ ये ठीक रहेगा।" करुणा ने कहा__"आप मेरे भाई को फोन कर दीजिए वो आ जाएगा और हम लोगों को अपने साथ ले जाएगा।"

"ठीक है।" अभय ने कहा__"मैं बात करता हूॅ तुम्हारे भाई से, तब तक तुम ज़रा चाय तो बना कर पिला दो मुझे।"

"जी अभी लाई।" करुणा ने बेड से उठते हुए कहा।

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जैसा कि अभय ने निर्णय ले लिया था इस लिए उसने ससुराल में अपने साले युवराज सिंह को फोन कर दिया था और उसे जल्द से जल्द यहाॅ से करुणा के साथ दिव्या तथा शगुन को ले जाने के लिए कह दिया था। अभय के साले युवराज ने अचानक इस तरह यहाॅ आने और फिर अपने साथ उसकी बहन व भांजा भांजी को घर ले जाने का कारण पूॅछा तो अभय ने कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि वह कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा है।

अभय ने करुणा तथा दिव्या से भी कह दिया था कि इस बात की चर्चा वो लोग अपने मायके तथा ननिहाल में किसी से नहीं करेंगी। अभय की ससुराल हल्दीपुर से ज्यादा दूर नहीं थी। बल्कि एक घंटे की दूरी पर थी। इस लिए उसके साले को आने में ज़्यादा देर नहीं हुई।

करुणा ने अपने पति अभय के लिए शाम का खाना बना कर रख दिया था जिसे वह गरम करके शाम को खा लेगा और खुद भारी मन से अपने बच्चों को लेकर अपने भाई के साथ अपने मायके मणिपुर चली गई थी। अभय ने उसे बता दिया था कि वह अगले दिन सुबह ही यहाॅ से मुम्बई के लिए निकलेगा। अभय ने अपनी पत्नी और बच्चों को अपने साले के साथ बेहद ही गुप्त रूप से भेजा था। किसी को भनक तक न लगने दी थी कि उसकी पत्नी और बच्चे किसके साथ कब कहाॅ गए हैं?

करुणा ने अभय से कहा था कि वह आज रात यहाॅ हवेली में न रहे बल्कि अपने किसी दोस्त या मित्र के यहाॅ रात रुक जाए और सुबह वहीं से मुम्बई के लिए रवाना हो जाएं। करुणा ये सब किसी अंजानी आशंका की वजह से कह रही थी जबकि उसकी इस सलाह पर अभय ने आवेश में कहा था__"मैं किसी से बाल बराबर भी नहीं डरता करुणा। मैंने किसी के साथ कोई ग़लत काम नहीं किया है, इस लिए किसी से डरने का सवाल ही नहीं है। रही बात बड़े भइया की तो उन्हें भी देख लूॅगा। मैं भी तो देखूॅ कि कितने बड़े तीसमारखाॅ हैं वो???" करुणा अभय की इस बात पर कुछ न बोल सकी थी।

उधर प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह को फोन करके आज हुई इस घटना के बारे में सब कुछ बता दिया था। जिसे सुन कर अजय सिंह के पैरों तले से ज़मीन निकल गई थी। उसे अपने बेटे पर बेहद गुस्सा आ रहा था। उसी की वजह से ये सब हुआ था वर्ना अभय ये सब कभी न सोचता कि उससे क्या कुछ छुपाया गया था??

अजय सिंह अपने बेटे के इस कार्य पर गुस्सा तो बहुत हुआ था किन्तु वह ये भी जानता था कि अब गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं है। यानी जो होना था वो तो हो ही चुका था। अब तो उसे ये करना था कि इससे आगे कोई बात बढ़े ही न और ना ही उस पर कोई बात आए।

अजय सिंह अपनी फैक्टरी को फिर से चालू करने की कोशिशों में लगा हुआ था इस लिए वह ज्यादातर हवेली से बाहर ही रहता था। किन्तु आज हुई इस घटना की जानकारी जब उसकी पत्नी द्वारा फोन के माध्यम से उसे मिली तो वह शहर से हवेली आने के लिए कह दिया था प्रतिमा से। उसने ये भी हिदायत दी थी कि आज की घटना के बारे में उसकी बेटी रितू को पता न चले। जबकि अपने बेटे शिवा को कुछ दिन के लिए शहर में बने मकान पर रहने के लिए कह दिया था। ऐसा इस लिए था क्योंकि शिवा की बुरी हालत देखकर कोई भी ढेरों सवाल पूॅछने लगता। जबकि रितू तो अब पुलिस वाली थी, हर बात पर शक करना उसका पेशा था। दूसरी बात वह अपने भाई की आवारा गर्दी करने वाली इस असलियत से अंजान भी नहीं थी। इस लिए वह कई तरह के सवाल पूछने लगती सबसे। अजय सिंह ने प्रतिमा से ये भी कह दिया था कि वह हवेली में रहने वाले नौकर व नौकरानियों को भी इस बात की ठोस शब्दों में हिदायत दे दे कि वो लोग आज हुई इस घटना के बारे में एक लफ्ज़ भी रितू से न कहें या उनके द्वारा किसी तरह रितू के कानों तक ये बात न पहुॅचे।

अजय सिंह शाम को हवेली पहुॅचा था। हवेली में शमशान की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। ऐसा लगता था जैसे इतनी बड़ी हवेली में किसी जीव का कहीं कोई वजूद ही न हो। अजय सिंह समझ सकता था कि हवेली में ये सन्नाटा क्यों फैला हुआ है। उसकी बेटी रितू किसी केस के सिलसिले में बाहर ही थी, यानी अभी तक वह हवेली नहीं लौटी थी पुलिस थाने से। जबकि शिवा अजय सिंह के पालतू कुछ आदमियों के साथ शहर वाले मकान में कुछ दिन रहने के लिए चला गया था।

अजय सिंह खामोशी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कमरे में पहुॅचते ही अजय सिंह ने देखा कि उसकी बीवी प्रतिमा बेड पर पड़ी है। बेड पर पड़ी प्रतिमा एकटक व निरंतर कमरे की छत पर झूल रहे पंखे को घूरे जा रही थी। बल्कि अगर ये कहें तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि वह पंखे को भी नहीं घूर रही थी वह तो बस शून्य में ही देखे जा रही थी। उसका मन कहीं और ही भटका हुआ नज़र आ रहा था। कदाचित् यही वजह थी कि उसे कमरे में अजय सिंह के दाखिल होने का ज़रा भी एहसास न हुआ था।

अजय सिंह ने गौर से अपनी बीवी की तरफ देखा फिर उसने अपने जिस्म पर मौजूद कोट को उतार कर उसे दीवार पर लगे एक हैंगर पर लटका दिया। इसके बाद वह बेड की तरफ बढ़ा। प्रतिमा अभी भी कहीं खोई हुई शून्य में घूरे जा रही थी।

"ऐसे किन ख़यालों में गुम हो प्रतिमा?" अजय सिंह ने उसे देखते हुए कहा__"जिसकी वजह से तुम्हें ये भी एहसास नहीं हो रहा कि मैं कब से इस कमरे में आया हुआ हूॅ?"

"सब कुछ खत्म हो गया अजय।" प्रतिमा उसी मुद्रा में तथा अजीब से भाव के साथ बिना अजय की तरफ देखे ही बोली__"सब कुछ खत्म हो गया। कुछ भी शेष नहीं बचा। हमने गुज़रे हुए कल में जो कुछ भी अपने हित के लिए किया था वो सब अब बेपर्दा हो चुका है। कैसी अजीब सी स्थित हो गई है हमारी। मैं और तुम ज़िंदा तो हैं मगर ऐसा लगता है जैसे हमारी एक एक साॅस हमारे मरे हुए होने की गवाही दे रही है। हम ऐसे जी रहे हैं अजय जैसे हर साॅस हमने किसी से उधार ली हुई है। आज आलम ये है कि हम अपने ही बच्चों के बीच डर डर कर जीवन का एक एक पल गुज़ार रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं अजय कि हमने जो कुछ भी अपने सुख सुविधा के लिए अपनों के साथ किया है उसी का प्रतिफल आज हमें इस रूप में मिल रहा है?"

"ये तुम क्या कह रही हो प्रतिमा?" अजय सिंह पहले तो चौंका था फिर अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखते हुए कहा__"यकीन नहीं होता यार। अरे इतनी सी बात पर तुम इतना हताश व विचलित हो गई??? नहीं डियर, तुम इतनी निराशावादी बातें नहीं कर सकती। तुमने तो गुज़रे हुए कल में मेरे कहने पर ऐसे ऐसे कठिन व हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया है जिसे करने के लिए कोई साधारण औरत सोच भी न सके।"

"मैं भी तो एक इंसान हूॅ, एक औरत ही हूॅ अजय।" प्रतिमा ने बेड से उठ कर तथा गंभीर होकर कहा__"भले ही गुज़रे हुए कल में मैंने तुम्हारे कहने पर या हमारे हित के लिए हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया हो मगर मुझे इस बात का भी एहसास है कि वह सब जो मैने किया था वो निहायत ही ग़लत था। ये एक सच्चाई है अजय कि इंसान जो कुछ भी कर्म करता है उसके बारे में वो इंसान भी भली भाॅति जान रहा होता है कि वह किस प्रकार का कर्म कर रहा है? इंसान जान रहा होता है कि वह ग़लत कर्म कर रहा है इसके बावजूद वह रुकता नहीं है बल्कि ग़लत कर्म को करता ही चला जाता है। कदाचित् इस लिए कि उसमें ही उसका हित होता है। जब इंसान सिर्फ अपने ही हित के लिए ज़ोर देता है तब वह ये नहीं देखता कि अपने हित में उसने किस किस की खुशियों की या किस किस के जीवन की बलि चढ़ा दी है?"

"ये आज तुम्हें क्या हो गया है प्रतिमा?" अजय सिंह हैरान परेशान होकर बोला__"कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम?"

"सच्चाई किसी भी तरह की हो अजय उसे सुन कर ऐसा ही लगता है सबको।" प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"क्या ये सच नहीं है कि हमने सिर्फ अपने स्वार्थ व हित के लिए अपने ही रिश्तों के साथ अहित किया है? ये बात तुम भी भली भाॅति जानते और समझते हो अजय। हाॅ ये अलग बात है कि तुम इस सब को स्वीकार न करो।"

"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है प्रतिमा।" अजय ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा__"और मत भूलो इसके पहले तुमने भी इन सब बातों के बारे में नहीं सोचा था। आज ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से तुम किसी के साथ सही ग़लत और हित अहित की बातें करने लगी? "

"आज हालात बदल गए हैं अजय।" प्रतिमा ने कहा__"पहले हम दूसरों के साथ अहित कर रहे थे इस लिए कुछ भी नहीं सोच रहे थे। मगर आज जब हमारे साथ अहित होने लगा है तब हमें इन सबका एहसास होना स्वाभाविक ही है। ये इंसानी फितरत है अजय, जब तक कोई बात खुद पर नहीं आती तब तक हमें किसी बात का एहसास ही नहीं होता।"

"ये सब बेकार की बातें हैं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"आज की घटना से तुम ज़रा विचलित हो गई हो। जबकि इस सबसे इतना परेशान या दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

"तुम्हें आज के समय की वस्तुस्थित का एहसास ही नहीं है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर होता तो समझते कि हालात किस कदर बिगड़ गए हैं। ज़रा सोचो अजय...जो अभय आज तक हमारी ही कही बातों पर आॅख बंद करके यकीन करता आया था वही आज हमारी हर बात पर शक करने लगा है। इतना ही नहीं उसने तो हर सच्चाई का पता लगाने के लिए कदम भी उठाने की बात कर रहा था। अगर उसने ऐसा किया और इस सबसे उसे सारी सच्चाई का पता चल गया तो सोचो क्या होगा अजय?"

"कुछ नहीं होगा प्रतिमा।" अजय ने बड़ी सहजता से कहा__"तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो। तुम्हें मैंने बताया नहीं है...हमारी सारी ज़मीन और ज़ायदाद अब सिर्फ हमारे ही बच्चों के नाम पर हैं। ये हवेली भी मैंने तुम्हारे नाम पर करवा दी है। मैं जब चाहूॅ तब अभय को इस हवेली और सारी ज़मीनों से बेदखल कर सकता हूॅ। यूॅ समझो कि वो सिर्फ मेरे रहमो करम पर इस हवेली पर है। मुम्बई में किसी होटल या ढाबे पर अपनी माॅ बहन के साथ कप प्लेट धोने वाले उस हरामज़ादे विराज का तो पत्ता ही साफ है। इस लिए कानूनन कोई कुछ भी नहीं कर सकता मेरा। अभय को अगर सच्चाई का पता चल भी गया तो क्या कर लेगा हमारा??"

प्रतिमा अवाक् सी देखती रह गई अजय की तरफ। उसे कुछ कहने के लिए तुरंत कुछ सूझा ही नहीं। जबकि.....

