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काल – सर्प

रात के 2 बज रहे थे पर मेरी आंखो में नींद नहीं थी....चाची मम्मी के साथ उनके रूम मै थी जबकि आरोही और सलोनी अपने अपने रूम मै....नवीन चाचा को सुबह कुछ तैयारी करनी थी इसलिए वो खाना खा कर सीधा अपने अपार्टमेंट मै जा चुके थे....मै करवट बदल बदल कर बुरी तरह परेशान हो चुका था इसलिए अपने बिस्तर से उठ किचन की तरफ बढ़ जाता हूं...

पूरे घर सन्नाटे मै डूबा हुआ था लेकिन बाहर सर्वेंट क्वार्टर से कुछ आवाजें जरूर आ रही थी....मैंने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो वहां ड्राइवर काका और महाराज आग जला कर बैठे बाते कर रहे थे...

नींद मेरी आंखो मै बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए मैं भी घर से बाहर उन लोगो के पास पहुंच गया....

मुझे वहां देखते ही ड्राइवर काका मुझे कहने लगे...

"" क्या हुआ काली बेटा नींद नहीं आ रही क्या...?? आज जो कुछ भी हुआ वो हमारे लिए भी किसी बुरे सपने की तरह ही था जो की सच हो गया ""

"" बड़ा अजीब लग रहा है काका....पहले पापा के साथ जो हादसा हुआ उसके बाद मम्मी कि तबीयत बिगाड़ना....रोने का मन कर रहा है लेकिन रो भी नहीं पा रहा हूं मैं....आप लोगो को बाहर देखा तो सोचा आप लोगो से थोड़ी बात कर लूं ताकि मेरा मन कुछ हल्का हो जाए...""

महाराज मेरे लिए एक स्टूल ले आए थे जब तक और मेरे पास रख कर बोले...

"" बैठो काली बेटा....साहब के जाने के बाद आपके परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ हम गरीबों के परिवारों की जिम्मेदारी भी आप पर आ गई है...""

"" आप लोग किसी बात की चिंता मत करो...जैसा अब तक चलता आया वैसा ही हमेशा चलता रहेगा....आप लोगो को किसी चीज की जरूरत हो तो सीधा मेरे पास आ जाना मुझ से जो कुछ भी हो सकेगा में जरूर करूंगा...""

ये सब कह कर मै बिल्कुल शांत हो गया और जलती हुई आग की लपटों को गौर से देखने लगा...मै अपलक उन लपटों को निहारे जा रहा था , ना जाने आंसू की एक लकीर आंखो का बांध तोड़ कर गालों पर बह चली....

मै काफी देर बिना कुछ बोले ऐसे ही बैठा रहा तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा....

"" क्या हुआ काली ?? तू अभी तक सोया नहीं....""

सलोनी मेरे पास घुटने मोड़ कर बैठ गई और मेरे बालों मै प्यार से हाथ फेरते हुए कहने लगी...

"" चल अब अंदर....बाहर काफी ठंड है देख मै शॉल भी पहन कर नहीं आई....""

मै बिना कुछ बोले वहां से उठा और सलोनी मेरा हाथ पकड़ कर घर के अंदर चलने लगी...

मेरे बेड पर बैठते हुए सलोनी ने कहा..

"" क्या बात है काली...तू मुझ से क्या छिपा रहा है....इतना परेशान तुझे मैंने कभी नहीं देखा....""

एक ठंडी सांस लेते हुए मैंने दादा जी के उस लेटर की तरफ इशारा किया और उसे पढ़ने की बोल कर वहीं सर पकड़ कर बैठ गया....

सलोनी ने जल्दी ही वो लेटर पढ लिया और वो फोटो मुझे दिखाती हुई बोली...

"" काली ये तो वही वर्ल्ड फैमस अंकोरवाट मंदिर है ना....अगर यहां जाने का मन बना रहा है तो मै भी तेरे साथ चलूंगी....""

"" हां सलोनी....तू भी साथ चलेगी और मम्मी और आरोही भी.....मुझे नहीं पता क्या कुछ होने वाला है लेकिन इस लेटर से इतना तो पता चल ही जाता है कि दादा जी चाहते थे कि हम जीवन के हर पल को जिएं ना की पैसों के पीछे या मोह माया मै फस कर अपना जीवन ख़तम कर दे...""

मेरी बात सुनकर सलोनी सोच मै डूब गई... और कुछ सोचते उसने बोलना शुरू किया....

"" पापा के तीसरे तक हम कहीं नहीं जा सकते....और मम्मी की भी तबीयत ठीक नहीं है क्या मम्मी हमारे साथ चलने को राजी हो पाएगी..?""

मैंने सलोनी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा...,

"" मम्मी मेरी बात कभी नहीं टालेगी.... लेकिन पता नहीं आरोही साथ चलेगी या नहीं उसको मेरा साथ कभी पसंद नहीं आया हमेशा मेरी वजह से वो खुद को शर्मिंदा महसूस करती है....मुझे नहीं लगता वो हमारे साथ चलेगी""

सलोनी ने मेरा हाथ अपने कंधे से उतारा और उसको मजबूती से थामते हुए कहने लगी...,

"" शायद तू जानता नहीं है काली कि पापा के जाने के दुख के साथ साथ एक बड़ा दुख भी आरोही को खाए जा रहा है.... जब हम शाम को गरीबों को खाना खिलाने गए थे तब वो सभी के पैरों को छू छू कर तुम्हारे साथ किए अन्याय का प्रायश्चित कर रही थी.... घर आने के बाद भी वो लगातार रोए जा रही थी और बोले जा रही थी कि पापा ने उसे अनजाने में ही पाप का भागी बना दिया.... वो तो यहां तक कह रही थी कि वो अपनी जान दे देगी अगर तूने उसे माफ नहीं किया तो"""

सलोनी की बात सुनकर मेरा दिमाग फट पड़ा..... आरोही ने कभी मुझ से सीधे मुंह बात नहीं करी.... हमेशा नफरत करती रही लेकिन पापा के मन की बात जानकर वो खुद को दोषी समझ रही है.... आत्मग्लानि... आत्महत्या की पहली सीढ़ी होती है, कहीं आरोही कुछ करने का सोच तो नहीं रही....

मन मै इस तरह के ख्याल आते ही मै तुरंत बिस्तर से उठ बैठा और आरोही के कमरे की तरफ भागा.....

आरोही के रूम का दरवाजा खुला था...शायद सलोनी मुझे बुलाने आते वक़्त दरवाजा बंद करना भूल गई थी....

मैंने देखा आरोही अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी लेकिन उसने रजाई नहीं ओढ़ रखी थी....इतने मै सलोनी भी मेरे साथ साथ दरवाजे पर ही खड़ी हो गई और धीमी आवाज मै मुझ से कहने लगी....

"" में जब तुम्हे बुलाने आई थी तब उसने रजाई ओढ़ रखी थी.....है भगवान ये क्या किया इसने....?????""

इतना बोलकर सलोनी तेजी से आरोही की तरफ लपकी और उसे जोर जोर से हिलाने लगी....

"" आरू उठ....आरु उठ.....ये क्या किया तूने उठ""

बुरी तरह से बौखलाई हुई सलोनी को देख मैं सन्न रह गया.... मेरे मुंह से बस इतना ही निकल पाया....

"" क..क्या या हुआ सलोनी..???""

सलोनी ने रोते हुए एक तरफ इशारा किया जहां स्लीपिंग पिल्स की पूरी शीशी खाली लुढ़की हुई थी.....

शीशी को देखते ही मुझे एक पल नहीं लगा समझने मै की आरोही ने क्या किया....

बिना देर किए मैंने आरोही को अपनी गोद मै उठाया और घर के बाहर खड़ी कार की तरफ भागा.... सलोनी भी मेरे पीछे पीछे बदहवास हालत मै भागती हुई आई....

 
हम लोगो को इस तरह भागता हुआ देख ड्राइवर काका और महाराज भी हमारे पास दौड़ते हुए आए और जल्दी से काका ने कार अनलॉक कर दी....

