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कैदी सलाखों की दूसरी तरफ़ मौजूद था। रूशी ने उसे गौर से देखा और वह उसे नीचे से ऊपर तक एक शरीफ़ आदमी मालूम हुआ। उसकी उम्र तीस और चालीस के बीच रही होगी।
आँखों में ऐसी चमक थी जो सिर्फ ईमानदार आदमियों ही की आँखों में नज़र आ सकती है।
रूशी को देख कर वह सलाखों के करीब आ गया। “मैं आपको नहीं जानता।" वह रूशी को घरता हुआ धीरे से बोला।
रूशी ने एक कहकहा लगाया जिसका अन्दाज़ चिढ़ाने जैसा था। रूशी ने उस वक़्त अपने ज़ेहन को बिलकल आज़ाद कर दिया था। वह अपने तौर पर उससे बातचीत करना चाहती थी। इमरान के बताये हए तरीकों पर अमल करने का उसका इरादा नहीं था....इमरान की बातों से उसने अन्दाज़ा कर लिया था कि वह सिर्फ इस मुलाकात का असर मालूम करना चाहता है। इसके अलावा और कोई मकसद नहीं।"
“आप कौन हैं?'' कैदी ने फिर पूछा।
“मैं आहा....!'' रूशी ने फिर कहक़हा लगाया और बुरी औरतों की तरह बेढंगेपन से लचकने लगी।
“मैं समझ गया।” कैदी धीरे से बड़बड़ाया। “लेकिन तुम मुझे गुस्सा नहीं दिला सकतीं। बिलकुल नहीं। कभी नहीं।"
बात बड़ी अजीब थी और उन जुमलों पर गौर करते वक़्त रूशी की अदाकारी ख़त्म हो गयी और वह एक सीधी-साधी औरत दिखने लगी। कैदी उसे गौर और दिलचस्पी से देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तुम्हें यहाँ किसने भेजा है?"
अचानक रूशी का ज़ेहन फिर जागा, उसने मायूसी से सिर हिला कर कहा, “नहीं, तुम वह आदमी नहीं मालूम होते।"
"कौन आदमी?' “
क्या तुम्हारा नाम सलीम है?"
“जी हाँ, मेरा ही नाम है।"
“और तुम नवाबज़ादा शौकत के लेबोरेटरी असिस्टेंट थे?"
"हाँ, यह भी ठीक है।"
"फिर तुम वही आदमी हो?"
कैदी के चेहरे पर फ़िक्रमन्दी के आसार पैदा हो गये, लेकिन उनमें दहशत का दख़ल नहीं था.... वह ख़ाली ज़ेहन के अन्दाज़ में कुछ पल रूशी के चेहरे पर नज़र जमाये रहा, फिर दो-तीन क़दम पीछे हट कर बोला, “तुम जा सकती हो।"
"लेकिन....अगर....तुम सलीम....!"
“मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। यहाँ से चली जाओ।"
“मगर....वह....!"
“जाओ!" वह गला फाड़ कर चीख़ा और दो पहरेदार तेज़ी से चलते हुए सलाखों के पास पहुँच गये....इससे पहले कि कैदी कुछ कहता, रूशी बोल पड़ी, "तुम फ़िक्र न करो, सलीम, मैं तुम्हारे घर वालों की अच्छी तरह ख़बर लेती रहूंगी।"
और फिर वह जवाब का इन्तज़ार किये बगैर बाहर निकल गयी।
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इमरान ने रूशी का बयान बहुत ग़ौर से सुना और कुछ पल ख़ामोश रह कर बोला, "तुम वाकई चल निकली हो। इससे ज़्यादा मैं भी न कर सकता...."
“और तुम मेरी इस कार्रवाई से मुतमईन हो?'' रूशी ने पूछा।
"इतना मुतमईन....कि....!"
इमरान जुमला पूरा न कर सका, क्योंकि किसी ने कमरे के दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक दी।
"हाँ....ऑ....कम इन!” इमरान ने दरवाज़े को घूरते हुए कहा।
एक लड़की दरवाज़ा खोल कर कमरे में आयी....इमरान ने उस पर एक उचटती सी नज़र डाली....
