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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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* * * * * * * * * * मम्मी फ्लैशबैक में

मम्मी- तो सुनो सब लोग... लण्डवाले लण्ड मुठियाते हुए सुनो... चूतवालियां चूत खुजलाती हुई सुनो।

झरना- क्यों मम्मी? एक काम करते हैं कि चूतवालियां लण्ड को सहलाये और लण्डवाले चूत को खुजलाएं तो कैसा रहे?

मम्मी- “गुड आइडिया मेरी चुदक्कड़ बेटी। वेरी गुड...” तो सुनो- “शादी के कुछ ही महीने बाद की बात है। मैं अक्सर परचून की दुकान में जाती थी सामान लेने के लिए। लालाजी मेरी तरफ हमेशा लचाई नजर से देखते थे। इधर मेरे पतिदेव मेरी गाण्ड के पीछे पड़े हुए थे की मुझे गाण्ड मारनी है। पहली बार में इतना दर्द हुआ की मैंने गाण्ड मराई से तौबा कर ली...”

मम्मी- हाँ... तो बात हो रही थी लालाजी की जो सामान देने के बहाने मेर हाथ को छू लेता था। कभी आँख मार देता था। मैं शर्माती कुछ कह नहीं पाती थी। इससे लालाजी का हौसला बढ़ने लगा। एक दिन तो हद हो गई। साले ने सामान पकड़ने के बहाने मेरी चूचियों को ही दबा दी। मैंने घर में आकर तेरे बापू को सब खबर सुनाई। उसने पहले तो गुस्सा किया। फिर हम दोनों ने मिलकर ये फैसला किया।

शाम के टाइम मैं फिर से लाला की दुकान में पहुँची। दुकान उस टाइम खाली थी। लालाजी तो मुझे देखते ही चहकने लगे। सामान देने के बहाने मेरी चूचियां दबाने लगे।

मैंने हिम्मत जुटाके कहा- लालाजी आज ये शहर गये हैं।

लालाजी- अच्छा तो हमारी बल्ले-बल्ले है।

मम्मी- हाँ लालाजी... मैं भी आपसे मिलना चाहती हूँ। आज अच्छा मौका है। आधी रात को हमारे घर में आ जाना।

लालाजी- पर वहाँ तुम्हारी सास ससुर?

मम्मी- अरे वो तो तीर्थ यात्रा पर गये हुए हैं।

लालाजी- फिर तो मैं पक्का आऊँगा।

मम्मी- आधी रात को... मेरा दिल घबरा रहा था। एकाएक किसी के आने की पदचाप से मेरा दिल और तेजी से धड़कने लगा। हाय आगे क्या होगा?

लालाजी कमरे में आ गये। और मुझसे लिपट गये। मैं भी तेजी के साथ उनकी धोती खोलने लगी।

जीजाजी- हे... हाय मम्मी, तो क्या तुम लालाजी से चुदवा ली उस रात को?

मम्मी- चुपकर साला बहनचोद।

जीजाजी- खाली बहनचोद नहीं मम्मी मैं मदरचोड़ भी हूँ।

मम्मी- ठीक है, ठीक है... बीच में मत टोक और सुन आगे क्या हुआ? जैसे ही मैंने लालाजी को पूरा नंगा कर दिया। प्लान के मुताबिक मैंने एक आह्ह... निकाली। दरवाजे के बाहर तेरे बापू इसी पल का इंतेजार कर रहे थे। उन्होंने फट से दरवाजा ठकठकाया- ठक्क... ठक्क... ठक्क...

 
हम दोनों घबराए। लालाजी का तो पेशाब निकल गया।

मम्मी- मैं घबराने का आक्टिंग कर रही थी। मैंने पूछा- कौन है?

बाहर से तेरे बापू की आवाज आई- भागवान... दरवाजा खोल, शहर से आ गया हूँ।

लालाजी को काटो तो खून नहीं।

मम्मी- मैंने उसे समझाया- “लालाजी गजब हो गया? शहर से मेरा पति आ गया। अब क्या होगा? वो तो बड़ा गुस्सैल है। हम दोनों को ही काट के फेंक देगा...”

