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खण्डहर के बाद से ही विजय रघुनाथ और तबस्सुम का पीछा कर रहा था-तबस्सुम ओंर रघुनाथ ने होटल 'सम्राट' में एक कमरा लिया था…विजय ने पता लगा लिया था कि उम्हें . , पचास नम्बर का कमरा मिला है-----कुछ देर तक वे अपने कमरे में आराम करते रहे थे।
किर कमरे मे ही लंच गया।
स्वयं-विजय ने भी हाँल में बैठकर लंच लिया।
वे चार बजे अपने होटल से बाहर निकले-कार में बैठकर रवाना हो गए------अपनी कार में इस वत्त भी विजय उनका पीछा कर रहा था------उस वक्त विजय की खोपडी घूम गई, जब उसने रघुनाथ की कार को कचहरी के अन्दर दाखिल होते देखा ।
काफी दिमाग' घुकाने के बाद भी विजयं यह नहीँ सोंच सका कि वे कचहरी कूयो गए हैं?
सुबकती हुई रैना ने विकास को सारी बाते विस्तारपूर्वक बता दीं।
सुनकर जहाँ विकास का चेहरा कठोर हो गया, वहीं धनुषटंकार ने भी अन्धाधुन्ध शराब पीनी शुरू कर दी-हालांकि है गुस्से के कारण लडके का सारा जिस्म कांप रहा था, परन्तु स्वयं को संयत रखकर उसने कहा…"म..........मगर मम्मी-आप इस तरह रो क्यों रही हैं?"
"तुमसे तुम्हारे डैडी छिन गए विकास !"
" नही---।” विकास ने दृढ़ता के साथ कहा---------“मैं इस तरह उन्हें नहीँ छिनने दुंगा !"
रोती हुई रैना ने कहा…"कोई कर भी क्या सकता है?"
"चाहे जो करना पड़े मम्मी-विकास की मां होकर रो रही हो तुम…रो मत मां-ये तूने सोच कैसे लिया कि कोई भी ऐरे-गैरे आकर डैडी को इकबाल बनाकर हमसे छीनकरं ले जाएगे-यदि वे इकबाल हैं भी तो हमारे रघुनाथ भी हैँ…मेरे डैडी और तुम्हारे पति भी हैं।"
"चाचाजी ने बताया कि कानूनन उन पर उन्हीं का हक बनता है !"
" तुम भूल मां-----क्या तुम भूल गई तुम्हारा विकास ऐसे कानून को नहीं मानता, जो किसी पर जुल्म करे--दुनिया का कोई भी कानून डैडी को हमसे नहीं छीन सकता और यदि ऐसा हुआ तो दुनिया-भर की कानून की किताबों मे आग लगा दूंगा…तेरा बेटा दुनिया की सारी अदालतों को जलाकर राख कर देगा मां…त..तुम.......तुम…! "
आगे कहता-कहता विकास रुक गया ।
पोर्च में कोई कार रुकी थी-दो--तीन लम्बे कदमों के साथ वह दरवाजे पर पहुंचा-वहां से पोर्च साफ चमकता था-कार मे से उसने रघुनाथ और तबस्सुम को निकलते देखा ।
उसने घूमकर कहा…"डेडी आ रहे है । "
सोफे पर बैठी रैना जल्दी से खडी हो गई…साड्री के पल्लू से आंसू पोछे--------धनुषटंकार इसतरह सम्भलकर बैठ गया, जैसे को महत्वपूर्ण काम करना हो, तबस्सुम का हाथ पकड़े रघुनाथ तेज कदमों के साथ इसी तरफ आ रहा था ।
विकास के समीप पहुँचते ही वह ठिठका ।
पूरी श्रद्घा के साथ विकास चरण स्पर्श करने के लिए झुका-रघुनाथ शीघ्रता से दो कदम पीछे हट गया…जिस वक्त सुर्ख चेहरा लिए विकास सीधा हो रहा था, उस वक्त रघुनाथ ने पूछा-“कौन हो तुम?"