" क्या हुआ बेटा आरोही बिटिया को ये ठीक तो है ना ""

काका के हाथ से कार की चाबी लगभग छीनते हुए मैंने उनसे कहा....

"" आप लोग घर का ध्यान रखना मै हॉस्पिटल जा रहा हूं...""

आरोही पीछे वाली सीट पर बेसुध पड़ी थी और सलोनी लगातार उसको जगाने की कोशिश करे जा रही थी....और मै पूरी रफ्तार मै गाड़ी भगाए जा रहा था हॉस्पिटल कि तरफ......

वहां से दूर कहीं किसी अनजान जगह पर....

एक हवन कुंड जल रहा था और एक वृद्ध पूर्णतया नग्न औरत के बाल नोच नोच कर हवन कुंड मै डाले जा रहा था.....उस औरत का सिर उस वृद्ध की जांघ पे पड़ा था जो कि खून से पूरी तरह लाल हो चुकी थी.... हवन कुंड के पास एक तस्वीर भी रखी हुई थी जो शर्तिया काली की ही थी......

8.......

बीप....बीप....बीप.....बीप....

आरोही इस वक़्त हॉस्पिटल के एक कॉटेज में बेसुध सोई हुई थी....और वहां लगी मशीनों से निकलती आवाजें माहौल को और ज्यादा गमगीन बनाए जा रही थी....

सलोनी का चेहरा रो रो कर सुज चुका था और ना जाने कब वो रोते रोते आरोही से लिपट कर सो गई....मेरी आंखो मै नींद कोसों दूर तक नहीं थी....अगर कुछ था तो ये जानने की जिज्ञासा की आखिर एक साथ इतनी मुसीबतें कैसे आ गई मेरे परिवार पर....

नवीन चाचा को फोन करके मैंने सारी स्थिति बता दी थी और उन्हें ये भी कहा था कि मम्मी को इस बात का पता बिल्कुल भी ना चले की आरोही हॉस्पिटल में है.....सुबह के 5 बजने वाले थे और हॉस्पिटल के बाहर गहमा गहमी शुरू हो चुकी थी....

आरोही अब खतरे से बाहर थी लेकिन दोपहर तक उसे हॉस्पिटल में ही रहना होगा....ये एक सुसाइड की कोशिश थी इस लिए पुलिस को भी इतल्ला होनी वाजबी थी....

तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई....

मैंने दरवाजा खोल देखा तो पाया वहां एक 24 -25 साल का वर्दी धारी इंस्पेक्टर खड़ा था....

"" सर वैसे तो ये सही वक़्त नहीं है लेकिन फिर भी मुझे कुछ कानूनी कार्यवाही करनी ही पड़ेगी.....वैसे कमिश्नर सर से मेरी बात हो गई है इसलिए मै आपका ज्यादा वक़्त बिल्कुल भी नहीं लूंगा....""

मैंने एक नजर आरोही और सलोनी की तरफ मुड़ कर देखा और स्वीकृति में अपनी गर्दन हिला कर बाहर चलने का इशारा किया....

कॉटेज वार्ड से बाहर निकल कर एक छोटी सी कैंटीन बनी हुई थी जो की पूरी तरह व्यवस्थित लग रही थी....अभी इस वक़्त भी कैंटीन के स्टाफ के साथ साथ कुछ ही लोग वहां उपस्थित थे....

एक मुनासिब जगह तलाश कर हम दोनों वहां बैठ गए और फिर शुरू हो गया सवाल जवाब का सिलसिला....

"" काली सर ऐसी क्या वजह आ गई की आरोही यानी कि आपकी बहन को स्लीपिंग पिल्स खानी पड़ गई...???""

सवाल बिल्कुल सीधा और सपाट था.... इंस्पेक्टर ने बिना कोई भूमिका बांधे सरल शब्दों मै अपना सवाल मेरे सामने रख दिया था...

"" आप तो जानते ही है कि एक ही दिन में हमारे घर में क्या से क्या हो गया.....पहले पापा कि डैथ उसके बाद मम्मी को आया अटेक हमारे परिवार पर ईश्वर का बेइंतहा जुल्म था , शायद इसी वजह से आरोही को इतना धक्का लगा कि वो अपने आप को संभाल नहीं पाई और ये सब कर गई..""

अपने सामने पड़ी एक डायरी मै इंस्पेक्टर अपनी कलम से कुछ नोट करने लगता है और उसी के साथ साथ अपना अगला सवाल दाग देता है....

"" आपने ठीक कहा सर...ऐसे आलम मै खुद को संभालना काफी मुश्किल होता है वो तो शुक्र है कि आप मैडम को सही समय पर हॉस्पिटल ले आए वरना कुछ भी हो सकता था....खेर अब जो मै आपसे पूछना चाहता हूं हो सकता है कि वो आपको बुरा लगे लेकिन ऐसे सवाल असली वजह ढूंढने मै मदद भी करते है.....आप के पिता की मौत के बाद सम्पत्ति का भी बटवारा हुआ....कहीं ऐसा तो नहीं कि सम्पत्ति के कारण कोई ऐसा विवाद आप दोनों भाई बहन के बीच हुआ और इसी बात को लेकर उन्होंने ऐसा कुछ कर लिया...???""

एक बार तो सवाल सुनकर मेरा रोम रोम गुस्से से बिलबिला गया...मन तो किया कि अभी एक तगड़ा थप्पड़ चिपका दू इंस्पेक्टर के गाल पे लेकिन खुद को शांत करता हुआ में बोला....

"" मुझे नहीं लगता कि आपको हमारे परिवार के बारे में कुछ भी पता है....अगर पता होता तो शायद आप ऐसा सवाल करने की सोचते भी नहीं , लेकिन फिर भी में आपकी जानकारी के लिए बता देता हूं कि सम्पत्ति तो क्या अगर आरोही या मेरे परिवार का कोई भी सदस्य मुझ से मेरी जान भी मांगता तो दे देता....""

 
"" मुझे नहीं लगता कि आपको हमारे परिवार के बारे में कुछ भी पता है....अगर पता होता तो शायद आप ऐसा सवाल करने की सोचते भी नहीं , लेकिन फिर भी में आपकी जानकारी के लिए बता देता हूं कि सम्पत्ति तो क्या अगर आरोही या मेरे परिवार का कोई भी सदस्य मुझ से मेरी जान भी मांगता तो दे देता....""

इंस्पेक्टर मेरे इस जवाब पर काफी शर्मिंदा होता हुआ बोला....

"" मुझे माफ़ करें काली सर....मेरा दिल तो नहीं चाहता कि मै आपसे इस तरह के सवाल करू लेकिन मेरी मजबूरी ही ऐसी है कि मुझे इस तरह के सवाल करने ही पड़ते है....""

मैंने भी खुद को नॉर्मल करते हुए इंस्पेक्टर की विवशता को पूरा सम्मान दिया और एक सवाल का तीर उस इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया....

"" में आपकी विवशता समझ सकता हूं ....लेकिन आप इस वक़्त हमारी परेशानी कम करने की बजाए उसे और बढ़ा रहे हो....इस वक़्त मुझे मेरी बहनों के पास होना चाहिए ना की आपके साथ यहां सवाल जवाब वाला खेल खेलना चाहिए , फिर भी मेरा एक सवाल आप से भी है.... मेरे पिता की हत्या किसने कि और क्यों.....मेरे ख्याल से इस सवाल का जवाब आपके पास नहीं होगा....""

कुछ सोचते हुए इंस्पेक्टर ने कहा...

"" आपके पिता कि हत्या किसने कि या करवाई इसका तो अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन फिर भी हमे कुछ ऐसा पता चला है जो काफी शॉकिंग था हमारे लिए भी...""

"" शौकिंग....??? आप कहना क्या चाहते है इंस्पेक्टर.....क्या पता चला है आपको??""

"" दरअसल पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु स्नाइपर से फायर हुई एक बुलेट से हुई है लेकिन जब हमने उस बुलेट को देखा तो उसके बारे में कुछ और भी पता चला.... उस बुलेट पर एक सितारे की तस्वीर बनी हुई थी या कुछ इस तरह से समझे तो दो त्रिभुज आकर के पिरामिड सितारे की शक्ल में....""