लालाजी घबराते हुए बोले- अब क्या करें?

मम्मी- करना क्या है? मैं तुम्हारी धोती और कमीज को छुपा देती हूँ। तुम मेरा साया, साड़ी और ब्लाउज़ पहन लो।

लालाजी- “फिर क्या होगा?” लालाजी ने घबराते हुए पूछा।

मम्मी- यही एक तरीका है हम दोनों के बचने का।

लालाजी ने बचने के लिए फट से मेरा साया, साड़ी, ब्लाउज़ पहन लिया।

दीदी- और तुम मम्मी? तुम नंगी ही रही क्या?

मम्मी- अरे नहीं बहूरानी। मैंने तो साले को अपना जिश्म दिखाया ही नहीं था। पलंग के ऊपर प्लान के मुताबिक पहले से ही साया, साड़ी और ब्लाउज़ रखा हुआ था। लालाजी के मेरे कपड़े पहनते ही मैंने लंबे से पूँघट के नीचे उसका चेहरा छुपाया और... दरवाजे को खोला।

प्लान के मुताबिक मेरे पति गुस्से से उबल पड़े- “साली कुतिया अंदर किससे चुदवा रही थी? कहीं लाला तो नहीं है? गाँव वाले बोल रहे थे कि बड़ी लाइन मारता है तेरे ऊपर?

अंदर एक महिला को देखकर वो ठिठक गये- ये कौन है?

मम्मी- ये है मेरी सहेली पड़ोस की रामदीन की बीवी। आप शहर गये हुए थे। माँ पिता जी भी नहीं हैं। मुझे अकेले में डर लग रहा था। इसीलिए इसे बुला लिया।

 
बहुत ही अच्छा काम किया भागवान... वरना लाला जैसे और भी कितने मनचले हैं, जो तेरी चूत में लण्ड घुसाने को आतुर रहते हैं। वो तो मुझसे डरते हैं, नहीं तो कब का तेरी फुद्दी में अपना लण्ड पेल चुके होते।

मम्मी- छी छी... क्या बात करते हो जी? मेरी सहेली यहाँ बैठी है।

ओहो... मैं तो इससे भूल ही गया था। जा मेरे लिए गरम पानी करके ला, नहाना है।

मम्मी- मैं अंदर रसोई में गई और वापस आ गई। लेकिन कमरे के अंदर नहीं गई बाहर से अंदर झाँकने लगी।

अंदर मेरे पति बहू बनी लालाजी के पास पहुँच गये और पीछे से उसको अपनी बाहों में भर लिए- “रामदीन की बहू... बहुत दिनों से तेरे ऊपर मेरी नजर थी। बीवी के सामने बोल नहीं पाता था। आज शानदार मौका मिला है...” उनकी छाती सहलाते हुए बोले- “अरे तेरी छाती? ऐसी कैसे है? बिल्कुल भी चूचियां बड़ी नहीं हैं? लगता है। राम...दीन तेरी चूचियां ठीक से दबाता नहीं है। कोई बात नहीं... मेरे से रोज दबवाना। दस दिन में मेरी बीवी की जितनी बड़ी-बड़ी हो जाएंगी, तेरी चूचियां... फिर लाला सरीखे गाँव के मनचले तेरे आगे-पीछे घूमेंगे। इससे पहले की मेरी बीवी गरम पानी करके ले आए मैं आज तेरे जिश्म से अपनी भूख मिटा लेता हूँ..” ।

लालाजी सिर से लेकर पाँव तक काँप गये। पूँघट उठा नहीं सकते थे। कोई आवाज निकाल नहीं सकते थे। अब तो पकड़े जाना ही था। साया के उठाते ही मेरे पति को पता लग ही जाना था की लाला कोई औरत नहीं मर्द है। फिर क्या होगा? साला मार मारकर मुझे अधमरा कर देगा।

लालाजी ये सब सोच ही रहे थे की तेरे बाबूजी ने कहा- “साली, तू जब मटकमटक के चलती है ना। तेरे कूल्हे आपस में टकराते हैं। हाय... मैं तो तेरी गाण्ड का दीवाना हूँ। आज तेरी गाण्ड मासँग। तेरी सहेली याने की मेरी बीवी अपनी गाण्ड छूने ही नहीं देती। तेरी गाण्ड मारके मुझे शान्ती मिलेगी। फिर भी तेरी मर्जी है। चूत मरवानी है तो पलंग पे पीठ के बाल लेट जा। और मुझे गाण्ड का सुख देना चाहती हो तो फौरन से कुतिया बन जा...”

