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दूध ना बख्शूंगी/ complete

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जाने किस झुंझलाहट में विजय ने स्टेयरिंग पर बहुत जोर से घूंसा मारा-----दाई तरफ का ट्रेफिक इस वक्त चौराहे पार गुजर रहा था-----------एकाएक ही विजय की नजर रघुनाथ की किराए वाली कार पर पड्री-----वह दाई तरफ के ट्रैफिक के-साथ चौराहा पार करके विजय के ठीक सामने वाली सडक पर मुडना चाहती थी ।

"विजय को जाने क्या हुआ कि, उसने एक झटके से गाडी गियर में डाली-----फिर लाल बत्ती के बावजूद विजय की कार अर्जुन के तीर की तरह सर-र्र र्र से रघुनाथ की कार की तरफ़ लपकी ।

अभी कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि 'ध्रड़ाम' ।

एक कर्णभेदी विस्फोटा हुआ विजय की कार का अगला हिस्सा ठीक रघुनाथ की कार के बीच में जा टकराया---रधुनाथ की कार के इस दिशा के दोनों पहिए हवा में उठे…दूसऱी तरफ के दोनों पहियों पर कार विपरीत दिशा में कुछ दूर तक धिसटती चली गई----फिर उलट गई ! और उलटते ही एक और पलटा खाकर कार सीधी हो गई ।

रघुनाथ की कार का बीच का हिस्सा पिचक गया था ।

विजय की कार के बोनट ने मुंह फाड़ दिया----------मुह फाडे कार फिर रघुनाथ की कार की तरफ बढी, मगर इस बार रघुनाथ की कार ने भी बडी तेजी से दोड़कर अपना स्थान छोड दिया है !

कुछ आगे बढकर सम्भली-घूमी और इस बार वह कार भी आक्रामक रुख अपनाकर विजय की कार की तरफ लपकी विजय की कार ने कन्नी काटी, मगर फिर भी कारें टकरा ही गई !!

इसके बाद----!

खुले-चौराहे पर कारों का युद्ध का बडा ही अजीब और रोमांचकारी दृश्य उपस्थित हो गया ॥

-चौराहे पर उन दो कारों के अतिरिक्त कुछ नहीं था…हर वाहन अपनी-अपनी दिशा में खड़ा उस रोगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देख रहा था ।

मानो एक साथ, हर तरफ की सिर्फ लाल बत्ती ही आंन हो उठी हो ।

घुम घूमकर कारे एकं दूसरे से टकरा रहीं थीं…धमाके गूंज रहे थे--दोनों की ही बॉंडियां बुरी तरह-पिचक गई थी-य-देखने बाले दिल थामे उस भयानक दृश्य को देख रहे थे ।

फिर एंक बार ॥॥॥

रघुनाथ की कार दूर तक लुढ़कती चली गई---------जब रुकी तब सीधी खड़ी थी…पर उसमें आग लग चुकी थी----कार के सीधी होते ही उसके दो दरवाजे एक साथ खुले--एक में से स्वयं रघुनाथ ने बाहर जम्प लगाई, दूसरे से तबस्सुम ने…. तबस्सुम का हाथ पकड़कर रघुनाथ ने चौराहा पार करने के लिए एक तरफ़ को दोड़ना शुरू कर दिया-------

लेकिन अभी वे मुश्किल से पांच कदमं ही दौड सके थे कि….....

विजय की कार ने उनका रास्ता रोक लिया ।

बौखलाए से वे ठिठक गए…पलक झपकते ही कार का दरवाजा खुला और उनके सामने प्रकट होकर विजय किसी जिन के समान खडा था !

रघुनाथ कह उठा-----'त.......तुम?”

“हां---- मै ।” कहने के साथ ही विजय, ने उछलकर एक जबरदस्त घूंसा रघुनाथ के जबड़े पर मारा-------मुँह से चीख निकली, पैर जमीन से उखड़ गए----हवा में लहराकर वह दुर-सड़कं पर जा गिरा ।

कुछ दूर तक घिसटता चला'गया रघुनाथ! !!!!!

रुका-अपनी तरफ़ से काफी जल्दी सम्भलकर खड़ा होगया , लेकिन विजय ने झपटकर दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड़ लिया…दांत भीचकर गुर्राया-----"तुम भले ही तुलाराशि सही-भले ही रैना बहन के सुहाग सही, लेकिन तुम्हें बेजबान मोन्टो की एक-एक बूंद का हिसाब देना है होगा रघुनाथ ------मरते समय अपने ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने का वचन भी जो किसी से नहीं ले सकता था…उसी मोन्टो की कसम-------- उसकी चिता के साथ ही तुम्हें भी जलाकर राख कर दिया जाऐगा !"

रघुनाथ ने संभलकर कहने की कोशिश की-"वं.,.वह जानवर...!"

विजय के सिर की टक्कर "भड़ाक' से उसकी नाक पर पडी…वातावरण में रघुनाथ की बिलबिलाहटयुक्त चीख गूंजती चली गई…उसकी नाक फट गई थी------सारा चेहरा खून से पुत गया-बह्र सडक पर पड़ा. चीख रहा था, जबकि विजय गुर्रया--------------"उससे बड़े जानवर तो तुम हो तुलाराशी !"

फिर-विजय पर मानो खून सवार था--------------वह बराबर आक्रामक रुख अपनाए था, जबकि रघुनाथ की सारी शक्ति उसके वारों से खुद को बचाने की असफल कोशिश में ही जाया हो रही थी--------------चौराहे पर ऐसी जबरदस्त फाइटिंग हो रही थी कि देखने बालों ने किसी फिल्म मे भी नही देखी थी ।

एक तरफ़ खडी तबस्सुम थरथर कांप रही थी ।

रैना ने दूर ही से देख लिया कि वाहनों की जबरदस्त भीड ने सारा रास्ता ब्लॉक कर रखा है-----कार की तो बात ही दूर---किसी साइकिल तक के पार निकल जाने की जगह तक नहीं थी--विवश रैना को भीड के इस सिरे पर कार रोकनी पडी--पहले उसने सोचा था कि ये सब वाहन रैड लाइट के कारण रूके पड़े हैं, मगर जल्दी ही उसका भ्रम टूट गया ।

हऱ कोई अपने वाहन के ऊपर खड़ा चौराहे की तंरफ देख रहा था !

रैना ने भी ऐसा ही किया और जब उसने चौराहे का दृश्य देखा तो दहल उठी-अपनी कार के बोनट पर खडी वह वहीं से चीख पडी…"र...रूकी जाओ विजय भइया?"

भीड ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

किन्तु विजय ने मानो वह आवाज सुनी ही नहीं।

रैना कार से कूदी----भीड़ ने काई तरह फटकर उसे जगह दी------चीखती-चिल्लाती वह वाहनों के बीच में से गुजरती हुई चौराहे पर पहुँची ।

वह बार-बार विजय को रुक जाने के लिए कहती हुई विजयं और रघुनाथ की तरफ बढी…दिजय ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा ।

इसी क्षण--रघुनाथ ने उछलकर एक फ्लाइंग किक उसके सीने पर जड़ दी----पहली बार विजय अपने मुंह से चीख निकालता हुआ सडक पर जा गिरा…रघुनाथ सम्भाला-अवसर मिलते ही वह अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाल चुका था-रैना उसकी तरफ वढ़ रही थी ।

उसने हैना पर भी रिवॉल्वर तान दिया ।

ठिठककर रैना चीख पडी------"आप क्या कर रहे हैँ…क्या बेवकूफी हे…आप विजय भइया को सब कुछ बता क्यों नहीं देते कि...........!"

विजय की ठोकर ने रघुनाथ को उठाकर दूर फेक दिया ।
 
मगर रघुनाथ ने अपने हाथ में दबे रिवॉल्वर को नही निकलने दिया-सड़क पर गिरते ही उसने विजय पर फाॅयर किया--विजय फूर्ती से हवा में उछलकर स्वयं..को बचा गया… रघुनाथ ने एक ही क्षण बाद रिवॉल्वर घुमाकर रैना पर फाॅयर कर दिया। परन्तु-विजय पहले ही रैना को एक तेज धक्का दे चुका था ।

एक चीख के साथ रैना लड़खड़ाकर सड़क पर गिरी-गोली हवा में सन्नाकर रह गई, लेकिन रघुनाथ ने दूसरे फाॅयर के लिए रिवॉल्वर सीधा किया-इस बीच अपनी जेब रिवॉल्वर निकाल कर विजय चीख पड़ा-"रुक जाओ रघुनाथ-बरना... ।"

"धांय..धांय !"' एक साथ दो फायर !

पहला रघुनाथ के रिवॉल्वर से-दूसरा विज़य के । रघुनाथ का निशाना चूक गया था, यानी रैना को गोली नहीं लगी, परन्तु विजय का निशाना चूकने का तो कोई मतलब ही नहीं था-दहकता हुआ अंगारा रघुनाथ के दिल में जा

धंसा-एक मर्मान्तक चीख गूंजी-जिस्म उछला-रिवॉल्वर वहीं रह गया--उछलकर जिस्म जव सडक पर गिरा तो--- !"

उसमें कोई हरकत नहीं थी…बिल्कुल निश्चल पड़ा रहा ।

हाथ में रिवाॅल्वर लिए विजय ठगा-सा खड़ा था…रैना मानो अचानक ही किसी संगमरमरी मूर्ति में बदल गई-आंखें फाड़े वे दोनों सड़क पर पड़े रघुनाथ के जिस्म को देख रहे थे, जख्म से गाढा-लाल और गर्म खून तेजी से बह रहा था… सारी सड़क रंगती चली गई ।

चारो तरफ भयावह खामोशी' छा गई, जबकि.............

"स, ..स्वामी!” उस खामोशी के बीच रैना की चीख अंधेरे में अग्निशिखा के समान उभरी-वह दोड्री-----करीब पहुंची----ठोकर लगी----------लहराकर वह ठीक रघुनाथ के जिस्म पर जा गिरी----- फुर्ती से उसने रघुनाथ की नब्ज टटोली-स्पन्दनहीन------------अगले ही क्षण रैना की दहाड------“न...नही !"

