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Guest
इतनी ठंडक मानो एसी लगा रखा हो.., लेकिन वहाँ पड़े एक पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाए हुए एक बिछावन को पड़ा देखकर मेने मंजरी की गान्ड दबाते हुए कहा –
क्या बात है मंजरी..,तुमने तो पहले से ही सारे इंतज़ाम कर रखे हैं यहाँ.., क्या तुम्हें पक्का मालूम था कि मे यहाँ अवंगा ही…?
मंजरी ने मुस्कराते हुए कहा – नही जी.., ऐसा नही है.., ये तो हमेशा यहाँ पड़ी रहती है.., कभी कभार दोपहर की गर्मी से बचने के लिए एकांत में हम दोनो मियाँ बीवी मज़े करने चले आते हैं…!
अभी तो बस मेने यहाँ साफ-सफाई की है…, आपको पसंद आई ना ये जगह..?
मेने उस बिछावन पर बैठते हुए कहा – पसंद…? बहुत पसंद आई.., लगता है यहाँ प्राकृतिक एसी लगा दिया हो.., और सबसे बड़ी बात चारों तरफ से एकदम पॅक…, सच में बहुत अच्छी जगह है…!
पर तुम मुझे यहाँ क्यों लेकर आई हो…? मेने जानबूझकर उसे छेड़ते हुए कहा…!
मंजरी ने मेरे सीने पर अपने हाथ का दबाब डालकर मुझे उस बिछावन पर लिटाते हुए कहा – बड़े बेईमान हैं आप.., वादा करके पुछ्ते हैं..यहाँ क्यों लाई हूँ…?
भूल गये कल सुबह जाते वखत क्या कहा था आपने…? ये कहते हुए वो मेरी शर्ट के बटन खोलते हुए बोली – अब आप चुप चाप यहाँ लेटे रहिए और मुझे जो करना है वो मुझे करने दीजिए…!
मेने उसकी कमर में अपने हाथ लपेटकर उसे अपने उपर खींचते हुए कहा – ये तो सरासर ज़्यादती कर रही हो मेरे साथ.., तुम ही सब कुच्छ करोगी.. और मुझे कुच्छ भी नही करने डोगी…?
ये कहकर मेने उसके पतले पतले थोड़े साँवले होठों पर अपने होठ टीका दिए और उनसे रस चूसने लगा…!
मंजरी को शायद होठ चूसने का कोई एक्सपीरियेन्स नही था.., उसने अपने होठ कसकर बंद कर लिए.., लेकिन मेरी जीभ उसके होठों पर निरंतर दबाब बनाती रही और एक दो बार की कोशिश के बाद उसे उसके दाँतों को छुने का सौभाग्य मिल ही गया…!
क्षण भर में ही मंजरी को मेरी जीभ का स्पर्श अच्छा लगने लगा और उसने अपने होठ खोल दिए.., अब वो भी मेरे उपर के होठ को अपने होठों में दबाकर उसका रस चूसने लगी…!
मौका देखकर मेने अपनी जीभ उसके मूह में पहुँचा दी.., अब वो उसकी जीभ के साथ अठखेलियाँ कर रही थी.., मंजरी को इसमें मज़ा आने लगा और वो भी मेरी जीभ से अपनी जीभ को भिड़ाने लगी…!
दोनो की जीभ और होठ आपस में संघर्ष करने लगे.., नतीजा दोनो के अंदर की वासना जाग उठी और अब ये खेल केवल होठों के चूसने तक ही सीमित नही रहा.. मेरे हाथ भी अपना कमाल दिखा रहे थे..,
उसकी सूती साड़ी और लहंगे को सरका कर उसकी पीठ तक चढ़ा दिया साथ ही मेने उसके गोल-मटोल गान्ड के उभारों को अपने पंजों में दबाकर मसल दिया…!
मंजरी ने अपना मूह उपर करके एक कामुक सिसकी ली…, उसकी चूत का दबाब मेरे लंड पर बढ़ गया.., जो अब पॅंट के अंदर किसी कोबरा नाग की तरह फुसकारें मारने लगा था…!