लालाजी का दिमाग तेज चलने लगा। लालाजी ने सोचा- “चूत तो है ही नहीं तो पीठ के बाल लेटकर क्या करूंगा? भगवान ने उसे आज बचा लिया जो साले को गाण्ड मारने की सूझी है। लालाजी फौरन कुतिया बनकर चौपाया हो गये।

तेरे बाबूजी ने थोड़ा सा उसके गाण्ड में थूका और थोड़ा सा थूक अपने लण्ड में लगाया- साली, तेरी गाण्ड से गंध आ रही है। ठीक से गाण्ड को धोती नहीं है क्या?

लालाजी और क्या बोलते... चुपचाप रहे, और एकाएक उनकी गाण्ड के छेद पे तेरे बाबूजी का लण्ड लगा और उन्होंने निशाना साधा और... एक करारा धक्का लगाया।

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लालाजी की चीख निकल गई- “हाय दर्द हो रहा है...”

 
कुछ नहीं साली... पहली बार में थोड़ा दर्द होगा, फिर मजा आएगा। देखना, एक बार मुझसे गाण्ड मरा लेगी ना तो फिर रोज आएगी यहाँ मुझसे गाण्ड मराने को...” कहते हुए तेरे बाबूजी ने दूसरा धक्का लगाया।

लालाजी की चीख उबल पड़ी- “हाय... मैं मरी...”

और फिर तेरे बाबूजी ने ताबड़तोड़ धक्का लगाना चालू जो किया तो फिर लण्ड से पानी निकलने के बाद ही उन्होंने छोड़ा।

लालाजी की चीख निकलती रही। लण्ड उसकी गाण्ड के अंदर-बाहर होता रहा। लालाजी की आँखों से आँसू निकल रहे थे, और फिर तेरे बाबूजी के लण्ड से फौव्वारा छूटा और लालाजी की गाण्ड तेरे बाबूजी के पानी से भर गई।

तेरे बाबूजी ने लालाजी के गालों को चूमते हुए कहा- “वाह... साली, मजा आ गया, आज तो। वायदा कर की कल फिर से आएगी। चल ठीक से बैठ जा। इससे पहले की मेरी बीवी आ जाए और हम दोनों को इस अवस्था में देख ले साड़ी ठीक कर ले। तू तो जानती ही है कि मैं तेरी इस गाण्ड का कितना बड़ा दीवाना हूँ... कहीं फिर से मूड ना हो जाये। अरे देख-देख मेरा लण्ड तो फिर से खड़ा होने लगा..."

लालाजी ने घबराते हुए अपनी साड़ी को फट से नीचे किया।

और मैं कमरे में दाखिल हुई- “हाँ जी... तो फिर मेरी सहेली का क्या करना है?

करना क्या है भागवान? यहीं इसी कमरे में सो जाएगी।

मम्मी- इसी कमरे में सो जाएगी? और मेरे सोने के बाद कहीं आपका उस पे मन चल गया तो?

मन चल गया तो क्या होगा भगवान? वही होगा जो हम दोनों के बीच में होता है। वैसे भी साली, आधी घरवाली होती है तो सो जाने दो। बल्कि मैं तो कहता हूँ कि मैं बीच में सो जाता हूँ। तुम दोनों मुझसे लिपटते हुए सो जाओ। पहले तेरी बजाता हूँ, या रहने दे। आज साली पहली बार आई है तो इसी का बजाता हूँ।

मम्मी- “पर जी आप तो मेरी सहेली के गाण्ड के दीवाने थे। आप तो कहते थे की मौका मिला तो रामदीन की बहू की गाण्ड जरूर से मारना चाहूँगा। आज मार लो इसकी गाण्ड..”

