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जिस्म की प्यास compleet

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रिचा ने कहा "अच्छा वो यार परशु का भाई है... उसने मुझसे बिन्ति करी थी कि आज वो अपने भाई के साथ रहना

चाहता है जोकि कल वापस हरयाणा चले जाएगा तो मैने उसको हां केहदी"

ललिता मन ही मन रिचा को गालिया देने लग गयी थी..रिचा बोली "सुन ना हम वैसे भी दरवाज़ा लॉक करके सोएंगे तो

कोई दिक्कत नहीं है और वैसे भी ये बंदा कई बारी आ चुका है यहाँ तो ऐसी घबराने वाली कोई बात नहीं है.."

कुच्छ देर बाद दोनो लड़कियों ने बत्ती बंद करी और सोने लग गयी..

कुच्छ देर रात ललिता की नींद टूट गयी.. अपनी नींद से भरी आवाज़ में उसने बड़बड़ाया "रिचा यार अपनी रज़ाई ओढ़ ना"

फिर उसके कुच्छ देर बाद उसने रिचा का हाथ अपनी कमर पे पाया.. इधर से उधर ललिता की कमर पे हाथ हिले

जा रहा था.. ललिता काफ़ी नींद में थी इसलिए उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया... मगर उसके बाद ललिता के

टॉप के अंदर जैसी ही वो हाथ गया और ललिता को अपने पेट वो महसूस हुआ उसने वो हाथ को तेज़ी से पकड़ा और उस हाथ की मोटाई और बाल महसूस करके उसे पता चला कि वो रिचा का नही बल्कि एक आदमी का हाथ है शायद परशु या फिर उसका भाई का.. ललिता को समझ नही आ रहा था कि वो क्या करें.. वो चुप चाप बिस्तर पे पड़ी रही.. वो हाथ फिर बढ़ा और

इस बार ललिता के पेट को सहलाने लगा.. ललिता के पतले से टॉप में से वो हाथ ललिता की गर्माहट महसूस करने लगा था.. गुस्से में ललिता ने अपने उपर से हाथ हटा दिया और बिस्तर से उठ के टाय्लेट की तरफ भागी..

उस आदमी ने ललिता को पीछे से जकड़ा और उठाकर कर वापस बिस्तर पे फेंक दिया.. वो आदमी कोई और नहीं परशु था..

जैसी ही ललिता ने चिल्लाना चाहा परशु ने उसके मुँह पर अपना बड़ा सा हाथ रख दिया.. परशु ने दूसरा हाथ ललिता की स्कर्ट और पैंटी में घुसा दिया और उसकी चूत पे चींटी मारने लग गया... ललिता ने हार नही मानी और गुस्से में परशु

को लात मारने लगी... परशु पर उन्न लातो का कुच्छ असर नहीं हुआ और आहिस्ते बोला "आए शहर की लड़की कितना तड़पाएगी....

अब लड़ ना" फिर अपना हाथ वो ललिता की चूत पे लेजाके बोला " एक भी बाल नहीं है चूत पर... मज़ा आ गया"..

परशु का हाथ चूत को छुते ही ललिता काप उठी..

परशु की उंगलिओ की वजह से उसकी चूत गीली होने लग गयी और परशु बोला "लगता है मज़ा आ रहा है तुझे"

ललिता अब लड़ने की भी कोशिश नहीं कर रही थी और ये देख कर परशु ने उसके मुँह से अपना हाथ हटा लिया..

परशु ने ललिता को साँस लेने का मौका दिया और उसके बिस्तर पे बिठा कर अपने हाथो से उसका टॉप उतार फेका और

उसकी काली ब्रा को भी उसके जिस्म से हटा दिया.. मम्मो को देखकर ही परशु उनसे खेलने लगा.. मज़े लेता लेता बोला

"तेरे मम्मे बड़े कमाल के है... इतने बड़े बड़े और टाइट हर मर्द को ऐसे मम्मे पसंद है"

फिर परशु ने अपने होंठो से ललिता को होंठो जमके चूम लिया.. परशु ललिता की ज़ुबान होंठो को चाते जा रहा था..

चूमता चूमता वो अपने हाथो से ललिता की चुचियाँ को मसल्ने लग गया.....

जब उसने ललिता के होंठो आज़ाद करा तो उसके बदन को उसने पलट दिया और अब उसकी गान्ड परशु के सामने पेश हुई थी.... अपनी उल्टे हाथ की एक मोटी उंगली उसने ललिता की गान्ड में डाल दी और ललिता दर्द के मारे चीख दी....
 
उसकी अंगली अंदर बाहर अंदर बाहर ललिता की गान्ड में होती रही...अपने सीधे हाथ से वो ललिता के

नितंबो को चाँटा मारने लग गया.... 4-5 बारी तेज़ी से चाँटा लगाया और ललिता के नितंबो पे परशु के

हाथ चिपक गये... हर चाँते के बाद ललिता को 2 सेकेंड के लिए दर्द होता और फिर मस्ती छाने लगती...

