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“इसकी परवाह न कीजिए। मैं फ्री फ़ण्ड में मशविरा देता हूँ।” इमरान ने कहा और फिर बुलन्द आवाज़ में बोला। “मैं उसे भी मशविरा देता हूँ जो पेड़ पर मौजूद है....उसे चाहिए कि वह नीचे उतर आये....वह ज़ख्मी है....आओ....आ जाओ नीचे....मुझे यह भी मालूम है कि तुम असलहे से लैस नहीं हो....और यहाँ सब तुम्हारे दोस्त हैं....आ जाओ नीचे।"
"अरे, अरे, तुम्हें क्या हो गया सितवत जाह!" जावेद मिर्जा ने घबरायी हुई आवाज़ में कहा।
अचानक इमरान ने अपनी टॉर्च का रुख ऊपर की तरफ़ कर दिया।
“मैं सलीम हूँ!" ऊपर से एक भर्रायी हुई-सी आवाज़ आयी।
"हकीम हो या डॉक्टर! इसकी परवाह न करो। बस, नीचे आ जाओ।” सन्नाटे में सिर्फ इमरान की आवाज़ गूंजी। बाकी लोगों को तो जैसे साँप सूंघ गया था।
पेड़ पर अचानक कई टार्यों की रोशनी पड़ रही थीं....लेकिन इमरान की नज़र शौकत के चेहरे पर थी। शौकत तभी बरसों का बीमार दिखने लगा।
सलीम टहनियों से उतरता हुआ तने के सिरे पर पहुँच चुका था अचानक उसने कराह कर कहा.... "मैं गिरा....मुझे बचाओ....!'' ।
एक ही छलाँग में इमरान तने के करीब पहुँच गया।
"चले आओ....चले आओ....ख़ुद को सँभालो....अच्छा....मैं हाथ बढ़ाता हूँ अपने पैर नीचे लटका दो!” इमरान ने कहा।
जावेद मिर्जा वगैरह भी उसकी मदद को पहँच गये किसी-न-किसी तरह सलीम को नीचे उतारा गया....उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। “मेरे दायें हाथ पर गोली लगी है।"
“मगर तुम तो जेल में थे....!" जावेद मिर्जा बोला।
“जज....जी हाँ मैं था।" सलीम आगे-पीछे झूलता हुआ ज़मीन पर गिर गया। वह बेहोश हो चुका था।
वे लोग बेहोश सलीम को कोठी की तरफ़ ले जा चके थे और अब लेबोरेटरी की इमारत के करीब इमरान के अलावा और कोई नहीं था। वह भी उनके साथ थोड़ी दूर तक गया था, लेकिन फिर उनकी बेख़बरी में लेबोरेटरी की तरफ़ पलट आया था। उन सबके ज़ेहन उलझे हुए थे और किसी को इसका होश नहीं था कि कौन कहाँ रह गया....अलबत्ता नवाब जावेद मिर्जा शौकत को वहाँ से खींचता हुआ ले गया था।
लेबोरेटरी वाली इमारत का दरवाज़ा खुला हुआ था....इमरान अन्दर घुस गया। उसकी टॉर्च जल रही थी। अन्दर घुसते ही जिस चीज़ पर सबसे पहले उसकी नज़र पड़ी वह एक रिवॉल्वर था जो इमरान ने पिछली रात शौकत के हाथ में देखा था। इमरान ने जेब से रूमाल निकाला और उससे अपनी उँगलियाँ ढकते हुए रिवॉल्वर को नाल से पकड कर उठा लिया....और फिर वह उसे अपनी नाक तक ले गया। नाल से बारूद की बू आ रही थी। साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि उससे कुछ ही देर पहले फ़ायर किया गया है....फिर इमरान ने मैगज़ीन पर नज़र डाली....दो चेम्बर ख़ाली थे। उसने अपने सिर को थोड़ा-सा हिलाया....और रिवॉल्वर को बहुत एहतियात से रूमाल में लपेट कर जेब में डाल लिया। फिर वह वहीं से लौट आया....आगे जाने की ज़रूरत ही नहीं थी। इतना ही काफ़ी था, बल्कि काफ़ी से भी ज़्यादा....
इमरान कोठी की तरफ़ चल पड़ा। उसका ज़ेहन ख़यालों में उलझा हुआ था....अचानक वह रुक गया और फिर तेज़ी से लेबोरेटरी की तरफ़ मुड़ कर दौड़ने लगा। ____
“कौन है? ठहरो!'' उसने पीछे से शौकत की आवाज़ सुनी....