"विकास ।
“ओह !" रघुनाथ के चेहरे पर व्यंग्य और खिल्ली उड़ाने बाले भाव पैदा गए…"तो तुम हो बिकास-हमारा बेटा होने का दावा करने बाले--खूबसूरत हो अच्छा कद है----ठाकुर साहव को मेरे अब्बाजान के हत्यारे के रुप में तुम्हारे जैसे-ही कद के किसी व्यक्ति की तलाश है।"
"क्या मतलब डैडी?"
"कुछ नहीँ…रांस्ता छोड़ो-मुझे तुम्हारी मा से मिलना है ।"
विकास एक तरफ हट गया-कमरे में कदम रखते ही रघुनाथ को बुरी तरह चौंककर पीछे हट जाना पड़ा ॥॥॥
कारण अचानक ही थनुषटंकार का उसके चरणों में गिर पडना था-----रघुनाथ अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि धनुषटंकार चरण स्पर्श करने के बाद एक ही जम्प में सोफे की पुश्त पर जा बैठा ।
तबस्सुम और रघुनांथ उसे हैरतअंगेज दृष्टि से देखते रहे ।
एकाएक रघुनाथ ने कहा-“ये बन्दर कौन है ?”
बन्दर शब्द कहने का मजा चखाने के लिए अभी धनुषटंकार उछलने ही वाला था कि विकास ने जल्दी से कहा…"नहीँ मोन्टो डेडी ने अनजाने में कहा है !'
धनुषटंकार रुक गया ।
रघुनाथ ने कहा…“काफी समझदार बंदर है ।"
"आप उसे बार-बार बन्दर न कहें-वह चिढ़ता है--उसका नाम मोन्टो है और यदि आप उसे इसी नाम से पुकारे तो अच्छा होगा ।" विकास ने कहा ।
रैना चुपचाप खडी सब कुछ देख-खुन रही थी-वह एक शब्द भी नहीं बोली थी-----जैसे गूगी हों-हां, अन्दर से फूट पड़ने वाली रुलाई को रोकने की कोशिश में रह-रहकर उसका
चेहरा जरूर बिगड़ने लगता था !'''
-एकाएक ही रघुनाथ उसकी तरफ़ घूमकर बोला-“मैं तुम से हीँ कुछ बाते करने आया था ।"
"ज, .. जी ।"
"क्या तुम¸ मेरी पत्नी बनी रहता चाहती हो?"
चौके हुए अन्दाज में रैना ने उसकी तरफ देखा, बोली-- "मैं इस सवाल का अर्थ नहीं समझी नाथ…-पत्नी तो मैं आपकी हू ही ।"
"मैं नहीं जनता----मगर तुम कह रही हो---------तुम्हारा बेटा कह रहा है--सारा राजनगर यही कह रहा है, इसीलिए मानता हू कि तुम मेरी पत्नी हो---मै. हां या ना में ज़वाब चाहता हु----- यह पूछा है कि क्या तुम भविष्य में भी मेरी पत्नी वनी रहना चाहती हो?"
"पत्नी के लिए पति के चरणों के अलावा जगह ही कहां है ?"
"इसका मतलब बनी रहना चाहती हो ?"
रैना चुप रही ।
रघुनाथ ने आगे कहा…"भविष्य में मेरी पत्नी बनी रहने के लिए तुम्हें मेरी एक शर्त मंजूर करनी पडेगी।"
" किसी भी पत्नी को हजार शर्ते भी मंजूर हो सकती है ।"
"मेरी पहली पत्नी यानी तबस्सुम को तुम्हारे बराबर के बल्कि उससे भी ज्यादा अधिकार प्राप्त होंमे ।"
" न.......नाथ !" रैना का स्वर कांपा ।
"ड.. .डैडी!" विकास की चीख से सारी कोठी झनझना उठी।
“अपने बेटे से कहो कि वह चुप रहे-मैं तुमसे बात कर रहा हू औऱ एक समझदार बेटे को मां-बाप के बीच में बोलने का कोई हक नहीं है।"
"मुझे पूरा हक है डैडी?" दहाड़ता हुआ विकास उसके सामने आ गया----"अ................आप----आखिर हो क्या गया है आपको आप समझते क्यों नहीं?"
"तुम बीच में से हटते हो या नहीं?"
अभी विकास ने कहने के लिए मुंह खोला ही था के रैना बोल पडी----" डैडी ठीक कह रहे हैं विकास-तुम्हें मां-बाप के बीच में नही बोलना चाहिए-हट जाओं बेटे!"