परशु ने ललिता को बिस्तर पे बिठा दिया और अपनी पतलून को नीचे उतारके अपना मोटा लंड उसको चूसने के लिए दिया....

वो बदतीमीज़ी से बोला "चल मेरी छमिया चूसना शुरू कर.." ललिता ने लंड को पकड़ा और हल्के हल्के चूमने लग गयी..

फिर अपना मुँह खोलके उसको अंदर लेने लग गयी.. आहिस्ते आहिस्ते उसने उस लंबे मोटे लंड को चूसना शुरू किया..

परशु सिसकिया लेके बोले जा रहा था "ऐसी ही मेरी जान.. चूस्ति रह.. जितना अच्छा चूसेगी उतनी अच्छी तरह तेरी बजाउँगा भी"

ललिता का मुँह नमकीन हो गया था... परशु के लंड के बालो में से अजीब सी बू आ रही थी जो ललिता को

पहले काफ़ी गंदी लग रही थी फिर उसे मदहोश कर रही थी.. ललिता को अंधेरे में लग रहा था कि परशु का लंड

शायद सबसे बड़ा लंड होगा जिसको अभी तक उसने अपने मुँह में लिया होगा... परशु ने ललिता को रोकके कहा

"बस रुकजा रानी नहीं तो पहले की तरह तेरे मुँह में ही पानी छोड़ देगा"

परशु ने अपनी बनियान उतारी और ललिता की स्कर्ट को नीचे उतार दिया.. उसने पैंटी को कोने से पकड़ा और मज़े लेते हुए

उसको उपर की तरफ खीच दिया.. ललिता की चूत और गान्ड पे बेहद दर्द होने लगा.. वो देख कर परशु और मचल गया..

. परशु ने फिर उसकी कच्छि को उतार फेका और बिस्तर पे लिटा कर उसकी चूत को चाटने लग गया...

उसकी ज़ुबान कुत्ते की तरह ललिता की चूत पर चल रही थी.. ललिता मज़े में सिसकियाँ लेने लगी...

बार बार परशु कहता "मज़े आ रहे है ना कुतिया... मज़े आ रहे है ना कुतिया" जिसका जवाब ललिता कुच्छ नहीं देती....

फिर परशु ने अपना लंड पे थुका और उसपे मला और ललिता को उसको और गीला करने को कहा.. ललिता ने फिर से लंड को रॅंडियो की तरह चूसना शुरू कर दिया

"बस बस कर कुतिया अब तुझे चोद्ता हूँ" ये कहकर परशु ने ललिता की टाँगें चौड़ी करी और अपना लंड एक झटके

में चूत में घुसेड दिया.. पूरा लंड तो चूत में नहीं गया मगर ललिता की चीख निकल गयी...

परशु ने फिर चोद्ना शुरू करा और ललिता को काफ़ी दर्द होने लगा.. ललिता की टाँगें परशु के कंधो पर थी और

परशु उसकी चुचियाँ को भी ज़ोर ज़ोर से नौचने लग गया... कुच्छ देर बाद परशु ने अपना लंड निकाला और ललिता को कुतियाकी तरह बिस्तर पे बिठा दिया..

2-3 बारी चूत पे धुकने के बाद उसने अपना लंड डाल दिया.. उसने ललिता के बालो को पकड़ लिया और उन्हे खीचने लग गया..
 
बीच बीच में उसकी कमर पे भी चाते लगाने लग गया.. ललिता ने दीवार के सहारे अपने आप को संभालने

की कोशिश करी और उसी वजह से उसका हाथ लाइट के स्विच पे पड़ गया और कमरे का बल्ब ऑन हो गया....

रोशनी में ललिता का बदन को देख कर परशु कुत्तो की तरह ललिता की चूत को चोद्ने लग गया... अब फिर से लाइट

बंद करने का कुच्छ फ़ायदा नहीं था और ललिता भी उस चुदाई का मज़ा लेने लग गई....

फिर कमरे के दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और ललिता ने अपनी नज़रे उसकी तरफ करी.... परशु का भाई वहाँ खड़ा हो

गया जोकि ललिता के मम्मो को झूलते हुए देख रहा था.... परशु ने अपने भाई को जलाने के लिए ललिता के हाथो को

जाकड़ लिया और पीछे खिच कर उसकी चूत बजाने लग गया... इस वजह से अब ललिता मस्ती में और चिल्लाने लग

गयी क्यूंकी परशु का लंड और अंदर घुस गया था.... परशु का सामने खड़ा देखा अपना लंड सहलाता हुआ बोला

"भाई उस साली का तो काम कर दिया लगे हाथो इसको भी चान्स दो ना"

परशु ने ललिता के बाल खीचे और बोला "बोल कुतिया चुद्वाएगि मेरे भाई से" ललिता कुच्छ नहीं बोली और परशु का

भाई बिस्तर पे चढ़ा और ललिता के मुँह में अपना लंड डाल दिया.. उसका लंड किसी भी तरह परशु के आकार का

नहीं था मगर ललिता सॉफ तौर से रिचा की चूत के पानी को चख पा रही थी..

