S
StoryPublisher
Guest
सज्जाद उसे घूरने लगा....और शौकत की आँखें भी हैरत से फैल गयी थीं। फ़ैयाज़ इस तरह ख़ामोश बैठा था जैसे उसे साँप सूंघ गया हो।
“दूसरी हरकत मेरी थी....और तुम्हारी लड़की को कोई बीमारी नहीं है। उन दागों को ख़ालिस स्पिरिट से धो डालने पर चेहरा साफ़ हो जायेगा....!"
“खैर....खैर....मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाया जा रहा है और मैं अदालत में देख लूँगा।'
“ज़रूर देखना सज्जाद! वाक़ई तुम्हारे ख़िलाफ़ सबूत पहुँचाना बड़ा मुश्किल काम होगा। लेकिन यह बताओ....कि पिछली रात अपनी लडकी का चेहरा देख कर तुम बेतहाशा ईंधन के गोदाम की तरफ़ क्यों भागे थे....बताओ....बोलो.... जवाब दो।"
तभी सज्जाद के चेहरे पर ज़र्दी फैल गयी। माथे पर पसीने की बूंदें फूट आयीं। आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगी और फिर उसकी गर्दन अचानक एक तरफ़ ढलक गयी। वह बेहोश हो गया था।
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
उसी शाम को इमरान, रूशी और फ़ैयाज़ रॉयल होटल में चाय पी रहे थे। फ़ैयाज़ का चेहरा उतरा हुआ था और इमरान कह रहा था, “मुझे उसी वक़्त यकीन हो गया था कि सलीम शौकत से नाराज़ नहीं है जब उसने जेल से निकलने के बाद जावेद मिर्जा की कोठी का रुख़ किया था।"
“मगर ईंधन के गोदाम से क्या बरामद हुआ है!'' रूशी ने कहा। "तुमने वह बात अधूरी छोड़ दी थी....!"
"वहाँ से एक ज़हरीला डिब्बा बरामद हुआ है जिस में वाइरस हैं....और नीले रंग के परिन्दों का एक ढेर-रबड़ के तीन परिन्दे....गोंद की एक बोतल और इंजेक्शन की तीन सइयाँ....क्या समझी....वह हक़ीक़त में परिन्दा नहीं था जिसे जमील ने अपनी गर्दन से खींच कर खिड़की के बाहर फेंका था....बल्कि रबड़ का परिन्दा था, जिस पर गोंद से नीले रंग के पर चिपकाये गये थे। उसके पेट में वह थैली भरी गयी थी जिसमें वाइरस थे। परिन्दे की चोंच की जगह इंजेक्शन लगाने वाली खोखली सुई फ़िट की गयी थी....पहले जमील पर बाहर से खिडकी के ज़रिये एक परिन्दा ही फेंका गया था। जो उसके कन्धे से टकरा कर उड़ गया था। फिर वह नकली परिन्दा फेंका गया, जिसमें लगी हुई सुई उसकी गर्दन में घुस गयी। ज़ाहिर है कि वह बदहवास हो गया होगा। जैसे ही उसने उसे पकड़ा होगा, दबाव पड़ने से सुई के रास्ते उसकी गर्दन में वाइरस दाखिल हो गया होगा....फिर उसने बौखलाहट में उसे खींच कर खिड़की के बाहर फेंक दिया। पहले नीले रंग का एक परिन्दा उसके कन्धे से टकरा कर उड़ चुका था। इसलिए उसने उसे भी परिन्दा ही समझा....और पिछली रात....वाह....वह भी अजीब इत्तफ़ाक़ था। मैं जमील की कोठी में घुसा। सईदा को क्लोरोफ़ॉर्म के ज़रिये बेहोश करके उसके चेहरे पर अपनी एक ईजाद आज़मायी जिसे मेकअप के सिलसिले में और ज़्यादा तरक्की देने का ख़याल रखता हूँ। फिर क्लोरोफ़ॉर्म का असर बेकार होने का इन्तज़ार रहा।