मुझे कुछ भी समझ नहीं आया कि आखिर ये इंस्पेक्टर कहना क्या चाहता है इसलिए मैंने उसे कहा....

"" में आप की बात समझ नहीं पा रहा हूं इंस्पेक्टर.....वो सितारा उस बुलेट का कोई ट्रेडमार्क भी हो सकता है....इस में ऐसा शोकिंग आपको क्या लगा....""

सामने की टेबल पर पड़ी अपनी डायरी फिर से अपने बैग में डालता हुआ इंस्पेक्टर बोला....

"" पहली बार जब हमने उस बुलेट को देखा तो हमे भी यही लगा कि ये कोई ट्रेडमार्क होगा.....लेकिन ध्यान से देखने पर पता चला कि बुलेट पर किसी ने मृत्यु यंत्र का निर्माण किया था.....और ये अपने आप मै एक शॉकिंग खबर ही है कि क्यों कोई बुलेट पर मृत्यु यंत्र का निर्माण करेगा , जबकि स्नाइपर की वो बुलेट शर्तिया जान लेने के लिए ही बनी होती है....""

इंस्पेक्टर अपनी बात ख़तम कर अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ बाहर जाने के लिए....तभी मुझे नवीन चाचा की आवाज आई..

"" काली मै काफी देर से तुझे ही ढूंढ़ रहा था....आरोही को होश आ गया है और वो तुझे पुकार रही है....तू पहले आरोही से मिल के इंस्पेक्टर से बात में कर लेता हूं...""

"" नहीं नहीं नवीन जी.....मेरा काम यहां पूरा हो चुका है....जो कुछ भी मुझे पूछना था में काली सर से पूछ चुका हूं.....कभी अगर मेरी कोई जरूरत हो तो जरूर मुझे याद करना....अब मैं चलता हूं ""

इतना कह वो इंस्पेक्टर तेज़ी से कैंटीन से बाहर निकल गया.....

"" चाचा....मम्मी की तबीयत कैसी है अभी.....?? ""

चाचा ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा....

"" तेरा फोन आते ही में सीधा यहीं चला आया....रास्ते में तेरी चाची से मेरी बात हुई थी भाभी की तबीयत के बारे में तो उसने मुझे बताया कि अब वो पहले से ठीक है लेकिन अभी कुछ दिन और आराम करना होगा उन्हें.....मैंने तेरी चाची को मना कर दिया आरोही के बारे में भाभी को कुछ भी बताने के लिए इस लिए तू उस तरफ से निश्चिंत रह और अब जा आरोही से मिल ले जब तक मैं तुम लोगों के लिए कुछ नाश्ते का प्रबंध करता हूं...""

इतना कह कर उन्होंने मुझे एक बार गले से लगाया और बाहर चले गए...

में इस वक़्त आरोही के सामने खड़ा था....

"" काली तू मुझ से नाराज़ तो नहीं है ना मेरे भाई ....पापा कि नफरत में छुपे प्यार को में देख ही नहीं पाई कभी , उन्होंने हमेशा तुझसे नफरत करी और में भी उसी नफरत की दलदल में फंसती चली गई.....मुझे बस एक बार माफ़ कर दे मेरे भाई ....""

इतना कहते ही आरोही फूट फूट कर रोने लगी....आरोही को इस तरह बिखरता देख मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और कहने लगा....

 
"" कुछ दिन पहले तक मुझे लगता था इस दुनिया मै मुझे प्यार करने वाली सिर्फ एक मेरी मां और एक सलोनी ही है लेकिन कल मुझे पापा का प्यार भी मिला और आज मेरी बड़ी बहन का भी....पापा हमे छोड़ कर चले गए लेकिन अब मै किसी को भी खुद से दूर नहीं जाने दूंगा.....दीदी मुझ से वादा करो कसम खाओ मेरे सिर पर हाथ रख कर दुबारा मुझ से दूर जाने की कभी सोचोगी भी नहीं....""

"" तेरी कसम मेरे भाई....तेरी ये बहन तुझे छोड़ के कभी नहीं जाएगी..""

इतना कहते ही आरोही ने मुझे कस कर गले से लगा लिया और साथ है साथ सलोनी को भी हाथ बढ़ा कर अपनी कोमल बांहों मै जकड़ लिया....

9........

हॉस्पिटल में अब सब कुछ ठीक प्रतीत हो रहा था....आरोही अब पूरी तरह से ठीक थी और साथ ही साथ सलोनी भी अब थोड़ी नॉर्मल हो चुकी थी....

कॉटेज में पड़ी हुई एक पुरानी मैगज़ीन के पन्ने पलटते हुए मैंने आरोही से कहा....

"" कुछ ही देर में डाक्टर आ कर आपको डिस्चार्ज कर देगा....उसके बाद कल घर में पूजा भी रखी है इसलिए अब कोई ऐसी वैसी हरकत मत कर देना....""

मैंने अभी अपनी बात रखी ही थी कि काटेज का दरवाजा खोल नवीन चाचा अंदर दाखिल हुए....

"" काली अभी अभी तेरी चाची का फोन आया था...तेरी मम्मी को होश आ गया है और वो आज पहले से काफी ठीक भी महसूस कर रही है....""

में कुछ बोल पाता उस से पहले ही आरोही बोल पड़ी....

"" कल पूरे दिन के बाद आज कोई अच्छी खबर सुनने को मिली है चाचा.....अब मुझ से यहां नहीं रहा जाता अब मुझे जल्दी से घर ले चलो ""

चाचा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया....

"" हां मेरी गुड़िया हम सब अब जल्दी ही घर चलेंगे....मैंने तो सोच लिया है अब प्रीति( चाची ) को लेकर तुम सब लोगो के साथ ही शिफ्ट हो जाऊंगा.....भाभी के साथ साथ प्रीति तुम सब लोगो का भी ध्यान रख लेगी, बस अब ईश्वर से यहीं प्रार्थना है कि हमारे परिवार को मुसीबतों से दूर रखे....""

सलोनी ने भी चाचा द्वारा लाए गए टिफिन और बाकी सामान एक बैग में डालते हुए कहा....

"" सही कहा चाचा.....अब और मुसीबतें नहीं चाहिए , एक बार कल की पूजा हो जाए उसके बाद आरोही, काली और में मम्मी को लेकर कहीं बाहर कुछ दिन मन ठीक करने के लिए जाएंगे.....अगर पॉसिबल हो तो आप भी चाची को हमारे साथ लेकर चलना...""

अब तक चाचा मेरे पास आकर बैठ चुके थे....और मेरे कंधे पर किसी दोस्त की तरह हाथ रखते हुए बोलने लगे...

"" चाहता तो में भी यही हूं मेरी बच्ची....लेकिन तुम्हारे पापा मुझ पर बड़ी जिम्मेदारी डाल कर गए है....मेरे लिए अब कहीं भी निकलने की सोचना भी पॉसिबल नहीं है.... हां तुम लोग अगर चाहो तो प्रीति को अपने साथ ले जा सकते हो....हम लोगो की शादी को दो साल हो गए लेकिन में कहीं भी उसे घुमाने नही के जा पाया....""

आरोही अपने बिस्तर से अब उठ चुकी थी और साइड में लगे मिरर में अपने बाल दुरुस्त करते हुए बोलने लगी....

"" क्यों नहीं चाचा....हम लोग जरूर ले जाएंगे चाची को अपने साथ....वैसे आपको भी हम लोगो के साथ चलना चाहिए.....पापा कि वसीयत के अनुसार हम लोगो को अब पैसे के पीछे भागना बंद कर देना चाहिए....हमारे पास जो कुछ भी है वो काफी है हमारे साथ साथ उन लोगो की जिंदगी के लिए भी जिन्हें पापा हमारे भरोसे छोड़ गए है....""

चाचा ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा...

