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घुड़दौड़ ( कायाकल्प ) complete

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मेरे प्रश्न पर उसकी आँखें भर आईं.. उसने बस ‘न’ में सर हिलाया। मुझे समझ आ गया की वो बात करने की दशा में नहीं है। मैंने वहाँ उपस्थित अधिकारी से बात करी, तो उन्होंने बताया की मेरे परिवार का कोई और सदस्य उनको नहीं मिला.. सुमन अकेली ही थी। वही बता सकती है की बाकी लोग किधर हैं! मैंने वहाँ पर सारी ज़रूरी औपचारिकताएं पूरी करीं, और सुमन को होटल ले आया। रास्ते में आते आते वो या तो गहरी नींद सो गयी, या फिर बेहोश हो गयी। बेचारी की क्या दशा हो गयी थी!! कोई और समय होता तो ऐसी हालत में किसी लड़की को लाने पर होटल के सभी लोग शक करते, लेकिन आज सभी सहयोग कर रहे थे। सामूहिक विपत्ति में समाज में मित्रों की संख्या बढ़ जाती है।

उन्ही की मदद से मैंने सुमन को बिस्तर पर लिटाया, और फिर दरवाज़ा बंद कर के उसके सारे कपड़े उतारे। उसके पूरे शरीर पर चोट, और कटने के निशान दिख रहे थे। शरीर में सूजन तो थी, लेकिन उसके तलवे काफी सूजे हुए थे, और साथ ही साथ उन पर फ़फोले पड़े हुए थे। उनमे से कुछ फूट भी गए थे, और वो घाव खुले भी हुए थे। मैं उसको बिस्तर में लिटा कर उसके लिए ज़रूरी वस्त्र, और डॉक्टर का इंतजाम करने चला गया। डॉक्टर के साथ वापस आया तो देखा की सुमन अभी भी सो रही थी, और उसका शरीर तप रहा था।

उन्होंने सुमन की पूरी तरह से जांच करी, और उसको इंजेक्शन दिया, और कुछ दवाएं लिख कर दीं। बताया की कोई डरने की बात नहीं लगती, बस सुमन को कुछ हल्का खिलाता रहूँ.. जैसे की जूस, सैंडविच इत्यादि, जब तक उसकी ताकत वापस न आ जाय! एक बार ताकत आने पर बुखार खुद ही उतर जाएगा। उनको बस इसी बात का डर है की कहीं उसको डि-हाइड्रेशन न हो जाय!

सुमन देर शाम को ही उठ पाई। तब तक मैं उसके लिए जूस, और सैंडविच इत्यादि का इंतजाम कर लाया था। मैं उसको बिस्तर से उठा कर बाथरूम ले गया, जहाँ अन्य ज़रूरी कामों के साथ मैंने उसको नहलाया भी। वापस आ कर मैंने उसको कपड़े पहनाये – वो इतनी कमज़ोर हो गयी थी की खुद के बल पर बैठ भी नहीं पा रही थी। खाना भी मैंने उसको अपने हाथों से ही खिलाया। और सबसे अंत में दवा पिलाई। फिर उसको वापस बिस्तर में लिटाया।

मैंने प्यार से उसके बालों को सहलाते हुए पूछा, “नीलू, अब ठीक लग रहा है?”

सुमन की आँखों से आंसू टपक पड़े।

“कोई नहीं बचा, जीजू! कोई नहीं..”

मेरे ऊपर मानो बिजली गिरी! ‘कोई नहीं..! मतलब!’

जब तक कोई निश्चित बुरी खबर नहीं मिलती, तब तक आशा बंधी रहती है। मेरी भी आशा बंधी हुई थी की शायद रश्मि और बाकी सभी जीवित होंगे... लेकिन सुमन के इस एक वाक्य ने वह आशा भी छीन ली। मैं बुरी तरह से फूट पड़ा – मानो, थमा हुआ बाँध अचानक ही टूट गया हो। मेरे पैर... जैसे उनमें से सारी जान निकल गयी हो। मेरा सर चकराने लगा, और मैं अचेत हो कर गिर गया।

रजनीगंधा की मस्त कर देने वाली खुशबू मेरे नथुनों के रास्ते से आ कर मुझे आंदोलित कर देती है। मेरी चेतना वापस आती है। आँख खुलती है, तो मुझे लगता है की मानो मैं स्वर्ग के नंदन वन में हूँ। चारो तरह चांदनी फैली हुई है, और हरी भरी घास पर ढेर सारे पुष्प खिले हुए हैं! वैसे ही जैसे फूलों की घाटी में देखे थे!

‘क्या बात है! लेकिन.. लेकिन, वो रजनीगंधा की खुशबू?’

मैं उठ कर देखता हूँ तो एक तरफ छोटा सा तालाब, जिसमें कई सारी कुमुदनियाँ अभी सुप्त अवस्था में थीं। दूसरी तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा की एक बहुत ही सुन्दर सा घर था – उस घर के प्रथम तल पर स्थित एक बड़ी खिड़की से रौशनी छन कर बाहर आ रही थी। दिमाग की एक झटका सा लगा – यह तो वही घर है जैसा मैंने और रश्मि ने साथ में सोचा था! एक बार और मैंने नज़र दौड़ाई, तो देखा की तालाब के समीप ही एक स्त्री, एक छोटी सी लड़की के साथ खेल रही है।

‘ओह! रजनीगंधा की सुगंध उसी तरफ से आ रही है।‘

अचानक उस स्त्री की दृष्टि भी मेरे ऊपर पड़ती है; वो खेलना बंद कर मेरे पास आती है.. रश्मि को देख कर मैंने मुस्कुरा उठता हूँ। वो खजुराहो की मूर्तियों जैसी सर्वांग सुंदर दिख रही है - अत्यन्त कमनीय! दरअसल, उसने खजुराहो की मूर्तियों के समान ही वस्त्र पहने हुए हैं – कमर के नीचे धोती है, और स्तनों को ढके हुए कंचुकी! इन वस्त्रों में रश्मि के रूप सौंदर्य और अंग-प्रत्यंग की रचना देखते ही बन रही है। उसके वक्ष गोलाकार थे, और शरीर चांदनी में चमक रहा था। आँखों में वही परिचित चंचलता और मादकता!

वो प्रेम से मेरे सर को अपनी गोद में रखकर मुझसे कहती है, “जानू.. उठ गए!”

मैंने एक गहरी सांस भरी – रजनीगंधा की मादक खुशबू मेरे पूरे वजूद में समां गई। समझ नहीं आ रहा की सो जाऊं या जागूँ?

“आई लव यू!” मैंने आँख बंद किये किये कहा।

उत्तर में रश्मि खिलखिलाई! फिर रुक कर बोली, “अच्छा.. एक बात बताओ.. सुन्दर है न?”

“बहोत!” मैंने रश्मि की कंचुकी में उंगली डाल कर उसको नीचे की तरफ खींचा। उसका बायाँ स्तन कंचुकी के बंधन से मुक्त हो गया। मेरी हरकत पर रश्मि ने मेरे हाथ पर एक हलकी सी चपत लगाई।

“गंदे! मैं नहीं...”,

कहते हुए उसने एक तरफ अपनी उंगली से इशारा किया,

“... हमारी बेटी!”

रश्मि की इस बात पर मेरा सर एक झटके से दूसरी तरफ उस छोटी लड़की को देखने के लिए मुड़ता है। मेरी आँख एक झटके से खुलती है। मेरे चेहरे पर सुमन झुकी हुई है और बदहवासी में मेरे दोनों गालों को पीट रही है।

“जीजू.. उठिए.. प्लीज.. उठिए! ओह थैंक गॉड!”

मेरा सर सुमन की गोद में था – उसने जब मेरी आँख खुली हुई देखी तो उसके चेहरे पर कुछ राहत के भाव आये।

“जीजू... आप ठीक तो हैं न?”

“ह्ह्ह..हाँ.. मैं ठीक हूँ..” कहते हुए मैं उसकी गोद से उठ कर बैठ जाता हूँ। लेकिन सदमे का असर अभी भी था – मेरा सर फिर से चकरा गया, तो मैं सर थाम कर बैठ गया। सुमन मुझे पकड़ कर पुनः रोने लगी।

“सब ख़तम हो गया.. सब..” कहते हुए उसकी एक बार फिर से हिचकियाँ बंध गईं। मैं तो मानो काठ का हो गया! क्या कहूँ? सुमन कुछ देर रोने के बाद खुद ही कहने लगी,

“बाढ़ से बचने के लिए हम लोग होटल बाहर निकले। होटल का अहाता बुरी तरह से टूट गया था, और वहाँ से पानी बह रहा था – वहीँ से बाहर निकलते हुए माँ का पैर फिसल गया। पानी इतना तेज़ और मैला था की गिरने के बाद वो फिर कभी नहीं दिखाई दीं। पापा उनको बचने के लिए अहाते में कुछ देर तक गए, और जब वापस आये तो लंगड़ा कर चल रहे थे – शायद उनके पैर में मोच आ गयी थी।

हमने देखा की आस पास के कुछ लोग पहाड़ की ढलान के ऊपर की तरफ जा रहे थे, इसलिए हम लोग भी उधर ही चलने लगे। जैसे-तैसे हम लोग ऊपर पहुंच गए, लेकिन उस चढ़ाई को करने में बहुत समय लगा – न दिन का पता चलता और न रात का! दीदी तो प्रेगनेंसी के कारण पहले ही कुछ कमज़ोर थीं, और भूखी प्यासी रहने के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे गई। और वो वहीँ बेहोश होकर गिर गयी। पापा ने कहा की वो कुछ खाने के लिए लाते हैं, लेकिन पूरा दिन भर तलाशने के बाद भी उनको कुछ भी नहीं मिला।

हमारे साथ जो लोग ऊपर जा रहे थे उनमे से उस समय तक कोई नहीं दिख रहा था – शायद वो किसी और तरफ निकल गए, या फिर .. बह गए! मदद देने के लिए अब कोई नहीं था। खैर, पहाड़ पर घास भी उगी हुई थी, और उसको देख कर पापा ने सोचा की शायद उसको खाया जा सकता है। लेकिन उनको कुछ शक था की वो घास खाने लायक है भी, या नहीं! लेकिन, उनका शक सही था... वो वाली घास ज़हरीली थी। उसको खाने पर उनको अच्छा तो नहीं लगा तो उन्होंने उसको थूक दिया – लेकिन जगता है की कुछ ज़हर अन्दर चला गया। दिन भर उल्टियाँ करने के बाद उनकी भी मौत हो गयी।

दीदी अब और चल नहीं सकती थीं.. इसलिए मैंने उसको वहीँ लिटा कर मैं आस पास खाने को ढूँढने गयी। शायद किसी पक्षी ने कुछ मांस गिरा दिया था। वो मैंने और दीदी ने मिल कर खाया। रात में डर लगता - लगातार बारिश, ठंड और जंगली जानवरों का डर बना रहता था। मरने वालों के शवों को कुत्ते और अन्य जानवर खा रहे थे। अगले दिन दीदी की हालत काफी खराब हो गयी। भूख, कच्चा मांस, डिहाइड्रेशन, कमजोरी, संक्रमण... रात में जब वो सोई तो उसका शरीर कांप रहा था। बाहर ठंडक भी बहुत हो रही थी। मैं जब सवेरे उठी तो देखा की दीदी नहीं बची..! रोने के लिए अब तो आंसू भी नहीं बचे थे! दो दिन तक जैसे तैसे जंगली जानवरों से बचते हुए मैं रही... फिर कल मैंने हेलिकॉप्टर की आवाज़ सुनी तो उसको इशारा किया... न जाने कैसे उन्होंने मुझे देखा और वहाँ से निकला। अब यह नहीं समझ आता की मैं लकी हूँ, या एकदम मनहूस!“

जीवन भी अजब है। क्या क्या रंग दिखलाता है। सब कुछ... इसी जन्म में हो जाता है, सब यहीं मिल जाता है! तीन साल भी हम साथ नहीं रह पाए! तीन साल भी नहीं!

‘हे देव! इतनी क्रूरता! ऐसे लेना था, तो दिया ही क्यों? रश्मि ने ऐसा क्या किया था की उसकी इस तरह से मृत्यु हो? वह बेचारी सभी की हंसी ख़ुशी के लिए ही सब कुछ करती थी। किसी के प्रति उसके मन में कोई भी विद्वेष नहीं था। फिर क्यों? कहाँ है भगवान? कैसा भगवान?’

और मेरी हालत?

मैं तो एकदम अकेला हूँ! एकदम अकेला.. मेरे हर तरफ एक भीड़ जैसी है.. घर में रहो, सड़क पर निकालो, या फिर ऑफिस जाओ... हर तरफ लोगों की कोई कमी नहीं है.. लेकिन, मैं नितांत अकेला हूँ! सोसाइटी में लोग जब मुझे देखते हैं तो मानो उनको लकवा हो जाता है.. बात करते करते चुप हो जाते हैं, मुझे देख रहे होते हैं तो किसी और तरफ देखने लगते हैं.. कन्नी काट लेते हैं.. जैसे की मुझे कोई रोग हो!

मुझे भी मुक्ति चाहिए! लेकिन आत्महत्या कर नहीं सकता। ऐसे संस्कार नहीं हैं! लेकिन... मुक्ति तो मुझे अब चाहिए! वसीयत में मैंने अपना सब सब कुछ सुमन के नाम लिख दिया है, और अपनी आखिरी इच्छा के लिए निर्देश दिया है की मृत्यु के बाद मुझे विद्युत् शव-दाह गृह में जलाया जाय। क्यों बेकार में लकड़ियाँ जलाना?

रश्मि की मृत्यु के बाद बीमा राशि और सरकारी सहायता से मिली हुई रकम मिला कर मैंने एक ट्रस्ट-फण्ड बनाया, जिसका एक ही उद्देश्य था – गरीब परिवार की चुनी हुई मेधावी क्षात्राओं को उनकी उच्च शिक्षा (कम से कम स्नातक स्तर तक) तक पूरी सहायता देना। मेरे ऑफिस, और रश्मि के कॉलेज के लोगों ने इस फण्ड में भरपूर योगदान दिया था, जिससे अब यह एक स्थाई क्षात्रवृत्ति बन चुका था। बाकी का सारा निबटारा होने वाली सारी राशि (सुमन के माता पिता की बीमा राशि और सरकारी सहायता), और उत्तराँचल की सारी ज़मीन इत्यादि मैंने कानूनी सहायता से सुमन के नाम लिखवा दी। कम से कम उसका जीवन तो अब स्थिर हो गया था।

मुझे लग रहा था की अब मेरे जीवन का मकसद पूरा हो गया है.. ‘रश्मि! मुझे भी अपने पास बुला लो!’ बस मैं यही एक बात रोज़ मन ही मन दोहराता। एक साल हो गया था मेरा परिवार नष्ट हुए! परिवार क्या, पूरा संसार नष्ट हुए! संसार की सबसे निराली लड़की को मुझसे आज से एक साल पहले काल ने छीन लिया। उसके साथ साथ छीन लिया उसने मेरी संतान को – मेरी बेटी! साथ ही चले गए मेरे माता और पिता भी! दोनों माता पिता!

‘कैसा क्रूर मजाक!’

कहते हैं की जीवन किसी के लिए नहीं रुकता! चलता ही रहता है.. लेकिन किस ओर? मैं तो अब हर क्षण बस मृत्यु का ही इंतज़ार कर रहा हूँ। हाँ – खाता हूँ, पीता हूँ, सोता हूँ.. टीवी भी देख लेता हूँ.. क्या करूँ? जीना पड़ रहा है! लेकिन क्या जीना! मैं सब कुछ अकेले ही करता हूँ। हाँ – घर में सुमन भी रहती है। लेकिन, उससे तो बस नाममात्र की बातें होती हैं। कभी कभी दुःख होता है की इस सब में उसकी क्या गलती! मैं क्यों उसके साथ ऐसे बर्ताव करूँ? आखिर मेरे साथ साथ उसने भी तो अपना परिवार खोया है! लेकिन, फिर भी.. एक अजीब तरह की बेबसी होती है.. अजीब तरह की कसक.. अक अजीब तरह का आक्रोश!! कुल मिला कर, उससे अधिक बात नहीं हो पाती! अब तो लगता है की किसी से भी मैं ठीक से बात नहीं कर पाऊँगा!

उस दुर्घटना के कुछ ही दिन बाद की बात है... मैं कमरे की खिड़की से बाहर किसी अनंत शून्य में देख रहा था।

सुमन मेरे पीछे आ कर कहती है, “आप क्या देख रहे हो?”

मैंने कई दिनों से खुद को जब्त किया हुआ था.. उस एक वाक्य ने न जाने कैसे मेरे सब्र के बाँध को ढहा दिया। मैंने चिड़चिड़े ढंग से उसको जवाब दिया, “अपने काम से काम रखो! मुझसे चिपकने की कोई ज़रुरत नहीं!”

वो उसी पल मेरे कमरे से बाहर भाग गई। कुछ समय बाद मैंने उसके रोने सुबकने की आवाज़ सुनी, लेकिन मैंने उसको मनाने की कोई कोशिश नहीं करी। वो मेरी जिम्मेदारी नहीं है। अगर उसको भी इस संसार में गुजारा करना है, तो बिना किसी मोह के ही करना होगा। संसार बहुत क्रूर है! और भगवान उससे भी बड़ा क्रूर! किसी भी प्रकार का मोह न ही हो तो अच्छा! न कोई बंधन होगा, और न कोई बोझ! आराम से चले जाओ.. किसी को पता भी नहीं चलेगा की कब निकल लिए!

सबसे अच्छी बात यह की रश्मि के ही कॉलेज में सुमन का दाखिला हो गया था – वहाँ के प्रिंसिपल मुझे अक्सर उसकी उन्नति के बारे में बताते.. कहते की बहुत मेधावी है! मैंने उनको अपनी स्थिति के बारे में बताया, और उनको कहा की वो उसको उचित मार्गदर्शन देते रहें। क्योंकि मुझसे नहीं हो पायेगा।

अच्छे लोगो न भारी अभाव हो रहा है मेरे जीवन में.. अभी कोई सात महीने पहले श्री देवरामानी का देहांत हो गया – दिल का दौरा पड़ने से। उनकी श्रीमति को उनकी संताने अपने साथ ले गईं। लिहाजा, अब पड़ोस भी खाली लगता है। घर आने का मन नहीं होता। इसलिए मैं अक्सर अपने टूर बनता रहता हूँ.. पिछले एक साल में चार महीने मैं बाहर रहा। वो मकान तो बस रश्मि के कारण घर था, अब तो बस एक बेरंग ढांचा सा लगता है! ऐसे यंत्रवत जीवन होने के कारण कार्यस्थल पर तरक्की बहुत तेजी से हो रही है! अब मैं खुद भी मेरे भूतपूर्व बॉस के स्तर पर हूँ। लेकिन उनका मित्रवत व्यवहार अभी भी बरकरार है।

वो अभी भी मुझसे संपर्क में हैं। दुर्घटना के बाद उन्होंने मुझसे रश्मि के बारे में पूछा। क्या बताता! बस फूट फूट कर रोने लगा। उनको मैंने सारा वाकया सुनाया। उसके बाद से उन्होंने कभी भी रश्मि का नाम भी मेरे सामने नहीं लिया, जिससे मुझे दुःख न हो! शुरू शुरू में मैंने दोस्तों के साथ मुलाकात की, और वो लोग भी मुझसे मिलने आये – जैसे की पारंपरिक सामाजिक प्रणाली होती है..। हिमानी भी मिलने आई थी... उसने मुझसे दबे छुपे शब्दों में दोबारा शादी करने को भी कहा। मैंने उससे क्या कहा, मुझे कुछ याद नहीं आता अभी! हाँ, लेकिन कोई चार महीने पहले मैंने उसकी शादी का कार्ड देखा – कार्ड मिलने के एक महीना पहले उसकी शादी हो गयी थी। अच्छी बात थी.. मुझे अपने जीवन में किसी भी तरह का उलझाव नहीं चाहिए था।

अकेलेपन के साथ साथ, मैं पिछले छह महीनों में न जाने किस गढ्ढे के अन्दर चला जा रहा हूँ.. वहाँ पर सूर्य का प्रकाश संभवतः कभी नहीं गया है। काश! आत्महत्या करना पाप न होता!

मृत्यु :

बहुत भयावह होता है जब आप देखते हैं की एक निश्चित मृत्यु आपकी तरफ आ रही है, और आपके पास उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। तीव्र गति पर अचानक ही लगाम लगाये जाने पर टायरों से उठने वाली चीख, ब्रेक्स के जलने पर उठने वाली कसैली गंध.. और इन सब का उस भयावह सच की तरफ इशारा!! मेरे अंतिम क्षण में मेरे दिमाग में बस एक ही बात आई,

‘आ ही गई मौत!’

वैसे, मृत्यु से मुझे कोई डर वर नहीं लगता.. हाँ, उससे मुझे एक तरह की खीझ सी होती है। लेकिन, रश्मि के बाद मैं जी ही कहाँ रहा था – बस जीवित था। अपने आखिरी क्षण में मुझे बस यही ख़याल आया... और चैन भी। टक्कर बेहद भीषण थी। उस झटके से मेरा हृदय रुक गया, और दिमाग में अनगिनत रुधिर वाहिकाएँ फट गई। चेतना जाते हुए आखिरी बात जो मुझे याद है वह यह है की कार की चेसी कुचलती जा रही थी, और कार की फ़र्श पर मेरा लहू! मेरे सर में एक असहनीय दर्द हुआ, और चेतना लुप्त हो गई।

अगला ख़याल जो मुझे याद है वह यह है की मैं मर गया हूँ। सचमुच मृत! ...लेकिन, फिर दिमाग पर जोर लगाया तो समझ आया की अगर मैं मर गया हूँ, तो फिर सोच कैसे सकता हूँ? सोच तो दिमाग से होती है, और दिमाग जीवित शरीर में! मतलब अभी भी जीवित हूँ!

ग्रेट!

“रूद्र... रूऊऊऊद्र..!” मैंने आवाज तो सुनी, लेकिन पहचान नहीं पाया।

कैसी आवाज़ है? अच्छी आवाज है, लेकिन जानता नहीं..। मेरे सिर में भयंकर दर्द हो रहा था। सिर में ही क्या, पूरे शरीर में! तो क्या मैं उस अतिभारित ट्रक से हुई दुर्घटना से बच गया?

“रूद्र.. बेबी.. मरना नहीं। प्लीज़..? जागते रहो। तुम मुझे सुन रहे हो? मेरे साथ रहो। चिंता मत करो। मैं हूँ यहाँ तुम्हारे साथ। मुझे सुन रहे हो? मुझसे बात करो.. प्लीज़..?”

