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काल – सर्प

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काल – सर्प

आह.... आह्ह.... आह....और जोर से बेटा और जोर से...फाड़ दे तेरी मां का भोसड़ा इस से पहले की तेरा बाप वापस आ जाए......

रात के 11.46 हो रहे थे लेकिन जंगल से गुजरती इस सुनसान रोड पर सिर्फ एक वाहन ही काफी देर से खड़ा हुआ था जिसकी पार्किंग लाइट जोरो शोरो से जल बुझ रही थी....वहीं रोड के किनारे झाड़ियों में से लगातार थप....थप...की आवाजे आए जा रही थी जैसे कोई तबले पे ताल दे रहा हो....

आह.....मजा आ गया मेरे बेटे.....मजा आ गया....आज इतने बरसों बाद तूने मेरी आग भुजाई है सच में आज तो मजा आ गया....

पूर्ण रूप से मादर जात नंगी औरत एक विशाल वृक्ष पे अपने हाथ टिकाकर घोड़ी बनी हुई थी, और और पीछे से घपा घप उसका सगा बेटा अपने हाहाकरी लौड़े से अपनी मां के पूरी तरह से खुले हुए भोसड़े मै अपना लन्ड पेले जा रहा था.....

कभी वो अपनी मां के लटकते हुए बोबे अपनी हथेलियों से दबाता और कभी घोड़ी बनी अपनी मां के चूतड़ अपने हाथो से चोडे करता....

तकरीबन पंद्रह मिनट चले इस खेल में दोनों की पोजिशन एक ही थी....अभी लड़के का पानी छूटने ही वाला था कि....

.... तड़ाक.....किसी ने एक मजबूत डंडे से उस लड़के के सिर पे प्रहार किया और चोट लगते ही वो लड़का किसी पर कटे पंछी की तरह जमीन पर आ पड़ा....

"" नहीं नहीं.... प्लीज मेरे बेटे को छोड़ दो.....इसमें इसका कोई कसूर नहीं है सारा किया धरा मेरा ही है.....""

लेकिन उस औरत की बात पे ध्यान ना देते हुए उस वयोवृद्ध ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ फरसा नीचे बेसुध पड़े युवा के सीने पे गाड़ दिया.....

पसलियों के बीचों बीच फरसा गड़ा हुआ था और तभी उस वयोवृद्ध ने अपने झोले से एक चाकू जैसा हथियार निकाला और उस लड़के का लिंग पकड़ के एक झटके मै काट डाला....

ये दृश्य देख कर वो औरत तुरंत ही बेहोश हो गई....

एक महीने बाद

महानगर मुंबई.....

कहते है मुंबई की हवा भी निराली होती है अगर आप कुछ करना चाहे तो मुंबई किसी रण्डी की तरह अपनी टांगे खोल कर स्वागत करती है....लेकिन यदि आप सिर्फ मुंबई के स्वभाव के अनुरूप ढलते हो तो दो वक़्त की रोटी भी नसीब हो जाए ये बड़ी बात है....

लेकिन वहीं कुछ ऐसे लोग भी है जिन्होंने कभी अपने आप से समझौता नहीं किया.... खूद भले से भूखे सो गए हो लेकिन किसी गरीब को भूखा सोने ना दिया.....और ये बात तो आप भी जानते हो की कोन ऐसी कुव्वत रखता होगा जो किसी गरीब को भूखा सोने ना दे....कम से कम कोई गरीब तो ऐसा कारनामा नहीं कर सकता....

यहां बात हो रही है सेठ नरेंद्र अग्रवाल के ज्येष्ठ पुत्र अशोक की.....ईश्वर का दिया क्या नहीं था उस परिवार के पास...अरबों खरबों की सम्पत्ति....ना जाने कितनी जमीन और ना जाने कितने बाग़ बगीचे....लेकिन अशोक के पिता का बस एक सपना था कि जहां भी उसका घर हो उसकी एक किलोमीटर परिधिं में कोई भी जीव भूखा ना सोए....शायद अपने इन्हीं पुण्य कर्मों की वजह से ये परिवार इतना सुदृढ़ था....

तकरीबन दो वर्ष पहले नरेंद्र अग्रवाल की मृत्यु हृदयघात से हो गई थी....उसके बाद ही सारे काम काज कि जिम्मेदारी अशोक के उपर आ गई जो कि लगभग 52 साल का होने आया था.....

45 साल की अशोक की धर्म पत्नी सुमन जो कहीं से भी युवा नहीं लगती थी,

यहां मै पाठकों को बताना चाहता हूं कि सेक्स के लिए युवा होना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है...

अक्सर सुमन ईश्वर की आराधना में ही अपना वक़्त लगाती थी.....कभी संतो को भोजन कभी निर्धनों को दान....या फिर एक तरह से कहे तो अपने ससुर नरेंद्र अग्रवाल की ही तरह दिव्यात्म्मा थी सुमन....

अशोक और सुमन की सबसे बड़ी लड़की आरोही.... कद तकरीबन 5 फीट 6 इंच .... संगमरमर की तरह आकर और वर्ण मै ढला उसका बदन जो किसी भी कमजोर दिल इंसान की सांसे रोक देने के लिए काफी था....

उसके बाद नंबर आता है सलोनी का जो कि अपने नाम के अनुरूप सांवला रूप लेकिन दीप्तिमान रूप में इस धरा पे प्रकट हुई है.....सिर्फ रंग की वजह से ही सलोनी आरोही से मात खाती है लेकिन अगर कोई उन दोनों बहनों की तुलना करने पे आए तो सलोनी जीते बल्कि उन लोगो का घमंड भी चकना चुर कर दे जो सिर नाप जोख कि दुनिया में विश्वास रखते है.....

मेरा नंबर सबसे आखिरी मै आता है....सलोनी से महज तीन मिनट छोटा हूं मैं....वैसे तो दिखने में मैं ठीक ठाक ही हूं लेकिन रंग मेरा सांवला बिल्कुल भी नहीं है....मुझे जन्म देते वक़्त शायद मां को कोई इंफेक्शन हुआ था जिस वजह से सलोनी सांवली और मेरी रंगत काली हो गई थी....

ये मेरा छोटा सा परिवार है.....होने को तो चाचा ताऊ या फिर मामा लोगो का भी परिवार है....लेकिन जो मैंने बताया वो सिर्फ मेरा परिवार है...

.......................................

 
आज का दिन बेहद खास था , और खास हो भी क्यों ना अशोक अग्रवाल और सुमन की शादी की सालगिरह जो थी....

सुबह से ही हर कोई हमारे घर के बाहर खड़ा अपनी शुभकामनाए देने के लिए इंतजार कर रहा था....

"" काली... उठ यार कितनी देर तक सोएगा....देख बाहर कितनी भीड़ इकट्ठा हो गई पापा मम्मी को एनिवर्सरी की बधाई देने के लिए....चल उठ अब और जल्दी से रेडी हो जा , नहीं तो तू यही सोता रह जाएगा और हम मंदिर चले जाएंगे..""

सलोनी मुझे झकझोरती है कि में उठ जाऊं लेकिन में फिर भी ऐसे ही पड़ा रहता हूं....तभी मेरे कानो में एक आवाज पड़ती है...

"" काली उठ रहा है या डंडा लाऊ....""

पापा की आवाज सुनते ही एक जोर का झटका लगा मुझे और मै बिना एक क्षण गवाए उठ के खड़ा हो गया....