ललिता सोचने लग गयी कि नज़ाने उसकी दोस्त कितनी देर से इस लंड से चुद रही होगी और अब भी ये इतने तना हुआ है...

परशु के लंड नेललिता की चूत की जान निकालके रख दी थी... ललिता का दर्द इतना बढ़ गया था कि वो परशु के लंड को

झेल नहीं पाई और वहीं बेहोश हो गयी...

जब सुबह उसकी आँख खुली तो वो बिस्तर पे नंगी लेटी हुई थी और उसके जिस्म में से वीर्य की बू आ रही थी...

वो जल्दी भागके टाय्लेट गयी और अपने आपको अच्छी तरह सॉफ करके बाहर निकली.. उसे उस वक़्त बस वहाँ से जल्दी से

भागना ही सबसे अच्छा उपाए लगा... उसने कपड़े पहने और अपना बक्सा लेकर वहाँ से चली गयी....

वो पूरे दिन सोचती रही कि कितनी देर तक दोनो गवार भईओ ने उसकी चूत को जमके चोदा होगा और कहीं उसकी

चूत में तो उन्होने अपना वीर्य तो नही डाल दिया होगा??

ललिता की ज़िंदगी में लंड की ऐसी बारिश होगी ये तो उसने सपने में भी नही सोचा था... भले ही उसे अभी इस बात पे रोना आ रहा हो मगर चुदाई के वक़्त उसे एक बारी भी इस बात के पछतावा नही होता... अब से उसके एग्ज़ॅम शुरू होने वाले थे और वहाँ रिचा से मिलना लिखा हुआ था.. तो क्या रिचा उसे सच सच सारी बातें बता देगी या फिर एक और फरेब होगा??

आने वाले दिनो में शन्नो के अंदर की सारी झिझक और शरम ख़तम हो गयी थी.... हर दिन चेतन उसको किसी ना

किसी तरह खुश कर देता था और जब वो नही होता था तो शन्नो उसको याद करते हुए खुश हो जाती...

दोनो बेटिओ के घर पे रहने की वजह से शन्नो को चेतन के साथ वक़्त बिताने का ज़्यादा मौका नहीं मिल रहा था...

कभी कभी चेतन उसको एक दम से डरा देता जैसे कि अचानक से नितंब पे चींटी नौच ना या उसके स्तनो को मसलना...

एक बारी तो वो रात में उसके कमरे में भी आ गया था मगर उसको चोद नहीं पाया था...

शन्नो को उस रात चेतन की उंगलिओ के जादू ने ही काफ़ी खुश कर दिया था और चेतन को अपनी मम्मी के मुँह ने...

डॉली और चेतन के बीच अब सब शांत हो गया था जिससे डॉली काफ़ी खुश थी मगर साथ ही साथ उसको अपने बॉय फ्रेंड

राज की कमी भी खल रही थी....वो जल्द से जल्द भोपाल जाके उसे मिलना चाहती थी मगर ये एग्ज़ॅम ने उसे रोक रखा था...

जब उससे वो बात करती वो खुशी के मारे पागल सी हो जाती और जब उससे बात ना हो पाती तो उसका मन एक दम

चिड़चिड़ा सा हो जाता.. वो बस जल्द से जल्द भोपाल जाने के लिए टिकेट करवाना चाहती थी ताकि वो अपने प्यार को देख पाए...

उसकी बहन ललिता की ज़िंदगी एक दम से रुक गयी थी.... गुज़रे हुए कुच्छ महीनो में उसने काफ़ी कुच्छ झेल लिया था...

परशु से चुद्ने के बाद उसने रिचा से ढंग से बात तक नहीं करी थी.... जब एग्ज़ॅम देने जाती तो वो रिचस से दूर दूर

रहती जिससे रिचा काफ़ी परेशान थी.... ललिता ने पूरे मन से सोच लिया था कि वो सिर्फ़ पढ़ाई और पढ़ाई पे ध्यान देगी मगर इसको ये एहसास होता रहता था कि कहीं उसके दिल के कोने में उसकी असली ख्वाहिशे जाग रही है जिनको वो ज़्यादा दिनो तक रोक नहीं पाएगी.....

क्रमशः…………………..

