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नए पड़ोसी complete

रुची थोड़ी ही देर में बहुत गरम हो गयी थी और उसकी चूत से पानी की धार बहने लगी तो ओम बोला "आ जाओ मनीष भाई देखो रांड कैसे पानी छोड़ रही है. चोदो साली को कुतिया बना के." ओम की बात सुनते ही मैंने अपना लंड रुची के मुह से निकाला और उसे कुतिया बना कर एक झटके में ही पूरा लंड उसकी चूत में उतार दिया.

अब ओम उसकी झूलती हुई चुचियो को चबाने लगा और रुची मस्ती में बोल उठी "उफ्फ्फ धीरे कर मादरचोद धीरे क्या काट खायेगा क्या. उफफ्फ्फ्फ़ इस्श्हह्ह्ह्ह" उसकी बात सुन कर ओम और तेज़ी से उसकी चुचिया झिंझोड़ने लगा पर अब रुची चिल्ला नहीं पाई क्योंकि मयंक ने अपनी बहन का मुह अपने मोटे लंड से भर दिया.

करीब १५ मिनट रुची को चोदने के बाद मैं जैसे ही हटा मयंक ने अपना लंड रुची के मुह से निकाल कर उसकी चूत में डाल दिया. मैं वापस रुची के मुह अपना लंड डाल कर हिलाने लगा और ओम से कहा "ओम भाई क्या कर रहे हो अभी इसका एक छेद खाली है." मेरी बात सुनते ही ओम बोला "अब ये बात तो मयंक बाबु को समझाओ. येही अपनी बहनिया का दर्द नहीं समझ रहे है. अरे भाई तुम नीचे लेट कर रुची की चूत चोदो तभी तो हम गांड में लंड डाल पाएंगे."

मयंक ने फ़ौरन पोजीशन बदली और बेड पर लेट कर रुची को अपने लंड पर बिठा लिया. ओम ने फ़ौरन रुची की गांड में अपना हलब्बी लंड डाल दिया. मैंने फिर से रुची का मुख चोदन शुरू कर दिया. करीब 2 घंटे हम तीनो पोजीशन बदल बदल कर रुची को चोदते रहे. कभी मेरा लंड रुची की गांड में, कभी मुह में और कभी चूत में घुसता रहा. रुची न जाने कितनी बार झड़ी होगी और हम तीनो भी काफी थक गए.

आखिर में हम तीनो ने रुची को फर्श पर बिठाया और एक साथ अपना माल उसके ऊपर छोड़ उसे नहला दिया. रुची हम तीनो के वीर्य से नहाई बहुत सेक्सी लग रही थी पर अब हम तीनो में दम नहीं बचा था की और सेक्स कर सके. हम तीनो बेड पर लेट गए और रुची अपने आपको साफ़ करने धीरे धीरे चलती हुई बाथरूम की तरफ चली गयी.

करीब आधे घंटे बाद हम थोडा नार्मल हुए तो हमने कपडे पहने. रुची और मयंक के मम्मी पापा के आने का टाइम भी हो गया था और मेरे मम्मी पापा तो काफी पहले ही घर आ चुके होंगे. मैंने ओम से कहा की कल सुबह मिलते है और घर वापस आ गया. काफी देर घर से बाहर रहने के कारण पापा थोडा नाराज थे और दीदी ने आग में घी डालते हुए कहा "पापा आजकल बस ये यूँही बिना बताये घंटो बाहर रहता है और पढाई में बिलकुल ध्यान नहीं देता."

दीदी की बात सुन कर पापा मुझे और डांटने लगे और दीदी की बात सुन कर मैं मन ही मन सोचने लगा की जब इसको मैं अपनी रांड बनाऊँगा तब मजा आयेगा.

 
तब तक मम्मी आ गयी और मुझे बचा लिया. थोड़ी देर बाद हम सबने खाना खाया और मैं सीधा सोने के लिए अपने रूम में आ गया. रात को ३ बजे के आस पास मेरी नींद खुली और मैं बाथरूम करने के लिए उठा तो मुझे याद आया की ओम ने मुझसे कहा था की अपने बाथरूम का लॉक ख़राब कर देना. मैं ज्यादा शोर नहीं कर सकता था वरना रश्मि दीदी जाग जाती क्योंकि उनका रूम बाथरूम के सामने ही था तो मैंने लॉक के एक हिस्से पर टॉवल लगाया और हथोड़े के ऊपर कपडा बाँध कर चिटकनी पर ४-५ बार जोर से मारा तो लॉक का एक हिस्सा हल्का सा नीचे खिसक गयी जिससे अब बाथरूम अन्दर से लॉक नहीं हो रहा था. मैंने जब अच्छे से देख लिया की बाथरूम किसी तरीके से लॉक नहीं हो रहा तो मैं वापस आकर आराम से सो गया.