पापा की लाल सुर्ख आंखे मुझे ही घूर रही थी....दुनिया में अगर मुझे किसी चीज से डर लगता है तो वो सिर्फ पापा से....

सलोनी भी थोड़ी घबरा सी गई थी मैंने जब उसकी तरफ देखा तो वो बेहद घबराई अपनी हथेली आपस में रगड़ रही थी....

मैंने ज्यादा वक़्त ना लगते हुए बाथरूम की तरफ दौड़ लगा दी जो कि मेरे कमरे में ही अटैच था....

तकरीबन 15 मिनट बाद मैं बाथरूम से बाहर निकला और देखा सलोनी भी तैयार हो कर आ चुकी थी...

उसने एक फ्रॉक पहना था जो कि उसके घुटनों तक था शोल्डर पे कपड़ा ना के बराबर था ....उसकी सांवली लेकिन मांसल बांहे पूरी तरह से नुमाया थी...

"" चल अब जल्दी से कपड़े पहन ले....और नीचे आ जा , और प्लीज़ अब देर मत करना वरना पापा का गुस्सा तो तू जानता ही है ""

इतना कह के सलोनी नीचे हॉल में चली गई और में एक जींस और लाइट ब्राउन कलर की राउंड नेक टीशर्ट पहन के उसपर डेनिम जैकेट डाल ली....

वैसे मै कुछ भी पहन लू मेरे ऊपर कुछ भी अच्छा नहीं लगता....और शायद मेरा रंग ही वो वजह थी जो मुझे पापा कि नफरत बचपन से ही तोहफे में मिली थी...

नीचे घर के सभी सदस्य थे सिवाए आरोही के ....सभी खुश लग रहे थे सिवाए सलोनी के...

मै उसके पास जाकर खड़ा हो गया और कहने लगा....

"" क्या हुआ अब तूने क्यों मुंह लटका रखा है....""

सलोनी ने मेरी आंखो में देखा और मुझे उसकी आंखो में जो नजर आया ,वैसा मैंने कभी नहीं देखा सलोनी की आंखो में...

"" काली तेरे साथ पापा अच्छा नहीं करते है....देखना भगवान इस जुर्म के लिए उन्हें सजा जरूर देगा...ये मेरी बद्दुआ है मेरे बाप के लिए...""

इतनी नफरत इतना गुस्सा....कैसे सलोनी अपने छोटे से दिल में रख के बैठी है....वो भी सिर्फ मेरे लिए जो ना चाहते हुए ऐसा रंग लेकर पैदा हुआ जो किसी को पसंद नहीं...

"" कैसी बातें कर रही है सलोनी...? पापा का मुझ पे गुस्सा करना कोई आज कि बात तो है नहीं....ये सब कुछ तो बरसो से चला आ रहा है इग्नोर मार इन सारी बातों को और एक अच्छी सी स्माइल लेकर आ अपने चेहरे पे...""

अपनी बात कह के मैंने सलोनी के गाल सहला दिया और वो भी किसी फूल कि तरह मुस्कुरा उठी....

अभी हम दोनों अपने आप में ही खोए थे कि पापा की आवाज फिर से सुनाई दी...

"" मंदिर के लिए नए जेवर और छत्र ले लिए ना सुमन...और आरोही कहा है....सुबह से मुझे वो दिखाई नहीं पड़ी""

मम्मी ने गहनों का बैग उठाते हुए कहा ...

"" आरोही मंदिर में ही मिलेगी हमे, वो सुबह जल्दी ही निकल गई थी मंदिर कि सजावट के लिए...""

पापा ने अपनी गर्दन हिलाई और कहा...

"" एक वहीं है जो अपने काम के प्रति जिम्मेदार है...यहां तक कि सलोनी भी कभी उसके जैसी फुर्ती नहीं दिखा पाती....बस एक नासूर ही पता नहीं कहां से पैदा हो गया....""

पापा का इतना बोलना ही हुआ था कि मैंने सलोनी का हाथ पकड़ लिया....मै नहीं चाहता था कि आज के दिन सलोनी मेरी वजह से पापा से कुछ कहे...लेकिन मम्मी का हाथ किसी ने नहीं पकड़ा था...

 
"" आप हर वक़्त ही क्यों काली को दोष देते रहते हो...?? अगर आपको किसी को इस बारे में दोष देना ही है तो वो सिर्फ आपको मुझे देना चाहिए.....ये मेरी गलती थी जो मुझे इंफेक्शन हुआ और उसकी वजह से काली को मेरी कोख में ही इंफेक्शन हो गया....हजार बार आपको समझा दिया भगवान ने हमे जो दिया है वो काफी है....लेकिन नहीं आपके लिए तो मेरी कोख से एक नासूर पैदा हो गया....बस बहुत हुआ मेरे बेटे के लिए एक ओर शब्द में बर्दाश्त नहीं करूंगी...""

पापा अपनी जगह से उठे और कहने लगे....

"" जब तक मैं जिंदा हूं, मैं कभी इस नासूर की शक्ल भी नहीं देखूंगा....दिया होगा भगवान ने तुम्हे तोहफा...पालती रहो इस नासूर को....मेरे खानदान का नाम रोशन करने वाला कम से कम इतना बदशकल तो नहीं हो सकता....अगर ये भगवान का दिया तोहफा है तो में चाहूंगा कि वो ये तोहफा वापस ले जाए....नहीं चाहिए मुझे ऐसा तोहफा....""

अपनी बात कह कर पापा मम्मी के हाथ से गहनों का बैग लगभग छीन कर घर से बाहर निकल जाते है....उनके जाते ही मम्मी कि रुलाई फुट पड़ती है....उनको इस तरह से बिखरता देख में और सलोनी उन्हें कस के गले से लगा लेते है....

"" क्या दोष है मेरे मासूम बच्चे का....इतनी नफरत किस लिए....मेरे बच्चे से इतनी नफरत किस लिए....???""

मम्मी लगभग चीखने ही लगी थी, इतना गुस्सा कभी भी नहीं देखा मैंने उनके अंदर...लेकिन आज पहली बार अहसास हुआ की वो कितना कोसती होंगी खुद को वो बार बार चिखे जा रही थी...

"" मेरे बच्चे से इतनी नफरत किस लिए....मेरे बच्चे से इतनी नफरत किस लिए....??""

"" मम्मी प्लीज़ शांत हो जाओ....आप अगर ऐसा करोगी तो कैसे जी पाऊंगा में....एक आप और एक सलोनी ही तो हैं जिसने मुझे इतना प्यार दिया....नहीं चाहिए मुझे पिता का प्यार....मुझे बस आप दोनों चाहिए हमेशा मेरे साथ और कुछ नहीं चाहिए मुझे.... प्लीज़ मम्मी चुप हो जाओ आपको इस हालत में नहीं देख सकता में....""

अचानक मम्मी ने खुद के आंसू पोंछे और खड़ी हो कर घर में बने मंदिर की तरफ भागने लगी और वहां पहुंच कर भगवान के सामने दंडवत हो गई ...

"" मेरा पति कहता है कि मेरा बेटा नासूर है.....वो उसकी शक्ल कभी नहीं देखेगा....तो मैं सुमन आज ये प्रतिज्ञा लेती हूं आज के बाद अशोक अग्रवाल से मेरा कोई रिश्ता नहीं है....वो मर भी जाएगा तो में कभी उसकी शक्ल नहीं देखूंगी....मेरे बच्चे ने क्या बिगाड़ा किसी का....मेरे बच्चे से इतनी नफरत क्यों..........