अरे भई.. कौन हो आप? कौन है मेरे साथ? मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मेरे सर में जैसे जैसे वो भयंकर दर्द बढ़ रहा था, वैसे वैसे मुझे यह समझ नहीं आ रहा था की ये रूद्र कौन है, और ये औरत (हाँ.. औरत की ही आवाज़ थी) कौन है! मैंने उठने की कोशिश करी.. एक अजीब सा अनुभव हुआ – जैसे चक्कर, उलटी, और एक और भयंकर दर्द की लहर.. ये सब एक साथ! मैं फिर से अचेत हो गया।

रह रह कर रश्मि की बातें याद आतीं.. एक बार मैंने सैंडविच बनाया। और खाते हुए उसको पूछा, “तुम्हारा बनाया हुआ इतना बढ़िया लगता है! ये कैसे हो सकता है!! एक जैसी चीज़ें ही तो डालते हैं – जो तुमने यूज़ करी, वही मैंने भी.. फिर ऐसा क्यों?”

रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानू.. मैं सैंडविच में प्यार भी डालती हूँ..”

रश्मि बिलकुल ऐसी ही थी। हर चीज़ में प्यार डालती थी। उसका किया हर काम बेहतर होता था! .. यह प्यार नहीं तो और क्या है...?

यू-ट्यूब पर मैं “आगे भी जाने न तू.. पीछे भी जाने न तू..” वाला गाना सुन रहा था। रश्मि को यह गाना बहुत पसंद था। मैं भी साथ में गाने लगा.. रश्मि की याद हो आई.. गला भर गया। और आँखों से आंसू आ गए। मैं रोने लगा – इस तरह मैं कभी नहीं रोया। कम से कम एक घंटा रोने के बाद सारी ऊर्जा क्षीण हो गयी। कब सोया कुछ भी याद नहीं!

‘ब्लिप... ब्लिप... ब्लिप...’

‘ये क्या चिढ़ाने वाला शोर हो रहा है! और.. रश्मि कहाँ है? अभी तो यहीं थी...’

मैंने आँख खोलने की कोशिश करी। लेकिन बहुत ही असह्य दर्द हुआ। मृत्यु? अह्ह्ह्हहाँ! मतलब मरा तो नहीं हूँ। जैसे जैसे चेतना लौट रही थी, और मैं जाग रहा था, तो मुझे समझ आने लगा की मैं शायद अचेत था।

अचानक ही मेरा संसार निशब्दता से गुंजायमान की तरफ चल दिया। मुझे सुनाई भी दे रहा था, और सुंघाई भी दे रहा था.. लेकिन, दिखाई क्यों नहीं दे रहा है?

मैंने आँख खोलने की कोशिश करी। इस कोशिश में मेरी हर चीज़ दर्द करने लगी – सर, आँख! मेरी कराह निकल गई।

“इनको होश आ गया..” कोई चिल्लाया।

मेरी आँखें उनको खोलने में मेरा साथ ही नहीं दे रही थीं। जैसे तैसे जब वो खुलीं, तो रोशनी की एक तीखी लकीर प्रविष्ट हो गयी। मैंने तुरंत ही आँखें बंद कर लीं.. यह सोच कर, की अभी तो नहीं खोलूँगा। सोचने की कोशिश करने पर दिमाग में सब गड्ड-मड्ड हो गया.. कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैंने महसूस किया की आँखें बंद होने के बावजूद मुझे मेरे इर्द गिर्द का सारा संसार धुंधला होता महसूस हो रहा था। और मैं एक बार फिर से सस्ते टंगस्टन के बल्ब के समान बेहोश हो गया।
 
रश्मि की बात सुन कर मुझे बहुत रोचक लगा! और मैं खुद भी काफी उत्तेजित हो गया!! बात तो सही है.. रश्मि है ही इतनी सुन्दर! और अब जब वो माँ बनने वाली है, तो उसकी सुन्दरता और भी निखर आई है! ज्यादातर स्त्रियाँ गर्भ-धारण करने के बाद अतिपक्व दिखने लगती है, और उनके शरीर पर गर्भ का बोझ दिखने लगता है। कहने का मतलब, वे स्थूल, थकी हुई और निस्तेज हो जाती है। लेकिन, कुछ स्त्रियाँ ऐसी होती है, जो पुष्प की तरह खिल जाती हैं.. उनके चेहरे पर उनके अन्दर पनप रहे जीवन का तेज दिखने लगता है। रश्मि इस दूसरी श्रेणी में थी। उसका चेहरा जीवन की आशा से दीप्तिमान होता जा रहा था, और उसका छरहरा शरीर स्थूल तो हो रहा था, परंतु साथ ही साथ अत्यंत आकर्षक भी होता जा रहा था। पहले ही वो रति का स्वरुप लगती थी, अब तो ऐसा लगता है की उसमें कम से कम सौ रतियों का वास हो! कोई भी ऐसी स्त्री को आकर्षक पायेगा ही! इसके लिए सुमन से मुझे कोई भी गिला-शिकवा नहीं था।

वापस आने के एक दिन पहले रश्मि ने मुझे फ़ोन पर कहा की वापस आने पर मेरे लिए एक सरप्राइज है! मेरे लाख पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया की क्या! खैर, बता देती तो कैसा सरप्राइज! घर आने पर मेरा स्वागत एक बेहद झीने नाईटी पहने हुए रश्मि ने एक गर्म कामुक फ्रेंच चुम्बन के साथ किया। दरवाज़े को भी ठीक से बंद नहीं पर पाया मैं। स्पष्ट था की इतने दिनों में रश्मि की यौनरुचि कई गुना बढ़ गयी थी। मुझे भी इस तराशी हुई सुंदरी को नंगा देखने की तीव्र इच्छा हो रही थी, इसलिए तुरत-फुरत मैंने उसकी नाईटी उतार फेंकी। मेरी नज़रों के सामने भरे हुए स्तन और उनके सामने सुशोभित स्थूल चूचक, जैसे किसी पूर्वज्ञान के कारण खड़े हुए, उपस्थित थे। मैंने आँख उठाई, तो मेरी आँखें रश्मि की आँखों से मिलीं। उसकी आँखों में एक संतुष्ट चमक थी – उसको मालूम है की मैं उसके स्तनों की सुन्दरता का दीवाना हूँ। फिर भी वो एक शिकायत भरे लहजे में कहती है,

“बहुत बड़े हो गए न?” और कहते हुए अपने स्तनों के नीचे हथेलियाँ लगा कर उठाती है। उसके इस हरकत में किसी भी प्रकार की लज्जा नहीं है.. वस्तुतः, मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझे अपने स्तनों का चढ़ावा दे रही हो। ऐसे चढ़ावे का भोग तो मैं कभी भी, और कहीं भी लगा सकता हूँ।

मैंने ‘न’ में सर हिलाया, “आई लव देम... आई लव यू!”

“तुम पागल हो..” कह कर रश्मि खिलखिलाते हुए हंसी.. और फिर उसने आगे जो किया उसने मेरे दिमाग और शरीर के सारे तार झनझना दिए। उसने अपने स्तनों को हलके से दबा दिया, और ऐसा करने से दोनों चूचकों में हलके पीले से रंग के दूध की बूँदें निकल आईं। ज़रा सोचिये, उसके प्यारे प्यारे रसभरे स्तनों में से अमृत उतर रहा था, और मैं उसको पीने जा रहा था! यह मेरा दावा है की धरती के प्रत्येक पुरुष के मन की फंतासी होगी की वो अपनी प्रेमिका या पत्नी के स्तनों से दूध पिए! कम से कम मेरी तो थी! और आज यह स्वप्न पूरा होने वाला था। इस दृश्य को देखते ही मेरा लिंग अपने पूरे तनाव पर खड़ा हो गया।

“मेला बच्चा भूखा है?” रश्मि ने मुझे प्यार से छेड़ा।

मैं मंत्रमुग्ध सा इस दृश्य को देख रहा था.. लिहाजा, मैं सिर्फ सर हिला कर हामी भर पाया।

“अले मेला बेटू... इत्ती देर शे उसे कुछ खाने को नहीं मिला... है न? मेला दूधू पिएगा..?”

रश्मि ने दुलराते हुए मुझसे पूछा। मेरे फिर से ‘हाँ’ में सर हिलाने पर रश्मि वहीँ सोफे पर बैठ गई, और उसने मुझे अपनी गोदी में आने का इशारा किया। मैंने उसकी गोदी में सावधानीपूर्वक व्यवस्थित हो जाने के बाद उसके होंठों को कोमलता से चूम लिया और उसके होंठों के अन्दर से होते हुए अपनी जीभ से उसकी जीभ चाट ली।

रश्मि फिर से खिलखिलाई, और बोली, “नीचे और भी टेस्टी चीज़ है...”

और यह कहते हुए उसने मेरे सर को अपने स्तनों की तरफ निर्देशित किया। मैंने उसके निप्पल और areola का पूरा हिस्सा मुँह में भर लिया और जोर से चूसा। कोई पांच छः बार कोशिश करने के बाद मुझे अपने मुंह में एक स्वादरहित द्रव रिसता हुआ महसूस हुआ। और इसी के साथ ही मुझे रश्मि के मुंह से संतुष्टि भरी आह भी सुनाई दी।

“आह्ह्ह मेरे राजा! ऐसे ही चूसते रहो.. आह.. बहुत अच्छा लग रहा है..।“

रश्मि मेरे चूषण से प्रसन्न तो थी – उसकी विभिन्न प्रकार की आहें और उम्म्म आह्ह्ह.. इत्यादि इसका सबसे बड़ा प्रमाण थीं। कुछ देर में द्रव/दूध निकलना बंद हो गय, लेकिन फिर भी मैंने उसके बाद भी एक दो मिनट तक उसके उस स्तन को चूसा। उसके बाद आई दूसरे स्तन की बारी.. मुझे अनुभव तो हो ही गया था.. या यह कह लीजिये की शेर को खून... (ओह! माफ करियेगा), दूध का स्वाद पता चल गया था।

इधर मैं उसका दूध पी रहा था, और उधर रश्मि मेरी पैंट की ज़िप के अन्दर से मेरे तने हुए लिंग के साथ खिलवाड़ कर रही थी। मैंने यह महसूस किया की जब वो मेरे लिंग को दबाती है, तो मेरा चूषण और बढ़ जाता है। खैर, यह खेल कब तक चलता.. अंततः उसके दोनों स्तनों में दूध समाप्त हो गया, तो मैं उसके पेट पर चुम्बन लेकर सोफे से ज़मीन पर उतर आया।

“कैसा लगा सरप्राइज?”

“बहुत ही बड़ा सरप्राइज था! मज़ा आ गया..”

“कब से बचा के रखा था.. आपका मन भरा?”

“मन कैसे भरेगा इससे मेरी जान! इतना न्यूट्रीशियश, इतना मजेदार! मैंने तो रोज़ पियूँगा!”

ऐसी बातें करते हुए शरीर पर जो प्रभाव होना होता है, वो होने लगा।

“अले ले ले! ये क्या.. मेले बेटू का छुन्नू तो ल्ल्ल्लंड बन गया है.. कितना बड़ा वाला ल्ल्ल्लंड..” उसने मुझे चिढ़ाया।

“मम्मी है ही इतनी सेक्सी!”

“ह्म्म्म? मम्मी इसको जल्दी से वापस छुन्नू बना दे? ठीक है न?”

“ख़याल बहुत ही उम्दा है!”

“मेला बेटू अपनी मम्मी की चुदाई करना चाहता है?” आज रश्मि को क्या हो गया है! अगर ऐसे ही होता रहा तो उसकी बातें सुन कर ही मैं स्खलित हो जाऊंगा!

“हां.. मम्मी की ज़ोरदार चुदाई करनी है..”

“स्स्स्सीईई! गन्दा बच्चा! अपनी मम्मी को चोदेगा!”

मैं ज़मीन पर लेट गया और जल्दी से अपने लिंग को ज़िप के अन्दर से आज़ाद कर दिया।

“मेरे लंड को अन्दर ले लो और अपनी दोनों टाँगें मेरी दोनों ओर करके बैठ जाओ! आज मम्मी मेरी घुड़सवारी करेगी!”

“इस तरह?”

वह मेरी गोद पर चढ़ते ही पूछती है। वह अपनी दोनों टाँगें मेरी दोनों ओर करके बैठ गयी है, लेकिन अभी भी ज़मीन पर अपने घुटनों के बल टिकी हुई है। उसके चूतड़ मेरी जांघों पर टिके हुए थे, और मेरा लिंग अभी भी बाहर था। मैंने अपने दोनों हाथों से उसके नितम्ब थाम लिए।

“इतना बड़ा लंड!”

रश्मि पर मानो आज किसी भूत का साया पड़ गया था। ऐसे खुलेपन से उसने गन्दी-बातें कभी नहीं करीं थी। उसने मेरे लिंग को पकड़ कर अपने योनि के चीरे पर से ऊपर-नीचे कई बार फिराया। उसकी योनि में से तेजी से स्राव हो रहा था। फिर उसने धीरे से मेरे लिंग के सुपाड़े को अपने चीरे में लगाया और धीरे धीरे उस पर बैठने लगी। उसका योनि द्वार तुरंत खुल गया, और मेरा लिंग अपनी नियत जगह में आराम से जाने लगा – जैसे गरम चाकू, मक्खन के अन्दर जाता है। आधा लिंग अन्दर जाने तक वह नीचे की तरफ बैठती है, और साथ में हाँफते हुए यह भी कहती जाती है की “यह बहुत बड़ा है”। कहने के लिए शिकायत है, लेकिन उसकी मुस्कान से पता चलता है की वह खुद अपने झूठ से आनंदित है। फिर वह मेरे लिंग पर ऊपर और नीचे होना शुरू कर देती है।

एक मिनट भी नहीं हुआ होता है की मैं अपना वीर्य छोड़ देता हूँ। हैं! यह क्या!! एक मिनट भी नही! मुझे थोड़ी लज्जा आई.. इतने वर्षों के सम्भोग क्रीड़ा में मैंने कभी भी इतनी जल्दी मैदान नहीं छोड़ा! आज क्या हुआ! फिर मैंने अपने लिंग पर रश्मि के खुद के सम्भोग निष्पत्ति का स्पंदन महसूस किया।

‘अरे! ये भी आ गई क्या!’

हम दोनों ने कुछ देर तक अपनी साँसे संयत करीं, और फिर रश्मि ने ही कहा, “बेटू मेरा... अपनी माँ को ऐसे आसानी से छोड़ देगा, क्या?” न जाने क्यों उसके इस तरह चिढ़ाने से या फिर यह कह लीजिये की इस स्वांग से मैं जल्दी ही फिर से उत्तेजित हो गया।

“ऐसे सस्ते में जाने देगा? हम्म्म? ऐसे चोदो न, जैसे अपनी बीवी को चोदते हो... हर रोज़..” मेरा लिंग वापस अपने पूर्ण तनाव पर आ गया। और पूर्ण तनाव आते ही,

“जानू...”

‘हैं! इसकी तो भाषा ही बदल गई..!’

“आज एक नया आसान ट्राई करते हैं? कुछ ही दिनों में मेरा पेट फूल कर बहुत बड़ा हो जाएगा। लेकिन, मुझे आपना लिंग अपने अन्दर हमेशा चाहिए... मगर, आपको ठीक लगे तो ही!”

“जानू मेरी! मैं तो बस जो तुम चाहती हो, मुझे बताओ, और मैं वैसे ही कोशिश करूंगा। अगर तुमको अच्छा लगता है तो मैं किसी भी आसन में तुमको चोदने को तैयार हूँ।“

तब रश्मि ने मुझे श्वान-सम्भोग आसन (दरअसल इसको कामसूत्र में ‘धेनुका’ कहा जाता है, लेकिन सामान्य भाषा में डॉगी स्टाइल कहते हैं) लगाने का निर्देश दिया। वो स्वयं अपने हाथों और सर को सोफे पर टिका कर और अपने नितम्बों को बाहर की तरफ निकाल कर घुटने के बल लेट/बैठ गई। जब मैं उसके पीछे जा कर अपना स्थान व्यवस्थित कर रहा था तो उसने बस इतना ही कहा, “जानू, आप सही छेद में ही करना..”

कहने सुनने में हास्यास्पद बात लगती है, लेकिन यह एक गंभीर चेतावनी थी। भगवान् के दिए दोनों छेद इतने करीब होते हैं, की इस आसन में अगर ध्यान नहीं दिया तो एक दर्दनाक और शर्मनाक गलती होने के पूरे आसार होते हैं। वैसे भी रश्मि को मैं आज तक गुदा-मैथुन के लिए मना नहीं पाया था।

मैंने अपने लिंग को रश्मि की योनि से रिसते रस (जो रश्मि के और मेरे रसों का मिश्रण था) से अच्छी तरह भिगोया और उसके पीछे से योनि द्वार पर टिकाया। रश्मि ने अपनी उँगलियों से अपनी योनि की दरार को कुछ फैलाया, जिससे मुझे उचित छेद खोजने में कोई कोई परेशानी न हो। अन्दर इतनी ज्यादा चिकनाई थी की ज़रा सी हरकत से मैं अन्दर तक समां गया।

रश्मि ने एक कामुक किलकारी भरी, “उईई माँ! आप तो पूरा अन्दर तक घुस गए! आह्ह्ह!”

इस कथन में किसी भी तरह की शिकायत, या दर्द जैसा कुछ नहीं था, इसलिए मैंने इसको सम्भोग आरम्भ करने की अनुमति के रूप में लिया, और उसकी सूजी हुई योनि की कुटाई आरंभ कर दी। रश्मि ने मेरे लिंग के घर्षण के साथ ही अपना आनंद भरा विलाप करना आरम्भ कर दिया। उधर मैंने पीछे से ही उसके स्तनों को दबाना, मसलना चालू कर दिया, और आराम से धक्के लगाने लगा। पीछे से सम्भोग करने से नितम्बों की पूरी संरचना स्पष्ट दिखाई देती है.. कमाल की बात यह है की इतने सारे आसन और पोजीशन ट्राई करने के बाद भी यह वाला बचा रह गया! रश्मि के नितम्ब! मैंने उंगली से उसकी गुदा को छुआ और फिर उसके छेद पर अपनी अंगुली फिराने लगा। कुछ प्रतिक्रिया न देखने पर मैंने धीरे से अपनी उंगली अंदर डाली। रश्मि चिहुंक गई, “ओउईई! म्म्मत क्क़करो..”

मैं रुक गया और कुछ और जोर से धक्के लगाने लगा। पहले स्खलन के बाद मेरा स्टैमिना काफी बढ़ गया था। इस नए काम युद्ध को करते हुए कोई दस-बारह मिनट के ऊपर तो हो ही गए होंगे। और अब मुझे भी लग रहा था की मंजिल निकट ही है। इस बीच में रश्मि एक बार निवृत्त हो चुकी थी। मैं अब ज़ोर का धक्का लगाने लगा – रश्मि भी अपनी तरफ से अपने नितम्ब आगे पीछे कर रही थी। कुछ ही देर में मेरे अन्दर का लावा फ़ूट पड़ा। स्खलन के उन्माद में मैंने अपनी कमर को कस कर रश्मि के नितम्बो से पूरी तरह चिपका लिया।

सम्भोग का नशा उतरा तो याद आया की सुमन भी घर पर होगी! लेकिन रश्मि ने बताया की वो अभी बाहर गयी हुई है किसी काम से। मैंने राहत की साँस ली – कमाल है! सोचा भी नहीं की घर में हमारे अलावा एक और प्राणी रहता है। आगे से सजग रहना होगा।
 
यात्रा वाले दिन:

रश्मि : “जानू, आप भी साथ आते तो मज़ा आता।“

सुमन : “हाँ जीजू! आप भी न.. मौके पर धोखा देते हैं!”

मैं : “मौके पर धोखा! हा हा हा!”

सुमन : “और क्या! अब बताइए.. ये सारा लगेज हम दो बेचारी लड़कियों को खुद ही ढोना पड़ेगा..”

मैं : “अच्छा जी.. तो मैं तुम दोनों का कुली हूँ?”

सुमन : “नहीं नहीं.. आप तो मेरी दीदी के ‘जाआआनू’ हैं.. (सुमन ने मुझे चिढ़ाया) और मेरे प्याआआरे जीजू! लेकिन.. सामान उठाने वाला भी तो कोई चाहिए! ही ही ही!!!”

मैं : “देख रही हो जानेमन.. इस लड़की को सामान उठाने वाला चाहिए.. लगता है की इसके लिए लड़का ढूंढना शुरू कर देना चाहिए..”

सुमन : “धत्त जीजू! आपके होते हुए मुझे कोई और क्यों चाहिए?” उफ्फ्फ़! इस लड़की से जीतना मुश्किल है!

मैं (सुमन की बात को नज़रंदाज़ करते हुए): “क्या बताऊँ जानू.. मेरा भी तो कितना मन है आपके साथ आने का! लेकिन यह मीटिंग्स! ये तो अच्छा है की मेरा काम दिल्ली में है.. बस, काम जल्दी से निबटा कर तुरंत आ जाऊँगा। बस यही तीन चार दिन की ही तो बात है... आप लोग एक दो दिन एक्स्ट्रा रह लेना वहाँ.. या एक दो दिन बाद चली जाना। मैं वहीँ सबको मिलूंगा! ओके?“

रश्मि मुस्कुराई, और फिर मेरे पास आ कर दबी आवाज़ में बोली, “वो तो ठीक है.. लेकिन, ये दूध कौन पिएगा?”

सुमन : “हाँ हाँ.. सुनाई दे रहा है मुझे!” सुमन अँधेरे में तीर मार रही थी।

मैं : “क्या सुन रही है तू?”

सुमन : “आप दोनों मेरे खिलाफ कोई साजिश कर रहे हैं..”

रश्मि : “तेरे कॉलेज में कहूँगी की रोज़ तेरे कान उमेठें जाएँ.. सारी चबड़ चबड़ निकल जायेगी!”

सुमन : “ठीक है! ठीक है! कर लो आप दोनों पर्सनल बातें! मैं क्यूँ कबाब में हड्डी बनूँ?” कहते हुए सुमन कमरे से बाहर निकल गयी।

मैं (मुस्कुराते हुए) : “इसको सम्हाल कर रखिएगा... मैं इत्मीनान से पियूँगा, जब आपसे मिलूंगा!”

रश्मि (खिलवाड़ करते हुए), “गन्दा बच्चा...!” और फिर अचानक गंभीर हो कर, “... जानू.. आपके बिना मेरा मन कहीं नहीं लगता! आप रहते हैं तो ज़िन्दगी में मज़ा रहता है!”

मैं : “क्या जानू.. बस तीन चार ही दिनों की तो बात है! मैं आ जाऊँगा! .. और फिर, मुझे ये डेयरी भी तो खाली करनी है! न्यूट्रीशन!! हेह हेह!”