ठगे से खडे विजय के हाथ से रिवॉल्वर’ छूटकर सडक पर गिर गया।"

“स. . .स्वामी.…स्वामी!" दहाड़कर रैना ने अपनी दोनों कलाइयों को सड़क पर दे मारी--------खनखनाकर चूडियाँ टूट गईं ! चारों तरफ कांच झनझनाया--लाश के चारों तरफ़ चूडियों के दुकड़े बिखर गये------रैना का रुदन देख लोगों के रोगटे खडे हो गये --------------जिन्दगी में पहली बार विजय ने अपनी टांगों मे हल्का-----सा कम्पन महसूस किया ।

उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ही इतनी तेजी से यह क्या हो गया…अभी ठीक से वह कुछ सोच भी नहीं पाया था कि अचानक ही रघुनाथ की लाश के पास रुदन करती हुईं रैना उसकी तरफ. देखकर चीख पडी----ये तूने क्या कर दिया कमीने…...इन्हें मार डाला-----अपनी बहन का सुहाग उजाड दिया?"

अर्द्धविक्षिप्त सी रैना चीखती हुई उसकी तरफ़ बढी ।

विजय हिला तक नहीं ।

समीप पहुचते ही रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा-बुरी तरह झंझोड़ती हुई चीखी-हरामजादे----कमीने---- ये तूने क्या किया---------बोल-बोल !"

"म...मगर रैना बहन-इसने हमारे मोन्टो को… ।"

"वह झूठ था-गलत था-मोन्टो नहीं मरा है कुत्ते!" रैना पागल-सी चीख पडी…"वह इनकी चाल थी---वह इकबाल भी नही बने थे----- एक्सीडेण्ट के बाद कुछ भी नहीं हुआ था इन्हें ।"

“क. .क्या?" विजय के पैरों तले से धरती खिसक गई ।

“मोन्टो जिन्दा है।"

बौखलाकर विजय चीख पड़ा-----"न...नहीँ!"

"म.......मगर तुने इन्हें मार डाला---खुद को सबसे ज्यादा चालाक समझता था न तू…इनकी छोटी-सी चाल को नहीं समझ सका…मुजरिमों तक पहुचने के लिए ही ये इकबाल बने थे-अपने पद से इस्तीफा देना---. तलाक देना…मोन्टो को मारना-सब एक चाल थी मुजरिमो तक पहुंचने के लिए इनकी चाल !"

"न-नहीं-नहीं!" विजय मानो सचमुच पागल हो गया-- "त.. .तुला राशि चाल नहीं चल सकता-म..मै घोखे मे नहीं आ सकता--ये गलत है-रैना बहन-ये गलत है ।"

"ये...यह ठीक है कुत्ते-----म.....मगर तूने मेरा सुहाग उजाड दिया ।" कहने के साथ रैना-उसका गिरेबान छोड़ेकर सडक पर पडे रिवॉल्वर पर झपटी-पलक झपकते ही उसने रिवॉल्बर उठाया -------और सिंहनी के समान गुराई-“म...मैं तुझे जिन्दा न ... ।"

" र-रैना-मेरी बात नो सुनो रैना बहन !"

"अपनी नापाक जुबान से मूझे बहन मत कह कुत्ते-मत कह ।" कहने के बाद थरथराती हुई रैना ने अन्धाधुन्थ फायरिंग शुरू कर दी-------मगऱ संग आर्ट का माहिर विजय ठीक किसी बन्दर की तरह उछत्त-उछलकर खूद को बचा गया-रिवॉत्वर पूरा खाली हो गया------इसके बावजूद रैना ने जब विजय को सामने खड़े देखा, तो उसने रिवॉल्वर ही खीच मारा------विजय झुका !॥॥॥

रिवॉल्वर उंसके सिर के ऊपर से गुजर गया।

यहीं क्षण था, जबकि वातावऱण मे पुलिस सायरन की आवाज गूंज उठी----विजय बौखला गया…सचमुच उसकी समझ में यह नहीं आया कि ये सब क्या हो गया हे-इतनी तेजी से और इतनी महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने घटकर सचमुच उसे हड़बड़ा दिया था------------विजय की जिन्दगी का ऐसा शायद यह "पहला ही" अवसर था, जबकि वह इतनी बूरी तरह से चकराया ! ! !

पुलिस सायरन की आवाजं ने दिमाग में बिजली की तरह सिर्फ एक ही विचार कौधा…"भाग विजय-भाग जा-तूने सुपर रघुनाथ की हत्या कर दी है----किसी बहुत ही बड़े और चालाक मुजरिम की साजिश का शिकार हो गया है तू-----भाग---भाग जा?

चीखती-चिघाडती रैना ने उसके चेहरे पर घूंसा जड़ दिया ।

एक चीख के साथ विजय लड़खड़ाया ।

उधर-वाहनों की भीड़ काई के समान फटी-एक 'जीप बड्री तेजी से चौराहे पर आकर सकी---पुलिस फोर्स के साथ उसमें से ठाकुर साहब कूदे-होलस्टर से रिवॉत्वर निकाला, विजय की तरफ तानकर गरजे…"हाथ ऊपर उठा लो विजय--यदि भागने के लिए एक कदम भी बडाया तो हम तुम्हें गोली मार-देगे!"

बोखलाया सा विजय उनक्री तरफ़ घूमा ।

रैना चीख पड्री-----"इसे मार डालो चाचा जी-इसने आपके को दामाद को गोली से उडा दिया है।"

"क...क्या?" ठाकुर साहब ने चौंककर रैना की तरफ देखा ।

यही वह क्षण था, जबकि विजय ने 'चीते की तऱह झपटकर न सिर्फ ठाकुर साहब से रिवॉल्वर छीन लिया, बल्कि किसी के कुछ समझने से पहले ही रिवॉल्वर उनकी कनपटी पर रखकर . . गुरर्रया-यदि कोई भी हिला तो मैं ठाकुर साहव को गोली मार दूगा-हटो, रास्ता दो ।"

ब्लेड की धार-सा सन्नाटा ।

ठाकुर साहब बिफर पड़े-----“यू ब्लडी फूल-ष्ट-ईडियट !"

"हिलो मत बापूजान! " विजय दात भीचकर गुर्राया-'"जौ अपनी वहन का सुहाग उजाड़ सकता है, उसके लिए बापूज्ञान . की खोपडी में छेद कर देना कठिन काम नहीं है।”

" यू चीट! " ठाकुर साहब कसमसा उठे…“तुम बच नहीं . सकोगे !"

"फिलहाल तो अपनी फिक्र कीजिए डैडी प्यारे!“ विजय ने कहा और फिर ठाकुर साहब को मार डालने की धमकी ही उसे रास्ता देती चली गई------ -ठाकुर साहब को लेकर वह एक पुलिस जीप में बैठा ड्राविंग सीट पर उसने ठाकुर साहब को बैठाया…स्वयं रिवॉल्वर सम्भाले उनके सिर पर सवार ।

जीप चौराहा पार करके एक तरफ को दौड़ गई ।

"जिस रास्ते से साहब की जीप चौराहे पर पहुची थी, उसी रास्ते से विकास की कार भी पहुंची-चौराहे का दृश्य देखते ही वह भौचक्का रह गया…रैना सडक पर पडे रधुनाय के जिस्म से लिपट-लिपटकर रो रही थी------------उसके पैर स्वयं ही ब्रेको पर जा ज़मे।
 
कार रूकी-----लम्बा लड़का कूदा ।

चीखा-' क्या हुआ मां?"

रैना ने एक झटके से चेहरा उठाकर उसकी तरफ़ देखा !

विकास अपनी मां के पौछे सिन्दूरी सूरज और सूनी कलाइयों को देखता रह गया------------रैना का सारा चेहरा आंसुओं में डूबा था।

बुरी तरह रो रहीँ री वह!

लम्बे लड़के का दिल बड्री जोर-जोर से धडक उठा-----जब न रहा गया तो पागलों की तरह चीख ही तो पड़ा जालिम--"क्या हुआ मां------------बोलत्ती क्यों नहीं-क्या हुआ डैडी को?"

रघुनाथ के खून में सने दोनों हाथ हवा में उठाकर रैना कह उठी-----"ख . .खून…तेरे डैडी का खून हो गया है विकास ये देख-ये-तेरे बाप का खून है !"

"न...नहों!" विकास के कंठ से वातावरण को दहला देने बाली चीख निकल गई---------------सुनकर दो कदम पीछे हटा वह…"चेहरा पसीने-पसीने हो गया------आखे हैरत के कारण फटी की फटी रह गई ।

जबकि, खुन से लथपथ हाथ लिए रैना खडी हो गई, …"ये सच है विकास-----खून झूठ नहीं बोलता--देख------आगे बढकर खुद ही देख मेरे लाल पिता के सीने में एक भी धड़कन नही है !"

विकास सचमुच जल्दी से आगे बढा------सड़क पर पडी लाश के समीप बैठा-------------कलाई अपने हाथ में लेकर नब्ज देखी--------अगले ही पल चीखता हुआ कलाई छोडकर इस तरह उछल पड़ा, जैसे शक्तिशाली स्प्रिंग ने उसे उछाल दिया हो----उसका सारा जिस्म थरथरा उठा था-फटी-फटी-सी आंखों से वह सिर्फ रघुनाथ की लाश को देख रहा था-----वह यकीन नहीं कर पा रहा था कि उसके डैडी नही रहे !"

"व...बिकास--!" रैना ने पुकारा।

घूमकर कह उठा विकस-----"क.....किसने------ये-किसने-ये जुल्म किसने किया मां?"

" व-विजय ने?"

"ग.......गुरू ?" सारा जिस्म पसीने से नहा गया ।

"हां तेरे गुरु ने ।" रैना दांत भींचकर कह उठी-----"उसने-जच तेरा आदर्श हे-जो तेरी ताकत है-उसने, सामने पहुंचते ही तू जिसके चरण छूता है।"

“म...मगर ----!"

" बोल चुप क्यों हो गया--जुबान तालू से क्यों चिपक गई विकास…तेरा'वो जोश-तेरा वो चीख पडना । कहां चला गया----------कहता क्यों नहीं कि तू अपने पिता की मौत का बदला लेगा---लहू का टीका अपने मस्तक पर लगाकर ये कसम क्यों नहीं खाता कि तू अपने डैडी के हत्यारे को, चीर-फाड़कर सुखा देगा-------उसकी नंगी लाश गिद्धों के झुंड में डाल देगा?"