..................................

मम्मी अभी भी बैठी सुबक रही थी....पिछले आधे घंटे के अंदर घर कि सारी तस्वीरें टूट चुकी थी जिसमे अशोक अग्रवाल की शक्ल हो....

आज इतने सालों मै पहली बार मैंने मम्मी को इतने गुस्से में देखा....हमेशा जब मुझे पापा कि बातों से तकलीफ होती थी तब वो ही मुझे बिखरने से बचाती थी और साथ ही साथ समझाती भी थी कि जैसे जैसे तेरी उमर होगी वैसे वैसे पापा के दिल से भी नफरत निकल जाएगी....लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ....अब तो ऐसा लग रहा था कि जैसे जैसे मेरी उमर बढ़ रही है , पापा कि नफरत भी बढ़ती जा रही है....

"" हम ये घर छोड़ देंगे....नहीं रहना मुझे वहां जहां मेरे बच्चो को सम्मान नहीं मिले...""

मम्मी ने सुबकते हुए सलोनी से अपने दिल की बात कही....

मम्मी की बात सुनकर मेरा भी गला भर आया...

"" नहीं मम्मी... नहीं....आप लोग कही नहीं जाएंगे ये घर छोड़ कर.....अब वक़्त आ गया है कि में यहां से निकल जाऊं...में आज ही नानी के यहां जा रहा हूं...""

"" तू पागल तो नहीं हो गया....एक तो पहले ही मम्मी का रो रो के बुरा हाल हुआ है , और तू अब घर छोड़ने की बात कर रहा है....कम से कम हमारा तो ख्याल कर की तेरे बिना हमारा क्या होगा....कोई कहीं नहीं जाएगा घर छोड़ के...और मम्मी प्लीज़ अब आप भी शांत हो जाओ ""

सलोनी ने जो कुछ भी कहा वो एक तरह से सही था, लेकिन मेरे लिए अब इस घर में रहना काफी मुश्किल हो चुका था.... कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब करूं भी तो क्या....

""ट्रिंग.....ट्रिंग....ट्रिंग.....ट्रिंग.......""

हॉल में पड़ा लैंड लाइन अचानक से बजने लगा....

मैंने सलोनी की तरफ देखा और उसने मेरी बात समझ के वो फोन पिक कर लिया....

"" हैलो ....??""

"" क्या....??""

""क्या बोल रही हो दीदी.... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा...""

"" किसका...?? ""

"" हम लोग आ रहे है आप चिंता मत करो""

इतना बोल कर सलोनी ने फोन वापस अपनी जगह रखा और बोलने लगी...

"" आरोही दीदी का फोन था.....वो रोए जा रही थी और बस बार बार यही बोले जा रही थी कि फोर्टिस आ जाओ....खून बह रहा है जल्दी आ जाओ....??? ""

सलोनी की बात सुनकर मम्मी भी घबरा गई में भाग कर बाहर निकला और पार्किंग से ऑडी आर एस फाइव निकाल कर ले आया....

हॉर्न की आवाज सुनते ही सलोनी और मम्मी लगभग भागते हुए कार तक आए और मैंने द्रुत गति से कार नजदीकी फोर्टिस हॉस्पिटल की तरफ बढ़ा दी....

 
हॉर्न की आवाज सुनते ही सलोनी और मम्मी लगभग भागते हुए कार तक आए और मैंने द्रुत गति से कार नजदीकी फोर्टिस हॉस्पिटल की तरफ बढ़ा दी....

आज सुबह से ही सब गड़बड़ हो रहा है....पहले मम्मी पापा का मेरी वजह से झगड़ा और अभी ये आरोही का फोन कॉल....समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किस की नजर लग गई मेरे परिवार को....

तकरीबन 15 मिनट का डिस्टेंस मैंने 6 मिनट में पूरा कर लिया था....हॉस्पिटल के बाहर इतनी भीड़ देख कर हम सभी के चेहरों पर और भी ज्यादा घबराहट आने लगी थी....

तभी एक सिक्योरिटी गार्ड आया और बोला....

"" आप कार कि चाबी मुझे दे दीजिए इसे में पार्क कर दूंगा.....पहले आप जल्दी से अंदर जाइए साहब कि हालात बहुत ज्यादा खराब है....""

में झट से गाड़ी से बाहर निकला और मेरे साथ साथ पीछे का दरवाजा खोल के सलोनी और मम्मी भी रिसेप्शन कि तरफ भाग पड़े.....

अभी हम रिसेप्शन पे पहुंचे ही थे कि वहां पापा के काफी सारे जानकर मौजूद थे....सलोनी अपने मोबाइल से आरोही को फोन लगा चुकी थी और उसने इमरजेंसी वार्ड में आने का बोल कर फोन काट दिया...

रिसेप्शन से आगे इमरजेंसी वार्ड की तरफ किसी को भी नहीं जाने दिया जा रहा था लेकिन हम तीनो को देखते है एक गार्ड भागता हुआ आया और बरेकैट्स पार करवाता हुआ इमरजेंसी वार्ड तक पहुंचा दिया....

मुझे बाहर ही आरोही दिख गई जो मम्मी को देखते ही उनके सीने से लग के रोने लगी.....

"" मम्मी .....पापा को किसी ने गोली मार दी...."" इतना कहते ही वो बुरी तरह से रोने लगी....और उसके साथ ही साथ मम्मी भी, लेकिन ना मेरी आंख में आंसू थे और ना ही सलोनी की आंखो में आंसू का एक भी कतरा....

"" अब कैसे है पापा...??""

मैंने दीदी से सवाल किया लेकिन जवाब मुझे नहीं मिला...

"" सलोनी इसको बोल यहां से चला जाए....इस मनहूस को यहां होना ही नहीं चाहिए ...""

अभी दीदी का इतना बोलना ही हुआ था कि मम्मी ने दीदी को एक झटके से खुद को अलग किया और एक झननाटे दार थप्पड़ रसीद कर दिया....

"" तुम सब लोगो को आखिर हो क्या गया है...क्यों मेरे बच्चे के पीछे पड़े हो....चल काली यहां से चल वापस घर....मुझे वहां एक पल भी नहीं रहना जहां तेरा सम्मान ना हो ""

अभी मम्मी और कुछ कहती इस से पहले ही इमरजेंसी का दरवाजा खुला और एक डाक्टर बाहर आया....

"" आई एम सॉरी....हम लोगो ने काफी कोशिश करी लेकिन सेठ जी को बचा नहीं पाए ""

इतना सुनते ही मम्मी वहीं बिखर गई....उनका रुदन मुझे अन्दर तक हिला रहा था....दीदी भी मम्मी से चिपक के तो रही थी जबकि सलोनी मम्मी और आरोही दीदी को संभालने की कोशिश कर रही थी.....

आज हम सभी की आंखे नम थी....चाहे हमारा बाप कैसा भी था लेकिन था तो बाप ही....

......................................

जहां पूरा शहर खुशियों की तैयारी में लगा हुआ था, वहीं अब शहर के बाशिंदे मातम मै डूबे स्व.अशोक अग्रवाल के घर के बाहर बैठे थे....हलकी हलकी बारिश भी बरसने लगी थी जैसे आज ईश्वर भी गम में डूबा हो...