लंड का दबाब पड़ते ही मंजरी की चूत में चींटिया सी दौड़ने लगी.., वो मेरे शरीर पर नागिन की तरह लहराती हुई नीचे को सरकती चली गयी और उसने मेरे पॅंट की जीप खींचकर पॅंट को अंडरवेर के साथ नीचे सरका दिया…!
मेरा 8” से भी बड़ा और उसकी कलाई जैसा मोटा लंड किसी सोहगाई के गुड्डे की तरह उछल्कर सीधा तक्क्क खड़ा उसकी आँखों के सामने आगया.., जिसे देख कर उसकी आँखें फटी रह गयी…,
हाई…दैयाअ…इतना बड़ा लंड.., ये तो चूत को पोखरा बना देता होगा.., कैसे लेती होगी इसे आपकी बीवी..?
मेने उसके ब्लाउस के बटन खोलते हुए कहा – उसकी छोड़ो.., तुम बताओ.., अच्छा नही लगा तुम्हें तो रहने दो…?
मंजरी तपाक से बोली… नहीं..नहीं… बहुत अच्छा है.., पर थोड़ा बड़ा है.., मुझे अपने हिसाब से करने देना इसके साथ…!
मेने उसकी नंगी गोल-गोल गेंद जैसी मुलायम चुचियों को अपने पंजों में कसते हुए कहा – क्या करने दूं इसके साथ..?
मंजरी – कुच्छ नही.., बस आप चुप चाप लेटे रहिए.., ये कहकर उसने मेरे गरम लंड को अपने दोनो हाथों में जकड लिया और वो उसके साथ खेलने लगी..
कभी वो उसे अपने हाथ की बिलस्त से नापति.., तो कभी उसकी गर्मी को अपने गालों पर लगाकर महसूस करती.., फिर मेरी तरफ देखकर बोली – क्या मे इससे चखकर देखूं.. मन कर रहा है मूह में लेने का…?
मे – हां.. हां क्यों नही.., अब तो ये तुम्हारे कब्ज़े में ही है.., जो चाहे करो.., ये सुनते ही मंजरी ने उसके सुपाडे को पूरी तरह से खोल लिया..,
खुले हुए लाल टमाटर जैसे सुपाडे को उसने अपने जीभ की नोक से चाटा.. और फिर थोड़ा सा अपने मूह में ले लिया…!
क्या बात है मंजरी..,तुमने तो पहले से ही सारे इंतज़ाम कर रखे हैं यहाँ.., क्या तुम्हें पक्का मालूम था कि मे यहाँ अवंगा ही…?
मंजरी ने मुस्कराते हुए कहा – नही जी.., ऐसा नही है.., ये तो हमेशा यहाँ पड़ी रहती है.., कभी कभार दोपहर की गर्मी से बचने के लिए एकांत में हम दोनो मियाँ बीवी मज़े करने चले आते हैं…!
अभी तो बस मेने यहाँ साफ-सफाई की है…, आपको पसंद आई ना ये जगह..?
मेने उस बिछावन पर बैठते हुए कहा – पसंद…? बहुत पसंद आई.., लगता है यहाँ प्राकृतिक एसी लगा दिया हो.., और सबसे बड़ी बात चारों तरफ से एकदम पॅक…, सच में बहुत अच्छी जगह है…!
पर तुम मुझे यहाँ क्यों लेकर आई हो…? मेने जानबूझकर उसे छेड़ते हुए कहा…!
मंजरी ने मेरे सीने पर अपने हाथ का दबाब डालकर मुझे उस बिछावन पर लिटाते हुए कहा – बड़े बेईमान हैं आप.., वादा करके पुछ्ते हैं..यहाँ क्यों लाई हूँ…?
भूल गये कल सुबह जाते वखत क्या कहा था आपने…? ये कहते हुए वो मेरी शर्ट के बटन खोलते हुए बोली – अब आप चुप चाप यहाँ लेटे रहिए और मुझे जो करना है वो मुझे करने दीजिए…!
मेने उसकी कमर में अपने हाथ लपेटकर उसे अपने उपर खींचते हुए कहा – ये तो सरासर ज़्यादती कर रही हो मेरे साथ.., तुम ही सब कुच्छ करोगी.. और मुझे कुच्छ भी नही करने डोगी…?