"" तुम लोगो के कहने से पहले ही में सारे इंतजाम कर चुका हूं आरोही....गरीबों और बेघर लोगो के लिए खाना और रहने के लिए एक ट्रस्ट की रूप रेखा मै पहले ही बना चुका हूं.....बिज़नेस से होने वाले फायदे से एम्प्लोई कि सैलरी के साथ साथ 20 करोड़ प्रतिमाह अलग से गरीबों के रहने खाने का इंतजाम के लिए एक ब्रांच का गठन जल्दी ही हो जाएगा.....इस सब की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रोफेश्नल लोगो के हाथ मै रहेगी जो क्वालिटी के साथ साथ गरीब लोगो को रोजगार भी मुहैया करवाने का काम करेंगे.....हमारे परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को 25 लाख हर महीने खर्च के साथ साथ तुम तीनो भाई बहनों की शादी और तुम्हारे होने वाले बच्चों की आने वाली पीढ़ी भी इसी ट्रस्ट की जिम्मेदारी रहेगी....किंही विशेष परिस्थितियों में तुम लोगो को एक मुश्त रकम कि जरूरत होने पर भी ये ट्रस्ट तुम सभी को बिना किसी सवाल के वो रकम मुहैय्या करवाएगा चाहे रकम कितनी भी बड़ी क्यों ना हो....""

मै काफी देर से चाचा की बात सुन रहा था और ये बात सुन मै तपाक से बोला.....

"" अगर मुझे रकम खरबों में चाहिए तो क्या आपका वो ट्रस्ट उसे भी प्रोवाइड करा पाएगा....""

चाचा के पास मेरे इस सवाल का भी जवाब था.....

 
"" अगर कभी ऐसी नोबत आ भी गई तब भी तुम्हारे पास वो ताकत होगी जिस से तुम सब कुछ बेच भी सकते हो....अगर सीधे सीधे इस ट्रस्ट का उद्देश्य समझो तो वह सिर्फ इतना होगा की वहीं बिजनेस को संभाले और सब कुछ वैसे ही चलने दे जैसा चल रहा है, उसमे मालिकाना हक हमेशा तुम्हारा ही रहेगा....वैसे अगर मान भी लें कि तुम्हे इतनी बड़ी रकम की जरूरत पड़ गई तो तुम इतने पैसे का करोगे क्या...???""

चाचा अब सीधा सवाल मुझ पर दाग चुके थे......और उनके साथ साथ आरोही और सलोनी की नज़रे भी मेरी तरफ घूम चुकी थी....

"" वैसे मुझे नहीं लगता कभी भी मुझे इतनी बड़ी रकम की एक साथ जरूरत पड़ेगी लेकिन फिर भी जानकारी के लिए बस आपसे पूछा.....दुनिया में विश्वास के लोग कम ही मिलते है....क्या पता इस तरह का ट्रस्ट हमारे परिवार को आगे जाकर कुछ भी ना दे और हम सब सड़क पर आ जाए....""

चाचा ने मेरी बात सुनकर सिर्फ इतना ही जवाब दिया....

"" देख काली.....तेरे पापा का छोटा भाई हूं में.....में मर जाऊंगा लेकिन कभी अपने खानदान पर कोई आंच नहीं आने दूंगा.....ये ट्रस्ट एक तरह से हमारे ही काम करेगा....साफ शब्दों में हमारा एक मुनीम जो काम के साथ साथ वो सारी चीजें देखेगा जो अभी तक हम देखते चले आ रहे थे....मेरे ख्याल से तुझे इस बात से कोई ऐतराज नहीं होगा....""

चाचा की बात सुनकर मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई और मैंने उन्हें जवाब दिया....

"" पापा ने चाहे अपनी वसीयत मै कुछ भी लिखा हो चाचा....लेकिन घर के बड़े अब आप हो....आप जो फैसला लोगे वो मुझे मंजूर है....और वैसे भी मेरे ख्याल से आपका ये फैसला हम सभी को पूरी तरह से आजाद कर देता है बिज़नेस की भागमभाग से दूर रहने को....मुझे कोई दिक्कत नहीं है अगर ऐसा हो सकता है तो आप जरूर करिए बस पहले आरोही सलोनी और मम्मी से भी जरूर पूछ लेना....में कभी नहीं चाहूगा की इन सब से पूछे बिना कोई भी बड़ा फैसला घर में हो...""

मेरा इतना कहना ही हुआ था कि आरोही के हाथ मै थमी कंघी उड़ती हुई अाई और मेरे सर पर जा लगी....

"" खबरदार काली.....इस दुनिया मै पापा से ज्यादा प्यार मै किसी से नहीं करती हूं.....अगर पापा तुझे हमारी जिम्मेदारी दे कर गए है तो इसका मतलब तेरा हर फैसला मुझे मान्य होगा.....रही बात मम्मी की ओर सलोनी की तो वो तो वैसे भी तुझ पर जान छिड़कते हैं....""

आरोही का इतना कहना ही हुआ था कि तभी कॉटेज के दरवाजे पर दस्तक हुई और अंदर आने वाला शक्श डाक्टर था जो आरोही का ट्रीटमेंट कर रहा था.....

"" हैलो यंग लेडी.....तुम्हें देख कर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा की तुमने कल खुदकुशी करने की कोशिश करी होगी.....मुझे उम्मीद है तुम दुबारा ऐसा कुछ भी नहीं करोगी और अपनी फैमिली के साथ हमेशा खुशियां बाटोगी....मिस्टर नवीन क्या आप थोड़ी देर के लिए मेरे केबिन में आ सकते है प्लीज़.....कुछ फॉर्मेलिटी है बस वो निपटाने मै आपकी मदद चाहिए.....""

इतना कह कर वो डाक्टर वापस बाहर निकल गया और चाचा उसके पीछे पीछे अभी आया कह कर चले गए.....

चाचा के जाते ही आरोही मुझ पर कूद पड़ी और मुझे कस कर अपने सीने से लगा लिया....

"" काली अब से बस मै तुझ से प्यार करती हूं.....मुझ से कभी अलग मत होना मेरे भाई...""

""अरे छोड़ मोटी....क्योंकि तेरी हिफाजत के लिए तेरा ये काली अभी जिंदा है .....दुबारा मरने की या मुझ से दूर जाने की कभी भी बात मत करना....जिस दिन जाने का मन करे उस दिन अपने इस भाई को ज़हर देकर जाना....""

अभी आरोही मुझ से चिपकी खड़ी हुई थी तभी सलोनी ने भी कुछ बोला....

"" एक थप्पड़ खाएगा मेरे हाथ से.....मेरे सामने कभी भी इस तरह की बात मात करना वरना तुझे यही से उठा कर बाहर फेंक दूंगी...…बड़ा आया ज़हर खाने वाला......""

इतना कह कर सलोनी भी मेरी बांहों मै आ गई और हम तीनो भाई बहन एक दूसरे में समा गए....

"" अब आप दोनों की आज्ञा हो तो घर चले...""

मैंने दोनों से कहा और दोनों ने बारी बारी एक एक चुम्बन मेरे गालों पर सरका दीए....

हम लोग अब कॉटेज से निकल कर कैंटीन क्रॉस करके लॉबी में आ चुके थे.... तभी कुछ ऐसा हुआ जिसे देख मेरी रूह अंदर तक कांप गई..........

 
10......

धाड़... धाड....

नवीन चाचा अपने सर से हॉस्पिटल कि बालकनी का ग्लास तोड़ने की कोशिश कर रहे थे.....उनके माथे से होकर खून अब जमीन पर गिरना शुरू हो चुका था....

में भाग कर उनके पास पहुंच पाता उस से पहले ही एक तेज़ आवाज़ के साथ हॉस्पिटल कि सातवीं मंजिल की बालकनी का वो ग्लास भर भराकर गिर पड़ा....

में जोर से चिल्लाया....

"" चाचा रुक जाइए.....नहीं....नहीं....ऐसा मत करिए....""

मेरी आवाज़ सुनकर उन्होंने पलट कर मुझे देखा और जोर से चिल्ला कर कहा.....

"" ये मेरे दिमाग को खाए जा रहा है काली....में इसको निकाल नहीं पा रहा हूं अपने दिमाग से.....प्रीति का ख्याल रखना काली....""

इतना कह कर हॉस्पिटल कि सातवीं मंजिल से चाचा नीचे कूद गए.....