"म...मां!"

"ईसीलिए न-इसीलिए न कि------वह तेरा गुरु है?"

"'न...नहीँ मां…ऐसा मत कहो-पैदा करने वालों से बढकर तो कोई नहीं, मगर--ग...गुरु ने भी तो कुछ सोचा होगा-ये इकबाल बन-चुकै थे-------मोन्टो को मार डाला था इन्होंने ।"

"ये गलत है-----झूठ है----मोन्टो जिन्दा है------ये कभी इकबाल नही बने थे------बह सब कुछ एक चाल थी…मुजांरेम को धोखे _मे रखने के लिए ।"

" य.......ये तुम क्या कह रही हो मां ?"

"म.. मगर-विजय ने इन्हें सचमुच मार डाला…मैं मना करती रह गईं-रोकती रह गई------- लेकिने उस कमीने ने एकं न सुनी----उस पर तो खून सवार था---मेरी आखों के सामने उस कुत्ते ने मेरे सुहाग के परखच्चे उड़ा दिए ।”

"म---मां----!" विकास के जवड़े भिचते चले गए-आवाज थरथरा गई । "

रैना ने दुढ़तापूर्वक पुकारा…"व--- पिकास !"

" बोल मां।”

" तुने इसी गर्भ से जन्म लिया है न-तुझे यकीन है न तूने इसी कोख में पैर पसारे हैं?"

तड़प-तड़पकर कह उठा बिकास-"कैसी बात कर रही हो मां ?"

" मेरा एक कर्ज है तुझ पर ।"

"क.....कर्ज ?”

"हां-मेरा खून पिया है तूने-मेरे स्तनों से निकलने वाले दूध को पीकर सात फूटा बना है तू--------मेरा कर्ज तुझे लौटाना होगा विकस------मेरे दूध की एक…एक बूंद की कीमत देनी होगी तुझे-----बोल----लौटाएगा न मेरा कर्ज---- मेरे दूध को लजाएगा तो नही तू ?"

"व....विकास के खून का हर कतरा तेरे दूघ से ही तो वना है मां?" लडका बिलख पड़ा।

" तो जा अपने खून के एक-एक कतरे को राजनगर की सडकों पर बहा दे---अपने सुहाग का हत्यारा चाहिए विकास-----जिन्दा नहीं----हा मुर्दा----हा, चौककर पीछे क्यों हट गया--------विजय की लाश चाहिए…बोल-ला सकेगा----चुका सकेगा मेरे दूध का कर्ज ?"

"म.......मा!"

" क.......कांप गया-----हट गया न पीछे------इसीलिए, क्योंकि वह तेरा गुरु है------यदि यही' जुल्म किसी और ने किया होता---तो मै जानती हू कि आगे बढकर तु खुद ही कभी का यह कसम खा चुका होता-------म...मगर अब हिचक रहा है-----वो तेरा गुरु सहीं, लेकिन ये तेरा पिता था…मै तेरी मां हू----मेरे दूध की लाज तुझे रखनी होगी--मुझे विजय की लाश चाहिए+-----चला जा यहां से…यदि तू उसकी लाश लाकर मेरे कदमों में नहीं डाल सका तो मैं तुझें कभी अपना दूघ न बख्शूंगी ।"

“म...मां!"

" रैना आगे बढी-विकास के सामने पहुंची----खून से रंगे हाथ ऊपर उठाए----अंगूठे से विकास के मस्तक पर लहू का टीका लगाया, बोली…“मां का हर कर्ज तुझे चुकाना होगा-----दुध की हऱ बूंद का, हिसाब देना होगा---------तुझे दूध न बख्शूंगी तब तक-----जब तक कि मेरे सुहाग का हत्यारा खत्म नहीं होगा।"
 
"म...मां!" विकास के जिस्म का रोयां-रोयां खडा हो गया । लहराकर रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा+----- फिर उसके-हाथ कमीज फाड़ते हुए नीचे की तरफ गए--------------विकास ने उसे सम्भालने की कोशिश की मगर--।

रैना धम्म से सडक पर.गिर पडी।

" म...मम्मी…-मम्मी !" विकास चीखता हुआ झुका, किन्तु रैना बेहोश हो चुकी थी---------लड़के की मुट्ठियां क़सती चली गई------- जवड़े भिच गए !

'तुम कानून के लम्बे हाथों से बचकर नहीं निकल सकोगे विजय!" जीप ड्राइव करते हुए ठाकुर साहव ने कहा------" बैसे भी ऐसे किसी मुजरिम को पुलिस पाताल से भी दूंढ़ निकालती है, जिसने किसी पुलिस अफसर की हत्या की हो…क्यों की कोशिश बेकार है---------आत्मसमर्पंण कर दो…मुमकिन है कि कानून तुम्हारे साथ उदारता बरते ।"

ठाकूर साहब की कनपटी पर रिवाल्बर रख विजय बोल'--.--- "जब शरीफ बच्चे कोई काम कर रहे होते हैं ,बापूजान बोलते नहीं है और इस वक्त' आप जीप चला रहे है ।"

"विजय !"

"वैसे भी-----मरने से पहलें अपना तुलाराशि सुपरिटेण्डेण्ट के पद से इस्तीफा दे चुका था।"

"व...वह- "

"बह रघुनाथ कम, इकबाल ज्यादा था-सच, मुझें बहुत दुख है कि वह मेरी गोली से मारा गया…खैर हम काफी दुर निकल आए हैं--आप एक काम करें 1”

" क्या?"

" अच्छे बच्चों की तरह चलती जीप से बाहर जम्प लगा दें।"

"क...क्या…?" ठाकुर साहब चौक उठे…“इतनी तेज जीप में से"'

"क्या करू बापु जान कानून के हाथ बहुत लम्बे है------क्योंकि -जीपं के रूकते ही बे हमारी गर्दन पर पहुंच सकते हैं-इसलिए कूदो--------शाबाश-आप तो'बबहुत अच्छे बच्चे हैं न…अच्छा, मैं गिनती गिनता हु-----------------आपको तीन पर कूद जाना है…बन-टू- थ्री-------!"

"मैं आ गया 'गुरु------यदि मर्द के बच्चे हो और अपनी कोठी के किसी कोने में भी हो तो सामने आओ…मैँ अपने पिता की मौत का बदला लेकर रहुगां------यदि आप मेरी आवाज सुन रहे हैं और फिर भी सामने नही आ रहे तो मैं दावा कर सकता हू कि आप किसी मर्द की औलाद नहीं हैं ।"

यूंही अनाप-शनाप चीखता हुआ विकास विजय की कोठी में दाखिल हुआ ।

जबाब में चारो तरफ सन्नाटा ही छाया रहा ।

लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक से दुसरे कमरे में पहुचता हुआ विकास चीख रहा था---------सामने आओ गुरु-यू चेहरा छुपाकर आप बहुत दिन तक बच नहीं सकेंगे।"

"क्या हुआ विकास बेटे?"

लडका बिजली के बेटे की तरह घूमा-कमरे के दरवाजे पर विजय का एकमात्र बूढ़ा नौकर पूर्णसिंह खडा था-कंधे पर अंगोछा डाले----------उसकी तरफ बढ़ते हुए विकास ने पूछा--------"क्या कुछ ही देर पहले यहाँ विजय गुरु आए थे पूर्णसिंह काका?"

"न...नही-तो बेटे------लेकिन क्यों----------तुम मालिक को इस तरह क्यों पुकार...?"

उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास के दाएं हाथ की हल्ले-सी कराट पूर्णसिंह की कनपटी पर पड्री------उसके कंठ से चीख निकली और वह लड़खड़ाकर फर्श पर ढेर हो गया ।

उसे देखते ही'ब्लैक बॉंय सीट से लगभग उछल पड़ा------"व...विकास !"

"गुरु कहां हैं अंकल?"

" म...मुझे नहीं पता, लेकिन...।"

" ऐसा नहीं हो सकता चीफ-ये नहीं हो सकता कि अम्पको गुरू का पता न हो---------------------राज़नगर की सारी पुलिस उन्हें दूंढ़ रही है-----राजनगर से बाहर निकलने बाला हर रास्ता बद का दिया गया है-----पुलिस से बचने के लिए वे सीधे यहीं आए होगे ।"

" यह तुम्हारा वहम है-------वे यहां नहीं आए------- मगर क्यो-------तुम उन्हें इस तरह क्यो पूछ------!"

" खामोश रहो चीफ !' गुर्राने के बाद एकाएक ही' विकास चीख पड़ा-"खामोश यदि आपने बनने की मैं 'कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा-------मै जानता हू कि आप सब कुछ जानते हैं-विक्रम, नाहर, परवेज, अशरफ या आशा में से किसी ने आपको रिपोर्ट जरूर भेज दी होगी--------ये हरगिज नहीं मान सकता कि इस कुर्सी पर बैठकर आप उससे अनजान हैं, जो हुआ है ।"

"त------तभी तो कह रहा हू-------वह ठीक नहीं है, जो तुम कर रहे हो ।"

कठोर स्वर--- ये मुझे आपसे नहीं पूछा चीफ कि क्या गलत और क्या सही है ।"

"फिर भी…यदि तुम बहको तो तुम्हें सही मार्ग बताना हमारा फर्जहै!'

"मुझे विजय गुरु चाहिए चीफ----बस !"

"ल......लेकिन क्यों?"

"क्योकि मेरी मां को उनकी -लाश चाहिए ।"

ब्लेक बाॅय कह 'उठा--------"तुम पागल हो गए हो क्या-उसे मारोगे, जिसने तुम्हें ताकत बख्शी ?"

“उसके लिए, जिसने दूध बक्शा ।"

"म.......मगर----वह तुम्हारे गुरु है-तुम्हारे आदरणीय है-------- उन्होंने कदम-कदम पर हमेशा तुम्हारी प्राणरक्षा की है-याद करों विकास-क्या तुम्हें याद नहीं कि उन्होंने तुम्हारे लिए ’क्या-क्या किया है?"