ये कहकर मेने उसके पतले पतले थोड़े साँवले होठों पर अपने होठ टीका दिए और उनसे रस चूसने लगा…!
मंजरी को शायद होठ चूसने का कोई एक्सपीरियेन्स नही था.., उसने अपने होठ कसकर बंद कर लिए.., लेकिन मेरी जीभ उसके होठों पर निरंतर दबाब बनाती रही और एक दो बार की कोशिश के बाद उसे उसके दाँतों को छुने का सौभाग्य मिल ही गया…!
क्षण भर में ही मंजरी को मेरी जीभ का स्पर्श अच्छा लगने लगा और उसने अपने होठ खोल दिए.., अब वो भी मेरे उपर के होठ को अपने होठों में दबाकर उसका रस चूसने लगी…!
मौका देखकर मेने अपनी जीभ उसके मूह में पहुँचा दी.., अब वो उसकी जीभ के साथ अठखेलियाँ कर रही थी.., मंजरी को इसमें मज़ा आने लगा और वो भी मेरी जीभ से अपनी जीभ को भिड़ाने लगी…!
दोनो की जीभ और होठ आपस में संघर्ष करने लगे.., नतीजा दोनो के अंदर की वासना जाग उठी और अब ये खेल केवल होठों के चूसने तक ही सीमित नही रहा.. मेरे हाथ भी अपना कमाल दिखा रहे थे..,
उसकी सूती साड़ी और लहंगे को सरका कर उसकी पीठ तक चढ़ा दिया साथ ही मेने उसके गोल-मटोल गान्ड के उभारों को अपने पंजों में दबाकर मसल दिया…!
मंजरी ने अपना मूह उपर करके एक कामुक सिसकी ली…, उसकी चूत का दबाब मेरे लंड पर बढ़ गया.., जो अब पॅंट के अंदर किसी कोबरा नाग की तरह फुसकारें मारने लगा था…!
लंड का दबाब पड़ते ही मंजरी की चूत में चींटिया सी दौड़ने लगी.., वो मेरे शरीर पर नागिन की तरह लहराती हुई नीचे को सरकती चली गयी और उसने मेरे पॅंट की जीप खींचकर पॅंट को अंडरवेर के साथ नीचे सरका दिया…!
मेरा 8” से भी बड़ा और उसकी कलाई जैसा मोटा लंड किसी सोहगाई के गुड्डे की तरह उछल्कर सीधा तक्क्क खड़ा उसकी आँखों के सामने आगया.., जिसे देख कर उसकी आँखें फटी रह गयी…,
हाई…दैयाअ…इतना बड़ा लंड.., ये तो चूत को पोखरा बना देता होगा.., कैसे लेती होगी इसे आपकी बीवी..?
मेने उसके ब्लाउस के बटन खोलते हुए कहा – उसकी छोड़ो.., तुम बताओ.., अच्छा नही लगा तुम्हें तो रहने दो…?
मंजरी तपाक से बोली… नहीं..नहीं… बहुत अच्छा है.., पर थोड़ा बड़ा है.., मुझे अपने हिसाब से करने देना इसके साथ…!
मेने उसकी नंगी गोल-गोल गेंद जैसी मुलायम चुचियों को अपने पंजों में कसते हुए कहा – क्या करने दूं इसके साथ..?
मंजरी – कुच्छ नही.., बस आप चुप चाप लेटे रहिए.., ये कहकर उसने मेरे गरम लंड को अपने दोनो हाथों में जकड लिया और वो उसके साथ खेलने लगी..
कभी वो उसे अपने हाथ की बिलस्त से नापति.., तो कभी उसकी गर्मी को अपने गालों पर लगाकर महसूस करती.., फिर मेरी तरफ देखकर बोली – क्या मे इससे चखकर देखूं.. मन कर रहा है मूह में लेने का…?
मे – हां.. हां क्यों नही.., अब तो ये तुम्हारे कब्ज़े में ही है.., जो चाहे करो.., ये सुनते ही मंजरी ने उसके सुपाडे को पूरी तरह से खोल लिया..,
खुले हुए लाल टमाटर जैसे सुपाडे को उसने अपने जीभ की नोक से चाटा.. और फिर थोड़ा सा अपने मूह में ले लिया…!