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Guest
रात के 2 बज रहे थे पर मेरी आंखो में नींद नहीं थी....चाची मम्मी के साथ उनके रूम मै थी जबकि आरोही और सलोनी अपने अपने रूम मै....नवीन चाचा को सुबह कुछ तैयारी करनी थी इसलिए वो खाना खा कर सीधा अपने अपार्टमेंट मै जा चुके थे....मै करवट बदल बदल कर बुरी तरह परेशान हो चुका था इसलिए अपने बिस्तर से उठ किचन की तरफ बढ़ जाता हूं...
पूरे घर सन्नाटे मै डूबा हुआ था लेकिन बाहर सर्वेंट क्वार्टर से कुछ आवाजें जरूर आ रही थी....मैंने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो वहां ड्राइवर काका और महाराज आग जला कर बैठे बाते कर रहे थे...
नींद मेरी आंखो मै बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए मैं भी घर से बाहर उन लोगो के पास पहुंच गया....
मुझे वहां देखते ही ड्राइवर काका मुझे कहने लगे...
"" क्या हुआ काली बेटा नींद नहीं आ रही क्या...?? आज जो कुछ भी हुआ वो हमारे लिए भी किसी बुरे सपने की तरह ही था जो की सच हो गया ""
"" बड़ा अजीब लग रहा है काका....पहले पापा के साथ जो हादसा हुआ उसके बाद मम्मी कि तबीयत बिगाड़ना....रोने का मन कर रहा है लेकिन रो भी नहीं पा रहा हूं मैं....आप लोगो को बाहर देखा तो सोचा आप लोगो से थोड़ी बात कर लूं ताकि मेरा मन कुछ हल्का हो जाए...""
महाराज मेरे लिए एक स्टूल ले आए थे जब तक और मेरे पास रख कर बोले...
"" बैठो काली बेटा....साहब के जाने के बाद आपके परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ हम गरीबों के परिवारों की जिम्मेदारी भी आप पर आ गई है...""
"" आप लोग किसी बात की चिंता मत करो...जैसा अब तक चलता आया वैसा ही हमेशा चलता रहेगा....आप लोगो को किसी चीज की जरूरत हो तो सीधा मेरे पास आ जाना मुझ से जो कुछ भी हो सकेगा में जरूर करूंगा...""
ये सब कह कर मै बिल्कुल शांत हो गया और जलती हुई आग की लपटों को गौर से देखने लगा...मै अपलक उन लपटों को निहारे जा रहा था , ना जाने आंसू की एक लकीर आंखो का बांध तोड़ कर गालों पर बह चली....
मै काफी देर बिना कुछ बोले ऐसे ही बैठा रहा तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा....
"" क्या हुआ काली ?? तू अभी तक सोया नहीं....""
सलोनी मेरे पास घुटने मोड़ कर बैठ गई और मेरे बालों मै प्यार से हाथ फेरते हुए कहने लगी...
"" चल अब अंदर....बाहर काफी ठंड है देख मै शॉल भी पहन कर नहीं आई....""
मै बिना कुछ बोले वहां से उठा और सलोनी मेरा हाथ पकड़ कर घर के अंदर चलने लगी...
मेरे बेड पर बैठते हुए सलोनी ने कहा..
"" क्या बात है काली...तू मुझ से क्या छिपा रहा है....इतना परेशान तुझे मैंने कभी नहीं देखा....""
एक ठंडी सांस लेते हुए मैंने दादा जी के उस लेटर की तरफ इशारा किया और उसे पढ़ने की बोल कर वहीं सर पकड़ कर बैठ गया....
सलोनी ने जल्दी ही वो लेटर पढ लिया और वो फोटो मुझे दिखाती हुई बोली...
"" काली ये तो वही वर्ल्ड फैमस अंकोरवाट मंदिर है ना....अगर यहां जाने का मन बना रहा है तो मै भी तेरे साथ चलूंगी....""
"" हां सलोनी....तू भी साथ चलेगी और मम्मी और आरोही भी.....मुझे नहीं पता क्या कुछ होने वाला है लेकिन इस लेटर से इतना तो पता चल ही जाता है कि दादा जी चाहते थे कि हम जीवन के हर पल को जिएं ना की पैसों के पीछे या मोह माया मै फस कर अपना जीवन ख़तम कर दे...""
मेरी बात सुनकर सलोनी सोच मै डूब गई... और कुछ सोचते उसने बोलना शुरू किया....
"" पापा के तीसरे तक हम कहीं नहीं जा सकते....और मम्मी की भी तबीयत ठीक नहीं है क्या मम्मी हमारे साथ चलने को राजी हो पाएगी..?""