रश्मि : “मेरा तो बस यही मन रहता है की इनमें लबालब दूध भरा रहे.. जिससे मैं आपको जब मन करे, दूध पिला सकूं!”

केदारनाथ की चढ़ाई काफी कठिन है। करीब सात हज़ार फुट की चढ़ाई चढ़ कर केदारनाथ मन्दिर तक पहुंचते हैं। केदारनाथ जाने की प्रबल इच्छा क्यों थी इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मुझे वैसे तो किसी तीर्थ पर जाने में कोई ख़ास रुचि नहीं है। लेकिन, इन लोगो की आस्था, और उनके परिवार की एक प्रकार की परम्परा के कारण मैंने कोई विरोध नहीं किया। वैसे भी रश्मि की डॉक्टर ने बताया था की इस यात्रा में कोई दिक्कत नहीं है, अगर बस कुछ ख़ास सावधानियाँ बरती जाएँ! मैंने यह सख्त निर्देश दिए थे, की रश्मि को चढ़ाई चढ़ने न दिया जाय – पालकी कर ली जाय, जिससे आसानी रहेगी। यह भी निर्देश दिया की रश्मि लगातार मुझसे बात करती रहे, जिससे मुझे वहाँ की परिस्थिति का मालूम होता रहे। इस पर रश्मि ने कहा की वो दिन में पांच छः बार मुझसे फ़ोन पर बात ज़रूर करेगी।

दोनों लड़कियों को मैंने बैंगलोर विमानपत्तन तक छोड़ा, और वापस काम पर चला गया। दो दिन बाद मुझे दिल्ली के लिए निकलना था, और वहाँ चार ज़रूरी मीटिंग्स कर के देहरादून, और वहाँ से केदारनाथ की यात्रा करनी थी। रश्मि, सुमन के जाने के बाद घर खाली खाली सा लगने लगा तो मेरा ज्यादातर समय ऑफिस में ही बीत रहा था। रश्मि मुझे हर समय फ़ोन या एस ऍम एस पर अपनी जानकारी देती रहती। दिल्ली में मीटिंग्स वगैरह करते हुए मुझे रश्मि ने बताया की केदार घाटी में काफी बारिश हो रही है। मैंने उसको सावधानी बरतने को कहा, और जल्दी मिलने का वायदा करके फोन काट दिया। देहरादून के लिए अगले दिन सवेरे की फ्लाइट थी।

रात में सोने से पहले मैंने रश्मि का नंबर लगाने की कोशिश करी – कई बार कोशिश किया, लेकिन नम्बर नहीं मिला। फिर उसके पापा और होटल का भी नंबर लगाया.. कहीं भी फ़ोन नहीं लग रहा था। निराश हो कर मैं सोने चला गया – रात भर ठीक से नींद नहीं आई। अजीब अजीब सपने आते रहे, और सवेरे उठने के बाद बुरे बुरे ख़याल आते रहे। उठते ही मैंने फिर से फ़ोन लगाने की कोशिश करी, लेकिन अभी भी फ़ोन नहीं लग रहा था। ऐसे ही बुरे मूड में मैं दिल्ली विमानपत्तन पहुंचा और वहाँ जा कर मालूम हुआ की केदारनाथ में भीषण बाढ़ आई हुई है। मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई – पेट में जैसे गाँठ पड़ गयी! मन अज्ञात आशंकाओं से घिर गया।

मन में अनजाने डर, और ह्रदय में ढेर सारी प्रार्थनाएँ लिए पूरी यात्रा बीती। लेकिन देहरादून विमानपत्तन पर पहुँचते ही सारे के सारे डर हकीकत में बदल गए। वहाँ मैंने टैक्सी करने की कोशिश करी, तो लोगों ने बताया की केदारनाथ में किसी भी ड्राईवर से उनका संपर्क नहीं हो पा रहा है। पूछने पर उसने आगे जाने से मना कर दिया, यह कह कर की ले तो जा सकता है, लेकिन सड़क की क्या हाल है, और बारिश में न जाने क्या क्या हो सकता है कुछ नहीं मालूम! आज का दिन यूँ ही निकल गया – एक एक मिनट.. एक एक पल ऐसा लग रहा है जैसे की एक एक सदी बीत रही हो! बॉस का भी दिन में कई बार कॉल आ चूका – वो रश्मि के बारे में पूछते हैं! मैं क्या जवाब दूं! एक बार तो मेरी आंखों में आंसू छलक पड़े! मेरी चुप्पी और खामोश रुदन उन्होंने शायद सुन लिया हो! फ़ोन पर मुझे धाड़स बंधाते हुए उन्होंने कहा की उम्मीद मत छोड़ना, और मेरी हर तरह से मदद करने का आश्वासन किया। मुझे इतना तो मालूम पड़ गया की उन्होंने उत्तराखंड आपदा कंट्रोल रूम और अधिकारियों से संपर्क करने की हर संभव कोशिश की है।

एक दिन।

दो दिन।

तीन दिन।

चार दिन।

हर एक दिन गुजरने के बाद मुझे मेरे परिवार के लौटने की आशा भी धूमिल होती नजर आ रही थी। एक एक पल इंतजार की करना मुश्किल होता जा रहा था। न तो भोजन का कोई कौर गले के अन्दर जा पाता, और न ही हलक से पानी की एक बूँद! न जाने उन लोगों ने कुछ खाया पिया होगा या नहीं, बस यही सोच कर कुछ खाने पीने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी।

ज्यादातर टैक्सी वाले अब मुझे पहचानने लग गए। मुझे देखते ही वह कहते हैं, “साहब, ऊपर के इलाकों में सड़कें ख़त्म हो चुकी हैं... और गाँव के गाँव साफ़ हो गए हैं। हमारे किसी भी साथी की कोई खोज खबर नहीं है। अब तो बस भगवान्, और सेना का ही सहारा है। आप बस प्रार्थना करिए की आपका परिवार सही सलामत आपको मिल जाय।“

रात में होटल वाले ने जबरदस्ती एक रोटी मुझे खिला दी। दिन भर आपदा कार्यालय के चक्कर लगाता, फ़ोन की घंटी बजने का इत्नाजार करता, और समाचार में मृतकों की बढ़ती हुई संख्या देख कर मन ही मन मनाता की मेरा कोई अपना न हो! इतनी बेबसी मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं महसूस करी। इतनी बेबसी, और इतनी खुदगर्जी!

इस आपदा में हुई और हो रही जान-माल की क्षति का आंकड़ा विकराल रूप से बढ़ता ही जा रहा है! मन में बस अब एक ही ख़याल आता है की अब बस! अब ये गिनती ख़त्म करो भगवान्! इतने दिन हो गए, और किसी से कोई संपर्क ही नहीं हो पाया है!

'काश! ये लोग ठीक हों! ओह रश्मि! प्लीज प्लीज! काश! तुम ज़िंदा हो..!'

छठा दिन:

राहत और बचाव कार्य बाधित हो रहा है, क्योंकि घाटी में फिर से तेज बारिश हो रही है, और धुंध छाई हुई है। सेना के हेलिकॉप्टर उड़ान ही नहीं भर पा रहे हैं! खबर आई थी की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया! बचने गए वीर युवक, खुद ही पहाड़ों की भेंट चढ़ गए! एक अफसर से बात हुई, उन्होंने मुझे साफगोई से कह दिया,

“साहब, यह तो एक तरह से 'रेस अगेन्स्ट टाइम' है... मौसम खराब है, हर तरह के जोखिम हैं और अब तो महामारी का खतरा भी पैदा हो गया है... लोग अब बीमारी और भूख–प्यास से मर रहे हैं! कितनी मौतें हुईं, कितने लापता हुए और कितने लोग सुरक्षित निकाले गए - इस पर अब कोई भी बात बेमानी लग रही है, क्योंकि यहाँ कोई समन्वय नज़र नहीं आ रहा है, और न ही कोई एक सूची है। सच्चाई यह भी है कि खुद प्रशासन का कितना नुकसान हुआ है, इसका अंदाजा ठीक-ठीक अभी उन्हें भी नहीं है। इसके शिकार हुए लोगों का पता लगाना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गयी है। हज़ारों की तादाद में लोग मदद की आस लगाए बैठे हैं। आप भी उम्मीद न छोडिए.. कुछ भी हो सकता है!”

सातवाँ दिन:

अब तो कोई उम्मीद ही नहीं बची है.. बस यंत्रवत रोज़ रोज़ राहत शिविर के दफ्तर पहुँच जाता हूँ। वहाँ लोगों से कई बार प्रार्थना भी करी है की मुझे भी सेवा का अवसर दें.. लेकिन वहाँ किसी के पास समय नहीं है। कई सारे लोग बचाए भी जा चुके हैं, लेकिन इन लोगों का कोई नामोनिशान ही नहीं है!

‘अरे! फ़ोन बज रहा है..’

कोई अनजाना नंबर था। स्थानीय! दिल धाड़ धाड़ कर के धड़कने लगा।

“हेल्लो?” मैंने बहुत उम्मीद से बोला।

“जीजू..?” यह तो सुमन की आवाज़ थी।

“सुमन?”

“जीजू... हू हू हू..” वो बेचारी रोने लगी!

‘हे भगवान्!’

“नीलू.. तुम ठीक तो हो न?”

“जीजू.. प्लीज आप मुझे ले चलो.. हू हू हू..” रोते हुए उसकी हिचकियाँ बांध गईं।

“हाँ नीलू.. बताओ कहाँ हो? बाकी लोग कैसे हैं?”

उत्तर में सुमन सिर्फ रोती रही।

“साहब, आप फलां फलां जगह पहुँच जाइए.. एक्सट्रैक्शन वही हो रहा है..”

“जी हाँ.. जी.. ठीक है.. मैं आ रहा हूँ..”

“ओह भगवान्! तेरा लाख लाख शुक्र है!”

कह कर मैं बिलख बिलख कर रोने लगा। कोई देखे या नहीं.. मुझे कोई परवाह नहीं! जब सब उम्मीदें छूट गईं, तब देखिए! कैसे खुशखबरी आई! कोई तीन घंटे की मशक्कत के बाद मैं राहत शिविर / एक्सट्रैक्शन कैंप में पहुंचा। वहाँ की हालत तो और भी दयनीय थी। बचाए गए सभी लोगों की आँखों में राहत और आस की नमी थी। साफ़ दिख रहा था की वो सभी बेहद भूखे और बेबस थे, और अब उनके अन्दर किसी भी तरह की शक्ति नहीं बची हुई थी। वाजिब भी है - इन लोगों को एक हफ्ता हो गया, कुछ भी खाने को नहीं मिला था.. और पीने के लिए भी सिर्फ गन्दा पानी ही नसीब हुआ होगा। ज़मीन पर एक व्यक्ति लेटा हुआ था... उसकी हालत देखकर मुझे नहीं लगा की उसके बचने की कोई उम्मीद होगी। सभी के कपड़े फटे हुए और मैले-कुचैले हो गए थे... या तो वो खड़े थे, या फिर लेटे हुए थे।

एक वृद्ध मुझे देखते ही बोला, “हे बबुआ, हम हाथ जोड़ित है.. हमका हियाँ से ले चला।”

बेचारे को लगा होगा की मैं उसका पुत्र या कोई सगा सम्बन्धी हूँगा! एक तरफ कुछ लोग उल्टियाँ कर रहे थे।

‘ये लोग दिख क्यूँ नहीं रहे हैं?’ अचानक मेरी नज़र एक तरफ ज़मीन पर लेटी हुई लड़की पर पड़ी.. ‘सुमन!’

“सुमन?” ‘हे भगवान्! क्या हालत हो गयी है इसकी! इतनी प्यारी बच्ची.. और ये दशा?’ उसके कपड़े बुरी तरह से फटे हुए थे। बुरी तरह से मैली कुचैली, ज़ख़्मी, बेदम!

“जीजू? ओह जीजू!” कहते हुए वो मुझसे लिपट गयी।

“तुम ठीक तो हो नीलू?”

उसने सर हिला कर हामी भरी।

“बाकी लोग कहाँ हैं?”

मेरे प्रश्न पर उसकी आँखें भर आईं.. उसने बस ‘न’ में सर हिलाया। मुझे समझ आ गया की वो बात करने की दशा में नहीं है। मैंने वहाँ उपस्थित अधिकारी से बात करी, तो उन्होंने बताया की मेरे परिवार का कोई और सदस्य उनको नहीं मिला.. सुमन अकेली ही थी। वही बता सकती है की बाकी लोग किधर हैं! मैंने वहाँ पर सारी ज़रूरी औपचारिकताएं पूरी करीं, और सुमन को होटल ले आया। रास्ते में आते आते वो या तो गहरी नींद सो गयी, या फिर बेहोश हो गयी। बेचारी की क्या दशा हो गयी थी!! कोई और समय होता तो ऐसी हालत में किसी लड़की को लाने पर होटल के सभी लोग शक करते, लेकिन आज सभी सहयोग कर रहे थे। सामूहिक विपत्ति में समाज में मित्रों की संख्या बढ़ जाती है।

उन्ही की मदद से मैंने सुमन को बिस्तर पर लिटाया, और फिर दरवाज़ा बंद कर के उसके सारे कपड़े उतारे। उसके पूरे शरीर पर चोट, और कटने के निशान दिख रहे थे। शरीर में सूजन तो थी, लेकिन उसके तलवे काफी सूजे हुए थे, और साथ ही साथ उन पर फ़फोले पड़े हुए थे। उनमे से कुछ फूट भी गए थे, और वो घाव खुले भी हुए थे। मैं उसको बिस्तर में लिटा कर उसके लिए ज़रूरी वस्त्र, और डॉक्टर का इंतजाम करने चला गया। डॉक्टर के साथ वापस आया तो देखा की सुमन अभी भी सो रही थी, और उसका शरीर तप रहा था।

उन्होंने सुमन की पूरी तरह से जांच करी, और उसको इंजेक्शन दिया, और कुछ दवाएं लिख कर दीं। बताया की कोई डरने की बात नहीं लगती, बस सुमन को कुछ हल्का खिलाता रहूँ.. जैसे की जूस, सैंडविच इत्यादि, जब तक उसकी ताकत वापस न आ जाय! एक बार ताकत आने पर बुखार खुद ही उतर जाएगा। उनको बस इसी बात का डर है की कहीं उसको डि-हाइड्रेशन न हो जाय!
 
सुमन देर शाम को ही उठ पाई। तब तक मैं उसके लिए जूस, और सैंडविच इत्यादि का इंतजाम कर लाया था। मैं उसको बिस्तर से उठा कर बाथरूम ले गया, जहाँ अन्य ज़रूरी कामों के साथ मैंने उसको नहलाया भी। वापस आ कर मैंने उसको कपड़े पहनाये – वो इतनी कमज़ोर हो गयी थी की खुद के बल पर बैठ भी नहीं पा रही थी। खाना भी मैंने उसको अपने हाथों से ही खिलाया। और सबसे अंत में दवा पिलाई। फिर उसको वापस बिस्तर में लिटाया।

मैंने प्यार से उसके बालों को सहलाते हुए पूछा, “नीलू, अब ठीक लग रहा है?”

सुमन की आँखों से आंसू टपक पड़े।

“कोई नहीं बचा, जीजू! कोई नहीं..”

मेरे ऊपर मानो बिजली गिरी! ‘कोई नहीं..! मतलब!’

जब तक कोई निश्चित बुरी खबर नहीं मिलती, तब तक आशा बंधी रहती है। मेरी भी आशा बंधी हुई थी की शायद रश्मि और बाकी सभी जीवित होंगे... लेकिन सुमन के इस एक वाक्य ने वह आशा भी छीन ली। मैं बुरी तरह से फूट पड़ा – मानो, थमा हुआ बाँध अचानक ही टूट गया हो। मेरे पैर... जैसे उनमें से सारी जान निकल गयी हो। मेरा सर चकराने लगा, और मैं अचेत हो कर गिर गया।

रजनीगंधा की मस्त कर देने वाली खुशबू मेरे नथुनों के रास्ते से आ कर मुझे आंदोलित कर देती है। मेरी चेतना वापस आती है। आँख खुलती है, तो मुझे लगता है की मानो मैं स्वर्ग के नंदन वन में हूँ। चारो तरह चांदनी फैली हुई है, और हरी भरी घास पर ढेर सारे पुष्प खिले हुए हैं! वैसे ही जैसे फूलों की घाटी में देखे थे!

‘क्या बात है! लेकिन.. लेकिन, वो रजनीगंधा की खुशबू?’

मैं उठ कर देखता हूँ तो एक तरफ छोटा सा तालाब, जिसमें कई सारी कुमुदनियाँ अभी सुप्त अवस्था में थीं। दूसरी तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा की एक बहुत ही सुन्दर सा घर था – उस घर के प्रथम तल पर स्थित एक बड़ी खिड़की से रौशनी छन कर बाहर आ रही थी। दिमाग की एक झटका सा लगा – यह तो वही घर है जैसा मैंने और रश्मि ने साथ में सोचा था! एक बार और मैंने नज़र दौड़ाई, तो देखा की तालाब के समीप ही एक स्त्री, एक छोटी सी लड़की के साथ खेल रही है।

‘ओह! रजनीगंधा की सुगंध उसी तरफ से आ रही है।‘

अचानक उस स्त्री की दृष्टि भी मेरे ऊपर पड़ती है; वो खेलना बंद कर मेरे पास आती है.. रश्मि को देख कर मैंने मुस्कुरा उठता हूँ। वो खजुराहो की मूर्तियों जैसी सर्वांग सुंदर दिख रही है - अत्यन्त कमनीय! दरअसल, उसने खजुराहो की मूर्तियों के समान ही वस्त्र पहने हुए हैं – कमर के नीचे धोती है, और स्तनों को ढके हुए कंचुकी! इन वस्त्रों में रश्मि के रूप सौंदर्य और अंग-प्रत्यंग की रचना देखते ही बन रही है। उसके वक्ष गोलाकार थे, और शरीर चांदनी में चमक रहा था। आँखों में वही परिचित चंचलता और मादकता!

वो प्रेम से मेरे सर को अपनी गोद में रखकर मुझसे कहती है, “जानू.. उठ गए!”

मैंने एक गहरी सांस भरी – रजनीगंधा की मादक खुशबू मेरे पूरे वजूद में समां गई। समझ नहीं आ रहा की सो जाऊं या जागूँ?

“आई लव यू!” मैंने आँख बंद किये किये कहा।

उत्तर में रश्मि खिलखिलाई! फिर रुक कर बोली, “अच्छा.. एक बात बताओ.. सुन्दर है न?”

“बहोत!” मैंने रश्मि की कंचुकी में उंगली डाल कर उसको नीचे की तरफ खींचा। उसका बायाँ स्तन कंचुकी के बंधन से मुक्त हो गया। मेरी हरकत पर रश्मि ने मेरे हाथ पर एक हलकी सी चपत लगाई।

“गंदे! मैं नहीं...”,

कहते हुए उसने एक तरफ अपनी उंगली से इशारा किया,

“... हमारी बेटी!”

रश्मि की इस बात पर मेरा सर एक झटके से दूसरी तरफ उस छोटी लड़की को देखने के लिए मुड़ता है। मेरी आँख एक झटके से खुलती है। मेरे चेहरे पर सुमन झुकी हुई है और बदहवासी में मेरे दोनों गालों को पीट रही है।

“जीजू.. उठिए.. प्लीज.. उठिए! ओह थैंक गॉड!”

मेरा सर सुमन की गोद में था – उसने जब मेरी आँख खुली हुई देखी तो उसके चेहरे पर कुछ राहत के भाव आये।

“जीजू... आप ठीक तो हैं न?”

“ह्ह्ह..हाँ.. मैं ठीक हूँ..” कहते हुए मैं उसकी गोद से उठ कर बैठ जाता हूँ। लेकिन सदमे का असर अभी भी था – मेरा सर फिर से चकरा गया, तो मैं सर थाम कर बैठ गया। सुमन मुझे पकड़ कर पुनः रोने लगी।

“सब ख़तम हो गया.. सब..” कहते हुए उसकी एक बार फिर से हिचकियाँ बंध गईं। मैं तो मानो काठ का हो गया! क्या कहूँ? सुमन कुछ देर रोने के बाद खुद ही कहने लगी,

“बाढ़ से बचने के लिए हम लोग होटल बाहर निकले। होटल का अहाता बुरी तरह से टूट गया था, और वहाँ से पानी बह रहा था – वहीँ से बाहर निकलते हुए माँ का पैर फिसल गया। पानी इतना तेज़ और मैला था की गिरने के बाद वो फिर कभी नहीं दिखाई दीं। पापा उनको बचने के लिए अहाते में कुछ देर तक गए, और जब वापस आये तो लंगड़ा कर चल रहे थे – शायद उनके पैर में मोच आ गयी थी।

हमने देखा की आस पास के कुछ लोग पहाड़ की ढलान के ऊपर की तरफ जा रहे थे, इसलिए हम लोग भी उधर ही चलने लगे। जैसे-तैसे हम लोग ऊपर पहुंच गए, लेकिन उस चढ़ाई को करने में बहुत समय लगा – न दिन का पता चलता और न रात का! दीदी तो प्रेगनेंसी के कारण पहले ही कुछ कमज़ोर थीं, और भूखी प्यासी रहने के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे गई। और वो वहीँ बेहोश होकर गिर गयी। पापा ने कहा की वो कुछ खाने के लिए लाते हैं, लेकिन पूरा दिन भर तलाशने के बाद भी उनको कुछ भी नहीं मिला।

हमारे साथ जो लोग ऊपर जा रहे थे उनमे से उस समय तक कोई नहीं दिख रहा था – शायद वो किसी और तरफ निकल गए, या फिर .. बह गए! मदद देने के लिए अब कोई नहीं था। खैर, पहाड़ पर घास भी उगी हुई थी, और उसको देख कर पापा ने सोचा की शायद उसको खाया जा सकता है। लेकिन उनको कुछ शक था की वो घास खाने लायक है भी, या नहीं! लेकिन, उनका शक सही था... वो वाली घास ज़हरीली थी। उसको खाने पर उनको अच्छा तो नहीं लगा तो उन्होंने उसको थूक दिया – लेकिन जगता है की कुछ ज़हर अन्दर चला गया। दिन भर उल्टियाँ करने के बाद उनकी भी मौत हो गयी।

दीदी अब और चल नहीं सकती थीं.. इसलिए मैंने उसको वहीँ लिटा कर मैं आस पास खाने को ढूँढने गयी। शायद किसी पक्षी ने कुछ मांस गिरा दिया था। वो मैंने और दीदी ने मिल कर खाया। रात में डर लगता - लगातार बारिश, ठंड और जंगली जानवरों का डर बना रहता था। मरने वालों के शवों को कुत्ते और अन्य जानवर खा रहे थे। अगले दिन दीदी की हालत काफी खराब हो गयी। भूख, कच्चा मांस, डिहाइड्रेशन, कमजोरी, संक्रमण... रात में जब वो सोई तो उसका शरीर कांप रहा था। बाहर ठंडक भी बहुत हो रही थी। मैं जब सवेरे उठी तो देखा की दीदी नहीं बची..! रोने के लिए अब तो आंसू भी नहीं बचे थे! दो दिन तक जैसे तैसे जंगली जानवरों से बचते हुए मैं रही... फिर कल मैंने हेलिकॉप्टर की आवाज़ सुनी तो उसको इशारा किया... न जाने कैसे उन्होंने मुझे देखा और वहाँ से निकला। अब यह नहीं समझ आता की मैं लकी हूँ, या एकदम मनहूस!“

जीवन भी अजब है। क्या क्या रंग दिखलाता है। सब कुछ... इसी जन्म में हो जाता है, सब यहीं मिल जाता है! तीन साल भी हम साथ नहीं रह पाए! तीन साल भी नहीं!