"याद है-सब कुछ याद है ।"

"तो फिर?" "

"उस सबका ये मतलब तो नहीं कि वे मेरे पिता की हत्य ही कर दे…मेरी मां की मांग में सिन्दूर की जगह खाक भर देने का अधिकार तो नहीं मिल गया उन्हें…वे मेरे-गुरु है, मगर वह मेरा पिता था चीफ, जिसकी लाश' चौराहे पर पड़ी रह गई-----वह मेरी मां है, जिसकी चूडियों का कांच सडक पर बिखर गया ।"

"म...मगर'-।'"
 
"म...मां!" विकास के जिस्म का रोयां-रोयां खडा हो गया । लहराकर रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा+----- फिर उसके-हाथ कमीज फाड़ते हुए नीचे की तरफ गए--------------विकास ने उसे सम्भालने की कोशिश की मगर--।

रैना धम्म से सडक पर.गिर पडी।

" म...मम्मी…-मम्मी !" विकास चीखता हुआ झुका, किन्तु रैना बेहोश हो चुकी थी---------लड़के की मुट्ठियां क़सती चली गई------- जवड़े भिच गए !

'तुम कानून के लम्बे हाथों से बचकर नहीं निकल सकोगे विजय!" जीप ड्राइव करते हुए ठाकुर साहव ने कहा------" बैसे भी ऐसे किसी मुजरिम को पुलिस पाताल से भी दूंढ़ निकालती है, जिसने किसी पुलिस अफसर की हत्या की हो…क्यों की कोशिश बेकार है---------आत्मसमर्पंण कर दो…मुमकिन है कि कानून तुम्हारे साथ उदारता बरते ।"

ठाकूर साहब की कनपटी पर रिवाल्बर रख विजय बोल'--.--- "जब शरीफ बच्चे कोई काम कर रहे होते हैं ,बापूजान बोलते नहीं है और इस वक्त' आप जीप चला रहे है ।"

"विजय !"

"वैसे भी-----मरने से पहलें अपना तुलाराशि सुपरिटेण्डेण्ट के पद से इस्तीफा दे चुका था।"

"व...वह- "

"बह रघुनाथ कम, इकबाल ज्यादा था-सच, मुझें बहुत दुख है कि वह मेरी गोली से मारा गया…खैर हम काफी दुर निकल आए हैं--आप एक काम करें 1”

" क्या?"

" अच्छे बच्चों की तरह चलती जीप से बाहर जम्प लगा दें।"

"क...क्या…?" ठाकुर साहब चौक उठे…“इतनी तेज जीप में से"'

"क्या करू बापु जान कानून के हाथ बहुत लम्बे है------क्योंकि -जीपं के रूकते ही बे हमारी गर्दन पर पहुंच सकते हैं-इसलिए कूदो--------शाबाश-आप तो'बबहुत अच्छे बच्चे हैं न…अच्छा, मैं गिनती गिनता हु-----------------आपको तीन पर कूद जाना है…बन-टू- थ्री-------!"

"मैं आ गया 'गुरु------यदि मर्द के बच्चे हो और अपनी कोठी के किसी कोने में भी हो तो सामने आओ…मैँ अपने पिता की मौत का बदला लेकर रहुगां------यदि आप मेरी आवाज सुन रहे हैं और फिर भी सामने नही आ रहे तो मैं दावा कर सकता हू कि आप किसी मर्द की औलाद नहीं हैं ।"

यूंही अनाप-शनाप चीखता हुआ विकास विजय की कोठी में दाखिल हुआ ।

जबाब में चारो तरफ सन्नाटा ही छाया रहा ।

लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक से दुसरे कमरे में पहुचता हुआ विकास चीख रहा था---------सामने आओ गुरु-यू चेहरा छुपाकर आप बहुत दिन तक बच नहीं सकेंगे।"

"क्या हुआ विकास बेटे?"

लडका बिजली के बेटे की तरह घूमा-कमरे के दरवाजे पर विजय का एकमात्र बूढ़ा नौकर पूर्णसिंह खडा था-कंधे पर अंगोछा डाले----------उसकी तरफ बढ़ते हुए विकास ने पूछा--------"क्या कुछ ही देर पहले यहाँ विजय गुरु आए थे पूर्णसिंह काका?"

"न...नही-तो बेटे------लेकिन क्यों----------तुम मालिक को इस तरह क्यों पुकार...?"

उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास के दाएं हाथ की हल्ले-सी कराट पूर्णसिंह की कनपटी पर पड्री------उसके कंठ से चीख निकली और वह लड़खड़ाकर फर्श पर ढेर हो गया ।

उसे देखते ही'ब्लैक बॉंय सीट से लगभग उछल पड़ा------"व...विकास !"

"गुरु कहां हैं अंकल?"

" म...मुझे नहीं पता, लेकिन...।"

" ऐसा नहीं हो सकता चीफ-ये नहीं हो सकता कि अम्पको गुरू का पता न हो---------------------राज़नगर की सारी पुलिस उन्हें दूंढ़ रही है-----राजनगर से बाहर निकलने बाला हर रास्ता बद का दिया गया है-----पुलिस से बचने के लिए वे सीधे यहीं आए होगे ।"

" यह तुम्हारा वहम है-------वे यहां नहीं आए------- मगर क्यो-------तुम उन्हें इस तरह क्यो पूछ------!"

" खामोश रहो चीफ !' गुर्राने के बाद एकाएक ही' विकास चीख पड़ा-"खामोश यदि आपने बनने की मैं 'कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा-------मै जानता हू कि आप सब कुछ जानते हैं-विक्रम, नाहर, परवेज, अशरफ या आशा में से किसी ने आपको रिपोर्ट जरूर भेज दी होगी--------ये हरगिज नहीं मान सकता कि इस कुर्सी पर बैठकर आप उससे अनजान हैं, जो हुआ है ।"

"त------तभी तो कह रहा हू-------वह ठीक नहीं है, जो तुम कर रहे हो ।"

कठोर स्वर--- ये मुझे आपसे नहीं पूछा चीफ कि क्या गलत और क्या सही है ।"

"फिर भी…यदि तुम बहको तो तुम्हें सही मार्ग बताना हमारा फर्जहै!'

"मुझे विजय गुरु चाहिए चीफ----बस !"

"ल......लेकिन क्यों?"

"क्योकि मेरी मां को उनकी -लाश चाहिए ।"

ब्लेक बाॅय कह 'उठा--------"तुम पागल हो गए हो क्या-उसे मारोगे, जिसने तुम्हें ताकत बख्शी ?"

“उसके लिए, जिसने दूध बक्शा ।"

"म.......मगर----वह तुम्हारे गुरु है-तुम्हारे आदरणीय है-------- उन्होंने कदम-कदम पर हमेशा तुम्हारी प्राणरक्षा की है-याद करों विकास-क्या तुम्हें याद नहीं कि उन्होंने तुम्हारे लिए ’क्या-क्या किया है?"

"याद है-सब कुछ याद है ।"

"तो फिर?" "

"उस सबका ये मतलब तो नहीं कि वे मेरे पिता की हत्य ही कर दे…मेरी मां की मांग में सिन्दूर की जगह खाक भर देने का अधिकार तो नहीं मिल गया उन्हें…वे मेरे-गुरु है, मगर वह मेरा पिता था चीफ, जिसकी लाश' चौराहे पर पड़ी रह गई-----वह मेरी मां है, जिसकी चूडियों का कांच सडक पर बिखर गया ।"

"म...मगर'-।'"
 
"ग. . . गुरू--- गुरू की जगह रहा, लेकिन पैदा करने वालों से वड़ा तो नही है-मुझें ये नहीं सोचना है कि वे मेरे गुरु है---मुझे सिर्फ इतना पता है कि उन्होंने मेरे पिता को मारा है और मुझें जन्म देने वाली मां ने अपने पति के हत्यारे की लाश मांगी है------दूध का वास्ता दिया है मुझे'-इसी दूध की कसम चीफ़, मां कर्ज मांगा नहीं करती, लेकिन जव मागा है तो उसे हर हालत में मिलेगा ।"

"ल. . लेकिन तुम यह क्यों नहीं-सोचते कि रधुनाथ इकबाल बन चुका था।"

"'वह सब नाटक था--एक ड्रामा !'

"लेकिन उन्हें नहीं मालुम था-जिस तरह सव धोखे मे थे------उसी तरह वे भी धोखे मे थे।"

" इसका ये मतलब तो नहीं कि उन्हें गोली ही मार दी जाए?”

"उन्होंने-------।"

“चीफ…!” एकाएक ही विकास का स्वर अत्यन्त ठन्डा हो गया------"मैं किसी बहस में नहीं पड़ना चाहता-मुझें सिर्फ अपने सवाल का जवाब चाहिए---विजय गुरु. कहां हैं?"'

“कह चुका हु कि वे यहां नहीं आए हैं।”

" पुलिस से बचनेके लिए उनके पास इससे बेहतऱ'जग़ह नही है !"

. "फिर भी-वे यहां नहीं आए ।"

“मुझे उम्मीद है कि वे जरूर आए हैं और.यदि वे गुप्त भवन मे कहीं हैं तो मेरी'आवाज़ भी सुन रहे हैं।" कहने के साथ विकास अचानक ही ऊची आवाज चीखा---" यदि यहां कहीं छुपे आप मेरी आवाज सुन रहे है गुरु, तो` सुनो-----------इस तरह मुंह छुपा लेने से आप ज्यादा दिन तक वच नही सकेंगे----" मेरा सामना करना होगा आपको---या तो मैं रहुंगा या आप-सामने आइए-वरना आपको सामने लाने के मैं इस गुप्त भवन को जलाकर राख कर सकता हु-आपकी कोठी में आग लगा सकता हु------सामने आओं गुरू-वरना राजनगर

में तबाही मचा डालंगा में।”

"वे यहां नहीँ है विकास-"

"नहीं हैं तो आऐगे-----आप से सम्बन्ध स्थापित जरूर करेंगे वे------जो आपने सुना है-उनसे कहना-मुझे उनकी लाश चाहिए--बेहतर है कि वे आत्महत्या कर ले ?" कहने के बाद वह मुडा और बाहर निकलने के लिए तेजी से दरवाजे की तरफ बढ गया !!

" बिकास !"

वह ठिठका----घूमा----"कहिए !"

" ये सव कुछ ठीक नहीं हो रहा है-खुद को सम्भालो बेटे…अनर्थ हो जाएगा ।"

" यह सब कुछ तो मेरे डैडी को मारने से पहले विजय गुरू को सोचना चाहिए था !"