यह सब मैंने इसलिए किया था कि घर वालों पर इसका असर देख सकॅ। खास तौर से सज्जाद की तरफ़ ख़याल भी नहीं था। जैसे ही मैंने महसस किया कि अब क्लोरोफॉर्म का असर बेकार हो रहा है। मैंने उसके बाजू में सुई चुभोई और पलँग के नीचे घुस गया....फिर हंगामा खड़ा हो गया। सज्जाद ही सबसे ज़्यादा बदहवास दिख रहा था। ज़ाहिर है कि उसे कोई अहमियत नहीं दी जा सकती थी, क्योंकि सईदा उसकी बेटी ही ठहरी....लेकिन जब मैंने उसे घर वालों को वहीं छोड़ कर एक तरफ़ भागते हुए देखा तो ....तुम ख़ुद सोचो फ़ैयाज़! भला उस वक्त इंधन के गोदाम में जाने का क्या तुक था। बहरहाल, सज्जाद ही ने बेख़बरी में अपने ख़िलाफ़ सबूत मुझे मुहैया कर दिये। दरअसल, उसकी मुसीबत ही आ गयी थी, वरना उन चीज़ों को रख छोड़ने की क्या ज़रूरत थी।"
“अच्छा बेटा! वह तो सब ठीक है!'' फ़ैयाज़ ने एक लम्बी अंगड़ाई ले कर कहा। “पर तुम्हारा वह आई कार्ड।”
“यह हक़ीक़त है कि मैं तुम्हारा अफ़सर हूँ। मेरा ताल्लक सीधे होम डिपार्टमेंट से है। और होम सेक्रेटरी सर सुलतान ने मुझे तैनात किया है....लेकिन ख़बरदार....ख़बरदार....इसकी जानकारी डैडी को न होने पाये, वरना तुम्हारी मिट्टी पलीद कर दूंगा समझे....!''
फ़ैयाज़ का चेहरा लटक गया। उसके लिए यह नयी जानकारी बड़ी तकलीफ़देह थी।
"तुमने मुझे भी आज तक इससे बेख़बर रखा।'' रूशी ने झल्लायी हुई आवाज़ में कहा। __
“अरे, किसकी बातों में आयी हो रूशी डियर!' इमरान बुरा-सा मुँह बना कर बोला।
“यह इमरान बोल रहा है....इमरान जिसने सच बोलना सीखा ही नहीं....
मैं तो फ़ैयाज़ को घिस रहा था।"
इमरान के इस आख़िरी जुमले पर फ़ैयाज़ को भरोसा नहीं था और वह किसी सोच में डूबा हुआ नज़र आ रहा था।
समाप्त
“दूसरी हरकत मेरी थी....और तुम्हारी लड़की को कोई बीमारी नहीं है। उन दागों को ख़ालिस स्पिरिट से धो डालने पर चेहरा साफ़ हो जायेगा....!"
“खैर....खैर....मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाया जा रहा है और मैं अदालत में देख लूँगा।'
“ज़रूर देखना सज्जाद! वाक़ई तुम्हारे ख़िलाफ़ सबूत पहुँचाना बड़ा मुश्किल काम होगा। लेकिन यह बताओ....कि पिछली रात अपनी लडकी का चेहरा देख कर तुम बेतहाशा ईंधन के गोदाम की तरफ़ क्यों भागे थे....बताओ....बोलो.... जवाब दो।"
तभी सज्जाद के चेहरे पर ज़र्दी फैल गयी। माथे पर पसीने की बूंदें फूट आयीं। आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगी और फिर उसकी गर्दन अचानक एक तरफ़ ढलक गयी। वह बेहोश हो गया था।
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
उसी शाम को इमरान, रूशी और फ़ैयाज़ रॉयल होटल में चाय पी रहे थे। फ़ैयाज़ का चेहरा उतरा हुआ था और इमरान कह रहा था, “मुझे उसी वक़्त यकीन हो गया था कि सलीम शौकत से नाराज़ नहीं है जब उसने जेल से निकलने के बाद जावेद मिर्जा की कोठी का रुख़ किया था।"
“मगर ईंधन के गोदाम से क्या बरामद हुआ है!'' रूशी ने कहा। "तुमने वह बात अधूरी छोड़ दी थी....!"