मेरे पैर इस वक़्त इतने भारी लग रहे थे जैसे किसी ने जंजीरों से इन्हें जकड़ रखा हो....चाचा को बस छलांग लगाते हुए देख पाया मैं और लड़खड़ा कर फर्श पर गिर पड़ा....

सलोनी और आरोही तेज़ी भाग कर मेरे पास पहुंचे लेकिन ना जाने मेरी सारी ताकत कहां चली गई जो में खड़ा भी नहीं हो पा रहा था.....

आरोही मेरे पास रुकी जबकि सलोनी फुर्ती से बालकनी की तरफ भागी लेकिन अब काफी देर हो चुकी थी.....

बालकनी के पास सलोनी को बस सुबकते हुए ही देख पाया मैं और मेरी आंखो के सामने अंधेरा सा छाने लग गया....

"" नहीं....नहीं......नहीं चाचा आप ऐसा नहीं कर सकते.....कोई मेरे चाचा को बचाओ....मम्मी चाचा को बचाओ....""

अचानक में चीखते हुए बिस्तर से उठा....मैंने देखा मै इस वक़्त घर पर हूं और मम्मी और आरोही मेरे पास बेड पर ही बैठे है....मम्मी को देखते ही मैं बोल पड़ा....

"" मम्मी चाचा....????""

मेरा इतना कहना हुआ ही था कि बड़ी मुश्किल से बांध के बैठी मम्मी की आंखो का सेलाब फूट पड़ा.....

"" सब ख़तम हो गया मेरे बच्चे सब उजड़ गया....आज पांच दिन बाद तू होश में आया है सब कुछ लूट गया मेरे बच्चे....तेरे पापा तेरे चाचा अब इस दुनिया में नहीं रहे....""

मुझे अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था....मम्मी की ऐसी हालत देख एक बार फिर से मेरी आंखो के सामने अंधेरा छाने लगा.....और एक बार फिर से में बेहोशी के अंधेरों में चला गया....

तीन दिन बाद.....

"" काली उठ....मत सो इतना, अगर आज नहीं उठेगा तो अब बारी तेरी मां की होगी....उठ खड़ा हो... कर हिम्मत...""

मैंने पूरा जोर लगा कर अपनी आंखे खोली और और बैठ गया बिस्तर पर....लेकिन मेरे आस पास कोई भी नहीं था...हाथ में ड्रिप लगी हुई थी और इस वक़्त में एक सफेद कुर्ते पयजामे में था....इधर उधर देखने से पता चला कि ये मेरा ही रूम है यानी कि में घर पर ही था....

मैंने देर ना करते हुए ड्रिप को अपनी कलाई से अलग किया और लड़खड़ाते हुए कदमों से बाहर हॉल की तरफ बढ़ गया.....

हाल में इस वक़्त काफी लोग बैठे हुए थे....बीच में हवन कुंड जल रहा था और हवन कुंड के पास सफेद साड़ी में मम्मी और चाची बैठी हुई थी और उनके ठीक पीछे आरोही और सलोनी....

""मम्मी""

मैंने आवाज लगाई....लेकिन मम्मी या कोई भी वाहा से उठ कर मेरे पास आ पाता उस से पहले ही वहां पूजा कर रहे साधु बाबा ने सबको बैठे रहने का इशारा किया और मुझे आवाज लगाई.....

"" आओ काली....यहां मेरे पास आकर बैठो....""

ये आवाज बिल्कुल वैसी ही थी जैसी अभी कुछ देर पहले मैंने नींद में सुनी थी....मै यंत्रवत उनके पास जाकर बैठ गया और उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा....

"" विपत्ति अभी टली नहीं है बेटा.....लेकिन में जानता हूं तू अब तेरे परिवार पर कोई आंच नहीं आने देगा.....जैसा सोचा था वैसा ही करना.....ईश्वर तुझे राह दिखाएंगे...""

उसके बाद वो वहां सभी लोगों को संबोधित कर के कहते है.....

""सभी बंधुओ अब अपने अपने घर चले जाएं.....इस परिवार को अब आप लोग अकेला छोड़ दे क्योंकि अभी काफी कुछ बदलने वाला है इसलिए आप सब अब अपने अपने घर के लिए प्रस्थान करें""

साधु बाबा के कहते ही वहां आए सारे लोग एक एक कर के साधु बाबा का आशीर्वाद लेकर जाते चले गए....

सब के जाने के बाद साधु बाबा अपने झोले में से दो हांडिया निकालते है जो कि एक लाल रंग की थी और एक काली.....उसके बाद वह अपने झोले से कुछ पैकेट्स भी निकालते है जो कि हांडी के रंगानुसार ही थे...

कुछ देर तक हम सब ऐसे ही बैठे साधु बाबा को देखते रहे....हाल में इस वक़्त एक मात्र साधु बाबा ही वो व्यक्ति थे जो की हमारे परिवार का हिस्सा नहीं थे....अभी कुछ ही देर हुई थी कि साधु बाबा ने कुछ कहा.....

"" बुरी ताकत पूरी पूर्ण वेग के साथ अग्रसर है, अगर अभी भी कुछ नहीं किया तो फिर से एक बड़ी अनहोनी होने का अंदेशा है..""

अपनी बात कह कर उन्होंने अपने झोले मै से फिर कुछ निकालने के लिए हाथ डाला और मम्मी का नाम लेकर उन्हें अपने पास बुलाया.......

"" देवी ये धागा बड़ा पवित्र है......इसके होते हुए कोई भी प्रेत या किसी तरह का काला जादू तुझ पर या तुम्हारे परिवार पर असर नहीं करेगा....ये धागा अपने परिवार के लोगों के साथ साथ तुम्हे खुद भी ग्रहण करना होगा....""

मम्मी बाबा के के हाथो से वो धागा लेकर फिर से अपनी जगह आ कर बैठ गई....

उसके बाद बाबा ने प्रीति यानी चाची को अपने पास बुलाया और एक लाल रंग का पैकेट उनके हाथ मै देते हुए उनके कानो मै कुछ कहा जिसे सुन चाची कि आंखे आश्चर्य और दर्द से फैलने लगी.....वो चुप चाप वहां से उठ पुनः अपनी जगह पर जाकर बैठ गई....

उसके बाद बाबा ने आरोही और सलोनी को बुलाया और काले रंग का पैकेट दोनों को एक एक दे दिया.....वो दोनो पैकेट्स लेने के बाद काफी असमंजस में लग रही थी जैसे उन्हें समझ ही नहीं आया हो की बाबा ने उन्हें क्या कहा....

उसके बाद एक बार फिर से मम्मी को उन्होंने पुकारा और काले रंग का एक पैकेट उन्हें भी दे दिया और उनके कानों में भी कुछ कहा.....

में वहां पास मै ही बैठा था लेकिन उन सब लोगों के कान में बाबा ने क्या कहा ये मुझे बिल्कुल भी सुनाई नहीं दिया तभी बाबा मेरी तरफ घूम गए और मेरे हाथो में एक काला और एक लाल पैकेट देते हुए मेरे कानो में कुछ कहा.....

"" काली....काले पैकेट मै तुम्हारे पिता के जिस्म की भस्म है जबकि लाल पैकेट में तुम्हारे चाचा की भस्म है..... इन दोनों भस्मो में मैंने कुछ विशेष मिलाया है ताकि तुम सभी कुछ समय के लिए किसी भी मक्कड़ जाल से दूर रहो....काला वाला पैकेट की भस्म तुम्हे तुम्हारी मां के जिस्म पर लगानी है और लाल वाले पैकेट की भस्म तुम्हारी चाची के जिस्म पर....याद रहे बाहरी जिस्म का कोई भी भाग इस भस्म के स्पर्श से अछूता ना रहे....""

मेरे होश उड़ गए इतना सुनते ही....मैंने घबराते हुए बाबा से कहा ...

"" बाबा ऐसे कैसे हो सकता है....ये काम तो ये दोनों खुद भी कर सकती है....मुझे इन सब बातों मै मत घसीटो बाबा में आपके आगे हाथ जोड़ता हूं...""