घर के अंदर हॉल के बीचों बीच अशोक अग्रवाल का पार्थिव जिस्म पड़ा था जो कि चेहरे से लेकर पैरों तक सफेद चादर में लिपटा हुआ था....

अशोक के सर पे गोली लगी थी जिस वजह से उसका चेहरा भी विकृत हो गया था....शायद इसी वजह से मम्मी कि प्रतिज्ञा का मान भी रह गया....

मम्मी एक कोने में बैठी सुबक रही थी , पूरी तरह से बेसुध जैसे उनकी पूरी दुनिया उजड़ गई हो....परिवार और सोसाइटी की औरतें उन्हें ढांढस बंधाने का भरसक प्रयास कर रही थी....वहीं आरोही भी अपनी कुछ फ्रेंड्स के साथ उनके गले लग आंसू बहाए जा रही थी.....

मेरी बाहों के घेरे से निकलती हुई सलोनी ने धीरे से कुछ कहा....

"" ये सब कुछ मेरी ही गलती कि वजह से हुआ है ....ना जाने क्यों भगवान से पापा को सजा देने की बात कही और ये देखो क्या हो गया....""

इतना कहते ही वो फिर से एक बार फफक फफक के रोती हुई मेरे सीने से जुड़ गई...

हमेशा पापा मुझ से नफरत किया करते थे लेकिन ना जाने क्यों मुझे उनकी कमी महसूस हो रही है , मेरी ज़िन्दगी मै वो एक दुस्वप्न कि तरह थे लेकिन थे तो आखिर पिता ही.....

तभी किसी को देख हॉल में थोड़ी हलचल होने लगी.....जो अभी अभी हॉल में दाखिल हुआ

उसके जिस्म से चिपका काला कोट उसके वकील होने कि गवाही चीख चीख के दे रहा था....

उसने जमीन पे बैठते हुए पार्थिव देह के चरण स्पर्श करें और अपने साथ लाई एक फाइल खोल के उसे जोर जोर से पढ़ने लगा....
 
उसने जमीन पे बैठते हुए पार्थिव देह के चरण स्पर्श करें और अपने साथ लाई एक फाइल खोल के उसे जोर जोर से पढ़ने लगा....

"" मैं अशोक अग्रवाल पुत्र स्वर्गीय श्री नरेन्द्र अग्रवाल अपने होशो हवास में ये वसीयत नामा तैयार करवा रहा हूं....

ईश्वर की तरह ये भी एक सत्य ही है कि मृत्यु भी एक ना एक दिन आनी ही है....मेरे पिता स्वर्गीय श्री नरेंद्र अग्रवाल मेरे लिए अथाह संपति एवम् कारोबार छोड़ के गए जिसे मैंने उनका आशीर्वाद समझ कर और आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी....

अपने सभी अकाउंट्स और कंपनी की सारी जानकारियां मैंने इस वसीयत नामे के साथ संलग्न करी है.....ईश्वर के आशीर्वाद से मेरी हर कंपनी शुद्ध मुनाफा कमा रही है और साथ ही साथ आने वाले कई सालों तक उन्हें कोई छू भी नहीं पाएगा....

में ये वसीयत नामा इसलिए कर रहा हूं ताकि जब मैं ना रहूं तो प्रोपर्टी को लेकर किसी भी तरह का झगड़ा या विवाद मेरे परिवार में ना हो....

1. सुमन अग्रवाल धर्म पत्नी श्री अशोक अग्रवाल

सभी कंपनियों और प्रोपर्टी में इनकी साझेदारी 19 % रहेगी...मुझे पता है मेरी सुम्मी को धन का बिल्कुल भी लोभ नहीं है लेकिन उसके भविष्य और उसके अगले एकाकी जीवन के लिए ये मात्र एक क्षतिपूर्ति होगी....

( आगे बढ़ने से पहले वकील थोड़ा खखार के अपना गला दुरुस्त करता है और आगे पढ़ने लगता है )

2 . आरोही अग्रवाल पुत्री श्री अशोक अग्रवाल

सभी कंपनियों और प्रोपर्टी में इनकी साझेदारी 15 % की रहेगी....शादी होने के बाद भी आरोही की साझेदारी उसके पति को ट्रांसफर नहीं होगी....और ना ही आरोही किसी भी तरह के कानून का सहारा लेकर अपनी साझेदारी ख़तम अथवा बेच सकती है.....आरोही मेरी बच्ची तू मेरा घमंड है , और अपने बाप के घमंड की लाज रखना.....

3. सलोनी अग्रवाल पुत्री श्री अशोक अग्रवाल

सभी कंपनियों और प्रोपर्टी में इनकी साझेदारी 15 % की रहेगी....शादी होने के बाद भी सलोनी की साझेदारी उसके पति को ट्रांसफर नहीं होगी....और ना ही सलोनी किसी भी तरह के कानून का सहारा लेकर अपनी साझेदारी ख़तम अथवा बेच सकती

सलोनी मेरी बच्ची....दिमाग से तेज़ इरादों की पक्की तुझे हमेशा मैने खुद से दूर रखा मैंने कभी नहीं चाहा की अपने बाप की छांव में रह कर तू कमजोर रह जाए अपने बाप के किए ज़ुल्मो को माफ करना मेरी बच्ची...

4. नवीन अग्रवाल पुत्र श्री नरेन्द्र अग्रवाल

मेरे छोटे भाई वैसे तो भगवान का दिया तेरे पास सब कुछ है लेकिन आज में तुझे एक जिम्मेदारी देना चाहता हूं....

किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में सुमन कि हिस्सेदारी को छोड़ के सभी की हिस्सेदारी पिता जी के द्वारा शुरू किए गए ट्रस्ट को ट्रांसफर हो जाए....वैसे मुझे पता है ऐसी स्थिति कभी आएगी नहीं लेकिन फिर भी अगर ऐसा कुछ कभी होता है तो मेरा ये छोटा सा काम जरूर करना मेरे भाई.....

5. काली अग्रवाल पुत्र श्री अशोक अग्रवाल ....

सभी कंपनियों और प्रोपर्टी में इनकी साझेदारी 51% की रहेगी ....51% का मतलब काली जब चाहे तब कंपनी बेच सकता है अपनी मां के साथ साथ अपनी बहनों की संपति साझा कर सकता है लेकिन ये सब तभी संभव होगा जब तक कि उसकी मां अपना हिस्सा काली को दे दे....जबरदस्ती या धोखा देकर हड़पा गया किसी का भी हिस्सा कानून मान्य नहीं होगा....उस स्थिति में मेरा छोटा भाई नवीन अग्रवाल आगे की कार्यवाही के लिए स्वतंत्र है....

काली....तुझे हमेशा मैने घृणा से देखा हमेशा तुझे ये दिखाया की तेरा एकमात्र शत्रु में ही हूं ,और काफी हद्द तक में इसमें सफल भी हुआ लेकिन तूने कभी पलट कर मेरा प्रतिकार नहीं किया कभी भी कोई ऐसा काम नहीं किया जिस से मुझे शर्मिंदा होना पड़े....तुझ पर मैंने क्या क्या अत्याचार नहीं किए होंगे लेकिन शायद किसी ने सही कहा है जब तक भट्टी की आग में सोना नहीं तपता वो कभी कुंदन नहीं बन पाता.....तुझ से मैंने नफरत करी वो सिर्फ इसलिए कि मेरे जाने के बाद तू अपनी मां अपनी बहनों का इतना ख्याल रखे जितना में भी नहीं रख पाया....मैंने तुझे हमेशा प्यार किया लेकिन कभी अपनी बात किसी से कह नहीं पाया....आज अगर तू ये सब बाते सुन रहा है तो इसका मतलब में इस दुनिया में नहीं रहा.....