"म-----मगर----तुम सिर्फ किसी के बेटे ही नहीं हो.---- भारतीय सीक्रेट सर्विस के सदस्य भी हो तुम----बल्कि सबसे पहले तुम सीक्रेट सर्विस के सदस्य हो-बाद में कुछ और-----मै यानी सीक्रेट सर्विस का चीफ तुम्हें हुक्म देता हू कि तुम विजय पर कोई आक्रमण नहीं करोगे !"

"और मैं-----यानी रैना का बेटा यह आदेश मानने से इंकार करता हूं !"

"विकास !"

" कल शाम तके मेरा इस्तीफा आपकी टेबल पर पहुच जाएगा !" एक झटके के साथ कहने के बाद विकास मुडा फिर तेज कदमो के साथ वहां हो निकल गया !

"मैं आपसे पूछता हू अशरफ अंकल--------------बोलो-----विजय गुरु कहां हैं?"

"मैं नहीं जानता हूं ।"

कठोर स्वर-----"आपको बताना होगा !"

"क्या मतलब-जब मैं कुछ जानता ही नहीं हूं तो बताऊंगा, क्या?"

लम्बे लड़के ने एक कदम बढाया और झपटकर दोनों हाथों से अशरफ का गिरेबान पकड़ लिया, गुर्राया--"आप जानते हैं अंकल, लेकिन आप बता नहीं रहे है ।"

"इस बेहूदगी का क्या मतलब विकास?" अशरफ दहाड़ा ।

"मेरे मस्तक पर लगा टीका देख रहे है आप?"

"हां !"

"काहे का है ?"

" लहु का।"

" नही !" विकास चीख पड़ा----" ये दूध का टीका है----- मां के दूध का !"

कहने के साथ ही विकास ने अशरफ के जबड़े पर इतनी जोर से घूंसा मारा कि हवा में उछलकर अशरफ अपने कमरे में पड़े सोफे से उलझकर फर्श पर जा गिरा और कदाचित ऐसा इसलिए हो गया था, क्योंकि अशरफ को उससे इस किस्म की हरकत की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी--इससे पहले कि वह सम्भलता, लम्बे लडके की टांग चली----बूट की एक भरपूर ठोकर पडी ।

एक चीख के साथ अशरफ लुढक गया।

उसके बाद-विकास ने उसे संभलने का एक भी मौका नहीं दिया-------अशरफ यह सोचता-सोचता ही बेहोश हो गया कि विकास को आखिर हो क्या गया है-फ़र्श पर बेहोश पड़े अशरफ घूरता हुआ विकास बोला-----"कुछ भी सही अंकल-----गुरु तुम्हे मेरी कैद छुड़ाने जरूर आएंगे ।"

“अरे !" फर्श पर गिरते ही विक्रम कह उठा---------“तुम पागल हो गए हो क्या विकास?"

"हां ।" कहने के बाद विकास आगे बढा-उसके नजदीक पहुचा-----झुका---एक हाथ से उसका गिरेबान पकड़कर ऊपर उठाता हुआ बोला-----“मैं पागल हो गया अंकल-इसतिए कि मेरे डैडी मरे हैं-------इसलिए कि मेरी मां ने दूध का वास्ता दिया है !"

"म......मगर---!" विकास के घूसे ने उसे पुनः हवा मैं उछाल दिया ॥

विकास ने सुनसान इलाके में स्थित एक पुराने माॅडल की इमारत के पोर्च मे कार रोक दी…कार के रूकते ही चारों तरफ देखेती हुई आशा कह उठी-----ये तुम मुझे कहां ले आए हो विकास ?"

"क्या आपको मुँझ पर यकीन नहीं है आन्टी?"

"अविश्वास का सवाल ही कहां है?"

"तो आइए----' यहां आपको एक तमाशा दिखाने लाया हूं।” कार का दरवाजा खोलकर बाहर निकलती आशा ने कहा---"यह तो तुम तभी से कह रहे हो, जब मुझसे मिलने मेरे फ्लैट पर पहुंचे-यह कहकर मुझे अपने साथ लाए हो कि मुझे कोई बहुत बड़ा तमाशा दिखाने जा रहे हो, परन्तु एक बार भी इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि आखिर वह तमाशा क्या है ।”

"कुछ ही देर बाद ज़वाब खुद मिल जाएगा-मेरे साथ-चलिए ।" कहने के साथ ही उसने कसकर आशा की कलाई पकडी और इमारत के द्वार की तरफ़ बढ गया------असमंजस में फ्रंसी आशा उसके साथ खिंचती चली गई---------द्वार पर एक मोटा ताला लगा था !

विकास ने उसे जेब से एक चाबी निकालकर खोला । फिर विकास उसे सुनसान पडी एक बारहदरी से गुजारता इमारत के अन्दर ले गया…विकास की पकड इतनी सख्त थी कि आशा को अपनी कलाई किसी फौलादी पंजे में फंसी महसूस हो रही थी------इमारत के विभिन्न हिस्सों में से गुजरते हुए एक कमरे में पहुच गए ।

विकास ने आशा को फर्श के ठीक बीच में खडा किया और बोला------"यहां खडी रहो आन्टी--कुछ ही देर बाद आपको एक दिलचस्प तमाशा देखने को मिलेगा ।"

-उलझन में फंसी आशा उस स्थान पर खडी रही । विकास कमरे की एक दीवार में लगे स्विच बोर्ड की तरफ बढा----इघर उसने एक स्विच आन किया और उधर आशा के पैरों तले का फर्श छोटे-छोटे दो किवाडों की तरह नीचे की तरफ़ खुल गया !"
 
एक लम्बी चीख के साथ आशे उसमें समा गई । स्विच आँफ़ करते ही किवाड़ यथा स्थान फिक्स हो गया--विकास के होंठों पर जहरीली मुस्कान नाच रही थी और उसकी आंखों में चमक रही थी-हिंसक चमक ।

सिर्फ एल क्षण तक हवा में लहराने के बाद उसके जिस्म को झटका सा लगा----वह किसी डनलप के गद्दे पर गिरी थी--उसी पर झूलती -सी आशा ने अपने ऊपर, छोटे छोटे दो किवाडों को बन्द होते देखा------ उसके चेहरे पंर हैरत-अविश्वास---- भय एवं उलझन के संयुक्त भाव, थे ।

"वेलकम आशा---- वेलकम !"

नाहर की आवाज सुनकर आशा इस तरह उछल पड्री, जेसे अचानक ही उसे किसी विच्छू ने डंक मार दिया हो-बडी तेजी से उसने आवाज की दिशा देखा------नाहंर पत्थर के वने एक चबूतरे पर लेटा मुस्करा रहा था-अभी आशा ने कुछ कहने के मुंह खोला ही था कि परवेज की आवाज------" यहां पड़े हम यही सोच रहे थे आशा कि आखिर अभी तक तुम यहां क्यों नहीं पहुंची हो?"

आशा ने चक्ति दृष्टि से उधर देखा ओर फिऱ उसी कमरे में अशरफ और विक्रम को देखकर तो वह चौक ही-पड्री ।

मुह से बरबस ही निकला-----"तुम सब यहां?"

"एक-एक करके सभी पहुच गए हैं ।"

"म...मगर तुम्हें. यहां किसने पहुचाया?"

विक्रम ने बताया---"जिसने तुम्हें पहुचाया हैं !"

" व............विकास ने ?"

उनमें से कोई कुछ ऩही बोला…यह काफी वड़ा और गोल कमरा था-----कमरे का व्यास बीस फुट तो रहा ही होगा । दीवारों के सहारे पत्थर के चबुतरे बने हुए थे….चारों ने एक-एक चबूतरा कब्जा रखा था------सारे कमरे में चार इंच मोटा डनलप का एक गद्दा बिछा हुआ -------उन्हें देखती हुई वह स्वयं ही बोली--------ल.......लेकिन----हम सबको यहाँ एक ही स्थान पर इकट्ठा करने के पीछे विकास का मकसद क्या है?"

" उसने हमे इकट्ठा नहीं-कैद किया है।"

"क्यों ?"

" कमाल है----उसने तुम्हें नही बताया----- वैसे भी तुम होशो हवास में इस तहखाने में गिरी हो, इससे लगता है कि विकास का तुम्हें यहां लाने का तरीका सबसे जरा अलग रहा है !"

"मैं समझी----नहीं!"

“हमारी आपस की बातो से जो निचोड निकला है, वह यह है कि उसने हम सबके पलेटों पर जाकर अलग-अलग सबको बेहोश किया…जब आंखें खुली तो हमने खुद को इसी कैद में पाया, लेकिन तुम अपने होशो-हवास में यहाँ पहुंची हो…जाहिर है कि उसका तुम्हें यहां लाने का तरीका ज़रा अलग रहा ।"

"मुझे तो वह यह कहकर लाया था कि कोई तमाशा दिखाने ले जा रहा है और फिर धोखे से यहाँ फंसा दिया ।"

"इसीलिए तुम्हें नहीं मालूम कि हम सबको कैद करने के पीछे उसका क्या मकसद है !"

" क्या मतलब?"

. "उसे विजय चाहिए आशा…रघुनाथ की हत्या करने के बाद विजय गधे के सींग की तरह गायब हो क्या है------रैना ने दूध का वास्ता देकर बिकास से विजय की लाश मांगी है-विकास पागलों की तरह विजय को दूंढ़ता फिर रहा है-हर्में उसने दो बाते सोचकर कैद किया है, पहली तो .यह है कि यदि हम आजाद रहे तो उसके ख्याल से विजय की मदद कर सकते है-दूसरे उसका अनुमान ये है कि विजय हमे इस कैद से निकालने की कोशिश जरूर करेगा।"

"अजीब घटनाएं घट रही हैं ।" आशा बोली--------" क्या तुम्हारी समझ में कुछ आ रहा है अशरफ-------ये सब क्या चक्कर चल रहा है-पहले रघुनाथ इकबाल बन गया----उसने मोन्टो तक को मार दिया------फिर विजय ने रघुनाथ को ही गोली मार दी-क्यो अशरफ-आखिर क्यों-------उत्तेजित होकर विकास से इस किस्म की हरकत की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन विजय नहीं----उसने ऐसा क्यों कर दिया?"