बाबा ने मेरा कान पकड़ लिया और दूसरा हाथ मेरे सर पे रखते हुए बोलने लगे.....

"" दवाई तभी असर करती है जब परहेज की पालना की जाए.....ये भस्म खुद अपने हाथो से खुद के जिस्म पे नहीं लगा सकते....अगर ऐसा करने का प्रयास भी किया तो ये भस्म स्वयं विकराल विष का स्वरूप के लेगी....इसमें मिलाया गया पदार्थ साधारण नहीं है काली.... तेरी एक बहन तेरी दूसरी बहन के जिस्म पर ये भस्म लगाएगी....तेरी मां और तेरी चाची तेरे जिस्म पर....उसके बाद तू तेरी मां और तेरी चाची के जिस्म पर.....याद कर वो पल जब नवीन कूदने वाला था....तब क्या कहा था उसने तुझ से क्या मांगा था उसने....याद कर..""

मैंने तुरंत जवाब दिया....

"" प्रीति का ख्याल रखना ""

इतना कहते ही मुझे तेज़ झटका लगा.....मेरे दिमाग में इस दिन जो कुछ भी हुआ बड़ी तेज़ी से रिवाइंड होने लगा और आखिरकार मैंने बाबा से ये सवाल पूछ ही लिया.....

"" आपको कैसे पता चला कि नवीन चाचा ने उस वक़्त मुझ से क्या कहा था....आरोही और सलोनी दोनों मै से किसी ने आपको बताया होगा....""

इस बार बाबा ने मेरे कान मै कुछ कहने की बजाय सब के सामने कहा....

"" जिस वक़्त तेरे चाचा ने तुझ से ये शब्द कहे थे वो तो उस से पहले ही मर चुके थे.....लेकिन तेरे पुकारने पर उनकी आत्मा फिर से उस जिस्म मै अाई और अपनी अंतिम इच्छा तुझे बता कर छलांग लगा गए......

 
11......

शाम के 6 बज चुके थे.....पूरे घर में जैसे मातम पसरा हुआ था , सभी लोग पूरी खामोशी से अपने अपने दर्द अपने सीने में दबाए बस उस घड़ी का इंतजार कर रहे थे कि कोई तो हमारा दर्द हम से बांट ले....

मम्मी और चाची एक साथ एक सोफे पर अपना सर पकड़े बैठी थी वहीं सलोनी मेरी बांहों में ना जाने कब सो गई....आरोही इस वक़्त घर की छत पर अपने अकेले पन से जूझ रही थी....

तभी घर की डोर बेल बजी जिसे सुन चाची दरवाजा खोलने के लिए गई....

"" आप लोग इस वक़्त ....?? ""

चाची ने आश्चर्य से दरवाजा खोलते ही ये शब्द कहे....

"" तुझे कब से फोन कर रहे थे लेकिन तू है कि फोन बंद करके बैठी है.....अब हमे अंदर भी आने देगी या बाहर से ही भगा देगी....""

आने वाले लोग चाची की मम्मी पापा और छोटी बहन थे....

अंदर आते ही सभी ने मम्मी के सामने हाथ जोड़ कर अपना दुख जाहिर किया और वह तीनो एक ही सोफे पर बैठ गए....

उन लोगो के बैठते ही मम्मी ने बोलना शुरू किया....

"" अच्छा हुआ जो आप लोग यहां आ गए.....हम सब पर तो जैसे दुखो का पहाड़ टूट पड़ा.....पहले ईश्वर ने मुझ से मेरे पति छीन लिए और अब प्रीति का सुहाग भी....में तो फिर भी मेरा दर्द मेरे बच्चो से बांट सकती हूं लेकिन प्रीति का सोच कर डर जाती हूं.....ना जाने अब इस मासूम बच्ची का क्या होगा....""

इतना कहते ही मम्मी फफक पड़ती है और चाची की मम्मी अपनी जगह से उठ कर उन्हें अपने गले से लगा दिलासा देने कि कोशिश करती है....

चाची के पिता अमित भंडारी भी एक बिज़नेस मेन थे....भंडारी क्लॉथिंग नाम से उनका अच्छा खासा काम था....उनकी पत्नी रजनी मम्मी कि तरह ही गृहिणी थी जबकि उनकी छोटी बेटी आराध्या अभी कॉलेज में अाई ही थी....

अमित - भाभी जी हमे माफ़ करना , अगर आप लोगो की अनुमति हो तो हम प्रीति को हमारे साथ ले जाना चाहते है.....कुछ दिन हमारे साथ रहेगी तो अपने दर्द से भी निकल पाएगी और फिर इसके लिए कोई अच्छा सा लड़का देख कर शादी भी कर देंगे....

अमित जी की बात सुन कर मम्मी के साथ साथ हम सभी को झटका लगा....लेकिन वो कह भी सही रहे थे.....अगर चाची यहां रही तो क्या ज़िन्दगी रह जाएगी उनकी बस यही सोच कर मैंने अभी कुछ कहना ही चाहा था कि उस से पहले चाची बिफर पड़ी.....

"" मेरे नवीन को गए अभी एक हफ्ता भी नहीं हुआ और तुम सब लोग ये कैसी बाते कर रहे हो.....में कहीं नहीं जाऊंगी.....अब मेरी अर्थी ही इस घर से निकलेगी.....अगर तुम लोगो को यही बाते करनी है तो अभी के अभी यहां से निकल जाओ और दुबारा मुझे अपनी शक्ल भी मत दिखाना....शर्म आती है मुझे आप लोगो को अब अपना माता पिता कहने मैं....में कहीं नहीं जाऊंगी ये मेरा पहला और आखिरी फैसला है.....""

चाची अपनी बात कह कर वही फर्श पर ही बैठ गई और सुबकने लगी....

सलोनी भी इसी गहमा गहमी मै जाग चुकी थी और उसने उठ कर फर्श पर सुबकती प्रीति को वहां से उठाया और मेरे बगल मै लाकर बैठा दिया....

तभी मम्मी ने कुछ कहा....

""प्रीति सही तो कह रहे है तेरे पापा.....अब किसके सहारे अपनी बाकी की ज़िंदगी निकालेगी तू यहां....अभी उम्र ही क्या है तेरी जो तू अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगाने की बात कर रही है.....में या इस घर का कोई भी सदस्य नहीं चाहेगा कि तू यहां से जाए लेकिन अब तुझे नए रास्ते तलाशने ही होंगे....अगर आज काली के पापा भी यहां होते तो वह भी यही कहते....मत कर खराब अपनी ज़िंदगी जो तेरे पापा कह रहे है वहीं सही है...""

अपने आप को संभालते हुए चाची ने कहा....

"" में प्रेगनेंट हूं....अगर इसके बाद भी आपको लगता है कि मुझे इन लोगो के साथ जाना चाहिए तो नवीन मेरी जिम्मेदारी काली को देकर गए थे....काली को ही अब मुझे ये बताना पड़ेगा कि में यहां रुकू या यहां से हमेशा के लिए चली जाऊं.....मैंने हमेशा नवीन से बेपनाह मोहब्बत करी है....उसके अलावा मेरी ज़िन्दगी में कभी कोई ना कोई आया है और अब ना ही कभी कोई आएगा....""

""प्रीति का ख्याल रखना काली""

अचानक मेरे दिमाग में चाचा के वो आखिरी शब्द गूंजे....

"" ये बात सही है कि चाचा आपका ख्याल रखने की जिम्मेदारी मुझे देकर गए थे....और जैसा कि आपने बताया कि आप प्रेगनेंट है तो मुझ से ज्यादा आप ये बता सकती है कि इस घर को आपकी कितनी जरूरत है....एक नन्हा मेहमान इस घर की खोई हुए खुशियां फिर से ला सकता है....लेकिन इस घर की खुशी देखने के चक्कर में आप अपनी बची हुई ज़िन्दगी तबाह कर लोगी....इसलिए आपकी ज़िन्दगी का फैसला करने वाला में कुछ भी नहीं होता हूं.....नवीन चाचा मुझ से जाते वक़्त आपका ख्याल रखने का बोल कर गए और वो में मरते दम तक रखूंगा चाहे आप यहां रहे या अपने मम्मी पापा के साथ चली जाए.....फैसला आपको करना है में अपना फैसला आप पर जबरदस्ती नहीं थोप सकता कभी भी...""