 
गतान्क से आगे……………………………………

उधर भोपाल में नारायण की ज़िंदगी काफ़ी रंगीन हो गयी थी... छुप छुप के मस्तिया करने में मज़ा ही कुच्छ और होता है और वो ही मज़ा नारायण को आने लगा था... रीत के वापस स्कूल आने के बाद नारायण से उसकी कोई ख़ास मुलाकात नहीं हुई क्यूंकी वो रश्मि के साथ ही लगा रहता था.... नारायण के कयि बारी कहने पर रश्मि ने स्कूल में थोड़े मॉडर्न कपड़े पहेन ने शुरू कर दिए थे और उसको ऐसे देख कर कयि स्कूल के टीचर्स/पीयान और यहाँ तक बच्चे भी मचल चुके थे..... कभी कबार जब वो स्कर्ट में होती तो नारायण उससे उसकी पैंटी उतरवा देता और खुली हवा का एहसास करवाता....

एक बारी कुच्छ दोपहर के 1 बज रहे थे और नारायण के कमरे में माहौल बड़ा रंगीन हो गया था....

रश्मि अपने बॉस को खुश करने के लिए उसके कॅबिन में गयी और उसकी कुर्सी के सामने और डेस्क के पीछे छुप के वो आराम से बैठके नारायण के लंड को चूस रही थी... नारायण को मस्ती तो बड़ी आ रही थी मगर असली मज़ा तब आया था जब सुधीर उसके कमरे में आया था.... एक आशिक़ के सामने उसकी महबूबा की बेशर्मी को देख कर नारायण पागल हुआ जा रहा था... सुधीर के कमरे में आने पर ही रश्मि ने भी अपना रॅनडिपना बढ़ा दिया था....

वो और मज़े लेके नारायण के लंड को चूसे जा रही और बिचारा नारायण किसी तरह अपने मज़े को च्छुपाने की

कोशिश कर रहा था... सुधीर ने नारायण से रश्मि के बारे में भी पूछा और उसने कुच्छ ना कुच्छ झूठी कहानी बना दी.... जैसी ही सुधीर वहाँ से निकला नारायण को राहत की साँस मिली और फिर अपना वीर्य अपनी नयी कुत्ति पे डाल दिया...

उसके अगली सुबह दिल्ली में दोनो बहनो का एग्ज़ॅम था और वो मौका था शन्नो और चेतन के पास माहॉल हसीन बनाने का मगर

वो सब चौपट हो गया जब उसकी शन्नो ने चेतन को बताया "आज मेरी बहन यानी के तुम्हारी आकांक्षा मासी आ रही है

तो प्लीज़ उसके रहने तक तुम कुच्छ हरकत नहीं करना" ये बात भी चेतन को काफ़ी देर में पता चली जिस वजह

से वो शन्नो से सुबह अपना लंड नहीं चुस्वा पाया और उस वजह से वो काफ़ी खफा भी था...

शन्नो की 2 बहने और भाई थे और उनमें से सबसे छ्होटी बहन आकांक्षा थी जोकि देहरादून में रहती थी....

वो दिल्ली आई हुई थी कुच्छ काम के सिलसिले में और ताकि वो अपनी बहन के जाने से पहले एक बारी मिल ले....

वैसे भी काफ़ी अरसे से उनकी मुलाकात नहीं हुई थी और शन्नो नही चाहती थी ये मुलाकात किसी भी तरह खराब हो जाए

तो इसलिए वो चेतन को समझा रही थी.... चेतन का भी यहाँ रुकने मैं कोई फ़ायदा नहीं था और उसने शन्नो की

परेशानी हल कर दी और वो चंदर से मिलने चला गया...
 
फिर शन्नो ने जल्दी से खाना चढ़ाया और नहा के तैयार हो गयी....उसने सारा खाना अपनी बहन की पसंद का बनाया

और वो बस उसके आने का इंतजार कर रही थी.... कुच्छ 11 बजे घर की घंटी बजी और चेहरे पे बड़ी मुस्कान लिए

वो दरवाज़ा खोलने गयी... अपनी बहन आकांक्षा को देख कर वो काफ़ी खुश हो गयी थी... आकांक्षा का असली नाम कौशल था

मगर उसने शादी के बाद अपना नाम बदल लिया था.... शन्नो आकांक्षा से गले मिली और उसको घर के अंदर लेके आई.... आकांक्षा आके सोफे पे बैठी और पूछा "दीदी बच्चे कहाँ है?? कितना समय हो गया उन्हे देखे हुए...