लेकिन इमरान रुका नहीं, बराबर दौड़ता रहा....शौकत भी शायद उसके पीछे दौड़ रहा था।
'ठहर जाओ....ठहरो....वरना गोली मार दूंगा।” शौकत फिर चीख़ा।
इमरान लेबोरेटरी की इमारत के पास एक चक्कर लगा कर झाड़ियों में घुस गया और शौकत की समझ में न आ सका कि वह कहाँ ग़ायब हो गया।
शौकत ने अब टॉर्च जलायी और चारों तरफ़ उसकी रोशनी डाल रहा था....लेकिन उसने झाड़ियों में घुसने की हिम्मत नहीं की।
"अरे, अरे, तुम्हें क्या हो गया सितवत जाह!" जावेद मिर्जा ने घबरायी हुई आवाज़ में कहा।
अचानक इमरान ने अपनी टॉर्च का रुख ऊपर की तरफ़ कर दिया।
“मैं सलीम हूँ!" ऊपर से एक भर्रायी हुई-सी आवाज़ आयी।
"हकीम हो या डॉक्टर! इसकी परवाह न करो। बस, नीचे आ जाओ।” सन्नाटे में सिर्फ इमरान की आवाज़ गूंजी। बाकी लोगों को तो जैसे साँप सूंघ गया था।
पेड़ पर अचानक कई टार्यों की रोशनी पड़ रही थीं....लेकिन इमरान की नज़र शौकत के चेहरे पर थी। शौकत तभी बरसों का बीमार दिखने लगा।
सलीम टहनियों से उतरता हुआ तने के सिरे पर पहुँच चुका था अचानक उसने कराह कर कहा.... "मैं गिरा....मुझे बचाओ....!'' ।
एक ही छलाँग में इमरान तने के करीब पहुँच गया।
"चले आओ....चले आओ....ख़ुद को सँभालो....अच्छा....मैं हाथ बढ़ाता हूँ अपने पैर नीचे लटका दो!” इमरान ने कहा।
जावेद मिर्जा वगैरह भी उसकी मदद को पहँच गये किसी-न-किसी तरह सलीम को नीचे उतारा गया....उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। “मेरे दायें हाथ पर गोली लगी है।"
“मगर तुम तो जेल में थे....!" जावेद मिर्जा बोला।
“जज....जी हाँ मैं था।" सलीम आगे-पीछे झूलता हुआ ज़मीन पर गिर गया। वह बेहोश हो चुका था।
वे लोग बेहोश सलीम को कोठी की तरफ़ ले जा चके थे और अब लेबोरेटरी की इमारत के करीब इमरान के अलावा और कोई नहीं था। वह भी उनके साथ थोड़ी दूर तक गया था, लेकिन फिर उनकी बेख़बरी में लेबोरेटरी की तरफ़ पलट आया था। उन सबके ज़ेहन उलझे हुए थे और किसी को इसका होश नहीं था कि कौन कहाँ रह गया....अलबत्ता नवाब जावेद मिर्जा शौकत को वहाँ से खींचता हुआ ले गया था।
लेबोरेटरी वाली इमारत का दरवाज़ा खुला हुआ था....इमरान अन्दर घुस गया। उसकी टॉर्च जल रही थी। अन्दर घुसते ही जिस चीज़ पर सबसे पहले उसकी नज़र पड़ी वह एक रिवॉल्वर था जो इमरान ने पिछली रात शौकत के हाथ में देखा था। इमरान ने जेब से रूमाल निकाला और उससे अपनी उँगलियाँ ढकते हुए रिवॉल्वर को नाल से पकड कर उठा लिया....और फिर वह उसे अपनी नाक तक ले गया। नाल से बारूद की बू आ रही थी। साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि उससे कुछ ही देर पहले फ़ायर किया गया है....फिर इमरान ने मैगज़ीन पर नज़र डाली....दो चेम्बर ख़ाली थे। उसने अपने सिर को थोड़ा-सा हिलाया....और रिवॉल्वर को बहुत एहतियात से रूमाल में लपेट कर जेब में डाल लिया। फिर वह वहीं से लौट आया....आगे जाने की ज़रूरत ही नहीं थी। इतना ही काफ़ी था, बल्कि काफ़ी से भी ज़्यादा....
इमरान कोठी की तरफ़ चल पड़ा। उसका ज़ेहन ख़यालों में उलझा हुआ था....अचानक वह रुक गया और फिर तेज़ी से लेबोरेटरी की तरफ़ मुड़ कर दौड़ने लगा। ____
“कौन है? ठहरो!'' उसने पीछे से शौकत की आवाज़ सुनी....
लेकिन इमरान रुका नहीं, बराबर दौड़ता रहा....शौकत भी शायद उसके पीछे दौड़ रहा था।
'ठहर जाओ....ठहरो....वरना गोली मार दूंगा।” शौकत फिर चीख़ा।
इमरान लेबोरेटरी की इमारत के पास एक चक्कर लगा कर झाड़ियों में घुस गया और शौकत की समझ में न आ सका कि वह कहाँ ग़ायब हो गया।
शौकत ने अब टॉर्च जलायी और चारों तरफ़ उसकी रोशनी डाल रहा था....लेकिन उसने झाड़ियों में घुसने की हिम्मत नहीं की।