मेरी बात सुनकर चाची ने मुझे गले से लगा लिया और रोते रोते कहने लगी.....

""मै कहीं नहीं जाना चाहती काली.....मुझे अब यही रहना है .....जितना हम हमारे अपार्टमेंट में नहीं रहे उस से कहीं ज्यादा इस घर में नवीन रहा है.....नवीन की यादें है इस घर में, वो यादें मै छोड़ के कहीं नहीं जाऊंगी.... प्लीज़ काली हेल्प मी....मुझे नहीं जाना कहीं भी....""

फैसला हो चुका था....

चाची का ये फैसला सुनते ही अमित जी अपनी जगह से उठ कर चाची को अपने सीने से लगा लेते है....और कहते है...

"" मुझे आज सच में खुद पर और तेरी मां पर नाज़ हो रहा है....हम भी नहीं चाहते थे कभी की तू शादी के बाद इस घर से निकले....लेकिन नवीन कि मौत ने हमे अंदर तक तोड़ कर रख दिया....बेटी की ज़िंदगी खराब ना हो बस इसी भुलावे में तुझ से इतनी बड़ी बात कह गए....लेकिन तूने दिखा दिया कि खानदानी होना क्या होता है.....तूने मेरे साथ साथ मेरे पुरखों का भी मान रख लिया मेरी बच्ची.....हमने तो तुझे दो साल पहले ही कन्या दान करके इस परिवार को दे दिया बस ना जाने कैसे बेटी के प्यार ने हम से क्या क्या कहलवा दिया....मुझे माफ़ कर देना मेरी बच्ची ""

इस वक्त चाची के माता पिता अपनी बेटी को गले से लगाए आंसू बहा रहे थे जबकि आराध्या वहीं सोफे पर गुम सुम अपनी नज़रें झुकाए बैठी थी..... उसे इस तरह से गुमसुम देख मम्मी ने कहा....

"" अमित जी अगर आप बुरा ना माने तो आराध्या कुछ दिन हमारे साथ रह सकती है क्या.... माना प्रीति का दुख इस वक़्त कोई नहीं बांट सकता लेकिन प्रीति और आराध्या दोनों बहने है कुछ दिन साथ रहेगी तो प्रीति का भी मन लग जाएगा....""

चाची के पिता इस बात का जवाब दे पाते उस से पहले ही चाची की मम्मी बोल पड़ी....

"" क्यों नहीं भाभी जी.....आराध्या भी आपकी ही बेटी सामान है.....जब तक आप चाहे आप इसे यहां रख सकते है....वैसे भी आराध्या का प्रीति से बेहद लगाव है इसलिए हमे कोई ऐतराज नहीं है आराध्या के यहां रहने से....""

चाची के साथ रुकने की खुशी आराध्या के चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी इस वक़्त....

आराध्या का सामान कल भिजवा देंगे कि बात कह कर चाची के माता पिता हमसे विदा लेकर चले गए.....

उन लोगो के जाते ही मम्मी ने आराध्या से कहा....

"" आराध्या आज तुम सलोनी के रूम मै सो जाना....आज प्रीति मेरे साथ रहेगी लेकिन कल से वो तुम्हारे साथ ही सोएगी...तुझे कोई परेशानी तो नहीं है ना बच्चा???""

जब से आराध्या यहां अाई थी मम्मी की बात सुनकर पहली बार उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला...

"" नहीं नहीं आंटी....मुझे भला कैसी परेशानी....दीदी के साथ में कल सो जाऊंगी...""

आराध्या की बात सुन मम्मी ने उसे डपटते हुए कहा.....

"" दुबारा मुझे आंटी कहा तो तू कल भी तेरी दीदी के साथ नहीं से पाएगी....मुझे मेरे बच्चे मम्मी कह कर बुलाते है और तू भी वही बुलाना अब से....""

"" ठीक है आंटी.....ओह आईएम सॉरी....मम्मी ""

आराध्या के इतना कहते ही मम्मी के साथ साथ सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई थी.....इतने मै छत से आरोही भी नीचे आ चुकी थी और हम सब के चेहरों पर मुस्कान और वहां हॉल मै आराध्या को देख उसके चेहरे पर भी मासूम मुस्कान आ गई....

आराध्या को सलोनी अपने साथ अपने रूम मै लेकर चली गई जबकि आरोही से मम्मी कुछ बात कर रही थी किचन मैं.....

मै भी अब वहां से उठ कर अपने रूम की तरफ बढ़ गया और अंदर जाते ही सीधा बिस्तर पर पसर गया.....तभी मेरी नजर बाबा के दिए हुए काले और लाल पैकेट पर पड़ी.....और साथ में उस तस्वीर पर भी जो पापा की वसीयत के साथ उस लेटर वाले लिफाफे से निकली थी.....

 
12.......

रात के 10.45 हो रहे थे हम सभी खाना खा कर अभी बस फ्री ही हुए थे कि हॉल मै पड़ा लैंडलाइन घनघना उठा....

चाची फोन उठाने के लिए डायनिंग टेबल से उठने ही वाली थी कि मम्मी ने ये कहते हुए उन्हें रोक दिया....

"" प्रीति बच्चो को आइस क्रीम खीला दे ,में देखती हूं फोन किसने किया...""

इतना कह कर मम्मी हॉल में चली गई और में भी अपने रूम की तरफ कुछ लाने के लिए बढ़ गया....

"" हैलो...जी बाबा जी प्रणाम....""

मम्मी बाबा जी की आवाज सुनते ही उन्हें पहचान गई, रूम मै दाखिल होते हुए में बस मम्मी के मुंह से बस इतना ही सुन पाया...

"" ये कैसे मुमकिन है बाबा जी...??""

में अपने कुछ डॉक्यूमेंट ढूंढ़ रहा था जैसे पासपोर्ट वगैरह जो मुझे कबर्ड मै जल्दी ही मिल गए....उन्हें लेकर मै रूम से बाहर निकला तो देखा मम्मी अभी भी फोन पे थी लेकिन उनके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो बहुत परेशान हैं....

मै कुछ सोच कर वापस मम्मी कि तरफ बढ़ा लेकिन में उन तक पहुंच पाता उस से पहले ही फोन डिस्कनेक्ट हो गया....

"" क्या हुआ...आप इतनी परेशान क्यों दिख रही है...??""

मुझे इस तरह सवाल करते देख मम्मी थोड़ा घबरा गई लेकिन खुद को संभालते हुए उन्होंने मुझ से कहा....

"" बाबा जी का फोन था....आज पूजा के वक़्त जो उन्होंने कहा बस उसी के बारे में मुझे कुछ बेटा रहे थे....चल अब सबके साथ बैठ....प्रीति आइस क्रीम ले अाई है...""

में बिना कुछ बोले उनके पीछे हो लिया और जाकर फिर से डायनिंग टेबल की कुर्सी पर खुद को बैठा लिया....

आराध्या और सलोनी आपस मै बातें कर रहे थे जबकि आरोही अपने टैबलेट पर कुछ सर्च कर रही थी....

चाची ने आइस क्रीम सर्व करी सबको और वो भी मम्मी के पास वाली कुर्सी पर बैठ गई....मैंने अभी आइस क्रीम खाने के लिए स्पून उठाया ही था कि मम्मी बोल पड़ी....

"" प्रीति महाराज को बोलना की हम कुछ दिनों के लिए कल बाहर जा रहे है, और उसके बाद मेरे पास आना तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है...""

इतना बोल कर मम्मी चुप हो गई और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए आइसक्रीम खाने के लिए कहा.....

हम सब अब अपने अपने रूम मै दाखिल हो चुके थे सलोनी और आराध्या फिलहाल एक रूम मै ही थे जबकि आरोही अपने रूम मै.....मैंने चाची को मम्मी के रूम की तरफ जाते हुए देखा और अपना दरवाजा बंद करके बिस्तर पर लेट गया....