अब तो काफ़ी बड़े भी हो गये होंगे"

शन्नो ने कहा "बस स्कूल गये है... डॉली और ललिता का तो एग्ज़ॅम है और बेटा भी एग्ज़ॅम के सिलसिले में दोस्त के पास

गया है...अच्छा है ना हम दोनो को बात करने का समय मिल गया"

दोनो ने ढेर सारी बात करी और फिर शन्नो ने फिर से वोई बात छेड़ दी जिसको उसकी बहन सुनना नहीं चाहती थी "

आकांक्षा अभी भी तूने उस बारे में नही सोचा है"

"किस बारे में दीदी" आकांक्षा अंजान बनके बोली

शन्नो ने कहा "तू जानती है मेरा क्या मतलब है... शादी के बारे में"

आकांक्षा बोली "दीदी आप प्लीज़ फिर से ये बात शुरू ना करो"

शन्नो गुज़ारिश करते हुए बोली " मैं मानती हू जो हुआ वो ग़लत हुआ... रोहित (उसका पति) तुम्हे छोड़के गया उसमें

तुम्हारी कोई ग़लती नहीं थी मगर देखो तुम्हारा एक छोटा बेटा है जिसको बाप की ज़रूरत है... तुम अगर नहीं

भी करना चाहती तो कम से कम उसका तो सोचो... उसको भी बाप क्या प्यार चाहिए होता होगा "

(हुआ ऐसा था कि आकांक्षा की शादी रोहित नाम के शक़्स से हुई थी.... दोनो ने एक अपने परिवार से लड़ झगदके शादी

करी थी .... शादी के बाद रोहित ने आकांक्षा के साथ बहुत एंजाय

करा मगर बच्चे होने के कुच्छ महीने बाद ही वो उसे दूसरी औरत के लिए छोड़ कर भाग गया और इसी वजह

आकांक्षा ने दूसरी शादी नहीं करी...)

आकांक्षा चिढ़ के बोली "इसलिए मैं आप में से किसी से भी नहीं मिलना चाहती... जब देखो शादी शादी करते रहते हो...

नहीं मुझे करनी शादी किसी से भी"

शन्नो आकांक्षा को गुस्से में देख कर चुप हो गयी और उसको शांत करने में लग गयी... कुच्छ देर बाद आकांक्षा का

गुस्सा शांत हो गया जिससे शन्नो को काफ़ी राहत मिली...

फिर कुच्छ 12:15 बजे घर की घंटी बजी और शन्नो को लगा कि ये उसका बेटा चेतन ही होगा... शन्नो के दिल में हल्की

घबराहट छाई हुई थी...
 
.चेतन को देख कर शन्नो ने कोशिश करी कि सब कुच्छ साधारण सा लगे...

उसने दरवाज़ा खोला तो चेतन घर में आया और आकांक्षा को देखा... आकांक्षा उसको देख कर सोफे से खड़ी हो

गयी और बड़ी खुशी से उसे मिली... आकांक्षा ने चेतन के गाल को हल्के से चूम लिया जिसको देख कर शन्नो को अच्छा

नहीं लगा... आकांक्षा अब पूरी तरह शन्नो से हुई उस बहस को भूल गयी थी और चेतन से खुश होकर

बातें करने लगी... चेतन भी दोनो बहनो को देखकर काफ़ी सोच में पड़ा हुआ था... उसकी मा शन्नो और आकांक्षा

में कुच्छ ख़ास अंतर नहीं था... दोनो के चेहरा सफेद और खूबसूरत था.. उसके बाल शन्नो के बालो से काफ़ी छोटे

थे यानी कंधे तक आते थे...जिस्म काफ़ी हद तक एक जैसे थे बेसक आकांक्षा थोड़ी पतली थी मगर उसके मम्मो और

नितंब का साइज़ शन्नो के मुक़ाबले का ही था... आकांक्षा की उम्र वैसे तो 38 थी मगर वो कुच्छ 34-35 तक लग रही थी

क्यूंकी उसका पहनावा भी आंटिओ वाला नहीं था.... आकांक्षा ने एक गहरे ब्राउन रंग का टॉप पहेन रखा था उसका अंदर

एक सफेद रंग की नूडल स्टाप बनियान और नीचे घुटनो से लंबी काली स्कर्ट थी.... चेतन को नही लगता था कि उसकी मासी इतनी मॉडर्न है...

शन्नो अपनी बहन को चेतन के साथ अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी मगर बार बार उठ कर प्रेशर कुक्कर की सीटी

बंद करने के लिए उठ रही थी क्यूंकी वो अपने आप बंद नही हो रही थी.... चेतन शन्नो के साथ लंबे वाले सोफे पे

बैठा था और उसके सीधे हाथ वाले छोटे सोफे पर उसकी मासी आकांक्षा थी... आखरी में जब शन्नो गॅस बंद

करके आई तो चैन की साँस लेके सोफे पे बैठी.... चेतन आकांक्षा से बात करकरके काफ़ी बोरा हो चुका था तो उसने अपना

सीधा हाथ अपनी मम्मी की कमर की तरफ रख दिया... धीरे धीरे वो अपना हाथ उसपे फेरने लगा... आकांक्षा को

वो हाथ दिखाई नही देने वाला था जिसका फ़ायदा चेतन उठा रहा था... शन्नो के काले कुर्ते पीछे से थोड़ा उठाकर

चेतन ने अपना हाथ उसकी पीठ के निचले हिस्से पे रख दिया..... शन्नो के चेहरे पे हल्की सी शिक्कन छा गयी थी जोकि

आकांक्षा को ज़ाहिर हो रही थी.... चेतन को उससे कोई मतलब नहीं था वो अपना हाथ शन्नोकी नंगी कमर पे

फेरे जा रहा था... फिर एक कदम और आगे बढ़ के चेतन ने अपना हाथ शन्नो की सलवार में घुसाने की कोशिश करी...