"म........मगर मा!'
रैना का कठोर स्वर---" मेरा हुक्म है विकास?"
किर कमरे मे ही लंच गया।
स्वयं-विजय ने भी हाँल में बैठकर लंच लिया।
वे चार बजे अपने होटल से बाहर निकले-कार में बैठकर रवाना हो गए------अपनी कार में इस वत्त भी विजय उनका पीछा कर रहा था------उस वक्त विजय की खोपडी घूम गई, जब उसने रघुनाथ की कार को कचहरी के अन्दर दाखिल होते देखा ।
काफी दिमाग' घुकाने के बाद भी विजयं यह नहीँ सोंच सका कि वे कचहरी कूयो गए हैं?
सुबकती हुई रैना ने विकास को सारी बाते विस्तारपूर्वक बता दीं।
सुनकर जहाँ विकास का चेहरा कठोर हो गया, वहीं धनुषटंकार ने भी अन्धाधुन्ध शराब पीनी शुरू कर दी-हालांकि है गुस्से के कारण लडके का सारा जिस्म कांप रहा था, परन्तु स्वयं को संयत रखकर उसने कहा…"म..........मगर मम्मी-आप इस तरह रो क्यों रही हैं?"
"तुमसे तुम्हारे डैडी छिन गए विकास !"
" नही---।” विकास ने दृढ़ता के साथ कहा---------“मैं इस तरह उन्हें नहीँ छिनने दुंगा !"
रोती हुई रैना ने कहा…"कोई कर भी क्या सकता है?"
"चाहे जो करना पड़े मम्मी-विकास की मां होकर रो रही हो तुम…रो मत मां-ये तूने सोच कैसे लिया कि कोई भी ऐरे-गैरे आकर डैडी को इकबाल बनाकर हमसे छीनकरं ले जाएगे-यदि वे इकबाल हैं भी तो हमारे रघुनाथ भी हैँ…मेरे डैडी और तुम्हारे पति भी हैं।"
"चाचाजी ने बताया कि कानूनन उन पर उन्हीं का हक बनता है !"
" तुम भूल मां-----क्या तुम भूल गई तुम्हारा विकास ऐसे कानून को नहीं मानता, जो किसी पर जुल्म करे--दुनिया का कोई भी कानून डैडी को हमसे नहीं छीन सकता और यदि ऐसा हुआ तो दुनिया-भर की कानून की किताबों मे आग लगा दूंगा…तेरा बेटा दुनिया की सारी अदालतों को जलाकर राख कर देगा मां…त..तुम.......तुम…! "
आगे कहता-कहता विकास रुक गया ।
पोर्च में कोई कार रुकी थी-दो--तीन लम्बे कदमों के साथ वह दरवाजे पर पहुंचा-वहां से पोर्च साफ चमकता था-कार मे से उसने रघुनाथ और तबस्सुम को निकलते देखा ।
उसने घूमकर कहा…"डेडी आ रहे है । "
सोफे पर बैठी रैना जल्दी से खडी हो गई…साड्री के पल्लू से आंसू पोछे--------धनुषटंकार इसतरह सम्भलकर बैठ गया, जैसे को महत्वपूर्ण काम करना हो, तबस्सुम का हाथ पकड़े रघुनाथ तेज कदमों के साथ इसी तरफ आ रहा था ।
विकास के समीप पहुँचते ही वह ठिठका ।
पूरी श्रद्घा के साथ विकास चरण स्पर्श करने के लिए झुका-रघुनाथ शीघ्रता से दो कदम पीछे हट गया…जिस वक्त सुर्ख चेहरा लिए विकास सीधा हो रहा था, उस वक्त रघुनाथ ने पूछा-“कौन हो तुम?"
"विकास ।
“ओह !" रघुनाथ के चेहरे पर व्यंग्य और खिल्ली उड़ाने बाले भाव पैदा गए…"तो तुम हो बिकास-हमारा बेटा होने का दावा करने बाले--खूबसूरत हो अच्छा कद है----ठाकुर साहव को मेरे अब्बाजान के हत्यारे के रुप में तुम्हारे जैसे-ही कद के किसी व्यक्ति की तलाश है।"
"क्या मतलब डैडी?"