सुबह मम्मी पापा के जाने के बाद ही मैं उठा तो दीदी फिर मुझे ताने देने लगी की इतनी देर तक सोता है. मैं भी गुस्से से बोला की "तुमको क्या प्रॉब्लम है."

"मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है बस तुम ऊपर वाले बाथरूम में जाकर फ्रेश हो क्योंकि नीचे मैं नहाने जा रही हूँ." दीदी ने मुझे हुकुम देते हुए कहा.

"तुम खुद क्यों नहीं ऊपर जाकर नहा लेती. ये बाथरूम मेरा भी है." मैंने भी थोडा भाव खाया. मुझे पता था की वो कभी भी ऊपर वाले बाथरूम में नहीं जाएगी.

"अरे मेरा सारा सामान साबुन शैम्पू क्रीम इसी बाथरूम में रहता है और ये मेरे नहाने का टाइम है या तो एक घंटे वेट करो या ऊपर वाले बाथरूम में चले जाओ." दीदी ने कहा.

"एक घंटे क्यों? नहाने में इतना टाइम लगता है क्या?" मैंने फिर से दीदी को छेड़ा.

"अरे आज मुझे उठने में देर हो गयी थी तो मैं भी अभी तक फ्रेश नहीं हुई हूँ अब ज्यादा बड बड न करो और सीधा ऊपर चले जाओ." दीदी बोली.

"हद है खुद भी देर से सो कर उठी हो और मेरी जान खा रही हो." बोल कर मैं ऊपर बाथरूम में आ गया.
 
५ मिनट बाद ही दीदी की आवाज आई. "कितना टाइम लगेगा मनीष."

"ओफ्फो कही भी चैन नहीं लेने देती हो. क्या हुआ?" मैंने पुछा.

"नीचे वाले बाथरूम का डोर लॉक नहीं हो रहा. जल्दी निकल. मैं यही नहा लेती हूँ." रश्मि दीदी बोली.

"ठीक है. मुझे एक घंटा लगेगा. मैं भी अब नहा कर ही निकलूंगा. तब तक तुम वेट करो दीदी." मैंने मजे लेते हुए कहा.

"भाड़ में जाओ. मैं नीचे नहाने जा रही हूँ. बाथरूम का डोर मत खोलना." बोल कर दीदी तुनक कर नीचे चली गयी.

मैं फटाफट फ्रेश हुआ और ब्रेश करके नीचे जाकर मैंने जैसे ही डोर खोला तो देखा ओम सामने ही खड़ा था.

"सही टाइम आये हो ओम भाई. मैं तुम्हे ही बुलाने जा रहा था." मैंने कहा.

"तुम्ही ने कहा था की १०.३० आ जाना तो आ गए. कहाँ है तुम्हारी पटाखा बहनिया? नहा चुकी या नहा रही है?" ओम ने पुछा.

"बाथरूम में है पर देखना पड़ेगा." मैं बोला.

"और बाथरूम का लॉक?" ओम ने पुछा.

"रात को ही ख़राब कर दिया था." मैंने कहा.

"बहुत बढ़िया? जरा देख के बताओ क्या कर रही है रश्मि अन्दर." ओम ने अन्दर आकर दरवाजा बंद कर लिया.

मैंने बाथरूम की खिड़की अन्दर झाँका. हमारी टाइमिंग बिलकुल सही थी. बाथरुम में दीदी बिलकुल नंगी शावर के नीचे नहा रही थी. उनका जवान नंगा मेरी आँखों के सामने था और उनकी पीठ पानी की बूंदो की वजह से चमक रही थी. मैं तो रश्मि दीदी का नंगा बदन देखने में खो ही गया था पर तभी ओम ने मुझे हिलाया और हटने का इशारा किया. मेरे हटते ही ओम ने अन्दर झाँका और फिर वापस मुझे इशारे से बोला की तुम देखो. मैं वापस खिड़की से अन्दर देखने लगा. दीदी के चूतड़ों की गोलाईयां और गहराइयाँ मेरे सामने थी. दीदी को देख कर मेरे लंड में एक सनसनी फ़ैल रही थी.