‘हे देव! इतनी क्रूरता! ऐसे लेना था, तो दिया ही क्यों? रश्मि ने ऐसा क्या किया था की उसकी इस तरह से मृत्यु हो? वह बेचारी सभी की हंसी ख़ुशी के लिए ही सब कुछ करती थी। किसी के प्रति उसके मन में कोई भी विद्वेष नहीं था। फिर क्यों? कहाँ है भगवान? कैसा भगवान?’

और मेरी हालत?

मैं तो एकदम अकेला हूँ! एकदम अकेला.. मेरे हर तरफ एक भीड़ जैसी है.. घर में रहो, सड़क पर निकालो, या फिर ऑफिस जाओ... हर तरफ लोगों की कोई कमी नहीं है.. लेकिन, मैं नितांत अकेला हूँ! सोसाइटी में लोग जब मुझे देखते हैं तो मानो उनको लकवा हो जाता है.. बात करते करते चुप हो जाते हैं, मुझे देख रहे होते हैं तो किसी और तरफ देखने लगते हैं.. कन्नी काट लेते हैं.. जैसे की मुझे कोई रोग हो!

मुझे भी मुक्ति चाहिए! लेकिन आत्महत्या कर नहीं सकता। ऐसे संस्कार नहीं हैं! लेकिन... मुक्ति तो मुझे अब चाहिए! वसीयत में मैंने अपना सब सब कुछ सुमन के नाम लिख दिया है, और अपनी आखिरी इच्छा के लिए निर्देश दिया है की मृत्यु के बाद मुझे विद्युत् शव-दाह गृह में जलाया जाय। क्यों बेकार में लकड़ियाँ जलाना?

रश्मि की मृत्यु के बाद बीमा राशि और सरकारी सहायता से मिली हुई रकम मिला कर मैंने एक ट्रस्ट-फण्ड बनाया, जिसका एक ही उद्देश्य था – गरीब परिवार की चुनी हुई मेधावी क्षात्राओं को उनकी उच्च शिक्षा (कम से कम स्नातक स्तर तक) तक पूरी सहायता देना। मेरे ऑफिस, और रश्मि के कॉलेज के लोगों ने इस फण्ड में भरपूर योगदान दिया था, जिससे अब यह एक स्थाई क्षात्रवृत्ति बन चुका था। बाकी का सारा निबटारा होने वाली सारी राशि (सुमन के माता पिता की बीमा राशि और सरकारी सहायता), और उत्तराँचल की सारी ज़मीन इत्यादि मैंने कानूनी सहायता से सुमन के नाम लिखवा दी। कम से कम उसका जीवन तो अब स्थिर हो गया था।

मुझे लग रहा था की अब मेरे जीवन का मकसद पूरा हो गया है.. ‘रश्मि! मुझे भी अपने पास बुला लो!’ बस मैं यही एक बात रोज़ मन ही मन दोहराता। एक साल हो गया था मेरा परिवार नष्ट हुए! परिवार क्या, पूरा संसार नष्ट हुए! संसार की सबसे निराली लड़की को मुझसे आज से एक साल पहले काल ने छीन लिया। उसके साथ साथ छीन लिया उसने मेरी संतान को – मेरी बेटी! साथ ही चले गए मेरे माता और पिता भी! दोनों माता पिता!

‘कैसा क्रूर मजाक!’

कहते हैं की जीवन किसी के लिए नहीं रुकता! चलता ही रहता है.. लेकिन किस ओर? मैं तो अब हर क्षण बस मृत्यु का ही इंतज़ार कर रहा हूँ। हाँ – खाता हूँ, पीता हूँ, सोता हूँ.. टीवी भी देख लेता हूँ.. क्या करूँ? जीना पड़ रहा है! लेकिन क्या जीना! मैं सब कुछ अकेले ही करता हूँ। हाँ – घर में सुमन भी रहती है। लेकिन, उससे तो बस नाममात्र की बातें होती हैं। कभी कभी दुःख होता है की इस सब में उसकी क्या गलती! मैं क्यों उसके साथ ऐसे बर्ताव करूँ? आखिर मेरे साथ साथ उसने भी तो अपना परिवार खोया है! लेकिन, फिर भी.. एक अजीब तरह की बेबसी होती है.. अजीब तरह की कसक.. अक अजीब तरह का आक्रोश!! कुल मिला कर, उससे अधिक बात नहीं हो पाती! अब तो लगता है की किसी से भी मैं ठीक से बात नहीं कर पाऊँगा!

उस दुर्घटना के कुछ ही दिन बाद की बात है... मैं कमरे की खिड़की से बाहर किसी अनंत शून्य में देख रहा था।

सुमन मेरे पीछे आ कर कहती है, “आप क्या देख रहे हो?”

मैंने कई दिनों से खुद को जब्त किया हुआ था.. उस एक वाक्य ने न जाने कैसे मेरे सब्र के बाँध को ढहा दिया। मैंने चिड़चिड़े ढंग से उसको जवाब दिया, “अपने काम से काम रखो! मुझसे चिपकने की कोई ज़रुरत नहीं!”

वो उसी पल मेरे कमरे से बाहर भाग गई। कुछ समय बाद मैंने उसके रोने सुबकने की आवाज़ सुनी, लेकिन मैंने उसको मनाने की कोई कोशिश नहीं करी। वो मेरी जिम्मेदारी नहीं है। अगर उसको भी इस संसार में गुजारा करना है, तो बिना किसी मोह के ही करना होगा। संसार बहुत क्रूर है! और भगवान उससे भी बड़ा क्रूर! किसी भी प्रकार का मोह न ही हो तो अच्छा! न कोई बंधन होगा, और न कोई बोझ! आराम से चले जाओ.. किसी को पता भी नहीं चलेगा की कब निकल लिए!

सबसे अच्छी बात यह की रश्मि के ही कॉलेज में सुमन का दाखिला हो गया था – वहाँ के प्रिंसिपल मुझे अक्सर उसकी उन्नति के बारे में बताते.. कहते की बहुत मेधावी है! मैंने उनको अपनी स्थिति के बारे में बताया, और उनको कहा की वो उसको उचित मार्गदर्शन देते रहें। क्योंकि मुझसे नहीं हो पायेगा।

अच्छे लोगो न भारी अभाव हो रहा है मेरे जीवन में.. अभी कोई सात महीने पहले श्री देवरामानी का देहांत हो गया – दिल का दौरा पड़ने से। उनकी श्रीमति को उनकी संताने अपने साथ ले गईं। लिहाजा, अब पड़ोस भी खाली लगता है। घर आने का मन नहीं होता। इसलिए मैं अक्सर अपने टूर बनता रहता हूँ.. पिछले एक साल में चार महीने मैं बाहर रहा। वो मकान तो बस रश्मि के कारण घर था, अब तो बस एक बेरंग ढांचा सा लगता है! ऐसे यंत्रवत जीवन होने के कारण कार्यस्थल पर तरक्की बहुत तेजी से हो रही है! अब मैं खुद भी मेरे भूतपूर्व बॉस के स्तर पर हूँ। लेकिन उनका मित्रवत व्यवहार अभी भी बरकरार है।

वो अभी भी मुझसे संपर्क में हैं। दुर्घटना के बाद उन्होंने मुझसे रश्मि के बारे में पूछा। क्या बताता! बस फूट फूट कर रोने लगा। उनको मैंने सारा वाकया सुनाया। उसके बाद से उन्होंने कभी भी रश्मि का नाम भी मेरे सामने नहीं लिया, जिससे मुझे दुःख न हो! शुरू शुरू में मैंने दोस्तों के साथ मुलाकात की, और वो लोग भी मुझसे मिलने आये – जैसे की पारंपरिक सामाजिक प्रणाली होती है..। हिमानी भी मिलने आई थी... उसने मुझसे दबे छुपे शब्दों में दोबारा शादी करने को भी कहा। मैंने उससे क्या कहा, मुझे कुछ याद नहीं आता अभी! हाँ, लेकिन कोई चार महीने पहले मैंने उसकी शादी का कार्ड देखा – कार्ड मिलने के एक महीना पहले उसकी शादी हो गयी थी। अच्छी बात थी.. मुझे अपने जीवन में किसी भी तरह का उलझाव नहीं चाहिए था।

अकेलेपन के साथ साथ, मैं पिछले छह महीनों में न जाने किस गढ्ढे के अन्दर चला जा रहा हूँ.. वहाँ पर सूर्य का प्रकाश संभवतः कभी नहीं गया है। काश! आत्महत्या करना पाप न होता!
 
मृत्यु :

बहुत भयावह होता है जब आप देखते हैं की एक निश्चित मृत्यु आपकी तरफ आ रही है, और आपके पास उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। तीव्र गति पर अचानक ही लगाम लगाये जाने पर टायरों से उठने वाली चीख, ब्रेक्स के जलने पर उठने वाली कसैली गंध.. और इन सब का उस भयावह सच की तरफ इशारा!! मेरे अंतिम क्षण में मेरे दिमाग में बस एक ही बात आई,

‘आ ही गई मौत!’

वैसे, मृत्यु से मुझे कोई डर वर नहीं लगता.. हाँ, उससे मुझे एक तरह की खीझ सी होती है। लेकिन, रश्मि के बाद मैं जी ही कहाँ रहा था – बस जीवित था। अपने आखिरी क्षण में मुझे बस यही ख़याल आया... और चैन भी। टक्कर बेहद भीषण थी। उस झटके से मेरा हृदय रुक गया, और दिमाग में अनगिनत रुधिर वाहिकाएँ फट गई। चेतना जाते हुए आखिरी बात जो मुझे याद है वह यह है की कार की चेसी कुचलती जा रही थी, और कार की फ़र्श पर मेरा लहू! मेरे सर में एक असहनीय दर्द हुआ, और चेतना लुप्त हो गई।

अगला ख़याल जो मुझे याद है वह यह है की मैं मर गया हूँ। सचमुच मृत! ...लेकिन, फिर दिमाग पर जोर लगाया तो समझ आया की अगर मैं मर गया हूँ, तो फिर सोच कैसे सकता हूँ? सोच तो दिमाग से होती है, और दिमाग जीवित शरीर में! मतलब अभी भी जीवित हूँ!

ग्रेट!

“रूद्र... रूऊऊऊद्र..!” मैंने आवाज तो सुनी, लेकिन पहचान नहीं पाया।

कैसी आवाज़ है? अच्छी आवाज है, लेकिन जानता नहीं..। मेरे सिर में भयंकर दर्द हो रहा था। सिर में ही क्या, पूरे शरीर में! तो क्या मैं उस अतिभारित ट्रक से हुई दुर्घटना से बच गया?

“रूद्र.. बेबी.. मरना नहीं। प्लीज़..? जागते रहो। तुम मुझे सुन रहे हो? मेरे साथ रहो। चिंता मत करो। मैं हूँ यहाँ तुम्हारे साथ। मुझे सुन रहे हो? मुझसे बात करो.. प्लीज़..?”

अरे भई.. कौन हो आप? कौन है मेरे साथ? मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मेरे सर में जैसे जैसे वो भयंकर दर्द बढ़ रहा था, वैसे वैसे मुझे यह समझ नहीं आ रहा था की ये रूद्र कौन है, और ये औरत (हाँ.. औरत की ही आवाज़ थी) कौन है! मैंने उठने की कोशिश करी.. एक अजीब सा अनुभव हुआ – जैसे चक्कर, उलटी, और एक और भयंकर दर्द की लहर.. ये सब एक साथ! मैं फिर से अचेत हो गया।

रह रह कर रश्मि की बातें याद आतीं.. एक बार मैंने सैंडविच बनाया। और खाते हुए उसको पूछा, “तुम्हारा बनाया हुआ इतना बढ़िया लगता है! ये कैसे हो सकता है!! एक जैसी चीज़ें ही तो डालते हैं – जो तुमने यूज़ करी, वही मैंने भी.. फिर ऐसा क्यों?”

रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानू.. मैं सैंडविच में प्यार भी डालती हूँ..”

रश्मि बिलकुल ऐसी ही थी। हर चीज़ में प्यार डालती थी। उसका किया हर काम बेहतर होता था! .. यह प्यार नहीं तो और क्या है...?

यू-ट्यूब पर मैं “आगे भी जाने न तू.. पीछे भी जाने न तू..” वाला गाना सुन रहा था। रश्मि को यह गाना बहुत पसंद था। मैं भी साथ में गाने लगा.. रश्मि की याद हो आई.. गला भर गया। और आँखों से आंसू आ गए। मैं रोने लगा – इस तरह मैं कभी नहीं रोया। कम से कम एक घंटा रोने के बाद सारी ऊर्जा क्षीण हो गयी। कब सोया कुछ भी याद नहीं!

‘ब्लिप... ब्लिप... ब्लिप...’

‘ये क्या चिढ़ाने वाला शोर हो रहा है! और.. रश्मि कहाँ है? अभी तो यहीं थी...’

मैंने आँख खोलने की कोशिश करी। लेकिन बहुत ही असह्य दर्द हुआ। मृत्यु? अह्ह्ह्हहाँ! मतलब मरा तो नहीं हूँ। जैसे जैसे चेतना लौट रही थी, और मैं जाग रहा था, तो मुझे समझ आने लगा की मैं शायद अचेत था।

अचानक ही मेरा संसार निशब्दता से गुंजायमान की तरफ चल दिया। मुझे सुनाई भी दे रहा था, और सुंघाई भी दे रहा था.. लेकिन, दिखाई क्यों नहीं दे रहा है?

मैंने आँख खोलने की कोशिश करी। इस कोशिश में मेरी हर चीज़ दर्द करने लगी – सर, आँख! मेरी कराह निकल गई।

“इनको होश आ गया..” कोई चिल्लाया।

मेरी आँखें उनको खोलने में मेरा साथ ही नहीं दे रही थीं। जैसे तैसे जब वो खुलीं, तो रोशनी की एक तीखी लकीर प्रविष्ट हो गयी। मैंने तुरंत ही आँखें बंद कर लीं.. यह सोच कर, की अभी तो नहीं खोलूँगा। सोचने की कोशिश करने पर दिमाग में सब गड्ड-मड्ड हो गया.. कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैंने महसूस किया की आँखें बंद होने के बावजूद मुझे मेरे इर्द गिर्द का सारा संसार धुंधला होता महसूस हो रहा था। और मैं एक बार फिर से सस्ते टंगस्टन के बल्ब के समान बेहोश हो गया।

जब मैं जागा तो काफी रौशनी हो रही थी। आँख बंद होने के बावजूद मैं रौशनी महसूस कर सकता था। मैंने काफी प्रयत्न करने के बाद अपनी आँखें खोलीं, और अपने बिना सर हिलाए, सिर्फ आँखें घुमा कर जायजा लिया। मुझे समझ आया की मैं एक कमरे में हूँ... संभवतः.. नहीं संभवतः नहीं.. निश्चित तौर पर एक अस्पताल के कमरे में। कमरे में सूर्य की रौशनी से ही उजाला हो रहा था। जीवित होने, और उसके एहसास से मुझे अच्छा लगा! कुछ क्षण के लिए मुझे अपने शरीर की विभिन्न हिस्सों से उठने वाले दर्द पर से ध्यान हट गया।

फिर अचानक ही सब याद आ गया। मेरे शरीर ने झटके खाए होंगे..

“श्श्शशह्ह्ह”

‘हँ..? कौन?’ मैंने महसूस किया की किसी ने मेरा हाथ थाम रखा है। मैंने उसी तरफ अपना सर घुमाया और कहा,

“हाय!” मेरे इतना कहने मात्र से ही वो बहुत खुश हो गई। कौन है ये? धुंधला सा दिख रहा है.. लेकिन लगता है की जान पहचान की है.. पता नहीं..! थोड़ा अपनी आँखें फोकस करीं तो उस स्त्री का चेहरा दिखा.. स्त्री नहीं.. लड़की। मेरे ज़हन में जो पहली बात आई, वो यह थी की यह लड़की बहुत थकी हुई लग रही थी.. और.. बहुत.. सुन्दर भी! सुन्दर... रश्मि जैसी!

‘रश्मि जैसी?’ ये ख़याल ज़हन में कैसे आया? जो भी हो, ख़याल तो सच था। यह लड़की वाकई सुन्दर थी.. सौम्य सुन्दर! आकर्षक! वो मुस्कुराई,

“ओह! हेल्लो!” मानों मेरी आवाज़ सुन कर उसकी जान में जान आई हो.. “आपको नहीं मालूम आपको ठीक होता देख कर मैं कितनी खुश हूँ! जब मुझे खबर मिली आपके एक्सीडेंट की तो मेरी तो जान ही निकल गयी थी.. सब को तो खो चुकी हूँ.. और आपको भी नहीं खोना चाहती.. भगवान का लाख लाख शुक्र है!”

‘आपको भी? मतलब? मतलब.. ये लड़की मुझे जानती है? लेकिन मुझे क्यों नहीं समझ आ रही है? क्यों नहीं याद आ रही है? मेरा नाम क्या है?’

“मैं... कहाँ हूँ? (इसका उत्तर तो खैर मुझे मालूम है) मेरा.. एक्सीडेंट.. कितना बुरा है? (हाँ.. यह ठीक है..) घर.. कब तक?”

“सब बताऊंगी.. लेकिन पहले डॉक्टर को बुला कर लाती हूँ...” कह कर वो लड़की लगभग भागते हुए कमरे से बाहर चली गयी।

जिस गति से वो लड़की बाहर गई थी, उसी गति से भागते हुए डॉक्टर ने भी कमरे में प्रवेश किया। आते ही उसने मेरी कलाई थाम ली (नब्ज़ लेने के लिए), और मेरे चार्ट का मुआयना किया।

“आपको कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।

‘मुझे कैसा लग रहा है? हा! कैसा लग रहा है!! मेरी पिछली याद मरने की है साहब! मरने की.. सुना? मृत्यु! निर्जीव! शव! यह है मेरी पिछली याद.. और आप पूछ रहे हो की कैसा लग रहा है! मर के वापस लौट आया हूँ.. कितनी शिद्दत से मरने की इच्छा थी.. लेकिन अभी लग रहा है की अच्छा हुआ की वापस लौट आया! लेकिन अभी कुझे डर भी लग रहा था.. एक बार मरना कैंसिल हो जाय, तो जीने की चाह बहुत बढ़ जाती है!’

न जाने कैसे कैसे ख़याल आ रहे थे दिमाग में! मुझे खुद को नियंत्रण में रखना चाहिए.. यह सब कोई सुनना नहीं चाहता! कम से कम इतनी तो कोशिश करनी ही चाहिए की सामान्य प्रश्नों का सामान्य उत्तर तो दिया ही जाय! वैसे लगता तो है की कुछ कुछ याददाश्त चली गयी है.. खैर...!

प्रत्यक्ष में मैंने कहा, “सब दुःख रहा है! सर में दर्द है.. एक्चुअली, पूरे शरीर में ही दर्द है.. लेकिन फिर भी चलने फिरने का मन करता है। लेकिन सब कुछ स्टिफ भी लग रहा है.. ऐसे लग रहा है की सब कुछ टूट जाएगा!”

फिर कुछ रुक कर, “कुछ खाने को है? बहुत भूख लग रही है.. और पानी भी चाहिए.. मैं तो कम से कम एक लीटर पानी पी सकता हूँ अभी!”

मेरी बात पर डॉक्टर हंसने लगा, और वो लड़की (कौन है भई?) राहत की सांस भरती है, “... अब मुझे पक्का यकीन है की आप बिलकुल ठीक हो जायेंगे!” उसकी हंसी में खिलखिलाहट और संतोष का मिला-जुला भाव आ रहा था.. और यह भाव बेहद मनमोहक था।

डॉक्टर ने मुझसे एक दो सवाल पूछे जैसे की मैं किस शहर में हूँ, क्या समय है.. बेहद सामान्य प्रश्न यह जानने के लिए की मेरा दिमाग तो ठीक ठाक चल रहा है.. दिन के सवाल पर मैं उत्तर नहीं दे सका.. उसने पूछा की अंतिम कौन सा दिन याद है.. तो मैंने दुर्घटना वाला दिन बता दिया। उसने संतोषप्रद तरीके से सर हिलाया। फिर काफी देर तक वो मुझे बताता रहा की मैं कितना भाग्यशाली हूँ, और यह कितना अविश्वसनीय है की ऐसी दुर्घटना हो जाने पर, जब मुझे ऐसी भयंकर चोटें आने पर भी मैं बहुत जल्दी रिकवर कर रहा हूँ।

“सच कहता हूँ..” उसने कहा, “आप ऑपरेशन टेबल पर.. यू वोंट बिलीव मी, .. मर गए थे!”

‘क्या सच में! इंटरेस्टिंग!’

उसने कहना जारी रखा, “लेकिन एक मिनट बाद जब आपकी धड़कन वापस चलने लगी तो वो तो मुझे बिलकुल करिश्मा ही लगा! मैंने और मेरे साथियों ने ऐसा कमाल होते कभी नहीं देखा!”

मैं मुस्कुराया।

“नहीं.. आप मजाक मत समझना इसको! यह वाकई अनयूसुअल है! आपके सर पर सबसे ज्यादा चोटें आईं थीं.. हमने उम्मीद छोड़ दी। फिर जब आपके दिल ने धड़कना बंद कर दिया तो हम समझ गए की आब क्या कर सकते हैं.. लेकिन फिर.. करिश्मा नहीं तो और क्या है! लेकिन आपकी पत्नी ने आपका साथ नहीं छोड़ा..”

‘मेरी पत्नी? ... रश्मि! कहाँ हो तुम?’

“.. यहाँ नर्सें कह रही हैं की वो आपको वापस ले आईं.. जैसे सावित्री ले आईं थीं सत्यवान को! हो सकता हो की यह सच भी हो!”