"वहाँ से एक ज़हरीला डिब्बा बरामद हुआ है जिस में वाइरस हैं....और नीले रंग के परिन्दों का एक ढेर-रबड़ के तीन परिन्दे....गोंद की एक बोतल और इंजेक्शन की तीन सइयाँ....क्या समझी....वह हक़ीक़त में परिन्दा नहीं था जिसे जमील ने अपनी गर्दन से खींच कर खिड़की के बाहर फेंका था....बल्कि रबड़ का परिन्दा था, जिस पर गोंद से नीले रंग के पर चिपकाये गये थे। उसके पेट में वह थैली भरी गयी थी जिसमें वाइरस थे। परिन्दे की चोंच की जगह इंजेक्शन लगाने वाली खोखली सुई फ़िट की गयी थी....पहले जमील पर बाहर से खिडकी के ज़रिये एक परिन्दा ही फेंका गया था। जो उसके कन्धे से टकरा कर उड़ गया था। फिर वह नकली परिन्दा फेंका गया, जिसमें लगी हुई सुई उसकी गर्दन में घुस गयी। ज़ाहिर है कि वह बदहवास हो गया होगा। जैसे ही उसने उसे पकड़ा होगा, दबाव पड़ने से सुई के रास्ते उसकी गर्दन में वाइरस दाखिल हो गया होगा....फिर उसने बौखलाहट में उसे खींच कर खिड़की के बाहर फेंक दिया। पहले नीले रंग का एक परिन्दा उसके कन्धे से टकरा कर उड़ चुका था। इसलिए उसने उसे भी परिन्दा ही समझा....और पिछली रात....वाह....वह भी अजीब इत्तफ़ाक़ था। मैं जमील की कोठी में घुसा। सईदा को क्लोरोफ़ॉर्म के ज़रिये बेहोश करके उसके चेहरे पर अपनी एक ईजाद आज़मायी जिसे मेकअप के सिलसिले में और ज़्यादा तरक्की देने का ख़याल रखता हूँ। फिर क्लोरोफ़ॉर्म का असर बेकार होने का इन्तज़ार रहा।
यह सब मैंने इसलिए किया था कि घर वालों पर इसका असर देख सकॅ। खास तौर से सज्जाद की तरफ़ ख़याल भी नहीं था। जैसे ही मैंने महसस किया कि अब क्लोरोफॉर्म का असर बेकार हो रहा है। मैंने उसके बाजू में सुई चुभोई और पलँग के नीचे घुस गया....फिर हंगामा खड़ा हो गया। सज्जाद ही सबसे ज़्यादा बदहवास दिख रहा था। ज़ाहिर है कि उसे कोई अहमियत नहीं दी जा सकती थी, क्योंकि सईदा उसकी बेटी ही ठहरी....लेकिन जब मैंने उसे घर वालों को वहीं छोड़ कर एक तरफ़ भागते हुए देखा तो ....तुम ख़ुद सोचो फ़ैयाज़! भला उस वक्त इंधन के गोदाम में जाने का क्या तुक था। बहरहाल, सज्जाद ही ने बेख़बरी में अपने ख़िलाफ़ सबूत मुझे मुहैया कर दिये। दरअसल, उसकी मुसीबत ही आ गयी थी, वरना उन चीज़ों को रख छोड़ने की क्या ज़रूरत थी।"
“अच्छा बेटा! वह तो सब ठीक है!'' फ़ैयाज़ ने एक लम्बी अंगड़ाई ले कर कहा। “पर तुम्हारा वह आई कार्ड।”
“यह हक़ीक़त है कि मैं तुम्हारा अफ़सर हूँ। मेरा ताल्लक सीधे होम डिपार्टमेंट से है। और होम सेक्रेटरी सर सुलतान ने मुझे तैनात किया है....लेकिन ख़बरदार....ख़बरदार....इसकी जानकारी डैडी को न होने पाये, वरना तुम्हारी मिट्टी पलीद कर दूंगा समझे....!''
फ़ैयाज़ का चेहरा लटक गया। उसके लिए यह नयी जानकारी बड़ी तकलीफ़देह थी।
"तुमने मुझे भी आज तक इससे बेख़बर रखा।'' रूशी ने झल्लायी हुई आवाज़ में कहा। __
“अरे, किसकी बातों में आयी हो रूशी डियर!' इमरान बुरा-सा मुँह बना कर बोला।
“यह इमरान बोल रहा है....इमरान जिसने सच बोलना सीखा ही नहीं....
मैं तो फ़ैयाज़ को घिस रहा था।"
इमरान के इस आख़िरी जुमले पर फ़ैयाज़ को भरोसा नहीं था और वह किसी सोच में डूबा हुआ नज़र आ रहा था।
समाप्त