फिर रश्मि दीदी पलटी और अब उनकी चून्चिया मेरे मन को पागल करने लगी. उन बड़े-बड़े स्तनों पर पानी की बूँदें चमक रही थी. छोटे-छोटे गुलाबी निप्पल मुझे और उत्तेजित कर रहे थे. उसकी चूत की दरार पर बहता हुआ पानी देख कर मैं दीवाना हुआ जा रहा था. शावर का ठंडा- ठंडा पानी उसके शरीर पर पड़ कर बह रहा था. दीदी कभी अपनी चुंचियाँ मलती तो कभी अपनी चूत साफ़ करती. तभी मुझे ख्याल आया की ओम कहाँ गायब हो गया. मैंने पलट कर देखा तो पाया की ओम अब तक अपने कपडे उतार कर पूरा नंगा हो गया था और अपने हलब्बी लंड पर अपने साथ लाया हुआ कोई तेल लगा रहा था. मैं वापस दीदी के नंगे बदन कप देख-देख कर और उत्तेजित होने लगा.
 
तभी दीदी ने शावर बंद किया और अपना बदन तौलिये से पौंछने लगी. मैंने ओम को इशारा किया की दीदी नहा चुकी है और कपडे पेहेनने वाली है. उधर दीदी तौलिये से अपनी चुंचियाँ मल-मल कर पोछने लगी और इधर ओम बाथरूम का दरवाजा खोल कर बाथरूम में घुस गया.

ओम को पूरा नंगा इस तरह बाथरूम में देख कर दीदी को झटका लग गया. दीदी ने फ़ौरन अपना बदन टावेल से कवर किया और फुसफुसाते हुए ओम से बोला "पागल हो क्या? इस तरह यहाँ क्यों आये हो. मनीष कहाँ है. तुम अन्दर कैसे आये."

"वो ऊपर नहा रहा है जानेमन और हम छत से कूद के आये. अरे जब प्यार किया तो डरना क्या?" ओम ने दीदी के पास जाकर दीदी की चुंचिया मसलते हुए कहा. दीदी की चुंचियाँ कड़ी होने लगी पर उन्होंने अपने को छुडाते हुए कहा.

"और मैंने तुमको मना किया था न की तुम मेरे घर मत आना. अगर मनीष ने देख लिया तो? इससे पहले की मनीष नहा कर निकले तुम वापस चले जाओ." दीदी ने गिडगिडाते हुए कहा.

"अरे हम तुम्हारी मोहब्बत में इतना रिस्क ले रहे है और तुम अपने भाई से शर्मा रही हो." ओम ने दीदी की टावेल ले ली और दीदी का गीला बदन पोछने लगा. वो तौलिये से दीदी की चूत साफ़ करने लगा. दीदी के मुह से एक आह निकली और उन्होंने अपने पर कण्ट्रोल करने की कोशिश की पर तब तक मैंने अपना दांव खेला और ऊँची आवाज में बोला "दीदी किस्से बात कर रही हो."

अब दीदी बहुत परेशान हो गयी. उनको कुछ समझ में नहीं आया और वो बोली "किसी से नहीं" और उन्होंने दुबारा शावर खोल दिया ताकि शावर की आवाज में कोई और आवाज बाहर न जाए. मैं वापस खिड़की से अन्दर झाँकने लगा. अब ओम ने तब तक दीदी के नंगे बदन को अपने नंगे बदन से चिपका लिया था और दोनों शावर के नीचे खड़े होकर भीग रहे थे. दीदी ने कुछ बोलने की कोशिश की पर तब तक ओम ने अपने होठो से दीदी के होठ बंद कर दिए. थोड़ी देर तक दीदी के होठ चूसने के बाद ओम ने दीदी को घुमाया. उनके दोनों हाथ सामने के नलों पर रखते हुए उन्हें झुकाने लगा. दीदी समझ गयी की वो क्या करने जा रहा है.

दीदी ने ओम से फुसफुसाते हुए कहा "क्या कर रहे हो. मनीष बाहर ही है."