‘सावित्री? रश्मि!!’

“आप भले मेरी बात को मज़ाक मानिए, लेकिन मैंने यह सब कहना अपना फ़र्ज़ समझा.. आगे इनका खूब ख़याल रखिएगा.. यू शुडन्ट भी अलाइव!”

“डॉक्टर.. एक मिनट..” ये लड़की कह रही थी, “मैं इनकी पत्नी नहीं.. साली हूँ....” उसने धीरे से कहा।

‘साली? मेरी साली?’ मेरे दिमाग में घूर्णन शुरू हो गया, ‘मतलब... नी...ल..म?’

“ओह! आई ऍम सॉरी! मुझे लगा की आप इनकी बीवी हैं.. ऐसी चिंता, ऐसी सेवा तो आज कल बीवियां भी नहीं करतीं।”

“इट इस ओके!” सुमन ने धीरे से कहा।

“नीलू?” मैंने कमज़ोर आवाज़ में उसको पुकारा। दिल के सारे ज़ख्म हरे हो गए। मेरी प्यारी बीवी नहीं है.. वो तो कब की मुझे छोड़ कर चल दी है.. आँखों से आंसू ढलक गए।

“जी?” उसने मेरा हाथ पकड़ कर पूछा।

“थैंक यू!”

सुमन मेरे हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम कर अपने आंसुओं से भिगोने लगी।

सुमन का परिप्रेक्ष्य

मेरी आँखों के सामने एक एक कर मेरी माँ, मेरे पिता, और फिर मेरी प्यारी बहन – जिसका दर्जा बहन से भी ऊपर था – और उसकी संतान कष्टप्रद मृत्यु को प्राप्त हो गए। बहुत से ज्ञानियों को अक्सर यह कहते सुना है की यदि किसी के साथ कुछ बुरा होता है तो उसके द्वारा किये गए पापों के कारण होता है। मैंने बहुत बार सोचा की इन लोगों ने किसका और क्या बुरा किया था, जो इनको इस प्रकार की मृत्यु मिली! माँ ने अपनी तरफ से पूजा पाठ, धार्मिक और सामाजिक कार्यों में कभी भी किसी भी प्रकार की कोर कसर नहीं रखी। पिता जी ने भी सदा ही अपनी मेहनत और इमानदारी का ही खाया, न कभी किसी के साथ बुरा किया और न कभी किसी का बुरा सोचा। और तो और, जितना उनका बस चला औरों की मदद ही की। और माँ उनके सभी कामों में बराबर की संगिनी बन कर चलीं। तो उनको इस प्रकार मृत्यु? यह किस तरह ठीक है? और दीदी! उसने तो अभी अपने जीवन में देखा ही क्या था? उसकी तो हंसती खेलती ज़िन्दगी तो बस शुरू ही हुई थी। उसके जैसी दयावान लड़की मैंने कभी नहीं देखी.. लोग क्या, वो तो पंछियों और जानवरों के लिए भी अच्छा और भला सोचती थी। और उस अजन्मे बच्चे का क्या, जो अपनी माँ के साथ ही तड़पता चल बसा?

और सोचती हूँ, तो लगता है की दरअसल यह उन तीनों को सजा नहीं, हम दोनों को सजा थी। मेरे पापों के बदले मेरे हृदय में त्रिशूल भोंक दिया गया और रूद्र के हृदय में एक दो-धारी तलवार! हाँ! यही तर्क उचित है.. हमने ज़रूर कुछ ऐसा किया है जिसके कारण भगवान ने हमसे हमारे सबसे प्रिय लोग छीन लिए। और दंड स्वरुप हम दोनों को उनका चिर-वियोग सहन करना लिख दिया। खैर, इस दुर्घटना को चाहे किसी भी दृष्टि से देखा जाय, सच तो यह है की मेरे हृदय में एक बड़ा सा हिस्सा अब खाली हो गया है, और लगता है की जैसे मेरे सीने पर एक भारी सिल रख दिया गया हो। यह भी सच है की उम्र भर, इन तीनों के वियोग की पीड़ा नहीं जाने वाली!

कभी कभी मन में एक ग्रंथि सी बनती लगती है.. सोचती हूँ की हो न हो, रूद्र यह यह बात तो ज़रूर सोचते होंगे की अगर उनकी रश्मि की जगह अगर मैं होती तो? अगर मैं मर जाती, तो आज उनके पास कम से कम उनका परिवार तो होता। मुझे पक्का यकीन है की जब भी वो मुझे देखते होंगे, तो उनको यह विचार तो ज़रूर आता होगा। उस दिन जिस तरह से वो उस मामूली बात से मुझ पर गुस्सा हुए थे, उससे मुझे सौ प्रतिशत यकीन हो गया है की वो मुझसे नफरत करते हैं। लेकिन उनका दिल अच्छा है, इसलिए मुझे बेघर होने, और दर-दर की ठोंकरें खाने से बचाने के लिए अपने घर में पनाह दी। और पनाह ही क्या, मेरी पढाई, लिखाई, खाने, पीने, रहने और हर खर्चे का इंतज़ाम भी किया। बस, कभी मुझसे खुल कर बात नहीं कर सके।

नई जगह, नया कॉलेज.. इन सबके कारण इस झंझावात को सहने की हिम्मत मिली। सहारा – मेरा मतलब, भावनात्मक सहारे से है – तो कोई था नहीं। तो कभी अनवरत अश्रु-धाराओं, तो कभी प्रिंसिपल महोदय के परामर्श और उत्साहवर्धन, तो कभी बस रूद्र के आभासी सान्निध्य को ही अपना अवलंब (सहारा) बना लिया। पड़ोसी श्रीमति देवरामनी ने भी कोशिश करी, लेकिन उनकी बात ही समझ नहीं आती.. और अब तो पड़ोस भी खाली है!

वैसे भी मुझे पड़ोसियों से किसी प्रकार के सहारे, और मदद की कोई उम्मीद नहीं है। शुरू शुरू में सभी ने (ख़ास तौर पर पड़ोस की महिलाओं ने) हमारे दुःख में मगरमच्छी आंसू बहाए, लेकिन तीन चार महीने के बाद ही मुझे ऐसे देखने लगे जैसे किसी तरह से मैं इस दुर्घटना के लिए उत्तरदाई हूँ! जैसे मैंने रूद्र का घर उजाड़ा हो! जैसे, रश्मि के जाने के बाद उनमे से किसी का चांस था, लेकिन मैं उस चांस का सूपड़ा साफ़ कर रही हूँ रूद्र पर डोरे डाल कर! यह सब सोच सोच कर दिल और गला भर आता है.. लेकिन यह सब बातें किससे कहूँ? सहेलियों को कितनी बातें बताई जा सकती हैं? हम दो जने एक छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानो बस दो अजनबी हों!

धीरे धीरे अपने गम का इलाज मैं स्वयं ही होती गई। बात तो सच है, की अगर मन में दृढ़ता न बढ़े, तो जीवन मुश्किल हो जाए.. इसलिए मैंने इस अनुभव को जीवन की लम्बी पाठशाला का एक और पाठ समझ कर खुद में समाविष्ट कर लिया। समय के साथ धीरे धीरे मेरा दुःख कम होता गया, और मैं भविष्य के लिए आशान्वित होने लगी। उधर रूद्र अभी तक अपनी इस हानि से उबर नहीं सके हैं.. मैंने अक्सर उनको रात में रोते हुए सुना है। लेकिन उनके कमरे में जाने की मेरी हिम्मत नहीं होती..! कैसे इस शानदार, आकर्षक पुरुष कान्तिविहीन हो जाता है, उसका उदाहरण था रूद्र का क्षय! उनका चेहरा दुःख से खुरदुरा हो गया था; बाल पकने लग गए थे; नींद, आराम और मनःशांति की कमी के कारण वो महज एक वर्ष में ही बूढ़े से लगने लग गए थे। वैसे भी रूद्र ने अपने गम से निबटने का रास्ता ढूंढ लिया है। वो काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते हैं। हर व्यक्ति का अपने अपने दुखों से निबटने का अपना अपना तरीका है.. और मुझे नहीं लगता की वो अपनी से बहुत कम उम्र की लड़की से इस विषय में कोई चर्चा करना चाहते हैं। तो अगर, वो ठीक हैं, तो मैं कुछ भी नहीं कहूँगी। मेरे लिए बस इतना ही काफी है!

इसी बीच मुझे एक तरह का आत्म उद्भेद (self discovery) हुआ।

पिछले कुछ महीनों के तनाव, अवसाद और व्यस्त ता के कारण शरीर में बहुत थकावट सी हो गयी थी। उस दिन जब मैं कॉलेज से बाहर निकली तो आसमान में काले घने बादल छाए हुए थे। काफी अँधेरा हो गया था। रूद्र बैंगलोर से बाहर गए हुए थे, और मैं घर में बिलकुल अकेली थी। बारिश का अंदेशा तो था ही.. मंद मंद ठंडी हवा बह रही थी। सप्ताहांत होने के कारण वैसे भी कुछ राहत सी लग रही थी। बिल्डिंग पहुँच कर मैं लिफ्ट के बजाय सीढ़ी चढ़ कर घर पहुंची। रूद्र तो आज आने ही वाले नहीं हैं... दो दिन खुद से! हम्म्म... दीदी होती तो हम दोनों शौपिंग करने जाते। यह सोच कर कुछ दुःख तो हुआ, लेकिन मैंने जल्दी ही उस पर काबू कर लिया।
 
घर पर अकेले मन नहीं हुआ, इसलिए सोचा की अपनी किसी सहेली को बुला लेती हूँ अगले दो दिनों के लिए! कम से कम यह घर मुझे काट खाने को नहीं दौड़ेगा! मैंने इसलिए रूद्र को फ़ोन लगाया, जिससे उनकी अनुमति मिल सके। उन्होंने संछिप्त सा उत्तर दिया की मेरा जैसा मन हो, मैं वैसा कर सकती हूँ.. यह घर मेरा भी है, और मुझे किसी काम के लिए उनकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा की तीन दिन बाद आयेंगे। अच्छी बात है... मैंने अगला फ़ोन अपनी सबसे करीबी सहेली भानुश्री (भानु) को लगाया, और घर आने को कहा। वो वैसे तो चार पांच बार यहाँ आ चुकी थी, लेकिन रहने के लिए कभी नहीं।

भानु अपने परिवार के साथ बैंगलोर में रहती थी। वो लोग कन्नडिगा ब्राह्मण थे, और हमारे घर से कोई पन्द्रह किलोमीटर दूर रहते थे। मैंने उसकी माँ से भी बात करी, तो उन्होंने मुझे ही घर रहने को बुला लिया। लेकिन फिर मेरे ही अनुनय विनय से उन्होंने उसको अनुमति दे दी। उनके परिवार वाले मुझे पसंद करते थे, और रूद्र से भी मिले थे.. इसलिए परेशानी वाली बात नहीं थी। भानु ने मुझसे कहा की वो करीब एक-डेढ़ घंटे में आ जाएगी। अच्छा है.. इतनी देर में मैं नहा लेती हूँ!

मैं घर पर छोटे गुसलखाने का प्रयोग करती हूँ.. लेकिन उस दिन मेरा मन था की मैं मास्टर र बाथरूम में नहाऊँ। वहाँ पर एक बाथटब था, जिसको दुर्घटना के बाद कभी भी प्रयोग में नहीं लाया गया था (घर की कामवाली ने बताया.. पहले काफी गन्दा हो जाता था, लेकिन आज कल साफ़ ही रहता है, और महीने में बस एक-आध बार सफाई से ही काम चल जाता है)। आज मेरा उसी में घुस कर नहाने का मन था। मैंने उसमें पानी भरने के लिए नल खोल दिया, और अपनी पसंद का खुशबूदार साबुन डाल दिया। और अपने कमरे में निर्वस्त्र होने चली गयी।

आज मैं वो करने वाली थी जो मैंने कभी नहीं किया था। ऐसा नहीं है की रूद्र मुझ पर मास्टर बाथरूम प्रयोग करने से नाराज़ होते.. बस, मैंने ही कभी उधर नहाने का नहीं सोचा। दरअसल, मैं घर में उस तरफ जाती ही नहीं – मेरे हिसाब से आप सोचें, तो वो एक तरह का पुण्यस्थान था, जहाँ मेरी दीदी की यादें बसी हुई थीं.. और रूद्र की प्यारी पत्नी की! मैं वहाँ जा कर किसी तरह की सेंधमारी नहीं करना चाहती थी। लेकिन, आज यूँ अकेलेपन के कारण मन हुआ की क्यूँ न वहाँ नहाया जाए.. और यही सोच सोच कर मुझे रोमांच हो रहा था। मैं कुछ गुनगुना रही थी.. मैंने अपनी ब्रा उतारी.. आह्ह! स्तनों के उस बंधन से मुक्त होते ही आनंद आ गया। मैंने अपने शरीर का निरिक्षण किया – ब्रा की कसाव के कारण मेरे स्तनों पर लाल निशान पड़ गए थे। उन निशानों, उन रेखाओं को हाथ से मसलने पर काफी आराम मिला। कितना मज़ा आएगा, अगर मैं दो दिन बिना कपड़ों के रहूँ? इस ख़याल से मेरा रोमांच और बढ़ गया!!

मेरे बचपन में घर पर सेक्स के बारे में किसी तरह की बातें ही नहीं होती थीं। बड़े बुजुर्गों में सम्भोग को लेकर इतनी वर्जनाये थी की इसको सिर्फ संतानोत्पत्ति हेतु एक आवश्यक कार्य ही समझा जाता रहा। मुझे जो भी कुछ मालूम हुआ, वो दीदी और रूद्र के कारण! उनको सेक्स का आनंद उठाते देख कर समझ आया की सेक्स "मजे" के लिए भी किया जाता है, और प्रेम प्रदर्शन के लिए भी.. और अगर कायदे से किया जाय तो सिर्फ शारीरिक ही नहीं, मानसिक और आत्मिक सतह पर जुड़ने के लिए भी। यही सब सोचते हुए मैं मास्टर बाथरूम में लगे लगभग आदमकद दर्पण के सामने आ कर निर्वस्त्र खड़ी हो गई। और जीवन में पहली बार खुद को पूर्ण-नग्न देखा। बीस की उम्र! और वैसा ही तरुण ताज़ा शरीर! मैंने अपने स्तनों को धीरे से दबाया – एकदम पुष्ट! कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन दीदी के स्तनों से भी निखरे और बड़े! अपने सुन्दर नग्न शरीर को आईने में देख कर मैं वाकई खुद ही उत्तेजित सी हो गई।

दीदी की याद आते ही उनके स्तनों का चूषण करना याद आ गया, और साथ ही यह विचार भी की किसी दिन मेरे स्तनों को भी कोई चूसेगा, और उनमें दूध आएगा! प्रकृति की कैसी अद्भुद रचना! सच ही कहते हैं की नारी शरीर एक तिलिस्म होता है। मैंने स्तनों को कुछ देर दबाया, फिर निप्पलों को हल्का सा मसला! प्रतिक्रिया स्वरुप वो तुरंत ही खड़े हो गए। मैं मुस्कुराई। मेरा ध्यान अब अपने सपाट पेट से होते हुए योनि पर चला गया। वहाँ उँगलियों से टटोलने पर गीलापन महसूस हुआ! ह्म्म्म.. योनि वो पहले ही परिपक्व हो चली थी – उत्तेजना के कारण उसके दोनों पटल फूले हुए थे (कहीं पढ़ा था की लड़के इनकी तुलना पाव-रोटी से करते हैं)। आज से पहले भी मन बहुत बार हो चुका है की अपनी योनि में उंगली डाल कर खुद को संतुष्ट कर लिया जाय, लेकिन बालपन में सिखाई गई वर्जनाएँ ऐसे ही नहीं चली जातीं।

टब में समुचित पानी भर गया था। मैं जा कर उस सुगन्धित झाग-वाले पानी में लेट गई, और इस नए अनुभव का आनंद लेने लगी। यहाँ पर भी दीदी और रूद्र साथ में नहाते रहे होंगे.. मेरे दिमाग में उन दोनों की काम-रत तस्वीर खिंच गई। मेरा हाथ पुनः मेरी योनि पर जा पंहुचा। ऐसा कुछ करने का मैंने कभी सोचा ही नहीं.. लेकिन आज सब कुछ नया है! अपनी आँखें बंद कर मैंने अनायास ही अपने भगनासे को सहलाना प्रारंभ कर दिया। पानी के अन्दर ऐसा करना एकदम अनोखा अनुभव साबित हो रहा था... अनोखा, और कामुक और आनंददायक! कामाग्नि से मेरा शरीर दहकने लग गया - ठीक वैसे ही जैसे की 102 डिग्री बुखार आने पर तपने लगता है।

‘यह कैसी तपन!’

कॉलेज में मेरी सहेलियाँ अक्सर हस्तमैथुन की बातें करतीं। ऐसा नहीं है की मुझे काम/यौन सम्बन्धी ज्ञान नहीं था – भरपूर था। रूद्र और दीदी की काम-क्रीड़ा मैंने देखी थी और मुझे अच्छी तरह से मालूम था की लड़की और लड़के के अंगों का प्रयोग किस प्रकार और किस हेतु होता है। कॉलेज में मेरे सिर्फ लड़कियाँ ही नहीं, बल्कि लड़के भी मित्र थे और उनमें से कई मुझसे प्रणय सम्बन्ध बनाना भी चाहते थे.. लेकिन मेरी दृष्टि में वो सारे सिर्फ अनाड़ी ही नहीं, मूढ़ भी थे। लेकिन रूद्र... हाँ, उनकी बात कुछ और ही थी। धीर और शांत स्वभाव के रूद्र, और उसमें निहित तीव्रता! उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व और उनकी गहन आँखें.. जैसे सामने वाले की आत्मा को ही देख रही हों! और हाँ! वो कसरती देह.. जैसे व्याघ्र! कुछ बात तो थी इस आदमी में!

शारीरिक प्रौढ़ता मैंने दीदी की शादी के आस-पास ही प्राप्त कर ली थी। लेकिन उसके साथ साथ मुझे हार्मोनों का प्रभाव भी झेलना पड़ा। सपने आते। और सपनों में लड़के आते.. उनका कोई चेहरा नहीं होता था। बिना चेहरे वाले नर! उन सपनों में वो मुझे छूते, छेड़ते.. और मेरे साथ अजीब अजीब सी हरकतें करते। आँखें खुली होने पर भी सपने आते - मैं खुद को जवान होते देखने की चाह में अक्सर आईने में अपने आप को निहारती रहती, अपने नवांकुर वक्षों को देखकर बड़ा अच्छा लगता। माँ देखती, तो डांटती, और किसी अन्य कार्य में लगा देती। खैर, मुझे सबसे अधिक रोमांचित मेरे योनि क्षेत्र में उग आये रोयेंदार बालों ने किया था। रात के अँधेरे में अक्सर उन्हें छूने का आनन्द लेती, और उनके साथ साथ योनि भी सहलाने में आनन्द का अहसास होता। लेकिन डर लगता की कहीं चोट न लग जाय (घर में ऐसे ही तो सिखाते हैं)। नहाते समय जब अपने स्तनों को सहलाती तो ऐसा महसूस होता की छूने पर वो आकार में बढ़ते जा रहे हैं।

बचपन में मैंने देखा था की एक घोड़ा, घोड़ों के झुण्ड में से एक के पीछे पीछे दौड़ रहा था.. दौड़ रहा था, या उसको दौड़ा रहा था। स्पष्टतः वह एक नर था – क्योंकि दौड़ते हुए उसके लिंग का आकार विकराल से विकरालतर होता जा रहा था। भयावह दृश्य था। आगे वाला घोड़ा (दरअसल घोड़ी) अचानक रुक गया, और नर उसके पीछे से उस पर सवार हो गया। उस समय मुझे इस विषय में कोई समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी ऐसा लगा की यह दृश्य नहीं देखना चाहिए। मैंने चुपके से अपने चारों तरफ देखा की कोई है तो नहीं! उस नर का विकराल लिंग, मादा के भीतर पूरी गहराई तक घुसा हुआ था, और वह शायद चार पांच धक्के लगाने के साथ ही कांपने लगा, और नथुने की राह से घुरघुराते हुए मादा पर से उतर गया। उसके लम्बे लिंग के आगे से, और मादा के पीछे से सफ़ेद रंग का गाढ़ा द्रव ज़मीन पर गिरने लगा।

और फिर वो वाला दिन.. बुग्याल पर! मुझे अच्छे से दीदी की कराह और सिसकियाँ आज भी याद हैं। याद है की कैसे रूद्र उसकी जाँघों को फैलाए उसकी योनि को चूम, चाट और सहला रहे थे। दीदी भी उनका लिंग अपने मुंह में ले कर कैसे देर तक बदला चुका रही थी। और फिर रूद्र ने भी उसी घोड़े के समान दीदी की चढ़ाई करनी शुरू कर दी थी! कितनी समान, लेकिन कितनी अलग थी दोनों की सम्भोग क्रिया! वो घोड़ा तो लगभग तुरंत ही ढेर हो गया था, लेकिन रूद्र तो मानो रुकने का नाम ही नहीं जानते! ओह! दीदी वाकई तृप्त रहती होगी।

'हे भगवान्!' उन्ही यादों से मंत्रमुग्ध होकर मेरे बिना सोचे हुए ही योनि को छेड़ने की मेरी गति बढ़ती जा रही थी। हाथ की उंगलियाँ अनियंत्रित होती जा रही थीं, और मेरे गले से दबी घुटी सिस्कारियां निकल रही थी। यह कहने की आवश्यकता नहीं की मेरा पूरा शरीर उत्तेजना के मारे कांपने लग गया था।

हाँ... कॉलेज में मेरी सहेलियाँ अक्सर हस्तमैथुन की बातें करतीं। यह बातें भी होती की यह क्रिया कितनी लाभदायक है! आनंद तो आता ही है, साथ ही साथ अनवरत यौनेच्छा, जो हम युवाओं में होती रहती है, उससे निजात भी मिल जाती है – बिना किसी पुरुष की आवश्यकता के! मतलब बिलकुल सुरक्षित, और संतोषजनक! शीघ्र ही मेरा कामोन्माद समाप्त हो गया। अनुभव में वह कुछ कुछ वैसा था जब दीदी और रूद्र ने मेरे स्तनों से खिलवाड़ किया था.. लेकिन इसकी तीव्रता कहीं अधिक थी।

"ऐसा आनंद तो पहले कभी नहीं आया", मैंने सोचा और संतोषप्रद गहरी सांस भरी।

अब नहा भी लिया जाय!