शन्नो की सलवार नाडे से बँधी हुई थी मगर चेतन रुकने का नाम ही नही ले रहा था... जब भी वो हाथ अंदर घुसाने

की कोशिश करता शन्नो को नाडे की वजह से दर्द होता और वो काप जाती.... चेतन अपने मकसद में कामयाब हो गया

और शन्नो की सफेद पैंटी के अंदर उंगली डालके शन्नो के नितंब के बीच वाले हिस्से की उपरी तरफ अपनी उंगली चलाने लग गया....
 
वो उंगली सबसे उपरी हिस्से पे हिल रही थी जिस वजह से शन्नो को गुदगुदी सी होने लगी....

वो मदहोश हो चुकी थी और वो अब और रुक नहीं सकती थी... अपने आपको बचाने के लिए वो वहाँ से उठी और टाय्लेट के बहाने वहाँ से भाग गयी.... चेतन भी वहाँ से उठ कर अपने कमरे में चले गया...

खाना खाने के वक़्त आकांक्षा ने शन्नो को कहा "चेतन से पुछ लो खाने के लिए"

शन्नो ने बोला "वो नहीं खाएगा ना... हम दोनो खाते है"

आकांक्षा बोली "मेरा तो ख़तम हो ही गया है... तो मैं पुछ लूँ उससे?? आप खाना खाओ"

शन्नो ने आकांक्षा को वही रोका और उठ कर चेतन के कमरे की तरफ गयी.... शन्नो ने जब दरवाज़ा खोला तो चेतन ने एक दम से उसे अंदर की तरफ खीच लिया और उसके बदन को चूमने लग गया....

शन्नो दबी आवाज़ में बोलने लगी "तुम्हारी मासी है बाहर... छोड़ो मुझे प्लीज़ छोड़ चेतन" और

चेतन ने शन्नो को जाने दिया... चेतन के ऐसे बर्ताव से शन्नो बेहद परेशान थी मगर फिर जब चेतन ने उसे अपनी

गिरफ़्त से आज़ाद कर दिया तब क्यूँ उसका बदन आज़ाद होना नहीं चाह रहा था.... परेशान शन्नो वहाँ से निकली और

अपनी बहन के पास जाके बैठ गयी... आकांक्षा को ऑफीस से कॉल आया और उसे दोपहर की मीटिंग के बारे में याद

दिलाया जो वो एक दम भूल गयी थी... मीठा खाने का बाद शन्नो सारा समान किचन में रखने गयी...

चेतन अपने कमरे के बाहर निकला और किचन में घुसते ही शन्नो के नितंब पे हाथ फेरता हुआ गुज़रा....

शन्नो शरम से पानी पानी हो रही थी... चेतन को अपनी मा पर ज़रा भी दया नहीं आई और उसकी गान्ड पे उसने ज़ोर

से चींटी मार दी... शन्नो अंदर ही अंदर ज़ोर से चिल्लाई और फिर टाय्लेट में चली गयी... उसी दौरान आकांक्षा के

फोन पे फिर से ऑफीस से कॉल आया और उसे जल्दी ऑफीस में आने को कहा... शन्नो टाय्लेट के अंदर अपनी सलवार खोलके अपने नितंब को देखने लगी जिसपे एक लाल निशान पड़ गया था... इन्न सारी हर्कतो की वजह से उसकी चूत गीली हो चुकी थी...

शन्नो अब आकांक्षा के सामने नहीं जाना चाहती थी तो उसने आकांक्षा को जाने के लिए कह दिया और आकांक्षा भी जल्दी

जल्दी में चेतन से मिलकर वहाँ से चली गयी...

जब घर का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई तो चेतन टाय्लेट के दरवाज़े को धीरे धीरे खटखटाने लग गया... वो बोला

"मा टाय्लेट में क्या चल रहा है.. वो भी अकेले अकेले??" ये बोलके वो हँसने लग गया.... फिर वो बोला "अच्छा ग़लती हो गयी थी... मैं रोक नही पाया था अपने आपको... दरवाज़ा खोलो ना"

शन्नो ने दरवाज़ा खोला तो चेतन उसे देख कर बोला "इतनी गरम हो गयी थी कि सलवार भी उतारनी पड़ी.??"