अब ओम ने अपना टोन बदलते हुए बोला "ज्यादा नखरे न कर वरना बाहर ले जाकर तेरे भाई के सामने ही चोद डालूँगा समझी. चल झुक जा." और ओम ने दीदी की एक न सुनी और उनको झुकाते हुए पीछे से एक ही झटके में अपना हलब्बी लंड दीदी की चंचल चूत में पेल दिया और बेदर्दी से दीदी को चोदने लगा. थापों की आवाज बाहर तक आने लगी. दीदी भी आखिर कब तक कण्ट्रोल करती. वो भी अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह ओफ्फ्फफ्फ्फ्फ़ येस्स्स्सस्स्स्स येस्सस्सस्स करने लगी. उनकी आवाजो से ओम और उत्तेजित हो गया और उसने अपने धक्को की रफ़्तार और बढ़ा दी.
 
जब ठप ठप की आवाजे बहुत तेज हो गयी तब मैंने फिर से चिल्ला कर पुछा "क्या हुआ दीदी. ये कैसी आवाजे है. कौन है बाथरूम में तुम्हारे साथ."

दीदी मेरी आवाज सुन कर डर गयी और इस बार उन्होंने ओम का लंड अपनी चूत से बाहर निकाल कर खड़ी हो गयी. वो ओम से बोली प्लीज अभी मत करो. देखो मनीष को आवाजे सुनाई दे रही है. पर ओम ने वो काम किया जो दीदी ने सपने में भी नहीं सोचा था. वो बाथरूम से ही चिल्ला कर बोला "अरे चिंता न करो मनीष भाई हम है ओम तुम्हारी दीदी के साथ."

दीदी का तो कलेजा ही मुह को आ गया. उनको समझ ही नहीं आया की ये क्या हुआ. मैंने और मजे लेते हुए पूछा "अरे ओम भाई आप दीदी के साथ बाथरूम में क्या कर रहे हो."

"तुम्हारी बहन की चुदाई. तुम्हे कोई एतराज तो नहीं है." ओम ने अन्दर से बोला.

"अगर दीदी को कोई एतराज नहीं है तो मुझे क्या फरक पड़ता है." मैंने कहा और वापस बाथरूम की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया. ओम दीदी से बोला "अब तो ठीक है जानेमन. चलो जल्दी घूम जाओ. तुम्हारे भाई को कोई एतराज नहीं है."

"तुम्हे हर बात मजाक लगती है. वो तो अभी कुछ भी बोले अगर उसने बाद में मम्मी पापा को बता दिया तो? मैंने तुम्हे मना किया और तुमने तो अपने मुह से ही उसको बता दिया." रश्मि दीदी बहुत गुस्से से बोली.

"ओफ्फो. किसी से नहीं कहेगा. बहुत समझदार लड़का है. चलो उसका भी इंतज़ाम कर देता हूँ. अरे मनीष जरा अन्दर तो आना. दरवाजा खुला है." ओम ने मुझे अन्दर बुलाया. दीदी फ़ौरन टावेल उठाने के लिए बढ़ी पर ओम ने उनको पकड़ लिया. दीदी ओम पर चिल्लाई "पागल हो क्या? उसको अन्दर क्यों बुला रहे हो. मुझे छोड़ो."

तब तक मैं बाथरूम के अन्दर पहुच गया. दीदी को पूरा नंगा इतनी पास से आज मैं दुबारा देख रहा था पर उनका भीगा बदन क़यामत ढा रहा था. मेरा लंड तो जैसे फटा ही जा रहा था.

"क्या हुआ ओम भाई." मैंने दीदी के नंगे बदन को घूरते हुए कहा. दीदी ने शर्मा कर अपनी आँखे नीची कर ली. अब वो ओम से छूटने की कोशिश भी नहीं कर रही थी. ओम ने दीदी को गोद में उठाया और बोला "चलो बाहर चल कर ही बात करते है." वो दीदी को गोद में लेकर दीदी के बेडरूम में आया और दीदी को बेड पर लिटा दिया और खुद दीदी के ऊपर लेट कर दीदी को चूमने चाटने लगा. उसने फिर से मुझसे कहा "यही आकर बैठो." मैं जो दीदी के रूम के डोर पर खड़ा था फ़ौरन अन्दर जाकर बेड के बगल की कुर्सी पर बैठ गया और ओम को दीदी की जवानी का रस पीते हुए देखने लगा. थोड़ी देर तक चूमा चाटी करने के बाद ओम ने दीदी की चूत में लंड डालने की कोशिश की पर दीदी ने अपनी टाँगे नहीं खोली. ओम बेड से उतर गया और उसने दीदी की टांगे खीच कर हवा में उठा दी और मुझसे बोला "मनीष जरा मेरा लंड अपनी दीदी की चूत में सेट करना."
 