मैंने सलोनी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा...,
"" मम्मी मेरी बात कभी नहीं टालेगी.... लेकिन पता नहीं आरोही साथ चलेगी या नहीं उसको मेरा साथ कभी पसंद नहीं आया हमेशा मेरी वजह से वो खुद को शर्मिंदा महसूस करती है....मुझे नहीं लगता वो हमारे साथ चलेगी""
सलोनी ने मेरा हाथ अपने कंधे से उतारा और उसको मजबूती से थामते हुए कहने लगी...,
"" शायद तू जानता नहीं है काली कि पापा के जाने के दुख के साथ साथ एक बड़ा दुख भी आरोही को खाए जा रहा है.... जब हम शाम को गरीबों को खाना खिलाने गए थे तब वो सभी के पैरों को छू छू कर तुम्हारे साथ किए अन्याय का प्रायश्चित कर रही थी.... घर आने के बाद भी वो लगातार रोए जा रही थी और बोले जा रही थी कि पापा ने उसे अनजाने में ही पाप का भागी बना दिया.... वो तो यहां तक कह रही थी कि वो अपनी जान दे देगी अगर तूने उसे माफ नहीं किया तो"""
सलोनी की बात सुनकर मेरा दिमाग फट पड़ा..... आरोही ने कभी मुझ से सीधे मुंह बात नहीं करी.... हमेशा नफरत करती रही लेकिन पापा के मन की बात जानकर वो खुद को दोषी समझ रही है.... आत्मग्लानि... आत्महत्या की पहली सीढ़ी होती है, कहीं आरोही कुछ करने का सोच तो नहीं रही....
मन मै इस तरह के ख्याल आते ही मै तुरंत बिस्तर से उठ बैठा और आरोही के कमरे की तरफ भागा.....
आरोही के रूम का दरवाजा खुला था...शायद सलोनी मुझे बुलाने आते वक़्त दरवाजा बंद करना भूल गई थी....
मैंने देखा आरोही अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी लेकिन उसने रजाई नहीं ओढ़ रखी थी....इतने मै सलोनी भी मेरे साथ साथ दरवाजे पर ही खड़ी हो गई और धीमी आवाज मै मुझ से कहने लगी....
"" में जब तुम्हे बुलाने आई थी तब उसने रजाई ओढ़ रखी थी.....है भगवान ये क्या किया इसने....?????""
इतना बोलकर सलोनी तेजी से आरोही की तरफ लपकी और उसे जोर जोर से हिलाने लगी....
"" आरू उठ....आरु उठ.....ये क्या किया तूने उठ""
बुरी तरह से बौखलाई हुई सलोनी को देख मैं सन्न रह गया.... मेरे मुंह से बस इतना ही निकल पाया....
"" क..क्या या हुआ सलोनी..???""
सलोनी ने रोते हुए एक तरफ इशारा किया जहां स्लीपिंग पिल्स की पूरी शीशी खाली लुढ़की हुई थी.....
शीशी को देखते ही मुझे एक पल नहीं लगा समझने मै की आरोही ने क्या किया....
बिना देर किए मैंने आरोही को अपनी गोद मै उठाया और घर के बाहर खड़ी कार की तरफ भागा.... सलोनी भी मेरे पीछे पीछे बदहवास हालत मै भागती हुई आई....
पूरे घर सन्नाटे मै डूबा हुआ था लेकिन बाहर सर्वेंट क्वार्टर से कुछ आवाजें जरूर आ रही थी....मैंने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो वहां ड्राइवर काका और महाराज आग जला कर बैठे बाते कर रहे थे...
नींद मेरी आंखो मै बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए मैं भी घर से बाहर उन लोगो के पास पहुंच गया....
मुझे वहां देखते ही ड्राइवर काका मुझे कहने लगे...
"" क्या हुआ काली बेटा नींद नहीं आ रही क्या...?? आज जो कुछ भी हुआ वो हमारे लिए भी किसी बुरे सपने की तरह ही था जो की सच हो गया ""
"" बड़ा अजीब लग रहा है काका....पहले पापा के साथ जो हादसा हुआ उसके बाद मम्मी कि तबीयत बिगाड़ना....रोने का मन कर रहा है लेकिन रो भी नहीं पा रहा हूं मैं....आप लोगो को बाहर देखा तो सोचा आप लोगो से थोड़ी बात कर लूं ताकि मेरा मन कुछ हल्का हो जाए...""
महाराज मेरे लिए एक स्टूल ले आए थे जब तक और मेरे पास रख कर बोले...
"" बैठो काली बेटा....साहब के जाने के बाद आपके परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ हम गरीबों के परिवारों की जिम्मेदारी भी आप पर आ गई है...""
"" आप लोग किसी बात की चिंता मत करो...जैसा अब तक चलता आया वैसा ही हमेशा चलता रहेगा....आप लोगो को किसी चीज की जरूरत हो तो सीधा मेरे पास आ जाना मुझ से जो कुछ भी हो सकेगा में जरूर करूंगा...""
ये सब कह कर मै बिल्कुल शांत हो गया और जलती हुई आग की लपटों को गौर से देखने लगा...मै अपलक उन लपटों को निहारे जा रहा था , ना जाने आंसू की एक लकीर आंखो का बांध तोड़ कर गालों पर बह चली....
मै काफी देर बिना कुछ बोले ऐसे ही बैठा रहा तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा....
"" क्या हुआ काली ?? तू अभी तक सोया नहीं....""
सलोनी मेरे पास घुटने मोड़ कर बैठ गई और मेरे बालों मै प्यार से हाथ फेरते हुए कहने लगी...