"मैने कहा था न कि तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए प्रतिमा के खूबसूरत चेहरे को सहला कर कहा__"तुमने तो खुद मेरे साथ कानून की एल एल बी की है। इस लिए जानती हो कि कानूनन कोई कुछ नहीं कर सकता। मैंने सारी ज़मीनें हमारे बच्चों के नाम कर दी हैं। और अगर कोई बात होगी भी तो इनमें से किसी के पास इतनी क्षमता ही नहीं है कि ये लोग ज़मीन ज़ायदाद को पाने के लिए मेरे साथ कोई मुकदमा वगैरह कर सकें। और अगर इन लोगों ने मुकदमा चलाने की कोशिश भी की तो सारी ज़िन्दगी इनसे कोर्ट कचहरी का चक्कर लगवाऊॅगा। इतने में ही इन सबका मूत निकल जाएगा।"

"वो सब तो ठीक है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर पहली बार राहत के भाव उभरे थे, किन्तु फिर तुरंत ही असहज होकर बोली__"लेकिन हम अपनी बेटियों को इस सबके लिए कैसे कन्विंस करेंगे? नीलम का तो भरोसा है कि वो हमसे कोई सवाल जवाब नहीं करेगी, लेकिन रितू का कुछ कह नहीं सकते। वो शुरू से ही तेज़ तर्रार रही हैं और न्यायप्रिय भी। अब तो वह पुलिस वाली भी बन गई है इस लिए इस सबका पता चलते ही वह कहीं हम पर ही न कोई केस ठोंक दे।"

"हद करती हो यार।" अजय सिंह ठहाका लगा कर हॅसते हुए बोला__"अपनी ही बेटी से इतना डरने लगी हो तुम।"

"ज्यादा शेखी न बघारो तुम।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"आज भले ही इतना हॅस रहे हो तुम, मगर थोड़े दिन पहले तुम्हारी भी जान हलक में अटकी पड़ी थी जब रितू ने फैक्टरी वाला केस रिओपेन किया था।"

"यार सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"यकीनन उस समय मेरी हालत की वाट लगी हुई थी। कितनी अजीब बात थी कि मेरी ही बेटी मेरी ही*****मारने पर तुली हुई थी। भला उस बेचारी को क्या पता था कि उसके द्वारा इस प्रकार से मेरी*****मारने से मुझे कितनी तक़लीफ हो रही थी।"

"अब आए न लाइन पर।" प्रतिमा खिलखिला कर हॅसते हुए बोली__"बड़ा उड़ने लगे थे अभी तो।"

"यार मेरा तो के एल पी डी भी हो गया।" अजय सिंह ने उदास भाव से कहा__"मेरे बेटे ने ही सारा काम खराब कर दिया वर्ना करुणा की आगे पीछे से लेने का चान्स बन ही जाना था। अब तो ये असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर हो गया है।"

"असंभव क्यों नहीं??" प्रतिमा चौंकी।

"असंभव इस लिए नहीं क्यों कि मैं चाहूॅ तो अभी भी उसको आगे पीछे से ठोंक सकता हूॅ।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन ये सब अब प्यार या उसकी रज़ामंदी से नहीं हो सकेगा बल्कि इसके लिए मुझे बल का प्रयोग करना पड़ेगा।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा हैरान।

"साली को उठवा लूॅगा किसी दिन।" अजय सिंह सहसा कठोर भाव से बोला__"और शहर में अपने नये वाले फार्महाउस पर रखूॅगा उसे। वहीं रात दिन उसकी आगे पीछे से लूॅगा। इतना ही नहीं अपने आदमियों को भी मज़ा करने का कह दूॅगा। मेरे आदमी उसकी आगे पीछे से बजा बजा कर उसकी***** का ****** बना देंगे।"

"ऐसा सोचना भी मत।" प्रतिमा ने आॅखें फैलाकर कहा__"वर्ना अभय तुम्हें कच्चा चबा जाएगा।"

"अभय की माॅ की ***** साले की।" अजय ने कहा__"उसने अगर ज्यादा उछल कूद करने की कोशिश की तो उसका भी वही अंजाम होगा जो विजय का हुआ था, लेकिन ज़रा अलग तरीके से।"

"उसकी छोंड़ो अजय।" प्रतिमा ने सहसा पहलू बदलते हुए कहा__"हमारी बेटी रितू के बारे में सोचो। उसे इस झमेले के लिए कैसे मनाएंगे?"

"उसकी भी फिक्र मत करो डियर।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा__"तुम तो जानती हो कि मुझे अपने रास्तों पर किसी तरह के काॅटें पसंद नहीं हैं। हम दोनो उसे इस सबके लिए पहले प्यार से समझाएंगे, अगर उसे हमारी बातें समझ आ गईं तो ठीक है वर्ना मजबूरन उसके साथ भी हमें बल का प्रयोग करना ही पड़ेगा।"
 
"न नहीं अजय नहीं।" प्रतिमा ने सहसा घबरा कर कहा__"तुम उसके लिए ऐसा कैसे कह सकते हो? वह हमारी अपनी बेटी है। हर ब्यक्ति की अपनी एक फितरत होती है, रितू की फितरत हम जैसी नहीं है तो इसमें उसकी क्या ग़लती है? इंसान का स्वभाव जन्म से ही बनने लगता है, और फिर हर इंसान का अपना एक प्रारब्ध भी तो होता है। सब एक जैसी सोच विचार के नहीं हो सकते अजय, ये प्रकृति के नियमों के खिलाफ है।"

"मुझे पता है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"मैं जानता हूॅ कि हमारी बेटी उनमें से है जिनकी रॅगों में सच्चाई और ईमानदारी का खून दौड़ता है। लेकिन हमारे साथ मामला ज़रा जुदा है, यानी हमारी बेटी का ये सच्चाई और ईमानदारी वाला खून भविस्य में हमारे लिए बड़ी मुसीबत भी खड़ी कर सकता है।"

"ऐसा कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा ने मजबूती से कहा__"मैं अपनी बेटी को अपने तरीके से समझाऊॅगी। वो ज़रूर मेरी बात को समझेगी और मानेगी भी।"

"अच्छी बात है।" अजय ने कहा__"तुम उसे अपने तरीके से ज़रूर समझा देना। क्योंकि तुम्हारे बाद अगर मुझे समझाना पड़ा उसे तो हो सकता है मेरा समझाना तुम्हें पसंद न आए।"

"मैं ज़रूर समझाऊॅगी अजय।" प्रतिमा के जिस्म में ठण्डी सी सिहरन दौड़ती चली गई थी, फिर बोली__"लेकिन अब अभय के बारे में भी तो सोचो। उसने साफ शब्दों में कहा है कि वह इस सच्चाई का पता लगाएगा कि गौरी और उसके बच्चों के साथ वास्तव में हुआ क्या था? इस लिए वह इस सबका पता लगाने के लिए मुम्बई में विराज तथा विराज की माॅ बहन के पास जाने का बोल रहा था। अगर उसे सारी बातों का पता चल गया तो क्या होगा अजय??"

"उसे जाने दो मेरी जान।" अजय ने अजीब से लहजे में कहा__"उसे सारी सच्चाई का पता लग भी जाएगा तो अब कोई कुछ भी नहीं कर सकेगा। जिस चीज़ के लिए हमने ये सब किया था वो तो हमें हासिल हो ही चुका है। इस लिए जाने दो जिसे जहाॅ जाना हो। विराज के साथ साथ उसकी माॅ बहन को तो मेरे आदमी भी ढूॅढ़ रहे हैं। अच्छा है कि अभय भी उन्हें तलाश करेगा वहाॅ मुम्बई में। साला इतनी बड़ी मुम्बई में कहाॅ ढूॅढेगा उन कप प्लेट धोने वालों को?"

"इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।" प्रतिमा ने कहा__"संभव है किसी संयोग के चलते अभय उन लोगों को ढूॅढ़ ही ले।"

"अगर ऐसा है तो मैं अपने कुछ आदमियों को अभय के पीछे लगा देता हूॅ।" अजय ने कुछ सोचते हुए कहा__"यदि अभय उन लोगों को ढूॅढने में कामयाब हो जाएगा तो मेरे आदमी तुरंत ही इस बात की मुझे सूचना दे देंगे।"

"हाॅ ये बिलकुल ठीक रहेगा अजय।" प्रतिमा ने खुश होकर कहा__"उस सूरत में तुम अपने आदमियों को आदेश दे देना कि वो इन सबको किसी भी तरह यहाॅ हमारे पास ले आएं। उसके बाद हम अपने तरीके से उन सबका कल्याण करेंगे।"

"ऐसा ही होगा मेरी जान।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"सब कुछ हमारे हिसाब से ही होगा और अभय के यहाॅ से जाते ही मैं उसकी खूबसूरत बीवी करुणा को भी अपने आदमियों के द्वारा उठवा लूॅगा।"

"ऐसा करना हमारे लिए कहीं खतरे का सबब न बन जाए अजय।" प्रतिमा ने अजय को अजीब भाव से देखते हुए कहा__"मुझे लगता है कि इस काम में तुम्हें अभी इतनी जल्दी इतना बड़ा क़दम नहीं उठाना चाहिए।"

"एक दिन तो ये होना ही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"और वैसे भी आज जिस तरह के हालात बन गए हैं उससे सारी बातें सबके सामने आ ही जाएॅगी। इस लिए जब सारी बातों को खुल ही जाना है तो इस काम में मैं देरी क्यों करूॅ? मुझे हर हाल में अपनी ख्वाहिशों को परवान चढ़ाना है डियर। मेरी शुरू से ही ये ख्वाहिश थी कि मैं गौरी तथा करुणा को अपने इसी बेड पर अपने नीचे लिटाऊॅ और उन दोनो के खूबसूरत किन्तु गदराए हुए मादक जिस्म का भोग करूॅ।"

"ख्वाहिश तो तुम्हारी अपनी बेटियों को भी अपने नीचे लिटाने की है अजय।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा__"तो क्या अपनी बेटियों के साथ भी अपने छोटे भाईयों की बीवियों की तरह जबरदस्ती करोगे?"

"अगर ज़रूरत पड़ी तो ऐसा भी करुॅगा मेरी जान।" अजय ने स्पष्ट भाव से कहा__"लेकिन हमारी बेटियों को मेरे नीचे लाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम अगर इस काम में सफल हो जाती हो तो अच्छी बात है वर्ना घी निकालने के लिए मुझे अपनी उॅगली को टेंढ़ा करना ही पड़ेगा।"

प्रतिमा हैरान परेशान सी देखती रह गई अपने पति को। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसका पति किस तरह का इंसान है??????

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उधर मुम्बई में।

विराज अपने वादे के अनुसार रविवार यानी स्कूल की छुट्टी के दिन निधि को बड़े से शिप में समुंदर घुमाने ले आया था। निधि बेहद खुश थी इस सबसे। पता नहीं क्या क्या उसके दिमाग़ में चलता रहता था। कदाचित् फिल्में देखने का असर ज्यादा हो गया था उस पर।

पिछली सारी रात वह विराज के कमरे में रही थी। सारी रात उसने तरह तरह की योजनाएं बना बना कर विराज को बताती रही थी कि कल समुंदर में किस किस तरह से हम मस्ती करेंगे। उसकी ऊल जुलूल बातों से विराज बुरी तरह परेशान हो गया था। किन्तु वह उसे कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि निधि उसकी जान थी। उसकी खुशी के लिए वह कुछ भी कर सकता था। विराज ने उसकी सभी बातों पर अमल करने का उसे वचन दिया और फिर प्यार से उसे अपने सीने से छुपका कर कहा था__"गुड़िया अब हम लोग सो जाते हैं, कल सुबह हमें जल्दी निकलना भी है न।" विराज की इस बात से और उसको इस तरह सीने से छुपका लेने से निधि खुश हो गई और खुशी खुशी ही नींद की आगोश में चली गई थी।

सुबह हुई तो दोनो ने नास्ता पानी किया और कुछ ज़रूरी चीज़ें लेकर घर से निकल पड़े। गौरी के द्वारा उन्हें शख्त हिदायतें भी दी गई थी कि वहाॅ पर सावधानी से ही काम लेना और शाम होने से पहले पहले घर वापिस आ जाना। विराज निधि को लेकर कार से निकल गया था।

जगदीश ओबराय की अच्छी जान पहचान थी जिसकी वजह से विराज को किसी बात की कोई परेशानी नहीं हुई थी। कहने का मतलब ये कि विराज ने एक बेहतरीन सुख सुविधा सम्पन्न शिप को शाम तक के लिए बुक करवा लिया था।

शिप मे दो चालक और एक गाइड करने वाला था बाॅकी पूरा शिप खाली ही था। इस खूबसूरत शिप में चढ़ कर निधि खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसका बस चलता तो वह मारे खुशी के आसमान में उड़ने लगती। वह विराज से चिपकी हुई थी। फिर वह उससे अलग होकर शिप के किनारे पर आ गई तथा यहीं से हर तरफ का नज़ारा करने लगी थी। विराज उसे इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। उसे आज पहली बार यहाॅ खुले आसमान के नीचे समुंदर में इस तरह अपनी बहन के साथ आकर खुशी हुई थी। वह अपनी बहन को ही देख रहा था, जो कभी कहीं देखती तो कभी कहीं और देखने लगती। उसके लिए ये सब नया था, हलाॅकि फिल्मों में उसने जाने कितनी दफा एक से बढ़कर एक सीन्स देखे थे। किन्तु यह नज़ारा उसके जीवन का पहला और वास्तविक था। विराज अपनी गुड़िया को इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। फिर एकाएक ही जाने क्या सोच कर उसकी आॅखों में आॅसू आ गए। कदाचित् ये सोच कर कि इसके पहले उन लोगों ने ऐसी किसी खुशी को पाने की कल्पना भी न की थी। उसके अपनों ने किस तरह उसे और उसकी माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल कर दिया था। कुछ दर्द ऐसे भी थे जो अक्सर तन्हाई में उसे रुलाते थे।

अभी वह ये सब सोच कर आॅसू बहा ही रहा था कि निधि उसके सामने आ गई। उसने निधि को देखकर जल्दी से मुह फेर लिया ताकि वह उसकी आॅखों में आॅसू न देख सके।

"आप क्या समझते हैं मुझे कुछ पता नहीं चलता??" निधि ने भर्राए गले से कहा__"अगर आप ऐसा समझते हैं तो ग़लत समझते हैं आप। संसार की ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे देख कर मैं अपने होश खो दूॅ और मुझे ये भी न पता चल सके कि जो मेरी जान है उसे किस पल किस दर्द ने आकर रुला दिया है। आप कहीं भी रहें लेकिन मैं ये महसूस कर लेती हूॅ कि आप किस लम्हें में किस दर्द से गुज़रे हैं।"

"ये सब क्या बोल रही है पगली?" विराज ने खुद को सम्हालते हुए तथा हॅसते हुए कहा__"चल छोंड़ ये सब और आ हम दोनों एंज्वाय करते हैं।"

"आप बातों को टालिये मत।" निधि ने विराज के चेहरे की तरफ एकटक देखते हुए कहा__"मुझे वचन दीजिए कि आज के बाद आप कभी भी अपनी आॅखों में आॅसू नहीं लाएॅगे।"

"जिन चीज़ों पर किसी इंसान का कोई बस ही न हो उन चीज़ों के लिए कैसे भला कोई वचन दे सकता है गुड़िया?" विराज ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"हाॅ इतना ज़रूर कह सकता हूॅ कि आइंदा ऐसा न हो ऐसी कोशिश करूॅगा।"

निधि एक झटके से विराज से लिपट गई, उसकी आॅखों में आॅसू थे, बोली__"क्यों उन सब चीज़ों के बारे में इतना सोचते हैं आप जिनके बारे में सोचने से हमें सिर्फ दुख और आॅसू मिलते हैं? मत सोचा कीजिए न वो सब...आप नहीं जानते कि आपको इस तरह दुख में आॅसू बहाते देख कर मुझ पर और माॅ पर क्या गुज़रती है? सबसे ज्यादा मुझे तक़लीफ होती है...आप उसे भूल जाइए न भाईया...क्यों उसे इतना याद करते हैं जिसे आपकी पाक मोहब्बत की कोई क़दर ही न थी कभी।"

विराज के दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा। ये क्या कह गई थी उसकी गुड़िया?? उसे ऐसा लगा जैसे उसके पास में ही कोई बम्ब बड़े ज़ोर से फटा हो और फिर सब कुछ खत्म व शान्त। कानों में सिर्फ साॅय साॅय की ध्वनि गूॅजती महसूस हो रही थी। विराग किसी बुत की तरह खड़ा रह गया था। उसकी पथराई सी आॅखें निधि के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे को आॅसुओं ने धो डाला था। फिर सहसा जैसे उसे होश आया। उसने निधि के मासूम से चेहरे को अपनी दोनों हॅथेलियों के बीच लिया और झुक कर उसके माॅथे पर एक चुबन लिया। इसके बाद वह पलटा और शिप के अंदर की तरफ चला गया। जबकि निधि वहीं पर खड़ी रह गई।

जब काफी देर हो जाने पर भी विराज अंदर से न आया तो निधि के चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करने लगे। उसे अपने भाई के लिए चिन्ता होने लगी और उसका दिलो दिमाग बेचैन हो उठा। वह तुरंत ही अंदर की तरफ बढ़ गई। समुंदर में उठती हुई लहरों के बीच तैरता हुआ शिप बढ़ता ही जा रहा था। निधि जब अंदर पहुॅची तो शिप में मौजूद गाइड करने वाला आदमी बाहर की ही तरफ आता दिखाई दिया। निधि ने उससे विराज के बारे में पूछा तो उसने हाथ के इशारे से एक तरफ संकेत किया और बाहर निकल गया। जबकि निधि उसकी बताई हुई दिशा की तरफ बढ़ गई। एक कमरे में दाखिल होते ही उसकी नज़र जैसे ही अपने भाई पर पड़ी तो उसे झटका सा लगा। उसके पाॅव वहीं पर ठिठक गए। उसकी आॅखों से बड़े तेज़ प्रवाह से आॅसू बहने लगे। उसका दिल बुरी तरह हाहाकार कर उठा था।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....

आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,
 
कमरे के दरवाजे पर अपनी आॅखों से डबडबाते आॅसू के साथ खड़ी निधि अपने भाई विराज को देखे जा रही थी जो अपने दाहिने हाॅथ में मॅहगी शराब की बोतल को मुॅह से लगाए गटागट पिये जा रहा था। देखते ही देखते सारी बोतल खाली हो गई। विराज ने खाली बोतल को बार काउंटर पर पटका और फिर से एक बोतल उठा ली उसने।

निधि को जैसे होश आया, वह बिजली की सी तेज़ी से कमरे के अंदर विराज के पास पहुॅची और हाॅथ बढ़ा कर एक झटके से विराज के हाॅथ से बोतल खींच ली।

"ये क्या पागलपन है भइया?" निधि ने रोते हुए किन्तु चीख कर कहा__"आप शराब को हाॅथ कैसे लगा सकते हैं? क्या उसका ग़म इतना बड़ा है कि उसके ग़म को भुलाने और मिटाने के लिए आपको इस शराब का सहारा लेना पड़ रहा है? क्यों भइया क्यों...क्यों उसको याद करके घुट घुट के जी रहे हैं? एक ऐसी बेवफा के लिए जिसको आपके सच्चे प्यार की कोई कद्र ही न थी। जिसने आपकी गुरबत को देख कर आपका साथ देने की बजाय आपका साथ छोंड़ दिया। क्यों भइया....क्यों ऐसे इंसान को याद करना? क्यों ऐसे इंसान की यादों में तड़पना जिसको प्यार और मोहब्बत के मायने ही पता नहीं?"

विराज ख़ामोश खड़ा था। उसका चेहरा आॅसुओं से तर था। चेहरे पर ज़माने भर का दर्द जैसे तांडव कर रहा था। आॅखें शराब के नशे में लाल सुर्ख हो चली थीं। निधि क्या बोल रही थी उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जबकि निधि ने उसे पकड़ कर आराम से वहीं रखे एक सोफे पर बिठाया और खुद भी उसके पास ही बैठ गई।

"तु तुझे ये सब कैसे पता चला गुड़िया?" फिर विराज ने लरजते हुए स्वर में कहा।

"आप सारी दुनियाॅ को बहला सकते हैं भइया,लेकिन अपनी गुड़िया को नहीं।" निधि ने कहा__"मुझे इस बात का आभास तो पहले से ही था कि आप जो हम सबको दिखा रहे हैं वैसा असल में है नहीं। मैंने अक्सर रातों में आपको रोते हुए देखा था। एक दिन जब आप किसी काम से बाहर गए हुए थे तो मैंने आपके कमरे की तलाशी ली। उस समय मैं खुद नहीं जानती थी कि आपके कमरे में मैं क्या तलाश कर रही थी? किन्तु इतना ज़रूर जानती थी कि कुछ तो मिलेगा ही ऐसा जिससे ये पता चल सके कि आप अक्सर रातों में क्यों रोते हैं? काफी तलाश करने के बाद जो चीज़ मुझे मिली उसने अपनी आस्तीन में छुपाई हुई सारी दास्तां को मेरे सामने रख दिया। मेरे हाॅथ आपकी डायरी लग गई थी....उसी से मुझे सारी बातें पता चलीं। डायरी में आपके द्वारा लिखा गया एक एक हर्फ़ ऐसा था जिसने मुझे और मेरी अंतर्आत्मा तक को झकझोर कर रख दिया था भइया। अच्छा हुआ कि वो डायरी मुझे मिल गई थी वर्ना भला मैं कैसे जान पाती कि आप अपने सीने में कितना बड़ा दर्द छुपा कर हम सबके सामने हॅसते बोलते रहते हैं?"

"ये सब माॅ से मत बताना गुड़िया।" विराज ने बुझे स्वर में कहा__"वर्ना माॅ को बहुत दुख होगा। उन्होंने बहुत दुख सहे हैं, मैं उन्हें अब किसी भी तरह दुखी नहीं देख सकता।"

"और मुझे???" निधि ने विराज की आॅखों में बड़ी मासूमियत से देखते हुए कहा__"क्या मुझे दुखी सकते है आप??"

"नहीं, हर्गिज़ नहीं गुड़िया।" विराज ने कहने के साथ ही निधि के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच लिया__"तू तो मेरी जान है रे। तेरी तरफ तो दुख की परछाई को भी न फटकने दूॅ।"

"अगर ऐसी बात है तो क्यों खुद को इतनी तकलीफ़ देते हैं आप?" निधि ने रुआॅसे स्वर में कहा__"आप भी तो मेरी जान हैं, और मैं भला अपनी जान को दुख में देख कर कैसे खुश रह सकती हूॅ, कभी सोचा है आपने? आप तो हमेशा उसी की याद में दुखी रहते हैं, उसी के बारे में सोचते रहते हैं। आपको इस बात का ख़याल ही नहीं रहता कि जो सचमुच आपसे प्यार करते हैं वो आपको इस तरह दुखी देख कर कैसे खुश रह सकते हैं?"

विराज कुछ न बोला। सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका लिया उसने और अपनी आॅखें बंद कर ली। उस पर अब नशा हावी हो गया था। दुख दर्द जब असहनीय हो जाता है तो वह कुछ भी कर गुज़रने पर उतारू हो जाता है। आज तक उसने शराब को हाथ भी न लगाया था। अपने इस दर्द को किसी से बयां भी न किया था, किन्तु आज अपनी ये सच्चाई जब निधि के मुख से सुनी तो उसे जाने क्या हुआ कि उसके जज्बात हद से ज्यादा मचल गए और उसने शराब पी। हलाकि वह अंदर इस लिए आया था क्योंकि वह निधि के सामने खुद को इस हाल में नहीं दिखा सकता था। जब वह कमरे में आया तो नज़र कमरे में ही एक तरफ लगे बार काउंटर पर पड़ी। अपनी हालत को छुपाने के लिए उसने पहली बार शराब की तरफ अपना रुख किया था। जुनून के हवाले हो चुके उसने शराब की बोतल ही मुख से लगा ली और सारी बोतल डकार गया। किन्तु अब उस पर शराब का नशा तारी हो चुका था।

निधि कोई बच्ची नहीं थी बल्कि सब समझती थी। उसे एहसास था कि शराब ने उसके भाई पर अपना असर दिखा दिया है। क्या सोच कर आए थे दोनो यहाॅ लेकिन क्या हो गया था। निधि को अपने भाई की इस हालत पर बड़ा दुख हो रहा था। वह आॅखे बंद किये अपने भाई को ही देखे जा रही थी। उसने उसे झकझोर कर पुकारा, तो विराज हड़बड़ा कर उठा। इधर उधर देखा फिर नज़र निधि पर पड़ी तो एकाएक ही वह चौंका। उसे निधि के चेहरे पर किसी और का ही चेहरा नज़र आ रहा था। वह एकटक देखे जा रहा था उसे। फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।

"अब यहाॅ क्या देखने आई हो विधि?" विराज भावावेश में कह रहा था__"देख लो तुमने जो ग़म दिये थे वो थोड़ा कम पड़ गए वर्ना आज मैं ज़िंदा नहीं रहता बल्कि कब का मर गया होता या फिर पागल हो गया होता। लेकिन चिन्ता मत करो, क्योंकि ज़िन्दा भी कहाॅ हूॅ मैं? हर पल घुट घुट कर जीता हूॅ मैं। इससे अच्छा तो ये होता कि तुम मुझे ज़हर दे देती। कम से कम एक बार में ही मर जाता।"

इधर विराज जाने क्या बोले जा रहा था जबकि उधर निधि पहले तो बुरी तरह चौंकी थी फिर जब उसे सब कुछ समझ आया तो उसका दिल तड़प उठा। उसने कुछ कहा नहीं बल्कि अपने भाई को बोलने दिया ये सोच कर कि ये उसके अंदर का गुबार है। इस गुबार का निकलना भी बहुत ज़रूरी है। उसे जाने क्या सूझी कि उसने इस सबके लिए खुद विधि का रोल प्ले करने का सोच लिया।

"क्यों किया ऐसा विधि?" विराज भर्राए गले से कह रहा था__"क्या यही प्यार था? क्या तुम्हें मेरे धन दौलत से प्यार था? और जब तुमने देखा कि मेरे अपनों ने मुझे मेरी माॅ बहन सहित हर चीज़ से बेदखल कर दिया है तो तुमने भी मुझे दुत्कार दिया? क्यों किया ऐसा विधि....?"

"प्यार व्यार ये सब फालतू की बाते हैं मिस्टर विराज।" विधि का रोल कर रही निधि ने अजीब भाव से कहा__"समझदार आदमी इनके चक्करों में पड़ कर अपना समय बर्बाद नहीं करता। मैने तुमसे प्यार किया था क्योंकि तुम उस समय अमीर थे। तुम्हारे पास धन था दौलत थी। उस समय तुम मेरे लिए कुछ भी खरीद कर दे सकते थे। तुमसे शादी करती तो सारी ज़िन्दगी ऐश करती। मगर तुम तो अपनों के द्वारा दर दर का भिखारी बना दिये गए। भला कोई भिखारी मेरी ज़रूरतों को कैसे पूरा कर पाता? इस लिए मैंने समझदारी से काम लिया और तुमसे जो प्यार का चक्कर चलाया था उसे खत्म कर दिया। हर ब्यक्ति अपने सुख और हित के बारे में सोचता है। मैं ने भी तो यही सोचा था, इसमें भला मेरी क्या ग़लती?"

"कितनी आसानी से ये सब कह दिया तुमने?" विराज के अंदर जैसे कोई हूक सी उठी थी, बोला__"क्या एक पल के लिए भी तुम्हारे मन में ये ख़याल नहीं आया कि तुम्हारे इस तरह के कठोर बर्ताव से मुझ पर क्या गुज़री रही होगी? क्या तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं लगा कि तुम ये जो कुछ कर रही हो वह कितना ग़लत है? क्या तुझे एक पल के लिए भी नहीं लगा था कि तेरे इस तरह दुत्कार देने से सारी ऊम्र मैं सुकून से जी नहीं पाऊॅगा? बता बेवफा....बता बेहया लड़की?"

विराज एकाएक ही बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा था। जुनून और पागलपन सा सवार हो गया था उस पर। उसने एक झटके में निधि की गर्दन को अपने दोनो हाॅथों से दबोच लिया। निधि को इस सबकी उम्मीद नहीं थी। इस लिए जैसे ही विराज ने अपने दोनो हाॅथों से उसकी गर्दन दबोची वैसे ही वह बुरी तरह घबरा गई। जबकि विराज जुनूनी हो चुका। इस वक्त उसके चेहरे पर नफरत घृड़ा और गुस्सा जैसे कत्थक करने लगा था। आॅखें तो नशे में वैसे ही लाल सुर्ख हो गई थी पहले से अब चेहरा भी सुर्ख पड़ गया था।

निधि ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है। विराज ने उसकी गर्दन को शख्ती से दबोचा हुआ था। निधि बुरी तरह सहम गई थी। डर और भय के चलते उसका चेहरा निस्तेज़ का हो गया था। जबकि.....

"अब बोलती क्यों नहीं खुदगर्ज़ लड़की? बोल क्यों किया मेरे दिल के साथ इतना बड़ा खिलवाड़?" विराज भभकते स्वर में बोले जा रहा था__"बोल क्यों मेरी पाक भावनाओं को पैरों तले रौंदा था? बोल कितनी धन दौलत चाहिए तुझे? आज तो मैं फिर से अमीर हो गया हूॅ....मेरे पास आज इतनी दौलत है कि तेरे जैसी जाने कितनी लड़कियों को एक साथ उस दौलत से तौल दूॅ। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुझे पता चल गया हो कि मैं फिर से धन दौलत वाला हो गया हूॅ और इस लिए तू फिर से अपना फरेबी प्यार मेरे आगे परोसने आ गई? नहीं नहीं...अब मुझे तेरे इस घिनौने प्यार की ज़रूरत नहीं है। बल्कि अब तो मैं तेरे जैसी लड़कियों को अपनी उसी दौलत से दो कौड़ी के दामों में खरीद कर अपने नीचे सुलाऊॅगा और रात दिन रगड़ूॅगा उन्हें समझी तू???"