मैं फ़ौरन आगे बढ़ा पर दीदी चीखी "खबरदार मनीष." मैं रुक गया पर ओम फिर बोला "अरे दीदी की बात से पहले जीजा की बात सुननी चाहिए. और फिलहाल तो मैं ही तेरा जीजा हूँ. चल जल्दी कर."

मैं मुस्कुराता हुआ दोनों के पास गया और घुटनो पर बैठ गया. ओम का लंड अभी तक वैसा ही टाईट खड़ा हुआ था और दीदी की चूत पर ठोकर मार रहा था. वो चाहता तो एक ही झटके में दीदी की चूत फाड़ देता पर वो चाहता था की मैं खुद अपने हाथो से अपनी बहन की चूत में उसका लंड घुसाऊ तो मैंने भी अपना बाया हाथ बढ़ा कर दीदी की चूत को सहलाया. दीदी ने जोर से अपने पैर छुड़ाने की कोशिश की पर ओम ने पकड़ और मजबूत कर दी. दीदी मुह से चाहे जो कहें लेकिन चूत उनकी पूरी गीली थी. मैंने अपने अंगूठे और बीच की ऊँगली दीदी की चूत में डाली और उनकी चूत को हल्का सा फैलाया. दीदी फिर से कसमसाई. मैंने दुसरे हाथ से ओम का लंड पकड़ा और दीदी की चूत में घुसाने लगा ओम में भी हल्का सा धक्का मारा और उसका लंड मेरी उंगलियों से रगड़ता हुआ आधा दीदी की चूत में घुस गया. अब मैंने अपने हाथ दीदी की चूत और ओम के लंड से हटा लिए और ओम ने वापस एक धक्का और मार कर पूरा लंड दीदी के अन्दर डाल दिया.

मैं वापस आकर कुर्सी पर बैठ गया और दीदी की चुदाई देख कर अपना लंड रगड़ने लगा. ओम तबियत से दीदी को चोदने में लगा था. दीदी थोड़ी देर तक तो विरोध करती रही फिर वो भी ओम का साथ देने लगी. उसके बाद ओम ने पोजीशन बदल बदल कर ४५ मिनट तक दीदी की चूत का बाजा बजाया और आखिर में दीदी के मुह में झड गया. झड़ने के बाद ओम कमरे से बाहर निकल गया पर मैं दीदी के नंगे बदन को देखता रहा. दीदी 2 मिनट तक वैसे ही पड़ी रही पर जैसे ही नार्मल हुई मुझे कमरे में देख कर भड़क गयी और अपने को चादर से ढक कर मुझ पर चिल्लाने लगी "अरे तू अभी भी यही बैठा है. शर्म नहीं आती. आज तूने अच्छा नहीं किया है."

तब तक ओम अपने कपडे पहन कर आ गया और बोला "क्यों उस पर चिल्ला रही हो. उसने जो किया मैंने बोला वो भी इसलिए क्योंकि तुम्हे लग रहा था की वो तुम्हारे मम्मी पापा से बोल देगा. अब कैसे बोलेगा की मैंने अपने हाथो से ओम का लंड दीदी की चूत में डाला था. चल मनीष मेरे साथ चल. कुछ काम है."

दीदी से और डांट खाने से तो मैं बच ही गया लेकिन साथ ही ये भी समझ गया की ओम मेरा काम पक्का करवा देगा और मैं उसके साथ नीलम अरोरा के घर की तरफ चल दिया.
 
"क्यों मनीष भाई, मजा आया अपनी प्यारी बहनिया की चूत में हमारा लंड घुसेड़ने में?" घर से बाहर निकलते ही ओम ने मुझसे पुछा.

"मजा तो बहुत आया पर असली मजा तो तब आयेगा जब दीदी मेरा लंड अपनी चूत में लेकर सिस्कारिया भरेंगी." मैंने जवाब दिया.