“मैं सईदा हूँ!” लड़की ने कहा। “आपने मुझे देखा तो होगा।"
“नहीं, अभी नहीं देख सका। सेक्रेटरी, मेरी ऐनक!"
लड़की उस पर कुछ झुंझला-सी गयी। “मैं सज्जाद साहब की लड़की हुँ।'
“लाहौल विला कूवत। मैं लड़का समझा था....बैठिए! सेक्रेटरी! डायरी में देखो....ये अमजाद साहब कौन हैं?''
“सज्जाद साहब!” लड़की गुस्से में बोली। “ आख़िर आप मेरा मज़ाक क्यों उड़ा रहे हैं।" ___
“मैंने आज तक पतंग के अलावा और कोई चीज़ नहीं उड़ायी, आप यक़ीन कीजिए....यूँ तो उड़ाने को मेरे ख़िलाफ़ बेपर की भी उड़ायी जा सकती है।'
“मैं यह कहने आयी थी कि जमील भाई आपसे मिलना चाहते हैं।'' सईदा झल्ला कर खड़ी हो गयी।
“सेक्रेटरी....ज़रा डायरी....!" इमरान का जुमला पूरा होने से पहले ही सईदा कमरे से निकल गयी।
“उस लड़की को मैंने कहीं देखा है।'' रूशी बोली। “तुमने क्या कह दिया वह गुस्से में मालूम होती थी।'' इमरान ख़ामोश रहा। इतने में फ़ोन की घण्टी बज उठी। इमरान ने बढ़ कर रिसीवर उठा लिया। __"हैलो....हाँ....हाँ....! हम ही बोल रहे हैं। सितवत जाह! ओह....अच्छा ....अच्छा ! ज़रूर....हम ज़रूर आयेंगे....!"
इमरान ने रिसीवर रख कर अंगड़ाई ली और यूँ ही मुस्कुराने लगा।
“मुझे उस आदमी....सलीम के बारे में बताओ....' रूशी ने कहा।
"क्या वह बहुत खूबसूरत था?' इमरान ने पूछा।
“बकवास मत करो। बताओ मुझे....वह अजीब था और उसका वह जुमला....तुम मुझे गुस्सा नहीं दिला सकती....और उसने पूछा था कि तुम्हें किसने भेजा है।"
"रूशी....! तुमने उसके बारे में क्या सोचा है?'' इमरान ने पूछा।
“मैंने! मैंने कुछ नहीं सोचा। वैसे वह चोरी के इलज़ाम में गिरफ्तार किया गया है। है न!"
“यही ख़ास प्वाइंट है....!'' इमरान कुछ सोचता हुआ बोला। “लेकिन उसने जो बातचीत तुमसे की थी....वह अजीब थी....थी या नहीं....अब तुम खुद अन्दाज़ा कर सकती हो।"
“यानी उसी के सिलसिले में हकीकत वह नहीं है जो ज़ाहिर की गयी है।"
"बस....बिलकुल ठीक है। इससे ज़्यादा मैं भी नहीं जानता।"
थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही फिर रूशी बड़बड़ाने लगी “और वह नीला परिन्दा....! बिलकुल कहानियों की बातें....!"
"नीला परिन्दा!” इमरान एक लम्बी साँस ले कर अपनी ठोड़ी खुजाने लगा। “मेरा ख़याल है कि उसे जमील के अलावा और किसी ने नहीं देखा। पेरिसियन नाइट क्लब के मैनेजर का यही बयान है। आज मैं कुछ ऐसे लोगों से भी मिलूँगा जिनके नाम मुझे मालूम हुए हैं।”
“किन लोगों से?”