" मैँ क्या करता गुलफाम--- मैँ क्या करता?" दांत भीचकर कसमसाते विजय ने दो-तीन मुक्के जोर-जोर से दीवर में मारे---मोन्टो की लाश देखकर अपने होशो हवास में न रहा----रघुनाथ से बदला लेने के लिए निकल पड़ा---------फिर भी मैं उसे जान से मारने की बेवकूफी नहीं कर सकता था--------मैं उस पर अपना गुस्सा उतारकर--उसे पुलिस को सौंप देना चाहता था, किन्तु उस कम्बख्त ने रैना बहन पर ही गोलियां चलानी शुरू कर दीं-मै क्या करता गुलफाम--तू ही सोच-जिसने विना हिचक के मोन्टो को मार डाला-उसे भला रैना को मारने में क्या देर लगती-----उस वक्त मैं सिर्फ इतना ही सोच सका क्रि यदि मैं चूक गया तो अगले ही पल मुझे मोन्टो की तरह रैना बहन की लाश भी देखनी होगी।”

"ल.........लेकिन मास्टर-रैना वहन का कहना तो ये है कि रघुनाथ नाटक कर रहा था?"

" यही सुनकर तो मेरे पेरों तले से धरती खिसक गई-----होशो-----हवास उड़ गए-मेरा दिमाग चकरा गया गुलफाम-मैं ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि अपना तुलाराशी कोई चाल भी चल सकता है--चाल भी ऐसी…इतनी खतरनाक…उफ् . अपने जीवन में आखिरी क्षणों में कहीं अपने तुलाराशि का दिमाग तो खराब नही हो गया था?"

"अब क्या करने का इरादा है मास्टर?"

विजय घूमा…उसका सारा चेहरा आंसुओं में डूबा हुआ था-----आखे जी भरकर-रोने के कारण बुरी तरह सुर्ख और सूजी हुई थी!

गुलफाम की तरफ़ देखता हुआ वह बोला------वह मेरा दोस्त ही नहीं गुलफाम-मेरी सबसे प्यारी वहन का पति भी था और मैंने उसका सुहाग उजाड़ दिया है-उफ्फ-एकं भाई ने अपनी बहन की माँग में खाक भर दी है…ऐसे भाई को इस दुनिया में रहकर एक भी सांस लेने का हक नहीं है…दूसरी तरफ तुम्हारे आदमियों ने रिपोर्ट दी-है कि रैना ने विकास को दूध का वास्ता देकर मेरी लाश मांगी है-----ऐसे हालातों में जी तो यह चाहता है कि या तो स्वयं ही अपने मस्तक में गोली उतार लूं या उस-सात फूटे के सामने जाकर सीना तान दूं--कह दूं कि…ले-इस सीने के परखच्चे उड़ा दे----दुध की कीमत चुका दे-----विजय नाम के इस कुत्ते की लाश ले जाकर रैना बहन के चरणों में डाल दे।”

"म..मास्टर !" गुलफाम तड़प उठा-----ऐसा मत कहो मास्टर !"

"मैं क्या करूं…मैं क्या करूं गुलफाम?" विजय चीख पड़ा ।

"उस गुजरिम का पता लगाइए मास्टर, जिसकी वजह से यह सब कुछ हुआ है--सुपरिटेंडेंट साहब को गोली आपने नहीं, उसी के फैलाए हुए जाल मे फंसकर आपने------।"

"य...यह भी तो मेरा गुनाह है गुलफाम कि मैं किसी के जाल में फंस गया-मैं-जो यह समझता था कि किसी के जाल में नहीं फंस सकता-उल्टे किसी को जाल में फंसा सकता हू।"

" आप इंसान हैं मास्टर-भगवान तो नहीं, जो कभी धोखा खा नहीं सकता ।"

"मैं तो इंसान भी नहीं रहा गुलफाम !"
 
"मास्टर !"

"लेकिन दिल में उसे देखने-उससे टकराने और उसकी लाश बिछा देने की तमन्ता जरूर है, जिसने यह सव कुछ किया है---अपनी-इस आखिरी तमन्ना को पूरी करने के बाद मैं खुद को विकास के हवाले कर दूंगा !"

गुलफाम की आवाज भर्रा गई+----“आप ऐसा क्यों कहते हैं मास्टर?"

"क्या तुम मेरी कुछ मदद नहीं कर सकते गुलफाम?"

रघुनाथ के दाह-संस्कार की तैयारियां चल रही थी ।

सारा शहर मानो उसकी कोठी पर उमड पड़ा-रेना को होश आ चुका था-छाती पीटती हुई वह दहाड़े मार-मारकर रो रही थी---- साथ ही विजय क्रो विभिन्न किस्म की गालियां के भी देती जा रही थी वह॥

उसर्के पास बैठी ढेर सारी औरते उसे सांत्वना देने के स्थान पर स्वयं ही रो रही थी ।

उन्ही में एक विजय की मां थी-टाकुर साहव की धर्मपत्नी ।

विजय की सगी बहन कुसुम भी थीं-उसे 'तार' द्वारा तुरन्त ससुराल से बुलाया गया था।

उन दोनों की अवस्था भी रैना जैसी ही थी-----छाती पीटती हुई वे-विजय को कोस रही थी ।

अर्थी तेयार करने बालों में से एक ठाकुर साहव थे------बुरी तरह रो रहे थे वे-अर्थी तैयार करते वक्त न सिर्फ हाथ ही बल्कि-उनका शरीर कांप रहा था !

कुछ लोग रघुनाथ के शव को अन्तिम स्नान करा रहे थे ।

एक कोने में विकास पत्थर की शिला के समान खड़ा था।

दीवारों में सिर-पटक-पटककर मोन्टो ने खुद क्रो लहूलहान' कर लिया था----उसकी दीवानगी-उसका जुनून और विलाप देखकर देखने वालों के मुहं से-चीत्कारे निकल गई थी------दिल दहल उठे थे ।

अंत में विकास ने ही सम्भाला था उसे । उस वक्त कोठी के चारों और रुदन ही रुदन गूंज गया, जा रघुनाथ अर्थी पर लिटाया गया-…चिरनिद्रा में लीन था वह------चेहरे पर

अजीब- सी पीडा के भाव ।

रोते-बिलखते ठाकुर साहव ने उस पर तिरंगा ढका ॥

फिर…चार कंधों ने अर्थी उठाई-उनमे एक कन्धा विकास का भी था…"राम.नाम…सत्य है का गमगीन स्वर मानव-समूह में गूंज उठा…लोग रोते-बिलखते रह गए ।

एक विशाल जन-समूह श्मशान की ओर चल दिया । उस तरफ़, जो कि सड़को पर घूम रहे प्रत्येक हाड़-मांस के पुतले की अंतिम मंजिल है…रघुनाध की उस अन्तिम यात्रा मे गृहमंत्री और प्रधानमंत्री तक आए थे !

श्मशान में चिता सज गई ।

सुपर रघुनाथ के नश्वर शरीर को मोटी-मोटी लकडिर्यों की सेज पर लिटा दिया गया---------पंडित उसकी आत्मा की शांति _हेतु मंत्रो का उच्चारण करने लगा ।

फिर-विकास को पूछा गया ।

सिरे पर से जल रही लकडी उसब हाथ में देकर चिंता मे 'अग्नि' प्रज्वलित करने के लिए कहा गया । आगे बढकर जब विकासं ने ऐसा किया तो उसके जबड़े र्भिचगए ।

आंखों से जलते हुए दो आंसू टपके।

कुछ ही देर बाद चिता आग की लपटों में धिर गई----लकडियों के साथ वह भी जलने लगा, जो विजय की ' झकझकियां सुनकर बोर हो जाया करता था…सुपरिंटेण्डैण्ट जैसे उच्च पद पर आसीन होने के बावजूद भी जो विजय _ की बकवास सुना और सहन किया करता था ।

कपाल-क्रिया का वक्त आ पहुचा । जब विकास के हाथ में लाठी थी और लक्ष्य के रूप में था उसके पिता का सर-तब विकास को यूं लगा कि जैसे वह सिर उसके पिता का नहीं, बल्कि विजय का है । उत्तेजना में झुंझलाकर उसने पूरी ताकत से लाठी मारी ।

सिर खील-खली होकर बिखर गया ।

सब कुछ आग में जलकर भस्म हो गया-लकांड़ेयों की राख में रघुनाथ की राख मिल गई…लकांड़ेयों के सुलगते हुए छोटे-टुकडों के बीच हड्डियां भी पडी थीं।

एक लाठी से उसी राख को कुरेदते हुए बिकास ने एक बार फिर अपनी कसम दोहराई ।

अब विकास ने मोन्टो से सबकुछ 'जानने के लिए प्रश्न किया तो.........!

मोन्टो ने डायरी पर लिखा…“मुझें इससे ज्यादा कुछ मालूम नहीं है कि अचान ही रैना मां'मेरे पास आई और कपडे उतारने का आदेश दिया------उनका आदेश मानते मैंने बहुत पूछा कि यह सब क्यो किया जा रहा है, पर मां ने क्रहाकि इस वक्त पूरी बात बताने का समय नही है, बादमें बताएंगी-----बस यह कहने के बाद रैना मां ने मुझे स्टोंर में बन्द कर दिया और कहा कि मैं तब तक यहां से बाहर निकलने की केशिश न करूं जब तक कि स्वयं न निकाले-उन्होंने निकाला तो रघुनाथ अंकल की मृत्यु हो चुकी थी----ऐसा वातावरण ही न मिल सका कि मैं रैना मां से सवाल कर सकता ।"

पढ़ने के बाद कई क्षण तक विकास जाने किस सोच में डूबा रहा।

ऐकाएक वह उठा और भीतरी कमरे की तरफ वढा-मोन्टो उसके पीछे था।

रैना अब भी अपने कमरे में बैठी रो रही थी-------उसके पास इस वक्त सिर्फ विजय की मां और कुसुम ही थी…वहां पहुंचते ही विकास ने उन दोनों से थोड्री देर लिए बाहर निकल जाने और रैना से अकेले में कुछ बाते करने की इच्छा जाहिर की-----वे बाहर चली गई।

" दरंवाजा अन्दर से बंद कर दो मोन्टो!"

मोन्टो ने तुरन्त आदेश का पालन किया,जबकि बिकासं ने रैना-को पुकारा-----" मां !'