भागवान... मैं इस शानदार मौके को हाथ से थोड़े ही जाने देता। गाण्ड मार भी चुका हूँ।

 
मम्मी- “अच्छा- “कब? हाय मेरी लाजवंती... वैसे तो मुझसे कहती थी कि जीजाजी से लाज आवे है। अब मौका मिलते ही गाण्ड मरवा भी चुकी। तू तो यारा बड़ी चुदक्कड़ निकली...”

चल ठीक है भागवान। गाण्ड तो मरा ही चुकी है तेरी सहेली। अब तेरे सामने इसकी फुद्दी भी बजा ही देता हूँ।

लालाजी सिर से पाँव तक काँप गये।

हम दोनों मुश्कुरा रहे थे।

मम्मी- “हाँ हाँ मार लो जी, मेरी सहेली की फुददी को। वैसे भी मैं दिन भर केलाकर-करके थक चुकी हैं। मार लो मेरी साली की फुद्दी को...”

लालाजी मेरे पाँव में गिर गये।

मम्मी- मुझे रहम आ गया। मैंने कहा- “अजी रहने दो। अभी याद आया की ये महीना हो रखी है..”

महीना हो रखी है? पर कपड़ा तो ले ही नहीं रखा है इसने? देखें तो इसकी फुद्दी को?

मम्मी- “अजी रहने दो, फिर कभी चोद लेना। पहली बार ही शर्म आती है, अगली बार से देख लेना। चूतड़ उछाल-उछालकर चुदवाएगी आपसे। क्यों री बहना?”

लालाजी घबरा करके गर्दन हिलाने लगे।

ठीक है फिर मैं छोड़ के आ जाता हूँ इसके घर तक।

मम्मी- “अजी रहने दो। बगल में ही तो घर है, चली जाएगी...” तेरे बाबूजी ने दरवाजा खोला तो बंदूक से निकली गोली की तरह लालाजी अपने घर की ओर दौड़ लिए।

हम सब जीजाजी, दीदी, सासूमाँ, झरना दीदी, और मैं खिलखिलाकर हँस पड़े।

दीदी- फिर क्या हुआ सासूमाँ? क्या ससुरजी ने फिर फुद्दी की भी चुदाई की?

मम्मी- अरे नहीं रे.. लालाजी ने दूसरे दिन दुकान ही नहीं खोला।

मम्मी- तीन दिन के बाद अकेले देखकर मैं उनकी दुकान पहुँच गई। सामान लिया और आते वक्त कहालालाजी, मेरी सहेली को पतिदेव याद कर रहे थे। कह रहे थे कि बहुत मजा आया उस रात को। आज फिर से बुलाया है। तो आधी रात को आ जाना हमारे घर...”

लालाजी अपना गुस्सा पीते हुए बोले- “हमको कौनो गाण्ड मराने शौक थोड़े ही है कि तुमरे घर जाएं। साला चोदने को तो मिला ही नहीं, उल्टा गाण्ड मराके आना पड़ा। साला अभी तक गाण्ड में दर्द हो रहा है। जब-जब वो। वाकया याद करता हूँ तो गाण्ड में एक टीस सी उठ जाती है, साला खाया पिया कुछ नहीं और गिलास थोड़ा बारह आना..."

 
मम्मी- “तो ठीक है ना... गाण्ड की खुजली दूर कर देंगे। आप आओ तो सही...”

लालाजी- “मेरी बहन, मैं आपकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखूगा...”

दीदी- “तो सासूमाँ इस तरह से आपका लालाजी से पीछा चूत गया।

मम्मी- “हाँ... मेरी प्यारी बहू...” और उस समय जब लालाजी कह रहे थे न की हमें कोई गाण्ड मराने का शौक थोड़े ही है जो आपके घर जाऊँ। तो मेरे पीछे मेरी वही पड़ोसन खड़ी थी जो की मेरी प्यारी सहेली भी थी। उसने मुझे शाम को दिशा मैदान में पकड़ लिया और सब राम-कहानी सुन ली। और हँस-हँसकरके लोट-पोट होने लगी।

फिर मेरी सहेली ने कहा- देख मेरी प्यारी सहेली, मेरा नाम लेकर जीजाजी ने लालाजी की गाण्ड मारी है। तो मैं भी एक बार तो कम से कम उसने चुदवाऊँगी। ये तो मेरा हक बनता है।

दीदी- तो क्या मम्मीजी, वो बाबूजी से चुदवाई?