सम्पत्ति के साथ साथ मुझे दुश्मनों कि भी सौगात मिली थी इसीलिए में सम्पत्ति के साथ साथ दुश्मनों कि वो सौगात भी तुझे देकर जा रहा हूं....वकील साहब को मैंने एक पत्र और दिया है जो सिर्फ तेरे लिए है....हो सके तो उस पत्र को पढ कर उसकी लिखी हुई बातें समझने कि कोशिश करना....में कभी भी नहीं समझ पाया कि मेरे पिता ने मुझे ये पत्र किस लिए दिया और ना ही कारोबार की व्यस्तता के चलते मैंने कभी इस में लिखे को समझने की कोशिश करी....

मुझ से कोई गलती हो गई हो तो मुझे क्षमा करना...

गवाह

1. मनोहर कुमार ( सुप्रीम कोर्ट जज )

2. सदाशिव नारायण ( मुख्य मंत्री मुंबई )

3. एस . श्रीकांत ( करुणा फाउंडेशन )

4. नवीन अग्रवाल ( भाई )

........................................
 
वकील साहब अपनी जगह से उठे और मेरे करीब आकर मुझे वो फाइल और साथ में एक लेटर भी दे दिया....अभी मै कुछ बोलने ही वाला था कि मम्मी कि गमगीन आवाज मुझे सुनाई दी....

"" भटनागर साहब हमे कोई प्रोपर्टी नहीं चाहिए....कम से कम वो प्रोपर्टी तो नहीं जिसकी वजह से मेरे बच्चो के सर से उनके बाप का साया उठ गया....आप कुछ ऐसा कीजिए की ये सारी प्रोपर्टी ट्रस्ट में चली जाए क्योंकि मुझे यकीन है मेरे बच्चे खुद के साथ साथ अपनी मां को भी दो वक़्त की रोटी और सिर छुपाने के लिए एक छत आराम से दे सकते है.....हमे नहीं चाहिए भटनागर साहब कुछ भी, आप ले जाइए सब कुछ....अब मेरे परिवार मै कोई मौत नहीं होगी...""

अपनी बात कह कर मम्मी फूट फूट कर रोने लगी और मैंने भाग कर उन्हें अपने गले से लगा लिया....मम्मी की रुलाई रोकने से भी नहीं रुक रही थी....हम तीनो भाई बहन उन्हें शांत करवाने का भरसक प्रयास कर रहे थे लेकिन वो कैसे चुप हो जाए जिसका सब कुछ लूट गया हो....तभी मम्मी रोते रोते अचानक शांत हो गई..उनका जिस्म कोई हरकत नहीं कर रहा था....

और में ये सब देख चीख पड़ा....

"" कोई कुछ करो.....मम्मी को ये क्या हो गया है....ये कुछ बोल क्यों नहीं रही हैं.....??""

मेरी बाहों में निढाल पड़ी मम्मी के चेहरे पर आंसू की धारा भी अब नमक कि तरह जम चुकी थी....

तभी साइड मै बैठे बुजुर्गों मै से कुछ लोग उठे और मम्मी का हाथ पकड़ कर उनकी नब्ज टटोलने लगे....

उसके बाद एक बुजुर्ग ने एक पर्ची पर कुछ लिखा और अपने साथ खड़े एक युवा व्यक्ति को वो पर्ची पकड़ा दी....

उस युवा व्यक्ति ने एक नजर उस पर्ची पर डाली और भागता हुआ घर से बाहर निकल गया....

लगभग एक मिनट बाद ही वो युवा फिर से भागता हुआ आया लेकिन उसके हाथ में एक सिरिंज और दवाई की शीशी भी थी....जो शायद डाक्टर की गाड़ी में ही पड़ी थी

"" इन्हें अंदर रूम मै ले चलो....इन्हें इंजेक्शन लगाना पड़ेगा....""

मैंने बिल्कुल भी देर नहीं करी और एक झ्टके मै मम्मी को अपनी गोद में उठा लिया और उनके रूम की तरफ ले भागा....

डाक्टर ने इंजेक्शन लगा दिया था लेकिन मम्मी अभी भी निढाल पड़ी हुई थी....

"" ये क्या हो गया मम्मी को....?? प्लीज़ कुछ तो बोलिए सर...??""

आरोही ने मम्मी के चेहरे पर अपने मुलायम हाथ फेरते हुए डाक्टर से पूछा और उसके इसी सवाल की वजह से हमारे चेहरे भी प्रश्नवाचक हो कर डाक्टर को ही देख रहे थे....

"" इन्हें दिल का दौरा पड़ा था अभी अभी.....वैसे तो ये दौरा मामूली था लेकिन अगला अटैक इनकी जान लेने के लिए काफी होगा.....मैंने हॉस्पिटल फोन कर दिया है वहां से नर्स आकर ड्रिप लगा देगी...लेकिन अब तुम लोगो को इस बात का ध्यान रखना होगा कि इन्हें कोई तकलीफ़ ना हो. ।""

अपनी बात कह कर वो फिर से बाहर हाल में चले गए और हम सुबकते हुए मम्मी के सीने से जा लगे.....

शाम के 7 बज चुके थे अंतिम क्रिया कर हम सब अब घर पर ही मौजूद थे....नवीन चाचा मेरी बगल मै ही बैठे थे जबकि आए हुए काफी मेहमान या तो अपने अपने घर जा चुके थे या फिर जाने कि तैयारी कर रहे थे.....रिश्तेदारी के लोग ही अब घर में बचे हुए थे जिनकी रहने की व्यवस्था पास ही के एक रिजॉर्ट में कर दी गई थी....

मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए नवीन चाचा कहने लगे...

"" अब आगे क्या सोचा है तुमने काली.....तुम्हारे पिता और मै भाई की तरह कभी नहीं रहे, क्योंकि वो हमेशा मुझे एक बेटे की तरह प्यार करते थे....उनके चले जाने का अफसोस हमेशा हमारे दिल में रहेगा....""

में नवीन चाचा के सीने से लग कर कहता हूं....

""मुझे नहीं पता चाचा की इतना बड़ी जिम्मेदारी में संभाल भी पाऊंगा या नहीं ,क्या होगा अगर में सब कुछ खराब कर दूं....कारोबार संभालने का मुझे कोई तजुर्बा भी नहीं है....फिर कैसे होगा ये सब कुछ...? ""

चाचा ने मुझे कस कर अपने सीने से लगाया और कहने लगे...

"" तेरे पापा कभी भी नहीं चाहते थे कि तू उनका कारोबार संभाले......वो हमेशा यही चाहते थे कि तू आजाद रहे खुले गगन मैं उड़ने के लिए.....उनका ये भी सोचना था कि जो काम वो नहीं कर पाए तू उन सभी कामों को पूरा भी करे और अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से जी भी पाए.....कारोबार की चिंता मत कर ये जैसा चल रहा है वैसा ही आगे भी चलता रहेगा.....तेरे पापा ने अपार दौलत के साथ साथ भरोसेमंद साथी भी कमाए है और वो सब तेरे पापा को पूजते थे....दूर क्यों जाना....तेरे पापा मेरे लिए भी किसी भगवान से कम नहीं थे.......चल अब खड़ा हो जा और तेरी चाची को बुला कर लेकर आ तेरी मम्मी के रूम से..""