भानु मेरी एक बहुत ही करीबी, और प्यारी सहेली है। जाहिर सी बात है की उसकी उम्र भी मेरे ही बराबर थी। वैसे उम्र ही क्या, हम दोनों का डील डौल भी लगभग एक जैसा ही था। लेकिन जहाँ मैं एक पहाड़ी लड़की हूँ, भानु एक दक्षिण भारतीय सुंदरी है। एक बात तो है – दक्षिण भारत की लड़कियों की गढ़न बहुत अच्छी होती है। भानु भी ऐसी ही है... सांवली सलोनी.. सामान्य कद की। लेकिन उसके स्तन 32B साइज़ के हैं, और उस पर खूब फबते हैं। बड़ी बड़ी आँखें और उन्नत नितम्ब! सचमुच, बहुत ही प्यारी लड़की है वो। वो कॉलेज में सबसे पहले मेरी दोस्त बनी, और धीरे धीरे हम दोनों इतने करीब आ गए हैं की हमारी कोई भी बात एक दूसरे से नहीं छुपी है।

एक और बात है, बैंगलोर जैसे शहर में रहने के बावजूद उसका परिवार कुछ रूढ़िवादी किस्म का है। रस्मों, और कर्म-कांडों को निभाने की जैसे सनक सी हैं उनमें! उनके परिवार की सोच यह भी रही है की लड़कियों का ब्याह जल्दी कर देना चाहिए.. लिहाजा, दो साल पहले ही भानु का रिश्ता एक सॉफ्टवेर इंजिनियर (बैंगलोर में और कौन मिलता है?) के साथ तय कर दिया गया है। इसने तो शुरू शुरू में बहुत नखरे किए, बहुत सी मिन्नतें करीं, लेकिन कुछ हो नहीं सका। माता-पिता के सामने बेबस थी। बस, इतनी ही गनीमत थी की उसको कम से कम स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लेने तक की मोहलत दी गई थी। शायद उसकी कुंडली में कुछ गोत्र, मांगलिक वाला चक्कर था, और इस कारण से बस कुछ ही रिश्ते मिल रहे थे। उसके माता-पिता ने सबसे कमाऊ वाले रिश्ते को पकड़ लिया। मजे की बात यह, की उसकी यह बात पूरे कॉलेज में सिर्फ मुझे ही मालूम थी। वैसे उसका मंगेतर अरुण कोई बुरा नहीं था। देखने बोलने में अच्छा था। उन दोनों को अपने अपने परिवार की तरफ से दिन में मिलने की इजाज़त मिली हुई थी। आज भी कॉलेज के बाद वो दोनों किसी कॉफ़ी शॉप पर ही मिल रहे थे।

खैर, नहाने के बाद मैंने हल्का फुल्का कपड़ा पहना (मतलब, सिर्फ पजामा और टी-शर्ट, और अन्दर कुछ भी नहीं) और टीवी देखते हुए भानु के आने का इंतज़ार करने लगी। कुछ ही देर में वो आ गई – उसके हाथ में एक बैग था, जिसमें दो दिनों के लिए ज़रूरी सामान और कपड़े थे। उसके आने के बाद हम दोनों साथ में चाय बनाने लगे, और साथ ही साथ मज़े से बातें भी करने लगे। मैंने उसको पूछा की आज दोनों ने मिल कर क्या किया! उत्तर में वो बस शरमा रही थी। दोनों को अनोखे में ही मिलने का अवसर मिलता था, इसलिए कुछ तो किया होगा न! मेरे खूब जिद करने से उसने बताया की आज अरुण में न जाने कहाँ से इतनी हिम्मत आ गई, की उसने इसे चूम लिया। यह बताते बताते ही उसके सांवले गालों पर लाली आ गयी। मैंने उसे छेड़ते हुए कहा, की बदमाश, इतनी ज़रूरी बात इतनी देर में बता रही है! तो वो शरमा कर हंस दी। (हमारी बात चीत अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ – इन मिली जुली भाषाओँ में हुई.. लेकिन यहाँ सुविधा के लिए सिर्फ हिंदी में ही बता रही हूँ)..

मैं : “हाय! हमारी किस्मत कहाँ, की कोई हमको चूमे!”

भानु : “अरे है न! तुम्हारे जीजू?”

मैं : “ऐसे मत छेड़ यार! मैं तो उनको दिखती ही नहीं.. उनकी नज़र मुझ पर पड़े, ऐसी किस्मत ही नहीं!”

भानु : “तू किस्मत की बात करती है? तू तो आइटम है.. आइटम! और आइटम ही क्या, पूरी पटाखा है! एक बार इशारा कर दे, बस, आशिकों की लाइन लग जायेगी तेरे सामने!”

मैं : “अच्छा जी! तू जैसे कोई कम है..?”

भानु (गहरी सांस भरते हुए): “मेरा क्या! मेरा डब्बा तो पैक हो गया है!”

मैं : “हा हा हा! वाह भई... यह डब्बा खुलने को इतना बेकरार है क्या? कुछ दिन रुक जा.. फुर्सत से खुलेगी! हा हा हा! अबे बता न.. क्या किया था तुम दोनो ने।“

भानु : “अरे बताया तो! सिर्फ़ किस किया था उसने...”

मैं : “हाँ जी! तुमने कहा, और मैंने मान लिया! आप लोग इतने शरीफ हो!”

भानु : “कुछ बातें परदे के अन्दर रखनी चाहिए!”

मैं (चाय पीते हुए): “मुझसे भी?”

भानु : “हाँ.. तुझसे भी..!”

मैं : “ह्म्म्म... ये सुनो! मैं तो तुमको कुछ बताने वाली थी.. लेकिन.. अब...”

भानु : “हैं? क्या बताने वाली थी?”

मैं (उसको छेड़ते हुए): “रहने दे.. कुछ बातें परदे के अन्दर ही रहनी चाहिए!”

भानु : “नीलू.. ऐसे मत छेड़! ठीक है बाबा.. मैं बताऊंगी.. लेकिन पहले तू बता! ओके?”

मैं : “लेकिन पहले तो मैंने पूछा!”

भानु : “तू बहस बहुत करती है.. अब नखरे मत कर, और बता भी दे..”

मैं : “अच्छा.. ठीक है! तो सुन.. मैंने आज अपनी.. इसको (अपनी योनि की तरफ इशारा करते हुए) देर तक सहलाया.. पहली बार...”

भानु : “धत्त तेरे की! खोदा पहाड़, निकली चुहिया! यह बोल न की तूने आज पहली बार मास्चरबेट किया!”

मैं : “हाँ.. वही..”

भानु : “मेरी बुद्धूराम! तूने यह आज किया? अपनी जिंदगी के कितने बरस तूने यूँ ही वेस्ट कर दिए!”

मैं : “मतलब? तूने क्या बहुत पहले ही...?”

भानु : “हाँ जी.. पांच साल पहले..!”

मैं : “पांच साल पहले? बाप रे!”

भानु : “हाँ! और नहीं तो क्या? हम लड़कियाँ तो जल्दी ही जवान हो जाती हैं! लेकिन तू बिना यह सब किए इतना दिन कैसे रही?”

मैं : “पता नहीं..”

भानु : “अपने जीजू को एक इशारा तो देती.. फिर देखती, तू कैसे बचती?”

मैं : “भानु प्लीज! इस बात से मुझे मत छेड़! ठीक है की वो मुझे पसंद हैं.. लेकिन इसका यह मतलब नहीं की वो भी मुझे पसंद करें!” फिर कुछ देर की चुप्पी के बाद, “अरे! मेरी छोड़.. तू बता! क्या क्या किया तुम दोनों ने?”

भानु : “ठीक है बाबा.. सुन! आज मिस्टर मूड में थे! पहले भी उसने मुझे दो तीन बार चूमा था.. लेकिन आज वाला! उसने मेरे दोनों गालों को पकड़ कर चूमा.. नॉट किस.. स्मूच! मेरी जान ही निकल गई जब मैंने उसकी जीभ अपने मुँह में महसूस करी! फिर उसने मेरे बूब्स भी छुए! इतना मना करने पर भी देर तक दबाता मसलता रहा! बड़ी मुश्किल से उससे पीछा छुड़ाया। शॉप में ज्यादातर लोग हमें ही देख रहे थे। मैं तो शर्म के मारे बाहर भाग आई।“

मैं : “बाप रे! तुझे कैसा लगा यार?”

भानु : “कैसा लगा? अरे, मेरी हालत खराब हो गयी! मेरी योनि में चींटियाँ काटने लग गईं। कोई और जगह होती तो आज मेरा केक भी कट जाता!”

मैं : “क्या वैसा लगता है जैसे मास्चरबेट करते समय लगता है?

भानु : “अरे! वो तो कुछ भी नहीं है.. उससे भी पावरफुल! मास्चरबेशन का क्या है? उसमें तो बस अपना ही हाथ है.. लेकिन जब दूसरे का हाथ लगता है न.. पूरा शरीर झनझना जाता है।”

मैं : “बाप रे!”

भानु : “तू जानना चाहती है की कैसा लगता है?”

मैं : “न बाबा! वैसे भी मेरा कोई बॉयफ्रेंड थोड़े ही है!”

भानु : “बॉयफ्रेंड नहीं तो क्या, गर्लफ्रेंड तो है! मैं ही सिखा देती हूँ...”

मैं उसकी बात सुन कर चुप हो गयी।

भानु : “ए नीलू.. तू बुरा तो नहीं मान गयी?”

मैं : “नहीं यार!”

भानु : “तो बोल.. तुझे प्यार करूँ?”

मैं हंस पड़ी।

भानु : “तेरे होने वाले बॉयफ्रेंड से बढ़िया करूंगी!”

मैं : “ऐसी बात है? तो आ जा..”
 
भानु वाकई सीरियस थी। मुझे शुरू शुरू में लगा की वो शायद मजाक कर रही थी। लेकिन जब उसने मेरे पास आकर मेरे होंठों पर अपने होंठ सटाए तो मुझे वाकई एक करंट सा लगा। कुछ देर ऊपर से ही छोटे छोटे चुम्बन लेने के बाद वो उन्हे चूसने लगी। मैंने भी अपनी तरफ से जैसा हो सका, सहयोग किया। कुछ देर चूमने के बाद भानु का मेरे स्तनों पर आ गया और वो उनको टी-शर्ट के ऊपर से ही सहलाने लगी। मैं रोमांचित हो उठी.. दिमाग में पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। सच में, मेरे शरीर में एक अनोखी सी आग आग सुलग गई। भानु मुझे अपनी बाहों में लिए रह रह कर मेरे गाल, होंठ, आंखें, नाक, गर्दन और स्तनों पर चुम्बन देने लगी। एक बारगी कामुक उन्माद में मेरा मुँह खुल गया, तो उसने मौका पाते ही अपने होंठों से वहाँ हमला कर दिया, और अपनी जीभ मेरे मुंह के अन्दर डाल कर मेरी जीभ से खिलवाड़ करने लगी! मैं उचक कर अलग हो गई।

मैं : “ओए! छी! कैसा कैसा तो लगा! गीला गीला!”

भानु : “तुझे अच्छा नहीं लगा?”

मैं : “न रे! कैसा अजीब सा लग रहा था। अब बस कर..।“

भानु : “बस कैसे करूँ मेरी जान? अब तो मुझसे भी रहा नहीं जा रहा है..”

मैं : “हम्म.. तो क्या किया जाय?”

भानु : “तेरा तो नहीं मालूम.. लेकिन मेरा तो अब इन कपड़ों के अन्दर रहना मुश्किल है..”

मैं (हँसते हुए) : “तो बाहर आ जा.. मेरे अलावा कौन है यहाँ तुझे देखने वाला?”

भानु : “अरे ऐसे नहीं! तू उतार! मैं तेरा उतार दूँगी!”

कहते हुए वो फिर से मुझसे लिपट कर मेरे होंठ चूसने लगी और टी-शर्ट के निचले हिस्से को पकड़ कर मेरे शरीर से हटाने लगी। मैं भी उसके कुर्ते के बटन खोल कर उसके कुरते को उतारने लगी। जैसा की मैंने पहले भी बताया है, मैंने टी-शर्ट के नीचे कुछ भी नहीं पहना हुआ था, लिहाजा, उसके उतरते ही मैं अर्धनग्न भानु के सामने सम्मुख हो गयी। भानु का कुर्ता भी उतरा – लेकिन उसने अभी भी ब्रा पहनी हुई थी।

भानु : “अरे भगवान्! नीलू.. तेरी चून्चियां क्या मस्त हैं! कितनी प्यारी प्यारी! देख न! कैसे लाइट मार रही हैं!”

मैं : “हट्ट बेशरम! कैसे बोल रही है!”

भानु : “अरे मैं सच कह रही हूँ..” कहते हुए उसने मेरे हाथ अपने स्तनों पर जमाए, और खुद मेरे दोनों स्तनों को दबाने लगी। मेरी तो जान ही निकल गयी।

मैं : “आऊऊ.. आह्ह नहीं.. धीरे अआह्ह्ह.. धीरे!”

भानु (अनसुना करते हुए) : “नीलू, तू भी उतार इसको और खेलो..”

मैंने जैसे तैसे उसके प्रहार झेलते हुए उसकी ब्रा उतारी। तुरंत ही उसके उन्नत वक्ष मेरे सामने उपस्थित थे। मैं सचमुच में उसके स्तन देखती रह गई। कितने प्यारे स्तन! बिलकुल खिलौनों के समान! बड़े-बड़े, शरीर के बाकी हिस्सों जैसा ही साँवला सलोना रंग, उत्तेजना से ओत-प्रोत लम्बे तने हुए गहरे सांवले चूचक, और उसी से मिलता जुलता गोल घेरा। मुझसे रहा नहीं गया.. और मैंने भी अपने हाथ उन पर जमा दिए।

मैं : “हाय रे मेरी भानु रानी! तेरे संतरे कितने मस्त हैं! ठोस.. मुलायम.. और रसीले... दोनों के दोनों! मैं खा लूँ?”

भानु : “नेकी और पूछ पूछ?”

मैंने उसकी इस बात पर उसको सोफे पर ही लिटा दिया, और खुद भी उसके बराबर लेट गई। एक तरीके का आलिंगन – करवट में मेरा दाहिना स्तन उसके बाएं स्तन से टकरा रहा था। मैंने उसकी पीठ और नितम्ब सहलाते हुए उसके एक निप्पल पर अपनी जीभ फिराई। दीदी की याद पुनः हो आई। मैंने पूरा निप्पल अपने मुंह में भरा, और चूसना शुरू किया। मज़ा आ गया। भानु की सिसकी छूट गयी। लेकिन फिर भी उसने मेरे सर को पकड़ कर अपने स्तन में भींच सा लिया।

भानु : “आह्ह्ह्ह! इस्स्स्स... नील्लू.. आह्ह्ह! धीरे... ऊफ़.. मज़ा आ गया! आह्ह! बहुत अच्छा लग रहा है। कस कर चूसो न... उफ्फ्फ़! आआऊऊ ... काटो मत प्लीज। आराम से मेरी जान। अआह्ह्ह.. अरुण सुनेगा, तो जल मरेगा! ऊऊह्ह्ह.. मजे से चूसो! ओह्ह्ह!”

मैंने कोई चार-पांच मिनट तक उसके दोनों स्तनों को बारी बारी से चूसा। एक पल मुझे लगा की भानु का शरीर थरथरा रहा है.. मुझे समझ में आ गया की उसने अपना कामोत्कर्ष प्राप्त कर लिया है, इसलिए जब तक वो शांत न हो जाए, तब तक मैं चूसती रही। निवृत्त होने के बाद भानु भी अब मेरे स्तन दबाने और चूसने लगी।

मैं : “भानु, तेरा मन नहीं हुआ की और कुछ भी किया जाय..?”

भानु : “मन क्यों नहीं हुआ! मैंने बताया न.. बड़ी मुश्किल से भागी वहाँ से.. कोई और जगह होती, तो आज तो अरुण ने मेरा काम तमाम कर दिया होता! खैर, मेरी छोड़.. तू बता, तेरा दिल भी तो तेरे जीजू से लगा हुआ है.. तेरा दिल नहीं चाहता?”

मैं : “दिल तो बहुत चाहता है! मैंने उनका और दीदी का खेल देखा है.. और मुझे मालूम है सब कुछ। लेकिन डर लगता है।“

भानु : “डर? किस बात का?”

मैं : “इस बात का की कहीं मैं उनको चोट न पहुंचा दूं! वो अभी तक दीदी के जाने का गम नहीं मिटा पाए हैं.. कहीं उनको ऐसा न लगे की मैं दीदी की याद मिटाना चाहती हूँ.. उनकी जगह लेना चाहती हूँ..”

भानु : “लेकिन ऐसा तो नहीं है न! तू तो उनसे प्यार करती है!”

मैं : “हाँ! प्यार तो मैं बहुत करती हूँ.. जब से उनको देखा है तब से! बस, प्यार के रूप बदलते गए!”

भानु : “तुम्हारी जैसी लड़की भी तो बड़े नसीब से मिलती है। ये एहसास करा दो अपने जीजू को! प्यार करती हो, तो बता भी दो! क्या बिगड़ेगा भला!”

फिर कुछ देर बाद अचानक ही बोलती है, “एक काम कर.. एक रात को चांस ले। तू पूरी नंगी हो कर उनके रूम में चली जा.. खुद बा खुद लाइन पर आ जायेंगे वो.. जब खुद विश्वामित्र मेनका के सामने मेमना बन गए, तो वो क्या चीज़ हैं?”

मैं : “बस कर.. अपने आइडियाज अपने पास ही रख.. अब तेरा हो गया हो तो छोड़ मेरे दुद्धू..”

भानु : “छोड़ने का मन ही नहीं करता। नीलू मेरी जान.. सच सच बताना, कहाँ छुपा रखी थी यह प्यारी प्यारी चून्चियां?”

उसकी इतनी बेशर्मी भरी बात सुन कर मैं पुनः शरमा गयी।

वो फिर मेरे स्तन जोर जोर से चूसने लगी और उसके कारण उठने वाले आनंद के उन्माद में मैं पागल होने लगी। इसी बीच उसने मेरा पजामा भी नीचे सरकाना शुरू कर दिया। मैं चौंक गई, “अआह्ह्ह.. ओए.. ये क्या कर रही है?”

“नीलू.. तेरे यार से पहले मैं देख लूंगी, तो क्या हो जाएगा?”

अब वो पूरी तरह निर्लज्ज हो कर मुझे निर्वस्त्र करने पर उतारू हो गई थी। हलके फुल्के कपड़े उतारने में कितनी ही देर लगती है.. कुछ ही क्षणों में मैं पूर्ण नग्न उसके सामने थी। शर्म के कारण मैंने अपनी दोनों टांगें और पैर एकदम सटा लिए, जिससे भानु मेरी योनि ठीक से न देख सके। कैसी मूर्खता.. निर्वस्त्र हो जाने पर भी क्या छुपना है भला! भानु न जाने कहाँ कहाँ से सीख कर आई है (और कहाँ से सीखी होगी?) लेकिन वो अपनी उँगलियों से मेरी योनि पर मालिश जैसी करने लगी, और साथ ही मेरे स्तन भी पी रही थी। ऐसे में भला कितनी देर रहा जाए? मैं वैसे ही उत्तेजित थी, अब अतिउत्तेजित हो गयी और बिना सोचे मैंने अपने दोनों पैर खोल दिए। भानु अब मेरी योनि एकदम साफ़ साफ़ देख सकती थी।

भानु मेरी योनि की दरार पर अपनी उंगली फिराते हुए बोली, “सच नीलू.. जिसे तू ये खज़ाना देगी न, वो धन्य हो जाएगा! कैसी पतली पतली फांकें हैं.. और गोरी भी! बस... ये बाल साफ़ करवा ले.. एकदम मस्त लगेगी!”

वो हल्के हलके हाथों से मेरी योनि को सहलाते हुए, मेरे उसके भगांकुर को रगड़ने लगी, मैं न चाहते हुए भी जोर जोर से आहें भरने लगी! उन्माद की बेचैनी के मारे मैं अपना सिर इधर-उधर करने लगी। लगा की साँसे रुक रुक कर चल रही हैं.. वाकई, कोई और छूता है, तो बहुत ही अलग एहसास होता है। भानु न जाने कब तक मेरी योनि को इस प्रकार रगडती रही, फिर अचानक ही उसने मेरे छिद्र में अपनी उंगली डाल कर अन्दर बाहर करने लगी। इस प्रहार को मैं नहीं सह पाई, और देखते ही देखते वह दबी घुटी आहें भरते हुए स्खलित हो गई। उसी उन्माद में मैं उठ कर जोर से भानु से लिपट गई। जब वासना का ज्वार थमा, तो मैंने देखा की सोफे के गद्दी पर मेरी योनि के नीचे की जगह गीली हो गई थी। न जाने क्यों मेरी आँखों में आँसू आ गए। भानु बिना कुछ कहे मुझसे लिपटी रही।

जब हम दोनों सहेलियां संयत हो कर एक दूसरे से अलग हुईं, तो भानु ने कहा, “नीलू रानी.. चल, तेरी चूत से बाल निकलवाते हैं.. ऐसा चिकना व्यंजन देख कर तेरे जीजू की भूख बढ़ जायेगी!”

मैंने काफी देर न नुकुर की, और नाराज़ होने का नाटक किया, लेकिन कौन लड़की सुन्दर नहीं दिखना चाहती? और कौन लड़की अपने प्रियतम को रिझाना नहीं चाहती? हम दोनों ने अपनी साफ़ सफाई करी, कपड़े पहने और बाहर चल दिए।

भानु मुझे एक वैक्सिंग सैलून लेकर गयी। मैं कभी कभार ब्यूटी पार्लर जाती हूँ, और शरीर की वैक्सिंग भी करवाती हूँ। वैक्सिंग करने में दर्द अधिक हो सकता है, बनिस्बत शेविंग जैसे उपायों के! लेकिन अनगिनत स्त्रियाँ आज कल वैक्सिंग ज्यादा करवाती हैं, क्योंकि उसके परिणाम कई कई सप्ताह तक रह सकते हैं। खास तौर पर गर्मी के मौसम में, जब शेविंग करने के एक-दो दिनों के अन्दर ही छोटे-छोटे बाल आना शुरू हो जाते हैं। वो अटपटा भी लगता है, और मेहनत भी बेकार जाती है। ऐसे में वैक्सिंग लंबे समय तक अनचाहे बालों से निजात दिलाता है। तो कहने का मतलब, मुझे भी अच्छा खासा अनुभव हो गया था अब तक! लेकिन आज कुछ अनोखा होना था। जब योनि और गुदा जैसे अति-संवेदनशील हिस्सों के बाल वैक्सिंग के द्वारा निकलवाए जाते हैं, तो इसको बिकिनी अथवा ब्राज़ीलियन वैक्सिंग करवाना कहते हैं। यह सैलून थोड़ा अप-मार्केट था.. बहुत ही साफ सुथरा और शांत! मुझे यहाँ आने से पहले डर लग रहा था की योनि पर से बाल नोचे जाने पर तो बहुत दर्द होगा, लेकिन यहाँ आ कर उम्मीद बंधी की सब ठीक हो जाएगा। भानु ने बताया की वो अक्सर बिकिनी वैक्सिंग करवाती है, और इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं है। मुझे इंतज़ार नहीं करना पड़ा – वैक्सर मुझे एक रोशनी-युक्त छोटे कमरे में ले गई – इसमें कोई खिड़की नहीं थी, और मधुर संगीत भी बज रहा था। उसने मुझे एक टेबल पर लेटने को कहा – वो टेबल भी काफी साफ़ थी, और उस पर एक कागज़ की परत चढ़ी हुई थी.. जैसे कोई अस्पताल हो।

“आप अपनी पैन्ट्स उतार कर इधर लेट जाइए.. सर उधर रख कर..” उसने कहा।

“... और अंडरवियर?”