"भ भइया...ये क् क्या हो गया है आ आपको?" निधि बड़ी मुश्किल से बोल पा रही थी__"मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।"

विराज इस तरह रुक गया जैसे स्टैचू में तब्दील हो गया हो। कानों में सिर्फ एक यही वाक्य गूॅज रहा था 'मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।' बार बार यही वाक्य कानों में गूॅज रहा था। एक झटके से विराज ने निधि की गर्दन से अपने हाॅथ खींचे। एक पल में ही उसकी बड़ी अजीब सी हालत हो गई। आॅखें फाड़ कर निधि को देखा उसने। और फिर फूट फूट कर रो पड़ा वह। निधि को अपने सीने से छुपका लिया उसने।

"मुझे माफ कर दे...माफ कर दे मुझे।" विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__"ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया...तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।"

"भइयाऽऽ।" निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।

जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।

'आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
"मुझे माफ कर दे...माफ कर दे मुझे।" विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__"ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया...तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।"

"भइयाऽऽ।" निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।

जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।

'आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अब आगे,,,,,,,,

विराज को लगभग चार घंटे बाद होश आया। निधि की गोद में सिर रखे वह उसी तरह लेटा हुआ था। उसके सिर पर निधि का हाॅथ था और वह खुद भी वहीं पर यूॅ ही सो गई थी। दोनो ही नहीं जानते थे कि जिस शिप में वो दोनो इस वक्त थे वह कहाॅ से कहाॅ घूमते हुए पहुॅच गया था।

विराज को जब होश आया तो उसने अपने सिर को निधि की गोद में टिका हुआ पाया। उसने देखा कि उसकी जान उसके सिर पर अपना हाॅथ रखे यूॅ ही सो गई थी। उसके खूबसूरत चेहरे पर संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। विराज को उस पर बड़ा प्यार आया। वह आहिस्ता से निधि की गोद से उठा और फिर निधि को बड़ी ही आसानी से अपनी बाजुओं में उठा लिया। पास में ही एक तरफ रखे सोफे पर उसने निधि को आहिस्ता से लिटाया। उसके बाद वह खुद भी उसके चेहरे के समीप ही बैठ गया और अपनी गुड़िया को सोते देखने लगा। कुछ देर यूॅ ही देखने के बाद वह झुका और निधि के माथे पर आहिस्ता से चूॅमा फिर उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

विराज के जाते ही निधि ने मुस्कुराते हुए पट से अपनी आॅखें खोल दी। कुछ पल जाने क्या सोचती रही फिर उसने बहुत ही धीमे स्वर में कहा__"आपको तो ये भी नहीं पता जान जी कि किस किसी लड़की के माथे पर नहीं बल्कि उसके होंठो पर किया जाता है। लेकिन आप चिन्ता मत कीजिए....आप ये भी जानने लगेंगे...मैं सब बताऊॅगी न आपको, हाॅ नहीं तो।" ये कह कर वह हॅस पड़ी फिर सहसा शर्मा भी गई वह। अपने दोनो हाथों द्वारा तुरंत ही अपना चेहरा छुपा लिया उसने।

कुछ देर बाद विराज जब बाथरूम से वापस आया तो उसने अपनी गुड़िया को अपने ही हाथों अपने चेहरे को छुपाये हुए पाया। उसे लगा गुड़िया अभी भी उसके लिए दुखी है, इस लिए वह तुरंत ही उसके पास पहुॅचा और फर्स पर उसके घुटनों के पास बैठ गया।

"तू दुखी मत हो गुड़िया।" विराज ने अपने हाॅथों द्वारा निधि के चेहरे से उसके हाॅथों को हटाते हुए कहा__"मैं तुझसे वादा करता हूॅ कि अब से मैं खुद को दुखी नहीं करूॅगा। उसकी यादों पर तो मेरा कोई ज़ोर नहीं है लेकिन अब उसकी यादों से मैं खुद को विचलित नहीं करूॅगा।"

"ये तो बहुत अच्छी बात है भइया।" निधि ने कहा__"उस लड़की को याद करके अपने दिल को क्यों तकलीफ़ देना जिसे प्यार की परिभाषा का ज्ञान ही न हो।"

"तू सही कह रही है गुड़िया।" विराज के चेहरे पर एकाएक ज़लज़ले के से भाव आए, बोला__"लेकिन इसका हिसाब तो मैं उससे लूॅगा गुड़िया। उसे मेरे साथ इस खिलवाड़ को करने की सज़ा ज़रूर मिलेगी मेरे हाथों। ऐसा हाल करूॅगा उसका कि फिर किसी के साथ ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं करेगी वो।"

"क्या आपका ऐसा करना मेरा मतलब है कि उसे सज़ा देना उचित है भइया?" निधि ने कहा__"उसने जो किया उसे उसका फल भगवान खुद ही दे देगा। आपने उससे सच्चा प्यार किया था, इस लिए आप उसके लिए अपने मन में ऐसा विचार कैसे रख सकते हैं??"

"मैं जानता हूॅ गुड़िया कि प्यार में बदले की ऐसी भावना या विचार रखना उचित नहीं है।" विराज ने कहा__"लेकिन किसी को आईना दिखाना तो सर्वथा उचित है न। वही करना चाहता हूॅ मैं।"

"ठीक है आपको जो अच्छा लगे वो कीजिये भइया।" निधि ने कहा__"शायद इससे आपके दिल को सुकून मिल जाए।"

"माफ़ करना गुड़िया।" विराज ने खेद भरे स्वर में कहा__"मैं तुझे यहाॅ किस लिये लाया था और क्या हो गया। लेकिन तू फिक्र मत कर, अभी तो बहुत समय है। चल हम दोनो अब इस टूर का आनन्द लेते हैं।"

"कोई बात नहीं भइया।" निधि ने प्यार भरे लहजे में कहा__"आपसे बढ़ कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है। आप मेरी जान हैं, और जब मेरी जान ही खुश नहीं रहेगी तो भला मैं कैसे किसी चीज़ से खुश रह सकती हूॅ?"

"तू और तेरी ये बातें।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा__"मेरी समझ से बाहर हैं गुड़िया।"

"ऐसा क्यों?" निधि ने विराज की तरफ गौर से देखते हुए कहा था।

"कभी कभी मुझे ऐसा लगा करता है जैसे तेरे अलावा भी तुझ में कोई और कैरेक्टर है जो कुछ और कहने लगता है।" विराज ने कहा__"कुछ ऐसा कहने लगता है जो मेरी समझ में ही नहीं आता।"

"अच्छा, ऐसा आपको क्यों लगता है भइया?" निधि ने धड़कते दिल से कहा__"कि मेरे अंदर कोई और भी कैरेक्टर है जो कुछ और ही कह डालता है?"

"पता नहीं गुड़िया।" विराज ने कहा__"कभी कभी लगता है जैसे तू अब मेरी वो गुड़िया नहीं रही जो हर चीज़ को अपनी मधुर व चुलबुली बातों से हस कर उड़ा देती थी बल्कि अब तू बड़ी हो गई लगती है। इतनी बड़ी कि तेरी बातों में अब किसी रहस्य तथा किसी दूसरे ही अर्थ का आभास होता है जो समझ से परे होता है।"

निधि अपलक देखती रह गई विराज को। उसके दिल की धड़कने अनायास ही बढ़ गई थी। उसे समझ में न आया कि वो क्या जवाब दे???

"मैं सच कह रहा हूॅ न गुड़िया?" उसे चुप देख विराज ने कहा__"ऐसी ही बात है न तुझ में?"

"पता नहीं भइया।" निधि ने सिर झुका कर कहा__"जाने क्यों ऐसा लगता है आपको, जबकि ऐसी तो कोई बात ही नहीं है।"

"चल कोई बात नहीं गुड़िया।" विराज ने निधि के चेहरे को अपने दोनो हाॅथों में लेते हुए कहा__"पर तू इतना समझ ले कि तेरा ये भाई तुझसे बहुत प्यार करता है और तुझे हमेशा खुशियों से चहकती व फुदकती हुई ही देखना चाहता है।"

विराज की बातें सुन कर निधि की आॅखें भर आई। उसके दिल में भावना का एक तीब्र भूचाल सा आ गया। उसी भावना के वशीभूत होकर वह विराज से लिपट गई। विराज के सीने में चेहरा छुपाए हुए ही बोली__"पर ये तभी संभव है जब आप भी खुश रहेंगे। अगर आप किसी बात से दुखी होंगे तो मैं भी दुखी हो जाऊॅगी।"

"ऐसा क्यों भला?" विराज ने कुछ सोचते हुए पूछा था।

"क्योंकि मैं आपसे प्या....।" निधि कहते हुए अचानक ही रुक गई। उसे एकाएक ही ध्यान आया था कि वह ये क्या बोलने वाली थी। उसकी हालत पल भर में ख़राब हो गई। दिल की धड़कने इतनी तीब्र हो गई उसकी धमक कनपटियों में स्पष्ट सुनाई देने लगी थी। उसने तुरंत ही बात को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से कहा__"क्यों कि आप हमारे लिए सब कुछ हैं भ भइया...अगर आप ही इस तरह दुखी रहेंगे तो हम माॅ बेटी कैसे खुश रह सकेंगे भला?"

निधि ने भले ही अपनी समझ में बात को सम्हाल लिया था किन्तु उसके पहले अधूरे वाक्य ने ही सारी सच्चाई स्पष्ट कर दी थी। विराज ने पूछा ही इस तरह था कि जल्दबाजी और बेध्यानी में उसके मुख से वो निकल गया था जो वर्षों से उसके दिल में पनप रहा था। विराज ये सुन कर तथा ये जान कर बुरी तरह हिल गया था कि उसकी जान उसकी गुड़िया उससे प्यार करती है। यही वो बातें थी जो द्विअर्थी होती थी और विराज को समझ में नहीं आती थी। किन्तु आज संयोगवश सब कुछ सामने आ गया था। निधि खुद ही बेख़याली में बोल गई थी।

अपने भाई को खामोश जान कर निधि को झटका सा लगा। उसे समझते देर न लगी कि सब गड़बड़ हो चुका है। मतलब उसका भाई उसके पहले ही अधूरे वाक्य को सुन कर समझ चुका है कि उसकी सच्चाई क्या है। बात को सम्हालने की उसकी कोशिश बेकार हो चुकी थी। हालत ये हो गई उसकी कि अपने भाई से नज़र मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी अब। भाई के सीने में चेहरा छुपाए वह वैसी ही खड़ी रही। उसे लग रहा था कि ये ज़मीन फटे और वह पाताल तक उसमे समाती चली जाए। मगर चाह कर भी तो वह ऐसा न कर सकी। उसके होंठ घबराहटवश बुरी तरह थरथरा रहे थे।

वातावरण में अजीब सी शान्ति छा गई थी। काफी देर तक यही आलम रहा। दोनो में से कोई भी कुछ न बोल रहा था। विराज तो जैसे वहाॅ था ही नहीं बल्कि किसी गहरे ख़यालों के समंदर में डूबा हुआ नज़र आ रहा था। बार बार उसके ज़ेहन में यही बात गूॅज रही थी कि उसकी गुड़िया उसकी अपनी बहन उससे प्यार करती है।

"भ भइया।" सहसा निधि ने हिम्मत जुटा कर तथा विराज के सीने से अपना चेहरा उठा कर विराज की तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा__"क्या बात है...आप एकदम से चुप क्यों हो गए? क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई? अगर ऐसा है तो मुझे माफ़ कर दीजिए प्लीज़।"

विराज के कानों में निधि की जब ये बातें पड़ीं तो वह ख़यालों के गहरे समुद्र से बाहर आया। वस्तुस्थित का आभास होते ही उसने निधि की तरफ अजीब भाव से देखा। निधि खुद भी उसी की तरफ देख रही थी किन्तु सीघ्र ही उसकी नज़रें झुक गईं। जाने क्यों अपने भाई की आॅखों से आॅखें न मिला सकी वह। कदाचित् इस लिए कि उसके दिल का भेद उसके भाई के सामने खुल चुका था।

"आज का पिकनिक टूर यहीं पर खत्म हो चुका गुड़िया।" सहसा विराज ने सपाट भाव से कहा__"अब हम वापस घर चल रहे हैं।"

इतना कह कर विराज ने निधि को खुद से अलग किया और बाहर की तरफ चल दिया। निधि को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे उसका सब कुछ लुट गया है, उसके सीने में बड़ा तेज़ दर्द उठा। आॅखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। ऐसा लगा जैसे वह अभी गश खा कर वहीं फर्स पर गिर पड़ेगी। लेकिन अंतिम समय में उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाल लिया। दिल में उमड़ते हुए जज़्बातों में प्रबलता आ गई जिसकी वजह से उसकी रुलाई फूट गई। वह जी जान से विराज की तरफ दौड़ी और पीछे से विराज की पीठ से लिपट कर ज़ार ज़ार रोने लगी।

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"ये तुम क्या कह रहे हो हरिया?" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था__"तुमने अच्छी तरह पता किया तो है न ?"

"जी हाॅ मालिक।" हरिया नाम का एक आदमी जो कि अजय सिंह का ही आदमी था बोला__"मैने अच्छी तरह पता किया है। आपके छोटे भाई कल ही यहाॅ से बम्बई के लिए निकल गए थे। उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को कल ही उदयपुर भेज दिया था। मेरे एक खास आदमी ने अपनी आॅखों से उनको जाते हुए देखा था। उसी ने बताया कि छोटी मालकिन(करुणा) के भाई उनके साथ ही थे।"

अजय सिंह ये सब जान कर बुरी तरह भिन्ना गया। उसने तो सोचा था कि अभय के जाते ही वह करुणा को उठवा लेगा और उसे अपने नये फार्महाउस पर रखेगा। उसके बाद वह जिस तरह चाहेगा करुणा के गदराए हुए व मादक से जिस्म का मज़ा लूटेगा। किन्तु हरिया की इस ख़बर ने उसके सभी अरमानों पर पानी नहीं फेरा था बल्कि बाल्टी भर पेशाब कर दिया था। उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि उसका छोटा भाई अभय इतना शातिर दिमाग़ निकलेगा जो इतना आगे का सोच कर अपना खेल खेल जाएगा।

अजय सिंह चाहता तो करुणा को उसके मायके से भी उठवा सकता था किन्तु उस सूरत में बहुत बड़ा बवाल हो जाता। इस लिए अब वह अपने हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। करुणा नाम की खूबसूरत चिड़िया अब उसके हाॅथ से निकल गई थी।

अजय सिंह ने सोचा था कि अभय के पीछे अपने आदमियों को लगा देगा किन्तु वो भी न कर सका वह। क्योंकि उसे पता ही न चल पाया था कि अभय सिंह ने कब क्या किया था?

"तुम पता करो हरिया।" फिर उसने कुछ सोचते हुए कहा__"अभय मुम्बई जा चुका है या नहीं?"

"वो तो कल ही यहाॅ से चले गए थे मालिक।" हरिया ने कहा__"और आज तो वो बम्बई पहुॅच भी गए होंगे।"

"अरे बेवकूफ कल वो मुम्बई कैसे जा सकता है?" अजय सिंह ने हुड़की दी__"शाम से पहले तक तो वो यहीं था, और शाम को भला कौन सी ट्रेन इस शहर से मुम्बई जाती है। वह तो दोपहर को जाती है। मतलब साफ है कि अभय कल नहीं आज गया होगा मुम्बई।"

"ये तो मैने सोचा ही नहीं मालिक।" हरिया ने सिर झुका कर कहा__"छोटे मालिक अगर आज गए होंगे तो कल ही पहुॅचेंगे बम्बई। अब हम क्या करें मालिक?"

"अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है हरिया।" अजय सिंह ने कहा__"ये तो तुम्हें भी मालूम है कि हमारे कुछ आदमी मुम्बई में ही हैं जो विराज और उसकी माॅ बहनों की खोज में लगे हुए हैं। हम अपने उन आदमियों को फोन करके कह देंगे कि वो अभय पर नज़र रखें। अभय कल मुम्बई पहुॅचेगा। मुम्बई में जैसे ही वह ट्रेन से उतरेगा वैसे ही हमारे आदमी उसके पीछे लग जाएंगे।"

"ये तो बहुत बढ़िया आइडियवा है मालिक।" हरिया ने इंग्लिश की माॅ बहन एक करते हुए कहा__"छोटे मालिक जहाॅ जहाॅ जाएॅगे हमारे आदमीं भी उनके पीछे जाएॅगे।"

"अब तुम जाओ हरिया।" अजय सिंह ने कहा__"हम भी किसी ज़रूरी काम से बाहर जा रहे हैं।"

"ठीक है मालिक।" कहते हुए हरिया चला गया वहाॅ से।

अजय सिंह ने मोबाइल निकाल कर मुम्बई में स्थित अपने आदमियों को फोन लगाया। अपने आदमियों को सारी बातें समझाने के बाद उसने फोन काट दिया।

अभी वह इस सबसे फारिग़ ही हुआ था कि सामने से उसकी इंस्पेक्टर बेटी रितू आती हुई दिखी। अजय सिंह उसे देख कर बस आह सी भर कर रह गया। पुलिस की चुस्त दुरुस्त वर्दी में उसकी बेटी ग़ज़ब ढा रही थी। जिस्म का एक एक उभार साफ नज़र आ रहा था। अजय सिंह की आॅखें एकटक रितू के सीने पर टिकी हुई थी। जहाॅ पर रितू के सीने के दो ठोस किन्तु बड़े बड़े वक्ष उसके चलने के कारण एक रिदम पर ऊपर नीचे कूद से रहे थे।

अजय सिंह अपनी बेटी के वक्षों को ललचाई नज़रों से देख ही रहा था कि तभी अंदर से आती हुई प्रतिमा की नज़र अजय सिंह पर पड़ी। अपने पति को अपनी ही बेटी के बड़े बड़े पर्वत शिखरों को ललचाई नज़रों से देखते देख वह मन ही मन कह उठी 'उफ्फ अजय तुम कभी नहीं सुधर सकते।'

"अरे...तुम अभी तक यहीं बैठे हो?" प्रतिमा ने तुरंत ही अजय सिंह का ध्यान भंग करने की गरज से कहा__"तुम तो कह रहे थे कि शहर जाना था?"

अजय सिंह चौंका, उसने तुरंत ही अपनी बेटी पर से नज़रे हटा ली। कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे इस सबसे वह बेहद शर्मसार हुआ हो किन्तु फिर अगले ही पल खुद को सम्हाल कर बोला__"ह हाॅ हाॅ बस निकल ही रहा हूॅ मैं।"

तब तक रितू भी आकर वहाॅ पर रखे एक सोफे पर लगभग पसर सी गई। अपने सिर से पुलिस की कैप उतार कर तथा हाथ में लिए पुलिस रुल को उसने एक तरफ रख दिया और फिर अपनी माॅ की तरफ देखते हुए कहा__"माॅम एक कप काॅफी मिलेगी क्या??"

"अभी लाई बेटी।" कहते हुए प्रतिमा वापस पलट गई और किचेन की तरफ चली गई।

"लगता है मेरी बेटी के सीने में काम और जिम्मेदारी का बोझ बहुत ही ज्यादा है।" अजय सिंह ने पुनः रितू के सीने की तरफ एक नज़र डाल कर कहा था।

"सीने पर?????" रितू ने चकरा कर कहा__"काम और जिम्मेदारी का बोझ तो कंधों पर होता है ना डैड??"

"ओह हाॅ हाॅ बेटी।" अजय सिंह बुरी तरह हड़बड़ा गया। उसके चेहरे पर घबराहट के भाव भी उभरे किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल कर बोला__"यू आर राइट....अब्सोल्यूटली राइट।"

"डैड कल से शिवा कहीं नज़र नहीं आ रहा?" रितु ने पहलू बदलते हुए कहा__"और ना ही चाचा चाची जी वगैरा कहीं नज़र आ रहे हैं?"

"शिवा तो शहर में है बेटी।" अजय ने राहत की साॅस लेते हुए कहा__"बाॅकियों का मुझे पता नहीं। सब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं। कहीं आने जाने के लिए वो किसी से पूछना ज़रूरी नहीं समझते। ख़ैर तुम बताओ, तुम्हारे केस का क्या हुआ? मेरा मतलब है कि क्या ये पता चल सका कि हमारी फैक्टरी में किसने बम्ब फिट किया था?"
 
"नहीं डैड।" रितू ने कहा__"बड़ा ही पेंचीदा मामला है। इस मामले में कुछ भी पता नहीं चल सका कि वो कौन था? हाॅ इतना जरूर पता किया कि फैक्टरी के गेट के बाहर मौजूद गार्ड झूठ बोल रहा था। दरअसल जिस रात ये हादसा हुआ था उस रात गेट पर एक ही गार्ड था और वो भी चौबीस घंटे की ड्यूटी पर। इस लिए रात में वह गेट के बाहर रखी कुर्सी पर बैठा बैठा ही ऊॅघ रहा था। इसके बाद उसने ये बताया कि उसे ये आभास हुआ कि कोई चीज़ उसकी नाॅक के पास लाई गई थी। जिसके असर से उसे पता ही नहीं चला कि वह कब बेहोश हो गया था? उसके बाद तब उसे होश आया जब फैक्टरी में लगी आग से अफरा तफरी मची हुई थी। यकीनन जो चीज़ उसके नाॅक के पास लाई गई थी वह क्लोरोफाॅम डाला हुआ कोई रुमाल रहा होगा या फिर खुद क्लोरोफाॅम की बाॅटल। इस हादसे से वह गार्ड बहुत ज्यादा डर गया था इसी लिए शुरू में उसने यही कहा था कि वह रात भर जागता रहा था और उसके सामने कोई भी ऐसा ब्यक्ति नहीं आया था जो फैक्टरी के अंदर गया हो।"

"तो फिर क्या फायदा हुआ तुम्हारे द्वारा केस को रिओपन करने से?" अजय सिंह ने रितू की तरफ अजीब भाव से देखते हुए कहा__"आख़िर क्या नतीजा निकला बेटी? वरना जिस तरह से तुमने इस केस को रिओपन किया था उससे तो यही ज़ाहिर हो रहा था कि इस बार कोई न कोई सुराग़ ज़रूर पुलिस के हाथ लगेगा। दूसरी बात ये भी मुझे पता चली थी कि इस केस के रिओपन होने के तुरंत बाद ही रातों रात शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट का तबादला कर दिया गया था। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ था?"

"ये सवाल तो मेरे लिए भी सोचने का विषय बना हुआ है डैड।" रितू ने सोचने वाले भाव से कहा__"मुझे खुद ये बात समझ में नहीं आ रही कि गृह मंत्री ने शहर के सारे पुलिस विभाग का रातों रात तबादले का आदेश किस वजह से दिया था? अगर हम ये सोचें कि इसकी वजह ये है कि पिछली बार फैक्टरी के केस में पुलिस ने अपनी पूरी ईमानदारी से तहकीकात नहीं की थी बल्कि ग़लत रिपोर्ट तैयार की थी तो भी ये इतनी बड़ी वजह नहीं हो सकती कि इसकी वजह से शहर के सारे पुलिस विभाग का इस तरह तबादला कर दिया जाए। पिछली रिपोर्ट पर ऊपर से इंक्वायरी भी हुई थी। जिसमें पुलिस के उस अफसर ने ये बयान दिया था कि ऐसी रिपोर्ट बनाने के लिए आपने कहा था क्यों कि आप नहीं चाहते थे कि इसकी वजह से आपकी इज्जत नीलाम हो जाए। ख़ैर, आपके कहने पर उस अफसर ने भले ही ग़लत रिपोर्ट बनाई थी लेकिन इसके लिए उसे ज्यादा से ज्यादा सस्पेंड किया जा सकता था मगर ऐसा नहीं हुआ बल्कि शहर का सारा पुलिस विभाग ही बदल दिया गया। यही वो बात है डैड जिसने दिमाग़ का दही किया हुआ है।"

"हम्म...यकीनन।" अजय सिंह ने गहन सोच के साथ कहा__"बात तो वाकई बड़ी ही चक्करदार है बेटी। और सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि इस बारे में गृहमंत्री से पूछा भी नहीं जा सकता।"

तभी प्रतिमा हाथ में ट्रे लिए हुई आई। उसने काफी का कप रितू को दिया और चाय का एक कप अजय सिंह को और चाय का ही एक कप खुद लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।

"क्या बातें हो रही हैं बाप बेटी के बीच?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा था।

अजय सिंह ने संक्षेप में उसे बता दिया। सुन कर प्रतिमा ने कहा__"ये तो सचमुच बड़ी सोचने वाली बात है। इस केस में आख़िर ऐसा क्या था जिसके लिए खुद गृहमंत्री को भी हस्ताक्षेप करना पड़ा? इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने रातो रात शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला भी कर दिया था।"

प्रतिमा की इस बात के बाद वहाॅ पर सन्नाटा छा गया। कोई कुछ न बोला, कदाचित् इस लिए कि किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ये अलग बात थी सबके मन में ये बात गहन रूप से विचाराधीन थी।

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"नहीं...प्लीज़ रुक जाइये...आप इस तरह कैसे जा सकते हैं?" निधि ने रोते हुए कहा था__"हम तो पिकनिक टूर पर आए थे न, फिर इतनी जल्दी ये टूर कैसे समाप्त हो जाएगा? और....और ये अचानक क्या हो गया है आपको जो ये कह रहे हैं कि हम अब घर चलेंगे???"

"मुझे कुछ नहीं हुआ है।" विराज ने अजीब भाव से कहा__"हम घर जा रहे हैं बस और कोई बात नहीं।"

ये कह विराज ने निधि को अपनी पीठ पर से अलग कर आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाया। किन्तु ज्यादा दूर जा नहीं सका वह। क्योंकि उसके कानों में तुरंत ही निधि का करुणायुक्त वाक्य टकराया__"आपको मेरी कसम है अगर आपने एक क़दम भी आगे बढ़ाया तो मैं अपनी जान दे दूॅगी। मुझे बताइये कि आख़िर क्या हो गया है ऐसा जिसकी वजह से आप अचानक ही इस तरह का बर्ताव करने लगे। अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई है तो आप उसके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दीजिए....मुझे आपकी हर सज़ा मंजूर है। लेकिन अपने प्रति आपकी ऐसी बेरुखी मैं सह नहीं सकती।"

"मेरी इस बेरुखी की वजह तुम अच्छी तरह जानती हो।" विराज ने एक झटके में पलट कर कहा था__"तुम जानती हो कि किस वजह से मेरा बर्ताव अचानक ही बदल गया है। अगर नहीं जानती तो इस तरह रोती नहीं और ना ही मुझे अपनी कसम देती।"

निधि देखती रह गई विराज को। उसे तुरंत कोई जवाब न सूझा था। आॅखों में आॅसू लिए वह बड़ी मुश्किल से अपने दिल के जज़्बातों को काबू में करने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो विराज से क्या कहे?

"तुम ऐसा कैसे कर सकती हो गुड़िया?" उसे चुप देख विराज ने कहा__"क्या एक बार भी तुम्हें ये ख़याल नहीं आया कि तुम ये क्या कर रही हो? क्या एक बार भी ये नहीं सोचा कि मैं तुम्हारा सगा भाई हूॅ? क्या एक बार भी नहीं सोचा कि जो रिश्ता तुम बना रही हो वो भाई बहन के बीच नहीं हो सकता? क्यों गुड़िया, क्यों किया ऐसा?"

"मुझे माफ कर दीजिये।" निधि की रुलाई फूट गई, बोली__"मैंने जान बूझ कर ये सब नहीं किया। ये तो बस हो गया। कब कैसे मुझे खुद पता नहीं चला। आप यकीन कीजिए भइया, मैने ये नहीं किया। आप तो जानते हैं न कि कोई किसी से जान बूझ कर या सोच समझ कर प्यार नहीं करता बल्कि लोगों को किसी खास ब्यक्ति से प्यार खुद ही हो जाता है। और उसे स्वयं इस बात का पता नहीं चल पाता। वैसा ही मेरे साथ हुआ है भइया।"

"लेकिन ये ग़लत है मेरी गुड़िया।" विराज ने कहा__"क्या तू नहीं जानती ये बात?"

"मैं जानती हूॅ कि ये ग़लत है।" रितु ने नज़रें झुका कर किन्तु भारी स्वर में कहा__"ये भी जानती हूॅ कि देश समाज भाई बहन के बीच इस रिश्ते को कभी मान्यता नहीं दे सकता बल्कि ऐसे रिश्ते को पाप समझ कर ऐसा रिश्ता रखने वाले को गाॅव समाज से बहिस्कृत कर देता है। इसी लिए मैने कभी आपके सामने ये ज़ाहिर नहीं होने दिया कि मेरे दिल में आपके लिए क्या है? मैने अकेले में खुद को लाखों बार समझाया कि मुझे अपने दिलो दिमाग़ से आपके प्रति ऐसे ख़याल निकाल देना चाहिए क्यों कि ये ग़लत था। मगर मेरा दिल खुद के द्वारा लाखों बार समझाने के बाद भी मेरी नहीं सुनता। मैं क्या करूॅ भइया....हाय कितनी बुरी हूॅ मैं और कितनी बद्किस्मत भी हूॅ कि जिससे मुझे जीवन में पहली बार दिलो जान से प्यार हुआ वो मेरे भाई हैं तथा एक ही माॅ की कोख से जन्में हैं। मेरे दिल ने जिनकी अटूट चाहत व हसरत पाल बैठा वो उसे कभी मिल ही नहीं सकते।"

कहते कहते निधि वहीं फर्स पर असहाय अवस्था में बैठ कर ज़ार ज़ार रोने लगी। जाने कब से उसके दिल में ये गुबार बाहर निकलने के लिए मचल रहा था। आज उस गुबार ने दिल की कैद से बाहर निकल आने का जैसे रास्ता ढूॅढ़ लिया था। हमेशा हॅसती खेलती व शरारतें करने वाली निधि आज जैसे इस सबके बाद दुख का दर्पण बन गई थी। जिस दिन उसे इस बात का एहसास हुआ था कि उसे अपने ही भाई से प्यार हो गया है उस दिन वह खूब रोई थी। क्योंकि वह इस बात को भली भाॅति जानती और समझती थी कि ये ग़लत है। अपने ही भाई को अपना महबूब बना लेना कतई उचित नहीं है। इस संबंध को समाज निम्न दृष्टि से देखता है। उसने इस बारे में अपने आपको बहुत समझाया था। सबके सामने उसी तरह हॅसती मुस्कुराती रहती किन्तु अपने कमरे में रात की तन्हाई में जब उसका मन भटकते हुए अपने भाई तक पहुॅच जाता तो सहसा उसको झटका सा लग जाता था। धड़कने रुक सी जाती उसकी और ये ख़याल उसे पल में रुला देता कि ये उसके दिल ने क्या कर दिया? वह रात रात भर इस बारे में सोचती रहती और भावना व जज़्बातों के भॅवर में खुद को रुलाती रहती। दिल के हाॅथों मजबूर हो चुकी थी वह। छोटी सी इस ऊम्र में उसके दिल ने ये कैसा रोग़ लगा लिया था, और लगाया भी था तो किसका.....खुद अपने ही भाई का? जो उसका कभी हो ही नहीं सकता था।