"वही लोग जो उस शाम क्लब के डाइनिंग हॉल में मौजूद थे।"
लेकिन उसी दिन कुछ घण्टों के बाद इस सिलसिले में इमरान ने रूशी को जो कुछ भी बताया, वह मतलब का नहीं था। वह उन लोगों से मिला था जो वारदात की शाम क्लब में मौजूद थे। लेकिन उन्हें वहाँ कोई परिन्दा नहीं दिखा था। अलबत्ता उन्होंने जमील को बौखलाये हुए अन्दाज़ में उछलते ज़रूर देखा था।
“फिर अब क्या ख़याल है!” रूशी ने कहा।
“फिलहाल....कुछ भी नहीं।" इमरान ने कहा और जेब में च्यूइंगम का पैकेट तलाश करने लगा....रूशी मेज़ पर पड़े हुए चाकू से खेलने लगी। उसके जेहन में एक साथ कई सवाल थे। इमरान थोड़ी देर तक ख़ामोश रहा फिर बोला।
"फ़ैयाज़ ने कहा था कि नाइट क्लब में वह परिन्दा कई आदमियों को दिखा था....लेकिन दूसरों के बयान उसके उलटे हैं।"
“हो सकता है कि कैप्टन फ़ैयाज़ को ग़लत ख़बर मिली हो।' रूशी ने कहा। “उसे ये सारी ख़बरें सज्जाद से मिली थीं और सज्जाद जमील का चचा है।"
"अच्छा....तो फिर इसका मतलब यह हुआ खुद जमील ही इन ख़बरों के लिए ज़िम्मेदार है।"
"हाँ....फ़िलहाल तो यही समझा जा सकता है।'' इमरान कुछ सोचता हुआ बोला। "अच्छा तो मैं चला....जमील मुझसे मिलना चाहता है....!"
जमील की कोठी में सबसे पहले सईदा ही से टक्कर हुई....उसने इमरान को देख कर बुरा-सा मुँह बनाया और इससे पहले कि इमरान जमील के बारे में पूछता, सईदा ने कहा। " आख़िर आप इतना बनते क्यों हैं।"
इमरान किसी सोच में पड़ गया। फिर उसने कहा। “हालाँकि आपने यह बात उर्दू ही में पूछी है, लेकिन मेरी समझ में नहीं आयी।"
“आप यहाँ क्यों आये हैं?' सईदा ने पूछा।
"ओह....आपने कहा था....शायद जमील साहब मुझसे मिलना चाहते हैं।"
"जमील साहब नहीं, बल्कि मैं ख़ुद मिलना चाहती थी।"
“मिलिए!'' इमरान सिर झुका कर ख़ामोश हो गया।
"जमील भाई किसी से नहीं मिलते।" सईदा ने कहा। "उस दिन आपकी उस तदबीर ने बड़ा काम किया था।"
“जमील साहब ने दूसरों को बेकार में उल्लू बना रखा है।'' इमरान गुस्से में बोला।
"क्या मतलब....?"
आँखों में ऐसी चमक थी जो सिर्फ ईमानदार आदमियों ही की आँखों में नज़र आ सकती है।
रूशी को देख कर वह सलाखों के करीब आ गया। “मैं आपको नहीं जानता।" वह रूशी को घरता हुआ धीरे से बोला।
रूशी ने एक कहकहा लगाया जिसका अन्दाज़ चिढ़ाने जैसा था। रूशी ने उस वक़्त अपने ज़ेहन को बिलकल आज़ाद कर दिया था। वह अपने तौर पर उससे बातचीत करना चाहती थी। इमरान के बताये हए तरीकों पर अमल करने का उसका इरादा नहीं था....इमरान की बातों से उसने अन्दाज़ा कर लिया था कि वह सिर्फ इस मुलाकात का असर मालूम करना चाहता है। इसके अलावा और कोई मकसद नहीं।"
“आप कौन हैं?'' कैदी ने फिर पूछा।
“मैं आहा....!'' रूशी ने फिर कहक़हा लगाया और बुरी औरतों की तरह बेढंगेपन से लचकने लगी।
“मैं समझ गया।” कैदी धीरे से बड़बड़ाया। “लेकिन तुम मुझे गुस्सा नहीं दिला सकतीं। बिलकुल नहीं। कभी नहीं।"
बात बड़ी अजीब थी और उन जुमलों पर गौर करते वक़्त रूशी की अदाकारी ख़त्म हो गयी और वह एक सीधी-साधी औरत दिखने लगी। कैदी उसे गौर और दिलचस्पी से देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तुम्हें यहाँ किसने भेजा है?"
अचानक रूशी का ज़ेहन फिर जागा, उसने मायूसी से सिर हिला कर कहा, “नहीं, तुम वह आदमी नहीं मालूम होते।"
"कौन आदमी?' “
क्या तुम्हारा नाम सलीम है?"
“जी हाँ, मेरा ही नाम है।"
“और तुम नवाबज़ादा शौकत के लेबोरेटरी असिस्टेंट थे?"