मै एक राहत की सांस लेता हुआ सोफे से खड़ा हुआ और बढ़ गया मम्मी के रूम की तरफ....

मैंने एक हलकी सी दस्तक दी दरवाजे पे और अंदर से चाची की आवाज आई...

"" खुला है....आ जाओ अंदर ....""

मैंने दरवाजे को धीरे से धकेला और रूम के भीतर दाखिल हो गया....

काफी बुरा लग रहा था मम्मी को इस तरह देख के...पलंग पे बेसुध हो कर सो रही मम्मी के हाथ में ड्रिप लगी हुई थी और चाची उनके सिरहाने बैठी उनके सिर पे हाथ फिरा रही थी....

मै आहिस्ता से चाची के पास पहुंचा और उनसे कहने लगा...

"" चाची....नवीन चाचा आपको बाहर बुला रहे है..""

चाची ने मेरा हाथ आहिस्ता से पकड़ा और मुझे अपने पास बैठा लिया और अपने मोबाइल से कॉल लगाने लगी किसी को....

"" हैलो....हा क्या हुआ....ये काली आया और बोल रहा की आप को मुझ से कोई काम है....""

"" हा ठीक है ठीक है....आप कमिश्नर के यहां हो कर आइये में यहां भाभी का ख्याल रख लूंगी....आप किसी तरह की चिंता ना करें...""

इतना कह कर चाची ने फोन डिस्कनेक्ट किया और मेरे पूछने पे बताया की चाचा क्या कह रहे थे....

"" उनको थोड़ी देर पहले कमिश्नर का फोन आया था....तेरे पापा को गोली किसने मारी शायद उसी बारे में कोई सुराग उनके हाथ लगा है...""

 
चाची की बात सुनकर आज पूरे दिन में पहली बार मेरे चेहरे पर राहत के भाव उमड़े थे....में बिना कुछ सोचे समझे चाची से लिपट कर थैंक्यू कहने लगा....

चाची थोड़ी देर तो मेरी पीठ सहलाती रही फिर मुझ से थोड़ा अलग हो कर कहती है...

"" आरोही और सलोनी तो मंदिर गई है....गरीबों को भोजन खिलाने लेकिन अब तू आ गया है तो मेरी भी मदद हो जाएगी"""

"" क्या हुआ चाची कैसी मदद चाहिए आपको.???""

चाची ने एक बार मम्मी कि तरफ देखा और फिर मुझ से कहने लगी....

"" भाभी को कपड़े चेंज करवाने है काली....""

मुझे उनकी बात समझ नहीं आई लेकिन फिर भी में कुछ समझ कर अपनी जगह से उठा और उनसे कहने लगा....

"" ठीक है चाची... मै बाहर जा रहा हूं ,जब आप कपड़े बदल दो तो मुझे बुला लेना...""

इतना कहते ही मै बाहर जाने को जैसे ही हुआ चाची ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया और कहने लगी....

"" कहां जा रहा है....?? तुझे क्या लगा में तेरी मम्मी की ड्रेस अकेले चेंज कर सकती हूं....पागल ऐसे वक़्त में एक बेटा भी अपनी मां की बेटी बन जाती है....पहले तू दरवाजा लॉक करके आ फिर मै तुझे बताती हूं कि ये कैसे करना है....""

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था...आखिर कैसे में अपनी मम्मी की ड्रेस चेंज कर सकता हूं....क्या चाची मुझ से कोई मजाक कर रही है ??? मेरा दिमाग अब बिल्कुल भी काम नहीं कर रहा था इसलिए मै किसी रोबोट कि तरह अपनी जगह से उठा और दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और जाकर फिर से चाची के पास खड़ा हो गया....

"" भाभी के हाथ में लगी ड्रिप को केनुला से अलग कर...""

चाची का कहना हुआ और मैंने झट से ड्रिप से कनुला को अलग कर दिया....

"" अब बाथरूम से किसी बाउल में गरम पानी और स्मॉल साइज टॉवेल लेकर आ....""

में बाथरूम के अन्दर घुस गया और गर्म पानी वाला नल शुरू कर दिया....हमारे घर की छत पे सोलर पेनल लगे हुए है....घर की 100% इलेक्ट्रिसिटी हमे उन्हीं सोलर पेनल से मिलती है और साथ ही साथ 24 घंटे गरम पानी भी...

मैंने एक बड़े बाउल मै पानी भरा और कुछ टॉवेल बाथरूम के कबर्ड से निकाल लिए....

में जैसे ही बाहर निकला मेरी आंखे फटी की फटी रह गई.....चाची मम्मी के जिस्म से साड़ी पूरी तरह अलग कर चुकी थी....और ये दृश्य देख कर जैसे में बाथरूम के बाहर ही जम सा गया....

"" काली.... काली....क्या हुआ....""

मुझे पुकारते पुकारते चाची ने मुझे पकड़ कर झिंझोड़ तो मुझे थोड़ा होश आया....

चाची ने मेरे हाथ से वो बाउल लिया और कहने लगी....

""देख काली बड़ा मुश्किल होता है अपनी मां या अपने किसी रिश्तेदार को इस हाल में देखना....लेकिन तू इन सब बातों को गलत नजरिए से मत ले....तू तेरी मां का चहेता बेटा है....और आज तुझे उनके इस भरोसे को कायम रखना होगा....क्या होगा जब मैं उनसे कहूंगी की आपका चहेता बेटा तो आपके कपड़े बदलने के नाम से ही घबरा कर भाग गया....इसलिए अपनी मां के बारे में सोच और सोच की कितनी तकलीफ में होंगी वो इस समय....अगर तुझे मेरी मदद नहीं करनी तो तू बाहर जा सकता है.....मुझे थोड़ी तकलीफ तो होगी लेकिन में मैनेज कर लूंगी.....लेकिन इस उठा पटक में भाभी को कुछ हो गया तो फिर में किसे जवाब दूंगी....बोल अब चुपचाप क्यों खड़ा है....""

मुझे कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था और इस वक़्त मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था चाची की बात मानने के अलावा....

"" ठीक है चाची आप जैसा बोलेंगी में वैसा करूंगा ""

इतना कह कर मैं मम्मी के सिरहाने जा कर बैठ गया और चाची की तरफ प्रश्नवाचक नज़रे गड़ा दी....

"" भाभी को पीछे से पकड़ कर बैठा....""

मैंने चाची के कहे अनुसार मम्मी कि गर्दन मै एक हाथ डाला और उन्हें बांहों में भर कर बिस्तर पर बैठा दिया....

इस समय मेरा एक हाथ मम्मी के सीधे हाथ वाले कंधे को मजबूती से थामे हुए थे और दूसरे हाथ से मैंने उनके उल्टे हाथ को थाम रखा था ....मेरा घुटना मम्मी की कमर को स्थिर किए हुए था और मेरा सीना मम्मी की पीठ को सहारा दे रहा था....

चाची भी अब बेड पर चढ़ गई और मम्मी के ब्लाउज के बटन खोलने लगी....एक एक करके उन्होंने सारे बटन खोल दिए और फिर मुझे वो ब्लाउज उतारने का इशारा किया.....

 
मेंने कांपते हाथो से उनका ब्लाउज धीरे धीरे उतारा और एक तरफ रख दिया....