उस दिन तो वह बहुत रोई थी जिस दिन उसे ये पता चला था कि उसका भाई किसी ऐसी लड़की से प्यार करता है जिसने उसके भाई को सिर्फ इस लिए दुत्कार कर छोंड़ दिया है कि अब वह धन दौलत वाला नहीं रहा। इस बात ने निधि के दिल में जाने क्यों जलन पैदा कर दी थी उस वक्त। लेकिन वहीं इस बात से उसके मन को थोड़ा राहत भी हुई थी कि वह लड़की अब उसके भाई को छोंड़ कर उसके जीवन से जा चुकी है। निधि खुद से ये सवाल करती कि उसको इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि उसके भाई के जीवन से कोई लड़की जा चुकी है या नहीं। पर दिल के किसी कोने से उसे ये आवाज़ भी आती कि 'बहुत फर्क पड़ता है....राज सिर्फ मेरे हैं'

अपने दिल की इस आवाज़ को सुन कर उसके रोंगटे खड़े हो जाते। उसका मन मयूर नाचने लग जाता था। मगर जब उसे इस बात का बोध होता कि वो जिसे प्यार करती है तथा जिसको अपना बनाने की हसरत रखती है वो तो उसका सगा भाई है जिसे वो किसी भी कीमत पर अपना नहीं बना सकती तो उसका दिल बैठ जाता। ये एहसास उसे एक ही पल में ज़िन्दा लाश में तब्दील कर देता। उसके अंदर एक हूक सी उठती और फिर आॅखों से मानो गंगा जमुना बहने लग जातीं। उसे लगता कि इस दुनिया में उससे ज्यादा कोई दुखी नहीं है।

निधि को इस तरह ज़ार ज़ार रोते देख विराज तड़प कर रह गया। आख़िर थी तो उसकी बहन ही। ऐसी बहन जिसकी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी वह नहीं देख सकता था। हालातों ने भले ही अपना चेहरा बदल लिया था और ये बता दिया था कि उसकी बहन के मन में वो जाने कब से एक महबूब बन कर बैठा हुआ था लेकिन वह तो अभी भी यही समझता था न कि निधि उसकी बहन ही है। जिसको वह किसी भी तरह दुख में नहीं देख सकता। इस लिए इसके पहले जो उसने बेरुखी का आवरण धारण कर लिया था उस आवरण को उसने सीघ्र ही दरकिनार कर दिया और तुरंत ही झुक कर फर्स पर बैठी रो रही अपनी बहन को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर हौले से उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

"बस कर अब।" विराज ने भर्राए हुए गले से कहा__"तू जानती है ना कि मैं तेरी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी नहीं देख सकता। इस तरह रो कर क्यों मेरे हृदय को चोंट पहुॅचा रही है गुड़िया? चल अब शान्त हो जा।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भइया।" निधि ने विराज के सीने से लगे हुए कहा__"लेकिन ये सच है कि मैं आपसे बेइंतहा प्यार करती हूॅ और आपके बिना एक पल भी जीने का सोच भी नहीं सकती। मैं जानती हूॅ भइया कि ये ग़लत है पर आप मेरी बेबसी को भी समझिये। आप मेरे मन मंदिर में इस हद तक बस चुके हैं कि अब मैं ही क्या बल्कि खुद भगवान भी मेरे मन मंदिर से आपको नहीं निकाल सकता। आप मेरे नहीं हो सकते और ना ही मैं आपको इस बात के लिए मजबूर करूॅगी कि आप मेरे हो जाइये। बस एक ही विनती है आपसे कि आप मुझे ये नहीं कहेंगे कि मैं आपसे प्यार का रिश्ता न रखूॅ, क्योंकि ये मेरे बस में नहीं है भइया।"

"ये हमारे भाग्य की कैसी विडम्बना है गुड़िया?" विराज ने अत्यंत गंभीर होकर किन्तु दुखी भाव से कहा__"मैं समझ सकता हूॅ तेरे दिल की हालत को क्योंकि मैं उस हालत से आज भी गुज़र रहा हूॅ। मगर ज़रा हम दोनो भाई बहन के नसीब का खेल तो देखो...जिसको मैने टूट कर चाहा उसने मुझे सिर्फ इस लिए ठुकरा दिया कि मैं रुपये पैसे वाला नहीं रहा था और जिसे तुम टूट कर चाहती हो वो तुम्हारा हो ही नहीं सकता। ये प्यार मोहब्बत क्यों ऐसी होती है? इसके नसीब को क्यों इस तरह का बना दिया है भगवान ने कि ये जिस किसी से होगी वो उसका हो ही नहीं सकेगा? क्यों ऐसी मोहब्बत बनाई बनाने वाले ने? क्या सिर्फ इस लिए कि मोहब्बत करने वाले अपने महबूब के विरह में जीवन भर तड़पें??"

"शायद इसी लिए राज।" निधि ने कहीं खोए हुए कहा था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि वह अपने बड़े भाई को उसके नाम से संबोधित कर ये कहा था। जबकि...

"र राज..???" विराज बुरी तरह चौंका था। उसने निधि को खुद से अलग कर उसके चेहरे की तरफ हैरानी से देखा।

"क क्या हुआ भइया??" निधि चौंकी, उसको कुछ समझ न आया कि उसके भाई ने अचानक उसे खुद से अलग क्यों किया।

"क्या बताऊॅ??" विराज ने अजीब भाव से उसे देखते हुए कहा__"सुना है इश्क़ जब किसी के सर चढ़ जाता है तो उस ब्यक्ति को कुछ ख़याल ही नहीं रह जाता कि वह किससे क्या बोल बैठता है?"

"आप ये क्या कह रहे हैं?" निधि ने उलझन में कहा__"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?"

"अरे पागल तूने अभी अभी मुझे मेरा नाम लेकर पुकारा है।" विराज ने कहा__"हाय मेरी बहन प्रेम में कैसी बावली और बेशर्म हो गई है कि अब वो अपने बड़े भाई का नाम भी लेने लगी।"

"क क्याऽऽ????" निधि बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत और अविश्वास से उसका मुॅह खुला का खुला रह गया। फिर सहसा उसे एहसास हुआ कि उसके भाई ने अभी क्या कहा है। उसका चेहरा लाज और शर्म से लाल सुर्ख पड़ता चला गया। नज़रें फर्स पर गड़ गईं उसकी। छुईमुई सी नज़र आने लगी वह। उसे इस तरह खड़े न रहा गया। कहीं और मुह छुपाने को न मिला तो पुनः वह विराज से छुपक कर उसके सीने में चेहरा छुपा लिया अपना। विराज को ये अजीब तो लगा किन्तु अपनी बहन की इस अदा पर उसे बड़ा प्यार आया। जीवन में पहली बार वह अपनी बहन को इस तरह और इतना शर्माते देखा था।
 
अब आगे,,,,,,,

विराज अपनी बहन को अभी इस तरह शर्माते देख ही रहा था कि उसकी पैन्ट की पाॅकेट में पड़ा मोबाइल बज उठा। दोनो ही मोबाइल की रिंगटोन सुन कर चौंके।

"आपका मोबाइल भी न।" निधि ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"ग़लत समय पर ही बजता है।"

"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" विराज ने पाॅकेट से मोबाइल निकालते हुए कहा था।

"अब जाने दीजिए।" निधि विराज से अलग होकर बोली__"आप देखिये, जाने कौन कबाब में हड्डी बन गया है, हाँ नहीं तो।"

विराज उसकी बात पर मुस्कुराया और मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देख तनिक चौंका फिर मुस्कुरा कर काॅल को रिसीव कर कानों से लगा लिया।

".................।" उधर से जाने क्या कहा गया जिसे सुन कर विराज बुरी तरह चौंका।

"ये क्या कह रहे हो तुम?" विराज ने हैरानी से कहा था।

"...............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।

"भाई तूने बहुत अच्छी ख़बर दी है।" विराज खुश होकर बोला__"चल ठीक है मैं देख लूॅगा।"

"..............।"

"ओह तो ये बात है।" विराज ने सहसा सपाट भाव से कहा__"चल कोई बात नहीं भाई। देख लेंगे सबको। और हाँ...सुन, मैने तेरा काम कर दिया है ठीक है न? चल रख फोन।"

"किससे बात कर रहे थे आप?" निधि ने उत्सुकतावश पूछा।

"अपना ही एक आदमी था गुड़िया।" विराज ने कहा__"उसने फोन करके बहुत अच्छी ख़बर सुनाई है। हमें अब इस टूर को यहीं खत्म करना होगा। क्योंकि बहुत ज़रूरी काम से मुझे कहीं जाना है।"

"क्या मुझे नहीं बताएॅगे?" निधि ने तिरछी नज़र से देखते हुए किन्तु इक अदा से कहा__"कि ऐसी क्या ख़बर सुनाई आपके उस आदमी ने जिसकी वजह से आपको अब जल्दी यहाँ से निकलना होगा??"

"अरे पागल तुझसे भला क्यों कोई बात छुपाऊॅगा मैं?" विराज हॅसा__"चल रास्ते में बताता हूँ सब कुछ।"

इसके बाद दोनो भाई बहन शिप के पायलट को सूचित कर शिप को वापस लौटने के लिए कह दिया। लगभग आधे घंटे बाद वो समुंदर के किनारे पर पहुॅचे। इस बीच विराज ने निधि को फोन पर हुई बातों के बारे में बता दिया था जिसे सुन कर वह भी खुश हो गई थी।

शिप से बाहर आकर विराज उस जगह निधि को लेकर गया जहाँ पर उसकी कार पार्क की हुई थी। दोनो कार में बैठ कर घर की तरफ तेज़ी से बढ़ गए थे। इस बीच विराज ने फोन लगा कर किसी से बातें भी की थी।

शाम होने से पहले ही जब दोनो घर के अंदर पहुॅचे तो माॅ गौरी को ड्राइंगरूम में एक तरफ की दीवार पर लगी बड़ी सी एल ई डी टीवी पर सीरियल देखते पाया। गौरी ने जब अपने बच्चों को देखा तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्करा कर बोली__"आ गए तुम दोनो? चलो अच्छा किया जो जल्दी ही आ गए। जाओ दोनो खुद को साफ सुथरा कर लो तब तक मैं चाय बना कर लाती हूँ।"

निधि और विराज दोनो अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में दोनो फ्रेस होकर आए और सोफों पर बैठ गए। तभी गौरी हाथ में ट्रे लिए आई और दोनो को चाय दी और खुद भी एक कप चाय लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।

"माॅ चाचा जी आ रहे हैं आज।" विराज ने चाय की एक चुश्की लेकर कहा__"और मुझे जल्द ही रेलवे स्टेशन जाना होगा उन्हें रिसीव करने के लिए।"

"क्या कह रहा है तू......अभय आ रहा है???" गौरी बुरी तरह चौंकी थी, बोली__"पर तुझे कैसे पता इसका?"

"गाॅव के एक दोस्त ने मुझे फोन पर इस बात की सूचना दी है माॅ।" विराज ने सहसा गंभीर होकर कहा__"उसने बताया कि अभय चाचा चुपचाप ही हमसे मिलने के लिए गाॅव से निकले हैं। उसने ये भी बताया कि पिछले दिन हवेली में कोई बातचीत हो गई थी और अभय चाचा बहुत गुस्से में भी थे।"

"ऐसी क्या बातचीत हुई होगी?" गौरी ने मानो खुद से ही सवाल किया था, फिर तुरंत ही बोली__"और क्या बताया तेरे उस दोस्त ने?"

"मुझे तो ऐसा लगता है माॅ कि कोई गंभीर बात है।" विराज ने कहा__"मेरा दोस्त कह रहा था कि बड़े पापा ने अभय चाचा के पीछे अपने आदमियों को लगाया हुआ है। इससे तो यही लगता है कि वो अभय चाचा के द्वारा हम तक पहुॅचना चाहते हैं।"

"ठीक कहता है तू।" गौरी ने कहा__"ऐसा ही होगा। और अगर कोई बात हो गई है तो उससे अभय और उसके बीवी बच्चों पर ख़तरा भी होगा। उन्हें पता नहीं है कि उनका बड़ा भाई कितना बड़ा कमीना है।"

"इसी लिए तो मैं उन्हें लेने जा रहा हूँ माॅ।" विराज ने कहा__"चाचा जी को तो शायद इस बात का अंदेशा भी न होगा कि उनके पीछे उनके बड़े भाई साहब ने अपने आदमी लगा रखे हैं।"

"अगर ये सच है कि अभय के पीछे तेरे बड़े पापा ने अपने आदमी लगा रखे हैं तो तू कैसे अभय को उन आदमियों की नज़रों से बचा कर लाएगा?" गौरी ने कहा__"तुझे तो पता भी नहीं है कि वहाँ पर किन जगहों पर वो आदमी मौजूद होकर अभय पर नज़र रखे हुए हैं?"

"आप फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने कहा__"मैं चाचा जी को सुरक्षित वहाँ से ले आऊॅगा और उन आदमियों को इसकी भनक भी नहीं लगेगी।"

"ठीक है बेटे।" गौरी ने सहसा फिक्रमंद हो कर कहा__"सम्हल कर जाना और अपने चाचा को सुरक्षित लेकर आना।"

"ऐसा ही होगा माॅ।" विराज ने कहा__"आप बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए। मैं उन्हें सुरक्षित ही लेकर आऊॅगा।"

ये कह विराज सोफे से उठ कर बाहर की तरफ चला गया। कुछ ही देर में उसकी कार हवा से बातें कर रही थी। लगभग पन्द्रह मिनट बाद उसकी कार मेन रोड से उतर कर एक तरफ को मुड़ गई। कुछ दूर जाने के बाद विराज ने कार को सड़क के किनारे लगा कर उसे बंद कर दिया और बाॅई कलाई पर बॅधी रिस्टवाच पर ज़रा बेचैनी से नज़र डाली। उसके बाद राइट साइड की तरफ बनी हुई सड़क की तरफ देखने लगा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे किसी के आने का इन्तज़ार कर रहा हो।

कुछ ही देर में उस सड़क से उसे चार आदमी आते हुए दिखे। उन चारो आदमियों में एक की वेशभूसा सामान्य थी किन्तु बाॅकी के तीनों आदमियों के जिस्म पर कुली की पोशाक थी। थोड़ी ही देर बाद वो चारो विराज की कार के ड्राइविंग डोर के पास आकर खड़े हो गए।

"आने में इतना समय क्यों लगा दिया तुम लोगों ने?" विराज ने कहा__"मैने तुम लोगों को फोन पर बोला था न कि मुझे एकदम तैयार होकर यहीं पर मिलना।"

"साहब वो रामू की बेटी की तबियत बहुत ख़राब थी।" एक आदमी ने कहा__"इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया था। उसके पास पैसे नहीं थे तो हम सबने पैसों की ब्यवस्था की फिर उसे अस्पताल ले गए। उसी में समय लग गया साहब।"

"क्या हुआ उसकी बेटी को?" विराज ने चौंकते हुए पूछा था।

"पता नहीं साहब।" उस ब्यक्ति ने कहा__"एक हप्ते से बुखार थी उसे। थोड़ी बहुत गोली दवाई करवाई थी रामू ने। लेकिन आज दोपहर उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया।"

"चलो कोई बात नहीं।" विराज ने कहा__"रामू को बोलो कि पैसों की चिन्ता न करे। उसकी बेटी के इलाज में जो भी पैसा लगेगा उसे हमारी कंपनी देगी। उसको बोलो कि वो अपनी बेटी का इलाज बेहतर तरीके से करवाए।"

"जी साहब।" उस आदमी ने खुश होकर कहा__"मैं अभी उसे बोलता हूँ।"

कहने के साथ ही उस आदमी ने अपनी सर्ट की पाॅकेट से एक छोटा सा कीपैड वाला फोन निकाला और उस पर रामू का नम्बर देख उसे लगा दिया। उसने रामू को सारी बात बताई। उसके बाद उसने फोन बंद कर दिया।

विराज ने कार की डैसबोर्ड पर रखा एक लिफाफा उठाया। उसमे से उसने जो चीज़ें निकाली वो कोई फोटोग्राफ्स थे।

"इनमें से एक एक फोटोग्राफ्स तुम चारो अपने पास रखो।" विराज ने कहा__"इस फोटो में जो आदमी है उसे अच्छी तरह देख लो। क्योंकि इस आदमी को बड़ी सावधानी से रेलवे स्टेशन के बाहर लाना है तुम लोगों को।"

"पर साहब इतनी भीड़ में हम उन्हें खोजेंगे कैसे?" एक आदमी ने कहा__"दूसरी बात क्या पता कौन से डिब्बे में होंगे वो?"

