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“यही कि इसका वज़न दो-ढाई मन से किसी तरह कम न होगा।” हमीद ने जल्दी से कहा।
“आप तो तिलस्मी बातें कर रहे हैं।" वह हँसते हुए बोली।
"ये सार्जेंट हमीद हैं।' फ़रीदी ने हमीद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। “बहुत दिलचस्प आदमी हैं। आप इनकी बातों का कुछ ख़याल न कीजिएगा।"
“ओह, कोई बात नहीं।” औरत मुस्कुरा कर बोली।
फ़रीदी को अपनी बेवकूफ़ी पर अफ़सोस हो रहा था कि उसने चिड़िया का राज़ इतनी जल्दी क्यों उगल दिया। अपनी ग़लती का एहसास होते ही वह फ़ौरन सँभल कर बोला।
___ “मोहतरमा, बात दरअसल यह है कि हम लोग आप ही के मामले की छानबीन कर रहे हैं। अभी-अभी हमें मालूम हुआ है कि यहाँ से तीन मील के फ़ासले पर किसी गड्ढे से एक लाश बरामद हुई है। लेकिन वह किसी मर्द की है; आप परेशान न हों।"
“आपकी तो कोई बात ही समझ में नहीं आ रही है। अभी तो आप चिड़िया...!"
“ठीक है...ठीक है..." वह उसकी बात काटता हुआ बोला। हम जासूसों के काम करने का तरीक़ा जनता की समझ में नहीं आ सकता। बहरहाल, अगर तकलीफ़ न हो तो पहले हमें थोड़ा-सा पानी पिलाइए। आप देखती हैं कितनी सख़्त धूप है।
“ज़रूर...ज़रूर...अन्दर आ जाइए।" वह बरामदे की तरफ़ मुड़ती हुई बोली।
बरामदे में पहुँच कर दोनों ने अपने कोट उतार कर कुर्सियों पर डाल दिये और रूमाल से चेहरों का पसीना पोंछते हुए आराम से कुर्सियों पर गिर गये।
“यहाँ भी काफ़ी गर्मी है।" औरत बोली। “मेरे ख़याल से अन्दर ठीक रहेगा।"
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लाश की पहचान
ड्रॉइंग-रूम में पहुँच कर वे सोफे पर बैठ गये।
औरत ने नौकर को बुला कर पानी लाने को कहा। ड्रॉइंग-रूम को बहुत ही बेहतरीन तरीके से सजाया गया था। फ़र्श पर भारी और क़ीमती कालीन बिछा हुआ था। सोफे पर फूलदार रेशमी कपड़े के गिलाफ़ चढ़े हुए थे। दीवारों पर बड़े फ्रेमों में आर्ट के बेहतरीन नमूने नज़र आ रहे थे। फ़रीदी इस देहाती इलाके में यह शानो-शौकत देख कर हैरान था। थोड़ी देर के बाद नौकर शीशे के जग में ठण्डा पानी लाया।
“मेरे ख़याल से कुछ खा भी लीजिए।" औरत बोली।
___“जी नहीं, शुक्रिया।” फ़रीदी ने पानी के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा।
दोनों ने जी भर कर पानी पिया। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं।
“वाक़ई विमला देवी का इस तरह ग़ायब हो जाना हैरतअंगेज़ है।” फ़रीदी बोला।
हमीद चौंक कर उसकी तरफ़ देखने लगा। उसे हैरत हो रही थी कि फ़रीदी चिड़िया से विमला देवी तक क्यों कर जा पहुँचे।
“क्या बताऊँ, इन्स्पेक्टर साहब, कि मुझे कितनी परेशानी है।
“कुदरती बात है।” फ़रीदी सिर हिला कर बोला।
___ “अब मेरी समझ में नहीं आता कि उसके माँ-बाप को क्या जवाब दूंगी?"
“क्या आपने उन्हें इसकी कोई ख़बर दी।"
“अब तक तो नहीं...समझ में नहीं आता कि उन्हें क्या लिखू।"
“तो क्या वह कहीं दूर रहते हैं?'' फ़रीदी ने कहा।
“जी हाँ...कानपुर में...उसके पिता वहाँ रूई के बहुत बड़े व्यापारी हैं। शायद आपने नाम सुना होगा। सेठ करमचन्द।"
“ओह अच्छा ...तो वे यहाँ अपने शौहर से लड़ कर आयी थीं।” फ़रीदी बोला।
“नहीं...अभी उसकी शादी नहीं हुई। वह मेरी क्लास-फ़ेलो रह चुकी है। यूँ ही घूमने के लिए यहाँ आयी थी। तक़रीबन एक महीने की बात है।"
“अभी एक महीना और रहने का इरादा था।"
“जी हाँ।"
“क्या यह नहीं हो सकता कि वह किसी वजह से आपको ख़बर दिये बगैर कानपुर चली गयी हों।"
“ऐसी तो कोई वजह नहीं हो सकती कि वह नंगे पैर, बगैर सामान लिए यहाँ से चली जाये।"
“नंगे पैर...क्या मतलब?"