"" पीछे से ब्रा का हुक खोल ""

चाची ने मम्मी के बाल सही करते हुए मुझ से कहा और मैंने अपनी उंगलियों से ब्रा के हुक खोल दिए....

"" अब इन्हें धीरे से बिस्तर पे लेटा दे लेकिन इनकी पीठ और सर तेरी गोद में ही रखना क्योंकि अभी इन्हें पलटना भी पड़ेगा.....

में धीरे धीरे संभाल कर मम्मी को लेटाया और उनका सर अपनी गोद मै रख कर अपनी आंखे बंद कर ली....

"" क्या कर रहा है काली....ये तेरी मां है....तूने आंखे क्यों बंद कर ली ?? क्या सिर्फ इस वजह से कि तू कहीं उनके स्तन ना देख ले....हद्द है....जिसने तुझे अपने इन्हीं स्तनों से दूध पिलाया आज वही इन्हें शर्म की वजह से नहीं देख पा रहा....अब आंखे खोल और मेरी मदद करवा....

"" नहीं चाची में आंखे नहीं खोलूंगा....में इस हाल में मम्मी को नहीं देख सकता....मुझे एक टॉवेल दो भीगो के में आंखे बंद कर के भी क्लीनिंग कर सकता हूं मम्मी कि ""

चाची ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुझे बाउल मै पानी टपकने की और टॉवेल निचोड़े जाने की आवाजे आने लगी....तभी चाची ने घबराते हुए कहा

"" काली भाभी का चेहरा सही कर....देख उनकी नाक से खून निकल रहा है....

मैंने बिना एक पल की देर किए अपनी आंखे खोली और उनका चेहरा सीधा किया....शायद उपर नीचे करने की वजह से उनकी नाक पर चोट आ गई और नकसीर के रूप में खून बाहर आने लगा....चाची गीले टॉवेल की मदद से उनकी नाक से निकला खून साफ करने लगी और फिर मेरी और गुस्से से देखती हुई कहने लगी......

"" और कर तेरी आंखे बंद....वो तो शुक्र है सिर्फ नकसीर आई है अगर चोट ज्यादा लग जाती तो...?

इतना कह कर चाची ने खून लगा हुआ टॉवेल नीचे जमीन पर पटक दिया और एक नया टॉवेल निचोड़ कर मुझे कहा...

"" भाभी के हाथ उपर कर मुझे इनके अंडर आर्म क्लीन करने है....""

चाची ने अपने गले में पहनी हुई चुन्नी मम्मी के सीने पर रख दी थी, ये देख मैंने एक राहत को सांस ली और मम्मी का एक हाथ उपर कर दिया....

चाची ने बड़े ध्यान से मम्मी के दोनों हाथो को उपर से नीचे तक गीले कपड़े से साफ किया लेकिन मुझे कुछ ऐसा दिख गया जिसकी कल्पना मैंने कभी नींद मै भी नहीं करी होगी....

चाची ने इस वक़्त एक नाइटी पहन रखी थी लेकिन जब से उन्होंने चुन्नी हटाई मेरा ध्यान पहली बार उनके सीने पे झूलते उन बड़े बड़े उरोजो पे गया.....

चाची ने एक ब्लैक कलर की सेटीन नाइटी पहन रखी थी जिसके अंदर उन्होंने ब्रा भी नहीं पहनी थी....

में मंत्रमुग्ध हो कर उनके झूलते उभारों में ना जाने कैसे खो गया ....

चाची के बूब्स बिल्कुल दूध की तरह गोरे थे जैसे जैसे वो हिलती वैसे ही उनके विशाल उरोज थरथराने लगते मेरा लिंग बुरी तरह से अकड़ने लगा था.....माथे पे एयरकंडीशन चलने के बाद भी पसीना जाने कहां से छलक आया था....

मै अभी उनको देख ही रहा था कि उन्होंने मुझे पुकारा....

"" काली भाभी को अब तुझे पलटना पड़ेगा ""

लेकिन मेरी तरफ से कोई जवाब ना आता देख उन्होंने मेरी तरफ देखा .... मै लगातार अभी भी उनके लटकते हुए उरोज उनकी डीप नेक नाइटी में से देख रहा था.... उन्होंने मेरी नज़रों का पीछा किया और एक झटके के साथ मम्मी के सीने पर पड़ी चुन्नी उठा कर अपने उभार छुपा लिए....

अचानक आए इस अवरोध से मै जैसे नींद से जागा....चाची के बूब्स अब मुझे दिखने बंद हो गए थे लेकिन जैसे ही मैंने उनके गले मै पड़ी हुई चुन्नी को देखा और फिर मम्मी के सीने की तरफ देखा तो मुझे एक जोरदार झ्टका लगा.....मम्मी के विशाल गोरे उरोज नग्न पड़े थे उनकी गुलाबी निप्पल पूरी तरह से सख्त किसी मीनार कि तरह खड़े हो रखे थे....मैंने चाची के चेहरे की तरफ देखा तो वो ना जाने क्यों मुस्कुराए जा रही थी....

"" चाची ये क्या किया आपने....मम्मी के उपर से चुन्नी क्यों हटा दी...""

मेरे इस सवाल से उनकी मुस्कुराहट और भी ज्यादा गहरी हो गई....और वो कहने लगी...

"" तू मेरी छातियां ताड़ रहा था.... उसका तुझे अफसोस नहीं है बल्कि मैंने भाभी के सीने से चुन्नी क्या हटा दी तू मुझ से शिकायत कर रहा है.....चल अब भाभी को पलट और इस बार ध्यान से पलटना कहीं तेरा कालू उनके मुंह मै मत डाल देना.....""

मैंने खीजते हुए एक बार चाची कि तरफ देखा लेकिन वो इस समय मम्मी के स्तनों को साफ कर चुकी थी इसलिए मैंने मम्मी को धीरे से अपनी गोद मै ही पलट दिया....

पलटने के साथ ही मुझे एक जोरदार झ्टका लगा....इस बार मम्मी का एक उरोज मेरी हथेली के बीचों बीच फस चुका था और उनकी कड़क निप्पल मेरी दो उंगलियों के बीच फड़फड़ा रही थी .....मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है और में जल्दी से जल्दी अब ये काम निपटाना चाहता था किसी भी तरह.....

मम्मी का नर्म मुलायम उरोज मेरे हाथ मै था और उनका कंधा मेरे लिंग को उतेज्जित किए जा रहा था.....

चाची अपनी जगह से उठी और मम्मी का पेटीकोट और पैंटी एक बार मैं ही खींच के बाहर निकाल दी.....

मम्मी के पर्वत की तरह के विशाल नितम्ब मेरी आंखो के सामने थे ....यहां तक कि उन दो पर्वतों के मध्य की खाई में बना एक छोटा सा गुलाबी छेद भी मुझे पूरी तरह से नजर आ रहा था ....

चाची ने आज मेरी मम्मी को मेरे ही सामने पूरा नंगा करके रख दिया था और शायद उनके साथ साथ आज में भी पूरी तरह से नंगा हो गया हूं....

चाची ने जल्दी जल्दी उनकी पीठ कमर नितम्बो को साफ किया और एक गाउन मुझे दिया ताकि मम्मी को में पहना सकु....

ऊपरी हिस्से तक मैंने गाउन मम्मी को बिना पलटे ही पहना दिया लेकिन अब आगे पहनाने के लिए उनका पलटा जाना जरूरी था.... अभी मेंने उनको पलटने कि कोशिश ही करी थी कि चाची ने मुझे रोक दिया...