वह कुछ न बोली----रोती रही,, सिसकती रही ।

"पिता की मौत का बदला लेने के लिए मुझे तुमसे चन्द 'सवालो' के जवाब चहिए मां!"

रैना ने'अपना चेहरा ऊंपर उठाया-उसे देखकर विकास के दिल में हाहाकार-सा मच गया---------बिल्लुत्त बुझा हुआ निस्तेज और आंसुओं में डूबा सफेद चेहरा-जहां बिंदिया हुआ करती थी, वहाँ धब्बा-मांग में पिछले दिन लगाए गए सिन्दूर के सिसकते कण ।

सूती सफेद धोती-पहने थी वह ।

जिन कलाइयों में उसने कल तक. चूड्रियां खनखनाते देखी थी, उन्हें सूनी देखकर विकास के मन एक हूक-सी उठी----अपनी विधवा मां को वह देखता ही रह गया--कुछ बोल नहीं सका, जब कि रैना ने पूछा--"क्या पूछना चाहता है?"

"वह सब कुछ जो हुआ है, यानी क्या सोचकर क्या कंर रहे थे ?"

"तोताराम दम्पति हत्याकांड हमारे लिए मनहूस _ सावित हुआ है।"

विकास चौंक पड़ा-"त्तोताराम दम्पति हत्याकांड से इस सबका क्या मतलब?"

"उसी हत्याकांड की-बजय से तो आज हमें यह दिन देखना पड़ा है-न वह होता---न तेरे डैडी मदद के लिए विजय के पास जाते-----------न वह कमीना हमारे सामने उन्हें इतनी ऊटपटांग बाते कहकर उनके ज़मीर को .ललकारात हुआ उसे नीचा दिखाता और न ही उनके जेहन में कुछ कर गुजरने की बात घुसती ।"

" मै समझा नहीं?"

" तुम्हे याद होगा कि उस हत्याकांड के सम्बन्थ में विजय ने उसे लत्ताड़ा था----कहा था कि उन्होंने आज तक स्वयं एक केस भी हल नहीं किया है-- एस पी के पद ने लायक ही नहीं हैं-विजय द्वारा वे हम सबके सामने अपना अपमान सहन न कर सके-----तुम्हें यह भी याद होगा कि उस वक्त वे गुस्से में उठकर चले गए थे ।"

"हां,यादहै।"

" उसके अगले ही दिन - अखबार में इकबाल बाला विज्ञापनं पढ़कर वे चौक पड़े उन्होंने मुझे दिखाया-तुमसे होती हुई बात विजय तक पहुच गई-----सब दिलबहारं होटल तबस्सुम और अहमद से मिलने गए------वहाँ जो बाते हुई-उनसे हमें इस सम्भावना पर गौर करने के लिए विवश हो जाना पड़ा कि कहीं वे सचमुच ही तो इकबाल नहीं हे-परन्तु वे अच्छी तरह जानते थे वे इकबाल नहीं रघुनाथ ही हैं-वे आँफिस चले गए, किन्तु उनका दिमाग हम सबसे ज्यादा परेशान रहा…उनकी समझ में नहीं आकर दे रहा था कि आखिर तबस्सुम…अहमद और इकबालं का चक्कर क्या है । उनके दिमाग यह विचार आया कि… हो न हो, तबरसुम और अहमद कोई षड्यंत्रकारी हैं, जो उम्हें किसी षड्यंत्र में उलझाना चाहते हैं-मगर आखिर वह षड्यंत्र क्या है? इसी प्रश्न का जवाब उनके दिमाग में नहीं आ रहा था-उसी की खोज मे वे आँफिस से सीधे दिलबहार होटल पहुच गये-----एकाएक ही उनकें दिमाग में स्वयं ही कुछ कर गुजरने की इच्छा प्रबल हो गई थी-उन्हें मालूम ही था कि विजय भी इस कैस में उलझ चुका है !"

"फिर !"
 
अत: उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि इस बार वे इस केस को विजय से पहले हल करके दिखाएंगे-दिलबर होटल में पहुंच कर संयोग कुछ ऐसा बना कि उन्होंने तबस्सुम और अहमद के बीच फोन पर होने वाली वार्ता सुन ली------उन बातो का निचोड़ यह निकलता था कि तबस्सुम और अहमद उन्हें सचमुच इकबाल ही समझते हैं और वे किसी 'मास्टर' नामक अपराधी के चंगुल में फंसे हुए हैं, जो कि सारी दुनिया को तबाह करने बाली किसी स्कीम पर काम कर रहा था--------------------उनकी बातों से ही उन्हें यह भी पता लगा कि मास्टर को उनकी (रघुनाथ की) जरूरत है, किन्तु उस रघुनाथ की, जिसे यह याद हो कि वह कभी इकबाल था…यह सब सुनने के बाद च उन्होंने मास्टर तक पहुचने का निश्चय कर लिया-----उस तक पहुचने के लिए उन्हें सबसे आसान तरकीब अपनी याददाश्त वापस लोट जाने का नाटक करना लगी-----अत्त: जवं वे बेहोश तबस्सुम को जीप: में डालकर ला रहे थे, तभी उन्होंने अपनी स्कीम कार्यान्वित कर दी ।"

"डैडी ने क्या किया?"

"वे यह त्ताड़ चुके थे कि कोई उनका पीछा कर रहा है-----अपने दिमाग से वे यहीं सोच सके कि जरूर र्यह मास्टर या उसका ही कोई आदमी होगा, अत: उन्होंने अपने दिमाग में पनपी योजना को कार्यान्वित करने की शुरुआत यूं की कि जीप की रफ्तार बढाते ही चले गये------वे निश्चय कर चुके थे कि उन्हें एक जबरदस्त जीप एक्सीडेण्ट करना है…जीप को पूरी रफ्तार पर करके उन्होंने तबस्सुम को जीप से बाहर फेक दिया-------कार द्वारा पीछा करने बाले जो कि वास्तव में विजय और अशरफ थे, अंधेरे के कारण तबस्सुम को जीप से बाहर फेका जाता न देख सके…फिर उन्होंने जीप का रुख एक पेड़ की तरफ़ कर दिया और एक्सीडेण्ट होने से एक पल पहले ही जीप से कूद पड़े ।"

"ओह !"

" वे सचमुच बेहोश हो गए थे---डाक्टर के प्रयास के बाद जब के सचमुच होश में आए तो स्वयं को अपने ही घर में देखकर वे मन-ही-मन चोंक पडे--फिर भी जो निश्चय उन्होंने कर लिया था, उस पर कायम रहे यानी होश में आते ही उन्होंने अपनी याददाश्त लौट आने कां बहुत ही खूबसूरत सफल नाटक किया-मैं-विजय और डॉ. प्रभाकर चकित और भोचक्के रह गए-उन्हे धोखे से कमरे में डालकर विजय मुझसे कुछ देर में वापस आने के लिए कहकर चला गया-जब डॉक्टर प्रभाकर भी चले गए तो उन्होंने कमरे के अन्दर से मुझे आवाज दी--------जब-उन्होंने मुझें यह बताया कि वे रघुनाथ ही हैं और उनकी कोई याददाश्त नहीं लौटी है तो मैं चकित रह गई-पूरा विश्वास आने पर मैंने दरवाजा खोला---वे खुश थे------- बेहद खुश-कई बार ठहाके लगा-लगाकर हंसे थे वे ।"

"क्यों ?"

"अपनी सफलता पर ।"

“कैसी सफ़लता?"

"उन्हें इस वात की सर्वाधिक खुशी थी, कि विजय उनके है चक्कर में फंस गया है-अपने-आपको बहुत बड़ा धुरन्थर समझने वाला विजय भी यह नहीं समझ सका है कि उनकी

याददाश्त नहीं लौटी है, बल्कि वह नाटक कर रहे हैं, है हंस-हंसकर कह रहे थे कि आज उन्होंने विजय क्रो पहली शिकस्त दी है ।"

“ओंह-फिर क्या हुआ''

"मै घबरा गई थी, घबराकर मैंने पूछा कि यह सब नाटक वे क्यों कर रहे हैं--------------------जवाब एक ही था-----मास्टर तक पहुचने और विजय से पहले ही इस केस को हल कर देने के लिए । मैंने उन्हें समझाया-कहा कि वे ऐसा न करें…यह खेल भविष्य में वहुत खतरनाक भी साबित हो सकता है---वे नहीं माने -उनके दिमाग में विजय से पहले ही इस केस को हल करने की जिद बूरी तरह जडे पकड़ चुकी थीं-उन्होंने मुझें अपनी कसम दे दी-जो कुछ वे कर रहे थे, वह मैं किसी को बता नहीं सकती थी----सारी स्कीम को गुप्त रखकर उन्होंने मुझसे मदद मागी----कसम ने मुझे मजबूर कर दिया- अंशरफ----आशा-विजय---तबस्सुम और अहमद के आने तक वे पहले की तरह ही वन्द हो गए थे-----उनके लौटने पर वही नाटक जारी हो गया…कुछ देर बाद वहां ठाकुर चाचा भी पहुंच गए--सभी को पूरा विश्वास हो गया था कि वे इकबाल हैं और, उनकी याददाश्त लौट आई है-------------मुजांरेमों पर अपना बिश्वास जमाने के लिए वे यहाँ से त्तबस्तुम और अहमद को लेकर भाग निकले ।"