“जी हाँ...सारे सैंडिल उसके कमरे में मौजूद हैं और वह सारा सामान भी जो वह अपने साथ लायी थी।"
“हैरत की बात है।” फ़रीदी हमीद की तरफ़ देखते हुए बोला। “अच्छा, यह बताइए इस दौरान उनके पास बाहर से कुछ ख़त भी आये थे।"
“जी हाँ...वे ज़्यादातर उनके माँ-बाप या मँगेतर के होते थे।"
“हूँ...!” फ़रीदी ने कुछ सोचते हुए कहा। “क्या आपको इन ख़तों के देखने का भी इत्तफ़ाक़ हुआ।"
“जी नहीं।"
“उनके मँगेतर का क्या नाम है?"
“रणधीर सिंह।"
“रणधीर सिंह...!' फ़रीदी तक़रीबन उछलते हुए बोला। “क्या आपने उसे देखा भी है?"
“कई बार...!'
“क्या वह कभी यहाँ आया था।"
“नहीं, मैं उससे कानपुर में मिल चुकी हूँ।"
“तब आपको मेरे साथ कोतवाली तक चलने की ज़हमत करनी पड़ेगी।"
“क्यों...?” औरत ने हैरान हो कर पूछा।
“आज जिस शख्स की लाश धर्मपुर के जंगल में मिली है उसने भी अपना नाम रणधीर सिंह ही बताया था।"
“अरे...तो क्या...तो क्या।" औरत काँपने लगी।
“घबराने की कोई बात नहीं।” फ़रीदी उठते हुए बोला। “जल्दी कीजिए।"
अचानक दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ सुनायी दी और एक अधेड़ उम्र का मज़बूत आदमी कमरे में आ कर खड़ा हो गया।
उसने पतलून-कमीज़ पहन रखी थी। बड़े-से लम्बूतरे चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी वीरान आँखें बहुत ही ख़ौफ़नाक मालूम हो रही थीं। दहाना काफ़ी फैला हुआ था और दोनों कानों पर घने बालों की लकीरें थीं। चेहरा इस तरह साफ़ था जैसे उसने अभी-अभी शेव की हो। साँस के साथ-साथ इसकी फूली हुई नाक के नथने फूल-पचक रहे थे। बाजुओं की उभरी मछलियाँ आस्तीन के ऊपर से साफ़ ज़ाहिर हो रही थीं।
“यह कौन है?' वह गरज कर बोला।
घबरा कर खड़ी हो गयी।
“आप तो तिलस्मी बातें कर रहे हैं।" वह हँसते हुए बोली।
"ये सार्जेंट हमीद हैं।' फ़रीदी ने हमीद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। “बहुत दिलचस्प आदमी हैं। आप इनकी बातों का कुछ ख़याल न कीजिएगा।"
“ओह, कोई बात नहीं।” औरत मुस्कुरा कर बोली।
फ़रीदी को अपनी बेवकूफ़ी पर अफ़सोस हो रहा था कि उसने चिड़िया का राज़ इतनी जल्दी क्यों उगल दिया। अपनी ग़लती का एहसास होते ही वह फ़ौरन सँभल कर बोला।
___ “मोहतरमा, बात दरअसल यह है कि हम लोग आप ही के मामले की छानबीन कर रहे हैं। अभी-अभी हमें मालूम हुआ है कि यहाँ से तीन मील के फ़ासले पर किसी गड्ढे से एक लाश बरामद हुई है। लेकिन वह किसी मर्द की है; आप परेशान न हों।"
“आपकी तो कोई बात ही समझ में नहीं आ रही है। अभी तो आप चिड़िया...!"
“ठीक है...ठीक है..." वह उसकी बात काटता हुआ बोला। हम जासूसों के काम करने का तरीक़ा जनता की समझ में नहीं आ सकता। बहरहाल, अगर तकलीफ़ न हो तो पहले हमें थोड़ा-सा पानी पिलाइए। आप देखती हैं कितनी सख़्त धूप है।
“ज़रूर...ज़रूर...अन्दर आ जाइए।" वह बरामदे की तरफ़ मुड़ती हुई बोली।
बरामदे में पहुँच कर दोनों ने अपने कोट उतार कर कुर्सियों पर डाल दिये और रूमाल से चेहरों का पसीना पोंछते हुए आराम से कुर्सियों पर गिर गये।
“यहाँ भी काफ़ी गर्मी है।" औरत बोली। “मेरे ख़याल से अन्दर ठीक रहेगा।"
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लाश की पहचान
ड्रॉइंग-रूम में पहुँच कर वे सोफे पर बैठ गये।
औरत ने नौकर को बुला कर पानी लाने को कहा। ड्रॉइंग-रूम को बहुत ही बेहतरीन तरीके से सजाया गया था। फ़र्श पर भारी और क़ीमती कालीन बिछा हुआ था। सोफे पर फूलदार रेशमी कपड़े के गिलाफ़ चढ़े हुए थे। दीवारों पर बड़े फ्रेमों में आर्ट के बेहतरीन नमूने नज़र आ रहे थे। फ़रीदी इस देहाती इलाके में यह शानो-शौकत देख कर हैरान था। थोड़ी देर के बाद नौकर शीशे के जग में ठण्डा पानी लाया।
“मेरे ख़याल से कुछ खा भी लीजिए।" औरत बोली।
___“जी नहीं, शुक्रिया।” फ़रीदी ने पानी के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा।
दोनों ने जी भर कर पानी पिया। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं।
“वाक़ई विमला देवी का इस तरह ग़ायब हो जाना हैरतअंगेज़ है।” फ़रीदी बोला।
हमीद चौंक कर उसकी तरफ़ देखने लगा। उसे हैरत हो रही थी कि फ़रीदी चिड़िया से विमला देवी तक क्यों कर जा पहुँचे।