वो मम्मी कि कबर्ड से एक पैंटी लेकर आई और उन्हें पहनाकर मुझे कहती है.....

"" अभी तक तूने जो कुछ भी देखा वो एक मां और बेटे के बीच की सीमा है....इसके आगे अगर तूने अगर कुछ देखा तो वो सीमा ख़तम हो जाएगी....अपनी आंखे बंद कर और भाभी को धीरे से पलट....""

 
मैंने धीरे धीरे मम्मी को पलट दिया और चाची ने मम्मी का गाउन उनके घुटनों से नीचे तक खेंच दिया.....

मै अब अपनी जगह से खड़ा हो चुका था......सब से पहले जो ड्रिप मैंने निकली थी उसको मैंने फिर से लगा दिया और ड्रिप की स्पीड भी कंट्रोल कर दी....

मै ये सब करके जैसे ही जाने को हुआ चाची ने मेरा लिंग अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया....

"" कम से कम तेरे कालू के दर्शन तो करा दे....में भी तो देखू मेरे काली का ये कालू कितना बड़ा हो गया है....""

चाची का इस तरह का व्यवहार मेरी अपेक्षा के विपरित था इसलिए ना जाने कैसे में चाची का हाथ अपने लिंग से हटा कर वहां से भाग निकला......

मेरी सांसे धोकनी की तरह चल रही थी...बुरी तरह से हांफते हुए मैने मेरे बेड के पास पड़ा पानी का ग्लास उठाया और एक सांस में ही खाली कर दिया....

चाची ने आज जो कुछ भी किया वो मेरे लिए बिल्कुल अनोखा था....ग्लानि और रोमांच का मिला जुला मिश्रण मेरे जहन मै उथल पुथल मचाए जा रहा था..

तभी मेरी नजर बेड के पास ही पड़ी एक फाइल पर पड़ी जो कि पापा की वसीयत थी...

अपने मन के सारे बुरे विचारों को त्याग, मै पलटा और वो फाइल उठा कर देखने लगा.....वसीयत मै मेरी बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी दिलचस्पी अगर थी तो बस उस पत्र में...

वो पत्र एक लिफाफे मै था जिसके ऊपर एक मोहर बनी हुई थी जो की एक सर्प की तरह प्रतीत हो रही थी....

कुछ सोचते हुए मैंने मोहर पे हाथ फेरा जो कि लाख को पिघला कर लगाई गई थी....देर ना करते हुए मैंने अपनी ड्रावर से एक पेपर नाइफ निकाला और संभाल कर उस मोहर के नीचे से लिफाफे को अलग किया और उसमे से एक पत्र और एक तस्वीर बाहर निकल आईं...

मैंने वो तस्वीर बिना देखे ही बिस्तर पर पलट कर रख दी और वो पत्र खोल कर पढ़ने लगा....

प्रिय पुत्र अशोक ,

अगर तुम आज ये पत्र पढ़ रहे हो तो इसका सीधा मतलब है कि मै अब इस दुनिया में नहीं रहा हूं....तुम्हारी अपेक्षा हमेशा मैने तुम्हारे छोटे भाई नवीन को हमेशा महत्व दिया मेरे इस भेद भाव का मुख्य कारण नवीन का अपने काम के प्रति समर्पित नहीं होने का भाव मुझे हमेशा कचोटता था , शायद यही वजह रही कि मैंने तुम्हे वो प्रेम नहीं दिया जिसके तुम हमेशा से हकदार थे...

अशोक आज मै तुम्हे ऐसा कुछ बताने जा रहा हूं जो मेरे पिता ने मुझे बताया और मेरे पिता को उनके पिता ने....

"" ना मोह ना छल ,निर्मोही एक तू ही !

याद रखना वचन अपना , दिया जो जिस्म ने आत्मा को तेरी !! ""

इस पत्र के साथ एक तस्वीर भी है जो कि मुझे पिता जी ने ही दी थी....तस्वीर वाली जगह मै पहुंच भी गया था लेकिन ज्यादा कुछ पता नहीं कर पाया सिवाए इस बात के की मेरे वंश वृष की आखिरी शाखा ही इस पहेली को सुलझा पाएगी....मुझे नहीं पता कि ये सब क्या है लेकिन तुम्हारे दादा कहते थे कि उनके पिता दोनों दुनिया के रहस्य और शक्तियों से परिचित थे...ना जाने कोनसा रहस्य वो मुझे बताना चाहते थे और वो रहस्य आखिर हमारे परिवार को जानना जरूरी क्यों है कुछ भी समझ नहीं आया मुझे कभी...

में चाहता हूं तू तेरे बच्चो को बिजनेस और पैसों की भूख से हमेशा दूर रखे....हमने अपने हाथ इतने फैला दिए की अब हम खुद अपने हाथो को नहीं देख पाते....मै नहीं चाहूंगा मेरे परिवार की सभी संताने इसी लोभ और माया मै उलझे रहे....उन्हें विश्वास और संयम सीखना , मुझे पूरा यकीन है वो जरूर ये अधूरा काम पूरा कर पाएंगे जो मुझे विरासत में मिला और अब तुझे यही विरासत सौंप रहा हूं.....

"" जीवन नश्वर तेरा , कर्म तेरा अजर !

आत्मा अज्ञानी अमर हमेशा , पर बुद्धि तेरी अमर !! ""

मेरे हाथ मै अब वो तस्वीर थी जो शर्तिया कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की थी....

मेरे दिमाग अनगिनत सवालों के भंवर में गोल गोल घूमता चला जा रहा था, कुछ भी समझ मै नहीं आ रहा था आखिर दादा जी का ये पत्र पिता जी ने आखिर कभी खोला क्यों नहीं....क्या उन्हें इस रहस्य के बारे मै कुछ पता था...?? क्या वो कभी कंबोडिया गए दादा जी के साथ..?? क्या खेल था ये ?? क्या रहस्य और ये कैसी विरासत....??

अभी मै इन सब सवालों में ही उलझा हुआ था कि मेरे रूम के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी...

"" अंदर आ जाओ दरवाजा खुला हुआ है..""

दरवाजा खोल कर अन्दर आने वाले की शक्ल देख एक बार फिर मुझे तेज़ झटका लगा....आने वाला सख्श कोई और नहीं बल्कि चाची ही थी जो मुझे देख मंद मंद मुस्कुरा रही थी...

"" क्या हुआ चाची....मम्मी ठीक तो है ना ""

मैंने खुद पे काबू रखते हुए चाची से सवाल किया और उन्होंने बस इतना ही कहा...

"" तेरे चाचा आ गए है....खाना खाने के लिए बुला रहे है बाहर....तू बोले तो तेरा खाना यहीं ले आऊ और तुझे अपने हाथो से खिलाऊं ""

इतना कह कर चाची ने अपनी दाहिनी आंख झपका दी....

मै उनकी इस हरकत से फिर से सकपका गया और बोल पड़ा...

"" बाहर ही खाऊंगा चाची ""

सब लोग खाना खा कर सो चुके थे....घर मै आज खाना पड़ोस मै रहने वाले आनंद जी के यहां से आया था...बड़ा ही अजीब लग रहा था आज जो कुछ भी हुआ..

सुबह सुबह घर मै झगड़ा फिर पापा की डेथ फिर चाची का अजीब सा बर्ताव और अब ये दादा जी का पत्र जो मेरे समझ के बाहर हो चुका था...

 
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