शन्नो ने ये सुनके अपनी सलवार को ज़मीन से उठाया.... चेतन ने सलवार को दूसरी तरफ से पकड़ा और उसको खीचता

खीचता किचन में ले आया... किचन में आके शन्नो ने सलवार को छोड़ दिया और नीचे सिर्फ़ सैफैद रंग की पैंटी में

खड़ी रही....
 
चेतन शन्नो के पास बढ़ा और अपने सीधे हाथ की सबसे बड़ी उंगली अपनी मम्मी की चूत में पैंटी

समैत घुसा दी... दर्द के मारे शन्नो अपने बेटे से लिपट गयी और चेतन उल्टे हाथ से शन्नो के नितंब को दबाने लगा... चेतन ने अपनी उंगली शन्नो की चूत में से निकाली और शन्नो को किचन की स्लॅब के सहारे खड़ा कर दिया...

शन्नो की चूत को कच्छि से आज़ाद करके चेतन ने अपनी जीन्स उतारी और शन्नो की चूत चोद्ने लग गया...

धीरे धीरे अपनी मा की चूत चोद्ने लगा और उसने अपनी टी-शर्ट भी उतार दी.... चेतन ने शन्नो को बोला

"अपनी सलवार उतारो मम्मिजान.. मैं तुम्हे पूरा नंगा देखना चाहता हूँ"

जब भी चेतन ऐसी बातें करता था शन्नो के चेहरे पे गुस्सा नहीं बल्कि और खुमारी छा जाती थी...

शन्नो ने हिम्मत दिखाकर अपनी किचन की स्लॅब को छोड़ा और चेतन के लंड के सहारे खड़ी रहके अपनी सलवार

को उतार दिया.... चेतन ने शन्नो के पेट को जकड़ा और उसे उसी पोज़िशन में चोद्ता रहा...

फिर चेतन के दिमाग़ में एक और गंदा ख़याल आया... उसने शन्नो को किचन की स्लॅब पे बैठने को कहा....

शन्नो पहले स्लॅब पे चढ़ि और उसपे टाय्लेट करने की पोज़िशन में बैठ गयी... उसकी गान्ड हवा में थी और उसकी

कमर को पकड़ के चेतन ने अपनालंड शन्नो की चूत में फिरसे डाल दिया.... ऐसे चुदाई करवाने मे शन्नो को बहुत मज़ा

आ रहा था.. चेतन ने उसको चोद्ते हुए पूछा "क्या ऐसे कभी चोदा भी है पापा ने" शन्नो बोली

"तुम हमेशा ऐसी शरम्नाक चीज़े करवाते हो मुझसे"

चेतन ये सुनके और तेज़ी से चोद्ने लग गया... अपना सीधा हाथ बढ़ाते हुए उसने शन्नो की ब्रा के हुक्स को खोला जोकि

नीचे गिर गयी... शन्नो के मम्मे हवा में आज़ाद कूदने लगे.... शन्नो ने अपनी नज़रे नीचे की तरफ की

तो उसके बेटे का लंड उसकी गीली चूत में अंदर बाहर हो रहा था... पूरे ड्रॉयिंग रूम मे सिसकिओं की आवाज़ छाई हुई थी...

किसिको बाहर की दुनिया से कुच्छ नहीं लेना देना था....

मगर फिर एक चीख आई जो कि शन्नो के कानो को चीरते हुए गुज़री

मगर फिर एक आवाज़ शन्नो के कानो को चीरते हुए गुज़री " डिदीईईईईईई"

शन्नो ने मूड के देखा तो उल्टे हाथ की तरफ एक दम कोने में दो सोफो के बीच में उसकी बहन उसे चुद्ते

हुए देख रही थी और वो भी अपने खुद के बेटे से.... शन्नो वही पर ही शरम के मारे मर गयी मगर चेतन को

कुच्छ असर नहीं पड़ा.. वो अभी भी अपनी मा को चोदे जा रहा था...

"चेतन छोड़ो मेरी बहन को... तुम्हे शरम नही आती अपनी मा के साथ ऐसा करते हुए... पहले अपनी मासी के हाथ

पाँव और मुँह बाँध दिया ताकि वो तुम्हे कुच्छ बोल ना पाए और तुम अब अपनी मा से बदतमीज़ी कर रहे हो"

आकांक्षा ने चेतन को गुस्से में बोला...
 
ये सुनके चेतन शन्नो को चोद्ता चोद्ता रुक गया... उसका लंड अभी भी शन्नो की चूत में घुसा पड़ा था मगर

वो उसे हिला नहीं रहा था.... "क्या तुम्हारी दीदी भी यही चाहती है.. क्यूँ मम्मी??" चेतन ने आकांक्षा को देखकर

शन्नो से पूछा मगर शन्नो इस बात का कोई जवाब दे नहीं पाई... उसकी बहती हुई चूत ही उसका सारा हाल

बयान कर रही थी.... चेतन फिर से शन्नो को चोद ने लगा और आकांक्षा उसे रोकने को कहती रही...