“आप बिकिनी वैक्सिंग करवाने आई हैं न?”

“हाँ.. पहली बार! इसलिए डर लग रहा है..”

“ओके! डरने जैसी कोई बात नहीं है.. और हाँ, अंडरवियर भी..”

मैंने अनिश्चित होकर अपनी चड्ढी उतार दी, और डरते हुए उस टेबल पर लेट गयी। वैक्सर मुझे बहलाने के लिए मुझसे बात करने लगी (आप यहाँ की लगती नहीं.. कहाँ से हैं? क्या कर रही हैं? कहाँ रहती हैं.. इत्यादि)।

खैर, बिकिनी वैक्सिंग के लिए वैक्सर को अपने गुप्तांगों में ज्यादा से ज्यादा पैठ देने के लिए अपनी जांघ को ऊपर की तरफ मोड़ कर और फैला कर रखना होता है... ठीक वैसे ही जैसे सम्भोग के समय लड़की लेटती है.. या लगभग वैसा ही! अब ऐसी दशा में कोई कैसे आराम से लेट सकता है? खुली हुई, पूर्णतः प्रदर्शित योनि, खूब सारी रौशनी, और एक अजनबी... न जाने भानु कैसे कह रही है की इतना खराब नहीं होता! झूठ कह रही है! मुझे तो लग रहा है की यह सब बहुत देर तक चलने वाला है.. अपने पैर हवा में उठाना, और अपने शरीर के उस भाग में किसी अजनबी की उंगलियाँ महसूस करना जहाँ अपने कभी सोचा भी ना हो, की कोई छुएगा...

खैर! अब तो भगवान् ही बचाए!

यहाँ इस्तेमाल होने वाला वैक्स कुछ अलग था। यह जल्दी सूख जाता है.. मेरा मतलब बहुत जल्दी। वैक्सर इसको लगाती हैं, और लगभग तुरंत ही यह सूख जाता है। यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन जान निकलती है जब वो इसको एक झटके के साथ शरीर से अलग करती है। गनीमत यह थी की वो वैक्स की हुई जगह पर अपने हथेली से थोड़ा दबाव डालती है.. इससे चुभन और दर्द कुछ कम हो जाता है। यदि वो ऐसे न करती तो शायद मैं बेहोश ही हो जाती! कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

अब मुझे यह तो नहीं पता की ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली सारी महिलाएं बातूनी होती हैं या वो मुझको कुछ ख़ास ही स्वान्त्वाना दे रही थी, लेकिन अगले एक घंटे तक, जब मैं सिर्फ चीख, चिल्ला और दर्द बर्दाश्त कर रही थी, वो वैक्सर लगातार अपनी ही बातें करने में लगी हुई थी।

“आप पहली बार करवा रही हैं न, इसलिए दर्द तो ज़रूर होगा।“

‘कमीनी.. अभी तो कह रही थी की डरने वाली कोई बात नहीं है..!’

“बाल कुछ छोटे काट कर आती तो कम दर्द होता..”

‘माफ़ कर दो मालकिन..’

“आपको पता है.. अभी कल ही हमारे यहाँ एक दुल्हन आई थी यह वैक्सिंग कराने। कह रही थी की उसके होने वाले पति को सब चिकना चिकना चाहिए था.. हे हे हे!”

“आअह्ह्ह्ह... ह्म्म्म..”

“आपकी भी शादी होने वाली है क्या?”

“इह.. आह.. नहीं.. ऐसे ही..”

“ओह!”

न जाने क्या समझी वो! वैसे ज्यादातर लड़कियाँ तो इसीलिए बिकिनी वैक्सिंग करवाती हैं जब उनको यौन क्रिया करनी होती है.. बिलकुल वह भी यही समझी होगी। वैसे, मन में मेरे भी तो यही था!

“आप तो उससे ज्यादा हिम्मती हैं... उसकी तो चीख चिल्लाहट के साथ साथ कुछ पेशाब भी निकल गयी...”

‘भानु की बच्ची! ठहर.. तेरी खैर नहीं!’

उसने जांघों के ऊपरी हिस्से से शुरू होते हुए योनि तक ऐसे ही वैक्स किया। दर्द भी इसी प्रकार से बढ़ता रहा। योनि तक आते आते दर्द असहनीय हो गया! देखने में तो यहाँ के बाल तो पूरी तरह से बेकार लगते हैं। लेकिन जो दर्द मुझे महसूस हुआ, उससे तो यही लगता है की जघन क्षेत्र के बाल निकालने नहीं चाहिए! उनका कोई तो उपयोग होगा.. पता नहीं! खैर! अच्छी बात यह थी की यह महिला लगातार मुझसे बात कर रही थी.. इससे मेरा ध्यान अपने दर्द से काफी हट सा गया था।

लेकिन इतना होने के बावजूद, परेशानी तो होती ही है। वातानुकूलन चल रहा था, लेकिन फिर भी मुझे पसीने छूट रहे थे। ऐसे की जैसे अभी दौड़ कर आई हूँ! हाथ, चेहरा, छातियाँ.. सब जगह पसीना! और फिर यह नोचना खसोटना बहुत ही अन्तरंग स्थान पर होने लगा – योनिमुख के बेहद समीप! एक बारगी मन में आया की यह कमीनी अपनी एक उंगली भी अन्दर घुसेड़ देती.. कम से कम ध्यान हट जाता। वो तो जल्दी ही कर रही होगी, लेकिन मुझे लग रहा था की न जाने कितनी देर से यह नोच खसोट चल रही है।

अंततः योनि के ठीक बीच पर वैक्स लगा, और इससे पहले की मैं खुद को तैयार कर पाती, उसने उसे तेजी से उखाड़ दिया। दर्द के अतिरेक से मेरी आँखों में आंसू भर गए। मन हुआ की फूट फूट कर रो दूं। लेकिन जैसे तैसे खुद को ज़ब्त किया।

“वैरी गुड हनी! यू आर सो ब्रेव!! अब पीछे भी कर लें?”

भानु ने कहा था की पीछे वैक्सिंग करने में दर्द नहीं होता। एक तरह से सच ही था – जब पहले ही किसी लड़की की योनि और भगनासे को नोच लिया गया हो, उसको और क्या दर्द महसूस होगा? दर्द क्या.. पहले की तकलीफ़ के आगे यह तो जैसे बगीचे की सैर जैसा लगा! खैर, जैसे तैसे मेरी वैक्सिंग ख़तम हो ही गयी। उस वैक्सर ने वैक्सिंग ख़तम होते ही किसी तरह का लोशन लगा दिया और अपने दराज से एक दर्द निवारक गोली भी दी।

फिर वो मुझे एक आदमकद आईने के पास ले गयी और मुस्कुराते हुए बोली, “देख लीजिये... अपनी चूत को ध्यान से...”

मैंने देखा और अपनी योनि को ऐसे नंगा देख कर खुद ही शर्म से पानी पानी हो गई... मुय्झे समझ नहीं आया की क्या करूँ, बस उस वैक्सर के गले लग गई, और उसको दोनों गालो पर चूम कर बोली, “यू आर ग्रेट... यू हैव डन अ वंडरफुल जॉब...!”

कुछ देर वहाँ बैठने के बाद मैं भानु के साथ बेढंगी चाल चलती हुई घर तक पहुंची। घर तक आते आते दर्द काफी कम हो गया, और मैं ठीक महसूस करने लगी। बाहर किसी होटल जाने के बजाय घर पर ही खाना मंगाने का निश्चय किया था, यह सोच कर की ऐसे बेढंग चाल चलता हुआ देख कर न जाने लोग क्या सोचेंगे! खैर, इतने दर्द झेलने के बावजूद मुझे साफ़ और चिकना होने का एहसास बहुत अच्छा लग रहा था। मुझे बहुत ख़ुशी मिल रही थी, और एक तरह से वो मेरा प्रतिष्ठा वाला पल भी था।
 
घर पर आने के बाद भानु ने बड़ी बेशर्मी से मुझे एक बार फिर से नंगा कर दिया और मेरी योनि को ध्यान से देखते हुए बोली, “सच में नीलू, तू कितनी सुन्दर है! और.. तेरे जैसी सुंदर और मस्त चूत शायद ही किसी लड़की की हो! तेरा प्रेमी या पति, जो भी होगा.. वो बहुत भाग्यवान होगा! जो तेरी जैसी सुन्दर लड़की, इतनी सुन्दर चूत भोगेगा!”

और कहते हुए उसने मेरी योनि पर बहुत ज़ोर का चुम्बन लिया।

“सच में.. बेहोश हो जाएगा वो!” कह कर उसने प्यार से मेरी चिकनी सी योनि पर उंगली फिराई।

मैं तो शर्म से पानी पानी हो गई। मैं मन ही मन सोच रही थी, ‘क्या वो भी मेरी चूत को ऐसे ही चूमेंगे... ऐसे ही प्यार करेंगे...?”

भानु ने मुझसे कहा भी, “जानेमन, अब तो तुम चुद ही जाओ!”

मैंने भी मस्ती करी, “भानु यार.. मैं तो कब से तैयार हूँ.. लेकिन मेरे बुद्धू सजन को कैसे समझाऊँ?”

“मैं तुझे रास्ता बताऊंगी.. लेकिन मुझे भी कुछ मिलना चाहिए.. है न?”

“क्या चाहिए तुझे?” मैंने ना-समझी में पूछा।

“तेरी चूत!” और हम दोनों खिलखिला कर हंस दीं।

डिनर के बाद हम दोनों मेरे कमरे में चली गईं। भानु ने इस पूरे समय सिर्फ टी-शर्ट और चड्ढी पहनी हुई थी, तो मेरी भी हिचकिचाहट चली गयी। मैंने भी उसी प्रकार के वस्त्रों में उसके साथ बिस्तर में घुस गई और हम दोनों बातें करने लगी। बातों बातों में वंशिका मुझसे लड़कों के साथ सम्भोग की बातें करने लगी। हम दोनों कॉलेज के लड़कों, उसके मंगेतर और रूद्र के बारे में बातें करते रहे। मैंने उसे रूद्र के लिए अपने दिल की चाहत के बारे में उसको पहले से ही बता रखा था, और भानु भी मुझे बताने लगी की कैसे एक बार अरुण ने उसके साथ सम्भोग किया था। यह मेरे लिए एक नई खबर थी। मैंने उससे सारे वृत्तान्त को बताने को बोला, तो वो रस ले लेकर मुझे सब बताने लगी। इतना तो समझ आया की दोनों ने एक झट-पट क्विकी करी है, लेकिन उसके बताने का तरीका इतना मजेदार था, की मुझे अपनी योनि के आस पास फिर एक जाना-माना पिघला सा एकसास होने लगा।

वो कमीनी यह सब बोलते हुए मुझे लगातार छेड़ती भी जा रही थी, और मेरी जाँघ सहला रही थी। मैं जल्दी ही उत्तेजित होने लगी और उसके बताने जैसे ही सम्भोग के बारे में सोचने लगी। मेरी साँसें भारी होने लगीं और मेरी योनि भी गीली होने लगी। और यह सिर्फ मेरी ही हालत नहीं थी। यह सब कहते करते भानु भी गहरी साँसें ले रही थी, और उसकी छातियाँ साँस लेने के साथ साथ ऊपर नीचे हो रही थीं। मेरे मन में आया की उनको दबा दूँ, और मैंने ऐसा ही किया।

“अआह्ह्ह... मार डालेगी क्या? अरे आराम से दबा.. तेरी सहेली के ही हैं..”

“ओके!” मैंने कहा, और उसके दोनों गालों को बारी बारी से चूम लिया। और जैसी मुझे उम्मीद थी, भानु भी मेरा सर पकड़ कर अपने और पास लाने की कोशिश करने लगी, और मुझे होंठों पर चूमने लगी। भानु ने पिछली बार भी पहल करी थी, तो इस बार वो कैसे पीछे रह जाती? वो कुछ ही देर में मेरे होठों को चूसने लगी। जाहिर सी बात थी, भानु भी उत्तेजित थी।

“ओह मेरी रानी! तू बहुत सैक्सी है! मैं आदमी होती तो तुझे यही पटक कर चोद डालती! हाय!”

मैं क्या बोलती? बस उसके चुम्बन में साथ देती रही। कुछ देर बाद उसने अपनी बाहें मेरी कांख के नीचे डाल कर मुझे अपने ऊपर की तरफ आने को कहा। मैं इशारा समझ कर उसके ऊपर आ गई और अपनी योनि को उसकी योनि पर दबाने रगड़ने लगी। भानु मेरे होठों को हल्के हल्के काटती हुई, अपने होंठों में दबा कर चूस रही थी।

मैंने कहा, “हाय भानु! तू ही आज आदमी बन जा.. अब तो रहा नहीं जा रहा है...”

भानु मुस्कुराई। उसने कुछ जगह सी बना कर पहले मेरी, और फिर अपनी टी-शर्ट उतार दी। उसके सांवले सलोने और प्यारे खिलौने मेरे सामने थे। मैं उनके रूप का स्वाद ले रही थी, और उसी बीच उसने मेरे नितम्बों पर हाथ फेरते हुए मेरी चड्ढी भी नीचे कर दी। मैंने स्वयं ही उनको उतार दिया और भानु के होठों को चूसने लगी।

भानु मुझको पलट कर नीचे लिटा कर मेरे ऊपर चढ़ गयी, और अपनी चड्ढी उतार कर अपनी योनि से मेरी योनि को रगड़ने लगी। बीच में मैंने एक बार उसके एक निप्पल को अपनी उँगलियों के बीच मसल दिया। वो जोर से चिंहुकी तो मैं हंसने लगी।

“भानु, तुझे ऐसे मज़ा आता है?”

उसने हाँ में सिर हिलाया तो मैं पुनः उनको मसलने कुचलने लग गयी।

“मेरी बन्नो! तेरी चूत तो बहुत गरम हो गई है! देख न! और मेरी भी देख! कैसे उससे पानी निकल रहा है! बोल.. चुदने का मन हो रहा है न?”

कहते हुए भानु मेरे ऊपर झुक कर मुझे पुनः चूमने लगी। हम दोनों लड़कियाँ साथ ही साथ अपने दोंनों हाथों से एक दूसरे के स्तनों का मर्दन कर रही थीं। मेरी योनि वाकई बहुत गीली हो गयी थी, और मुझे वाकई एक तगड़े सम्भोग का मन होने लगा था। मैंने भानु के स्तनों को पकड़ कर अपने मुंह की तरफ खींचा और उसके चूचक चूसने लगी।

“भानु, तेरे बूब्स कितने बढ़िया हैं! इनको दबाने और चूसने में कितना मज़ा आता है!”

“मेरी रानी! तुझे इतना मज़ा आता है, तो सोच, लड़कों को कितना आता होगा?”

“अरुण के रहते तुझे और लड़के चाहिए क्या?”

“ही ही ही.. जानती है, वो एक दिन कह रहा था की वो मेरे बूब्स के बीच अपना लंड रगड़ना चाहता है!”

“क्या? होओओओओ!”

“हाँ.. मिस्टर मेरी चूत ही नहीं, मेरे बूब्स भी चोदना चाहते हैं!”

मैं उत्तेजना में आ कर उसके स्तन खुद जोर से दबा दिए।

“आह्ह्ह्ह नीलू! मसल दे! हाय! चूस, और जोर से चूस! काट ले इनको!”

उसके उत्साहवर्धन पर मैं उसके स्तनों को और जोर से दबाना, चूसना और काटना शुरू कर दिया। उधर, वो अपने हाथों से मेरे नितम्बों को मसलने लगी। मैंने इशारा पा कर अपनी एक उंगली उसकी योनि पर रखी, और उसको सहलाने लगी। वाकई, उसकी योनि भी बहुत गीली थी। मैं ज़रा सी हरकत से अपनी उंगली उसकी योनि में डाल दी। भानु सिसक उठी। वो भी मेरे ऊपर से उतर कर मेरे बगल लेट गई और उसने भी मेरी योनि में अपनी एक उंगली डाल दी।

मैं थोड़ा उत्सुक थी। सुना था की सम्भोग करने से लड़की की योनि का आकार बढ़ जाता है (दरअसल ऐसा होता तो है, लेकिन योनि बहुत लचीली और इलास्टिक होती है.. इसलिए उसके आकार में आया परिवर्तन जल्दी ही वापस हो जाता है। यदि लड़की कुछ दिन सम्भोग न करे, तो उसकी योनि का आकार पहले जैसा हो जाता है।)। तो, अगर भानु ने सम्भोग किया है, तो ज़रूर उसकी योनि का आकार बढ़ गया होगा। मैंने चुपके से अपनी दूसरी उंगली भी भानु की योनि में प्रविष्ट करा दी। यह उंगली आसानी से अन्दर नहीं गयी। लेकिन भानु ने हिल डुल कर, जैसे तैसे उसकी अपने अन्दर डालने में मेरी मदद करी। जैसे ही उंगलियाँ उसकी योनि में गईं, मैंने उनको उसकी योनि के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। उधर भानु ने अपनी उंगली मेरी योनि से निकाल कर मेरे होंठों को जोर जोर से चूसना शुरू कर दिया। मैंने अपनी उँगलियों को उसकी योनि के अंदर-बाहर करने की गति और तेज़ कर दी। जैसे जैसे मेरे हाथ की गति बढ़ती, भानु की सिसकारियों की आवाज़ भी उतनी जोर से आती। कुछ ही देर में उसने अपना चरम सुख प्राप्त कर लिया और वो अपना सिर इधर उधर हिलाते डुलाते हुए आहआह की आवाजें निकालने लगी।

मैं रुक गयी। भानु को ऐसे सुख के आसमान में गोते लगाते देखना बहुत सुखद था। कुछ देर बाद उसने अपनी आँखें खोली, और मुझे चूमते हुए बोली, “हाय रानी! तुमने बहुत मज़ा दिलाया! अब देख, मैं तुझे कैसे मज़ा दिलाती हूँ!”

और वो अपनी साँसें संयत कर के मुझे फिर से चूमने चाटने लगी। और धीरे धीरे मेरे चेहरे से मेरे शरीर के नीचे की ओर जाने लगी।

“तेरी चूत के लिए एक लंड चाहिए, रानी!” उसने फरमाया!

“ह्म्म्म?” मैंने मस्ती में कहा।

“खीरा है क्या?”

“हं?”

“तू लेटी रह.. मैं आती हूँ!”

मैं पीठ के बल लेटी हुई अपनी साँसे संयत करने लगी। कुछ ही देर में भानु वापस आई.. उसके हाथ में एक खीरा था।

“हैं? इसका क्या करेगी?”

“अरे रानी, तेरी चूत का इलाज है इसमें! आज इसी लंड से काम चला ले?”

कहते हुए वो बिस्तर पर मेरे पास आई, और उसने खीरे को मेरी योनि पर फिराया। फ्रिज़ में रखा होने के कारण खीरा बहुत ठंडा हो गया था। मैं चिहुंक गयी। और उसी के साथ मेरे होश भी ठिकाने आ गए।

“नहीं.. भानु.. प्लीज! ये मत घुसाना!”

“क्यों डा?”

“नहीं यार! प्लीज! मैं ‘उनके’ अलावा और कुछ अपने अन्दर नहीं लेना चाहती..”

“ओओह्ह्ह्ह! तो आग इतनी भड़की है! मेरी रानी अपने जीजू को अपनी कुंवारी चूत का उपहार देना चाहती है! हाय! ऐसी किस्मत सभी आशिको की हो! कसम से.. हा हा हा!”

भानु की नंगेपन से भरी इतनी बेशर्म बात सुन कर मैं शर्म से पानी पानी हो गयी।

“चुप कर..”

“ही ही ही.. आज खीरे से चुद जा.. कल अपने जीजू का डलवा लेना!”

“भानु की बच्ची.. तू मरने वाली है अब..!”

“अरे! अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैंने अपनी उंगली डाली थी?”

“ये खीरा इसकी शकल बिगाड़ देगा! उंगली तो पतली सी होती है..”

“अरे मेरी मेनका! अपने विश्वामित्र को भी तो पटा पहले.. नहीं तो तेरी चूत सूखी रह जायेगी!”

“सच में भानु! किस्मत ही खराब है मेरी!”

“किस्मत नहीं.. तू गधी है.. पूरी गधी!”

“तो मैं क्या करूँ?”

“स्त्री को करना ही क्या है? भगवान् ने स्त्री को ऐसा ही बनाया है की उसको कुछ न करना पड़े! जो करना है बस मर्द को ही..” कहते हुए उसने आँख मारी!

“लेकिन वो तो मेरी तरफ देखते ही नहीं..”

“जानेमन..” भानु ने मेरे एक नितम्ब को अपने हाथ से दबाते, और मेरे एक निप्पल को चूसते हुए कहा, “.. या तो तेरा जीजू अँधा है.. या फिर नामर्द!”

“क्या कह रही है?” मुझे उनकी बुराई बिलकुल अच्छी नहीं लगी। और ऊपर से यह भी की उसने इसी समय मेरे चूचक काटने शुरू कर दिए।

“हट तू.. छोड़ इसको!” कहत एहुए मैंने झिड़की लगाई।

“गुस्सा मत हो यार! मैंने बस तुझे छेड़ा! लेकिन तू ही बता.. तुझ जैसी लड़की एक ही छत के नीचे है.. उनको उसकी चाहत, उसका प्यार नहीं दिखता? क्यों?”

वो मेरे पेट को चाटती हुई मेरी योनि तक पहुँच गई और मेरी जांघों को चाटने लगी। मैं स्वप्रेरणा से अपने नितम्ब को आगे पीछे करते हुए अपनी योनि को उसके मुँह पर फिराने लगी। अंततः भानु ने अपनी दो उँगलियाँ मेरी योनि में डाल दीं और उन्हें अंदर-बाहर करने लगी। साथ ही साथ वो मेरे भगनासे को अपनी जीभ से धीरे धीरे चाटने लगी।

“अब कैसा लग रहा है?”