रैना सांस लेने के लिए रुकी।

मोन्टो और विकास ध्यान से सुन रहे थे कि रैना ने आगे कहा-----“उसके बाद उन्होंने जितनी भी हंरकते की, उनके पीछे 'मास्टर' के दिमाग में यह बात बैठा देना ही मुख्य मकसद था कि वे सचमुच इकबाल बन चुके हैं…ताकि मास्टर जल्दी-से-जल्दी उसे अपने ठिकाने पर बुलाए-जैसे वे अच्छी तरह जानते थे कि अहमद की हत्या कम-से-कम विजय ने नहीं की है, भले ही चाहे जिसने की हो, मगर, विजय के खिलाफ भड़क उठने का नाटक करते हुए के सीधे गृहमंत्री के पास पहुंच गए------- अनाप-शनाप रिपोर्ट की-ठाकुर साहब से टकराकर पद से इस्तीफा देना और अदालत में मुझसे तलाक की अर्जी देना आदि सभी नाटक था…उनका ख्याल था कि जब वे यह सब कुछ कर लेगे तो 'मास्टर' उनकी याददाश्त लोट आने की घटना पर यकीन कर लेगा----तब भी उनकी मंशा पूरी न हुई तो वे मायूस हो उठे अभी वे सोच ही ,रहे थे कि उन्हें अपना अगला कदम क्या उठाना, है कि तुम सम्राट होटल के कमरा नम्बर पचास में पहुंच गए-यहीं तुमने तबस्सुम को मारने की कोशिश की-तबस्सुम के मरने पर उनका सारा प्लान चौपट हो जाना था, अत: उन्होंने तबस्सुम को तुमसे बचाया------पुलिस को बुलाकर तुम्हें फंसाने वाला बयान दिया----ये सुचना उन्होंने मुझे एक पब्लिक टेलीफोर्न बूथ से फोन पर दी -क्रह्म था कि विकास की इस हरकत के कारण उन्हें एक और खूबसूरत नाटक कंरने का खूबसूरत मौका मिल गया है-मैंने पूछा क्या, तो वे बोले कि इसी समय

चिड़ियाघर से जाकर मोन्टो के बराबर की क्रद-काठी का एक बन्दर ले आऊं-मैंने पूछा कि उसका क्या होगा---उन्होंने यह बताया कि कुछ देर बाद वे तबस्सुम के साथ वहां आएंगे और मुझ पर बरस पड़ेगे---तव तक मोन्टो को कहीं छुपा दूं और चिड्रियाघर'से लाए बन्दर को उसके कपडे पहना दू---- उनके ख्याल से बन्दरों की शक्ल में वहुत ज्यादा फर्क नहीं होता है-मोन्टो के कपडों में यह मोन्टो ही नजर आएगा-यहाँ आकर उन्हें ऐसा नाटक करना था कि बन्दर उन पर हमला कर दे-बस यहां उसे मोन्टो का कत्ल करके तबस्तुम के साथ

भागना था' ।"

" क्यों?"

"मेरे पूछने पर उन्होंने यहीं बताया कि मोन्टो के कल्ल के बाद सारे राजनगर की पुलिस उसे पकडने के लिए कटिबद्ध हो जाएगी---" वे 'मास्टर' के काम के हैं…मास्टर यह कभी नहीं चाहेगा कि पुलिस के चंगुल में फंसें यानी उस स्थिति में मास्टर उसे अड्डे पर ले जांने के लिए विवश हो जाएगा और उसके अड्डे पर पहुचना ही उनका मकसद था ।"

"तो क्या मरने से पहले वे अपने मकसद मे कामयाब हो गए थे ?"

"इस बारे में मैं कुछ नहीं जानती ।"

“क्यों?"

" “क्योंकि उसके बाद किसी भी माध्यम से उनसे बाते ही न हो सकीं !"

“ओह! ”

"यहां विजय आया…मोन्टो की लाश देखते ही वह पागल हो गया----मैने उसे बताया कि मोन्टो को वे मार गए-----सुनकर वह आपे से बाहर हो गया…कुछ ऐसी मुद्रा में और . कुछ -ऐसे संवाद बोलकर वह यहां से जाने लगा कि मैं डर . गई…मेरे दिमाग में यह विचार उठा कि कहीं सचमुच गलतफ़हमी का शिकार होकर विजय उन्हें मार ही न डाले-----यही सोचकर

मैंने उसे सब कुछ बता देने का निश्चया किया------- उसे रुकने के लिए कहा, मगर उस कमीने पर तो खून सवार हो चुका था------------ 'वह रुका ही नहीं-अनिष्ट की आशंका ने मुझें बुरी तरह डरा दिया था, डुसलिए मैं कार लेकर उसके पीछे दोड्री-जब मैंने उसे पकड़ा तो चौराहे पर उनका खूनी युद्ध हो रहा चा-वहां मैंने चीख-चीख-उनसे कहा कि आखिर वे विजय को सब कुछ बता क्यों नहीं देते-उन्होंने भी मेरी एक न सुनी और उस कमीने ने…।"

कहने के बाद रैना फूट फूटटकर रो पडी ।

कठोर चेहरे वाले विकास ने पूछा-"सुना है कि मरने से पहले डैडी ने आप पर भी गोली चलाई ।”

"वे नाटक कर रहै थे ।"

" ऐसा भी क्या नाटक हुआ कि वे आप ही को मार रहे थे !”

"यदि वे नाटक न कर रहे होते तो क्या सचमुच ही हर बार उनका निशाना चूकता?"

विकास की आंखे सिकुड़ती चली गई !

“सवाल पूछकर कम-से-कम मेरा अपमान करने का' हक तो आपको विल्कुल नहीं है मास्टर !"

"मुझें आदमी चाहिए !"

"गुलफाम के हाथ से आपने चाकु जरूर छीन लिया मास्टर-आपने एक ऐसे गुण्डे को जीने का सही मकसद जरूर बता दिया, जिसके कहर से कभी सारा राजनगर कांपता था, राजनगर में आज भी जरायमपेशा में एक ही आदमी ऐसा नही है, जो गुलफाम की इज्जत न करता हो । आप जितने जितने आदमी चाहेंगे-प्रवन्ध हो जाएगा ।"

" मुझे सिर्फ दो हरफनमौला चाहिए !"

" अभी लो मास्टर !' कहकर गुलफाम ने ऊँची आवाज मे अपने गुर्गो को पुकारा-----" अबे ओ टिंकु और टिंगा----कहां मर गये सालों ?"

दो लड़के सामने आ गये !
 
अगले दिन !

"बोलो-तुम्हें बोलना होगा तबस्सुम?" ठाकुर साहब गुर्राये----" ये सब क्या चक्कर था इकबाल की कहानी किसने गढी…वह कौन है, जिसके इशारे पर तुम और अहमद चचा नाच रहे थे ?"

"हजारबार ,कह चुकी हूं कि मैं कुछ नहीं जानती ।"

"और हम अच्छी तरह जानहे है कि तुम सब कुछ जानती हो…अब तुम्हारी ये बकरे की तीन टांग वाली रट बिल्कुल नहीं ,चलेगी-----------तुम्हें सब कुछ बकना ही होगा ।"

" मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप एक ऐसे व्यक्ति से क्या और कैसे बकवा लेंगे, जिसे कुछ मालूम ही नहीं है !"

ठाकुर साहब का चेहरा कठोर हो गया, बोले------"इसका मतलब तुम इस तरह जवाब नहीं दोगी-----जिस चेयर पर तुम बैठी हो, उसे टार्चर चेयर कहते हैं---------इस पर यदि पत्थर को भी बैठा दिया जाए तो उसे बोलना पडता है------हमें सख्ती से पेश आने के लिए मज़बूर मत करो------यदि तुम्हें इलेक्ट्रिक शॉक दिए गए तो तुम उसे सह नहीं सकोगी और तब तुम्हें सब कुछ उगलना होगा ।"

"जब मैं कछ जानती ही नहीं हूं तो उगलूगी क्या?"

तबस्सुम की बार-बार की इस एक ही रट ठाकुर साहब का पारा सातवे आसमान पर पहुंचा दिया…उन्होंने झपटकर बाएं हाथ से तबस्सुम के बाल पकडे उन्हे बुरी तरह झंझोड़ते हुए बोले---- मतलब तुम लातों की भूत हो और बिना टार्चर हमारे सवालों का जवाब नहीं दोगी !"

इससे पहले कि तबस्सुम अपना रटा-रटाया वाक्य दोहराए,, टार्चर रूम के बन्द दरवाजे पर दस्तक हुई--ठाकुर साहब ने ऊंची आवाज़ मे पूछा…“कौन है?"

"सर, मैं हूं शर्मा ।"

"क्या बात ?'

"मिस्टर विकास आपसे मिलने आए हैं-उनका कहना है कि उन्हें इसी वक्त आपसे कुछ जरूरी बाते करनी हैँ-हमने कहा कि ठाकुर साहब व्यस्त हैं लेकिन उन्होंने कहा कि मेरा सन्देश पहुचा दो ।"

ठाकुर साहब ने एक क्षण कुछ सोचा ।

फिर एक झटका-सा देने के साथ ही उसके बाल छोडकर दरवाजे की तरफ बढ़ गए…दरवाजा खोला-सामने' डी एस पी शर्मा खड़ा था ।

ठाकुर साहब ने पूछा…कहां है बिकास?"

"वेटिंग रूम में ।"

"दरवाजा बन्द कर लो !” कहकर ठाकुर साहब आगे वढ़ गए…गेलरी में दोनों तरफ सशस्त्र जवान मुस्तेदी के साथ खड़े थे…शर्मा ने टार्चर रूम का दरवाजा बन्द कर दिया ।

उधर वेटिंग हॉल में कदम रखते ही ठाकुर साहब की नजर विकास पर पंडी-सात फुट लम्बे-----------लडके के चेहरे पर इस वक्त हर तरफ़ गम्भीरता छाई हुई थी…खून का टीका अभी तक उसके मस्तक पर मौजूदु था------उन्हें देखते ही वह फुर्ती से उठ खड़ा हुआ-अपनी विशिष्ट कुर्सी की तरफ बढते हुए ठाकुर ~ साहब ने पुछा…" यहां कैसे आना हुआ विकास ?"

“सुना कि चौराहे से भागने` की कोशिश करती हुई तबस्सुम को पुलिस ने पकड लिया।"

"तुमने ठीक सुना है।"

"इस वक्त वह कहां है?"

"टार्चर'रुम में।”

विकास ने पूछा-----"क्या उसने कुछ बताया?"

"अभी तक नहीं-मगर कोशिश कर रहे हैं ।"

"क्या आप मुझे चांस देगे?"

हल्के से चौंककर ठाकुर साहब ने पूछा-----------"क.......क्या मतलब?"

“मैं चाहता हू कि आप मुझें तीस मिनट दे, दावा कर सकता हूँ कि उससे सारे रहस्य उगलवा लुंगा-----उसकी जुबान खुलवानी जितनी जरूरी अपके लिए है, उतनी ही मेरे-लिऐ भी . . ।"

“क्या तुम उसे टार्चर करना चाहते हो?.”

"यदि जरूरत पडी तो...!"

"म------मगर---!"
 
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