मम्मी- “अरे हाँ री... पर इस बार हमने तेरे बाबूजी को धोखा दिया। रात को सहेली को लेकर मैं तेरे बाबूजी के पास आ गई और कहने लगी- लो जी मेरी सहेली को... न जाने क्या मजा दिया तुमने की फिर से आज आ गई...”

तेरे बाबूजी तो उसे लालाजी ही समझ रहे थे- “ठीक है साली जी... पर आज पीछे का नहीं आगे का मजा लूंगा। चल पीठ के बल लेट जा..."

और मेरी सहेली पीठ के बल लेट गई।

तेरे बाबूजी ने आश्चर्य के साथ जब हाथ फेरा तो लण्ड की जगह चूत के बाल हाथ में आए तो वो काँप गये। और जब लालटेन के उजाले में उन्होंने देखा की ये तो सचमुच मेरी सहेली यानी उनकी मुँह बोली साली है तो फिर फूले ना समाए। उस रात रात भर मेरी सहेली की पुंगी बजाते रहे। सुबह मेरी सहेली की बुर सूज करके पाओ रोटी बन गई। मैंने गरम पानी से सेंका, तब जाकर उसे कुछ आराम आया।

मम्मी की सहेली- “छीः जीजाजी... हम चुदवाने आ गये, मतलब पूरा कचूमर ही निकल दोगे। अब फिर कभी आपसे चुदवाने नहीं आऊँगी...”

मम्मी- “फिर.. मुझे आश्चर्य तब लगा जब तीसरे ही दिन दिशा मैदान में उसने कहा की वो आज फिर से मेरे साथ रात गुजरने को तैयार है। फिर तो जब-जब उसका पति गाँव से बाहर होता। तब-तब वो मेरे साथ रात भर टाँगें फैलाकर मेरे पति के लण्ड को अपनी फुद्दी में पेलवाती रहती। खैर वो सब छोड़ो झरना बेटी, तुम्हारी जिंदगी की पहली चुदाई के बारे में बताओ...”\

 
झरना मुश्कुराते हुए बोली- ठीक है... टांगें फैलाकर सुनो। बात उन दिनों की है जब मुझपे नई-नई जवानी आ रही थी। नींबू जैसी चूचियों को आते जाते सब घूरते रहते थे। एक रात की बात है जब पानी पीने के लिए... (दोस्तों, सब कहानियों में ऐसे ही होता है। प्यास लगी, पानी पीने को किचेन में गये और... दिख गया कुछ) तो मैंने देखा बाबूजी के कमरे में।

मम्मी- बाबूजी के कमरे में? याने बेटी हमारे कमरे में?

झरना- “हाँ हाँ मम्मीजी... आपके कमरे में से आवाजें आ रही थीं। दरवाजे की झिरी में से देखा तो माँ तुम.. एकदम नंगी होकर एक आदमी का लण्ड चूस रही थी...”

मम्मी- “हे कौन था वो? मर जावां, जिसका लण्ड चूसते हुए तूने देख लिया बेटी। कहीं तेरे मामाजी तो नहीं थे?

झरना- “वो नहीं थे.. वाउ... क्या मम्मी आप मामाजी का लण्ड भी चूस चुकी हो?

मम्मी- “हाँ बेटी... जैसे एक बार खून मुँह में लग गया तो आदमखोर शेर इंशान का शिकार करना नहीं छोड़ता। वैसे ही लण्ड का शौक लगा गया तो फिर लण्ड है किसका? ये मुझसे और नहीं देखा जाता। तूने आज देखा नहीं कि कैसे मैंने बहूरानी के भाई के लण्ड से ही चुदवा लिया। खैर तू अपनी जीवन गाथा को आगे बढ़ा...”