शन्नो आकांक्षा से बिनति करते हुए बोली "प्लीज़ इधर मत देखो आकांक्षा प्लीज़ मुझे मत देखो"

आकांक्षा बोली " जानवर हो आप दोनो... आपको शरम नहीं आती.... आपकी दो बेटियाँ है एक अच्च्छा पति है तब भी

आप ये सब होने दे रही है"

शन्नो ने ना चाहते हुए भी चेतन को रुकने के लिए कह दिया... मगर चेतन तब भी नहीं रुका और बोला

"मुझे क्या मिलेगा रुकने पर"

कुच्छ देर दोनो बहने कुच्छ नहीं बोल पाई और फिर आकांक्षा ने हिम्मत दिखाते हुए कहा "अगर तुम मेरी बहन को अकेला छोड़ दोगे तो मैं अपने आपको तुम्हे सौप दूँगी..."

ये सुनके शन्नो बोली "पागल हो गई है क्या आकांक्षा"

चेतन ज़ोर से हँस पड़ा और बोला " अपने आपको सौपने का मतलब"

शन्नो चेतन को बोलने लगी तुम "मेरी बहन से मत बात करो... तुम मुझे चोद लो जितना चाहो"

आकांक्षा शन्नो को ऐसी हालत में परेशान देखकर बोली "मैं तुम्हे अपने आपको चोद्ने को दूँगी अगर तुम अभी

मेरी बहन को आज़ाद करते हो"

चेतन एक दम वही रुक गया और अपना लंड जोकि शन्नो की चूत से गीला पड़ा था निकालकर आकांक्षा की तरफ बढ़ा....

शन्नो किचन पे फर्श पे आधी लेटी हुई थी... वो अपने बेटे को अपनी बहन के पास नंगा जाते हुए देख रही थी...

क्रमशः…………………..

 
गतान्क से आगे……………………………………

चेतन ने अपनी ताक़त दिखाते हुए सोफे को धक्का देते हुए हटाया और आकांक्षा को वहाँ बैठे हुए

लाचार देखने लगा... वो फर्श पे बैठा और अपने सीधे हाथ से आकांक्षा के मम्मो को हल्के से दबाया...

उस चुअन के असर की वजह से आकांक्षा ने अपनी आखें बंद करली... चेतन ने अपनी मासी की काली स्कर्ट उठाया और

उसकी मलाई जाँघो को देखने लगा...अपना हाथ उन जाँघो पे वो फेरने लगा और आकांक्षा की टाँगें कापने लगी....

उसने आकांक्षा की स्कर्ट और उठाया और उसकी चूत एक पीली रंग की पैंटी से धकि हुई थी और पीला रंग काफ़ी

हल्का होता है जिस वजह से चेतन को अपनी मासी की चूत की नमी सॉफ दिखाई दे रही थी और बोला

"अपनी बहन को चुद्ते हुए देख काफ़ी गीली हो गई है आपकी चूत मासी"

अपनी उगली वो आकांक्षा की चूत पे उपर नीचे करने लग गया... जब उसे आकांक्षा पे पूरा भरोसा हो गया तो

उसने उसकी टाँग पे बँधी रस्सी को खोल दिया और उसको कोने से उठाकर थोड़ा बाहर की तरफ ले आया....

आकांक्षा के चेहरे पे घबराहट, उत्सुकता, डर, रोना सब झलक रहे थे मगर चेतन को किसी चीज़ की कुच्छ

परवाह नहीं था.... चेतन ने आकांक्षा की सीधी टाँग को पकड़ा और उसको चूमने लग गया और चूमता चूमता

उसकी जाँघो तक पहुच गया... अपने उल्टे हाथ से चेतन शन्नो के मम्मो को दबाने लग गया...

आकांक्षा के नज़रे चेतन के लंड पे थी जोकि फिर से बड़ा होने लगा था... चेतन ने आकांक्षा की नज़रो को अपने लंड पे

देखा और हँस कर बोला "क्या चूसने का मन है" ये कहकर अपना लंड आकांक्षा के मुँह की तरफ ले गया और

आकांक्षा ने ना चाहते हुए भी अपना मुँह खोला और चेतन के लंड को अपने मुँह में लिया... धीरे धीरे उसने चूसना

शुरू करा और फिर अच्छे तरीके से लंड को चूसने लगी... चेतन आकांक्षा को देख कर बोला

"अपनी पति के बाद कितनो के लंड को चूस चुकी हो क्यूंकी इसमे तो तुम मा से बेहतर हो" आकांक्षा को ये सुनके शरम

भी आई और अजीब सी खुशी भी मिली... उसने जवाब नहीं दिया और बस लंड चूस्ति रही....

चेतन का लंड ढकने लगा तो उसने अपने लंड को आकांक्षा के मुँह से आज़ाद कराया और आकांक्षा को खड़े होने को कहा....
 
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