“बहुत अच्छा! और... स्स्स्सस..... आअह्ह्ह्ह.... चाटो और चाटो!”

भानु ने बिलकुल वैसे ही किया।

“आह! भानु..” मैं आनंद से मरी जा रही थी, “तू यह क्या जादू कर रही है?” मैं जैसे तैसे अपनी सांस सम्हालने की कोशिश कर रही थी।

“भानु... हाय... कैसा कैसा तो हो रहा है!” मैंने कहा।

“मजे ले मेरी जान! बस मजे ले...” भानु ने कहा।

मेरी आँखें उन्माद के मद में बंद हो गयी थीं और मैं अपने नितम्ब जोर से चला रही थी। मन में बस यही हो रहा था की रूद्र इसी समय आ जाएँ, और मुझे प्यार करें!

“अआह्हह.. ओह्ह्ह!” मैंने अपना मुँह तकिये में दबा लिया। भानु किसी अनुभवी खिलाड़ी की तरह तेजी से मुझे अपनी उँगलियों से चोदती रही और मैं जल्दी ही रति-निष्पत्ति को प्राप्त हो गयी। मेरी योनि से निकल कर रस की बौछार भानु के हाथ, और साथ ही साथ बिस्तर को भिगोने लगी। जैसे ही भानु ने अपनी उंगलियाँ बाहर निकाली, मैं बिस्तर पर गिर गई और जोर जोर से हांफने लगी।

भानु ने मुझे चूमते हुए कहा, “नीलू मेरी जान, मेरे दिमाग में एक आईडिया है... तेरे जीजू को पटाने का!”

कह कर उसने मेरी योनि का रस चाट चाट कर वहाँ सफाई कर दी, और मुझे बाहों में लेकर मुझे अपना प्लान समझाने लगी।
 
सोमवार सवेरे ही रूद्र की कार दुर्घटना की खबर आई। मुझ पर तो मानो वज्रपात हुआ। खबर सुनते ही मुझे चक्कर आ गया, और मैं जहाँ खड़ी थी, वही गिर गई।

“रूद्र प्रताप सिंह को जानती हैं?” फ़ोन के उस तरफ से दो टूक सवाल किया गया।

“...जी हाँ!”

“आप?”

“जी मैं उनकी.. रिलेटिव हूँ” मैंने हिचकिचाते ही कहा, “... क्यों?”

“ओके.. उनका एक्सीडेंट हुआ है मैडम...” उधर से उत्तर सुन कर मेरा मन जोर जोर से धड़कने लगा। सोचने लगी की कहीं रूद्र को कुछ हो तो नहीं गया...।

“आप प्लीज ठीक ठीक बताइए...”

"... आप जल्दी से अपोलो हॉस्पिटल आ जाइए..” उधर फिर से दो टूक आवाज़ आई।

“आप बताएँगे तो?”

“कहा न...”

“हाँ... वो मेरे रिलेटिव हैं..। सब ठीक तो है।“ मैंने घबराते हुए पूछा।

“खबर ठीक नहीं है।“

“...क्या मतलब...?”

“वैसे हम उनका ऑपरेशन कर रहे हैं.. लेकिन...”

“लेकिन क्या...?”

“बचने की कोई उम्मीद नहीं है। खून बहुत निकल चुका है.. और.. और देर भी काफी हो गयी है..।“

इतना सुनना था की मैं बेहोश होकर वही फ़र्श पर ढेर हो गई। सहेलियों ने मेरे चेहरे पर पानी के छींटे दे देकर मुझे होश में लाया। और, थोड़ा होश आने पर मेरे साथ हॉस्पिटल पहुंचे। करने को वहाँ क्या था? बस, अनगिनत कागजों पर दस्तखत करने थे। वैसे भी इंश्योरेंस रूद्र के इलाज का पूरा खर्चा उठा ही रहा था। उनके ऑफिस से कई सारे लोग आ कर मिल चुके हैं.. कोई आश्वासन देता, कोई हिम्मत बढ़ाता, कोई सलाह देता, तो कोई मदद!

लेकिन मुझे कुछ समझ नहीं आता, कुछ सुनाई नहीं देता, कुछ दिखाई नहीं देता। बार बार आँखों के सामने कुछ ही दिनों पहले हुए आतंक के चित्र खिंच जाते। मैं वापस वैसे परिस्थितियां झेलने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थी। इतने बड़े संसार में ऐसे नितांत अकेली रहना...!! बस मन में एक ख़याल रहता की भगवान्, इनको ठीक कर दो.. जल्दी! न अन्न का दाना खाया जाता, न ही जल की एक बूँद पी जाती! लेकिन जीने के लिए करना पड़ता है.. जैसे तैसे अन्न जल को अपने उदर के अन्दर धकेल कर वापस ICU के सामने बैठ जाती, की न जाने कब इनको होश आ जाए!

‘बचना मुश्किल है..’

‘खून बहुत बह चुका..’

‘बहुत देर से हॉस्पिटल लाये जा पाए..’

‘दुआ करो की बच जाएँ..’

‘अगले बहत्तर घंटे में कुछ सुधार हो तो कुछ गुंजाईश है..’

‘कमाल है.. बस होश आ जाय..’

‘जैसा सोचा था, उतना बुरा नहीं है..’

‘बच जायेंगे अब..’

‘बस, जल्दी से होश आ जाय..’

एक.. दो.. तीन.. ऐसे कर के पूरे अट्ठारह दिन बीत गए! न जाने इस प्रकार के कितने बयान सुने! डॉक्टर भी क्या करे! वो कोई भगवान् या अन्तर्यामी थोड़े ही होते हैं.. और फिर अंततः..

“.. यहाँ नर्सें कह रही हैं की वो आपको वापस ले आईं.. जैसे सावित्री ले आईं थीं सत्यवान को! हो सकता हो की यह सच भी हो!”

सुन कर मेरी आँखों से आंसू ढलक गए! ऐसे क्यों कह रहे हैं डॉक्टर? मैं इनकी पत्नी हूँ नहीं.. लेकिन... लेकिन... ओह!

“आप भले मेरी बात को मज़ाक मानिए, लेकिन मैंने यह सब कहना अपना फ़र्ज़ समझा.. आगे इनका खूब ख़याल रखिएगा.. यू शुडन्ट भी अलाइव!”

“डॉक्टर.. एक मिनट..” मैंने कहा, “मैं इनकी पत्नी नहीं.. साली हूँ....”

“ओह! आई ऍम सॉरी! मुझे लगा की आप इनकी बीवी हैं.. ऐसी चिंता, ऐसी सेवा तो आज कल बीवियां भी नहीं करतीं।”

“इट इस ओके!”

“नीलू?” उन्होंने पुकारा! उनकी आँखों में आंसू थे।

“जी?” मेरे दिल ने राहत की सांस ली.. मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

“थैंक यू!”

दिल के सारे बाँध टूट गए.. मैं उनके हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम कर अपने आंसुओं से भिगोने लगी।

‘हे भगवान्! आपका लाख लाख शुक्र है!’

अगले सप्ताह मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गयी। हादसे की गंभीरता के विपरीत, मेरे शरीर में टूटी हुई हड्डियों की संख्या काफी कम थी – बस हाथ, पैर और पसलियों में कुछ टूट फूट हुई थी। इस दुर्घटना ने मानसिक और भावनात्मक तौर पर कितनी चोट पहुंचाई थी, वो तो समय के सतह ही मालूम होना था। लेकिन, हाल फिलहाल, सभी का (और मेरा भी) उद्देश्य मुझे वापस अपनी पहले वाली शारीरिक दशा तक लाना था। अस्पताल में पड़े रहने से कोई लाभ नहीं था – वहाँ जितना स्वास्थ्य लाभ उठाना था, वो तो हो गया था। इसलिए अब घर में ही रहने का आदेश हुआ था। एक बड़ी समस्या यह थी की मेरी देखभाल कौन करेगा – ऐसी ऐसी जगहों पर हड्डियाँ टूटी थीं, की मैं खुद से तो अपनी देखभाल तो क्या, ठीक से उठ या चल फिर नहीं सकता था। सुमन ने तुरंत ही मेरी देखभाल करने के लिए आग्रह किया, लेकिन मैंने ही मना कर दिया। उसकी पढाई लिखाई का हर्जा कर के मुझे कोई ख़ुशी नहीं मिलने वाली थी। और वैसे भी मुझे एक ऐसी नर्स चाहिए थी तो मेरे साथ अगर सारे चौबीस घंटे नहीं तो उसके ज्यादातर समय तक तो रहे ही।

खैर, मेरे डिस्चार्ज के ठीक एक दिन पहले एक ऐसी नर्स मिल गई, और जैसे ही वो मिली, मुझे डिस्चार्ज होने का सुख भी मिल गया (अस्पताल की गंध से मुझे उबकाई आती है... तो मात्र वहाँ से छुटकारा पाने के ख़याल से ही सुख होने लगता)। घर पहुँचने के लगभग साथ साथ ही एक नर्स ने दरवाजे पर दस्तखत दी। उसके साथ कुछ देर सुमन ने वार्तालाप किया, और फिर वो मेरे कमरे में अन्दर आई। मैंने देखा की वो बिलकुल साफ़-सुथरी बेदाग़ सफ़ेद पोशाक पहने एक लड़की थी – उसकी आँखों में हल्का सा काजल लगा हुआ था, और उसने अपने बाल पोनीटेल जैसे बाँधा हुआ था। नर्स शब्द सोच कर लगता है की कोई प्रौढ़ उम्र की एक कन्टाली महिला होगी.. लेकिन यह सबसे पहले तो एक लड़की थी.. बस कोई चौबीस-पच्चीस साल की.. और.. और उसका चेहरा एकदम खिला खिला सा था। मुस्कुराता हुआ। उतनी ही मुस्कुराती हुई और चमकदार आँखें!

“हेल्लो मिस्टर सिंह!” उसने प्रफुल्ल आवाज़ में कहा, “हाउ आर यू फीलिंग टुडे?”

और मेरे उत्तर देने से पहले, “ओह.. बाई दि वे.. आई ऍम योर नर्स, फरहत!”

“हेल्लो फरहत! थैंक यू फॉर अक्सेप्टिंग टू टेक केयर ऑफ़ मी!”

अगले कुछ देर तक उसने मुझे और सुमन को अपना अपॉइंटमेंट लैटर पढाया, मेरी दवाइयों और उनको लेने की समय सारिणी, व्यायाम और अन्य आवश्यकताओं के बारे में विस्तार से बताया। ज्यादातर बातें तो ठीक थी, लेकिन जब उसने यह भी बताया की उसकी ड्यूटी में रोज़ मेरे कपड़े बदलना, नहलाना और बाथरूम में मदद करना भी शामिल रहेगा तो मुझे कुछ घबराहट और कोफ़्त सी महसूस हुई।

एक तो वो एक लड़की थी, और ऊपर से मुसलमान। अब यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं की मुस्लिम समुदाय कितना दकियानूसी होता है, ख़ासतौर पर अपनी महिलाओं को लेकर। उन पर इतनी सारी बंदिशें होती हैं की गिनना मुश्किल है।

“फरहत, टेल मी अबाउट योर फॅमिली!” मैंने कहा। इतनी देर तक अंग्रेजी में ही बातें हो रही थीं.. मुझे लगा की औपचारिक रहना ठीक है..

“मैं, और मेरे अब्बू.. बस, हम दो ही जने हैं!”

“अरे वाह! आपको तो हिन्दी बोलनी भी आती है? और.. आपके बोलने से लग रहा है की आप उत्तर भारत की हैं..?”

“आपको कैसे पता? दरअसल, मेरे अब्बू लखनऊ से हैं! वो यहाँ बैंगलोर में कोई पैंतीस साल पहले आये थे.. काम के लिए। वो रिटायर हो गए हैं.. शॉप-फ्लोर पर एक एक्सीडेंट में उनका हाथ कट गया था। तब से वो रिटायर हो गए हैं। घर चलाने और उनकी दवाइयों के खर्च के लिए पेंशन पूरा नहीं पड़ता न.. इसलिए मैं भी काम करती हूँ।“

बिना कहे ही उसको जैसे मेरी मन की बात समझ में आ गयी। इतना तो मुझे समझ में आ गया की इस लड़की से आराम से बात चीत की जा सकती है। यह एहसास अपने आप में बहुत सुखद था.. इतने दिन गहरे मानसिक अवसाद में गुजारने, और फिर एक प्राणघातक दुर्घटना झेलने के बाद मुझमें वापस जीवन जीने की इच्छा प्रबल हो गयी थी।

खैर, फरहत को कुछ और कुरेदने पर उसने बताया की वैसे तो नर्स बनने, या फिर किसी तरह का करियर बनाने की उसने कभी सोची ही नहीं थी। निम्न-मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार से सम्बद्ध होने के कारण उसकी नियति उसको मालूम थी। जैसे तैसे तो उसने इंटरमीडिएट की परीक्षा बायोलॉजी साइंस से पास करी। बायोलॉजी लेने पर भी घर में बहुत हाय-तौबा मची।

‘आर्ट्स या होम साइंस क्यों नहीं लेती?’ कह कह कर नाक में दम कर दिया। लेकिन आज पीछे देख कर लगता है की अच्छा किया! अपने अब्बू के एक्सीडेंट के बाद उसने जनरल नर्सिंग और मिडवाइफरी का कोर्स किया। जब तक कोर्स ख़तम हुआ तब तक उसकी अम्मी चल बसी, और घर की माली हालत बहुत खराब हो गयी। अच्छी बात यह रही की उसकी इस हॉस्पिटल में नर्सिंग का कार्य मिल गया, जिससे कुछ सहारा हो सका। यदि सब कुछ ठीक रहता तो पढाई लिखाई नहीं, वो किसी के बच्चे जन कर उनको पाल रही होती।

मैंने पूछा की वो और आगे नहीं पढना चाहती, तो उसने बताया की बिलकुल पढना चाहती है.. लेकिन बीएससी नर्सिंग का कोर्स दो साल का है.. और इस समय वो अपने काम से मुक्त नहीं हो सकती।

उसने यह भी बताया की घर ही नहीं, जान पहचान में भी सभी ने कितना बवाल मचाया। उसका नर्सिंग की पढाई करना जैसे सभी का ठेका हो गया। ‘गैर मर्दों को छुएगी!’ यह सभी के जीवन का मानो सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। लेकिन वो कहते हैं न.. जब ज़रुरत होती है, तो हर बात छोटी हो जाती है। कुछ दिनों बाद सभी लोग चुप हो गए.. भारत की नर्स आज कल गल्फ और यूरोप में काफी डिमांड में हैं.. इसलिए पहले हाय तौबा मचाने वाले, अब उसके करियर में सिक्कों की खनक सुन कर रिश्तेदारी जोड़ने के लालच में चुप हो गए।

“और यह इतनी अच्छी इंग्लिश कैसे बोलती हो?” मैंने पूछा।

“जब इतनी कठिन ट्रेनिंग होती है, तो लगता है की क्यों न फिर इस मौके का पूरा फायदा उठाया जाय। लैब ट्रेनिंग, लाइब्रेरी, और हेल्थ सेंटर्स.. वहाँ अनगिनत घंटे बिताने के बाद बचे हुए समय में मैं डिस्कवरी और न्यूज़ चैनल देखती, और अंग्रेजी पढ़ती। बिना अंग्रेजी के आगे कैसे बढ़ा जा सकता है?” उसने एक बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर दिया। इसी बीच सुमन भी कमरे में आ गयी।

“दैट इस ग्रेट, फ़रहत! आपसे बात करके मुझे लग रहा है की अब मेरा केयर ठीक से होगा, एंड दैट आई ऍम इन सेफ हैंड्स!”

मेरी इस बात पर वो ख़ुशी से मुस्कुराई। हम तीनों कुछ देर तक इधर उधर की बातें करते रहे। फरहत ने मुझे आराम करने को कहा, लेकिन मैंने यह कह कर मना कर दिया की पिछले न जाने कितने महीनो से किसी से ढंग से बात नहीं किया – न घर के बाहर, और न ही घर के अन्दर! इसलिए, आज रोको मत.. अगर थक गया, तो मैंने खुद ही चुप हो कर सो जाऊँगा। मेरी इस दलील पर दोनों ही लड़कियाँ चुप हो गयी, और हमने कुछ और देर तक बात चीत जारी रखी।

मुझे इस बात का अनुमान था की मेरे एक्सीडेंट के कारण सुमन की पढाई का काफी नुक्सान हो गया था, इसलिए मैंने उससे आग्रह किया की वो अब बेफिक्र हो कर अपने कोर्स को जल्दी जल्दी पूरा करने पर ध्यान लगाए। वैसे भी घर में खाना पकाने के लिए हमारी काम-वाली ने स्वीकार कर लिया था। मजे की बात यह है की अभी मेरा जीवन पूरी तरह से स्त्रियों के भरोसे पर टिका हुआ था।

“अच्छा.. मैं आप से एक बात पूछूं?” मैंने फरहत से कहा।

“हाँ, पूछिए न?”

“आपके नाम का मतलब क्या है?”

“ओह! हा हा.. फरहत शायद अरबी या फ़ारसी शब्द है.. और इसका मतलब है.. उम्म्म.. सुशील, सभ्य, हैप्पीनेस, आनंद, मेजेस्टी.. एक्चुअली बहुत सारे मीनिंग्स हैं.. लेकिन लड़कियों के लिए यूज़ होने से इसका मतलब हैप्पीनेस होना चाहिए..”

“वैरी नाईस!” कह कर मैं कुछ और देर तक चुप हो गया।

और फिर बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा।

“आपको उठना है?”

“हाँ.. एक्चुअली, टॉयलेट जाना है..”

“ओके” कह कर फरहत मेरी उठने में मदद करने लगी।

कोई दो तीन मिनट कोशिश करने के बाद, जिससे मुझे कम से कम तकलीफ़ हो, फरहीन मुझे सहारा दे कर टॉयलेट तक पहुँचाया। इतना तो तय था की बिना उसके सहारे के मैं यह सब मामूली काम भी नहीं कर सकता था, लेकिन ऐसे ही किसी अनजान लड़की (जो की उम्र में मुझसे काफी छोटी हो) के सामने निर्वस्त्र कैसे हुआ जा सकता है? एक वयस्क पुरुष के लिए इससे ज्यादा लाचारी और लज्जा का विषय और क्या हो सकता था?

“फरहत.. आप.. अब मैं देख लूँगा..” मैंने हिचकिचाते हुए कहा।

“नाउ वेट अ मिनट! आई थिंक वी नीड टू टॉक एंड सॉर्ट आउट समथिंग। मैं आपकी नर्स हूँ, तो सबसे पहला रूल यह है की आपको मेरे सामने शर्माने की कोई ज़रुरत नहीं है। आपके हाथ और पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ है, और रिब्स पर भी चोटें हैं.. अगर आप पूरी तरह से ठीक होते तो मेरी ज़रुरत ही नहीं थी.. है न?”

“हाँ.. वो सब तो ठीक है लेकिन..”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं। आप अगर इस बात से शर्मा रहे हैं तो यह सोचिये की मैं आपको स्पंज बाथ, टॉयलेट, ड्रेसिंग भी करूंगी.. तो प्लीज.. ओफेन्देड मत फील कीजिए! ओके?

“ओह गॉड! कहना आसान है..”

“आई नो! बट वी विल ट्राई.. ओके? नाउ, लेट में हेल्प यू विद योर पजामा..”

कह कर उसने मुझे सहारा दिए हुए ही मेरे पजामे का नाड़ा ढीला कर दिया और मेरे पजामे को धीरे से नीचे सरका दिया। कोई और समय होता (मतलब अगर रश्मि होती) तो अब तक मेरा लिंग अपने पूर्ण उत्थान पर पहुँच कर छलांगे लगाने लगता, लेकिन इस समय शर्म, संकोच और नर्वसनेस होने के कारण मेरा लिंग एक छोटे से छुहारे के आकार का ही रहा। मैंने फरहत की तरफ देखने की हिम्मत नहीं की, लेकिन मुझे पूरी तरह से यकीन था की वो अवश्य ही उसी तरफ देख रही होगी, और उसके आकार पर मन ही मन हंस रही होगी..

खैर, जब मेरा पजामा यथोचित दूरी तक सरक गया, तो उसने मुझे सहारा दे कर कमोड पर बैठाया। मैंने कुछ देर तक कोशिश करी, लेकिन फरहत की उपस्थिति में मेरे लिए मूत्र करना संभव ही नहीं हो रहा था।

“कर लीजिये न..”

“थोड़ी प्राइवेसी मिल जाय... मुझसे हो नहीं पा रहा है ...”

“ओह सॉरी..!” कह कर वो बाथरूम से बाहर निकल गयी।

उसके जाते ही मन में कुछ शांति हुई - मैंने अपने जघन क्षेत्र की मांस-पेशियों को ढीला करने की कोशिश की और तत्क्षण ही मैंने मूत्र को बाहर निकलता महसूस किया। जब मैंने मूत्र कर लिया तो मैंने कुछ देर रुक कर आवाज़ लगाई,

“..फरहत?”

“जी.. आई..”

अन्दर आकर उसने सबसे पहले बाथरूम में नज़र दौड़ाई। एक तरफ उसको वेट-टिश्यु मिल गए। उसने उसमें से एक टिश्यु निकाल कर आधा फाड़ा, और मेरी तरफ मुखातिब हुई। उसने मुझे सहारा दे कर उठाया, और फिर मेरे लिंग को पकड़ कर उसके शिश्नाग्रच्छ्द को धीरे से पीछे की तरफ सरकाया उसको तीन-चार बार झटका दिया, जिससे मूत्र की बची हुई कुछ बूँदें निकल गई। फिर उसने वेट-टिश्यु की मदद से लिंग के सुपाड़े को ठीक से पोंछ दिया। इसके बाद हम दोनों वापस अपने कमरे में आ गए।

कमरे में आकर लेटने के कुछ देर तक हमने कोई बात नहीं करी। इसी बीच कामवाली आ गयी। फरहत ने उसको विशेष निर्देश दिए की घर और खासतौर पर मेरे कमरे की सफाई कैसे करी जाय, और यह भी की खाना कैसे बनाया जाय। यह निर्देश देते समय उसका अंदाज़ धौंस देने वाला नहीं था.. बल्कि यह साफ़ दिख रहा था की वो मेरी और कामवाली की मदद ही करना चाहती थी। सच में.. पहले ही दिन में फरहत का व्यक्तित्व, उसके बात करने का अंदाज़ और उसकी मुस्कान मेरे दिल-ओ-दिमाग पर छा गई।
 

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