"" चल अब अंदर....बाहर काफी ठंड है देख मै शॉल भी पहन कर नहीं आई....""
मै बिना कुछ बोले वहां से उठा और सलोनी मेरा हाथ पकड़ कर घर के अंदर चलने लगी...
मेरे बेड पर बैठते हुए सलोनी ने कहा..
"" क्या बात है काली...तू मुझ से क्या छिपा रहा है....इतना परेशान तुझे मैंने कभी नहीं देखा....""
एक ठंडी सांस लेते हुए मैंने दादा जी के उस लेटर की तरफ इशारा किया और उसे पढ़ने की बोल कर वहीं सर पकड़ कर बैठ गया....
सलोनी ने जल्दी ही वो लेटर पढ लिया और वो फोटो मुझे दिखाती हुई बोली...
"" काली ये तो वही वर्ल्ड फैमस अंकोरवाट मंदिर है ना....अगर यहां जाने का मन बना रहा है तो मै भी तेरे साथ चलूंगी....""
"" हां सलोनी....तू भी साथ चलेगी और मम्मी और आरोही भी.....मुझे नहीं पता क्या कुछ होने वाला है लेकिन इस लेटर से इतना तो पता चल ही जाता है कि दादा जी चाहते थे कि हम जीवन के हर पल को जिएं ना की पैसों के पीछे या मोह माया मै फस कर अपना जीवन ख़तम कर दे...""
मेरी बात सुनकर सलोनी सोच मै डूब गई... और कुछ सोचते उसने बोलना शुरू किया....
"" पापा के तीसरे तक हम कहीं नहीं जा सकते....और मम्मी की भी तबीयत ठीक नहीं है क्या मम्मी हमारे साथ चलने को राजी हो पाएगी..?""
मैंने सलोनी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा...,
"" मम्मी मेरी बात कभी नहीं टालेगी.... लेकिन पता नहीं आरोही साथ चलेगी या नहीं उसको मेरा साथ कभी पसंद नहीं आया हमेशा मेरी वजह से वो खुद को शर्मिंदा महसूस करती है....मुझे नहीं लगता वो हमारे साथ चलेगी""
सलोनी ने मेरा हाथ अपने कंधे से उतारा और उसको मजबूती से थामते हुए कहने लगी...,
"" शायद तू जानता नहीं है काली कि पापा के जाने के दुख के साथ साथ एक बड़ा दुख भी आरोही को खाए जा रहा है.... जब हम शाम को गरीबों को खाना खिलाने गए थे तब वो सभी के पैरों को छू छू कर तुम्हारे साथ किए अन्याय का प्रायश्चित कर रही थी.... घर आने के बाद भी वो लगातार रोए जा रही थी और बोले जा रही थी कि पापा ने उसे अनजाने में ही पाप का भागी बना दिया.... वो तो यहां तक कह रही थी कि वो अपनी जान दे देगी अगर तूने उसे माफ नहीं किया तो"""
सलोनी की बात सुनकर मेरा दिमाग फट पड़ा..... आरोही ने कभी मुझ से सीधे मुंह बात नहीं करी.... हमेशा नफरत करती रही लेकिन पापा के मन की बात जानकर वो खुद को दोषी समझ रही है.... आत्मग्लानि... आत्महत्या की पहली सीढ़ी होती है, कहीं आरोही कुछ करने का सोच तो नहीं रही....
मन मै इस तरह के ख्याल आते ही मै तुरंत बिस्तर से उठ बैठा और आरोही के कमरे की तरफ भागा.....
आरोही के रूम का दरवाजा खुला था...शायद सलोनी मुझे बुलाने आते वक़्त दरवाजा बंद करना भूल गई थी....
मैंने देखा आरोही अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी लेकिन उसने रजाई नहीं ओढ़ रखी थी....इतने मै सलोनी भी मेरे साथ साथ दरवाजे पर ही खड़ी हो गई और धीमी आवाज मै मुझ से कहने लगी....
"" में जब तुम्हे बुलाने आई थी तब उसने रजाई ओढ़ रखी थी.....है भगवान ये क्या किया इसने....?????""
इतना बोलकर सलोनी तेजी से आरोही की तरफ लपकी और उसे जोर जोर से हिलाने लगी....
"" आरू उठ....आरु उठ.....ये क्या किया तूने उठ""
बुरी तरह से बौखलाई हुई सलोनी को देख मैं सन्न रह गया.... मेरे मुंह से बस इतना ही निकल पाया....
"" क..क्या या हुआ सलोनी..???""
सलोनी ने रोते हुए एक तरफ इशारा किया जहां स्लीपिंग पिल्स की पूरी शीशी खाली लुढ़की हुई थी.....
शीशी को देखते ही मुझे एक पल नहीं लगा समझने मै की आरोही ने क्या किया....
बिना देर किए मैंने आरोही को अपनी गोद मै उठाया और घर के बाहर खड़ी कार की तरफ भागा.... सलोनी भी मेरे पीछे पीछे बदहवास हालत मै भागती हुई आई....