"हाँ, यह भी ठीक है।"
"फिर तुम वही आदमी हो?"
कैदी के चेहरे पर फ़िक्रमन्दी के आसार पैदा हो गये, लेकिन उनमें दहशत का दख़ल नहीं था.... वह ख़ाली ज़ेहन के अन्दाज़ में कुछ पल रूशी के चेहरे पर नज़र जमाये रहा, फिर दो-तीन क़दम पीछे हट कर बोला, “तुम जा सकती हो।"
"लेकिन....अगर....तुम सलीम....!"
“मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। यहाँ से चली जाओ।"
“मगर....वह....!"
“जाओ!" वह गला फाड़ कर चीख़ा और दो पहरेदार तेज़ी से चलते हुए सलाखों के पास पहुँच गये....इससे पहले कि कैदी कुछ कहता, रूशी बोल पड़ी, "तुम फ़िक्र न करो, सलीम, मैं तुम्हारे घर वालों की अच्छी तरह ख़बर लेती रहूंगी।"
और फिर वह जवाब का इन्तज़ार किये बगैर बाहर निकल गयी।
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इमरान ने रूशी का बयान बहुत ग़ौर से सुना और कुछ पल ख़ामोश रह कर बोला, "तुम वाकई चल निकली हो। इससे ज़्यादा मैं भी न कर सकता...."
“और तुम मेरी इस कार्रवाई से मुतमईन हो?'' रूशी ने पूछा।
"इतना मुतमईन....कि....!"
इमरान जुमला पूरा न कर सका, क्योंकि किसी ने कमरे के दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक दी।
"हाँ....ऑ....कम इन!” इमरान ने दरवाज़े को घूरते हुए कहा।
एक लड़की दरवाज़ा खोल कर कमरे में आयी....इमरान ने उस पर एक उचटती सी नज़र डाली....
“मैं सईदा हूँ!” लड़की ने कहा। “आपने मुझे देखा तो होगा।"
“नहीं, अभी नहीं देख सका। सेक्रेटरी, मेरी ऐनक!"
लड़की उस पर कुछ झुंझला-सी गयी। “मैं सज्जाद साहब की लड़की हुँ।'
“लाहौल विला कूवत। मैं लड़का समझा था....बैठिए! सेक्रेटरी! डायरी में देखो....ये अमजाद साहब कौन हैं?''
“सज्जाद साहब!” लड़की गुस्से में बोली। “ आख़िर आप मेरा मज़ाक क्यों उड़ा रहे हैं।" ___
“मैंने आज तक पतंग के अलावा और कोई चीज़ नहीं उड़ायी, आप यक़ीन कीजिए....यूँ तो उड़ाने को मेरे ख़िलाफ़ बेपर की भी उड़ायी जा सकती है।'
“मैं यह कहने आयी थी कि जमील भाई आपसे मिलना चाहते हैं।'' सईदा झल्ला कर खड़ी हो गयी।
“सेक्रेटरी....ज़रा डायरी....!" इमरान का जुमला पूरा होने से पहले ही सईदा कमरे से निकल गयी।
“उस लड़की को मैंने कहीं देखा है।'' रूशी बोली। “तुमने क्या कह दिया वह गुस्से में मालूम होती थी।'' इमरान ख़ामोश रहा। इतने में फ़ोन की घण्टी बज उठी। इमरान ने बढ़ कर रिसीवर उठा लिया। __"हैलो....हाँ....हाँ....! हम ही बोल रहे हैं। सितवत जाह! ओह....अच्छा ....अच्छा ! ज़रूर....हम ज़रूर आयेंगे....!"
इमरान ने रिसीवर रख कर अंगड़ाई ली और यूँ ही मुस्कुराने लगा।
“मुझे उस आदमी....सलीम के बारे में बताओ....' रूशी ने कहा।
"क्या वह बहुत खूबसूरत था?' इमरान ने पूछा।
“बकवास मत करो। बताओ मुझे....वह अजीब था और उसका वह जुमला....तुम मुझे गुस्सा नहीं दिला सकती....और उसने पूछा था कि तुम्हें किसने भेजा है।"
"रूशी....! तुमने उसके बारे में क्या सोचा है?'' इमरान ने पूछा।
“मैंने! मैंने कुछ नहीं सोचा। वैसे वह चोरी के इलज़ाम में गिरफ्तार किया गया है। है न!"