"वो जनरल डिब्बे में ही हैं।" विराज ने कहा__"इस लिए तुम लोग सिर्फ जनरल डिब्बे में ही उन्हें खोजोगे। कहीं और खोजने की ज़रूरत नहीं है। बाॅकी तो सब कुछ तुम्हें फोन पर समझा ही दिया था मैने।"

"ठीक है साहब।" दूसरे आदमी ने कहा__"हम सब इस बात का ख़याल रखेंगे कि उनके पीछे लगे हुए उन आदमियों को पता न चल सके कि वो जिनका पीछा कर रहे हैं वो उनकी आँखों के सामने से कैसे गायब हो गया??"

"वैरी गुड शंकर।" विराज ने कहा__"अभी ट्रेन के आने में समय है। तब तक मैं तुम्हें एक किराए की टैक्सी का इन्तजाम भी कर देता हूँ। तुम उन्हें रेलवे स्टेशन से बाहर लाओगे, एक आदमी बाहर टैक्सी में बैठा तुम लोगों का इन्तज़ार करेगा। जैसा कि अभी तुम में से एक आदमी को छोंड़ कर बाकी तीनो कुली के वेश में हो इस लिए तुम तीनो में से जिसे भी वो मिलें तो उनके पास जाकर बड़ी सावधानी से सिर्फ वही कहना जो फोन पर समझाया था।"

"ऐसा ही होगा साहब।" एक अन्य आदमी ने कहा__"आप बेफिक्र रहिए।"

"अच्छी बात है।" विराज ने कहा__"चलो बैठो सब, हमें निकलना भी है अब।"

विराज के कहने पर चारो आदमी खुशी से बैठ गए जबकि विराज ने कार को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।

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मुम्बई जाने वाली ट्रेन के उस जनरल कोच में भीड़ तो इतनी नहीं थी किन्तु नाम तो जनरल ही था। कोई किसी को भी बैठने के लिए सीट देने को तैयार नहीं था। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो ज़बरदस्ती लड़ झगड़ कर अपने बैठने के लिए सीट का जुगाड़ कर ही लेते हैं। यहाँ प्यार इज्जत या अनुनय विनय करने वाले को कोई सीट नहीं देता और ना ही सीट के ज़रा से भी हिस्से में कोई बैठने देता है। जनरल कोच में तो ऐसा है कि अगर आप गाली गलौच या लड़ना जानते हैं या फिर तुरंत ही किसी भी ब्यक्ति पर हावी हो जाना जानते हैं तो बेहतर है। क्योंकि उससे आपको जल्द ही कहीं न कहीं सीट मिल जाती है बैठने के लिए। लेकिन उसमें भी शर्त ये होती है कि आपके पास अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ कुछ लोगों का बैकप होना ज़रूरी है वरना अगर आप अकेले हैं और अकेले ही तोपसिंह बनने की कोशिश कर रहे हैं तो समझिये आपका बुरी तरह पिट जाना तय है।

अभय सिंह गरम मिज़ाज का आदमी था। उसे कब किस बात पर क्रोध आ जाए ये बात वो खुद ही आज तक जान नहीं पाया था। मगर आज उस पर कोई क्रोध हावी न हुआ था। उसने सीट के लिए किसी से कुछ नहीं कहा था, बल्कि हाँथ में एक छोटा सा थैला लिए वह दरवाजे के पास ही एक तरफ कभी खड़ा हो जाता तो कभी वहीं पर बैठ जाता। सारी रात ऐसे ही निकल गई थी उसकी।

ट्रेन अपने नियमित समय से चार घंटे लेट थी। ये तो भारतीय रेलवे की कोई नई बात नहीं थी किन्तु इस सबसे यात्रियों को जो परेशानी होती है उसका कोई कुछ नहीं कर सकता, ये एक सबसे बड़ी समस्या है। यद्यपि अभय को समय का आभास ही इतना नहीं हुआ था क्योंकि वो तो अपने परिवार और अपने बीवी बच्चों के बारे में ही सोचता रहा था। रह रह कर उसके मन में ये विचार उठता कि उसने अपनी देवी समान भाभी के साथ अच्छा नहीं किया। उसे अपने भतीजे का भी ख़याल आता कि कैसे वह उसे हमेशा इज्जत व सम्मान देता था। परिवार में वही एक लड़का था जिस पर संस्कार और शिष्टाचार कूट कूट कर भरे हुए थे। उसे अपने इस भतीजे पर बड़ा स्नेह और फक्र भी होता था। उसकी भतीजी निधि उसकी लाडली थी। वह परिवार में सबसे ज्यादा निधि को ही प्यार और स्नेह देता था। सब जानते थे कि अभय गुस्सैल स्वभाव का था किन्तु उसका गुस्सा कपूर की तरह उस वक्त काफूर हो जाता जब उसकी लाडली भतीजी अपनी चंचल व नटखट बातों से उसे पहले तो मनाती फिर खुद ही रूठ जाती उससे। उसका अपनी किसी भी बात के अंत में 'हाँ नहीं तो' जोड़ देना इतना मधुर और हृदय को छू लेने वाला होता कि अभय का सारा गुस्सा पल में दूर हो जाता और वह अपनी लाडली भतीजी को खूब प्यार करता। परिवार की बाॅकी दो भतीजियाॅ उसके पास नहीं आती थी, क्यों कि वो सब उससे डरती थी।

अभय का दिलो दिमाग़ गुज़री हुई बातों को सोच सोच कर बुरी तरह दुखी होता और उसकी आँखें भर आतीं। वह अपने मन में कई तरह के संकल्प लेता हुआ खुद के मन को हल्का करने की कोशिश करता रहा था।

आख़िर वह समय भी आ ही गया जब ट्रेन मुम्बई के कुर्ला स्टेशन पर पहुॅची। अभय अपनी सोचों के अथाह समुद्र से बाहर आया और उठ कर गेट की तरफ चल दिया। काफी भीड़ थी अंदर, लोग जल्द से जल्द नीचे उतरने के लिए जैसे मरे जा रहे थे। अभय खुद भी लोगों के बीच धक्के खाते हुए गेट की तरफ आ रहा था। हलाॅकि खड़ा वह गेट के थोड़ा पास ही था किन्तु वह इसका क्या करता कि पीछे से आँधी तूफान बन कर आते हुए लोग बार बार उसे पीछे धकेल कर खुद आगे निकल जाते थे। वह बेचारा बेज़ुबान सा हो गया था। कदाचित् उसकी मानसिक स्थित उस वक्त ऐसी नहीं थी कि वह लोगों के द्वारा खुद को बार बार पीछे धकेल दिये जाने पर कोई प्रतिक्रिया कर सके।

कुछ देर बाद आख़िर वह गेट के पास पहुॅचा और ट्रेन से नीचे उतर गया। प्लेटफार्म पर आदमी ही आदमी नज़र आए उसे। उसे समझ न आया कि किस तरफ जाए? इतने बड़े मुम्बई शहर में वह अपनी भाभी व उनके दोनो बच्चों को कहाँ और कैसे ढूॅढ़ेगा? उसका तो खुद का कहीं ठिकाना नहीं था। उसे अब महसूस हुआ कि वो कितना असहाय और थका हुआ लग रहा है। भूख और प्यास ने जैसे उस पर अब अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। वह अपने साथ खाने पीने की कोई चीज़ लेकर नहीं चला था। कल अपने दोस्त के घर से खाकर ही चला था। हलाॅकि इतने बड़े सफर के लिए उसके दोस्त की बीवी ने खाने का एक टिफिन तैयार कर दिया था किन्तु अभय ने जाने क्या सोच कर मना कर दिया था।

ट्रेन से उतर कर अभय ने उसी तरफ चलने के लिए अपने कदम बढ़ाए जिस तरफ सारे लोग जा रहे थे। अभी वह कुछ कदम ही चला था कि एक कुली उसके पास आया और उसके अत्यंत निकट आकर बड़े ही रहस्यमय किन्तु संतुलित स्वर में बोला__"साहब जी! आपके भतीजे विराज जी आपको लाने के लिए हमें भेजे हैं। कृपया आप मेरे साथ जल्दी चलें।"

अभय सिंह को पहले तो कुछ समझ न आया फिर जब उसके विवेक ने काम किया तो कुली की इस बात को समझ कर वह बुरी तरह चौंका। उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव नाच उठे। उसके मुख से हैरत में डूबा हुआ स्वर निकला__"क् कौन हो तुम? और कहाँ है मेरा भतीजा?"

"साहब जी अभी आप ज्यादा कुछ न बोलिए।" उस कुली ने कहा__"बस मेरे साथ चलिए और अपना ये बैग मुझे दीजिए। और हाँ, आप चेहरे से ऐसा ही दर्शाइये जैसे आप अपना सामान कुली को देकर उसके साथ बाहर जा रहे हैं। इधर उधर कहीं मत देखिएगा।"

"अरे...ऐसे कैसे भाई?" अभय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है उसके साथ__"कौन हो तुम और ये सब क्या है?"

"ओह साहब जी समझने की कोशिश कीजिए।" कुली ने चिन्तित स्वर में कहा__"यहाँ पर ख़तरा है आपके लिए। इस लिए जल्दी से चलिए मेरे साथ। स्टेशन से बाहर आपके भतीजे विराज जी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

अभय के दिलो दिमाग़ में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। उसके मन में विचार उठा कि ये आदमी मुझे जानता है और मेरे लिए ही आया है, वरना दूसरे किसी आदमी को ये सब भला कैसे पता होता? दूसरी बात ये विराज का नाम ले रहा है और कह रहा है कि मेरा भतीजा स्टेशन से बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन ख़तरा किस बात का है यहाँ??

अभय को पूरा मामला तो समझ न आया किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि अपना बैग उस कुली को दे दिया। कुली उसका बैग लेकर तुरंत ही पलटा और स्टेशन के बाहर की तरफ चल दिया। उसके पीछे पीछे अभय भी चल दिया। दिमाग़ में कई तरह के विचारों का अंधड़ सा मचा हुआ था उसके।

स्टेशन से बाहर आकर वो कुली अभय को लिए एक टेक्सी के पास पहुॅचा। टैक्सी के अंदर बैग रख कर कुली ने अभय को टैक्सी के अंदर बैठने को कहा। लेकिन अभय न बैठा, उसने सशंक भाव से देखा कुली की तरफ। तब कुली ने एक तरफ हाँथ का इशारा किया। अभय ने उस तरफ देखा तो चौंक गया, क्योंकि जिस तरफ कुली ने इशारा किया था उस तरफ उसका भतीजा विराज खड़ा था। विराज ने दूर से ही टैक्सी में बैठ जाने के लिए इशारा किया।

अभय अपने भतीजे को देख खुश हो गया और उसने राहत की सास भी ली। वह जल्द ही टैक्सी में बैठ गया। टैक्सी के अंदर चार आदमी थे। अभय के बैठते ही टैक्सी तुरंत आगे बढ़ गई। अभय को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे ये सब पहले से ही प्लान बनाया हुआ था। किन्तु उसे ये समझ न आया कि इस सबकी क्या ज़रूरत थी? आख़िर ये क्या चक्कर है?

"तुम सब लोग कौन हो भाई?" टैक्सी के कुछ दूर जाते ही अभय ने पूछा__"और ये सब क्या चक्कर है? मेरा मतलब है कि मुझे इस तरह रहस्यमय तरीके से क्यों ले जाया जा रहा है?"

"साहब जी ये तो हम भी नहीं जानते कि क्या चक्कर है?" कुली बने शंकर ने कहा__"हम तो वही कर रहे हैं जो करने के लिए विराज साहब ने हमे आदेश दिया था।"

अभय ये सुन कर मन ही मन चौंका कि ये विराज को साहब क्यों कह रहा है? किन्तु फिर प्रत्यक्ष में बोला__"ओह, तो अभी हम कहाँ चल रहे हैं? और मेरा भतीजा विराज कहाँ गया? वो इस टैक्सी में क्यों नहीं आया?"

"वो अपनी कार में हैं साहब जी।" शंकर ने कहा__"वो हमें आगे एक जगह मिलेंगे।"

"अ अपनी..क..कार में?" अभय लगभग उछल ही पड़ा था। उसे इस बात ने उछाल दिया कि उसके भतीजे के पास कार कहाँ से आ गई? वह तो खुद भी यही समझ रहा था कि विराज कोई मामूली सा काम करता होगा यहाँ।

"जी साहब जी।" उधर अभय के मनोभावों से अंजान शंकर ने कहा__"आगे एक जगह पर हमें विराज साहब मिल जाएॅगे। फिर आपको उनके साथ उनकी कार में बैठा कर हम इस टैक्सी को वापस कर देंगे जहाँ से लाए थे।"

"क्या मतलब?" अभय चौंका, झटके पर झटके खाते हुए पूछा__"कहाँ से लाए थे इसे? क्या ये टैक्सी तुम्हारी नहीं है?"