झरना- जब वो इंसान नीचे झुका तो मैंने देखा?

मम्मी- कौन था? कहीं तेरा खुद का भाई तो नहीं था?

झरना- “नहीं...”

मम्मी- फिर तेरे नानाजी?

झरना- हे राम... मम्मी, आप नानाजी से भी चुदवा रखी हो?

मम्मी- मैंने कहा ना बेटी, लण्ड और चूत की चुदाई में रिश्तेदारी नहीं देखी जाती।

झरना- बैंक यू मम्मी... तो मैंने देखा कि वो मेरे प्यारे बाबूजी थे।

मम्मी- “ओह्ह... खोदा पहाड़ तो निकली चुहिया। आखिर दूसरा कोई नहीं था और मैं तेरे बाबूजी का ही लण्ड चूस रही थी। और जोश में आकर मैंने खुद की पाल पट्टी खोल दी...”

 
झरना- कोई बात नहीं मम्मी, अबकी गर्मी की छुट्टियों में नानाजी के घर जाऊँगी तो नानाजी से पूछूगी, और मामाजी से भी की मेरी फुद्दी को पेलते हुए साल हो गये और अपने राज को मेरे सामने नहीं खोला...”

दीदी- “हे दीदी आप मेरे मामा-ससुर और नाना-ससुरजी से चुदवा रखी हो।।

झरना- “चुदवा रखे हो? अरे भाभी, जब तक नानाजी और मामाजी मुझे चोद नहीं लें। तब तक मेरा खाना हजम नहीं होता था। नानी अक्सर मामाजी से कहा करती थी कि जा बेटा एक बार पेल दे अपनी भांजी को। मुझे तो रोज ही करता है, मुझे कल पेल देना..."

दीदी- हे राम... क्या परिवार है? मामाजी नानीजी को चोदते हैं?

झरना- “हाँ भाभीजी... और नानाजी मामीजी को...”

हाँ तो खैर मैं उनकी चुदाई देख रही थे। माँ अपनी दोनों टाँगें फैलाकर कह रही थी- “अब तो चोद लो सनम। आम अंगूर सस्ते हो गये हैं अब तो चोद लो सनम। कुतिया को कुत्ता चोद रहा है। तुम भी चोद लो सनम..."

और बाबूजी... उनकी धमाकेदार चुदाई कर रहे थे। थोड़ी ही देर में दोनों थक गये और मैं भी अपनी चूचियों को मसलते हुए अपने कमरे में आ गई। अब तो रोज रात को मेरा यही प्रोग्राम था। कुछ दिनों के बाद मम्मी-पापा मामाजी के यहाँ गये। घर में सिर्फ भैया और मैं।

मेरा मन कुछ-कुछ करने को चाह रहा था। मैंने मोबाइल निकालकर अपने बायफ्रेंड गोलू को फोन किया। उसने भी हामी कर दी, रात के ग्यारह बजे का समय फिक्स हुआ। मेरा कमरा फर्स्ट फ्लोर पे था। मैंने उससे कह के रखा था की मैं मैं दरवाजे को ओढ़का के रचूँगी, बिना लाक किए। जब तुम नीचे आ जाओगे तो मुझे मिस काल करना। मैं भाई को और पोजीशन देखकर गली में एक सिक्का गिराऊँगी तब तुम ऊपर आ जाना। कमरे में अंधेरा होगा। चुपचाप मजे करेंगे। कोई आवाज नहीं। भैया बगल के कमरे में रहेंगे इसीलिए चुपचाप करना जो करना है। समझ गये? और काम खतम होते ही चले जाना। बाहर का मेनगेट आटोमटिक लाक है। तो मुझे नीचे उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