“क्या बताऊँ, इन्स्पेक्टर साहब, कि मुझे कितनी परेशानी है।
“कुदरती बात है।” फ़रीदी सिर हिला कर बोला।
___ “अब मेरी समझ में नहीं आता कि उसके माँ-बाप को क्या जवाब दूंगी?"
“क्या आपने उन्हें इसकी कोई ख़बर दी।"
“अब तक तो नहीं...समझ में नहीं आता कि उन्हें क्या लिखू।"
“तो क्या वह कहीं दूर रहते हैं?'' फ़रीदी ने कहा।
“जी हाँ...कानपुर में...उसके पिता वहाँ रूई के बहुत बड़े व्यापारी हैं। शायद आपने नाम सुना होगा। सेठ करमचन्द।"
“ओह अच्छा ...तो वे यहाँ अपने शौहर से लड़ कर आयी थीं।” फ़रीदी बोला।
“नहीं...अभी उसकी शादी नहीं हुई। वह मेरी क्लास-फ़ेलो रह चुकी है। यूँ ही घूमने के लिए यहाँ आयी थी। तक़रीबन एक महीने की बात है।"
“अभी एक महीना और रहने का इरादा था।"
“जी हाँ।"
“क्या यह नहीं हो सकता कि वह किसी वजह से आपको ख़बर दिये बगैर कानपुर चली गयी हों।"
“ऐसी तो कोई वजह नहीं हो सकती कि वह नंगे पैर, बगैर सामान लिए यहाँ से चली जाये।"
“नंगे पैर...क्या मतलब?"
“जी हाँ...सारे सैंडिल उसके कमरे में मौजूद हैं और वह सारा सामान भी जो वह अपने साथ लायी थी।"
“हैरत की बात है।” फ़रीदी हमीद की तरफ़ देखते हुए बोला। “अच्छा, यह बताइए इस दौरान उनके पास बाहर से कुछ ख़त भी आये थे।"
“जी हाँ...वे ज़्यादातर उनके माँ-बाप या मँगेतर के होते थे।"
“हूँ...!” फ़रीदी ने कुछ सोचते हुए कहा। “क्या आपको इन ख़तों के देखने का भी इत्तफ़ाक़ हुआ।"
“जी नहीं।"
“उनके मँगेतर का क्या नाम है?"
“रणधीर सिंह।"
“रणधीर सिंह...!' फ़रीदी तक़रीबन उछलते हुए बोला। “क्या आपने उसे देखा भी है?"
“कई बार...!'
“क्या वह कभी यहाँ आया था।"
“नहीं, मैं उससे कानपुर में मिल चुकी हूँ।"
“तब आपको मेरे साथ कोतवाली तक चलने की ज़हमत करनी पड़ेगी।"
“क्यों...?” औरत ने हैरान हो कर पूछा।
“आज जिस शख्स की लाश धर्मपुर के जंगल में मिली है उसने भी अपना नाम रणधीर सिंह ही बताया था।"
“अरे...तो क्या...तो क्या।" औरत काँपने लगी।
“घबराने की कोई बात नहीं।” फ़रीदी उठते हुए बोला। “जल्दी कीजिए।"
अचानक दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ सुनायी दी और एक अधेड़ उम्र का मज़बूत आदमी कमरे में आ कर खड़ा हो गया।
उसने पतलून-कमीज़ पहन रखी थी। बड़े-से लम्बूतरे चेहरे पर उसकी बड़ी-बड़ी वीरान आँखें बहुत ही ख़ौफ़नाक मालूम हो रही थीं। दहाना काफ़ी फैला हुआ था और दोनों कानों पर घने बालों की लकीरें थीं। चेहरा इस तरह साफ़ था जैसे उसने अभी-अभी शेव की हो। साँस के साथ-साथ इसकी फूली हुई नाक के नथने फूल-पचक रहे थे। बाजुओं की उभरी मछलियाँ आस्तीन के ऊपर से साफ़ ज़ाहिर हो रही थीं।
“यह कौन है?' वह गरज कर बोला।
घबरा कर खड़ी हो गयी।