"होगा होगा वो भी जरूर होगा और हमको तो लगता है की बहुत जल्दी ही होगा. अच्छा सुनो नीलम भौजी को हमने ये तो बोला था की एक लौंडा साथ होगा पर तुम होगे वो नहीं जानती है. अब अपने बेटे के दोस्त के सामने थोडा बिदकेगी पर तुम घबराना नहीं. जैसा हम कहें करते जाना." ओम ने मुझे हिदायत दी और तब तक नीलम आंटी का घर भी आ गया. ओम ने घंटी नहीं बजाई सीधा दरवाजा खोल के अन्दर घुस गया. मैं भी उसके पीछे पीछे अन्दर पहुँच गया. उसने मुझको ड्राइंग रूम में बिठाया और नीलम आंटी को किचेन में देखने लगा. आंटी वहाँ नहीं थी तो वो उनके बेड रूम में घुस गया.

ओम ने अन्दर जाकर आंटी से कहा "अरे तुम यहाँ हो मेरी जान और हम तुमको पूरे घर में ढूँढ रहे है. घर का दरवाजा बंद रखा करो वरना कोई भी घुस कर चोद डालेगा."

"इसी लिए तो दरवाजा खुला छोड़ा था की कोई भी घुस के चोद डाले. अब तुमने आग ही ऐसी लगाई है की बुझती ही नहीं." आंटी ने हँसते हुए कहा.

फिर ओम ने धीरे से कुछ बोला जो मुझे सुनाई नहीं दिया पर आंटी और ओम दोनों की हँसने की आवाजे आने लगी. फिर ओम ने कहा "अरे क्यों मेहनत कर रही हो कपडे पहनने में अभी तो उतरने ही है. जल्दी चलो वो बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है."

"अरे क्या कर रहे हो कम से कम पेटीकोट तो पहन लेने दो. अरे रुको भी. उफ्फ्फ." नीलम अरोरा की बातों से लगा की शायद वो नहा कर कपडे पहन रही है और ओम उसको कपडे नहीं पहनने दे रहा. अचानक ख़ामोशी छा गयी और २ मिनट बाद ओम नीलम आंटी को लेकर ड्राइंग रूम में आया. आंटी ने सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहना हुआ था मतलब ओम ने उनको साड़ी नहीं पेहेनने दी. हरे रंग के ब्लाउज और पेटीकोट में आंटी क़यामत लग रही थी पर मुझ पर नज़र पड़ते ही आंटी की हँसी गायब हो गयी और वो ओम से हाथ छुड़ा कर वापस अपने कमरे में घुस गयी और चिल्ला कर ओम को अन्दर बुलाया.

 
ओम ने मुस्कुरा कर मुझे आँख मारी और कमरे में चला गया. मुझे पता था की आगे की बात चीत दबी आवाज में होगी तो मैं फ़ौरन दरवाजे के पास पहुच गया और दोनों की बातें सुनने लगा.

आंटी गुस्से से बोली "ये तुम किसको ले आये अपने साथ और इसको क्या क्या बताया हमारे बारे में."

"सब कुछ बता कर ही लाया हूँ. क्या हुआ मेरी जान. नाराज क्यों हो रही हो." ओम ने नादान बनते हुए पुछा.

"क्यों? तुमको नहीं पता की मनीष और चेतन दोनों दोस्त है. तुम मेरे बेटे के दोस्त को ही ले आये. पागल हो क्या?" आंटी गुस्से में बोली.

"अरे अब हमको क्या पता. जब हमने उससे पुछा की नीलम भौजी को चोदोगे तो फ़ौरन तैयार हो गया. एक बार भी नहीं बोला की वो मेरे दोस्त की मम्मी है." ओम ने जवाब दिया.

"क्या? तुम उसको ये कह कर लाये हो?" आंटी लगभग गुस्से में चीखते हुए बोली.

"अरे तो तुम ही कह रही थी की दो लंड एक साथ लेने का बड़ा मन है तो हमने सोचा की मनीष को ले चलें. इस पर हमको पूरा भरोसा है की बात किसी से नहीं कहेगा." ओम बोला.

"नहीं नहीं, तुम इसको लेकर जाओ. वो मेरे बेटे का दोस्त है. उसके साथ मैं ये नहीं कर सकती." आंटी के ये अल्फाज़ सुनते ही मेरे खड़ा लंड बैठने लगा पर ओम भी परम हरामी था.

बोला "ठीक है जाते है लेकिन ये तो सोचो की अब तो इसको हमारे बारे में सब पता चल गया है. अगर इसने चेतन को बोल दिया की हम तुमको चोदते है तो वो हमसे लड़ने आ जायेगा."

 
"ओफ्फो तुमको अपनी पड़ी है और वो मेरे बारे में जो सोचेगा वो? पर अभी तो तुम कह रहे थे की तुम्हे इस पर पूरा भरोसा है की ये किसी से कुछ नहीं कहेगा" आंटी थोडा परेशान हो गयी.