“यही ख़ास प्वाइंट है....!'' इमरान कुछ सोचता हुआ बोला। “लेकिन उसने जो बातचीत तुमसे की थी....वह अजीब थी....थी या नहीं....अब तुम खुद अन्दाज़ा कर सकती हो।"
“यानी उसी के सिलसिले में हकीकत वह नहीं है जो ज़ाहिर की गयी है।"
"बस....बिलकुल ठीक है। इससे ज़्यादा मैं भी नहीं जानता।"
थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही फिर रूशी बड़बड़ाने लगी “और वह नीला परिन्दा....! बिलकुल कहानियों की बातें....!"
"नीला परिन्दा!” इमरान एक लम्बी साँस ले कर अपनी ठोड़ी खुजाने लगा। “मेरा ख़याल है कि उसे जमील के अलावा और किसी ने नहीं देखा। पेरिसियन नाइट क्लब के मैनेजर का यही बयान है। आज मैं कुछ ऐसे लोगों से भी मिलूँगा जिनके नाम मुझे मालूम हुए हैं।”
“किन लोगों से?”
"वही लोग जो उस शाम क्लब के डाइनिंग हॉल में मौजूद थे।"
लेकिन उसी दिन कुछ घण्टों के बाद इस सिलसिले में इमरान ने रूशी को जो कुछ भी बताया, वह मतलब का नहीं था। वह उन लोगों से मिला था जो वारदात की शाम क्लब में मौजूद थे। लेकिन उन्हें वहाँ कोई परिन्दा नहीं दिखा था। अलबत्ता उन्होंने जमील को बौखलाये हुए अन्दाज़ में उछलते ज़रूर देखा था।
“फिर अब क्या ख़याल है!” रूशी ने कहा।
“फिलहाल....कुछ भी नहीं।" इमरान ने कहा और जेब में च्यूइंगम का पैकेट तलाश करने लगा....रूशी मेज़ पर पड़े हुए चाकू से खेलने लगी। उसके जेहन में एक साथ कई सवाल थे। इमरान थोड़ी देर तक ख़ामोश रहा फिर बोला।
"फ़ैयाज़ ने कहा था कि नाइट क्लब में वह परिन्दा कई आदमियों को दिखा था....लेकिन दूसरों के बयान उसके उलटे हैं।"
“हो सकता है कि कैप्टन फ़ैयाज़ को ग़लत ख़बर मिली हो।' रूशी ने कहा। “उसे ये सारी ख़बरें सज्जाद से मिली थीं और सज्जाद जमील का चचा है।"
"अच्छा....तो फिर इसका मतलब यह हुआ खुद जमील ही इन ख़बरों के लिए ज़िम्मेदार है।"
"हाँ....फ़िलहाल तो यही समझा जा सकता है।'' इमरान कुछ सोचता हुआ बोला। "अच्छा तो मैं चला....जमील मुझसे मिलना चाहता है....!"
जमील की कोठी में सबसे पहले सईदा ही से टक्कर हुई....उसने इमरान को देख कर बुरा-सा मुँह बनाया और इससे पहले कि इमरान जमील के बारे में पूछता, सईदा ने कहा। " आख़िर आप इतना बनते क्यों हैं।"
इमरान किसी सोच में पड़ गया। फिर उसने कहा। “हालाँकि आपने यह बात उर्दू ही में पूछी है, लेकिन मेरी समझ में नहीं आयी।"
“आप यहाँ क्यों आये हैं?' सईदा ने पूछा।
"ओह....आपने कहा था....शायद जमील साहब मुझसे मिलना चाहते हैं।"
"जमील साहब नहीं, बल्कि मैं ख़ुद मिलना चाहती थी।"
“मिलिए!'' इमरान सिर झुका कर ख़ामोश हो गया।
"जमील भाई किसी से नहीं मिलते।" सईदा ने कहा। "उस दिन आपकी उस तदबीर ने बड़ा काम किया था।"
“जमील साहब ने दूसरों को बेकार में उल्लू बना रखा है।'' इमरान गुस्से में बोला।
"क्या मतलब....?"