"नहीं साहब जी, ये टैक्सी तो हमने किराए पर ली थी।" शंकर ने कहा__"विराज साहब ने ऐसा ही कहा था। बाॅकी सारी बातें वही बताएॅगे आपको।"

अभय उसकी बात सुनकर चुप रह गया। उसे समझ में आ चुका था कि सारी बातें विराज से ही पता चलेंगी। क्योंकि इन्हें ज्यादा कुछ पता नहीं है। शायद विराज ने इन्हें नहीं बताया था। पर ये लोग विराज को साहब क्यों कह रहे हैं? क्या वो इन लोगों का साहब है? अभय का दिमाग़ जैसे जाम सा हो गया था।

अभय को ये बात हजम नहीं हो रही थी। लेकिन उसने फिर कुछ न कहा। टैक्सी तेज़ रफ्तार से कई सारे रास्तों में इधर उधर चलती रही। कुछ ही देर में टैक्सी एक जगह पहुॅच कर रुक गई। टैक्सी के रुकते ही शंकर नीचे उतरा और पीछे का गेट खोल कर अभय को उतरने का संकेत दिया। अभय उसके संकेत पर टैक्सी से उतर आया। अभी वह टैक्सी से उतर कर ज़मीन पर खड़ा ही हुआ था कि तभी।

"प्रणाम चाचा जी।" अभय के उतरते ही एक तरफ से आकर विराज ने अभय के पैर छूकर कहा__"माफ़ कीजिएगा आपको इस तरह यहाँ लाना पड़ा।"

"अरे राज तुम?? सदा ही खुश रहो।" अभय ने कहा और एकाएक ही भावना में बह कर उसने विराज को अपने गले से लगा लिया, फिर बोला__"आ मेरे गले लग जा मेरा शेर पुत्तर। कदाचित् मेरे दिल को ठंडक मिल जाए।"

अभय की आँखों में आँसू छलक आए थे। उसने बड़े ज़ोर से विराज को भींच लिया था। विराज को भी आज अपने चाचा जी के इस तरह गले लगने से बड़ा सुकून मिल रहा था। आज मुद्दतों बाद कोई अपना इस तरह मिला था। शिकवे गिले तो बहुत थे लेकिन सब कुछ भूल गया था विराज। कुछ देर ऐसे ही दोनो गले मिले रहे। फिर अलग हुए। अभय अपने दोनो हाँथों से विराज का सुंदर सा चेहरा सहला कर उसके शरीर के बाॅकी हिस्सों को देखने लगा।

"कितना दुबला हो गया है मेरा बेटा।" अभय ने भर्राए स्वर में कहा__"पगले अपना ठीक से ख़याल क्यों नहीं रखता है तू? और भ भाभी कैसी हैं...और...और वो मेरी लाडली गुड़िया कैसी है..बता मुझे??"

"सब लोग एकदम ठीक हैं चाचा जी।" विराज ने कहा__"चलिए हम वहीं चलते हैं।"

"हाँ हाँ चल राज।" अभय ने तुरंत ही कहा__"मुझे जल्दी से ले चल उनके पास। मुझे भाभी के पास ले चल...मुझे उनसे....।"

वाक्य अधूरा रह गया अभय सिंह का..क्यों कि दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तीब्रता से जज्बातों का उबाल सा आ गया था। जिसकी वजह से उसका गला भारी हो गया और उसके मुख से अल्फाज़ न निकल सके।
 
विराज अपने साथ अभय को लिए कुछ ही दूरी पर खड़ी अपनी कार के पास पहुॅचा। फिर उसने कार का दूसरी तरफ वाला गेट खोल कर अंदर अभय को बैठाया। इस बीच शंकर ने अभय का बैग विराज की कार के अंदर रख दिया था। विराज खुद ड्राइविंग डोर खोल कर ड्राइविंग शीट पर बैठ गया। खिड़की के पास आ गए शंकर से उसने कहा__"उस टैक्सी को वापस कर देना। और ये पैसे रामू को दे देना, और ये तुम सब के लिए।"

विराज ने कार में ही रखे एक छोटे से ब्रीफकेस को खोल कर उसमे से दो हज़ार के नोटों की एक गड्डी शंकर को पकड़ाया था जो रामू की बेटी के इलाज़ के लिए था बाॅकी अलग से दो सौ के नोटों की एक गड्डी उन चारों के लिए। पैसे लेकर चारो ही खुशी खुशी वहाँ से चले गए।

विराज ने कार स्टार्ट की और आगे चल दिया। अभय ये सब देख कर हैरान भी था और खुश भी।

"ये सब क्या चक्कर था राज?" अभय ने पूछा__"उन लोगों ने बताया कि ये सब करने के लिए उन्हें तुमने कहा था, लेकिन इस सबकी क्या ज़रूरत थी भला?"

"ऐसा करना ज़रूरी था चाचा जी।" विराज ने ड्राइविंग करते हुए कहा__"क्योंकि आपके पीछे कुछ ऐसे आदमी लगे थे जो आपकी निगरानी के लिए लगाए गए थे, बड़े पापा जी के द्वारा।"

"क क्या मतलब??" अभय बुरी तरह चौंका था, बोला__"बड़े भइया ने अपने आदमी मेरे पीछे लगा रखे थे? लेकिन क्यों और कैसे? और...और तुझे कैसे पता ये सब?"

"मुझे सबका पता रहता है चाचा जी।" विराज ने कहा__"वक्त और हालात ने सब कुछ सिखा दिया है आपके इस बेटे को। कल जब आप गाॅव से चले थे तब आपके वहाँ से चलने की सूचना मुझे मेरे एक दोस्त ने फोन पर दी थी। उसने बताया था कि हवेली में कुछ बातचीत हो गई थी और आप हम लोगों से मिलने के लिए मुम्बई निकल चुके हैं। उसने ये भी बताया कि आपके पीछे बड़े पापा ने अपने आदमी भी लगा दिये हैं जो यहीं मुम्बई में हमारी खोज में न जाने कब से मौजूद थे।"

"ओह तो भइया ने ऐसा भी कर दिया मेरे पीछे?" अभय का चेहरा एकाएक सुलगता सा प्रतीत हुआ__"खैर कोई बात नहीं, उनसे उम्मींद भी क्या की जा सकती है? ख़ैर, तो तुम्हें इस सबकी जानकारी तुम्हारे दोस्त ने दी थी फोन के माध्यम से?"

"जी चाचा जी।" विराज ने कहा__"मुझे लगा कहीं आप पर किसी प्रकार का कोई ख़तरा न हो इस लिए मैने ऐसा किया। मैं खुद स्टेशन के अंदर नहीं गया क्योंकि संभव है बड़े पापा के आदमियों की नज़र मुझ पर पड़ जाती, उसके बाद उनके लिए हर काम आसान हो जाता। इस लिए मैंने उन सबसे बचने का ये उपाय किया। कुली के वेश में मेरे आदमी आपको सुरक्षित स्टेशन से बाहर ले आएॅगे। उसके बाद आपको टैक्सी में बैठा कर मेरे आदमी शहर में तब तक इधर उधर सड़कों में घूमते जब तक कि उन्हें ये एहसास न हो जाए कि किसी के द्वारा उनका पीछा अब नहीं किया जा रहा है। कहने का मतलब ये कि अगर बड़े पापा के आदमी किसी तरह आपको देख लिये हों और आपका पीछा करने लगे हों तो मेरे आदमी टैक्सी को तेज़ रफ्तार में इधर उधर घुमा कर उन आदमियों को गोली दे देंगे। उसके बाद मेरे आदमी सीधा वहाँ आ जाते जहाँ पर मैंने उन्हें अपने पास आने को बोला था। यहाँ से मैं आपको अपनी कार में बैठा कर ले जाता। बड़े पापा के आदमी ढूॅढ़ते ही रह जाते उस टैक्सी को।"

"ओह तो ये प्लान था तुम्हारा?" अभय ये सोच सोच कर हैरान था कि उसका इतना संस्कारी और भोला भाला भतीजा आज इतना कुछ सोचने लगा है, बोला__"बहुत अच्छा किया तुमने राज। मैं तुम्हारी इस समझदारी से बहुत खुश हूँ।" अभय कुछ पल रुका और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर दुख के भाव आ गए, बोला__" कितना ग़लत था मैं....अपने क्रोध और अविवेक के कारण कभी नहीं सोच सका कि वास्तव में क्या सही था क्या ग़लत? अपने देवता जैसे विजय भइया और देवी जैसी अपनी गौरी भाभी पर शक किया और उनसे ये भी न जानने की कोशिश की कभी कि उन पर लगाए गए आरोप सच भी हैं या ये सब आरोप किसी साजिश के तहत उन पर थोपे गए थे? राज बेटे, अपने देवी देवता जैसे भईया भाभी के साथ मैने ये अच्छा नहीं किया। भगवान मुझे इस सबके लिए कभी माफ़ नहीं करेगा।"

ये कहने के साथ ही अभय की आवाज़ भर्रा गई। उसका चेहरा दुख और ग्लानिवश बिगड़ गया। उसकी आँखों से आँसू बह चले। विराज अपने चाचा जी के इस रूप को देख कर खुद भी दुखी हो गया था। वह जानता था कि उसके चाचा चाची का कहीं कोई दोष नहीं था। उनका अपराध तो सिर्फ इतना था कि उन्हें जो कुछ बताया और दिखाया गया था उसी को उन्होंने सच मान लिया था। अपने क्रोध की वजह से चाचा ने कभी ये जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि सच्चाई वास्तव में क्या थी?

खैर कुछ ही समय में विराज अपने घर पहुॅच गया। एक बड़े से मेन गेट पर दो गार्ड खड़े थे। विराज की कार देखते ही दोनो गार्ड्स ने मेन गेट खोला। उसके बाद विराज ने कार को अंदर की तरफ बढ़ा दिया। लम्बे चौड़े लान से चलते हुए उसकी कार पोर्च में आकर खड़ी हो गई। दोनो चाचा भतीजा अपनी अपनी तरफ का गुट खोल कर नीचे उतरे। अभय की नज़र जब सामने बड़े से बॅगला टाइप घर पर पड़ी तो वह आश्चर्यचकित सा होकर देखने लगा उसे। इधर उधर दृष्टि घुमा कर देखने लगा हर चीज़ों को।

"राज बेटा ये कहाँ आ गए हम?" अभय ने अजीब भाव से पूॅछा__"ये तो किसी बहुत ही बड़े आदमी का बॅगला लगता है।"

"आपने बिलकुल सही कहा चाचा जी ये किसी बहुत बड़े आदमी का ही बॅगला है लेकिन।" विराज ने कहा__"लेकिन अब ये बॅगला और ये सब प्रापर्टी आपके इस राज बेटे की ही है।"

"क् क्याऽऽ?????" अभय बुरी तरह चौंका था। आश्चर्य और अविश्वास से उसका मुह खुला का खुला रह गया, बोला__"ये ये सब तेरा है?? लेकिन ये सब तेरा कैसे हो गया राज? क्या तू सच कह रहा है?"

"चलिए अंदर चलते हैं।" विराज ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा__" माॅ और गुड़िया आपका इन्तज़ार कर रही हैं।"

अभय विराज की इस बात पर उसके साथ बॅगले के अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि कोई तेज़ी से आया और एक झटके से उससे लिपट गया। अभय इस सबसे पहले तो हड़बड़ाया फिर जब उसकी नज़र लिपटने वाले पर पड़ी तो अनायास ही मुस्कुरा उठा वह।

"अरे ये तो मेरी लाडली गुड़िया है।" अभय ने निधि के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा__"राज, ये मेरी गुड़िया है, ये...।"

अभय का गला भर आया, उसके जज्बात उसके काबू में न रहे। उसने निधि को अपने से से छुपका लिया और रो पड़ा वह। उसे इस ख़याल ने बुरी तरह रुला दिया कि आज मुद्दतों के बाद उसने अपनी गुड़िया पर अपना प्यार लुटाने को मिला है। इसके पहले तो वह जैसे पत्थर का बन गया था। उसके दिलो दिमाग़ में इन सबके लिए क्रोध और घृणा भर दी गई थी। पहले जब उसकी भाभी और गुड़िया खेतों पर बने मकान के एक कमरे में रहती थीं तो वह किसी किसी दिन जाता था लेकिन फिर जैसे ही उसे उस सबका ख़याल आता वैसे ही उसका मन क्रोध और गुस्से से भर जाता और वह पत्थर का बन कर वापस चला आता। अपनी लाडली को प्यार व स्नेह देने के लिए वह तड़प जाता लेकिन आगे बढ़ने से हमेशा ही खुद को रोंक लेता था वह।

"आप आ गए न चाचू" निधि ने रोते हुए कहा__"मैं जानती थी कि आप मेरे बिना ज्यादा दिन नहीं रह सकेंगे वहाँ पर। लेकिन आने में इतनी देर क्यों कर दी आपने? जाइये आपसे बात नहीं करना मुझे, हाँ नहीं तो।"

ये कह कर निधि अपने चाचू से अलग हो गई और रूठ कर एक तरफ को मुह कर लिया। अभय को लगा कि उसका हृदय फट जाएगा। अपनी गुड़िया के मुख से बस यही सुनने के लिए तो तरस गया था वह। 'हाँ नहीं तो' जाने इन शब्दों में ऐसा क्या था कि सुन कर अभय को लगा कि इन शब्दों को सुनने के बाद इस वक्त अगर उसे मृत्यु भी आ जाए तो उसे कोई ग़म न होगा।

"तू रूठ जाएगी तो मैं समझूॅगा कि मुझसे ये सारा संसार रूठ गया मेरी बच्ची।" अभय ने तड़प कर कहा__"यहाँ तक कि वो ईश्वर भी। और फिर उसके बाद मेरे लिए एक पल भी जीने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।"

"न नहीं चाचू नहीं।" निधि तुरंत ही अभय से लिपट गई। उसकी आँखों से आँसू बह चले। रोते हुए बोली__"प्लीज ऐसा मत कहिए। आप तो मेरे सबसे अच्छे चाचू हैं। मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ। और हाँ आज के बाद ऐसा कभी मत बोलियेगा नहीं तो सच में मैं आपसे बात नहीं करूॅगी, हाँ नहीं तो।"

जाने कितनी ही देर तक अभय अपनी लाडली को स्नेह और प्यार के वशीभूत हुए खुद से छुपकाए रहा। उसके सिर पर प्यार से हाँथ फेरता रहा। विराज ये सब नम आँखों से देखता रहा।

"अगर अपनी लाडली भतीजी से मिलना जुलना हो गया हो तो अपनी भाभी से भी मिल लो अभय।" सहसा गौरी की ये आवाज़ गूॅजी थी वहाँ। वह काफी देर से बॅगले के मुख्य दरवाजे पर खड़ी ये सब देख रही थी। उसकी आँखों में भी आँसू थे।

गौरी की इस आवाज़ को सुन कर अभय और निधि एक दूसरे से अलग हुए। अभय ने पलट कर गौरी की तरफ देखा। जो उसी की तरफ करुण भाव से देख रही थी। उसकी आँखों में अपने लिए वही आदर वही स्नेह देख कर अभय का दिलो दिमाग़ अपराध बोझ से भर गया। उसे खुद पर इतनी शर्म और ग्लानी महसूस हुई कि उसे लगा ये धरती फटे और वह उसमें रसातल तक समाता चला जाए। दिलो दिमाग़ में भावनाओं का तेज़ तूफान चलने लगा। हृदय की गति तीब्र हो गई। उसे अपनी जगह पर खड़े रहना मुश्किल सा प्रतीत होने लगा।
 
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