मम्मी के रूम मै....

"" प्रीति अभी कुछ ही देर पहले बाबा जी का कॉल आया था.....ना जाने उन्हें कैसे पता चला की आराध्या भी हमारे साथ रुकी हुई है....""

अपने हाथ मै पकड़े उस काले पैकेट को एक तरफ रखते हुए सुमन प्रीति से कहती है...

"" उन्होंने कहा है को आराध्या के यहां आ जाने से उस पर भी खतरा हो गया है....""

"" लेकिन आराध्या का इन सब बातों से क्या लेना देना है.....वो तो हमारे परिवार का हिस्सा भी नहीं है जो उस पर किसी तरह का खतरा हो....""

प्रीति ने अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए कहा वहीं सुमन से मिला जवाब उसके होश उड़ा देने के लिए काफी थे....

"" बाबा जी ने कहा है कि आराध्या वो भस्म मुझे लगाएगी जो पहले काली लगाने वाला था और जो भस्म मुझे दी गई थी काली को लगाने के लिए वो अब आराध्या लगाएगी काली को और बची हुई आधी भस्म काली आराध्या को लगाएगा....पता नहीं किस विपत्ति मै फस गए है हम लोग.....बाबा जी की कहीं बात पत्थर की लकीर होती है प्रीति.....मैंने जब उनसे पूछा कि आराध्या ही क्यों....उस बेचारी का तो कोई लेना देना ही नहीं है इस परिवार से फिर उस पर खतरा क्यों..??""

सुमन बोलते बोलते अचानक रुक गई और उन्हें इस तरह रुका देख प्रीति ने कहा....

"" आपके सवाल का जवाब मिला भाभी....बाबा जी ने क्या कहा जब आपने उन्हें ये कहा...???""

प्रीति की तरफ देखते हुए सुमन ने कहा....

"" हर राज खुलने का एक सही वक़्त होता है....और वो वक़्त अभी नहीं आया है.....बस इतना ही कहा बाबा जी ने और फोन डिस्कनेक्ट हो गया...""

प्रीति भी अब सुमन कि बगल मै अपना सर पकड़ कर बैठ गई और कहने लगी....

"" कैसे समझाऊं मै आराध्या को.... कैसे बोलू उसको की काली के सामने अपने कपड़े उतार दे या फिर काली के नग्न जिस्म पर वो भस्म लगा दे.....एक मन तो कहता है की ये सब कुछ अंधविश्वास है लेकिन दूसरी तरफ आप सब को देखती हूं तो ऐसा लगता है कहीं ये सब कुछ सच तो नहीं....पहले काली के पापा गुजर गए फिर आरोही ने नींद कि गोलियां खा ली उसके बाद नवीन के साथ जो कुछ भी हुआ वो असंभव ही तो था....हॉस्पिटल कि सीसी टीवी फुटेज मैंने भी देखी थी भाभी....किस तरह नवीन पर वो जुनून सवार हो गया था....हमारे परिवार को किसी की बुरी नजर लग गई है भाभी....में नवीन को तो नहीं बचा सकी लेकिन अब कोई नहीं मरेगा इस घर मै....में बात करती हूं आराध्या से.....उसको ये काम करना ही होगा....""

अपनी बात कह प्रीति फुर्ती से उठी और पास में पड़ा काले रंग का पैकेट उठा लिया जो काली के जिस्म पर लगना था....

वहां से निकल कर प्रिती सीधा सलोनी के रूम की तरफ बढ़ गई जहां आराध्या और सलोनी सोने की तैयारी कर रहे थे....

सलोनी -- चाची आप....क्या हुआ चाची सब ठीक तो है ना....

प्रीति को इस तरह गुस्से से धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल होते देख सलोनी घबरा सी गई....तभी प्रीति ने कुछ कहा....

"" सलोनी तू अभी तक यही है...?? बाबा जी ने वो भस्म दी थी वो आरोही को लगाई या नहीं अभी तक....??""

सलोनी ने कुछ जवाब नहीं दिया बस अपना सर नीचे झुका लिया.....सलोनी को इस तरह से देख प्रीति भड़क उठी....

"" तू चाहती क्या है सलोनी.....तेरे पापा और चाचा की मौत को तू इतना लाईटली कैसे ले सकती है....क्या तू चाहती है भाभी को कुछ हो जाए...??""

प्रीति को इस तरह आग बबूला देख सलोनी घबरा गई जबकि आराध्या बिस्तर छोड़ दीवार के सहारे खड़ी हो कर थरथराने लगी.....

तभी प्रीति ने एक बार फिर से सलोनी को डांटते हुए कहा....

"" तुझे जो करने के लिए कहा गया है वो बहुत आसान है सलोनी.....अगर तुझे पता होता कि तेरी मम्मी मैं और आराध्या क्या करने वाले है तू यहीं बेहोश हो जाती.....अब इस से पहले की में कुछ कर बेठू जा और जा कर वो काम कर जो तुझे और आरोही को बाबा जी ने कहा था....""

प्रीति इस वक़्त गुस्से से सरोबार हो गई थी.....गुस्सा आए भी क्यों नहीं बात उसकी बहन आराध्या की जो थी....प्रीति कैसे समझौता कर लेती की उसकी बहन एक लडके के सामने नंगी हो जाए.....लेकिन फिर भी अपना गुस्सा काफी हद्द तक दबा लिया प्रीति ने....

सलोनी अपने रूम से बाहर निकल चुकी थी और वो पैकेट साथ ले जाना बिल्कुल भी नहीं भूली जो उसे आरोही को लगाना था....

सलोनी के जाते ही प्रीति ने आराध्या से कहा....

"" अारू....मेरे बच्चे बता तू तेरी बहन के लिए क्या कर सकती है....""

दीवार के सहारे खड़ी आराध्या के पैर इस वक़्त कम्पन कर रहे थे लेकिन अपनी बड़ी बहन की प्यार भरी आवाज सुन आराध्या ने कहा....

"" दी क्या हुआ.....आज आप इतना गुस्से मैं क्यों हो.....आप जो बोलोगी मै वो करूंगी लेकिन प्लीज पहले बताओ तो की बात क्या है...""

आराध्या अभी इतना ही बोल पाई थी कि प्रीति बरस पड़ी उस पर....

"" तुझे इतना लाड़ किया मैंने जिसका कोई मोल नहीं....तू एक बार मुझ से पूछती कि प्रीति दीदी आप मेरे लिए क्या कर सकती हो.....जान दे देती में तेरे इक बार कहने भर से या फिर जान ले भी लेती.....लेकिन तूने आज तेरी दी का दिल दुखाया है आराध्या.....जा आज के बाद तू मेरी कोई भी नहीं....""

प्रीति की बात सुनते ही आराध्या की आंखो से आंसुओ कि धारा बह निकली.... उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब हो क्या रहा है....क्यों उसकी सबसे प्यारी सहेली उसकी बहन उस से इतनी नाराज है कि आज पहली बार अारु की जगह आराध्या नाम उसके मुंह पर आया....वो रोती बिलखती प्रीति के पैरों मै गिर पड़ी और आंसुओं से डूबी आंखो से अपनी प्यारी दी की तरफ देख कर बोली.....

"" दी आप जो कहोगी में करूंगी.... प्लीज आप मुझ से गुस्सा मत रहो.....मम्मी ने कभी मुझे प्यार नहीं किया लेकिन बस पापा के अलावा बस आप ही थी जो मेरी बड़ी बहन से ज्यादा मेरी दोस्त भी थी......आपका दिया हुआ प्यार मै कभी भूल नहीं सकती दी..... प्लीज मुझे बताओ कि मुझ से क्या गलती हो गई....""

दुनिया में सब से ज्यादा जिसे चाहा प्रीति ने वो उसकी बहन आराध्या ही थी, कैसे कहेगी प्रीति अपनी प्यारी बहन को किसी लड़के के सामने नंगी हो जाने के लिए कैसे कहेगी की किसी नग्न युवक के जिस्म पर भस्म भी रमानी है उसे....

फिर मिलते है........

 
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