"हाँ वो तो अगर तुम उससे चुदवा लोगी तब पर अब जब तुम उसको भगा रही हो तो कह भी सकता है और तुम ही कह रही हो की चेतन उसका दोस्त भी है." ओम ने ब्रह्मास्त्र फेंका.

"अजीब मुसीबत में फंसा दिया तुमने. कम से कम मुझसे पूछ तो लिया होता." आंटी ने कहा.

"पूछने की बात कह रही हो? खुद ही तो कहा था की दो लंड एक साथ लेने है कुछ करो तो क्या मैं एक लंड और उगा लेता. भाई अब थ्रीसम करना है तो किसी को तो जोड़ना ही पड़ेगा न. अब तुम चिंता छोड़ो और भूल जाओ की वो तुम्हारे बेटे का दोस्त है. समझी" ओम ने आंटी को समझाया पर उनको और कोई मौका न देते हुए मुझे आवाज देकर अन्दर बुला लिया. मैं तो दरवाजे पर ही था फ़ौरन अन्दर घुस गया.

ओम मुझसे बोला "देखो भौजी को प्रॉमिस करो की जो यहाँ होगा उसकी खबर इस कमरे से बाहर नहीं जाएगी."

"गॉड प्रॉमिस आंटी." मैंने गले पर हाथ लगते हुए बोला और आंटी कुछ बोल पाती इससे पहले ही ओम ने आंटी के पेटीकोट का नारा खीच दिया.

 
नीलम अरोरा इसके लिए तैयार नहीं थी तो वो अरीएआआअ करती रह गयी और उनका पेटीकोट जमीन पर गिर पड़ा. पर मुझे अभी भी उनकी चूत के दीदार नहीं हुए क्योंकि उन्होंने अन्दर काले रंग की पैंटी पहन रखी थी. नीलम आंटी मुझसे बहुत शर्मा रही थी तो ओम ने कहा "अरे यार मनीष, तुम्हारे सामने नंगे होने में भौजी बहुत शर्मा रही है तुम ऐसा करो की पहले तुम अपने कपडे उतार दो."

ओम ने जैसे ही कहा वैसे ही मैंने अपने कपडे उतरने शुरू कर दिए. उधर ओम नीलम आंटी के ब्लाउज के हुक खोलने लगा. मैं एक मिनट में ही पूरा नंगा हो गया और नीलम आंटी के हुस्न को देखने लगा जो की काले रंग की ब्रा पैंटी में मेरे सामने खड़ी थी और मेरे तने हुए लंड को देख रही थी. उनके चेहरे से लग रहा था की वो लंड का साइज़ देख कर संतुष्ट है पर फिर भी वो थोडा थोडा शर्मा रही थी. ओम बोला अरे भौजी हमने मनीष को वादा किया था की तुम्हारा डांस उसको दिखायेंगे तो अब शरमाना छोडो और जरा म्यूजिक बजा के दो चार ठुमके लगा दो.

आंटी ने कहा "अरे अब डांस वांस रहने ही दो."

"अरे इतना शरमाओगी तो कैसे चुदवाओगी भौजी. चलो शुरू हो जाओ." ओम ने खुद ही एक म्यूजिक प्लेयर ऑन कर दिया. गाना बजने लगा 'ये समां, समां है ये प्यार का.' आंटी ने धीरे धीरे कमर हिलाना शुरू किया. काले ब्रा पैंटी में आंटी का मक्खन जैसा सफ़ेद बदन थिरकना शुरू हो गया. आंटी ने अब मन बना लिया था की शर्माने से कोई फायदा नहीं और अब उनको चुदना ही है तो पूरे मजे ले कर चुदे. उनका कामुक डांस देख कर मेरा तो जैसे लंड ही फट जाने को होने लगा. ओम ने भी अपने कपडे उतार दिए और आंटी के साथ डांस करने लगा. आंटी ने डांस करते करते अपना ब्रा भी खोल दिया और मेरे ऊपर उछाल दिया. आंटी की पपीते जैसी चुंचिया बंधन मुक्त होकर उछलने लगी. इतने सही फिगर पर इतनी बड़ी चुचिया बहुत कम देखने को मिलती है. ओम ने मुझे इशारा किया की मैं भी उनके डांस में शामिल हो जाऊं.

 
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