उस रात भैया खाना खाकर दस बजे ही सोने को चले गये।

 
मेरा दिल बल्ले-बल्ले करने लगा। रात के ग्यारह बजे गोलू का मिस काल आया। मैं उठकरके भाई के कमरे की तरफ गई। भाई चुपचाप सो रहा था। मैंने गली में एक सिक्का उछाला और कमरे में आकर सारे कपड़े निकाल दिया ताकी समय की बचत हो, और गोलू का इंतेजार करने लगी। बहुत देर हो गई, गोलू नहीं आया तो मुझे चिंता होने लगी। मैं उठने ही वाली थी की पदचाप सुनाई दी। मैं लेटी रही। गोलू कमरे में आ गया। कमरे में अंधेरा था। एकदूसरे का चेहरा देख नहीं पा रहे थे।

फिर भी मैं थोड़े नाराजगी के साथ फुसफुसाई- “साले गोलू के बच्चे... सिक्का उछालने के बाद आधे घंटे हो गये। नीचे क्या तेरी अम्मा कुत्तों से चुदवा रही थी? जो इतना वक्त लगा दिया..”

गोलू ने धीरे से कहा- “अरे नहीं पगली, मैं तो गली में सिक्का ढूंढ़ रहा था...”

मैं मुश्कुराती हुई बोली- “अरे पगले, मैं पक्की बनिया की लड़की हूँ। साले सिक्का गली में ढूँढ़ रहा था। मैंने सिक्का एक धागे से बाँध करके नीचे उछाला था। काम होने के बाद धागे को वापस खींच ली। फालतू में समय बरवाद किया ना। चल इससे पहले की भैया जाग जायें और कोई दूसरी गड़बड़ी हो जाये। चल शुरू हो जा। वैसे तेरी आवाज कुछ भारी-भारी कैसे लग रही है?”

गोलू- वो... थोड़ा गला बैठ गया है।

झरना- “कहीं तेरा लण्ड भी तो नहीं बैठ गया है ना। नहीं तो मुझे अपनी फुद्दी में गाजर बैगन ना घुसना पड़े।

गोलू- चिन्ता मत कर मेरी जान। ऐसी चुदाई करूंगा कि जिंदगी भर याद रखेगी।

झरना- “चल चल ज्यादा बातें ना बना। खोल दे अपने सारे कपड़े...” मैंने उसे झट से नंगा किया। और मम्मी जैसे आप बाबूजी के लण्ड को चूस रही थी वैसे ही शुरू हो गई...”

गोलू- “ये सब कहाँ से सीखा जानू? कहीं पहले से ही चुदी चुदाई तो नहीं हैं तेरी चूत?

झरना- चुपकर बे.. वो तो मैं मम्मी पाप की रोज चुदाई देखती हूँ बोलकर सीख गई, और तुझसे चुदवाने को तैयार हो गई...” मेरी फुद्दी भी पनियाने लगी थी।

गोलू ने भी मेरी फुद्दी चाटी। फिर मेरी दोनों टाँगों को फैलाते हुए चूत के मुहाने पर लण्ड को टिकाया और एक करारा धक्का लगाया।

झरना- हे राम... मेरी तो चीख निकल गई। फिर भैया के डर से जोर से चीख भी तो नहीं सकती थी। मैंने उससे कहा- “मुझे नहीं चुदवाना। जल्दी निकाल तेरा लण्ड...”

गोलू ने मेरी बातों को अनसुना कर दिया और मेरी चूचियों को मसलने लगा। कुछ ही देर में मुझे जब मजा आने लगा तो दर्द भी कम हो गया।

झरना- अरे, ऐसे ही लण्ड डाले पड़े रहेगा या चोदेगा भी?

और फिर वो शुरू हो गया। ऐसा मजा आया मम्मी, की क्या बताऊँ। इस दौरान मैं दो बार झड़ चुकी थी। जब वो झड़ने के कगार पे पहुँच तो उसने पूछा- कहाँ डालूं?

मैंने कहा- “अंदर नहीं डालना, मेरे मुँह में डाल...”

गोलू ने पिचकारी सीधी मेरे मुँह में डाल दी।

फिर चुदाई के तुरंत बाद मैंने उसे कपड़े पहनाया और पप्पी देते हुए तुरंत बाहर भेजा। और कहा- “कल फिर मिस-काल करने पर आना..."

गोलू ने ठीक है कहा। और मुझे पप्पी देते हुए कमरे के बाहर निकल गया।

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