"कुछ नहीँ…रांस्ता छोड़ो-मुझे तुम्हारी मा से मिलना है ।"
विकास एक तरफ हट गया-कमरे में कदम रखते ही रघुनाथ को बुरी तरह चौंककर पीछे हट जाना पड़ा ॥॥॥
कारण अचानक ही थनुषटंकार का उसके चरणों में गिर पडना था-----रघुनाथ अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि धनुषटंकार चरण स्पर्श करने के बाद एक ही जम्प में सोफे की पुश्त पर जा बैठा ।
तबस्सुम और रघुनांथ उसे हैरतअंगेज दृष्टि से देखते रहे ।
एकाएक रघुनाथ ने कहा-“ये बन्दर कौन है ?”
बन्दर शब्द कहने का मजा चखाने के लिए अभी धनुषटंकार उछलने ही वाला था कि विकास ने जल्दी से कहा…"नहीँ मोन्टो डेडी ने अनजाने में कहा है !'
धनुषटंकार रुक गया ।
रघुनाथ ने कहा…“काफी समझदार बंदर है ।"
"आप उसे बार-बार बन्दर न कहें-वह चिढ़ता है--उसका नाम मोन्टो है और यदि आप उसे इसी नाम से पुकारे तो अच्छा होगा ।" विकास ने कहा ।
रैना चुपचाप खडी सब कुछ देख-खुन रही थी-वह एक शब्द भी नहीं बोली थी-----जैसे गूगी हों-हां, अन्दर से फूट पड़ने वाली रुलाई को रोकने की कोशिश में रह-रहकर उसका
चेहरा जरूर बिगड़ने लगता था !'''
-एकाएक ही रघुनाथ उसकी तरफ़ घूमकर बोला-“मैं तुम से हीँ कुछ बाते करने आया था ।"
"ज, .. जी ।"
"क्या तुम¸ मेरी पत्नी बनी रहता चाहती हो?"
चौके हुए अन्दाज में रैना ने उसकी तरफ देखा, बोली-- "मैं इस सवाल का अर्थ नहीं समझी नाथ…-पत्नी तो मैं आपकी हू ही ।"
"मैं नहीं जनता----मगर तुम कह रही हो---------तुम्हारा बेटा कह रहा है--सारा राजनगर यही कह रहा है, इसीलिए मानता हू कि तुम मेरी पत्नी हो---मै. हां या ना में ज़वाब चाहता हु----- यह पूछा है कि क्या तुम भविष्य में भी मेरी पत्नी वनी रहना चाहती हो?"
"पत्नी के लिए पति के चरणों के अलावा जगह ही कहां है ?"
"इसका मतलब बनी रहना चाहती हो ?"
रैना चुप रही ।
रघुनाथ ने आगे कहा…"भविष्य में मेरी पत्नी बनी रहने के लिए तुम्हें मेरी एक शर्त मंजूर करनी पडेगी।"
" किसी भी पत्नी को हजार शर्ते भी मंजूर हो सकती है ।"
"मेरी पहली पत्नी यानी तबस्सुम को तुम्हारे बराबर के बल्कि उससे भी ज्यादा अधिकार प्राप्त होंमे ।"
" न.......नाथ !" रैना का स्वर कांपा ।
"ड.. .डैडी!" विकास की चीख से सारी कोठी झनझना उठी।
“अपने बेटे से कहो कि वह चुप रहे-मैं तुमसे बात कर रहा हू औऱ एक समझदार बेटे को मां-बाप के बीच में बोलने का कोई हक नहीं है।"
"मुझे पूरा हक है डैडी?" दहाड़ता हुआ विकास उसके सामने आ गया----"अ................आप----आखिर हो क्या गया है आपको आप समझते क्यों नहीं?"
"तुम बीच में से हटते हो या नहीं?"
अभी विकास ने कहने के लिए मुंह खोला ही था के रैना बोल पडी----" डैडी ठीक कह रहे हैं विकास-तुम्हें मां-बाप के बीच में नही बोलना चाहिए-हट जाओं बेटे!"
"म........मगर मा!'
रैना का कठोर स्वर---" मेरा हुक्म है विकास?"